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शुक्रवार, 28 अगस्त 2009

मुक्तक : आचार्य संजीव 'सलिल'

मुक्तक : आचार्य सन्जीव 'सलिल'
जो दूर रहते हैं वही तो पास होते हैं.

जो हँस रहे, सचमुच वही उदास होते हैं.

सब कुछ मिला 'सलिल' जिन्हें अतृप्त हैं वहीं-

जो प्यास को लें जीत वे मधुमास होते हैं.

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पग चल रहे जो वे सफल प्रयास होते हैं

न थके रुक-झुककर वही हुलास होते हैं.

चीरते जो सघन तिमिर को सतत 'सलिल'-

वे दीप ही आशाओं की उजास होते है.

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जो डिगें न तिल भर वही विश्वास होते हैं.

जो साथ न छोडें वही तो खास होते हैं.

जो जानते सीमा, 'सलिल' कह रहा है सच देव!

वे साधना-साफल्य का इतिहास होते हैं

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