पुरोवाक्
''दोहा नैवैद्यम्'' - सम सामयिक दोहों का लोकोपयोगी संकलन
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल '
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उपनिषदों के अनुसार श्रेष्ठ की उत्पत्ति सृष्टि की उत्पत्ति अनाहद नाद से हुई है। विज्ञान का महाविस्फोट सिद्धांत (बिग बैंग थ्योरी) सृष्टि की उत्पत्ति एक बहुत बड़े विस्फोट से हुई मानती है। नाद से उत्पन्न हुई सृष्टि पर सर्वत्र ध्वनि होना स्वाभाविक है। इसीलिए कहा गया छंद वह है जो सर्वत्र छा जाता है। छंद को वेदों का पाद या चरण भी कहा गया है। इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि चरण का महत्व शीश से कम है, छंद को वेद का चरण कहने का आशय यह है कि जिस तरह मंदिर में देवता से साक्षात्कार करने के लिए चरणों की सहायता से एक-एक कदम रख कर जाया जाता है, वैसे ही वेदों में अंतर्निहित ज्ञान की प्राप्ति के लिए छंद का आश्रय लेना अत्यावश्यक है। वेदों की ऋचाएँ छंदों में ही लिखी गई हैं और छंद ज्ञान के बिना उन्हें समझना संभव नहीं है।
आदि मानव ने प्रकृति के संसर्ग में ज्ञान प्राप्त किया। पवन प्रवाह की सनसन, जल प्रवाह की कलकल, मेघ का गरजना, बिजली का तड़कना, सिंह की दहाड़, सर्प की फुंफकार इत्यादि ध्वनियाँ आदि मानव ने अपने स्मृति कोष में संचित कीं और उनका उच्चारण कर अपने अन्य समूहों को सूचित कर सतर्क करने का प्रयास किया। यह उसे प्रकार था जैसे आज भी बंदर आदि जीव शेर को देखते ही हूप की ध्वनि कर अन्य पशु-पक्षियों को सूचित कर देते हैं ताकि वे अपना बचाव कर सकें। ध्वनियों में अंतर्निहित आरोहों-अवरोहों की पुनरावृत्ति से छंदों की रचना हुई।भुजंग प्रयात छंद सर्प की फुंफकार पर ही आधारित है। कुंडलिया छंद का कुंडली मारकर बैठे हुए सर्प से सादृष्य सहज दृष्टव्य है। स्पष्ट है कि छंद का जन्म आउए विकास प्रकृति और ध्वनि के संगम से ही हुआ है। आदि मानव ने प्रकृति में व्याप्त ध्वनियों का अनुसरण कर बोलना सीखा। एकाधिक ध्वनियों के संयुक्त उच्चारण से लय खंड बने जिनमें गति-यति भी थी। कई ध्वनियों अर्थात उच्चारों को एक साथ बोलने से क्रमश: शब्द और वाक्य अस्तित्व में आए। मातें शिशुओं को बहलाने के लिए पहले निरर्थक और फिर सार्थक ध्वनियों का गायन कर, छंद रचने लगीं। रात्रि के सन्नाटे और अँधेरे में एकाकीपन को दूर करने के लिए गुनगुनाने-गाने का चलन हुआ।
किसी आदि मानव ने नदी के किनारे खेल-खेल में रेत पर कुछ आकृति बनाई, किसी अन्य ने किसी पौधे की टहनी तोड़कर उससे बहते द्रव को चट्टानों पर लगाया द्रव सूखने पर कुछ आकृति दिखी। आस-पास घट रही घटनाओं के शैल चित्र इसी तरह बनाए गए। क्रमश: ध्वनियों (उच्चारों) के लिए संकेत लिखे गए और तब लिपि ने जन्म लिया। स्पष्ट है कि छंद का अस्तित्व लेखन के पहले भी था। इस काल में जब तक अक्षर (वर्ण) लिखा ही नहीं गया था तो वर्ण अथवा मात्रा की गणना कैसे हो सकती थी? अतः यह समझ लिया जाना चाहिए कि छंद मूलतः ध्वनि (उच्चार) पर आधारित अर्थात वाचिक होता है। मनुष्य ने लिपि का आविष्कार किया लेकिन अन्य जीव-जंतु ध्वनि के आधार पर ही अब तक संवाद करते हैं। वाक् को लिपि का विकास होने के बाद लिखा जाने लगा और तब उसके वर्ण और मात्रा की गणना क्रमशः प्रारंभ हुई। अतः, यह अवधारणा की छंद के दो प्रकार वार्निक और मात्रिक हैं, तथ्यात्मक रूप से गलत है। छंद मूलतः वाचिक होता है जिसके दो अंग वर्ण और मात्रा हैं।
दोहा हिंदी का सर्वकालिक सर्वाधिक लोकप्रिय छंद है। सैकड़ो वर्षों से अपभ्रंश, पाली, प्राकृत, अंगिका, बज़्जि,का संस्कृत इत्यादि भाषाओं में दोहा लिखा जाता रहा। दोहे का उद्भव लोक में हुआ, खेतों में, खलिहानों में पनघटों में, दोहे का प्रयोग होता रहा। कबीर, मीरा, रैदास आदि अनेक संत कवियों ने जो कि निरक्षर थे, दोहे का सृजन किया। यह दोहे लय साधते हुए, उच्चार के आधार पर ही लिकहे गए थे। तुलसी जैसे संत कवियों ने सुशिक्षित होते हुए भी प्रभु के प्रेम में मग्न होकर लयात्मक रूप से गुनगुनाते हुए काव्य रचा। आज के नौसिखिया रचनाकार जब इन कालजयी कवियों के कालजयी साहित्य को वर्ण और मात्रा के आधार पर दोषपूर्ण बताते हैं तो उनकी तथाकथित बुद्धिमत्ता पर तरस आता है। संवत १६७७ में अपभ्रंश में रचित 'ढोला-मारू दा दूहा' में सरस्वती वंदना दोहा में ही लिखी गई-
सकल सुरासुर सामिनी, सुण माता सरसत्ति।
विनय करूँ इ वीणवुं, मुझ तउ अविरल मत्ति।।
दोहा छंद में दो कि प्रधानता पर दोहा के विविध नाम दुषअह, दूहा, दोहड़ा, दोग्कध, दोपदी, द्विपथक, दोहक आदि विविध देश-कालों में प्रचलित हुए। दोहा में पंक्ति संख्या दो, प्रत्येक पंक्ति में विषम चरण दो, सम चरण दो, विषम चरण के आरंभ में समान उच्चारक काल दो,सम चरण के अंत में उच्चार काल २ सहज ही देखे जा सकते हैं। दोहा भारत कि हर भाषा-बोली में कहा गया छंद है।
हिंदी की सक्रिय, सजग, प्रतिभावान कवियत्री मनीषा सहाय 'सुमन' ने ''दोहा नैवेद्यम्'' नाम से अपना दोहा संग्रह तैयार किया है, यह अत्यंत प्रसन्नता और हर्ष का विषय है। मनीषा प्रतिभावान रचनाकार हैं। उन्होंने ६५ अध्यायों में विविध विषयों पर दोहे संग्रहित किए हैं जिनमें भारत, श्री राम, गाँधी विचार, हिंदी, संविधान, ग्रंथों और शहरों पर आधारित दोहे विशेष हैं। मनीषा को मानवीय व्यवहार, पर्यावरण सुधार, पर्व और त्योहार, अलंकार, वानस्पतिक संसार, अंतर्जालिक नवाचार आदि विषय प्रिय हैं। वे दोहों का सृजन करते समय भाषिक सरलता, सुबोधता, सहजता और लय-बद्धता के तत्वों को साध पाती हैं। देश का गौरव उन्हें सृजन के लिए प्रेरित करता है-
गौरव भारत का बढ़े, सजे देश का भाल।
सदा सतत आगे बढ़े, रहें सभी खुशहाल।।
'सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामय' के सनातन आदर्श को दोहे में मनीषा ने व्यक्त किया है। मनीषा कलम की शक्ति को पहचानती हैं। वह लिखती हैं-
कलम बड़ी तलवार से, करती गहरे वार।
सोच-समझकर यह चले, फिर बदले संसार।।
कलम से संसार बदलने का कार्य सत्साहित्य के माध्यम से ही संभव होता है। राष्ट्रीय ध्वज हमारी गर्व का प्रतीक है। मनीषा लिखती हैं-
हाथ तिरंगा थाम कर, चलते सीना तान।
डर चिंता से दूर हो, मंजिल हो आसान।।
मानवीय जीवन में हर्ष, हुलास, उल्लास, श्रृंगार का अपना महत्व है। हमारे पर्व और त्योहार इन्हीं भावनाओं को व्यक्त करते हैं। मनीषा बिहार की पुत्री हैं। बिहार के सबसे बड़े पर्व छठ को भूल नहीं सकतीं-
छट की महिमा है बड़ी, पूज जग संसार।
सूर्य देव संसार के, एक प्रबल आधार।।
बिहार में दिनकर पूजन की परंपरा तो है ही, दिनकर बिहार के एक बहुत बड़े राष्ट्रीय कवि भी हुए हैं। हिंदी भाषा के प्रति मनीषा का प्रेम सराहनीय है-
हिंदी भाषा सरल हो, विपुल शब्द भंडार।
भारत को यह जोड़ती, करती सबसे प्यार।।
वर्तमान में तो हिंदी भारत ही नहीं विश्व के विभिन्न भागों में बोली जा रही है और उन्हें भी जोड़ रही है। भारत का संविधान विश्व का सबसे बड़ा और सर्वोपायोगी संविधान है। यह एक विडंबना है कि जिस संविधान को ३८९ सदस्यी, ८ समितियों (संचालन समिति अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद, प्रक्रिया नियम समिति डॉ. राजेंद्र प्रसाद, संघ शक्ति समिति अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू, संघीय संविधान समिति अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू, राज्य-समझौता समिति अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू, प्रांतीय संविधान समिति अध्यक्ष सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलिक अधिकार व अल्प संखयक सलाहकार समिति अध्यक्ष सरदार वल्लभभाई पटेल तथा प्रारूप समिति अध्यक्ष डॉ. बी.आर. अंबेडकर, संपूर्ण संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद) उसके निर्माण का श्रेय केवल एक समिति अध्यक्ष को दिया जा रहा है। इस विसंगति को मनीषा ने एक दोहे में व्यक्त किया है-
संविधान अध्यक्ष थे, श्री राजेंद्र प्रसाद।
जनक हुए अंबेडकर यह कैसा अपवाद।।
दोहा ४८ उच्चारों (२ x २४) का छंद है जिसकी हर पंक्ति में १३ + ११ उच्चार होते हैं। हर चरण में १-१ लघु उच्चार अनिवार्य हैं, शेष ४४ उच्चारों के आधार पर दोहे में लघु-गुरु उच्चार संख्या के आधार पर २३ निम्न प्रकार बताए गए हैं- भ्रमर, सुभ्रमर, शरभ, श्येन, मण्डूक, मर्कट, करभ, नर, हंस, गयंद, पयोधर, बल, पान, त्रिकल, कच्छप, मच्छ, शार्दूल, अहिवर, व्याल, विडाल, उदर, श्वान तथा सर्प।
दोहा के सम (दूसरे तथा चौथे) चरणों में गुरु-लघु उच्चार होना अनिवार्य है। दोहे के विषम (पहले-तीसरे) चरणों में, केवल पहले चरण में एवं केवल तीसरे चरण के अंत में गुरु-लघु उच्चारण का प्रयोग कर ३ प्रकार के दोहे लिखे जा सकते हैं।
हिन्दी में मान्य ११ रसों (श्रृंगार रस, हास्य रस, करुण रस, वीर रस, रौद्र रस, भयानक रस, वीभत्स रस, अद्भुत रस, शान्त रस, वात्सल्य रस और भक्ति रस) के आधार पर ११ प्रकार के दोहे लिखे जाते रहे हैं।
विश्व वाणी हिन्दी संस्थान अभियान जबलपुर तथा समन्वय प्रकाशन जबलपुर के तत्वावधान में उक्त सबही प्रकार के दोहों को समाविष्ट करते हुए वर्ष २०१८ में दोहा दोहा नर्मदा , दोहा सलिल निर्मला तथा दोहा दिव्य दिनेश ३ साझा संकलन प्रकाशित किए गए हैं। इनमें से प्रत्येक में ११-११ दोहाकारों के १००-१०० दोहों के साथ कुल मिलकर ३८०० दोहे, दोहों का इतिहास, गत २००० वर्षों के प्रतिनिधि दोहे, विविध भाषाओं-बोलिओं व रसों में कहे गए दोहे प्रकाशित हैं।
मनीषा ने उक्त सभी प्रकारों के दोहे कहे हैं। इससे उनकी सृजन सामर्थ्य का परिचय मिलता है। मनीषा अपने साहित्य को उपनाम सुमन के अनुसार सु-मन से यह दोहा संकलन इष्टदेव श्री चित्रगुप्त जी को समर्पित कर रही हैं, मुझे विश्वास है उनका यह संकलन पाठकों को पसंद आएगा और अनेक कृतियाँ रच चुकी मनीषा की रचना यात्रा निरंतर जारी रहेगी। अनंत शुभकामनाएँ।
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संपर्क- विश्ववाणी हिन्दी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१
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