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बुधवार, 21 अगस्त 2013

message to sister on raksha bandhan -sanjiv

रक्षा बंधन पर बहिन को पाती:
संजीव 
*
बहिन! शुभ आशीष तेरा, भाग्य का मंगल तिलक
भाई वंदन कर रहा, श्री चरण का हर्षित-पुलक
भगिनियाँ शुचि मातृ-छाया, स्नेहमय कर हैं वरद
वृष्टि देवाशीष की, करतीं सतत- जीवन सुखद
स्नेह से कर भाई की रक्षा उसे उपकारतीं
आरती से विघ्न करतीं दूर, फिर मनुहारतीं
कभी दीदी, कभी जीजी, कभी वीरा है बहिन
कभी सिस्टर, भगिनी करती सदा ममता ही वहन
शक्ति-शारद-रमा की तुझमें त्रिवेणी है अगम
'सलिल' को भव-मुक्ति का साधन हुई बहिना सुगम
थामकर कर द्वयों में दो कुलों को तू बाँधती
स्नेह-सिंचन श्वास के संग आस नित नव राँधती
निकट हो दूर, देखी या अदेखी हो बहिन
भाग्य है वह भाई का, श्री चरण में शत-शत नमन
---------------------------------------------------------
Sanjiv verma 'Salil'
salil.sanjiv@gmail.com
http://divyanarmada.blogspot.in

मंगलवार, 20 अगस्त 2013

muktika: kaise?... sanjiv

मुक्तिका:
कैसे?… 
संजीव
*
जो हकीकत है तेरी दुनिया बताऊँ कैसे?
आइना आँख के अंधे को दिखाऊँ कैसे?
*
बात बढ़-चढ़ के तू करता है, तुझे याद रहे
तू है नापाक, तुझे पाक बुलाऊँ कैसे?
*
पाल चमचों को, नहीं कोई बड़ा होता है.
पूत दरबार में चढ़ पाए, सिखाऊँ कैसे?
*
हैं सितारे तेरे गर्दिश में सम्हल ऐ नादां!
तू है तिनका, तुझे बारिश में बचाऊँ कैसे?
*
'चोर की दाढ़ी में तिनका' की मसल याद रहे
किसी काने को कहो टेंट दिखाऊँ कैसे?
*
पीठ में भाई की भाई ने छुरा फिर घोंपा
लाल हैं सरहदें मस्तक न जुकाऊँ कैसे?
*
देख होता है अनय सच को छिपाऊँ कैसे?​
​कल कहा ठीक, गलत आज बताऊँ कैसे?
*
शीश कटते हैं जवानों के, नयन नम होते-
​सुन के भाषण औ' बहस महुद को मनाऊँ कैसे??

रविवार, 18 अगस्त 2013

sameeksha lekh: dr. mahendra bhatnagar ke geeton men alankaarik saundarya - sanjiv

विशेष आलेख:

डॉ. महेंद्र भटनागर के गीतों में अलंकारिक सौंदर्य

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

जगवाणी हिंदी को माँ वीणापाणी के सितार के तारों से झंकृत विविध रागों से उद्भूत सांस्कृत छांदस विरासत से समृद्ध होने का अनूठा सौभाग्य मिला है. संस्कृत साहित्य की सरस विरासत को हिंदी ने न केवल आत्मसात किया अपितु पल्लवित-पुष्पित भी किया. हिंदी सहित्योद्यान के गीत-वृक्ष पर झूमते-झूलते सुन्दर-सुरभिमय अगणित पुष्पों में अपनी पृथक पहचान और ख्याति से संपन्न डॉ. महेंद्र भटनागर गत ७ दशकों से विविध विधाओं (गीत, कविता, क्षणिका, कहानी, नाटक, साक्षात्कार, रेखाचित्र, लघुकथा, एकांकी, वार्ता संस्मरण, गद्य काव्य, रेडियो फीचर, समालोचना, निबन्ध आदि में) समान दक्षता के साथ सतत सृजन कर बहु चर्चित हुए हैं. उनके गीतों में सर्वत्र व्याप्त आलंकारिक वैभव का पूर्ण निदर्शन एक लेख में संभव न होने पर भी हमारा प्रयास इसकी एक झलक से पाठकों को परिचित कराना है. नव रचनाकर्मी इस लेख में उद्धृत उदाहरणों के प्रकाश में आलंकारिक माधुर्य और उससे उपजी रमणीयता को आत्मसात कर अपने कविकर्म को सुरुचिसंपन्न तथा सशक्त बनाने की प्रेरणा ले सकें, तो यह प्रयास सफल होगा.

संस्कृत काव्यशास्त्र में काव्य समीक्षा के विभिन्न सम्प्रदायों (अलंकार, रीति, वक्रोक्ति, ध्वनि, औचत्य, अनुमिति, रस) में से अलंकार, ध्वनि तथा रस को ही हिंदी गीति-काव्य ने आत्मार्पित कर नवजीवन दिया. असंस्कृत साहित्य में अलंकार को 'सौन्दर्यमलंकारः' ( अलंकार को काव्य का कारक), 'अलंकरोतीति अलंकारः' (काव्य सौंदर्य का पूरक) तथा अलंकार का मूल वक्रोक्ति को माना गया.

'सैषा सर्वत्र वक्रोक्तिरनयार्थो विभाच्याते.

यत्नोस्यां कविना कार्यः को लं कारो नया बिना..' २.८५ -भामह, काव्यालंकारः

डॉ. महेंद्र भटनागर के गीत-संसार में वक्रोक्ति-वृक्ष के विविध रूप-वृन्तों पर प्रस्फुटित-पुष्पित विविध अलंकार शोभायमान हैं. डॉ. महेंद्र भटनागर गीतों में स्वाभाविक भावाभिव्यक्ति के पोषक हैं. उनके गीतों में प्रयुक्त बिम्ब और प्रतीक सनातन भारतीय परंपरा से उद्भूत हैं जिन्हें सामान्य पाठक/श्रोता सहज ही आत्मसात कर लेता है. ऐसे पद सर्वत्र व्याप्त हैं जिनका उदाहरण देना नासमझी ही कहा जायेगा. ऐसे पद 'स्वभावोक्ति अलंकार' के अंतर्गत गण्य हैं.

शब्दालंकारों की छटा:

डॉ. महेंद्र भटनागर सामान्य शब्दों का विशिष्ट प्रयोग कर शब्द-ध्वनियों द्वारा पाठकों/श्रोताओं को मुग्ध करने में सिद्धहस्त हैं. वे वस्तु या तत्त्व को रूपायित कर संवेद्य बनाते हैं. शब्दालंकारों तथा अर्थालंकारों का यथास्थान प्रयोग गीतों के कथ्य को रमणीयता प्रदान करता है.

शब्दालंकारों के अंतर्गत आवृत्तिमूलक अलंकारों में अनुप्रास उन्हें सर्वाधिक प्रिय है.

'मैं तुम्हें अपना ह्रदय गा-गा बताऊँ, साथ छूटे यही कभी ना, हे नियति! करना दया, हे विधना! मोरे साजन का हियरा दूखे ना, आज आँखों में गया बस, प्रीत का सपना नया, निज बाहुओं में नेह से, लहकी-लहकी मधुर जवानी हो, नील नभ सर में मुदित-मुग्धा, तप्त तन को वारिदों सी छाँह दी आदि अगणित पंक्तियों में 'छेकानुप्रास' की छबीली छटा सहज दृष्टव्य है.

एक या अनेक वर्णों की अनेक आवृत्तियों से युक्त 'वृत्यानुप्रास' का सहज प्रयोग डॉ. महेंद्र जी के कवि-कर्म की कुशलता का साक्ष्य है. 'संसार सोने का सहज' (स की आवृत्ति), 'कन-कन की हर्षांत कहानी हो' ( क तथा ह की आवृत्ति), 'महकी मेरे आँगन में महकी' (म की आवृत्ति), 'इसके कोमल-कोमल किसलय' (क की आवृत्ति), 'गह-गह गहनों-गहनों गहकी!' (ग की आवृत्ति), 'चारों ओर झूमते झर-झर' (झ की आवृत्ति), 'मिथ्या मर्यादा का मद गढ़' (म की आवृत्ति) आदि इसके जीवंत उदाहरण हैं.

अपेक्षाकृत कम प्रयुक्त हुए श्रुत्यानुप्रास के दो उदाहरण देखिये- 'सारी रात सुध-बुध भूल नहाओ' (ब, भ) , काली-काली अब रात न हो, घन घोर तिमिर बरसात न हो' (क, घ) .

गीतों की काया को गढ़ने में 'अन्त्यानुप्रास' का चमत्कारिक प्रयोग किया है महेंद्र जी ने. दो उदाहरण देखिये- 'और हम निर्धन बने / वेदना कारण बने तथा 'बेसहारे प्राण को निज बाँह दी / तप्त तन को वारिदों सी छाँह दी / और जीने की नयी भर चाह दी' .

इन गीतों में 'भाव' को 'विचार' पर वरीयता प्राप्त है. अतः, 'लाटानुप्रास' कम ही मिलता है- 'उर में बरबस आसव री ढाल गयी होली / देखो अब तो अपनी यह चाल नयी हो ली.'

महेंद्र जी ने 'पुनरुक्तिप्रकाश' अलंकार के दोनों रूपों का अत्यंत कुशलता से प्रयोग किया है.

समानार्थी शब्दावृत्तिमय 'पुनरुक्तिप्रकाश' के उदाहरणों का रसास्वादन करें: 'कन-कन की हर्षांत कहानी हो, लहकी-लहकी मधुर जवानी हो, गह-गह गहनों-गहनों गहकी, इसके कोमल-कोमल किसलय, दलों डगमग-डगमग झूली, भोली-भोली गौरैया चहकी' आदि.

शब्द की भिन्नार्थक आवृत्तिमय पुनरुक्तिप्रकाश से उद्भूत 'यमक' अलंकार महेंद्र जी की रचनाओं को रम्य तथा बोधगम्य बनाता है: ' उर में बरबस आसव सी ढाल गयी होली / देखो अब तो अपनी यह चाल नयी होली' ( होली पर्व और हो चुकी), 'आँगन-आँगन दीप जलाओ (घर का आँगन, मन का आँगन).' आदि.

'श्लेष वक्रोक्ति' की छटा इन गीतों को अभिनव तथा अनुपम रूप-छटा से संपन्न कर मननीय बनाती है: 'चाँद मेरा खूब हँसता-मुस्कुराता है / खेलता है और फिर छिप दूर जाता है' ( चाँद = चन्द्रमा और प्रियतम), 'सितारों से सजी चादर बिछये चाँद सोता है'. काकु वक्रोक्ति के प्रयोग में सामान्यता तथा व्यंगार्थकता का समन्वय दृष्टव्य है: 'स्वर्ग से सुन्दर कहीं संसार है.'

चित्रमूलक अलंकार: हिंदी गीति काव्य के अतीत में २० वीं शताब्दी तक चित्र काव्यों तथा चित्रमूलक अलंकारों का प्रचुरता से प्रयोग हुआ किन्तु अब यह समाप्त हो चुका है. असम सामयिक रचनाकारों में अहमदाबाद के डॉ. किशोर काबरा ने महाकाव्य 'उत्तर भागवत' में महाकाल के पूजन-प्रसंग में चित्रमय पताका छंद अंकित किया है. डॉ. महेंद्र भटनागर के गीतों में लुप्तप्राय चित्रमूलक अलंकार यत्र-तत्र दृष्टव्य हैं किन्तु कवि ने उन्हें जाने-अनजाने अनदेखा किया है. बानगी देखें:

डॉ. महेंद्र भटनागर जी ने शब्दालंकारों के साथ-साथ अर्थालंकारों का प्रयोग भी समान दक्षता तथा प्रचुरता से किया है. छंद मुक्ति के दुष्प्रयासों से सर्वथा अप्रभावित रहते हुए भी उनहोंने न केवल छंद की साधना की अपितु उसे नए शिखर तक पहुँचाने का भागीरथ प्रयास किया.

प्रस्तुत-अप्रस्तुत के मध्य गुण- सादृश्य प्रतिपादित करते 'उपमा अलंकार' को वे पूरी सहजता से अंगीकार कर सके हैं. 'दिग्वधू सा ही किया होगा, किसी ने कुंकुमी श्रृंगार / झलमलाया सोम सा होगा किसी का रे रुपहला प्यार, बिजुरी सी चमक गयीं तुम / श्रुति-स्वर सी गमक गयीं तुम / दामन सी झमक गयीं तुम / अलबेली छमक गयीं तुम / दीपक सी दमक गयीं तुम, कौन तुम अरुणिम उषा सी मन-गगन पर छ गयी हो? / कौन तुम मधुमास सी अमराइयाँ महका गयी हो? / कौन तुम नभ अप्सरा सी इस तरह बहका गयी हो? / कौन तुम अवदात री! इतनी अधिक जो भा गयी हो? आदि-आदि.

रूपक अलंकार उपमेय और उपमान को अभिन्न मानते हुए उपमेय में उपमान का आरोप कर अपनी दिव्या छटा से पाठक / श्रोता का मन मोहता है. डॉ. महेंद्र भटनागर के गीतों में 'हो गया अनजान चंचल मन हिरन, झम-झमाकर नाच ले मन मोर, आस सूरज दूर बेहद दूर है, गाओ कि जीवन गीत बन जाये, गाओ पराजय जीत बन जाये, गाओ कि दुःख संगीत बन जाये, गाओ कि कण-कण मीत बन जाये, अंधियारे जीवन-नभ में बिजुरी सी चमक गयीं तुम, मुस्कुराये तुम ह्रदय-अरविन्द मेरा खिल गया है आदि में रूपक कि अद्भुत छटा दृष्टव्य है.'नभ-गंगा में दीप बहाओ, गहने रवि-शशि हों, गजरे फूल-सितारे, ऊसर-मन, रस-सागा, चन्द्र मुख, मन जल भरा मिलन पनघट, जीवन-जलधि, जीवन-पिपासा, जीवन बीन जैसे प्रयोग पाठक /श्रोता के मानस-चक्षुओं के समक्ष जिवंत बिम्ब उपस्थित करने में सक्षम है.

डॉ. महेंद्र भटनागर ने अतिशयोक्ति अलंकार का भी सरस प्रयोग सफलतापूर्वक किया है. एक उदाहरण देखें: 'प्रिय-रूप जल-हीन, अँखियाँ बनीं मीन, पर निमिष में लो अभी / अभिनव कला से फिर कभी दुल्हन सजाता हूँ, एक पल में लो अभी / जगमग नए अलोक के दीपक जलाता हूँ, कुछ क्षणों में लो अभी.'

डॉ. महेंद्र भटनागर के गीतों में अन्योक्ति अलंकार भी बहुत सहजता से प्रयुक्त हुआ है. किसी एक वस्तु या व्यक्ति को लक्ष्य कर कही बात किसी अन्य वस्तु या व्यक्ति पर घटित हो तो अन्योक्ति अलंकार होता है. इसमें प्रतीक रूप में बात कही जाती है जिसका भिन्नार्थ अभिप्रेत होता है. बानगी देखिये: 'सृष्टि सारी सो गयी है / भूमि लोरी गा रही है, तुम नहीं और अगहन की रात / आज मेरे मौन बुझते दीप में प्रिय / स्नेह भर दो / अब नहीं मेरे गगन पर चाँद निकलेगा.

कारण के बिना कार्य होने पर विशेषोक्ति अलंकार होता है. इन गीतों में इस अलंकार की व्याप्ति यत्र-तत्र दृष्टव्य है: 'जीवन की हर सुबह सुहानी हो, हर कदम पर आदमी मजबूर है आदि में कारन की अनुपस्थिति से विशेषोक्ति आभासित होता है.

'तुम्हारे पास मानो रूप का आगार है' में उपमेय में उपमान की सम्भावना व्यक्त की गयी है. यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है जिसका अपेक्षाकृत कम प्रयोग इन गीतों में मिला.

डॉ. महेंद्र भटनागर रूपक तथा उपमा के धनी गीतकार हैं. सम्यक बिम्बविधान, तथा मौलिक प्रतीक-चयन में उनकी असाधारण दक्षता ने उन्हें अछूते उपमानों की कमी नहीं होने दी है. फलतः, वे उपमेय को उपमान प्रायः नहीं कहते. इस कारन उनके गीतों में व्याजस्तुति, व्याजनिंदा, विभावना, व्यतिरेक, भ्रांतिमान, संदेह, विरोधाभास, अपन्हुति, प्रतीप, अनन्वय आदि अलंकारों की उपस्थति नगण्य है.

'चाँद मेरे! क्यों उठाया / जीवन जलधि में ज्वार रे?, कौन तुम अरुणिम उषा सी, मन गगन पर छा गयी हो?, नील नभ सर में मुदित-मुग्धा उषा रानी नहाती है, जूही मेरे आँगन में महकी आदि में मानवीकरण अलंकर की सहज व्याप्ति पाठक / श्रोता को प्रकृति से तादात्म्य बैठालने में सहायक होती है.

स्मरण अलंकार का प्रचुर प्रयोग डॉ. महेंद्र भटनागर ने अपने गीतों में पूर्ण कौशल के साथ किया है. चिर उदासी भग्न निर्धन, खो तरंगों को ह्रदय / अब नहीं जीवन जलधि में ज्वार मचलेगा, याद रह-रह आ रही है / रात बीती जा रही है, सों चंपा सी तुम्हारी याद साँसों में समाई है, सोने न देती छवि झलमलाती किसी की आदि अभिव्यक्तियों में स्मरण अलंकार की गरिमामयी उपस्थिति मन मोहती है.

तत्सम-तद्भव शब्द-भ्नादर के धनि डॉ. महेंद्र भटनागर एक वर्ण्य का अनेक विधि वर्णन करने में निपुण हैं. इस कारन गीतों में उल्लेख अलंकार की छटा निहित होना स्वाभाविक है. यथा: कौन तुम अरुणिम उषा सी?, मधु मॉस सी, नभ आभा सी, अवदात री?, बिजुरी सी, श्रुति-स्वर सी, दीपक सी / स्वागत पुत्री- जूही, गौरैया, स्वर्गिक धन आदि.

सच यह है कि डॉ. भटनागर के सृजन का फलक इतना व्यापक है कि उसके किसी एक पक्ष के अनुशीलन के लिए जिस गहन शोधवृत्ति की आवश्यकता है उसका शतांश भी मुझमें नहीं है. यह असंदिग्ध है की डॉ. महेंद्र भटनागर इस युग की कालजयी साहित्यिक विभूति हैं जिनका सम्यक और समुचित मूल्यांकन किया जाना चाहिए और उनके सृजन पर अधिकतम शोध कार्य उनके रहते ही हों तो उनकी रचनाओं के विश्लेषण में वे स्वयं भी सहायक होंगे. डॉ. महेंद्र भटनागर की लेखनी और उन्हें दोनों को शतशः नमन.

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सलिल.संजीव@जीमेल.कॉम / दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.com

doha salila : aaj ki baat -sanjiv

दोहा सलिला-
आज की बात :
संजीव
*
नर ने चुने नरेश बन,  भूल गए कर्तव्य
इसीलिये धुँधला लगे, आज 'सलिल' भवितव्य
*
रुपये को पैसा कहें, मिट जाएगा कष्ट
नीति यही सरकार की, बढ़ता रहे अनिष्ट
*
मुफ्त बाँट सौ- कर बढ़ा, करें वसूल हजार
चतुर आई.ए.एस. हैं, सचिवालय-सरकार
*
मान न मोल करें तनिक, श्रम का- हम दुत्कार
फिर मजूर कोई बने, क्यों? सहने फटकार??
*
नाकाबिल इंजीनियर, गढ़ते हैं कोलेज
श्रेष्ठ बढ़ई-मिस्त्री बनें, कोई न दे नोलेज
*
रहे भीख पर आश्रित, मतदाता- दे वोट
शासन के अनुदान के, पीछे भारी खोट
*
रोजगार पाकर गहे, शक्ति न लोक-समाज
नेतागण चाहें यही, करें निबल पर राज
*
देश नहीं दीवालिया,  धन ले गये विदेश
वापिस लाने के लिये, जनगण दे आदेश
*
सेना महज गुलाम है, मंत्रालय का दोष
मंत्री-सचिवों का बढ़े, कमा कमीशन कोष
*
पिठ्ठू है सरकार यह, अमरीका की मीत
उसके हित की नीतियाँ, बना गा रही गीत
*
होता है निर्यात कम, बहुत अधिक आयात
मंत्री-अफसर कमीशन ले, करते आघात
*
उत्पादन करते महज, यंत्री  श्रमिक किसान
शिक्षक डॉक्टर जरूरी, ज्ञान-जान की खान
*
शांति-व्यवस्था के लिए, सेना पुलिस सहाय
न्यायालय का भी नहीं,  दूजा कोई उपाय
*
बाबू अफसर भृत्य का, कहीं न कोई काम
मिटें दलाल-वकील भी, कर श्रम पायें नाम
*
जिसका उत्पादन अधिक, उसे मिले ईनाम
अन उत्पादक से छिनें, सुविधा 'सलिल' तमाम
*
जन-प्रतिनिधि दलहीन हों, राष्ट्रीय सरकार
रहें समर्थक सदन में, जैसे घर-परिवार
*
सब मिल संचालन करें, बने राष्ट्र-हित नीति
देश स्वावलंबी बने, महाशक्ति तज भीति
*
नर नरेश बनकर करे, सतत राष्ट्र-निर्माण
'सलिल' तभी हो सकेगा हर संकट से त्राण
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शनिवार, 17 अगस्त 2013

doha salila: bhavan mahatmya 2 -sanjiv

दोहा सलिला :
भवन माहात्म्य : 2
संजीव
*
[इंस्टिट्यूशन ऑफ़ इंजीनियर्स, लोकल सेंटर जबलपुर द्वारा गगनचुम्बी भवन (हाई राइज बिल्डिंग) पर १०-११ अगस्त २०१३ को आयोजित अखिल भारतीय संगोष्ठी  की स्मारिका में प्रकाशित कुछ दोहे।]
*

आते खाली हाथ सब, जाते खाली हाथ।
बना छोड़ते जो भवन, दें यश-अपयश नाथ।२६।
*
भवन हेतु धरती चुनें, जन-जीवन उपयुक्त।
सब प्रसन्न हो रह सकें, हिल-मिल हो उन्मुक्त।२७।
*
भवनों में दृश्यांकन, करें मनोरम आप।
निरखें- मन में शांति हो, पड़े ह्रदय पर छाप।२८।
*
सुन्दर-उपयोगी भवन, बना कमायें पुण्य।
रहवासी आशीष दें, तब जीवन हो धन्य।२९।
*
करतीं 'सलिल' इमारतें, जन-जीवन संपन्न।
अगर न हों तो हो मनुज, बेबस-दीन-विपन्न।३०।
*
नींव सदा मजबूत हो, सीधी हो दीवाल।
वायु-प्रकाश मिले प्रचुर, जीवन हो खुशहाल।३१।
*
भवन बनाने से बढ़े, वंश कीर्ति सुख नाम।
पंछी पाये नीड़ निज, शांति-सौख्य-विश्राम।३२।
*
भवन अगर कमजोर हो, कर सकते कुल-नाश।
मिट जाती मनु-सभ्यता, पल में जैसे ताश।३३।
*
भवन यांत्रिकी-दूत हैं, मानव को वरदान।
आपद-विपदा से बचा, तन में फूकें जान।३४।
*
पौधारोपण कीजिए, भवनों के चहुँ ओर।
उज्जवल उषा निहारिए, सुन्दर सांझ अंजोर।३५।
*
उपयोगी सुदृढ़ भवन, आते सबके काम।
हैं सचमुच बेदाम ये, सेवा दें अविराम।३६।
*
बिल्डिंग नहीं इमारतें, हैं जीवित इतिहास।
मानवता की धड़कनें, राष्ट्र-देव की श्वास।३७।
*
भवन बना रहते रहे, सुर-नर हो सम्पन्न।
भवन-हीन दानव रहे वन में घोर-विपन्न।३८।
*
भवन-सडक से सुख मिले, मणि-कांचन संयोग।
जीते जी ही स्वर्ग सा, सुख सकते सब भोग।३९।
*
भवनों का निर्माण कर, रक्षें भली प्रकार।
यातायात सुगम बने, 'सलिल' बढ़े व्यापार।४०।
*
गत से आगत तक बनें, भवन सभ्यता-सेतु।
शिल्प और तकनीक का, संगम सबके हेतु।४१।
*
ताप-शीत-बरखा सहें, भवन खड़े रह मौन।
रक्षा करने भवन की, आगे आये कौन?४२।
*
इमारतें कहतीं कथा, युग की- सुनिए चेत।
जो न सत्य पहचानता, वह रहता है खेत।४३।
*
भवन भेद करते नहीं, सबके शरणागार।
सबके प्रति हों समर्पित, क्षमता के अनुसार।४४।
*
भवनों का आकार हो, सम्यक भव्य सुरूप।
हर रहवासी सुखी हो, खुद को समझे भूप।४५।
*
भवन-सुरक्षा कीजिए, मान सुखद कर्त्तव्य।
भवन सुरक्षित तो मिलें, शीघ्र सभी गंतव्य।४६।
*
भवन-इमारत चाहते, संरक्षण दें मीत।
संरक्षित रहिए विहँस, गढ़ नव जीवन-रीत।४७।
*
साथ मनुज का दे रहे, भवन आदि से अंत।
करते पर उपकार ज्यों, ऋषि-मुनि तारक संत।४८।
*
भवन क्रोध करते नहीं' रहें हमेशा शांत।
सहनशक्ति खो हो रहा, मानव क्यों उद्भ्रांत।४९।
*
भवन-सुरक्षा कीजिए, मानक के अनुरूप।
अवहेला कर दीन हों, पालन कर हों भूप।५०।
*

muktika - sanjiv

मुक्तिका -
संजीव
कलियुग की पहचान, स्वयंभू खुद अपनी जय-जय गाएँगे

चाटुकार-फौजों से जय-जयकार स्वयं की करवाएँगे
आम आदमी सत्य जानता जिन्हें न जन-हित की है चिंता
वे मक्कार सत्य की सीता को जंगल में भिजवाएँगे
समय नहीं पर सन्चालक बनने का ठेका लेते हैं जो
वे शब्दों के बाण चला, सीमा पर सैनिक कटवाएँगे
निज कर्त्तव्य-बोध से वंचित, हुए सियासत में है मंचित
वहम अहम् का पाले बैठे, गलत अन्य को बतलाएँगे
'सलिल' समय की नदी न ठहरे, बहती-बढ़ती जाती पल-पल
ज्यों की त्यों चादर हो जिनकी पार धार के वे जाएँगे
कुसुम वीर ही वरे, कायरों के कर में पत्थर मिलते हैं
कोयल मौन रहेगी, जब कागा कर्कश स्वर गुंजाएँगे

नेह नर्मदा नहा न पत्थर कमल बने, मिट सिकता होता
बरस थकें घन श्याम, मलिनता किन्तु न मन की धो पाएँगे
पावस में मर्यादा तोड़े जलधारा तो निकट न जाओ
साथ समय के मिटे मलिनता, निर्मल मन-तट मुस्काएँगे
सृजन यज्ञ में समिधा बन सब विद्वेषों को जलना होगा
छंद देवता तभी कलम से उतर ब्रम्ह की जय गाएँगे

Sanjiv verma 'Salil'
salil.sanjiv@gmail.com
http://divyanarmada.blogspot.in

mukatak: sanjiv

मुक्तक :
संजीव 
*
एक नाग दल सर्प दूसरा, तंत्र सपेरा नचा रहा है
घूँट गरल का मुफ्त पिलाकर, जन को काहिल बना रहा है
दलदल का हर दल है दोषी, कैसे कह दें कोई मुक्त है-
परिवर्तन लाने अन्ना सा त्याग न कोई दिखा रहा है
*
हर दल में अपराधी-दागी, पैठे मुक्त नहीं है कोई
जिस पर जन ने किया भरोसा, छला गया भारत माँ रोई
दूर धर्म से राम, न सच से है गौतम का तनिक वास्ता-
'सलिल' अमल कैसे हो तट पर जब खुद ही विष-बेलें बोई
*

अहम्-गुल धर शीश बाती कह रही है दीप्ति ले लो 
सूखकर नदिया हुई सिकता, कहे: आ नाव खे लो 
चाटुकारों ने हमेशा नाव मालिक की डुबाई-
भौंकता कूकुर कहे: 'मुझ सा बनो, आ होड़ ले लो'
*

शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

kavi aur kavita: manoranjan sahay saxena

कवि और कविता
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मनोरंजन सहाय सक्सेना
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foftr djsxk thou j.k] ik;sxk og uHk]
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lHkh lsrq [kqn <+g x;s] vuqHko gqvk vuwiA

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gS vuFkZ lc vFkZ fcu] vFkZ fcuk lc O;FkZA
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tks vLohd`r fd;k rqeus] vc dgk eSa tkÅaxk\
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¼xhrktafy ds NBs xhr dk Hkkokuqokn½

nj ls rqe rku oalh dh lqukrs gks eq>s]
vlhfer e:/kjk esa] okjf/k fn[kkrs gks eq>sA
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I;kl thou dh cq>kus] n'kZuke`r pkfg;sA
¼xhrktafy ds ,d xhr dk Hkkokuqokn½

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foey ;equk ty esa rsjh] Nfo fugk: ';ke jsA
eSa lek tkÅaa rqEgha esa] }sr feV ,dkRe gks]
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¼duqfiz;k ds pkSFkk xhr dk Hkkokuqokn½

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vk ols uhjt u;u esa izhr dks djus eq[kjA
d.B ls e`nq xhr lqudj] izk.k lq/kcq/k Hkwydj]
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,d e`nq eqLdku rsjh ls feyk] thou ljlA
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/;ku rsjk eq>s gfj dk] lxq.k n'kZu ns x;kA
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tc ryd Fks lkeus] cl ns[krs rqedks jgsA
uk v/kj xfreku gks ik;s] fd djrs ckr ge]
vc gS iNrkok cgqr] ij nwfj;ka gksrh u deA
¼duqfiz;k ds ikapos xhr dk Hkkokuqokn½

;fn dHkh Lohdkj dj ysrh fiz;s rqe Hkwy ls]
gS rqEgsa Lohsdkj esjk lkFk thou iaFk esaA
Lo;a eafty vk igaqprh] dne mBrs ckn esa]
pkg D;k fQj 'ks"k jgrks] mu iyksa ds ckn esaA
¼duqfiz;k ds NBs xhr dk Hkkokuqokn½

vc dksbZ viuk u le>s] uk dksbZ viuk yxs]
,d dU/kk lj >qdkus ds fy;s] liuk yxsA
dy ryd lkeF;Z dh iwath] gekjs gkFk Fkh]
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,d lqugjs tke esa] yojst e; Fkh ftUnxh]
tke vks e; ds jax ls] rj >werh Fkh ftUnxhA
gkFk ls [kqn ds fQly dj] fxj xbZ dy ftUnxh]
dkap dh fdjpks lh fny esa] pqHk jgh gS ftUnxhA

lkFk jgrs jkr vkSj fnu ij nwj jgrs gS]
;{k dh eu fLFkfr] fur ekSu lgrs gSA
jkr dks tc es?knwr dfoÙk i<+rs gS]
unh ds ge nks fdukjs fey u ldrs gSA
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;qok iq"i dh lst ij] lksbZ fu'k Hkj vkslA
izkr% lfork jf'e ls] [kqyk Kku dk dks'kAA

lqf/k vkbZ tc rqfgu dks] gqvk xgu ladkspA
D;k ik;k jfr&jeu esa] jg jg djrh lkspAA

izFke n`f"V esa yxk Fkk] eq>s dqlqe lqdqekjA
dfo ds lkSUn;Z cks/k dk] yxk :i lkdkjAA

n`f"V feyh T;ksagh rHkh] fy;k iz.k; ladYiA
ru eu vfiZr fd;k [kqn] cqf} jgh Fkh vYiAA

lw;Z jf'e gksaxh iz[kj] cnysxk ;g :iA
D;k ik;k [kksdj Loa; dks] gS ;g iz'u vuwiAA

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dgrk gS foKku fd] Loj [kqn  gh v&{kj gS]
bldk rks vfLrRo] czg~e le lrr vej gSA
rc esjh iqdkj D;ksa] rqe rd ugh igaqprh]
'kCn ukn ;fn vt le 'kk'or vksj vtj gSA
fnx fnxUr O;kih] thou ds bl /ku re esa]
Hkzfer u;u [kksts viuk iu] HkVd jgs gSA
viuh gh izfrNk;k] tc dj xbZ iyk;u]
      dksbZ nwtk vk;sxk vc] lkFk dgka ls\
dSlk Fkk og iy] tks thou ds miou esa]
lglk vk;k Fkk >ksads lk ey; iou dsaA
e/kq _rq dk mYykl prqfnZd esa Nk;k Fkk]
uUnu dkuu thou cuk] ,d ml iy esaA
      ij 'kk'or thou la/;k dk gqvk vkxeu]
      nks iy dk clUr chrk] ir>M+ fjrq vkbZA
      mtM+ x;k thou miou] 'kk[kks dh dfy;k]
      fcuk f[kys gh eqj>k dj] 'kk[kksa ls fxj xbZA
thou esa lwukiu cgqr =Lr djrk gS]
viuks dk vHkko gh] vc csgn [kyrk gSA
,sls esa esjh iqdkj dk] {kj.k dgha ij]
[kqn gh my>s iz'u Lo;a ls gh djrk gSA
      rqe rks vius laca/kks dh dVd ltk;s]
      thou dk laxzke fot; djus fudys FksA
      dgka x;s prqjaxh lsuk ds lc uk;d]
      vkt vdsys+ foftr [kMs+ gks j.k izkxa.k esaA
d.kZ leku egkHkkjr dk nqtZ; ;ks)k]
gqvk ijkftr rHkh] jg x;k fuiV vdsykA
vtqZu dk Fkk ugh ijkdze d.kZ gqvk gr]
,sdkdhiu dh ihM+k dk Fkk og jsykA
      gqvk ohjxfr izkIr] lksp tc mlesa iuik]
      'ks"k u dksbZ ehr u fj'rk u fgr viukA
      nq%lg vdsys iu dk =kl gqvk ftl iy esa]  
      d.kZ mlh {k.k foftr gqvk ml egklej esaA

;knksa dh jks'kuh

ftUnxh dk Q~ylQk dqN le> esa vkrk ugh]
dksbZ et~gc ;k iSxEcj jkg fn[kykrk ughaA
ftUnxh dh 'kke D;ksa vc bl rjg ohjku gS]
[kqn dk lk;k gh vU/ksjsa esa utj vkrk ughA

fVefVekrh jks'kuh ;knksa dh rsjh lkFk ys]
ftUnxh dh jkg ij Fkdrs dne ls py jgsA
ekSr vkdj Fkke ys vc gkFk rks ge ne feys]
ge lQj ml 'kDy esa gh dksbZ rks vkf[kj feysA

rksM+ ns lUukVk ,slk ,d e`nq Loj pkfg;s]
ns lgkjs dk Hkjkslk gkFk ,slk pkfg;sA
py lds gj dne lax&lax ehr ,slk pkfg;s]
ihj le>s bl gzn; dh ,d fny og pkfg;sA

ij cgkjksa dk oks ekSle ykSVdj D;k vk;sxk]
tks peu mtM+k cgkjksa esa oks D;k f[ky ik;sxkA
iz'u gS ckdh cgqr mŸkj u budk vk;sxk]
lk/k vfUre njl dh ys] tgk¡ ls mB tk;sxkA
gS olUr

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