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गुरुवार, 13 अगस्त 2026

अगस्त १३, लेफ्ट हैंडर्स डे, केतकी, सोरठे, महासंस्कारी छंद, नवगीत, फिरोज गाँधी, संसद भवन, हास्य

सलिल सृजन अगस्त १३
लेफ्ट हैंडर्स डे
*
पूर्णिका
आईना
बोलता सच आईना
खोलता सच आईना
.
बिका जबसे मीडिया
तोलता सच आईना
.
हाय! संसद में न अब
ढोलता सच आईना
.
सलिल-जनमत में सतत
घोलता सच आईना
१३.८.२०२५
०००
पूर्णिका
छप्पर है पानी पानी
भू-चूनर धानी-धानी
.
आसमान खैरात लिए
बादल गरजे बन दानी
.
नदी समंदर में फेंके
पाया जल सचमुच मानी
.
पवन बिजुरिया को छेड़े
कहे- जान, दिलवर जानी
.
लिव इन, लव जिहाद घातक
रहो दूर तितली रानी
.
चंपा और चमेली ने
शादी करने की ठानी
.
फुलबगिया अपनी सुंदर
कली कली है लासानी
.
सावन-फागुन दीवाली
बिना 'सलिल' है बेमानी
.
बागबान गुल गुलशन का
नाता नाजुक अरमानी
१३.८.२०२५
०००
पूर्णिका
मन मंदिर में प्रेम
बसे तभी हो क्षेम
.
कोशिश कर अनवरत
जब तक मिले न एम
.
जग काजल का कक्ष
बच हो नहीं डिफेम
.
शेष न जब धन-देह
हो तब बुक अरु फेम
.
बने हार भी जीत
'सलिल' न छोड़ो गेम
०००
षट्पदी
सामना
.
मैके से लाली लौटी तो, सुन लालू का लाफ
कारण पूछा तो कहे लालू- 'करना माफ
कहता ट्रुथ होना नहीं तुम मुझसे नाराज़
कहा गुरू जी ने यही, प्रवचन में था आज
सिर चढ़ जाए मुसीबत तो मत डरकर भाग
हँसी-खुशी कर सामना, पग पर रखकर पाग।।
०००
केतकी पर सोरठे
हुई केतकी दीन, शिव से मिथ्या वचन कह।
थी मन-वृत्ति मलीन, पछताई भी शाप पा।।
.
श्वेत-पीत अभिराम, कोमल पात हरे हरे।
जपती हरि का नाम, सुरभि बिखेरे दूर तक।।
.
कहें गवाही झूठ, जो वे यह भी जान लें।
किस्मत जाती रूठ, मिलता है अभिशाप भी।।
.
जड़-पत्तों से आप, बना चटाई-टोकनी।
सकें जगत में व्याप, हस्त शिल्प से ख्याति पा।।
.
फुलबगिया में बैठ, जुही-केतकी सहेली।
कह मुकरी में पैठ रोज बूझतीं पहेली।।
.
लव-जिहाद तूफान,
हुई केतकी भीत है।
कोई न ले ले मान, बली बने तब जीत है।।
.
रंग-जाति शैतान, रिपु दहेज दानव मुआ।
लिए ले रहा जान, दिखा केतकी को कुँआ।।
.
१२.८.२०२५
०००
इतिहास
धोया गया संसद भवन
मुहूर्त निकाल तय किया था आजादी का दिन|
हमारे संविधान के निर्माण में २ साल ११ महीने १८ दिन का समय लगा। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को संविधान निर्माता कहलाने का गौरव प्राप्त है। डॉ. वे संविधान सभा के अध्यक्ष थे। संविधान के विविध पहलू पर अध्ययन और अनुश्ंसाओं हेतु कई समिति थीं। भीमराव अंबेडकर संविधान बनाने वाली प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे जिसमें कुल ७ सदस्य थे।
१९४७ में जब यह तय हो गया कि अंग्रेज भारत छोडऩे के लिए तैयार हैं, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने गोस्वामी गणेशदत्त महाराज के माध्यम से उज्जैन के पंडित सूर्यनारायण व्यास को बुलावा भेजा। पंडित व्यास ने पंचांग देखकर बताया कि आजादी के लिए सिर्फ दो ही दिन शुभ हैं। १४ और १५ अगस्त। इसमें एक दिन पाकिस्तान को आजाद घोषित किया जा सकता है और एक दिन भारत को। उन्होंने डॉ. प्रसाद को भारत की आजादी के लिए मध्यरात्रि १२ बजे यानी स्थिर लग्न नक्षत्र का समय सुझाया। ताकि देश में लोकतंत्र स्थिर रहे। डॉ. राजेंद्र प्रसाद के आग्रह पर उन्होंने बताया कि अगर आजादी १५ अगस्त १९४ की मध्यरात्रि १२ बजे ली गई तो हमारा गणतंत्र अमर रहेगा, १९९० के बाद से देश की तरक्की होगी और २०२० तक भारत विश्व का सिरमौर बन जाएगा। इतना ही नहीं पंडित व्यास के कहने पर आजादी के बाद देर रात संसद को धोया भी गया था। क्योंकि ब्रिटिश शासकों के बाद अब यहां भारतीय बैठने वाले थे। धोने के बाद उनके बताए मुहूर्त पर गोस्वामी गिरधारीलाल ने संसद की शुद्धि करवाई थी। इसके बाद से चाहे शनि की दशा में देश को आजादी मिली, देश के टुकड़े हो गए, केतु की महादशा में देश भुखमरी और तंगहाली से गुजरा। मगर १९९० में शुक्र की महादशा शुरू होने के बाद देश की तरक्की भी शुरू हो गई।
पंडित सूर्यनारायण व्यास के पुत्र राजशेखर ने उनके जीवन और उनकी भविष्यवाणियों पर एक किताब लिखी है। 'याद आते हैं 'शीर्षक वाली इस किताब के ३४ वें 'अध्याय ज्योतिष जगत के सूर्य (पृष्ठ क्रमांक १९७-१९८) में आजादी के दिन के मुहूर्त का उल्लेख किया गया है। राजशेखर ने इस अध्याय में अपने पिता की अन्य भविष्यवाणियों का भी जिक्र किया है। सांदीपनी ऋषि के वंशज महान ज्योतिषाचार्य, लेखक, पत्रकार, पंडित सूर्यनारायण व्यास थे। उनका जन्म २ मार्च १९९ को हुआ था।
भविष्यवाणियां याँ सच निकली - लालबहादुर शास्त्री के ताशकंद जाने से पहले सूर्यनारायण व्यास ने एक लेख में इस बात का उल्लेख कर दिया था कि वे जीवित नहीं लौटेंगे। उन तक यह खबर पहुंची भी लेकिन उन्होंने इसे हँसकर टाल दिया। बाद में भविष्यवाणी सच साबित हुई। ७ दिसंबर १९५० को एक अखबार में उन्होंने लिखा कि उपप्रधानमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल का स्वास्थ्य अत्यंत चिंताजनक हो सकता है। १७ दिसंबर तक उनके लिए कठिन समय रहेगा। आखिर १६ दिसंबर की अर्ध रात्रि को सरदार पटेल दिवंगत हो गए। इससे पहले १९३२ में उन्होंने एक अंग्रेजी अखबार में भूकंप पर एक लेख लिखा था। फिर एक पत्र लिखकर आने वाले ३०० भूकंपों की सूची प्रकाशित करवा दी। समय के साथ-साथ ये भी सही साबित होती जा रही है। यह पत्र और अखबार सुरक्षित हैं। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू, राजेन्द्र प्रसाद और महात्मा गाँधी के बारे में भी कई सटीक भविष्यवाणियाँ काफी पहले ही कर दी थीं।
***
भ्रष्टाचार के विरुद्ध खड़े होते थे फिरोज गाँधी
*
परिवार से जुड़े होने के बावजूद अपनी अलग पहचान रखने के कायल फिरोज गांधी को एक ऐसे नेता और सांसद के रूप में याद किया जाता है जो हमेशा स्वच्छ सामाजिक जीवन के पैरोकार रहे और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करते रहे। फिरोज के समकालीन लोगों का कहना है कि वह भले ही संसद में कम बोलते रहे लेकिन वे बहुत अच्छे वक्ता थे और जब भी किसी विषय पर बोलते थे तो पूरा सदन उनको ध्यान से सुनता था। उन्होंने कई कंपनियों के राष्ट्रीयकरण का भी अभियान चलाया था।
फिरोज गाँधी अपने दौर के एक कुशल सांसद के रूप में जाने जाते थे। फिरोज इलाहाबाद के रहने वाले थे और आज भी लोग उनकी पुण्यतिथि के दिन उनकी मजार पर जुटते हैं और उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है। दिल्ली में मृत्यु के बाद फिरोज गांधी की अस्थियों को इलाहाबाद लाया गया था और पारसी धर्म के रिवाजों के अनुसार वहां उनकी मजार बनाई गई।
फिरोज गाँधी अच्छे खानपान के बेहद शौकीन थे। इलाहाबाद में फिरोज को जब भी फुर्सत मिलती थी वह लोकनाथ की गली में जाकर कचौड़ी तथा अन्य लजीज व्यंजन खाना पसंद करते थे। इसके अलावा हर आदमी से खुले दिल से मिलते थे। फिरोज गांधी का जन्म १२ अगस्त १९१२ को मुंबई के एक पारसी परिवार में हुआ था। बाद में वह इलाहाबाद आ गए और उन्होंने एंग्लो वर्नाकुलर हाई स्कूल और इवनिंग क्रिश्चियन कालेज से पढ़ाई की। पढ़ाई के दौरान ही उनकी जान पहचान नेहरू परिवार से हुई। शिक्षा के लिए फिरोज बाद में लंदन स्कूल आफ इकोनामिक्स चले गये।
इंग्लैंड में पढ़ाई के दौरान फिरोज और इंदिरा गांधी के बीच घनिष्ठता बढ़ी। इसी दौरान कमला नेहरू के बीमार पड़ने पर वह स्विट्जरलैंड चले गये। कमला नेहरू के आखिरी दिनों तक वह इंदिरा के साथ वहीं रहे। फिरोज बाद में पढ़ाई छोड़कर वापस आ गए और मार्च 1942 में उन्होंने इंदिरा गांधी से हिन्दू रीति रिवाजों के अनुसार विवाह कर लिया। विवाह के मात्र छह महीने बाद भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान दंपत्ति को गिरफ्तार कर लिया गया। फिरोज को इलाहाबाद के नैनी जेल में एक साल कारावास में बिताना पड़ा। आजादी के बाद फिरोज नेशनल हेरल्ड समाचार पत्र के प्रबंध निदेशक बन गये। पहले लोकसभा चुनाव में वह रायबरेली से जीते। उन्होंने दूसरा लोकसभा चुनाव भी इसी संसदीय क्षेत्र से जीता। संसद में उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ कई मामले उठाये जिनमें मूंदड़ा मामला प्रमुख था। फिरोज गांधी का निधन ८ सितंबर १९६० को दिल्ली में दिल का दौरा पड़ने से हुआ।
***
दोहा सलिला
मित्र
*
निधि जीवन की मित्रता, करे सुखी-संपन्न
मित्र न जिसको मिल सके, उस सा कौन विपन्न.
*
सबसे अधिक गरीब वह, मिला न जिसको मित्र
गुल गुलाब जिससे नहीं, बन सकता हो इत्र
*
बिना स्वार्थ संबंध है, मन से मन का मित्र
मित्र न हो तो ज़िंदगी, बिना रंग का चित्र
१३-८-२०२०
***
नवगीत:
*
हल्ला-गुल्ला
शोर-शराबा
*
जंगल में
जनतंत्र आ गया
पशु खुश हैं
मन-मंत्र भा गया
गुराएँ-चीखें-रम्भाएँ
काँव-काँव का
यंत्र भा गया
कपटी गीदड़
पूजता बाबा
हल्ला-गुल्ला
शोर-शराबा
*
शतुरमुर्ग-गर्दभ
हैं प्रतिनिधि
स्वार्थ साधते
गेंडे हर विधि
शूकर संविधान
परिषद में
गिद्ध रखें
परदेश में निधि
पापी जाते
काशी-काबा
हल्ला-गुल्ला
शोर-शराबा
*
मानुष कैट-वाक्
करते हैं
भौंक-झपट
लड़ते-भिड़ते हैं
खुद कानून
बनाकर-तोड़ें
कुचल निबल
मातम करते हैं
मिटी रसोई
बसते ढाबा
हल्ला-गुल्ला
शोर-शराबा
***
मुक्तक
*
मापनी: २१२११ १२१११ २११
छंद: महासंस्कारी
बह्र: फाइलातुन मुफाईलुन फैलुन
*
रोकना मत, चले सदन संसद
चेतना झट, अगर रुके संसद
स्वार्थ साधन करें सतत जो दल
छोड़ना मत, गति भटक संसद
*
लीडरों! फिर बबाल करना मत
जो हुआ, अब धमाल करना मत
लोक का दुःख नहीं तनिक भी कम
शोक का इंतिज़ाम करना मत
*
पंडितों! तनिक राम भजिए अब
लोभ-लालच हराम तजिए अब
अस्थियाँ धरम की करम में लख
भूत-भावन सदृश्य सजिए अब
***
एक दोहा
बाप, बाप के है सलिल, बच्चे कम मत मान
वे तुझसे आगे बहुत, खुद पर कर न गुमान
१३-८-२०१५

दिव्य नर्मदा अलंकरण २०२५-२६ परिणाम

दिव्य नर्मदा अलंकरण २०२५-२६ परिणाम 
०१. परिचर्चा सम्राट जगदीश किंजल्क स्मृति हिन्दी रत्न अलंकरण ११,०००/- प्रदाता श्रीमती राजो किंजल्क भोपाल- डॉ. अर्जुन चव्हाण, कोल्हापूर - हिन्दी भाषा, व्याकरण तथा शोध कार्य मरदर्शन हेतु। 
०२. महीयसी महादेवी वर्मा लघुकथा रत्न अलंकरण ५०००/- प्रदाता संजीव वर्मा 'सलिल' जबलपुर- श्रीमती कांता राय भोपाल - लघुकथा के विकास में अवदान। 
०३. शांति-राज साहित्य रत्न अलंकरण ५०००/- प्रदाता प्रदाता संजीव वर्मा 'सलिल' जबलपुर- श्री राग तैलंग भोपाल ९४२५६ ०३४६० - काव्य में अभियांत्रिक बिंबों का प्रयोग संपादन इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए। 
०४. प्रो. शरद वर्मा साहित्य रत्न अलंकरण ५०००/- प्रदाता इं. मुकुल वर्मा नागपुर- इं. राजेश अरोरा 'शलभ' लखनऊ हास्य साहित्य सृजन।
०५. स्व. गोविंददास वर्मा साहित्य रत्न अलंकरण ५०००/- प्रदाता श्रीमती छाया सक्सेना जबलपुर- श्री बसंत शर्मा हिन्दी साहित्य संवर्धन व यातायात प्रबंधन। 
०६. विजय लक्ष्मी विभा साहित्य रत्न अलंकरण ५०००/- प्रदाता श्री अनमोल खरे प्रयागराज- उपन्यास- अग्नि गर्भ में जलती पंखुड़ियाँ, डॉ. वीणा सिन्हा भोपाल तथा उपन्यास- भीष्म प्रतिज्ञा- किशोर शर्मा 'सारस्वत' गुड़गांव (संयुक्त)।  
०७. स्व. कमला शर्मा बाल साहित्य रत्न अलंकरण ५०००/- प्रदाता श्री बसंत शर्मा जबलपुर ९४७९३५६७०२- समीक्षा दुष्टि, बाल निबंध: हमारे बच्चे बनें अच्छे- लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव बस्ती तथा बाल कहानी- माटी के लड्डू - सुधा दुबे भोपाल (संयुक्त)।  
०८. सत्याशा साहित्य रत्न अलंकरण २५००/- डॉ. साधना वर्मा जबलपुर- ज्योति जिंदा है तथा अन्य कहानियाँ २०२४, डॉ. रानी श्रीवास्तव गुड़गाँव। 
०९. स्व. सुशील वर्मा साहित्य रत्न अलंकरण २५००/- प्रदाता श्रीमती सरला वर्मा भोपाल- व्यंग्य: भरा नहीं जो भाव से, मतलब अपना साध रे बंदे, सतीश चंद्र श्रीवास्तव भोपाल।  
१०. लाला भगवान दीन साहित्य गौरव अलंकरण २५००/- प्रदाता डॉ. नीलिमा रंजन भोपाल- आलोचना का ब्राह्मणवाद समीक्षा, राजा अवस्थी कटनी। 
११. इन्द्र बहादुर खरे साहित्य गौरव अलंकरण २५००/- प्रदाता डॉ. नीलिमा रंजन भोपाल- गीत-नवगीत: एक बूँद हम, धूप भरकर मुट्ठियों में, बाल गात बच्चे होते फूल से मनोज जैन 'मधुर' भोपाल। 
१२. राधिका प्रसाद वर्मा साहित्य गौरव अलंकरण २१,००/- प्रदाता वसुधा वर्मा मुंबई- यात्रा संस्मरण:गंध के गलियारे गोविंद अनुज शिवपुरी। 
१३. स्व. हृदयेश्वरी - स्व. सुशील पाण्डे साहित्य भूषण अलंकरण ११००/- डॉ. अरुणा पांडे जबलपुर- छंद नवनीत अनुराधा गर्ग 'दीप्ति' कोटा।
१४. डॉ. जवाहर लाल चौरसिया 'तरुण' साहित्य भूषण अलंकरण ११००/- प्रदाता अस्मिता शैली जबलपुर- काव्य संग्रह - संकल्प की धूप रचना उनियाल 'अरविन्द' बेंगलुरु। 
१५.. कवि राजीव वर्मा 'राजू' साहित्य भूषण अलंकरण ११००/- प्रदाता सुश्री आशा वर्मा जबलपुर- शब्द शिल्पी विश्वेश्वरैया इं. सुरेन्द्र सिंह पवार जबलपुर 
१६ . डॉ. ओम प्रकाश सक्सेना कला श्री सम्मान ११००/- प्रदाता श्री मन्वन्तर वर्मा जबलपुर- काव्य संग्रह- जीवन के सरोकार, इं. राजेन्द्र शर्मा 'राही' ग्वालियर। 
१७. डॉ. कृष्ण मोहन निगम साहित्य भूषण अलंकरण ११००/- प्रदाता सुश्री तुहिना वर्मा भोपाल- रेखांकन कला - श्रीमती खंजन सिन्हा, भोपाल। साहित्य श्री अलंकरण व पुस्तकोपहार
१८. डॉ. अरविन्द श्रीवास्तव 'असीम' झाँसी, लघुकथा संग्रह लघुता का अहसास। 
१९.शालिनी श्रीवास्तव बेंगुलुरु काव्य संग्रह अनुगूँज। 
२०. कालीदास ताम्रकार 'काली' जबलपुर काव्य संग्रह तीसरी आँख। 
२१. रागिनी देवी प्रसाद शाह मुंबई काव्य कृति 'शब्द पुंज'। 
२२. मंजु शर्मा जांगिड़ मनी' जोधपुर लघुकथा संग्रह 'देहरी पार'। 
२३. फराह नसीम मयूख कविता संग्रह। 
०००   

रे मन! नर्मदा हो जा, छाया सक्सेना, पुरोवाक्, मन की बात

पुरोवाक्

"रे मन! नर्मदा हो जा : जग का ताप हर ले जा।"

- आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
० 

"नर्मम् ददाति इति नर्मदा" जो परम आनन्द दे, वह नर्मदा है।
नर्मदा में कंकर-कंकर को शंकर करने की सामर्थ्य है।
नर्मदा किनारे का कंकर भी शिव-शिवा के रूप में पूजित होता है।
नर्मदा तट पर प्रवास हो या निवास शिव से साक्षात करना और शिवत्व को आत्मसात करना सहज हो जाता है किंतु तब ही जब मन मंदिर में अनहद नाद को कलकल निनाद के माध्यम से पाने की आकुलता हो।
नर्मदा से पाना तभी संभव होता है जब हाथ खाली हों, मन में अहंकार न हो, गुरु-लघु, अनुकूल-प्रतिकूल अनुभवों की सम भाव से ग्राह्यता हो।
नर्मदा तट पर देना तभी संभव होता है जब पाना हो सके।
नर्मदा निरभिमानता की प्रतिमूर्ति है। मन से विमलता, नेत्रों से शीतलता, सूर्य से तेजस्विता, पवन से चंचलता, गगन से अनंतता और धरा से धैर्य लेकर कलकल करती नर्मदा 'सर्व' के कल्याण हेतु 'स्व' को समर्पित करने में तनिक भी संकोच नहीं करतीं।
नर्मदा जीवन देती ही देती हैं, लेती कुछ नहीं।
नर्मदा भक्त की भावना के अनुरूप रूप धरण करने में संकोच नहीं करतीं। भक्त नर्मदा का गुणगान करते नहीं थकते।
नर्मदा नामावली १५५ विविध छवि-छटाओं की प्रतीति कराती है -

पुण्यतोया सदानीरा नर्मदा, शैलजा गिरिजा अनिंद्या वर्मदा।
शैलपुत्री सोमतनया निर्मला, अमरकंटी शाम्भवी शुभ-शर्मदा।।
आदिकन्या चिरकुमारी पावनी, जलधिगामिनी चित्रकूटा पद्मजा।
विमलहृदया क्षमादात्री कौतुकी, कमलनयना जगज्जननी हर्म्यदा।।
शशिसुता रुद्रा विनोदिनी नीरजा, मक्रवाहिनी ह्लादिनी सौन्दर्यदा।
शारदा वरदा सुफलदा अन्नदा, नेत्रवर्धिनी पापहारी धर्मदा।।
सिन्धु सीता गौतमी सोमात्मजा, रूपदा सौदामिनी सुख-सौख्यदा।
शिखरिणी नेत्रा तरंगिणी मेखला, नीलवासिनी दिव्यरूपा कर्मदा।।
बालुकावाहिनी दशार्णा रंजना, विपाशा मन्दाकिनी चित्रोत्पला।
रुद्रदेहा अनुसुया पय-अम्बुजा, सप्तगंगा समीरा जय-विजयदा।।
अमृता कलकल निनादिनी निर्भरा, शाम्भवी सोमोद्भवा स्वेदोद्भवा।
चन्दना शिव-आत्मजा सागर-प्रिया, वायुवाहिनी ह्लादिनी आनंददा।।
मुरदला मुरला त्रिकूटा अंजना, नंदना नम्माडियस भव-मुक्तिदा।
शैलकन्या शैलजायी सुरूपा, विराटा विदशा सुकन्या भूषिता।।
गतिमयी क्षिप्रा शिवा मेकलसुता, मतिमयी मन्मथजयी लावण्यदा।
रतिमयी उन्मादिनी उर्वर शुभा, यतिमयी भवत्यागिनी वैराग्यदा।।
शोभिता रम्या सुरूपा माननी, करुणहृदया पापहरिणी मुक्तिदा।
तापसी दिव्यांगना भवतारिणी, मनोहारिणी वत्सला सद्भक्तिदा।।
दिव्यरूपा त्यागिनी भयहारिणी, महार्णवा कमला निशंका मोक्षदा।
अम्ब रेवा करभ कालिंदी शुभा, कृपा तमसा शिवज सुरसा मर्मदा।।
तारिणी मनहारिणी नीलोत्पला, क्षमा यमुना मेकला यश-कीर्तिदा।
साधना-संजीवनी सुख-शांतिदा, सलिल-इष्टा माँ भवानी नरमदा।।

नर्मदा के आँचल की छाया में न कोई बड़ा है, न कोई छोटा, न अपना, न पराया। कण-कण, तृण-तृण और क्षण-क्षण नर्मदा जल को स्पर्श करते ही अलौकिक हो जाते हैं।
नर्मदा के घाट पर जाना तो अहंकार तजकर जाना, नर्मदा तरंगों को देखते ही मन बंधन-मुक्त हो जाता है।
नर्मदा दर्शन की इच्छा जागृत होते ही हृदय में सहज शांति उतर आती है। नर्मदा का दर्शन ही भाव-विभोर कर देता है। शंकर नर्मदा के प्रलयंकर रूप को नमन करते हैं।
नर्मदा के स्पर्शमात्र से जल-तरंगों में भरी ऊर्जा अंतर्मन में प्रवाहित होने लगती है। नर्मदा के कल-कल निर्झर, नर्मदा तट पर पक्षियों की कलरव ध्वनि, हरित वन—यह सब दुःख हर लेता है।
नर्मदा जीवन से भागने नहीं जीवन का सामना करने का संदेश देती हैं। कुछ न मिले तो बहुत कुछ औरों को दो। नर्मदा सिखाती हैं कि दर्द और द्वंद्व में भी आनंद है।
नर्मदा ऋषियों और योगियों की साधना-स्थली है। अनगिनत वर्षों से मनीषियों ने तट पर तप कर सिद्धियाँ पाई हैं। जीवनारंभ, जलचर, थलचर, नभचर, डायनासौर, वन्य-ग्राम्य और नागर सभ्यताएँ, वैदिक-पौराणिक-औपनिषदिक ज्ञान-ध्यान साधना-आराधना, संस्कृति, संस्कार, सुर-नर-असुर, साधु-संत, ऋषि-मुनि, शैव-शाक्त-गाणपत्य-वैष्णव, लोकजीवन, नाट्यकला, लोककला, दर्शन-प्रदर्शन, ज्ञान-विज्ञान अर्थात आदि से अब तक हर तत्व किसी न किसी रूप में नर्मदा से जुड़ा हुआ है।
नर्मदा भारत के हृदयस्थल में प्रवाहित यह जीवनधारा है, केवल एक नदी नहीं चेतन पुंज है।
नर्मदा का दरस-परस प्रिय छाया को हुआ, यह सौभाग्य है। नर्मदा सलिल अंजुरी में भरकर अभिषेक करो, आचमन करो या पद प्रक्षालन कल्याण सुनिश्चित है।
नर्मदा के चाहे बिना ''रे मन! नर्मदा हो जा'' कहना और लिखना संभव नहीं हो सकता। नर्मदा दर्शन का पुण्य पाने देवता भी धरा पर अवतार लेते हैं।
नर्मदा में अवगाहने का सुअवसर उपलब्ध कराने के लिए छाया को शुभाशीष।
नर्मदा को सुनो-गुनो, नर्मदा से हिलो-मिलो, नर्मदा बनो और अंत में नर्मदा में मिलो ''जैसे मिल गए मताई औ बाप।''
- शुभाशीष सहित
नर्मदात्मज संजीव

मन की बात

“रे मन! नर्मदा हो जा” केवल नर्मदा तट की यात्रा का संस्मरण नहीं है। यह आत्मानुभूति है उस यात्रा की जिसमें नर्मदा के साथ चलते-चलते एक बाहरी यात्रा कब भीतर की यात्रा बन गई, इसका पता ही नहीं चला।

नर्मदा-तट पर जो देखा, जो सुना, जो अनुभव किया और जो भीतर उतरता गया, उसी अनुभव-गाथा को शब्द देने का एक सहज प्रयास है यह पुस्तक। इसमें किसी को उपदेश देने का प्रयास नहीं,केवल इतनी इच्छा है कि पाठक प्रसंग-दर-प्रसंगसाथ-साथ इस यात्रा में चले और अपने जीवन-अनुभवों को जोड़ सके।

यात्रा के बीच नर्मदा तट के अनेक प्रमुख स्थल, लोककथाएँ, किवदंतियाँ, मंदिर, ऋषि-मुनियों और साधु-संतों का सान्निध्य, पेड़-पौधों और प्रकृति के मौन-मुखर सौन्दर्य से साक्षात्कार स्वाभाविक है। कहीं किसी बच्चे की सहजता ने मन को छुआ, कहीं किसी वृद्ध की सेवा ने, कहीं किसी युवा की निस्वार्थ भावना ने। इन सबको लिखने का उद्देश्य किसी को बड़ा या छोटा दिखाना नहीं बल्कि उस स्थान से मिले अनुभव अपने भीतर उतारना रहा है।

नर्मदा तट पर बार-बार यह अनुभव हुआ कि जीवन के वे पाठ, जिन्हें हम सामान्य जीवन में वर्षों तक सीखने का प्रयास करते रहते हैं, वहाँ सहजता से जीवन का हिस्सा बनते जाते हैं, लेना और देना अलग-अलग नहीं लगता। यदि प्रकृति और जीवन से कुछ मिला है तो उसे लौटाना भी है। अकेले रहना और साथ रहना, मौन और कोलाहल भी कहीं न कहीं एक ही सत्य के दो रूप दिखाई देने लगते हैं।

परिक्रमा-पाठ पर आगे बढ़ते हुए शरीर की थकान बढ़ने के साथ मन की थकान कम होने पर विस्मय होता है। जैसे-जैसे कदम आगे बढ़ते हैं, भीतर का कोई बोझ पीछे छूटता जाता है। मन के विकार, उलझनें और अनावश्यक आग्रह धीरे-धीरे हल्के होते जाते हैं।

जब नर्मदा सागर-संगम की ओर बढ़ती है, तब एक अद्भुत अनुभूति होती है- नर्मदा सागर में अपना अस्तित्व खो नहीं रही, बल्कि अपने अस्तित्व को पा रही है, ''स्व'' से ''सर्व'' हो रही है। यह दृश्य केवल नदी का सागर में मिलना नहीं रह जाता; यह जीवन के एक गहरे सत्य का अनुभव बन जाता है।

सागर-संगम से लौटते समय मन पहले से अधिक हल्का होता है जैसे यात्रा में हमने बहुत कुछ पाया ही नहीं, बल्कि बहुत कुछ छोड़ भी दिया है। जो बोझ लेकर चले थे, उसका कुछ अंश रास्ते में ही उतर गया और उसके स्थान पर एक नई जीवन्तता भीतर उतरती चली गई।

यही नर्मदा की शिक्षा है-वह सिखाती कम है, दिखती अधिक है। कोई प्रेरणा बाहर से थोपनी नहीं पड़ती। पथ पर चलते-चलते, लोगों से मिलते-जुलते, प्रकृति को देखते और अनुभवों से गुजरते हुए बदलाव अपने आप भीतर जन्म लेने लगता है।

परिक्रमा पूरी होने तक लगता है कि हमने जीवन के बारे में बहुत कुछ सीखा नहीं, बल्कि जी लिया है। तब समझ में आने लगता है कि अपनी दिनचर्या में क्या बदलना है, अपने व्यवहार में क्या सुधारना है और स्वयं के भीतर किस तरह का परिवर्तन लाना है। यह परिवर्तन किसी बाहरी प्रेरणा से नहीं आता; माँ की गोद में बच्चे की तरह चलते-चलते, वह सहज ही भीतर उतरता जाता है।

''रे मन! नर्मदा हो जा'' मेरे लिए नर्मदा की यात्रा लिखने का प्रयास भर नहीं, उन क्षणों को सँजोने का प्रयास है, जिन्होंने मुझे भीतर से छुआ, बदला और कुछ नया देखने की दृष्टि दी।

इस यात्रा और इस पुस्तक के पीछे मेरे साहित्यिक गुरु आचार्य संजीव वर्मा ''सलिल'' जी का स्नेह, मार्गदर्शन और आशीर्वाद रहा। उनके विश्वास ने इस यात्रा को शब्द देने का साहस दिया। सलिल जी की ७५ वीं वर्ष ग्रन्थि पर ७५ प्रसंगों में निबद्ध यह संस्मरण-कथा ''तेरा तुझको अर्पित क्या लागे मेरा'' की भावना से उन्हें संमर्पित करते हुए मैं आह्लादित हूँ।

मेरे माता-पिता का विश्वास, मेरे पति का निरंतर सहयोग, बच्चों का उत्साह और पूरे परिवार का स्नेह एवं प्रोत्साहन मेरे लिए हमेशा शक्ति बना रहा। परिवार के हर सदस्य ने मुझे कुछ अच्छा करने के लिए प्रेरित किया और मेरे प्रयासों में अपना विश्वास बनाए रखा।

वे सभी लोग, जो किसी न किसी रूप में मुझसे जुड़े रहे, उनकी आँखों में दिखाई देने वाली उम्मीद भी मेरे लिए बहुत बड़ी प्रेरणा रही। उन्हें विश्वास था कि मैं कुछ अच्छा करूँगी। उस विश्वास को शब्दों में व्यक्त करना संभव नहीं, लेकिन इस पुस्तक के हर पन्ने में उस स्नेह और विश्वास के प्रति मेरी कृतज्ञता अवश्य है।

''रे मन! नर्मदा हो जा'' किसी उपलब्धि का दावा नहीं, बल्कि उन अनुभवों को विनम्रता से ग्रहण करने का प्रयास है, जो माँ नर्मदा ने मेरी झोली में डाले।
जबलपुर                                                                                                                                                                   रेवार्पणम् अस्तु।

२९ जुलाई २०२६                                                                                                                                              नर्मदात्मजा छाया सक्सेना







बुधवार, 12 अगस्त 2026

अगस्त १२, सरस्वती, बधावा, मुकरी, हास्य, मैत्री, भाषा, स्वतंत्र, प्रतिभा, दोहा, यमक, गीत

सलिल सृजन अगस्त १२
*
सरस्वती वंदना:
*
संवत १६७७ में रचित ढोला मारू दा दूहा से सरस्वती वंदना का दोहा :
सकल सुरासुर सामिनी, सुणि माता सरसत्ति.
विनय करीन इ वीनवुं, मुझ घउ अविरल मत्ति..
(सकल स्वरों की स्वामिनी, सुनो सरस्वती मात
विनय करूँ सर नवा दो, अविरल मति सौगात)
*
अम्ब विमल मति दे.....
*
हे हंस वाहिनी! ज्ञानदायिनी!!
अम्ब विमल मति दे.....
*
नन्दन कानन हो यह धरती।
पाप-ताप जीवन का हरती।
हरियाली विकसे.....
*
बहे नीर अमृत सा पावन।
मलयज शीतल शुद्ध सुहावन।
अरुण निरख विहसे.....
*
कंकर से शंकर गढ़ पायें।
हिमगिरि के ऊपर चढ़ जाएँ।
वह बल-विक्रम दे.....
*
हरा-भरा हो सावन-फागुन।
रम्य ललित त्रैलोक्य लुभावन।
सुख-समृद्धि सरसे.....
*
नेह-प्रेम से राष्ट्र सँवारें।
स्नेह समन्वय मन्त्र उचारें।
'सलिल' विमल प्रवहे.....
***
२.
हे हंस वाहिनी! ज्ञानदायिनी!!
अम्ब विमल मति दे.....
जग सिरमौर बने माँ भारत.
सुख-सौभाग्य करे नित स्वागत.
आशिष अक्षय दे.....
साहस-शील हृदय में भर दे.
जीवन त्याग तपोमय करदे.
स्वाभिमान भर दे.....
*
लव-कुश, ध्रुव, प्रहलाद हम बनें.
मानवता का त्रास-तम् हरें.
स्वार्थ सकल तज दे.....
*
दुर्गा, सीता, गार्गी, राधा,
घर-घर हों काटें भव बाधा.
नवल सृष्टि रच दे....
*
सद्भावों की सुरसरि पावन.
स्वर्गोपम हो राष्ट्र सुहावन.
'सलिल' निरख हरषे...
***
३.
हे हंस वाहिनी! ज्ञानदायिनी!!
अम्ब विमल मति दे.....
नाद-ब्रम्ह की नित्य वंदना.
ताल-थापमय सलिल-साधना
सरगम कंठ सजे....
*
रुन-झुन रुन-झुन नूपुर बाजे.
नटवर-नटनागर उर साजे.
रास-लास उमगे.....
*
अक्षर-अक्षर शब्द सजाये.
काव्य, छंद, रस-धार बहाये.
शुभ साहित्य सृजे.....
*
सत-शिव-सुन्दर सृजन शाश्वत.
सत-चित-आनंद भजन भागवत.
आत्मदेव पुलके.....
*
कंकर-कंकर प्रगटें शंकर.
निर्मल करें हृदय प्रलयंकर.
गुप्त चित्र प्रगटे.....
*
४.
हे हंस वाहिनी! ज्ञानदायिनी!!
अम्ब विमल मति दे.....
*
कलकल निर्झर सम सुर-सागर.
तड़ित-ताल के हों कर आगर.
कंठ विराजे सरगम हरदम-
सदय रहें नटवर-नटनागर.
पवन-नाद प्रवहे...
*
विद्युत्छटा अलौकिक वर दे.
चरणों में गतिमयता भर दे.
अंग-अंग से भाव साधना-
चंचल चपल चारू चित कर दे.
तुहिन-बिंदु पुलके....
*
चित्र गुप्त, अक्षर संवेदन.
शब्द-ब्रम्ह का कलम निकेतन.
जियें मूल्य शाश्वत शुचि पावन-
जीवन-कर्मों का शुचि मंचन.
मन्वन्तर महके...
***
भक्ति गीत :
कहाँ गया
*
कहाँ गया रणछोड़ रे!
जला प्रेम की ज्योत
*
कण-कण में तू रम रहा
घट-घट तेरा वास.
लेकिन अधरों पर नहीं
अब आता है हास.
लगे जेठ सम तप रहा
अब पावस-मधुमास
क्यों न गूँजती बाँसुरी
पूछ रहे खद्योत
कहाँ गया रणछोड़ रे!
जला प्रेम की ज्योत
*
श्वास-श्वास पर लिख लिया
जब से तेरा नाम.
आस-आस में तू बसा
तू ही काम-अकाम.
मन-मुरली, तन जमुन-जल
व्यथित विधाता वाम
बिसराया है बोल क्यों?
मिला ज्योत से ज्योत
कहाँ गया रणछोड़ रे!,
जला प्रेम की ज्योत
*
पल-पल हेरा है तुझे
पाया अपने पास.
दिखता-छिप जाता तुरत
ओ छलिया! दे त्रास.
ले-ले अपनी शरण में
'सलिल' तिहारा दास
दूर न रहने दे तनिक
हम दोनों सहगोत
कहाँ गया रणछोड़ रे!
जला प्रेम की ज्योत
***
बधावा
*
***
नन्द घर आनंद है
गूँज रहा नव छंद है
नन्द घरा नंद है
*
मेघराज आल्हा गाते
तड़ित देख नर डर जाते
कालिंदी कजरी गाये
तड़प देवकी मुस्काये
पीर-धीर-सुख का दोहा
नव शिशु प्रगटा, मन मोहा
चौपाई-ताला डोला
छप्पय-दरवाज़ा खोला
बंबुलिया गाये गोकुल
कूक त्रिभंगी बन कोयल
बेटा-बेटी अदल-बदल
गया-सुन सोहर सम्हल-सम्हल
जसुदा का मुख चंद है
दर पर शंकर संत है
प्रगटा आनँदकंद है
नन्द घर आनंद है
गूँज रहा नव छंद है
नन्द घरा नंद है
*
काल कंस पर मँडराया
कर्म-कुंडली बँध आया
बेटी को उछाल फेंका
लिया नाश का था ठेका
हरिगीतिका सुनाई दिया
काया कंपित, भीत हिया
सुना कबीरा गाली दें
जनगण मिलकर ताली दें
भेद न वासुदेव खोलें
राई-रास चरण तोलें
गायें बधावा, लोरी, गीत
सुना सोरठा लें मन जीत
मति पापी की मन्द है
होना जमकर द्वन्द है
कटना भव का फंद
नन्द घर आनंद है
गूँज रहा नव छंद है
नन्द घरा नंद है
***
पुस्तक सलिला :
रसरंगिनी : मनसंगिनी
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
[पुस्तक विवरण : रसरंगिनी, मुकरी संग्रह, तारकेश्वरी यादव 'सुधि', प्रथम संस्करण, वर्ष २०२०, आकार २१ से. मी. x १४ से. मी., आवरण बहुरंगी पेपरबैक, पृष्ठ ४८, मूल्य ६०रु., राजस्थानी ग्रंथागार प्रकाशन जोधपुर, रचनाकार संपर्क : truyadav44@gmailcom ]
*
भारतीय लोक साहित्य में आदिकाल से प्रश्नोत्तर शैली में काव्य सृजन की परंपरा अटूट है। नगरों की तुलना में कम शिक्षित और नासमझ समझे जानेवाले ग्रामीण मजदूर-किसानों ने काम की एकरसता और थकान को दूर करने के लिए मौसमी लोकगीत गाने के साथ-साथ एक दूसरे के साथ स्वस्थ्य छेड़-छाड़ कर ते हुए प्रश्नोत्तरी गायन के शैली विकसित की। इस शैली को समय-समय पर दिग्गज साहित्यकारों ने भी अपनाया। कबीर और खुसरो इस क्षेत्र में सर्वाधिक पुराने कवि हैं जिनकी रचनाएँ प्राप्त हैं। इन दोनों की प्रश्नोत्तरी रचनाएँ अध्यात्म से जुडी हैं। कबीर की रचनाओं में गूढ़ता है तो खुसरों की रचनाओं में लोक रंजकता। कबीर की रचनाएँ साखी हैं तो खुसरो की मुकरी। साखी में सीख देने का भाव है तो मुकरी में कुछ कहना और उससे मुकरने का भाव निहित है।
कबीर ने कहा -
चलती चाकी देखकर, दिया कबीरा रोय
दो पाटन के बीच में, साबित बचो न कोय
कबीर के पुत्र कमाल ने उत्तर दिया-
चलती चाकी देखकर दिया कमाल ठिठोय
जो तीली से लग रहा, मार सका नहीं कोय
ये दोनों दोहे द्विअर्थी हैं। कबीर के दोहे का सामान्य अर्थ है चक्की के दो पाटों के बीच में जो दाना पड़ा वह पिस जायेगा उसे कोई बचा नहीं सकता जबकि गूढ़ार्थ है ब्रह्म और माया के दो पाटों में पीसने से जीव की रक्षा कोई नहीं कर सकता। कमाल के दोहे का सामान्य अर्थ है कि दोनों पाटों से बचकर,चलती हुई चक्की की कीली (धुरी) से जो दाना चिपक गया वह नहीं पिसा, बच गया जबकि विशेषार्थ है संसार की चक्की में जो जीव ब्रह्म से प्रेम कर उससे अभिन्न हो गया उसका यम भी बाल-बाँका नहीं कर सकता।
शब्द कोष के अनुसार मुक़री, संज्ञा स्त्रीलिंग शब्द हैं जिसका अर्थ है एक पद्य जिसमें पहले कथन किया जाए फिर उसका खंडन किया जाए। वह कविता जिसमें प्रारंभिक चरणों में कही हुई बात से मुकरकर उसके अंत में भिन्न अभिप्राय व्यक्त किया जाय। यह कविता प्रायः चार चरणों की होती है इसके पहले तीन चरण ऐसे होते हैं; जिनका आशय दो जगह घट सकता है। इनसे प्रत्यक्ष रूप से जिस पदार्थ या व्यक्ति का आशय निकलता है, चौथे चरण में किसी और पदार्थ का नाम लेकर, उससे इनकार कर दिया जाता है । इस प्रकार मानो कही हुई बात से मुकरते हुए कुछ और ही अभिप्राय प्रकट किया जाता है।
मुकरी लोकप्रचलित पहेलियों का ही एक रूप है, जिसका लक्ष्य मनोरंजन के साथ-साथ बुद्धिचातुरी की परीक्षा लेना होता है। इसमें जो बातें कही जाती हैं, वे द्वयर्थक या श्लिष्ट होती है, पर उन दोनों अर्थों में से जो प्रधान होता है, उससे मुकरकर दूसरे अर्थ को उसी छन्द में स्वीकार किया जाता है, किन्तु यह स्वीकारोक्ति वास्तविक नहीं होती, कही हुई बात से मुकरकर उसकी जगह कोई दूसरी उपयुक्त बात बनाकर कह दी जाती है। जिससे सुननेवाला कुछ का कुछ समझने लगता है। मुकरी और पहेली में साम्य और वैषम्य दोनों है। पहेली में भी प्रश्न और उत्तर होता है किन्तु पहेली का उत्तर उसके पद्य का अंग नहीं होता अपितु पतंग की पूंछ की तरह उससे जुड़ा होकर भी अलग रहता है।
हिन्दी में अमीर खुसरो ने इस लोककाव्य-रूप को साहित्यिक रूप दिया। अलंकार की दृष्टि से इसे छेकापह्नुति कह सकते हैं, क्योंकि इसमें प्रस्तुत अर्थ को अस्वीकार करके अप्रस्तुत को स्थापित किया जाता है। इसे ‘कह-मुकरी’ अर्थात पहले कहना और फिर मुकर जाना भी कहते हैं। हिन्दी में अमीर खुसरो की मुकरियाँ प्रसिद्ध हैं। खुसरो इसके अंत में प्राय: 'सखी' या 'सखिया' भी कहते हैं । एक जीवंत उदाहरण देखें -
सगरि रैन वह मो संग जागा।
भोर भई तब बिछुरन लागा।
वाके बिछरत फाटे हिया।
क्यों सखि साजन? ना सखि दिया।
भारतेन्दु हरिश्चंद्र रचित एक मुकरी का आनंद लें -
भीतर भीतर सब रस चूसै,
हँसि हँसि कै तन मन धन मूसै।
जाहिर बातन मैं अति तेज,
क्यों सखि सज्जन?
नहिं अँगरेज।
इस सदी के आरंभ में मैंने भी कुछ मुकरियाँ कहीं। एक उदाहरण देखें -
इससे उसको जोड़ मिलाता
झटपट दूरी दूर भगाता
कोई स्वार्थ न कोई हेतु
क्या सखि साजन, ना सखि सेतु।
२०११ में प्रकाशित योगराज प्रभाकर रचित एक मुकरी देखें -
इस बिन तो वन उपवन सूना,
सच बोलूँ तो सावन सूना,
सूनी सांझ है सूनी भोर,
ए सखि साजन ? ना सखि मोर !
अगस्त २०१७ में मंतव्य पत्रिका ने डॉ. प्रदीप शुक्ल की ४८० मुकरियों को एक १६७ पृष्ठीय विशेषांक के रूप में प्रकाशित किया। एक मुकरी का अवलोकन करें -
जब आये वो धूम मचाये,
मुझको रातों रात जगाये,
जाने उससे कौन लगाव,
ए सखि साजन ? नहीं चुनाव!
इंजी. त्रिलोक सिंह ठकुरेला (मुकरी संग्रह आनंद मंजरी) ने भी मुकरी लेखन की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया है। उनकी कहमुकरी विषय वैविध्य की दृष्टी से महत्वपूर्ण हैं। एक बानगी पेश है-
जैसे चाहे वह तन छूता।
उसको रोके, किसका बूता।
करता रहता अपनी मर्जी।
क्या सखि, साजन ? ना सखि, दर्जी।
कह मुकरियाँ सृजन के क्रम की नवीनतम कड़ी हैं तारकेश्वरी यादव 'सुधि' जिन्होंने १२० मुकरियों का संग्रह 'रसरंगिनी' शीर्षक से प्रकाशित किया है। इन मुकरियों में शिल्प की दृष्टि से चार पंक्तियाँ हैं जिनमें १६-१६ मात्राएँ हैं। प्रथम दो पंक्तियों में सामान तुकांत है जबकि शेष दो पंक्तियों में भिन्न समान तुकांत है। अंतिम पंक्ति का आठ मात्रिक प्रथम चरण प्रश्न का उत्तर देते हुए पूर्ण होता है जबकि आठ मात्रिक दूसरे चरण में इसे नकार कर वैकल्पिक उत्तर दिया जाता है। पूर्ववर्ती कवियों ने भिन्न छंदों, पंक्ति संख्या तथा यति का प्रयोग किया है किंतु सुधि जी ने आजकल प्रचलि सोलह मात्रिक चार चरणों में ही मुकरी कही है। इस संग्रह में ईश्वर, डॉक्टर, डाकिया, मनिहार, मालिन, चौकीदार, आँगन, सपना, पायल, दर्पण, काजल, सागर, बसंत, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, बेलन, मंच्छर, आदि पारंपरिक विषयों के साथ-साथ गूगल, मोबाइल, डायरी, चाय, हलवा, टेलीविजन जैसी दैनंदिन उपयोग की वस्तुओं पर भी मुकरियाँ कही गयीं हैं।
तारकेश्वरी की मुकरियों की 'कहन' सहज बोध गम्य है। उनकी भाषा सरल है। वे क्लिष्ट शब्दों का उपयोग न कर मुकरी के रसानंद में पाठक को निमग्न होने देती हैं।
जब भी बैठा थाम कलाई
मैं मन ही मन में इतराई
नहीं कर पाती मैं प्रतिकार
क्या सखि साजन? नहीं, मनिहार
प्रकृति के उपादान बादल सागर, अँधेरा, आदि उन्हें प्रिय हैं।
रात गए वह घर में आता
सुबह सदा ही जल्दी जाता
दिन में जाने किधर बसेरा
काया सखि साजन? नहीं अँधेरा
किसी वास्तु के लक्षणों के मध्यान से उसका शब्दांकन करना मुकरी की विशेषता है। तारकेश्वरी इस कला में दक्ष हैं -
जैसी हूँ वैसी बतलाये
सत्य बोलना उसे सुहाए
मेरा मुझको करता अर्पण
क्या सखि साजन? ना सखी दर्पण
सप्ताह के छह दिन काम करने के बाद इतवार की सब को प्रतीक्षा रहती है। तारकेश्वरी की मुकरी भी अपवाद नहीं है -
जब वह आता देता खुशियाँ
बात जोहती मेरी अँखियाँ
फरमाइश का लगे अंबार
क्या सखि साजन? नहीं इतवार
सुगृहणी का काम छलनी के बिना नहीं चलता, 'सार सार को गहि रहे' जैसे गुण की धनी छलनी पर मुकरी में 'मनहरनी' शब्द का प्रयोग नवता लिए है-
सार-सार वह मुझको देती
अपशिष्टों को खुद रख लेती
इसीलिये है वह मनहरनी
क्या प्रिय सजनी? ना प्रिय छलनी
सुबह उठते ही चाय के तलब सबको लगती है। 'चाय' पर मुकरी अच्छी बन पड़ी है -
जब भी होठों को छू जाए
तन-मन की सब थकन मिटाए
उसका कोई नहीं पर्याय
क्या सखि साजन? ना सखि चाय
टेलीविजन आजकल जीवन की अनिवार्यता बन गया है। तारकेश्वरी का मुकरी लोक भला कैसे इससे दूर रह सकता है? इसमें अंतिम पंक्ति मात्राधिक्य की शिकार हो गयी है।
जब मैं चाहूँ तब वह बोले
अगर रोक दूँ मुँह ना खोले
अक्सर वह बहलाता है मन
क्या सखि साजन ? ना सखि टेलीविजन
बिखरते परिवार और घर-घर में उठी दीवार एक अप्रिय सत्य है। तारकेश्वरी मुकरी में इस स्थिति से आँखें चार करती हैं-
खंडित करती भाई चारा
पल में कर दे वह बँटवारा
बिखरा देती घर-परिवार
क्या सखी साजन? नहीं दीवार
मीरा पर मुकरी कहते समय तारकेश्वरी 'प्रेम दीवानी' विशेषण का प्रयोग करती हैं।
वह तो पगली प्रेम दीवानी
समझाया पर बात न मानी
उसे लुभाये ढोल मंजीरा
क्या प्रिय सजनी? नाप्रिय मीरा
मुकरी विधा को समृद्ध करने में तारकेश्वरी 'सुधि' का अवदान महत्वपूर्ण है। उन्हें बधाई। अपवाद स्वरूप मात्राधिक्य व लयभंग के बावजूद इन मुकरियों में पाठक को बाँधने की सामर्थ्य है।
***
विमर्श: बचाओ पर्वत, घाटी, जमीन और सागर
महासागरों का पानी पीने-योग्य मीठा व पौष्टिक होता तो सम्भवतय इंसान पर्वतों को समतल करके गगनचुंबी होटल्स, मोल्स, फ्लैट्स बनाकर नदियों को विलुप्त करवाकर उनकी तलछटी में झुग्गी-झोंपड़ियाँ बसा चूका होता; महासागरों को गट्टर में बदलकर फेसबुक-युग आने से पहले विलुप्त हो चूका होता! सौभाग्य से महासागरों का पानी खारा और लवणीय है; पीने के योग्य नहीं है; महासागरों की बदौलत पर्वतों की चोटियों पर जमा हुई बर्फ पिघलकर नदियों के रूप में बहती है और धरती पर जीवन का आधार बनती है! बर्फ पिघलने से बना पानी मीठा तो होता है लेकिन उसमें पौष्टिकता पर्वतों की वनस्पति व पत्थरों से आती है! मीठे-पौष्टिक पानी हेतु पर्वतों व पर्वतों की प्राकृतिक सुन्दरता, रमणीयता व स्वच्छता को सुरक्षित व संरक्षित करना यानी पर्वतों एवं नदियों के बहाव-क्षेत्रों में आवाजाही, आवास व उद्योगीकरण को नियंत्रित रखना अत्यंत ही जरूरी है! जीवन है तो सबकुछ है यानी पर्वतों व नदियों के संरक्षण के सामने हिंदुत्व, इस्लाम, राष्ट्रवाद आदि शब्द महत्वहीन हैं! >>> तथाकथित राजनीतिज्ञ व नेता राजनीति की किताब को ‘राजनीतिक-विज्ञान’ तो कहते हैं, लेकिन राजनीति करते समय ‘विज्ञान’ को भूल जाते हैं! फलस्वरूप राजनीति पर ‘अज्ञानता’ व ‘मूर्खता’ हावी होकर भारतीय-उपमहाद्वीप का दुर्भाग्य बनकर उभरती है; धूर्तता, पाखण्ड, नौटंकी की बदौलत लोकतंत्र कब्बडी की प्रतियोगिता जैंसा बन गया है; नासमझ भावुक आमजन इस कब्बडी-प्रतियोगिता में चलरही दांव-पेच से मंत्रमुग्ध होकर सबकुछ भूल जाता है: नेताओं के आका पूंजीपति अपना सिट्टा-सेककर साफसुथरी रमणीक जगह पर रैनबसेरा बनाकर ठाठ से रहते हैं! >>> पर्वतों व नदियों के बहाव-क्षेत्रों में आवाजाही, आवास व उद्योगीकरण बढ़ने का ही परिणाम है कि आम-इंसान की औसत प्राकृतिक-आयु 40 वर्ष है, 40 के बाद उसकी औषधीय-आयु शुरू हो जाती है!
१२.८.२०२०
***
हास्य रचना:
उल्लू उवाच
मुतके दिन मा जब दिखो, हमखों उल्लू एक.
हमने पूछी: "कित हते बिलमे? बोलो नेंक"
बा बोलो: "मुतके इते करते रैत पढ़ाई.
दो रोटी दे नई सके, बो सिच्छा मन भाई.
बिन्सें ज्यादा बड़े हैं उल्लू जो लें क्लास.
इनसें सोई ज्यादा बड़े, धरें परिच्छा खास.
इनसें बड़े निकालते पेपर करते लीक.
औरई बड़े खरीदते कैते धंधा ठीक.
करें परीच्छा कैंसिल बिन्सें बड़े तपाक.
टीवी पे इनसें बड़े, बैठ भौंकते आप.
बिन्सें बड़े करा रए लीक काण्ड की जाँच.
फिर से लेंगे परिच्छा, और बड़े रए बाँच
इतने उल्लुन बीच में अपनी का औकात?
एई काजे लुके रए, जान बचाखें भ्रात.
***
गीत:
हर दिन मैत्री दिवस मनायें.....
*
हर दिन मैत्री दिवस मनायें.....
*
होनी-अनहोनी कब रुकती?
सुख-दुःख नित आते-जाते हैं.
जैसा जो बीते हैं हम सब
वैसा फल हम नित पाते हैं.
फिर क्यों एक दिवस मैत्री का?
कारण कृपया, मुझे बतायें
हर दिन मैत्री दिवस मनायें.....
*
मन से मन की बात रुके क्यों?
जब मन हो गलबहियाँ डालें.
अमराई में झूला झूलें,
पत्थर मार इमलियाँ खा लें.
धौल-धप्प बिन मजा नहीं है
हँसी-ठहाके रोज लगायें.
हर दिन मैत्री दिवस मनायें.....
*
बिरहा चैती आल्हा कजरी
झांझ मंजीरा ढोल बुलाते.
सीमेंटी जंगल में फँसकर-
क्यों माटी की महक भुलाते?
लगा अबीर, गायें कबीर
छाछ पियें मिल भंग चढ़ायें.
हर दिन मैत्री दिवस मनायें.....
*
गीत
करो आचमन.
*
भाषा तो प्रवहित सलिला है
आओ! तट पर,
अवगाहो या करो आचमन .
*
जीव सभ्यता ने ध्वनियों को
जब पहचाना
चेतनता ने भाव प्रगट कर
जुड़ना जाना.
भावों ने हरकर अभाव हर
सचमुच माना-
मिलने-जुलने से नव रचना
करना ठाना.
ध्वनि-अंकन हित अक्षर आये
शब्द बनाये
मानव ने नित कर नव चिंतन.
भाषा तो प्रवहित सलिला है
आओ! तट पर,
अवगाहो या करो आचमन .
*
सलिला की कलकलकल सुनकर
मन हर्षाया.
सांय-सांय सुन पवन झकोरों की
उठ धाया.
चमक दामिनी की जब देखी, तब
भय खाया.
संगी पा, अपनी-उसकी कह-सुन
हर्षाया.
हुआ अचंभित, विस्मित, चिंतित,
कभी प्रफुल्लित
और कभी उन्मन अभिव्यंजन.
भाषा तो प्रवहित सलिला है
आओ! तट पर,
अवगाहो या करो आचमन .
*
कितने पकडे, कितने छूटे
शब्द कहाँ-कब?
कितने सिरजे, कितने लूटे
भाव बता रब.
अपना कौन?, पराया किसको
कहो कहें अब?
आये-गए कहाँ से कितने
जो बोलें लब.
थाती, परिपाटी, परंपरा
कुछ भी बोलो
पर पालो सबसे अपनापन.
भाषा तो प्रवहित सलिला है
आओ! तट पर,
अवगाहो या करो आचमन .
* * *
नवगीत
*
हैं स्वतंत्र पर
तंत्र न अपना
दाल दले छाती पर
*
गए विदेशी दूर
स्वदेशी अफसर
हुए पराए.
सत्ता-सुविधा लीन
हुए जन प्रतिनिधि
खेले-खाए.
कृषक, श्रमिक,
अभियंता शोषित
शिक्षक है अस्थाई.
न्याय व्यवस्था
अंधी-बहरी, है
दयालु नाती पर
हैं स्वतंत्र पर
तंत्र न अपना
दाल दले छाती पर
*
अस्पताल है
डॉक्टर गायब
रोगी राम भरोसे.
अंगरेजी में
मँहगी औषधि
लिखें, कंपनी पोसे.
दस प्रतिशत ने
अस्सी प्रतिशत
देश संपदा पाई.
देशभक्त पर
सौ बंदिश हैं
कृपा देश-घाती पर
हैं स्वतंत्र पर
तंत्र न अपना
दाल दले छाती पर
***
गीत
प्रतिभा खुद में वन्दनीय है...
*
प्रतिभा खुद में वन्दनीय है...
*
प्रतिभा मेघा दीप्ति उजाला
शुभ या अशुभ नहीं होता है.
वैसा फल पाता है साधक-
जैसा बीज रहा बोता है.
शिव को भजते राम और
रावण दोनों पर भाव भिन्न है.
एक शिविर में नव जीवन है
दूजे का अस्तित्व छिन्न है.
शिवता हो या भाव-भक्ति हो
सबको अब तक प्रार्थनीय है.
प्रतिभा खुद में वन्दनीय है.....
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अन्न एक ही खाकर पलते
सुर नर असुर संत पशु-पक्षी.
कोई अशुभ का वाहक होता
नहीं किसी सा है शुभ-पक्षी.
हो अखंड या खंड किन्तु
राकेश तिमिर को हरता ही है.
पूनम और अमावस दोनों
संगिनीयों को वरता भी है
भू की उर्वरता-वत्सलता
'सलिल' सभी को अर्चनीय है.
प्रतिभा खुद में वन्दनीय है.
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कौन पुरातन और नया क्या?
क्या लाये थे?, साथ गया क्या?
राग-विराग सभी के अन्दर-
क्या बेशर्मी और हया क्या?
अतिभोगी ना अतिवैरागी.
सदा जले अंतर में आगी.
नाश और निर्माण संग हो-
बने विरागी ही अनुरागी.
प्रभु-अर्पित निष्काम भाव से
'सलिल'-साधना साधनीय है.
प्रतिभा खुद में वन्दनीय है.
१२.८.२०१७
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दोहा सलिला
गले मिले दोहा यमक
संजीव
देव! दूर कर बला हर, हो न करबला और
जाई न हो अन्याय अब, चले न्याय का दौर
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'सलिल' न हो नवजात की, अब कोई नव जात
मानव मानव एक हो, भेद रहे अज्ञात
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अबला सबला या बला, बतलायेगा कौन?
बजे न तबला शीश पर, बेहतर रहिए मौन
१२.८.२०१४
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गीत:
चुनौतियों के आँधी-तूफां.....
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चुनौतियों के आँधी-तूफां मुझको किंचित डिगा न पाये.
अपने सपने पतझर में इस तरह झरे वीरान कर गये ...
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संबंधों की मृग-मरीचिका, अनुबंधों के मिले भुलावे.
स्नेह-प्रेम का ओढ़ आवरण, पग-पग पर छल गए छलावे..
अनजाने लगते अपने हैं, अपने अपनापन सपने हैं.
छेद हुआ पेंदी में जिनके, बेढब दुनियावी नपने हैं..
अपनी-अपनी कहें बेसुरे, कोई किसी की नहीं सुन रहा.
हाय! इमारत का हर पत्थर, अलग-अलग निज शीश धुन रहा..
सत्ता-सियासती मौसम में, बिन मारे सद्भाव मर गए.
अपने सपने पतझर में इस तरह झरे वीरान कर गये ...
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अपने मत को सत्य मानना, मीता! बहुत सहज होता है.
केवल अपना सच ही सच है, जो कहता सच को खोता है..
अलग-अलग सुर-ताल मिलें जब, राग-रागिनी तब बन पाती.
रंग-बिरंगे तरह-तरह के, फूलों से बगिया सज पाती..
अपनी सीमा निर्धारित कर, कैद कर रहे खुद ही खुद को.
मन्दिर में भगवान समाता, कैसे? पूज रहे हैं बुत को..
पूर्वाग्रह की सुदृढ़ बेड़ियाँ, जेवर कहकर पहन घर गए.
अपने सपने पतझर में इस तरह झरे वीरान कर गये ...
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बड़े-बड़े घावों पर मलहम, समय स्वयं ही रहा लगता.
भूली-बिसरी याद दिला मन, चोटों पर कर चोट दुखाता..
निर्माणों की पूर्व पीठिका, ध्वंस-नाश में ही होती है.
हर सिकता-कण, हर चिनगारी, जीवन की वाहक होती है..
कंकर-कंकर को शंकर कर, प्रलयंकर अभ्यंकर होता.
विधि-शारद, हरि-श्री शक्तित हों, तब जागृत मन्वन्तर होता.
रतिपति मति-गति अभिमंत्रित कर, क्षार हुए, साहचर्य वर गए.
अपने सपने पतझर में इस तरह झरे वीरान कर गये ...
१२-८-२०१०

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