कुल पेज दृश्य

शुक्रवार, 26 जुलाई 2019

समीक्षा काल है संक्रांति का -चंद्रकांता अग्निहोत्री

समीक्षा
काल है संक्रांति का
चंद्रकांता अग्निहोत्री
*
शब्द, अर्थ, प्रतीक, बिंब, छंद, अलंकार जिनका अनुगमन करते हैं और जो सदा सत्य की सेवा में अनुरत हैं, ऐसे मनीषी के परिचय को शब्दों में बाँधना कठिन है। इनकी कविताओं को प्रयोगवादी कविता कहा जा सकता है। काल है संक्रांति का आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल’ जी की नवीन कृति है। २०१५ में प्रकाशित इस गीत, नवगीत संग्रह में कवि ने कई नए प्रयोग किये हैं। इसमें उन्हें सफलता भी मिली है। नवीन की चाह में इन्होंने शाश्वत मूल्यों को तिलांजलि नहीं दी क्योंकि इस संग्रह में आरंभ में ही 'वंदन' नामक कविता में सब प्रकार से अभिनंदन किया है:
‘शरणागत हम
चित्रगुप्त प्रभु!
हाथ पसारे आए।’
अब वे ’स्तवन’ के अंतर्गत शारदा माँ की स्तुति करते हैं:
‘सरस्वती शारद ब्रह्माणी!
जय-जय वीणापाणी!'
एक आध्यात्मिक यात्री की तरह वे अपने पूर्वजों का स्मरण भी करते हैं:
कलश नहीं आधार बन सकें
भू हो हिंदी धाम।
सुमिर लें पुरखों को हम
आओ करे प्रणाम।
समाज हमें प्रभावित करता है और समाज की विद्रूपताओं को देख कवि हृदय विचलित हो काव्य रचना करता है। चारों और फैले आतंक को महसूस करते कवि कहता है:
‘झोंक दो आतंक-दहशत
तुम जलाकर भाड़
तुम मत झुको सूरज।’
कवि कहता है विकास के,प्रकाश के, नई उड़ान के सूरज तुम मत थकना। यहाँ सूरज प्रतीक है शुभ संकल्प का, उदित श्रेष्ठ संभावनाओं का और कहीं भी भ्रष्टाचार का अँधेरा न हो।
अपने भीतर के सूरज को संबोधित करते हर कवि कहता है:
'तुम रुको नहीं
थको नहीं।'
क्योंकि काल है संक्रांति का ।इस काल में चलते हुए कवि कहता है:.
खरपतवार न शेष रहे,
कचरा कहीं न लेश रहे।
सच में संक्रांति काल से गुजरना निश्चय ही पीड़ादायक है लेकिन कवि की निश्चयात्मक बुद्धि कहती है:
‘प्रणति है आशीष दो रवि
बाँह में कब घेरते हैं
प्रतीक्षा है उन पलों की।’
'काल है संक्राति का’ नामक काव्य संग्रह में यही स्वर उद्घोषित होता है: 'तुम रुको तुम थको नहीं। हम नये युग की ओर बढ़ रहे हैं। पुराना छूट रहा है,नये का आगमन है।
'सिर्फ सच में
धांधली अब तक चली
अब रोक दे।
सुधारों के लिए खुद को
झोंक दे।'
आक्रोश भी है उम्मीद भी। यह भाव लगभग सभी कविताओं में दृष्टिगोचर होता है:
'सुंदरिये मुंदरिये' की तर्ज़ पर अभिनव प्रयोग द्रष्टव्य है:
‘झूठी लड़े लड़ाई होय
भीतर करें मिताई होय।'
सदा शुभ की प्रेरणा देते हुए ‘करना सदा’ में कवि कहता है:
'हर शूल ले, हँस फूल दे
यदि भूल हो, मत तूल दे।
तुम बन्दूक चलाओ तो.
दीन-धर्म की तुम्हें न चाह
अमन-चैन को देते दाह
तुम जब आग लगाओगे
हम हँस, फिर फूल खिलाएँगे।'
स्थिति कोई भी हो, मनुष्य को उसका सामना करने के लिए तत्पर रहना चाहिए। समाज में रहते हुए भी भीड़ के साथ होना पड़ता है। 'राम बचाए' में कवि प्रश्न करते हैं:
'दुश्मन पर कम, करे विपक्षी पर
ही क्यों ज्यादा प्रहार हम?
कजरी आल्हा फागें बिसरे
माल जा रहे माल लुटाने
क्यों न भीड़ से
हुए भिन्न हम
राम बचाए।'
'कब होंगे आजाद' में क्षोभ है, स्वतंत्र होने की अभीप्सा है:
रीति-नीति, आचार-विचारों, भाषा का हो ज्ञान।
समझ बढ़े तो सीखें, रुचिकर धर्म नीति विज्ञान।
सुर न असुर, हम आदम यदि बन पायेंगे इंसान-
स्वर्ग तभी तो हो पाएगा, धरती पर आबाद।
कब होंगे आजाद?
कवि आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' जी की सभी रचनाएँ श्रेष्ठ हैं। ‘काल है संक्राति का’ का उद्घोष सभी
रचनाओं में परिलक्षित होता है। सभी रचनाओं की अपनी एक अलग पहचान है। जैसे: उठो पाखी, संक्रांति
काल है, उठो सूरज, छुएँ सूरज, सच की अर्थी, लेटा हूँ, मैं लडूंगा, उड़ चल हंसा, लोकतंत्र का पंछी आदि
विशेष उल्लेखनीय हैं।
अधिकांश बिंब व प्रतीक नए व मनोहारी हैं। कवि ने अपनी भावनाओं को बहुत सुंदरता से प्रस्तुत किया है।इनकी कविताओं की मुख्य विशेषता है घोर अन्धकार में भी आशावादी होना। प्रस्तुत संग्रह हमें साहित्य के क्षेत्र में आशावादी बनाता है। यह पुस्तक अमूल्य देन है साहित्य को। कथ्य व शिल्प की दृष्टि से सभी रचनाएं श्रेष्ठ हैं। पुस्तक पठनीय ही नहीं संग्रहणीय भी है।
आचार्य संजीव 'सलिल' जी को बहुत-बहुत बधाई।

समीक्षा चमचावली

पुरोवाक:
हास्य साहित्य परंपरा और 'चमचावली' हास्य-व्यंग्य की दीपावली 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 
*
मार्क ट्वेन ने कहा है कि हँसना एक गुणकारी औषधि है मगर इस औषधि को देनेवाला डॉक्टर बहुत मुश्किल से मिलता है। आजकल हर मंच पर हास्य-व्यंग पढ़ने का फैशन होने के बाद भी हास्य-व्यंग्य की सरस काव्य रचनाओं का अभाव है। सामान्यत: चुटकुलेबाजी और फूहड़ टिप्पणियाँ ही हास्य-व्यंग्य के नाम पर सुनाई जाती हैं। यह विसंगति तब है जबकि हिंदी और हिंदी भाषी अंचल की लोक भाषाओँ-बोलिओं में शिष्ट हास्य कविता लेखन-पठन की उदात्त परंपरा रही है। हास्य-व्यंग्य का मूल स्रोत हमारी पुरातन संस्कृति, सभ्यता और जीवन दर्शन में देखा जा सकता है। भारतीय संस्कृति में मृत्यु, भय और दु:ख का विशेष महत्व नहीं है। ब्रह्म सत् चित् के साथ ही आनंद का स्वरूप है जिसके अंश सकल सृष्टि का कण-कण है। ब्रह्म आनंद के रूप में सभी प्राणियों में निवास करता है। उस आनंद की अनुभूति जीवन का परम लक्ष्य माना जाता है। इसी से ब्रह्मानंद शब्द की रचना हुयी है। वह रस, माधुर्य, लास्य का स्वरूप है। इसीलिये ब्रह्म जब माया के संपर्क से मूर्तरूप लेता है तो उसकी लीलाओं में आनंद को ही प्रमुखता दी गयी है। हमारे कृष्ण रास रचाते हैं, छल करते हैं, लीलायें दीखाते हैं। वे वृंदावन की कुंज गलियों में आनंद की रसधार बहा देते हैं। मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम भी होली में रंग, गुलाल उड़ाते हैं और सावन में झूला झूलते हैं। उनकी मर्यादा में भी भक्त आनंद का अनुभव करते हैं। यह आनंदानुभूति निराकार है, इसका चित्र नहीं बनाया जा सकता, इसका चित्र गुप्त है। 'गूँगे के गुण' की तरह आनंद भी प्रसन्नता को जन्म देता है, यह प्रसन्नता अधरों या नेत्रों से व्यक्त होती है। हास्य को आनंद की प्रतीति करानेवाला 'ब्रम्हानंद सहोदर' कहा जा सकता है।

सनातन भारतीय संस्कृति में मृत्यु और दु:ख को अधिक महत्त्व नहीं दिया गया। मृत्यु परिवर्तन की वाहक मात्र है। देह के साथ आत्मा नहीं मरती, वह एक चोला बदलकर दूसra पहन लेती है। कुछ पंथ शरीर का समय पूरा होने पर खुशी मनाते हैं। नाच-गाने, उमंग और उत्साह से पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार किया जाता है कि जीवात्मा अपने स्वामी ब्रह्म से मिलने जा रही है। मिलन की इस पावन बेला में दु:ख, दर्द और शोक क्यों? अंत समय का शोक मोह, अज्ञान और लोक-परंपरा का निर्वहन मात्र है। कुछ पन्थों में शव को दफनाते हैं ताकि वह कुछ जीवों का भोज्य बन जाए, कुछ अन्य पंथ शव को पक्षियों के भोग हेतु छोड़ देते हैं। सनातन धर्म रोगजनित मृत्यु के कारण शव में उपस्थित रोगाणु अन्यों के लिए घातक होने की सम्भावना के कारण शव-दाह करते हैं जबकि इसी से बनी भभूत से बोले बाबा का शृंगार किया जाता है जो 'सत-शिव-सुंदर' के पर्याय और परम आनंद के प्रतीक हैं। वे नृत्य, गायन, व्याकरण, भाषा आदि के केंद्र हैं जिनसे प्राणी के मन में आनंद का सागर हिलोरें लेने लगता है। हम अवतारों की जयंतियाँ उत्साह और श्रध्दा सहित मानते किन्तु निधन तिथियों को भूलकर भी याद नहीं करते। हम मूलत: आनंद को ईश्वर का पर्याय मानते हैं। इसलिए आनंददायी हास्य-व्यंग्य की परंपरा वेद-पूर्व से तत्कालीन भाषाओं के साहित्य में है। लौकिक और वैदिक संस्कृत, पाली, प्राकृत, अपभ्रंश आदि के साहित्य में हास्य-व्यंग्य की छटा देखते ही बनती है। उदाहरण: - "मम पुत्रस्य अन्नवस्त्रादि-व्ययं समग्रं सर्वकारः एव निर्वहति।" इति उक्तवती रुक्मिणी-देवी। = "कथं सम्भवति तत्?" कीदृशः उद्योगः तस्य ??" इति पृष्टवती मालादेवी। -"एकपैसात्मक-व्ययः अपि नास्ति तस्य। यतः आजीवनकारागारवासेन दण्डितः अस्ति सः।" (लौकिक संस्कृत) पुत्र के अन्न-वस्त्रादि की व्यवस्था हतु उसे आजीवन कारावास के उपाय में छिपे व्यंग्य को सहज ही अनुभव किया जा सकता है। 
अपभ्रंश साहित्य में संवत १२४१ विक्रम में सोमप्रभ सूरि रचित 'कुमार पाल प्रतिबोध' से एक दोहा देखिए: 'बेस बिसिट्ठइ बारियइ, जइबि मनोहर गत्त। / गंगाजल पक्वालियवि, सुणिहि कि होइ पवित्त।। अर्थात ''वेश-धारियों से बचें, चाहे मनहर गात। / गंग-स्नान से हो नहीं,पावन कुतिया जात।।'सारे जहां का दर्द हमारे जिगर में है' अथवा 'मुल्ला जी दुबले क्यों? - शहर के अंदेशे से' जैसी लोकोक्तियों का सार अपभ्रंश के दोहाकार सोमप्रभ सूरी के निम्न दोहे में हो सकता है जहाँ दोहाकार की चिंता यह है कि दशानन के दस मुँह थे तो उसकी माता उन सबको दूध कैसे पिलाती होगी? 'रावण जायउ जहि दिअहि, दहमुहु एकु सरीरु। / चिंताविय तइयहि जणणि, कवहुं पियावहुं खीरु।। अर्थात् एक बदन दस वदनमय, रावन जन्मा तात। / दूध पिलाऊँ किस तरह, सोचे चिंतित मात।।

संत कबीर हास्य-व्यंग्य परंपरा के श्रेष्ठ वाहक रहे। वे ब्रम्ह के साथ जो रिश्ता जोड़ते हैं उसकी कल्पना भी आसान नहीं है: 'हम बहनोई, राम मोर सारा। हमहिं बाप, हरिपुत्र हमारा।।' लोक भी हास्य-व्यंग्य का आनंद लेने में पीछे नहीं रहता- 'फागुन में बाबा देवर लागे' गाकर ससुअर को छेदती नव्वादु को देखकर कौन सोच सकेगा कि वह शेष समय लज्जा का निर्वहन सहजता और आनंद के साथ करती है। उत्सवधर्मी भारतीय मनीषा आराध्य के साथ भी हंसी-ठिठोली करने से बाज नहीं आती। भगवान जगन्नाथ के दर्शनकर एक भक्त कवि के मन में प्रश्न है कि भगवान काठ क्यों हो गये? 'कठुआ जाना' लोक बोली का एक मुहावरा है। भक्त अपनी कल्पना की उड़ान से संस्कृत में जो छंद रचता है उसका हिन्दी रूपान्तर कुछ इस तरह किया जा सकता है -'भगवान की एक पत्नी आदतन वाचाल हैं (सरस्वती) दूसरी पत्नी (लक्ष्मी) स्वभाव से चंचल हैं। वह एक जगह टिक कर रहना नहीं चाहतीं। उनका एक बेटा मन को मथनेवाला कामदेव है जो अपने पिता पर भी शासन करता है । उनका वाहन गरूड़ है। विश्राम करने के लिये उन्हें समुद्र में जगह मिली है। सोने के लिये शेषनाग की शैय्या है। भगवान विष्णु को अपने घर का यह हाल देख कर काठ मार गया है। एक अन्य भक्त कवि आशुतोष शंकर का दर्शन कर सोचता है कि इस भोले भण्डारी, जटाधारी, बाघम्बर वस्त्र पहनने वाले के पास खेती-बारी नहीं है। रोजी का कोई साधन नहीं है तो इनका गुजारा कैसे होते है। भक्त संस्कृत में छंद कहता है: 'उनके पास पाँच मुँह हैं। उनके एक बेटे (कार्तिकेय) के छह मुँह हैं। दूसरे बेटे गजानन का मुँह और पेट थी का है। यह दिगबंर कैसे गुजारा करता अगर अन्नपूर्णा पत्नी के रूप में उसके घर नहीं आतीं। तीसरा भक्त कवि कहता है कि भगवान शंकर बर्फीले कैलाश पर्वत पर रहते हैं। भगवान विष्णु का निवास समुद्र में है। इसकी वजह क्या है? निश्चित ही दोनों भगवान मच्छरों से डरते हैं इसलिये उन्होंने ने अपना ऐसा निवास स्थान चुना है। मृच्छकटिक नाटक के रचयिता राजा शूद्रक हैं ब्राह्मणों की खास पहचान 'यज्ञोपवीत 'की उपयोगिता के बारे में ऐसा व्यंग्य करते हैं जिसे सुनकर हँसी नहीं रुकती। वे कहते हैं: य'ज्ञोपवीत कसम खाने के काम आता है। अगर चोरी करना हो तो उसके सहारे दीवार लांघी जा सकती है।'
हास्य का जलवा यह कि संस्कृत वांग्मय में हास्य को सभी आचार्यों ने रस स्वीकार किया है। भरत मुनि कृत नाट्यशास्त्र के अनुसार- 'विपरीतालंकारैर्विकृताचाराभिधानवेसैश्च/विकृतैरर्थविशेषैहंसतीति रस:स्मृतो हास्य:।।'भावप्रकाश में लिखा है- 'प्रीतिर्विशेष: चित्तस्य विकासो हास उच्यते।'साहित्यदर्पणकार का कथन है- 'वर्णदि वैकृताच्चेतो विकारो हास्य इष्यते विकृताकार वाग्वेश चेष्टादे: कुहकाद् भवेत्।।दशरूपककार की उक्ति है- 'विकृताकृतिवाग्वेरात्मनस्यपरस्य वा / हास: स्यात् परिपोषोऽस्य हास्य स्त्रिप्रकृति: स्मृत:।। सार यह है कि हास एक प्रीतिपरक भाव है और चित्तविकास का एक रूप है। उसका उद्रेक विकृत आकार, विकृत वेष, विकृत आचार, विकृत अभिधान, विकृत अलंकार, विकृत अर्थविशेष, विकृत वाणी, विकृत चेष्टा आदि द्वारा होता है। इन विकृतियों से युक्त हास्यपात्रता कवि, अभिनेता, वक्ता द्वारा कथनी या करनी से किया जाना हास्य है। विकृति का तात्पर्य है प्रत्याशित से विपरीत अथवा विलक्षण कोई ऐसा वैचित्र्य, कोई ऐसा बेतुकापन, जो हमें प्रीतिकर जान पड़े, क्लेशकर न जान पड़े। इन लक्षणों में पाश्चात्य समीक्षकों के प्राय: सभी लक्षण समाविष्ट हो जाते हैं, जहाँ तक उनका संबंध हास्य विषयों से है। ऐसा हास जब विकसित होकर हमें कवि-कौशल द्वारा साधारणीकृत रूप में, अथवा आचार्य पं. रामचंद्र शुक्ल की शब्दावली के अनुसार, मुक्त दशा में प्राप्त होता है, वह हास्यरस कहलाता है। हास के भाव का उद्रेक देश-काल-पात्र-सापेक्ष रहता है। घर पर कोई खुली देह बैठा हो तो दर्शक को हँसी न आएगी परंतु उत्सव में भी वह इसी तरह पहुँच जाए तो उसका आचरण प्रत्याशित से विपरीत या विकृत माना जाने के कारण हँसी जगा देगा। इसी तरह युवा व्यक्ति श्रृंगार करे तो फबने की बात है किंतु जर्जर वृद्ध का श्रृंगारर हास का कारण होगा; कुर्सी से गिरनेवाले पहलवान पर हम हँसेंगे परंतु छत से गिरनेवाले बच्चे के प्रति हमारी सहानुभूति उमड़ेगी। हास का आधार प्रीति है न कि द्वेष। किसी की प्रकृति, प्रवृत्ति, स्वभाव, आचार आदि की विकृति पर कटाक्ष भी करना हो तो वह कटुक्ति के रूप में नहीं, प्रियोक्ति के रूप में हो। उसकी तह में जलन अथवा नीचा दिखाने की भावना न होकर विशुद्ध संशुद्धि की भावना होगी। संशुद्धि की भावनावाली यह प्रियोक्ति भी उपदेश की शब्दावली में नहीं किंतु रंजनता की शब्दावली में होगी।

वर्तमान काल में हरिमोहन झा ने अपनी हास्य व्यंग्य कृति 'खट्टर काका' में देवी-देवताओं और अवतारों के साथ खूब जमकर ठिठोली की है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, अकबर इलाहाबादी , बाबू बालमुकुंद गुप्त आदि ने अन्योक्तिपूर्ण व्यंग्य लेखन का नया मानक बनाया। उर्दू शायरों ने तो ब्रिटिश शासनकाल में अंग्रेजियत पर ऐसे तीखे प्रहार किये कि अंग्रेज उसे समझ भी नहीं पाते थे और हिन्दुस्तानी उसका जायका लेते थे। अकबर साहब फरमाते हैं - 'बाल में देखा मिसों के साथ उनको कूदते। /डार्विन साहब की थ्योरी का खुलासा हो गया।' जनाब अकबर इलाहाबादी ब्रिटिश अदालत में मुंसिफ थे लेकिन वे अपने व्यंग के तीरों से ऐसा गहरा घाव करते थे कि पढ़नेवाला एक बार उसे पढ़कर हजारों बार उस पर सोचने को मजबूर हो जाता था। लार्ड मैकाले की शिक्षा पध्दति का पोस्टमार्टम जिस बेबाकी से अकबर साहब ने किया उसकी गहराई तक आज के व्यंगकार सोच भी नहीं सकते हैं -'तोप खिसकी प्रोफेसर पहुंचे। बसूला हटा तो रंदा है।' प्लासी की लड़ाई में सिराज्जुदौला को शिकस्त देकर तमाम देसी रियासतों को जंग में मात देकर अंग्रेजों ने तोप पीछे हटा ली और अंग्रेजी पढ़ानेवाले प्रोफेसरों को आगे कर दिया। तोप के बसूले ने समाज को छील दिया और प्रोफेसर के रंदे ने उसे अंग्रेजों के मनमाफिक कर दिया। तोप और प्रोफसर का यह तालमेल ब्रिटिश शिक्षापध्दति पर बेजोड़ और बेरहम हमला है।
पं0 मदनमोहन मालवीय और सर सैयद अहमद खाँ जिन दिनों हिन्दू यूनिवर्सिटी और मुस्लिम यूनिवर्सिटी की स्थापना के लिये प्रयास कर रहे थे उन्हीं दिनों मालवीय जी के मित्र अकबर इलाहाबादी ने अंग्रेजपरस्त सैयद अहमद खाँ को लक्ष्य कर एक शेर कहा- 'शैख ने गो लाख दाढ़ी बढ़ाई सन की सी। मगर वह बात कहाँ मालवी मदन की सी। ' यहाँ 'सन' की शब्द पर गौर कीजिये। दोनों शब्दों को मिला देने पर जो अर्थ निकलता है वह शायर के हुनर की मिसाल है। हास्य के प्रमुख कारक: (अ) अप्रत्याशित शब्दाडंबर: शब्द की अप्रत्याशित व्युत्पत्ति के सहारे 'को घट ये वृषभानुजा, वे हलधर के बीर' -बिहारी, 'न साहेब ते सूधे बतलाएँ, गिरी थारी अइसी झन्नायें, कबौं छउकन जइसी खउख्यायें, पटाका अइसी दगि-दगि जाएँ'-रमई काका, 'मन गाड़ी गाड़ी रहै. प्रीति क्लियर बिनु लैन, जब लगि तिरछे होत नहिं, सिंगल दोऊ नैन' -सुकवि, (आ) विलक्षण तर्कोक्ति: 'पाँव में चक्की बाँध के हिरना कुदा होय', (इ) वाग्वैदग्ध्य (विट्): अर्थ के फेर-बदल के सहारे "भिक्षुक गो कितको गिरिजे? सुत माँगन को बलि द्वारे गयो री / सागर शैल सुतान के बीच यों आपस में परिहास भयो री, (ई) प्रत्युतर में नहले की जगह दहला लगाने की कला: 'गावत बाँदर बैठ्यो निकुंज में ताल समेत, तैं आँखिन पेखे / गाँव में जाए कै मैं हू बछानि को बैलहिं बेद पढ़ावत देखे- काव्य कानन; (उ) व्यंग्य (सैटायर): रामचरितमानस के शिव-बरात प्रसंग में विष्णु की उक्ति 'कि बर अनुहारि बरात न भाई, हँसी करइइहु पर पुर जाई', कृष्णायन में उद्धव की उक्ति 'की भवन जरैहैं मधुपुरी, श्याम बजैहैं बेनु?' भवानीप्रसाद मिश्र जी का गीतफरोश आदि, (ऊ)कटाक्ष (आइरानी):'करि फुलेल को आचमन, मीठो कहत सराहिं / रे गंधी मति-अंध तू, अतर दिखावत काहि' - बिहारी; 'मुफ्त का चंदन घस मेरे नंदन' - लोकोक्ति; 'मुनसी कसाई की कलम तलवार है' - भड़ोवा संग्रह, (ए) रचना विरूपीकरण (पैरोडी): 'नेता ऐसा चाहिए जैसा रूप सुभाय / चंदा सारा गहि रहै देय रसीद उड़ाय' - चोंच, 'बीती विभावरी जाग री / छप्पर पर बैठे काँव-काँव करते हैं कितने काग री'-बेढब), (ऐ) वक्त्तृत्व विरूपीकरण: अभिनेताओं, नेताओं या कवियों की कहन-शैली की नकल आदि हैं। प्रभाव की दृष्टि से हास्य को (क) परिहास: संतुष्टि प्रधान, व्यंग्य रहित, गुदगुदाता हुआ, तथा (ख) उपहास: संशुद्धि प्रधान, व्यंग्य सहित तिलमिलाता हुआ में वर्गीकृत किया जा सकता है।

भारत के ह्रद्प्रदेश नर्मदांचल के सिवनी जिले निवासी युवा शिक्षक और उत्साही रचनाकार रामकुमार चतुर्वेदी हास्य कविता-लेखन और पठन को गंभीरता से लेकर निरंतर आगे बढ़ रहे हैं। राम कुमार चतुर्वेदी जीवट और संघर्ष की मशाल और मिसाल दोनों हैं। ३४ वर्ष की युवावस्था में सड़क दुर्घटना में रीढ़ की हड्डी, कमर की हड्डी, पसली, कोलर बोन, हाथ-पैर आदि को गंभीर क्षति, दो वर्ष तक पीड़ादायक शल्य क्रिया और सतत के बाद भी वे न केवल उठ खड़े हुए अपितु पूर्वापेक्षा अधिक आत्मविश्वास से शैक्षणिक-साहित्यिक उपलब्धियाँ प्राप्त कीं। महाकवि शैली के अनुसार ‘अवर स्वीटैस्ट सोंग्स आर दोज विच टैल ऑफ़ सैडेस्ट थोट’, कवि शैलेंद्र के शब्दों में ‘हैं सबसे मधुर वे गीत जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं’ को राम कुमार ने चरितार्थ कर दिखाया है और दुनिया को हँसाने के लिए कलम थाम ली है। चमचावली के दोहे लक्षणा और व्यंजन के माध्यम से देश और समाज में व्याप्त विसंगतियों पर चोट करते हैं-
पढ़कर ये चमचावली, जाने चम्मच ज्ञान।
सफल काज चम्मच करे, कहते संत सुजान।

साधु-संतों की कथनी-करनी और भोग-विलास चमचों की दम पर फलते-फूलते हैं किंतु एक लोकोक्ति के अनुसार ‘बुरे काम का बुरा नतीजा’ मिल ही जाता है-
बाबा बेबी छेड़कर, पहुँच गये हैं जेल।
कैसे तीरंदाज को, मिल जाती है बेल।।

चम्मच अपने मालिक को सौ गुनाहों के बाद भी मुक्त कराकर ही दम लेता है। चमचे की स्वामिभक्ति के सामने श्वान भी हार मान लेता है। एक अभिनेता द्वारा कृष्ण-मृग का शिकार करने के बाद भी उसे दंडित न किये जाने की प्रतिक्रियास्वरूप कवि एक दोहा कहता है-
अपने मालिक के लिए, चम्मच करे उपाय।
हिरन मारकर भी उन्हें, मिल जाता है न्याय।।

संन्यास लिए संत ईश-भक्ति के अलावा शेष संसार को माया और निस्सार समझते हैं। तुलसीदास जी को अकबर द्वारा मनसबदारी दिए जाने पर उन्होंने 'पटा लिखो रघुबीर को, जे साहन के साह / तुलसी अब का होइंगे, नर के मनसबदार' कहते हुए प्रस्ताव अमान्य कर दिया था। किन्तु आगामी चुनाव को देखते हुए शासन द्वारा राज्य मंत्री का पद-प्रस्ताव होते ही तथाकथित संतों ने लपक लिया। इस प्रसंग पर रामकुमार कहते हैं: राजनीति चमचों की चारागाह है-
मंत्री का दर्जा मिला, चहके साधु-संत।
डूबे भोग विलास में, चम्मच बने महंत।।

चमचे सब का हिसाब-किताब माँगते हैं किंतु अपनी बारी आते ही गोलमाल करने से नहीं चूकते-
अपनी पूँजी का कभी, देते नहीं हिसाब।
दूजे के हर टके का, माँगें चीख जवाब।।

राम कुमार की भाषा सरल, सहज, प्रसंगानुकूल चुटीली और विनोदपूर्ण है। हास्य-व्यंग्य की चासनी में घोलकर कुनैन खिला देना उनके लिए सहज-साध्य है। वे सामयिक प्रसंगों को लेकर सरस व्यंग्य प्रहार करते हैं साथ ही हास्य की फुहार से भिगाते चलते हैं। प्रसाद गुण संपन्न भाषा, यथावसर सम्यक शब्द-प्रयोग, मुहावरेदार भाषा तथा सहजग्राह्यता उनका वैशिष्ट्य है। 'चमचावली' सामाजिक परिप्रेक्ष्य में दिनानुदिन घटित हो रही घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में कवि के स्वस्थ्य छंटन तथा देश-समाज हित की लोकोपकारी भावना से उत्पन्न हास्य-व्यब्ग्य काव्य है। इस सार्थक, सर्वोपयोगी, पथ-प्रदर्शक कृति का न केवल साहित्यिक जगत अपितु जन सामान्य में भी स्वागत होगा यम मुझे विश्वास है। रामकुमार ने एक मनुष्य, भारत के एक नगरीं और हिंदी के हास्य कवि के रूप में इस कृति की रचना कर अपनी शवासन को सार्थक किया है। उनका उर्वर चिंतन भविष्य में भी ऐसी कृतियों का परायण कराए यही कामना है। 
***
सम्पर्क- विश्व वाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष: ७९९९५५९६१८, salil.sanjiv@gmail.com

navgeet

नवगीत:
संजीव 
*
गैर कहोगे जिनको 
वे ही 
मित्र-सगे होंगे
*
ना माँगेंगे पानी-राशन
ना चाहेंगे प्यार
नहीं लगायेंगे वे तुमको
अनचाहे फटकार
शिकवे-गिले-शिकायत
तुमसे?, होगी कभी नहीं
न ही जतायेंगे वे तुम पर
कभी तनिक अधिकार
काम पड़े पर नहीं
आचरण
प्रेम-पगे होंगे
गैर कहोगे जिनको
वे ही
मित्र-सगे होंगे
*
अगर न चाहो तो वे किंचित
निकट नहीं आते
काम पड़े तो अ
अपनापन दे
तनिक न भरमाते
लेन-देन साँसों के
आने-जाने सा व्यापार
कहो कभी क्या किंचित भी वे
तुमको तरसाते?
नाम न उनके, मन-
खूँटी पर
कभी टँगे होंगे
गैर कहोगे जिनको
वे ही
मित्र-सगे होंगे
*
सगा कह रहे जिनको वे ही
रहे निभाते बैर
सम्राटों की शहजादों से
कहो रही कब खैर?
जन्मा, गोद खिलाया-पाला
जिसको देता फूँक
बाप गधे को कहता, कहिए
जीते जी क्या गैर?
वे न जगेंगे,
जिनकी खातिर
आप जगे होंगे
गैर कहोगे जिनको
वे ही
मित्र-सगे होंगे
*

२४-७-२०१५ 

दोहा सलिला

दोहा सलिलाः
संजीव
*
प्राची पर आभा दिखी, हुआ तिमिर का अन्त
अन्तर्मन जागृत करें, सन्त बन सकें सन्त
*
आशा पर आकाश टंगा है, कहते हैं सब लोग
आशा जीवन श्वास है, ईश्वर हो न वियोग
*
जो न उषा को चाह्ता, उसके फूटे भाग
कौन सुबह आकर कहे, उससे जल्दी जाग
*
लाल-गुलाबी जब दिखें, मनुआ प्राची-गाल
सेज छोड़कर नमन कर, फेर कर्म की माल
*
गाल टमाटर की तरह, अब न बोलना आप
प्रेयसि के नखरे बढ़ें, प्रेमी पाये शाप.
*
प्याज कुमारी से करे, युवा टमाटर प्यार
किसके ज्यादा भाव हैं?, हुई मुई तकरार
*

२६-७-२०१४ 

दोहा सलिला

दोहा सलिला
आभा जब आ भा कहे, तितली रंग बिखेर
कहे कली से खिल सखी, अब न अधिक कर देर
*
कमलमुखी ने हुलसकर, जब देखा निज रूप
लहरें संजीवित हुई,  सलिल हो गया भूप 
*
अंजुरी में ले सलिल को, लिया अधर ने चूम
हम भी कह मचले नयन, लगे मचाने धूम
*
चरण चम्पई सलिल छू, सिहरे ठिठके तीर
रतनारे नयना उठे, मिले चुभ गया तीर
*
सलिल संग संजीव हो, पुलकित हुई तरंग
उछल-कूद अल्हड करें मानों पी ली भंग
*
संजीव
२६-७-२०१९
७९९९५५९६१८     

समीक्षा : है छिपा सूरज कहाँ पर

समीक्षा :
''है छिपा सूरज कहाँ पर'' : खोजिए नवगीत में
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल"
*
[कृति विवरण : है छिपा सूरज कहाँ पर, नवगीत संग्रह, गरिमा सक्सेना, प्रथम संस्करण २०१९, आई.एस.बी.एन. ९७८९३८८९४६१७९, आकार २२ से.मी. x १४.से.मी., आवरण बहुरंगी सजिल्द लेमिनेटेड जैकेट सहित, पृष्ठ १३६, मूल्य २००/-, बेस्ट बुक बडीज टेक्नोलॉजीस प्रा। लि. नई दिल्ली, कृतिकार संपर्क : २१२ ए ब्लॉक, सेंचुरी सरस् अपार्टमनत, अनंतपुरा मार्ग, यलहंका, बेंगलोर ५६००६४, चलभाष ७६९४९२८४४८, ईमेल : garimasaxena1990@gmail.com ]
*
साहित्य समाज का समय सापेक्ष दर्पण है जिसमें उज्जवल-मलिन छवि बिना किसी लाग-लपेट के देखी जा सकती है। साहित्य स्वयं पूरी तरह निरपेक्ष होता है किन्तु साहित्यकार प्राय: तटस्थ नहीं होता। हर रचनाकार की अपनी मान्यताएँ और प्रतिबद्धताएँ होती हैं। साहित्य भाषा, अनुभूति और भाव की त्रिवेणी है जिओ सतत प्रवाहित हो तो निर्मल और किसी प्रतिबद्धता के कुएँ में कैद होकर मलिन हो जाती है। साहित्य लेखन, पठान और समीक्षण तीनों स्तरों पर गतागत का संघर्ष स्वाभाविक है। साहित्यकार जिन्हें पढ़कर लिखने सीखता है, सीखते ही उनसे भिन्न पथ पर जाता है किन्तु किसी वैचारिक खूँटे से बँधे स्वयंभूजन उसे नकारने या अपने खेमे में खींचने-घसीटने का प्रयास करते हैं। समय, भाषा और साहित्य सतत परिवर्तनशील होता है किन्तु ये तथाकथित प्रतिबद्ध मठाधीश परिवर्तन को नकारकर अपनी मान्यताओं को थोपकर खुद को धन्य अनुभव करते हैं। समाज के युवा जनों को आकर्षित करती विधाएँ नवगीत, व्यंग्य लेख हुए लघुकथा के क्षेत्र में यह द्व्न्द सहज दृष्टव्य है। 

नवोदित नवगीतकार रचना सक्सेना इस सबसे परिचित होकर भी किसी खेमे में कैद न होकर बेबाकी से अपनी अनुभूतियों को नवगीत में अभिव्यक्त कर सकी हैं, इसके लिए उन्हें सराहा जाना चाहिए। डॉ. कुंअर बेचैन ने ठीक ही लिखा है "जैसे बागों में हर वर्ष पतझर का मौसम भी आता है और वसंत का भी, पतझर में पुराने पत्ते झर जाते हैं और फिर नई कोंपलें आती हैं। ऐसे ही हमारे जीवन में उम्र और परिस्थिति के अलग-अलग पड़ावों पर हमारे भाव, हमारे विचार, हमारी जीवन शैली, हमारे भाषा-व्यवहार और अगर हम साहित्य से जुड़े रचनाकार हैं तो कुछ नया करने का भाव भी बदलता जाता है। गीतकार का मन भी एक वृक्ष की तरह होता है, उस पर भी भावनाओं-अनुभूतियों और उनकी शब्दाभिव्यक्तियों के नए-नए रूप जैसे प्रतीकों की नवीनता, बिम्बों की नवीनता और गीतों के आकार का स्वरूप आदि बदलते जाते हैं। यह नव्यता ही गीत को नवगीत की ओर ले जाती है।" नवगीत के उद्भव से अब तक नवगीतकारों के कथ्य और शिल्प में यह बदलाव सहज दृष्टव्य है। गरिमा के नवगीत इस बदलाव के साक्षी हैं। 

गरिमा के व्यक्तित्व में भाव पक्ष और बुद्धि पक्ष के सहल-सार्थक तालमेल की उपज हैं ये नवगीत। गरिमा के शब्दों में "गीत वही है जो किसी एक ह्रदय से उपजकर हर ह्रदय का स्वर स्वत्: ही बन जाये। अधिक निजी पैन लिए गीत या अत्यधिक क्लिष्ट गीत आमजन के मन तक नहीं पहुँच पाते क्योंकि उनका संबंध लोक से स्थापित नहीं हो पता है, न ही वे आम जन के लिए उपयोगी हो पते हैं। गीत का विस्तार तभी हो पायेगा जब गीत समाज में वर्तमान की व्याप्तियों को अभिव्यक्त कर  पाएंगे और सबकी पीड़ा का आभास कर सकेंगे और गीत का प्रयोजन तब पूर्ण होगा जब न केवल घाव को इंगित करें बल्कि उन घावों पर समाधान का मरहम भी लगाने का प्रयत्न करें। ऐसे में गीत को सामाजिक यथार्थ को समझना होगा, वह भी गीत के शिल्प, लय, गेयता, भाव आदि विशिष्टताओं को बचाते हुए।"

'है छिपा सूरज कहाँ पर' के गीत तिमिर से भयाक्रांत नहीं हैं। वे तमस की भयावहता का चित्रण कर रुकते भी नहीं, वे अँधेरे में भटकते भी नहीं अपितु उजास देने या राह तलाशने की कोशिश करते हैं। समाज में व्याप्त असंगति का संकेत संकलन के आरम्भ में ही है- 

है बदलता आस में पन्ने कलेंडर   
पर छाला जाता है बस प्रस्ताव से 
ताख पर सिद्धांत 
धन की चाह भारी 
हो गया है आज 
आँगन भी जुआरी
रोज ही गंदला रहा है आँख का जल 
स्वार्थ ईर्ष्या के हुए ठहराव से 

प्रतिबद्ध रचनाकारों के नवगीत इस ठहराव के आगे नहीं बढ़ पाते क्योंकि उनकी यह मान्यता है की नवगीत वैषम्य धर्मा है, दिशा दर्शन या पीर-हरण से नवगीत को कुछ लेना-देना नहीं है। मेरी कृतियों 'काल है संक्रांति का' और 'सड़क पर' को इसी पूर्वाग्रही दृष्टिका शिकार होना पड़ा। मैं देख पाता हूँ कि मुखपोथी (फेसबुक) पर उदित हो रही नई कलमें ही नहीं नवगीतकारों की प्रतिष्ठित हो रही नई पीढ़ी जिसमें संध्या सिंह, अशोक गीते, मधु प्रधान, मधु प्रसाद, पूर्णिमा बर्मन, जयप्रकाश श्रीवास्तव, बृजमोहन श्रीवास्तव, डॉ. गोपाल कृष्ण भट्ट 'आकुल', रामशंकर वर्मा, डॉ. प्रदीप शुक्ल, शीला पाण्डे, डॉ. रंजना गुप्ता, बसंत शर्मा, अविनाश ब्योहार, रविशंकर मिश्र, धीरज श्रीवास्तव, कृष्ण 'शलभ', छाया सक्सेना आदि भी अपने नवगीतों में सांत्वना, सहानुभूति और  सामाजिक सरोकारों को सुदृढ़ करने के स्वर घोल रहे हैं। विडम्बना है कि इनमें से अधिकांश को नवगीत कोष में स्थान नहीं मिला है। कारण उनसे अपिरचय हो या उनकी अवहेलना नवगीत के लिए दोनों ही दृष्टियों से परिवर्तन की पदचाप को अनसुना किया जाना हितकर नहीं है। गरिमा के नवगीत 'समाधान के गीत' लिखकर इस पीढ़ी का प्रतिनिधि स्वर बन पाती है- 

हरे-भरे जीवन के पत्ते 
हुए जा रहे पीत 
आओ हम सब मिलकर गायें 
समाधान के गीत 
अँधियारे पर कलम चलकर 
सूरज नया उगायें  
उम्मीदों के पंखों को 
विस्तृत आकाश थमायें 
चलो हाय-तौबा की, डर की 
आज गिरायें भीत 

इन गीतों में सामाजिक वैषम्य को विविध बिम्बों, रूपकों और उपमाओं के माध्यम से व्यक्त किया गया है- 'गाँवों के भी मन-मन अब / उग आये हैं शूल / देख चकित हो रहा बबूल', 'बने बिजूके हम सब / वर्षों से चुपचाप ख़डे', 'रेत हो रही नदियाँ / खोया कल-कल का उल्लास', 'क्षरित हुए संबंध नेह के / जीवन के बदलावों से, 'इस सूखे में बीज न पनपे / फिर जीवन से ठना युद्ध है', सुर्ख लावा हो गए हैं / पाँव तपती रेत में', 'वृद्धाश्रम में माँ बेटे की / राह देखती', 'हम अधीन हो गए / सफल हो गया नियोजन', 'धन अर्जित कर सहे जा रहे / निज मूल्यों की मंदी हम', 'राजमार्ग पर सपने सजते / पगडंडी का घाव हरा है', 'ओझल मुद्दों को करना है / हंगामा इसलिए जरूरी', 'राजनीति ने छला हमेशा / नदियों का विश्वास', 'क्षरित हुई ओज़ोन / बनी भू गरम कड़ाही है', 'नख से शिख तक है भ्रष्ट तंत्र / रो-रोकर कहते बाबूजी', सदा सियासत करते रहती / समझौंतों की ता-ता-थैया, आदि आदि पंक्तियों में देश-काल को विविध दृष्टियों से निरख-परख कर यत्र-तत्र ही नहीं सर्वत्र व्याप गयी विसंगतियों का लेखा-जोखा इन नवगीतों के सर्जक की सजगता शब्द-शब्द में निहित है। 

गीतों में अंतर्व्याप्त दूसरा तत्व है इन विसंगतियों के प्रति चेतना जागना। प्रथम चरण में विसंगतियों का आकलन तो हो गया यदि उस आकलन पर चिंतन न हो तो आकलन करना उद्देश्यहीन हो जायेगा। '  ढल रहा जो वक़्त / उसकी चाल का स्वर / कह रहा है आगमन का / वक़्त बदतर',  'कब खुलेंगी, धूप देने खिड़कियाँ /  मौत का माहौल हैँ', 'हम बिन आखिर प्रतिरोधों के / अक्षर कौन गढ़े', कब तलक हम बरगदों की / छाँव में पलते रहेंगे', 'कोहरे की बढ़ गयी हैं टहनियाँ / मौत का माहौल है', 'पोखर-नाले भी करते हैं / अब उसका उपहास', 'जीवन के सच बतलाते हैं दाग पड़े गहरे / मगर बने प्रोफ़ाइल पिक्चर / दाग मुक्त चेहरे', 'क्षरित हुए संबंध नेह के / जीवन के बदलावों से', 'धन की कमी कहीं अच्छी थी / मन को मिले अभावों से', 'घायल कंधे, मन है व्याकुल / स्वप्न पराजित, समय क्रुद्ध है', 'मैं ही क्यूँ? मेरे हिस्से क्यूँ? / सोचूँ लिखा मुश्किल ढोना', 'नैन मूंदकर बोलबो कब तक / पूजोगे तुम पाहुन को', 'सोच रहे है सुता -भाग्य में / क्यों लिक्खी है सिर्फ रसोई' आदि अभिव्यक्तियाँ केवल विसंगति का शब्दांकन नहीं करतीं उनके प्रति असंतोष को मुखर कर परिवर्तन की चेतना जगाती हैं। 

गरिमा सक्सेना के नवगीत जिस तीसरे तत्व को मुखर करते हैं वह है विसगंतियों के आकलन से उपजी चेतना को बदलाव में बदलने का आव्हान या विसंगतियों की प्रतिक्रियावत उपजे प्रश्न।  इस अंतर्वस्तु को उद्घाटित करती कुछ पंक्तियाँ देखें -  'हरे-भरे जीवन के पत्ते / हुए जा रहे पीत / आओ हम सब मिलकर गायें / समाधान के गीत', 'कब खुलेंगी, धूप देने खिड़कियाँ?', 'हम बिन आखिर प्रतिरोधों के / अक्षर कौन गढ़े', 'कैसे मानें सत्य, ट्रेंड में जब / जुमला है', 'आओ मिलकर आज लगायें / खुशियों की दो-चार फसल', 'कौन लड़ा है किसकी खातिर / खुद ही लड़ना है', चूक गया सूरज गगन का / अब उजाला कौन देगा?' आदि पंक्तियों से पाठक की मन:स्थिति परिवर्तन हेतु  तत्पर होने की बनती है। 

ये नवगीत आव्हान मात्र को भी पर्याप्त नहीं मानते। वे उपचार और समाधान भी सुझाते हैं- 'जी रहा जो वृहनला का / रूप धरकर / यदि जगे उस पार्थ के / गांडीव का स्वर / तो सुरक्षित हो सकेगा देश अपना / स्वयं पर ही हो रहे पथराव से', 'अँधियारे पर कलम चलकर / सूरज नया उगायें  / उम्मीदों के पंखों को / विस्तृत आकाश थमायें / चलो हाय-तौबा की, डर की / आज गिरायें भीत', 'आग खोजें, कँपकँपाती हड्डियाँ', 'ढूँढ़ते हैं / है छिपा सूरज कहाँ पर .... चेतते हैं जड़ों की जकड़न छुड़ाकर ...  चीखते हैं / आइए संयम भुलाकर। ... तोड़ते हैं स्वयं पर हावी हुआ डर ...', 'कुहरे का गुब्बारा / छेड़ गयी पिन / चीर निकल आई हैं / किरणें कमसिन ... साहस ने काट लिए पतझड़ के दिन', 'कूकने है लगी कोयल / देख ऋतु मधुमास की', 'हमें हमारी चिंता खुद ही / करनी होगी / कब तक मन का क्रोध रहेगा / सुविधा भोगी', नए वर्ष में जारी रक्खें / उम्मीदों की चहल-पहल', कब तक हम दीपक बालेंगे / हमको सूर्य उगाना होगा' आदि पंक्तियों में गरिमा परिवर्तन की अभिलाष को संकल्प तक ले जाती हैं। 

नवगीतकारों की नयी पीढ़ी नवगीतों को 'अरण्य रोदन' मात्र न  बनाकर उन्हें मांगलिक परिवर्तन और शुभत्व से जोड़ रहे है। यह स्वर १९८० से २०१० के मध्य जवाहर लाल चौरसिया 'तरुण' के नवगीतों में था किन्तु तब नवगीतों को वैषम्य चित्रण तक सीमित रखने की जिद ने उन्हें नवगीत की परिधि में स्वीकार नहीं किया। अब नवगीतकारों की नई पीढ़ी नवगीत का सीमा विस्तार कर उसे विसंगति, विसंगति की प्रतीति, प्रतीति से उपजा आक्रोश और आक्रोश से परिवर्तन के संकल्प तक ले जा रही है। गरिमा सक्सेना के शब्दों में -

हवा आज आई है 
लाल किले से होकर 
बोल रही है नव विकास का 
द्वार खुला है    

यही नहीं गरिमा एक कदम और आगे बढ़कर परिवर्तन असफल न रह जाए, इसके प्रति भी चेताती हैं। संपूर्ण क्रांति और अन्ना आंदोलन की परिणति को देखते हुए गरिमा का यह चिंतन यथार्थवादी ही कहा जायेगा। 

देखना फिर उग न आएँ 
नागफनियाँ खेत में 

इस कृति में वैचारिक दृष्टि से एक और नवाचार है। अन्न का मोल रुपये से नहीं चुकाया जा सकता। वास्तव में रूपया ममता, शिक्षा, स्नेह, श्रम, त्याग, समर्पण किसी का मोल नहीं चुका सकता। 

नहीं अन्न का मोल रुपैया 
अन्न बड़ी मेहनत से उगता 
इसे उगाने की खातिर ही 
कोई धूप, शीत सब सहता 

कथ्य में नवता के साथ इस संकलन के नवगीत भाषिक दृष्टी से सटीक शब्दों का चयन कर रचे गए हैं। गरिमा की पारिवारिक पृष्ठभूमि और शिक्षा उन्हें प्रचुरशब्द संपदा और सांस्कारिक भाषा संपन्न बनाती है , यह समृद्धि नवगीतों में झलकती है। 

'है छिपा सूरज कहाँ पर' के गीत छंद वैविध्य की दृष्टि से प्रयोगधर्मिता कम है। पारंपरिक छंदों का प्रयोग प्रचुरता से किया गया है। सामान्यत: चार पंक्तियों के तीन अंतरों का प्रयोग कर गीत रचे गए हैं। मुखड़े में २ से ५ पंक्तियों का प्रयोग है।  मात्रिक छंदों पर आधृत इन गीतों में लयबढ़ता और गेयता चारुत्व वृद्धि करती है। छंद वैविध्य ने इन नवगीतों की सरसता वृद्धि की है। कुछ उदाहरण देखें- 

सरसी छंद 
हरे-भरे जीवन के पत्ते, 
हुए जा रहे पीत
आओ हम सब मिलकर गायें 
समाधान के गीत 

पादाकुलक छंद 
अम्मा आँखों के स्याही से 
नया नहीं कुछ लिख पाती हैं

विष्णुपद छंद 
जहाँ कभी थीं हरसिंगार की 
टेसू की बातें 
चम्पा, बेली के संग कटतीं 
थीं प्यारी रातें 

अवतारी जातीय छंद 
सदियों तक जो 
शक्ति रही है जन जीवन की 
तट को सींचा, प्यास बुझाई 
जिसने तन की 

चौपाई छंद 
सुता किसी की ब्याह योग्य है 
कहीं बीज का कर्जा भरी 
जुआ किसानी हुआ गाँव में 
मदद नहीं कोई सरकारी 

सर्व विदित है कि चन्द्रमा में भी दाग होते हैं। ''है छिपा सूरज कहीं पर'' में क्रिया रूपों में समरूपता नहीं है। यथा  - गायें पृष्ठ ३३, वर्जनाएँ पृष्ठ  ४६, आई पृष्ठ ४७ , आयी पृष्ठ  ७५, भायी  पृष्ठ ४९, हुए पृष्ठ ५५ , गए पृष्ठ ५९, नई पृष्ठ ५१, तुरपाई पृष्ठ  ६८, बुझायी पृष्ठ ७० आदि।  अशुद्ध शब्द प्रयोग दुक्ख पृष्ठ ८२, रक्खें ८५। लिंग दोष - ऊपर से शिक्षा ऋण का / युवकों को गड़ती  पिन। 

दोहा संग्रह 'दिखते नहीं निशान' के पश्चात् यह गरिमा सक्सेना की दूसरी प्रकाशित कृति है। 'है छिपा सूरज कहीं पर' के नवगीत उनकी कारयित्री प्रतिभा को प्रमाणित करते हैं। यह कृति नवगीत में नवाचार की दृष्टी से महत्वपूर्ण है और नवगीत के नव आयामों में ले जाने में सक्षम है। गरिमा के अगले नवगीत संग्रह की प्रतीक्षा की जाएगी। 
================
[संपर्क : आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', सभापति विश्ववाणी हिंदी संसथान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, जबलपुर ४८२००१, चलभाष ७९९९५५९६१८, salil.sanjiv@gmail.com ]

गुरुवार, 25 जुलाई 2019

समीक्षा काल चक्र को चलने दो -सुनीता सिंह

पुस्तक चर्चा :
''कालचक्र को चलने दो'' भाव प्रधान कवितायें
''
[पुस्तक विवरण: काल चक्र को चलने दो, कविता संग्रह, सुनीता सिंह, प्रथम संस्करण २०१८, पृष्ठ १२५, आकार २० से.मी. x १४.५ से. मी., आवरण बहुरंगी पेपर बाइक लेमिनेटेड, २००/- प्रतिष्ठा पब्लिशिंग हाउस, लखनऊ]
*
साहित्य समय सापेक्षी होता है। कविता 'स्व' की अनुभूतियों को 'सर्व' तक पहुँचाती है। समय सनातन है। भारतीय मनीषा को 'काल' को 'महाकाल' का उपकरण मानती है इसलिए भयाक्रांत नहीं होती, 'काल' का स्वागत करती है। 'काल को चलने दो' जीवन में व्याप्त श्वेत-श्याम की कशमकश को शब्दांकन है।कवयित्री सुनीता सिंह के शब्दों में "अकस्मात मन को झकझोर देनेवाली परिस्थितियों से मन को अत्यंत नकारात्मक रूप से प्रभावित होने से बचने के लिए उन परिस्थितियों को स्वीकार करना आवश्यक होता है जो अपने बस में नहीं होतीं। जीवन कभी आसान रास्ता नहीं देता। हतोत्साहित करनेवाले कारकों और नकारात्मकता के जाल से जीवन को अँधेरे से उजाले की ओर शांत मन से ले जाने की यात्रा का दर्शन काव्य रूप से प्रस्तुत करती है यह पुस्तक।'

५४ कविताओं का यह संकलन अजाने ही पूर्णता को लक्षित करता है। ५४ = ५+४=९, नौ पूर्णता का अंक है। नौ शक्ति (नौ दुर्गा) का प्रतीक है। नौ को कितनी ही बार जोड़े या गुणा करें ९ ही मिलता है।संकलन में राष्ट्रीयता के रंग में रंगी ५ रचनाएँ हैं। ५ पंचतत्व का प्रतीक है। 'अनिल, अनल, भू, नभ सलिल' यही देश भी है। भारत भूमि, भारत वर्ष, स्वदेश नमन, प्रहरी, भारत अखंड शीर्षक इन रचनाओं में भारत का महिमा गान होना स्वाभाविक है।
इसकी गौरव गाथा को हिमगिरि झूम कर गाता है
जिस पर गर्वित होकर के सागर भी लहराता है
तिलक देश के माथे का हिम चंदन है
शत बार तुझे ऐ देश मेरे अभिनन्दन है
कवयित्री देश भक्त है किन्तु अंधभक्त नहीं है। देश महिमा गुँजाते हुए भी देश में व्याप्त अंतर्विरोध उसे दुखी करते हैं -
एक देश में दो भारत / क्यों अब तक है बसा हुआ?
एक माथ पर उन्नत भाल / दूजा क्यों है धँसा हुआ?
'माथ' और 'भाल' पर्यायवाची हैं। एक पर दूसरा कैसे? 'माथ' के स्थान पर 'कांध' होता तो अर्थवत्ता में वृद्धि होती।
इस भावभूमि से जुडी रचनाएँ रणभेरी, बढ़ते चलो, वीरों की पहचान आदि भी हैं जिनमें परिस्थितियों से जूझकर उन्हें बदलने का आव्हान है।
कवि को प्राय: काव्य-प्रेरणा प्रकृति से मिलती है। इस संग्रह में प्रकृति से जुडी रचनाओं में प्रकृति दोहन, आंधी, हरीतिमा, जल ही जीवन, मकरंद, फाग, बसंत, चूनर आदि प्रमुख हैं।
प्रकृति का अनुपम उपहार / यह अभिलाषा का संसार
इच्छाओं की अनंत श्रृंखला / दिव्य लोक तक जाती है
स्वच्छंद कल्पना के उपवन में / सतरंगी पुष्प खिलाती है
स्वप्नों में स्वर्णिम पथ पर / आरूढ़ होकर आती है
कितना मोहक, कितना सुंदर / है यह विशाल अंबर निस्सार
एक बाल कथा सुनी थी जिसमें गुरु जी शिष्यों को सिखाने के बाद अंतिम परीक्षा यह लेते हैं कि वह खोज के लाओ जो किसी काम का नहीं। प्रथम वह विद्यार्थी आया जो कुछ नहीं ला सका। गुरु जी ने कहा हर वास्तु का उपयोग कर सकनेवाला ही श्रेष्ठ है। ईश्वर ने निरुपयोगी कुछ नहीं बनाया। कवयित्री ने वाकई अंबर को निस्सार पाया या तुक मिलाने के लिए शब्द का प्रयोग किया? अंबर पाँच तत्वों में से एक है, वह निस्सार कैसे हो सकता है?
दर्शन को लेकर कवयित्री ने कई रचनाएँ की हैं। गुरु गोरखनाथ की साधनास्थली में पली-बढ़ी कलम दर्शन से दूर कैसे रह सकती है?
मन की आँखों से है दिखता / खोल हृदय के द्वार
निहित कर्म पर गढ्ता / सद्गति या दुर्गति आकार
''कर्म प्रधान बिस्व करि राखा'' का निष्कर्ष तुलसी ने भी निकाला था, वही सुनीता जी का भी प्राप्य है।
संग्रह की रचनाओं में 'एकला चलो रे' हे प्रिये, हे मन सखा आदि पठनीय हैं। कवयित्री में प्रतिभा है, उसे निरंतर तराशा जाए तो उनमें छंद, शुद्ध छंद रचने की सामर्थ्य है किन्तु समयाभाव उन्हें रचना को बार-बार छंद-विधान के निकष पर कसने का अवकाश नहीं देता। पुरोवाक में नीलम चंद्रा के अनुसार 'इनके हर अलफ़ाज़ चुनिंदा होते हैं' के संदर्भ में निवेदन है कि 'हर' एक वचन है, अल्फ़ाज़ बहुवचन, 'हर लफ्ज़' सही होता।
''कालचक्र चलने दो'' कवयित्री के संवेदनशील मन की भाव यात्रा है। रचनाओं में पाठक को अपने साथ रख पाने की सामर्थ्य है। कथ्य मौलिक है। शब्द चयन सटीक है। सारत: यह कृति मानव जीवन की तरह गन-दोष युक्त है और यही इसे ग्रहणीय बनाता है। सुनीता का भविष्य एक कवयित्री के नाते उज्जवल है। वे 'अधिक' और 'श्रेष्ठ' का अंतर समझ कर 'श्रेष्ठ' की दिशा में निरंतर अग्रसर हैं।
*****
[संपर्क: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', सभापति विश्ववाणी हिन्दी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष ७९९९५५९६१८, salil.sanjiv@gmail.com ]

नकल

क्या यह मौलिक सृजन है???
मुख पुस्तक पर एक द्विपदी पढ़ी. इसे सराहना भी मिल रही है. 
मैं सराहना तो दूर इसे देख कर क्षुब्ध हो रहा हूँ. 
आप की क्या राय है?
*
Arvind Kumar
उनके दर्शन से जो बढ़ जाती है मुख की शोभा
वोह समझते हैँ कि रोगी की दशा उत्तम है
*
उनके देखे से जो आ जाती है मुँह पे रौनक
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है - मिर्ज़ा ग़ालिब
***
#दिव्यनर्मदा
#हिंदी_ब्लॉगर

दोहा

दोहा:
तिमिर न हो तो रुचेगा, किसको कहो प्रकाश.
पाता तभी महत्त्व जब, तोड़े तम के पाश..
***
२०-७-२०११ 
salil.sanjiv@gmail.com
#दिव्यनर्मदा
#हिंदी_ब्लॉगर

लघुकथा

लघुकथा 
धर्म संकट 
*
वे महाविद्यालय में प्रवेश कराकर बेटे को अपनी सखी विभागाध्यक्ष से मिलवाने ले गयीं। जब भी सहायता चाहिए हो, निस्संकोच आ जाना सखी ने कहा तो उन्होंने खुद को आश्वस्त पाया। 
वह कठिनाई हल करने, पुस्तकालय से अतिरिक्त पुस्तक लेने, परीक्षा के पूर्व महत्वपूर्ण प्रश्न पूछने विभागाध्यक्ष के पास जाता रहा। पहले तो उन्होंने कोई विशेष रुचि नहीं ली किन्तु क्रमश:उसकी प्रशंसा करते हुए सहायता करने लगीं। उसे कहा कि महाविद्यालय में 'आंटी' नहीं 'मैडम' कहना उपयुक्त है। 
प्रयोगशाला में वे अधिक समय तक रूककर प्रयोग करातीं, अपने शोधपत्रों के साथ उसका नाम जोड़कर छपवाया। वह आभारी होता रहा।
उसे पता ही नहीं चला कब गलियारों में उनके सम्बन्धों को अंतरंग कहती कानाफूसियाँ फ़ैलने लगीं।
एक शाम जब वह प्रयोग कर रहा था, वे आकर हाथ बँटाने लगीं। हाथ स्पर्श होने पर उसने संकोच और भय से खुद में सिमट, खेद व्यक्त किया पर उन्होंने पूर्ववतकार्य जारी रखा मानो कुछ हुआ ही न हो। अचानक वे लड़खड़ाती लगीं तो उसने लपक कर सम्हाला, अपने कंधे पर से उनका सर और उनकी कमर में से अपने हाथ हटाने के पूर्व ही उसकी श्वासों में घुलने लगी परफ्यूम और देह की गंध। पलक झपकते दूरियाँ दूर हो गयीं।
कुछ दिन वे एक दूसरे से बचते रहे किन्तु धीरे-धीरे वातावरण सहज होने लगा। आज कक्षा के सब विद्यार्थी विभागाध्यक्ष को शुभकामनायें देकर चरण-स्पर्श कर रहे हैं। वह क्या करे? धर्मसंकट में पड़ा है चरण छुए तो कैसे?, न छुए तो साथी क्या कहेंगे? यही धर्म संकट उनके मन में भी है। दोनों की आँखें मिलीं, कठिन परिस्थिति से उबार लिया चलभाष ने, 'गुरु जी! प्रणाम। आप कार्यालय में विराजें, मैं तुरंत आती हूँ' कहते हुए, शेष विद्यार्थियों को रोककर वे चल पड़ीं कार्यालय की ओर। इस क्षण तो गुरु ने उबार लिया, टल गया था धर्म संकट।
***
१९-६-२०१६
salil.sanjiv@gmail.com
#दिव्यनर्मदा
#हिंदी_ब्लॉगर

मुक्तिका

मुक्तिका:
क्यों है?
संजीव 'सलिल'
*
जो जवां है तो पिलपिला क्यों है?
बोल तो लब तेरा सिला क्यों है?
दिल से दिल जब कभी न मिल पाया.
हाथ से हाथ फिर मिला क्यों है?
नींव ही जिसकी रिश्वतों ने रखी.
ऐसा जम्हूरियत किला क्यों है?
चोर करता है सीनाजोरी तो
हमको खुद खुद से ही गिला क्यों है?
शूल से तो कभी घायल न हुआ.
फूल से दिल कहो छिला क्यों है?
और हर चीज है जगह पर, पर
ये मगज जगह से हिला क्यों है?
ठीक कब कौन क्या करे कैसे?
सिर्फ गलती का सिलसिला क्यों है?
**********************************
२५-७-२०११
salil.sanjiv@gmail.com
#दिव्यनर्मदा
#हिंदी_ब्लॉगर

दोहा रवि वसुधा का ब्याह

दोहा सलिला;
रवि-वसुधा के ब्याह में...
संजीव 'सलिल'
*
रवि-वसुधा के ब्याह में, लाया नभ सौगात.
'सदा सुहागन' तुम रहो, ]मगरमस्त' अहिवात..
सूर्य-धरा को समय से, मिला चन्द्र सा पूत.
सुतवधु शुभ्रा 'चाँदनी', पुष्पित पुष्प अकूत..
इठला देवर बेल से बोली:, 'रोटी बेल'.
देवर बोला खीझकर:, 'दे वर, और न खेल'..
'दूधमोगरा' पड़ोसी, हँसे देख तकरार.
'सीताफल' लाकर कहे:, 'मिल खा बाँटो प्यार'..
भोले भोले हैं नहीं, लीला करे अनूप.
बौरा गौरा को रहे, बौरा 'आम' अरूप..
मधु न मेह मधुमेह से, बच कह 'नीबू-नीम'.
जा मुनमुन को दे रहे, 'जामुन' बने हकीम..
हँसे पपीता देखकर, जग-जीवन के रंग.
सफल साधना दे सुफल, सुख दे सदा अनंग..
हुलसी 'तुलसी' मंजरित, मुकुलित गाये गीत.
'चंपा' से गुपचुप करे, मौन 'चमेली' प्रीत..
'पीपल' पी पल-पल रहा, उन्मन आँखों जाम.
'जाम' 'जुही' का कर पकड़, कहे: 'आइये वाम'..
बरगद बब्बा देखते, सूना पनघट मौन.
अमराई-चौपाल ले, आये राई-नौन..
कहा लगाकर कहकहा, गाओ मेघ मल्हार.
जल गगरी पलटा रहा, नभ में मेघ कहार..
*
salil.sanjiv@gmail.com
#दिव्यनर्मदा
#हिंदी_ब्लॉगर

मुक्तक

मुक्तक:
संजीव 'सलिल'
*
खोजता हूँ ठाँव पग थकने लगे हैं.
ढूँढता हूँ छाँव मग चुभने लगे हैं..
डूबती है नाव तट को टेरता हूँ-
दूर है क्या गाँव दृग मुंदने लगे हैं..
*
आओ! आकर हाथ मेरा थाम लो तुम.
वक़्त कहता है न कर में जाम लो तुम..
रात के तम से सवेरा जन्म लेगा-
सितारों से मशालों का काम लो तुम..
*
आँख से आँखें मिलाना तभी मीता.
पढ़ो जब कर्तव्य की गीता पुनीता..
साँस जब तक चल रही है थम न जाना-
हास का सजदा करे आसें सुनीता..
*
मिलाकर कंधे से कंधा हम चलेंगे.
हिम शिखर बाधाओं के पल में ढलेंगे.
ज़मीं है ज़रखेज़ थोड़ा पसीना बो-
पत्थरों से ऊग अंकुर बढ़ फलेंगे..
*
ऊगता जो सूर्य ढलता है हमेशा.
मेघ जल बनकर बरसता है हमेशा..
शाख जो फलती खुशी से झूमती है-
तिमिर में जुगनू चमकता है हमेशा..
*
२५-७-२०१२
salil.sanjiv@gmail.com
#दिव्यनर्मदा
#हिंदी_ब्लॉगर

Poem

Poem:
Sanjiv
*
Success and un success 
Are two faces of a coin. 
Every un success leads to
Success in life
If you do'nt lose heart.
Success gives more pleasure
After un success.
Spoon feeded success
Without any struggle or
Testing your ability
Doesn't serve any purpose.
Baloon gets the height
Without any foundation
Hence, falls down.
Let us all try to get success
Only after proper efforts.
Success without doing our best
Can't give satisfaction.
Never feel shy
If the attempt fails.
Always ensure the use of
Proper and fair means
To get success.
***
२५-७-२०१५
salil.sanjiv@gmail.com
#दिव्यनर्मदा
#हिंदी_ब्लॉगर

नवगीत

नवगीत:
संजीव 
*
समय के संतूर पर 
सरगम सुहानी 
बज रही.
आँख उठ-मिल-झुक अजाने
आँख से मिल
लज रही.
*
सुधि समंदर में समाई लहर सी
शांत हो, उत्ताल-घूर्मित गव्हर सी
गिरि शिखर चढ़ सर्पिणी फुंकारती-
शांत स्नेहिल सुधा पहले प्रहर सी
मगन मन मंदाकिनी
कैलाश प्रवहित
सज रही.
मुदित नभ निरखे न कह
पाये कि कैसी
धज रही?
*
विधि-प्रकृति के अनाहद चिर रास सी
हरि-रमा के पुरातन परिहास सी
दिग्दिन्तित रवि-उषा की लालिमा
शिव-शिवा के सनातन विश्वास सी
लरजती रतनार प्रकृति
चुप कहो क्या
भज रही.
साध कोई अजानी
जिसको न श्वासा
तज रही.
*
पवन छेड़े, सिहर कलियाँ संकुचित
मेघ सीचें नेह, बेलें पल्ल्वित
उमड़ नदियाँ लड़ रहीं निज कूल से-
दमक दामिनी गरजकर होती ज्वलित
द्रोह टेरे पर न निष्ठा-
राधिका तज
ब्रज रही.
मोह-मर्यादा दुकूलों
बीच फहरित
ध्वज रही.
***
२५-७-२०१५
salil.sanjiv@gmail.com
#दिव्यनर्मदा

मुक्तक

मुक्तक:
संजीव 
*
मापनी: २११ २११ २११ २२ 
*
आँख मिलाकर आँख झुकाते
आँख झुकाकर आँख उठाते
आँख मारकर घायल करते
आँख दिखाकर मौन कराते
*
मापनी: १ २ २ १ २ २ १ २ २ १२२
*
न जाओ, न जाओ जरा पास आओ
न बातें बनाओ, न आँखें चुराओ
बहुत हो गया है, न तरसा, न तरसो
कहानी सुनो या कहानी सुनाओ
*
२५-६-२०१५
salil.sanjiv@gmail.com
#दिव्यनर्मदा
#हिंदी_ब्लॉगर

नवगीत

नवगीत  
*
हम आज़ाद देश के वासी,
मुँह में नहीं लगाम। 
*
जब भी अपना मुँह खोलेंगे,
बेमतलब बातें बोलेंगे।
नहीं बोलने के पहले हम
बात कभी अपनी तोलेंगे।
ना सुधरें हैं, ना सुधरेंगे
गलती करें तमाम।
*
जितना भी ऊँचा पद पाया,
उतना नीचा गिर गर्राया।
लज्जा-हया-शर्म तज, मुस्का
निष्-दिन अपना नाम थुकाया।
दल सुधार की हर कोशिश
कर ही देंगे नाकाम।
*
अपना थूका, खुद चाटेंगे,
नफरत, द्वेष, घृणा बाँटेंगे।
तीन-पाँच दो दूनी बोलें,
पर न गलत खुद को मानेंगे।
कद्र न इंसां की करते,
हम पद को करें सलाम।
***
salil.sanjiv@gmail.com
#दिव्यनर्मदा
#हिंदी_ब्लॉगर