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बुधवार, 22 जुलाई 2026

जुलाई २२, मस्तिष्क दिवस, ग़जल, मेघ, सॉनेट, नवगीत, पुरखे, मनहरण, यमक, हाड़ौती, दोहे

 सलिल सृजन जुलाई २२

विश्व मस्तिष्क दिवस
*
सामयिक गीत ० दिल्ली पुलिस लाख धिक्कार ० जनसेवक जनमित्र नहीं तुम, न ही देश के भक्त हो। चरण चूमते नेताओं के राजनीति अनुरक्त हो। जो भी कहीं सुधार माँगता उस पर करते अत्याचार दिल्ली पुलिस लाख धिक्कार ० खाकी वर्दी मारपीट का क्यों बन गई प्रतीक है। निर्दोषों का खून बहे गोरे डायर की लीक है।। शर्म करो कुछ बेटी-बेटे रोक रहे हैं चीख-पुकार दिल्ली पुलिस लाख धिक्कार ० अपराधी से साँठगाँठ है नेताओं के पहरेदार। जन-धन से वेतन पा करते जन-गण पर ही अत्याचार। लोकतंत्र को शोकतंत्र में बदल दिया झेलो फटकार दिल्ली पुलिस लाख धिक्कार ०००
सामयिक दोहे ० नाकाबिल मंत्री बने, असफल शासन-नीति। गल्ती मान सुधार लें, सीख न पाए रीति।। . हैं भविष्य इस देश का, तरुण तरुणियाँ सत्य। अनाचार करती पुलिस, निंदनीय है कृत्य।। . असंतोष हो जहाँ भी, करते नहीं विमर्श। बुलडोजर किंचित नहीं, जनतंत्री आदर्श।। . लोकतंत्र का प्राण है, आपस में संवाद। मन की बात न सार्थक, अगर न वाद-विवाद।। . लांछित करे विपक्ष को, यह न पक्ष का काम। संसद दोनों से बने, झुक मिल करिए नाम।। . कुशाभाऊ सम हो अगर, निर्मल पाक चरित्र। महकें जीवन भर विहँस, जैसे महके इत्र।। . नाना जी सम समर्पण, और सादगी साध्य। लाखों के मँहगे वसन, लोलुप के आराध्य।। . मिलनसारिता अटल सी, मिटा सके अलगाव। आदर मिले सभी जगह, जन का बढ़े प्रभाव।। . बदला चित्र चरित्र तो, बिसरे दीनदयाल। मंदिर में डाकाजनी, पर उन्नत है भाल।। . महाशक्ति के हाथ क्यों, बने खिलौना मौन। प्रैस वार्ता से डरे, दुनिया जाने कौन? . सुलझ न पाए परिस्थिति, दें पिछलों को दोष। जनता सच समझे मगर, रोके रहती रोष।। . एक इंच भी भूमि जब, सत्ता सके न छोड़। हो विनाश संवाद बिन, देता दामन छोड़।। . द्वारे गया विपक्ष तो, पिला न पाए चाय। साथ बैठने से खुले, सद्भावी अध्याय।। . सत्ता निर्बल पर करे, बल प्रयोग हो दीन। रक्त सड़क पर बहाती, वह सत्ता जो दीन।। २२.७.२०२६
०००

ग़जलिका
मत हो चंचल
मन रह अविचल
देख रहा वह
कण-कण हर पल
देख सका है
कहो कौन कल?
छलिए पर जय
पाने कर छल
सबल वही जो
निर्बल का बल
यदि कल उगना
आज मौन ढल
सलिल नयन में
बन सपना पल
२२.७.२०२५
०0०
मेघ
मेघदूत संदेश यक्ष का पहुँचाना भूले,
मेघासुर सम रूप बदलकर लड़ते-भिड़ते हैं,
पवन झुलाता झूला फिर भी शांत न होते हैं,
गरज गरज कर गुस्सा करते, गिरते-उठते हैं।
मल्ल लड़ाते पंजा, पल पल दांँव बदलते हैं,
झपट पकड़ते, बगली देते, टाँग अड़ाते हैं,
रपट फिसलते, सँभल न गिरते, मचल लपकते हैं,
कुछ न किसी को कभी समझते फँसा-गिराते हैं।
रूपवती दामिनी अदा दिखला भरमा गिरती,
घर घमंड का खाली होता फूटे जल-गगरी,
कोष लुटा सिर पीटें पर तकदीर नहीं जगती,
ठेंगा दिखा भागती आती हाथ न गिर बिजुरी।
वसुधा गिरा सलिल संचित कर हँस हरियाती है।
जब दिखता है कहीं बदरवा, मोद मनाती है।।
२२-७-२०२३
•••
छंद सलिला : सॉनेट
तिरंगा
ध्वज न केवल मैं तिरंगा
चिरंतन बलिदान हूँ मैं
लोक के हित सदा बेकल
सनातन अरमान हूँ मैं
सद्भाव हूँ मैं, शांति हूँ
चाहता सबका भला नित
नव सृजन की क्रांति भी हूँ
साध्य केवल लोक का हित
हरितिमा हूँ, भाग्य-भाषा
अहर्निश उन्नति-परिश्रम
स्वेद उपजी नवल आशा
जन प्रगति का चक्र अनुपम
आत्म जेता लो न पंगा
ध्वज न केवल मैं तिरंगा
(शेक्सपीरियन सॉनेट)
●●●
छंद सलिला : (अभिनव प्रयोगः प्रदोष सॉनेट)
मुखिया
नव मुखिया को नमन है
सबके प्रति समभाव हो
अधिक न न्यून लगाव हो
हर्षित पूरा वतन है
भवन-विराजी है कुटी
जड़ जमीन से है जुड़ी
जीवटता की है धनी
धीरज की प्रतिमा धुनी
अग्नि परीक्षा है कड़ी
दिल्ली के दरबार में
सीता फिर से है खड़ी
राह न किंचित सहज है
साथ सभी का मिल सके
यह संयोग न महज है
२२-७-२०२२
•••
छंद सलिला : (अभिनव प्रयोगः प्रदोष सॉनेट)
प्रदोष रहिए खुशी से
हमेशा करें व्रत-कथा
जीतें हर बाधा-व्यथा
आशीष मिले शिवा से
प्रदोष रचिए हमेशा
अठ-पच कल मिल खेलिए
सुख-दुख सम चुप झेलिए
विनम्र रहिए हमेशा
गुरु लघु हो न पदांत में
आस्था मिले न भ्रांत में
रखिए शांति दिनांत में
चौदह पद सॉनेट में
चौ चौ चौ दो या रहे
चौ चौ त्रै त्रै पद सदा
२२-७-२०२२
•••
नवगीत
तुम्हें प्रणाम
*
मेरे पुरखों!
तुम्हें प्रणाम।
*
सूक्ष्म काय थे,
चित्र गुप्त विधि ,
अणु-परमाणु-विषाणु विष्णु हो धारे तुमने।
कोष-वृद्धि कर
'श्री' पाई है।
जल-थल--नभ पर
कीर्ति-पताका
फहराई है।
पंचतत्व तुम
नाम अनाम।
मेरे पुरखों!
तुम्हें प्रणाम।
*
भू-नभ
दिग्दिगंत यश गाते।
भूत-अभूत तुम्हीं ने नाते, बना निभाए।
द्वैत दिखा,
अद्वैत-पथ वरा।
कहा प्रकृति ने
मनुज है खरा।
लड़, मर-मिटे
सुरासुर लेकिन
मिलकर जिए
रहे तुम आम।
मेरे पुरखों!
तुम्हें प्रणाम।
*
धरा-पुत्र हे!
प्रकृति-मित्र हे!
गही विरासत हाय! न हमने, चूक यही।
रौंद प्रकृति को
'ख़ास' हो रहे।
नाश बीज का
आप बो रहे।
खाली हाथों
जाना फिर भी
जोड़ मर रहे
विधि है वाम।
२२-७-२०१९
***
मुक्तक
दीप्ति तम हरकर उजाला बाँट दे
अब न शर्मा शतक से तम छांट दे
दस दिशाओं से सुनो तुम तालियाँ
फाइनल लो जीत धोबीपाट दे
*
एकता है तो मिलेगी विजय भी
गेंद की गति दिशा होगी मलय सी
खाए चक्कर ब्रिटिश बल्लेबाज सब
तिरंगा फ़हरा सके, हो जयी भी
***
महिला क्रिकेट के दोहे
स्मृति का बल्ला चला, गेंद हुई रॉकेट.
पलक झपकते नभ छुए, गेंदबाज अपसेट.
*
कैसे करती अंगुलियाँ, पल में कहो कमाल.
मात दे रही पेस से, झूलन मचा धमाल.
*
दीप्ति कौंधती दामिनी, गिरे उड़ा दे होश.
चमके दमके निरंतर, कभी न रीते कोश.
*
पूनम उतरी तो हुई, अजब अनोखी बात.
घिरे विपक्षी तिमिर में, कहें अमावस तात.
*
शर संधाना तो हुई, टीम विरोधी ढेर.
मंधाना के वार से, नहीं किसी की खैर.
२२.७.१७
***
मनहरण छन्द
विधान: 8-8-8-7 वर्ण
.
चीनियों को ठोंककर, पाकियों को पीटकर, फ़हरा तिरंगा आज, हम मुसकाएँगे.
लाख मतभेद रहें, पर मनभेद ना हों, जन गण मन, वंदे मातरम गाएँगे.
सिक्किम भूटान नेपाल की न बात करो, तिब्बत को भी 'सलिल', आजाद हम कराएँगे.
भारत के भाग, किसी वक्त जो अलग हुए, एक साथ जोड़, आर्यावर्त हम बनाएँगे.
***
गीत
कारे बदरा
*
आ रे कारे बदरा
*
टेर रही धरती तुझे
आकर प्यास बुझा
रीते कूप-नदी भरने की
आकर राह सुझा
ओ रे कारे बदरा
*
देर न कर अब तो बरस
बजा-बजा तबला
बिजली कहे न तू गरज
नारी है सबला
भा रे कारे बदरा
*
लहर-लहर लहरा सके
मछली के सँग झूम
बीरबहूटी दूब में
नाचे भू को चूम
गा रे कारे बदरा
*
लाँघ न सीमा बेरहम
धरा न जाए डूब
दुआ कर रहे जो वही
मनुज न जाए ऊब
जारे कारे बदरा
*
हरा-भरा हर पेड़ हो
नगमे सुना हवा
'सलिल' बूंद नर्तन करे
गम की बने दवा
जारे कारे बदरा
२२-७-२०१६
***
दोहा-यमक
*
गले मिले दोहा यमक, गणपति दें आशीष।
हो समृद्ध गणतंत्र यह, गणपति बने मनीष।।
*
वीणावादिनि शत नमन, साध सकूं कुछ राग ।
वीणावादिनि है विनत, मन में ले अनुराग। ।
*
अक्षर क्षर हो दे रहा, क्षर अक्षर ज्ञान।
शब्द ब्रह्म को नमन कर, भव तरते मतिमान।।
*
चित्र गुप्त है चित्र में, देख सके तो देख।
चित्रगुप्त प्रति प्रणत हो, अमिट कर्म का लेख।।
*
दोहा ने दोहा सदा, भाषा गौ को मीत।
गीत प्रीत के गुँजाता, दोहा रीत पुनीत।।
*
भेंट रहे दोहा-यमक, ले हाथों में हार।
हार न कोई मानता, प्यार हुआ मनुहार।।
*
नीर क्षीर दोहा यमक, अर्पित पिंगल नाग।
बीन छंद, लय सरस धुन, झूम उठे सुन नाग।।
*
गले मिले दोहा-यमक, झपट झपट-लिपट चिर मीत।
गले भेद के हिम शिखर, दमके ऐक्य पुनीत।।
*
ग्यारह-तेरह यति रखें, गुरु-लघु हो पद अंत।
जगण निषिद्ध पदादि में, गुरु-लघु सम यति संत।।
*
नाहक हक ना त्याग तू, ना हक पीछे भाग।
ना मन में अनुराग रख, ना तन में बैराग।।
*
ना हक की तू माँग कर, कर पहले कर कर्तव्य।
नाहक भूला आज को, सोच रहा भवितव्य।।
२२-६-२०१६
***
एक रचना:
का बिगार दओ?
*
काए फूँक रओ बेदर्दी सें
हो खें भाव बिभोर?
का बिगार दो तोरो मैंने
भइया रामकिसोर??
*
हँस खेलत ती
संग पवन खें
पेंग भरत ती खूब।
तेंदू बिरछा
बाँह झुलाउत
रओ खुसी में डूब।
कें की नजर
लग गई दइया!
धर लओ मो खों तोर।
का बिगार दो तोरो मैंने
भइया रामकिसोर??
*
काट-सुखा
भर दई तमाखू
डोरा दओ लपेट।
काय नें समझें
महाकाल सें
कर लई तुरतई भेंट।
लत नें लगईयो
बीमारी सौ
दैहें तोय झिंझोर
का बिगार दो तोरो मैंने
भइया रामकिसोर??
*
जिओ, जियन दो
बात मान ल्यो
पीओ नें फूकों यार!
बढ़े फेंफडे में
दम तुरतई
गाड़ी हो नें उलार।
चुप्पै-चाप
मान लें बतिया
सुनें न कौनऊ सोर।
का बिगार दो तोरो मैंने
भइया रामकिसोर??
*
अपनों नें तो
मेहरारू-टाबर
का करो ख़याल।
गुटखा-पान,
बिड़ी लत छोड़ो
नई तें होय बबाल।
करत नसा नें
कब्बऊ कौनों
पंछी, डंगर, ढोर।
का बिगार दो तोरो मैंने
भइया रामकिसोर??
*
बात मान लें
निज हित की जो
बोई कहाउत सयानो।
तेन कैसो
नादाँ है बीरन
साँच नई पहचानो।
भौत करी अंधेर
जगो रे!
टेरे उजरी भोर।
का बिगार दो तोरो मैंने
भइया रामकिसोर??
*
२१-११-२०१५
कालिंदी विहार लखनऊ
***
हाड़ौती मुक्तिका:
*
तनखा पूड़ी, घूस मलाई
मत देखै तू पीर पराई
.
अंग्रेजी में गिट-पिट कर लै
हिंदी की मत करै पढ़ाई
.
बेसी धन सूं मन हरखायो
आछी लागी श्याम कमाई
.
कंसराज को खाड कालज्यो
लार सुदामा करी मिताई
.
बना भेंट कै नाक चढ़ावै
ऊँ ई सांचो जगत गुसाई
.
धोला कपड़ा, मैला मन सूं
भव सागर सूँ पार न्ह पाई
.
आतंकी रावण की लंका
सिरी राम ने जा'र ढहाई
.
आपण सबका पाप धो'र भी
यार 'सलिल' नंदी हरखाई
***
दोहे का रंग कविता के संग
*
बाहर कम भीतर अधिक जब-जब झाँकें आप
तब कविता होती प्रगट, अंतर्मन में व्याप
*
औरों की देखें कमी, दुनिया का दस्तूर
निज कमियाँ देखो बजे, कविता का संतूर
*
कविता मन की संगिनी, तन से रखे न काम
धन से रहती दूर यह, प्रिय जैसे संतान
*
कविता सविता तिमिर हर, देते दिव्य प्रकाश
महक उठे मन-मोगरा, निकट लगे आकाश
*
काव्य -कामिनी ने कभी, करी न कोई चाह
बैठे चुप थक-हारकर, कांत न पाएं थाह
***
मुक्तिका
*
मापनी: २१२२ १२१२ २२
*
आँख से आँख जब मिलाते हैं
ख्वाहिशें आप क्यों छिपाते हैं?
आइना गैर को दिखाते हैं
और खुद से नज़र चुराते हैं
वक़्त का दे रहे दुहाई जो
फ़र्ज़ का क़र्ज़ कब चुकाते हैं?
रौशनी भीख माँगती उनसे
जो मशालें जला उठाते हैं
मैं 'सलिल' ज़िंदगी का जीवन हूँ
आप बेकार क्यों बहाते हैं?
२२-७-२०१५
***
गीतः
सुग्गा बोलो
जय सिया राम...
*
सुग्गा बोलो
जय सिया राम...
*
काने कौए कुर्सी को
पकड़ सयाने बन बैठे
भूल गये रुकना-झुकना
देख आईना हँस एँठे
खिसकी पाँव तले धरती
नाम हुआ बेहद बदनाम...
*
मोहन ने फिर व्यूह रचा
किया पार्थ ने शर-सन्धान
कौरव हुए धराशायी
जनगण सिद्ध हुआ मतिमान
खुश मत हो, सच याद रखो
जन-हित बिन होगे गुमनाम...
*
हर चूल्हे में आग जले
गौ-भिक्षुक रोटी पाये
सांझ-सकारे गली-गली
दाता की जय-जय गाये
मौका पाये काबलियत
मेहनत पाये अपना दाम...
२२-७-२०१४
***

मंगलवार, 21 जुलाई 2026

जुलाई २१, सेमल, सॉनेट, हाइकु, माहिया, दोह, मुक्त्क, सुगती, दीप, निधि, छंद, लघुकथा, वर्ष गीत

 सलिल सृजन जुलाई २१

0
सामयिक गीत . देश हमारा है, सरकार हमारी है फिर क्यों आईं बुलडोजर की बारी है? . हमने जिनको जनसेवा के हेतु चुना। वे ही जन से दूर हुए सिर लिए तना।। अहंकार ने नाप बताया छाती का- निज महिमा मंडन का भ्रामक पंथ चुना।। आत्म मोह की नागिन नित फुँफकारी है देश हमारा है, सरकार हमारी है फिर क्यों आईं बुलडोजर की बारी है? . पक्ष-विपक्ष न दुश्मन, हैं दोनों आँखें। कैसे उड़े परिंदा अगर न दो पाँखें।। जड़ होती मजबूत वृक्ष की केवल तब जब होती हैं अलग दिशाओं में शाखें।। मतभेदों में सहमति, राह बिसारी है देश हमारा है, सरकार हमारी है फिर क्यों आईं बुलडोजर की बारी है? . हर दल हिस्सा लोकतंत्र का है मानो। बहुमत पा मत कुचलो औरों को स्यानो।। सबका सबसे स्नेह बढ़े वह राह चुनो- सिर्फ तुम्हीं हो सही, गलत मत अनुमानो।। सहें असहमति, यह तहजीब हमारी है देश हमारा है, सरकार हमारी है फिर क्यों आईं बुलडोजर की बारी है? . सिक्के के दो पहलू पक्ष-विपक्ष रहें। नाव और पतवार सरीखे साथ बहें।। देश और जनता की उन्नति हो कैसे? नीति बनाएँ, नव उपाय नित सुनें-कहें।। बहु दल जनहित लक्ष्य, भोर उजियारी है देश हमारा है, सरकार हमारी है फिर क्यों आईं बुलडोजर की बारी है? . दो एंजिन सरकार न संविधान में है। कोटि-कोटि इंजन अपनी पहचान में है।। अगिन देवता अगिन भक्त हैं एक सखे! है कुटुंब दुनिया सारी, भगवान में है।। गैर विपक्षी नहीं, शक्ति दोधारी है देश हमारा है, सरकार हमारी है फिर क्यों आईं बुलडोजर की बारी है? २१.७.२०२६ ०००
सेमल
अनुभूति की मिट्टी में
विचारों के बीज
संवेदना का पानी पीकर
फूले न समाए।
फट गया कठोरता का
कृत्रिम आवरण,
सृजन के अंकुर
पैर जमाकर मुस्काए।
संकल्प की जड़ें
जमीं में जमीँ,
प्रयास के पल्लव हरियाए।
गगन चूमने को आतुर
तना तना और
शाखाओं ने हाथ फैलाए।
सूर्य की तपिश झेली
पवन संग करी अठखेली
चाँदनी संग आँख मिचौली
चाँद संग खिलखिलाए।
कभी सब्जी बन मिटाई क्षुधा
कभी चर्म रोग मिटाए
घटाकर बढ़ती उम्र के प्रभाव
रक्त शोधन के काम आए।
लोक कल्याण के लिए
किया आत्म बलिदान
रहकर मौन और बेदाम
इसलिए कुदरत ने सिर पर
लाल फूलों के मुकुट सजाए।
रेशमी कपास का देकर उपहार
बीजों से भरकर पशुओं का पेट
काष्ठ से बनाकर नाव और वाद्य यंत्र
हम पर्णपाती शाल्मली उर्फ़ सेमल
मरकर भी जी पाए,
जिंदगी के तराने गुंजाए।
२१.७.२०२५
***
छंद सलिला
हाइकु
पानी बरसे
मेघ-नयन से
रुके न रोके।।
घन श्याम से
वर माँगते सब
घनश्याम से।।
आँखों में आँखें
डाल डाल झूमती
शाखें ही शाखें।।
माहिया
बिन बारिश रोते हैं
बारिश हो जमकर
झट नयन भिगोते हैं।
बुलडोजर बाबा जी!
अपने न रहे अपने
काशी या काबा जी।।
किस्से ही किस्से हैं,
सुख भोगें नेता
दुख जन के हिस्से हैं।।
•••
जनक छंद
कंकर में शंकर मिले
देख सके तो देख ले
व्यर्थ न कर शिकवे गिले।।
हरयाया है ठूँठ हर
हैं विषाक्त फिर भी शहर
हुआ प्रदूषण ही कहर।।
खुशगवार मौसम कहे
नाच-झूम, चिंता न कर
होनी होकर ही रहे।।
•••
मुक्तक
आपमें बच्चा सदा जिंदा रहे
झूठ में सच्चा सदा जिंदा रहे
पक रहे, थक-चुक रहे हैं तन सभी
सभी का मन मृदुल अरु कच्चा रहे
कौन किसका कब हुआ कहिए कभी
खुद खुदी को जान पाए क्या सभी?
और पर रहते उठाते अँगुलियाँ
अँगुलियाँ खुद पर उठी देखें अभी।।
बात मत कर, काम कर
यह न हो बस नाम कर
आत्मश्लाघा दूर रख
नहीं विधि को वाम कर।।
•••
दोहा
कृष्णा कृष्णा कह रहे, रहे कृष्ण से दूर।
दो न, एक यह जान जप, हो दीदार जरूर।।
गुरु से गुर जो सीख ले, वही शिष्य मतिमान।
जान, अजान न रह कभी, गुरु ही गुण की खान।।
सरला वसुधा दे सदा, जोड़े कभी न कोष।
झोली खाली हो नहीं, यदि मन में संतोष।।
•••
सोरठा
करिए सरस विनोद, अगर समय विपरीत हो।
दे आलोक प्रमोद, संकट टल जाते सभी।।
रेखा लंबी आप, खींचें सदा हुजूर जी!
मिटा और की पाप, करें न पाल गुरूर जी।।
करें प्रशंसा गैर, निज मुख से करिए नहीं।
सदा रहेगी खैर, करें न निंदा गैर की।।
•••
सुगती छंद
जो भला है
झुक चला है।
बुरा है जो
तना है वो।
आइए हम
मिटाएँ तम।
बाँट दें सुख
माँग लें दुख।
खुश रहें प्रभु!
जीव सब विभु।
•••
छबि छंद
जपिए रमेश
हर दिन हमेश।
छबि में निखार
लाता सुधार।
कर ले प्रयास
फैले सुवास।
मत चाह मोह
मत पाल द्रोह।
चल अंत नाम
कह राम राम।
•••
गंग छंद
घन गरज घूमे
गिरि शिखर चूमे।
झट हुई वर्षा
मन मुकुल हर्षा।
बीज अंँकुराया
भू यश गुँजाया।
फुदक गौरैया
कर ता ता थैया।
मिल बजा ताली
वरो खुशहाली।
•••
निधि छंद
सिय राम निहार
गईं सुधि बिसार।
लख राम सीता
कहते पुनीता।
रसना न बोले
दृग राज खोले।
पल में बनाया
अपना पराया।
दीपक दिपा है
प्रभु की कृपा है।
•••
दीप छंद
दीपक अगिन बाल
नर्तित विहँस बाल।
किरणें थिरक गोल
लाईं मुदित ढोल।
गातीं हुलस गीत
पालें पुलक प्रीत।
सज्जित सुगृह द्वार
हर्षित सुमन वार।
गृहणी मदिर नैन
रुचिकर सुखद बैन।
हैं प्रि‌यतम निहाल
कुंजित पिंक रसाल।
गुरु पूर्णिमा
२१.७.२०२४
•••
सॉनेट
बूँदें
तपती धरती पर पड़ीं बूँदें
तपिश मन की हो गई शांत
भीगकर घर आ गए कांत
पर्ण पर मणि सम जड़ी बूँदें
हाय! लज्जा से गड़ीं बूँदें
देखकर गंदी नदी सूखी
गृह लक्ष्मी हो ज्यों दुखी-भूखी
ठिठक मेघों संग उड़ी बूँदें
हैं महज शुभ की सगी बूँदें
बिकें नेता सम नहीं बूँदें
स्नेह से मिलती पगी बूँदें
आँख से छिप-छिप बहीं बूँदें
गाल पर छप-छप गईं बूँदें
धैर्य धर; ढहती नहीं बूँदें
२१-७-२०२२
***
लघुकथा
सिसकियाँ
सिसकियों की आवाज सुनकर मैंने पीछे मुड़के देखा। सांझ के झुरमुट में घुटनों में सर झुकाए वह सिसक रही थी। उसकी सिसकियाँ सुनकर पूछे बिना न रहा गया। पहले तो उसने कोई उत्तर न दिया, फिर धीरे धीरे बोली- 'क्या कहूँ? मेरे अपने ही जाने-अनजाने मेरे बैरी हो गए।
- तुम उनसे कोई अपेक्षा ही क्यों करती हो?
= अपेक्षा मैं नहीं करती, मुझसे ही अपेक्षा की जाती है कि मैं सबके और हर एक के मन के अनुसार ही खुद को ढाल लूँ। मैं किस-किस के अनुसार खुद को बदलूँ?
- बदलाव ही तो जीवन है। सृष्टि में बदलाव न हो एक सा मौसम, एक से हालात रहें तो विकास ही रुक जाएगा।
= वही तो मैं भी कहती हूँ। मेरा जन्म लोक में हुआ। माताएँ अपने बच्चों को बहलाने के लिए मुझे बुला लेतीं। किसान-मजदूर अपनी थकान भुलाने के लिए मुझे अपना हमसाया पाते। गुरुजन अपने विद्यार्थियों को समझाने, राह दिखाने के लिए मुझे सहायक पाते रहे।
- यह तो बहुत अच्छा है, तुम्हारा होना तो सार्थक हो गया।
= होना तो ऐसा ही चाहिए पर जो होना चाहिए वह होता कहाँ है? हुआ यह कि वर्तमान ने अतीत को पहचनाने से ही इंकार कर दिया। पत्तियों और फूलों ने बीज, अंकुर और जड़ों को अपना मूल मानने से ही इंकार कर दिया।
- यह तो वाकई दुर्भाग्यपूर्ण है।
= बात यहीं तक नहीं है। अब तो अलग अलग फलों ने अलग-अलग यह निर्धारित करना शुरू कर दिया है कि जड़ों, तने और शाखाओं को कैसा होना चाहिए, उनका आकार-प्रकार कैसा हो?, रूप रंग कैसा हो?
- ऐसा तो नहीं होना चाहिए। पत्तियों, फूलों और फलों को समझना चाहिए कि अतीत को बदला नहीं जा सकता, न झुठलाया जा सकता है।
= कौन किसे समझाए? हर पत्ती, फूल और फल खुद को नियामक मानकर नित नए मानक तय कर खुद को मसीहा मान बैठे हैं।
- तुम कौन हो? किसके बारे में बात कर रही हो?
= मैं उस वृक्ष की जीवन शक्ति हूँ जिसे तुम कहते हो लघुकथा।
२१.७.२०२१ ***
दोहा सलिला
*
प्रभु सारे जग का रखे, बिन चूके नित ध्यान।
मैं जग से बाहर नहीं, इतना तो हैं भान।।
*
कौन किसी को कर रहा, कहें जगत में याद?
जिसने सब जग रचा है, बिसरा जग बर्बाद
*
जिसके मन में जो बसा वही रहे बस याद
उसकी ही मुस्कान से सदा रहे दिलशाद
*
दिल दिलवर दिलदार का, नाता जाने कौन?
दुनिया कब समझी इसे?, बेहतर रहिए मौन
*
स्नेह न कांता से किया, समझो फूटे भाग
सावन की बरसात भी, बुझा न पाए आग
*
होती करवा चौथ यदि, कांता हो नाराज
करे कृपा तो फाँकिये, चूरन जिस-तिस व्याज
*
प्रभु सारे जग का रखें, बिन चूके नित ध्यान।
मैं जग से बाहर नहीं, इतना तो हैं भान।।
*
कौन किसी को कर रहा, कहें जगत में याद?
जिसने सब जग रचा है, बिसरा जग बर्बाद
*
जिसके मन में जो बसा वही रहे बस याद
उसकी ही मुस्कान से सदा रहे दिलशाद
*
दिल दिलवर दिलदार का, नाता जाने कौन?
दुनिया कब समझी इसे?, बेहतर रहिए मौन
*
स्नेह न कांता से किया, समझो फूटे भाग
सावन की बरसात भी, बुझा न पाए आग
*
होती करवा चौथ यदि, कांता हो नाराज
करे कृपा तो फाँकिये, चूरन जिस-तिस व्याज
***
बरसाती गीत
*
नहा रहे हैं
बरसातों में
हरे-भरे बतियाते झाड़
अपनी जगह
हमेशा ठांड़े
झूम-झूम मस्ताते झाड़
*
सूर्य-बल्ब
जब होता रौशन
मेक'प करते बिना छिपे.
शाखाओं,
कलियों फूलों से
मिलते, नहीं लजाते झाड़
नहा रहे हैं
बरसातों में
हरे-भरे बतियाते झाड़
अपनी जगह
हमेशा ठांड़े
झूम-झूम मस्ताते झाड़
*
बऊ धरती
आँखें दिखलाये
बहिना हवा उड़ाये मजाक
पर्वत दद्दा
आँख झुकाये,
लता संग इतराते झाड़
नहा रहे हैं
बरसातों में
हरे-भरे बतियाते झाड़
अपनी जगह
हमेशा ठांड़े
झूम-झूम मस्ताते झाड़
*
कमसिन सपने
देख थिरकते
डेटिंग करें बिना हिचके
बिना गये
कर रहे आउटिंग
कभी नहीं पछताते
नहा रहे हैं
बरसातों में
हरे-भरे बतियाते झाड़
अपनी जगह
हमेशा ठांड़े
झूम-झूम मस्ताते झाड़
***
हाइकू सलिला
*
हाइकू लिखा
मन में झाँककर
अदेखा दिखा।
*
पानी बरसा
तपिश शांत हुई
मन विहँसा।
*
दादुर कूदा
पोखर में झट से
छप - छपाक।
*
पतंग उड़ी
पवन बहकर
लगा डराने
*
हाथ ले डोर
नचा रहा पतंग
दूसरी ओर
२१.७.२०१९
***
नवगीत:
*
मेघ बजे
नभ ठाकुर की ड्योढ़ी पर
फिर मेघ बजे
ठुमुक बिजुरिया
नचे बेड़नी बिना लजे
*
दादुर देते ताल,
पपीहा-प्यास बुझी
मिले मयूर-मयूरी
मन में छाई खुशी
तोड़ कूल-मरजाद
नदी उफनाई तो
बाबुल पर्वत रूठे
तनया तुरत तजे
*
पल्लव की करताल
बजाती नीम मुई
खेत कजलियाँ लिये
मेड़ छुईमुई हुई
जन्मे माखनचोर
हरीरा भक्त पिये
गणपति बप्पा, लाये
मोदक हुए मजे
*
टप-टप टपके टीन
चू गयी है बाखर
डूबी शाला हाय!
पढ़ाये को आखर?
डूबी गैल, बके गाली
अभियंता को
डुकरो काँपें, 'सलिल'
जोड़ कर राम भजे
***
दोहा सलिला:
कुछ दोहे बरसात के
*
गरज नहीं बादल रहे, झलक दिखाकर मौन
बरस नहीं बादल रहे, क्यों? बतलाये कौन??
*
उमस-पसीने से हुआ, है जनगण हैरान
जल्द न देते जल तनिक, आफत में है जान
*
जो गरजे बरसे नहीं, हुई कहावत सत्य
बिन गरजे बरसे नहीं, पल में हुई असत्य
*
आँख और पानी सदृश, नभ-पानी अनुबंध
बन बरसे तड़पे जिया, बरसे छाये धुंध
*
पानी-पानी हैं सलिल, पानी खो घनश्याम
पानी-पानी हो रहे, दही चुरा घनश्याम
*
बरसे तो बरपा दिया, कहर न बाकी शांति
बरसे बिन बरपा दिया, कहर न बाकी कांति
*
धन-वितरण सम विषम क्यों, जल वितरण जगदीश?
कहीं बाढ़ सूखा कहीं, पूछे क्षुब्ध गिरीश
*
अधिक बरस तांडव किया, जन-जीवन संत्रस्त
बिन बरसे तांडव किया, जन-जीवन अभिशप्त
*
महाकाल से माँगते, जल बरसे वरदान
वर देकर डूबे विवश, महाकाल हैरान
२०.७.२०१९
***
जा विदेश में बोलिए, हिन्दी तब हो गर्व.
क्या बोला सुन समझ लें, भारतीय हम सर्व.
कर किताब से मित्रता, रह तनाव से दूर.
शान्त चित्त खेलो क्रिकेट, मिले वाह भरपूर.
चौको से यारी करो, छक्को से हो प्यार.
शतक साथ डेटिग करो, मीताली सौ बार.
अंग्रेजी का मोह तज, कर हिन्दी में बात.
राज दिलों पर राज का, यह मीताली राज.
राज मिताली राज का, तूफानी रफ़्तार.
राज कर रही विकेट पर, दौड़ दौड़ हर बार.
खेलो हर स्ट्रोक तुम, पीटो हँस हर गेंद.
गेंदबाज भयभीत हो, लगा न पाए सेंध.
दस हजार का लक्ष्य ले, खेलो धरकर धीर.
खेल नायिका पा सको, नया नाम रन वीर.
चौको छक्को की करी, लगातार बरसात.
हक्का बक्का रह गए, कंगारू खा मात.
हरमन पर हर मन फिदा, खूब दिखाया खेल.
कंगारू पीले पड़े, पल में निकला तेल.
सरहद सारी सुरक्षित, दुश्मन फौज फ़रार.
पता पड़ गया आ रही, हरमन करने वार.
हरमन ने की दनादन, चोट, चोट पर चोट.
दीवाली की बम लडी, ज्यों करती विस्फ़ोट.
षटपदी
गेंदबाज चकरा गए, भूले सारे दाँव.
पंख उगे हैं गेंद के, या ऊगे हैं पाँव.
या ऊगे हैं पाँव विकेटकीपर को भूली.
आँख मिचौली खेल, भीड़ के हाथों झूली.
हरमन से कर प्रीत, शोट खेल में छा गए.
भूले सारे दाँव, गेदबाज चकरा गए.
***
मुक्तिका:
बरसात में
*
बन गयी हैं दूरियाँ, नज़दीकियाँ बरसात में.
हो गये दो एक, क्या जादू हुआ बरसात में..
आसमां का प्यार लाई जमीं तक हर बूँद है.
हरी चूनर ओढ़ भू, दुल्हन बनीं बरसात में..
तरुण बादल-बिजुरिया, बारात में मिल नाचते.
कुदरती टी.वी. का शो है, नुमाया बरसात में..
डालियाँ-पत्ते बजाते बैंड, झूमे है हवा.
आ गयीं बरसातियाँ छत्ते लिये बरसात में..
बाँह उनकी राह देखे चाह में जो हैं बसे.
डाह हो या दाह, बहकर गुम हुई बरसात में..
चू रहीं कवितायेँ-गज़लें, छत से- हम कैसे बचें?
छंद की बौछार लायीं, खिड़कियाँ बरसात में..
राज-नर्गिस याद आते, भुलाये ना भूलते.
बन गये युग की धरोहर, काम कर बरसात में..
बाँध,झीलें, नदी विधवा नार सी श्री हीन थीं.
पा 'सलिल' सधवा सुहागन, हो गयीं बरसात में..
मुई ई कविता! उड़ाती नींद, सपने तोड़कर.
फिर सजाती नित नये सपने 'सलिल' बरसात में..
***
मुक्तिका
*
कल दिया था, आज लेता मैं सहारा
चल रहा हूँ, नहीं अब तक तनिक हारा
सांस जब तक, आस तब तक रहे बाकी
जाऊँगा हँस, ईश ने जब भी पुकारा
देह निर्बल पर सबल मन, हौसला है
चल पड़ा हूँ, लक्ष्य भूलूँ? ना गवारा
पाँव हैं कमजोर तो बल हाथ का ले
थाम छड़ियाँ खड़ा पैरों पर दुबारा
साथ दे जो मुसीबत में वही अपना
दूर बैठा गैर, चुप देखे नज़ारा
मैं नहीं निर्जीव, हूँ संजीव जिसने
अवसरों को खोजकर फिर-फिर गुहारा
शक्ति हो तब संग जब कोशिश करें खुद
सफलता हो धन्य जब मुझको निहारा
२१.७.२०१६
***
दोहा - सोरठा गीत
पानी की प्राचीर
*
आओ! मिलकर बचाएँ,
पानी की प्राचीर।
पीर, बाढ़ - सूखा जनित
हर, कर दे बे-पीर।।
*
रखें बावड़ी साफ़,
गहरा कर हर कूप को।
उन्हें न करिये माफ़,
जो जल-स्रोत मिटा रहे।।
चेतें, प्रकृति का कहीं,
कहर न हो, चुक धीर।
आओ! मिलकर बचाएँ,
पानी की प्राचीर।।
*
सकें मछलियाँ नाच,
पोखर - ताल भरे रहें।
प्रणय पत्रिका बाँच,
दादुर कजरी गा सकें।।
मेघदूत हर गाँव को,
दे बारिश का नीर।
आओ! मिलकर बचाएँ,
पानी की प्राचीर।।
*
पर्वत - खेत - पठार पर
हरियाली हो खूब।
पवन बजाए ढोलकें,
हँसी - ख़ुशी में डूब।।
चीर अशिक्षा - वक्ष दे ,
जन शिक्षा का तीर।
आओ मिलकर बचाएँ,
पानी की प्राचीर।।
२०-७-२०१६
-----------------
सोरठा - दोहा गीत
संबंधों की नाव
*
संबंधों की नाव,
पानी - पानी हो रही।
अनचाहा अलगाव,
नदी-नाव-पतवार में।।
*
स्नेह-सरोवर सूखते,
बाकी गन्दी कीच।
राजहंस परित्यक्त हैं,
पूजते कौए नीच।।
नहीं झील का चाव,
सिसक रहे पोखर दुखी।
संबंधों की नाव,
पानी - पानी हो रही।।
*
कुएँ - बावली में नहीं,
शेष रहा विश्वास।
निर्झर आवारा हुआ,
भटके ले निश्वास।।
घाट घात कर मौन,
दादुर - पीड़ा अनकही।
संबंधों की नाव,
पानी - पानी हो रही।।
*
ताल - तलैया से जुदा,
देकर तीन तलाक।
जलप्लावन ने कर दिया,
चैनो - अमन हलाक।।
गिरि खोदे, वन काट
मानव ने आफत गही।
संबंधों की नाव,
पानी - पानी हो रही।।
२०-७-२०१६
***
अश्'आर
बसा लो दिल में, दिल में बस जाओ / फिर भुला दो तो कोई बात नहीं
*
खुद्कुशी अश्क की कहते हो जिसे / वो आंसुओं का पुनर्जन्म हुआ
*
अल्पना कल्पना की हो ऐसी / द्वार जीवन का जरा सज जाये.
*
गौर गुरु! मीत की बातों पे करो / दिल किसी का दुखाना ठीक नहीं
*
श्री वास्तव में हो वहीं, जहां रहे श्रम साथ / जीवन में ऊन्चा रखे श्रम ही हरदम माथ
*
खरे खरा व्यव्हार कर, लेते हैं मन जीत / जो इन्सान न हो खरे, उनसे करें न प्रीत.
*
गौर करें मन में नहीं, 'सलिल' तनिक हो मैल / कोल्हू खीन्चे द्वेष का, इन्सां बनकर बैल
*
काया की माया नहीं जिसको पाती मोह, वही सही कायस्थ है, करे गलत से द्रोह.
२१.७.२०१४
०००
नवगीत:
संजीव
*
हर चेहरे में
अलग कशिश है
आकर्षण है
*
मिलन-विरह में,
नयन-बयन में
गुण-अवगुण या
चाल-चलन में
कहीं मोह का
कहीं द्रोह का
संघर्षण है
*
मन की मछली,
तन की तितली
हाथ न आयी
पल में फिसली
क्षुधा-प्यास का
हास-रास का
नित तर्पण है
*
चितवन चंचल
सद्गुण परिमल
मृदु मिठासमय
आनन मंजुल
हाव-भाव ये
ताव-चाव ये
प्रभु-अर्पण है
*
गिरि सलिलाएँ
काव्य-कथाएँ
कहीं-अनकहीं
सुनें-सुनाएँ
कलरव-गुंजन
माटी-कंचन
नव दर्पण है
*
बुनते सपने
मन में अपने
समझ न आते
जग के नपने
जन्म-मरण में
त्याग-वरण में
संकर्षण है
*
प्रयास अलीगढ में दिसंबर २००७ में प्रकाशित