कुल पेज दृश्य

शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

gazal: amitabh tripathi






ग़ज़ल:
 अमिताभ त्रिपाठी
बह्र- फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन

दर्द ऐसा, बयाँ नहीं होता
जल रहा हूँ, धुआँ नहीं होता

अपने अख़्लाक़ सलामत रखिये
वैसे झगड़ा कहाँ नहीं होता

आसमानों से दोस्ती कर लो
फिर कोई आशियाँ नहीं होता

इश्क़ का दौर हम पे दौराँ था
ख़ुद को लेकिन ग़ुमाँ नहीं होता

कोई सब कुछ भुला दे मेरे लिये
ये तसव्वुर जवाँ नहीं होता

जब तलक वो क़रीब रहता है
कोई शिकवा ज़ुबाँ नहीं होता

पाँव से जब ज़मीं खिसकती है
हाथ में आसमाँ नहीं होता

तक्ती की कोशिश

फ़ा

ला
तुन

फ़ा

लुन
फ़े
लुन
दर्‌


सा

याँ

हीं
हो
ता
जल

हा
हूँ
धु
आँ

हीं
हो
ता
अप्‌
ने
अख़्‍
ला

सल्‍

मत
रखि
ये
वै
से
झग
ड़ा

हाँ

हीं
हो
ता


मा
नों
से
दो

ती
कर
लो
फिर
को


शि
याँ

हीं
हो
ता
इश

का
दौ

हम
पे
दौ
राँ
था
ख़ुद
को
ले
किन
गु
माँ

हीं
हो
ता
को

सब
कुछ
भु
ला
दे
मे
रे
लिये
ये

रो
सा

वाँ

हीं
हो
ता
जब

लक
वो

री

रह
ता
है
को

शिक
वा
ज़ु
बाँ

हीं
हो
ता
पाँ

से
जब

मीं
खि
सक
ती
है
हा

में


माँ

हीं
हो
ता
लाल अंकित अक्षरों पर मात्रा गिराई गई है।


bal kavita: gudiyon ka tyohaar - s.n.sharma 'kamal'

गुड़ियों का त्यौहार और नाग पंचमी पर एक बाल - गीत



कमल
*
(गुड़िया का त्यौहार उत्तरप्रदेश के एक बड़े हिस्से में नागपंचमी के दिन मनाया जाता है। नागपंचमी के एक-दो दिन पहले से ही रंगीन डंडियां बिकनी शुरू हो जाती हैं। ये डंडियां लड़कों के लिए होती हैं। नाग पंचमी के दिन कपड़े की रंग-बिरंगी गुड़ियां बनाई जाती हैं। शायद उनमें उबले हुए चने इत्यादि भी भरे जाते हैं। शाम के वक्त सभी घरों से लड़कियां रंगीत डलियों या तश्तरियों में रंगीन कवर से अपनी-अपनी गुड़िया ढंककर मुहल्ले के चौराहे पर पहुंचती हैं। उनके साथ उनके भाई हाथों में पहले सी खरीदी डंडियां लेकर जाते है। सारी लड़कियों के इकट्ठा होने के बाद लड़कियां गोल घेरा बनाकर अपनी-अपनी गुड़िया घेरे के बीच में फेंक देती हैं । गुड़ियों के जमीन पर गिरते ही लड़के डंडियों से गुड़िया पीटने लगते हैं। इस अवसर पर चूंकि मुहल्ले के सारे बच्चे इकट्ठा होते हैं, इसलिए चाट, मिठाई और गुब्बारे वाले भी जमा हो जाते हैं। इसे कहते हैं नागपंचमी का मेला।)
*
995975_609100482454976_940519898_n

देर रात सोई थी जा कर
गुड्डे गुड़ियों को सजा धजा कर
सुबह हुई तो देखा आ कर
गुद्दे गुडियाँ नहीं वहाँ पर
कौन ले गया कहाँ गईं  वे
ढूँ ढ़ ढूंढ हारी मैं थक कर
चुन्नूमुन्नू जाग गए थे
तब उनसे ही पूछा जा कर
चुन्नू बोला तब हंस कर
गयी घूमने होंगी बाहर
समझ गई उसकी शैतानी
 गुस्सा आई बहुत  उसी   पर
मैंने भी  मन ही  मन उसको
सबक सिखा  देने की ठानी       
ऐसा मजा  चखाऊँगी की
उसको याद आजाये नानी
 उसका प्यारा एक खिलोना
ढोल बजाता खट ख़ट बौना
मैंने  उसे छुपा कर बेड   में
रख ऊपर ढक दिया बिछौना
याद  उसे  जब  आई उसकी  
ढूंढा  घर का कोना कोना
नहीं मिला जब उसे कहीं भी
शुरू कर दिया  रोना धोना
दीदी तुमने देखा क्या मेरा
ढोल बजाता हुआ खिलोना
मैं बोली बाहर चला गया हो
मेरी गुड़ियां लाने बौना
पैर  कर बोला दीदी देदो
गुड़ियां ला देता हूँ
आज ब्याह करना गुडिया का
गुड्डा खूब  सजा देता  हूँ 
फिर तो हम सबने मिल कर
गुड्डा गुडिया ब्याह रचाया
उसके बौने गैजेट  से ही
बहुत  देर बाजा बजवाया 
आज नाग-पंचमी भी है
बाहर एक सपेरा आया
बीन बजा कर नाग और
 नागिन का दर्शन  करवाया

पूरी कालोनी ने नागों पर
अपनी श्रद्धा भर भेंट चढ़ाया
हलवा पूरी और सिवैंये
खाया सबने त्यौहार मनाया
श्रावण शुक्ल पंचमी होती
गुड़ियों  नागों का त्यौहार
बच्चो सदा याद रखना तुम
इसे मनाना है हर बार
=================
sn Sharma <ahutee@gmail.com>
 

Tryst with destiny - J.L. Nehru

भारत की स्वतंत्रता-संध्या पर, स्वतन्त्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री स्वप्नद्रष्टा पंडित जवाहर लाल नेहरु का संसद में भारतीय संविधान सभा में दिया गया विश्व को सन्देश "नियति के साथ करार (Tryst with destiny)"(हिंदी रूपांतरण: पुष्पराज चसवाल)

anhad imageकई वर्ष पूर्व हमने नियति के साथ परस्पर एक करार किया था और अब वह समय आया है जब हम अपने उस वचन को साकार करेंगे, न केवल सम्पूर्ण अर्थों में बल्कि पूरी जीवन्तता से। आज घड़ी की सुइयाँ जब मध्य रात्रि का समय बताएंगी, जब सारी दुनिया सो रही होगी, भारतवर्ष स्वतंत्रता से परिपूर्ण जीवन की अंगड़ाई ले रहा होगा। इतिहास में ऐसा क्षण कभी-कभार ही आता है जब हम विगत से नये युग में प्रवेश करते हैं, जब एक युग का अंत हो रहा होता है तथा एक राष्ट्र की आत्मा जिसका लम्बे समय तक शोषण किया गया हो, मुखर हो उठती है। इस शुभ घड़ी में यह सर्वथा उचित होगा कि हम सभी भारतवर्ष और उसकी जनता की सेवा करने का व्रत लें इससे भी आगे बढ़ कर मानवता से जुड़े महत उद्देश्य के लिए समर्पित हों।

इतिहास के पहले उजाले के साथ ही भारत ने अपनी अनंत खोज प्रारंभ की तथा इस प्रयास में उसकी कई सदियाँ गरिमापूर्ण सफलताओं एवं असफलताओं से भरी रही हैं। सौभाग्य तथा दुर्भाग्य समान रूप से मानते हुए भारत ने कभी भी उस खोज को दृष्टि-विगत नहीं होने दिया और न ही उसने उन आदर्शों को कभी भुलाया जिनसे उसने ऊर्जा ग्रहण की। आज हमारे दुर्भाग्य का युग समाप्त हो रहा है तथा भारत फिर से स्वयं को खोजने में सफल हुआ है। जिस उपलब्धि का उत्सव आज हम मना रहे हैं, यह उस अवसर की शुरूआत है जिसमें बड़ी-बड़ी सफलताएँ एवं उपलब्धियाँ हमारी प्रतीक्षा कर रही हैं। क्या हम इतने सक्षम एवं बुद्धिमान हैं कि हम इस अवसर पर अपनी पकड़ बना सकें और भविष्य में आने वाली चुनौतियों को स्वीकार कर सकें। स्वतंत्रता तथा शक्ति दोनों ही उत्तरदायित्व से बंधे हुए हैं। उत्तरदायित्व है इस संविधान सभा का जो कि भारत के संप्रभु लोगों की सर्वप्रभुतासंपन्न संस्था है। स्वतंत्रता से पूर्व हमने बहुत कष्ट उठाए हैं और हमारा हृदय आज उन दर्दभरी स्मृतियों से भरा हुआ है। उनमें से कुछेक कष्ट अभी भी मौजूद हैं। फिर भी वह दुखभरा अनुभव अब अतीत हो चुका है और भविष्य हमें आशातीत नज़रों से आवाज़ दे रहा है। भविष्य सुविधाजनक अथवा विश्राम करने के लिए नहीं है बल्कि हमें निरंतर प्रयास करना है, जिससे वे वचन जो हम प्राय: दोहराते रहे हैं और जो प्रतिज्ञा हम आज भी लेंगे पूरी कर सकें। भारत की सेवा करने का मतलब है उन लाखों-करोड़ों देशवासियों की सेवा जो कष्टों से पीड़ित रहे हैं। इसका अर्थ हुआ निर्धनता, अज्ञानता, बीमारी एवं अवसरों की उपलब्धता में असमानता का अंत करना। हमारी पीढ़ी के महानतम व्यक्ति का सपना रहा है 'प्रत्येक आँख से आंसू पोंछना'। हो सकता है यह कार्य हमारी सामर्थ्य से बाहर हो, तो भी जब तक एक भी आँख में आँसू है और कष्ट है, उस क्षण तक हमारा कार्य समाप्त नहीं होगा।

अत: हमें अपने सपनों को साकार करने के लिए सख्त मेहनत करनी है। ये स्वप्न हैं भारत के लिए, पर वे सारे संसार के लिए भी हैं। अब सारे राष्ट्र परस्पर निकटता से जुड़ गये हैं, इनमें से कोई भी राष्ट्र अकेला नहीं रह सकता, शांति को विभाजित नहीं किया जा सकता, इसी प्रकार स्वतन्त्रता, खुशहाली तथा आपदाएँ एकता में बंधी इस दुनिया में अविभाज्य बन गये हैं, इन्हें अब अकेले अलग-अलग टुकड़ों में नहीं बाँटा जा सकता।

भारत के लोगो के जन-प्रतिनिधि होने के नाते हम उनसे आग्रह करते हैं कि वे पूरे विश्वास एवं आस्था के साथ इस महान कार्य में हमारे साथ शामिल हों। ये समय सस्ती, नकारात्मक, स्तरहीन आलोचना का नहीं है, न ही ये समय परस्पर द्वेष अथवा दूसरों पर दोषारोपण करने का है। हमें स्वतंत्र भारत की ऐसी इमारत का शानदार निर्माण करना है जिसमें उसके सभी बच्चे इकट्ठे रह सकें।

वह सुनिश्चित दिन अब आ पहुंचा है, वह दिन जिसका निश्चय नियति ने किया है, भारत दीर्घ निद्रा व लंबे संघर्ष के उपरांत फिर से खड़ा है, जाग रहा है, समर्थ एवं स्वतंत्र भारत। कुछ हद तक अतीत अभी भी हमसे जुड़ा हुआ है और जो वचन प्राय: हमने भारत की जनता को दिए हैं, उन्हें निभाने के लिए हमें बहुत-कुछ करना होगा। अन्तत: समय ने निर्णायक करवट ले ली है और हमारे लिए इतिहास का नया अध्याय शुरू हो रहा है, जिसे हम बनाएंगे, परिश्रम करेंगे तथा भावी पीढ़ी के लोग जिसके विषय में लिखेंगे।

भारत के लिए, सम्पूर्ण एशिया महाद्वीप के लिए तथा समूचे संसार के लिए यह एक भाग्यशाली समय है। एक नये सितारे का जन्म हो रहा है, पूरब दिशा में स्वतन्त्रता का प्रतीक एक सितारा, एक नई आशा जन्म ले रही है, बहुत अरसे से संजोया एक स्वप्न साकार हो रहा है। ये सितारा कभी अस्त न हो, यह आशा कभी धूमिल न हो। इस दिन हमें सबसे पहले ध्यान आता है हमारी इस स्वतन्त्रता के निर्माता का, राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का जिन्होंने भारत की प्राचीन आत्मा को संजोये हुए स्वतन्त्रता की मशाल को ऊँचा उठाए रखा एवं हमारे चारों ओर छाए अंधेरे को दूर करके प्रकाश का विस्तार किया। हम कई बार उनके अयोग्य अनुयायी सिद्ध हुए हैं, उनके द्वारा दिए गए संदेश से भटक गए हैं। केवल हम ही नहीं बल्कि भावी पीढियाँ भी उनके संदेश को याद रखेंगी और भारत के इस महान सपूत की छवि अपने हृदय में संजोयेगी जो अपनी आस्था में, ऊर्जा में, साहस में एवं विनम्रता में बेमिसाल रहे हैं। हम स्वतन्त्रता की उस मशाल को कभी भी बुझने न देंगे, कोई तूफ़ान या ज़लज़ला कितना भी बड़ा भले ही क्यों न आये।

इसके बाद हमारा ध्यान अवश्य ही उन अनगिनत गुमनाम आज़ादी के सिपाहियों की ओर जाना स्वभाविक है जिन्होंने भारतमाता की सेवा के मार्ग में बिना किसी पारितोषिक या सराहना की अपेक्षा किये अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। आज हमें अपने उन भाई-बहनों का भी ध्यान आता है जो राजनैतिक सीमाएं खिंच जाने के कारण हमसे अलग हो गये हैं और जो इस समय स्वतन्त्रता की इस खुशी में शामिल नहीं हो पा रहे हैं। वे हमारा ही हिस्सा हैं और आगे भी रहेंगे। चाहे कुछ भी हो, हम सुख-दुःख में उनके बराबर के साथी रहेंगे।

भविष्य हमें बुला रहा है। यहाँ से हम किस दिशा में जाएँगे और हमारा प्रयास क्या होगा? हमें प्रत्येक साधारण जन के लिए, भारत के किसानों, कर्मचारियों के लिए स्वतन्त्रता एवं अवसर सुनिश्चित करने हैं; हमें ग़रीबी, अज्ञानता तथा बीमारी से जूझना है; एक खुशहाल, जनतान्त्रिक एवं समुन्नत राष्ट्र का निर्माण करना है; ऐसी सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक संस्थायों का निर्माण करना है जिनसे प्रत्येक महिला व पुरुष के लिए न्याय और जीवन की सम्पूर्णता सुनिश्चित की जा सके।

हमें भविष्य में बहुत परिश्रम करना है। जब तक हम अपने संकल्प पूरी तरह साकार नहीं कर लेते, जब तक हम भारत की जनता का जीवन ऐसा सुनिश्चित नहीं कर लेते जैसा नियति ने उनके लिए चुना था, तब तक हम में से किसी एक के लिए भी क्षण भर का विश्राम सम्भव नहीं है। हम सभी एक साहसपूर्ण प्रगति के मुहाने पर खड़े हुए महान देश के नागरिक हैं, हमें ऊँचे मानकों को सुनिश्चित करना है। हम सभी चाहे जिस भी धर्म से सम्बन्धित हों, भारत के समान नागरिक हैं तथा हमारे अधिकार, कर्तव्य तथा उत्तरदायित्व भी समान हैं। हम साम्प्रदायिकता व संकीर्णता को बढ़ावा नहीं दे सकते क्योंकि कोई भी राष्ट्र जिसके नागरिकों की सोच और कर्म में संकीर्णता होगी, महान नहीं बन सकता।

विश्व के राष्ट्रों एवं लोगों को हम शुभकामनाएं देते हैं तथा शांति, स्वतन्त्रता एवं प्रजातन्त्र को मज़बूत करने में उनके साथ सहयोग करने का वचन देते हैं। और भारत, हमारी मातृभूमि जिसे हम बेइंतिहा मुहब्बत करते हैं, जो प्राचीन है, शाश्वत है, सदा नवीन है, उस प्यारे भारत को सम्मानपूर्वक श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए एकजुटता से इसकी सेवा करने का व्रत लेते हैं।

- जयहिंद।

गुरुवार, 15 अगस्त 2013

mahiya -shashi padha

माहिया 
तारों का मेला ---
शशि पाधा
*
1
 सन्ध्या की वेला है
 नीले अम्बर में
तारों का मेला है।
2
लहरें क्या गाती हैं
चंदा रोज़ सुने
क्या राग सुनाती हैं।
3
अमराई छाई है
खुशबू के झोंके
पुरवा भरमाई है

पागल मन झूम रहा
सावन की बूँदें
अधरों से चूम रहा ।
5
मन को समझाओ तो 
पंछी -सा उड़ता
क्या रोग बताओ तो  
6
हर बात छिपाते हो
कैसा रोग हुआ
क्यों वैद बुलाते हो?
7
छन छन झंकार हुई
पायल तेरी थी
मेरी क्यों हार हुई
8
तुम जीतो तो जानें
छम छम की भाषा
समझो तो हम मानें

9
मन- पीड़ा झलक गई
नैनों की गगरी
कुछ काँपी, छलक गई।
10
कंगना कुछ  बोल रहा
भेद कलाई के
धीमे से खोल रहा|
11
देहरी पर दीप धरूँ
पाहुन  आन खड़े
नैनों में हास भरूँ
----------------------

azadi ka Alha : Bairagi

Amitabh Tripathi <amitabh.ald@gmail.com>

 आज़ादी का आल्हा
 
एक मेरी ही तरह राज्यकर्मचारी जिन्होने यह आल्हा लिखा है। इसे बैरागी के छद्मनाम से प्रस्तुत कर रहा हूँ।

आजादी का दिवस आ गया फिर से होगी जयजयकार।
लाल किले पर फहरायेंगे झण्डा स्वामिभक्त सरदार॥
भानुमती के कुनबे के हैं सबसे ऊँचे सिपहसलार।
करें बंदगी साँझ सवेरे माता जी हैं प्राण - आधार॥
दस वर्षों के महाकाल में किया देश का खस्ताहाल।
रुपया डूब रसातल पहुँचा लेकिन कुनबा मालामाल॥
हुये घोटालों पर घोटाले फिर घोटालों की पड़्ताल।
कोर्ट कचेहरी दिन दो दिन की रहे रूपया सालों साल॥
है शहीद होने पर अपने वीरों को भारी अफ़सोस।
गदहे सभी पँजीरीं फाँके नौ दिन चलें अढ़ाई कोस॥
उनकी स्मृतियों को बिसार कर करते हैं सब गर्दभ गान।
और दुलत्ती एक दूसरे को देकर करते जलपान॥
सीमा पर ऐसी तैयारी देखी हमने अबकी सा्ल।
अपने घर हमें घूमने से ही रोके पूँजी लाल॥
एक पड़ोसी सीमा में घुस मारे अपने वीर जवान।
और हमारे नेता जी के मुख पर पंचशील मुस्कान॥
इनकी बात यहीं पर छोड़ें चलिये अवधपुरी दरबार।
सत्ता पर बच्चा बैठा कर चाचा ताऊ करें शिकार॥
लूट खसोट बढ़ रही प्रतिदिन कोई करे कहाँ फरियाद।
बाहुबली सब बाँह सिकोड़े चौराहों पर करें फसाद॥
है ईमान मुअत्तल देखो भ्रष्ट फिर रहे सीना तान।
अन्धे की रेवड़ी बना कर बाँट रहे पदवी-सम्मान॥
लैपटाप का कर्जा सिर पर बिजली का भरा न जाय।
सूबे के आला वज़ीर की गिनती करते सर चकराय॥
जातिवाद औऽ सम्प्रदाय के वोट बैंक का सब नुकसान।
उठा रहा है देश वृहत्तर कुछ लोगों की चली दुकान॥
यही दशा यदि रही बहुत दिन मित्रो! जरा दीजिये ध्यान।
आज़ादी पर संकट है यह विफल राष्ट्र का है अभियान॥
स्वतन्त्रता-दिन के अवसर पर इतना ले यदि मन में ठान।
अगली बार उन्हें चुनना है जिन्हें देश की हो पहचान॥
घोर निराशा के बादल हैं राष्ट्र क्षितिज पर चारों ओर।
फिर भी यही कामना अपनी ना्चे आज़ादी का मोर॥

-बैरागी

GEET: SHYAMAL SUMAN

लोकतंत्र सचमुच बीमार

राष्ट्र-गान आये ना जिनको, वो संसद के पहरेदार।
भारतवासी अब तो चेतो, लोकतंत्र सचमुच बीमार।।

कहने को जनता का शासन, लेकिन जनता दूर बहुत।
रोटी - पानी खातिर तन को, बेच रहे मजबूर बहुत।
फिर कैसे उस गोत्र - मूल के, लोग ही संसद जाते हैं,
हर चुनाव में नम्र भाव, फिर दिखते हैं मगरूर बहुत।।
प्रजातंत्र मूर्खों का शासन, कथन हुआ बिल्कुल साकार।
भारतवासी अब तो चेतो, लोकतंत्र सचमुच बीमार।।

बहुत शान से यहाँ लुटेरे, "बड़े लोग" कहलाते हैं।
मिहनतकश को नीति-वचन और वादों से सहलाते हैं।
वो अभाव में अक्सर जीते, जिनके हैं ईमान बचे,
इधर घोषणा बस कागज में, बेबस को बहलाते हैं।।
परिवर्तन लाजिम है लेकिन, शेष क्रांति का बस आधार।
भारतवासी अब तो चेतो, लोकतंत्र सचमुच बीमार।।

वीर-शहीदों की आशाएँ, कहो आज क्या बच पाई?
बहुत कठिन है जीवन-पथ पर, धारण करना सच्चाई।
मन - दर्पण में अपना चेहरा, रोज आचरण भी देखो,
निश्चित धीरे-धीरे विकसित, होगी खुद की अच्छाई।।
तब दृढ़ता से हो पायेगा, सभी बुराई का प्रतिकार।
भारतवासी अब तो चेतो, लोकतंत्र सचमुच बीमार।।

कर्तव्यों का बोध नहीं है, बस माँगे अपना अधिकार।
सुमन सभी संकल्प करो कि, नहीं सहेंगे अत्याचार।।
तब ही सम्भव हो पायेगा, भारत का फिर से उद्धार।
अपने संग भावी पीढ़ी पर, हो सकता है इक उपकार।।

 
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।

www.manoramsuman.blogspot.com
गीत
आज पंद्रह अगस्त है
---------------------

उठो उठो श्रीमान
आज पंद्रह अगस्त है ।                       


सरसठ की हो गई
आज बूढ़ी आज़ादी,
सोई चद्दर तान
दिखे पूरी आबादी ;


सीमाओं पर लगातार
मिलती शिकस्त है ।

अंदर-बाहर सभी तरफ
ख़तरा ही ख़तरा,
पानी सा हो गया
लहू का कतरा-कतरा

लालकिले वाला वक्ता
भी दिखे पस्त है ।

लूट रहे वो जिन्हें
आपने चुनकर भेजा,
देख देश की दशा
फटा जा रहा कलेजा ;

नौजवान अपनी दुनिया में
हुआ मस्त है ।

भले रुलाए प्याज
खून के हमको आँसू,
लिखे जा रहे उन्नति के
नारे नित धाँसू ;

कहाँ शिकायत करें
हवा भी हुई भ्रष्ट है।

- ओमप्रकाश तिवारी

(15 अगस्त, 2013


--
Om Prakash Tiwari
Chief of Mumbai Bureau
Dainik Jagran
41, Mittal Chambers, Nariman Point,
 Mumbai- 400021

Tel : 022 30234900 /30234913/39413000
Fax : 022 30234901
M : 098696 49598
Visit my blogs :  http://gazalgoomprakash.blogspot.com/
http://navgeetofopt.blogspot.in/

--------------------------------------------------
Resi.- 07, Gypsy , Main Street ,
Hiranandani Gardens, Powai , Mumbai-76
Tel. : 022 25706646

doha on buildings -SANJIV

दोहा सलिला :
भवन माहात्म्य : २
संजीव
*
[इंस्टिट्यूशन ऑफ़ इंजीनियर्स, लोकल सेंटर जबलपुर द्वारा गगनचुम्बी भवन (हाई राइज  बिल्डिंग) पर १०-११ अगस्त २०१३ को आयोजित अखिल भारतीय संगोष्ठी  की स्मारिका 'भवनांकन' में प्रकाशित कुछ दोहे।]
*
[इंस्टिट्यूशन ऑफ़ इंजीनियर्स, लोकल सेंटर जबलपुर द्वारा गगनचुम्बी भवन (हाई राइज बिल्डिंग) पर १०-११ अगस्त २०१३ को आयोजित अखिल भारतीय संगोष्ठी  की स्मारिका में प्रकाशित कुछ दोहे।]
*
भवन मनुज की सभ्यता, ईश्वर का वरदान।
रहना चाहें भवन में, भू पर आ भगवान।१।
*
भवन बिना हो जिंदगी, आवारा-असहाय।
अपने सपने ज्यों 'सलिल', हों अनाथ-निरुपाय।२।
*
मन से मन जोड़े भवन, दो हों मिलकर एक।
सब सपने साकार हों, खुशियाँ मिलें अनेक।३।
*
भवन बचाते ज़िन्दगी, सड़क जोड़ती देश।
पुल बिछुडों को मिलाते, तरु दें वायु हमेश।४।
*
राष्ट्रीय संपत्ति पुल, सड़क इमारत वृक्ष।
बना करें रक्षा सदा, अभियंतागण दक्ष।५।
*
भवन सड़क पुल रच बना, आदम जब इंसान।
करें देव-दानव तभी, मानव का गुणगान।६।
*
कंकर को शंकर करें, अभियंता दिन-रात।
तभी तिमिर का अंत हो, उगे नवल प्रभात७।
*
भवन सड़क पुल से बने, देश सुखी संपन्न।
भवन सेतु पथ के बिना, होता देश विपन्न।८।
*
इमारतों की सुदृढ़ता, फूंके उनमें जान।
देश सुखी-संपन्न हो, बढ़े विश्व में शान।९।
*
भारत का नव तीर्थ है, हर सुदृढ़ निर्माण।
स्वेद परिश्रम फूँकता, निर्माणों में प्राण।१०।
*
अभियंता तकनीक से, करते नव निर्माण।
होता है जीवंत तब, बिना प्राण पाषाण।११।
*
भवन सड़क पुल ही रखें, राष्ट्र-प्रगति की नींव।
सेतु बना- तब पा सके, सीता करुणासींव।१२।
*
करे इमारत को सुदृढ़, शिल्प-ज्ञान-तकनीक।
लगन-परिश्रम से बने, बीहड़ में भी लीक।१३।
*
करें कल्पना शून्य में, पहले फिर साकार।
आंकें रूप अरूप में, यंत्री दे आकार।१४।
*
सिर्फ लक्ष्य पर ही रखें, हर पल अपनी दृष्टि।
अभियंता-मजदूर मिल, रचें नयी नित सृष्टि।१५।
*
सडक देश की धड़कनें, भवन ह्रदय पुल पैर।
वृक्ष श्वास-प्रश्वास दें, कर जीवन निर्वैर।१६।
*
भवन सेतु पथ से मिले, जीवन में सुख-चैन।
इनकी रक्षा कीजिए, सब मिलकर दिन-रैन।१७।
*
काँच न तोड़ें भवन के, मत खुरचें दीवार।
याद रखें हैं भवन ही, जीवन के आगार।१८।
*
भवन न गन्दा हो 'सलिल', सब मिल रखें खयाल।
कचरा तुरत हटाइए, गर दे कोई डाल।१९।
*
भवनों के चहुँ और हों, ऊँची वृक्ष-कतार।
शुद्ध वायु आरोग्य दे, पायें ख़ुशी अपार।२०।
*
कंकर से शंकर गढ़े, शिल्प ज्ञान तकनीक।
भवन गगनचुम्बी बनें, गढ़ सुखप्रद नव लीक।२१।
*
वहीं गढ़ें अट्टालिका जहाँ भूमि मजबूत।
जन-जीवन हो सुरक्षित, खुशियाँ मिलें अकूत।२२।
*
ऊँचे भवनों में रखें, ऊँचा 'सलिल' चरित्र।
रहें प्रकृति के मित्र बन, जीवन रहे पवित्र।२३।
*
रूपांकन हो भवन का, प्रकृति के अनुसार।
अनुकूलन हो ताप का, मौसम के अनुसार।२४।
*
वायु-प्रवाह बना रहे, ऊर्जा पायें प्राण।
भवन-वास्तु शुभ कर सके, मानव को सम्प्राण।२५।
*
Sanjiv verma 'Salil'
salil.sanjiv@gmail.com
http://divyanarmada.blogspot.in

बुधवार, 14 अगस्त 2013

muktak : sanjiv

स्वाधीनता दिवस पर :
मुक्तक
संजीव
*
शहादतों को भूलकर सियासतों को जी रहे 
पड़ोसियों से पिट रहे हैं और होंठ सी रहे
कुर्सियों से प्यार है, न खुद पे ऐतबार है-
नशा निषेध इस तरह कि मैकदे में पी रहे
*
जो सच कहा तो घेर-घेर कर रहे हैं वार वो
हद है ढोंग नफरतों को कह रहे हैं प्यार वो
सरहदों पे सर कटे हैं, संसदों में बैठकर-
एक-दूसरे को कोस, हो रहे निसार वो
*
मुफ़्त भीख लीजिए, न रोजगार माँगिए
कामचोरी सीख, ख्वाब अलगनी पे टाँगिए
फर्ज़ भूल, सिर्फ हक की बात याद कीजिए-
आ रहे चुनाव देख, नींद में भी जागिए
*
और का सही गलत है, अपना झूठ सत्य है
दंभ-द्वेष-दर्प साध, कह रहे सुकृत्य है
शब्द है निशब्द देख भेद कथ्य-कर्म का-
वार वीर पर अनेक कायरों का कृत्य है
*
प्रमाणपत्र गैर दे: योग्य या अयोग्य हम?
गर्व इसलिए कि गैर भोगता, सुभोग्य हम
जो न हाँ में हाँ कहे, लांछनों से लाद दें -
शिष्ट तज, अशिष्ट चाह, लाइलाज रोग्य हम
*
गंद घोल गंग में तन के मुस्कुराइए
अनीति करें स्वयं दोष प्रकृति पर लगाइए
जंगलों के, पर्वतों के नाश को विकास मान-
सन्निकट विनाश आप जान-बूझ लाइए
*
स्वतंत्रता है, आँख मूँद संयमों को छोड़ दें
नियम बनायें और खुद नियम झिंझोड़-तोड़ दें
लोक-मत ही लोकतंत्र में अमान्य हो गया-
सियासतों से बूँद-बूँद सत्य की निचोड़ दें
*
हर जिला प्रदेश हो, राग यह अलापिए
भाई-भाई से भिड़े, पद पे जा विराजिए
जो स्वदेशी नष्ट हो, जो विदेशी फल सके-
आम राय तज, अमेरिका का मुँह निहारिए
*
धर्महीनता की राह, अल्पसंख्यकों की चाह
अयोग्य को वरीयता, योग्य करे आत्म-दाह
आँख मूँद, तुला थाम, न्याय तौल बाँटिए-
बहुमतों को मिल सके नहीं कहीं तनिक पनाह
*
नाम लोकतंत्र, काम लोभतंत्र कर रहा
तंत्र गला घोंट लोक का विहँस-मचल रहा
प्रजातंत्र की प्रजा है पीठ, तंत्र है छुरा-
राम हो हराम, तज विराम दाल दल रहा
*
तंत्र थाम गन न गण की बात तनिक मानता
स्वर विरोध का उठे तो लाठियां है भांजता
राजनीति दलदली जमीन कीचड़ी मलिन-
लोक जन प्रजा नहीं दलों का हित ही साधता
*
धरें न चादरों को ज्यों का त्यों करेंगे साफ़ अब
बहुत करी विसंगति करें न और माफ़ अब
दल नहीं, सुपात्र ही चुनाव लड़ सकें अगर-
पाक-साफ़ हो सके सियासती हिसाब तब
*
लाभ कोई ना मिले तो स्वार्थ भाग जाएगा
देश-प्रेम भाव लुप्त-सुप्त जाग जाएगा
देस-भेस एक आम आदमी सा तंत्र का-
हो तो नागरिक न सिर्फ तालियाँ बजाएगा
*
धर्महीनता न साध्य, धर्म हर समान हो
समान अवसरों के संग, योग्यता का मान हो
तोडिये न वाद्य को, बेसुरा न गाइए-
नाद ताल रागिनी सुछंद ललित गान हो
*
शहीद जो हुए उन्हें सलाम, देश हो प्रथम
तंत्र इस तरह चले की नयन कोई हो न नम
सर्वदली-राष्ट्रीय हो अगर सरकार अब
सुनहरा हो भोर, तब ही मिट सके तमाम तम
=============================

मंगलवार, 13 अगस्त 2013

kavi aur kavita: kusum vir

कवि और कविता :  कुसुम वीर

निश्छल मन की अभिव्यक्तियाँ हैं श्रीमती कुसुम वीर की कविताएँ



परिचय:
श्रीमती कुसुम वीर जी वर्तमान में ‘‘आसरा’’ – गरीब, असाक्षर एवं पिछली महिलाओं के उत्थान में अग्रसर चेरिटेबल संस्था की निदेशक हैं।
पूर्व में ये प्रौढ़ शिक्षा निदेशालय, स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार, के निदेशक के रुप में कार्यरत थीं। जहां से ये जनवरी 2011 में सेवानिवृत्त हुईं। इसके पूर्व केंद्रीय हिंदी प्रशिक्षण संस्थान, राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय, भारत सरकार में 5 वर्षों तक निदेशक के रुप में कार्यरत थीं। इसके अलावा केद्रीय अनुवाद ब्यूरो, राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय, भारत सरकार में निदेशक का अतिरिक्त प्रभार संभाल चुकीं हैं। श्रीमती कुसुम वीर जी का अध्यापन में भी व्यापक अनुभव रहा है। ये वर्ष 1989 में आई.टी. कॉलेज, लखनऊ (उ.प्र.) में मनोविज्ञान विभाग में प्रवक्ता रही तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में स्नातक/स्नातकोत्तर छात्रों को ‘‘अनुवाद’’ विषय पढ़ाया हैं। इसके अलावा इन्होंने विभिन्न देशों में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों/कार्यशालाओं में भारत सरकार के प्रतिनिधि के रूप में समय-समय पर सहभागिता की।
इन्होंने स्नातक की शिक्षा आगरा विश्वविद्यालय से वर्ष 1970 में हिंदी में प्रथम स्थान एवं स्वर्ण पदक के साथ प्राप्त की तथा स्नातकोत्तर – ‘मनोविज्ञान’ में प्रथम श्रेणी एवं आगरा विश्वविद्यालय में तृतीय स्थान के साथ हासिल की। शिक्षा की प्रति इनकी प्रतिबद्धता की वजह से इन्होंने इंटरनेशनल कॉलेज, डेनमार्क से वर्ष 1986 में ‘‘प्रौढ़ों की शिक्षा एवं उनका सामाजिक – आर्थिक विकास’’ विषय पर कोर्स किया। इन्होंने वर्ष 2006-07 में केंद्रीय हिंदी संस्थान, मानव संसाधन विकास मंत्रालय से संचालित ‘‘भाषा विज्ञान’’ का स्नातकोत्तर डिप्लोमा कोर्स प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया।
अध्ययन के प्रति इनकी चेष्टा का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि ये कक्षा 1 से एम.ए. तक सदैव प्रत्येक स्तर पर ‘प्रथम स्थान’ पर रहीं। ये वर्ष 1968 से 1972 तक राष्ट्रीय स्कालर भी रहीं। इन्हें  अनेक वर्षों तक ‘‘सर्वोत्तम छात्रा’’ के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इन्हे वर्ष 1984 में ‘‘भारत की सर्वोत्तम युवा’’ के पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इनके अथक प्रयासों एवं भाषा के प्रचि निष्ठा का सम्मान करने के लिए वर्ष 2008 में ‘‘विक्रमादित्य विद्यापीठ’’, भागलपुर, बिहार द्वारा ‘‘विद्यासागर’’ (डी.लिट) की मानद उपाधि से इन्हे विभूषित किया गया।
ये शिक्षा का अनमोल खजाना लेकर अपेक्षाकृत कम विकसित शहरों में गयीं। उत्तर प्रदेश सरकार में जिला प्रौढ़ शिक्षा अधिकारी के पद पर 10 वर्षों तक (वर्ष 1980-90) कार्य करते हुए विभिन्न जिलों यथा – आगरा, मथुरा, गाजियाबाद एवं बुलंदशहर में साक्षरता कार्यक्रम का सफल संचालन किया एवं गाँव-गाँव घूमकर बहुत से गाँवों को पूर्ण साक्षर किया। भारत के विकास में महिलाओं की भागीदारी को सुनिश्चित करने के लिए इन्होंने ‘‘आसरा’’ चैरिटेबल ट्रस्ट की निदेशक के रूप में जून 2011 से गरीब, असाक्षर एवं पिछड़ी अनुसूचित जाति/जनजाति की महिलाओं के उन्नयन हेतु उन्हें सिलाई-कढ़ाई, फल संरक्षण, ब्यूटी पार्लर एवं पढ़ाई-लिखाई का अनवरत प्रशिक्षण, हुनर एवं रोजगार प्राप्त कराया।
इतने व्यस्त कार्यकाल में भी साहित्य के प्रति अनुराग और समर्पण का प्रमाण इनके द्वारा लिखी गयी कई महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं। जिसमें प्रमुख है 30 दिन में हिंदी सीखें – द्वारा – डायमंड पॉकेट बुक्स, a few steps in learning Hindi – द्वारा – डायमंड पॉकेट बुक्स, ‘राजभाषा व्यवहार ’ – द्वारा – डायमंड पॉकेट बुक्स, ‘‘मैं आवाज़ हूँ’’ (कविता संग्रह) – द्वारा – प्रतिभा प्रतिष्ठान तथा ‘प्रशिक्षण ‘मैनुअल्स’ का निर्माण।
देशभर में ये महिलाओं के उद्धार हेतु कई कार्यक्रमों से जुड़ी रहीं हैं। महिलाओं के उन्नयन और उनमें साक्षरता को बढ़ावा देने के लिए राज्य स्तरीय/जिला स्तरीय सफल अभिनव प्रयोग एवं समन्वय कार्य किए। देशभर में ‘‘लेखक कार्यशालाओ’’ का आयोजन कर विभिन्न भाषाओं में ‘‘साक्षरता प्रवेशिकाओं’’ का निर्माण कराया। इनकी लेखन प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वागर्थ, ज्ञानोदय, गगनान्चल, स्वागत, शब्द-योग, राजभाषा भारती, साक्षरता मिशन, प्रौढ़ शिक्षा पत्रिका एवं सजग समाचार आदि अन्य कई पत्रिकाओं में लेखों एवं कविताओं का प्रकाशन हो चुका है। इसके अलावा आकाशावाणी एवं दूरदर्शन पर भी वार्ताओं एवं परिचर्चाओं का प्रसारण हो चुका है। इनसे kusumvir@gmail.com ई-मेल पर सम्पर्क किया जा सकता है। इनसे मोबाईल नम्बर 9899571158 पर भी सम्पर्क किया जा सकता है।
प्रस्तुत है श्रीमती कुसुम वीर जी की पुस्तक “ मैं आवाज़ हूँ – काव्य संग्रह” की दिनेश मिश्र द्वारा लिखी गई भूमिका।
कविताएँ जो बहुत-कुछ कहती हैं
कुसुम वीर की कविताएँ बहुत-कुछ कहती हैं। जीवन से जुड़े अनेक संघर्ष और अनुभव उनकी कविताओं में झलकते हैं। सर्वाधिक महत्वपूर्ण चुनौती तो अभिव्यक्ति की है जिसे उन्होंने अपनी कविता ‘मैं आवाज़ हूँ’ के माध्यम से सुदृढ़ आत्मविश्वास के साथ व्यक्त किया है। कवयित्री को मालूम है कि हमारे परिवेश में, हमारे समाज में, स्वतंत्र और स्वाभिमानी विचार का आसानी से स्वागत नहीं होता। उस आवाज़ को दबाने या बाँधने की भरपूर कोशिश होती है। लेकिन, कवयित्री समाज की उन शक्तियों के सामने झुकने को तैयार नहीं। दमन और न्याय के खि़लाफ़ उसकी आवाज़ बुलंद है और रहेगी ताकि, बाधाओं और अंधविश्वासों की दीवारें गिराई जा सकें। कवयित्री का साहस अदम्य है और आत्मविश्वास अपराजेय। तभी तो,
मैं आरक्षित हूँ
एक बुलंद आवाज़
एक अपरिमित आकाश
जिसे न गिरा सका है कोई
न दबा सकेगा कोई।
कुसुम वीर की कविताओं में जहाँ एक ओर मानवीय संबंधों की उलझनें सामने आती हैं, वहीं दूसरी ओर रिश्तों की सच्चाई कुछ इस तरह नज़र आती है,
रंग-रँगीले लोग
गिरगिट-से रंग बदलते
स्वार्थरत
निजोन्मुख
अंतर की माँद में
दुबले-से रिश्ते
और फिर रिश्ते भी ‘किसिम-किसिम’ के,
रिश्ते
कुछ खट्टे
कुछ मीठे
कुछ तीखे
कुछ फीके
कुछ मन से जुड़े
कुछ तन से जुड़े
संपर्कों की आड़ में
कुछ बरबस जुड़े।
परंतु कवयित्री आशावादी है – सकारात्मक दृष्टि-संपन्न। तभी तो कहा है,
रिश्ता कोई भी
इतना फीका नहीं
कि सौहार्द का रंग न चढ़े
इतना खट्टा नहीं
जिस पर प्रेम की मिठास न मढ़े
इतना तीखा नहीं
कि नम्रता का असर न पड़े।
कुसुम वीर की कविताएँ जीवन की ऊहापोह से गुजरते हुए एक निश्छल मन की अभिव्यक्तियाँ हैं। इन कविताओं में भावनाएँ, संवेदनाएँ, विचार,रुचियां – उनका समूचा व्यक्तित्व परिलक्षित होता है। क्या मन को भला लगता है और क्या नहीं, बड़ी बेबाकी से बताया है:
मुझे अच्छा लगता है
लोगों के बीच रहना
मिलना-जुलना
लेकिन अखर जाता है
लोगों की भीड़ में
अपने को अकेला पाना।
जैसे मनुष्य के व्यक्तित्व के अनेक पहलू होते हैं, कुसुम वीर की कविताओं के भी कई रंग हैं। एक ओर सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश की जकड़न का गहरा अहसास है, वहीं मन की कोमलतम संवेदनाओं को भी ये कविताएँ उजागर करती हैं,
मन
गीली मिट्टी सा
उपजते हैं इसमें
अनेक विचार
अभिलाषाएँ
आकांक्षाएँ
या फिर,
मुझ्ो प्यार चाहिए
ढेर सारा प्यार
लाड़ और दुलार।
कुसुम वीर की कविताओं का एक अहम विषय है सामाजिक एवं राजनीतिक परिवेश की विसंगतियाँ। भारत की गौरवमयी सांस्कृतिक विरासत के बावजूद वर्तमान समाज में बहुत-सी बातें असहनीय हैं। उनके विरोध में कवयित्री के मन का आक्रोश कई कविताओं में मुखर हुआ है। जैसे,
कैसी आज़ादी यहाँ
कोई किसी की
सुनती नहीं।
कोई किसी को
कुछ कहता नहीं।
और भी बहुत-कुछ कहा जा सकता है कुसुम वीर की कविताओं के बारे में, उनकी संभावनाओं के बारे में। परंतु बेहतर यह है कि पाठक सीधे कविताओं से ही सुनें कि वे क्या कहती हैं?
विश्वास है कि पाठकों को ये कविताएँ अपने मन के आस-पास की कविताएँ लगेंगी और वे इनमें एक भावनापूर्ण निश्छल स्वर सुन सकेंगे।
‘मैं आवाज़ हूँ’ कुसुम वीर की कविताओं का पहला संग्रह है और आशा है कि यह समर्थ आवाज़ दूर तक हमारे साथ चलेगी। – दिनेश मिश्र
प्रस्तुत है श्रीमती कुसुम वीर जी की कुछ महत्वपूर्ण कवितायें –
मैं आवाज़ हूँ
मैं
एक आवाज़ हूँ
जीती-जागती
झंझावतों को चीरती
ज़ुल्मों को बींधती
म्यान से निकल
अत्याचारों को रौंदती
तुम सोचते हो
दबा सकोगे तुम
मेरी आवाज़ को
मेरी ताकत को
मेरी शख़्सियत को
मेरे वजूद को
आज तक
कौन बाँध सका है
मुझे, अपने पाश में
न मानव
न दानव
न सूरज
न तारे
गवाह हैं
ये सभी
मेरी सत्ता के
मेरे अस्तित्व के
मेरी आवाज़ के
मेरी आवाज़
युगों से पुकार रही है
मुझे जीने दो
खुली हवा में
साँस लेने दो
तोड़ डालो
उन बाधाओं को
अंधविश्वासों की दीवारों को
जो चारदीवारी से
तुम्हें बाहर नहीं आने देतीं
गिरा दो
उन शिलाखंडों को
जिनके पाषाण संकेतों ने
दबा रखा है स्वप्नों को
लौटा दो
उन गरजते तूफानों को
जो अपनी गरज से
दबा देना चाहते हैं
उभरती आवाज़ को
उड़ने दो इस आवाज़ को
भावनाओं के उन्मुक्त गगन में
जहाँ विस्तृत आकाश
बाँहें फैला खड़ा है
यह आवाज़ आत्मसात कर
उसे दोहराने को।
मैं अक्षरित हूँ
एक बुलंद आवाज़
एक अपरिमित आकाश
जिसे न गिरा सका है कोई
न दबा सकेगा कोई।
***
मैं खुश हूँ
मैं
बहुत खुश हूँ
मेरे आँगन में
एक अंकुर फूटा है
परसों, मैंने
एक नन्हें बीज को
अपनी हथेलियों से सहलाकर
बोया था
माटी के बीच में
आज
एक अंकुर फूटा है उसमें
मृदुल, कोमल
इक नन्हे शिशु सा
कोमल हरित गात
मैंने
उसे सहलाया
जल बिंदुओं से
और
आहिस्ता-आहिस्ता
वह बढ़ने लगा
थोड़ा ऊँचा
उठने लगा
और अब
कुछ-कुछ मुझे
पहचानने भी लगा है
मेरे पास आते ही
वह मचलने लगता है
मेरी उँगलियों का
स्पर्श पाने को
अपनी कोमल सी कोंपल बाँहों से
छूना चाहता है मुझे
मैं
रोज़ उसे देखती हूँ
दुलारती हूँ
सींचती हूँ।
अब
वह जवान हो चला है
मैं आज बहुत खुश हूँ
उसने जन्म दिया है
शाखों को,
जिनको
मौसम की बहारें
अपने पालने में
दुलार रही हैं
धीरे-धीरे
फिर बढ़ने लगी हैं
शाखें
और
बौर उमड़ आया है
उन पर
यौवन का
फैला दी हैं उसने अपनी बाँहें
किसी आलिंगन को
झुकने लगा है वह
अपने फलों से
धरा को
पूरित करने को
मैं
बहुत खुश हूँ
क्योंकि
मैंने आज
एक जीवन को
भरपूर जीते देखा है।
***
चस्का
यहाँ, कोई किसी से
नहीं बोलता
किसी की नहीं सुनता
सब अपने में मगन
आगे बढ़ने की होड़
एक चस्का
ढेर सारे पैसे
पाने का
और
सिक्कों की खनखनाहट में
बेसुध हो जाने का।
यहाँ पर
कोई किसी को नहीं रोकता
नहीं टोकता
क्योंकि
इस आपाधापी में
सबको
अपनी पड़ी है।
उसे चाहिए ज्चयादा
और ज्चयादा, सबसे ज्चयादा
किसी को कम मिले
या ना मिले
उसे क्या
उसे तो पाना है सर्वस्व
कभी न खत्म होनेवाली मरीचिका
और अपार अधिकार!
***
मैंने भारत को देखा है
मैंने
भारत को देखा है
उसके मान को
सम्मान को
गौरव को
मर्यादा को।
मैंने
भारत को जाना है
उसकी आत्मा को
पौरुष को
शौर्य को
बलिदान को।
मैंने
भारत को सुना है
उसके तरकस से छूटे
प्रत्यंचा पर चढ़े
तीरों की गर्जना को।
मैंने
भारत को सूँघा है
उसकी हवा में बहती
यज्ञ-सुवासित
समिधा की खुशबू को।
मैंने
भारत को पहचाना है
तक्षशिला नालंदा में गूँजते
वेदों की ऋचाओं के
मुखरित स्वरों को।
***
बुलबुले
बुलबुले
छोटे-बड़े बुलबुले
तरह-तरह के बुलबुले
बुलबुले
जो बहुत-कुछ कहते हैं
अपनी ज़बानी
जीवन की कहानी
बुलबुले
भावों के बुलबुले
उभरते-ठिठकते
अंतर के सागर में
फूटते-सिमटते
बुलबुले
सपनों के बुलबुले
तैरते-मचलते
उमंगों के बुलबुले
मुसकाते-चहकते
बुलबुले
आशा-निराशा के बुलबुले
जलते औ’ बुझ्ाते
आकांक्षाओं के बुलबुले
टिमटिमाते-चमकते
बुलबुले
प्रीत के बुलबुले
गहाराते-उथले
रिश्तों के बुलबुले
बनते-बिगड़ते
बुलबुले
खुशियों के बुलबुले
हँसते-मचलते
गम के बुलबुले
अकेले-वीराने
बुलबुले
तृष्णा के बुलबुले
ललचाते-बहकते
करुणा के बुलबुले
दुलारते-सहलाते
बुलबुले
वीरता के बुलबुले
दहाड़ते-गरजते
भय के बुलबुले
सहमते-दुबकते
बुलबुले
साँसों के बुलबुले
आते-गुज़रते
जीवन के बुलबुले
उगते औ’ ढलते
बुलबुले
मृत्यु के बुलबुले
मिटते-सिमटते
सत्य के बुलबुले
शाश्वत ही रहते
अनूठी कहानी है
ये बुलबुलों की
मिटकर भी फिर से
उपजते हैं बुलबुले
***
ये भी हैं बच्चे
बच्चे
कूड़े के ढेर में
इधर-उधर
ताकते-झाँकते
नन्हीं-नन्हीं उँगलियों से
चिंदी-चिंदी कागज़ बीनते
प्लास्टिक की बोतलें बटोरते
दिशाहीन बच्चे
पुराने घिसे कपड़ों को
अपने मैले हाथों से पोंछते
दूर कहीं सलीके से
यूनीफार्म पहने
स्कूल जाते दूसरे बालकों को
हसरत से निहारते
कुछ करने की चाह में
ऊपर- नीचे बेमकसद
कूदते-फाँदते बच्चे
चौराहे की लाल बत्ती पर
गाड़ियों के आगे-पीछे
डोलते- मंडराते
माँओं की गोद में चिपके
लाडले बच्चों को
गुब्बारा बेचते
अभावग्रस्त बच्चे
आरामदार गाड़ियों में बैंठे
साहब मेमसाहब से
माँगते- गिड़गिड़ाते
टाई बाबू की फटकार से
सहमते- डरते
किसी नुक्कड़ पर
हलवाई की दुकान को
ललचाई नज़रों से ताकते
भूखे बच्चे
भारत निर्माण के
ख्वाबों से अनजान
अक्षरों से महरुम
चौराहों पर
कलम किताब बेचते बच्चे
पास से गुज़रती
किसी गाड़ी की तेज़ रफ्तार से
ठोकर खाते
गिरते- कराहते
थककर पगडंडी पर पैर पसारे
भावपूरित आँखों से
शून्य में ताकते बच्चे
बाल शोषण मुक्ति कानून
देश के विकास,
उसकी तरक्की से बेखबर
देश के नौनिहाल-कर्णधार
सड़क फुटपाथ पर
अधनंगे सोते बच्चे
***
सुर्खियों में
मुझे अच्छा लगता है
सुबह-सुबह
हरी घास पर टहलना,
और शबनमी बूँदों का
मेरे पाँओं को सहलाना
भाती है मुझे
ठंडी हवाओं के झोकों में,
पेड़ों की शाखों पर
पत्तों का,
रह-रहकर मचल जाना
लेकिन, गर्म चाय की
प्याली के साथ
अख़बार की सुर्खियों में
जब पढ़ती हूँ,
बलात्कार, डकैती
अपहरण और मारकाट,
तब सिहर उठता है मन
काँप जाती है रूह
कि आज
फिर किसी
वृद्धा को पाकर अकेले
किसी कसाई ने,
उसका हलक दबाया होगा !
सुबह की सुहानी,
शीतल सुवासित मलय
अब गर्म हो चुकी है
अख़बार के सुर्ख स्याह
पन्नों की धूप से,
रेशमी घास के
शबनमी मोती भी
अब सुख चुके है,
और रीत चुके है
भावों के अप्लव
दूर कहीं
कोमल, निश्छल शाखें
ताक रही है
पेड़ो को,
और, पूछ रही है,
कब ये आदमी
इन्सान बनेगा?
क्या इसीलिए, ईश्वर ने
इन्सान को
धरती पर भेजा था,
कि वह,
ज़र, जोरू और ज़मी के लिए
कत्ले आम करे
और बहाए खून
माँओं, बहनों और बच्चों का
जिनका दोष सिर्फ यह है,
कि वे निर्दोष हैं !
***
आभार : प्रवासी दुनिया

shabd salila, mafee, muaafee ya muhafee?

शब्द सलिला :
माफी, मुआफी या मुहाफी?
*
डॉ. महेश चन्द्र गुप्ता: सही लफ़्ज़ तो मुहाफ़ी ही है, मुआफ़ी या माफ़ी नहीं. इस विचार की पुष्टि मैंने इस तर्क पर की: गलती हो गई, क्षमादान दीजिए, हिफ़ाज़त कीजिए, मेरे हाफ़िज़  (रक्षक) बनिए.
हाफ़िज़ >> मुहाफ़िज़ >> मुहाफ़ी >> मुआफ़ी >>माफ़ी.

बृहत् हिंदी कोष : पृष्ठ ८८९ 
माफ़ = मुआफ़ = क्षमा किया हुआ, बख्शा गया. -करो -क्षमा करो, रास्ता लो, जान छोड़ो.
माफ़कत, माफ़िकत = मुआफ़िकत
माफ़ि = अनुकूल, अनुसार 
माफ़ी = क्षमा, माफ किया जाना, वह जमीन जिसकी मालगुजारी या लगन मा हो.  
माफ़ीदार = जिसके पास माफी जमीन हो
बृहत् हिंदी कोष : पृष्ठ ९००
मुआफ़ = माफ़
मुआफ़िक = मुवाफ़िक / माफ़िक (अनुकूल, अनुसार, तुल्य, सदृश, योग्य, उचित)

मुआफ़िकत =  अनुकूलता, मेल-जोल
उर्दू हिंदी शब्द कोष पृष्ठ ५०५ 
मुआफ़ = क्षमा प्राप्त, क्षमित  
मुआफ़कत = समानता, यकसानियत, अनुकूलता, इत्तिफाक, मैत्री, दोस्ती 
मुआफ़िक = अनुकूल, मुत्तफ़िक़, मित्र, दोस्त
मुआफ़िकीन = मुआफ़िक का बहुवचन, अनुकूल लोग 
मुआफ़ी = क्षमा, बख़शिश  
मुआफ़ीदार = जिसे मुआफ़ी की ज़मीन या जागीर मिली हो
मुआफ़ीनाम: = वह पात्र जिसमें कोइ व्यक्ति अपने अपराध-क्षमा की लिखित तह्रीर दे, क्षमापत्र
समान्तर कोष (हिंदी थिसारस) पृष्ठ १४११-१४१२
माफ़ = आदान मुक्त, क्षमा प्राप्त
माफ़ करना = आदान मुक्त करना, क्षम करना, प्राण क्षमा करना
माफ़िक = अनुकूल, अनुसार, कल्याणकारी, सदृश्य, सहमत, सादृश्य, हितकारी 
माफ़िक आना = कल्याणकारी होना
माफ़िक होना = कल्याणकारी होना
माफ़ी = अपराधमुक्ति, आदानमुक्ति, क्षमा, प्राण क्षमा, भूमि दान, लगानमुक्त कृषि
माफ़ीदार = दानग्राही, लगानमुक्त कृषि धारी
माफ़ीनामा = क्षमापत्र  
समान्तर कोष (हिंदी थिसारस) पृष्ठ १४२३
मुआफ़ = क्षमाप्राप्त 
मुआफ़िक़ = अनुसार, सदृश्य 
मुआफ़िकत = अनुकूलता
आनंद पाठक;
मु आ फ़ी उर्दू के ५ हर्फ ( मीम् ऐन् अलिफ् फ़े ये ) से मिल कर बना है. अब आप हिन्दी में चाहे जैसे उच्चारण कर लें मुआफी या माफी ख़याल रहे हिन्दी में 'ऐन' की आवाज़ नहीं है.  


 

 

सोमवार, 12 अगस्त 2013

doha salila: bhavan mahatmya -SANJIV

दोहा सलिला :
भवन माहात्म्य
संजीव
*
[इंस्टिट्यूशन ऑफ़ इंजीनियर्स, लोकल सेंटर जबलपुर द्वारा गगनचुम्बी भवन (हाई राइज बिल्डिंग) पर १०-११ अगस्त २०१३ को आयोजित अखिल भारतीय संगोष्ठी  की स्मारिका में प्रकाशित कुछ दोहे।]

*
भवन मनुज की सभ्यता, ईश्वर का वरदान।
रहना चाहें भवन में, भू पर आ भगवान।१।
*
भवन बिना हो जिंदगी, आवारा-असहाय।
अपने सपने ज्यों 'सलिल', हों अनाथ-निरुपाय।२।
*
मन से मन जोड़े भवन, दो हों मिलकर एक।
सब सपने साकार हों, खुशियाँ मिलें अनेक।३।
*
भवन बचाते ज़िन्दगी, सड़क जोड़ती देश।
पुल बिछुडों को मिलाते, तरु दें वायु हमेश।४।
*
राष्ट्रीय संपत्ति पुल, सड़क इमारत वृक्ष।
बना करें रक्षा सदा, अभियंतागण दक्ष।५।
*
भवन सड़क पुल रच बना, आदम जब इंसान।
करें देव-दानव तभी, मानव का गुणगान।६।
*
कंकर को शंकर करें, अभियंता दिन-रात।
तभी तिमिर का अंत हो, उगे नवल प्रभात७।
*
भवन सड़क पुल से बने, देश सुखी संपन्न।
भवन सेतु पथ के बिना, होता देश विपन्न।८।
*
इमारतों की सुदृढ़ता, फूंके उनमें जान।
देश सुखी-संपन्न हो, बढ़े विश्व में शान।९।
*
भारत का नव तीर्थ है, हर सुदृढ़ निर्माण।
स्वेद परिश्रम फूँकता, निर्माणों में प्राण।१०।
*
अभियंता तकनीक से, करते नव निर्माण।
होता है जीवंत तब, बिना प्राण पाषाण।११।
*
भवन सड़क पुल ही रखें, राष्ट्र-प्रगति की नींव।
सेतु बना- तब पा सके, सीता करुणासींव।१२।
*
करे इमारत को सुदृढ़, शिल्प-ज्ञान-तकनीक।
लगन-परिश्रम से बने, बीहड़ में भी लीक।१३।
*
करें कल्पना शून्य में, पहले फिर साकार।
आंकें रूप अरूप में, यंत्री दे आकार।१४।
*
सिर्फ लक्ष्य पर ही रखें, हर पल अपनी दृष्टि।
अभियंता-मजदूर मिल, रचें नयी नित सृष्टि।१५।
*
सडक देश की धड़कनें, भवन ह्रदय पुल पैर।
वृक्ष श्वास-प्रश्वास दें, कर जीवन निर्वैर।१६।
*
भवन सेतु पथ से मिले, जीवन में सुख-चैन।
इनकी रक्षा कीजिए, सब मिलकर दिन-रैन।१७।
*
काँच न तोड़ें भवन के, मत खुरचें दीवार।
याद रखें हैं भवन ही, जीवन के आगार।१८।
*
भवन न गन्दा हो 'सलिल', सब मिल रखें खयाल।
कचरा तुरत हटाइए, गर दे कोई डाल।१९।
*
भवनों के चहुँ और हों, ऊँची वृक्ष-कतार।
शुद्ध वायु आरोग्य दे, पायें ख़ुशी अपार।२०।
*
कंकर से शंकर गढ़े, शिल्प ज्ञान तकनीक।
भवन गगनचुम्बी बनें, गढ़ सुखप्रद नव लीक।२१।
*
वहीं गढ़ें अट्टालिका जहाँ भूमि मजबूत।
जन-जीवन हो सुरक्षित, खुशियाँ मिलें अकूत।२२।
*
ऊँचे भवनों में रखें, ऊँचा 'सलिल' चरित्र।
रहें प्रकृति के मित्र बन, जीवन रहे पवित्र।२३।
*
रूपांकन हो भवन का, प्रकृति के अनुसार।
अनुकूलन हो ताप का, मौसम के अनुसार।२४।
*
वायु-प्रवाह बना रहे, ऊर्जा पायें प्राण।
भवन-वास्तु शुभ कर सके, मानव को सम्प्राण।२५।