बाघा जतीन (जोतिन)
९ सितंबर १९१५ को पुलिस ने जतींद्र नाथ का गुप्त अड्डा 'काली पोक्ष' (कप्तिपोद) से राज महन्ती नमक अफसर ने गाँव के लोगों की मदद से उन्हें पकड़ने की कोशश की। बढ़ती भीड़ को तितर-बितर करने के लिए यतींद्र नाथ ने गोली चला दी। राज महन्ती वहीं ढेर हो गया। यह समाचार पाकर बालासोर का जिला मजिस्ट्रेट किल्वी दल-बल सहित वहाँ आ पहुंचा। यतीश नामक एक क्रांतिकारी बीमार था। जतींद्र उसे अकेला छोड़कर जाने को तैयार नहीं थे। चित्तप्रिय नामक क्रांतिकारी उनके साथ था। दोनों तरफ़ से गोलियाँ चली। चित्तप्रिय वहीं शहीद हो गया। वीरेन्द्र तथा मनोरंजन नामक अन्य क्रांतिकारी मोर्चा संभाले हुए थे। इसी बीच यतींद्र नाथ का शरीर गोलियों से छलनी हो चुका था। वह जमीन पर गिर कर 'पानी-पानी' चिल्ला रहे थे। मनोरंजन उन्हें उठा कर नदी की और ले जाने लगा। तभी अंग्रेज अफसर किल्वी ने गोलीबारी बंद करने का आदेश दे दिया। गिरफ्तारी देते वक्त जतींद्र नाथ ने किल्वी से कहा- 'गोली मैं और चित्तप्रिय ही चला रहे थे। बाकी के तीनों साथी बिल्कुल निर्दोष हैं। 'इसके अगले दिन भारत की आज़ादी के इस महान सिपाही ने अस्पताल में सदा के लिए आँखें मूँद लीं।
रास बिहारी बोस (२५ मई १८८६ सुबलदाहा, बर्धमान - २१ जनवरी १९४५) के पिता बिनोद बिहारी बोस और माता भुवनेश्वरी अपने चाचा कालीचरण बोस की विधवा बिधुमुखी के घर में रहते थे। टिंकोरी दासी रास बिहारी बोस की पालक माता थीं। बोस और उनकी बहन सुशीला की प्रारंभिक शिक्षा कालीचरण की देखरेख में हुई। अपने दादा और शिक्षक (बक्केश्वर) से क्रांतिकारी आंदोलन की कहानियाँ सुनकर बोस इस ओर आकर्षित हुए। वे पूरे गांव के चहेते थे और अपने जिद्दी स्वभाव के लिए जाने जाते थे। उनका उपनाम रसू था। गांव वालों से पता चलता है कि वे 12 या 14 साल की उम्र तक सुबलदाहा में रहे। पिता की हुगली जिले में तैनाती के समय बोस चंदननगर स्थित अपने ननिहाल में रहे और चचेरे भाई श्रीश चंद्र घोष के साथ डुप्लेक्स कॉलेज में पढ़े । प्रधानाचार्य चारु चंद्र रॉय ने उन्हें क्रांतिकारी राजनीति के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कलकत्ता के मॉर्टन स्कूल में दाखिला लिया। उन्होंने चिकित्सा विज्ञान और इंजीनियरिंग में डिग्री प्राप्त की। १९०८ के अलीपुर बम कांड के मुकदमों से बचने के लिए वे बंगाल छोड़कर वन अनुसंधान संस्थान देहरादून में मुख्य क्लर्क हो गए। वहाँ, जुगंतर के अमरेंद्र चटर्जी के माध्यम से वे गुप्त रूप से बंगाल के क्रांतिकारियों से जुड़े। १९१२में लॉर्ड हार्डिंग पर जानलेवा हमला में, उन्होंने अनुशीलन समिति के बसंत कुमार बिस्वास के साथ मिलकर लॉर्ड हार्डिंग के काफिले पर एक स्वयंनिर्मित बम फेंका, जिससे वायसराय गंभीर रूप से घायल हो गए। वे रात की ट्रेन से देहरादून लौटकर अगले दिन कार्यालय में ऐसे शामिल हो गए जैसे कुछ हुआ ही न हो। उन्होंने वायसराय पर हुए इस कायरतापूर्ण हमले की निंदा करने के लिए नागरिकों की एक बैठक आयोजित की। १९१३ में बंगाल में बाढ़ राहत कार्य के दौरान, बोस का संपर्क जतिन मुखर्जी से हुआ, जिनमें उन्हें "एक सच्चा नेता" नज़र आया, जिसने बोस के कम होते उत्साह को "एक नई प्रेरणा" दी। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान वे गदर विद्रोह १९१५ के प्रमुख क्रांतिकारियों में से एक थे। क्रांति विफल रही और अधिकांश क्रांतिकारी किध किए गए। बोस ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों से बचकर वींद्रनाथ टैगोर के रिश्तेदार प्रियनाथ ठाकुर के छद्म नाम सेजापान पहुँच गए। वहाँ बोस ने विभिन्न अखिल एशियाई समूहों के साथ शरण ली। ब्रिटिश सरकार उनके प्रत्यर्पण के लिए जापानी सरकार पर लगातार दबाव डाल रही थी। बचने के लिए उन्होंने टोक्यो में नाकामुराया बेकरी के मालिक और अखिल एशियाई समर्थक आइज़ो सोमा और कोक्को सोमा की बेटी तोशिको सोमा (निधन १९२४) से शादी की और १९२३ में जापानी नागरिक बनकर पत्रकार और लेखक के रूप में रहने लगे। उन्होंने जापान में भारतीय करी को लोकप्रिय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके दो बच्चे बेटा मसाहिदे बोस (भरतचंद्र जन्म १९२०, द्वितीय विश्व युद्ध में २४ वर्ष की आयु में मृत्यु) तथा बेटी तेत्सुको (जन्म १९२२)थे। बोस ने ए.एम. नायर के साथ मिलकर जापानी अधिकारियों को भारतीय क्रांतिकारियों का समर्थन करने के लिए राजी करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने २८-३० मार्च १९४२ को टोक्यो में एक सम्मेलन आयोजित कर भारतीय स्वतंत्रता लीग की स्थापना तथा भारतीय स्वतंत्रता के लिए एक सेना गठित करने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने २२ जून १९४२ को बैंकॉक में लीग के दूसरे सम्मेलन में सुभाष चंद्र बोस को लीग में शामिल होने और अध्यक्ष के रूप में कमान संभालने के लिए आमंत्रित करने का प्रस्ताव पारित कराया। मलाया और बर्मा मोर्चों पर जापानियों द्वारा बंदी बनाए गए भारतीय युद्धबंदियों को भारतीय स्वतंत्रता लीग में शामिल होने और भारतीय राष्ट्रीय सेना (INA) के सैनिक बनने के लिए प्रोत्साहित किया गया था। १ सितंबर १९४२ को रास बिहारी बोस की भारतीय राष्ट्रीय लीग की सैन्य शाखा के रूप में भारतीय राष्ट्रीय सेना का गठन किया गया था। उन्होंने आज़ाद हिंद आंदोलन के लिए ध्वज का चयन किया और ध्वज तथा सत्ता सुभाष चंद्र बोस को सौंप दी जो 'आज़ाद हिंद फौज' बनी। तपेदिक से उनकी मृत्यु से पहले, जापानी सरकार ने उन्हें ऑर्डर ऑफ द राइजिंग सन (द्वितीय श्रेणी) से सम्मानित किया।
कन्हाई लाल दत्त (३० अगस्त १८८८ जन्माष्टमी चंदन नगर, हुगली - १० नवंबर १९०८, अलीपुर, मूल नाम सर्वतोष) का जन्म जन्माष्टमी को मामा के घर में हुआ। उनका आर्किशिक नाम सर्वतोष था। चंदन नगर टैब फ्रांसीसी उपनिवेश था। उनका पैतृक घर बंगाल के श्रीरामपुर में था। चार साल के कन्हाई को उनके पिता चुन्नीलाल दत्त जो सरकार की सेवा में थे, उन्हें बंबई ले गए। ५ साल मुंबई में रहने के बाद ९ साल की उम्र में वह वापस चंदन नगर आ गए और डुप्ले कॉलेज से स्नातक तक शिक्षा प्राप्त की। उनकी राजनीतिक गतिविधियों के चलते ब्रिटिश सरकार ने उनकी डिग्री रोक ली। चारु चन्द्र राय से गहनता के कारण कन्हाई को क्रांति पथ का परिचय प्राप्त हुआ था। चंदन नगर में क्रांति की योजना बनाने वाले ब्रम्ह बाँधव उपाध्याय के संपर्क में कन्हाई युगांतर कार्यालय में काम करने लगे, अपने घर में ही कोलकता की अनुशीलन समिति की एक शाखा बनाई और बाद में अपने क्षेत्र में पाँच अन्य संस्थाओं की भी स्थापना की। इनमें व्यायाम और लाठी आदि की शिक्षा दी गई थी। खुदीराम बोस द्वारा पुराने ज्वालामुखी बम कांड के कारण चौकन्ने अंग्रेजी शासन को मानिकतल्ला की एक गोदाम में क्रान्तिकारियों के अड्डे का पता चला। यह बागान अरविंद घोष के भाई सिविल सर्जन डॉक्टर वारिन्द्र घोष का था। दुर्भाग्य से क्रांतिकारी गुप्तचर विभाग की इस कारस्तानी से सर्वथा अनभिज्ञ रहे। १९०५ के बंगाल विभाजन विरोधी आन्दोलन में कनाईलाल ने भाग लिया तथा आन्दोलन के नेता सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के सम्पर्क में आए। अप्रैल १९०८ को खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने मुजफ्फरपुर में किंग्सफ़ोर्ड पर हमला किया। इस हमले के आरोपी के रूप में कनाईलाल दत्त, अरविन्द घोष और बारीन्द्र कुमार आदि को गिरफ्तार किया गया। उन्हीं के बीच का एक साथी नरेन गोस्वामी सरकारी मुखबिर बन गया। इस मुखबिर से उसके बयान के पूर्व बदला लेने के लिए कनाईलाल दत्त और सत्येन बोस ने मुलाकात के समय कटहल और मछली में छिपकर गुप्त रूप से जेल में रिवाल्वर और कारतूस मँगवाए। योजनानुसार पहले सत्येन बोस, उसके बाद कनाईलाल बीमार होकर अस्पताल में भर्ती हुए। दोनों ने अस्पताल के स्टाफ का विश्वास जीता। सत्येन ने मुखबिर नरेन गोस्वामी के पास खुद को सरकारी गवाह बनने का संदेश भिजवाया। नरेन प्रसन्न होकर सत्येन से मिलने जेल अस्पताल पहुँचा। ३१ अगस्त सन १९०८ को कनाईलाल और सत्येन बोस ने उसे गोलियों से ढेर कर दिया। दोनों को मृत्युदंड मिला। कन्हाई को १० मार्च १९०८ को तथा सत्येन्द्र को दो दिन बाद प्राण दंड दिया गया। जन आक्रोश के भी से सरकार ने कन्हाई का अंतिम संस्कार जेल में ही कराया।
| पत्नी अंजली और पुत्री भारती के साथ बटुकेश्वर दत्त |
पाठशाला की नौकरी करते हुए उनकी भेंट अज्ञातवास में रह रहे प्रसिद्ध क्रांतिकारी सूर्य सेन से हुई। प्रीतिलता उनके दल की सक्रिय सदस्य बनी। सूर्य सेन का एक साथी रामकृष्ण विश्वास कलकत्ता के अलीपुर जेल में था जिसे फाँसी की सज़ा सुनाई गई थी। उससे मिलना आसान नहीं था लेकिन प्रीतिलता उनसे कारागार में लगभग चालीस बार मिली और किसी अधिकारी को उन पर संशय भी नहीं हुआ। यह था, उनकी बुद्धिमत्ता और बहादुरी का प्रमाण। इसके बाद वे सूर्यसेन के नेतृत्त्व कि इन्डियन रिपब्लिकन आर्मी में महिला सैनिक बनी। पूर्वी बंगाल के घलघाट में क्रान्तिकारियो को पुलिस ने घेर लिया था घिरे हुए क्रान्तिकारियों में अपूर्व सेन, निर्मल सेन, प्रीतिलता और सूर्यसेन आदि थे। सूर्यसेन ने लड़ाई करने का आदेश दिया। अपूर्वसेन और निर्मल सेन शहीद हो गये। सूर्यसेन की गोली से कैप्टन कैमरान मारा गया। सूर्यसेन और प्रीतिलता लड़ते-लड़ते भाग गए। क्रांतिकारी सूर्यसेन पर १० हजार रुपये का इनाम घोषित था। दोनों एक सावित्री नाम की महिला के घर गुप्त रूप से रहे। वह महिला क्रान्तिकारियों को आश्रय देने के कारण अंग्रेजों का कोपभाजन बनी। सूर्यसेन ने अपने साथियों का बदला लेने की योजना बनाई कि पहाड़ी की तलहटी में यूरोपीय क्लब पर धावा बोलकर नाच-गाने में मग्न अंग्रेजो को मृत्यु का दंड देकर बदला लिया जाए। प्रीतिलता के नेतृत्त्व में कुछ क्रांतिकारी २४ सितम्बर १९३२ की रात इस काम के लिए गए। हथियारों से लैस प्रीतिलता ने आत्म रक्षा के लिए पोटेशियम साइनाइड नामक विष भी रख लिया था। क्लब की खिड़की में बाहर से बम लगाया, क्लब की इमारत बम फटने और पिस्तौल की आवाज़ से काँप उठी। नाच-रंग के वातावरण में एकाएक चीखें सुनाई देने लगी। १३ अंग्रेज जख्मी हुए, बाकी भाग गए, एक यूरोपीय महिला मारी गई। क्लब से हुई गोलीबारी में प्रीतिलता के शरीर में एक गोली लगी। वे घायल अवस्था में भागीं लेकिन गिरते ही और पोटेशियम सायनाइड खा लिया। मात्र २१ साल की उम्र में उन्होंने झाँसी की रानी की तरह अंतिम समय तक अंग्रेजों से लड़ते हुए स्वयं ही मृत्यु का वरण कर लिया। प्रीतिलता के आत्म बलिदान के बाद तलाशी में अंग्रेज अधिकारियों को मिले पत्र में छपा था कि चटगाँव शस्त्रागार काण्ड के बाद जो मार्ग अपनाया जाएगा, वह भावी विद्रोह का प्राथमिक रूप होगा। यह संघर्ष भारत को पूरी स्वतंत्रता मिलने तक जारी रहेगी।
वीणा दास
वीणा दास (२४ अगस्त १९११ - २६ दिसम्बर १९८६) बीणा दास सुप्रसिद्ध ब्रह्म समाजी शिक्षक वेणीमाधव दास और सामाजिक कार्यकर्त्ता सरला देवी की पुत्री थीं। वे सेंट जॉन डोसेसन गर्ल्स हायर सैकण्डरी स्कूल की छात्रा रहीं। वे कोलकाता में महिलाओं के संचालित अर्ध-क्रान्तिकारी संगठन छात्री संघ की सदस्या थीं। ६ फरवरी १९३२ को कलकत्ता विश्वविद्यालय के समावर्तन उत्सव (दीक्षान्त समारोह) में बंगाल के अंग्रेज लाट सर स्टैनले जैकसन मुख्य अतिथि थे। उस अवसर पर उपाधि लेने आई कुमारी वीणादास ने गवर्नर स्टनली जैक्शन पर गोली चला दी। गोली गवर्नर के कान के पास से निकल गई, वह मंच पर लेट गया। लेफ्टिनेन्ट कर्नल सुहरावर्दी ने दौड़कर वीणादास का गला एक हाथ से दबा लिया और दूसरे हाथ से पिस्तोलवाली कलाई पकड़ कर सीनेट हाल की छत की तरफ कर दी। वीणादास गोली चलाती गई, लेकिन पाँचों गोलियाँ निशाना चूक गईं। उन्होंने पिस्तौल फेंक दी। अदालत में वीणादास ने एक साहसपूर्ण बयान दिया। अखबारों पर रोक लगा दिये जाने के कारण वह बयान प्रकाशित न हो सका। इसके लिए उन्हें नौ वर्षों के लिए सख़्त कारावास की सजा दी गई। १९३९ में रिहा होने के बाद दास ने कांग्रेस पार्टी की सदस्य बनकर सन् १९४२ में भारत छोड़ो आन्दोलन में भाग लिया और १९४२ से १९४५ तक कारावास भोगा। वे १९४६-४७ में बंगाल प्रान्त विधान सभा और १९४७ से १९५१ तक पश्चिम बंगाल प्रान्त विधान सभा की सदस्या रहीं। उन्होंने १९४७ में युगान्तर समूह के स्वतन्त्रता कार्यकर्ता साथी ज्योतिष चन्द्र भौमिक से विवाह किया। बीणा दास ने बंगाली में 'शृंखल झंकार' और 'पितृधन' नामक दो आत्मकथाएँ लिखीं। पति की मृत्यु के बाद वे कलकत्ता छोड़कर ऋषिकेश के एक छोटे से आश्रम में एकान्त में रहने लगीं । अपना गुज़ारा करने के लिए उन्होंने शिक्षिका के तौर पर काम किया और सरकार द्वारा दी जानेवाली स्वतंत्रता सेनानी पेंशन लेने से इंकार कर दिया। भारतमाता के लिए स्वयं को समर्पित कर देने वाली इस वीरांगना का अन्त बहुत ही दुखद था। महान स्वतंत्रता सेनानी, प्रोफेसर सत्यव्रत घोष ने अपने लेख 'फ्लैश बैक: बीना दास – रीबोर्न' में उनकी मार्मिक मृत्यु के बारे में लिखा- ''उन्होंने सड़क के किनारे अपना जीवन समाप्त किया। उनका मृत शरीर बहुत ही छिन्न-भिन्न अवस्था में था। रास्ते से गुज़रने वाले लोगों को उनका शव मिला। पुलिस को सूचित किया गया और महीनों की तलाश के बाद पता चला कि यह शव बीना दास का है। यह सब उसी आज़ाद भारत में हुआ जिसके लिए इस अग्नि-कन्या ने अपना सब कुछ ताक पर रख दिया था। देश को इस मार्मिक कहानी को याद रखते हुए, देर से ही सही, लेकिन अपनी इस महान स्वतंत्रता सेनानी को सलाम करना चाहिए।''
शांति सेन (२५ दिसंबर १९१३ मालदा - १६ सितंबर १९९६) एक भारतीय क्रांतिकारी और तेज निशानेबाज थे, अंग्रेजों ने उन्हें शांति क्रैकशूट सेन नाम दिया। मालदा जिला स्कूल से मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण कर वे अपने पिता के साथ मिदनापुर चले गए और कॉलेज में दाखिला लिया। बाद में वे ब्रिटिश भारत के एक क्रांतिकारी संगठन, बंगाल वॉलंटियर्स में शामिल हो गए । दो पिछले जिला मजिस्ट्रेट जेम्स पेडी और रॉबर्ट डगलस की हत्या के बाद, कोई ब्रिटिश अधिकारी मिदनापुर जिले का प्रभार लेने के लिए तैयार नहीं था। पूर्व सैनिक बर्नार्ड ईजे बर्गे को तब मिदनापुर जिले में तैनात किया गया था । बंगाल स्वयंसेवकों के सदस्यों रामकृष्ण रॉय , ब्रजकिशोर चक्रवर्ती, प्रभांशु शेखर पाल, कामाख्या चरण घोष, सोनातन रॉय, नंदा दुलाल सिंह, सुकुमार सेन गुप्ता, बिजॉय कृष्ण घोष, पूर्णानंद सान्याल, मणिंद्र नाथ चौधरी, सरोज रंजन दास कानूनगो, शांति गोपाल सेन, शैलेश चंद्र घोष, अनाथ बंधु पांजा और मृगेंद्र दत्ता ने बरगे की हत्या करने का फैसला किया। रॉय, चक्रवर्ती, निर्मल जिबोन घोष और दत्ता ने मिदनापुर पुलिस मैदान में मिदनापुर मोहम्मडन स्पोर्टिंग क्लब (मोहम्मडन एससी (कोलकाता) का एक फैन क्लब ) और मिदनापुर टाउन क्लब ( ब्रैडली-बर्ट चैलेंज कप कॉर्नर शील्ड प्रतियोगिता) के बीच फुटबॉल मैच खेलते समय बर्ज की गोली मारकर हत्या करने की योजना बनाई। २ सितंबर १९३३ को पुलिस परेड ग्राउंड में फुटबॉल मैच के हाफ टाइम के दौरान, बर्ज की पांजा और दत्ता ने गोली मारकर हत्या कर दी। पांजा को बर्ज के एक अंगरक्षक ने मौके पर ही मार डाला। दत्ता को भी गोली लगी और अगले दिन अस्पताल में उसकी मौत हो गई। गोलीबारी के बाद शांति गोपाल सेन साइकिल लेकर सालबानी जंगल भाग गया। वहाँ उसने गोदापियासल रेलवे स्टेशन से ट्रेन पकड़ी। गोदापियासल गाँव के बिनोद सेन उर्फ बिनोद बिहारी सेन नामक एक क्रांतिकारी ने इस मामले में उसकी मदद की। एक साल बाद शांति गोपाल को कोलकाता से गिरफ्तार कर लिया गया। ब्रिटिश सरकार की विशेष अदालत ने उसे और छह अन्य लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई और उसे अंडमान द्वीप समूह भेज दिया। वह १९४६ में जेल से रिहा हुआ। भारत की स्वतंत्रता के बाद सेन ने १९५७, १९६२ और १९६७ में पश्चिम बंगाल विधानसभा की इंग्लिश बाजार सीट से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में विधानसभा चुनाव जीते। अपने शेष जीवन में सेन ने एक समाजसेवी के रूप में काम किया।उन्हें १९७२ में भारत सरकार द्वारा ताम्रपत्र से सम्मानित किया गया। उन्होंने मालदा महिला महाविद्यालय और मालदा बालिका विद्यालय (शांति सेन बालिका विद्यालय) की स्थापना के लिए विभिन्न प्रकार से दान दिया । उनके नाम पर 'शांति सेन सरणि' नामक एक सड़क का नामकरण किया गया।
वीर क्रांतिकारियों, आजाद हिंद फौज के सैनिकों तथा सत्याग्रहियों के सम्मिलित प्रयासों के फलस्वरूप भारत को १५ अगस्त १९४७ को स्वतंत्रता मिली। हमारा कर्तव्य है कि हम इन सबको याद कर देश के प्रति समर्पित होने का संकल्प करें। इस एक लेख में सब सेनानियों की जनक्री दे पान संभव नहीं है। अनेक सेनानी विशेषकर महिलाओं का योगदान अनदेखा-अनसुना है। हमें इतिहास में पैठकर वास्तविक सेनानियों के अवदान पर साहित्य लेखन, उनके समरक बनाने, उनके वंशजों के प्रति आभार व्यक्त करने के कर्तव्य का पालन करना चाहिए।
