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बुधवार, 14 अगस्त 2013

muktak : sanjiv

स्वाधीनता दिवस पर :
मुक्तक
संजीव
*
शहादतों को भूलकर सियासतों को जी रहे 
पड़ोसियों से पिट रहे हैं और होंठ सी रहे
कुर्सियों से प्यार है, न खुद पे ऐतबार है-
नशा निषेध इस तरह कि मैकदे में पी रहे
*
जो सच कहा तो घेर-घेर कर रहे हैं वार वो
हद है ढोंग नफरतों को कह रहे हैं प्यार वो
सरहदों पे सर कटे हैं, संसदों में बैठकर-
एक-दूसरे को कोस, हो रहे निसार वो
*
मुफ़्त भीख लीजिए, न रोजगार माँगिए
कामचोरी सीख, ख्वाब अलगनी पे टाँगिए
फर्ज़ भूल, सिर्फ हक की बात याद कीजिए-
आ रहे चुनाव देख, नींद में भी जागिए
*
और का सही गलत है, अपना झूठ सत्य है
दंभ-द्वेष-दर्प साध, कह रहे सुकृत्य है
शब्द है निशब्द देख भेद कथ्य-कर्म का-
वार वीर पर अनेक कायरों का कृत्य है
*
प्रमाणपत्र गैर दे: योग्य या अयोग्य हम?
गर्व इसलिए कि गैर भोगता, सुभोग्य हम
जो न हाँ में हाँ कहे, लांछनों से लाद दें -
शिष्ट तज, अशिष्ट चाह, लाइलाज रोग्य हम
*
गंद घोल गंग में तन के मुस्कुराइए
अनीति करें स्वयं दोष प्रकृति पर लगाइए
जंगलों के, पर्वतों के नाश को विकास मान-
सन्निकट विनाश आप जान-बूझ लाइए
*
स्वतंत्रता है, आँख मूँद संयमों को छोड़ दें
नियम बनायें और खुद नियम झिंझोड़-तोड़ दें
लोक-मत ही लोकतंत्र में अमान्य हो गया-
सियासतों से बूँद-बूँद सत्य की निचोड़ दें
*
हर जिला प्रदेश हो, राग यह अलापिए
भाई-भाई से भिड़े, पद पे जा विराजिए
जो स्वदेशी नष्ट हो, जो विदेशी फल सके-
आम राय तज, अमेरिका का मुँह निहारिए
*
धर्महीनता की राह, अल्पसंख्यकों की चाह
अयोग्य को वरीयता, योग्य करे आत्म-दाह
आँख मूँद, तुला थाम, न्याय तौल बाँटिए-
बहुमतों को मिल सके नहीं कहीं तनिक पनाह
*
नाम लोकतंत्र, काम लोभतंत्र कर रहा
तंत्र गला घोंट लोक का विहँस-मचल रहा
प्रजातंत्र की प्रजा है पीठ, तंत्र है छुरा-
राम हो हराम, तज विराम दाल दल रहा
*
तंत्र थाम गन न गण की बात तनिक मानता
स्वर विरोध का उठे तो लाठियां है भांजता
राजनीति दलदली जमीन कीचड़ी मलिन-
लोक जन प्रजा नहीं दलों का हित ही साधता
*
धरें न चादरों को ज्यों का त्यों करेंगे साफ़ अब
बहुत करी विसंगति करें न और माफ़ अब
दल नहीं, सुपात्र ही चुनाव लड़ सकें अगर-
पाक-साफ़ हो सके सियासती हिसाब तब
*
लाभ कोई ना मिले तो स्वार्थ भाग जाएगा
देश-प्रेम भाव लुप्त-सुप्त जाग जाएगा
देस-भेस एक आम आदमी सा तंत्र का-
हो तो नागरिक न सिर्फ तालियाँ बजाएगा
*
धर्महीनता न साध्य, धर्म हर समान हो
समान अवसरों के संग, योग्यता का मान हो
तोडिये न वाद्य को, बेसुरा न गाइए-
नाद ताल रागिनी सुछंद ललित गान हो
*
शहीद जो हुए उन्हें सलाम, देश हो प्रथम
तंत्र इस तरह चले की नयन कोई हो न नम
सर्वदली-राष्ट्रीय हो अगर सरकार अब
सुनहरा हो भोर, तब ही मिट सके तमाम तम
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मंगलवार, 13 अगस्त 2013

kavi aur kavita: kusum vir

कवि और कविता :  कुसुम वीर

निश्छल मन की अभिव्यक्तियाँ हैं श्रीमती कुसुम वीर की कविताएँ



परिचय:
श्रीमती कुसुम वीर जी वर्तमान में ‘‘आसरा’’ – गरीब, असाक्षर एवं पिछली महिलाओं के उत्थान में अग्रसर चेरिटेबल संस्था की निदेशक हैं।
पूर्व में ये प्रौढ़ शिक्षा निदेशालय, स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार, के निदेशक के रुप में कार्यरत थीं। जहां से ये जनवरी 2011 में सेवानिवृत्त हुईं। इसके पूर्व केंद्रीय हिंदी प्रशिक्षण संस्थान, राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय, भारत सरकार में 5 वर्षों तक निदेशक के रुप में कार्यरत थीं। इसके अलावा केद्रीय अनुवाद ब्यूरो, राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय, भारत सरकार में निदेशक का अतिरिक्त प्रभार संभाल चुकीं हैं। श्रीमती कुसुम वीर जी का अध्यापन में भी व्यापक अनुभव रहा है। ये वर्ष 1989 में आई.टी. कॉलेज, लखनऊ (उ.प्र.) में मनोविज्ञान विभाग में प्रवक्ता रही तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में स्नातक/स्नातकोत्तर छात्रों को ‘‘अनुवाद’’ विषय पढ़ाया हैं। इसके अलावा इन्होंने विभिन्न देशों में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों/कार्यशालाओं में भारत सरकार के प्रतिनिधि के रूप में समय-समय पर सहभागिता की।
इन्होंने स्नातक की शिक्षा आगरा विश्वविद्यालय से वर्ष 1970 में हिंदी में प्रथम स्थान एवं स्वर्ण पदक के साथ प्राप्त की तथा स्नातकोत्तर – ‘मनोविज्ञान’ में प्रथम श्रेणी एवं आगरा विश्वविद्यालय में तृतीय स्थान के साथ हासिल की। शिक्षा की प्रति इनकी प्रतिबद्धता की वजह से इन्होंने इंटरनेशनल कॉलेज, डेनमार्क से वर्ष 1986 में ‘‘प्रौढ़ों की शिक्षा एवं उनका सामाजिक – आर्थिक विकास’’ विषय पर कोर्स किया। इन्होंने वर्ष 2006-07 में केंद्रीय हिंदी संस्थान, मानव संसाधन विकास मंत्रालय से संचालित ‘‘भाषा विज्ञान’’ का स्नातकोत्तर डिप्लोमा कोर्स प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया।
अध्ययन के प्रति इनकी चेष्टा का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि ये कक्षा 1 से एम.ए. तक सदैव प्रत्येक स्तर पर ‘प्रथम स्थान’ पर रहीं। ये वर्ष 1968 से 1972 तक राष्ट्रीय स्कालर भी रहीं। इन्हें  अनेक वर्षों तक ‘‘सर्वोत्तम छात्रा’’ के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इन्हे वर्ष 1984 में ‘‘भारत की सर्वोत्तम युवा’’ के पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इनके अथक प्रयासों एवं भाषा के प्रचि निष्ठा का सम्मान करने के लिए वर्ष 2008 में ‘‘विक्रमादित्य विद्यापीठ’’, भागलपुर, बिहार द्वारा ‘‘विद्यासागर’’ (डी.लिट) की मानद उपाधि से इन्हे विभूषित किया गया।
ये शिक्षा का अनमोल खजाना लेकर अपेक्षाकृत कम विकसित शहरों में गयीं। उत्तर प्रदेश सरकार में जिला प्रौढ़ शिक्षा अधिकारी के पद पर 10 वर्षों तक (वर्ष 1980-90) कार्य करते हुए विभिन्न जिलों यथा – आगरा, मथुरा, गाजियाबाद एवं बुलंदशहर में साक्षरता कार्यक्रम का सफल संचालन किया एवं गाँव-गाँव घूमकर बहुत से गाँवों को पूर्ण साक्षर किया। भारत के विकास में महिलाओं की भागीदारी को सुनिश्चित करने के लिए इन्होंने ‘‘आसरा’’ चैरिटेबल ट्रस्ट की निदेशक के रूप में जून 2011 से गरीब, असाक्षर एवं पिछड़ी अनुसूचित जाति/जनजाति की महिलाओं के उन्नयन हेतु उन्हें सिलाई-कढ़ाई, फल संरक्षण, ब्यूटी पार्लर एवं पढ़ाई-लिखाई का अनवरत प्रशिक्षण, हुनर एवं रोजगार प्राप्त कराया।
इतने व्यस्त कार्यकाल में भी साहित्य के प्रति अनुराग और समर्पण का प्रमाण इनके द्वारा लिखी गयी कई महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं। जिसमें प्रमुख है 30 दिन में हिंदी सीखें – द्वारा – डायमंड पॉकेट बुक्स, a few steps in learning Hindi – द्वारा – डायमंड पॉकेट बुक्स, ‘राजभाषा व्यवहार ’ – द्वारा – डायमंड पॉकेट बुक्स, ‘‘मैं आवाज़ हूँ’’ (कविता संग्रह) – द्वारा – प्रतिभा प्रतिष्ठान तथा ‘प्रशिक्षण ‘मैनुअल्स’ का निर्माण।
देशभर में ये महिलाओं के उद्धार हेतु कई कार्यक्रमों से जुड़ी रहीं हैं। महिलाओं के उन्नयन और उनमें साक्षरता को बढ़ावा देने के लिए राज्य स्तरीय/जिला स्तरीय सफल अभिनव प्रयोग एवं समन्वय कार्य किए। देशभर में ‘‘लेखक कार्यशालाओ’’ का आयोजन कर विभिन्न भाषाओं में ‘‘साक्षरता प्रवेशिकाओं’’ का निर्माण कराया। इनकी लेखन प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वागर्थ, ज्ञानोदय, गगनान्चल, स्वागत, शब्द-योग, राजभाषा भारती, साक्षरता मिशन, प्रौढ़ शिक्षा पत्रिका एवं सजग समाचार आदि अन्य कई पत्रिकाओं में लेखों एवं कविताओं का प्रकाशन हो चुका है। इसके अलावा आकाशावाणी एवं दूरदर्शन पर भी वार्ताओं एवं परिचर्चाओं का प्रसारण हो चुका है। इनसे kusumvir@gmail.com ई-मेल पर सम्पर्क किया जा सकता है। इनसे मोबाईल नम्बर 9899571158 पर भी सम्पर्क किया जा सकता है।
प्रस्तुत है श्रीमती कुसुम वीर जी की पुस्तक “ मैं आवाज़ हूँ – काव्य संग्रह” की दिनेश मिश्र द्वारा लिखी गई भूमिका।
कविताएँ जो बहुत-कुछ कहती हैं
कुसुम वीर की कविताएँ बहुत-कुछ कहती हैं। जीवन से जुड़े अनेक संघर्ष और अनुभव उनकी कविताओं में झलकते हैं। सर्वाधिक महत्वपूर्ण चुनौती तो अभिव्यक्ति की है जिसे उन्होंने अपनी कविता ‘मैं आवाज़ हूँ’ के माध्यम से सुदृढ़ आत्मविश्वास के साथ व्यक्त किया है। कवयित्री को मालूम है कि हमारे परिवेश में, हमारे समाज में, स्वतंत्र और स्वाभिमानी विचार का आसानी से स्वागत नहीं होता। उस आवाज़ को दबाने या बाँधने की भरपूर कोशिश होती है। लेकिन, कवयित्री समाज की उन शक्तियों के सामने झुकने को तैयार नहीं। दमन और न्याय के खि़लाफ़ उसकी आवाज़ बुलंद है और रहेगी ताकि, बाधाओं और अंधविश्वासों की दीवारें गिराई जा सकें। कवयित्री का साहस अदम्य है और आत्मविश्वास अपराजेय। तभी तो,
मैं आरक्षित हूँ
एक बुलंद आवाज़
एक अपरिमित आकाश
जिसे न गिरा सका है कोई
न दबा सकेगा कोई।
कुसुम वीर की कविताओं में जहाँ एक ओर मानवीय संबंधों की उलझनें सामने आती हैं, वहीं दूसरी ओर रिश्तों की सच्चाई कुछ इस तरह नज़र आती है,
रंग-रँगीले लोग
गिरगिट-से रंग बदलते
स्वार्थरत
निजोन्मुख
अंतर की माँद में
दुबले-से रिश्ते
और फिर रिश्ते भी ‘किसिम-किसिम’ के,
रिश्ते
कुछ खट्टे
कुछ मीठे
कुछ तीखे
कुछ फीके
कुछ मन से जुड़े
कुछ तन से जुड़े
संपर्कों की आड़ में
कुछ बरबस जुड़े।
परंतु कवयित्री आशावादी है – सकारात्मक दृष्टि-संपन्न। तभी तो कहा है,
रिश्ता कोई भी
इतना फीका नहीं
कि सौहार्द का रंग न चढ़े
इतना खट्टा नहीं
जिस पर प्रेम की मिठास न मढ़े
इतना तीखा नहीं
कि नम्रता का असर न पड़े।
कुसुम वीर की कविताएँ जीवन की ऊहापोह से गुजरते हुए एक निश्छल मन की अभिव्यक्तियाँ हैं। इन कविताओं में भावनाएँ, संवेदनाएँ, विचार,रुचियां – उनका समूचा व्यक्तित्व परिलक्षित होता है। क्या मन को भला लगता है और क्या नहीं, बड़ी बेबाकी से बताया है:
मुझे अच्छा लगता है
लोगों के बीच रहना
मिलना-जुलना
लेकिन अखर जाता है
लोगों की भीड़ में
अपने को अकेला पाना।
जैसे मनुष्य के व्यक्तित्व के अनेक पहलू होते हैं, कुसुम वीर की कविताओं के भी कई रंग हैं। एक ओर सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश की जकड़न का गहरा अहसास है, वहीं मन की कोमलतम संवेदनाओं को भी ये कविताएँ उजागर करती हैं,
मन
गीली मिट्टी सा
उपजते हैं इसमें
अनेक विचार
अभिलाषाएँ
आकांक्षाएँ
या फिर,
मुझ्ो प्यार चाहिए
ढेर सारा प्यार
लाड़ और दुलार।
कुसुम वीर की कविताओं का एक अहम विषय है सामाजिक एवं राजनीतिक परिवेश की विसंगतियाँ। भारत की गौरवमयी सांस्कृतिक विरासत के बावजूद वर्तमान समाज में बहुत-सी बातें असहनीय हैं। उनके विरोध में कवयित्री के मन का आक्रोश कई कविताओं में मुखर हुआ है। जैसे,
कैसी आज़ादी यहाँ
कोई किसी की
सुनती नहीं।
कोई किसी को
कुछ कहता नहीं।
और भी बहुत-कुछ कहा जा सकता है कुसुम वीर की कविताओं के बारे में, उनकी संभावनाओं के बारे में। परंतु बेहतर यह है कि पाठक सीधे कविताओं से ही सुनें कि वे क्या कहती हैं?
विश्वास है कि पाठकों को ये कविताएँ अपने मन के आस-पास की कविताएँ लगेंगी और वे इनमें एक भावनापूर्ण निश्छल स्वर सुन सकेंगे।
‘मैं आवाज़ हूँ’ कुसुम वीर की कविताओं का पहला संग्रह है और आशा है कि यह समर्थ आवाज़ दूर तक हमारे साथ चलेगी। – दिनेश मिश्र
प्रस्तुत है श्रीमती कुसुम वीर जी की कुछ महत्वपूर्ण कवितायें –
मैं आवाज़ हूँ
मैं
एक आवाज़ हूँ
जीती-जागती
झंझावतों को चीरती
ज़ुल्मों को बींधती
म्यान से निकल
अत्याचारों को रौंदती
तुम सोचते हो
दबा सकोगे तुम
मेरी आवाज़ को
मेरी ताकत को
मेरी शख़्सियत को
मेरे वजूद को
आज तक
कौन बाँध सका है
मुझे, अपने पाश में
न मानव
न दानव
न सूरज
न तारे
गवाह हैं
ये सभी
मेरी सत्ता के
मेरे अस्तित्व के
मेरी आवाज़ के
मेरी आवाज़
युगों से पुकार रही है
मुझे जीने दो
खुली हवा में
साँस लेने दो
तोड़ डालो
उन बाधाओं को
अंधविश्वासों की दीवारों को
जो चारदीवारी से
तुम्हें बाहर नहीं आने देतीं
गिरा दो
उन शिलाखंडों को
जिनके पाषाण संकेतों ने
दबा रखा है स्वप्नों को
लौटा दो
उन गरजते तूफानों को
जो अपनी गरज से
दबा देना चाहते हैं
उभरती आवाज़ को
उड़ने दो इस आवाज़ को
भावनाओं के उन्मुक्त गगन में
जहाँ विस्तृत आकाश
बाँहें फैला खड़ा है
यह आवाज़ आत्मसात कर
उसे दोहराने को।
मैं अक्षरित हूँ
एक बुलंद आवाज़
एक अपरिमित आकाश
जिसे न गिरा सका है कोई
न दबा सकेगा कोई।
***
मैं खुश हूँ
मैं
बहुत खुश हूँ
मेरे आँगन में
एक अंकुर फूटा है
परसों, मैंने
एक नन्हें बीज को
अपनी हथेलियों से सहलाकर
बोया था
माटी के बीच में
आज
एक अंकुर फूटा है उसमें
मृदुल, कोमल
इक नन्हे शिशु सा
कोमल हरित गात
मैंने
उसे सहलाया
जल बिंदुओं से
और
आहिस्ता-आहिस्ता
वह बढ़ने लगा
थोड़ा ऊँचा
उठने लगा
और अब
कुछ-कुछ मुझे
पहचानने भी लगा है
मेरे पास आते ही
वह मचलने लगता है
मेरी उँगलियों का
स्पर्श पाने को
अपनी कोमल सी कोंपल बाँहों से
छूना चाहता है मुझे
मैं
रोज़ उसे देखती हूँ
दुलारती हूँ
सींचती हूँ।
अब
वह जवान हो चला है
मैं आज बहुत खुश हूँ
उसने जन्म दिया है
शाखों को,
जिनको
मौसम की बहारें
अपने पालने में
दुलार रही हैं
धीरे-धीरे
फिर बढ़ने लगी हैं
शाखें
और
बौर उमड़ आया है
उन पर
यौवन का
फैला दी हैं उसने अपनी बाँहें
किसी आलिंगन को
झुकने लगा है वह
अपने फलों से
धरा को
पूरित करने को
मैं
बहुत खुश हूँ
क्योंकि
मैंने आज
एक जीवन को
भरपूर जीते देखा है।
***
चस्का
यहाँ, कोई किसी से
नहीं बोलता
किसी की नहीं सुनता
सब अपने में मगन
आगे बढ़ने की होड़
एक चस्का
ढेर सारे पैसे
पाने का
और
सिक्कों की खनखनाहट में
बेसुध हो जाने का।
यहाँ पर
कोई किसी को नहीं रोकता
नहीं टोकता
क्योंकि
इस आपाधापी में
सबको
अपनी पड़ी है।
उसे चाहिए ज्चयादा
और ज्चयादा, सबसे ज्चयादा
किसी को कम मिले
या ना मिले
उसे क्या
उसे तो पाना है सर्वस्व
कभी न खत्म होनेवाली मरीचिका
और अपार अधिकार!
***
मैंने भारत को देखा है
मैंने
भारत को देखा है
उसके मान को
सम्मान को
गौरव को
मर्यादा को।
मैंने
भारत को जाना है
उसकी आत्मा को
पौरुष को
शौर्य को
बलिदान को।
मैंने
भारत को सुना है
उसके तरकस से छूटे
प्रत्यंचा पर चढ़े
तीरों की गर्जना को।
मैंने
भारत को सूँघा है
उसकी हवा में बहती
यज्ञ-सुवासित
समिधा की खुशबू को।
मैंने
भारत को पहचाना है
तक्षशिला नालंदा में गूँजते
वेदों की ऋचाओं के
मुखरित स्वरों को।
***
बुलबुले
बुलबुले
छोटे-बड़े बुलबुले
तरह-तरह के बुलबुले
बुलबुले
जो बहुत-कुछ कहते हैं
अपनी ज़बानी
जीवन की कहानी
बुलबुले
भावों के बुलबुले
उभरते-ठिठकते
अंतर के सागर में
फूटते-सिमटते
बुलबुले
सपनों के बुलबुले
तैरते-मचलते
उमंगों के बुलबुले
मुसकाते-चहकते
बुलबुले
आशा-निराशा के बुलबुले
जलते औ’ बुझ्ाते
आकांक्षाओं के बुलबुले
टिमटिमाते-चमकते
बुलबुले
प्रीत के बुलबुले
गहाराते-उथले
रिश्तों के बुलबुले
बनते-बिगड़ते
बुलबुले
खुशियों के बुलबुले
हँसते-मचलते
गम के बुलबुले
अकेले-वीराने
बुलबुले
तृष्णा के बुलबुले
ललचाते-बहकते
करुणा के बुलबुले
दुलारते-सहलाते
बुलबुले
वीरता के बुलबुले
दहाड़ते-गरजते
भय के बुलबुले
सहमते-दुबकते
बुलबुले
साँसों के बुलबुले
आते-गुज़रते
जीवन के बुलबुले
उगते औ’ ढलते
बुलबुले
मृत्यु के बुलबुले
मिटते-सिमटते
सत्य के बुलबुले
शाश्वत ही रहते
अनूठी कहानी है
ये बुलबुलों की
मिटकर भी फिर से
उपजते हैं बुलबुले
***
ये भी हैं बच्चे
बच्चे
कूड़े के ढेर में
इधर-उधर
ताकते-झाँकते
नन्हीं-नन्हीं उँगलियों से
चिंदी-चिंदी कागज़ बीनते
प्लास्टिक की बोतलें बटोरते
दिशाहीन बच्चे
पुराने घिसे कपड़ों को
अपने मैले हाथों से पोंछते
दूर कहीं सलीके से
यूनीफार्म पहने
स्कूल जाते दूसरे बालकों को
हसरत से निहारते
कुछ करने की चाह में
ऊपर- नीचे बेमकसद
कूदते-फाँदते बच्चे
चौराहे की लाल बत्ती पर
गाड़ियों के आगे-पीछे
डोलते- मंडराते
माँओं की गोद में चिपके
लाडले बच्चों को
गुब्बारा बेचते
अभावग्रस्त बच्चे
आरामदार गाड़ियों में बैंठे
साहब मेमसाहब से
माँगते- गिड़गिड़ाते
टाई बाबू की फटकार से
सहमते- डरते
किसी नुक्कड़ पर
हलवाई की दुकान को
ललचाई नज़रों से ताकते
भूखे बच्चे
भारत निर्माण के
ख्वाबों से अनजान
अक्षरों से महरुम
चौराहों पर
कलम किताब बेचते बच्चे
पास से गुज़रती
किसी गाड़ी की तेज़ रफ्तार से
ठोकर खाते
गिरते- कराहते
थककर पगडंडी पर पैर पसारे
भावपूरित आँखों से
शून्य में ताकते बच्चे
बाल शोषण मुक्ति कानून
देश के विकास,
उसकी तरक्की से बेखबर
देश के नौनिहाल-कर्णधार
सड़क फुटपाथ पर
अधनंगे सोते बच्चे
***
सुर्खियों में
मुझे अच्छा लगता है
सुबह-सुबह
हरी घास पर टहलना,
और शबनमी बूँदों का
मेरे पाँओं को सहलाना
भाती है मुझे
ठंडी हवाओं के झोकों में,
पेड़ों की शाखों पर
पत्तों का,
रह-रहकर मचल जाना
लेकिन, गर्म चाय की
प्याली के साथ
अख़बार की सुर्खियों में
जब पढ़ती हूँ,
बलात्कार, डकैती
अपहरण और मारकाट,
तब सिहर उठता है मन
काँप जाती है रूह
कि आज
फिर किसी
वृद्धा को पाकर अकेले
किसी कसाई ने,
उसका हलक दबाया होगा !
सुबह की सुहानी,
शीतल सुवासित मलय
अब गर्म हो चुकी है
अख़बार के सुर्ख स्याह
पन्नों की धूप से,
रेशमी घास के
शबनमी मोती भी
अब सुख चुके है,
और रीत चुके है
भावों के अप्लव
दूर कहीं
कोमल, निश्छल शाखें
ताक रही है
पेड़ो को,
और, पूछ रही है,
कब ये आदमी
इन्सान बनेगा?
क्या इसीलिए, ईश्वर ने
इन्सान को
धरती पर भेजा था,
कि वह,
ज़र, जोरू और ज़मी के लिए
कत्ले आम करे
और बहाए खून
माँओं, बहनों और बच्चों का
जिनका दोष सिर्फ यह है,
कि वे निर्दोष हैं !
***
आभार : प्रवासी दुनिया

shabd salila, mafee, muaafee ya muhafee?

शब्द सलिला :
माफी, मुआफी या मुहाफी?
*
डॉ. महेश चन्द्र गुप्ता: सही लफ़्ज़ तो मुहाफ़ी ही है, मुआफ़ी या माफ़ी नहीं. इस विचार की पुष्टि मैंने इस तर्क पर की: गलती हो गई, क्षमादान दीजिए, हिफ़ाज़त कीजिए, मेरे हाफ़िज़  (रक्षक) बनिए.
हाफ़िज़ >> मुहाफ़िज़ >> मुहाफ़ी >> मुआफ़ी >>माफ़ी.

बृहत् हिंदी कोष : पृष्ठ ८८९ 
माफ़ = मुआफ़ = क्षमा किया हुआ, बख्शा गया. -करो -क्षमा करो, रास्ता लो, जान छोड़ो.
माफ़कत, माफ़िकत = मुआफ़िकत
माफ़ि = अनुकूल, अनुसार 
माफ़ी = क्षमा, माफ किया जाना, वह जमीन जिसकी मालगुजारी या लगन मा हो.  
माफ़ीदार = जिसके पास माफी जमीन हो
बृहत् हिंदी कोष : पृष्ठ ९००
मुआफ़ = माफ़
मुआफ़िक = मुवाफ़िक / माफ़िक (अनुकूल, अनुसार, तुल्य, सदृश, योग्य, उचित)

मुआफ़िकत =  अनुकूलता, मेल-जोल
उर्दू हिंदी शब्द कोष पृष्ठ ५०५ 
मुआफ़ = क्षमा प्राप्त, क्षमित  
मुआफ़कत = समानता, यकसानियत, अनुकूलता, इत्तिफाक, मैत्री, दोस्ती 
मुआफ़िक = अनुकूल, मुत्तफ़िक़, मित्र, दोस्त
मुआफ़िकीन = मुआफ़िक का बहुवचन, अनुकूल लोग 
मुआफ़ी = क्षमा, बख़शिश  
मुआफ़ीदार = जिसे मुआफ़ी की ज़मीन या जागीर मिली हो
मुआफ़ीनाम: = वह पात्र जिसमें कोइ व्यक्ति अपने अपराध-क्षमा की लिखित तह्रीर दे, क्षमापत्र
समान्तर कोष (हिंदी थिसारस) पृष्ठ १४११-१४१२
माफ़ = आदान मुक्त, क्षमा प्राप्त
माफ़ करना = आदान मुक्त करना, क्षम करना, प्राण क्षमा करना
माफ़िक = अनुकूल, अनुसार, कल्याणकारी, सदृश्य, सहमत, सादृश्य, हितकारी 
माफ़िक आना = कल्याणकारी होना
माफ़िक होना = कल्याणकारी होना
माफ़ी = अपराधमुक्ति, आदानमुक्ति, क्षमा, प्राण क्षमा, भूमि दान, लगानमुक्त कृषि
माफ़ीदार = दानग्राही, लगानमुक्त कृषि धारी
माफ़ीनामा = क्षमापत्र  
समान्तर कोष (हिंदी थिसारस) पृष्ठ १४२३
मुआफ़ = क्षमाप्राप्त 
मुआफ़िक़ = अनुसार, सदृश्य 
मुआफ़िकत = अनुकूलता
आनंद पाठक;
मु आ फ़ी उर्दू के ५ हर्फ ( मीम् ऐन् अलिफ् फ़े ये ) से मिल कर बना है. अब आप हिन्दी में चाहे जैसे उच्चारण कर लें मुआफी या माफी ख़याल रहे हिन्दी में 'ऐन' की आवाज़ नहीं है.  


 

 

सोमवार, 12 अगस्त 2013

doha salila: bhavan mahatmya -SANJIV

दोहा सलिला :
भवन माहात्म्य
संजीव
*
[इंस्टिट्यूशन ऑफ़ इंजीनियर्स, लोकल सेंटर जबलपुर द्वारा गगनचुम्बी भवन (हाई राइज बिल्डिंग) पर १०-११ अगस्त २०१३ को आयोजित अखिल भारतीय संगोष्ठी  की स्मारिका में प्रकाशित कुछ दोहे।]

*
भवन मनुज की सभ्यता, ईश्वर का वरदान।
रहना चाहें भवन में, भू पर आ भगवान।१।
*
भवन बिना हो जिंदगी, आवारा-असहाय।
अपने सपने ज्यों 'सलिल', हों अनाथ-निरुपाय।२।
*
मन से मन जोड़े भवन, दो हों मिलकर एक।
सब सपने साकार हों, खुशियाँ मिलें अनेक।३।
*
भवन बचाते ज़िन्दगी, सड़क जोड़ती देश।
पुल बिछुडों को मिलाते, तरु दें वायु हमेश।४।
*
राष्ट्रीय संपत्ति पुल, सड़क इमारत वृक्ष।
बना करें रक्षा सदा, अभियंतागण दक्ष।५।
*
भवन सड़क पुल रच बना, आदम जब इंसान।
करें देव-दानव तभी, मानव का गुणगान।६।
*
कंकर को शंकर करें, अभियंता दिन-रात।
तभी तिमिर का अंत हो, उगे नवल प्रभात७।
*
भवन सड़क पुल से बने, देश सुखी संपन्न।
भवन सेतु पथ के बिना, होता देश विपन्न।८।
*
इमारतों की सुदृढ़ता, फूंके उनमें जान।
देश सुखी-संपन्न हो, बढ़े विश्व में शान।९।
*
भारत का नव तीर्थ है, हर सुदृढ़ निर्माण।
स्वेद परिश्रम फूँकता, निर्माणों में प्राण।१०।
*
अभियंता तकनीक से, करते नव निर्माण।
होता है जीवंत तब, बिना प्राण पाषाण।११।
*
भवन सड़क पुल ही रखें, राष्ट्र-प्रगति की नींव।
सेतु बना- तब पा सके, सीता करुणासींव।१२।
*
करे इमारत को सुदृढ़, शिल्प-ज्ञान-तकनीक।
लगन-परिश्रम से बने, बीहड़ में भी लीक।१३।
*
करें कल्पना शून्य में, पहले फिर साकार।
आंकें रूप अरूप में, यंत्री दे आकार।१४।
*
सिर्फ लक्ष्य पर ही रखें, हर पल अपनी दृष्टि।
अभियंता-मजदूर मिल, रचें नयी नित सृष्टि।१५।
*
सडक देश की धड़कनें, भवन ह्रदय पुल पैर।
वृक्ष श्वास-प्रश्वास दें, कर जीवन निर्वैर।१६।
*
भवन सेतु पथ से मिले, जीवन में सुख-चैन।
इनकी रक्षा कीजिए, सब मिलकर दिन-रैन।१७।
*
काँच न तोड़ें भवन के, मत खुरचें दीवार।
याद रखें हैं भवन ही, जीवन के आगार।१८।
*
भवन न गन्दा हो 'सलिल', सब मिल रखें खयाल।
कचरा तुरत हटाइए, गर दे कोई डाल।१९।
*
भवनों के चहुँ और हों, ऊँची वृक्ष-कतार।
शुद्ध वायु आरोग्य दे, पायें ख़ुशी अपार।२०।
*
कंकर से शंकर गढ़े, शिल्प ज्ञान तकनीक।
भवन गगनचुम्बी बनें, गढ़ सुखप्रद नव लीक।२१।
*
वहीं गढ़ें अट्टालिका जहाँ भूमि मजबूत।
जन-जीवन हो सुरक्षित, खुशियाँ मिलें अकूत।२२।
*
ऊँचे भवनों में रखें, ऊँचा 'सलिल' चरित्र।
रहें प्रकृति के मित्र बन, जीवन रहे पवित्र।२३।
*
रूपांकन हो भवन का, प्रकृति के अनुसार।
अनुकूलन हो ताप का, मौसम के अनुसार।२४।
*
वायु-प्रवाह बना रहे, ऊर्जा पायें प्राण।
भवन-वास्तु शुभ कर सके, मानव को सम्प्राण।२५।

health corner: dr. m. c. gupta


स्वास्थ्य सलिला :
डॉ. महेश चन्द्र गुप्ता

Benefits of Walking 
cid:1.3505775927@web192204.mail.sg3.yahoo.com
  • The human body is made to walk.  
  • Walking 30 minutes a day cuts the rate of people becoming diabetic by more than half and it cuts the risk of people over 60 becoming diabetic by almost 70 percent.  
  • Walking cuts the risk of stroke by more than 25 percent.  
  • Walking reduces hypertension. The body has over 100,000 miles of blood vessels. Those blood vessels are more supple and healthier when we walk.  
  • Walking cuts the risk of cancer as well as diabetes and stroke.  
  • Women who walk have a 20 percent lower likelihood of getting breast cancer and a 31 percent lower risk of getting colon cancer.  
  • Women with breast cancer who walk regularly can reduce their recurrence rate and their mortality rate by over 50 percent.  
  • The human body works better when we walk. The body resists diseases better when we walk, and the body heals faster when we walk.  
  • We don't have to walk a lot. Thirty minutes a day has a huge impact on our health.  
  • Men who walk thirty minutes a day have a significantly lower level of prostate cancer. Men who walk regularly have a 60 percent lower risk of colon cancer.  
  • For men with prostate cancer, studies have shown that walkers have a 46 percent lower mortality rate.  
  • Walking also helps prevent depression, and people who walk regularly are more likely to see improvements in their depression.  
  • In one study, people who walked and took medication scored twice as well in 30 days as the women who only took the medication. Another study showed that depressed people who walked regularly had a significantly higher level of not being depressed in a year compared to depressed people who did not walk. The body generates endorphins when we walk. Endorphins help us feel good.  
  • Walking strengthens the heart. Walking strengthens bones. 
  • Walking improves the circulatory system.  
  • Walking generates positive neurochemicals. Healthy eating is important but dieting can trigger negative neurochemicals and can be hard to do.  
  • Walking generates positive neurochemicals. People look forward to walking and enjoy walking.  
  • And research shows that fit beats fat for many people. Walking half an hour a day has health benefits that exceed the benefits of losing 20 pounds.  
  • When we walk every day, our bodies are healthier and stronger. A single 30 minute walk can reduce blood pressure by five points for over 20 hours.  
  • Walking reduces the risk of blood clots in your legs.  
  • People who walk regularly have much lower risk of deep vein thrombosis.  
  • People who walk are less likely to catch colds, and when people get colds, walkers have a 46 percent shorter symptom time from their colds.  
  • Walking improves the health of our blood, as well. Walking is a good boost of high density cholesterol and people with high levels of HDL are less likely to have heart attacks and stroke.  
  • Walking significantly diminishes the risk of hip fracture and the need for gallstone surgery is 20 to 31 percent lower for walkers.  
  • Walking is the right thing to do. The best news is that the 30 minutes doesn't have to be done in one lump of time. Two 15 minute walks achieve the same goals. Three 10 minute walks achieve most of those goals.  
  • We can walk 15 minutes in the morning and 15 minutes at night and achieve our walking goals.  
  • Walking feels good. It helps the body heal. It keeps the body healthy. It improves our biological health, our physical health, our psychosocial health, and helps with our emotional health. Walking can literally add years entire years to your life.
Its good to walk.
Be good to yourself. Be good to your body.
ALL ACCUPRESSURE POINTS ARE IN THE SOLE OF YOUR FEET ......
JUST LIKE YOUR HANDS !!

रविवार, 11 अगस्त 2013

sanskrit bramh vani : mridul kirti

संस्कृत ब्रह्म वाणी क्यों है? – डॉ.मृदुल कीर्ति


अपरा और परा का संयोग ही सकल जगत का बीज है.
बीजं माम सर्व भूतानाम ———–गीता ७/१०
सब प्राणियों का अनादि बीज मुझे ही जान.
आठ भेदों वाली– पञ्च तत्त्व, मन, बुद्धि, अहम् 
यह मेरी अपरा प्रकृति है.–गीता ७–४/५
पञ्च तत्वों की तन्मात्राओं में ही इस जिज्ञासा के सूत्र छिपे हैं
 कि संस्कृत ब्रह्म वाणी क्यों है?
पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश ये पांच स्थूल तत्व हैं. 
रूप ,गंध, रस,स्पर्श और ध्वनि यह पांच इनकी तन्मात्राएँ हैं. 
इन्हें सूक्ष्म महाभूत भी कहते हैं. 
इन पाँचों तत्वों में आकाश का ध्वनि तत्व अन्य सभी तत्वों में समाहित है. 
आकाश सर्वत्र है, क्योंकि ज्यों-ज्यों जड़ता घटती है, 
त्यों-त्यों गति उर्ध्व गामी होती है. 
आकाश की तन्मात्रा ( निहित विशेषता ) नाद है. 
नाद अर्थात ध्वनि, ध्वनि अर्थात स्वर.संस्कृत में ‘र’ का अर्थ प्रवाह होता है,
 ‘स्व’ अर्थात अपना मूल तत्त्व. ‘नाद’ आकाश की तन्मात्रा है जो
आकाश की मूल तत्व शक्ति है, अपना मूल ध्वनि प्रवाह है. 
अतः आदि शक्ति का स्वर स्रोत, भूमा की ध्वनि है,
 तब ही उद्घोषित है कि ‘नाद ही ब्रह्म है.’
नाद –आकाश की वह तन्मात्रा है, 
जो ब्रह्म की तरह ही शाश्वत, विराट, अगम्य, अथाह और आत्म-भू है.
आकाश सर्वत्र है अतः नाद भी सर्वत्र है.
वाणी — नाद- शक्ति, ही वाणी की ऊर्जा है और वाणी का सार्थक रूप
 शब्दों में ही रूपांतरित होता है. 
शब्द अक्षरों से बने हैं.. 
अतः मन जिज्ञासु होता है कि अक्षरों का मूल स्रोत्र क्या है?
अक्षरों का मूल स्रोत
वासुदेव का उदघोष
“अक्षरानामकारोस्मि” —-गीता १०/ ३३
अक्षरों में अकार मैं ही हूँ और बिना आखर के
 शब्द संसार की रचना नहीं हो सकती.
कदाचित अक्षर नाम इसीलिये हुआ कि
 ‘क्षर’ (नाश) ‘अ’ (नहीं) जिसका विनाश नहीं होता वह अक्षर है.
अतः बोला हुआ कुछ भी नाश नहीं होता. 
सो जैसे ब्रह्म अविनाशी है वैसे ही अक्षर भी अविनाशी हैं.
 अतः ” शब्द और ब्रह्म” सहोदर है गर्भा शब्द
ब्रह्मा की नाभी से अक्षरों का निःसृत माना जाना इसी तथ्य की पुष्टि है.
देह विज्ञान और आध्यात्म संयोजन के बिंदु संयोजन की जब बात होती है तो मूलाधार से सहस्त्रधार तक के बिन्दुओं में तीसरा बिंदु ‘मणिपुर’ क्षेत्र का है,
 जो ‘नाभी’ से प्रारंभ होता है. नाभी क्षेत्र 
दिव्य ऊर्जा से पूर्ण है और सृजन का भी स्रोत बिंदु है. 
गर्भस्थ शिशु को भोजन नाभि से ही मिलता है.
 वेदों में मूल स्रोत्र के सन्दर्भ में “हिरण्य गर्भा ” शब्द प्रयुक्त हुआ है.
 ब्रह्मा की नाभी से निःसृत होने का यही संकेत है. 
यहीं पर ‘कुण्डलिनी’ है जो अनंत दिव्य मणियों से पूरित है. 
यहीं से आखर का उच्चारण भी आरम्भ होता है. 
पुष्टि के लिए आप ‘अ ‘ अक्षर का उच्चारण करें तो
 ‘नाभि’ क्षेत्र स्पंदित होता है.
 नाभि क्षेत्र को छुए बिना आप ‘अ ‘ बोल ही नहीं सकते. अतः
‘अकारो विष्णु रूपात’
स्वयं सिद्ध है.
अ से म तक की अक्षर यात्रा ही ‘ओम’ का बोध कराती है, 
क्योंकि ‘ओइम’ में व्योम की सारी नाद शक्ति समाहित है.
सबसे अधिक ध्यान योग्य तथ्य है कि ओम के कोई रूप नहीं होते.
 परब्रह्म के एकत्व का प्रमाण भाषा विज्ञानं के माध्यम से भी है.
बिना अकार के कोई अक्षर नहीं होता 
अर्थात बिनाब्रह्म शक्ति के किसी आखर का अस्तित्व नहीं है. 
आप ‘क’ बोलें तो वह क +अ = क ही है. 
यही ‘ अक्षरों में ब्रह्म के अस्तित्व की अकार रूप में प्रमाणिकता है.
अक्षरों का प्राण तत्व ब्रह्म ही है.
यही वह बिंदु है जहॉं से वेद निःसृत हुए है 
क्योंकि नाद का श्रुति से सम्बन्ध है और हम श्रुति परंपरा के वाहक भी तो हैं.
 ब्रह्मा द्वारा ऋषि मुनियों को ध्वनि संचेतना से ही ज्ञान संवेदित हुए.
 ये अनुभूति क्षेत्र की उर्जा से ही अनुभव में उजागर होकर
 वाणी द्वारा व्यक्त हुए.
पाणिनि अष्टाध्यायी में लिखा है कि ‘पाणिनी व्याकरण’ शिव ने उपदिष्ट की थी.
‘वेद’ सुनकर ही तो हम तक आये हैं. तब ही वेदों को श्रुति’ भी कहते है.
जैसे ब्रह्म अविनाशी है वैसे ही वाणी भी अविनाशी है.
 तब ही उपदिष्ट किया जाता है कि ‘दृष्टि, वृत्ति और वाणी ‘ सब प्रभु में जोड़ दो,
 क्योकि वाणी कई जन्मों तक पीछा करती है. 
वाणी की प्रतिक्रिया से प्रारब्ध भी बनते है,
 इसकी ऊर्जा से वर्तमान और भविष्य भी बनते हैं.
संस्कृत भाषा की विशेषताएं
संस्कृत भाषा का मूल भी दिव्यता से ही निःसृत है.——————-
सम और कृत दो शब्दों के योग से संस्कृत शब्द बना है. 
सम का अर्थ सामायिक अर्थात हर काल, युग में 
एक सी ही रहने वाली.विधा. समय के प्रभाव से परे 
अर्थात कितना ही काल बीते इसके मूल स्वरुप में कोई परिवर्तन नहीं होता.
जो स्वयं में ही पूर्ण और सम्पूर्ण है. कृ क्रिया ‘कृत’ के लिए प्रयुक्त हुआ है.
संस्कृत में सोलह स्वर और छत्तीस व्यंजन हैं.
 ये जब से उद्भूत हुए तब से अब तक इनमें अंश भर भी परिवर्तन नहीं हुए हैं.
 सारी वर्ण माला यथावत ही है.
मूल धातु (क्रिया) में कोई परिवर्तन नहीं होता
 यह बीज रूप में सदा मूल रूप में ही प्रयुक्त होती है. 
जैसे ‘भव’ शब्द है सदा भव ही रहेगा, 
पहले और बाद में शब्द लग सकते हैं जैसे अनुभव , संभव , भवतु आदि.
संस्कृत व्याकरण में कभी कोई परिवर्तन नहीं होता.
जैसे ब्रह्म अविनाशी वैसे ही संस्कृत भी अविनाशी है.
नाद की परिधि में आते ही ‘अक्षर’ ‘अक्षर’ हो जाते हैं, 
महाकाश में समाहित ब्रह्ममय हो जाते हैं.
सूक्ष्म और तत्व मय हो जाते हैं. 
इस पार गुरुत्वमय तो उस पार तत्वमय , 
नादमय और ब्रह्ममय क्षेत्र का पसारा है.
डॉ.मृदुल कीर्ति
 

शनिवार, 10 अगस्त 2013

nagpanchami

नागपंचमी :
लावण्या शाह

*

नाग पँचमी के अवसर पर भारत के उज्जैन शहर के मँदिर मेँ भगवान शिव और पार्वती जी की प्रतिमा पर शेष नाग छत्र किये हुए हैँ
जिसकी अत्याधिक महिमा है 

  • नाग पूर्वजोँ को भी कहा गया है कि सँपत्ति व सँतति के प्रति बहुत मोह या लोभ के कारण नाग योनि मेँ पैदा होकर वे रखवाली करते हैँ -
    गाईड फिल्म मेँ वहीदा जी का भी एक रोमाँचक सर्प नृत्य दीखलाया गया था -- नाग लोक पाताल लोक है जिसकी राजधानी भोगावती कहलाती है
  • तो आइये, नाग देवताओँ को प्रणाम करेँ --
  • नाग सारे कश्यप ऋषि की सँतान हैँ - और कद्रू और वनिता जो गरिद की माता थीम वे कश्यप जी की पत्नीयाँ थीँ
  • Anantha: अनन्त शेष नाग जिस पर महाविष्णु दुग्ध सागर मेँ शयन करते हैँ
  • Balarama: बलराम: श्री कृष्ण के बडे भाई, रेवती के पुत्र जो शेष नाग के अवतार हैँ
  • Karkotaka: कर्कोटक- जों आबोहवा के नियँत्रक हैँ
  • Padmavati: पद्मावती: राजा धरणेन्द्र की नाग साथिन
  • Takshaka: तक्षक :नागोँ के राजा
  • UlupiArjuna : की पत्नी : नाग वँश की राज महाभारत से (epic Mahabharata.)
  • Vasuki: वासुकी : नागोँ के राजा जिन्होँने देवोँ की अमृत लाने मेँ सहायता की (devas ) Ocean of Milk.

 WHERE NĀGA LIVE

  • Bhoga-vita: भोगावती : पाताल की राजधानी
  • Lake Manosarowar: मानसरोवर : नाग भूमि
  • Mount Sumeru : सुमेरु पर्बत
  • Nagaland : भारत का नागालैन्ड प्राँत
  • Naggar: नग्गर ग्राम : हिमालय की घाटी मेँ बसा Himalayas, तिब्बत
  • Nagpur: नागपुर शहर, भारत (Nagpur is derived from Nāgapuram, )
  • Pacific Ocean: (Cambodian myth)
  • Pātāla: (or Nagaloka) the seventh of the "nether" dimensions or realms.
  • Sheshna's well: in Benares, India, said to be an entrance to Patala.

नाग देवता पर फिल्माये गये नृत्य देखेँ जायेँ - लीजिये ..ये रहे लिन्क

शेष नाग की शैया पर लेटे हुए महा विष्णु की प्राचीन प्रतिमा
शिवलिँगम्`

नागिन फिल्म के गीत मन मेँ गूँज रहे हैँ - 
" मन डोले मेरा तन डोले रे मेरे दिल का गया करार रे ये कौन बजाये बाँसुरिया "


और श्रीदेवी की छवि मन पटल पर उपस्थित हो गयी ! 

नगीना मेँ नीली , हरी आँखोँ के लेन्स लगाये , सँपेरे बने अमरीश पुरी को गुस्से से फूँफकारती हुई, 
डराती हुई लहराती हुई , नाचते हुए, लता जी के स्वर मेँ गाती हुई जादूभरी नागिन 
" मैँ तेरी दुशमन, तू दुशमन है मेरा, मैँ नागिन तू सँपेरा ..आ आ "

और भी एक अद्भुत नृत्य है - श्रीदेवी और जया प्रदा 
दोनोँ साथ नाच रहीँ हैँ मँदिर मेँ और जीतेन्द्र गा रहे हैँ " हे नाग राजा तुम आ जाओ " -

Nameste
http://lavanyam-antarman.blogspot.com/*
संजीव 'सलिल'
नागिन जैसी झूमतीं , श्यामल लट मुख गौर.
ना-गिन अनगिनती लटें, लगे आम्र में बौर..
नाग के बैठने की मुद्रा को कुंडली मारकर बैठना कहा जाता है. इसका भावार्थ जमकर या स्थिर होकर बैठना है. इस मुद्रा में सर्प का मुख और पूंछ आस-पास होती है. इस गुण के अधर पर कुण्डलिनी छंद बना है जिसके आदि-अंत में एक सामान शब्द या शब्द समूह होता है.

कुंडली  छंद :

हिंदी की जय बोलिए, हो हिंदीमय आप.
हिंदी में नित कार्य कर, सकें विश्व में व्याप..
सकें विश्व में व्याप, नाप लें समुद ज्ञान का.
नहीं व्यक्ति का, बिंदु 'सलिल' राष्ट्रीय आन का..
नेह-नरमदा नहा बोलिए होकर निर्भय.
दिग्दिगंत में गूज उठे, फिर हिंदी की  जय..
*
नव संवत्सर पर करें, शब्द-पुत्र संकल्प.
राष्ट्र-विश्व हित ही जियें, इसका नहीं विकल्प..
इसका नहीं विकल्प, समय के साथ चलेंगे.
देश-दुश्मनों की छाती पर दाल दलेंगे..
जीवन का हर पल, मानव सेवा का अवसर.
मानव में माधव देखें, शुभ नव संवत्सर..
*
साँसों के साम्राज्य का, वह मानव युवराज.
त्याग-परिश्रम का रखा, जिसने निज सिर ताज..
जिसने निज सिर ताज, शीश को नित्य नवाया.
अहंकार का पाश 'सलिल' सम, व्यर्थ बनाया..
पीड़ा-वन में राग छेड़ता, जो हासों के.
उसको ही चंदन-वंदन, मिलते श्वासों के..
*
हर दिन, हर पल कर सके, यदि मन सच को याद.
जग-जीवन आबाद कर, खुद भी होता शाद..
खुद भी होता शाद, नेह-नर्मदा बहाता.
कोई रहे न गैर, सकल जग अपना पाता.
कंकर में शंकर दिखते, उसको हर पल-छिन.
'सलिल' करे अभिषेक, विहँसकर उसका हर दिन..
*
धुआँ-धुआँ सूरज हुआ, बदली-बदली धूप.
ऊषा संध्या निशा सा, दोपहरी का रूप..
दोपहरी का रूप,  झुका आकाश दिगंबर.
ऊपर उठती धारा, गले मिल, मिटता अंतर.
सिमट समंदर खुद को, करता कुआँ-कुआँ.
तज सिद्धांत सियासत-सूरज धुआँ-धुआँ..
*
मरुथल बढ़ता, सिमटता हरियाली का राज.
धरती के सिर पर नहीं, शेष वनों का ताज.
शेष वनों का ताज, नहीं पर्वत-कर बाकी.
सलिल बिना सलिलायें, मधुशाला बिन साक़ी.
नहीं काँपता पंछी-कलरव बिन क्यों मानव?
हरियाली का ताज सिमटता, बढ़ता मरुथल..
*
कविता कवि करता अगर, जिए सुकविता आप.
सविता तब ही सकेगा, कवि-जीवन में व्याप..
कवि-जीवन में व्याप, लक्ष्मी दूर रहेगी.
सरस्वती नित लेकर, सुख-संतोष मिलेगी..
निशा उषा संध्या वंदन कर, हर ढल-उगता.
जिए सुकविता आप, अगर कवि करता कविता..
*

smaran : mohammad rafi

स्मरण : 

: कालजयी गायक मोहम्‍मद रफ़ी :

मोहम्मद रफ़ी के चाहने वाले दुनिया भर में हैं. सुमधुर गायक मोहम्मद रफ़ी भले ही हमारे बीच में नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज़ करोड़ों दिलों में आज भी अपना स्थान बनाये है. मोहम्मद रफ़ी के विविध आयामी गायन एवं व्यक्तित्व को भूल पाना उनसे मिले किसी भी व्यक्ति के लिए संभव नहीं है. गांव मजीठा, जिला अमृतसर पंजाब में 24 दिसंबर, 1924 को  जन्में मोहम्मद रफ़ी के पिता हाजी अली मोहम्मद और माता अल्लारखी थीं. उनके पिता ख़ानसामा थे. रफ़ी के बड़े भाई मोहम्मद दीन की हजामत की दुकान थी. यहाँ उनके बचपन का काफ़ी वक़्त गुज़रा.

बचपन में रफ़ी इकतारा बजाते फ़कीर के पीछे-पीछे घूमते हुए उसके स्वर में स्वर मिलाकर गाते थे. एक दिन उनके बड़े भाई ने देख लिया और उनके वालिद को बताया तो रफ़ी को काफ़ी डांट पड़ी. उस फ़क़ीर ने रफ़ी को आशीर्वाद दिया था कि वह आगे चलकर ख़ूब नाम कमाएगा. एक दिन दुकान पर आए कुछ लोगों ने ऱफी को फ़क़ीर के गीत इस क़दर सधे हुए सुर में गाते सुना कि वे लोग हैरान रह गए. ऱफी के बड़े भाई ने उनकी प्रतिभा को पहचाना. 1935 में उनके पिता रोज़गार के सिलसिले में लाहौर आ गए. यहां उनके भाई ने उन्हें गायक उस्ताद उस्मान ख़ान अब्दुल वहीद ख़ान की शार्गिदी में सौंप दिया. बाद में रफ़ी ने पंडित जीवन लाल और उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खां जैसे शास्त्रीय संगीत के दिग्गजों से भी संगीत सीखा.


आरम्भ में मोहम्मद रफ़ी उस वक़्त के मशहूर गायक और अभिनेता कुंदन लाल सहगल के दीवाने थे  और उनके जैसा ही बनना चाहते थे. वह छोटे-मोटे जलसों में सहगल के गीत गाते थे. क़रीब 15 साल की उम्र में उनकी मुलाक़ात सहगल से हुई. हुआ यूं कि एक दिन लाहौर के एक समारोह में सहगल गाने वाले थे. रफ़ी भी अपने भाई के साथ वहां पहुंच गए. संयोग से माइक ख़राब हो गया और लोगों ने शोर मचाना शुरू कर दिया. व्यवस्थापक परेशान थे कि लोगों को कैसे ख़ामोश कराया जाए. उसी वक़्त रफ़ी के बड़े भाई व्यवस्थापक के पास गए और उनसे अनुरोध किया कि माइक ठीक होने तक रफ़ी को गाने का मौक़ा दिया जाए. मजबूरन व्यवस्थापक मान गए. रफ़ी ने गाना शुरू किया, लोग शांत हो गए. इतने में सहगल भी वहां पहुंच गए. उन्होंने रफ़ी को आशीर्वाद देते हुए कहा कि इसमें कोई शक नहीं कि एक दिन तुम्हारी आवाज़ दूर-दूर तक फैलेगी.

बाद में रफ़ी को संगीतकार फ़िरोज़ निज़ामी के मार्गदर्शन में लाहौर रेडियो में गाने का मौक़ा मिला. उन्हें कामयाबी मिली और वह लाहौर फ़िल्म उद्योग में अपनी जगह बनाने की कोशिश करने लगे. उस दौरान उनकी रिश्ते में बड़ी बहन लगने वाली बशीरन से उनकी शादी हो गई. उस वक़्त के मशहूर संगीतकार श्याम सुंदर और फ़िल्म निर्माता अभिनेता नासिर ख़ान से रफ़ी की मुलाक़ात हुई. उन्होंने उनके गाने सुने और उन्हें बंबई आने का न्यौता दिया. ऱफी के पिता संगीत को इस्लाम विरोधी मानते थे, इसलिए बड़ी मुश्किल से वह संगीत को पेशा बनाने पर राज़ी हुए.
1944 में रफ़ी अपने भाई के साथ बंबई पहुंचे. अपने वादे के मुताबिक़ श्याम सुंदर ने रफ़ी को पंजाबी फ़िल्म गुलबलोच में ज़ीनत के साथ गाने का मौक़ा दिया.  रफ़ी ने गुलबलोच के सोनियेनी, हीरिएनी तेरी याद ने बहुत सताया गीत के ज़रिये पार्श्वगायन के क्षेत्र में क़दम रखा.

नौशाद ने फ़िल्म शाहजहां के एक गीत में उन्हें सहगल के साथ दो पंक्तियां -मेरे सपनों की रानी, रूही, रूही रूही
गाने का मौक़ा दिया. नौशाद ने 1946 में फ़िल्म अनमोल घड़ी का गीत तेरा खिलौना टूटा बालक, तेरा खिलौना टूटा रफी की आवाज़ में रिकॉर्ड कराया. 1947 में फ़िरोज़ निज़ामी ने रफ़ी को फ़िल्म जुगनूं के युगल गीत 'यहां बदला वफ़ा का बेवफ़ाई के सिवा क्या है' में रफ़ी को नूरजहां के साथ गाने का मौक़ा दिया.  यह गीत बहुत लोकप्रिय हुआ. इसके बाद नौशाद ने रफ़ी से फ़िल्म मेला का एक गीत ये ज़िंदगी के मेले गवाया. इस फ़िल्म के बाक़ी गीत मुकेश से गवाये गए, लेकिन रफ़ी का गीत अमर हो गया. यह गीत हिंदी सिनेमा के बेहद लोकप्रिय गीतों में से एक है.

इस बीच रफ़ी संगीतकारों की पहली जोड़ी हुस्नलाल-भगतराम के संपर्क में आए. इस जोड़ी ने अपनी शुरुआती फ़िल्मों प्यार की जीत, बड़ी बहन और मीना बाज़ार में रफ़ी की आवाज़ का भरपूर इस्तेमाल किया. इसके बाद तो नौशाद को भी फ़िल्म दिल्लगी में नायक की भूमिका निभा रहे श्याम कुमार के लिए रफ़ी की आवाज़ का ही इस्तेमाल करना पड़ा. इसके बाद फ़िल्म चांदनी रात में भी उन्होंने रफ़ी को मौक़ा दिया. बैजू बावरा संगीत इतिहास की सिरमौर फ़िल्म मानी जाती है. इस फ़िल्म ने रफ़ी को कामयाबी के आसमान तक पहुंचा दिया. इस फ़िल्म में प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खां साहब और डी वी पलुस्कर ने भी गीत गाये थे. फ़िल्म के पोस्टरों में भी इन्हीं गायकों के नाम प्रचारित किए गए, लेकिन जब फिल्म प्रदर्शित हुई तो मोहम्मद रफ़ी के गाये गीत तू गंगा की मौज और ओ दुनिया के रखवाले हर तरफ़ गूंजने लगे. रफ़ी ने अपने समकालीन गायकों तलत महमूद, मुकेश और सहगल के रहते अपने लिए जगह बनाई.

रफ़ी के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने तक़रीबन 26 हज़ार गाने गाये, लेकिन उनके तक़रीबन पांच हज़ार गानों के प्रमाण मिलते हैं, जिनमें ग़ैर फ़िल्मी गीत भी शामिल हैं. देश विभाजन के बाद जब नूरजहां, फ़िरोज़ निज़ामी और निसार वाज्मी जैसी कई हस्तियां पाकिस्तान चली गईं, लेकिन वह हिंदुस्तान में ही रहे. इतना ही नहीं, उन्होंने सभी गायकों के मुक़ाबले सबसे ज़्यादा देशप्रेम के गीत गाये. रफ़ी ने जनवरी, 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के एक माह बाद गांधी जी को श्रद्धांजलि देने के लिए हुस्नलाल भगतराम के संगीत निर्देशन में राजेंद्र कृष्ण रचित सुनो सुनो ऐ दुनिया वालों, बापू की ये अमर कहानी गीत गाया तो पंडित जवाहर लाल नेहरू की आंखों में आंसू आ गए थे. भारत-पाक युद्ध के वक़्त भी रफ़ी ने जोशीले गीत गाये. यह सब पाकिस्तानी सरकार को पसंद नहीं था. शायद इसलिए दुनिया भर में अपने कार्यक्रम करने वाले रफ़ी पाकिस्तान में शो पेश नहीं कर पाए. ऱफी किसी भी तरह के गीत गाने की योग्यता रखते थे. संगीतकार जानते थे कि आवाज़ को तीसरे सप्तक तक उठाने का काम केवल ऱफी ही कर सकते थे. मोहम्मद रफ़ी ने संगीत के उस शिखर को हासिल किया, जहां तक कोई दूसरा गायक नहीं पहुंच पाया. उनकी आवाज़ के आयामों की कोई सीमा नहीं थी. मद्धिम अष्टम स्वर वाले गीत हों या बुलंद आवाज़ वाले याहू शैली के गीत, वह हर तरह के गीत गाने में माहिर थे. उन्होंने भजन, ग़ज़ल, क़व्वाली, दशभक्ति गीत, दर्दभरे तराने, जोशीले गीत, हर उम्र, हर वर्ग और हर रुचि के लोगों को अपनी आवाज़ के जादू में बांधा. उनकी असीमित गायन क्षमता का आलम यह था कि उन्होंने रागिनी, बाग़ी, शहज़ादा और शरारत जैसी फ़िल्मों में अभिनेता-गायक किशोर कुमार पर फ़िल्माये गीत गाये.


वह 1955 से 1965 के दौरान अपने करियर के शिखर पर थे. यह वह व़क्त था, जिसे हिंदी फ़िल्म संगीत का स्वर्ण युग कहा जा सकता है. उनकी आवाज़ के जादू को शब्दों में बयां करना नामुमकिन है. उनकी आवाज़ में सुरों को महसूस किया जा सकता है. उन्होंने अपने 35 साल के फ़िल्म संगीत के करियर में नौशाद, सचिन देव बर्मन, सी रामचंद्र, रोशन, शंकर-जयकिशन, मदन मोहन, ओ पी नैयर, चित्रगुप्त, कल्याणजी-आनंदजी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, सलिल चौधरी, रवींद्र जैन, इक़बाल क़ुरैशी, हुस्नलाल, श्याम सुंदर, फ़िरोज़ निज़ामी, हंसलाल, भगतराम, आदि नारायण राव, हंसराज बहल, ग़ुलाम हैदर, बाबुल, जी एस कोहली, वसंत देसाई, एस एन त्रिपाठी, सज्जाद हुसैन, सरदार मलिक, पंडित रविशंकर, उस्ताद अल्ला रखा, ए आर क़ुरैशी, लच्छीराम, दत्ताराम, एन दत्ता, सी अर्जुन, रामलाल, सपन जगमोहन, श्याम जी-घनश्यामजी, गणेश, सोनिक-ओमी, शंभू सेन, पांडुरंग दीक्षित, वनराज भाटिया, जुगलकिशोर-तलक, उषा खन्ना, बप्पी लाह़िडी, राम-लक्ष्मण, रवि, राहुल देव बर्मन और अनु मलिक जैसे संगीतकारों के साथ मिलकर संगीत का जादू बिखेरा.

रफ़ी साहब ने 31 जुलाई, 1980 को आख़िरी सांस ली. उन्हें दिल का दौरा पड़ा था. जिस रोज़ उन्हें जुहू के क़ब्रिस्तान में दफ़नाया गया, उस दिन बारिश भी बहुत हो रही थी. उनके चाहने वालों ने उन्हें नम आंखों से विदाई दी. लग रहा था मानो ऱफी साहब कह रहे हों-
हां, तुम मुझे यूं भुला न पाओगे
जब कभी भी सुनोगे गीते मेरे
संग-संग तुम भी गुनगुनाओगे…

शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

जन्म दिवस शुभ कामना:

जन्म दिवस शुभ कामना:
  अगस्त- 1-  अमर ज्योति 
                6-  सुनीता सानू
                8 -  डॉ. एस. एन. शर्मा 'कमाल'
               11 - सुरेन्द्र भूटानी 
               28 - श्याम सखा 'श्याम'  

सितंबर-  1 -  शार्दुला नोगजा
                8 -  अनूप भार्गव 
              10 - रविकांत 'अनमोल' 
              23 - रामधारी सिंह 'दिनकर' 

'दिनकर'  अमर अनूप है, किरण शार्दुला शांत
श्याम सखा अनमोल नभ-उर-वासी रवि कांत
देख सुनीता जिन्दगी, भू पर उतर सुरेंद्र
कहे कमल सम अमल हो, सचमुच धन्य नरेन्द्र
ज्यों की त्यों चादर रखूँ, ढाई आखर बांच
ज्ञान-कर्म दश अश्व का, रथपति बोलूँ सांच
वर्ष-ग्रंथि आगमन की, दर्पण से साक्षात्
क्या करना था क्या किया, पूछे नवल प्रभात
'सलिल' करे अभिषेक नित, चन्दन शोभित माथ
सदा रहे- है विनय यह, स्वीकारो हे तात!

download manager

Hindi Tech Blog


Posted: 08 Aug 2013 02:30 AM PDT
डाउनलोड मैनेजर इंटरनेट से डाउनलोडिंग को बहुत आसान बना देते है । ज्यादा फाइल डाउनलोड करनी हो या कोर्इ बडी फाइल डाउनलोड करनी हो सबसे बेहतर विकल्प डाउनलोड मैनेजर ही होते है । ऐसे में एक नया बढि.या विकल्प है eagleget इसमें डाउनलोड मैनेजर की सभी जरुरी खूबिया तो है ही साथ ही ये आपको आासानी से यूटयूब विडियो डाउनलोड करने की अतिरिक्त सुविधा भी देता है ।

ये सभी प्रमुख ब्राउजर जैसे फायरफाक्स, ओपेरा, इंटरनेट एक्सप्लोरर और क्रोम के साथ भी जुड जाता है यानि आप सीधे ब्राउजर से ही इसका उपयोग कर सकते हैं और चाहें तो बिना किसी ब्राउजर के सीधे ही इसका प्रयोग कर सकते हैं ।

एक बार इसें इंस्टाल करने के बाद ये आपके ब्राउजर में किसी लिंक पर राइट किलक करने पर तो उपयोग किया जा ही सकता है साथ ही यूटयूब पर आपको विडियो पर एक अतिरिक्त डाउनलोड बटन भी दिखार्इ देगा जिस पर किलक करके आप यूटयूब विडियो को अलग अलग फार्मेट में किसी एक विकल्प में डाउनलोड कर पायेंगें ।

कुछ इस तरह






साथ ही आप चाहे तो सीधे लिंक से ही यूटयूब विडियो डाउनलोड कर सकते है इसके लिए आपको पहले तो  डाउनलोड मैनेज्र को शुरु करना होगा फिर Video sniffer पर किलक करके दांयी ओर खुली छोटी विंडो में लिंक को टाइप या पेस्ट करना होगा । थोडी देर में नीचे Quality के सामने अपनी पसंद का फार्मेट चुने और उसके सामने रेडियो बटन सेलेक्ट करे फिर नीचे Download पर किलक कर दे आपका यूटयूब विडियो डाउनलोड होने लगेगा ।


कुछ इस तरह


इसमें कुछ अतिरिक्त सुविधांए भी है जैसे आप तय कर सकते है कि एक निशिचत समय में डाउनलोड मैनेजर खुद ही आपकी लिंक की हुर्इ फाइल्स को डाउनलोड करना शुरु कर दे ( मुख्य चित्र देंखें )

और इस टूल की सबसे अच्छी बात तो ये है कि ये बिल्कुल मुफ्त है और आाकार में भी छोटा सिर्फ 4 एम बी का है ।

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दूसरी अतिरिक्त डाउनलोड लिंक यहां है ।


उम्मीद है ये टूल आपके काम आयेगा ।