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सोमवार, 31 अगस्त 2026

अगस्त ३१, फार्माकोग्नोसी, सॉनेट, दोहा, ट्विन टॉवर, बुन्देली, निमाड़ी, माहिया, हाइकु, ककुप, गीत, कल्पना


सलिल सृजन अगस्त ३१ 
*
द्विपदी 
शेष रिश्ते चाय चालू जानिए 
दोस्ती को चाय 'पेशल मानिए 
दोस्त न हर परिचित को बोलें 
मन न सामने सबके खोलें 
दोस्त वही जो दोस्त के दुख में देता साथ 
सिर्फ सुखों में साथ जो थाम न उसका हाथ 
३१.८.२०२६ 
००० 
प्राकृतिक-औषधि विज्ञान (फार्माकोग्नोसी)
प्राकृतिक औषधि विज्ञान क्या है?
प्रकृति का निर्माण पाँच तत्वों अग्नि, आकाश, हवा, धरती और पानी से हुआ है। ये पाँचों तत्व हर पदार्थ और हर जीव में मौजूद होते हैं। इनका असंतुलन रोगों का कारण होता है। इन्हें संतुलित कर रोग को दूर किया जा सकता है। प्रकृति से प्राप्त अकृत्रिम पदार्थों व जीवों अथवा उनसे प्राप्त पदार्थों का अध्ययन, विश्लेषण व परीक्षण कर उनके प्रभाव को जानने की विधा का नाम प्राकृतिक- औषधि विज्ञान (फार्माकोग्नोसी) है।
प्राकृतिक औषधि विज्ञान में पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, मिट्टी-पत्थरों, खनिजों आदि का परीक्षण कर उनसे बनाई गई औषधियों के प्रभावों का विधिवत अध्ययन किया जाता है।
प्राकृतिक औषधि विज्ञान : जन्म और विकास
प्राकृतिक उपादानों के उपयोग व उनसे रोग निवारण की समझ मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षियों में भी पाई गई है।
कब्ज़ होने पर शेर, कुत्ते आदि घास खाते देखे गए हैं। पक्षी बेस्वाद, सड़े-गले, हानिप्रद फल नहीं खाते जबकि पके फल खा लेते हैं। प्राकृतिक- औषधि पहचानने और सेवन करने की प्रवृत्ति आदिमानवों, आदिवासियों तथा ग्रामीणों में पीढ़ी दर पीढ़ी विकसित होती रही है। ऋषि-मुनियों के आश्रमों में प्राकृत औषध विज्ञान का विकास हुआ। आयुर्विज्ञान संबंधी ग्रंथों में आयुर्वेद महत्वपूर्ण है। वेद पूर्व, वैदिक तथा वेदोत्तर काल में प्राकृतिक-औषधियों का व्यवस्थित अध्ययन व शोध कार्य हुआ। आधुनिक काल में विज्ञान की उन्नति विदेशों विशेषकर पश्चिम में हुई।
000 
दोहा सलिला
कल था कल आता नहीं, जो करना कर आज।
कल कल करते कल न हो, कलकल सुन कर काज।।
अकल अ कल हो विकल है, नकल न देती साथ।
किलकिल कर गुमसुम शकल, रुके हाथ नत माथ।।
खुद को दुहराता सदा, कहते हैं इतिहास।
कल फिर कल आ आज हो, विरह मिलन दें हास।।
३१.८.२०२४
सॉनेट
*
थोथा चना बाजे घना
जोर-जोर से रेंके गधा
भले रहे खूंटे से बँधा
जो न जानता रहता तना।
पहले पढ़ो-लिखो-सोचो
बिना जरूरत मत बोलो
यदि बोलो पहले तोलो
कहा न कुछ बेमतलब हो
लाखों की है बंद जुबान
पहचानो बातों का मोल
ज़हर-अमिय सकती है घोल
करो नहीं नाहक अभिमान
बिना बात कर वाद-विवाद
खुद को करों नहीं बर्बाद
२९-८-२०२२
***
विमर्श : ट्विन टॉवर ध्वंस
वॉटरफॉल = झरना जिसमें पानी बिना रुके सीधे नीचे गिरता है।
इम्पलोड = फटना, इम्प्लोजन = विस्फोट।
वॉटरफॉल इम्प्लोजन = गगनचुंबी इमारत में इस तरह विस्फोट करना की मलबा बिना बिखरे झरने की धार की तरह सीधे नीचे गिरे।
वाटरफॉल इंप्लोजन तकनीक का मतलब है कि मलबा सचमुच पानी की तरह गिरेगा. इम्प्लोजन ऐसे शहरी विस्फोट के लिए उपयोग की जाने वाली विधि है जिसे नियंत्रित विस्फोटों की आवश्यकता होती है.
नोएडा (Noida) में सुपरटेक ट्विन टावरों (Supertec twin tower) के विस्फोट की उलटी गिनती शुरू होने के साथ ही अंतिम जांच चल रही है. टावरों को सुरक्षित रूप से जमीन पर गिराने की जरूरत है. इसका मतलब है कि आसपास की इमारतों को कम से कम नुकसान सुनिश्चित करना है जिसमें 5,000 लोग रहते हैं, जो मुश्किल से 9 मीटर दूर हैं. इस अत्यंत सटीक कार्य के लिए विस्फोट विशेषज्ञों का जवाब एक तकनीक है जिसे 'वाटरफॉल इम्प्लोजन' (waterfall implosion) के रूप में जाना जाता है. वाटरफॉल तकनीक का मतलब है कि मलबा सचमुच पानी की तरह गिरेगा. इम्प्लोजन ऐसे शहरी विस्फोट के लिए उपयोग की जाने वाली विधि है जिसे नियंत्रित विस्फोटों की आवश्यकता होती है. इसके विपरीत, एक विस्फोट के परिणामस्वरूप मलबा दूर-दूर दिशाओं में बह जाएगा. एक और कहावत यह है कि 'ताश का घर' कैसे गिरता है. नियंत्रित विस्फोट कुछ ही सेकंड में 55,000 टन बड़े पैमाने पर मलबे को नीचे लाएगा. साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि टावर को ढहाते समय कोई अन्य क्षति तो नहीं हो रही है.
नोएडा ट्विन टावर गिराने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा सटीक दृष्टिकोण
इस तकनीक को भारत में उस समय प्रयोग किया गया था जब उसी कंपनी ने 2020 में कोच्चि में 4 ऊंची इमारतों को ध्वस्त कर दिया था. वही प्रयोग 15 सेकंड से भी कम समय में ट्विन टावरों को ढहा देगी. पूरी टीम 150 प्रतिशत आश्वस्त है कि ढांचा उस दिशा में और सटीक तरीके से नीचे गिरेंगी, जिस तरह से उन्होंने बड़े पैमाने पर विध्वंस की परिकल्पना की है. विस्फोट में एक ढांचा अपने आप में गिर जाती है. तकनीक गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांतों का उपयोग करती है. यह ढांचों के आधार को इस तरह से हटा देगा कि गुरुत्वाकर्षण का केंद्र मिलीमीटर से शिफ्ट हो जाए, जिससे ढांचा नीचे आ जाए.
दोनों टावरों को ढहाने के लिए 3700 किलो विस्फोटक
विध्वंस टीम के एक इंजीनियर के हवाले से कहा गया, "गुरुत्वाकर्षण कभी नहीं सोता है. यह पूरे दिन और पूरी रात काम करता है. यह विस्फोट का पूरा विचार है. उन्होंने कहा, "विध्वंस की इस पद्धति के लिए कोई संदर्भ पुस्तक नहीं है. इसे करने का कोई विशेष तरीका नहीं है या इसे कैसे करना है, इस पर दुनिया में कहीं भी कोई शब्द नहीं लिखा गया है. यह केवल व्यक्तियों के कौशल और इसे करने के उनके अनुभवों पर निर्भर करता है. सटीक कार्य के हिस्से के रूप में 2.634 मिलीमीटर मापने वाले 9,640 छेद जो कि अंतिम दशमलव अंक के लिए सटीक हैं, को 3,700 किलोग्राम विस्फोटक के लिए टावरों में ड्रिल किया गया है जो इसे विस्फोट कर देगा. कई स्थानों पर उच्च और निम्न गति वाले कैमरों जैसे उपकरण टीम द्वारा घटना के बाद के विश्लेषण के लिए विध्वंस को कैप्चर करेंगे. पैसे से ज्यादा टीम हाथ में बड़े पैमाने पर उपलब्धि के साथ अपनी प्रतिष्ठा को दांव पर लगाती है.
क्या विध्वंस से आस-पास की इमारतों को कोई नुकसान होगा?
विस्फोटक टीम ने आश्वासन दिया कि कोई संरचनात्मक क्षति नहीं होगी. अधिक से अधिक पेंट और प्लास्टर या टूटी खिड़कियों में कुछ कॉस्मेटिक दरारें होंगी जहां वे पहले से ही कमजोर हो गई हैं या ढीली हो गई हैं. मलबे को हटाने के लिए ठेकेदारों की पहले से ही व्यवस्था कर ली गई है. रविवार को 2:30 बजे पुलिस की मंजूरी के बाद विस्फोट किया जाएगा. सफाई कर्मचारियों की सहायता के लिए यांत्रिक स्वीपिंग मशीन, एंटी-स्मॉग गन और पानी के छिड़काव के साथ धूल साफ करने की व्यवस्था की गई है.
३१-८-२०२२
***
निमाड़ी दोहा सलिला
*
सिंदूरी सुभ भोर छे, चटक दुफेरी धूप।
संझा सरस सुहावणी,रात रूपहलो रूप।।
*
खेती बाड़ी बावड़ी, अमरित पाणी सीच।
ठुमका प$ ओरावणी, नाच सयाणी मीच।।
*
सूनी गोद भरावणी, संजा चारइ पूज
बरसूद् या खs लावणी, हिवड़ा कहीं न दूज
*
दाणी मइया नरबदा, पाणी अमरित धार
माणी घऊँ जुआर दs, धाणी जीवन सार।।
*
सांस-सांस मं$ हर घड़ी,अमर प्यार का बोल
परकम्मा कर पुन्न लइ, चल्या टोळ का टोळ।।
*
बुन्देली दोहे
महुआ फूरन सों चढ़ो, गौर धना पे रंग।
भाग सराहें पवन के, चूम रहो अॅंग-अंग।।
मादल-थापों सॅंग परंे, जब गैला में पैर।
धड़कन बाॅंकों की बढ़े, राम राखियो खैर।।
हमें सुमिर तुम हो रईं, गोरी लाल गुलाल।
तुमें देख हम हो रए, कैसें कएॅं निहाल।।
मन म्रिदंग सम झूम रौ, सुन पायल झंकार।
रूप छटा नें छेड़ दै, दिल सितार कें तार।।
नेह नरमदा में परे, कंकर घाईं बोल।
चाह पखेरू कूक दौ, बानी-मिसरी घोल।।
सैन धनुस लै बेधते, लच्छ नैन बन बान।
निकरन चाहें पै नईं, निकर पा रए प्रान।।
तड़प रई मन मछरिया, नेह-नरमदा चाह।
तन भरमाना घाट पे, जल जल दे रौ दाह।।
अंग-अंग अलसा रओ, पोर-पोर में पीर।
बैरन ननदी बलम सें, चिपटी छूटत धीर।।
कोयल कूके चैत मा, देख बरे बैसाख।
जेठ जिठानी बिन तपे, सूरज फेंके आग।।
३१-८-२०१९
***
एकाक्षरी द्विपदी
*
भूल भुलाई, भूल न भूली, भूलभुलैयां भूली भूल.
भुला न भूले भूली भूलें, भूल न भूली भाती भूल.
*
***
एकाक्षरी दोहा
*
न नोननुन्नो नुन्नोनो नाना नानानना ननु। 
नुन्नोअ्नुन्नो ननुन्नेनो नानेना नुन्ननुन्ननुत।। 

अर्थ: इस श्लोक का अर्थ बहुत ही गहरा और वीरता से भरा हुआ है:जो मनुष्य अपने से दुर्बल या हारे हुए इंसान से हार गया है, वह वास्तव में मनुष्य (वीर) नहीं है।
इसी तरह, अपने से श्रेष्ठ या वीर पुरुष के द्वारा हराया गया व्यक्ति भी पराजित नहीं माना जाता (क्योंकि उसने वीर से युद्ध किया)।
जिसका स्वामी (नेता) पराजित न हुआ हो, वह सैनिक कभी हारा हुआ नहीं कहलाता।
जो वीर पुरुषों को घायल या पराजित करता है, वह व्यक्ति वास्तव में पाप रहित (निर्दोष) होता है।
महर्षि भारवि, किरातार्जुनीयम सर्ग १५, श्लोक १४ 
***
माहिया
फागों की तानों से
मन से मन मिलते
मधुरिम मुस्कानों से
*
ककुप
मिल पौधे लगाइए
वसुंधरा हरी-भरी बनाइये
विनाश को भगाइए
*
हाइकु
गाओ कबीर
बुरा न माने कोई
लगा अबीर
३१-८-२०१७
***
द्विपदियों में कल्पना
*
कल्पना की विरासत जिसको मिली
उस सरीखा धनी दूजा है नहीं
*
कल्पना की अल्पना गृह-द्वार पर
डाल देखो सुखों का हो सम्मिलन
*
कल्पना की तूलिका, रंग शब्द के
भाव चित्रों में झलकती ज़िन्दगी
*
कल्पना उड़ चली फैला पंख जब
सच कहूँ?, आकाश छोटा पड़ गया
*
कल्पना कंकर को शंकर कर सके
चाह ले तो कर सके विपरीत भी
*
कल्पना से प्यार करना है अगर
आप अवसर को कभी मत चूकिए
*
कल्पना की कल्पना कैसे करे?
प्रश्न का उत्तर न खोजे भी मिला
*
कल्पना सरिता बदलती रूप नित
कभी मन्थर, चपल जल प्लावित कभी
*
कल्पना साकार होकर भी विनत
'सलिल' भट नागर यही है, मान लो
*
कल्पना की शरण जा कवि धन्य है
गीत दोहे ग़ज़ल रचकर गा सका
*
कल्पना मेरी हक़ीक़त हो गयी
नर्मदा अवगाह कर सुख पा लिया
*
कल्पना को बाँह में भर, चूमकर
कोशिशों ने मंज़िलें पायीं विहँस
*
कल्पना नाचीज़ है यह सत्य है
चीज़ तो बेजान होती है 'सलिल'
*
३१-८-२०१६
वीणा की झंकार में, सच है अन्तर्व्याप्त
बहारों के संसार में, व्यर्थ वचन हैं आप्त
***
मुक्तिका:
*
ये शायरी जबां है किसी बेजुबान की.
ज्यों महकती क्यारी हो किसी बागबान की..
आकाश की औकात क्या जो नाप ले कभी.
पाई खुशी परिंदे ने पहली उड़ान की..
हमको न देखा देखकर तुमने तो क्या हुआ?
दिल ले गया निशानी प्यार के निशान की..
जौहर किया या भेज दी राखी अतीत ने.
हर बार रही बात सिर्फ आन-बान की.
उससे छिपा न कुछ भी रहा कह रहे सभी.
किसने कभी करतूत कहो खुद बयान की..
रहमो-करम का आपके सौ बार शुक्रिया.
पीछे पड़े हैं आप, करूँ फ़िक्र जान की..
हम जानते हैं और कोई कुछ न जानता.
यह बात है केवल 'सलिल' वहमो-गुमान की..
३१-८-२०११
***
गीत :
स्वागत है...
*
पीर-दर्द-दुःख-कष्ट हमारे द्वार पधारो स्वागत है.
हम बिगड़े हैं जनम-जनम के, हमें सुधारो स्वागत है......
*
दिव्य विरासत भूल गए हम, दीनबंधु बन जाने की.
रूखी-सूखी जो मिल जाए, साथ बाँटकर खाने की..
मुट्ठी भर तंदुल खाकर, त्रैलोक्य दान कर देते थे.
भार भाई, माँ-बाप हुए, क्यों सोचें गले लगाने की?..
संबंधों के अनुबंधों-प्रतिबंधों तुम पर लानत है.
हम बिगड़े हैं जनम-जनम के, हमें सुधारो स्वागत है......
*
सात जन्म तक साथ निभाते, सप्त-पदी सोपान अमर.
ले तलाक क्यों हार रहे हैं, श्वास-आस निज स्नेह-समर?
मुँह बोले रिश्तों की महिमा 'सलिल' हो रही अनजानी-
मनमानी कलियों सँग करते, माली-काँटे, फूल-भ्रमर.
सत्य-शांति, सौन्दर्य-शील की, आयी सचमुच शामत है.
हम बिगड़े हैं जनम-जनम के, हमें सुधारो स्वागत है......
*
वसुधा सकल कुटुंब हमारा, विश्व नीड़वत माना था.
सबके सुख, कल्याण, सुरक्षा में निज सुख अनुमाना था..
सत-शिव-सुन्दर रूप स्वयं का, आज हो रहा अनजाना-
आत्म-दीप बिन त्याग-तेल, तम निश्चय हम पर छाना था.
चेत न पाया व्हेतन मन, दर पर विनाश ही आगत है.
हम बिगड़े हैं जनम-जनम के, हमें सुधारो स्वागत है......
*
पंचतत्व के देवों को हम दानव बनकर मार रहे.
प्रकृति मातु को भोग्या कहकर, अपनी लाज उघार रहे.
धैर्य टूटता काल-चक्र का, असगुन और अमंगल नित-
पर्यावरण प्रदूषण की हर चेतावनी बिसार रहे.
दोष किसी को दें, विनाश में अपने स्वयं 'सलिल' रत हैं.
हम बिगड़े हैं जनम-जनम के, हमें सुधारो स्वागत है......
***
गीत
आपकी सद्भावना में
*
आपकी सद्भावना में कमल की परिमल मिली.
हृदय-कलिका नवल ऊष्मा पा पुलककर फिर खिली.....
*
उषा की ले लालिमा रवि-किरण आई है अनूप.
चीर मेघों को गगन पर है प्रतिष्टित दैव भूप..
दुपहरी के प्रयासों का करे वन्दन स्वेद-बूँद-
साँझ की झिलमिल लरजती, रूप धरता जब अरूप..
ज्योत्सना की रश्मियों पर मुग्ध रजनी मनचली.
हृदय-कलिका नवल आशा पा पुलककर फिर खिली.....
*
है अमित विस्तार श्री का, अजित है शुभकामना.
अपरिमित है स्नेह की पुष्पा-परिष्कृत भावना..
परे तन के अरे! मन ने विजन में रचना रची-
है विदेहित देह विस्मित अक्षरी कर साधना.
अर्चना भी, वंदना भी, प्रार्थना सोनल फली.
हृदय-कलिका नवल ऊष्मा पा पुलककर फिर खिली.....
*
मौन मन्वन्तर हुआ है, मुखरता तुहिना हुई.
निखरता है शौर्य-अर्णव, प्रखरता पद्मा कुई..
बिखरता है 'सलिल' पग धो मलिनता को विमल कर-
शिखरता का बन गयी आधार सुषमा अनछुई..
भारती की आरती करनी हुई सार्थक भली.
हृदय-कलिका नवल ऊष्मा पा पुलककर फिर खिली.....
***
गीत
पुकार
*
आजा, जल्दी से घर आजा, भटक बाँवरे कहाँ रहा?
तुझसे ज्यादा विकल रही माँ, मुझे बता तू कहाँ रहा?...
जहाँ रहा तू वहाँ सफल था, सुन मैं गर्वित होती थी.
सबसे मिलकर मुस्काती थी, हो एकाकी रोती थी..
आज नहीं तो कल आएगा कैयां तुझे सुलाऊँगी-
मौन-शांत थी मन की दुनिया में सपने बोती थी.
कान्हा सम तू गया किन्तु मेरी यादों में यहाँ रहा.
आजा, जल्दी से घर आजा, भटक बाँवरे कहाँ रहा?
तुझसे ज्यादा विकल रही माँ, मुझे बता तू कहाँ रहा?...
*
दुनिया कहती बड़ा हुआ तू, नन्हा ही लगता मुझको .
नटखट बाल किशन में मैंने पाया है हरदम तुझको..
दुनिया कहती अचल मुझे तू चंचल-चपल सुहाता है-
आँचल-लुकते, दूर भागते, आते दिखता तू मुझको.
आ भी जा ओ! छैल-छबीले, ना होकर भी यहाँ रहा.
आजा, जल्दी से घर आजा, भटक बाँवरे कहाँ रहा?
तुझसे ज्यादा विकल रही माँ, मुझे बता तू कहाँ रहा?...
*
भारत मैया-हिन्दी मैया, दोनों रस्ता हेर रहीं.
अब पुकार सुन पाया है तू, कब से तुझको टेर रहीं.
कभी नहीं से देर भली है, बना रहे आना-जाना
सारी धरती तेरी माँ है, ममता-माया घेर रहीं?
मेरे दिल में सदा रहा तू, निकट दूर तू जहाँ रहा.
आजा, जल्दी से घर आजा, भटक बाँवरे कहाँ रहा?
तुझसे ज्यादा विकल रही मैं, मुझे बता तू कहाँ रहा?...
***
नवगीत
आराम चाहिए.....
*
हम भारत के जन-प्रतिनिधि हैं
हमको हर आराम चाहिए.....
*
प्रजातंत्र के बादशाह हम,
शाहों में भी शहंशाह हम.
दुष्कर्मों से काले चेहरे
करते खुद पर वाह-वाह हम.
सेवा तज मेवा के पीछे-
दौड़ें, ऊँचा दाम चाहिए.
हम भारत के जन-प्रतिनिधि हैं
हमको हर आराम चाहिए.....
*
पुरखे श्रमिक-किसान रहे हैं,
मेहनतकश इन्सान रहे हैं.
हम तिकड़मी,घोर छल-छंदी-
धन-दौलत अरमान रहे हैं.
देश भाड़ में जाये हमें क्या?
सुविधाओं संग काम चाहिए.
हम भारत के जन-प्रतिनिधि हैं
हमको हर आराम चाहिए.....
*
स्वार्थ साधते सदा प्रशासक.
शांति-व्यवस्था के खुद नाशक.
अधिनायक हैं लोकतंत्र के-
हम-वे दुश्मन से भी घातक.
अवसरवादी हैं हम पक्के
लेन-देन बेनाम चाहिए.
हम भारत के जन-प्रतिनिधि हैं
हमको हर आराम चाहिए.....
*
सौदे करते बेच देश-हित,
घपले-घोटाले करते नित.
जो चाहो वह काम कराओ-
पट भी अपनी, अपनी ही चित.
गिरगिट जैसे रंग बदलते-
हमको ऐश तमाम चाहिए.
हम भारत के जन-प्रतिनिधि हैं
हमको हर आराम चाहिए.....
*
वादे करते, तुरत भुलाते.
हर अवसर को लपक भुनाते.
हो चुनाव तो जनता ईश्वर-
जीत उन्हें ठेंगा दिखलाते.
जन्म-सिद्ध अधिकार लूटना
'सलिल' स्वर्ग सुख-धाम चाहिए.
हम भारत के जन-प्रतिनिधि हैं
हमको हर आराम चाहिए.....
***
गीत:
है हवन-प्राण का.........
*
है हवन-प्राण का, तज दूरियाँ, वह एक है .
सनातन सम्बन्ध जन्मों का, सुपावन नेक है.....
*
दीप-बाती के मिलन से, जगत में मनती दिवाली.
अंशु-किरणें आ मिटातीं, अमावस की निशा काली..
पूर्णिमा सोनल परी सी, इन्द्रधनुषी रंग बिखेरे.
आस का उद्यान पुष्पा, ॐ अभिमंत्रित सवेरे..
कामना रथ, भावना है अश्व, रास विवेक है.
है हवन-प्राण का..........
*
सुमन की मनहर सुरभि दे, जिन्दगी हो अर्थ प्यारे.
लक्ष्मण-रेखा गृहस्थी, परिश्रम सौरभ सँवारे..
शांति की सुषमा सुपावन, स्वर्ग ले आती धरा पर.
आशुतोष निहारिका से, नित प्रगट करता दिवाकर..
स्नेह तुहिना सा विमल, आशा अमर प्रत्येक है..
है हवन-प्राण का..........
*
नित्य मन्वंतर लिखेगा, समर्पण-अर्पण की भाषा.
साधन-आराधना से, पूर्ण होती सलिल-आशा..
गमकती पूनम शरद की, चकित नेह मयंक है.
प्रयासों की नर्मदा में, लहर-लहर प्रियंक है..
चपल पथ-पाथेय, अंश्चेतना ही टेक है.
है हवन-प्राण का..........
*
बाँसुरी की रागिनी, अभिषेक सरगम का करेगी.
स्वरों की गंगा सुपावन, भाव का वैभव भरेगी..
प्रकृति में अनुकृति है, नियंता की निधि सुपावन.
विधि प्रणय की अशोका है, ऋतु वसंती-शरद-सावन..
प्रतीक्षा प्रिय से मिलन की, पल कठिन प्रत्येक है.
है हवन-प्राण का..........
*
श्वास-सर में प्यास लहरें, तृप्ति है राजीव शतदल.
कृष्णमोहन-राधिका शुभ साधिका निशिता अचंचल..
आन है हनुमान की, प्रतिमान निष्ठा के रचेंगे.
वेदना के, प्रार्थना के, अर्चन के स्वर सजेंगे..
गँवाने-पाने में गुंजित भाव का उन्मेष है.
है हवन-प्राण का..........
३१-८-२०१०
***

रविवार, 30 अगस्त 2026

अगस्त ३०, संजय, समीक्षा, सॉनेट, छंद, हरिगीतिका, दोहा, निमाड़ी, दोहा, नवगीत, मुक्तक

सलिल सृजन अगस्त ३०
*
संजय
संजय जो देखे 
वह सच कह
सब जग को 
करता आगाह।
कोई गैर न, 
सब अपने हैं, 
अपनापन ही
सबकी चाह।
सुख कर वितरित
दुख समेट लो, 
बेहतर हो
जीवन की राह।
हर तन-मन में
प्रभु का डेरा, 
कौन इस सके 
किसकी थाह? 
*
विमर्श:
पुस्तक समीक्षा
पुस्तक समीक्षा हमेशा कथ्य को केंद्र में रखकर होनी चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं होता। अक्सर देखने को मिलता है कि समीक्षक लेखक की पहचान, राजनीतिक विचारधारा, निजी संबंध आदि को केंद्र में रखकर समीक्षा लिखते हैं। यहाँ तक कि स्वयं दर्शक बनकर अपनी निजी भावनाओं को केंद्र में रखकर भी समीक्षा लिखी जाती है।
नतीजा यह है कि किसी पुस्तक के विमोचित होने के बाद हम जो चर्चाएँ पढ़ते हैं, उनमें से अधिकांश में यही बातें होती हैं- पुस्तक के लेखक व पात्र कौन हैं, प्रकाशन किसका है, कितने पृष्ठों की है, आवरण कैसा है, छपाई कैसी हुई है, पुस्तक में क्या कहा गया है आदि लेकिन पुस्तक की विधा के मानकों, भाषा शैली, मौलिकता, विषय पर पूर्व कृतियों, प्रामाणिकता, समाज को संदेश आदि पक्षों पर चर्चा बहुत कम होती है।
भारत में पुस्तक समीक्षा के क्षेत्र में प्रचलित ५ प्रमुख प्रवृत्तियाँ हैं।
१. भावनात्मक समीक्षा: इस तरह की समीक्षा का मुख्य विषय भावना होती है। समीक्षक पुस्तक पढ़कर रोया, हँसा, भावुक हुआ, पुरानी यादों में खो गया, आश्चर्यचकित हुआ, देशभक्ति से अभिभूत हुआ या पुस्तक को अपनी किसी निजी स्मृति से जोड़ दिया, यही समीक्षा का आधार बन जाता है। ऐसी समीक्षा में समीक्षक लिखता है “मैं पुस्तक पढ़कर रो पड़ा।”, ''ऐसी पुस्तक पहले कभी नहीं लिखी गई।”, “इस पुस्तक ने भूला समय याद दिल दिया।” आदि।
भावना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। लेकिन जब भावना ही विश्लेषण का एकमात्र साधन बन जाती है, तब पुस्तक के कथ्य पर चर्चा पृष्ठभूमि में चली जाती है।
२. लोकप्रिय समीक्षा: सोशल मीडिया के दौर में यह सबसे शक्तिशाली प्रवृत्ति है। ऐसी समीक्षा का उद्देश्य पुस्तक को समझना नहीं, बल्कि तेजी से एक राय बनाना होता है। जरूर पढ़ें, अद्वितीय, निरर्थक, साधुवाद, कालजयी आदि शब्द ही समीक्षा की भाषा बन जाते हैं। एकाएक अपनी निर्णय सुनाकर पाठकों को प्रभावित करने की प्रवृत्ति बढ़ गई है। ऐसी स्थिति में पुस्तक समीक्षा सोशल मीडिया के एल्गोरिद्म पर निर्भर हो जाती है, जितने अधिक शेयर और व्यू, उतना अधिक प्रचार और उतनी ही अधिक स्वीकार्यता। कुछ पत्रकार या समीक्षक पैसे लेकर पुस्तक के प्रचार के हिस्से के रूप में इस तरह की समीक्षाएँ करते हैं। कई बार गहरे विश्लेषण की तुलना में तत्काल प्रतिक्रिया को दर्शक तैयार करने के हथियार के रूप में अधिक महत्व दिया जाता है। कभी-कभी पाठक भी पुस्तक पढ़ने से पहले समीक्षा नहीं, बल्कि फैसला चाहते हैं।
३. पत्रकारिता-आधारित समीक्षा: पत्र-पत्रिकाओं और और ऑनलाइन पोर्टलों में प्रकाशित समीक्षाओं का एक बड़ा हिस्सा इस श्रेणी में आता है।इन समीक्षाओं में पुस्तक से जुड़ी विभिन्न जानकारियाँ- कथ्य क्या है, पात्र कौन-कौन हैं, विषय विश्लेषण कैसा था, विमोचन की तारीख क्या है, पाठकों की प्रतिक्रिया कैसी है, लेखक का क्या कहना है आदि को प्राथमिकता दी जाती है। समस्या यह है कि इस तरह की समीक्षा वास्तव में पुस्तक समीक्षा नहीं, बल्कि सूचना संग्रह मात्र है। सूचना महत्वपूर्ण है, लेकिन क्या सूचना और समीक्षा एक ही चीज हैं?
४. भक्ति समीक्षा: संभवतः यह समीक्षा की सबसे खतरनाक प्रवृत्ति है। इसमें समीक्षक वास्तव में समीक्षक नहीं होता, बल्कि लेखक का एक प्रशंसक होता है। उसके पसंदीदा लेखक कुछ भी लिखे, वह समीक्षक को पढ़ने से पहले से ही असाधारण प्रतीत होता है। समीक्षक को कृति में अच्छाई के अलावा बुराई कभी दिखाई नहीं देती। ऐसी समीक्षा में खामियाँ नजर नहीं आतीं, कमजोरियों का उल्लेख नहीं किया जाता और सवाल नहीं उठाए जाते। इसके बजाय समीक्षा की भाषा केवल प्रशंसा की भाषा बन जाती है। कई बार यह सांस्कृतिक जनसंपर्क का काम करती है। भक्ति-आधारित समीक्षा साहित्य जगत के विकास में बड़ी बाधा पैदा करती है, क्योंकि लेखक को फिर यह एहसास ही नहीं होता कि उसमें सुधार की कोई जरूरत है।
५. गुरु-विद्या समीक्षा: इसमें किसी पुस्तक का मूल्यांकन इस सवाल के आधार पर किया जाता है कि वह किस साहित्य-गुरु की नकल करके लिखी गई है, किस विचार-धारा का अनुसरण करती है, किस स्थापित वाद के पक्ष में जाती है या किस विदेशी सिद्धांत से मेल खाती है। इस तरह की समीक्षा में अक्सर उद्धरणों की संख्या अधिक होती है। निराला, महादेवी, हजारी प्रसाद द्विवेदी, नामवर सिंह, या किसी अन्य प्रतिष्ठित साइटीकार कार का नाम ले लेने भर से मानो विश्लेषण पूरा हो जाता है। ज्ञान निश्चित रूप से आवश्यक है लेकिन जब ज्ञान पुस्तक और समीक्षा को प्रकाशित करने के बजाय उसे ढकने लगे, तब वह समीक्षा नहीं रहती, बल्कि विद्वता का प्रदर्शन बन जाती है।
तो फिर आवश्यकता किस चीज की है?
सबसे अधिक आवश्यकता पुस्तक के कथ्य और भाषा पर आधारित समीक्षा की है, जिसमें पुस्तक को पुस्तक के रूप में देखा और विश्लेषित किया जाए। किसी अंश विशेष ने प्रभाव क्यों पैदा किया?, किसी घटना ने क्या भाव संप्रेषित किया?
लेखकीय विश्लेषण ने प्रसंग के कौन-कौन से पहलू उद्घाटित किए? शब्दों ने पाठकों के साथ कैसा संबंध बनाया?, पारिस्थितिक वर्णन ने दर्शक को किस नैतिक दृष्टिकोण पर खड़ा किया? चरित्र चित्रण ने किस प्रकार की सामाजिक वास्तविकता को व्यक्त किया?
इन सवालों के बिना फिल्म समीक्षा पूर्ण नहीं हो सकती। समीक्षा साहित्य के साथ एक गहरा संवाद है। साहित्य समीक्षा बेहद महत्वपूर्ण विधा है। पुस्तक की भाषा, कथ्य, घटना क्रम, शब्दों में अंतर्निहित भावों की लय, लेखक का दृष्टिकोण या वैचारिक स्थिति जैसे विषयों पर समीक्षाओं में चर्चा बहुत कम दिखाई देती है।
आखिर में सवाल यह है कि आलोचना का अर्थ निराधार निंदा करना नहीं है और न ही अंधी प्रशंसा करना। आलोचना साहित्य के साथ एक गहरा संवाद है। जिस समाज में आलोचना कमजोर होती है, उस समाज में साहित्य भी कमजोर हो जाता है। समय आ गया है कि हम भावना, लोकप्रियता, पत्रकारिता, भक्ति और गुरु-विद्या से आगे बढ़ें और साहित्य को उसकी अपनी भाषा में पढ़ना सीखें।
अंतिम सवाल बहुत सरल है—
क्या हम वास्तव में साहित्य पढ़ते हैं, या पुस्तक के हर पात्र या प्रसंग मरण में खुद को ही खोजते रहते हैं?
३०.८.२०२६
***
दोहा सलिला
रोकर कष्ट न दीजिए, उन्हें गए जो दूर।
आप सदा हँसते रहें, जी चाहा भरपूर।।
*
अभिनव प्रयोग
(संरचना सॉनेट, छंद हरिगीतिका)
हरतालिका
*
हरतालिका व्रत जो करे, शिव की कृपा उसको मिले
मन चाहता जिसको वही, हर जन्म में मनमीत हो
खुश हों उमा गणदेव भी, तन स्वस्थ हो मन भी खिले
व्रत कीजिए शुभकामना रख, प्रीत की तब जीत हो
कर थामिए जिसका उसे, कर दें थमा रख साथ में
जल पीजिए; मत पीजिए पर याद प्रभु को कीजिए
पग साथ ही रखिए सदा, हँस हाथ भी रख हाथ में
मन में रखें शुभ भावना, नित प्रेम रस में भीजिए
मतभेद दे तज द्वैत भी; रख ऐक्य भाव सदा सखे!
कुछ ऊँच हो; कुछ नीच हो, कुछ धूप हो; कुछ छाँव हो
यह प्रार्थना प्रभु जी सुनें, नित साथ ही हमको रखे
कुछ हो; न हो; मन में सदा, शिव औ' शिवा तव ठाँव हो
जब हों बिदा; तन से जुदा, भव को तजें हम नाथ हे!
तब आइए इस आत्म को, परमात्म लें हँस साथ में
***
निमाड़ी दोहा सलिला
*
सिंदूरी सुभ भोर छे, चटक दुपैरी धूप।
रंगीली संझा सरस, रातs सुहाणो रूप।।
*
खेती बाड़ी बावड़ी, अमरित पाणी सीच
ठुमके पर ओरावणी, नाच सयाणी मीच
*
सूनी गोद भरावणी, संजा चारइ पूज
बरसूद् या खs लावणी, हिवड़ा कहीं न दूज
*
दाणी मइया नरबदा, पाणी अमरित धार
धाणी गऊँ जुआर दs, माणी जीवन सार
*
घड़ी-घड़ी खम्माघणी, अमर प्यार के बोल
परिकम्मा कर पुन्न ले, चलाया टोल का टोल
***
चिंतन:
कौन बेहतर नर या नारी?
*
स्त्री विमर्शवादियों का मत है कि स्त्री का हमेशा शोषण किया गया, समानाधिकार नहीं दिया गया। प्रगतिशीलता की चाह अश्लील लेखन, पारिवारिक बिखराव, अंग प्रदर्शन, सहजीवन (लिव इन) तक सीमित रह गई।
पुरुष वर्ग और न्यायालय का आकलन है कि सब कानून स्त्री हितों को दृष्टि में रखकर बनाए गए हैं, प्रताड़ित और पीड़ित पुरुष की हितरक्षा हेतु कोई कानून ही नहीं है।
विवाह को बंधन मानकर नकारने और उन्मुक्त संबंध का दुष्परिणाम बालिका वधुऔर प्रशांत अर्थात स्त्री-पुरुष दोनों के लिए अहितकर रहा है।
साहित्य भ्रमित समाज को दिशा दिखाता है।
भारतीय चिंतन विद्या, धन और शक्ति की अधिष्ठात्री सरस्वती-रमा-उमा को पूजता रहा तो अप्सराओं से प्रणय-विवाह-संतान अधिकार छीननेवाली देव संस्कृति को आदर्श मानता रहा।
धरती को माता और आसमान को पिता मानने का समन्वयपरक चिंतन वेदपूर्व से मान्य रहा है।
तुलसी ने इसी समन्वयवादी दृष्टिकोण को अपनाया। "ढोल गँवार शूद्र पशु नारी, सकल तोड़ना के अधिकारी" को उद्धृत कर तुलसी को नारी-निंदक कहनेवाले भूल जाते हैं कि तुलसी ने अपनी पत्नि द्वारा तिरस्कृत किए जाने के बाद भी "जगत जननि दामिनी सुख दाता / नहिं तव आदि मध्य अफसाना, अमित प्रभाव वेद नहिं जाना" कहकर नारी वंदना की, मीरा का पथ प्रदर्शन किया, रत्नावली को रामभक्ति हेतु प्रेरित किया और रत्नावली आजीवन उन्हें पूजती रहीं।
मैथिलीशरण गुप्त जी के मत में-
एक नही दो दो मात्राएँ,
नर से बढ़कर है नारी।
नर-नारी दोनों की प्रकृति अलग है, स्वभाव अलग है, कार्यशैली अलग है।
दोनों एक-दूसरे के पूरक है, विरोधी नहीं। कुहीं नारी श्रेष्ठ है, कहीं नर।
नर गगन की तरह छाना चाहता है तो नारी धरती की तरह समेटना। नर पाकर खुश होता है, नारी देकर।
रामधारी सिंह दिनकर नर-नारी के मनोवैज्ञानिक अंतर को स्पष्ट करते हैं-
पुरुष चूमते तब जब वे सुख में होते हैं,
हम चूमती उन्हें जब वे दुख में होते हैं।
नर जीतना चाहता है , नारी आत्मसात करना।
जीवन पथ पर कभी तुम जो थके
मैं शीतल जल, बन आउंगी
बुझा सकी ना प्यास तेरी
तो, थके पाँव धो जाऊँगी
नारी प्यार में खो जाना चाहती ,प्यार में , प्रीत में मिट जाने को ही श्रेष्ठ मानती है-
दिया कहे तू सागर, मैं होती तेरी नदिया ,
लहर बहर कर तू अपने, पीया चमन जाती रे ,
सुन मेरे साथी रे
नारी पुरुषार्थ हीन नहीं है, न नर ममतारहित है। नारी का पौरुष और नर की ममता उनकी सुप्त वृत्ति है जो आवश्यकतानुसार प्रगट होती है।
वत्सला से वज्र में
ढल जाऊँगी,
मैं नहीं हिमकण हूँ
जो गल जाऊँगी।
भारतीय चिंतन संघर्ष नहीं समन्वय को इष्ट मानता है। वह सरस्वती, लक्ष्मी, दुर्गा को पूजने में हिचकता नहीं है किंतु इन्हें क्रमश: ब्रह्मा-विष्णु-महेश का अभिन्न अंग मानता है।
हमारे शास्त्रों में भी परमेश्वर अर्थात परम शक्ति की कभी नर रूप में कभी नारी रूप में कल्पना की गई है। वास्तुत: वह शक्ति न तो नर है, न नारी है। उस शक्ति को आश्रयदाता के रूप में नर और पोषक के रूप में नारी कहा है। 'त्वमेव माता च पिता त्वमेव' में यही भाव अंतर्निहित है।
उपनिषद में भी समान अभिव्यक्ति है-
'रुद्रो नर उमा नारी तस्मै तस्यै नमो नमः।
रुद्रो ब्रह्म उमा वाणी तस्मै तस्यै नमो नमः।
रुद्रो विष्णु उमा लक्ष्मी तस्मै तस्यै नमो नमः।'
रुद्र, सूर्य है और उमा उसकी प्रभा है, रुद्र फूल है और उमा उसकी सुगंध है, रुद्र यज्ञ है और उमा उसकी वेदी है।
सृष्टि के मूल में प्रकृति और पुरुष ये दो तत्व हैं। ऐसा सांख्यदर्शन का स्पष्ट मत है।
श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं- 'प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्धयनादी उभावपि।'
प्रकृति और पुरुष दोनों के समन्वय-सहयोग से सृष्टि बनी है।
नर-नारी के अद्वैत को अर्धनारीश्वर (शिवा-शिव, राधा-कृष्ण) के रूप मे वर्णित किया गया है।
पुरुष के अंतःकरण में जब स्त्रीभाव का उदात्तीकरण होता है, तब वह करुणामय, प्रेमपूर्ण वात्सल्यमय बनता है, कवि और कलाकार बनता है, संवेदनाक्षम बनता है। इसी तरह स्त्री में 'पुरुष' जागृत होते ही वह धीर और दृढ़ सावित्री बनती है, उसमें से रणचंडी लक्ष्मीबाई प्रकट होती है।
इसीलिए शास्त्रों में कहा गया है कि स्त्रीत्व और पुरुषत्व के गुण जब एक मानव में होते हैं, तब मानव मे अर्धनारीश्वर प्रकट होते हैं।
२९-८-२०२०
***
कार्यशाला:
चर्चा डॉ. शिवानी सिंह के दोहों पर
*
गागर मे सागर भरें, भरें नयन मे नीर|
पिया गए परदेश तो, कासे कह दे पीर||
तो अनावश्यक, प्रिय के जाने के बाद प्रिया पीर कहना चाहेगी या मन में छिपाना? प्रेम की विरह भावना को गुप्त रखना करुणा को जन्म देता है।
.
गागर मे सागर भरें, भरें नयन मे नीर|
पिया गए परदेश मन, चुप रह, मत कह पीर||
*
सावन भादव तो गया गई सुहानी तीज|
कौनो जतन बताइए साजन जाए पसीज||
साजन जाए पसीज = १२
सावन-भादों तो गया, गई सुहानी तीज|
कुछ तो जतन बताइए, साजन सके पसीज||
*
प्रेम विरह की आग मे, झुलस गई ये गात|
मिलन भई ना सांवरे उमर चली बलखात||
गात पुल्लिंग है., सांवरा पुल्लिंग, गई एकवचन, ये बहुवचन, नारी देह की विशेषता उसकी कोमलता है, 'ये' तो कठोर भी हो सकता है.
प्रेम-विरह की आग में, झुलस गया मृदु गात|
किंतु न आया साँवरा, उमर चली बलखात||
*
प्रियतम तेरी याद में झुलस गई ये नार|
नयन बहे जो रात दिन भया समुन्दर खार||
.
प्रियतम! तेरी याद में, मुरझी मैं कचनार|
अश्रु बहे जो रात-दिन, हुआ समुन्दर खार||
कचनार में श्लेष एक पुष्प, कच्ची उम्र की नारी,
नयन नहीं अश्रु बहते हैं, जलना विरह की अंतिम अवस्था है, मुरझाना से सदी विरह की प्रतीति होती है।
*
अब तो दरस दिखाइए, क्यों है इतनी देर?
दर्पण देखूं रूप भी ढले साँझ की बेर|
क्यों है इतनी देर में दोषारोपण कर कारण पूछता है। दर्पण देखना सामान्य क्रिया है, इसमें उत्कंठा, ऊब, खीझ किसी भाव की अभिव्यक्ति नहीं है। रूप भी अर्थात रूप के साथ कुछ और भी ढल रहा है, वह क्या है?
.
अब तो दरस दिखाइए, सही न जाए देर.
रूप देख दर्पण थका, ढली साँझ की बेर
सही न जार देर - बेकली का भाव, रूप देख दर्पण थका श्लेष- रूप को बार-बार देखकर दर्पण थका, दर्पण में खुद को बार-बार देखकर रूप थका
*
टिप्पणी- १३-११ मात्रावृत्त, पदादि-चरणान्त व पदांत का लघु गुरु विधान-पालन या लय मात्र ही दोहा नहीं है. इन विधानों से दोहा की देह निर्मित होती है. उसमें प्राण संक्षिप्तता, सारगर्भितता, लाक्षणिकता, मर्मबेधकता तथा चारुता के पञ्च तत्वों से पड़ते हैं। इसलिए दोहा लिखकर तत्क्षण प्रकाशन न करें, उसका शिल्प और कथ्य दोनों जाँचें, तराशें, संवारें तब प्रस्तुत करें।
३०-८-२०१७
***
नवगीत -
*
पहले मन-दर्पण तोड़ दिया
फिर जोड़ रहे हो
ठोंक कील।
*
कैसा निजाम जिसमें
दो दूनी
तीन-पाँच ही होता है।
जो काट रहा है पौधों को
वह हँसिया
फसलें बोता है।
कीचड़ धोता है दाग
रगड़कर
कालिख गोर चेहरे पर।
अंधे बैठे हैं देख
सुनयना राहें रोके पहरे पर।
ठुमकी दे उठा, गिराते हो
खुद ही पतंग
दे रहे ढील।
पहले मन-दर्पण तोड़ दिया
फिर जोड़ रहे हो
ठोंक कील।
*
कैसा मजहब जिसमें
भक्तों की
जेब देख प्रभु वर देता?
कैसा मलहम जो घायल के
ज़ख्मों पर
नमक छिड़क देता।
अधनंगी देहें कहती हैं
हम सुरुचि
पूर्ण, कपड़े पहने।
ज्यों काँटे चुभा बबूल कहे
धारण कर
लो प्रेमिल गहने।
गौरैया निकट बुलाते हो
फिर छोड़ रहे हो
कैद चील।
पहले मन-दर्पण तोड़ दिया
फिर जोड़ रहे हो
ठोंक कील।
३०-८-२०१६
***
मुक्तक
राखी :
नहीं धागा है महज यह यह स्नेह का आधार है
आस का, विश्वास का, परिहास का संसार है
सहारा है डूबते को यही तिनके सा 'सलिल'-
विदेहित शुभ भाव पूरित देह में आगार है
*

सोमवार, 18 मार्च 2024

मार्च १८, निमाड़ी, नदी, मुक्तिका, दोहा, फागुन, सॉनेट, अस्ति

सलिल सृजन १८ मार्च
*
मुक्तिका
(पदभार २४)
बेख्याल से...
***
बेखयाल से खयाल हो रहे हैं आजकल
कीच लगा कीच लोग धो रहे हैं आजकल
*
प्रेम चाहते हैं आप नफ़रतें उगा रहे
चैन-अमन बिना दाम खो रहे हैं आजकल
*
मुस्कुरा रहे हैं होंठ लालियाँ लगा लगा
हाल-ए-दिल न पूछना रो रहे हैं आजकल
*
पा गए जो कुर्सियाँ न जड़ जमीन में रही
रोज अहंकार बीज बो रहे हैं आजकल
*
निज प्रशस्ति गा रहे हैं चीख चीख काग भी
राजहंस मौन दीन मूँद आँखें सो रहे
१८.३.२०२४
***
सॉनेट
अस्ति
'अस्ति' राह पर चलते रहिए
तभी रहे अस्तित्व आपका
नहीं 'नास्ति' पथ पर पग रखिए
यह भटकाव कुपंथ शाप का
है विराग शिव समाधिस्थ सम
राग सती हो भस्म यज्ञ में
पहलू सिक्के के उजास तम
पाया-खोया विज्ञ-अज्ञ ने
अस्त उदित हो, उदित अस्त हो
कर्म-अकर्म-विकर्म सनातन
त्रस्त मत करे, नहीं पस्त हो
भिन्न-अभिन्न मरुस्थल-मधुवन
काम-अकाम समर्पित करिए
प्रभु चरणों में नत सिर रहिए
१८-३-२०२३
•••
दोहे फागुन के
फागुन फगुनायो सलिल, लेकर रंग गुलाल।
दसों दिशा में बिखेरें, झूमें दे दे ताल।।
*
जहँ आशा तहँ स्मिता, बिन आशा नहिं चैन।
बैज सुधेंदु सलिल अनिल, क्यों सुरेंद्र बेचैन।।
*
अफसाना फागुन कहे, दे आनंद अनंत।
रूपचंद्र योगेश हैं, फगुनाहट में संत।।
*
खुशबू फगुनाहट उषा, मोहक सुंदर श्याम।
आभा प्रमिला हमसफ़र, दिनकर ललित ललाम।।
*
समदर्शी हैं नंदिनी, सचिन दिलीप सुभाष।
दत्तात्रय प्राची कपिल, छगन छुए आकाश।।
*
अनिल नाद सुन अनहदी, शारद हुईं प्रसन्न।
दोहे आशा के कहें, रसिक रंग आसन्न।।
*
फगुनाहट कनकाभिती, दे सुरेंद्र वक्तव्य।
फागुन में नव सृजन हो, मंगलमय मंतव्य।।
*
सुधा सुधेन्दु वचन लिए, फगुनाए हम आप।
मातु शारदा से विनय, फागुन मेटे ताप।।
*
मुग्ध प्रियंका ज्योत्स्ना, नवल किरण आदित्य।
वर लय गति यति मंजुला, फगुनाए साहित्य।।
*
किरण किरण बाला बना, माथे बिंदी सूर्य।
शब्द शब्द सलिला लहर, गुंजित रचना तूर्य।।
*
साँची प्राची ने किया, श्रोता मन पर राज।
सरसों सरसा बसंती, वनश्री का है ताज।।
*
छगन लाल पीले न हो, मूठा में भर रंग।
मूछें रंगी सफेद क्यों, देखे दुनिया दंग।।
*
धूप-छाँव सुख-दुःख लिए, फगुनाहट के रंग।
चन्द्रकला भागीरथी, प्रमिला करतीं दंग।।
*
आभा की आभा अमित, शब्द शब्द में अर्थ।
समालोचना में छिपी, है अद्भुत समर्थ।।
१८-३-२०२३
***
मुक्तिका
*
मन मंदिर जब रीता रीता रहता है।
पल पल सन्नाटे का सोता बहता है।।
*
जिसकी सुधियों में तू खोया है निश-दिन
पल भर क्या वह तेरी सुधियाँ तहता है?
*
हमसे दिए दिवाली के हँस कहते हैं
हम सा जल; क्यों द्वेष पाल तू दहता है?
*
तन के तिनके तन के झट झुक जाते हैं
मन का मनका व्यथा कथा कब कहता है?
*
किस किस को किस तरह करे कब किस मंज़िल
पग बिन सोचे पग पग पीड़ा सहता है
१८-३-२०२१
***
गीत
नदी मर रही है
*
नदी नीरधारी, नदी जीवधारी,
नदी मौन सहती उपेक्षा हमारी
नदी पेड़-पौधे, नदी जिंदगी है-
भुलाया है हमने नदी माँ हमारी
नदी ही मनुज का
सदा घर रही है।
नदी मर रही है
*
नदी वीर-दानी, नदी चीर-धानी
नदी ही पिलाती बिना मोल पानी,
नदी रौद्र-तनया, नदी शिव-सुता है-
नदी सर-सरोवर नहीं दीन, मानी
नदी निज सुतों पर सदय, डर रही है
नदी मर रही है
*
नदी है तो जल है, जल है तो कल है
नदी में नहाता जो वो बेअकल है
नदी में जहर घोलती देव-प्रतिमा
नदी में बहाता मनुज मैल-मल है
नदी अब सलिल का नहीं घर रही है
नदी मर रही है
*
नदी खोद गहरी, नदी को बचाओ
नदी के किनारे सघन वन लगाओ
नदी को नदी से मिला जल बचाओ
नदी का न पानी निरर्थक बहाओ
नदी ही नहीं, यह सदी मर रही है
नदी मर रही है
***
१२.३.२०१८
***
मुक्तिका
जो लिखा
*
जो लिखा, दिल से लिखा, जैसा दिखा, सच्चा लिखा
किये श्रद्धा सुमन अर्पित, फ़र्ज़ का चिट्ठा लिखा
समय की सूखी नदी पर आँसुओं की अँगुलियों से
दिल ने बेहद बेदिली से, दर्द का किस्सा लिखा
कौन आया-गया कब-क्यों?, क्या किसी को वास्ता?
गाँव अपने, दाँव अपने, कुश्तियाँ-घिस्सा लिखा
किससे क्या बोलें कहों हम?, मौन भी कैसे रहें?
याद की लेकर विरासत, नेह का हिस्सा लिखा
आँख मूँदे, जोड़ कर कर, सिर झुका कर-कर नमन
है न मन, पर नम नयन ले, दुबारा रिश्ता लिखा
१८-३-२०१६
***
निमाड़ी दोहा:
जिनी वाट मंs झाड नी, उनी वांट की छाँव.
मोह ममता लगन, को नारी छे ठाँव..
१८-३-२०१०
*

सोमवार, 24 अगस्त 2020

निमाड़ी सलिला हमारा निमाड़

निमाड़ी सलिला 
हमारा निमाड़ 
*
निमाड़ (Nimar) मध्य प्रदेश के पश्चिमी ओर स्थित है। इसके भौगोलिक सीमाओं में निमाड़ के एक तरफ़ विन्ध्य पर्वत और दूसरी तरफ़ सतपुड़ा हैं, जबकि मध्य में नर्मदा नदी है। पौराणिक काल में निमाड़ अनूप जनपद कहलाता था। बाद में इसे निमाड़ की संज्ञा दी गयी। फिर इसे पूर्वी और पश्चिमी निमाड़ के रूप में जाना जाने लगा। निमाड़ीमध्य प्रदेश के निमाड़ क्षेत्र की बोली है। यह क्षेत्र मालवा के दक्षिण में महाराष्ट्र से सटा समीवर्ती क्षेत्र है। निमाड़ी बोलने वाले जिले हैं - बड़वानीखंडवापूर्वी निमाड़पश्चिमी निमाड़धार जिले के कुछ भाग तथा कई गाँव ऐसे है जिनमे निमाड़ी बोली जाती है। निमाड़ी शब्दकोष में 30 हजार शब्द है। ६ जिलों में लगभग एक करोड़ लोग निमाड़ी समझते हैं। 
जलवायु, संस्कृति, इतिहास 
निमाड़ में हज़ारों वर्षों से उष्म जलवायु रही है। निमाड़ का सांस्कृतिक इतिहास अत्यन्त समृद्ध और गौरवशाली है। विश्व की प्राचीनतम नदियों में एक नदी नर्मदा का विकास निमाड़ में ही हुआ। नर्मदा-घाटी-सभ्यता का समय महेश्वर नावड़ाटौली में मिले पुरा साक्ष्यों के आधार पर लगभग ढ़ाई लाख वर्ष माना गया है। विन्ध्य और सतपुड़ा अति प्राचीन पर्वत हैं। प्रागैतिहासिक काल के आदि मानव की शरणस्थली सतपुड़ा और विन्ध्य की उपत्यिकायें रही हैं। आज भी विन्ध्य और सतपुड़ा के वन-प्रान्तों में आदिवासी समूह निवास करते हैं। नर्मदा तट पर आदि अरण्यवासियों का निमाड़ पुराणों में वर्णित है। उनमें गौण्ड, बैगा, कोरकू, भील, शबर आदि प्रमुख हैं। निमाड़ का जनजीवन कला और संस्कृति से सम्पन्न रहा है, जहाँ जीवन का एक दिन भी ऐसा नहीं जाता, जब गीत न गाये जाते हों, या व्रत-उपवास कथावार्ता न कही-सुनी जाती हो।
निमाड़ की पौराणिक संस्कृति के केन्द्र में ओंकारेश्वर, मांधाता और महेश्वर है। वर्तमान महेश्वर प्राचीन माहिष्मति ही है। कालीदास ने नर्मदा और महेश्वर का वर्णन किया है। निमाड़ की अस्मिता के बारे में पद्मश्री रामनारायण उपाध्याय लिखते है- "जब मैं निमाड़ की बात सोचता हूँ तो मेरी आँखों में ऊँची-नीची घाटियों के बीच बसे छोटे-छोटे गाँव से लगा जुवार और तूअर के खेतों की मस्तानी खुशबू और उन सबके बीच घुटने तक धोती पर महज कुरता और अंगरखा लटकाकर भोले-भाले किसान का चेहरा तैरने लगता है। कठोर दिखने वाले ये जनपद जन अपने हृदय में लोक साहित्य की अक्षय परम्परा को जीवित रखे हुए हैं। निमाड़ का, जिले के रूप में गठन ब्रिटिशराज में नरबुड्डा (नरबद्दा) डिवीजन में हुआ, जिसका प्रशासनिक मुख्यालय खण्डवा (मुस्लिम शासनकाल में बुरहानपुर) में था। निमाड़ के जिले बड़वानी, बुरहानपुर,खंडवा, खरगौन हैं। निमाड़ के प्रमुख शहर बड़वाह, बड़वानी, बुरहानपुर, हरसूद, खंडवा, खरगोन, जुलवानिया, बमनाला, भीकनगाँव, मूँदी, सनावद, बैड़िया, सेंधवा, महेश्वर, करही, राजपुर, मंडलेश्वर, गोगांवा व ठीकरी हैं। 
निमाड़ की होली
  • होली वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण भारतीय और नेपाली लोगों का पारम्परिक त्योहार है। रंगों का यह त्यौहार जहाँ सम्पूर्ण भारत और पड़ोसी राज्य नेपाल में बड़ी धूमधाम एवम उत्साह के साथ मनाया जाता है वही भारत के मध्य बसा मध्य  प्रदेश  के निमाड़  और मालवा अंचल में भी प्रेम और सौहार्द के साथ  मनाया जाता है।  होली पर्व को   पौराणिक प्रचलित  कथा  के अनुसार  होलिका द्वारा भक्त प्रह्लाद को गोद में बैठाकर आत्मदाह करने व् प्रह्लाद के जीवित रहने के कथानक से जोड़ा गया है  यह पर्व हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इतिहासकारों का मानना है कि आर्यों में भी इस त्यौहार का प्रचलन था। अनेक धार्मिक ग्रंथो हस्तलिपियों नारद पुराण औऱ भविष्य पुराण जैसे पुराणों में भी इस पर्व का उल्लेख मिलता है।
  • होली का पहला काम झंडा या डंडा गाड़ना होता है। इसे किसी सार्वजनिक स्थल या घर के आहाते में गाड़ा जाता है। होली के एक माह पूर्व गांव व् नगर का सरपंच अथवा कोई जनप्रिय नागरिक द्वारा होली का दण्ड निर्धारित होली दहन स्थल पर स्थापित किया जाता है। परम्परा अनुसार ग्राम के नागरिक महिलाये बालक बालिकाएं गोबर के कण्डे,गोबर से हाथ के बनाये नारियल,पीपल पान,षटकोण और विभिन्न प्रकार की मालाएं बनाकर होली दहन स्थल पर पूजन के साथ रखते हैं। कई स्थलों पर होलिका में भरभोलिए जलाने की भी परंपरा है। भरभोलिए गाय के गोबर से बने ऐसे उपले होते हैं जिनके बीच में छेद होता है। इस छेद में मूँज की रस्सी डाल कर माला बनाई जाती है। एक माला में सात भरभोलिए होते हैं। होली में आग लगाने से पहले इस माला को भाइयों के सिर के ऊपर से सात बार घूमा कर फेंक दिया जाता है। होली से काफ़ी दिन पहले से ही यह सब तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं। रोजाना दहन स्थल पर लकड़िया काटकर अथवा एकत्रित कर डाली जाती है। इस परम्परा में हरे भरे पेड़ पौधों को भी काटकर होली स्थल पर डाला जाता है। इससे हमारे आसपास की वनस्पति को नुकसान भी पहुचता है.
  • ग्रामीण और शहरी क्षेत्रो में ग्राम प्रधान द्वारा लकड़ियों व उपलों से तैयार होली का विधिवत पूजन किया जाता है। इस दिन गृहणियों द्वारा अपने अपने घरों में अनेक प्रकार के पकवान बनाये जाते है. मालवा और निमाड़ अंचल के अधिकतर घरो में इस दिन पूरनपोली, भजिये, दाल,चावल, कड़ी, पकोड़े बनाये जाते है। इन पकवानों का होली को भोग लगाया जाता है। दिन ढलने के पश्चात ज्योतिषियों द्वारा निकाले गए मुहूर्त पर होली का दहन किया जाता है।
  • निमाड़ी साहित्य 
  • जोरू गोरू गोखरू, तूप तुअर की दाल                                                                                                                        ऐतरी चीज निमाड़ की, बोली मिसरी समान 
  • संस्कृतियों की जितनी विभिन्नता भारत में देखने को मिलती है, वह दुनिया में और कहीं भी संभव नहीं। हमारा देश इस मामले में आकूत संपदा का मालिक है। यहाँ के विभिन्न अंचलों की सांस्कृतिक विरासत और मीठी बोलियाँ इस संपन्नता का बखान करती हैं। ऐसा ही एक अंचल है निमाड़। जो गन्नों और केले के साथ ही मिर्ची के लिए भी प्रसिद्ध है और इसका यही तीखा-मीठा स्वाद इसके साहित्य में भी झलकता है। निमाड़ी बोली में रचे लोकगीत तथा कहावतें और कहानियाँ एक अनोखे सौंधेपन का एहसास कराते हैं। निमाड़ी साहित्य ने पिछले वर्षों में कई पड़ाव पार किए और कई प्रयोगों को भी अपने में समोया। आज इस बोली में व्यंग्य तथा कविताओं से लेकर निबंध तथा कहानियाँ रचने वाले कई नाम राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हैं। लोककथाओं और गीतों के जरिए प्राचीन समय से कहा और सुना चला आ रहा साहित्य निमाड़ का असली रूप प्रस्तुत करता है। इसके जरिए न केवल प्राचीन समय के लोगों तथा जीवनशैली का परिचय प्राप्त होता है बल्कि साहित्य में हुए नए-पुराने आविष्कारों-प्रयोगों को भी करीब से जानने का मौका मिलता है।
  • मराठी एवं गुजराती भाषा तथा राजस्थानी बोली का मिश्रण निमाड़ी में ध्वनित होता है। इसके लोकगीतों में भी उक्त तीनों ही की अद्भुत मिठास प्रतिध्वनित होती है। निमाड़ी साहित्य वैसे भी खासतौर पर लोकगीतों के लिए ही जाना जाता है।
    परंपरागत गीत इसकी पहली पहचान हैं। इनमें संतों द्वारा गाए जाने वाले भक्ति गीत तथा जनसाधारण द्वारा गाए जाने वाले विभिन्न त्योहारों तथा महत्वपूर्ण अवसरों के लिए रचे गए गीत मुख्य तौर पर शामिल हैं। निमाड़ में हुए कई संतों के रचे दोहे-चौपाइयाँ सामान्य होते हुए भी जीवन-दर्शन की गहरी झलक दे जाते हैं। इसका एक उदाहरण देखिए-
  •  "हेत प्रीत की राबड़ी, मिलकर पीजे वीर।हेत बिना काळू कहे, कड़वी लागे खीर ॥"
    यह संत सिंगाजी के पुत्र संत काळूजी का कहा दोहा है। जिसका मतलब है- प्रेम से पिलाई गई राबड़ी (एक प्रकार का मक्के तथा छाछ का व्यंजन) भी मिल-जुलकर पीने से स्वादिष्ट लगती है लेकिन बिना स्नेह के परोसी गई खीर भी कड़वी लगती है। इसके अलावा बच्चों के मनोरंजन तथा नीति-कथाओं का भी समृद्ध भंडार निमाड़ी साहित्य अपने अंक में समेटे हुए है।
  • महत्वपूर्ण पुस्तकें - १. निमाड़ी साहित्य का इतिहास,- डॉ. श्रीराम परिहार, २. निमाड़ी संस्कृति और साहित्य - वसंत निरगुणे, ३. निमाड़ी की लोक कथाएं - कृष्ण लाल हंस, ४. निमाड़ी लोकोक्ति कोश - डॉ. मंजुला जोशी, 
  • प्रमुख साहित्यकार - महादेव प्रसाद चतुर्वेदी 'माध्या' (अम्मर बोल -निमाड़ी में श्रीमद्भगवद्गीता) मंडलेश्वर, हरीश दुबे मंडलेश्वर, गजानन सिंह चौहान 'नम्र' मंडलेश्वर, शरद पगारे इंदौर, जगदीश जोशीला (सरग-नरग य्हांज् छे उपन्यास, क्रांति ज्योत व निमाड़ी मं कविता नं काव्य संग्रह, निमाड़ी लघुकथाएं ३ भाग, गाँव की पयचाण खंड काव्य, जननायक टंट्या मामा, कई हिंदी पुस्तकें) गोगांवा खरगोन, सहदेव सिंह 'मलय' गोगावां, सदाशिव कौतुक इंदौर (असो क्यऊँ हुइ रयोज्, माटी नs मखs बुलायो), स्व. ओमप्रकाश जोशी बड़वाह, शिशिर उपाध्याय बड़वाह, सुरेश कुशवाहा 'तन्मय' जबलपुर,  कुँअर उदय सिंह 'अनुज' महेश्वर, हेमंत उपाध्याय, अशोक गीते, महेश जोशी खरगोन (हाल-चाल सं अच्छा छे), दीपक पगारे सनावद, डॉ. शैलेंद्र चौकड़े सनावद,   अशोक गर्ग अग्र (बाजे बांसुरिया), सौरभ लाड़ (अगेड़ी मुक्तिधाम छे..), महेश साकल्ले काटकूर,  विष्णु फागना मंडलेश्वर, बाबूलाल सेन महेश्वर, मांगीलाल उपाध्याय खंडवा, डॉ. जगदीशचंद्र चौरे आदि।  
  • प्रमुख कलाकार साधना उपाध्याय, काठी नृत्यकार देवराम अबोले भाड़ली, निमाड़ी लोकाख्याकार चंद्रकांता बड़ोले, मांडणा कलाकार श्वेता शर्मा सेंधवा, कलगी गायक  राधेश्याम सोलंकी कोठा खुर्द, जयराम यादव व जगदीश यादव गवाड़ी बालीपुर, डॉ. मीना साकल्ले इंदौर,  दिनेश शर्मा बड़वानी, नंदराम पंवार लालपुरा, वैशाली सेन, मनीषा शास्त्री 
  • खंडवा जिला - राज्यों के पुनर्गठन से पहले, अर्थात 1 नवंबर 1956 को, जिले को आधिकारिक तौर पर निमाड़ जिले के रूप में जाना जाता था और तत्कालीन मध्य प्रदेश के महाकोशल क्षेत्र का हिस्सा था। पुराने प्रस्तर निमाड़ का पश्चिमी भाग जो मूल रूप से होल्कर के पास था, 1948 में मध्य भारत राज्य के गठन के समय उसका हिस्साज बन गया था। 1956 में राज्यों के पुनर्गठन के समय मध्य भारत क्षेत्र को कुछ बदलाव कर मध्य प्रदेश में बदल दिया गया और पश्चिमी भाग (पुराना निमाड़) अंतत: मध्य प्रदेश का एक हिस्सा बन गया । बाद में निमाड़ का पश्चिम भाग जो महाकौशल क्षेत्र का एक हिस्साक था पश्चिम निमाड़ के रूप में अलग हुआ जिसका मुख्या लय खरगोन था । 1 नवंबर, 1956 से निमाड़ (पूर्व) या पूर्वी निमाड़ के रूप मे जिला आस्तित्वख में आया । पूर्व निमाड़ जिला 15 अगस्त, 2003 को जिले को खंडवा और बुरहानपुर जिले में विभाजित किया गया।
    स्थान और सीमाएँ: खंडवा जिला मध्य प्रदेश राज्य के दक्षिण पश्चिम में स्थित है। जिला मध्य प्रदेश के इंदौर संभाग में है। समुद्र तल से अधिकतम और न्यूनतम ऊँचाई क्रमशः 905.56 मीटर और 180.00 मीटर है। यह जिला पूर्व में होशंगाबाद संभाग के बैतूल और हरदा जिले और दक्षिण में इंदौर संभाग के बुरहानपुर जिले, पश्चिम में इंदौर संभाग के पश्चिम निमाड़ जिले और उत्तर में इंदौर संभाग के देवास जिले से घिरा हुआ है।
    प्रशासनिक प्रभाग: सामान्य और राजस्व प्रशासन के उद्देश्य के लिए जिला को चार अनुभागों , खंडवा, पंधाना, पुनासा, हरसूद में विभाजित किया गया है जो पाँच तहसील, जैसे, खंडवा, पंधाना, हरसूद, पुनासा और खालवा में विभाजित है । तहसीलों को राजस्व निरीक्षक के हलकों और राजस्व प्रशासन के लिए पटवारी हलकों में और उप-विभाजित किया गया है।
    हरसूद अनुभाग का मुख्याखलय और तहसील मुख्यालय को इंदिरा सागर परियोजना के तहत विस्थापन के कारण न्यू-हरसूद (छनेरा) में स्थानांतरित कर दिया गया है।
    पंधाना
    प्राकृतिक विभाजन: जिले का अधिकांश भाग, दो प्रमुख नदियों नर्मदा और ताप्ती के बीच की घाटियों में स्थित है । नर्मदा नदी जिले के मध्यव में पूर्व से पश्चिम तक एक दूसरे के समानांतर बह रही है। हात्तीथ रेंज जिले की दक्षिण सीमा को चिंहित करती है । जिले का प्रमुख प्राकृतिक विभाजन दो अलग-अलग भौगोलिक विभाजन के अनुरूप है, जैसे:
    • नर्मदा घाटी
    • मुख्य सतपुड़ा पर्वतमाला
    निमाड़ (पूर्व) भौगोलिक कण्टू र की समुद्र तल से सामान्य ऊंचाई लगभग 1,000 फीट(304.8 मीटर) है। लेकिन पूर्व निमाड़ का एलिवेशन पश्चिम में नर्मदा घाटी में 618 फीट (188.4 मीटर) से लेकर हट्टी रेंज के पीपरडोल शिखर पर 3,010 फीट (917.5 मीटर) तक असमान है। ।
    ड्रेनेज प्रणाली : जिले की जल निकासी नर्मदा और ताप्ती नदी प्रणालियों के अंतर्गत आती है। सतपुड़ा के उत्तरी श्रेणी दो नदी-प्रणालियों के बीच जल-विभाजन रेखा बनाती है। इस लाइन के उत्तर चांदगढ़ और सेलानी के निचले इलाकों को छोड़कर, लगभग सारा पानी छोटी तवा और कावेरी के साथ साथ कई छोटी छोटी नदियों से उत्तडर दिशा की ओर ही प्रवाहित होता है । नर्मदा के उत्तर तट तरफ दक्षिण की ओर ढलान है।
    नर्मदा नदी ओंकारेश्‍वर में
    भूगर्भीय हलचल: जिला एक भूकंपीय क्षेत्र में है जहां हल्के से मध्यम भूकंप संभव हैं, हालांकि यह भारत के स्थिर प्रायद्वीपीय शील्ड का एक हिस्सा है जिसे ‘हॉर्स्ट ब्लॉक’ के रूप में जाना जाता है और यह भारत के मुख्य भूकंप बेल्ट, अर्थात हिमालयन आर्क के बाहर है। 14 मार्च, 1938 के प्रसिद्ध सतपुड़ा भूकंप का केंद्र (21O 32 ‘एन -75O50′ ई) जिले के पश्चिम भाग के नजदीक ही था । जिले का पश्चिमी एम एम तीव्रता VII में और पूर्वी भाग एम एम तीव्रता VI में आता है । 11 दिसंबर 1998 और 5 अप्रेल 1999 के मध्य पंधाना विकासखण्डं में आवाज और कंपन के साथ हल्की तीव्रता (माइक्रो अर्थक्‍वेक) के भूकंप का अनुभव किया गया था ।
    जलवायु: जिला भारत के सूखे हिस्से में पड़ता है। जिले में औसत वार्षिक वर्षा 808 मिमी है। जिले के उत्तरी भाग में दक्षिणी भाग की तुलना में अधिक वर्षा होती है। मानसून का मौसम हर साल 10 जून तक शुरू होता है और अक्टूबर के शुरू तक रहता है। दिन काफी उमस भरे होते हैं। मई के महीने में अधिकतम तापमान 45O सेण्‍टीग्रेड और दिसंबर के महीने में न्यूनतम 10सेण्‍टीग्रेड दर्ज किया गया है
    पेशा: कामकाजी जन का प्रमुख हिस्सा कृषि में है। प्रति परिवार औसत खेत का आकार कम है और कृषि के पारंपरिक रूप को अपनाते हुए, अधिकांश किसान केवल आजीविका के लिए कमा रहे हैं। कृषि श्रम भी कुल जनसंख्या का बड़ा हिस्सा है।
    गणगौर
    भाषा: हिंदी जिले के शहरी भाग में संचार का एक सामान्य माध्यम है। निमाड़ी जिले के उत्तर-पश्चिम भाग के ग्रामीण क्षेत्र में बोली जाती है जबकि कोरकू, भीली क्रमशः जनजातीय क्षेत्र में संचार के साधन के रूप में। उत्तरी भाग में क्रमशः मालवी और कोरकू बोली जाने वाली जनजातियाँ शामिल हैं। गुजराती, राजस्थानी आदि भी कई सामाजिक वर्गों में बोली जाती है, जैसे बोहरा आदि।
    धार्मिक जीवन – तीर्थ केंद्र और जात्रा: ओंकारेश्वर ज्योर्तिलिंग (ओंकारेश्वर मांधाता) प्रसिद्ध तीर्थस्थल है। पूरे वर्ष, देश से तीर्थयात्री यात्रा करते हैं। कार्तिक के महीने में इस स्थान पर एक मेला लगता है, जिसमें कई तीर्थयात्री शामिल होते हैं। जिले में लगभग 40 मेले लगते हैं। पिपलिया में सिंगाजी महाराज का मेला, मलगांव में दाता-साहेब का मेला,छनेरा में बाबा बुखारदास का मेला, सिवना में बृह्मगीर महाराज का मेला,रूस्तंमपुर में महाशिवरात्रि का मेला, बोरगाँव में बागेश्वरी देवी का मेला, पुनासा में काजल देवी का मेला, श्रीरामजी के नाम पर जामनिया में,हनुमानजी के नाम पर बड़झिरी में, नर्मदा जयंति पर ओंकारेश्वर और नर्मदा नदी के किनारों के गांवो में उत्सव इत्यादि । मुस्लिम समुदाय का गुराडि़या में उर्स, रहीमपुरा में ख्वाजा साहेब का उर्स, पोखरकला में नवगज पीर का उर्स इत्यादि प्रमुख हैं
    काठी नृत्‍य

    लोक नृत्य: धर्म से जुडे नृत्यों की समृद्ध विरासत अभी भी राजपूतों, गुर्जरों, कोरकू, नागर ब्राह्मणों और बंजारों द्वारा संरक्षित है। राजपूत पुरुष के नृत्य को गेर और किमाड़ी के रूप में जाना जाता है, जबकि उनकी महिला-लोक नृत्य को खड़ा कहा जाता है। गुर्जरों के बीच, पुरुष लोक, दीप नृत्य करते हैं। कोरकु समाज का पसंदीदा नर नृत्य सुसुर है, जबकि गदोलिया उसी का महिला-लोक है। गुजराती समुदाय की महिला लोक गरबा है। काठी निमाड़ का प्रसिद्ध लोक नृत्य है। गम्मत (नाटक) ग्रामीण जन के पसंदीदा शगल हैं।
  • संत सिंगा जी 
  • संत कवि सिंगाजी को निमाड़ के कबीर कहा जाता है। उन्होंने निर्गुणी भक्तिधारा की अनोखी निर्झर बहायी। वास्तव में वे नर्मदांचल की महान् विभूति थे। आज भी निमाड़ में उनके जन्म स्थान व समाधि स्थल पर उनके पगल्यों (पद्चिन्हों) की पूजा की जाती है। पशुपालक उन्हें पशु दूध और घी अर्पण करते हैं। इन स्थानों पर घी की अखण्ड ज्योत भी प्रज्वलित रहती है।सन्त शिरोमणि सिंगाजी महाराज का जन्म मध्यप्रदेश के बड़वानी जिले के एक छोटे से गांव खजूरी में हुआ था। पिता श्री भीमाजी गवली और माता गवराबाई कीतीन सन्तान थी। बड़े भाई लिम्बाजी और बहिन का नाम किसनाबाई था। सिंगाजी काजसोदाबाई के साथ विवाह हुआ था। इनके चार पुत्र—कालू, भोलू, सदू और दीप थे। सिंगाजी के जन्म और समाधिस्थ होने के बारे में विद्वान मतैक्य नहीं हैं। डा. कृष्णदास हंस ने उनका जन्म विक्रम संवत् 1574 बताया है। पंडित रामनारायण उपाध्याय ने वि.स. 1576 की वैशाख शुक्ल एकादशी (बुधवार) बताया है। इसी प्रकार समाधिस्थ होने की तिथि डा. हंस श्रावण शुक्ल नवमी सवंत् 1664 व पं. उपाध्याय वि.स. 1616 श्रावण बदी नवमी निश्चित करते हैं।ऐसी लोकमान्यता है कि श्रृगी ऋषि ने ही सिंगाजी के रूप में जन्म लिया। संस्कृत में ‘श्रृग’ का अर्थ सींग होता है और ‘सिंगा’ भी ‘सिंग’ का अर्थ लिए हुए है। फिर सिंगाजी की उच्च आध्यात्मिकता उनके भजनों से भी स्पष्टï होती है। लोकजीवन से जुड़े होने के कारण उनके काव्यगत उदाहरण भी उसी परिवेश से हैं, जो सीधे मन पर प्रभाव डालते हैं। एक भजन से यह बात स्पष्ट एवं प्रमाणित हो जाती है।
    खेती खेड़ो रे हरिनाम की, जामंऽ मुक्तो लाभ।
    पाप का ‘पालवा’ कटाव जो, काठी बाहर राल,
    कर्म की कासी एचावजो, खेती चोखी थाय।
    ‘वास’ ‘श्वास’ दो बैल हैं, ‘सुर्ती’ रास लगाव,
    प्रेम-पिराणो कर धरो, ‘ज्ञान’ आर लगाव।
    ‘ओहं’ वक्खर जूपजो, ‘सोहं’ सरतो चलाव,
    ’मूलमंत्र’ बीज बावजो,खेती लटलुम थाय।
    ’सत’ को मांडो रोप जो, ‘धरम’ पैड़ी लगाव,
    ‘ज्ञान’ का गोला चलावजो, सूवो उड़ी-उड़ी जाय।
    ‘दया’ की दावण राल जो, बहुरि फेरा नहीं होय,
    कहे सिंगा पहिचाण लेवो, आवागमन नहीं होय।
    वैसे भीमाजी का घर-परिवार काफी सम्पन्न था। उनके आंगन सैकड़ों भैंसें बंधी रहती थीं। लेकिन विषम परिस्थितियों के कारण उन्हें गांव छोड़कर पूर्वी निमाड़ में ग्राम हरसूद जाना पड़ा। यह घटना वि.सं. 1581-82 की मानी जाती है। उस समय सिंगाजी की उम्र मात्र पांच वर्ष की थी। सिंगाजी जब 22 वर्ष के हुए तो भामगढ़ के राव साहब के यहां हरकारे (डाकिये) की नौकरी की। इन्हीं दिनों स्वामी ब्रह्मïगिर के मुख से भजनरूपी अमृत का पान किया और मन में वैराग्य उपजा। बाद में मनरंग स्वामी से दीक्षा ग्रहण की जो ब्रह्मïगिरजी के शिष्य थे।सिंगाजी के जीवन से जुड़ी अनेक चमत्कारिक घटनाएं आज भी प्रचलित हैं। जनमानस में पैंठी इन घटनाओं में कुछेक इस प्रकार हैं :-एक बार सिंगाजी की भैंसों की चोरी हो गई। घर के सभी सदस्य चिंतित होकर भैंसों की खोज में निकल पड़े। लेकिन सिंगाजी घर बैठे-बैठे मुस्कराते रहे।यह देखकर मां बहुत नाराज हुई। तब सिंगाजी ने कहा,’माय तू चिंता मत कर। भगवान अपणी भैंस न को रखवालों छे। तू तो पाड़ा-पाड़ी छोड़। भैंसी न आवतीऽ होयगऽ।’ (मां तू चिंता मत कर। भगवान अपनी भैंसों का रखवाला है। तू तो पाड़ा-पाड़ी छोड़, भैंसें आती ही होंगी)। सचमुच तभी भैंसें आ गईं। ढूंढऩे वाले चकित थे कि आखिर भैंसें किस मार्ग से आयीं। इसी प्रकार एक बार गांव के लोगों ने सिंगाजी से ओंकारेश्वर चलने का आग्रह किया। तो उन्होंने कहा-तम चलो, हव अऊऽज(तुम चलो मैं आता हूं)। तीन दिनों की पैदल यात्रा के बाद लोग वहां पहुंचे तो देखा कि सिंगाजी नाव में बैठे हैं। जबलोग गांव वापस आये तो पता चला कि सिंगाजी गांव छोड़कर कहीं गये ही नहीं। तब से लोगों में उनके प्रति सिद्ध पुरुष होने की मान्यता और दृढ़ हो गई।वैसे उनके भजनों में झाबुआ के राजा बहादुरसिंह के डूबते जहाज को उबारने व कुंवारी भैंस का दूध दुहने की घटनाएं भी आती हैं। इनके अलावा एक उल्लेख यहभी मिलता है कि सिंगाजी ने अपने गुरु को समाधिस्थ होने के बाद दर्शन दिए थे। इसकी भी एक रोचक कथा प्रचलित है— एक बार जन्माष्टïमी पर उनके गुरु मनरंगगिर को नींद आने लगी। उन्होंने सिंगाजी से कहा कि आरती के समय उन्हेंजगा देना। जब आरती का समय हुआ तो सिंगाजी ने उन्हें गहरी नींद से जगाना ठीक नहीं समझा और खुद ही आरती कर दी। थोड़ी देर बाद गुरु की नींद खुली। यह देखकर कि सिंगा ने आरती कर दी और जगाया नहीं, क्रोध में सिंगाजी को कहा, ‘जा दुष्टï! मुझे अपना मरा मुंह दिखाना।’ उन्हें यह बात तीखे तीर-सी चुभ गई। परंतु सिंगाजी ने गुरु के कोप-वचन को वरदान की तरह ग्रहण किया और ग्यारह माह की समाधि ले ली। कहते हैं मृत्यु के बाद जब मनरंगजी उनके घर आए तो सिंगाजी उन्हें रास्ते में हीमिले। इस प्रकार गुरु का वचन ‘मरा मुंह दिखाना’ सत्य और पूरा किया।सिंगाजी के जन्म स्थान खजूरी की पहाडिय़ों पर आज भी सफेद निशान मौजूद हैं। कहा जाता है कि यहां सिंगाजी अपने पशुओं को चराते थे और दूध दुहते थे। उनके बारे में और भी अनेक चमत्कारिक घटनाएं प्रचलित हैं। इसी कारण निमाड़-मालवा के पशु-पालक आज भी सिंगाजी को देवता की तरह पूजते हैं। पदचिन्ह (पगल्ये) के मंदिर स्थापित हैं। जहां अखण्ड ज्योति और भजन-पूजन के साथ मेलों का आयोजन भी होता है। रोज शाम को मंदिरों में सिंगाजी के भजनमिरदिंग (मृदंग) के साथ गाये जाते हैं। गुरु-गादी की परम्परानुसार इस पदपर आसीन गुरु का आज भी पूरा सम्मान किया जाता है।
  • निमाड़ी क्रांतिकारी बिरजू नायक

  • सन् 1857 की क्रांति के दौर के वीर क्रांतिकारी, एक महान योद्धा, सतपुड़ा के सुदूर पहाड़ियों में रहने वाले निमाड़ के आदिवासी वीर योद्धा रहे बिरजू नायक। जिनकी कहानी से बहुत ही कम लोग वाकिफ है, अंग्रेज शासनकाल में कई क्रांतिकारी योद्धाओं ने अपना बलिदान दिया। उनमें से कई वीर ऐसे भी है जिनका जिक्र इतिहास में एक लाइन से ज्यादा नही किया गया है। ऐसे ही आदिवासी वीर योद्धा रहे बिरजू नायक, जिनका शहीदी दिवस 2 मई को मनाया जाता है।
    मध्य्प्रदेश के बड़वानी जिले की राजपुर तहसील के नगर पलसूद के निकट ग्राम मटली एवं सावरदा के बीच स्थित एक पहाड़ी पर स्तिथ प्रसिद्ध "बांडी हवेली" है। जो वीर बिरजू नायक का कर्मघर है, जो आज भी मौजूद है, हालांकि अब वह अब खण्डहर में तब्दील हो चुका है। इसको संरक्षित करने की आवश्यकता है। स्थानीय समाजनों से प्राप्त जानकारी के अनुसार ऐसी मान्यता है, कि वीर बिरजू नायक इसी बांडी हवेली से अपने साथियों के साथ अंग्रेजो के विरुद्ध अपनी योजना बना कर उन्हें अंजाम देते थे।
    वहीं पलसूद के नजदीक ग्राम उपला में इनका समाधि स्थल है, जहां वर्तमान में भी क्षेत्र के समाजजन पहुँचकर वीर योद्धा को श्रधांजलि सुमन अर्पित करते है, वहीं समस्त मूलनिवासी संघटनों द्वारा प्रतिवर्ष 2 मई को वीर बिरजू नायक का शहीद दिवस भी मनाया जाता है। हमारे पूर्वजो एवं वरिष्ठ महानुभावो से प्राप्त जानकारी अनुसार बिरजू नायक हमेशा गरीब एवं किसान के हितों के लिए लड़ते थे।
    वीर योद्धा भीमा नायक, ख्वाजा नायक और टांट्या मामा भील के साथ कई विद्रोह में सहभागिता की। उन्होंने अंग्रेजो से कई लड़ाई लड़ कर उन्हें धूल चटा दी थी, कहा जाता है कि जब भी गांव में अंग्रेज आते थे, अंग्रेजो को गांव से मारकर भगाने पर मजबूर कर देते थे। उलेखनीय है कि स्वतंत्रता सेनानी तात्या टोपे के पश्चिम निमाड़ के आगमन पर राजपूर क्षेत्र के गुप्त रास्तों से नर्मदा नदी पार करवाकर मंजिल तक पंहुचाने में भीमा नायक, ख्वाजा नायक एवं बिरजू नायक तथा साथियो का अहम योगदान था, इसी योगदान के बदले उन्हें "वीर की उपाधि" दी गयी थी। जिससे पता चलता है कि सिंधु घाटी क्षेत्र में वीर के नाम से चर्चित थे। आज भी उनके नाम के आगे लोग वीर लिखना नही भूलते है । निवाली(सिंधु घाटी) राजपुर उनका गढ़ रहा है। ग्राम मटली में स्थित झरने (कुंडी) पर नहाने जाया करते थे, उन्हें धोखे के तहत रणनीति बनाकर मारने के लिए अंग्रेजो ने करीबी साथी का सहारा लिया, क्योकि बिरजू नायक को मारना आसान नही था, अंग्रेजो ने उन्हें मारने के लिए कई असफल प्रयास किये।
    वे युद्ध कला में निपुण थे, बिरजू नायक प्रतिदिन की तरह एक बार झरने (कुंडी) पर नहाने पँहुचे थे, तभी अंग्रेजो द्वारा भेजे गए किसी परिचित ने उनका सर धड़ सर से अलग कर दिया। ऐसा बताया जाता हैकि सर धड़ से अलग होने के बावजूद वे उपला स्थित समाधि तक दौड़ते हुए आ गए थे व उक्त स्थल पर प्राण त्यागे थे।
    आदिवासी समाज एवं विभिन्न संघटनो के कार्यकर्ता वर्तमान में भी उनकी गाथा का गायन करते है।
    कहा जाता है कि वीर बिरजू नायक अपने साथियों को सूचना देने हेतु वाद्य यंत्र का उपयोग करते थे, जिस स्थान से सूचनाओं का आदान प्रदान करते थे उस स्थान को अब ढोला बेड़ी के नाम से जाना जाता है जो वर्तमान में ग्राम मटली में स्थित है।
  • निमाड़ी पर्व : संजा (छाबड़ी) 
  • गीतात्मक लोक पर्व संजा बाई (छाबड़ी)

  • निमाड़ की किशोरी बालिकाओ द्वारा भाद्र माह की पूर्णिमा से अश्विन माह की सर्वपितृ अमावस्या तक मनाया जाता है । इन 16 दिनों तक चलने वाले गीतात्मक मांडना पर्व को गीतों के माध्यम मनाया जाता है मांडना बनाए में 16 दिन पूनम का पाटला और चाँद ,तारे ,सूरज , पाँच कुँआरा, बंदनवार डोकरा डोकरी ,निसरणी, छाबड़ी, रुनझुन की गाड़ी, कोट किल्ला ,वान्या की हाटडी,मोर,बिजौरा, पंखा, कौवा,कुआ,बावड़ी,आदि बनाये जाते है। गीत गाये जाते है और आरती प्रसाद बांटा जाता है... संजा कौंन ?उनका सामाजिक आत्मिक और आद्यात्मिक स्वरूप क्या है संजा के गीतों में कहा जाता है-
    "संजा सहेलड़ि बाज़ार में खेले
    बजार में रमे
    वा कोणा जी नी बेटी
    वा खाय खाजा रोटी
    पठानी चाल चाले
    रजवाड़ी बोली बोले
    संजा एडो संजा का माथा बेड़ो "........
    गीत का भाव है कि संजा निडर,साहसी, राजसी वैभव को जीने वाली हमारी सखी है जो कोना जी की बेटी है खाजा खाती है पठानी चाल से चलती है परन्तु वो जल के प्रतीक जीवन में स्वभिमानी पनिहारिन की तरह कर्मशील है।
    दोस्तों निमाड़ की किशोरीय अंतरिक्षीय कल्पना पटल पर प्रारम्भ में चाँद और सूरज का प्रादुर्भाव होता है रात और दिन की तरह ,सुख और दुःख की तरह, संघर्ष की तपिश और सफलता की चांदनी की तरह वो जीवन के कर्मशीलता की साधना में सोलह संस्कारों से अभिसिंचित सोलह दिवसीय लोक महोत्सव में रूपांतरित हो जीवन को गीतात्मक से परिलक्षित और परिभाषित कर फिर जीवन की अनन्तता में विसर्जित हो जाता है।