सलिल सृजन अक्टूबर ३
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सॉनेट
काली
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कल क्यों?, काल आज ला काली
अत्याचारी का विनाश कर
करा पाप से दुनिया खाली
सत्ता-सुख का भवन ताश कर
कलकत्ते की मातु कराली
घर घर आ नैवेद्य ग्रहण कर
हाथों में ले थाम भुजाली
शस्य श्यामला वसुंधरा कर
खप्पर कभी न हो माँ खाली
आतंकी का लहू पान कर
फूल-फलों लद झूमे डाली
सुजला सुफला सलिला हो हर
सींचो बगिया बनकर माली
सदय रहो हे मैया काली
३-१०-२०२२
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प्रार्थना
कब लौं बड़ाई करौं सारदा तिहारी
मति बौराई, जस गा जुबान हारी।
बीना के तारन मा संतन सम संयम
चोट खांय गुनगुनांय धुन सुनांय प्यारी।
सरस छंद छांव देओ, मैया दो अक्कल
फागुन घर आओ रचा फागें माँ न्यारी।
तैं तो सयानी मातु, मूरख अजानो मैं
मातु मति दै दुलार, 'सलिल' काब्य क्यारी।
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ॐ
छंदशाला ३०
पुनीत छंद
(इससे पूर्व- सुगती/शुभगति, छवि/मधुभार, गंग, निधि, दीप, अहीर/अभीर, शिव, भव, तोमर, ताण्डव, लीला, नित, चंद्रमणि/उल्लाला, धरणी/चंडिका, कज्जल, सखी, विजाति, हाकलि, मानव, मधुमालती, सुलक्षण, मनमोहन, सरस, मनोरम, चौबोला, गोपी, जयकारी/चौपई, भुजंगिनी/गुपाल व उज्जवला छंद)
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विधान
प्रति पद १५ मात्रा, पदांत SSI ।
लक्षण छंद-
तिथि पुनीत पंद्रहवी खूब।
चाँद-चाँदनी सोहें खूब।।
गुरु गुरु लघु पद का हो अंत।
सरस सरल हो तो ही तंत।।
उदाहरण-
राजा नहीं, प्रजा का राज।
करता तंत्र लोक का काज।।
भूल न मालिक सच्चा- लोक।
सेवक है नहिं नेता- शोक।।
अफसर शोषण करता देख।
न्यायालय नहिं खींचे रेख।।
व्यापारी करता है लूट।
पत्रकारगण डाले फूट।।
सत्ता नहीं घटाती भाव।
जनता सहे घाव पर घाव।।
२-१०-२०२२
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०००
हरियाणवी हाइकु
*
घणा कड़वा
आक करेला नीम
भला हकीम।१।
*
गोरी गाम की
घाघरा-चुनरिया
नम अँखियाँ।२।
*
बैरी बुढ़ापा
छाती तान के आग्या
अकड़ कोन्या।३।
*
जवानी-नशा
पोरी पोरी मटकै
जोबन-बम।४।
*
कोरा कागज
हरियाणवी हाइकु
लिक्खण बैठ्या।५।
*
'हरि' का 'यान'
देस प्रेम मैं आग्गै
'बहु धान्यक'।६।
*
पीछै पड़ गे
टाबर चिलम के
होश उड़ गे।७।
*
मानुष एक
छुआछूत कर्या
रै बेइमान।८।
*
हैं भारतीय
आपस म्हं विरोध
भूल भी जाओ।९।
*
चिन्ता नै चाट्टी
म्हारी हाण कचोट
रंज नै खाई।१०।
*
ना है बाज का
चिडिय़ा नै खतरा
है चिड़वा का।११।
*
गुरू का दर्जा
शिक्षा के मन्दिर मैं
सबतै ऊँच्चा।१२।
*
कली नै माली
मसलण लाग्या हे
बची ना आस। १३।
*
माणस-बीज
मरणा हे लड़कै
नहीं झुककै।१४।
*
लड़ी लड़ाई
जमीन छुड़वाई
नेता लौटाई।१५।
*
भुख्खा किसाण
कर्ज से कर्ज तारै
माटी भा दाणे।१६।
*
बाग म्हं कूकै
बिरहण कोयल
दिल सौ टूक।१७।
*
चिट्ठी आई सै
आंख्या पाणी भरग्या
फौजी हरख्या।१८।
*
सब नै दंग
करती चूड़ी-बिंदी
मैडल ल्याई।१९।
*
लाडो आ तूं
किलकारी मारकै
सुपणा मेरा।२०।
*
000
अभिनव प्रयोग
दृश्य काव्य-
तीर अलंकार
*
मैं
बच्चा,
बचपन
से दूर हूँ।
मत समझो
बेबस-मजबूर हूँ।
दुनिया बदल सकता
मेहनत से अपनी।
कहूँगा समय से
कल- देख ले!
मैं भी तो
मशहूर
हूँ।
३.१०.२०१६
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अतीत के सिक्के : आज के मुहावरे
2..दमड़ी =1 पाई (पावली )
2..पाई = 1 धेला
2..धेला = 1 पैसा
2..पैसे का 1 टका
2..टका का 1 आना
2..टका की 1 दुवन्नी
2..दुवन्नी की 1 चवन्नी
2.. चवन्नी की 1 अट्ठनी
2.. अट्ठन्नी का 1 रुपया अर्थात् 64 पैसों का एक रुपया ।
स्वामी दयानंद सरस्वती ने सत्य प्रकाश ग्रन्थ में कर्मकांडी पंडितों की अर्थ लोलुपता पर एक श्लोक कहा है:
टका धर्मष्टकाकर्मष्टकाहि परमं पदं
यस्य गृहे टका नास्ति हा टका टकटकायते
इनसे कुछ मुहावरे भी बने:
चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए = कृपाण, कंजूस
पाई-पाई जोड़ना = थोड़ा-थोड़ा बचाना
ढेला भर अकल न होना = थोड़ी भी बुद्धि न होना
पैसे-पैसे को मुहताज = अत्यधिक गरीबी
टका सेर भाजी, टका सेर खाजा, अंधेर नगरी, चौपट राजा = भला-बुरा बराबर
सोलह आने सही = पूरी तरह ठीक
बाप भला न भैया, सबसे भला रुपैया= दुनिया में मतों की नहीं दौलत की कदर होती है.
स्वातंत्र्य सत्याग्रह के समय एक एक नारा लगाकर चंदा माँगा जाता था -
एक चवन्नी चाँदी की, जय बोलो महात्मा गांधी की
कुछ चित्रपटीय गीतों में भी मुद्राओं का जिक्र हुआ है.
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गीत:
कम हैं...
*
जितने रिश्ते बनते कम हैं...
अनगिनती रिश्ते दुनिया में
बनते और बिगड़ते रहते.
कुछ मिल एकाकार हुए तो
कुछ अनजान अकड़ते रहते.
लेकिन सारे के सारे ही
लगे मित्रता के हामी हैं.
कुछ गुमनामी के मारे हैं,
कई प्रतिष्ठित हैं, नामी हैं.
कोई दूर से आँख तरेरे
निकट किसी की ऑंखें नम हैं
जितने रिश्ते बनते कम हैं...
हमराही हमसाथी बनते
मैत्री का पथ अजब-अनोखा
कोई न देता-पाता धोखा
हर रिश्ता लगता है चोखा.
खलिश नहीं नासूर हो सकी
पल में शिकवे दूर हुए हैं.
शब्द-भाव के अनुबंधों से
दूर रहे जो सूर हुए हैं.
मैं-तुम के बंधन को तोड़े
जाग्रत होता रिश्ता 'हम' हैं
जितने रिश्ते बनते कम हैं...
हम सब एक दूजे के पूरक
लगते हैं लेकिन प्रतिद्वंदी.
उड़ते हैं उन्मुक्त गगन में
लगते कभी दुराग्रह-बंदी.
कौन रहा कब एकाकी है?
मन से मन के तार जुड़े हैं.
सत्य यही है अपने घुटने
'सलिल' पेट की ओर मुड़े हैं.
रिश्तों के दीपक के नीचे
अजनबियत के कुछ तम-गम हैं.
जितने रिश्ते बनते कम हैं...
३-१०-२०११
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