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बुधवार, 23 सितंबर 2026

राजा अवस्थी


लेख
सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार करते राजा अवस्थी के नवगीत
आचार्य संजीव वर्मा ''सलिल''
रचनाकार संपर्क- गाटरघाट मार्ग, आजाद चौक, कटनी ४८३५०१, चलभाष ९६१७९१३२८७
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         सनातन सलिला नर्मदा के अंचल में आधुनिक हिंदी के उद्भव काल से ही साहित्य की हर विधा में सतत सत्साहित्य का सृजन-धारप्रवाहित होती रही है। वर्तमान पीढ़ी के मौलिक चेतना संपन्न नवगीतकारों में राजा अवस्थी का नाम अग्रगण्य है। हिंदी साहित्य के श्रेष्ठ-ज्येष्ठ हस्ताक्षर डॉ. देवेन्द्र शर्मा 'इंद्र', नर्मदांचल के वरिष्ठ साहित्य साधक श्यामनारायण मिश्र व राम सेंगर द्वारा से आशीष प्राप्त राजा द्रुत गति से परिवर्तित होती सामाजिक जीवन शैली परिस्थितियों और मूल्यों के आकलन, अवलोकन और अन्वेषण को अपने गीति काव्य की प्राणशक्ति बना सके हैं। सियासती संघर्ष से सतत आहत होते सामाजिक सद्भाव की सिसकियों और चीखों को सुनते राजा की कलम न तो विचलित होती है, न मौन रहती है, वह निरंतर अपनी असहमति और परिवर्तनोन्मुखी जिजीविषा को गीत पंक्तियों में ढालकर अभिव्यक्ति की पगडंडी पर पग पढ़ती रहती है। जीवन की चुनौतियाँ और संघर्ष के सामने राजा झुकते नहीं किंतु उन पर प्रहार कर सकारात्मक परिवर्तन के लिए संदेश देते हैं।

         श्री दर्श रूप अवस्थी - श्रीमती गंगा देवी के पुत्र रूप में ४ अप्रैल १९६६ को जन्मे, हिन्दी साहित्य में परास्नातक, शिक्षा स्नातक की शिक्षा प्राप्त राजा मध्य प्रदेश शालेय शिक्षा विभाग में शिक्षक, प्रधानाध्यापक तथा जिला स्रोत व्यक्ति हिन्दी के रूप में कार्यरत रहे राजा का सृजन निरंतर चलता रहा है। राजा के २ नवगीत संग्रह 'जिस जगह यह नाव है' (वर्ष २००६) तथा 'जीवन का गुणा-भाग' (वर्ष २०२१), एक दोहा प्रबंध काव्य ''कैकेयी अब बोलती'' तथा एक समालोचना कृति ''आलोचना का ब्राह्मणवाद प्रकाशित हुई हैं। उनकी उपस्थिति महत्वपूर्ण साझा संकलनों नई सदी के नवगीत (संपादक डॉ. ओम प्रकाश सिंह), नवगीत नई दस्तकें (संपादक डॉ. निर्मल शुक्ल), गीत वसुधा व समकालीन गीत कोश (संपादक नचिकेता), नवगीत के नए प्रतिमान, नवगीत का लोकधर्मी सौन्दर्यबोध व नवगीत का मानवतावाद (संपादक राधेश्याम बंधु) सहयात्री समय के (संपादक रणजीत पटेल) व पत्र-पत्रिकाओं में अधिक रही है। नवगीत की समीक्षा के क्षेत्र में भी राजा का योगदान उल्लेखनीय है। यू ट्यूब पर उनका 'नवगीत धारा' चर्चित कार्यक्रम है।

         'जिस जगह यह नाव है' (नवगीत संग्रह, राजा अवस्थी, वर्ष २००६, आकार डिमाई, आवरण सजिल्द, बहुरंगी, जैकेट सहित, पृष्ठ १३६, मूल्य १२०रु., प्रकाशक- अनुभव प्रकाशन, ई २८ लाजपत नगर, साहिबाबाद, गाज़ियाबाद २०१००५, ०१२० ४११२२१०) ७८ समसामयिक, सरस नवगीतों का पठनीय संग्रह है। मध्य प्रदेश के बड़े जंक्शन कटनी में बसे राजा के नवगीत विंध्याटवी के नैसर्गिक सौंदर्य, ग्राम्यांचल के संघर्ष, नगरीकरण की घुटन, राजनीति के दिशाभ्रम, आम जन के अंतर्द्वंद तथा युवाओं के सपनों के बहुदिशायी रेलगाड़ियों में यात्रारत मनोभावों को मन में बसाते हैं। करुणा और व्यथा काव्य का उत्स है. गाँव की माटी की व्यथा-कथा गाँव के बेटों तक न पहुँचे यह कैसे संभव है?


आज गाँव की व्यथा बाँचती / चिट्ठी मेरे नाम मिली
विधवा हुई रमोली की भी / किस्मत कैसी फूटी
जेठ-ससुर की मैली नज़रें / अब टूटीं, तब टूटीं

         जीवन में तमाम विसंगतियों से लड़ते-जूझते हुए भी अनवरत अक्षर आराधना करना किसी सैनिक के पराक्रम से कम नहीं है।

चंदन वन काट-काट / शव का श्रृंगार करें
शिशुओं को दें शव सा जीवन
यौवन में सन्नाटा / मरघट सा छाता है
आस-ओस दुर्लभ आजीवन
यश अर्जन को होता
भूख को हमारी, साहित्य में उतारना

         माँ शारदा को क्षुधा-दीप समर्पित करती कलम का संघर्ष गाँव और शहर हर जगह एक सा है। विडम्बनाओं व विसंगतियों से जूझना ही नियति है-

स्वार्थ-पोषित आचरण को / यंत्रवत निष्ठुर शहर को / सौंपने बैठा
भाव की पहचान भूले / चेहरे पढ़ना कठिन है
धुंध, सन्नाटा, अँधेरा / और बहरापन कठिन है
विवशताएँ, व्यस्तताएँ / ह्रदय में छल वर्जनाएँ / थोपने बैठा

         विधि की विडंबना कहें या आदमी की व्यवस्थाओं का दोष सत्य यही है कि अनचाही पीड़ाएँ प्रकृति प्रदत्त कम, मनुष्य रचित अधिक हैं-


गाँव के पंचों ने मिलकर / फिर खड़ी दीवार की
फिर वही हालत, नियति / वह ही प्रकृति के प्यार की
किशनवा-रधिया की / घुटती साँस का मौसम।

         किसी समाज के सामने सर्वाधिक चिंतनीय स्थिति तब होती है जब बिखराव के कारण मानव-मन दूर होने लगें। राजा इस परिस्थिति का अनुमान कर अपनी चिंता नवगीत में उड़ेल देते हैं-

अंतस के समतल की / चिकनाई गायब अब
रोज बढ़े, फैले, ज़हरीला बिखराव
रिश्तों का ताप चुका / आ बैठा ठंडापन
चहक-पुलक में में पसरा जाता ठहराव
कैसी इच्छाओं के / ज्वार और भाटे ये
दूर हुए जाते मन, सदियों के द्वीप

         विषमताओं के कुम्भ में सपनों की आहट बेमानी प्रतीत होने लगे तो नवगीत मन की पीड़ा को स्वर देता है -

किसलिए सजें / सपने, तो बस विशुद्ध रेत हैं
नरभक्षी पौधों से / आश्रय की आशा क्या?
सब के सब इक जैसे / तोला क्या, माशा क्या?
कोई भी अमृत फल / इन पर आ पायेगा?
छोड़ो भी आशा, ये बेंत हैं
बेशर्मी जेहन से / आँखों में उतरी
ढंकेंगी कब तक / ये पोशाकें सुथरी
बच पाना मुश्किल है / ये भोंडे संस्कार
दम लेंगे हँसकर ही, ये करैत हैं

         राजा केवल नाम के ही नहीं अनुभूतियों और अभिव्यक्ति-क्षमता के भी राजा हैं। लोकतंत्र में भी सामंतवादी प्रवृत्तियों का बढ़ते जाना, प्रगति की मरीचिका मैं आम आदमी का दर्द बढ़ते जाना उनके मन की पीड़ा को बढ़ाता है-

फिर उसी सामंतवादी / जड़ प्रकृति को रोपता
एक विध्वंसक समय को / हाथ बाँधे न्योतता
जड़ तमाचे पर तमाचे / अमन के मुँह पर
पढ़ कसीदे पर कसीदे / दमन के मुँह पर
गर्व से मुस्की दबाये / है प्रगति का देवता

         मुहावरेदार भाषा राजा अवस्थी के नवगीतों की जान है। रेवड़ी, ढिबरी, बिजूका मकड़जाल आदि शब्द अपने प्रचलित अर्थों के साथ विशिष्ट प्रवृत्तियों के द्योतक है.-

रेवड़ी बेभाव बाँटी / प्रगति को दे दी धता,
ढिबरी का तेल चुका / फैला अँधियार,
खेतिहर बिजूकों से / भय खाएँ राम,
मस्तक में बोकर नासूर / टोपी के ये नकली बाल क्या सँवारना?,
संविधान के मकड़जाल में / उलझा अक्सर न्याय हमारा,
तार पर दे जीवन आघात / बेसुरे सुर दे रहे धता,
कुँवारी इच्छाएं ऐसी / खिले ज्यों हरसिंगार के फूल

         आदि अभिव्यक्तियाँ कम शब्दों में अधिक अनुभूतियों से पाठक का साक्षात करा देती हैं।

         ग्राम्यांचली पृष्ठभूमि राजा अवस्थी को देशज शब्दों के उस ख़ज़ाने से संपन्न करती है जो शहरों के कोंवेंटी कवि के लिए आकाश कुसुम है। बरुआ, ठकुरवा, छप्पर, छुअन, झरोखा, निठुराई, बिजूका, झोपड़, जांगर. कहतें, पांग, बढ़ानी, हिय, पर्भाती, सुग्गे, ढिबरी, किशनवा, कुछबन्दियों, खटती, बहुँटा, अंकुई, दलिद्दर, चरित्तर, पैताने आदि ग्रामीण शब्दों के साथ उर्दू लफ्ज़ खातिर, रैयत, खबर, गुजरे, बैर, ज़ुल्मों, खस्ताहाल, नज़रें, ख्याल, आमद, बदन, यकीन, ज़ेहन, नुस्खे, नासूर, इन्तिज़ार, ज़हर, आफत, एहसान, तकादा, एहसान, चस्पा, लफ़्फ़ाज़ी आदि मिलकर उस गंगो-जमुनी जीवन की बानगी पेश करते हैं जिसमें शुद्ध हिंदी के अनुपूरित, प्रतिकार, अंतर्मन, उल्लास, ग्रसित, व्याल, आतंकित, प्रतिबंधित, मराल, भ्रान्ति, आलिंगन, उत्कंठा, वीथिकाएँ, वर्जनाएं,अंतस, निष्कलुष, बड़वानल, हिमगलित, संभरण आदि पुलाव में मेवे की तरह प्रतीत होते हैं।

         राजा अवस्थी ने शब्द-युग्मों की शक्ति और उपदेयता को पहचाना और उपयोग किया है। खबर-दबर, जेठ-ससुर, माँ-दद्दा, रात-दिन, हम-तुम, मन-मान, आस-ओस, उठना-गिरना, साँझ-सँझवाती, लड़ी-फड़ी, डगर-मगर, सुख-दुःख, घर-गाँव, सुबह-शाम, दोपहरी-रात, नून-तेल, आस-पास, दूध-भात, मरते-कटते, चोर-लबार, अमन-चैन, चहक-पुलक, सीलन-सन्नाटे, दंभ-छ्ल्, है-मेल, हवा-पानी, प्रीति-गीति-रीति, मोह-ममता-नेह, तन-मन-जेहन आदि शब्द युगन इन नवगीतों की भाषा को जीवंतता देते हैं।

         राजा अवस्थी की प्रयोगधर्मी वृत्ति फाइलबाजों, कंठ-लावनी, वर्ण-कंपित, हिटलरी डकार, श्रध्दाशा, ममता की अलगनी, सुधियों की डोर, काँटों की गलियाँ, मुस्कानों के झोंके, शब्दों का संत्रास, पीड़ाओं के शिलाखंड जैसे शब्दावलियों से पाठक को बाँध पाते हैं। शब्द-सामर्थ्य, भाषा-शैली, नव बिम्ब, नए प्रतीक, मौलिक कथ्य की कसौटी पर ये गीत खरे उतरते हैं। इन नवगीतों में मात्रिक छंदों का प्रयोग किया गया है। दो से लेकर चार पंक्तियों तक के मुखड़े तथा आठ पंक्तियों तक के अंतरे प्रयुक्त हुए हैं। नवगीतों में अंतरों की संख्या दो या तीन है।

         हिंदी के समर्थ समीक्षक डॉ. विजय बहादुर सिंह ने इन गीतों में 'समकालीन जीवन व् उसके यथार्थ के प्रति अत्यधिक सजगता एवं संवेदनशीलता, स्थानीयता के रंगों से कुछ अधिक रंगीनियत' ठीक ही लक्षित की है। इस कृति के प्रकाशन के एक दशक बाद राजा अवस्थी की कलम अधिक पैनी हुई है इसका प्रमाण उनका दूसरा नवगीत संग्रह ''जीवन का गुणा-भाग'' (नवगीत संग्रह, वर्ष २०१९, पृष्ठ १२८, सजिल्द बहुरंगी आवरण जैकेट सहित, मूल्य २००/-, श्वेतवर्णा प्रकाशन, नई दिल्ली चलभाष ८४४७५४००७८) है। शीर्षक से ही स्पष्ट है कि पूर्वापेक्षा अत्यधिक तेजी से हो रहे वैश्विक तकनीकी-सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक परिवर्तनों के मनुष्य मात्र, पशु-पक्षियों, जीव-जंतुओं व प्रकृति-पर्यावरण पर पड़ रहे दुष्प्रभाव की चिंता इन गीतों में हो। यांत्रिकता और पूंजीवाद के बढ़ते वर्चस्व ने मानवीय संबंधों, संवेदनाओं और सामाजिक संरचना को निरंतर गंभीर क्षति पहुँचाई है। सद्भाव, सहकार, समन्वय व सहिष्णुता को दुर्भाव, अहंकार, अधिनायकवाद व असहिष्णुता ने प्रतिस्थापित किया है। इस वातावरण में गीति रचनाधर्मी किंकर्तव्यविमूढ़ हों यह स्वाभाविक है।

         राजा अवस्थी ने समय की चुनौतियों से आँख मिलाते हुए आम आदमी की नब्ज पर हाथ रखते हुए उसकी पीड़ा को स्वर देने की कोशिश की है। आम आदमी की जिंदगी के कथ्य-तथ्य को गीतों में ढालते हुए राजा अतिरेकी वृत्तियों से परे रह सके हैं। वे न तो क्रंदन और आर्तनाद के पिंजरे में कैद हुए हैं, न ही सर्वस्व नष्ट कर देने की दिशा में गए हैं। पेशे से शिक्षक होने के नाते राजा की दृष्टि सुधार, बेहतरी और नव निर्माण की ओर उन्मुख होना स्वाभाविक है। राजा के गीत समय का अंध विरोध नहीं करते, वे परिस्थितियों का विश्लेषण करते हैं। ख्यात नवगीतकार राम सेंगर के शब्दों में ''एक अच्छे गीत कवि के लिए इतनी सी बात ही तो अहम चुनौती है कि जीवंत कथ्यपूर्ण ढंग से बात आए और सहज होकर बिना किसी अटकाव के, विन्यस्त शिल्प के साथ खलती चली जाए। इस चुनौती को राजा अवस्थी ने अपने नवगीतों में पूरे मनोयोग से साधा है।'' मैं सेंगर जी के आकलन से पूरी तरह सहमत हूँ।

         जीवन का गुणा-भाग के ६८ गीतों में नवगीत के प्रारंभिक मानकों और प्रतिमानों की अनदेखी भले ही न की गई हो, नवाचारजनित प्रयोग राजा अवस्थी ने निस्संकोच किए है। इसे लक्षित करते हुए भूमिका में डॉ. श्याम सुंदर दुबे लिखते हैं- ''अं यह निश्चय करना सचमुच जटिल होता जा रहा है कि नवगीत रचना की तासीर कैसी हो? उसका स्थापत्य किस आकार-प्रकार का हो? कुल मिलकर नवगीत की सैद्धांतिकी की खोज और उसके निश्चयीकरण के आसपास हमारा आना-जाना होता रहता है, जबकि रचना हमारे सामने होती है। रचना केंद्रित निष्कर्ष अधिक मौजूं होना चाहिए क्योंकि जिसे हम विशेष विधा का नाम दे रहे हैं- क्या वह अपनी सभी प्रवृत्तियों में कुछ विशेष बन रही है- जो परंपरा को और आगे बढ़ाने में अपनी ऊर्जा से आवेष्टित कुछ स्वतंत्र बनक-ठनक के साथ अपने कथ्य में नयी चमत्कृति उत्पन्न कर रही है।'' मुझे स्मरण है मेरी दो गीत-नवगीत काव्य कृतियान ''काल है संक्रांति का'' तथा ''सड़क पर'' की रचनाओं में नवाचार को लेकर समीक्षकों में दो वर्ग हो गए थे एक उन गीतों को नवगीत मानता था दूसरा नहीं। यही स्थिति राजा अवस्थी के गीतों को लेकर है। मेरी स्पष्ट धारणा है कि किसी भी तरह की ''जड़ता'' को ''नवता'' नहीं कहा जा सकता। भले ही वह विधा के आरंभ काल के मानक या विशिष्टताएँ ही क्यों न हों। नवता देश-काल-समय-परिस्थिति और रचनाकार के परिप्रेक्ष्य में सतत परिवर्तित और व्याख्यायित होना अपरिहार्य है।

         राजा अवस्थी स्वयं भी समीक्षक है। उनका मत है- ''''नवगीत के उद्भव के प्रमुख कारणों में अपने समय को अभिव्यक्त करने की उद्दाम इच्छा भी रही है। यही कारण लगातार और प्रमुख होता गया और अब भी बना हुआ है। दरअसल नवगीत कविता की चुनौती भी यही है कि वह अपने समय की सबही तरह की स्तहित्यों, संघर्षों, अपेक्षाओं को पूरे गीतात्मकता, पूरे पैनेपन, प्रभावी तेवर और संप्रेक्षणीय भाषा के साथ अपनी संस्कृति, अपने लोक और व चेतना को स्वर दे सके।'' जीवन का गुणा-भाग इस निकष की मिसाल हैं। लोक और लोकतंत्र की चिंता की अभिव्यक्ति देखिए-

जहाँपनाह हुए
पहरुए आलमशाह हुए ।

लोकतंत्र बेधड़क / लोक की चिंता छोड़ी
हंटर तंत्र हाथ में / जनते बेवश घोड़ी
शब्दकोश से शर्म मिटाकर
बेशर्मी की हद तक जाकर
तानाशाह हुए।

         लोकतान्त्रिक सरकारों द्वारा संवैधानिक मर्यादाओं को रौंदते बुलडोज़रों पर नेता या दल का नाम लिए बिना शब्द-प्रहार करना राजा अवस्थी की सामर्थ्य का परिचायक है। ग्राम्य संस्कृति को निगलती नागर संस्कृति को लक्षित करते हुए राजा अरबी-फारसी शब्दों का प्रयोग निस्संकोच करते हुए भाषिक शुद्धता की संकीर्ण मानसिकता को नकारते हैं-

शहर ने डस-डस / विषैले ट्रक के जंगल उगाए,
चेतन में अँधेरों के / किले भुतहे कुलबुलाए;
हर सुबह हर शाम पिटी
खोखली ख्याली खुमारी।
मेघ बारिश बाढ़ सब हैं / नहीं है तानें मल्हारी।

         श्रंगार जीवन की उत्पत्ति का मूल रस है। कितना भी अभाव है बासन्ती मादकता उसे स्पर्श कर पुलकानुभूति कर ही देती है-

देह-देह फगुनाई आई / गेह-गेह रस-वास
मुन्नी की आँखों में रमुआ / जहां रहा मधुमास।

चौथे पहर रात से / झरने लगते हैं पुखराज;
नींद निगोड़ी भी भिनसारे / करना चाहे राज;
आँख मीचते उठा टोकरी / गाँव चला मौहार,
मीठे रस से भरा जहां / फरता-झरता मधुमास।

         शिक्षक अपने छात्र को देश के विकास और नव निर्माण का जमीनी सच कक्ष में भले ही न बता सके पर रचनाओं में तो बयान कर ही सकता है-

खेतों पर उन्नति के बादल / देखे-भाले हैं,
शहर गए मजदूर, खेत सब बैठे-ठाले हैं।

अम्मा दरारीन धान / कुनाइटा चावल नित उगले;
तंगी में भी पूरे घर को / खाने भात मिले;
अब तो आम और कुनैता / दोनों नहीं रहे;
बैठक अपने सूनेपन का / किससे दर्द कहे
हिरण-चौकड़ी गाँव भरे / गलियों में छाले हैं।

         नवगीत लेखन तिमिर की अमरता का बखान नहीं उजाले की जीवटता का जयगान करना है-


उजियारे की संतानों के / घर भी अँधियारे आते हैं,
उजियारे के लिए / जलाने और बुझाने पड़ते दीपक

         नवगीत लेखन के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए राजा अवस्थी लिखते हैं-

एक दीप की लौ से जग का / तमस मिटायें ऐसा कौशल;
ब्रम्हनाद से गगन गुँजायें / पर्वत के झरनों का कलकल;
शिलाखंड से जगे अहिल्या / वानर सेतु सिंधु पर रच दें,
सब कुछ संभव हगो जाता जब / वाल्मीकि अपने लिखते हैं।

         आज कल जेन जी और जेन अल्फा द्वारा पूछे जा रहे सवालों से सत्ताधीश हैरान-परेशान हैं लेकिन राजा अवस्थी तो इसकी भविष्यवाणी अपने नवगीत में पहले ही कर चुके हैं-

कई पीढ़ियों से पुरखों ने  / पोथी सत्य नारायण बाँची 
किसने कही, सुनी किसने थी / कथा कौन सी कैसी साँची;
नई खाद का असर /  छोड़ बैठे यजमानी से 
पोते पूछ रहे बाबा से / अर्थ कथाओं के 

         वर्तमान संक्रमण काल में सत्ता के कदाचरण की अनदेखी साहित्य के जागरूक पहरुओं द्वारा मुमकिन ही नहीं है। राजा अवस्थी का संकेत देखिए- 

धर्मराज चौसर का / शौक पुन: पाले हैं 
कंठ से प्रवाहमान / दाँव की नदी

जंगल सब खत्म / राज में जंगल व्याप गया
आतंकित ऋतुएँ सब / मौसम तक काँप गया
रेत बढ़ी सूख गया / पानी संवेदन का 
बैठी है घाट तक / नाव की नदी। 

         साहित्य वह शै है जो हार नहीं मानता, घनघोर अँधेरे में भी रौशनी की हिफाजत करना, तूफान में चराग को बचाए-जलाए रखना केवल साहित्य के ही बस में है। राजा कहते हैं- 

जीवटता बाकी है / जीना संघर्षों में 

बीज मंत्र सर्जक के आये / किसके घेरे में / अवचेतन के सन्न अँधेरे में  
खोज रहे हैं रेख किरण की / बची-खुची ताकत ले मन की
तोड़-फोड़ को भोग रही / पीढ़ी के डेरे में। 

         लोक तंत्र का लोक गाँवों में बसता है। शहर में जड़ों से कटे लोग प्राय: भीत और चुप रहते हैण किंतु गांवों में जड़ से जुड़े लोग विपन्नता के बाद भी मूल्यों के लिए लड़ते हैं। सत्ता के खिलाफ होना साहस की साक्षी देता है- 

गाँव की गलियों में अब / बारूद पनपता है; 
आंधी जागृतिवाला / अंधा नाग संकट है; 
दौड़ भयंकर यह रुकवाई / हमसे नहीं गई। 

         लोक अब यह भी पूछ रहा है -

कब तक और कबीर बने / घर फूँकेंगे अपना; 
मीरा भी अब भूल चुकी है / बैरागी सपना; 

         और 

भीतर तक भर गया कहाँ से / इतना अधिक दुराव। 

         लोकतंत्र में आम आदमी को सबसे बड़ा सुख यह सोचकर मिलता की अपनी सरकार वह खुद चुनता है। अब नई नीतियों ने करोड़ों मतदाताओं से उनके मताधिकार छीन लिए है। राजा के गीतकार ने समय से पहले ही समय की दस्तक को पहचान लिया- 

पहले ही लील लिया / सुखुआ का सारा सुख-चैन 
समय बैरी ने / पहले ही लील लिया है। 

         दगा दे गई बदरी फिर से / दगा दे गई बदरी, अनुत्तरित प्रश्न सब बाकी / बिखरी परछाई, दृश्य या अदृश्य जाल / फैले हैं जगह-जगह, कथा-भागवत, झंडे-डंडे / पंडे, पंडों के मुस्टंडे / सबकी चहल-पहल भारी है / बाँट रहे तबीजें-गंदे/ जल्दी-जल्दी चले हाँकते / गली-खोर में खदाबदी है आदि अभिव्यक्तियाँ समय पूर्व की परिस्थितियों की जानी-अनजानी अभिव्यक्तियाँ हैं। 

         नवगीत के पारंपरिक कथ्य सीमा को विस्तारते हुए राजा अवस्थी सामाजिक-राजनैतिक गड़बड़ियों को रूपकों और उपमाओं के माध्यम से निरंतर उद्घाटित करते हुए परिवर्तन की संभावनाओं की जड़ों में खाद-पानी देते हैं- 

अभी-अभी राजा जी / लौटे हैं विदेश से 
और बेतुकी गहन मंत्रणायें जारी हैं 
अंट-शंट बतिहाव / कैमरा रोज झेलता 
तेजाबी ट्रकों से घायल / फुलवारी हैं; 
रोज वही मुस्टंड / मंच पर / रहे ककहरा बाँच। 

         और 

राजा राज् करे तो राजा / गाल बजाये जैसे बाजा;
जन-जन के रुपयों पर नजरें / रोज एक उद्घोषण ताजा; 
पाखंडी तरकश-वीरों के / छद्म तीर हर दिन छूटेंगे। 

         राजा अवस्थी शिक्षक हैं। वे भाषाई व्याकरिक और पिंगलीय शुद्धता के प्रति सजग हैं, किंतु ''अपने राम कलुष-तम त्यागे / शुद्ध बुद्ध जितने'' में काल-दोष हो गया है। राम पहले हुए, बुद्ध बाद में। बुद्ध राम जैसे कलुष-तम त्याग सकते है किंतु राम अपने पश्चातवर्ती का अनुकरण कैसे कर सकते हैं?  

         राजा अवस्थी की तीसरी काव्य कृति है 'कैकेयी अब बोलती' (दोहा प्रबंध काव्य, पृष्ठ ८४, पेपर बैक, मूल्य २००/-, लिटिल बर्ड पब्लिकेशन नई दिल्ली)। बकौल कुसुमलता सिंह ''कविता केवल अपने अतीत से नहीं जुड़ती बल्कि अपनी दृष्टि और प्रयोग धर्मितासे अपने समय के आगे तनी हुई सच्चाई से संवाद करती है।'' यह संवाद करने की कोशिश ही 'कैकेयी अब बोलती' के रूप में सामने है। राम कथा में अपने युग की समय से आगे चलती विद्रोहिणी कैकेयी अभूतपूर्व वीरता, आत्म-बलिदान, सद्भाव, सहकारिता और सकरात्मकता के बाद भी केवल खलनायिका के तौर पर लोक-निंदा और पुत्र-तिरस्कार की शिकार बना दी गयी। दोहा छंद में रचित इस प्रबंध काव्य में कैकेयी के चरित्र को एक नयी दृष्टि से मूल्यांकित किया गया है। चार युगों तक फैली कथा को समेटते हुए यह काव्य कृति युगीन प्रवृत्तियों और संकटों-समाधानों के बीच कैकेयी अपने नारीत्व, मातृत्व, स्त्रीत्व और विप्लवत्व के सहारे खुद को अपराजेय बनाये रखती है। कैकेयी छली गयी लेकिन उसे छलनेवाले दशरथ और उनके गुरु वशिष्ठ लोक मान्य और लोक पूज्य बने रहे जबकि निर्दोष कैकेयी के हिस्से में आयी लोक निंदा। कृतिकार ने कैकेयी के चरित्र पर लगे लांछनों के कुहासे को दूर करने का सफल प्रयास किया है। इस कृति में कैकेयी अपनी आत्म कथा आपने दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती है। वह चारों युगों में पुरुष प्रधान समाज में नारी के साथ किये जाते पुरुष वर्चस्व को अन्याय की तरह लेती है। 

         राजा अवस्थी की चौथी कृति ''आलोचना का ब्राह्मणवाद'' (समीक्षा कृति, वर्ष २०२६, पृष्ठ १०८, पेपरबैक, मूल्य २२५/-, प्रकाशक न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन नई दिल्ली) है। हिन्दी समालोचना के पितृ पुरुष आचार्य राम चंद्र शुक्ल को समर्पित इस कृति में राजा अवस्थी ने हिन्दी समीक्षा के वर्तमान गाड़ी कविता को मूल कविता माने जाने के विरोध में कई सवाल उठाते हैं। हिन्दी साहित्य की छांदस कविता के समर्थ रचयिता राजा अवस्थी गीत-नवगीत के कथ्य और शिल्प की जड़ता के विरोध और नवता के समर्थन में बहुधा अपनी बात कहते रहे हैं। 'आलोचना का ब्राह्मणवाद' हिन्दी समालोचना में नवता लाने की दिशा में एक सुचिन्तित कदम है।   

         यह लेख राजा अवस्थी के नवगीतों पर केंद्रित है इसलिए यहाँ उनकी दो पश्चातवर्ती किताबों का उल्लेख मात्र किया गया है। राजा अवस्थी के नवगीत समय से पूर्व समय के दरवाजे पर दस्तक देकर भावी बदलावों का सफल संकेत सहजता से करते हैं।
००० 
संपर्क: आचार्य संजीव वर्मा ''सलिल'', विश्ववाणी हिन्दी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१. 
वाट्स ऐप ९४२५१८३२४४ 

 
                   

  
















सितंबर २३, मुक्तक, दोहा, कुंडलिया, नवगीत, बाल, मंदिर, मस्जिद,

सलिल सृजन सितंबर २३
*
नवगीत 
० 
जैसा भी है 
घर तो घर है
ईंट-रेत-सीमेंट 
घर नहीं हो सकते हैं,
चौखट-पल्ले मात्र 
नहीं दर हो सकते हैं, 
जमीं और आकाश 
बिछा लो याकि ओढ़ लो-
क्रंदन आह विलाप 
न सुस्वर हो सकते हैं।  
मालिक केवल एक 
शेष हर जन नौकर है।
जैसा भी है 
घर तो घर है
शिव ने कब धरती से  
जंगल-पर्वत छीने?,
हरि ने महामार्ग कब 
थे कोई बनवाए?, 
ब्रह्मा ने कब महानगर में  
माल खड़े कर-
लूटा सुर-असुरों को 
कोई तो बतलाए।  
जगत गुरु का आत्म प्रवंचन  
धोखा भर है।
जैसा भी है 
घर तो घर है
हुआ भ्रष्ट आचार; 
शिष्ट आचार आजकल,
असन्तुष्ट; संतुष्ट न   
लेकिन मौन अति विकल, 
सेवक-प्रतिनिधि कुचलें  
जन को; होकर निर्दय-
नाव आशा का सूर्य  
ऊगने से पहले ढल।  
बतला रहा अटल सच  
घर-घर घुसा तिमिर है।
जैसा भी है 
घर तो घर है 
२३.९.२०२६  
०००  
मुक्तक
नारी भारी नर हल्का है
वह फल यह केवल छिलका है
चाँद कहोगे यदि तुम उसको-
वह बोले 'तू तो उल्का है'।
*
चार न बजते जब, न क्यों कहते उसे अ-चार?
कारण खट्टे दाँत कर, करता चुप्प अचार।
दाँत निपोरो व्यर्थ क्यों जब खुद हो बे-दाँत
कहती दाल बघारकर, और न शान बघार।।
*
जो न नार उसको कभी कहना नहीं अ-नार
जो सु-नार क्या उसे तुम कहते कभी सुनार?
शब्द-अर्थ का खेल है धूप-छाँव सम मीत-
जो बे-कार न मानिए आप उसे बेकार।।
*
बात करें बेबात गर हो उसमें भी अर्थ
बिना अर्थ हर बात को आप मानिए व्यर्थ।
रहे स्व-अर्थ, न स्वार्थ हो, साध्य 'सलिल' सर्वार्थ -
अगर न कुछ परमार्थ तो होगा सिर्फ अनर्थ।।
***
विमर्श
- शब्दों का गलत प्रयोग मत कीजिए।
क्यों पूछते हो राह यह जाती कहाँ है?
आदमी जाते हैं नादां, रास्ते जाते नहीं हैं।।
- हम रेल में नहीं रेलगाड़ी(ट्रेन) में बैठते हैं।
रेल = पटरी
- जबलपुर आ गया कहना ग़लत है।
जबलपुर (स्थान) कहीं आता-जाता नहीं, हम आते-जाते हैं।
- पदनाम उभय लिंगी होता है। प्रधान मंत्री स्त्री हो या पुरुष प्रधान मंत्री ही कहा जाता है, प्रधान मंत्रिणी नहीं होता। सभापति महिला हो तो सभा पत्नी नहीं कही जा सकती। राष्ट्रपति भी नहीं बदलता। इसलिए शिक्षक, चिकित्सक आदि भी नहीं बदलेंगे, शिक्षिका, चिकित्सका, अधीक्षिका आदि प्रयोग गलत हैं।
-भाषा का भी विज्ञान होता है। साहित्य लिखते समय भाषा शास्त्र और भाषा विज्ञान का ध्यान रखना जरूरी है।
२३.९.२०२४
***
दोहा सलिला
*
मीरा का पथ रोकना, नहीं किसी को साध्य।
दिखें न लेकिन साथ हैं, पल-पल प्रभु आराध्य।।
*
श्री धर कर आचार्य जी, कहें करो पुरुषार्थ।
तभी सुभद्रा विहँसकर, वरण करेगी पार्थ।।
*
सरस्वती-सुत पर रहे, अगर लक्ष्मी-दृष्टि।
शक्ति मिले नव सृजन की, करें कृपा की वृष्टि।।
*
राम अनुज दोहा लिखें, सतसई सीता-राम।
महाकाव्य रावण पढ़े, तब हो काम-तमाम।।
*
व्यंजन सी हो व्यंजना, दोहा रुचता खूब।
जी भरकर आनंद लें, रस-सलिला में डूब।।
*
काव्य-सुधा वर्षण हुआ, श्रोता चातक तृप्त।
कवि प्यासा लिखता रहे, रहता सदा अतृप्त।।
*
शशि-त्यागी चंद्रिका गह, सलिल सुशोभित खूब।
घाट-बाट चुप निरखते, शास्वत छटा अनूप।।
*
दीप जलाया भरत ने, भारत गहे प्रकाश।
कीर्ति न सीमित धरा तक, बता रहा आकाश।।
*
राव वही जिसने गहा, रामानंद अथाह।
नहीं जागतिक लोभ की, की किंचित परवाह।
*
अविरल भाव विनीत कहँ, अहंकार सब ओर।
इसीलिए टकराव हो, द्वेष बढ़ रहा घोर।।
*
तारे सुन राकेश के, दोहे तजें न साथ।
गयी चाँदनी मायके, खूब दुखा जब माथ।।
*
कथ्य रखे दोहा अमित, ज्यों आकाश सुनील।
नहीं भाव रस बिंब में, रहे लोच या ढील।।
*
वंदन उमा-उमेश का, दोहा करता नित्य।
कालजयी है इसलिए, अब तक छंद अनित्य।।
*
कविता की आराधना, करे भाव के साथ।
जो उस पर ही हो सदय, छंद पकड़ता हाथ।।
*
कवि-प्रताप है असीमित, नमन करे खुद ताज।
कवि की लेकर पालकी, चलते राजधिराज।।
*
अनिल अनल भू नभ सलिल, पञ्च तत्वमय सृष्टि।
कथ्य, भाव रस बिंब लय, करें सत्य की वृष्टि।।
*
करे कल्पना कल्पना, दोहे में साकार।
पाठक पढ़ समझे तभी, भावों का व्यापार।।
*
दूर कहीं क्या घट रहा, संजय पाया देख।
दोहा बिन देखे करे, शब्दों से उल्लेख।।
*
बेदिल से बेहद दुखी, दिल-डॉक्टर मिल बैठ।
कहें बिना दिल किस तरह, हो अपनी घुसपैठ।।
*
मुक्तक खुद में पूर्ण है, होता नहीं अपूर्ण।
छंद बिना हो किस तरह, मुक्तक कोई पूर्ण।।
*
तनहा-तनहा फिर रहा, जो वह है निर्जीव।
जो मनहा होकर फिर, वही हुआ संजीव।।
*
पूर्ण मात्र परमात्म है, रचे सृष्टि संपूर्ण।
मानव की रचना सकल, कहें लोग अपूर्ण।।
*
छंद सरोवर में खिला, दोहा पुष्प सरोज।
प्रियदर्शी प्रिय दर्श कर, चेहरा छाए ओज।.
*
किस लय में दोहा पढ़ें, समझें अपने आप।
लय जाए तब आप ही, शब्द-शब्द में व्याप।।
*
कृष्ण मुरारी; लाल हैं, मधुकर जाने सृष्टि।
कान्हा जानें यशोदा, अपनी-अपनी दृष्टि।।
*
नारायण देते विजय, अगर रहे यदि व्यक्ति।
भ्रमर न थकता सुनाकर, सुनें स्नेहमय उक्ति।।
*
शकुंतला हो कथ्य तो, छंद बने दुष्यंत।
भाव और लय यों रहें, जैसे कांता-कंत।।
*
छंद समुन्दर में खिले, दोहा पंकज नित्य।
तरुण अरुण वंदन करे, निरखें रूप अनित्य।।
*
विजय चतुर्वेदी वरे, निर्वेदी की मात।
जिसका जितना अध्ययन, उतना हो विख्यात।।
*
श्री वास्तव में गेह जो, कृष्ण बने कर कर्म।
आस न फल की पालता, यही धर्म का मर्म।।
*
राम प्रसाद मिले अगर, सीता सा विश्वास।
जो विश्वास न कर सके, वह पाता संत्रास।।
२३.९.२०१८
***
मुक्तक
एक से हैं हम मगर डरे - डरे
जी रहे हैं छाँव में मरे - मरे
मारकर भी वो नहीं प्रसन्न है
टांग तोड़ कह रहे अरे! अरे!!
२३.९.२०१६
***
दो रचनाकार एक कुंडलिया 
*
गरजा बरसा मेघ फिर , कह दी मन की बात
कारी बदरी मौन में सिसकी सारी रात - शशि पाधा
सिसकी सारी रात, अश्रु गिर ओस हो गए
मिला उषा का स्नेह, हवा में तुरत खो गए
शशि ने देखा बिम्ब सलिल में, बादल गरजा
सूरज दमका धूप साथ, फिर जमकर लरजा - संजीव 'सलिल'
***
नवगीत:
*
एक शाम
करना है मीत मुझे
अपने भी नाम
.
अपनों से,
सपनों से,
मन नहीं भरा.
अनजाने-
अनदेखे
से रहा डरा.
परिवर्तन का मंचन
जब कभी हुआ,
पिंजरे को
तोड़ उड़ा
चाह का सुआ.
अनुबंधों!
प्रतिबंधों!!
प्राण-मन कहें
तुम्हें राम-राम.
.
ज्यों की त्यों
चादर कब
रह सकी कहो?
दावानल-
बड़वानल
सह, नहीं दहो.
पत्थर का
वक्ष चीर
गंग
सलिल सम बहो.
पाये को
खोने का
कुछ मजा गहो.
सोनल संसार
हुआ कब कभी कहो
इस-उस के नाम?
.
संझा में
घिर आयें
याद मेघ ना
आशुतोष
मौन सहें
अकथ वेदना.
अंशुमान निरख रहे
कालचक्र-रेख.
किस्मत में
क्या लिखा?,
कौन सका देख??
पुष्पा ले जी भर तू
ओम-व्योम, दिग-दिगंत
श्रम कर निष्काम।
बेंगलुरु, २२.९.२०१५
***
बाल रचनाएँ:
१. श्रेया रानी
श्रेया रानी खूब सयानी
प्यारी लगती कर नादानी
पल में हँसे, रूठती पल में
कभी लगे नानी की नानी
चाहे मम्मी कभी न टोंकें
करने दें जी भर मनमानी
लाड लड़ाती है दादी से
बब्बाजी से सुने कहानी
***
२. अर्णव दादा
अर्णव दादा गुपचुप आता
रहे शांत, सबके मन भाता
आँखों में सपने अनंत ले-
मन ही मन हँसता-मुस्काता
मम्मी झींके:'नहीं सुधरता,
कभी न खाना जी भर खाता
खेले कैरम हाथी-घोड़े,
ऊँट-वज़ीरों को लड़वाता
***
३. आरोही
धरती से निकली कोंपल सी
आरोही नन्हीं कोमल सी
अनजाने कल जैसी मोहक
हँसी मधुर, कूकी कोयल सी
उलट-पलटकर पैर पटकती
ज्यों मछली जल में चंचल सी
चाह: गोद में उठा-घुमाओ
करती निर्झर ध्वनि कलकल सी
२३.९.२०१५
***
सामयिक रचना:
मंदिर बनाम मस्जिद
*
नव पीढ़ी सच पूछ रही...
*
ईश्वर-अल्लाह एक अगर
मंदिर-मस्जिद झगड़ा क्यों?
सत्य-तथ्य सब बतलाओ
सदियों का यह लफड़ा क्यों?
*
इसने उसको क्यों मारा?
नातों को क्यों धिक्कारा?
बुतशिकनी क्यों पुण्य हुई?
किये अपहरण, ललकारा?
*
नहीं भूमि की तनिक कमी.
फिर क्यों तोड़े धर्मस्थल?
गलती अगर हुई थी तो-
हटा न क्यों हो परिमार्जन?
*
राम-कृष्ण-शिव हुए प्रथम,
हुए बाद में पैगम्बर.
मंदिर अधिक पुराने हैं-
साक्षी है धरती-अम्बर..
*
आक्रान्ता अत्याचारी,
हुए हिन्दुओं पर भारी.
जन-गण का अपमान किया-
यह फसाद की जड़ सारी..
*
ना अतीत के कागज़ हैं,
और न सनदें ही संभव.
पर इतिहास बताता है-
प्रगटे थे कान्हा-राघव..
*
बदला समय न सच बदला.
किया सियासत ने घपला..
हिन्दू-मुस्लिम गए ठगे-
जनता रही सिर्फ अबला..
*
एक लगाता है ताला.
खोले दूजा मतवाला..
एक तोड़ता है ढाँचा-
दूजे का भी मन काला..
*
दोनों सत्ता के प्यासे.
जन-गण को देते झाँसे..
न्यायालय का काम न यह-
फिर भी नाहक हैं फासें..
*
नहीं चाहता कोई दल.
मसला यह हो पाये हल..
पंडित,मुल्ला, नेता ही-
करते हलचल, हो दलदल..
*
जो-जैसा है यदि छोड़ें.
दिशा धर्म की कुछ मोड़ें..
मानव हो पहले इंसान-
टूट गए जो दिल जोड़ें..
*
पंडित फिर जाएँ कश्मीर.
मिटें दिलों पर पड़ी लकीर..
धर्म न मजहब को बदलें-
काफ़िर कहों न कुफ्र, हकीर..
२३-९-२०१०
***
मुक्तक
हर इंसां हो एक समान.
अलग नहीं हों नियम-विधान..
कहीं बसें हो रोक नहीं-
खुश हों तब अल्लाह-भगवान..
*
जिया वही जो बढ़ता है.
सच की सीढ़ी चढ़ता है..
जान अतीत समझता है-
राहें-मंजिल गढ़ता है..
*
मिले हाथ से हाथ रहें.
उठे सभी के माथ रहें..
कोई न स्वामी-सेवक हो-
नाथ न कोई अनाथ रहे..
*
सबका मालिक एक वही.
यह सच भूलें कभी नहीं..
बँटवारे हैं सभी गलत-
जिए योग्यता बढ़े यहीं..
*
हम कंकर हैं शंकर हों.
कभी न हम प्रलयंकर हों.
नाकाबिल-निबलों को हम
नाहक ना अभ्यंकर हों..
*
पंजा-कमल ठगें दोनों.
वे मुस्लिम ये हिन्दू को..
राजनीति की खातिर ही-
लाते मस्जिद-मन्दिर को..
*
जनता अब इन्साफ करे.
नेता को ना माफ़ करे..
पकड़ सिखाये सबक सही-
राजनीति को राख करे..
*
मुल्ला-पंडित लड़वाते.
गलत रास्ता दिखलाते.
चंगुल से छुट्टी पायें-
नाहक हमको भरमाते..
*
सबको मिलकर रहना है.
सुख-दुख संग-संग सहना है..
मजहब यही बताता है-
यही धर्म का कहना है..
*
एक-दूजे का ध्यान रखें.
स्वाद प्रेम का 'सलिल' चखें.
दूध और पानी जैसे-
दुनिया को हम एक दिखें..
***

मंगलवार, 22 सितंबर 2026

सितंबर २२, दोहा ग़ज़ल, आव्हान गीत, स्वर्ण चम्पा, गाँधी, नवगीत, मुक्तक, बेटी, हास्य

सलिल सृजन सितंबर २२
*
दोहा ग़ज़ल
.
ख्वाब सुनहरे देखते, जागे सारी रात।
हुई दोस्त से गुफ्तगू, यादों की बारात
.
फतह तुम्हारी हुई तो, हमने पाई जीत
बनीं दोस्त की हार ही, यारों अपनी मात
.
गले मिला फिर पीठ में, छुरा दिया था भोंक
मिली दोस्त से दोस्त को, यह कैसी सौगात
.
तुम तो थे मुस्का रहे, कर नज़रों के वार
हुआ शहादत के लिए, दिल हँसकर तैयार
.
खेलो खेल न तुम रुको, हम लेंगे चुप झेल
हमें मिले या ना मिले, मिले तुम्हें तो प्यार
.
प्यार अगर हो दोस्त से, झट कह दे मत सोच
प्यार अगर तू दोस्त का, बन जा खिदमतगार
.
तू तू मैं मैं थे, न हैं, हम होकर हैं एक,
तूतूमैंमैं कर रहे, खुद को खुद ही मार
२२.९.२०२६
०००
स्वर्ण चम्पा
स्वर्ण चम्पा से सुवासित बाग
सोनपरियाँ झुलसतीं ले आग
ज्योत्सना आकर रही है छेड़
जगाती है संत में अनुराग
फागुनी हैं हवाएँ मदमस्त
रंग ले आईं लगाएँ दाग
उषा किरणें लिपटतीं ले मोह
जलन से काला हुआ है काग
शीत छेदे बदन, मारे तीर
सिहरता ज्यों डँस रहा हो नाग
दामिनी हो कामिनी गिरती
बिन दिए कंधा रही है दाग
कर 'सलिल' में स्नान हो शीतल
नर्मदा को नमन कर झट जाग
२२.९.२०२५
***
आव्हान गीत
जागो माँ
*
जागो माँ! जागो माँ!!
*
सीमा पर अरिदल ने भारत को घेरा है
सत्ता पर स्वार्थों ने जमा लिया डेरा है
जनमत की अनदेखी, चिंतन पर पहरा है
भक्तों ने गाली का पढ़ लिया ककहरा है
सैनिक का खून अब न बहे मौन त्यागो माँ
जागो माँ! जागो माँ!!
*
जनगण है दीन-हीन, रोटी के लाले हैं
चिड़ियों की रखवाली, बाज मिल सम्हाले हैं
नेता के वसन श्वेत, अंतर्मन काले हैं
सेठों के स्वार्थ भ्रष्ट तंत्र के हवाले हैं
रिश्वत-मँहगाई पर ब्रम्ह अस्त्र दागो माँ
जागो माँ! जागो माँ!!
*
जन जैसे प्रतिनिधि को औसत ही वेतन हो
मेहनत का मोल मिले, खुश मजूर का मन हो
नेता-अफसर सुत के हाथों में भी गन हो
मेहनत कर सेठ पले, जन नायक सज्जन हो
राजनीति नैतिकता एक साथ पागो माँ
*
सीमा पर अरिदल ने भारत को घेरा है
सत्ता पर स्वार्थों ने जमा लिया डेरा है
जनमत की अनदेखी, चिंतन पर पहरा है
भक्तों ने गाली का पढ़ लिया ककहरा है
सैनिक का खून अब न बहे मौन त्यागो माँ
जागो माँ! जागो माँ!!
*
दोहा सलिला:
गाँधी के इस देश में...
संजीव 'सलिल'
गाँधी के इस देश में, गाँधी की जयकार.
सत्ता पकड़े गोडसे, रोज कर रहा यार..
गाँधी के इस देश में, गाँधी की सरकार.
हाय गोडसे बन गया, है उसका सरदार..
गाँधी के इस देश में, गाँधी की है मौत.
सत्य अहिंसा सिसकती, हुआ स्वदेशी फौत..
गाँधी के इस देश में, हिंसा की जय बोल.
बाहुबली नेता बने, जन को धन से तोल..
गाँधी के इस देश में, गाँधी की दरकार.
सिर्फ डाकुओं को रही, शेष कहें बेकार..
गाँधी के इस देश में, हुआ तमाशा खूब.
गाँधीवादी पी सुरा, राग अलापें खूब..
गाँधी के इस देश में, डंडे का है जोर.
खेल रहे हैं डांडिया, विहँस पुलिसिए-चोर..
गाँधी के इस देश में, अंग्रेजी का दौर.
किसको है फुर्सत करे, हिन्दी पर कुछ गौर..
गाँधी के इस देश में, बोझ हुआ कानून.
न्यायालय में हो रहा, नित्य सत्य का खून..
गाँधी के इस देश में, धनी-दरिद्र समान.
उनकी फैशन ये विवश, देह हुई दूकान..
गाँधी के इस देश में, 'सलिल 'न कुछ भी ठीक.
दुनिया का बाज़ार है, देश तोड़कर लीक..
*
नवगीत:
*
गाँधी को मारा
आरोप
गाँधी को भूले
आक्रोश
भूल सुधारी
गर वंदन कर
गाँधी को छीना
प्रतिरोध
गाँधी नहीं बपौती
मानो
गाँधी सद्विचार
सच जानो
बाँधो मत सीमा में
गाँधी
गाँधी परिवर्तन की
आँधी
स्वार्थ साधते रहे
अबोध
गाँधी की मत
नकल उतारो
गाँधी को मत
पूज बिसारो
गाँधी बैठे मन
मंदिर में
तन से गाँधी को
मनुहारो
कर्म करो सत
है अनुरोध
***
हास्य रचना:
सीता-राम
*
लालू से
कालू मिला,
खुश हो किया सलाम।
बोला-
"जोड़ी जँच रही
जैसे सीता-राम।
लालू बोला-
सच?
न क्यों, रावण हरता बोल?
समा न लेती भू कहो,
क्यों लाकर भूडोल??
२२.९.२०१८
***
एक गीत,
*
अनसुनी रही अब तक पुकार
मन-प्राण रहे जिसको गुहार
वह आकर भी क्यों आ न सका?
जो नहीं सका पल भर बिसार
*
वह बाहर हो तब तो आए
मनबसिया भरमा पछताए
जो खुद परवश ही रहता है
वह कैसे निज सुर में गाए?
*
जब झुका दृष्टि मन में देखा
तब उसको नयनों ने लेखा
जग समझ रहा हम रोये हैं
सुधियाँ फैलीं कज्जल-रेखा
*
बिन बोले वह क्या बोल गया
प्राणों में मिसरी घोल गया
मैं रही रोकती लेकिन मन
पल भर न रुका झट डोल गया
*
जिसको जो कहना है कह ले
खुश हो यो गुपचुप छिप दह ले
बासंती पवन झकोरा आ
मेरी सुधियाँ गह ले, तह ले
*
कर वाह न भरना अरे! आह
मन की ले पाया कौन थाह?
जो गले मिले, भुज पाश बाँध
उनके उर में ही पली डाह
*
जो बने भक्त गह चरण कभी
कर रहे भस्म दे शाप अभी
वाणी में नहीं प्रभाव बचा
सर पीट रहे निज हाथ तभी
*
मन मीरा सा, तन राधा सा,
किसने किसको कब साधा सा?
कह कौन सकेगा करुण कथा
किसने किसको आराधा सा
*
मिट गया द्वैत, अंतर न रहा
अंतर में जो मंतर न रहा
नयनों ने पुनि मन को रोका
मत बोल की प्रत्यंतर न रहा
***
मुक्तक
खुद जलकर भी सदा उजाला ज्योति जगत को देती है
जीत निराशा तरणि नित्य नव आशा की वह खेती है
रश्मि बिम्ब से सलिल-लहर भी ज्योतिमयी हो जाती है
निबिड़ तिमिर में हँस ऊषा का बीज वपन कर आती है
*
हम चाहें तो सरकारों के किरदारों को झुकना होगा
हम चाहें तो आतंकों को पीठ दिखाकर मुडना होगा
कहे कारगिल हार न हिम्मत, टकरा जाना तूफानों से-
गोरखनाथ पुकार रहे हैं,अब दुश्मन को डरना होगा
*
मजा आता न गर तो कल्पना करता नहीं कोई
मजा आता न गर तो जगत में जीता नहीं कोई
मजे में कट गयी जो शुक्रिया उसका करों यारों-
मजा आता नहीं तो मौन हो मरता नहीं कोई
*
करो मत द्वंद, काटो फंद, रचकर छंद पल-पल में
न जो मति मंद, ले आनंद, सुनकर छंद पल-पल में
रसिक मन डूबकर रस में, बजाता बाँसुरी जब-जब
बने तन राधिका, सँग श्वास गोपी नाचें पल-पल में
*
पता है लापता जिसका उसे सब खोजते हैं क्यों?
खिली कलियाँ सवेरे बाग़ में जा नोचते हैं क्यों?
चढ़ें मन्दिर में जाती सूख, खुश हो देवता कैसे?
कहो तो हाथ को अपने नहीं तुम रोकते हो क्यों?
***
एक गीत
बातें हों अब खरी-खरी
*
मुँह देखी हो चुकी बहुत
अब बातें हों कुछ खरी-खरी
जो न बात से बात मानता
लातें तबियत करें हरी
*
पाक करे नापाक हरकतें
बार-बार मत चेताओ
दहशतगर्दों को घर में घुस
मार-मार अब दफनाओ
लंका से आतंक मिटाया
राघव ने यह याद रहे
काश्मीर को बचा-मिलाया
भारत में, इतिहास कहे
बांगला देश बनाया हमने
मत भूले रावलपिडी
कीलर-सेखों की बहादुरी
देख सरहदें थीं सिहरी
मुँह देखी हो चुकी बहुत
अब बातें हों कुछ खरी-खरी
*
करगिल से पिटकर भागे थे
भूल गए क्या लतखोरों?
सेंध लगा छिपकर घुसते हो
क्यों न लजाते हो चोरों?
पाले साँप, डँस रहे तुझको
आजा शरण बचा लेंगे
ज़हर उतार अजदहे से भी
तेरी कसम बचा लेंगे
है भारत का अंग एक तू
दुहराएगा फिर इतिहास
फिर बलूच-पख्तून बिरादर
के होंठों पर होगा हास
'जिए सिंध' के नारे खोदें
कब्र दुश्मनी की गहरी
मुँह देखी हो चुकी बहुत
अब बातें हों कुछ खरी-खरी
२१-९-२०१६
***
विमर्श: श्रम और बुद्धि
ब्राम्हणों ने अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने के लिये ग्रंथों में अनेक निराधार, अवैज्ञानिक, समाज के लिए हानिप्रद और सनातन धर्म के प्रतिकूल बातें लिखकर सबका कितना अहित किया? तो पढ़िए व्यास स्मृति विविध जातियों के बारे में क्या कहती है?
जानिए और बताइये क्या हमें व्यास का सम्मान कारण चाहिए???
व्यास स्मृति, अध्याय १
वर्द्धकी नापितो गोपः आशापः कुम्भकारकः
वीवक किरात कायस्थ मालाकर कुटिम्बिनः
एते चान्ये च वहवः शूद्रा भिन्नः स्वकर्मभिः -१०
चर्मकारः भटो भिल्लो रजकः पुष्ठकारो नट:
वरटो भेद चाण्डाल दासं स्वपच कोलकाः -११
एते अन्त्यज समाख्याता ये चान्ये च गवारान:
आशाम सम्भाषणाद स्नानं दशनादरक वीक्षणम् -१२
अर्थ: बढ़ई, नाई, अहीर, आशाप, कुम्हार, वीवक, किरात, कायस्थ, मालाकार कुटुम्बी हैं। ये भिन्न-भिन्न कर्मों के कारण शूद्र हैं. चमार, भाट, भील, धोबी, पुस्तक बांधनेवाले, नट, वरट, चाण्डालों, दास, कोल आदि माँसभक्षियों अन्त्यज (अछूत) हैं. इनसे बात करने के बाद स्नान तथा देख लेने पर सूर्य दर्शन करना चाहिए।
उल्लेख्य है कि मूलतः ब्राम्हण और कायस्थ दोनों की उत्पत्ति एक ही मूल ब्रम्ह या परब्रम्ह से है। दोनों बुद्धिजीवी रहे हैं. बुद्धि का प्रयोग कर समाज को व्यवस्थित और शासित करनेवाले अर्थात राज-काज को मानव की उन्नति का माध्यम माननेवाले कायस्थ (कार्यः स्थितः सह कायस्थः) तथा बुद्धि के विकास और ज्ञान-दान को मानवोन्नति का मूल माननेवाले ब्राम्हण (ब्रम्हं जानाति सः ब्राम्हणाः) हुए।
ये दोनों पथ एक-दूसरे के पूरक हैं किन्तु अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए ब्राम्हणों ने वैसे ही निराधार प्रावधान किये जैसे आजकल खाप के फैसले और फतवे कर रहे हैं. उक्त उद्धरण में व्यास ने ब्राम्हणों के समकक्ष कायस्थों को श्रमजीवी वर्ग के समतुल्य बताया और श्रमजीवी कर्ज को हीन कह दिया। फलतः, समाज विघटित हुआ। बल और बुद्धि दोनों में श्रेष्ठ कायस्थों का पराभव केवल भुज बल को प्रमुख माननेवाले क्षत्रियों के प्रभुत्व का कारण बना। श्रमजीवी वर्ग ने अपमानित होकर साथ न दिया तो विदेशी हमलावर जीते, देश गुलाम हुआ।
इस विमर्श का आशय यह कि अतीत से सबक लें। समाज के उन्नयन में हर वर्ग का महत्त्व समझें, श्रम को सम्मान देना सीखें। धर्म-कर्म पर केवल जन्मना ब्राम्हणों का वर्चस्व न हो। होटल में ५० रु. टिप देनेवाला रिक्शेवाले से ५-१० रु. का मोल-भाव न करे, श्रमजीवी को इतना पारिश्रमिक मिले कि वह सम्मान से परिवार पाल सके। पूंजी पे लाभ की दर से श्रम का मोल अधिक हो। आपके अभिमत की प्रतीक्षा है।
२२.९.२०१४
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मुक्तक सलिला :
बेटियाँ
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आस हैं, अरमान हैं, वरदान हैं ये बेटियाँ
सच कहूँ माता-पिता की शान हैं ये बेटियाँ
पैर पूजो या कलेजे से लगाकर धन्य हो-
एक क्या दो-दो कुलों की आन हैं ये बेटियाँ
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शोरगुल में कोकिला का गान हैं ये बेटियाँ
नदी की कलकल सुरीली तान हैं ये बेटियाँ
माँ, सुता, भगिनी, सखी, अर्धांगिनी बन साथ दें-
फूँक देतीं जान देकर जान भी ये बेटियाँ
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मत कहो घर में महज मेहमान हैं ये बेटियाँ
यह न सोचो सत्य से अनजान हैं ये बेटियाँ
लेते हक लड़ के हैं लड़के, फूँक भी देते 'सलिल'-
नर्मदा जल सी, गुणों की खान हैं ये बेटियाँ
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ज़िन्दगी की बन्दगी, पहचान हैं ये बेटियाँ
लाज की चादर, हया का थान हैं ये बेटियाँ
चाहते तुमको मिले वरदान तो वर-दान दो
अब न कहना 'सलिल कन्या-दान हैं ये बेटियाँ
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सभ्यता की फसल उर्वर, धान हैं ये बेटियाँ
महत्ता का, श्रेष्ठता का भान हैं ये बेटियाँ
धरा हैं पगतल की बेटे, बेटियाँ छत शीश की-
भेद मत करना, नहीं असमान हैं ये बेटियाँ
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हास्य रचना:
चना जोर गरम
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चना जोर गरम
बाबू ! मैं लाया मजेदार
चना जोर गरम…
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ममो मुट्ठी भर चना चबाये
संसद को नित धता बताये
रूपया गिरा देख मुस्काये-
अमरीका को शीश नवाये
चना जोर गरम…
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नमो ने खाकर चना डकारा
शनी मिमयाता रहा बिचारा
लाम का उतर गया है पारा
लाल सियापा कर कर हांरा
चना जोर गरम…
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मुरा की नूरा-कुश्ती नकली
शामत रामदेव की असली
चना बापू ने नहीं चबाये-
चदरिया मैली ले पछताये
चना जोर गरम…
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मेरा चना मसालेवाला
अन्ना को करता मतवाला
जनगण-मन जपता है माला-
मेहनतकश का यही निवाला
चना जोर गरम…
२२-९-२०१३
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ममो = मनमोहन सिंह
नमो = नरेन्द्र मोदी,
शनी = शरद यादव-नीतीश कुमार
लाम = लालू यादव-ममता
लाल = लालकृष्ण अडवानी
मुरा = मुलायम सिंह-राहुल गाँधी बापू = आसाराम