कुल पेज दृश्य

शुक्रवार, 27 मार्च 2026

पुरोवाक्, दोहा नैवैद्यम्, मनीषा सहाय


पुरोवाक्
''दोहा नैवैद्यम्'' - सम सामयिक दोहों का लोकोपयोगी संकलन 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल '

            उपनिषदों के अनुसार श्रेष्ठ की उत्पत्ति सृष्टि की उत्पत्ति अनाहद नाद से हुई है। विज्ञान का महाविस्फोट सिद्धांत (बिग बैंग थ्योरी) सृष्टि की उत्पत्ति एक बहुत बड़े विस्फोट से हुई मानती है। नाद से उत्पन्न हुई सृष्टि पर सर्वत्र ध्वनि होना स्वाभाविक है। इसीलिए कहा गया छंद वह है जो सर्वत्र छा जाता है। छंद को वेदों का पाद या चरण भी कहा गया है। इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि चरण का महत्व शीश से कम है, छंद को वेद का चरण कहने का आशय यह है कि जिस तरह मंदिर में देवता से साक्षात्कार करने के लिए चरणों की सहायता से एक-एक कदम रख कर जाया जाता है, वैसे ही वेदों में अंतर्निहित ज्ञान की प्राप्ति के लिए छंद का आश्रय लेना अत्यावश्यक है। वेदों की ऋचाएँ छंदों में ही लिखी गई हैं और छंद ज्ञान के बिना उन्हें समझना संभव नहीं है।

            आदि मानव ने प्रकृति के संसर्ग में ज्ञान प्राप्त किया। पवन प्रवाह की सनसन, जल प्रवाह की कलकल, मेघ का गरजना, बिजली का तड़कना, सिंह की दहाड़, सर्प की फुंफकार इत्यादि ध्वनियाँ आदि मानव ने अपने स्मृति कोष में संचित कीं और उनका उच्चारण कर अपने अन्य समूहों को सूचित कर सतर्क करने का प्रयास किया। यह उसे प्रकार था जैसे आज भी बंदर आदि जीव शेर को देखते ही हूप की ध्वनि कर अन्य पशु-पक्षियों को सूचित कर देते हैं ताकि वे अपना बचाव कर सकें। ध्वनियों में अंतर्निहित आरोहों-अवरोहों की पुनरावृत्ति से छंदों की रचना हुई।भुजंग प्रयात छंद सर्प की फुंफकार पर ही आधारित है। कुंडलिया छंद का कुंडली मारकर बैठे हुए सर्प से सादृष्य सहज दृष्टव्य है। स्पष्ट है कि छंद का जन्म आउए विकास प्रकृति और ध्वनि के संगम से ही हुआ है। आदि मानव ने प्रकृति में व्याप्त ध्वनियों का अनुसरण कर बोलना सीखा। एकाधिक ध्वनियों के संयुक्त उच्चारण से लय खंड बने जिनमें गति-यति भी थी। कई ध्वनियों अर्थात उच्चारों को एक साथ बोलने से क्रमश: शब्द और वाक्य अस्तित्व में आए। मातें शिशुओं को बहलाने के लिए पहले निरर्थक और फिर सार्थक ध्वनियों का गायन कर, छंद रचने लगीं। रात्रि के सन्नाटे और अँधेरे में एकाकीपन को दूर करने के लिए गुनगुनाने-गाने का चलन हुआ।

            किसी आदि मानव ने नदी के किनारे खेल-खेल में रेत पर कुछ आकृति बनाई, किसी अन्य ने किसी पौधे की टहनी तोड़कर उससे बहते द्रव को चट्टानों पर लगाया द्रव सूखने पर कुछ आकृति दिखी। आस-पास घट रही घटनाओं के शैल चित्र इसी तरह बनाए गए। क्रमश: ध्वनियों (उच्चारों) के लिए संकेत लिखे गए और तब लिपि ने जन्म लिया। स्पष्ट है कि छंद का अस्तित्व लेखन के पहले भी था। इस काल में जब तक अक्षर (वर्ण) लिखा ही नहीं गया था तो वर्ण अथवा मात्रा की गणना कैसे हो सकती थी? अतः यह समझ लिया जाना चाहिए कि छंद मूलतः ध्वनि (उच्चार) पर आधारित अर्थात वाचिक होता है। मनुष्य ने लिपि का आविष्कार किया लेकिन अन्य जीव-जंतु ध्वनि के आधार पर ही अब तक संवाद करते हैं। वाक् को लिपि का विकास होने के बाद लिखा जाने लगा और तब उसके वर्ण और मात्रा की गणना क्रमशः प्रारंभ हुई। अतः, यह अवधारणा की छंद के दो प्रकार वार्निक और मात्रिक हैं, तथ्यात्मक रूप से गलत है। छंद मूलतः वाचिक होता है जिसके दो अंग वर्ण और मात्रा हैं।

            दोहा हिंदी का सर्वकालिक सर्वाधिक लोकप्रिय छंद है। सैकड़ो वर्षों से अपभ्रंश, पाली, प्राकृत, अंगिका, बज़्जि,का संस्कृत इत्यादि भाषाओं में दोहा लिखा जाता रहा। दोहे का उद्भव लोक में हुआ, खेतों में, खलिहानों में पनघटों में, दोहे का प्रयोग होता रहा। कबीर, मीरा, रैदास आदि अनेक संत कवियों ने जो कि निरक्षर थे, दोहे का सृजन किया। यह दोहे लय साधते हुए, उच्चार के आधार पर ही लिकहे गए थे। तुलसी जैसे संत कवियों ने सुशिक्षित होते हुए भी प्रभु के प्रेम में मग्न होकर लयात्मक रूप से गुनगुनाते हुए काव्य रचा। आज के नौसिखिया रचनाकार जब इन कालजयी कवियों के कालजयी साहित्य को वर्ण और मात्रा के आधार पर दोषपूर्ण बताते हैं तो उनकी तथाकथित बुद्धिमत्ता पर तरस आता है। संवत १६७७ में अपभ्रंश में रचित 'ढोला-मारू दा दूहा' में सरस्वती वंदना दोहा में ही लिखी गई-

सकल सुरासुर सामिनी, सुण माता सरसत्ति।
विनय करूँ इ वीणवुं, मुझ तउ अविरल मत्ति।।

            दोहा छंद में दो कि प्रधानता पर दोहा के विविध नाम दुषअह, दूहा, दोहड़ा, दोग्कध, दोपदी, द्विपथक, दोहक आदि विविध देश-कालों में प्रचलित हुए। दोहा में पंक्ति संख्या दो, प्रत्येक पंक्ति में विषम चरण दो, सम चरण दो, विषम चरण के आरंभ में समान उच्चारक काल दो,सम चरण के अंत में उच्चार काल २ सहज ही देखे जा सकते हैं। दोहा भारत कि हर भाषा-बोली में कहा गया छंद है।

            हिंदी की सक्रिय, सजग, प्रतिभावान कवियत्री मनीषा सहाय 'सुमन' ने ''दोहा नैवेद्यम्'' नाम से अपना दोहा संग्रह तैयार किया है, यह अत्यंत प्रसन्नता और हर्ष का विषय है। मनीषा प्रतिभावान रचनाकार हैं। उन्होंने ६५ अध्यायों में विविध विषयों पर दोहे संग्रहित किए हैं जिनमें भारत, श्री राम, गाँधी विचार, हिंदी, संविधान, ग्रंथों और शहरों पर आधारित दोहे विशेष हैं। मनीषा को मानवीय व्यवहार, पर्यावरण सुधार, पर्व और त्योहार, अलंकार, वानस्पतिक संसार, अंतर्जालिक नवाचार आदि विषय प्रिय हैं। वे दोहों का सृजन करते समय भाषिक सरलता, सुबोधता, सहजता और लय-बद्धता के तत्वों को साध पाती हैं। देश का गौरव उन्हें सृजन के लिए प्रेरित करता है-

गौरव भारत का बढ़े, सजे देश का भाल।
सदा सतत आगे बढ़े, रहें सभी खुशहाल।।

            'सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामय' के सनातन आदर्श को दोहे में मनीषा ने व्यक्त किया है। मनीषा कलम की शक्ति को पहचानती हैं। वह लिखती हैं-

कलम बड़ी तलवार से, करती गहरे वार।
सोच-समझकर यह चले, फिर बदले संसार।।

            कलम से संसार बदलने का कार्य सत्साहित्य के माध्यम से ही संभव होता है। राष्ट्रीय ध्वज हमारी गर्व का प्रतीक है। मनीषा लिखती हैं-

हाथ तिरंगा थाम कर, चलते सीना तान।
डर चिंता से दूर हो, मंजिल हो आसान।।

            मानवीय जीवन में हर्ष, हुलास, उल्लास, श्रृंगार का अपना महत्व है। हमारे पर्व और त्योहार इन्हीं भावनाओं को व्यक्त करते हैं। मनीषा बिहार की पुत्री हैं। बिहार के सबसे बड़े पर्व छठ को भूल नहीं सकतीं-

छट की महिमा है बड़ी, पूज जग संसार।
सूर्य देव संसार के, एक प्रबल आधार।।

            बिहार में दिनकर पूजन की परंपरा तो है ही, दिनकर बिहार के एक बहुत बड़े राष्ट्रीय कवि भी हुए हैं। हिंदी भाषा के प्रति मनीषा का प्रेम सराहनीय है-

हिंदी भाषा सरल हो, विपुल शब्द भंडार।
भारत को यह जोड़ती, करती सबसे प्यार।।

            वर्तमान में तो हिंदी भारत ही नहीं विश्व के विभिन्न भागों में बोली जा रही है और उन्हें भी जोड़ रही है। भारत का संविधान विश्व का सबसे बड़ा और सर्वोपायोगी संविधान है। यह एक विडंबना है कि जिस संविधान को ३८९ सदस्यी, ८ समितियों (संचालन समिति अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद, प्रक्रिया नियम समिति डॉ. राजेंद्र प्रसाद, संघ शक्ति समिति अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू, संघीय संविधान समिति अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू, राज्य-समझौता समिति अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू, प्रांतीय संविधान समिति अध्यक्ष सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलिक अधिकार व अल्प संखयक सलाहकार समिति अध्यक्ष सरदार वल्लभभाई पटेल तथा प्रारूप समिति अध्यक्ष डॉ. बी.आर. अंबेडकर, संपूर्ण संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद) उसके निर्माण का श्रेय केवल एक समिति अध्यक्ष को दिया जा रहा है। इस विसंगति को मनीषा ने एक दोहे में व्यक्त किया है-

संविधान अध्यक्ष थे, श्री राजेंद्र प्रसाद।
जनक हुए अंबेडकर यह कैसा अपवाद।।

            दोहा ४८ उच्चारों (२ x २४) का छंद है जिसकी हर पंक्ति में १३ + ११ उच्चार होते हैं। हर चरण में १-१ लघु उच्चार अनिवार्य हैं, शेष ४४ उच्चारों के आधार पर दोहे में लघु-गुरु उच्चार संख्या के आधार पर २३ निम्न प्रकार बताए गए हैं- भ्रमर, सुभ्रमर, शरभ, श्येन, मण्डूक, मर्कट, करभ, नर, हंस, गयंद, पयोधर, बल, पान, त्रिकल, कच्छप, मच्छ, शार्दूल, अहिवर, व्याल, विडाल, उदर, श्वान तथा सर्प।

            दोहा के सम (दूसरे तथा चौथे) चरणों में गुरु-लघु उच्चार होना अनिवार्य है। दोहे के विषम (पहले-तीसरे) चरणों में, केवल पहले चरण में एवं केवल तीसरे चरण के अंत में गुरु-लघु उच्चारण का प्रयोग कर ३ प्रकार के दोहे लिखे जा सकते हैं।

            हिन्दी में मान्य ११ रसों (श्रृंगार रस, हास्य रस, करुण रस, वीर रस, रौद्र रस, भयानक रस, वीभत्स रस, अद्भुत रस, शान्त रस, वात्सल्य रस और भक्ति रस) के आधार पर ११ प्रकार के दोहे लिखे जाते रहे हैं।

            विश्व वाणी हिन्दी संस्थान अभियान जबलपुर तथा समन्वय प्रकाशन जबलपुर के तत्वावधान में उक्त सबही प्रकार के दोहों को समाविष्ट करते हुए वर्ष २०१८ में दोहा दोहा नर्मदा , दोहा सलिल निर्मला तथा दोहा दिव्य दिनेश ३ साझा संकलन प्रकाशित किए गए हैं। इनमें से प्रत्येक में ११-११ दोहाकारों के १००-१०० दोहों के साथ कुल मिलकर ३८०० दोहे, दोहों का इतिहास, गत २००० वर्षों के प्रतिनिधि दोहे, विविध भाषाओं-बोलिओं व रसों में कहे गए दोहे प्रकाशित हैं।

            मनीषा ने उक्त सभी प्रकारों के दोहे कहे हैं। इससे उनकी सृजन सामर्थ्य का परिचय मिलता है। मनीषा अपने साहित्य को उपनाम सुमन के अनुसार सु-मन से यह दोहा संकलन इष्टदेव श्री चित्रगुप्त जी को समर्पित कर रही हैं, मुझे विश्वास है उनका यह संकलन पाठकों को पसंद आएगा और अनेक कृतियाँ रच चुकी मनीषा की रचना यात्रा निरंतर जारी रहेगी। अनंत शुभकामनाएँ। 

००० 

संपर्क- विश्ववाणी हिन्दी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१ 
ईमेल- salil.sanjiv@gmail.com, वाट्सऐप ९४२५१८३२४४  

मार्च २७, ग़ज़लिका, सरस्वती, सॉनेट, गणगौर, दोहा गीत, मधुमालती छंद, मनोरम छंद,

सलिल सृजन मार्च २७
विश्व नाट्य शाला दिवस
कुंडलियाँ ़़ राम न लेना भूलकर, कलियुग में अवतार। ट्रंप पुतिन शी पिंग से, पा न सकोगे पार।। पा न सकोगे पार, पाक आतंकवाद से। साथ दलित-जनजाति, न देंगे निहित स्वार्थ से।। होंगे व्यर्थ विवाद, है यह दक्षिण वह वाम। बिना भाजपा जीत, मिल नहीं सकेगी राम।। . संसद करे विचार, रानी को कैसे दिया दशरथ ने वरदान, बिल किसने पारित किया।। अविश्वास प्रस्ताव, गुरु वशिष्ठ ले आएँगे। बहुमत हेतु सुमंत्र, निज दावा बतलाएँगे।। सुन विपक्ष का शोर, सत्र अधूरा हो विपद। जा न सकें वन राम, करे प्रतिबंधित संसद। २७.३.२०२६
०००
ग़ज़लिका
*
नाट्यशाला जग सकल जग
करो अभिनय कहे रग-रग
.
पटकथा लिख दी गई है
ठगे जाओ या बचो ठग
.
धूल बैठे शीश पर जा
रौंदता है गर अधिक पग
.
रुक न थक या हारकर मन
मिले मंजिल तज नहीं मग
.
राह लंबी हो भले ही
नाप लेते उठे लघु डग
.
काट पर कहते उड़ो रे!
काट बंधन उड़ गया खग
.
'सलिल' शत चोट पल-पल
जो वही पत्थर बने नग
०००
प्रार्थना
शारद! सलिल अंजली अर्पित स्वीकारो हे मैया!
मूढ़ दीन मैं, कृपा करो माँ! पकड़ो मेरी बैंया।।
काम-क्रोध मद-मोह दंभ भव बाधाएँ हैं घेरे।
पग पग पर हैं शूल अनगिनत जननी! ले लो कैंया।
मर्म धर्म का समझाओ माँ! शंका सभी मिटाओ।
पाप-ताप से अंब! बचा लो सिर पर दो कर छैंया।।
सब रिश्ते-नाते मतलब के, कोई दर्द न बाँटे।
तारणहार न कोई संकट में माता ही सैंया।
२७.३.२०२५
०००
सॉनेट
शीतल जल जैसा,
था अग्नि ताप क्यों?,
चमत्कार ऐसा,
धरा पर हुआ यों।
झूठ है या सत्य?
कैसे बतलाएँ?
किसने किया कृत्य?
कैसे समझाएँ?
हाथ की सफाई,
अय्यारी या छल?
माया फैलाई
दिखाया भक्ति बल?
प्रह्लाद रहा मौन,
कहेगा सच कौन?
२७.३.२०२४
***
मुक्तिका
मुक्तक का विस्तार मुक्तिका
हो समान पदभार मुक्तिका
हिंदी ग़ज़ल इसे कह सकते
है शब्दों का हार मुक्तिका
मिटा दूरियाँ सके दिलों से
रही लुटाती प्यार मुक्तिका
लिए पदांत-तुकांत सुसज्जित
भावों का श्रृंगार मुक्तिका
यही गीतिका सजल तेवरी
द्विपद मुक्त रसधार मुक्तिका
तज अपूर्णता बनी पूर्णिका
नित गहती नव नाम मुक्तिका
***
सॉनेट
दिया
*
दिया जल गया हुआ उजाला
जय जय करें अंबिका की सब
हुआ अँधेरे का मुँह काला
लगे हो गई है पूनम अब
दिया जिसे जो लिया न जाता
तब ही कीर्ति गूँजती जग में
जो किस्मत में खुद ही आता
मंज़िल दूर न रहती मग से
दिया मकां को बना रहा घर
उतर मयंक धरा पर आया
दिया कहे हो कोई न बेघर
रहे प्रियंक सदा सरसैया
दिया हुलास आस देता है
दिया न कुछ वापिस लेता है
***
सॉनेट
कलम
*
कलम न होती अगर हमारे हाथ में
भाग्य विधाता खुद के हम कैसे होते?
कलम न करती भावों की खेती यदि तो
गीत-ग़ज़ल की फसलें हम कैसे बोते?
कलम न करती अक्षर का आराधन तो
शब्द निःशब्दित कहिए कैसे कर पाते?
कलम न रोपी जाती बगिया-क्यारी में
सुमन सुगंधित कैसे दुनिया महकाते?
बक़लम कलम जुड़े मन से मन खत बनकर
थाती पीढ़ी ने पीढ़ी को दी अनुपम
कलम जेब में भाग्य बनाती लिख-पढ़कर
मिली विरासत कल की कल को हर उत्तम
कलम उपस्थित कर देती है चित्र सखे!
कलम गमकती जीवन में बन इत्र सखे!
***
: हिंदी शब्द सलिला - १ :
आइये! जानें अपनी हिंदी को।
हिंदी का शब्द भंडार कैसे समृद्ध हुआ?
आभार अरबी भाषा का जिसने हमें अनेक शब्द दिए हैं, इन्हें हम निरंतर बोलते हैं बिना जाने कि ये अरबी भाषा ने दिए हैं।
भाषिक शुद्धता के अंध समर्थक क्या इन शब्दों को नहीं बोलते?
ये शब्द इतने अधिक प्रचलित हैं कि इनके अर्थ बिना बताए भी हम सब जानते हैं।
कुछ अरबी शब्द निम्नलिखित हैं -
अखबार
अदालत
अल्लाह
अलस्सुबह
आदमकद
आदमी
औकात
औरत
औलाद
इम्तहान
ऐनक
कद्दावर
काफी
किताब
कैद
खत
खातिर
ग़ज़ल
गलीचा
जलेबी
तकिया
तबला
तलाक
तारीख
दिनार
दीवान
बिसात
मकतब
मस्तूल
महक
मानसून
मुहावरा
मौसम
लिहाज
वकील
वक़्त
शहीद
शादी
सुबह
हकीम
हमकदम
हमदम
हमपेशा
हमराह
हमेशा
हरदम
***
विमर्श :
गणगौर : क्या और क्यों?
*
'गण' का अर्थ शिव के भक्त या शिव के सेवक हैं।
गणनायक, गणपति या गणेश शिवभक्तों में प्रधान हैं।
गणेश-कार्तिकेय प्रसंग में वे शिव-पार्वती की परिक्रमा कर सृष्टि परिक्रमा की शर्त जीतते हैं।
'कर्पूर गौरं करुणावतारं' के अनुसार 'गौर' शिव-शिवा हैं। गण गौर में 'गण' मिलकर 'गौर' की पूजा करते हैं जो अर्धनारीश्वर हैं अर्थात् 'गौर' में ही 'गौरी' अंतर्व्याप्त हैं। तदनुसार परंपरा से गणगौर पर्व में शिव-शिवा पूज्य हैं।
'गण' स्त्री-पुरुष दोनों होते हैं किंतु चैत्र में फसल पकने के कारण पति को उसका संरक्षण करना होता है। इसलिए स्त्रियाँ (अपने मन में पति की छवि लिए) 'गौर' (जिनमें गौरी अंतर्निहित हैं) को पूजती हैं। नर-नारी साम्य का इससे अधिक सुंदर उदाहरण विश्व में कहीं नहीं है।
विवाह पश्चात् प्रथम गणगौर पर्व 'तीज' पर ही पूजने की अनिवार्यता का कारण यह है कि पति के मन में बसी पत्नि और पति के मन में बसा पति एक हों। मन का मेल, तन का मेल बने और तब तीसरे (संतान) का प्रवेश हो किंतु उससे भी दोनों में दूरी नहीं, सामीप्य बढ़े।
ईसर-गौर की प्रतिमा के लिए होलिका दहन की भस्म और तालाब की मिट्टी लेना भी अकारण नहीं है। योगी शिव को भस्म अतिप्रिय है। महाकाल का श्रंगार भस्म से होता है। त्रिनेत्र खुलने से कामदेव भस्म हो गया था। होलिका के रूप में विष्णु विरोधी शक्ति जलकर भस्म हो गयी थी। शिव शिवा प्रतिमा हेतु भस्म लेने का कारण विरागी का रागी होना अर्थात् पति का पत्नि के प्रति समर्पित होना, प्रेम में काम के वशीभूत न होकर आत्मिक होना तथा वे विपरीत मतावलंबी या विचारों के हों तो विरोध को भस्मीभूत करने का भाव अंतर्निहित है।
गौरीश्वर प्रतिमा के लिए दूसरा घटक तालाब की मिट्टी होने के पीछे भी कारण है। गौरी, शिवा, उमा ही पार्वती (पर्वत पुत्री) हैं। तालाब पर्वत का पुत्र याने पार्वती का भाई है। आशय यह कि ससुराल में पर्व पूजन के समय पत्नि के मायके पक्ष का सम मान हो, तभी पत्नि को सच्ची आनंदानुभूति होगी और वह पति के प्रति समर्पिता होकर संतान की वाहक होगी।
दर्शन, आध्यात्म, समाज, परिवार और व्यक्ति को एक करने अर्थात अनेकता में एकता स्थापित करने का लोकपर्व है गणगौर।
गणगौर पर १६ दिनों तक गीत गाए जाते हैं। १६ अर्थात् १+६=७। सात फेरों तथा सात-सात वचनों से आरंभ विवाह संबंध १६ श्रंगार सज्जित होकर मंगल गीत गाते हुए पूर्णता वरे।
पर्वांत पर प्रतिमा व पूजन सामग्री जल स्रोत (नदी, तालाब, कुआं) में ही क्यों विसर्जित करें, जलायें या गड़ायें क्यों नहीं?
इसका कारण भी पूर्वानुसार ही है। जलस्रोत पर्वत से नि:सृत, पर्वतात्मज अर्थात् पार्वती बंधु हैं। ससुराल में मंगल कार्य में मायके पक्ष की सहभागिता के साथ कार्य समापन पश्चात् मायके पक्ष को भेंट-उपहार पहुँचाई जाए। इससे दोनों कुलों के मध्य स्नेह सेतु सुदृढ़ होगा तथा पत्नि के मन में ससुरालियों के प्रति प्रेमभाव बढ़ेगा।
कुँवारी कन्या और नवविवाहिता एेसे ही संबंध पाने-निभाने की कामना और प्रयास करे, इसलिए इस पर्व पर उन्हें विशेष महत्व मिलता है।
एक समय भोजन क्योँ?
ऋतु परिवर्तन और पर्व पर पकवान्न सेवन से थकी पाचन शक्ति को राहत मिले। नवदंपति प्रणय-क्रीड़ारत होने अथवा नन्हें शिशु के कारण रात्रि में प्रगाढ़ निद्रा न ले सकें तो भी एक समय का भोजन सहज ही पच सकेगा। दूसरे समय भोजन बनाने में लगनेवाला समय पर्व सामग्री की तैयारी हेतु मिल सकेगा। थके होने पर इस समय विश्राम कर ऊर्जा पा सकेंगे।
इस व्रत के मूल में शिव पूजन द्वारा शिवा को प्रसन्न कर गणनायक सदृश मेधावी संतान धारण करने का वर पाना है। पुरुष संतान धारण कर नहीं सकता। इसलिए केवल स्त्रियों को प्रसाद दिया जाता है। सिंदूर स्त्री का श्रंगार साधन है। विसर्जन पूर्व गणगौर को पानी पिलाना, तृप्त करने का परिचायक है।
२७-३-२०२०
***
गीत :
मैं अकेली लड़ रही थी
*
मैं अकेली लड़ रही थी
पर न तुम पहचान पाये.....
*
सामने सागर मिला तो, थम गये थे पग तुम्हारे.
सिया को खोकर कहो सच, हुए थे कितने बिचारे?
जो मिला सब खो दिया, जब रजक का आरोप माना-
डूब सरयू में गये, क्यों रुक न पाये पग किनारे?
छूट मर्यादा गयी कब
क्यों नहीं अनुमान पाये???.....
*
समय को तुमने सदा, निज प्रशंसा ही सुनाई है.
जान यह पाये नहीं कि, हुई जग में हँसाई है..
सामने तव द्रुपदसुत थे, किन्तु पीछे थे धनञ्जय.
विधिनियंता थे-न थे पर, राह तुमने दिखायी है..
जानते थे सच न क्यों
सच का कभी कर गान पाये???.....
*
हथेली पर जान लेकर, क्रांति जो नित रहे करते.
विदेशी आक्रान्ता को मारकर जो रहे मरते..
नींव उनकी थी, इमारत तुमने अपनी है बनायी-
हाय! होकर बागबां खेती रहे खुद आप चरते..
श्रम-समर्पण का न प्रण क्यों
देश के हित ठान पाये.....
*
'आम' के प्रतिनिधि बने पर, 'खास' की खातिर जिए हो.
चीन्ह् कर बाँटी हमेशा, रेवड़ी- पद-मद पिए हो..
सत्य कर नीलाम सत्ता वरी, धन आराध्य माना.
झूठ हर पल बोलते हो, सच की खातिर लब सिये हो..
बन मियाँ मिट्ठू प्रशंसा के
स्वयं ही गान गाये......
*
मैं तुम्हारी अस्मिता हूँ, आस्था-निष्ठा अजय हूँ.
आत्मा हूँ अमर-अक्षय, सृजन संधारण प्रलय हूँ.
पवन धरती अग्नि नभ हूँ, 'सलिल' हूँ संचेतना मैं-
द्वैत मैं, अद्वैत मैं, परमात्म में होती विलय हूँ..
कर सके साक्षात् मुझसे
तीर कब संधान पाए?.....
*
मैं अकेली लड़ रही थी
पर न तुम पहचान पाये.....
*
⭐⭐⭐⭐👌👌👌👌⭐⭐⭐⭐
सामयिक दोहे
लोकतंत्र की हो गई, आज हार्ट-गति तेज?
राजनीति को हार्ट ने, दिया सँदेसा भेज?
वादा कर जुमला बता, करते मन की बात
मनमानी को रोक दे, नोटा झटपट तात
मत करिए मत-दान पर, करिए जग मतदान
राज-नीति जन-हित करे, समय पूर्व अनुमान
लोकतंत्र में लोकमत, ठुकराएँ मत भूल
दल-हित साध न झोंकिए, निज आँखों में धूल
सत्ता साध्य न हो सखे, हो जन-हित आराध्य
खो न तंत्र विश्वास दे, जनहित से हो बाध्य
नोटा का उपयोग कर, दें उन सबको रोक
स्वार्थ साधते जो रहे, उनको ठीकरा लोक
👌👌👌👌⭐⭐⭐⭐👌👌👌👌
***
गीत
सच्ची बात
*
मेरे घर में हो प्रकाश
तेरा घर बने मशाल
*
मेरा अनुभव है यही
पैमाने हैं दो।
मुझको रिश्वत खूब दो
बाकी मगर न लो।।
मैं तेरा रखता न पर
तू मेरा रखे खयाल।
मेरे घर में हो प्रकाश
तेरा घर बने मशाल।।
*
मेरे घर हो लक्ष्मी,
तेरे घर काली।
मुझसे ले मत, दे मुझे
तू दहेज-थाली।
तेरा नत, मेरा रहे
हरदम ऊँचा भाल।
मेरे घर में हो प्रकाश।
तेरा घर बने मशाल।।
*
तेरा पुत्र शहीद हो
मेरा अफसर-सेठ।
तेरी वाणी नम्र हो
मैं दूँ गाली ठेठ।।
तू मत दे, मैं झटक लूँ
पहना जुमला-माल।
मेरे घर में हो प्रकाश
तेरा घर बने मशाल।।
२७-३-२०१९
***
दोहा गीत
*
जो अव्यक्त हो,
व्यक्त है
कण-कण में साकार
काश!
कभी हम पा सकें,
उसके भी दीदार
*
कंकर-कंकर में वही
शंकर कहते लोग
संग हुआ है किस तरह
मक्का में? संजोग
जगत्पिता जो दयामय
महाकाल शशिनाथ
भूतनाथ कामारि वह
भस्म लगाए माथ
भोगी-योगी
सनातन
नाद वही ओंकार
काश!
कभी हम पा सकें,
उसके भी दीदार
*
है अगम्य वह सुगम भी
अवढरदानी ईश
गरल गहे, अमृत लुटा
भोला है जगदीश
पुत्र न जो, उनका पिता
उमानाथ गिरिजेश
नगर न उसको सोहते
रुचे वन्य परिवेश
नीलकंठ
नागेश हे!
बसो ह्रदय-आगार
काश!
कभी हम पा सकें,
उसके भी दीदार
२७-३-२०१८
***
नवगीत
*
ताप धरा का
बढ़ा चैत में
या तुम रूठीं?
लू-लपटों में बन अमराई राहत देतीं।
कभी दर्प की उच्च इमारत तपतीं-दहतीं।
बाहों में आ, चाहों ने हारना न सीखा-
पगडंडी बन, राजमार्ग से जुड़-मिल जीतीं।
ठंडाई, लस्सी, अमरस
ठंडा खस-पर्दा-
बहा पसीना
हुई घमौरी
निंदिया टूटी।
*
सावन भावन
रक्षाबंधन
साड़ी-चूड़ी।
पावस की मनहर फुहार मुस्काई-झूमी।
लीक तोड़कर कदम-दर-कदम मंजिल चूमी।
ध्वजा तिरंगी फहर हँस पड़ी आँचल बनकर-
नागपंचमी, कृष्ण-अष्टमी सोहर-कजरी।
पूनम-एकादशी उपासी
कथा कही-सुन-
नव पीढ़ी में
संस्कार की
कोंपल फूटी।
*
अन्नपूर्णा!
शक्ति-भक्ति-रति
नेह-नर्मदा।
किया मकां को घर, घरनी कण-कण में पैठीं।
नवदुर्गा, दशहरा पुजीं लेकिन कब ऐंठीं?
धान्या, रूपा, रमा, प्रकृति कल्याणकारिणी-
सूत्रधारिणी सदा रहीं छोटी या जेठी।
शीत-प्रीत, संगीत ऊष्णता
श्वासों की तुम-
सुजला-सुफला
हर्षदायिनी
तुम्हीं वर्मदा।
*
जननी, भगिनी
बहिन, भार्या
सुता नवेली।
चाची, मामी, फूफी, मौसी, सखी-सहेली।
भौजी, सासू, साली, सरहज छवि अलबेली-
गति-यति, रस-जस,लास-रास नातों की सरगम-
स्वप्न अकेला नहीं, नहीं है आस अकेली।
रुदन, रोष, उल्लास, हास,
परिहास,लाड़ नव-
संग तुम्हारे
हुई जिंदगी ही
अठखेली।
२७-३-२०१६
***
छंद सलिला:
मधुमालती छंद
*
लक्षण: जाति मानव, प्रति चरण मात्रा १४ मात्रा, यति ७-७, चरणांत गुरु लघु गुरु (रगण) होता है.
लक्षण छंद:
मधुमालती आनंद दे
ऋषि साध सुर नव छंद दे
चरणांत गुरु लघु गुरु रहे
हर छंद नवउत्कर्ष दे।
उदाहरण:
१. माँ भारती वरदान दो
सत्-शिव-सरस हर गान दो
मन में नहीं अभिमान हो
घर-अग्र 'सलिल' मधु गान हो।
२. सोते बहुत अब तो जगो
खुद को नहीं खुद ही ठगो
कानून को तोड़ो नहीं-
अधिकार भी छोडो नहीं
***
छंद सलिला: मनोरम छंद
*
लक्षण: समपाद मात्रिक छंद, जाति मानव, प्रति चरण मात्रा १४ मात्रा, चरणारंभ गुरु, चरणांत गुरु लघु लघु या लघु गुरु गुरु होता है.
लक्षण छंद:
हैं भुवन चौदह मनोहर
आदि गुरुवत पकड़ लो मग
अंत भय से बच हमेशा
लक्ष्य वर लो बढ़ाओ पग
उदाहरण:
१. साया भी साथ न देता
जाया भी साथ न देता
माया जब मन भरमाती
काया कब साथ निभाती
२. सत्य तज मत 'सलिल' भागो
कर्म कर फल तुम न माँगो
प्राप्य तुमको खुद मिलेगा
धर्म सच्चा समझ जागो
३. लो चलो अब तो बचाओ
देश को दल बेच खाते
नीति खो नेता सभी मिल
रिश्वतें ले जोड़ते धन
४. सांसदों तज मोह-माया
संसदीय परंपरा को
आज बदलो, लोक जोड़ो-
तंत्र को जन हेतु मोड़ो
२७-३-२०१४
***
मुक्तिका
बात मन की कही खरी समझो
ये मुलाकात आखिरी समझो
चीखती है अगर टिटहरी तो
वाकई है बहुत डरी समझो
दोस्त ही कर रहे दगाबाजी
है तबीयत जरा हरी समझो
हमनशीं हमसफ़र मिली जो भी
ज़िंदगी भर उसे परी समझो
बात 'संजीव' की सुनो-मानो
ये न जुमला, न मसखरी समझो
२७-३-२०१३
***
मुक्तिका
भावना बच पाए तो होली मने
भाव ना बढ़ पाएँ तो होली मने
*
काम ना मिल सके तो त्यौहार क्या
कामना हो पूर्ण तो होली मने
*
साधना की सिद्धि ही होली सखे!
साध ना पाए तो क्या होली मने?
*
वासना से दूर हो होली सदा
वास ना हो दूर तो होली मने
*
झाड़ ना काटो-जलाओ अब कभी
झाड़ना विद्वेष तो होली मने
*
लालना बृज का मिले तो मन खिले
लाल ना भटके तभी होली मने
*
साज ना छोड़े बजाना मन कभी
साजना हो साथ तो होली मने
***
२७-३-२०११
मुक्तिका
*
नेताओं का शगल है, करना बहसें रोज.
बिन कारण परिणाम के, क्यों नाहक है खोज..
नारी माता भगिनी है, नारी संगिनी दिव्य.
सुता सखी भाभी बहू, नारी सचमुच भव्य..
शारद उमा रमा त्रयी, ज्ञान शक्ति श्री-खान.
नर से दो मात्रा अधिक, नारी महिमावान..
तैंतीस की बकवास का, केवल एक जवाब.
शत-प्रतिशत के योग्य वह, किन्तु न करे हिसाब..
देगा किसको कौन क्यों?, लेगा किससे कौन?
संसद में वे भौंकते, जिन्हें उचित है मौन..
२७-३-२०१०

*