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सोमवार, 13 जुलाई 2026

जुलाई १३, शिला दिवस, सोरठे, सॉनेट, गुरु, सवैया, भाषा, कुंडलिया, हाइकु, पोयम, शिव, शक्ति

सलिल सृजन जुलाई १३
शिला दिवस
*
ग़ज़लिका . भोर भई रे! बदरी छाई। धरा-सूर्य की भइ कुड़माई।। . नखरेबारी बिजुरी नच रइ बदरा ने ढोलकी बजाई।। . सज-धज दादुर बनें बराती हरियाली कर रई पहुनाई।। . दरवज्जे पे ठांड़ी ऊसा हुलस उमग जी भर मुसकाई।। . पवन ससुर बाँटत नजराना सुनत बेड़ी तुरतइ धाई १३.७.२०२६ ०००
सोरठे
हृदय लिली के नाम, जब से किया गुलाब ने।
खुशियों के पैगाम, तबसे नित मिलने लगे।।
.
चैनो-अमन हराम, रजनीगंधा ने किया।
मुफ्त हुआ बदनाम, अमलतास बाजार में।।
.
कान पकड़ गुलफाम, माफी माँगे रात-दिन।
कर दी नींद हराम, नागफनी ने धौंस दे।।
.
करती काम तमाम, शौहर का दे सुपारी।
सबकी नींद हराम, कर दी गाजर घास ने।।
.
हुए विधाता वाम, भाग गई घर छोड़कर।
डुबा दिया कुलनाम, लिव इन में जा जुही ने।।
.
हाथ गैर का थाम, ठगी जा रही चमेली।
रुचा नहीं गृह-धाम, डायवोर्स खुश रही ले।
.
हैरां खासो-आम, हवा बदलती देखकर।
बहुएँ नींद हराम, करें ननदियां सांस की ।।
१२.७.२०२५
०0०
श, ष, स भेद , उच्चारण स्थान
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श ष स के उच्चारण भेद को बहुधा लोग नहीं जानते, यदि जानते भी होंगे तो जानबूझ त्रुटि करते हैं अथवा स्वाभविक सुगमतावश गलत उच्चारण होता है। संस्कृत ही एक मात्र व्यवस्थित जिसका विज्ञानपरक व्याकरण को समूचा विश्व अपनी आवश्यकतानुकूल ग्रहण कर रहा है। हमें समझना होगा उच्चारण स्थान को -
1 अकुहविसर्जनीयानां कण्ठः
क वर्ग (क, ख, ग, घ, ङ) अ, आ, ह और विसर्ग का उच्चारण स्थान कण्ठ है।
2 इचुयशानां तालुः
च वर्ग (च, छ, ज, झ, ´) इ, ई, य, श का उच्चारण स्थान तालु है। इसी आधार पर श के तालव्यी होने की पहचान सर्व विदित है।
3 ऋटुरषानां मूर्घाः
ट वर्ग (ट, ठ, ड, ढ, ण) ऋ, र, ष का उच्चारण स्थान मूर्धा है। इसी आधार पर ष के मूर्धन्नी होने की पहचान सर्व विदित है।
4 लृतुलसानां दन्तः
त वर्ग (त, थ, द, ध, ना) लृ, ल, स का उच्चारण स्थान दंत है। इसी आधार पर स के दन्ती होने की पहचान सर्व विदित है।
5 उपूपध्मानीयानामोष्ठौ
प वर्ग (प, फ, ब, भ, म) )( उ, ऊ का उच्चारण स्थान ओष्ठ है।
तालव्यी, मूर्धन्नी, दन्ती रूपी पहचान ही श,ष,स के भेद को प्रकट करती है। च वर्ग के फ्लो में जीभ का तालु से स्पर्श होते हुए निकलने वाली शकार ध्वनि तालव्यी है। टवर्ग के फ्लो में मुंह के खुलने से निकलने वाली षकार ध्वनि मूर्धन्नी है, जबकि त वर्ग के फ्लो में दंतपंक्तियों के परस्पर मिलने से होने वाली सकार ध्वनि दन्ती है।
*
सॉनेट
गट्टू
नटखट-चंचल है गट्टू,
करे शरारत जी भरकर,
सीधा-साधा है बिट्टू,
रहे मस्त पुस्तक पढ़कर।
तुहिना जीजी के प्यारे,
भैया सनी लड़ाते लाड़,
दादी के चंदा-तारे,
बब्बा करते जान निसार।
शैंकी जी को दुलराते,
धमाचौकड़ी करते खूब,
मिल चिंकी को दुलराते,
हिल-मिल रहें स्नेह में डूब।
खड़ी करें मिल सबकी खाट।
एक एक से बढ़कर ठाठ।।
१३-७-२०२३
•••
सॉनेट
प्राण निकलते गर्मी से, नवगीतों में गाया,
धरती की छाती फटती, सुन इंद्र देव पिघले,
झुलस रहा लू से तन-मन, सूरज को गरियाया,
रूठा छिपा मेघ पीछे, बोला जी भर जल ले।
हुई मूसलाधार वृष्टि, हो कुपित गिरी बिजली,
वन काटे रूठे पर्वत, हो गीले फिसल गिरे,
कर विनाश कहकर विकास, हँस राजनीति पगली,
अच्छे सोच बुरे दिन पा, जुमलों से लोग घिरे।
पानी मरा आँख का तो, तू पानी-पानी हो,
रौंद प्रकृति को ठठा रहा, पानी आँखों में भर,
भोग कर्म का दंड न अब, तुझसे नादानी हो,
हाय हाय क्यों करता है, गलती करने से डर।
गीत खुशी के मत बिसरा, गा बंबुलिया कजरी।
पूज प्रकृति को सुत सम तब देखे हालत सुधरी।।
१३-७-२०२३
•••
सॉनेट
गुरु
गुरु को नतशिर नमन करो रे!
गुरु की महिमा कही न जाए
गुरु ही नैया पार लगाए
गुरु पग रज पा अमन वरो रे!
गुरु वचनामृत पान करो रे!
गुरु शब्दों में सत्य समाहित
गुरु वाणी में अर्थ विराजित
गुरु का महिमा-गान करो रे!
गुरु का मन में मान करो रे!
गुरु-दर्पण में निज छवि देखो
गुरु-परखे तो निज सच लेखो
गुर-वचनों का ध्यान धरो रे!
गुरु को सत्-शिव सुंदर मानो
गुरु का खुद को चाकर मानो
१३-७-२०२२
रुद्राक्ष, गुलमोहर, भोपाल
•••
सॉनेट
गुरु
गुरु गुर सिखलाता है उत्तम
दिखलाता है राह हमेशा
हरता है अज्ञानजनित तम
दिलवाता है वाह हमेशा
लेता है गुरु कड़ी परीक्षा
ठोंक-पीटकर खोट निकाले
देता केवल तब ही दीक्षा
दीप-ज्योति अंतर में बाले
कहे दीप अपना खुद होओ
गिरकर रुको न, उठ फिर भागो
तम पी, उजियारा बो जाओ
खुद समर्थ हो भीख न माँगो
गुरु-वंदन कर शिष्य तर सके
अपनी मंजिल आप वर सके
१३-७-२०२२
रुद्राक्ष, गुलमोहर, भोपाल
•••
नवान्वेषित द्वि इंद्रवज्रा सवैया
२ x (त त ज ग ग), २२ वर्ण, सम पदांत।
*
दूरी मिटा दे मिल ले गले आ, श्वासें करेंगी मनुहार तेरा।
आँखें मिलीं तो हट ही न पाई, आसें बनेंगी गलहार तेरा।
तू-मैं किनारे नद के भले हों, है सेतु प्यारी शुभ प्यार तेरा।
पूरा करेंगे हम वायदों को, जीना मुझे है बन हार तेरा।
१३-७-२०१९
***
भाषा व्याकरण
*
*ध्वनि*
कान सुन रहे वह ध्वनि, जो प्रकृति में व्याप्त।
अनहद ध्वनि गुंजरित है, सकल सृष्टि में आप्त।।
*
*रसानुभूति*
ध्वनि सुनकर प्रतिक्रिया हो, सुख-दुख की अनुभूति।
रस अनुभूति सजीव को, जड़ को हो न प्रतीति।।
*
*उच्चार*
जो स्वतंत्र ध्वनि बोलते, वह ही है उच्चार।
दो प्रकार लघु-गुरु कहें, इनको मात्रा भार।।
*
*अर्थ*
ध्वनि सुनकर जो समझते, उसको कहते अर्थ।
अगर न उसका भान तो, बनता अर्थ अनर्थ।।
*
*सार्थक ध्वनि*
कलकल कलरव रुदन में, होता निश्चित अर्थ।
शेर देख कपि हूकता, दे संकेत न व्यर्थ।।
*
*निरर्थक ध्वनि*
अंधड़ या बरसात में, अर्थ न लेकिन शोर।
निरुद्देश्य ध्वनि है यही, मंद या कि रव घोर।।
*
*सार्थक ध्वनि*
सार्थक ध्वनियाँ कह-सुनें, जब हम बारंबार।
भाव-अर्थ कह-समझते, भाषा हो साकार।।
*
*भाषा*
भाषा वाहक भाव की, मेटे अर्थ अभाव।
कहें-गहें हम बात निज, पड़ता अधिक प्रभाव।।
*
*लिपि*
जब ध्वनि को अंकित करें देकर चिन्ह विशेष।
चिन्ह देख ध्वनि विदित हो, लिपि विग्यान अशेष।।
*
*अक्षर*
जो घटता-कमता नहीं,
ऐसा ध्वनि-संकेत।
अक्षर अथवा वर्ण से,
यही अर्थ अभिप्रेत।।
*
*मात्रा*
लघु-गुरु दो उच्चार ही, लघु-गुरु मात्रा मीत।
नीर-क्षीर वत वर्ण से, मिल हों एक सुनीत।।
*
*वर्ण माला*
अक्षर मात्रा समुच्चय, रखें व्यवस्थित आप।
लिख-पढ़ सकते हैं सभी, रखें याद कर जाप।।
*
*शब्द*
वर्ण जुड़ें तो अर्थ का, और अधिक हो भान।
अक्षर जुड़कर शब्द हों, लक्ष्य एकता जान।।
*
*रस*
स्वाद भोज्य का सार है, गंध सुमन का सार।
रस कविता का सार है, नीरस बेरस खार।।
*
*रस महिमा*
गो-रस मधु-रस आम्र-रस,
गन्ना रस कर पान।
जौ-रस अंगूरी चढ़़े, सिर पर बच मतिमान।।
.
बतरस, गपरस दे मजा, नेतागण अनजान।
निंदारस में लीन हों, कभी नहीं गुणवान।।
.
पी लबरस प्रेमी हुए, धन्य कभी कुर्बान।
संजीवित कर काव्य-रस, फूँके सबमें प्राण।।
*
*अलंकार*
पत्र-पुष्प हरितिमा है, वसुधा का श्रृंगार।
शील मनुज का; शौर्य है, वीरों का आचार।।
.
आभूषण प्रिय नारियाँ, चला रहीं संसार।
गह ना गहना मात्र ही, गहना भाव उदार।।
.
शब्द भाव रस बिंब लय, अर्थ बिना बेकार।
काव्य कामिनी पा रही, अलंकार सज प्यार।।
.
शब्द-अर्थ संयोग से, अलंकार साकार।
मम कलियों का मोहकर, हरे चित्त हर बार।।
*
*ध्वनि खंड*
कुछ सार्थक उच्चार मिल, बनते हैं ध्वनि खंड।
ध्वनि-खंडों के मिलन से, बनते छंद अखंड।।
*
*छंद*
कथ्य भाव रस बिंब लय, यति पदांत मिल संग।
अलंकार सज मन हरें, छंद अनगिनत रंग।।
*
*पिंगल*
वंदन पिंगल नाग ऋषि, मिला बीन फुँफकार।
छंद-शास्त्र नव रच दिया, वेद-पाद रस-सार।।
*
*पाद*
छंद-पाद हर पंक्ति है, पग-पग पढ़-बढ़ आप।
समझ मजा लें छंद का, रस जाता मन व्याप।।
*
*चरण*
चरण पंक्ति का भाग है, कदम-पैर संबंध।
द्वैत मिटा अद्वैत वर, करें सहज अनुबंध।।
*गण*
मिलें तीन उच्चार जब, तजकर लघु-गुरु भेद।
अठ गण बन मिल-जुल बनें, छंद मिटा दें खेद।।
.
यमत रजभ नस गण लगग, गगग गगल के बाद।
गलग लगल फिर गलल है, ललल ललग आबाद।।
*वाक्*
वाक् मूल है छंद का, ध्वनि-उच्चार स-अर्थ।
अर्थ रहित गठजोड़ से, रचना करे अनर्थ।।
*
*गति*
निर्झर-नीर-प्रवाह सम, तीव्र-मंद हो पाठ।
गति उच्चारों की सधे, कवि जनप्रियता हों ठाठ।।
.
कथ्य-भाव अनुरूप हो, वाक्-चढ़ाव-उतार।
समय कथ्य जन ग्राह्य हो, करतल गूँज अपार।।
*
*यति*
कुछ उच्चारों बाद हो, छंदों में ठहराव।
है यति इसको जानिए, यात्रा-मध्य पड़ाव।।
.
यति पर रुककर श्वास ले, पढ़िए लंबे छंद।
कवित-सवैया का बढ़े, और अधिक आनंद।।
.
श्वास न उखड़े आपकी, गति-यति लें यदि साध।
शुद्ध रखें उच्चार तो, मिट जाए हर व्याध।।
*
*उप यति*
दो विराम के मध्य में, निश्चित जो न विराम।
स्थिर न रहें- जो बदलते, उपरति उनका नाम।।
*
*विराम चिह्न*
मध्य-अंत में पाद के, यति संकेत-निशान।
रखता कवि पाठक सके, उनको झट पहचान।।
*
विस्मय संबोधन कहाँ, कहाँ प्रश्न संकेत।
कहाँ उद्धरण या कथन, चिन्हों का अभिप्रेत।।
१२-७-२०१९
***
एक रचना:
*
मन-वीणा पर चोट लगी जब,
तब झंकार हुई.
रिश्तों की तुरपाई करते
अँगुली चुभी सुई.
खून जरा सा सबने देखा
सिसक रहा दिल मौन?
आँसू बहा न व्यर्थ
पीर कब,
बाँट सका है कौन?
१३-७-२०१८
*
दोहा सलिल- रूप धूप का दिव्य
*
धूप रूप की खान है, रूप धूप का दिव्य।
छवि चिर-परिचित सनातन, पल-पल लगती नव्य।।
*
रश्मि-रथी की वंशजा, या भास्कर की दूत।
दिनकर-कर का तीर या, सूर्य-सखी यह पूत।।
*
उषा-सुता जग-तम हरे, घोर तिमिर को चीर।
करती खड़ी उजास की, नित अभेद्य प्राचीर।।
*
धूप-छटा पर मुग्ध हो, करते कलरव गान।
पंछी वाचिक काव्य रच, महिमा आप्त बखान।।
*
धूप ढले के पूर्व ही, कर लें अपने काम।
संध्या सँग आराम कुछ, निशा-अंक विश्राम।।
*
कलियों को सहला रही, बहला पत्ते-फूल।
फिक्र धूप-माँ कर रही, मलिन न कर दे धूल।।
*
भोर बालिका; यौवना, दुपहर; प्रौढ़ा शाम।
राग-द्वेष बिन विदा ले, रात धूप जप राम।।
*
धूप राधिका श्याम रवि, किरण गोपिका-गोप।
रास रचा निष्काम चित, करें काम का लोप।।
*
धूप विटामिन डी लुटा, कहती- रहो न म्लान।
सूर्य-़स्नान कर स्वस्थ्य हो, जीवन हो वरदान।।
*
सलिल-लहर सँग नाचती, मोद-मग्न हो धूप।
कभी बँधे भुजपाश में, बाँधे कभी अनूप।।
*
रूठ क्रोध के ताप से, अंशुमान हो तप्त।
जब तब सोनल धूप झट, हँस दे; गुस्सा लुप्त।।
*
आशुतोष को मोहकर, रहे मेघ ना मौन।
नेह-वृष्टि कर धूप ले, सँग-सँग रोके कौन।।
*
धूप पकाकर अन्न-फल, पुष्ट करे बेदाम।
अनासक्त कर कर्म वह, माँगे दाम न नाम।।
*
कभी न ब्यूटीपारलर, गई एक पल धूप।
जगती-सोती समय पर, पाती रूप अनूप।।
*
दिग्दिगंत तक टहलती, खा-सो रहे न आप।
क्रोध न कर; हँसती रहे, धूप न करे विलाप।।
१३-७-२०१८
***
कुंडलिया
*
विधान: एक दोहा + एक रोला
अ. २ x १३-११, ४ x ११-१३ = ६ पंक्तियाँ
आ. दोहा का आरंभिक शब्द या शब्द समूह रोला का अंतिम शब्द या शब्द समूह
इ. दोहा का अंतिम चरण, रोला का प्रथम चरण
*
परदे में छिप कर रहे, हम तेरा दीदार।
परदा ऐसा अनूठा, तू भी सके निहार।।
तू भी सके निहार, आह भर, देख हम हँसे।
हँसे न लेकिन फँसे, ह्रदय में शूल सम धँसे।।
मुझ पर मर, भर आह, न कहना कर में कर दे।
हो जा तू संजीव, हटाकर आ जा परदे।।
१४-७-२०१७
***
हाइकु सलिला
*
कल आएगा?
सोचना गलत है
जो करो आज।
*
लिखो हाइकु
कागज़-कलम ले
हर पल ही।
*
जिया में जिया
हर पल हाइकु
जिया ने रचा।
*
चाह कलम
मन का कागज़
भाव हाइकु।
*
शब्द अनंत
पढ़ो-सुनो, बटोरो
मित्र बनाओ।
*
शब्द संपदा
अनमोल मोती हैं
सदा सहेजो।
*
श्वास नदिया
आस नद-प्रवाह
प्रयास नौका।
*
ध्यान में ध्यान
ध्यान पर न ध्यान
तभी हो ध्यान।
*
मुक्ति की चाह
रोकती है हमेशा
मुक्ति की राह।
*
खुद से ऊब
कैसे पायेगा राह?
खुद में डूब।
***
एक कुण्डलिया
औकात
अमिताभ बच्चन-कुमार विश्वास प्रसंग
*
बच्चन जी से कर रहे, क्यों कुमार खिलवाड़?
अनाधिकार की चेष्टा, अच्छी पड़ी लताड़
अच्छी पड़ी लताड़, समझ औकात आ गयी?
क्षमायाचना कर न समझना बात भा गयी
रुपयों की भाषा न बोलते हैं सज्जन जी
बच्चे बन कर झुको, क्षमा कर दें बच्चन जी
१३-७-२०१७
***
मुक्तक
था सरोवर, रह गया पोखर महज क्यों आदमी?
जटिल क्यों?, मिलता नहीं है अब सहज क्यों आदमी?
काश हो तालाब शत-शत कमल शतदल खिल सकें-
आदमी से गले मिलकर 'सलिल' खुश हो आदमी।।
१३-७-२०१६
***
पुस्तक सलिला-
स्व. श्याम़ श्रीवास्तव गीत-नवगीत ‘यादों की नागफनी’
आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
[पुस्तक परिचय- यादों की नागफनी, गीत संग्रह, स्व. श्याम़ श्रीवास्तव, प्रथम संस्करण २०१६, आकार २१.५ से.मी. x १४ से.मी., आवरण बहुरंगी पेपरबैक लेमिनेटेड, पृष्ठ ६२, मूल्य १५० रु., शैली प्रकाशन, २०सहज सदन, शुभम विहार, कस्तूरबा मार्ग, रतलाम, संपादन- डाॅ. सुमनलता श्रीवास्तव sumanshrivastava2003@yahoo.com ]
00000
‘यादों की नागफनी’सनातन सलिला नर्मदा के तट पर बसी संस्कारधानी जबलपुर के लाड़ले रचनाकार स्व. श्याम़ श्रीवास्तव की प्रतिनिधि रचनाओं का संकलन है जिसे उनके स्वजनों ने अथक प्रयास कर उनके ७५ वें जन्म दिवस पर प्रकाशित कर उनके सरस-सरल व्यक्तित्व को पुनः अपने बीच महसूसने का श्लाघ्य प्रयास किया। स्व. श्याम ने कभी खुद को कवि, गायक, गीतकार नहीं कहा या माना, वे तो अपनी अलमस्ती में लिखते - गाते रहे। आकाशवाणी ए ग्रेड कलाकार कहे या श्रोता उनके गीतों-नवगीतों पर वाह-वाह करें, उनके लिये रचनाकर्म हमेशा आत्मानंद प्राप्ति का माध्यम मा़त्र रहा। आत्म में परमात्म को तलाशता-महसूसता रचनाकार विधाओं और मानकों में बॅंधकर नहीं लिखता, उसके लिखे में कहाॅं-क्या बिना किसी प्रयास के आ गया यह उसके जाने के बाद देखा-परखा जाता है।
यादों की नागफनी में गीत-नवगीत, कविता तीेनों हैं। श्याम का अंदाज़े-बयाॅं अन्य समकालिकों से जुदा है-
‘‘आकर अॅंधेरे घर में / चौंका दिया न तुमने
मुझको अकेले घर में / मौका दिया न तुमने
तुम दूर हो या पास /क्यों फर्क नहीं पड़ता?
मैं तुमको गा रहा हूॅं / हूॅंका दिया न तुमने
‘जीवन इक कुरुक्षेत्र’ में श्याम खुद से ही संबोधित हैं- "जीवन / इक कुरुक्षेत्र है / मैं अकेला युद्ध लड़ रहा /अपने ही विरुद्ध लड़ रहा ......... शांति / अहिंसा क्षमा को त्याग / मुझमें मेरा बुद्ध लड़ रहा।"
यह बुद्ध आजीवन श्याम की ताकत भी रहा और कमजोरी भी। इसने उन्हें बड़े से बड़े आघात को चुपचाप सहने और बिल्कुल अपनों से मिले गरल को पीने में सक्षम बनांया तो अपने ‘स्व’ की अनदेखी करने की ओर प्रवृत्त किया। फलतः, जमाना ठगकर खुश होता रहा और श्याम ठगे जाकर।
श्याम के नवगीत किसी मानक विधान के मोहताज नहीं रहे। आनुभूतिक संप्रेषण को वरीयता देते हुए श्याम ‘कविता कोख में’ शीर्षक नवगीत में संभवतः अपनी और अपने बहाने हर कवि की रचना प्रक्रिया का उल्लेख करते हैं।
तुमने जब / समर्पण किया
धरती आसमान मुझे / हर जगह क्षितिज लगे।
छुअन - छुअन मनसिज लगे।
कविता आ गई कोख में।
वैचारिक लयता / उगी /मिटटी पगी
राग के बयानों की/भाषा जगी
छंद-छंद अलंकार- पोषित हुए
नव रसों को ले कूदी /चिंतन मृगी
सृष्टि का / अर्पण किया
जनपद की खान मुझे
समकालिक क्षण खनिज लगे।
कथ्य उकेरे स्याहीसोख में।
कविता आ गई कोख में।
श्याम के श्रृंगारपरक गीत सात्विकता के साथ-साथ सामीप्य की विरल अनुभूति कराते हैं। ‘नमाज़ी’शीर्षक नवगीत श्याम की अन्वेषी सोच का परिचायक है-
पूर्णिमा का चंद्रमा दिखा
विंध्याचल-सतपुड़ा से प्रण
पत्थरों से गोरे आचरण
नर्मदा का क्वांरापन नहा
खजुराहो हो गये हैं क्षण
सामने हो तुम कुरान सी
मैं नमाज़ी बिन पढ़ा-लिखा
‘बना-ठना गाॅंव’ में श्याम की आंचलिक सौंदर्य से अभिभूत हैं। उरदीला गोदना, माथे की लट बाली, अकरी की वेणी, मक्का सी मुस्कान, टिकुली सा फूलचना, सरसों की चुनरिया, अमारी का गोटा, धानी किनार, जुन्नारी पैजना, तिली कम फूल जैसे कर्णफूल, अरहर की झालर आदि सर्वथा मौलिक प्रतीक अपनी मिसाल आप हैं। समूचा परिदृश्य श्रोता/पाठक की आॅंखों के सामने झूलने लगता है।
गोरी सा / बना-ठना गाॅंव
उरदीला गोदना गाॅंव।
माथे लट गेहूॅं की बाली
अकरी ने वेणी सी ढाली,
मक्का मुस्कान भोली-भाली
टिकुली सा फूलचना गाॅंव।
सरसों की चूनरिया भारी
पल्लू में गोटा अमारी,
धानी-धानी रंग की किनारी
जुन्नारी पैंजना गाॅंव।
तिली फूल करनफूल सोहे
अरहर की झालर मन मोहे,
मोती अजवाइन के पोहे।
लौंगों सा खिला धना गाॅंव।
श्रेष्ठ-ज्येष्ठ गीतकार स्व, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ ने श्याम की रचनाओं को ‘विदग्ध, विलोलित, विभिन्न आयामों से गुजरती हुई अनुभूति के विरल क्षणों को समेटने में समर्थ, पौराणिक संदर्भों के साथ-साथ नई उदभावनाओं को सॅंजोने में समर्थ तथा भावना की आॅंच में ढली भाषा से संपन्न‘’ ठीक ही कहा है। किसी रचनाकार के महाप्रस्थान के आठ वर्ष पश्चात भी उसके सृजन को केंद्र में रखकर सारस्वत अनुष्ठान होना ही इस बात का परिचायक है कि उसका रचनाकर्म जन-मन में पैठने की सामथ्र्य रखता है। स्व. रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ के अनुसार ‘‘कवि का निश्छल सहज प्रसन्न मन अपनम कथ्य के प्रति आश्वस्त है और उसे अपनी निष्ठा पर विश्वास है। पुराने पौराणिक प्रतीकों की भक्ति तन्मयता को उसने अपनी रूपवर्णना और प्रमोक्तियों में नये रूप् में ढालकर उन्हें नयी अर्थवत्ता प्रदान की हैं।’’
श्याम के समकालीन चर्चित रचनाकारों सर्व श्री मोहन शशि, डाॅ. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’, संजीव वर्मा ‘सलिल’ की शब्दांजलियों से समृद्ध और श्रीमती पुष्पलता श्रीवास्तव, माधुरी श्रीवास्तव, मनोज श्रीवास्तव, रचना खरे तथा सुमनलता श्रीवास्तव की भावांजलियों से रससिक्त हुआ यह संग्रह नयी पीढ़ी के नवगीतकारों ही नहीं तथाकथित समीक्षकों और पुरोधाओं को नर्मदांचल के प्रतिनिधि गीतकार श्याम श्रीवास्तव के अवदान सें परिचित कराने का सत्प्रयास है जिसके लिये शैली निगम तथा मोहित श्रीवास्तव वास्तव में साधुवाद के पात्र हैं।
श्याम सामाजिक विसंगतियों पर आघात करने में भी पीछे नहीं हैं। "ये रामराजी किस्से / जनता की सुख-कथाएॅं / भूखे सुलाते बच्चों को / कब तलक सुनायें", "हम मुफलिस अपना पेट काट / पत्तल पर झरकर परस रहे", "गूँथी हुई पसीने से मजदूर की रोटी, पेट खाली लिये गीत गाता रहा" आदि अनेक रचनाएॅं इसकी साक्षी हैं।
तत्सम-तदभव शब्द प्रयोग की कला में कुशल श्याम श्रीवास्तव हिंदी, बुंदेली, उर्दू, अंग्रेजी के शब्दों को भाव-भंगिमाओं की टकसाल में ढालकर गीत, नवगीत, ग़ज़ल, कविता के खरे सिक्के लुटाते चले गये। समय आज ही नहीं, भविष्य में भी उनकी रचनाओं को दुहराकर आश्वस्ति की अनुभूति करता रहेगा।
***
मुक्तिका:
*
जिसे भी देखिये वो बात कर रहा प्रहार की
नहीं किसी को फ़िक्र तनिक है यहाँ सुधार की
सुबह से शाम चीखते ही रह गये न बात की
दूरदर्शनी बहस न आर की, न पार की
दक्षिणा लिये बिना टले न विप्र द्वार से
माँगता नगद न बात मानता उधार की
सियासती नुमाइशें दिखा रही विधायिका
नफरतों ने लीं वसूल कीमतें गुहार की
बाँध बनाने की योजना बना रहे हो तुम
ज़िक्र कर नहीं रहे हो तुम तनिक दरार की
***
1. Water
There is an ocean
In every drop of water.
Can you see it?
There is a life
In every drop of water
Can you live it?
There is a civilization
In every drop of water
Can you save it?
If not:
See by Heart and not through Eyes
You will certainly notice that
There is Past
There is Present
There is Future
There is Culture
In every drop of water.
If You will forget Heart
And will see through Eyes
You will say with fear that
There is flood
There is death
There is an end.
It depend upon you
What do you want to see?
Try to be neat, clean and
Transparent as Water.
Then only You will be
Able to witness
Water in it's reality & totality.
***
विमर्श
शिव, शक्ति और सृष्टि
सृष्टि रचना के सम्बन्ध में भारतीय दर्शन में वर्णित एक दृष्टान्त के अनुसार शिव निद्रालीन थे. शिव के साथ क्रीड़ा (नृत्य) करने की इच्छा लिये शक्ति ने उन्हें जाग्रत किया. आरंभ में शिव नहीं जागे किन्तु शक्ति के सतत प्रयास करने पर उग्र रूप में गरजते हुए क्रोध में जाग्रत हुए. इस कारण उन्हें रूद्र (अनंत, क्रोधी, महाकाल, उग्ररेता, भयंकर, क्रंदन करने वाला) नाम मिला। शिव ने शक्ति को देखा, वह शक्ति पर मोहित हो उठ खड़े हुए. शक्ति के प्रेम के कारण वे शांत होते गये. उन्होंने दीर्घवृत्ताभ (इलिप्सॉइड) का रूप लिया जिसे लिंग (स्वगुण, स्वभाव, विशेषता, रूप) कहा गया.
शिव कोई सशरीर मानव या प्राणी नहीं हैं. शिव का अर्थ है निर्गुण, गुणातीत, अक्षर, अजर, अमर, अजन्मा, अचल, अज्ञेय, अथाह, अव्यक्त, महाकाल, अकर्ता आदि. शिव सृष्टि-कर्ता भी हैं. शक्ति सामान्य ताकत या बल नहीं हैं. शक्ति का अर्थ आवेग, ऊर्जा, ओज, प्राण, प्रणोदन, फ़ोर्स, एनर्जी, थ्रस्ट, त्रिगुणा, माया, प्रकृति, कारण आदि है. शिव अर्थात “वह जो है ही नहीं”। जो सुप्त है वह होकर भी नहीं होता। शिव को हमेशा श्याम बताया गया है. निद्रावस्था को श्याम तथा जागरण को श्वेत या उजला कहकर व्यक्त किया जाता है.
शक्ति के उपासकों को शाक्त कहा जाता है. इस मत में ईश्वर की कल्पना स्त्री रूप में कर उसे शक्ति कहा गया है. शक्ति के आनंदभैरवी, महाभैरवी, त्रिपुरसुंदरी, ललिता आदि नाम भी हैं.
विज्ञान सृष्टि निर्माण के कारक को बिग-बैंग कहता है और भारतीय दर्शन शिव-शक्ति का मिलन. विज्ञान के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति के पीछे डार्क मैटर और डार्क इनर्जी की भूमिका है. योग और दर्शन के अनुसार डार्क मैटर (शिव) और डार्क एनर्जी (महाकाली) का मिलन ही सृष्टि-उत्पत्ति का कारण है. स्कॉटिश यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के अनुसार डार्क मैटर और डार्क एनर्जी के बीच संबंध (लिंक) है. पहले वे इन्हें भिन्न मानते थे अब अभिन्न कहते हैं. विज्ञान के अनुसार डार्क मैटर और डार्क इनर्जी के मिलन से एक विस्फोट नहीं विस्फोटों की श्रृंखला उत्पन्न होती है. क्या यह विस्फोट श्रंखला जागकर क्रुद्ध हुए शिव के हुंकारों की ध्वनि है?
वैज्ञानिकों के अनुसार आरम्भ में समूची सृष्टि दीर्घवृत्ताभ आकार के विशाल गैस पिंड के रूप में गर्जना कर रही थी. धीरे-धीरे वह गैसीय पिंड ठंडा होता गया. शीतल होने की प्रक्रिया के कारण इस जगत की रचना हुई. योग कहता है कि जब शक्ति ने शिव को जगा दिया तो वह गुस्से में दहाड़ते हुए उठे। वह कुछ समय के लिये रूद्र बन गये थे. शक्ति को देखकर उनका गुस्सा ठंडा हुआ. शक्ति पर मोहित होकर वह दीर्घवृत्ताभ बन गये, जिसे लिंग कहा गया.
वैज्ञानिक बड़ा धमाकों के बाद की स्थिति एक खंभे की तरह बताते हैं, जिसमें ऊपर के सिरे पर छोटे-छोटे मशरूम लगे हैं. यह ठीक वैसा है जैसा योग-विद्या में बताया गया है. सृष्टि दीर्घवृत्त के आकार में है, जो ऊष्मा, गैसों के फैलाव और संकुचन तथा उनके द्रव्यमान की सघनता पर निर्भर है. इसका ज्यादातर हिस्सा खाली है जिसमें द्रव्य कण, तारे, ग्रह और आकाशीय पिंड बिखरे हुए हैं। सम्भवत:ज्यादातर चीजें अब तक आकार नहीं ले सकी हैं।
विज्ञान जो बात अब समझा है, उसे दर्शन बहुत पहले समझा चुका था। यह शरीर भी वैसे ही है, जैसे कि यह संपूर्ण सृष्टि। पेड़ के तने में बने छल्लों से पेड़ के जीवन-काल में धरती पर घटित हर घटना का ज्ञान हो सकता है. मानव शरीर में अन्तर्निहित ऊर्जा से साक्षात हो सके तो ब्रह्मांड के जन्म और विकास की झाँकी अपने भीतर ही मिल सकती है।
संदर्भ:
१. हिंदी साहित्य कोष, सं. डॉ. धीरेन्द्र वर्मा, डॉ. ब्रजेश्वर वर्मा, डॉ. धर्मवीर भारती, श्री रामस्वरूप चतुर्वेदी, डॉ. रघुवंश
२. बृहत् हिंदी कोष सं. कलिका प्रसाद, राजवल्लभ सहाय, मुकुन्दीलाल श्रीवास्तव
३. समान्तर कोष, अरविन्द कुमार, कुसुम कुमार,
१३-७-२०१५
***
गीतः
सुग्गा बोलो
*
सुग्गा बोलो
जय सिया राम...
*
काने कौए कुर्सी को
पकड़ सयाने बन बैठे
भूल गये रुकना-झुकना
देख आईना हँस एँठे
खिसकी पाँव तले धरती
नाम हुआ बेहद बदनाम...
*
मोहन ने फिर व्यूह रचा
किया पार्थ ने शर-सन्धान
कौरव हुए धराशायी
जनगण सिद्ध हुआ मतिमान
खुश मत हो, सच याद रखो
जन-हित बिन होगे गुमनाम...
*
हर चूल्हे में आग जले
गौ-भिक्षुक रोटी पाये
सांझ-सकारे गली-गली
दाता की जय-जय गाये
मौका पाये काबलियत
मेहनत पाये अपना दाम...
*
***
गीत:
हम मिले…
*
हम मिले बिछुड़ने को
कहा-सुना माफ़ करो...
*
पल भर ही साथ रहे
हाथों में हाथ रहे.
फूल शूल धूल लिये-
पग-तल में पाथ रहे
गिरे, उठे, सँभल बढ़े
उन्नत माथ रहे
गैरों से चाहो क्योँ?
खुद ही इन्साफ करो...
*
दूर देश से आया
दूर देश में आया
अपनों सा अपनापन
औरों में है पाया
क्षर ने अक्षर पूजा
अक्षर ने क्षर गाया
का खा गा, ए बी सी
सीन अलिफ काफ़ करो…
*
नर्मदा मचलती है
गोमती सिहरती है
बाँहों में बाँह लिये
चाह जब ठिठकती है
डाह तब फिसलती है
वाह तब सँभलती है
लहर-लहर घहर-घहर
कहे नदी साफ़ करो...
१३-७-२०१४
***
एक कविता:
सीखते संज्ञा रहे...
*
सीख पाए हम न संज्ञा.
बन न पाए सर्वनाम.
क्रिया कैसी?
क्या विशेषण?
कहाँ है कर्ता अनाम?
कर न पाए
साधना हम
वंदना ना प्रार्थना.
किरण आशा की लिये
करते रहे शब्द-अर्चना.
साथ सुषमा को लिये
पुष्पा रहे रचना कमल.
प्रेरणा देती रहें
नित भावनाएँ नित नवल.
****

१३-७-२०११ 

जुलाई १२, गीत, कुण्डलिया, दोहा, ग़ज़लिका, व्यंग्य, आभूषण, दाँत, रूबी राय,

 सलिल सृजन जुलाई १२

*
मुक्तक
जय जय करिए मना जयंती सुखद पलों से पाएँ शक्ति।
खुशियाँ ही खुशियाँ देती है ईश-भक्ति, प्रिय प्रति अनुरक्ति।।
मिलता हर्ष याद कर जिसको उसको मिल जाती है मुक्ति-
जिसे याद कर शोक मिले वह तर पाए हैं कहीं न युक्ति।।
०००
गीत
फुलबगिया वह तीर्थ धाम है, जो भव की पीड़ा हर लेता।
करे सुवासित सकल जगत को, जीवन को नव जीवन देता।।
.
धूनी रमा रहे जोगी का, करे अपर्णा ध्यान भंग आ
भस्म हुआ रतिनाथ व्यर्थ ही, माँगी किंतु न मिली थी क्षमा
जो करता है हवन हाथ निज, जला दर्द खुद को ही देता।
फुलबगिया वह तीर्थ धाम है, जो भव की पीड़ा हर लेता।।
.
उड़ें तितलियाँ तो बनती है, हर दिन कोई नहीं कहानी
कर गुंजार कह रहे भँवरे, कर नादानी विहँस सयानी
करे कामना कनक हिरन की, वनजा फाँस कनक मृग लेता।
फुलबगिया वह तीर्थ धाम है, जो भव की पीड़ा हर लेता।।
.
कुंजबिहारी पल-पल हेरे, कहाँ छिपी है मिले राधिका
चाह मिलन की मन में पाले, भटक रही नित विकल साधिका
बरगद बब्बा मौन निहारें, चाह रहा क्या सृष्टि प्रणेता।
फुलबगिया वह तीर्थ धाम है, जो भव की पीड़ा हर लेता।।
.
कुछ फूलों के मुरझाने से, बगिया नहीं मरा करती है।
कुछ शूलों के चुभ जाने से, कली नहीं खिलना तजती है?
जड़ न रहे जड़ चेतन होकर, किसलय अंकुर पल्लव जन्मे
जो जी भर हँसता-मुस्काता, वह जग को जन्नत कर देता
फुलबगिया वह तीर्थ धाम है, जो भव की पीड़ा हर लेता।।
.
१२.७.२०२५
०0०
तुकबंदी
घर की मुर्गी दाल बराबर
कहावतें हैं सत्य सरासर
एक तरफ पड़ता है सूखा
बारिश करती शेष तर-ब-तर
नसबंदी सरकार गिराती
तुकबंदी मन-रंजन बेहतर
जीवन है जंगल सवाल का
कोशिश की पगडंडी उत्तर
जला रहे जो जलकर दुनिया
शांत हो गए खुद जल-बुझकर
कर अभिषेक, आचमन, पग धो
'सलिल' काम आए है सुखकर
काम तमाम तमाम काम का
हुआ न चूर हुए हम थककर
१२.७.२०२४
•••
कुण्डलिया
दाँत दिखाते देखकर, डेनटिस्ट लें फीस
दाँत निपोरो बेधड़क, चमक उठें बत्तीस
चमक उठें बत्तीस, दाँत बज देते ताली
दाँत पीसना नहीं, छटा हो तभी निराली
दाँत पेट में अगर, नहीं तब दाँत दिखाते
दाँत किटकिटा रहे, दाँत को दाँत डराते
*
रहो दाँत में जीभ बन, खट्टे कर दो दाँत।
तिनका पकड़ो दाँत से, व्यर्थ न तोड़ो दाँत।।
व्यर्थ न तोड़ो दाँत, दाँत काटी रोटी हो।
अगर हुए बेदाँत, बड़ी मुश्किल छोटी हो।।
दाँत दूध के टूट सकें हँस राह वह गहो।
दाँत पेट में अगर, बेहतर दूर ही रहो।।
१२-७-२०२१
***
समस्या पूर्ति चरण-तब लगती है चोट
*
तब लगती है चोट जब, दुनिया करे सवाल.
अपनी करनी जाँच लें, तो क्यों मचे बवाल.
*
खुले आम बेपर्द जब, तब लगती है चोट.
हैं हमाम में नग्न सब, फिर भी रखते ओट.
*
लाख गिला-शिकवा करें, सह लेते हम देर.
तब लगती है चोट, जब होता है अंधेर.
*
होती जब निज आचरण, में न तनिक भी खोट.
दोषी करें सवाल जब, तब लगती है चोट.
***
दोहा आभूषण
आभूषण से बढ़ सकी, शोभा किसकी मीत?
आभूषण की बढ़ा दे, शोभा सच्ची प्रीत.
*
'आ भूषण दूँ' टेर सुन, आई वह तत्काल.
भूषण की कृति भेंट कर, बिगड़ा मेरा हाल.
*
गहना गह ना सकी तो, गहना करती रंज.
सास-ननदिया करेंगी, मौका पाकर तंज.
*
अलंकार के लिए थी, अब तक वह बेचैन.
'अलंकार संग्रह' दिया, देख तरेरे नैन.
*
रश्मि किरण मुख पर पड़ी, अलंकार से घूम.
कितनी मनहर छवि हुई, उसको क्या मालूम?
*
अलंकारमय रमा को, पूज रहे सब लोग.
गहने रहित रमेश जी, मन रहे हैं सोग.
*
मिली सुंदरी ज्वेल सी, ज्वेलर हो हूँ धन्य.
माँगे मिली न ज्वेलरी, हुई उसी क्षण वन्य.
***
दोहा सलिला
दोहा मन की बात
*
बात-बात में कर रहा, दोहा मन की बात।
पर न बात बेबात कर, करे कभी आघात।।
*
बात निकलती बात से, बात-बात में जोड़।
दोहा गप्प न मारता, लेकर नाहक होड़।।
*
बिना बात की बात कर, संसद में हुड़दंग।
भत्ते लेकर मचाते, सांसद जनता तंग।।
*
बात काटते बात से, नेता पंडित यार।
पत्रकार पीछे नहीं, अधिवक्ता दमदार।।
*
मार न मारें मारकर, दें बातों से मार।
मीठी मार कभी करे, असर कभी फटकार।।
*
समय बिताने के लिए, लोग करें बतखाव।
निर्बल का बल बात है, सदा करें ले चाव।।
*
वार्ता विद्वज्जन करें, पंडितगण शास्त्रार्थ।
बात 'वाक्' हो जाए तो, विहँस करें वागार्थ।।
*
श्रुति-स्मृति है बात से, लोक-काव्य भी बात।
समझदार हो आमजन, गह पाए गुण तात।।
*
बातें ही वाचिक प्रथा, बातें वार्तालाप।
बात अनर्गल हो अगर, तब हो व्यर्थ प्रलाप।।
*
प्रवचन संबोधन कथा, बातचीत उपदेश।
मन को मन से जोड़ दे, दे परोक्ष निर्देश।।
*
बंधन है आदेश पर, स्वैच्छिक रहे सलाह।
कानाफूसी गुप्त रख, पूरी कर लें चाह।।
*
मन से मन की बात को, कहें मंत्रणा लोग।
बने यंत्रणा वह अगर, तज मत करिए सोग।।
*
बातें ही गपशप बनें, दें मन को आनंद।
जैसे कोई सुनाता, मद्धिम-मधुरिम छंद।।
*
बातें भाषण प्रबोधन, सबक पाठ वक्तव्य।
विगत-आज़ होता विषय, कभी विषय भवितव्य।।
*
केवल बात न काम ही, आता हरदम काम।
बात भले अनमोल हो, कह-सुन लो बेदाम।।
*
बिना बात का बतंगड़, पैदा करे विवाद।
बना सके जो समन्वय, वह करता संवाद।।
*
बात गुफ्तगू हो करे, मन-रंजन बिन मोल।
बात महाभारत बने, हो यदि उसमें झोल।।
*
सबक सिखाती बात या, देती है संदेश।
साखी सीख सबद सभी, एक भिन्न परिवेश।।
*
टाक लैक्चर स्पीच दे, बात करे एड्रैस।
कमुनिकेट कर घटा दें, बातें सारा स्ट्रैस।।
*
बात बात को मात दे, लेती है दिल जीत।
दिल की दूरी दूरकर, बात बढ़ाती प्रीत।।
१२.७.२०१८
***
गीत
*
नहा रहे हैं
बरसातों में
हरे-भरे बतियाते झाड़
अपनी जगह
हमेशा ठांड़े
झूम-झूम मस्ताते झाड़
*
सूर्य-बल्ब
जब होता रौशन
मेक'प करते बिना छिपे.
शाखाओं,
कलियों फूलों से
मिलते, नहीं लजाते झाड़
नहा रहे हैं
बरसातों में
हरे-भरे बतियाते झाड़
अपनी जगह
हमेशा ठांड़े
झूम-झूम मस्ताते झाड़
*
बऊ धरती
आँखें दिखलाये
बहिना हवा उड़ाये मजाक
पर्वत दद्दा
आँख झुकाये,
लता संग इतराते झाड़
नहा रहे हैं
बरसातों में
हरे-भरे बतियाते झाड़
अपनी जगह
हमेशा ठांड़े
झूम-झूम मस्ताते झाड़
*
कमसिन सपने
देख थिरकते
डेटिंग करें बिना हिचके
बिना गये
कर रहे आउटिंग
कभी नहीं पछताते
नहा रहे हैं
बरसातों में
हरे-भरे बतियाते झाड़
अपनी जगह
हमेशा ठांड़े
झूम-झूम मस्ताते झाड़
***
व्यंग्य-
हाय! हम न रूबी राय हुए
- संजीव वर्मा 'सलिल'
*
रात अचानक नींद खुल गयी, उठ भी नहीं सकता था। श्रीमती जी की निद्रा भंग होने की आशंका और फिर अगले दिन ठीक से सो न पाने का उलाहना कौन सुनता? यह भी कि देर रात उठकर तीर भी कौन सा मार लेता? सो 'करवटें बदलते रहे सारी' न सही आधी 'रात हम'... कसम किसकी? यह नहीं बता सकते.... 'श्रीमती जी की' कहा तो गुस्सा "क्यों असगुन कर रहे हो झूठ बोलकर" और किसी और का नाम लिया तो ज़लज़ला ही आ जायेगा सो "परदे में रहने दो पर्दा न उठाओ, पर्दा जो उठ गया तो" रूबी राय बन जाएगा।
चालीस साल इंजीनियरी करने, सामाजिक-साहित्यिक संस्थाओं में सक्रिय रहने और कलम घिसाई करने, ५ पुस्तकें छपाने और सहस्त्रों रचनाएँ करने के बाद बकौल श्रीमती जी "भाड़ झोंकने" के बाद भी दूरदर्शन पर अपने आपके निकट दर्शन कर पाने से वंचित रहा मैं, गत कई दिनों से छोटे पर्दे की एकछत्र साम्राज्ञी महामहिमामयी रूबी राय जी के कीर्तिमान के समक्ष नतमस्तक हो सोचने लगा 'क्यों न टॉपर बन गया?'
मैं ही नहीं, न जाने कितने और भी यही सोच रहे होंगे। जो समझदार हैं उन्होंने सोचा पूरा न सही, आधा ही सही कुछ तो हाथ आये। ऐसे समझदार जनसेवक दो खेमों में बँट गए। कुछ रूबी राय के विरोध में बोलकर-लिखकर सुर्ख़ियों में आ गए, शासन, प्रशासन, कॉलेज प्रबंधन और छात्रों को पानी पीकर कोसने, अरे! नहीं, नहीं तब तो भीषण गर्मी और पानी का अकाल था, इसलिए बिना पानी पिए ही सबको कोस-कोसकर अख़बारों में छपे और दिन - दो दिन की वाहवाही बटोरकर भुला दिए गए। कोसनेवालों के हाथ में दोष - दर्शन के अलावा कोई तर्क नहीं रहा, लोग उनसे मौखिक सहानुभूति जताकर धीरे से सरकने लगे चूँकि अपने गरेबां में झाँकते ही जान गए कि हमाम में सब नंगे हैं। मौका मिलने पर हाथ सेंकनेवाले भी कहाँ पीछे रहे? अपने चेहरे की झलक कैमरे में कैद होते ही सरक लिए। रूबी राय के कारण जो प्रथम आने की मनोकामना पूरी न कर सके थे, वे शुरू में खुश हुए किंतु खुलासे की आग में अपने भी हाथ जलते देख 'सबसे भली चुप्प' के नीति का अनुसरण करने लगे।बाकी रह गये वे जिन्हें मौक़ा ही नहीं मिला, ऐसे लोग मौके की तलाश में आगे आये किन्तु यह अहसास होते ही कि कल मौका देनेवाले उनसे दूर हो जायेंगे, पीठ दिखाकर भाग खड़े हुए।
कुछ अधिक समझदार जननायक बनने की तैयारी कर आरंभ में मौन रहकर हालात का जायज़ा लेते रहे और फिर धीरे से समर्थन में आ खड़े हुए और मौखिक संवेदना जताने लगे। इनके तर्क अधिक दमदार हैं। भारत में हर गलत को सही सिद्ध करने का सर्वाधिक प्रभावशाली शस्त्र मानवाधिकार है। आतंकी सौ निर्दोषों को मार दे तो कोई बात नहीं, सेना या पुलिस आतंकी को मारने की बात सोचे भी तो मानवाधिकार पर बिजली गिर जाती है। किसी अपराधी मानसिकता के नराधम ने किसी अबला के साथ कुकृत्य किया तो व्यवस्था दोष को लेकर हंगामा और जब दण्ड देने की बात सामने आये तो अपराधी के कमसिन होने, गरीब होने, अशिक्षित होने याने किसी न किसी बात का बतंगड़ कर अपराधी को नाममात्र का दण्ड दिलाकर या दण्ड-मुक्त कराने की दुहाई देकर अपनी पीठ आप ठोंकने का मौका तलाशना मानवाधिकारवादियों का प्रिय शगल है। कोइ रईसजादा इन्हें इस से भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनकी बात न्यायालय में टिकी या नहीं? उन्हें मतलब सिर्फ इस बात से है कि सुर्खियाँ बटोरीं, कतरने विदेश भेजीं और अपने एन. जी. ओ. के लिए डोनेशन बटोरकर अपने निजी ऐशो-आराम पर खर्च किया। किस्मत ने साथ दिया और दमदार नेता की कोई कमी पकड़ ली तो उसे उजागर न करने का सौदा कर 'पदम' पाने का जुगाड़ याने आम के आम गुठली के भी दाम। रूबी राय ऐसे मानवाधिकारवादियों (?) के लिए सुनहरा मौका है।
रूबी राय एक लॉटरी है जो खुल गयी है स्त्री विमर्शवादियों के नाम पर। लॉटरी भी ऐसी जिसका टिकिट ही नहीं खरीदना पड़ा। इनका तर्क यह है कि वह कमसिन है, अबला है, निर्दोष-नासमझ है, धोखे से फँसाई गयी है। स्त्री विमर्शवादी द्रौपदी, अहल्या, मंदोदरी, शूर्पणखा, शबरी और न जाने किस-किस के गड़े मुर्दे उखाड़कर सिद्ध कर देंगे कि इस देश में नारी का दमन और शोषण ही किया गया है, कभी मान, प्यार, लाड़ नहीं दिया गया। बहुत आसानी से भुला दिया जाएगा कि इसी देश में कहा गया 'काह न अबला कर सके?' कहकर नारी की सामर्थ्य को आलोचकों ने भी स्वीकारा है। इसी देश में 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता' कह कर नारी की वंदना की गयी। इसी देश में विद्या, धन और शक्ति की अधिष्ठात्री नारी ही मान्य है जिसकी उपासना कर नर खुद को धन्य मानता है। इनसे पूछ लिया जाए कि उन्हें लाड़ नहीं मिला तो जन्म के बाद सुरक्षित कैसे रहीं? उन्हें प्यार नहीं मिला तो वे अपने सुहाग पर नाज़ क्यों करती हैं और संतान कहाँ से आई? उन्हें सम्मान नहीं मिला तो घर में उनकी मर्जी के बिना पत्ता भी क्यों नहीं खड़कता? तो वे बगलें झाँकती नज़र आएँगी।
लोकतंत्र की विधायिका के अपरिहार्य अंग विपक्ष के लिए तो यह प्रसंग सोने का अंडा देनेवाली मुर्गी की तरह है।अपने सत्ताकाल में हुईं इस जैसी और इससे भी बड़ी गड़बड़ियों को भूलकर इस प्रसंग को लेकर जुलूस, नारेबाजी, सभाएँ, अखबारबाजी और खबरी चैनलों पर भाषणबाजी का यह सुनहरा मौका है। सत्ता पक्ष की आलोचना, सरकार को कटघरे में खड़ा करना, सत्ता के सच को झूठ और विपक्ष के झूठ को सच कहना, कुर्सी से दूर रहने तक अपना जन्मसिद्ध अधिकार माननेवाले, सत्ता हेतु समर्पित राजनैतिक लोगों के लिए रूबी-प्रसंग अलादीन का चिराग है, घिसते रहो कभी न कभी तो जिन्न निकलेगा ही। "मंज़िल मिले, मिले न मिले, और बात है / मंज़िल की जुस्तजू में मेरा (इनका) कारवां तो है।" इनका बस चले तो ये रूबी मैया की जय का जयकारा लगते हुए विधान सभा के गलियारे में व्रत-कथा भी करने लगें।
यह प्रसंग परिवार के व्यक्तिगत विरोधियों के लिए भी एक अवसर है किन्तु वे जुबानी चटखारे ले - लेकर परनिंदा रस का आनंद लेने से अधिक नहीं सकेंगे कि इससे अधिक की उनकी औकात ही नहीं है। कॉलेज के व्यवसायगत विरोधियों के लिए यह मौका है खुद को बढ़ाने का। इसलिए नहीं कि वे ऐसा फिर नहीं होने देना चाहते बल्कि इसलिए कि ऐसा चाहनेवाले अब बड़ी रकम देकर उनकी संस्था में प्रवेश लें और अगले कई वर्षों तक कुशलतापूर्वक ऐसे कारनामे करने का अवसर उन्हें मिले।
पराई आग में हाथ सेंकने की आदी खबरिया बिरादरी के छुटभैये इस घटना को नमक-मिर्च लगाकर इस आस में बखानते रहेंगे कि उनका कद बढ़ जाए लेकिन उनके आका उनसे कई कदम आगे हैं। वे छुटभैयों द्वारा जुटाए गए मसाले सनसनीखेज़ बनाकर सबसे पहले परोसने की नूरा कुश्ती कर टी. आर. पी. बढ़ाने में प्राण-प्राण से संलग्न होकर, कॉलेजों से विज्ञापन जुटाकर अपना उल्लू सीधा करेंगे। यही नहीं ऐसे मामलों से होनेवाली कमाई का अंदाज़ कर अपना कॉलेज आरम्भ करने में भी पीछे नहीं रहेंगे।इसलिए निकट भविष्य में ऐसे अनेक प्रकरण हर राज्य और विश्वविद्यालय में होने लगें तो 'किमाश्चर्यम?' अर्थात कोई आश्चर्य नहीं।
यहाँ तक तो फिर भी गनीमत है लेकिन बात यहीं नहीं रूकती, यह प्रसंग सत्ता पक्ष के लिए भी मौके को भुनाने की तरह है। जाँच के नाम पर एक जाँच आयोग गठित कर अपने चहेतों को नियुक्त कर मुख्य मंत्री जी विद्यार्थी वर्ग जो कल मतदाता बनेगा, के बीच अपनी स्वच्छ छवि बनायेँगे। जाँच आयोग सुरसा के मुँह की तरह अपना कार्यकाल और बजट बढ़ाता जाएगा और जब उसके घपले सामने आयेंगे तो एक साथ गवाहों की दुर्घटना या बीमारियों से मौतें होने लगेंगी। नेताओं को राजनीति की रोटियां सेंकने के नए अवसर मिलते रहेंगे।
इस घटना के बाद रूबी राय व्यक्ति नहीं प्रवृत्ति बन गयी है। हम सबमें कहीं न कहीं रूबी राय है। वह जब भी नज़र आये तो उसे उकसाने नहीं, दबाने की जरूरत है कि वह गलत तरीके या छोटे मार्ग से शीर्ष तक जाने की बात न सोचे।
रूबी राय को इस मुकाम पर पहुँचाने का श्रेय है उसके माता-पिता, कॉलेज प्रबंधक, उत्तर पुस्तिका जाँचकर्ता और नियति को भी है। जो हुआ वह सब होने के बाद भी यदि रूबी राय शीर्ष पर न आकर कुछ नीचे आतीं ८ वें-१० वें क्रमांक पर, तो उनकी चर्चा ही न होती। अभी भी उनके अलावा किस-किस ने किस प्रकार कितने अंक और कौन सा स्थान इसके पहले पाया या बाद में पाएगा यह कोई नहीं बता सकता।रूबी के जीवन में जटिलता और बदनामी का उसे सामना करना ही होगा, उसके परिजन उसे सहारा दें और इतना सबल बनायें कि वह परिश्रम कर उत्तम परिणाम लाये और जिन में कुछ बन सके।
लाख टके का सवाल यह है कि क्या इस सबके बाद भी रूबी राय, उनके स्वजन, कॉलेज प्रबंधन या अन्य छात्र ऐसा करने से तौबा करेंगे? अगर नहीं तो इसका यही अर्थ है कि मिल रही सजा कम है। हमारे समाज की यही विडंबना है कि सही को सराहनेवाले नहीं मिलते पर गलत के प्रति सहानुभूति जतानेवाले रेडीमेड होते हैं। इसे संयोग कहें या दुर्योग सच यह है कि शिक्षा के नाम पर अंकों और उपाधियों का फर्जीवाड़ा सड़ गए नासूर की तरह बजबजा रहा है। दो ही रास्ते हैं दोषियों को कड़ा दण्ड या रहमदिली के साथ और बढ़ने का अवसर देना।पौ फटती देख मन मसोस कर उठ रहे हैं कि हाय! हम क्यों न हुए रूबी राय ? हो पाते तो दूरदर्शन और छाने के साथ हमारे हमदर्दों की भी बड़ी संख्या होती।
१२.७.२०१६
***
ग़ज़लिका :
मन में यही...
*
मन में यही मलाल है.
आदम हुआ दलाल है..
लेन-देन ही सभ्यता
ऊँच-नीच जंजाल है
फतवा औ' उपदेश भी
निहित स्वार्थ की चाल है..
फर्ज़ भुला हक माँगता
पढ़ा-लिखा कंगाल है..
राजनीति के वाद्य पर
गाना बिन सुर-ताल है.
बहा पसीना जो मिले
रोटी वही हलाल है..
दिल से दिल क्यों मिल रहे?
सोच मूढ़ बेहाल है..
'सलिल' न भय से मौन है.
सिर्फ तुम्हारा ख्याल है..
१२-७-२०१०
*

शनिवार, 11 जुलाई 2026

जुलाई ११, गीता, दोहा, भाषा, लघुकथा, बरसात, षट्पदिक कृष्ण-कथा, गीतिका छंद, भोजपुरी हाइकु

 सलिल सृजन जुलाई ११

*
दोहा सलिला . घट-घट में क्या घट रहा, उसकी मत कर फ़िक्र। दिखे बढ़ा लेकिन घटा, जो उसका हो जिक्र।। . पनघट पर पर जा रहे, औघट बिसरा पैर। रहजन हैं हर राह में, व्यर्थ न करना सैर।। . चढ़ा चढ़ावा या नहीं, नहीं देखते राम। भाव भक्ति ही प्रिय उन्हें, जब हो वह निष्काम।। . कुछ न माँगिए राम से, दाता देते आप। कुछ न दीजिए राम को, सकें सभी में व्याप।। . मायापति माया रचें, सब कुछ जान अजान। माया मालिक तू नहीं, फिर क्यों करता दान।। . अधिक राम से राम को, प्यारा अपना दास। दीनबंधु वे दीन का, कर न कभी उपहास।। . रोगी निर्धन वृद्ध में, बसे राम को देख। चढ़ा चढ़ावा मौन रह, मत कर नाहक लेख।।
एक सोरठा
हम माया का दान, मायापति को दे रहे। समझ रहे मतिमान, खुद को पर हैं नासमझ।।
११.७.२०२६ ०००
गीता
गीता जिसके उर बसे वह होता है धन्य
काम करें निष्काम हो, जीवन जिए अनन्य
.
गीता का मंथन करें, पल में छूटे मोह
करे नहीं परमात्म से, आत्म निमिष भर द्रोह
.
गीता हो मीता अगर भूल न सकते राह
कृष्ण कृपा के हेतु मन, कर गीता की चाह
.
गीता का कर अनुसरण, सच से मन मत भाग
वर विराग अनुराग का, कर पगले परित्याग
११.७.२०२५
०0०
सॉनेट
सुन
*
नदी नहाते हुए किसी के मंत्र तो सुनो,
डुबकी मारो, पैर न फिसले, सम्हल हो खड़े,
लहरों की कलकल सुन मन में नाद तो गुनो,
निकलो औरों को अवसर दो, व्यर्थ हो अड़े।
मंदिर बजते शंख-घंटियाँ क्या कहती हैं?
बाँग दे रहा मुर्गा, मस्जिद से अजान सुन,
भजन-सबद, साखी न कभी भी चुप रहती हैं,
तू गा सबके साथ; समस्या का हल भी बुन।
उस पलाश को देख वीतरागी चुप दहता,
बरगद पत्ते झरने देता नहीं रोकता,
तू क्यों अप्रिय याद को नाहक ही है तहता,
क्यों न भाड़ में नकारात्मक याद झोंकता?
रिधि-सिधि निधि-विधि बिसरा दे; मत नाहक सिर धुन।
बैठ पालथी मार; धुकधुकी चुप रहकर सुन।।
११-७-२०२३
***
दोहा सलिला
चित्र गुप्त जिसका रहा, भाव वही साकार
भाषा करती लोक में, रस लय का व्यापार
*
अक्षर अजर अमर रहे, लघुतम ध्वनि लें जान
मिलकर सार्थक रूप धर, बनें शब्द प्रतिमान
*
शब्द-भेद बन व्याकरण, करता भाषा शुद्ध
पिंगल छांदस काव्य रच, कहता पढ़ें प्रबुद्घ
*
भाषा जन्मे लोक में, गहता प्रकृति स्वतंत्र
सधुक्कड़ी मनमौज है, सरल-कठिनतम तंत्र
*
लोक गढ़े नव शब्द खुद, तत्सम-तद्भव आप
मिल समृद्ध भाषा करें, जन जन जाते व्याप
*
कर्ता करता कार्य कर, क्रिया कर्म कर मौन
कहे खासियत विशेषण, कारक रहे न मौन
*
सर्वनाम संग्या हटा, हो जाता आसीन
वंशबेल दे ज्यों पिता, सुत को किंतु न दीन
*
कह विशेषता विशेषण, गुण चर्चा कर संत
क्रिया विशेषण क्रिया के, गुण कह रहा अनंत
*
ताना-बाना बुन रहा, अव्यय निकले अर्थ
अर्थ बिना अभिव्यक्ति ही, हो जाती है व्यर्थ
*
चित्र भावमुद्रा करें, बिना कहे पर बात
मौन लकीरें भी करें, बात समझिए तात
*
भाषा जुड़ विग्यान से, हो जाती है गूढ़
शब्द-अर्थ की श्लिष्टता, समझ न पाते मूढ़
*
व्यापकता दे शब्द को, लोक गहे साहित्य
संस्कार जो समझ ले, लेखक हो आदित्य
*
तारो! तारोगे किसे, तर न सके खुद आप.
शिव जपते हैं उमा को, उमा करेन शिव जाप.
११-७-२०२०
***
लघुकथा
मोहनभोग
*
'क्षमा करना प्रभु! आज भोग नहीं लगा सका.' साथ में बाँके बिहारी के दर्शन कर रहे सज्जन ने प्रणाम करते हुए कहा.
'अरे! आपने तो मेरे साथ ही मिष्ठान्न भण्डार से नैवेद्य हेतु पेड़े लिए था, कहाँ गए?' मैंने उन्हें प्रसाद देते हुए पूछा.
पेड़े लेकर मंदिर आ रहा था कि देखा कुछ लोग एक बच्चे की पिटाई कर रहे हैं और वह बिलख रहा है. मुझसे रहा नहीं गया, बच्चे को छुडाकर कारण पूछ तो हलवाई ने बताया कि वह होटल से डबल रोटी-बिस्कुट चुराकर ले जा रहा था. बच्चे ने बताया कि उसका पिता नहीं है, माँ बुखार से पीड़ित होने के कारण काम पर नहीं जा रही, घर में खाने को कुछ नहीं है, छोटी बहिन का रोना नहीं देखा गया तो वह होटल में चार घंटे से काम कर रहा है. सेठ से कुछ खाने का सामान लेकर घर दे आने को पूछा तो वह गाली देने लगा कि रात को होटल बंद होने के बाद ही देगा. बार-बार भूखी बहिन और माँ के चेहरे याद आ रहे थे, रात तक कैसे रहेंगी? यह सोचकर साथ काम करनेवाले को बताकर डबलरोटी और बिस्किट ले जा रहा था कि घर दे आऊँ फिर रात तक काम करूंगा और जो पैसे मिलेंगे उससे दाम चुका दूंगा.
दुसरे लड़के ने उसकी बात की तस्दीक की लेकिन हलवाई उसे चोर ठहराता रहा. जब मैंने पुलिस बुलाने की बात की तब वह ठंडा पड़ा.
बच्चे को डबलरोटी, दूध, बिस्किट और प्रसाद की मिठाई देकर उसके घर भेजा. आरती का समय हो गया इसलिए खाली हाथ आना पड़ा और प्रभु को नहीं लगा सका भोग' उनके स्वर में पछतावा था.
'ऐसा क्यों सोचते हैं? हम तो मूर्ति ही पूजते रह गए और आपने तो साक्षात बाल कृष्ण को लगाया है मोहन भोग. आप धन्य है.' मैंने उन्हें नमन करते हुए कहा.
***
एक दोहा
तारो तरोगे किसे, तर न सके खुद आप
शिव जपते हैं उमा को, उमा करें शिव-जाप
***
दोहा सलिला:
मेघ की बात
*
उमड़-घुमड़ आ-जा रहे, मेघ न कर बरसात।
हाथ जोड़ सब माँगते, पानी की सौगात।।
*
मेघ पूछते गगन से, कहाँ नदी-तालाब।
वन-पर्वत दिखते नहीं, बरसूँ कहाँ जनाब।।
*
भूमि भवन से पट गई, नाले रहे न शेष।
करूँ कहाँ बरसात मैं, कब्जे हुए अशेष।।
*
लगा दिए टाइल अगिन, भू है तृषित अधीर।
समझ नहीं क्यों पा रहे, तुम माटी की पीर।।
*
स्वागत तुम करते नहीं, साध रहे हो स्वार्थ।
हरी चदरिया उढ़ाओ, भू पर हो परमार्थ।।
*
वर्षा मंगल भूलकर, ठूँस कान में यंत्र।
खोज रहे मन मुताबिक, बारिश का तुम मंत्र।।
*
जल प्रवाह के मार्ग सब, लील गया इंसान।
करूँ कहाँ बरसात कब, खोज रहा हूँ स्थान।।
*
रिमझिम गिरे फुहार तो, मच जाती है कीच।
भीग मजा लेते नहीं, प्रिय को भुज भर भींच।।
*
कजरी तुम गाते नहीं, भूले आल्हा छंद।
नेह न बरसे नैन से, प्यारा है छल-छंद।।
*
घास-दूब बाकी नहीं, बीरबहूटी लुप्त।
रौंद रहे हो प्रकृति को, हुई चेतना सुप्त।।
*
हवा सुनाती निरंतर, वसुधा का संदेश।
विरह-वेदना हर निठुर, तब जाना परदेश।।
*
प्रणय-निमंत्रण पा करूँ, जब-जब मैं बरसात।
जल-प्लावन से त्राहि हो, लगता है आघात।।
*
बरसूँ तो संत्रास है, डूब रहे हैं लोग।
ना बरसूँ तो प्यास से, जीवनांत का सोग।।
*
मनमानी आदम करे, दे कुदरत को दोष।
कैसे दूँ बरसात कर, मैं अमृत का कोष।।
*
नग्न नारियों से नहीं, हल चलवाना राह।
मेंढक पूजन से नहीं, पूरी होगी चाह।।
*
इंद्र-पूजना व्यर्थ है, चल मौसम के साथ।
हरा-भरा पर्यावरण, रखना तेरा हाथ।।
*
खोद तलैया-ताल तू, भर पानी अनमोल।
बाँध अनगिनत बाँध ले, पानी रोक न तोल।।
*
मत कर धरा सपाट तू, पौध लगा कर वृक्ष।
वन प्रांतर हों दस गुना, तभी फुलाना वक्ष।।
*
जूझ चुनौती से मनोज, श्रम को मिले न मात।
स्वागत कर आगत हुई, ले जीवन बरसात
११.७.२०१८
***
नवगीत
समारोह है
*
समारोह है
सभागार में।
*
ख़ास-ख़ास आसंदी पर हैं,
खासुलखास मंच पर बैठे।
आयोजक-संचालक गर्वित-
ज्यों कौओं में बगुले ऐंठे।
करतल ध्वनि,
चित्रों-खबरों में
रूचि सबकी है
निज प्रचार में।
*
कुशल-निपुण अभियंता आए,
छाती ताने, शीश उठाए।
गुणवत्ता बिन कार्य हो रहे,
इन्हें न मतलब, आँख चुराए।
नीति-दिशा क्या सरकारों की?
क्या हो?, बात न
है विचार में।
*
मस्ती-मौज इष्ट है यारों,
चुनौतियों से भागो प्यारों।
पाया-भोगो, हँसो-हँसाओ-
वंचित को बिसराओ, हारो।
जो होता है, वह होने दो।
तनिक न रूचि
रखना सुधार में।
११-७-२०१७
***
लघुकथा
अकेले
*
'बिचारी को अकेले ही सारी जिंदगी गुजारनी पड़ी।'
'हाँ री! बेचारी का दुर्भाग्य कि उसके पति ने भी साथ नहीं दिया।'
'ईश्वर ऐसा पति किसी को न दे।'
दिवंगता के अन्तिम दर्शन कर उनके सहयोगी अपनी भावनाएँ व्यक्त कर रहे थे।
'क्यों क्या आप उनके साथ नहीं थीं? हर दिन आप सब सामाजिक गतिविधियाँ करती थीं। जबसे उनहोंने बिस्तर पकड़ा, आप लोगों ने मुड़कर नहीं देखा।
उन्होंने स्वेच्छा से पारिवारिक जीवन पर सामाजिक कार्यक्रमों को वरीयता दी। पिता जी असहमत होते हुए भी कभी बाधक नहीं हुए, उनकी जिम्मेदारी पिताजी ने निभायी। हम बच्चों को पिता के अनुशासन के साथ-साथ माँ की ममता भी दी। तभी माँ हमारी ओर से निश्चिन्त थीं। पिताजी बिना बताये माँ की हर गतिविधि में सहयोग करते रहेऔर आप लोग बिना सत्य जानें उनकी निंदा कर रही हैं।' बेटे ने उग्र स्वर में कहा।
'शांत रहो भैया! ये महिला विमर्श के नाम पर राजनैतिक रोटियाँ सेंकने वाले प्यार, समर्पण और बलिदान क्या जानें? रोज कसमें खाते थे अंतिम दम तक साथ रहेंगे, संघर्ष करेंगे लेकिन जैसे ही माँ से आर्थिक मदद मिलना बंद हुई, उन्हें भुला दिया। '
'इन्हें क्या पता कि अलग होने के बाद भी पापा के पर्स में हमेश माँ का चित्र रहा और माँ के बटुए में पापा का। अपनी गलतियों के लिए माँ लज्जित न हों इसलिए पिता जी खुद नहीं आये पर माँ की बीमारी की खबर मिलते ही हमें भेजा कि दवा-इलाज में कोइ कसर ना रहे।' बेटी ने सहयोगियों को बाहर ले जाते हुए कहा 'माँ-पिताजी पल-पल एक दूसरे के साथ थे और रहेंगे। अब गलती से भी मत कहियेगा कि माँ ने जिंदगी गुजारी अकेले।
२-५-२०१७
***
गीत
धरती की छाती पै होरा
रओ रे सूरज भून।
*
दरक रे मैदान-खेत सब
मुरझा रए खलिहान।
माँगे सीतल पेय भिखारी
ले न रुपया दान।
संझा ने अधरों पे बहिना
लगा रखो है खून।
धरती की छाती पै होरा
रओ रे सूरज भून।
*
धोंय, निचोरें सूखें कपरा
पहने गीले होंय।
चलत-चलत कूलर हीटर भओ
पंखें चल-थक रोंय।
आँख मिचौरी खेरे बिजुरी
मलमल लग रओ ऊन।
धरती की छाती पै होरा
रओ रे सूरज भून।
*
गरमा गरम नें कोऊ चाहे
रोएँ चूल्हा-भट्टी।
सब खों लगे तरावट नीकी
पनहा, अमिया खट्टी।
धारें झरें नई नैनन सें
बहें बदन सें दून।
धरती की छाती पै होरा
रओ रे सूरज भून।
*
लिखो तजुरबा, पढ़ तरबूजा
चक्कर खांय दिमाग।
मृगनैनी खों लू खें झोंकें
लगे लगा रए आग।
अब नें सरक पे घूमें रसिया
चौक परे रे! सून।
धरती की छाती पै होरा
रओ रे सूरज भून।
*
अंधड़ रेत-बगूले घेरे
लगी सहर में आग।
कितै गए पनघट अमराई
कोयल गाए नें राग।
आँखों मिर्ची झौंके मौसम
लगा र ओ रे चून।
धरती की छाती पै होरा
रओ रे सूरज भून।
*
***
दोहा सलिला
*
पाठक मैं आनंद का, गले मिले आनंद
बाहों में आनंद हो, श्वास-श्वास मकरंद
*
आनंदित आनंद हो, बाँटे नित आनंद
हाथ पसारे है 'सलिल', सुख दो आनंदकंद!
*
जब गुड्डो दादी बने, अनुशासन भरपूर
जब दादी गुड्डो बने, हो मस्ती में चूर
*
जिया लगा जीवन जिया, रजिया है हर श्वास
भजिया-कोफी ने दिया, बारिश में उल्लास
*
पता लापता जब हुआ, उड़ी पताका खूब
पता न पाया तो पता, पता कर रहा डूब
११-७-२०१७
***
षट्पदिक कृष्ण-कथा
देवकी-वसुदेव सुत कारा-प्रगट, गोकुल गया
नंद-जसुदा लाल, माखन चोर, गिरिधर बन गया
रास-लीला, वेणु-वादन, कंस-वध, जा द्वारिका
रुक्मिणी हर, द्रौपदी का बन्धु-रक्षक बन गया
बिन लड़े, रण जीतने हित ज्ञान गीता का दिया
व्याध-शर का वार सह, प्रस्थान धरती से किया
(महाभागवतजातीय गीतिका छंद, यति ३-१०-१७-२४, पदांत लघु गुरु)
११-७-२०१६
***
गीत
*
सत्य
अपने निकट पायें
कलम
केवल तब उठायें
*
क्या लिखना है?
क्यों लिखना है?
कैसे लिखना है
यह सोचें
नाहक केश न
सर के नोचें
नवसंवेदन
जब गह पायें
सत्य
अपने निकट पायें
कलम
केवल तब उठायें
*
लिखना कविता
होना सविता
बहती सरिता
मिटा पिपासा
आगे बढ़ना
बढ़े हुलासा
दीप
सम श्वासें जलायें
सत्य
अपने निकट पायें
कलम
केवल तब उठायें
*
बहा पसीना
सीखें जीना
निज दुःख पीकर
खुशियाँ बाँटें
मनमानी को
रोकें-डाँटें
स्वार्थ
प्रथम अपना तज गायें
सत्य
अपने निकट पायें
कलम
केवल तब उठायें
११-७-२०१५
***
गले मिले दोहा यमक
*
चंद चंद तारों सहित, करे मौन गुणगान
रजनी के सौंदर्य का, जब तक हो न विहान
***
मुक्तक:
आसमान पर भा/व आम जनता/ का जीवन कठिन हो रहा
त्राहिमाम सब ओ/र सँभल शासन, / जनता का धैर्य खो रहा
पूंजीपतियों! धन / लिप्सा तज भा/व् घटा जन को राहत दो
पेट भर सके मे/हनतकश भी, र/हे न भूखा, स्वप्न बो रहा
११-७-२०१४
***
भोजपुरी हाइकु: संजीव वर्मा 'सलिल'
*
पावन भूमि / भारत देसवा के / प्रेरणा-स्रोत.
भुला दिहिल / बटोहिया गीत के / हम कृतघ्न.
देश-उत्थान? / आपन अवदान? / खुद से पूछ.
साँच साबित/ गुलामी के जंजीर / अंगरेजी के.
सुख के धूप / सँग-सँग मिलल / दुःख के छाँव.
नेह अबीर / जे के मस्तक पर / वही अमीर.
अँखिया खोली / हो गइल अंजोर / माथे बिंदिया.
भोर चिरैया / कानन में मिसरी / घोल गइल.
काहे उदास? / हिम्मत मत हार / करल प्रयास.
११-७-२०१०
***
एक दोहा
जब भी 'मैं' की छूटती, 'हम' की हो अनुभूति.
तब ही 'उस' से मिलन हो, सबकी यही प्रतीति..
७-७-२०१०