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शनिवार, 11 नवंबर 2023

हाइकु गीत, ऊषा, दोहा, गीत,

नरक चौदस / रूप चतुर्दशी पर विशेष रचना:
*
असुर स्वर्ग को नरक बनाते
उनका मरण बने त्यौहार.
देव सदृश वे नर पुजते जो
दीनों का करते उपकार..
अहम्, मोह, आलस्य, क्रोध, भय,
लोभ, स्वार्थ, हिंसा, छल, दुःख,
परपीड़ा, अधर्म, निर्दयता,
अनाचार दे जिसको सुख..
था बलिष्ठ-अत्याचारी
अधिपतियों से लड़ जाता था.
हरा-मार रानी-कुमारियों को
निज दास बनाता था..
बंदीगृह था नरक सरीखा
नरकासुर पाया था नाम.
कृष्ण लड़े, उसका वधकर
पाया जग-वंदन कीर्ति, सुनाम..
रजमहिषियाँ कृष्णाश्रय में
पटरानी बन हँसी-खिलीं.
कहा 'नरक चौदस' इस तिथि को
जनगण को थी मुक्ति मिली..
नगर-ग्राम, घर-द्वार स्वच्छकर
निर्मल तन-मन कर हरषे.
ऐसा लगा कि स्वर्ग सम्पदा
धराधाम पर खुद बरसे..
'रूप चतुर्दशी' पर्व मनाया
सबने एक साथ मिलकर.
आओ हम भी पर्व मनाएँ
दें प्रकाश दीपक बनकर..
'सलिल' सार्थक जीवन तब ही
जब औरों के कष्ट हरें.
एक-दूजे के सुख-दुःख बाँटें
इस धरती को स्वर्ग करें..
४-११-२०१०
***
***
दोहा 
किरण सलिल जब जब मिले, स्वर्णिम आभा देख।
निशि में भी आलोक हो, पवन मुग्ध हो लेख।।
***
हाइकु गीत
*
ऊषा की माँग
माँग भरे सूरज
हो गई पूरी।
*
गगन सजा / पंछी बने बाराती / आ रहा मजा
फहर रही / भू से गगन तक / प्रणय ध्वजा
ऊषा शर्माई
चेहरे पर छाई
लालिमा नूरी।
*
गूँजते गीत / पत्ते बजाते वाद्य / मजा ही मजा
धरती सास / हँसती मुँह देख / प्रभु की रजा
देवर चंदा
करे जब मजाक
भौजी सिंदूरी।
*
देता आशीष / बाबुल आसमान / हो सुखी सदा
दूध नहाओ / हमेशा फूलो फलो / पुत्री शुभदा
दोनों कुलों का
रखना तुम मान
सीख है जरूरी।
११.११.२०२१
***
दोहा सलिला
*
श्री श्री की श्री-सरलता, मीठी वाणी खूब
उतना ही ज्यादा मिले, जितना जाओ डूब
*
अरुण! गीतमय हो रहा, रजनी भाव विभोर
उषा लाल-पीली हुई, पवन कर रहा शोर
*
शिशु शशि शीश शशीश चुप, शशिवदनी-शशिनाथ
कुंडलि कुंडलिनाथ की, निरखें गहकर हाथ
*
दिन कर दिनकर ने कहा, उठो! करो कुछ काम
काम करो निष्काम तब, नाम न रख हो नाम
*
सरसों के पीले किये, जब से भू ने हाथ
एक साथ हँस-रो रही, उठा-झुका कर माथ
*
जन्म ब्याह राखी तिलक, गृह-प्रवेश त्यौहार
हर अवसर पर दे 'सलिल', पुस्तक ही उपहार
*
तन कुंडा में कुंडली, आत्म चेतना जान
छंद कुंडली रच 'सलिल', मन होगा रसखान
*
भू, जल, अग्नि, पवन,गगन, पञ्च चक्र के तत्व
रख विवेक जाग्रत सलिल', तभी प्राप्त हो सत्व
*
खुद में खुद ही डूब जा, खुद रह खुद से दूर
खुद ही खुद मिल जायेगा, तुझको खुद का नूर
*
खुदा खुदी खुद में रहे, खुद न खुदा से भिन्न
जुदा खुदा से कब हुआ, कोई सलिल'अभिन्न
*
कौन जगत में सगा है?, बोल कौन है गैर?
दोनों हाथ पसारकर, माँग सभी की खैर
*
मत प्रयास करना अधिक, और न देना छोड़
थोड़ी-थोड़ी कोशिशें, लोहा भी दें मोड़
*
जोड़-तोड़ से क्या मिला?, खोया मन का चैन
होड़ न करना किसी से, छोड़ स्वार्थ पा चैन
*
अधिक खींचने से 'सलिल', टूटे मन की डोर
अधिक ढील से उलझकर, गुम चैन के छोर
*
*
सु-मन ग्रहण कविता करे, मिले सुमन सी गंध
दूर दृष्ट भी हो निकट, हट जाए मन-बंध
११.११.२०१६
***
गीत:
कौन हो तुम?
*
कौन हो तुम?
मौन हो तुम?...
*
समय के अश्वों की वल्गा
निरंतर थामे हुए हो.
किसी को अपना किया
ना किसी के नामे हुए हो.

अनवरत दौड़ा रहे रथ
दिशा, गति, मंजिल कहाँ है?
डूबते ना तैरते, मझधार या
साहिल कहाँ है?

क्यों कभी रुकते नहीं हो?
क्यों कभी झुकते नहीं हो?
क्यों कभी चुकते नहीं हो?
क्यों कभी थकते नहीं हो?

लुभाते मुझको बहुत हो
जहाँ भी हो जौन हो तुम.
कौन हो तुम?
मौन हो तुम?...
*
पूछता है प्रश्न नाहक,
उत्तरों का जगत चाहक.
कौन है वाहन सुखों का?
कौन दुःख का कहाँ वाहक?

करो कलकल पर न किलकिल.
ढलो पल-पल विहँस तिल-तिल.
साँझ को झुरमुट से झिलमिल.
झाँक आँकों नेह हिलमिल.

क्यों कभी जलते नहीं हो?
क्यों कभी ढलते नहीं हो?
क्यों कभी खिलते नहीं हो?
क्यों कभी फलते नहीं हो?

छकाते हो बहुत मुझको
लुभाते भी तौन हो तुम.
कौन हो तुम?
मौन हो तुम?...
११.११.२०१० 
***

शुक्रवार, 10 नवंबर 2023

हाइबन, हाइकु, ताँका, सेदोका, चोका, हाइगा, ककुप, माहिया, जनक छंद, कहमुकरी, मुक्तिका, दोहा, गीत, लघुकथा


***
हाइबन
*
'विश्वैक नीड़म्' (संसार एक घोंसला है), 'वसुधैव कुटुम्बकम्' (पृथ्वी एक कुटुंब है) आदि अभिव्यक्तियाँ भारतीय मनीषा की उदात्तता की परिचायक हैं। विश्ववाणी हिंदी इसी पृष्ठभूमि में विश्व की हर भाषा-बोली के शब्दों और साहित्य को गले लगाती है। हिंदी साहित्य लेखन को मुख्यत: गद्य-पद्य दो वर्गों में रखे जाने के साथ ही दोनों मिलाकर अथवा दोनों विधाओं के गुण-धर्म युक्त साहित्य रचा जाता रहा है। 'गद्य ग़ीत', 'अगीत' आदि ऐसी ही काव्य-विधाएँ हैं। गद्य गीत वह गद्य है जिसमें आंशिक गीतात्मकता हो। अगीत ऐसे गीत हैं जिनमें गीत के बंधन शिथिल कर आंशिक गद्यात्मकता को आत्मसात किया गया हो। इन दोनों विधाओं की रचनाएँ कथ्यानुसार आकार ग्रहण करती हैं। हाइकु, ताँका, सेदोका, चोका, स्नैर्यू आदि काव्य विधाएँ हिंदी में ग्रहण की जा चुकी हैं। जापानी काव्य विधा 'हाईकु' के रचना विधान (तीन पंक्तियों में ५-७-५ उच्चार) में पद्य-गद्य का मिश्रित रूप है 'हाइबन'।
डॉ. हरदीप कौर संधू के अनुसार- ''हाइबन' जापानी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है 'काव्य-गद्य'। हाइबन गद्य तथा काव्य का संयोजन है। १७ वीं शताब्दी के कवि बाशो ने इस विधा का आरंभ १६९० में आपने एक दोस्त को खत में सफरनामा /डायरी के रूप में 'भूतों वाली झोंपड़ी' लिखकर किया। इस खत के अंत में एक हाइकु लिखा गया था। हाइबन की भाषा सरल, मनोरंजक तथा बिंबात्मक होती है। इस में आत्मकथा, लेख , लघुकथा या यात्रा का ज़िक्र आ सकता है। पुरातन समय में हाइबन एक सफरनामे या डायरी के रूप में लिखी जाता था। यात्रा करने के बाद बौद्ध भिक्षु पूरी दिनचर्या को वार्ता के रूप में लिख लेता था और अंत में एक हाइकु भी''
चढ़ती लाली
पत्ती -पत्ती बिखरा
सुर्ख गुलाब।
(यह हाइकु विकलांग बच्चों के माता -पिता के मन की दशा को ब्यान करता है। इन बच्चों की जिंदगी तो अभी शुरू ही हुई है अभी तो दिन चढ़ा ही है। सूर्य की लालिमा ही दिखाई दे रही है…मगर सुर्ख गुलाब …ये बच्चे …पत्ती-पत्ती हो बिखर भी गए। इनको तमाम जिंदगी इनके माता -पिता ही सँभालेंगे। स्कूल ऑफ़ स्पेशल एजुकेशन -"चिल्ड्रन विथ स्पेशल नीड्स "… का अनुभव ब्यान करता )
कुछ और उदाहरण-
बहती हवा
लाई धूनी की गंध
देव द्वार से।
(अभी अभी बाहर टहलने निकली तो वातावरण में धूप अगरबत्ती फूल सबका मिला जुला गंध बहुत ही मोहक लगा.... लेकिन कहीं पास में ना तो कोई माता पंडाल है और ना कोई मन्दिर है)
*
अट्टा जो मिले
ढूँढें झिर्री जीवन
रश्मि हवा भी
(अगर जोड़ते है इसे एक लड़की के अरमानों से...जिसकी गरीब मोहब्बत की झोपड़ी को कुचल कर उसके ऊपर बना दिया गया है... एक महल... उसे थमा दिया गया है सोने का एक महल... जिसमे कैद है वो... अपने अरमानों के साथ... नहीं है एक धड़कता दिल जो बन सके एक झरोखा... उसकी कैद जिन्दगी में... जिससे आ सके थोड़ी सी रोशनी और खुली हवा...चारों ओर ऊँची-ऊँची दीवारें है... जिनसे टकराकर दुआएँ भी लौट जाती हैं ... हैं तो बस दीवारें और अँधेरा ... और ढूँढती रहती है वो एक झरोखा... उन दीवारों में)
*
नभ बिछुड़ा
बेसहारों का आस
उडु भू संगी ।
*
कुछ अन्य जापानी काव्य विधाएँ-
हाइकु (३ पंक्तियों में ५-७-५ उच्चार) भूल न जाना / झाड़ियों में खिले ये / बेर के फूल -बाशो
. नश्वर संसार में / छोटी सी चिड़िया भी / बनाती है नीड़ -इस्सा
. मंदिर के घंटे पर चुपचाप सोई है एक तितली -बुसोन
.
आकाश बड़ा
हौसला हारिल का
उससे बड़ा -नलिनिकान्त
. ईंट-रेत का
मंदिर मनहर
देव लापता -संजीव वर्मा 'सलिल' .
जेरीली हवा
हमनेज करीदी
अबे भुगतां -मालवी हाइकु, ललिता रावल
*
ताँका (५ पंक्तियों में ५-७-५-७-७ उच्चार)
जापानी काव्य विधा ताँका (短歌) को नौवीं शताब्दी से बारहवीं शताब्दी के दौरान प्रसिद्धि मिली। इसके विषय धार्मिक या दरबारी हुआ करते थे। हाइकु का उद्भव इसी से हुआ।[1] इसकी संरचना ५+७+५+७+७=३१ वर्णों से होती है। एक कवि प्रथम ५+७+५=१७ भाग की रचना करता था तो दूसरा कवि दूसरे भाग ७+७ की पूर्त्ति के साथ शृंखला को पूरी करता था। फिर पूर्ववर्ती ७+७ को आधार बनाकर अगली शृंखला में ५+७+५ यह क्रम चलता; फिर इसके आधार पर अगली शृंखला ७+७ की रचना होती थी। इस काव्य शृंखला को रेंगा कहा जाता था।
इस प्रकार की शृंखला सूत्रबद्धता के कारण यह संख्या १०० तक भी पहुँच जाती थी। ताँका पाँच पंक्तियों और ५+७+५+७+७=३१ वर्णों के लघु कलेवर में भावों को गुम्फित करना सतत अभ्यास और सजग शब्द साधना से ही सम्भव है। इसमें यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि इसकी पहली तीन पंक्तियाँ कोई स्वतन्त्र हाइकु है। इसका अर्थ पहली से पाँचवीं पंक्ति तक व्याप्त होता है।
ताँका का शाब्दिक अर्थ है लघुगीत अथवा छोटी कविता। लयविहीन काव्यगुण से शून्य रचना छन्द का शरीर धारण करने मात्र से ताँका नहीं बन सकती। साहित्य का दायित्व बहुत व्यापक है। अत: ताँका को किसी विषय विशेष तक सीमित नहीं किया जा सकता।
रो रही रात
बुला रही चाँद को
तारों को भी
डरती- सिसकती
अमावस्या है आज - डॉ. अनीता कपूर
.
मदन गंध
कहाँ से आ रही है?
तुम आए क्या?
महके हैं
घर-आँगन मेरे -आचार्य भगवत दुबे
.
मन बैरागी
हुआ है आज बागी
तुम्हें देख के
बुनता नए स्वप्न
जीन की आस जागी -मंजूषा 'मन'
*
सेदोका (६ पंक्तियों में ५-७-७, ५-७-७ उच्चार)
जापान में ८वीं सदी में प्रचलित रहा छंद जिसमें प्रेमी या प्रेमिका को सम्बोधित कर ५-७-७, ५-७-७ दो अधूरी काव्य रचनाएँ (प्रश्नोत्तर / संवाद भी) संगुफित होती हैं। इसे कतौता (katauta = kah-tah-au-tah) कहते हैं। इसमें विषयवस्तु, ३८ वर्ण, पंक्ति संख्या या तुक बंधन रूढ़ नहीं होता। सेदोका का वैशिष्ट्य संवेदनशीलता है।
ले जाओ सब
वो जो तुमने दिया
शेष को बचाना है
सँभालने में
आधी चुक गई हूँ
भ्रम को हटाना है -डॉ. अनीता कपूर .
क्या पूछते हो रास्ता जाता कहाँ है? बताऊँ सच सुनो। जाता नहीं है रास्ता कोई कहीं भी हमेशा जाते हमीं। -संजीव वर्मा 'सलिल'
*
चोका
चोका उच्चार पर आधारित उच्च स्वर में गाई जाने वाली एक लम्बी कविता (नज़्म) है। चुका में ५ और ७ वर्णों के क्रम में यथा ५+७+५ +७+५+ ....... पंक्तियों को व्यवस्थित करते हैं और अन्त में एक ताँका अर्थात ७ वर्ण की एक और पंक्ति जोड़ देते हैं। इसमें पंक्ति संख्या या विषय बंधन नहीं है।
खुद ही काटें
ये दु:ख की फ़सलें
सुख ही बाँटें
है व्याकुल धरती
बोझ बहुत
सबके सन्तापों का
सब पापों का
दिन -रात रौंदते
इसका सीना
कर दिया दूभर
इसका जीना
शोषण ठोंके रोज़
कील नुकीली
आहत पोर-पोर
आँखें हैं गीली
मद में ऐंठे बैठे
सत्ता के हाथी
हैं पैरों तले रौंदे
सच के साथी
राहें हैं जितनी भी
सब में बिछे काँटे । -रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' *
हाइगा (चित्र कविता)
एक छोटा लड़का जिसे हाइगा के लिए मार्गदर्शन दिया जा रहा है।
हाइगा शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है 'हाइ' और 'गा'। हाइ शब्द का अर्थ है हाइकु और 'गा' का तात्पर्य है चित्र। इस प्रकार हाइगा का अर्थ है चित्रों के समायोजन से वर्णित किया गया हाइकु। वास्तव में हाइगा’ जापानी पेण्टिंग की एक शैली है, जिसका शाब्दिक अर्थ है-’चित्र-कविता’। हाइगा की शुरुआत १७ वीं शताब्दी में जापान में हुई। तब हाइगा रंग-ब्रुश से बनाया जाता था।
*
भारतीय लघु काव्य विधाएँ
ककुप
मिल पौधे लगाइए
वसुंधरा हरी-भरी बनाइये
विनाश को भगाइए
*
माहिया
फागों की तानों से
मन से मन मिलते
मधुरिम मुस्कानों से
*
जनक छंद (३ पंक्तियाँ १३-१३-१३ मात्राएँ)
सबका सबसे हो भला
सभी सदा निर्भय रहें
हो मन का शतदल खिला
.
कहमुकरी
सृष्टि रचे प्रभु खेल कर रहा
नित्य अशुभ-शुभ मेल कर रहा
रसवर्षा ही है अरमान
आसमान है?, नहिं अभियान
***
यह भी खूब रही
सुहागरात में आलू भूनना
--------------------------------
कवि कब क्या कर बैठे, कोई नहीं कह सकता। कवी होता ही है अपने मन का मालिक, धुन का पक्का, प्रचलित नियमें-क़ायदों-मूल्यों को तहस-नहस कर अपनी तरह से जीवन जीनेवाला, सारी वर्जनाओं को ठेंगा दिखानेवाला, 'मेरी मुर्गी की एक टाँग' को माननेवालावाला।
विश्वास न हो तो पढ़िए एक रोचक प्रसंग सोवियत रूस के सुप्रसिद्ध कवि ओसिप मन्देलश्ताम और उसकी पत्नी चित्रकार नाद्‍या हाज़िना का, कैसे उन दोनों ने मनाई सुहागरात।
मिख़ाइल मठ के बाहर बने बाज़ार से उन्होंने एक-एक पैसे वाली दो नीली अँगूठियाँ ख़रीद लीं, पर वे अँगूठियाँ उन्होंने एक-दूसरे को पहनाई नहीं। मन्देलश्ताम ने वह अँगूठी अपनी जेब में ठूँस ली और नाद्या हाज़िना ने उसे अपने गले में पहनी ज़ंजीर में पिरो लिया।
मन्देलश्ताम ने इस अनोखी शादी के मौक़े पर शरबती आँखों वाली अपनी अति सुन्दर व आकर्षक प्रेमिका को उसी बाज़ार से एक उपहार भी ख़रीदकर भेंट किया। यह उपहार था - लकड़ी की एक हस्तनिर्मित ख़ूबसूरत कँघी, जिस पर लिखा हुआ था - 'ईश्वर तुम्हारी रक्षा करे।' हनीमून की जगह मन्देलश्ताम नाद्या को द्‍नेपर नदी में नौका-विहार के लिए ले गए और उसके बाद नदी किनारे बने कुपेचिस्की बाग़ में अलाव जलाकर उसमें आलू भून-भून कर खाते हुए दोनों ने अपने विवाह की सुहागरात मनाई।
***
मुक्तिका
(१४ मात्रिक मानव जातीय छंद, यति ५-९)
मापनी- २१ २, २२ १ २२
*
आँख में बाकी न पानी
बुद्धि है कैसे सयानी?
.
है धरा प्यासी न भूलो
वासना, हावी न मानी
.
कौन है जो छोड़ देगा
स्वार्थ, होगा कौन दानी?
.
हैं निरुत्तर प्रश्न सारे
भूल उत्तर मौन मानी
.
शेष हैं नाते न रिश्ते
हो रही है खींचतानी
.
देवता भूखे रहे सो
पंडितों की मेहमानी
.
मैं रहूँ सच्चा विधाता!
तू बना देना न ज्ञानी
.
संजीव, १०.१०.२०१८
***
मुक्तिका
छंद: महापौराणिक जातीय पीयूषवर्ष छंद
मापनी: २१२२ २१२२ २१२
बह्र: फ़ायलातुन् फ़ायलातुन् फायलुन्
*
मीत था जो गीत सारे ले गया
ख्वाब देखे जो हमारे ले गया
.
दर्द से कोई नहीं नाता रखा
वस्ल के पैगाम प्यारे ले गया
.
हारने की दे दुहाई हाय रे!
जीत के औज़ान न्यारे ले गया
.
ताड़ मौका वार पीछे से किया
फोड़ आँखें अश्क खारे ले गया
.
रात में अच्छे दिनों का वासता
वायदों को ही सकारे ले गया
.
बोल तो जादूगरी कैसे करी
पूर्णिमा से ही सितारे ले गया
.
साफ़ की गंगा न थोड़ी भी कहीं
गंदगी जो थी किनारे ले गया
***
संजीव, १०.११.२०१८
***
दोहा सलिला
स्वास्थ्य संपदा है सलिल, सचमुच ही अनमोल
वह खाएँ जो पच सके, रखें याद यह बोल
*
अदरक थोड़ी चूसिये, अजवाइन के साथ
हो खराश से मुक्ति तब, कॉफ़ी भी लें साथ
*

मिश्र न हो सुख-दुख अगर, जीवन हो रसहीन.
बने 'सलिल' रसखान यदि, रहे सदा रसलीन.
*
मन प्रशांत हो तो करे, पूर्ण शक्ति से काम.
मन अशांत हो यदि 'सलिल', समझें विधना वाम.
*
सुख पाने के हेतु कर, हर दिन नया उपाय.
मन न पराजित हो 'सलिल', कभी न हो निरुपाय.
*
अदरक थोड़ी चूसिये, अजवाइन के साथ
हो खराश से मुक्ति जब, कॉफ़ी प्याला हाथ
१०.११.२०१७
***
मुक्तक
कविता उबालें, भूनें, तलें तो, धोना न भूलें यही प्रार्थना है
छौंकें-बघारें तो हो आंच मद्दी, जला दिल न लेना यही कामना है
जो चटनी सी पीसो तो मिर्ची भी डालो, मगर हो न ज्यादा खटाई तनिक हो
पुदीना मिला लो, ढेली हो गुड़ की, चटखारे लेना सफल साधना है
*
***
षट्पदी
*
संजीवनी मिली कविता से सतत चेतना सक्रिय है
मौन मनीषा मधुर मुखर, है, नहीं वेदना निष्क्रिय है
कभी भावना, कभी कामना, कभी कल्पना साथ रहे
मिली प्रेरणा शब्द साधना का चेतन मन हाथ गहे
व्यक्त तभी अभिव्यक्ति करो जब एकाकार कथ्य से हो
बिम्ब, प्रतीक, अलंकारों से रस बरसा नव बात कहो
१०.११.२०१६
***
दोहा दीप
*
अच्छे दिन के दिए का, ख़त्म हो गया तेल
जुमलेबाजी हो गयी, दो ही दिन में फेल
*
कमल चर गयी गाय को, दुहें नितीश कुमार
लालू-राहुल संग मिल, खीर रहे फटकार
*
बड़बोलों का दिवाला, छुटभैयों को मार
रंग उड़े चेहरे झुके, फीका है त्यौहार
*
मोदी बम है सुरसुरी, नितिश बाण दमदार
अमित शाह चकरी हुए, लालू रहे निहार
*
पूँछ पकड़ कर गैर की, बिसरा मन का बैर
मना रही हैं सोनिया, राहुल की हो खैर
*
शत्रु बनाकर शत्रु को, चारों खाने चित्त
हुए, सुधारो भूल अब. बात बने तब मित्त
*
दूर रही दिल्ली हुआ, अब बिहार भी दूर
हारेंगे बंगाल भी, बने रहे यदि सूर
*
दीवाला तो हो गया, दिवाली से पूर्व
नर से हार नरेंद्र की, सपने चकनाचूर
*
मीसा से विद्रोह तब, अब मीसा से प्यार
गिरगिट सम रंग बदलता, जब-तब अजब बिहार
***
***
दोहा:
दया उसी पर कीजिए, जो मन से विकलांग
तन तो माटी में मिले, कोई रचा ले स्वांग
*
माटी है तो दीप बन, पी जा सब अँधियार
इंसां है तो ते सीप सम, दे मुक्ता हर बार
*
व्यर्थ पटाखे फोड़कर, क्यों करता है शोर
मौन-शांति की राह चल, ऊगे उज्जवल भोर
***
लघु कथा:
चन्द्र ग्रहण
*
फेसबुक पर रचनाओं की प्रशंसा से अभिभूत उसने प्रशंसिका के मित्रता आमंत्रण को स्वीकार कर लिया। एक दिन सन्देश मिला कि वह प्रशंसिका उसके शहर में आ रही है और उससे मिलना चाहती है। भेंट के समय आसपास के पर्यटन स्थलों का भ्रमण करने का प्रस्ताव उसने सहज रूप से स्वीकार कर लिया। नौकाविहार आदि के समय कई सेल्फी भी लीं प्रशंसिका ने। लौटकर वह प्रशंसिका को छोड़ने उसके कमरे में गया ही था की कमरे के बाहर भाग-दौड़ की आवाज़ आई और जोर से दरवाजा खटखटाया गया।
दरवाज़ा खोलते ही कुछ लोगों ने उसेउसे घेर लिया। गालियाँ देते हुए, उस पर प्रशंसिका से छेड़छाड़ और जबरदस्ती के आरोप लगाये गए, मोबाइल की सेल्फ़ी और रात के समय कमरे में साथ होना साक्ष्य बनाकर उससे रकम मांगी गयी, उसका कीमती कैमरा और रुपये छीन लिए गए। किंकर्तव्यविमूढ़ उसने इस कूटजाल से टकराने का फैसला किया और बात मानने का अभिनय करते हुए द्वार के समीप आकर झटके से बाहर निकलकर द्वार बंद कर दिया अंदर कैद हो गई प्रशंसिका और उसके साथी।
तत्काल काउंटर से उसने पुलिस और अपने कुछ मित्रों से संपर्क किया। पुलिसिया पूछ-ताछ से पता चला वह प्रशंसिका इसी तरह अपने साथियों के साथ मिलकर भयादोहन करती थी और बदनामी के भय से कोई पुलिस में नहीं जाता था किन्तु इस बार पाँसा उल्टा पड़ा और उस चंद्रमुखी को लग गया चंद्रग्रहण।
***
नवगीत:
बतलाओ तो
*
बतलाओ तो
धन्वन्तरी!
क्या है कोई इलाज?
.
औंधे मुँह गिर पड़े हैं
वाग्मी जुमलेबाज।
तक्षशिला पर हो गया
फिर तिकड़म का राज।
संग सुशासन-घुटाले
करते बंदरबाँट।
मीसा सत्ता की सगी
हक़ छीने किस व्याज?
बिसर गयी सिद्धांत सब
हाय! सियासत आज।
बतलाओ तो
धन्वन्तरी!
क्या है कोई इलाज?
.
केर-बेर के साथ पर
गर्व करें या लाज?
बेच-खरीद उसूल कह
खुद पर करते नाज।
बड़बोला हर शख्श है
कोई न जिम्मेदार।
दइया रे! हो गया है
आज कोढ़ संग खाज।
रक्षक बने कपोत के
क्रूर-शिकारी बाज।
बतलाओ तो
धन्वन्तरी!
क्या है कोई इलाज?
.
अफसर हैं प्यारे इन्हें
चाहें करें न काज।
रैंक-पेंशन बन गिरी
अफसरियत पर गाज।
जनगण का शोषण करें
बढ़ा-थोपकर टैक्स।
सब्जी-दाल विलासिता
दूभर हुआ अनाज।
चाह एक न्यूज शीश पर
हो सत्ता का ताज।
बतलाओ तो
धन्वन्तरी!
क्या है कोई इलाज?
१०.११.२०१५

***

नवगीत:

मौन सुनो सब, गूँज रहा है
अपनी ढपली
अपना राग
तोड़े अनुशासन के बंधन
हर कोई मनमर्जी से
कहिए कैसे पार हो सके
तब जग इस खुदगर्जी से
भ्रान्ति क्रांति की
भारी खतरा
करे शांति को नष्ट
कुछ के आदर्शों की खातिर
बहुजन को हो कष्ट
दोष व्यवस्था के सुधारना
खुद को उसमें ढाल
नहीं चुनौती अधिक बड़ी क्या
जिसे रहे हम टाल?
कोयल का कूकना गलत है
कहे जा रहा
हर दिन काग
संसद-सांसद भृष्ट, कुचल दो
मिले न सहमत उसे मसल दो
पिंगल के भी नियम न माने
कविपुंगव की नयी नसल दो
गण, मात्रा,लय,
यति-गति तज दो
शब्दाक्षर खुद
अपने रच लो
कर्ता-क्रिया-कर्म बंधन क्यों?
ढपली ले,
जो चाहो भज लो
आज़ादी है मनमानी की
हो सब देख निहाल
रोक-टोक मत
कजरी तज
सावन में गायें फाग
१०.११.२०१४
***

गुरुवार, 9 नवंबर 2023

लघुकथा, मुक्तिका

मुक्तिका 
मौसम भौंचक
*
मौसम भौंचक तपिश बढ़ी है
निष्ठा बेघर लुटी खड़ी है

राजनीति हर शीश चढ़ी है
आरोपों की फसल बड़ी है

शत्रु चैन से बजा बाँसुरी
नेताओं में जंग छिड़ी है

बदकिस्मत के शयन कक्ष में
'लिव इन' की तस्वीर मढ़ी है

पहुँचा भू की बर्बादी कर
मनु, चंदा की खाट खड़ी है

देशभक्ति की कोई पुस्तक
अफसर सेठों ने न पढ़ी है

आस सुहागिन राहों में 
सौत प्यास की टाँग अड़ी है 
९.११.२०२३ 
***
लघुकथा 
*
खट खट खट खट
अलस्सुबह सरस्वती मंदिर के द्वार की कुंडी बज रही थी। अलसाते हुए पुजारी जी ने दरवाजा खोला। एक भद्र महिला सिसक रही थी। पुजारी जी आने ने कारण पूछा तो बोली माँ से विनती करनी है। पुजारी ने राह छोड़ दी। 
महिला ने सरस्वती जी को प्रणाम किया और बोली- 'माँ! मेरी रक्षा करो।' 
''बोल बेटी क्या कष्ट है?'' 
'माँ! आप तो त्रिकालदर्शी हैं सब जानती हैं, फिर भी अनजान की तरह पूछ रही हैं?'
''सृष्टि की रचना उद्देश्य यही है कि ईश का अंश 'कर्ता और भोक्ता हो', यदि दैवीय शक्ति 'कर्ता' हो तो उसे 'भोक्ता' भी होना होगा। तब 'ईश' और 'जीव' में कोई भेद ही न रहेगा।
' जैसी आज्ञा माँ! मैं आपकी सुता लघुकथा हूँ। आपने मुझे जीव के जीवन में क्षणमात्र में घटित होनेवाली घटनाओं को कथ्य बनाकर उससे उपजी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति करने का दायित्व दिया है। मैं आदि काल से अपने दायित्व का निर्वहन कर रही हूँ। कलिकाल के प्रभाव से कुछ मठाधीश मेरे दायित्व निर्वहन में बाधक बन गए हैं।'
लघु कथा ने माँ की पर देखा, उन्हें ध्यान से सुनते पाया तो आगे बोली 'माँ! मठाधीशों ने पहले तो मेरे पूर्व कथ्य-रूपों का विभाजन कर दिया, फिर उन्हें मुझसे अलग घोषित कर दिया, इतने पर भी नहीं रुके। मेरे कथ्य, शिल्प, आकार आदि को लेकर मनमानी मान्यताएँ थोप दिन और जिन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया उन्हें लघुकथाकार ही नहीं मान रहे।'
'इससे तुम्हें कष्ट है तो इतने दिन मौन क्यों रहीं और अब क्या चाहती हो?'
'माँ! मैंने सोचा वे बाल-क्रीडा कर रहे हैं, समय के साथ समझकर सुधार जाएँगे पर उन्हें अक्ल तो न आई, उन्होंने लामबंदी कर, नए लघुकथाकारों के लेखन को नियंत्रित करने का दुष्प्रयास आरंभ कर दिया है। उन्होंने अनधिकार चेष्टा करते हुए अलग-लग कुछ मानक बना लिए हैं और स्वतंत्रचेता लघुकथाकारों द्वारा लिखी जा रही लघुकथाओं को अपने मानक के अनुसार न होने पर अमान्य करने का दुस्साहस कर रहे हैं। चंद परिपक्व लघुकथाकार इं पर ध्यान न देकर समाजोपयोगी लघुकथाएँ लिख रहे हैं पर नए लघुकथाकार कुंठित होकर लघुकथा लेखन बंद कार रहे हैं। इससे मेरा विकास ही रुक जाएगा और किसी कारखाने के उत्पाद की तरह एक ही ढाँचे में लिखी गई लघुकथाएँ पाठकों को मुझसे विमुख कर मुझे निष्प्राण कर देंगी।'   
''बस इतना सा कष्ट है। स्मरण रखो 'समय होत बलवान'। जब तक अँधेरा घना नहीं होता, दीपावली नहीं मनाई जाती, सूर्योदय नहीं होता। मेरी किसी संतान का विकास रोकना या विनाश करना किसी मठाधीश के लिए संभव नहीं है। वे अपने कदाचरण के कारण  कुछ समय बाद खुद ही नकार दिए जाएँगे। साहित्य और समाज में सबका हित साधने का साधनेवाली लघुकथाएँ ही चिरजीवी होंगी। किसके रोके रुक है सवेरा।'
'माँ! मैं आश्वस्त हुई। अब कोई शंका शेष नहीं है।' कहकर पुन: प्रणाम कर लौट पड़ी लघुकथा। 
९.११.२०२३
***     

बुधवार, 8 नवंबर 2023

अंशु-मिंशू , सॉनेट, दीपक, संदेह अलंकार, हाइकु, मुक्तक, पूर्णिमा बर्मन, शब्द और अर्थ

सॉनेट
दीपक
जलते बाती-तेल उजाला करते,
दीपक पाता श्रेय, छिपाता तम को,
जैसे नेता ठगता है जन-गण को,
दोषी जन-गण भी न सत्य जो वरते।
औरों की सूखी पर नजरें धरते,
चलें न अपने घर की हरियाली को,
जोड़, न खाते, छोड़ यहीं सब मरते।


कुछ अतिभोगी कर्जा ले घृत पीते,
भोग भोगते, भोग भोगता उनको,
दोनों अति से बचो, चतुर जन कहते।
रखें समन्वय जो जीवन-रण जीते,
सत्य समझ आया है यह दीपक को,
जले न रवि सम और नहीं तम तहते।
८.११.२०२३
•••
कार्यशाला- ७-११-१६
आज का विषय- पथ का चुनाव
अपनी प्रस्तुति टिप्पणी में दें।
किसी भी विधा में रचना प्रस्तुत कर सकते हैं।
रचना की विधा तथा रचना नियमों का उल्लेख करें।
समुचित प्रतिक्रिया शालीनता तथा सन्दर्भ सहित दें।
रचना पर प्राप्त सम्मतियों को सहिष्णुता तथा समादर सहित लें।
किसी अन्य की रचना हो तो रचनाकार का नाम, तथा अन्य संदर्भ दें।
*
हाइकु
सहज नहीं
है 'पथ का चुनाव'
​विकल्प कई.
(जापानी त्रिपदिक वार्णिक छंद, ध्वनि ५-७-५)
*
मुक्तक
पथ का चुनाव आप करें देख-भालकर
सारे अभाव मौन सहें, लोभ टालकर
​पालें लगाव तो न तजें, शूल देखकर
भुलाइये 'सलिल' को न संबंध पालकर ​
​(२२ मात्रिक चतुष्पदिक मुक्तक छंद, टुकनर गुरु-लघु, पदांत गुरु-लघु-लघु-लघु) ​
*
***
त्रिपदिक गीत:
करो मुनादी...
*
करो मुनादी
गोडसे ने पहनी
उजली खादी.....
*
सवेरे कहा:
जय भोले भंडारी
फिर चढ़ा ली..
*
तोड़े कानून
ढहाया ढाँचा, और
सत्ता भी पाली..
*
बेचा ईमान
नेता हैं बेईमान
निष्ठा भुला दी.....
*
एक ने खोला
मंदिर का ताला तो -
दूसरा डोला..
*
रखीं मूर्तियाँ
करवाया पूजन
न्याय को तौला..
*
मत समझो
जनगण नादान
बात भुला दी.....
*
क्यों भ्रष्टाचार
नस-नस में भारी?
करें विचार..
*
आख़िरी पल
करें किला फतह
क्यों हिन्दुस्तानी?
*
लगाया भोग
बाँट-खाया प्रसाद.
सजा ली गादी.....
*
​***
हरियाणवी हाइकु
*
घणा कड़वा
आक करेला नीम
भला हकीम।१।
*
​गोरी गाम की
घाघरा-चुनरिया
नम अँखियाँ।२।
*
बैरी बुढ़ापा
छाती तान के आग्या
अकड़ कोन्या।३।
*
जवानी-नशा
पोरी पोरी मटकै
जोबन-बम।४।
*
कोरा कागज
हरियाणवी हाइकु
लिक्खण बैठ्या।५।
*
'हरि' का 'यान'
देस प्रेम मैं आग्गै
'बहु धान्यक'।६।
*
पीछै पड़ गे
टाबर चिलम के
होश उड़ गे।७।
*
मानुष एक
छुआछूत कर्‌या
रै बेइमान।८।
*
हैं भारतीय
आपस म्हं विरोध
भूल भी जाओ।९।
*
चिन्ता नै चाट्टी
म्हारी हाण कचोट
रंज नै खाई।१०।
*
ना है बाज का
चिडिय़ा नै खतरा
है चिड़वा का।११।
*
गुरू का दर्जा
शिक्षा के मन्दिर मैं
सबतै ऊँच्चा।१२।
*
कली नै माली
मसलण लाग्या हे
बची ना आस। १३।
*
माणस-बीज
मरणा हे लड़कै
नहीं झुककै।१४।
*
लड़ी लड़ाई
जमीन छुड़वाई
नेता लौटाई।१५।
*
भुख्खा किसाण
कर्ज से कर्ज तारै
माटी भा दाणे।१६।
*
बाग म्हं कूकै
बिरहण कोयल
दिल सौ टूक।१७।
*
चिट्ठी आई सै
आंख्या पाणी भरग्या
फौजी हरख्या।१८।
*
सब नै दंग
करती चूड़ी-बिंदी
मैडल ल्याई।१९।
*
लाडो आ तूं
किलकारी मारकै
सुपणा मेरा।२०।
८.११.२०१६
***
अलंकार सलिला: २९
संदेह अलंकार
*
*
किसी एक में जब दिखें, संभव वस्तु अनेक।
अलंकार संदेह तब, पहिचानें सविवेक।।
निश्चय करना कठिन हो, लख गुण-धर्म समान ।
अलंकार संदेह की, यह या वह पहचान ।।
गुरुदत्त जी, वहीदा जी, रहमान जी तथा जॉनी वाकर जी के जीवंत अभिनय, निर्देषम, कथा और मधुर गीतों के लिये
स्मरणीय हिंदी सिनेमा की कालजयी कृति 'चौदहवीं का चाँद' को हम याद कर रहे हैं शीर्षक गीत के लिये...
चौदहवीं का चाँद हो / या आफताब हो?
जो भी हो तुम / खुदा की कसम / लाजवाब हो।
नायिका के अनिंद्य रूप पर मुग्ध नायक यह तय नहीं कर पा रहा कि उसे चाँद माने या सूर्य? एक अन्य पुराना फिल्मी गीत है-
ख्वाब हो तुम या कोई हकीकत / कौन हो तुम बतलाओ?
देर से इतनी दूर खड़ी हो / और करीब आ जाओ।
यह तो आप सबने समझ ही लिया है कि नायक नायिका को देखकर सपना है या सच है? का निश्चय नहीं कर पा रहा है
और यह तय करने के लिये उसे निकट बुला रहा है। एक और फिल्मी गीत को लें-
मार दिया जाये कि छोड़ दिया जाए
बोल तेरे साथ क्या सलूक किया जाए?
आप सोच रहे होंगे अलंकार चर्चा के इच्छुक काव्य रसिकों से यह कैसा सलूक कि अलंकार छोड़कर सिनेमाई गीत वो भी
पुराने दोहराये जाएँ? धैर्य रखिये, यह अकारण नहीं है।
घबराइये मत, हम आपसे न तो गीत सुनाने को कह रहे हैं, न गीतकार, गायक या संगीतकार का नाम ही पूछ रहे हैं।
बताइए सिर्फ यह कि इन गीतों में कौन सी समानता है?
क्या?.. पर्दे पर नायक ने गाया है... यह तो पूछने जैसी बात ही नहीं है असल में ...समानता यह है कि तीनों गीतों में
नायक दुविधा का शिकार है- चाँद या सूरज?, सपना या सच?, मारे या छोड़े ?
यह दुविधा, अनिर्णय, संशय, शक या संदेह की मनःस्थिति जिस अलंकार की जननी है, उसका नाम है संदेह अलंकार।
रूप, रंग आदि की समानता होने के कारण उपमेय में उपमान का संशय होने पर संदेह अलंकार होता है।
जहाँ रूप, रंग और गुण की समानता के कारण किसी वस्तु को देखकर यह निश्चचय न हो सके कि यह वही वस्तु है या
नहीं? वहाँ संदेह अलंकार होता है।
यह अलंकार तब होता है जब एक वस्तु में किसी दूसरी वस्तु का संदेह तो हो पर निश्चय न हो। इसके वाचक शब्द कि,
किधौं, धौं, अथवा, या आदि हैं।
यह-वह का संशय बने, अलंकार संदेह।
निश्चय बिन हिलता लगे, विश्वासों का गेह।।
इस-उस के निश्चय बिना हो मन हो डाँवाडोल।
अलंकार संदेह को, ऊहापोह से तोल।।
उदाहरण:
१. कौन बताये / वीर कहूँ या धीर / पितामह को?
२. नग, जुगनू या तारे? / बूझ न पाये हारे
३. नर्मदा हो, वर्मदा हो / शर्मदा हो धर्मदा
जानता माँ मात्र इतना / तुम सनातन मर्मदा
४. सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है।
सारी ही कि नारी है कि नारी ही कि सारी है।।
यहाँ द्रौपदी के चीरहरण की घटना के समय का चित्रण है कि द्रौपदी के चारों और चीर के ढेर देखकर दर्शकों को संदेह
हुआ कि साड़ी के बीच नारी है या नारी के बीच साड़ी है?
५. को तुम तीन देव मँह कोऊ, नर नारायण की तुम दोऊ।
यहाँ संदेह है कि सामने कौन उपस्थित है ? नर, नारायण या त्रिदेव (ब्रम्हा-विष्णु-महेश)।
६ . परत चंद्र प्रतिबिम्ब कहुँ जलनिधि चमकायो।
कै तरंग कर मुकुर लिए शोभित छवि छायो।।
कै रास रमन में हरि मुकुट आभा जल बिखरात है।
कै जल-उर हरि मूरति बसत ना प्रतिबिम्ब लखात है।।
पानी में पड़ रही चंद्रमा की छवि को देखकर कवि संशय में है कि यह पानी में चन्द्र की छवि है या लहर हाथ में दर्पण लिये
है? यह रास लीला में निमग्न श्री कृष्ण के मुकुट की परछाईं है या सलिल के ह्रदय में बसी प्रभु की प्रतिमा है?
७. तारे आसमान के हैं आये मेहमान बनि,
केशों में निशा ने मुक्तावलि सजायी है।
बिखर गयी है चूर-चूर है के चंद कैधों,
कैधों घर-घर दीपमालिका सुहाई है।।
इस प्रकृति चित्रण में संशय है कि आसमान में तारे अतिथि बनकर आये हैं, अथवा रजनी ने मुक्तावलि सजायी है,
चंद्रमा चूर होकर बिखर गया है या घर -घर में दिवाली मनाई जा रही है.
८. कज्जल के तट पर दीपशिखा सोती है कि,
श्याम घन मंडल में दामिनी की धारा है?
यामिनी के अंचल में कलाधर की कोर है कि,
राहू के कबंध पै कराल केतु तारा है?
'शंकर' कसौटी पर कंचन की लीक है कि,
तेज ने तिमिर के हिए में तीर मारा है?
काली पाटियों के बीच मोहिनी की मांग है कि,
ढाल पर खांडा कामदेव का दुधारा है.?
इस छंद में संदेह अलंकार की ४ बार आवृत्ति है. संदेह है कि- काजल के किनारे दिये की बाती है या काले बादलों के बीच बिजली?, रात के आँचल में चंद्रमा की कोर है या राहू के कंधे पर केतु?, कसौटी के पत्थर पर परखे जा रहे सोने की रेखा है या अँधेरे के दिल में उजाले का तीर?, काले बालों के बीच सुन्दरी की माँग है या ढाल पर कामदेव का दुधारा रखा है?
९. नित सुनहली साँझ के पद से लिपट आता अँधेरा,
पुलक पंखी विरह पर उड़ आ रहा है मिलन मेरा।
कौन जाने बसा है उस पार
तम या रागमय दिन? - महादेवी वर्मा
१०. जननायक हो जनशोषक
पोषक अत्याचारों के?
धनपति हो या धन-गुलाम तुम
दोषी लाचारों के? -सलिल
११. भूखे नर को भूलकर, हर को देते भोग।
पाप हुआ या पुण्य यह?, करुँ हर्ष या सोग?.. -सलिल
१२. राधा मुख आली! किधौं, कैधौं उग्यो मयंक?
१३. कहहिं सप्रेम एक-इक पाहीं। राम-लखन सखि! होब कि नाहीं।।
१४. संसद या मंडी कहूँ?
हल्ला-गुल्ला हो रहा
आम आदमी रो रहा।
१५. जीत हुई या हार
भाँज रहे तलवार
जन हित होता उपेक्षित।
संदेह अलंकार का प्रयोग सामाजिक विसंगतियों और त्रासदियों के चित्रण में भी किया जा सकता है।
८-११-२०१५
===
कृति चर्चा :
पारम्परिक नवता की तलाश: चोंच में आकाश
*
[कृति विवरण: चोंच में आकाश, नवगीत संग्रह, पूर्णिमा बर्मन, प्रथम संस्करण २०१४, डिमाई आकार, आवरण बहुरंगी, पेपरबैक, पृष्ठ ११२, १२०/-, अंजुमन प्रकाशन इलाहाबाद]
आदिमानव ने सलिल प्रवाह की कलकल, परिंदों के कलरव, मेघों के गर्जन पवन की सन-सन से ध्वनियों से अभिभूत होकर उसके विविध प्रभावों हर्ष, विषाद, भय आदि की अनुभूति की। कलकल एवं कलरव ने उसे ध्वनियों के आरोह-अवरोहजनित नैरन्तर्य और माधुर्य का परिचय दिया। कालांतर में इन ध्वनियों को दुहराते हुए ध्वनिसंकेतों के माध्यम से पारस्परिक संवाद स्थापित कर मानव ने कालजयी आविष्कार किया। विविध मानव समूहों ने मूल एक होते हुए भी उनसे अपनी उच्चारण क्षमता के अनुसार विविध भाषाओँ क विकास किया। ध्वनि संकेतों का स्थान ध्वनि खण्डों ने लिया। कालांतर में ध्वनि खंड शब्दों में बदले और शब्दों का सातत्य सूक्ष्म और लघु गीतों का वाहक हुआ। छंद की गति-यति ने लय निर्धारण कर गीत की सरसता को समृद्ध किया तो स्थाई या मुखड़े की आवृत्ति ने अंतरों को एक सूत्र में पिरोते हुए भाव-माला बनाकर शब्द चित्र को पूर्णता प्रदान की। छंदबद्ध हर रचना गेय होने पर भी गीत नहीं होती। गीत में लय, गति, ताल, मुखड़ा तथा अन्तरा होना आवश्यक है। गीत में शिथिलता, नवता का भाव तथा बिम्ब-प्रतीकों का बासीपन, दीर्घता, तह छायावाद की अस्पष्टता होने पर उसके असमय काल कवलित होने की उद्घोषणा ने नवजीवन का पथ प्रशस्त किया। गीत के शिल्प और कथ्य का जीर्णोद्धार होने पर नवगीत का भवन प्रगट हुआ।
आरम्भ में गीत के शिल्प में प्रगतिवादी कविता का कलेवर अपनाने के पश्चात नव गीत क्रमशः लयात्मकता, पारम्परिकता और अधुनातनता की त्रिवेणी को एक कर वह रूपाकार पा सका जिससे साक्षात कराता है हिंदी को विश्ववाणी के रूप में समर्थ होते देखने की इच्छुक सरस्वतीपुत्री पूर्णिमा बर्मन जी का नवगीत संग्रह चोच में आकाश। नवगीत में 'नव गति, नव लय, ताल, छंद नव' तो होना ही चाहिए। पूर्णिमा जी की 'नवल दृष्टि' छंद, बिम्ब, प्रतीक, जीवन मूल्य, पारम्परिक लोकाचार, अधुनातनता तथा समसामयिक संदर्भो के सप्त तत्वों का सम्मिश्रण कर नवगीतों की रचना करती है। नवगीत को प्रगतिवादी कविताओं की प्रतिक्रिया और हर परंपरा के विरोध में शब्दास्त्र माननेवालों को इन नवगीतों में नवता की न्यूनता अनुभव हो तो यह उनकी संकुचित दृष्टि का सीमाबाह्य सत्य को न देख सकने का दोष होगा। पूर्णिमा जी ने भारतीय संस्कृति की उत्सवधर्मी लोकाचारिक परंपरा की पड़ती जमीन पर उग आयी जड़ता की खरपतवार को अपनी सामयिक परिस्थितियों के बखर तथा संवेदनशीलता के हल से अलग कर सांगीतिक सरसता के बीज मात्र नहीं बोये अपितु विदेशी धरती पर पंप रही विश्व संस्कृति और भारत के नगर-ग्रामों में परिव्याप्त पारम्परिक सभ्यता के उर्वरकों का प्रयोग कर नवत्व के समीरण से पाठकों / श्रोताओं को आनंदित होने का अवसर सुलभ कराया है।
भाषिक प्रयोग :
पारम्परिक काव्य मानकों की लीक से हटकर पूर्णिमा जी ने कुछ भाषिक प्रयोग किये हैं। परीक्षकीय दृष्टि इन्हें काव्य दोष कह सकती है किन्तु नवता की तलाश में प्रयोगधर्मी नवगीतकार ने इन्हें अनजाने नहीं जान बूझकर प्रयोग किया है, ऐसा मुझे लगता है तथापि इन पर चर्चा होनी चाहिए। नव प्रयोग करना दो बाँसों से बँधी रस्सी पर चलने की तरह दुष्कर होता है, संतुलन जरा सा डगमगाया तो परिणाम विपरीत हो जाता है। पूर्णिमा जी ने यह खतरा बार-बार उठाया है, भाषा की अभिव्यक्ति क्षमता की वृद्धि हेतु ऐसे प्रयोग आवश्यक हैं।
'रामभरोसे' में 'नफरत के एलान बो रहे', 'आँसू-आँसू गाल रो रहे' ऐसे ही प्रयोग हैं। एलान किया जाता है बोया नहीं जाता है। 'बोने' की क्रिया एक से अनेक की उत्पत्ति हेतु होती है। 'नफरत का एलान' उसे शतगुणित करने हेतु हो तो उसे 'नफरत को बोना' कहा जाना ठीक लगता है किंतु 'गाल का रोना'? रुदन की क्रिया पीड़ाजनित होती है, अपनी या अन्य की पीड़ा से व्याकुल-द्रवित होना रुदन का उत्स है। आँख से अश्रु बहना भौतिक क्रिया है, मन या दिल का रोना भावनात्मक अभिव्यक्ति है। शरीरविज्ञान का 'दिल' धड़कने, रक्तशोधन तथा पंप करने के अलावा कुछ नहीं कर सकता पर साहित्य का दिल भावनात्मक अभिव्यक्ति में भी सक्षम होता है।सामान्यतः 'गाल' का स्पर्श अथवा चुम्बन प्रेमाभिव्यक्ति हेतु तथा गाल पर प्रहार चोट पहुँचाने के लिये होता है। रोने की क्रिया में गाल का योगदान नहीं होता अतः 'गाल का रोना' प्रयोग सटीक नहीं लगता।
'सकल विश्व के विस्तृत प्रांगण / मंद-मंद बुहरें' के संदर्भ में निवेदन है कि क्रिया 'बुहारना' का अर्थ झाड़ना या स्वच्छ करना होता है। 'बुहारू' वह उपकरण जिससे सफाई की जाती है। किसी स्थान को बुहारा जाता है, वह अपने आप कैसे 'बुहर' सकता है? यहाँ तथ्यपरक काव्य दोष प्रतीत होता है।
ओंकार या अनहद नाद को सृष्टि कहा गया है. 'शुभ ओंकार करें' से ध्वनित होता कि कोई 'अशुभ ओंकार' भी हो सकता है जबकि ऐसा नहीं है। ओंकार तो हमेशा शुभ ही होता है, यह काव्य दोष शुभ के स्थान पर 'नित' के प्रयोग से दूर किया जा सकता है।
एक नवगीत में प्रयुक्त 'इस डग पर हम भी हैं' (पृष्ठ ५४) के सन्दर्भ में निवेदन है कि 'डग' का अर्थ कदम होता है. जैसे ५ डग चलो या ५ कदम चलो, वह अर्थ यहाँ उपयुक्त नहीं प्रतीत होता, यहां डेग को मग के अर्थ में लिया गया है। यदि 'इस डग पर हम भी हैं' को 'इस मग पर हम भी हैं' किया जाए तो अर्थ अधिक स्पष्ट होता है मग = मार्ग।
'जिस भाषा में बात शुरू की / वह बोली ही बदल गयी' (पृष्ठ ५५) में भाषा और बोली का प्रयोग समानार्थी के रूप में हुआ प्रतीत होता है पर वस्तुतः दोनों शब्दों के अर्थ भिन्न हैं। भाषा में बात करें तो भाषा ही बदलेगी।
सटीक शब्द चयन:
नवगीत कमसे कम शब्दों में अधिक से अधिक अर्थ समाहित करने की कला है। यहाँ भाव या कल्पना को विस्तार देने का स्थान ही नहीं होता। पूर्णिमा जी सटीक शब्दचयन में निपुण हैं। वे सुदीर्घ विदेश प्रवास के बावजूद जमीन से जुडी हैं। देशज शब्दों ने उनके नवगीतों को जनमानस को व्यक्त करने में सक्षम बनाया है। दियना, पठवाई (भोजपुरी), गलबहियाँ, सगरी, मिठबतियाँ, टेरा, मुण्डेरा, बिराना, सतुआ, हूला, मुआ, रेले, हरियरी, हौले, कथरी, भदेस, भिनसारा, चौबारा, खटते, हिन्दोल, दादुर, बाँचो आदि शब्द इन नवगीतों को भोर की हवा के झोंके की ताज़गी देते हैं। समृद्धि, तरह आदि शब्दों के देशज रूपों समरिधि, तरहा का प्रयोग बिना हिचक किया गया है। तौलने की क्रिया में तौले गये पदार्थ के लिये 'तुलान' शब्द का प्रयोग पूर्णिमा जी की जमीनी पकड़ दर्शाता है। यह शब्द हिंदी के आधुनिक शब्दकोशों में भी नहीं है। हिंदी की भाषिक क्षमता पर संदेह करनेवालों को ऐसे शब्द एकत्रकर शब्दकोशों में जोड़ना चाहिए।
संस्कृत में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त पूर्णिमा जी की भाषा में संस्कृतनिष्ठ शब्द होना स्वाभाविक है, वैशिष्ट्य यह की इन शब्दों के प्रयोग से भाषा कलिष्ट या बोझिल नहीं हुई अपितु प्राणवान हुई है। स्वहित, समेकित, वल्कल, अभिज्ञान, नवस्पन्दन, नवता, वाट्स, मकरंद, अलिंद आदि शब्द कोंवेंटी पाठकों को कठिन लग सकते हैं पर सामान्य हिंदी पाठक के लिए सहज ग्राह्य हैं।
हिंदी की अरबी-फ़ारसी शब्दप्रधान शैली उर्दू तथा अंग्रेजी के शब्द पूर्णिमा जी के लिए पराये नहीं है। हिंदी को विश्ववाणी का रूप पाने के लिए अन्य भाषाओँ-बोलिओं के शब्दों को अपनी प्रकृति और आवश्यकता के अनुसार आत्मसात करना ही होगा। जश्न, ख्वाब, वक़्त, खुशबू, अहसास, इन्तिज़ार,रौशनी, सफर, दर्द, ज़ख्म, गुलदस्ता, बेकल पैगाम आदि उर्दू शब्द तथा मीडिया, टी. वी., फिल्म, लैंप, टाइप, ट्रेफिक, लॉन आदि अंग्रेजी शब्द यथावसर प्रयुक्त हुए हैं।
पूर्णिमा जी ने इन गीतों में शब्द-युग्मों का प्रयोग कर गीत के कथ्य को सरसता दी है। तन-मन, धन-धान्य, ताने-बाने, ज्ञान-ध्यान-विज्ञान, ऋद्धि-सिद्धि, जीर्ण-शीर्ण, आप-धापी, रेले-मेले, यहाँ-वहाँ-सभी कहाँ, जगर-मगर आदि शब्द युग्मों से भाषा प्राणवंत हुई है।
भाषिक चेतना :
अन्य नवगीत संग्रहों से अलग हटकर यह कृति हिंदी की वैश्विकता को रेखांकित करती है।'हिंदी अपने पंख फैलाये उड़ने को तैयार' तथा 'अब भी हिंदी गानों पर मन / विव्हल होता है' पूर्णिमा जी के हिंदी प्रेम को उद्घाटित करता है। यथास्थान मुहावरों तथा लोकोक्तियों के प्रयोग ने नवगीतों को भाषा को सरसता दी है। ढोल पीटना, लीप-पोत देना, चमक-दमक आदि मुहावरों का सटीक प्रयोग दृष्टव्य है। आजकाल नवगीतों में विशिष्ट शब्द-चयन से सहजता पर सलीके को वरीयता देने का जो चलन दीखता है उसे पूर्णिमा जी विनम्रता से परे कर सुबोधतापरक वैविध्य और नवता से अपनी बात कह पाती हैं। 'अधभर गगरी छलकत जाए' मुहावरे का मनोहर प्रयोग देखें: कब तक ढोऊँ अधजल घट यह / रह-रह छलके नीर।
भाषिक प्रवाह:
पूर्णिमा जी के इन नवगीतों में भाषा का स्वाभाविक प्रवाह दृष्टव्य है : ' माटी की / खुशबू में पलते / एक ख़ुशी से / हर दुःख छलते / बाड़ी चौक गली अमराई / हर पत्थर गुरुद्वारा थे / हम सूरज / भिन्सारा थे, दुनिया ये आनी-जानी है / ज्ञानी कहते हैं फानी है / चलाचली का / खेला है तो / जग में डेरा कौन बनाये / माया में मन कौन रमाये आदि में मन रम सा जाता है।
अलंकार :
नवगीतों में मुखड़े / स्थाई होने के कारण अन्त्यानुप्रास होता ही है, प्रायः अंतरों में भी अनुप्रास आ ही जाता है। पूर्णिमा जी पदांत की समता को खींच-तान कर नहीं मिलतीं अपितु सम उच्चारण के शब्द अपने आप ही प्रवाह में आते हुए प्रतीत होते हैं: जर्जर मन पतवार सखी री! / छूटे चैतन्य अनार सखी री, जिनको हमने नहीं चुना / उनको हमने नहीं गुना / अपना मन ही नहीं सुना, नीम-नीम धरती है, नीम-नीम छत / फूल-फूल बिखरी है बाँटती रजत / टाँकती दिशाओं में रेशमी अखत / थिरकेगी तारों पर मंद्र कोई गत, सोन चंपा महकती रही रात भर / चाँदनी सुख की झरती रही रात भर / दीठि नटिनी ठुमकती रही रात भर / रूप गंधा लहकती रही रात भर / धुन सितारों की बजती रही रात भर जैसे अँतरे रस नर्मदा में अवगाहन कराकर पाठक को आत्मानंदित होने का अवसर देते हैं। उपमा पूर्णिमा जी का प्रिय अलंकार है। घुंघरू सी कलियाँ, रंगीन ध्वज सी ये छटाएँ, आरती सी दीप्त पँखुरी, अनहद का राम किला, गुलमोहर सी ज्वालायें, तितली सी इच्छएं, मकड़ी के जालों सी निराशाएं जैसी अनेक मौलिक उपमाएं सोने में सुहागा हैं।
टुकड़े-टुकड़े टूट जायेंगे / मनके मनके में यमक की सुंदर छवि दृष्टव्य है।
आध्यात्मिक चेतना :
प्रकृति के सानिंध्य में आध्यात्मिक चेतना की और झुकाव स्वाभाविक है। ओंकार, अनहद, कमल, चक्र, ज्योति, प्रकाश, घट, चैतन्य, अशोक, सुखमन आदि शब्द पाठक को आध्यात्मिक भावलोक में ले जाते हैं। पिंगल की परंपरा के अनुसार इस नवगीत संग्रह का श्री गणेश गणेश वंदना से उचित ही हुआ है। मन मंदिर में दिया जलने का स्नेहिल अनुरोध समाहित किये दूसरे नवगीत में ' चक्र गहन कर्मों के बंधन / स्थिर रहे न धीर / तीन द्वीप और सात समंदर / दुनिया बाजीगीर' आध्यात्मिक प्रतीकों से युक्त है। 'कमल खिला' शीर्षक नवगीत में 'चेतन का द्वार खुला / सुखमन ने / जीत लिया अनहद का राम किला / कमल खिला' फिर आध्यात्म संसार से साक्षात कराता है। 'झीनी-झीनी रे बीनी चदरिया' का कबीरी रंग 'अनबन के ताने को / मेहनत के बाने को / निरानंद विमल मिला / सुधियों ने / झीनी इस चादर को आन सिला / कमल खिला' में दृष्टव्य है।
पर्यावरणीय चेतना:
सामान्यतः नवगीत संग्रह में पर्यावरणीय चेतना होना आवश्यक नहीं होता, न ही यह समलोचकीय मानक है किंतु इस संग्रह के शीर्षक से अंत तक पर्यावरण के प्रति नवगीतकार की चेतना जाने-अनजाने प्रवाहित हुई है। उसकी अनदेखी कैसे संभव है? 'चोंच में आकाश' शीर्षक नभ और नभचरों के प्रति पूर्णिमा जी की संवेदना को अभियक्त करता है। नभ चल हों तो थलचर और जलचर भी आ ही जायेंगे और नभ के साथ वायु, ध्वनि धूम्र का होना स्वाभाविक है। पर्यावरणविदों का चिंतन और चिंता के इन केन्द्रों को केंद्र में रखनेवाली कृति पर्यावरणीय चेतना की वाहक न हो, यह कैसे संभव है?
न्यूटन ने कहा था: मुझे खड़े होने के लिये जमीन दो, मैं आकाश को हाथों में उठा लूँगा। पंछी के हाथ उसके पंख होते हैं। इसलिए न्यूटन का विचार पंछी कहे तो यही कहेगा 'तुम मुझे उड़ने के लिये पंख दो, मैं आकाश को चोच में भर लूँगा'। 'चोंच में आकाश' परोक्षतः जिजीविषाजयी पखेरू की जयगाथा ही है। वह पखेरू जिसके उड़ाते ही 'शिव' भी 'शव' हो जाता है। यह प्राण-पखेरू पक्षियों, पशुओं, पौधों, पुष्पों और आध्यात्मिक प्रतीकों के रूप में इस संग्रह में सर्वत्र व्याप्त है। कमल, अमलतास, कचनार, गुलमोहर, हरसिंगार, महुआ, पलाश, बोगनविला, चंपा आदि पुष्प-वृक्ष, महुआ, अनार जिसे फल-वृक्ष, ताड़ सा रस-वृक्ष, नीम सा औषधि-वृक्ष, बोनसाई, घास, दूब आदि हरियाली, तितली, केका, मयूर, पाखी, चिड़िया, कोयलिया, विहग, पक्षी आदि नभचर, मछली, सर्प,हरिण, खरगोश आदि प्राणी इस संग्रह को जीवंत कर रहे हैं।
पर्यावरण के प्रति चिंता बार-बार अभिव्यकर होती है: छाया मिले न रंग फाग के / मौसम सूने गए बाग़ के / जंगलों खिलती आग / किासे उठे दिलों में राग / स्वारथ हवस चढ़ा आँखों पर / अब क्या खड़ा बावरा सोचे,
संगीत चेतना:
नवगीत के जन्मदाता निराला जी पारम्परिक संगीत के साथ-साथ बंग संगीत के भी जानकार थे. संभवतः इसी कारण वे लयतथा रस को क्षति पहुँचाये बिना छंद के रूपाकार में, गति-यतिजनित परिवर्तन कर नव छंदों और नवगीतों का सृजन कर सके। इस संग्रह को पढ़ने से पूर्णिमाजी की संगीत सम्बन्धी जानकारी की पुष्टि होती है। इकतारा, संतूर, ढोल, करताल, दादरी, मल्हार आदि की यथास्थान उपस्थिति से नवगीत माधुर्यमय हुए हैं। 'थिरकेगी तारों पर मंद्र /कोई गत' में 'मंद्र' तथा 'गत' का अर्थवाही प्रयोग पूर्णिमा जी के अवचेतन में क्रियाशील सांगीतिक चेतना ही प्रयोग कर सकती है।
शैल्पिक नवता:
'लीक छोड़ तीनों चलें शायर, सिंह, सपूत' की लोकोक्ति को चरितार्थ करते हुए पूर्णिमा जी ने शब्दों को सामान्य से हटकर विशिष्ट अर्थ संकेतन हेतु प्रयोग किया है। इस दिशा में अनन्य कबीर जिन्होंने प्रचलित से भिन्नार्थों में अनेक शब्दों का प्रयोग किया और वे जनसामान्य तथा विद्वानों में समान रूप से मान्य भी हुए। इसलिए डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने कबीर को भाषा का डिक्टेटर भी कहा। पूर्णिमा जी भाषा की डिक्टेटर न सही भाषा की सशक्त प्रयोक्ता तो हैं ही। मरमरी उंगलियाँ, मूँगिया हथेली, चितवन की चौपड़, परंपरा के खटोले, प्यार की हथेली, चैत की छबीली जैसी सटीक अभिव्यक्तियाँ पूर्णिमा जी का वैशिष्ट्य है। 'जगह बनाती कोहनियाँ / घुटने बोल गये, आस की शक्ल में सपनों को / लिये जाती है, मन में केका-पीहू जगता, काले बालों में चाँदी ने लड़ियाँ डाली हैं, विलसिता से व्याकुल हर चित / आचारों में निरा दुराग्रह, हर हिटलर की वाट लग गयी, परंपरा की / घनी धरोहर और / प्रगति से प्यार मंदिर दियना बार सखी री! / मंगल दियना बार, अपने छूटे देस बिराना आदि पंक्तियाँ शब्द-शक्ति की जय-जयकार करती प्रतीत होती हैं।
व्यंग्य परकता :
'नवता नए व्याकरण खोले / परंपरा के उठे खटोले / आभिजात्य की नयी दूकान / बोनसाई के ऊँचे दाम' में परंपरा विरोधियों पर प्रखर व्यंग्य प्रहार है। राम भरोसे शीर्षक गीत व्यंग्य से सराबोर है: अमन-चैन के भरम पल रहे / राम भरोसे । राजनैतिक गतिविधियों और उनके आकाओं पर चुटीला व्यंग्य देखें: कैसे-कैसे शहर जल रहे राम भरोसे / जैसा चाहा बोया-काटा / दुनिया को मर्जी से बाँटा / उसकी थाली अपना काँटा / इसको डाँटा उसको चाँटा / राम नाम की ओढ़ चदरिया / कैसे आदम जात छल रहे / राम भरोसे।कथनी-करनी के अंतर पर इसी गीत में शब्द बाण है: दया-धर्म नीलम हो रहे / नफरत के एलान बो रहे / आँसू-आँसू गाल रो रहे / बारूदों के ढेर ढो रहे / जप कर माला विश्व शांति की / फिर भी जग के काम चल रहे / राम भरोसे। मुफलिसी में फकीराना मस्ती सारे दुखों की दवा बन जाती है: भाड़ में जाए रोटी-दाना/ अपनी डफली पाना गाना / लाख मुखौटा चढ़े भीड़ में / चेहरा लेकिन है पहचाना।
मूल्यांकन :
नवगीत संग्रहों की सामान्य लीक से हटकर पूर्णिमा जी ने इस संग्रह के ५५ गीतों को स्वस्ति गान - २ गीत, फूल-पान १० गीत, देश गाम १४ गीत, मन मान १२ गीत तथा धूप धान १७ गीत शीर्षक पञ्चाध्यायों में व्यवस्थित किया है।
प्रख्यात नवगीतकार यश मालवीय जी ने ठीक ही कहा है कि पूर्णिमा जी ने मौसम को शिद्दत से महसूस करते हुए उससे मन के मौसम का संगम कराकर गीत के रूप विधान में कुछ ऐसा नया जोड़ दिया है की बात नवगीत से भी आगे चली गयी है।
नचिकेता जी ने इन गीतों में नवगीत की बँधी लीक का अंधानुकरण न होने से अस्वीकृति की कहट्रे को इन्गिर करते हुए कहा है: 'मुमकिन है की इनके गांठीं, सहज और सुबोध गीतों में कुछ हदसूत्री आधुनिकतावादियों को कोई प्रयोगधर्मी नवीनता दिखाई न दे, इसलिए वे इन्हें नवगीत मैंने से ही इंकार कर दें'।
नवगीत के मूल तत्वों में शिल्प के अंतर्गत मुखड़ा और अन्तरा होना आवश्यक है. मुखड़ा तथा अँतरे की अंतिम पंक्ति का मुखड़े के सामान पदभार व सम पदांत का होना सामान्यतः आवश्यक है, इस शिल्प बंधन को पूर्णिमा जी ने सामान्यतः स्वीकारा है किन्तु 'ढूंढ तो लोगे' शीर्षक गीत में मुखड़ा नहीं है। इस गीत में ७-७ पंक्तियों के ४ पद हैं। ' नमन में मन' में प्रथम पद में ७ पंक्तियाँ है शेष ३ पदों में ८-८ पंक्तियाँ है। एक पंक्ति कम होने से प्रथम पद को ७ पंक्ति का मुखड़ा कहा सकते हैं। शैपिल प्रयोगधर्मिता का परिचय देते इस संग्रह के गीतों में १ पंक्ति से ७ पंक्ति तक के मुखड़े हैं।
पदांत और पंक्त्यांत में तुक बंधन का पालन होते हुए भी भिन्नता है: कहीं सिर्फ मात्र का साम्य है जैसे क्यों पलाश गमलों में रोपे / उसको बात बात में टोके / अब क्या खड़ा बावरा सोचे तथा जैसे हों कागज़ के खोखे में केवल 'ए' की मात्रा की समानता है जबकि 'बोगन विला' शीर्षक नवगीत में में फूला मुंडेरे पर बोगनविला / ओ पिया, झूला मुंडेरे पर बोगनविला / ओ पिया, हूला मुंडेरे पर बोगनविला / ओ पिया में केवल प्रथम अक्षर भिन्न है जबकि ऊ की मात्रा के साथ ला मुंडेरे पर बोगनविला / ओ पिया का पदांत है। निस्संदेह ऐसे शैल्पिक प्रयोग के लिए नवगीतकार का शब्द भण्डार और भाषिक पकड़ असाधारण होना आवश्यक है।
नवगीतों में गेयता पर पठनीयता के हावी होने से असहमत पूर्णिमा जी ने इन गीतों को सहजता, स्वाभाविकता, रागात्मकता, सामूहिकता तथा संगीतात्मकता से संस्कारित किया है। वे यथर्थ के नाम पर गद्यात्मक ठहराव न आने देने के प्रति सचेष्ट रही हैं। राष्ट्र और राष्ट्र भाषा के प्रति उनकी चिंता इन गीतों में व्यक्त हुई है: तिरंगा और मेरी माटी मेरा देश ऐसे ही नवगीत हैं।
सारतः पूर्णिमा बर्मन जी के ये नवगीत उन्हें पाठकों-श्रोताओं के लिए सहज ग्रहणीय बनाते है। किताबी समीक्षक भले ही यथार्थ वैषम्य और विसंगतियों की कमी को न्यूनता कहें किन्तु मेरे मत में इससे उनके गीत दुरूह, नीरस और असहज होने से बचे हैं। अपने वर्तमान रूप में ये गीत आम जन की बात आमजन की भाषा में कह सके हैं। इनकी ताकत है और वैशिष्ट्य यह है की ये ज़ेहन पर वज़न नहीं डालते, पढ़ते-सुनते की मन को छू पते हैं और दुबारा पढ़ने-सुनने पे अरुचिकर नहीं लगते। यह पूर्णिमा जी का प्रथम नवगीत संग्रह है। उअनके सभी पाठकों - श्रोताओं की तरह अगले संकलन की प्रतीक्षा करते हुए मैं भी यही कहूँगा 'अल्लाह करे जोरे कलम और ज़ियादा'।
८-११-२०१४

***
चर्चा :
शब्द और अर्थ
शब्द के साथ अर्थ जुड़ा होता है। यदि अन्य भाषा के शब्द का ऐसा अनुवाद हो जिससे अभीष्ट अर्थ ध्वनित न हो तो उसे छोड़ना चाहिए जबकि अभीष्ट अर्थ प्रगट होता है तो ग्रहण करना चाहिए ताकि उस शब्द का अपना स्वतंत्र अस्तित्व हो सके।
'चलभाष' या 'चलित भाष' से गतिशीलता तथा भाषिक संपर्क अनुमानित होता है। इसका विकल्प 'चलवार्ता' भी हो सकता है। कोई व्यक्ति 'मोबाइल' शब्द न जानता हो तो भी उक्त शब्दों को सार्थक पायेगा। अतः, ये हिंदी के लिये उपयुक्त हैं।
साइकिल का वास्तविक अर्थ चक्र होता है। चक्र का अर्थ भौतिकी, रसायन, युद्ध विज्ञान, यातायात यांत्रिकी में भिन्न होते हैं।
अंग्रेजी में 'बाइसिकिल' शब्द है जिसे हम विरूपित कर हिंदी में 'साइकिल' वाहन के लिये प्रयोग करते हैं. यह प्रयोग वैसा ही है जैसे मास्टर साहब को' मास्साब' कहना। अंग्रेजी में भी बाइ = दो, साइकिल = चक्र भावार्थ दो चक्र का (वाहन), हिंदी में द्विचक्रवाहन। जो भाव व्यक्त करता शब्द अंग्रेजी में सही, वही भाव व्यक्त करता शब्द हिंदी में गलत कैसे हो सकता है?
संकेतों के व्यापक ताने-बाने को नेट तथा इसके विविध देशों में व्याप्त होने के आधार पर 'इंटर' को जोड़कर 'इंटरनेट' शब्द बना। इंटरनेशनल = अंतर राष्ट्रीय सर्व स्वीकृत शब्द है। 'इंटर' के लिये 'अंतर' की स्वीकार्यता है (अंतर के अन्य अर्थ 'दूरी', फर्क, तथा 'मन' होने बाद भी)। ताने-बाने के लिये 'जाल' को जोड़कर अंतरजाल शब्द केवल अनुवाद नहीं है, वह वास्तविक अर्थ में भी उपयुक्त है।
टेलीविज़न = दूरदर्शन, टेलीग्राम =दूरलेख, टेलीफोन = दूरभाष जैसे अनुवाद सही है पर इसी आधार पर टेलिपैथी में 'टेली' का भाषांतरण 'दूर' नहीं किया जा सकता। 'पैथी' के लिये हिंदी में उपयुक्त शब्द न होने से एलोपैथी, होमियोपैथी जैसे शब्द यथावत प्रयोग होते हैं।
दरअसल अंग्रेजी शब्द मस्तिष्क में बचपन से पैठ गया हो तो समानार्थी हिंदी शब्द उपयुक्त नहीं लगता। भाषा विज्ञान के जानकार शब्दों का निर्माण गहन चिंतन के बाद करते हैं।
८-११-२०१४


***
बाल कविता:
अंशु-मिंशू
*
अंशू-मिंशू दो भाई हिल-मिल रहते थे हरदम साथ.
साथ खेलते साथ कूदते दोनों लिये हाथ में हाथ..


अंशू तो सीधा-सादा था, मिंशू था बातूनी.
ख्वाब देखता तारों के, बातें थीं अफलातूनी..


एक सुबह दोनों ने सोचा: 'आज करेंगे सैर'.
जंगल की हरियाली देखें, नहा, नदी में तैर..


अगर बड़ों को बता दिया तो हमें न जाने देंगे,
बहला-फुसला, डांट-डपट कर नहीं घूमने देंगे..


छिपकर दोनों भाई चल दिये हवा बह रही शीतल.
पंछी चहक रहे थे, मनहर लगता था जगती-तल..


तभी सुनायी दीं आवाजें, दो पैरों की भारी.
रीछ दिखा तो सिट्टी-पिट्टी भूले दोनों सारी..


मिंशू को झट पकड़ झाड़ पर चढ़ा दिया अंशू ने.
'भैया! भालू इधर आ रहा' बतलाया मिंशू ने..


चढ़ न सका अंशू ऊपर तो उसने अकल लगाई.
झट ज़मीन पर लेट रोक लीं साँसें उसने भाई..


भालू आया, सूँघा, समझा इसमें जान नहीं है.
इससे मुझको कोई भी खतरा या हानि नहीं है..


चला गए भालू आगे, तब मिंशू उतरा नीचे.
'चलो उठो कब तक सोओगे ऐसे आँखें मींचें.'


दोनों भाई भागे घर को, पकड़े अपने कान.
आज बचे, अब नहीं अकेले जाएँ मन में ठान..


धन्यवाद ईश्वर को देकर, माँ को सच बतलाया.
माँ बोली: 'संकट में धीरज काम तुम्हारे आया..


जो लेता है काम बुद्धि से वही सफल होता है.
जो घबराता है पथ में काँटें अपने बोता है..


खतरा-भूख न हो तो पशु भी हानि नहीं पहुँचाता.
मानव दानव बना पेड़ काटे, पशु मार गिराता..'


अंशू-मिंशू बोले: 'माँ! हम दें पौधों को पानी.
पशु-पक्षी की रक्षा करने की मन में है ठानी..'


माँ ने शाबाशी दी, कहा 'अकेले अब मत जाना.
बड़े सदा हितचिंतक होते, अब तुमने यह माना..'
८-११-२०१०
***

मंगलवार, 7 नवंबर 2023

मेरे गीत गोमती का जल, ओमप्रकाश शुक्ल

 मेरे गीत गोमती का जल : सलिल प्रवाहित कलकलकल 

*

ॐ अनादि-अनंत है। ॐ से उत्पन्न सृष्टि का ॐ में ही विलय होता है। ॐ का प्रकाश 'श्याम' नहीं; शुक्ल ही होता है। ॐ की ऊर्जा ही जीव रूप में अवतार लेती है। सुयोग है की ॐ के एक अंश ने गोमती तीर पर धरावतरण किया और गोमती किनारे बालुका राशि के अक्षर कणों से घरघूला बनाते हुए अक्षरों को जोड़कर विचार  को व्यक्त करना सीखा और 'गाँधी और उनके बाद' जैसी विचारोत्तेजक-समजोपयोगी कृति के रचना की।   

गोमती के सलिल-प्रवाह में अंतर्निहित छंद को आत्मसात कर ॐ का प्रकाश अपनी शुक्लता को गीत पंक्तियों में समाहित कर 'मेरे गीत गोमती का जल' की रचना कर सका है। 'नीता' का सत्संग पाकर नीति-पथ पर चलना स्वाभाविक है। ॐ प्रकाश के गीत देश और समाज, प्रकृति और नियति, कर्तव्य और भावना, व्यष्टि और समष्टि, प्रेम और क्षेम के दो किनारों के बीच भाव-रस के प्रवाह पर अभिव्यक्ति का सेतु बनाते चलते हैं। 

इन गीतों में लोक है तो उसमें व्याप्त लोभ और उससे उपजा शोक भी है, कान्हा है तो कनुप्रिया भी है, फागुन है तो बसंत भी है। ॐ प्रकाश की शुक्लता बाह्य नहीं आभ्यंतरिक है। वह करात्रिमत से सर्वथा दूर है- 

बनावटी ही शब्द अगर मैं चुनकर लाऊँगा 

प्रणय गीत या राष्ट्र वंदना कैसे गाऊँगा?  

इन गीतों में हृदयोद्गार पंक्ति-पंक्ति में समाहित है। अमिधा और लक्षणा का प्रयोग अधिक है। व्यंजना भोजन में नमक की तरह ही होनी चाहिए, और है। सरलता, सहजता और सुबोधता का मणि-कांचन योग इनमें है। प्रिय ॐप्रकाश 'दिमाग' से नहीं 'दिल' से गीत रचते हैं, इसलिए वे सीधे दिल तक पहुँचते हैं। हार्दिक बधाई। विश्वास है ये लोकप्रिय होंगे और ॐप्रकाश के सृजनशील व्यक्तित्व का अन्य पहलू लेकर नई कृति शीघ्र ही प्राप्त होगी। 

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

संयोजक विश्ववाणी हिंदी संस्थान अभिएन 

४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१ 

९४२५१८३२४४ 



सोमवार, 6 नवंबर 2023

नासदीय सूक्त, सृष्टि उत्पत्ति, प्राण शर्मा, अमरकंटक छंद, सोरठा गीत, मुक्तक, दोहा, कुण्डलिया

सोरठा गीत
कली रखे यदि शूल, कुसुम वीर हो देश में।
कोई सके न भूल, देख बदनीयत से उसे।।
*
तम का करते अंत, तभी रहें जब साथ मिल।
दीपक बाती तेल, ज्योति न होते जब अलग।।
मार मिलातीं धूल, असुरों को दुर्गा शुभे।
सिंह देता रद हूल, कर गर्जन अरि वक्ष में।।
*
चाह रहा है देश, नारी बदले भूमिका।
धारे धारिणी वेश, शुभ-मंगल कर भूमि का।।
वन हों नदिया कूल, शांति स्वच्छता पा विहग।
नभ-सागर मस्तूल, फहराए निज परों के।।
*
पंचतत्व रख शुद्ध, पंच पर्व हम मनाएँ।
करें अनय से युद्ध, विजय विनय को दिलाएँ।।
सुख सपनों में झूल, समय गँवाएँ व्यर्थ मत।
जमा जमीं में मूल, चलो!छुएँ आकाश हम।।
६-११-२०२१
***
मुक्तक
*
स्नेह का उपहार तो अनमोल है
कौन श्रद्धा-मान सकता तौल है?
भोग प्रभु भी आपसे ही पा रहे
रूप चौदस भावना का घोल है
*
स्नेह पल-पल है लुटाया आपने।
स्नेह को जाएँ कभी मत मापने
सही है मन समंदर है भाव का
इष्ट को भी है झुकाया भाव ने
*
'फूल' अंग्रेजी का मैं, यह जानता
'फूल' हिंदी की कदर पहचानता
इसलिए कलियाँ खिलाता बाग़ में
सुरभि दस दिश हो यही हठ ठानता
*
उसी का आभार जो लिखवा रही
बिना फुरसत प्रेरणा पठवा रही
पढ़ाकर कहती, लिखूँगी आज पढ़
साँस ही मानो गले अटका रही
२९.१०.२०१७
***
हिंदी के नए छंद १२
कृष्णमोहन छन्द
विधान-
1. प्रति पंक्ति 7 मात्रा
2. प्रति पंक्ति मात्रा क्रम गुरु लघु गुरु लघु लघु
गीत
रूप चौदस
.
रूप चौदस
दे सदा जस
.
साफ़ हो तन
साफ़ हो मन
हों सभी खुश
स्वास्थ्य है धन
बो रहा जस
काटता तस
बोलती सच
रूप चौदस.
.
है नहीं धन
तो न निर्धन
हैं नहीं गुण
तो न सज्जन
ईश को भज
आत्म ले कस
मौन तापस
रूप चौदस.
.
बोलना तब
तोलना जब
राज को मत
खोलना अब
पूर्णिमा कह
है न 'मावस
रूप चौदस
.
मैल दे तज
रूप जा सज
सत्य को वर
ईश को भज
हो प्रशंसित
रूप चौदस
.
वासना मर
याचना मर
साथ हो नित
साधना भर
हो न सीमित
हर्ष-पावस
साथ हो नित
रूप चौदस
.......
१८-१०-२०१७
***
हिन्दी के नये छंद १३
अमरकंटक छंद
विधान-
1. प्रति पंक्ति 7 मात्रा
2. प्रति पंक्ति मात्रा क्रम लघु लघु लघु गुरु लघु लघु
गीत
नरक चौदस
.
मनुज की जय
नरक चौदस
.
चल मिटा तम
मिल मिटा गम
विमल हो मन
नयन हों नम
पुलकती खिल
विहँस चौदस
मनुज की जय
नरक चौदस
.
घट सके दुःख
बढ़ सके सुख
सुरभि गंधित
दमकता मुख
धरणि पर हो
अमर चौदस
मनुज की जय
नरक चौदस
.
विषमता हर
सुसमता वर
दनुजता को
मनुजता कर
तब मने नित
विजय चौदस
मनुज की जय
नरक चौदस
.
मटकना मत
भटकना मत
अगर चोटिल
चटकना मत
नियम-संयम
वरित चौदस
मनुज की जय
नरक चौदस
.
बहक बादल
मुदित मादल
चरण नर्तित
बदन छागल
नरमदा मन
'सलिल' चौदस
मनुज की जय
नरक चौदस
६-११-२०१८
.......
कार्यशाला
रचना-प्रतिरचना
*
रचना
ग़ज़ल - प्राण शर्मा
----------
देश में छाएँ न ये बीमारियाँ
लोग कहते हैं जिन्हें गद्दारियाँ
+
ऐसे भी हैं लोग दुनिया में कई
जिनको भाती ही नहीं किलकारियाँ
+
क्या ज़माना है बुराई का कि अब
बच्चों पर भी चल रही हैं आरियाँ
+
राख में ही तोड़ दें दम वो सभी
फैलने पाएँ नहीं चिंगारियाँ
+
`प्राण`तुम इसका कोई उत्तर तो दो
खो गयी हैं अब कहाँ खुद्दारियाँ
+
प्रतिरचना
मुक्तिका - संजीव
*
हैं चलन में आजकल अय्यारियाँ
इसलिए मुरझा रही हैं क्यारियाँ
*
पश्चिमी धुन पर थिरकती है कमर
कौन गाये अब रसीली गारियाँ
*
सूक्ष्म वसनों का चलन ऐसा चला
बदन पर खीचीं गयीं ज्यों धारियाँ
*
कान काटें नरों के बचकर रहो
अब दुधारी हो रही हैं नारियाँ
*
कौन सोचे देश-हित की बात अब
खेलते दल आत्म-हित की पारियाँ
*
***
गीत
*
जीवन की बगिया में
महकाये मोगरा
पल-पल दिन आज का।
*
श्वास-श्वास महक उठे
आस-आस चहक उठे
नयनों से नयन मिलें
कर में कर बहक उठे
प्यासों की अँजुरी में
मुस्काये हरसिंगार
छिन-छिन दिन आज का।
*
रूप देख गमक उठे
चेहरा चुप चमक उठे
वाक् हो अवाक 'सलिल'
शब्द-शब्द गमक उठे
गीतों की मंजरी में
खिलखलाये पारिजात
गिन -गिन दिन आज का।
*
चुप पलाश दहक उठे
महुआ सम बहक उठे
गौरैया मन संझा
कलरव कर चहक उठे
मादक मुस्कानों में
प्रमुदित हो अमलतास
खिल-खिल दिन आज का।
***
मुक्तक
नींद उड़ानेवाले तेरे सपनों में सँग-साथ रहूँ
जो न किसी ने कह पायी हो, मन ही मन वह बात कहूँ
मजा तभी बिन कहे समझ ले, वह जो अब तक अनजाना
कही-सुनी तो आनी-जानी, सोची-समझी बात तहूँ
६-११-२०१६
***
कुण्डलिया
मन से मन रखते मिले, जनगण करें न भेद.
नेता भ्रम फैला रहे, नाहक- है यह खेद..
नाहक है यह खेद, पचा वे हार न पाये
सहनशीलता भूल और पर दोष लगाएं
पोल खुल रही फिर भी सबक न लें जीवन से

गयीं सोनिया उतर ' सलिल' जनता के मन से

६-११-२०१५
***
मुक्तक:
हमको फ़ख़्र आप पर है, हारिए हिम्मत नहीं
दूरियाँ दिल में नहीं, हम एक हैं रखिये यकीं
ज़िन्दगी ज़द्दोज़हद है, जीतना ही है हमें
ख़त्म कर सब फासले, हम एक होंगे है यकीं
६-११-२०१४
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Nasadiya Sukta (called Hymn of Creation in the West)
नासदासींनॊसदासीत्तदानीं नासीद्रजॊ नॊ व्यॊमापरॊ यत् ।
किमावरीव: कुहकस्यशर्मन्नभ: किमासीद्गहनं गभीरम् ॥१॥
Then even nothingness was not, nor existence,
There was no air then, nor the heavens beyond it.
What covered it? Where was it? In whose keeping
Was there then cosmic water, in depths unfathomed?
न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न रात्र्या।आन्ह।आसीत् प्रकॆत: ।
आनीदवातं स्वधया तदॆकं तस्माद्धान्यन्नपर: किंचनास ॥२॥
Then there was neither death nor immortality
nor was there then the torch of night and day.
The One breathed windlessly and self-sustaining.
There was that One then, and there was no other.
तम।आअसीत्तमसा गूह्ळमग्रॆ प्रकॆतं सलिलं सर्वमा।इदम् ।
तुच्छॆनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिना जायतैकम् ॥३॥
At first there was only darkness wrapped in darkness.
All this was only unillumined water.
That One which came to be, enclosed in nothing,
arose at last, born of the power of heat.
कामस्तदग्रॆ समवर्तताधि मनसॊ रॆत: प्रथमं यदासीत् ।
सतॊबन्धुमसति निरविन्दन्हृदि प्रतीष्या कवयॊ मनीषा ॥४॥
In the beginning desire descended on it -
that was the primal seed, born of the mind.
The sages who have searched their hearts with wisdom
know that which is is kin to that which is not.
तिरश्चीनॊ विततॊ रश्मीरॆषामध: स्विदासी ३ दुपरिस्विदासीत् ।
रॆतॊधा।आसन्महिमान् ।आसन्त्स्वधा ।आवस्तात् प्रयति: परस्तात् ॥५॥
And they have stretched their cord across the void,
and know what was above, and what below.
Seminal powers made fertile mighty forces.
Below was strength, and over it was impulse.
कॊ ।आद्धा वॆद क‌।इह प्रवॊचत् कुत ।आअजाता कुत ।इयं विसृष्टि: ।
अर्वाग्दॆवा ।आस्य विसर्जनॆनाथाकॊ वॆद यत ।आबभूव ॥६॥
But, after all, who knows, and who can say
Whence it all came, and how creation happened?
the gods themselves are later than creation,
so who knows truly whence it has arisen?
इयं विसृष्टिर्यत ।आबभूव यदि वा दधॆ यदि वा न ।
यॊ ।आस्याध्यक्ष: परमॆ व्यॊमन्त्सॊ आंग वॆद यदि वा न वॆद ॥७॥
Whence all creation had its origin,
he, whether he fashioned it or whether he did not,
he, who surveys it all from highest heaven,
he knows - or maybe even he does not know.
RV 10.130

The Nasadiya Sukta (after the incipit ná ásat "not the non-existent") also known as the Hymn of Creation is the 129th hymn of the 10th Mandala of the Rigveda (10:129). It is concerned with cosmology and the origin of the universe
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जड़ पकड़े चेतन तजे, हो खयाल या माल
'सलिल' खलिश आनंद दे, झूमो दे-दे ताल

यमकीय दोहा

फेस न करते फेस को, छिपते फिरते नित्य
बुक न करें बुक फोकटिया, पाठक 'सलिल' अनित्य
६-११-२०१३
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