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शुक्रवार, 29 मई 2020

अभियान २६ : स्मरण पर्व

ॐ  
विश्ववाणी हिंदी संस्थान अभियान जबलपुर 
४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर 
चलभाष ९४२५१८३२४४, ईमेल salil.sanjiv@gmail.com 

समाचार: 

२६ वां दैनंदिन सारस्वत अनुष्ठान : स्मरण पर्व 
अलंकार काव्य को सुरुचिपूर्ण बनाते हैं - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 

जबलपुर, २९-५-२०२०। संस्कारधानी जबलपुर की प्रतिष्ठित संस्था विश्ववाणी हिंदी संस्थान अभियान के २६ वे दैनंदिन सारस्वत अनुष्ठान स्मरण पर्व के अंतर्गत साहित्यकारों ने अपने मनपसंद दिवंगत साहित्यकारों के अवदान तथा व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को याद किया। इस विमर्श का श्री गणेश वागेश्वरी सरस्वती जी के पूजार्चन से हुआ। सुमधुर स्वर में मीनाक्षी शर्मा 'तारिका' ने आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' रचित सरस्वती वंदना ''हे हंसवाहिनी! ज्ञानदायिनी!! अब विमल मति दे'' जिसे भारत के समस्त सरस्वती शिशु मंदिरों में दैनिक प्रार्थना के रूप में लगभग ३ दशकों से अगणित विद्यार्थियों द्वारा गया जाता है, का गायन किया। मुखिया की आसंदी पर सुशोभित हुईं हिंदी-बुंदेली की वरिष्ठ कहानीकार-कवयित्री लक्ष्मी शर्मा जी।  पाहुने की आसंदी पर प्रतिष्ठित हुईं भीलवाड़ा की बाल शिक्षाविद-कवयित्री पुनीता भारद्वाज। कासगंज उत्तर प्रदेश से पधारे विशेष अतिथि अखिलेश सक्सेना द्वारा अतिथि द्वय के स्वागतोपरांत विषय प्रवर्तन करते हुए आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने दिवंगत साहित्यकारों, वर्तमान साहित्यकारों तथा उभरते साहित्यकारों के मध्य सृजन सेतु स्थापित करने के के लिए ऐसे कार्यक्रम की उपादेयता प्रतिपादित की।
विमर्श का आरंभ करते हुए नगर की प्रतिष्ठित शिक्षिका-समाजसेविका-कवयित्री-नाटककार साधना उपाध्याय जी ने "भगवान पिता मत बनो, बनो तुम माता / माता का सबसे अच्छा लगता नाता'' जैसी बाल कविता रचने वाले उमरखैय्याम की रुबाइयों का हिंदी में सबसे पहले काव्यानुवाद करने वाले केशव पाठक के व्यक्तित्व-कृतित्व पर प्रकाश डाला। ओजस्वी कवि अभय तिवारी ने बच्चन जी की पहली कविता प्रेमा पत्रिका में प्रकाशित करनेवाले रामानुजलाल श्रीवास्तव ''ऊँट बिलहरीवी'' पर प्रकाश डालते हुए उनके द्वारा सुभद्रा कुमारी चौहान की जेल यात्रा  पर रची गयी कालजयी रचना सुनाई-
''जानते हैं सब तुम्हें तुम उग्र हो उद्द्ण्डिका हो
आग हो तूफ़ान हो भूचाल ही रणचण्डिका हो
खून से अपने लिखी हड़कंप रानी झाँसी की कहानी
याद है जालियां वाला बाग़ लाखो की जबानी
क्यों अभी से आग इतनी जोर से भड़का रही हो
जा रही हो''
हिंदी-बुंदेली-संस्कृत साहित्य के साथ शोधकार्य हेतु सर्वप्रशंसित सुमनलता श्रीवास्तव ने छायावाद की स्तंभ पद्म विभूषण पद्मभूषण महीयसी महादेवी जी वर्मा पर निबंध वचन करते हुए उन्हें जबलपुर की नातिन तथा आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' को उनका भतीजा होने का उल्लेख करते हुए साहित्य, गायन और चित्रकला तीनों क्षेत्रों में महीयसी के अवदान का उल्लेख किया। महीयसी के ३२ ग्रंथों का उल्लेख करते हुए विदुषी वक्त ने उनके साहित्य को समयजयी तथा भाषा को प्रांजल व् माधुर्य से परिपूर्ण बताया तथा अनेक गीतों की पंक्तियाँ सुनाईं। बाल शिक्षाविद आशा रिछारिया ने स्वातंत्र्य सत्याग्रही बालमुकुंद त्रिपाठी के व्यक्तित्व व् साहित्य की चर्चा करते हुए उन्हें हिंदी का प्रकाश दीप बताया। डॉ. वंदना दुबे ले बुंदेली साहित्य के शिखर डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव पर उनके शिष्य स्वामी प्रज्ञानंद सरस्वती द्वारा लिखित लेख का वाचन किया जिसमें पूरनचंद की शिक्षण पद्धति को अभूतपूर्व बताते हुए उनकी भाषा में बुंदेली लोकोक्तियों तथा मुहावरों की चाशनी घुली होने को याद किया। जपला झार खंड से प्रो. रेखा सिंह ने डॉ. जगदीश सिंह के साहित्यिक अवदान पर प्रकाश डाला। 
महात्मा गाँधी  के सहयोगी रहे, वाल्मीकि रामायण के हिंदी पद्यानुवादकर्ता, महर्षि अरविन्द कृत दर्शनशास्त्रीय चिंतन से संपन्न समृद्ध कृति सावित्री के प्रथम हिंदी अनुवादकर्ता ब्योहार राजेंद्र सिंह के व्यक्तित्व को सदा जीवन उच्च विचार का पर्याय बताया। ब्योहार जी के साथ नैकट्य और उनके समृद्ध पुस्तकालय में दुर्लभ पुस्तकों को सुरक्षित न रखे जा सकने को हिंदी वांग्मय की गंभीर क्षति  बताया। भीलवाड़ा से पधारी पुनिता भारदवाज ने ओजस्वी कवि शिवमंगल सिंह सुमन से संबंधित संस्मरण सुनाते हुए सुमन जी द्वारा कन्या भोज में मितव्ययिता के साथ भोजन परोसे जाने तथा भोजन के पश्चात् चवन्नी मिलने का उल्लेख करते हुए सुमन जी के व्यक्तित्व में व्याप्त सरलता को दुर्लभ बताया। देश की प्रसिद्ध पादप रोग विशेषज्ञ, कवयित्री, गायिका डॉ. अनामिका तिवारी ने अपने श्वसुर, जबलपुर के सांसद व महापौर रहे भवानी प्रसाद तिवारी को याद करते हुए  उन्हें प्रजातंत्र का जागरूक प्रहरी, संवेदनशील जन नेता तथा प्रखर साहित्यकार बताया। जबलपुर के ओजस्वी कवि हिंदी प्राध्यापक-प्राचार्य जवाहरलाल चौरसिया 'तरुण' के व्यक्तित्व-कृतित्व की चर्चा की श्रीमती लक्ष्मी शर्मा ने। प्रसिद्ध समीक्षक-निबंधकार- हरिकृष्ण त्रिपाठी के प्रेरक व्यक्तित्व-कृतित्व को नगर और समाज के लिए गौरव का पर्याय बताया। माधुरी मिश्रा ने सामाजिक कार्यकर्ता और साहित्यकार ओंकार श्रीवास्तव 'संत' से जुड़े व्यक्तिगत संसमरण सुनते हुए उन्हें प्रेरणास्रोत आदर्श बताया। सपना सराफ ने डॉ. हरिवंश राय बच्चन रचित गीत   ''जग में अँधियारा छाया था / मैं ज्वाला लेकर आया था /मैंने जलकर दी आयु बिता / पर जगती का तम हर न सका / मैं जीवन में कुछ कर न सका'' सुनाया। डॉ. मुकुल तिवारी ने सुभद्राकुमारी चौहान को स्वतंत्रता आंदोलन की प्राणशक्ति बताया। नन्हे बच्चों का मोह त्यागकर लगातार स्वतंत्रता सत्याग्रह में सक्रियता तथा कारावास के साथ अद्भुत साहित्य सृजन को असाधारण बताया।
मीनाक्षी शर्मा ''तारिका'' ने अनूठे साहित्यकार-सांसद भगवतीचरण वर्मा के साहित्य पर प्रकाश डालते हुए संक्षिप्त विवेचन किया। प्रो। आलोकरंजन पलामू ने वैद्यनाथ मिश्र उर्फ़ नागार्जुन के व्यक्तित्व-कृतित्व की एकाकारिता तथा कविता को अभिजात्यता  से मुक्ति देनेवाला बताया। आकाशवाणी उद्घोषिका, शिक्षिका बुंदेली कवयित्री प्रभा विश्वकर्मा 'शील' ने लोककवि ईसुरी को सरस्वतीपुत्र बताते हुए उन्हें श्रृंगार का अग्रदूत निरूपित किया और ईसुरी की फागों का सस्वर वाचन किया। राष्ट्रपति पुरस्कृत शिक्षिका चंदा देवी स्वर्णकार ने स्वतंत्रता सत्याग्रही प्रभादेवी श्रॉफ की जेलयात्रा संबंधी संस्मरण सुनाये। युवा चिंतक-साधक सारांश गौतम ने विश्व प्रसिद्ध दार्शनिक ओशो पर विचार व्यक्त करते हुए उन्हें २० वीं सदी के १० व्यक्तित्वों में से एक बताया। ओशो दर्शन का सम्यक विश्लेषण करते हुए सारांश ने पूर्व की प्रज्ञा और पश्चिम के विज्ञान का सम्मिश्रण ओशो के दर्शन में पाया।

इंजी. अरुण भटनागर ने महर्षि महेश योगी के अद्भुत अवदान और वेद विज्ञान संबंधी साहित्य पर प्रकाश डालते हुए उन्हें विश्व मानवता की धरोहर बताया।
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पुस्तक चर्चा: 'बुंदेली दोहे'

पुस्तक चर्चा:
'बुंदेली दोहे' सांस्कृतिक शब्द छवियाँ मन मोहे
चर्चाकार: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
[कृति विवरण: बुंदेली दोहे, दोहा संग्रह , आचार्य भगवत दुबे, प्रथम संस्करण २०१६, आकार डिमाई, आवरण बहुरंगी पेपरबैक, पृष्ठ १५२, मूल्य ५०/-, ISBN ९७८-९३-८३८९९-१८-०, प्रकाशक आदिवासी लोक कला एवं बोली विकास अकादमी, म. प्र. संस्कृति परिषद्, श्यामला हिल्स, भोपाल ४६२००२, कृतिकार संपर्क- ९३००६१३९७५]
*
विश्ववाणी हिंदी का कालजयी छंद दोहा अपनी मिसाल आप है। संक्षिप्तता, सारगर्भितता, लाक्षणिकता, मर्मबेधकता, कालजयिता, उपयोगिता तथा लोकप्रियता के सप्त सोपानी निकष पर दोहा जन सामान्य से लेकर विद्वज्जनों तक अपनी प्रासंगिकता निरंतर बनाए रख सका है। बुंदेली के लोककवियों ने दोहे का महत्त्व पहचान कर नीतिपरक दोहे कहे. घाघ-भड्डरी, ईसुरी, जगनिक, केशव, जायसी, घनानंद, राय प्रवीण प्रभृति कवियों ने दोहा के माध्यम से बुंदेली साहित्य को समृद्ध किया। आधुनिक काल के बुंदेली दोहकारों में अग्रगण्य रामनारायण दास बौखल ने नारायण अंजलि भाग १ में ४०८३ तथा भाग २ में ३३८५ दोहों के माध्यम से साहित्य और आध्यात्म का अद्भुत समागम करने में सफलता अर्जित की है।

बौखल जी की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए बहुमुखी प्रतिभा और बहुविधायी स्तरीय कृतियों के प्रणेता आचार्य भगवत दुबे ने विवेच्य कृति में बुंदेली लोक जीवन और लोक संस्कृति के वैविध्य को उद्घाटित किया है। इसके पूर्व दुबे जी 'शब्दों के संवाद' दोहा संकलन में शुद्ध साहित्यिक हिंदी के अभिव्यंजनात्मक दोहे रचकर समकालिक दोहकारों की अग्रपंक्ति में स्थापित हो चुके हैं। यह दोहा संग्रह दुबे जी को बुंदेली का प्रथम सांस्कृतिक दोहाकार के रूप में प्रस्तुत करता है। 'किरपा करियो शारदे' शीर्षक अध्याय में कवि ने ईशवंदना करने के साथ-साथ लोकपूज्य खेडापति, जागेसुर, दुल्हादेव तथा साहित्यिक पुरखों लोककवियों ईसुरी, गंगाधर, जगनिक, केशव, बिहारी, भूषण, राय प्रवीण, आदि का स्मरण कर अभिनव परंपरा का सूत्रपात किया है।
'बुंदेली नौनी लगे' शीर्षक के अंतर्गत 'बुंदेली बोली सरस', 'बुंदेली में लोच है', 'ई में भरी मिठास', 'अपनेपन कौ भान' आदि अभिव्यक्तियों के माध्यम से दोहाकार ने बुंदेली के भाषिक वैशिष्ट्य को उजागर किया है। पाश्चात्य संस्कृति तथा नगरीकरण के दुष्प्रभावों से नवपीढ़ी की रक्षार्थ पारंपरिक जीवन-मूल्यों, पारिवारिक मान-मर्यादाओं, सामाजिक सहकार भाव का संरक्षण किये जाने की महती आवश्यकता है। दुबे जी ने ने यह कार्य दोहों के माध्यम से संपन्न किया है किन्तु बुंदेली को संयुक्त राष्ट्र संघ तक पहुँचाने की कामना अतिरेकी उत्साह भाव प्रतीत होता है। आंचलिक बोलिओं का महत्त्व प्रतिपादित करते समय यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि वे हिंदी के उन्नयन पथ में बाधक न हों। वर्तमान में भोजपुरी, राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी आदि के समर्थकों द्वारा अपनी क्षेत्रीय बोलि हिंदी पर वरीयता दिए जाने और उस कारण हिंदी बोलनेवालों की संख्या में कमी आने से विश्व में प्रथम स्थान से च्युत होकर तृतीय होने को देखते हुए ऐसी कामना न की जाए तो हिंदी के लिए बेहतर होगा।
इस कृति में 'जेवर हैं बुन्देल के' शीर्षक अध्याय में कवि ने लापता होते जा रहे पारंपरिक आभूषणों को तलाशकर दोहों में नगों की तरह जड़ दिया है। इनमें से अधिकांश जेवर ग्राम्यांचलों में आज भी प्रचलित हैं किन्तु नगरीकरण के प्रभाव ने उन्हें युवाओं के लिए अलभ्य बना दिया है।
नौ गज की धुतिया गसैं, लगै ओई की काँछ।
खींसा बारो पोलका, धरें नोट दस-पाँच।।
*
सोन पुतरिया बीच में, मुतियन की गुनहार।
पहरै मंगलसूत जो, हर अहिबाती नार।।
*
बीच-बीच में कौडियाँ, उर घुमची के बीज।
पहरैं गुरिया पोत के, औ' गंडा-ताबीज़।।
*
इन दोहों में बुंदेली समाज के विविध आर्थिक स्तरों पर जी रहे लोगों की जीवंत झलक के साथ-साथ जीवन-स्तर का अंतर भी शब्दित हुआ है। 'बनी मजूरी करत हैं' अध्याय में श्रमजीवी वर्ग की पीड़ा, चिंता, संघर्ष, अभाव, अवदान तथा वैशिष्ट्य पंक्ति-पंक्ति में अन्तर्निहित है-
कोदों-कुटकी, बाजरा, समा, मका औ' ज्वार।
गुजर इनई में करत हैं, जुरैं न चाउर-दार।।
*
महुआ वन की लकडियाँ, हर्र बहेरा टोर।
और चिरौंजी चार की, बेचें जोर-तंगोर।।
*
खावैं सूखी रोटियाँ, नून मिर्च सँग प्याज।
हट्टे-कट्टे जे रहें,महनत ई को राज।।
*
चंद्र, मंगल और अब सूर्य तक यान भेजनेवाले देश में श्रमिक वर्ग की विपन्नावस्था चिंतनीय है। बैद हकीमों खें रओ' शीर्षक के अंतर्गत पारंपरिक जड़ी-बूटी चिकित्सा, 'बनन लगत पकवान' में उत्सवधर्मी जीवनपद्धति, 'कई नेंग-दस्तूर', 'जब बरात घर सें कढ़े', 'खेलें बाबा-बाइयें', 'बधू खें चढ़े चढ़ाव', 'पाँव पखारे जांय', 'गारी गावै औरतें', 'सासू जी परछन करैं', 'गोद भराई होत है', 'मोंड़ा हों या मोंड़ियाँ', आदि अध्यायों में बुंदेली जन-जीवन की जीवंत पारिवारिक झलकियाँ मन मोह लेती हैं। दोहाकार ने चतुरतापूर्वक रीति-रिवाजों के साथ-साथ दहेज़ निषेध, कन्या संरक्षण, पक्षी संरक्षण, पौधारोपण, प्रदुषण निवारण जैसे समाज सुधारक विचारों को दोहा में पिरोकर 'सहकार में कुनैन लपेटकर खिलाने और मलेरिया को दूर करने का सार्थक और प्रभावी प्रयोग किया है।

'नौनिहाल कीआँख में', 'काजर आंजे नन्द', 'मामा करैं उपासनी', 'बुआ झालिया लेय', बुआ-सरहजें देत हैं', बाजे बजा बधाव' आदि में रिश्तों की मिठास घुली है। 'तुलसी चौरा स्वच्छ हो', 'सजे सातिया द्वार', 'आँखों से शीतल करैं', 'हरी छिछ्लती दूब', 'गौरैया फुदकत रहे', मिट्ठू सीताराम कह', 'पोसें कुत्ता-बिल्लियाँ', गाय-बैल बांधे जहाँ', 'कहूँ होय अखंड रामान', 'बुंदेली कुस्ती कला', 'गिल्ली नदा डाबरी चर्रा खो-खो खेल' आदि में जन जीवन की मोहक और जीवंत झलकियाँ हैं। 'बोनी करैं किसान', 'भटा टमाटर बरबटी', 'चढ़ा मलीदा खेत में', 'करैं पन्हैया चर्र चू', 'फूलें जेठ-असाढ़ में', 'खेतों में पानी भरे', 'पशुओं खें छापा-तिलक' आदि अध्यायों में खेती-किसानी से सम्बद्ध छवियाँ मूर्तिमंत हुई हैं। आचार्य भगवत दुबे जी बुंदेली जन-जीवन, परम्पराओं, जीवन-मूल्यों ही नहीं क्षेत्रीय वैशिष्ट्य आदि के भी मर्मज्ञ हैं। बंजारी मनिया बरम, दतिया की पीताम्बरा, खजराहो जाहर भयो, मैया को दरबार आदि अध्यायों का धार्मिक-अध्यात्मिक दृष्टि से ही नहीं पर्यटन की दृष्टि से भी महत्त्व है। इस संग्रह के हर दोहे में कथ्य, शिल्प, कहन, सारल्य तथा मौलिकता के पंच तत्व इन्हें पठनीय और संग्रहनीय बनाते हैं। ऐसी महत्वपूर्ण कृति के प्रकाशन हेतु आदिवासी लोक कला एवं बोली विकास परिषद् अकादमी भी बधाई की पात्र है।
***

कार्यशाला आइये! कविता करें १० :

कार्यशाला
आइये! कविता करें १० :
संजीव
.
लता यादव
राह कितनी भी कठिन हो, दिव्य पथ पर अग्रसर हो ।
हारना हिम्मत न अपनी कितनी भी टेढ़ी डगर हो ।
कितनी आएं आँधी या तूफान रोकें मार्ग तेरा, .
तू अकेला ही चला चल पथ प्रदर्शक बन निडर हो ।
कृपया मात्रा भार से भी अवगत करायें गणना करने में कठिनाई का अनुभव करती हूँ , धन्यवाद
संजीव:
राह कितनी भी कठिन हो, दिव्य पथ पर अग्रसर हो ।
21 112 2 111 2, 21 11 11 2111 2 = 14, 14 = 28 हारना हिम्मत न अपनी, कितनी भी टेढ़ी डगर हो ।
212 211 1 112, 112 2 22 111 2 = 14. 15 = 29 कितनी आएं आँधी या, तूफान रोकें मार्ग तेरा, .
112 22 22 2, 221 22 21 22 = 14, 16 = 30 तू अकेला ही चला चल, पथ प्रदर्शक बन निडर हो । 2 122 2 12 11, 11 1211 11 111 2 = 14, 14 = 28
दूसरी पंक्ति में एक मात्रा अधिक होने के कारण 'कितनी' का 'कितनि' तथा तीसरी पंक्ति में २ मात्राएँ अधिक होने के कारण 'कितनी' का 'कितनि' तथा आँधी या का उच्चारण 'आंधियां' की तरह होता है.
इसे सुधारने का प्रयास करते हैं:
राह कितनी भी कठिन हो, दिव्य पथ पर अग्रसर हो ।
21 112 2 111 2, 21 11 11 2111 2 = 14, 14 = 28
हारना हिम्मत न अपनी, भले ही टेढ़ी डगर हो ।
212 211 1 112, 112 2 22 111 2 = 14. 14 = 28
आँधियाँ तूफान कितने, मार्ग तेरा रोकते हों
२१२ ११२ ११२, २१ २२ २१२ २ = 14, 14 = 28
तू अकेला ही चला चल, पथ प्रदर्शक बन निडर हो ।
2 122 2 12 11, 11 1211 11 111 2 = 14, 14 = 28
लता जी! विचार करिए. उचित लगे तो अपना लें अन्यथा कुछ अन्य सोचें.
८-२-२०१५ 

नवगीत: शिरीष

नवगीत:
शिरीष
संजीव
.
क्षुब्ध टीला
विजन झुरमुट
झाँकता शिरीष
.
गगनचुम्बी वृक्ष-शिखर
कब-कहाँ गये बिखर
विमल धार मलिन हुई
रश्मिरथी तप्त-प्रखर
व्यथित झाड़ी
लुप्त वनचर
काँपता शिरीष
.
सभ्य वनचर, जंगली नर
देख दंग शिरीष
कुल्हाड़ी से हारता है
रोज जंग शिरीष
कली सिसके
पुष्प रोये
झुलसता शिरीष
.
कर भला तो हो भला
आदम गया है भूल
कर बुरा, पाता बुरा ही
जिंदगी है शूल
वन मिटे
बीहड़ बचे हैं
सिमटता शिरीष
.
बीज खोजो और रोपो
सींच दो पानी
उग अंकुर वृक्ष हो
हो छाँव मनमानी
जान पायें
शिशु हमारे
महकता शिरीष
...
टिप्पणी: इस पुष्प का नाम शिरीष है। बोलचाल की भाषा में इसे सिरस कहते हैं। बहुत ही सुंदर गंध वाला... संस्कृत ग्रंथों में इसके बहुत सुंदर वर्णन मिलते हैं। अफसोस कि इसे भारत में काटकर जला दिया जाता है। शारजाह में इसके पेड़ हर सड़क के दोनो ओर लगे हैं। स्व. हजारी प्रसाद द्विवेदी का ललित निबंध 'शिरीष के फूल' है -http://www.abhivyakti-hindi.org/.../lali.../2015/shirish.htm वैशाख में इनमें नई पत्तियाँ आने लगती हैं और गर्मियों भर ये फूलते रहते हैं... ये गुलाबी, पीले और सफ़ेद होते हैं. इसका वानस्पतिक नाम kalkora mimosa (albizia kalkora) है. गाँव के लोग हल्के पीले फूल वाले शिरीष को, सिरसी कहते हैं। यह अपेक्षाकृत छोटे आकार का होता है। इसकी फलियां सूखकर कत्थई रंग की हो जाती हैं और इनमें भरे हुए बीज झुनझुने की तरह बजते हैं। अधिक सूख जाने पर फलियों के दोनों भाग मुड़ जाते हैं और बीज बिखर जाते हैं। फिर ये पेड़ से ऐसी लटकी रहती हैं, जैसे कोई बिना दाँतो वाला बुजुर्ग मुँह बाए लटका हो।इसकी पत्तियाँ इमली के पेड़ की पत्तियों की भाँति छोटी छोटी होती हैं। इसका उपयोग कई रोगों के निवारण में किया जाता है। फूल खिलने से पहले (कली रूप में) किसी गुथे हुए जूड़े की तरह लगता है और पूरी तरह खिल जाने पर इसमें से रोम (छोटे बाल) जैसे निकलते हैं, इसकी लकड़ी काफी कमजोर मानी जाती है, जलाने के अलावा अन्य किसी उपयोग में बहुत ही कम लाया जाता है।बडे शिरीष को गाँव में सिरस कहा जाता है। यह सिरसी से ज्यादा बडा पेड़ होता है, इसकी फलियां भी सिरसी से अधिक बडी होती हैं। इसकी फलियां और बीज दोनों ही काफी बडे होते हैं, गर्मियों में गाँव के बच्चे ४-५ फलियां इकठ्ठा कर उन्हें खूब बजाते हैं, यह सूखकर सफेद हो जाती हैं, और बीज वाले स्थान पर गड्ढा सा बन जाता है और वहाँ दाग भी पड जाता है ... सिरस की लकड़ी बहुत मजबूत होती है, इसका उपयोग चारपाई, तख्त और अन्य फर्नीचर में किया जाता है ... गाँव में ईंट पकाने के लिए इसका उपयोग ईधन के रूप में भी किया जाता है।गाँव में गर्मियों के दिनों में आँधी चलने पर इसकी पत्ती और फलियां उड़ कर आँगन में और द्वारे पर फैल जाती हैं, इसलिए इसे कूड़ा फैलाने वाला रूख कहकर काट दिया जाता है.
२९-५-२०१६ 

गीत तुम


एक रचना
*
तुम लाये अकथ प्यार
महक उठे हरसिंगार।।
*
कुछ हाँ-हाँ, कुछ ना-ना
कुछ देना, कुछ पाना।
पलक झुका, चुप रहना
पलक उठा, इठलाना।
जीभ चिढ़ा, छिप जाना
मंद अगन सुलगाना
पल-पल युग सा लगना
घंटे पल हो जाना।
बासंती बह बयार
पल-पल दे नव निखार।।
तुम लाये अकथ प्यार
महक उठे हरसिंगार।।
*
तुम-मैं हों दिक्-अम्बर
स्नेह-सूत्र श्वेताम्बर।
बाती मिल बाती से
हो उजास पीताम्बर।
पहन वसन रीत-नीत
तज सारे आडम्बर।
धरती को कर बिछात
आ! ओढ़ें नीलाम्बर।
प्राणों से, प्राणों को
पूजें फिर-फिर पुकार।
तुम लाये अकथ प्यार
महक उठे हरसिंगार।।
*
श्वासों की ध्रुपद-चाल
आसें नर्तित धमाल।
गालों पर इंद्रधनुष
बालों के अगिन व्याल।
मदिर मोगरा सुजान
बाँहों में बँध निढाल
कंगन-पायल मिलकर
गायें ठुमरी - ख़याल।
उमग-सँकुच बहे धार
नेह - नर्मदा अपार ।।
तुम लाये अकथ प्यार
महक उठे हरसिंगार।।
*
तन तरु पर झूल-झूल
मन-महुआ फूल-फूल।
रूप-गंध-मद से मिल
शूलों को करे धूल।
जग की मत सुनना, दे
बातों को व्यर्थ तूल
अनहद का सुनें नाद
हो विदेह, द्वैत भूल।
गव्हर-शिखर, शिखर-गव्हर
मिल पूजें बार-बार।
तुम लाये अकथ प्यार
महक उठे हरसिंगार।।
*
प्राणों की अगरु-धूप
मनसिज का प्रगट रूप।

मदमाती रति-दासी
नदी हुए काय - कूप।
उन्मन मन, मन से मिल
कथा अकथ कह अनूप
लूट-लुटा क्या पाया?
सब खोया, हुआ भूप।
सँवर-निखर, सिहर-बिखर
ले - दे, मत रख उधार ।।
तुम लाये अकथ प्यार
महक उठे हरसिंगार।।
*
२९-५-२०१६

हाइकु

हाइकु सलिला:
संजीव
*
कमल खिला
संसद मंदिर में
पंजे को गिला
*
हट गयी है
संसद से कैक्टस
तुलसी लगी
*
नरेंद्र नाम
गूँजा था, गूँज रहा
अमरीका में
*
मिटा कहानी
माँ और बेटे लिखें
नयी कहानी
*
नहीं हैं साथ
वर्षों से पति-पत्नी
फिर भी साथ
*
२९-५-२०१४ 

चर्चा - राष्ट्रीय सरकार

चर्चा :

क्या चुनाव में दलीय स्पर्धा से उपजी कड़वाहट और नेताओं में दलीय हित को राष्ट्रीय हित पर वरीयता देने को देखते हुए राष्ट्रीय सरकार भविष्य में अधिक उपयुक्त होगी?

संविधान नागरिक को अपना प्रतिनिधि चुनने देता है. दलीय उम्मीदवार को दल से इतनी सहायता मिलती है की आम आदमी उम्मीदवार बनने का सोच भी नहीं सकता।
स्वतंत्रता के बाद गाँधी ने कांग्रेस भंग करने की सलाह दी थी जो कोंग्रेसियों ने नहीं मानी, अटल जी ने प्रधान मंत्री रहते हुए राष्ट्रीय सरकार की बात थी किन्तु उनके पास स्पष्ट बहुमत नहीं था और सहयोगी दलों को उनकी बात स्वीकार न हुई. क्यों न इस बिंदु के विविध पहलुओं पर चर्चा हो.
२९-५-२०१४

रोला छंद


छंद सलिला:

रोला छंद

संजीव
*
छंद-लक्षण: जाति अवतारी, चार पद, प्रति चरण दो पद - मात्रा २४ मात्रा, यति ग्यारह तेरह, पदांत गुरु (यगण, मगण, रगण, सगण), विषम पद सम तुकांत,

लक्षण छंद:

आठ चरण पद चार, ग्यारह-तेरह यति रखें
आदि जगण तज यार, विषम-अंत गुरु-लघु दिखें
गुरु-गुरु से सम अंत, जाँचकर रचिए रोला
अद्भुत रस भण्डार, मजा दे ज्यों हिंडोला

उदाहरण:

१. सब होंगे संपन्न, रात दिन हँसें-हँसायें
कहीं न रहें विपन्न, कीर्ति सुख सब जन पायें
भारत बने महान, श्रमी हों सब नर-नारी
सद्गुण की हों खान, बनायें बिगड़ी सारी

२. जब बनती है मीत, मोहती तभी सफलता
करिये जमकर प्रीत, न लेकिन भुला विफलता
पद-मद से रह दूर, जमाये निज जड़ रखिए
अगर बन गए सूर, विफलता का फल चखिए

३.कोटि-कोटि विद्वान, कहें मानव किंचित डर
तुझे बना लें दास, अगर हों हावी तुझपर
जीव श्रेष्ठ निर्जीव, हेय- सच है यह अंतर
'सलिल' मानवी भूल, न हों घातक कम्प्यूटर

टीप:
रोल के चरणान्त / पदांत में गुरु के स्थान पर दो लघु मात्राएँ ली जा सकती हैं.
सम चरणान्त या पदांत सैम तुकान्ती हों तो लालित्य बढ़ता है.
रचना क्रम विषम पद: ४+४+३ या ३+३+२+३ / सम पद ३+२+४+४ या ३+२+३+३+२
कुछ रोलाकारों ने रोला में २४ मात्री पद और अनियमित गति रखी है.
नविन चतुर्वेदी के अनुसार रोला की बहरें निम्न हैं:
अपना तो है काम छंद की करना
फइलातुन फइलात फाइलातुन फइलातुन
२२२ २२१ = ११ / २१२२ २२२ = १३
भाषा का सौंदर्य, सदा सर चढ़कर बोले
फाइलुन मफऊलु / फ़ईलुन फइलुन फइलुन
२२२ २२१ = ११ / १२२ २२ २२ = १३

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२९-५-२०१४
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामिनीमोहन, काव्य, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनअवतार, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, रसाल, राजीव, राधिका, रामा, रूपमाला, रोला, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विरहणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, शोभन, सरस, सार, सारस, सिद्धि, सिंहिका, सुखदा, सुगति, सुजान, सुमित्र, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)

दोहा सलिला

दोहा सलिला:
संजीव
*
एक न सबको कर सके, खुश है सच्ची बात
चयनक जाने पात्रता, तब ही चुनता तात
*
सिर्फ किताबी योग्यता, का ही नहीं महत्व
समझ, लगन में भी 'सलिल', कुछ तो है ही तत्व
*
संसद से कैक्टस हटा, रोपी तुलसी आज
बने शरीफ शरीफ अब, कोशिश का हो राज
*
सुख कम संयम की अधिक, शासक में हो चाह
नियम मानकर आम सम, चलकर पाये वाह
*
जो अरविन्द वही कमल, हुए न फिर भी एक
अपनी-अपनी राह चल, कार्य करें मिल नेक
*
वृद्धा-रुग्णा संगिनी, घर- बाहर कर प्यार
शर्म नहीं आती जिन्हें, उनको दें दुत्कार
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पैर कब्र की राह पर, हाथ भर रहा माँग
हवस साथ ले जा रहा, समय काँध पर टाँग
*
२९-५-२०१४

गुरुवार, 28 मई 2020

दोहा-दोहा अलंकार
*
होली हो ली अब नहीं, होती वैसी मीत
जैसी होली प्रीत ने, खेली कर कर प्रीत
*
हुआ रंग में भंग जब, पड़ा भंग में रंग
होली की हड़बोंग है, हुरियारों के संग
*
आराधा चुप श्याम को, आ राधा कह श्याम
भोर विभोर हुए लिपट, राधा लाल ललाम
*
बजी बाँसुरी बेसुरी, कान्हा दौड़े खीझ
उठा अधर में; अधर पर, अधर धरे रस भीज
*
'दे वर' देवर से कहा, कहा 'बंधु मत माँग,
तू ही चलकर भरा ले, माँग पूर्ण हो माँग
*
'चल बे घर' बेघर कहे, 'घर सारा संसार'
बना स्वार्थ दे-ले 'सलिल', जो वह सच्चा प्यार
*
जितनी पायें; बाँटिए, खुशी आप को आप।
मिटा संतुलन अगर तो, होगा पश्चाताप।।
*

अभियान २५ अलंकार पर्व

ॐ  
विश्ववाणी हिंदी संस्थान अभियान जबलपुर 
४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर 
चलभाष ९४२५१८३२४४, ईमेल salil.sanjiv@gmail.com 

समाचार: 

२५ वां दैनंदिन सारस्वत अनुष्ठान : अलंकार पर्व 
अलंकार काव्य को सुरुचिपूर्ण बनाते हैं - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 

जबलपुर, २८-५-२०२०। एक नयी परंपरा का सूत्रपात करते हुए हिंदी काव्य के विविध अलंकारों पर एक संगोष्ठी का आयोजन विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर के तत्वावधान में किया गया। इस संगोष्ठी में २५ वक्ताओं ने हिंदी के विविध अलंकारों के लक्षणों-उदाहरणों, हिंदी तथा विविध बोलिओं बुंदेली, बघेली, छत्तीसगढ़ी, भोजपुरी, उर्दू, राजस्थानी आदि के साथ अंग्रेजी काव्य में अलंकार-प्रयोग  परंपरा का उल्लेख किया। आरम्भ में विघ्नेश्वर तथा वीणापाणी की वंदना, मुखिया छाया त्रिवेदी बाल शिक्षाविद, पाहुना मनोरमा रतले दमोह तथा संयोजन आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' का स्वागत किया गया। मीनाक्षी शर्मा 'तारिका' ने सुमधुर स्वर में सरस्वती वंदना प्रस्तुत करते हुए आचार्य संजीव वर्मा रचित आलंकारिक दोहों का पाठ किया जिनमें अनेक अलंकारों को इस तरह गूँथा गया है जैसे माला में मोती पिरोये गए हैं- 
'दे वर' देवर से कहा, कहा 'बंधु मत माँग,
तू ही चलकर भरा ले, माँग पूर्ण हो माँग
विशेष अतिथि आचार्य कृष्णकांत चतुर्वेदी पूर्व अध्यक्ष कालिदास पीठ उज्जैन ने इस प्रयोग को प्रथमत: किया गया महत्वपूर्ण प्रयोग बताते हुए भूरी-भूरी सराहना की। 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने विषय प्रवर्तन करते हुए संस्कृत पिंगलाचार्यों द्वारा अलंकार सम्प्रदाय में व्यक्त विचारों तथा हिंदी में अलंकारों के वर्गीकरण व् प्रकारों पर प्रकाश डाला और अलंकारों से अलंकृत दोहे पढ़कर सराहना पाई। सिरोही से पधारे वरिष्ठ साहित्यकार छगनलाल गर्ग ने ''राजस्थान काव्य में अलंकार''डिंगल काव्य परंपरा में नीति संबंधी दोहों और वीर काव्य में अलंकारों के उदहारण दिए तथा कृपाशंकर बारठ  द्वारा सेवक राजियो को संबोधित सोरठों का उल्लेख किया। छाया सक्सेना ने बघेली काव्य परंपरा में अलंकारों की चर्चा करते हुए शब्दालंकारों -अर्थालंकारों के उदाहरण दिए - ''के खे तारिअ महतारिअस, तारिअ होय कहाँ से / महतारी है जबर बिस्वा में, अउर सबई जहां से'' । रायपुर छत्तीसगढ़ से पधारी रजनी शर्मा ने छत्तीसगढ़ी के पुरोधा सुंदरलाल शर्मा का पुण्य स्मरण करते हुए छत्तीसगढ़ी काव्य में अलंकारों के उदहारण प्रस्तुत किये " हमर कत का सुन्दर गाँव जैसे लछमी के पाँव'' । ख्यात शायर यूनुस अदीब ने उर्दू अदब में अलंकार को खूबसूरती निखारनेवाला तत्व बताते हुए अदबी अस्नाफ व् इज़ाफ़तों का ज़िक्र किया तथा साबिर जबलपुरी का शेर सुनाया ''उस बेवफा ने मुझे सताने के वास्ते / दिल का दिया दिया भी तो जलता दिया दिया''। दिल्ली से आई डॉ. संगीता शर्मा अधिकारी ने रीतिकाल के महाकवि रहीम का दोहा ''खैर खून खाँसी खुशी, बैर प्रीति मदपान / रहिमन दाबे न दबे, जाने सकल जहान'' प्रस्तुत किया। 
कासगंज उत्तर प्रदेश से सम्मिलित हुए अखिलेश सक्सेना जी ने काव्य में अलंकारों के महत्व को बताते हुए उसकी अतिशयता से बचकर स्वाभाविकता से अपनाने की सलाह दी। नल-दमयंती की नगरी दमोह से प्रतिनिधित्व कर रहे डॉ. अनिल जैन विभागाध्यक्ष अंग्रेजी ने स्पेंसरियन स्टेंज़ा और मेटाफर अलंकार पर चर्चा करते हुए उसके उदाहरण दिए। किसी गोष्ठी में पहली बार उर्दू अंग्रेजी साहित्य में अलंकार परंपरा की चर्चा हुई। प्र्रीति शर्मा ने विरोधाभास अलंकार तथा संदेह अलंकार के उदाहरण देते हुए उनके अंतर को स्पष्ट किया। सिद्धेश्वरी सराफ ने छेकानुप्रास अलंकार की चर्चा की। भिंड से पधारी मनोरमा जैन 'पाखी' ने उत्प्रेक्षा अलंकार का रथ जी देख रहे हैं उसे कल्पना से अधिक बढ़ा-चढ़ाकर देखना बताया। पुनीता भारद्वाज भीलवाड़ा ने अलंकार को भावोत्कर्षकारी बताया। मनोरमा रतले दमोह ने भ्रांतिमान अलंकार और संदेह अलंकार में सूक्ष्म अंतर बताते हुए उदाहरण दिया "ओस बिंदु चुग रही हंसिनी, उनको मोती जान' । सपना सराफ ने वृत्यानुप्रास पर प्रकाश डाला।   
मीनाक्षी शर्मा 'तारिका' ने श्रुत्यानुप्रास की चर्चा करते हुए एक ही स्थान से उच्चरित वर्णों के प्रयोग के उदाहरण दिए। भारती नरेश पाराशर ने लाटानुप्रास को परिभाषित करते हुए उसे शब्द  की वृत्ति होने पर अर्थ में भिन्नता को लक्षण बताया। इंजी अरुण भटनागर ने श्लेष अलंकार  की परिभाषा 'एक शब्द के एक प्रयोग से एकाधिक अर्थ निकलना' बताते हुए उदाहरण दिए- 'जो रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय / बारो उजियारो करे, बड़े अंधेरो होय'। उपमा अलंकार की जानकारी देते हुए रमन श्रीवास्तव ने तरनि तनुजा तट तमाल तरुवर बहु छाए' को शब्दालंकार तथा सिंधु सा विस्तृत और अथाह, एक निर्वासित का उत्साह को अर्थालंकार बताया। उन्होंने उपमा अलंकार को परिभाषित करते हुए 'सीता का मुख चन्द्रमा के समान सुंदर है, उदाहरण दिया। बाल शिक्षाविद छाया त्रिवेदी ने 'बालकाव्य में अलंकार' विषय पर सारगर्भित विचार व्यक्त किए। डॉ मुकुल तिवारी ने अन्त्यानुप्रास अलंकार पर प्रकाश डाला। डॉ. आलोकरंजन ने भोजपुरी  काव्य में अलंकार का परिचय कराया। 
वीना श्रीवास्तव रांची ने अलंकार और संगीत के अंर्तसंबंध की चर्चा की। चंदा देवी स्वर्णकार ने रूपक अलंकार पर चर्चा कर उदाहरणों का विश्लेषण किया। बबीता चौबे दमोह ने 'स्मरण अलंकार' को इससे उसकी याद बताया। अध्यक्षीय संबोधन में छाया त्रिवेदी जी ने 'अलंकार तत्व' को अभिनव आयोजन बताया। कार्यक्रम में सटीक उद्घोषणाएँ कर रही डॉ. मुकुल तिवारी का समयानुशासन सराहनीय रहा। 
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