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रविवार, 3 मार्च 2024

३ मार्च, बरवै, नंदा दोहा, गीत हाजिर हो, आलोक श्रीवास्तव, बंधु, हाइकु गीत, रोहिताश्व अस्थाना, रामकिंकर

सलिल सृजन ३ मार्च
*
हाइकु गीत
प्रभु कृपा से / राम किंकर हुए / युग तुलसी।
नर्मदा तट / अवतरित फिर / रामबोला ही।।
जबलपुर / नगरी सुपावन / है मनोहर।
नर्मदा तट / सलिल अविकल / नाद सुंदर।।
कथावाचक / बसे शिवनायक / सरल मन।
मृदु स्वभावी / धनेसरा का साथ / था पावन।।
सुत हुआ था / श्याम सुंदर छवि / सुदर्शन थी।
प्रभु कृपा से / राम किंकर हुए / युग तुलसी।।
शांत बालक / प्रखर मतिमय / श्लोक रुचते।
लीन होकर / कथा सुनता / पिता कहते।।
भजन गातीं / दोउ बेरा जननि / सुनता वह।
मौन रहता / अर्थ उनमें छिपा / गुनता वह।।
पुलकते थे / पिता-माता सहित परिजन भी।
प्रभु कृपा से / राम किंकर हुए / युग तुलसी।।
सीख आखर / पढ़े-पूछे अर्थ भी / चिंतन करे।
संस्कृत-हिंदी / पढ़े, हल गणित कर/ कीर्तन करे।।
पितृ ममता / मातृ अनुशासन / सुखद पल।
विधि विचारे / घटित अघटित / हो न खो कल।।
नहीं कहतीं / कभी कुछ माँ पर / नहीं हुलसी।
प्रभु कृपा से / राम किंकर हुए / युग तुलसी।।
३.३.२०२४
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होली की कुण्डलियाँ:
मनाएँ जमकर होली
*
होली हो ली हो रही होगी फिर-फिर यार
मोदी राहुल ममता केजरि लालू हैं तैयार
लालू हैं तैयार, ठाकरे शरद न बच्चे
फूँक फूँक रख पाँव, दाँव नहिं चलते कच्चे
कहे 'सलिल' कवि जनता को ठगती हर टोली
जनता बचकर रहे चुनावी भंग की गोली
*
होली अनहोली न हो, खाएँ अधिक न ताव.
छेड़-छाड़ सीमित करें, अधिक न पालें चाव..
अधिक न पालें चाव, भाव बेभाव बढ़े हैं.
बचें, करेले सभी, नीम पर साथ चढ़े हैं..
कहे 'सलिल' कविराय, न भोली है अब भोली.
बचकर रहिये आप, खेलिए बचकर होली..
*
होली जो खेले नहीं, वह कहलाये बुद्ध.
माया को भाए सदा, सत्ता खातिर युद्ध..
सत्ता खातिर युद्ध, सोनिया को भी भाया.
जया, उमा, ममता, स्मृति का भारी पाया..
मर्दों पर भारी है, महिलाओं की टोली.
पुरुष सम्हालें चूल्हा-चक्की अबकी होली..
*
होली ने खोली सभी, नेताओं की पोल.
जिसका जैसा ढोल है, वैसी उसकी पोल..
वैसी उसकी पोल, तोलकर करता बातें.
लेकिन भीतर ही भीतर करता हैं घातें..
नकली कुश्ती देख भ्रमित है जनता भोली.
एक साथ मिल खर्चे बढ़वा खेलें होली..
***
सॉनेट
हम
हम अपने ही दुश्मन क्यों हैं?
कहें भला पर बुरा कर रहे।
आत्मनाश से नहीं डर रहे।।
बिना काम के कंचन क्यों हैं?
बिना नींव, प्रासाद बनाते।
कह विकास करते विनाश हम।
तम फैलाते कालांश हम।।
अपनों की बलि, बली चढ़ाते।
अहं-दंभ की सुरा पी रहे।
शंका भय के साथ जी रहे।
नाश-यज्ञ दुष्कर्म घी रहे।।
वन पर्वत सलिलाएँ सिसकें।
करें अनसुनी मनुज न हिचकें।
हाय विधाता! कहीं तो रुकें।।
३.३.२०२२
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मुक्तिका
°
खामियाँ खोजते नादां ऐसे।
खुद नहीं हैं, हुए खुदा जैसे।।
ख्वाहिशें ही हमें नचाती हैं।
बिक रहे हम खरीदते पैसे।।
आँसू पोछें नहीं, न दें राहत।
जिंदगी जी,न जी कभी कैसे?
आदमी कह रहे, न हैं लेकिन।
हम हुए जंगली बली भैंसे।।
काश रब दे अकल जरा हमको।
हों नहीं हम डरावने ऐसे।।
३-३-२०२२
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लेख:
सतत स्थाई विकास : मानव सभ्यता की प्राथमिक आवश्यकता
*
स्थायी-निरंतर विकास : हमारी विरासत
मानव सभ्यता का विकास सतत स्थाई विकास की कहानी है। निस्संदेह इस अंतराल में बहुत सा अस्थायी विकास भी हुआ है किन्तु अंतत: वह सब भी स्थाई विकास की पृष्ठ भूमि या नींव ही सिद्ध हुआ। विकास एक दिन में नहीं होता, एक व्यक्ति द्वारा भी नहीं हो सकता, किसी एक के लिए भी नहीं किया जाता। 'सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामय:, सर्वे भद्राणु पश्यन्ति, माँ कश्चिद दुःखभाग्भवेद" अर्थात ''सभी सुखी हों, सभी स्वस्थ्य हों, शुभ देखें सब, दुःख न कहीं हो"का वैदिक आदर्श तभी प्राप्त हो सकता है जब विकास, निरंतर विकास, सबकी आवश्यकता पूर्ति हित विकास, स्थाई विकास होता रहे। ऐसा सतत और स्थाई विकास जो मानव की भावी पीढ़ियों की आवश्यकताओं और उनके समक्ष उपस्थित होने वाले संकटों और अभावों का पूर्वानुमान कर किया जाए, ही हमारा लक्ष्य हो सकता है। सनातन वैदिक चिंतन धारा द्वारा प्रदत्त वसुधैव कुटुम्बकम" तथा 'विश्वैक नीडं' के मन्त्र ही वर्तमान में 'ग्लोबलाइज विलेज' की अवधारणा का आधार हैं।
'सस्टेनेबल डेवलपमेंट अर्थ स्थायी या टिकाऊ विकास से हमारा अभिप्राय विकास ऐसे कार्यों की निरन्तरता से है जो मानव ही नहीं, सकल जीव जंतुओं की भावी पीढ़ियों का आकलन कर, उनकी प्राप्ति सुनिश्चित करते हुए, वर्तमान समय की आवश्यकताएँ पूरी करे। दुर्गा सप्तशतीकार कहता है 'या देवी सर्व भूतेषु प्रकृतिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:'। पौर्वात्य चिन्तन प्रकृति को 'माँ' और सभी प्राणियों को उसकी संतान मानता है। इसका आशय यही है कि जैसे शिशु माँ का स्तन पान इस तरह करता है की माँ को कोई नहीं होती, अपितु उसका जीवन पूर्णता पता है, वैसे ही मनुष्य प्रकृति संसाधनों का उपयोग इस कि प्रकृति अधिक समृद्ध हो। भारतीय परंपरा में प्रकृति के अनुकूल विकास की मानता है, प्रकृति के प्रतिकूल विकास की नहीं।'सस्टेनेबल डवलेपमेन्ट कैन ओनली बी इन एकॉर्डेंस विथ नेचर एन्ड नॉट, अगेंस्ट और एक्सप्लोयटिंग द नेचर।'
प्रकृति माता - मनुष्य पुत्र
स्वयं को प्रकृति पुत्र मानने की अवधारणा ही पृथ्वी, नदी, गौ और भाषा को माता मानने की परंपरा बनकर भारत के जान-जन के मन में बसी है। गाँवों में गरीब से गरीब परिवार भी गाय और कुत्ते के लिए रोटी बनाकर उन्हें खिलाते हैं। देहरी से भिक्षुक को खाली हाथ नहीं लौटाते। आंवला, नीम, पीपल, बेल, तुलसी, कमल, दूब, महुआ, धान, जौ, लाई, आदि पूज्यनीय हैं। नर्मदा ,गंगा, यमुना, क्षिप्रा आदि नदियाँ पूज्य हैं। नर्मदा कुम्भ, गंगा दशहरा, यमुना जयंती आदि पर्व मनाये जाते हैं। पोला लोक पर्व पोला पर पशुधन का पूजन किया जाता है। आँवला नवमी, तुलसी जयंती आदि लोक पर्व मनाये जाते हैं। नीम व जासौन को देवी, बेल व धतूरा को शिव, कदंब व करील को कृष्ण, कमल व धान को लक्ष्मी, हरसिंगार को विष्णु से जोड़कर पूज्यनीय कहा गया है। यही नहीं पशुओं और पक्षियों को भी देवी-देवताओं से संयुक्त किया गया ताकि उनका शोषण न कर, उनका ध्यान रखा जाए। बैल, सर्प व नीलकंठ को शिव, शेर व बाघ को देवी, राजहंस व मोर को सरस्वती, हाथी को लक्ष्मी, मोर को कृष्ण आदि देवताओं के साथ संबद्ध बताया गया ताकि उनका संरक्षण किया जाता रहे। यही नहीं हनुमान जी को वायु, लक्ष्मी जी को जल, पार्वती जी को पर्वत, सीता जी भूमि की संतान कहा गया ताकि जन सामान्य इन प्राकृतिक तत्वों तत्वों की शुद्धता और सीमित सदुपयोग के प्रति सचेष्ट हो।
विश्व रूपांतरण : युग की महती आवश्यकता
हम पृथ्वी को माता मानते है और सतत विकास सदैव हमारे दर्शन और विचारधारा का मूल सिद्धांत रहा है। सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अनेक मोर्चों पर कार्य करते हुए हमें महात्मा गांधी की याद आती है, जिन्होंने हमें चेतावनी दी थी कि धरती प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकताओं को तो पूरा कर सकती है, पर प्रत्येक व्यक्ति के लालच को नहीं। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा पारित 'ट्रांस्फॉर्मिंग आवर वर्ल्ड : द 2030 एजेंडा फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट' के संकल्प कोभारत सहित १९३ देशों ने सितंबर, २०१५ में संयुक्त राष्ट्र महासभा की उच्च स्तरीय पूर्ण बैठक में स्वीकार और इसे एक जनवरी, २०१६ से लागू किया। इसे सतत विकास लक्ष्यों के घोषणापत्र के नाम से भी जाना जाता है। सतत विकास का उद्देश्य सबके लिए समान, न्यायसंगत, सुरक्षित, शांतिपूर्ण, समृद्ध और रहने योग्य विश्व का निर्माण हेतु विकास में सामाजिक परिवेश, आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण को व्यापक रूप से समाविष्ट करना है। २००० से २०१५ तक के लिए निर्धारित नए लक्ष्यों का उद्देश्य विकास के अधूरे कार्य को पूरा करना और ऐसे विश्व की संकल्पना को मूर्त रूप देना है, जिसमें चुनौतियाँ कम और आशाएँ अधिक हों। भारत विश्व कल्याणपरक विकास के मूलभूत सिद्धांतों को अपनी विभिन्न विकास नीतियों में आराम से ही सम्मिलित करता रहा है। वर्तमान विश्वव्यापी अर्थ संकट के संक्रमण काल में भी विकास की अच्छी दर बनाए रखने में भारत सफल है। गाँधी जी ने 'आखिरी आदमी के भले', विनोबा जी ने सर्वोदय और दीनदयाल उपाध्याय ने अंत्योदय के माध्यम से निर्धनों को को गरीबी रेखा से ऊपर लाने और निर्बल को सबल बनाने की संकल्पना का विकास किया। वर्ष २०३० तक निर्धनता को समाप्त करने का लक्ष्य हमारा नैतिक दायित्व ही नहीं, शांतिपूर्ण, न्यायप्रिय और चिरस्थायी भारत और विश्व को सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य प्राथमिकता भी है।
सतत विकास कार्यक्रम : लक्ष्य
वित्तीय लक्ष्य:
विकसित देश सरकारी विकास सहायत का अपना लक्ष्य प्राप्त कर, अपनी सकल राष्ट्रीय आय का ०.७%० विकासशील देशों को तथा ०.१५% से ०.२०% सबसे कम विकसित राष्ट्रों को दें। विकासशील देश एकाधिक स्रोत से साधन जुटाएँ तथा समन्वित नीतियों द्वारा दीर्घिकालिक ऋण संवहनीयता प्राप्त कर अत्यधिक ऋणग्रस्त निर्धन देशों पर ऋण बोझ कम कर निवेश संवर्धन को करें।
तकनीकी लक्ष्य:
विकसित, विकासशील व् अविकसित देशों के मध्य विज्ञान, प्रौद्योगिकी, तकनालोजी व नवाचार सुलभ कर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना। वैश्विक तकनॉलॉजी तंत्र का विकास करना। परस्पर सहमति पर रियायती और वरीयता देते हुए हितकारी शर्तों पर पर्यावरण अनुकूल तकनोलॉजी का विकास, हस्तांतरण, प्रसार व् समन्वय करना। तकनोलॉजी बैंक बनाकर सामर्थ्यवान तकनोलॉजी का प्रयोग बढ़ाना।
क्षमता निर्माण तथा व्यापार :
विकाशील देशों में लक्ष्य क्षमता निर्माण कर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना। राष्ट्रीय योजनाओं को समर्थन दिलाना। विश्व व्यापार संगठन के अन्तर्गत सार्वभौम, नियमाधारित, भेदभावहीन, खुली और समान बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली को प्रोत्साहित करना। विकासशील देशों के निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि कर, सबसे कम देशों की भागीदारी दोगुनी करना। सबसे कम विकसित देशों को शुल्क और कोटा मुक्त बाजार प्रवेश सुविधा देना, पारदर्शी व् सरल व्यापार नियम बनाकर बाजार में प्रवेश सरल बनाना।
नीतिगत-संस्थागत सामंजस्य:
सतत विकास हेतु वैश्विक वृहद आर्थिक स्थिरता वृद्धि हेतु नीतिगत-संस्थागत सामंजस्य बनाना। गरीबी मिटाने हेतु पारस्परिक नीतिगय क्षमता और नेतृत्व का सम्मान करना। सभी देशों के साथ सतत विकास लक्ष्य पाने में सहायक बहुहितकारी भागीदारियाँ कर विशेषज्ञता, तकनोलॉजी, तहा संसाधन जुटाना। प्रभावी सार्वजनिक व् निजी संसाधन जुटाना। सबसे कम विकसित, द्वीपीय व विकासशील देशों के लिए क्षमता निर्माण समर्थन बढ़ाना। २०३० तक सकल घेरलू उत्पाद के पूरक प्रगति के पैमाने विकसित करना।
स्थायी विकास लक्ष्य : केंद्र के प्रयास
सतत् विकास लक्ष्‍यों को हासिल करने के लिए खरबों डॉलर के निजी संसाधनों की काया पलट ताकत जुटाने, पुनःनिर्देशित करने और बंधन मुक्‍त करने हेतु तत्‍काल कार्रवाई करने, विकासशील देशों में संवहनीय ऊर्जा, बुनियादी सुविधाओं, परिवहन - सूचना - संचार प्रौद्योगिकी आदि महत्‍वपूर्ण क्षेत्रों में प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश सहित दीर्घकालिक निवेश जुटाने के साथ सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के लिए एक स्‍पष्‍ट दिशा निर्धारित करनी है। इस हेतु सहायक समीक्षा व निगरानी तंत्रों के विनियमन और प्रोत्‍साहक संरचनाओं हेतु नए साधन जुटाकर निवेश आकर्षित कर सतत विकास को पुष्‍ट करना प्राथमिक आवश्यकता है। सर्वोच्‍च ऑडिट संस्‍थाओं, राष्‍ट्रीय निगरानी तंत्र और विधायिका द्वारा निगरानी के कामकाज को अविलंब पुष्‍ट किया जाना है। हमारे मेक इन इंडिया, स्वच्छ भारत अभियान, बेटी बचाओ-बेटी पढाओ, राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, प्रधानमंत्री ग्रामीण और शहरी आवास योजना, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, डिजिटल इंडिया, दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना, स्किल इंडिया और प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना शामिल हैं। इसके अलावा अधिक बजट आवंटनों से बुनियादी सुविधाओं के विकास और गरीबी समाप्त करने से जुड़े कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जा रहा है। केंद्र सरकार ने सतत विकास लक्ष्यों के कार्यान्वयन पर निगरानी रखने तथा इसके समन्वय की जिम्मेदारी नीति आयोग को, संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक परिषद द्वारा प्रस्तावित संकेतकों की वैश्विक सूची से उपयोगी संकेतकों की पहचान कर राष्ट्रीय संकेतक तैयार करने का कार्य सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय को सौंपा है।न्यूयार्क में जुलाई, २०१७ में आयोजित होने वाले उच्च स्तरीय राजनीतिक मंच (एचएलपीएफ) पर अपनी पहली स्वैच्छिक राष्ट्रीय समीक्षा (वीएनआर) प्रस्तुत कर भारत सरकार ने सतत विकास लक्ष्यों के सफल कार्यान्वयन को सर्वोच्च महत्व दिया है।
राज्यों की भूमिका :
भारत के संविधान केंद्रों और राज्यों के मध्य राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक शक्ति संतुलन के अनुरूप राज्यों में विभिन्न राज्य स्तरीय विकास योजनायें कार्यान्वित की जा रही हैं। इन योजनाओं का सतत विकास लक्ष्यों के साथ तालमेल है। केंद्र और राज्य सरकारों को सतत विकास लक्ष्यों के कार्यान्वयन में आनेवाली विभिन्न चुनौतियों का मुकाबला मिलकर करना है। भारतीय संसद विभिन्न हितधारकों के साथ सतत विकास लक्ष्यों के कार्यान्वयन को सुविधाजनक बनाने के लिए सक्रिय है। अध्यक्षीय शोध कदम (एसआरआई) सतत विकास लक्ष्यों से संबंधित विभिन्न मुद्दों पर सांसदों और विशेषज्ञों के मध्य विमर्श हेतु है। नीति आयोग सतत विकास लक्ष्यों पर राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर परामर्श शृंखलाएं आयोजित कर विशेषज्ञों, विद्वानों, संस्थाओं, सिविल सोसाइटियों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों और केंद्रीय मंत्रालयों राज्य सरकारों व हितधारकों के साथ गहन विचार-विमर्श कर रहा है। पर्यावरण संरक्षण व संपूर्ण विकास हेतु जन आकांक्षा पूर्ण करने हेतु राष्ट्रीय, राज्यीय, स्थानीय प्रशासन तथा जन सामान्य द्वारा सतत समन्वयकर कार्य किये जा रहे हैं।
जन सामान्य की भूमिका :
भारत के संदर्भ में दृष्टव्य है कि सतत स्थाई कार्यक्रमों की प्रगति में जान सामान्य की भूमिका नगण्य है। इसका कारण उनका समन्वयहीन धार्मिक-राजनैतिक संगठनों से जुड़ाव, प्रशासन तंत्र में जनमत और जनहित के प्रति उपेक्षा, व्यापारी वर्ग में येन-केन-प्रकारेण अधिकतम लाभार्जन की प्रवृत्ति तथा संपन्न वर्ग में विपन्न वर्ग के शोषण की प्रवृत्ति का होना है। किसी लोकतंत्र में सब कुछ तंत्र के हाथों में केंद्रित हो तो लोक निराशा होना स्वाभाविक है। सतत विकास नीतियाँ गाँधी के 'आखिरी आदमी' अर्थात सबसे कमजोर को उसकी योग्यता और सामर्थ्य के अनुरूप आजीविका साधन उपलब्ध करा सकें तभी उनकी सार्थकता है। सरकारी अनुदान आश्रित जनगण कमजोर और तंत्र द्वारा शोषित होता है। भारत के राजनीतिक नेतृत्व को दलीय हितों पर राष्ट्रीय हितों को वरीयता देकर राष्ट्रोन्नयनपरक सतत विकास कार्यों में परस्पर सहायक होना होगा तभी संविधान की मंशा के अनुरूप लोकहितकारी नीतियों का क्रियान्वय कर मानव ही नहीं, समस्त प्राणियों और प्रकृति की सुरक्षा और विकास का पथ प्रशस्त सकेगा।
३.३.२०२०
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कृति चर्चा:
‘बाँसुरी विस्मित है’ हिंदी गज़ल की नई भंगिमा
- आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
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[कृति विवरण: बाँसुरी विस्मित है, हिंदी ग़ज़ल / मुक्तिका संग्रह, डॉ. रोहिताश्व अस्थाना, द्वितीय संस्करण, २०११, पृष्ठ ७०, मूल्य १००/-, आवरण एकरंगी, पेपरबैक, सहयोगी साहित्यकार प्रकाशन, निकट बावन चुंगी चौराहा हरदोई २४१००१, रचनाकार संपर्क: चलभाष ०५८५२ २३२३९२]
*
‘बाँसुरी विस्मित है’ हिंदी ग़ज़ल या मुक्तिका विधा के शिखर हस्ताक्षर डॉ. रोहिताश्व अस्थाना रचित ५४ मुक्तिकाओं का पठनीय संकलन है. अस्थाना जी हिंदी ग़ज़ल पर प्रथम शोधकार, हिंदी गजल के ७ सामूहिक संकलनों के संपादक तथा सुधी समीक्षक के रूप में बहुचर्चित तथा बहुप्रशंसित रहे हैं. साफ़-सुथरी, सहज-सरल भाषा शैली, मानवीय मनोभावनाओं का सटीक-सूक्ष्म विश्लेषण, लाक्षणिकता तथा व्यंजनात्मकता का सम्यक मिश्रण तथा आम आदमी के दर्द-हर्ष का संवेदनापूर्ण शब्दांकन inमुक्तिकाओं में है. ख्यात हिंदी गज़लकार डॉ. कुंवर बेचैन के शब्दों में- ‘साफ़-सथरी बहारों में कही/लिखी in ग़ज़लों ने भाषा का अपना एक अलग मुहावरा पकड़ा है. प्रतीक और बिम्बों की झलक में कवि का मंतव्य देखा जा सकता है. उनकी ग़ज़लों में अनुभवों का पक्कापन दिखाई देता है.
सनाकलं की पहली गजल हिंदी ग़ज़ल को परिभाषित करते हुए तमाम विवादों का पटाक्षेप कर स्वस्थ परिभाषा का संकेत करती है. १९ मात्रिक महापौराणिक जातीय छंद (बहर- ‘रमल मुसद्दस महफूज़’) में लिखी गई यह ग़ज़ल डॉ. अस्थाना के विश्वास की साक्षी है कि हिंदी ग़ज़ल का भविष्य उज्जवल है-
दर्द का इतिहास है हिंदी ग़ज़ल
एक शाश्वत प्यास ही हिंदी ग़ज़ल
प्रेम मदिरा रूप की बातों भरी
अब नहीं बकवास है हिंदी गजल
आदमी के साथ नंगे पाँव ही
ढो रही संत्रास है हिंदी ग़ज़ल
आदमी की जिंदगी का आइना
पेश करती ख़ास है हिंदी ग़ज़ल
२६ मात्रिक महाभागवत जातीय गीतिका छंद (बह्र- रमल महजूफ़ मुसम्मन) में रची गयी ग़ज़ल ज़िंदगी के दिन-ब-दिन मुश्किल होते जाते हालात बयान करती है-
प्यास का पर्याय बनकर रह गयी है ज़िन्दगी
कस कदर असहाय बनकर रह गयी है जिंदगी
दे न पायेगी तुम्हें सुविधाओं का ये दूध अब
एक बूढ़ी गाय बनकर गयी है जिंदगी
सभ्यता के नाम पर क्या गाँव से आए शहर
एक प्याला चाय बनकर रह गयी है ज़िन्दगी
धूम्र का अजगर निगलता जा रहा है बस्तियां
धुंध सीलन हाय बनकर रह गयी है जिंदगी
दर्द उत्पीडन रुदन जैसे पड़ावों से गुजर
काफिला निरुपाय बनकर रह गयी है जिंदगी
१९९७ में लिखी गई यह ग़ज़ल जिन पर्यावरणीय समस्याओं को सामने लाती हैं वे तब उतनी भीषण नहीं थीं किंतु कवि भविष्यदर्शी होता है. आज से लगभग २० पूर्व लिखी गई रचना अधिक प्रासंगिक और समीचीन है.
शहर और गाँव के बीच बढ़ती खाई और आम आदमी की अधिक से अधिक दुश्वार होती ज़िन्दगी की नब्ज़ पर गजलकार की नजर है-
इस कदर फैला हवाओं में ज़हर है
धुंध में डूबा हुआ सारा शहर है
हैं पडीं चुपचाप सड़कें वैश्या सी
कुंओं पर ढा रहा हर पल कहर है
झोपडी-झुग्गी उजड़कर रह गयी
शहर में आई तरक्की की लहर है
(त्रैलोक जातीय छंद, बह्र रमल मुसद्दस सालिम)
गज़ल-दर-ग़ज़ल उसकी बह्र का उल्लेख करनेवाले डॉ. अस्थाना ग़ज़लों के छंदों का भी उल्लेख कर देते तो सोने में सुहागा होगा किंतु उनहोंने यह कार्य शोधकारों पर छोड़ दिया है. बह्र के नाम देने से रचनाओं की ग़ज़लपरक शास्त्रीयता तो प्रमाणित होती है किंतु छंद का नाम छूट जाने से हिंदी छंद सम्मतता सिद्ध नहीं हो पाई है.
अस्थाना जी शिक्षा कर्म से जुड़े और सामाजिक जीवन की विसंगतियों से भली-भाँति परिचित हैं. सम्माज में व्याप्त दहेज़ की कुप्रथाजनित दुष्प्रभाव को वे बहुत कोमलता से सामने रखते हैं-
‘कम है दहेज’ सब की जुबान पर ये बात है
भोली बहू के हाथ का कंगन उदास है
शिक्षा के शेत्र में ज्ञान पर उपाधि को वरीयता देने के दुष्प्रभाव और दुरभिसंधि के वे आजीवन साक्षी रहे हैं और इसीलिए पूछते हैं-
ज्ञान का स्वागत करें ताम को मिटाएँ
इस जरूरी काम पर किसकी नजर है?
आम आदमी के मंगल को भूलकर मंगल की खोज करने के फलसफे से असहमत रोहिताश्व जी बहुत सादगी और संजीदगी से कहते हैं-
मरते हैं लोग भूख से, वो देखते नहीं
झन्डा विजय का चाँद पर जो गाड़ने लगे
‘दिल मिले या न मिले हाथ मिलाए रहिए’ की दिखावटी सामाजिकता अस्थाना जी को मंजूर नहीं है. वे ऐसी झूठी सदाशयता को आइना दिखाते हुए पूछते हैं-
दिल न मिल पाएँ तो हम सीना मिलाकर क्या करें?
अपने चहरे पर नया चेहरा लगाकर क्या करें??
क्या मिला था हमको पहले फूँक दी थी झोपड़ी
आज फिर महलों की खातिर, घर जलाकर क्या करें?
चाँद सुख-सुविधाओं के लिए अपने सिद्धांतों को तिलांजलि देनेवालों से मुक्तिकाकार पूछता है-
एक दिना जाना सभी को है सिकन्दर की तरह
क्यों भला फिर आदमी नाचे है बन्दर की तरह?
और फिर विसंगतियों का पटाक्षेप कर सर्व सहमति की दिशा इंगित करते हैं डॉ. अस्थाना
आपमें सबके विचारों की नदी मिल जाएँगी
दिल को अपने कीजिए पहले समंदर की तरह
जन सामान्य को सहज ग्राह्य शब्दावली में बड़ी से बड़ी बात रख पाना उन्हीं के वश की बात है-
कुछ खुदा से डरो तो अच्छा है
बोलना कम करो तो अच्छा है
धुन में अपनी लगे-लगे यूँ ही
पीर सबकी हरो तो अच्छा है
मौन से मूर्ख कालिदास हुआ
अनुकरण तुम करो तो अच्छा है
देश के बड़बोले नेताओं को इससे अधिक साफ़-साफ़ और कौन सलाह दे सकता है?
दुष्यंत कुमार ने लिखा था- ‘पीर पर्वत हो गयी है अब पिघलनी चाहिए’ और डॉ. अस्थाना लिखते हैं-
पीर का पर्वत खड़ा उर पर
मरसिए के गान के दिन हैं
हड्डियों तक भर गयी जड़ता
चेतना-प्रस्थान के दिन हैं.
मर्मबेधी व्यंजनात्मकता का कमाल देखें-
कारोबार बड़े लोगों का
है संसार बड़े लोगों क
चोर-उचक्का ही होता है
पहरेदार बड़े लोगों का
परिवर्तन क़ानून में कर दें
हर अधिकार बड़े लोगों का
शब्द-बिम्बों के माध्यम से समाज में व्याप्त विद्रूपताओं और विसंगतियों को सामने लाकर डॉ. अस्थाना हिंदी ग़ज़ल को समय-साक्षी दस्तावेज बना देते हैं-
रूपा का रूप ले गया ग्रसकर कोई ग्रहण
पर पेट के प्रसंग सवालात हैं वही
नाराज़ हो गए हैं सभी दोस्त ‘रोहिताश्व’
सच बोलने के अपने तो आदात हैं वही
‘प्रेम मदिरा रूप की बातें भरी / अब नहीं बकवास है हिंदी ग़ज़ल’ कहने के बाद भी रोहिताश्व जी सात्विक श्रृंगार से हिंदी ग़ज़ल / मुक्तिका को सज्जित कर आल्हादित होते हैं-
फूलों का उपहार तुम्हारा
सबसे सुन्दर प्यार तुम्हारा
मुझे बहुत अच्छा लगत अहै
यह सोलह श्रृंगार तुम्हारा
मेरी ग़ज़लों पर जाने-मन
पहला है अधिकार तुम्हारा
मेरे जीवन में आ जाओ
मानूँगा आभार तुम्हारा
एक और बानगी देखें –
बैठकर मुस्का रही हो तुम
सच बहुत ही भा रही हो तुम
बाँसुरी विस्मित समर्पित सी
गीत मेरा गा रही हो तुम
एक अभिनव प्रेम का दर्शन
आँख से समझा रही हो तुम
एक अनबुझ आग पानी में
प्रिय! लगाए जा रही हो तुम
चाहते हैं भूलना जितना
याद उतना आ रही हो तुम
डॉ, अस्थाना शब्दों की सांझा विरासत में यकीन करते हैं. वे हिंदी-उर्दू ग़ज़ल को भिन्न तो मानते हैं किंतु इसका आधार ‘शब्द’ नहीं शिल्प को स्वीकारते हैं. उर्दू तक्तीअ के अनुसार वज़न देखें को वे उर्दू ग़ज़ल के लिए जरूरी मानते हैं तो हिंदी मात्रा गणना को हिंदी ग़ज़ल का आधार मानते हैं. हिंदी छंदों का प्रयोगकर हिंदी ग़ज़ल को नव आयाम दिए जाने का समर्थन करते हैं डॉ. अस्थाना किंतु स्वयं हिंदी पिंगल पर अधिकार न होने का हवाला देकर हिंदी बह्र के साथ छंद का उल्ल्लेख न करने का बचाव करते हैं.
डॉ. अस्थाना की कहाँ अपने आपमें एक मिसाल है. वे बहुत सादगी और सरलता से बात इस तरह कहते हैं जिसे समझने की कोशिश न करनी पड़े, पढ़ते या सुनते ही अपने आप समझ आ जाए.
बाँट दिया नाकाम प्यार मासूम खिलौनों में
उन हँसमुख चेहरों का तुम्हें सलाम लिख रहा हूँ
पीड़ा का इतिहास पढ़ा तो जान लिया मैंने
कोई मीरा पा न सकी घनश्याम लिख रहा हूँ.
*
चन्द्रमा की चांदनी हो तुम
पूर्णिमा की यामिनी हो तुम
पास मेरे इस तरह बैठो-
मेघ में ज्यों दामिनी हो तुम
*
दर्द का दरिया समन्दर हो गया
जब से कोइ दिल के अन्दर हो गया
गजल का वर्चस्व हिंदी में बढ़ा
क्योंकि उसका तल्ख़ तेवर हो गया
हिंदी ग़ज़ल के वर्चस्व का आधार ‘तल्ख़ तेवर’ को माननेवाल्व डॉ. रोहिताश्व अस्थाना उम्र के सात दशक पार करने, कई बीमारियों और पारिवारिक समस्याओं से दो-चार होने के बाद भी हिंदी ग़ज़ल, बाल साहित्य और समीक्षा के सरह नव रचनाकारों को संरक्षण देने के उपक्रम में जुटे हुए हैं. उनके पास महत्वपूर्ण पुस्तकों का संकलन है जिसे वे किसी शोधगार को सौपना कहते हैं ताकि उसका समुषित उपयोग और सुरक्षा हो सके. उनके महत्वपूर्ण कार्य का सम्यक मूल्यांकन अब तक नहीं हो सका है. जिस हिंदी ग़ज़ल की आधार शिला पर शोध की इमारत उन्होंने खादी की, उसी के नए दावेदार उनके अवदान का उल्लेख तक करने में संकुचाते हैं. शासन और समीक्षकों को अपनी वैचारिक संकीर्णता और बौनेपन से बाहर आकर उन्हें और उनके काम को सम्दृत कर अपने दायित्व का निर्वहन करना चाहिए, अन्यथा समय उन्हें कटघरे में खड़ा करेगा है. डॉ. अस्थाना रहिंदी ग़ज़ल को मुक्तिका कहा जाना ‘गीतिका’ या अन्य नामों की तुलना में अधिक तार्किक मानते हैं.
३.३.२०१८
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दोहा की होली
*
दीवाली में दीप हो, होली रंग-गुलाल
दोहा है बहुरूपिया, शब्दों की जयमाल
*
जड़ को हँस चेतन करे, चेतन को संजीव
जिसको दोहा रंग दे, वह न रहे निर्जीव
*
दोहा की महिमा बड़ी, कीर्ति निरुपमा जान
दोहा कांतावत लगे, होली पर रसखान
*
प्रथम चरण होली जले, दूजे पूजें लोग
रँग-गुलाल है तीसरा, चौथा गुझिया-भोग
*
दोहा होली खेलता, ले पिचकारी शिल्प
बरसाता रस-रंग हँस, साक्षी है युग-कल्प
*
दोहा गुझिया, पपडिया, रास कबीरा फाग
दोहा ढोलक-मँजीरा, यारों का अनुराग
*
दोहा रच-गा, झूम सुन, होला-होली धन्य
दोहा सम दूजा नहीं. यह है छंद अनन्य
होलिकोत्सव २-३-२०१८
***
लघु कथा-
बदलाव का मतलब
*
जन प्रतिनिधियों के भ्रष्टाचरण, लगातार बढ़ते कर और मँहगाई, संवेदनहीन प्रशासन ने जीवन दूभर कर दिया तो जनता जनार्दन ने अपने वज्रास्त्र का प्रयोग कर सत्ताधारी दल को चारों खाने चित्त कर वोपक्षवोपक्ष को सत्तासीन कर दिया।
अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में निरंतर पेट्रोल-डीजल की कीमत में गिरावट के बावजूद ईंधन के दाम न घटने, बीच सत्र में अहिनियमों के द्वारा परोक्ष कर वृद्धि और बजट में आम कर्मचारी को मजबूर कर सरकार द्वारा काटे और कम ब्याज पर लंबे समय तक उपयोग किये गये भविष्य निधि कोष पर करारोपण से ठगा अनुभव कर रहे मतदाता को समझ ही नहीं आया बदलाव का मतलब।
***
मुक्तिका:
*
जब भी होती है हव्वा बेघर
आदम रोता है मेरे भीतर
*
आरक्षण की फाँस बनी बंदूक
जले घोंसले, मरे विवश तीतर
*
बगुले तालाबों को दे धाढ़स
मार रहे मछली घुसकर भीतर
*
नहीं चेतना-चिंतन संसद में
बजट निचोड़े खूं थोपे जब कर
*
खुद के हाथ तमाचा गालों पर
मार रहे जनतंत्र अश्रु से तर
*
पीड़ा-लाश सियासत का औज़ार
शांति-कपोतों के कतरें नित पर
*
भक्षक के पहरे पर रक्षक दीन
तक्षक कुंडली मार बना अफसर
***
छंद शाला
बरवै (नंदा दोहा)
बरवै अर्ध सम मात्रिक छंद है जिसके विषम चरण (प्रथम, तृतीय) में बारह तथा सम चरण ( द्वितीय, चतुर्थ) में सात मात्राएँ रखने का विधान है। सम चरणों के अन्त में जगण (जभान = लघु गुरु लघु) या तगण (ताराज = गुरु गुरु लघु) होने से बरवै की मिठास बढ़ जाती है।
बरवै छंद के प्रणेता अकबर के नवरत्नों में से एक महाकवि अब्दुर्रहीम खानखाना 'रहीम' कहे जाते हैं। किंवदन्ती है कि रहीम का कोई सेवक अवकाश लेकर विवाह करने गया। वापिस आते समय उसकी विरहाकुल नवोढा पत्नी ने उसके मन में अपनी स्मृति बनाये रखने के लिए दो पंक्तियाँ लिखकर दीं। रहीम का साहित्य-प्रेम सर्व विदित था सो सेवक ने वे पंक्तियाँ रहीम को सुनायीं।सुनते ही रहीम चकित रह गये। पंक्तियों में उन्हें ज्ञात छंदों से अलग गति-यति का समायोजन था। सेवक को ईनाम देने के बाद रहीम ने पंक्ति पर गौर किया और मात्रा गणना कर उसे 'बरवै' नाम दिया। मूल पंक्ति में प्रथम चरण के अंत 'बिरवा' शब्द का प्रयोग होने से रहीम ने इसे बरवै कहा। रहीम के लगभग २२५ तथा तुलसी के ७० बरवै हैं। विषम चरण की बारह (भोजपुरी में बरवै) मात्रायें भी बरवै नाम का कारण कही जाती है। सम चरण के अंत में गुरु लघु (ताल या नन्द) होने से इसे 'नंदा' और दोहा की तरह दो पंक्ति और चार चरण होने से नंदा दोहा कहा गया। पहले बरवै की मूल पंक्तियाँ इस प्रकार है:
प्रेम-प्रीति कौ बिरवा, चले लगाइ।
सींचन की सुधि लीज्यौ, मुरझि न जाइ।।
रहीम ने इस छंद का प्रयोग कर 'बरवै नायिका भेद' नामक ग्रन्थ की रचना की। गोस्वामी तुलसीदास की कृति 'बरवै रामायण में इसी का प्रयोग किया गया है। भारतेंदु हरिश्चंद्र तथा जगन्नाथ प्रसाद 'रत्नाकर' आदि ने भी इसे अपनाया। उस समय बरवै रचना साहित्यिक कुशलता और प्रतिष्ठा का पर्याय था। दोहा की ही तरह दो पद, चार चरण तथा लय के लिए विख्यात छंद नंदा दोहा या बरवै लोक काव्य में प्रयुक्त होता रहा है। ( सन्दर्भ: डॉ. सुमन शर्मा, मेकलसुता, अंक ११, पृष्ठ २३२)
रहीम ने फ़ारसी में भी इस छंद का प्रयोग किया-
मीं गुज़रद ईं दिलरा, बेदिलदार।
इक-इक साअत हमचो, साल हज़ार।।
इस दिल पर यूँ बीती, हृदयविहीन!
पल-पल वर्ष सहस्त्र, हुई मैं दीन
बरवै को 'ध्रुव' तथा' कुरंग' नाम भी मिले। ( छ्न्दाचार्य ओमप्रकाश बरसैंया 'ओंकार', छंद-क्षीरधि' पृष्ठ ८८)
मात्रा बाँट-
बरवै के चरणों की मात्रा बाँट ८+४ तथा ४+३ है। छन्दार्णवकार भिखारीदास के अनुसार-
पहिलहि बारह कल करु, बहरहुँ सत्त।
यही बिधि छंद ध्रुवा रचु, उनीस मत्त।।
पहले बारह मात्रा, बाहर सात।
इस विधि छंद ध्रुवा रच, उन्निस मात्र।।
उदाहरण-
०१. वाम अंग शिव शोभित, शिवा उदार ।
SI SI II SII IS ISI
सरद सुवारिद में जनु, तड़ित बिहार ॥
III ISII S II III ISI
०२. चंपक हरवा अँग मिलि, अधिक सुहाय।
जानि परै सिय हियरे, जब कुम्हलाय।।
०३. गरब करहु रघुनन्दन, जनि मन मांह।
देखहु अपनी मूरति, सिय की छांह।। -तुलसीदास
०४. मन-मतंग वश रह जब, बिगड़ न काज।
बिन अंकुश विचलत जब, कुचल समाज।। -ओमप्रकाश बरसैंया 'ओंकार'
०५. 'सलिल' लगाये चन्दन, भज हरि नाम।
पण्डे ठगें जगत को, नित बेदाम।।
०६. हाय!, हलो!! अभिवादन, तनिक न नेह।
भटक शहर में भूले, अपना गेह।।
०७. पाँव पड़ें अफसर के, भूले बाप।
रोज पुण्य कह करते, छिपकर पाप।।
शन्नो अग्रवाल -
०८. उथल पुथल करे पेट, न पचे बात।
मंत्री को पचे नोट, बन सौगात।।
०९. चश्में बदले फिर भी, नहीं सुझात।
मन के चक्षु खोल तो, बनती बात।।
१०. गरीब के पेट नहीं, मारो लात।
कम पैसे से बिगड़े, हैं हालात।।
११. पैसे ठूंसे फिर भी, भरी न जेब।
हर दिन करते मंत्री, नये फरेब।।
१२. मैं हूँ छोटा सा कण, नश्वर गात।
परम ब्रह्म के आगे, नहीं बिसात।।
१३. महुए के फूलों का, पा आभास।
कागा उड़-उड़ आये, उनके पास।।
१४. अकल के खोले पाट, जो थे बंद।
आया तभी समझ में, बरवै छंद।
अजित गुप्ता-
१५. बारह मात्रा पहले, फिर लिख सात।
कठिन बहुत है लिख ले, मिलती मात।।
१६. कैसे पकडूँ इनको, भागे छात्र।
रचना आवे जिनको, रहते मात्र।।
३-३-२०१६
***
नवगीत:
गीत! हाज़िर हो
.
समय न्यायाधीश की
लगती अदालत.
गीत! हाज़िर हो.
.
लगा है इलज़ाम
तुम पर
गिरगिटों सा
बदलते हो रंग.
श्रुति-ऋचा
या अनुष्टुप बन
छेड़ डी थी
सरसता की जंग.
रूप धरकर
मन्त्र का
या श्लोक का
शून्य करते भंग.
काल की
बनकर कलम तुम
स्वार्थ को
करते रहे हो तंग.
भुलाई ना
क्यों सखावत?
गीत! हाज़िर हो.
.
छेड़ते थे
जंग हँस
आक्रामकों
से तुम.
जान जाए
या बचे
करते न सुख
या गम.
जूझते थे
बूझते थे
मनुजता को
पूजते थे.
ढाल बनकर
देश की
दस दिशा में
घूमते थे.
मिटायी क्यों
हर अदावत?
गीत! हाज़िर हो.
.
पराजित होकर
न हारे,
दैव को
ले आये द्वारे.
भक्ति सलिला
में नहाये
कर दिये
सब तम उजारे.
बने संबल
भीत जन का-
‘त्राहि’ दनु हर
हर पुकारे.
दलित से
लगकर गले तुम
सत्य का
बनते रहे भुजदंड .
अनय की
क्यों की मलामत?
गीत! हाज़िर हो.
.
एक पल में
जिरह-बखतर
दूसरे पल
पहन चीवर.
योग के सँग
भोग अनुपम
रूप को
वरकर दिया वर.
नव रसों में
निमज्जित हो
हर असुन्दर
किया सुंदर.
हास की
बनकर फसल
कर्तव्य का ही
भुला बैठे संग?
नाश की वर
ली अलामत?
गीत! हाज़िर हो.
.
श्रमित काया
खोज छाया,
लगी कहने-
‘जगत माया’.
मूर्ति में भी
अमूरत को
छिपा- देखा,
पूज पाया.
सँग सुन्दर के
वरा शिव
शिवा को
मस्तक नवाया.
आज का आधार
कल कर,
स्वप्न कल का
नव सजाया.
तंत्र जन का
क्यों नियामत?
गीत! हाज़िर हो.
.
स्वप्न टूटा,
धैर्य छूटा.
सेवकों ने
देश लूटा.
दीनता का
प्रदर्शन ही -
प्रगतिवादी
बेल-बूटा.
छंद से हो तंग
कर रस-भंग
कविता गढ़ी
श्रोता मिला सोता.
हुआ मरकर
पुनर्जीवित
बोल कैसे
गीत-तोता?
छंद अब भी
क्यों सलामत?
गीत! हाज़िर हो.
.
हो गये इल्जाम
पूरे? तो बतायें
शेष हों कुछ और
तो वे भी सुनायें.
मिले अनुमति अगर
तो मैं अधर खोलूँ.
बात पहले आप तोलूँ
बाद उसके असत्य बोलूँ
मैं न मैं था,
हूँ न होऊँ.
अश्रु पोछूं,
आस बोऊँ.
बात जन की
है न मन की
फ़िक्र की
जग या वतन की.
साथ थी हर-
दम सखावत
प्रीत! हाज़िर हो.
.
नाम मुझको
मिले कितने,
काम मैंने
किये कितने.
याद हैं मुझको
न उतने-
कह रहा है
समय जितने.
छंद लय रस
बिम्ब साधन
साध्य मेरा
सत सुपावन
चित रखा है
शांत निश-दिन
दिया है आनंद
पल-छिन
इष्ट है परमार्थ
आ कह
नीत! हाज़िर हो.
.
स्वयंभू जो
गढ़ें मानक,
हो न सकते
वे नियामक.
नर्मदा सा
बह रहा हूँ.
कुछ न खुद का
गह रहा हूँ.
लोक से ले
लोक को ही,
लोक को दे-
लोक का ही.
रहा खाली हाथ
रखा ऊँचा माथ,
सब रहें सानंद
वरें परमानन्द.
विवादों को भूल
रच नव
रीत! हाज़िर हो.
.
***
कृति चर्चा :
‘नदियाँ क्यों चुप हैं?’ विसंगतियों पर आस्था का जयघोष
चर्चाकार: संजीव
[कृति विववरण: नदियाँ क्यों चुप हैं?, नवगीत संग्रह, राधेश्याम बंधु , आकार डिमाई, पृष्ठ ११२, मूल्य १५०/-, आवरण बहुरंगी सजिल्द जैकेटयुक्त, वर्ष २०११, कोणार्क प्रकाशन, बी ३/१६३ यमुना विहार दिल्ली ११००५३, संपर्क: ९८६८४४४६६६, rsbandhrsbandhu2@gmail.com]
.
दादी सी दुबली, गरीब हैं नदियाँ बहुत उदास
सबकी प्यास बुझातीं, उनकी कौन बुझाये प्यास?
.
जब सारा जल
जहर हो रहा नदियाँ क्यों चुप हैं?
.
उक्त २ उद्धरण श्रेष्ठ-ज्येष्ठ नवगीतकार राधेश्याम बंधु के चिन्तनपरक नवगीतों में अन्तर्निहित संतुलित, समन्वित, विचारधारा के संकेतक हैं कि उनकी सोच एकांगी नहीं है, वे विसंगति और विडम्बना के दोनों पक्षों का विचार कर नीर-क्षीर प्रवृत्ति परक नवगीत रचते हैं, उनका आग्रह ‘कला’ को साध्य मानने के प्रति कम तथा ‘कथ्य’ को साध्य मानने के प्रति अधिक है. वे नवगीत में छंद की अंतर्व्याप्ति के पक्षधर हैं. उनके अपने शब्दों में: ‘मनुष्य ने जब भी अपनी अन्तरंग अनुभूतियों की अनुगूंज अपने मन में सुननी चाही, तो उसे सदैव गीतात्मक प्रतीति की अनुगूंज ही सुनाई पड़ी. वहाँ विचार या विमर्श का कोई अस्तित्व नहीं होता. हम चाहे जितने आधुनिकता या उत्तर आधुनिकता के रंग में रंग जाएँ, हम अपने सांस्कृतिक परिवेश और लोकचेतना के सौन्दर्यबोध से कभी अलग नहीं हो सकते. इतिहास साक्षी है कि जब भी हर्ष, विषद या संघर्ष की अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने की आवश्यकता हुई तो लयात्मक छान्दस कविता ही उसके लिये माध्यम बनी. आदि कवि बाल्मीकि से लेकर निराला तक के कविता के इतिहास पर यदि हम दृष्टि डालें तो हम पायेंगे कि इतने लम्बे कालखंड में छन्दस काव्य का ही सातत्य विद्यमान है. वह चाहे ऋचा हो या झूले का गीत हो.’
इस संग्रह के गीत कथ्य की दृष्टि से नवगीत (२७) तथा जनगीत (१५) में वर्गीकृत हैं किन्तु उनमें पर्यावरण के प्रति चिंता सर्वत्र दृष्टव्य है. प्रदूषण प्राकृतिक पर्यावरण में हो अथवा सामाजिक पर्यावरण में वह बंधु जी को क्लेश पहुँचाता है. इस संग्रह का वैशिष्ट्य एक पात्र को विविध रूपकों में ढाल कर उसके माध्यम से विसंगतियों और विडम्बनाओं का इंगित करना है. चाँदनी, नदी, आदि के माध्यम से कवि वह सब कहता है जो सामान्य जन अनुभव करते हैं पर अभिव्यक्त नहीं कर पाते:
यहाँ ‘नदी’ जलधार मात्र नहीं है, वह चेतना की संवाहक प्रतीक है, वह जीवन्तता की पर्याय है:
संसद की
राशन की नदियाँ
किस तहखाने में खो जाती?
.
प्यासी नदी
रेत पर तड़पे
अब तो बादल आ
.
कैसे दिन
आये रिश्तों की
नदिया सूख गयी.
.
पाषाणों
में भी हमने
नदिया की तरज जिया.
मानव जीवन में खुशहाली के लिये हरियाली और छाँव आवश्यक है:
फिर-फिर
जेठ तपेगा आँगन
हरियल पेड़ लगाये रखना
विश्वासों के
हरसिंगार की
शीतल छाँव बचाये रखना
बादल भी विसंगतियों का वाहक है:
राजा बन बादल जुलूस में
हठी पर आते
हाथ हिलाकर प्यासी जनता
को हैं बहलाते
.
फिर-फिर
तस्कर बादल आते
फिर भी प्यास नहीं बुझ पाती
.
जब बादल बदल गए तो चांदनी कैसे अपनी मर्यादा में रहे:
कभी उतर आँगन में
निशिगंधा चूमती
कभी खड़ी खिड़की पर
ननदी सी झाँकती
निराश न हों, कहते हैं आशा पर आकाश थमा है. कालिमा कितनी भी प्रबल क्यों न हो जाए चाँदनी अपनी धवलता से निर्मलता का प्रसार करेगी ही:
उतरेगी
दूधिया चाँदनी
खिड़की जरा खुली रहने दो
.
कठिनाई यह है कि बेचारी चाँदनी के लिये इंसान ने कहीं स्थान ही नहीं छोड़ा है:
पत्थर के
शहरों में अब तो
मिलती नहीं चाँदनी है
बातूनी
चंचल बंगलों में
दिखती नहीं चाँदनी है
.
इस जीवन शैली में किसी को किसी के लिये समय नहीं है और चाँदनी नाउम्मीद हुई जाती है:
लेटी है बेचैन चाँदनी
पर आँखों में नींद कहाँ?
आँखें जब रतजगा करें तो
सपनों की उम्मीद कहाँ?रिश्तों की
उलझी अलकें भी
कोई नहीं सँवार रहा
.
नाउम्मीदी तो किसी समस्या का हल हो नहीं सकती. कोशिश किये बिना कोई समाधान नहीं मिलता. इसलिए चाँदनी लगातार प्रयासरत रहती है:
रिश्तों की
उलझन को
सुलझाती चाँदनी
एकाकी
जीना क्या
समझाती चाँदनी
.
बंधु जी विसंगतियों का संकेतन स्पष्टता से करते हैं:
चाँदनी को
धूप मैं, कैसे कहूँ
वह भले ही तपन का अहसास दे?
.
नारी है
चाँदनी प्यार की
हर घर की मुस्कान
फिर भी
खोयी शकुंतला की
अब भी क्यों पहचान?
.
कम भले हो
तन का आयतन
प्यार का घनत्व कम न हो
.
अपनेपन की कोमल अनुभूति को समेटे कवि प्यार दो या न दो / प्यार से टेर लो, मौन / तुम्हारा इतना मादक / जब बोलोगे तब क्या होगा, धुप बनी / या छाँव बनो / हम तुम्हें खोज लेंगे, शब्दों / के पंख उड़ चले / चलो चलें सपनों के गाँव, चलो बचा लें / महुआवाले / रिश्तों का अहसास आदि में रूमानियत उड़ेलते हुए नवगीत को क्लिष्ट शब्दों और जटिल अनुभूतियों से भरनेवाले कला के पक्षधरों को अपनी सरलता-सहजता से निरुत्तरित करते हैं.
जनगीतों में बन्धु जी मनुष्य की अस्मिता के संरक्षण हेतु कलम चलाते हैं:
आदमी कुछ भी नहीं
फिर भी वतन की आन है
हर अँधेरी झोपड़ी का
वह स्वयं दिनमान है
जब पसीने की कलम से
वक्त खुद गीता लिखे
एक ग्वाला भी कभी
बनता स्वयं भगवान् है.
.
भारत में श्रम की प्रतिष्ठा तथा मूल्यांकन न होना पूँजी के असमान वितरण का कारण है. बंधु जी को श्रम ही अँधेरा मिटाकर उजाला करने में समर्थ प्रतीत होता है:
उगा
सूर्य श्रम का
अँधेरा मिटेगा
गयी धुंध दुःख की
उजाला हँसेगा
.
वे इंसान की प्रतिष्ठा भगवान से भी अधिक मानते हैं:
रहने दो इंसान
ही मुझे, मुझको मत देवता बनाओ.
नवगीतों में छंद को अनावश्यक माननेवाले संकीर्ण दृष्टि संपन्न अथवा छंद का पूर्णरूपेण पालन न कर सकनेवाले मूर्धन्यों को छोड़ दें तो नवगीत के प्रेमी इन नवगीतों का स्वागत मात्र नहीं करेंगे अपितु इनसे प्रेरणा भी ग्रहण करेंगे. अवतारी, महाभागवत आदि छंदों का प्रयोग करने में बंधु जी सिद्धहस्त हैं. वे शब्द चयन में प्रांजलता को वरीयता देते हैं, हिंदीतर शब्दों का प्रयोग न्यूनतम करते हैं. विवेच्य संकलन के नवगीत लोकमानस में अपना स्थान बनाने में समर्थ हैं, यही कवि का साध्य है.
३-३-२०१५
***


कृति चर्चा:
मानवीय जिजीविषा का जीवंत दस्तावेज ''मुझे जीना है''
*
(कृति विवरण: मुझे जीना है, उपन्यास, आलोक श्रीवास्तव, डिमाई आकार, बहुरंगी सजिल्द आवरण, पृष्ठ १८३, १३० रु., शिवांक प्रकाशन, नई दिल्ली)
*
विश्व की सभी भाषाओँ में गद्य साहित्य की सर्वाधिक लोकप्रिय विधा उपन्यास है. उपन्यास शब्द अपने जिस अर्थ में आज हमारे सामने आता है उस अर्थ में वह प्राचीन साहित्य में उपलब्ध नहीं है. वास्तव में अंगरेजी साहित्य की 'नोवेल' विधा हिंदी में 'उपन्यास' विधा की जन्मदाता है. उपन्यास जीवन की प्रतिकृति होता है. उपन्यास की कथावस्तु का आधार मानवजीवन और उसके क्रिया-कलाप ही होते हैं. आलोचकों ने उपन्यास के ६ तत्व कथावस्तु, पात्र, संवाद, वातावरण, शैली और उद्देश्य माने हैं. एक अंगरेजी समालोचक के अनुसार- 'आर्ट लाइज इन कन्सीलमेंट' अर्थात 'कला दुराव में है'. विवेच्य औपन्यासिक कृति 'मुझे जीना है' इस धारणा का इस अर्थ में खंडन करती है कि कथावस्तु का विकास पूरी तरह सहज-स्वाभाविक है.
खंडकाव्य पंचवटी में मैथिलीशरण गुप्त जी ने लिखा है:
'जितने कष्ट-कंटकों में है जिसका जीवन सुमन खिला,
गौरव गंध उन्हें उतना ही यत्र-तत्र-सर्वत्र मिला'.
उपन्यास के चरित नायक विजय पर उक्त पंक्तियाँ पूरी तरह चरितार्थ होती हैं। छोटे से गाँव के निम्न मध्यम खेतिहर परिवार के बच्चे के माता-पिता का बचपन में देहावसान, दो अनुजों का भार, ताऊ द्वारा छलपूर्वक मकान हथियाकर नौकरों की तरह रखने का प्रयास, उत्तम परीक्षा परिणाम पर प्रोत्साहन और सुविधा देने के स्थान पर अपने बच्चों को पिछड़ते देख ईर्ष्या के वशीभूत हो गाँव भेज पढ़ाई छुडवाने का प्रयास, शासकीय विद्यालय के शिक्षकों द्वारा प्रोत्साहन, गाँव में दबंगों के षड्यंत्र, खेती की कठिनाइयाँ और कम आय, पुनः शहर लौटकर अंशकालिक व्यवसाय के साथ अध्ययन कर प्रशासनिक सेवा में चयन... उपन्यास का यह कथा क्रम पाठक को चलचित्र की तरह बांधे रखता है। उपन्यासकार ने इस आत्मकथात्मक औपन्यासिक कृति में आत्म-प्रशंसा से न केवल स्वयं को बचाया है अपितु बचपन में कुछ कुटेवों में पड़ने जैसे अप्रिय सच को निडरता और निस्संगता से स्वीकारा है।
शासकीय विद्यालयों की अनियमितताओं के किस्से आम हैं किन्तु ऐसे ही एक विद्यालय में शिक्षकों द्वारा विद्यार्थी के प्रवेश देने के पूर्व उसकी योग्यता की परख किया जाना, अनुपस्थिति पर पड़ताल कर व्यक्तिगत कठिनाई होने पर न केवल मार्ग-दर्शन अपितु सक्रिय सहायता करना, यहाँ तक की आर्थिक कठिनाई दूर करने के लिए अंशकालिक नौकरी दिलवाना... इस सत्य के प्रमाण है की शिक्षक चाहे तो विद्यार्थी का जीवन बना सकता है. यह कृति हर शिक्षक और शिक्षक बनने के प्रशिक्षणार्थी को पढ़वाई जानी चाहिए ताकि उसे अपनी सामर्थ्य और दायित्व की प्रतीति हो सके. विपरीत परिस्थितियों और अभावों के बावजूद जीवन संघर्षों से जूझने और सफल होने का यह यह कथा-वृत्त हर हिम्मतहबाने वाले के लिए अंधे की लकड़ी हो सकता है. कृति में श्रेयत्व के साथ-साथ प्रेयत्व का उपस्थिति इसे आम उपन्यासों से अलग और अधिक प्रासंगिक बनाती है।
अपनी प्रथम कृति में जीवन के सत्यों को उद्घाटित करने का साहस विरलों में ही होता है. आलोक जी ने कैशोर्य में प्रेम-पकरण में पड़ने, बचपन में धूम्रपान जैसी घटनाओं को न छिपाकर अपनी सत्यप्रियता का परिचय दिया है। वर्तमान काल में यह प्रवृत्ति लुप्त होती जा रही है। मूल कथावस्तु के साथ प्रासंगिक कथावस्तु के रूप में शासकीय मोडल हाई स्कूल जबलपुर के शिक्षक और वातावरण, खलनायिकावत ताई, अत्यंत सहृदय और निस्वार्थी चिकित्सक डॉ. एस. बी. खरे, प्रेमिका राधिका, दबंग कालीचरण, दलित स्त्री लक्ष्मी द्वारा अपनी बेटी के साथ बलात्कार का मिथ्या आरोप, सहृदय ठाकुर जसवंत सिंह तथा पुलिस थानेदार द्वारा निष्पक्ष कार्यवाही आदि प्रसंग न केवल कथा को आगे बढ़ाते हैं अपितु पाठक को प्रेरणा भी देते हैं। सारतः उपन्यासकार समाज की बुराइयों का चित्रण करने के साथ-साथ घटती-मिटती अच्छाइयों को सामने लाकर बिना कहे यह कह पाता है की अँधेरे कितने भी घने हों उजालों को परस्त नहीं कर सकते।
उपन्यासकार के कला-कौशल का निकष कम से कम शब्दों में उपन्यास के चरित्रों को उभारने में है। इस उपन्यास में कहीं भी किसी भी चरित्र को न तो अनावश्यक महत्त्व मिला है, न ही किसी पात्र की उपेक्षा हुई है। शैल्पिक दृष्टि से उपन्यासकार ने चरित्र चित्रण की विश्लेषणात्मक पद्धति को अपनाया है तथा पात्रों की मानसिक-शारीरिक स्थितियों, परिवेश, वातावरण आदि का विश्लेषण स्वयं किया है। वर्तमान में नाटकीय पद्धति बेहतर मानी जाती है जिसमें उपन्यासकार नहीं घटनाक्रम, पत्रों की भाषा तथा उनका आचरण पाठक को यह सब जानकारी देता है। प्रथम कृति में शैल्पिक सहजता अपनाना स्वाभाविक है। उपन्यास में संवादों को विशेष महत्त्व नहीं मिला है। वातावरण चित्रण का महत्त्व उपन्यासकार ने समझा है और उसे पूरा महत्त्व दिया है।
औपन्यासिक कृतियों में लेखक का व्यक्तित्व नदी की अंतर्धारा की तरह घटनाक्रम में प्रवाहित होता है। इस सामाजिक समस्या-प्रधान उपन्यास में प्रेमचंद की तरह बुराई का चित्रण कर सुधारवादी दृष्टि को प्रमुखता दी गयी है। आजकल विसंतियों और विद्रूपताओं का अतिरेकी चित्रण कर स्वयं को पीड़ित और समाज को पतित दिखने का दौर होने पर भी आलोक जी ने नकारात्मता पर सकारात्मकता को वरीयता दी है। यह आत्मकथात्मक परिवृत्त तृतीय पुरुष में होने के कारन उपन्यासकार को चरित-नायक विजय में विलीन होते हुए भी यथावसर उससे पृथक होने की सुविधा मिली।
मुद्रण तकनीक सुलभ होने पर भी खर्चीली है. अतः किसी कृति को सिर्फ मनोरंजन के लिए छपवाना तकनीक और साधनों का दुरूपयोग ही होगा। उपन्यासकार सजगता के साथ इस कृति को रोचक बनाने के साथ-साथ समाजोपयोगी तथा प्रेरक बना सका है। आदर्शवादी होने का दम्भ किये बिना उपन्यास के अधिकांश चरित्र प्रेमिका राधिका, माडल हाई स्कूल के प्राचार्य और शिक्षक, मित्र, ठाकुर जसवंत सिंह, पुलिस निरीक्षक, पुस्तक विक्रय केंद्र की संचालिका श्रीमती मनोरमा चौहान (स्व. सुभद्रा कुमारी चौहान की पुत्रवधु) आदि पात्र दैनंदिन जीवन में बिना कोई दावा या प्रचार किये आदेश का निर्वहन अपना दायित्व मानकर करते हैं। दूसरी ओर उच्चाधिकारी ताऊजी, उनकी पत्नी और बच्चे सर्व सुविधा होने पर भी आदर्श तो दूर अपने नैतिक-पारिवारिक दायित्व का भी निर्वहन नहीं करते और अपने दिवंगत भाई की संतानों को धोखा देकर उनके आवास पर न केवल काबिज हो जाते हैं अपितु उन्हें अध्ययन से विमुख कर नौकर बनाने और गाँव वापिस भेजने का षड्यंत्र करते हैं। यह दोनों प्रवृत्तियाँ समाज में आज भी कमोबेश हैं और हमेशा रहेंगी।
यथार्थवादी उपन्यासकार इमर्सन ने कहा है- ''मुझे महान दूरस्थ और काल्पनिक नहीं चाहिए, मैं साधारण का आलिंगन करता हूँ।'' आलोक जी संभवतः इमर्सन के इस विचार से सहमत हों। सारतः मुझे जीना है मानवीय जिजीविषा का जीवंत और सार्थक दस्तावेज है जो लुप्त होते मानव-मूल्यों के प्रति और मानवीय अस्मिता के प्रति आस्था जगाने में समर्थ है। उपन्यासकार अलोक श्रीवास्तव इस सार्थक कृति के सृजन हेतु बढ़ाई के पात्र हैं.
३.३.२०१३
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