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सोमवार, 22 जून 2026

पुरोवाक्, भक्ति गीतांजलि, शशि शर्मा

पुरोवाक्
भक्ति गीतांजलि : प्रभु को अर्पित भावांजलि
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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भक्ति काव्य और उसका अवदान 

            हिन्दी साहित्य के इतिहास के मध्यकाल को विद्वानों ने दो भागों में विभक्त किया है- पूर्व मध्यकाल तथा उत्तर मध्यकाल। पूर्व मध्यकाल का नामकरण विद्वानों ने भक्तिकाल किया है। चौदहवीं शताब्दी के बाद जो हिन्दी साहित्य रचा गया, उसमें अधिकांश साहित्य की मूल प्रेरणा भक्ति भावना रही। इस समय समाज में फैली संकीर्णता, कट्टरता, उच्छृंखलता, टकराव, बिखराव, हताशा तथा निराशा से समाज का बचाने का प्रयत्न भक्त कवियों ने भक्ति के माध्यम से किया। इस भक्ति भाव ने आगे युग चेतना का रूप धारण किया। भक्तिकाल के पदार्पण तक हिन्दी भाषा का रूप स्थापित होकर उसका साहित्य पंजाब से बंगाल और उत्तरांचल से आगे दक्षिण तक प्रसारित हो रहा था। वीरगाथा काल में जिन मुसलमान आक्रमणकर्ताओं से भारतीय जनता आतंकित हो रही थी, भक्तिकाल आते-आते वे विदेशी मुसलमान यहीं के हो चुके थे, शासकऔर शासित भी बन गए थे। सामान्य जनों के पास भक्ति से शक्ति प्राप्त करने और सामंजस्य स्थापित करने के अलावा अन्य कोई चारा नहीं रह गया था। अमन परस्त यवन और नव मुस्लिम भारतीय रीति-रिवाजों का पालन करने लगे थे। हिन्दी मज़्लिन अपने उपास्य देवों की शरण में जाने के साथ-साथ एक दूसरे के इष्ट देवों को भी पूजने लगे थे। अनेक हिंदू सवारियाँ रखते, ईद और मुहर्रम मनाते तो अनेक मुस्लिम कृष्ण और राम के गीत गाते, देवी प्रतिमा अपने घरों में रखते और पूजते।


            भक्तिकाल के सभी कवियों ने गुरु-महिमा को अत्यधिक महत्व दिया है। कबीरदास ने तो गुरु-महिमा को सर्वाधिक स्थान देते हुए कहा-


गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पांय।

बलिहारी गुरु आपनी, गोविंद दियो बताय।।

            भक्त कवियों ने अपनी भक्तिमय काव्य साधना से अपने इष्टदेव रूपी लक्ष्य को प्राप्त करने का सतत और अथक प्रयास किया। नाम-महिमा, लोक-कल्याण, प्रेम-भावना, सामाजिक समरसता, पाखंड-निषेध आदि भक्ति काल की गीति रचनाओं का वैशिष्ट्य रहा कालांतर में दैन्य, समर्पण और मिलन का भाव अपने इष्ट के प्रति सीमित न रहकर अन्य देवी-देवताओं तक विस्तारित हुआ। इसमें मुख्य भूमिका गुरुओं और ग्रहणियों ने निभाई। गुरु को शिष्य और कन्याओं को ससुराल मूल से भिन्न दैवी स्वरूप की उपासक होने पर नए इष्ट के प्रति समर्पण भाव विकसित होने पर भी पुराने इष्ट को विस्मृत करना संभव न रहा। शैव,वैष्णव, शाक्त, गाणपत्य आदि देवों की उपासना एक ही पूजाघर में होने लेगी। सूर और तुलसी के इष्ट राम और कृष्ण हर हिंदू के घर और अंतर्मन में बस गए। तुलसी ने शिव और राम को शिव एक दूसरे का इष्ट बनाकर सांस्कृतिक समन्वय को पुष्ट किया। यही नहीं यह भक्ति भाव धरती और राष्ट्र के साथ जुड़कर राष्ट्रीय भावधारा के साहित्य का जन्मदाता बना। भारत माता की संकल्पना अवधारणा बनकर हर भारतवासी को देश के लिए प्राणोत्सर्ग हेतु प्रेरित कर सकी। फलत:, देश स्वतंत्र हुआ।


भक्ति काव्य की भाषा

            भक्तिकालीन हिंदी काव्य की प्रमुख भाषा पछाँही, कौरवी, शौरसेनी, ब्रज, बुन्देली अवधी, और भोजपुरी है। सूरदास, तुलसीदास जगनिक और ईसुरी जैसे महान लोकप्रिय कवियों ने सांसारिकता और अलौकिकता का गंगो-जमुनी सम्मिश्रण करते हुए संस्कृत और स्थानीय भाषाओं-बोलियों का ऐसा प्रयोग किया कि उनमें भाषिक द्वैत समाप्त होकर पचमेल खिचड़ी की तरह सर्व स्वीकृत सरस स्वरूप बना। खड़ी बोली ने अपने उद्भव के साथ ही भारत की भाषिक विविधता को एकरूप में ढाला। फलत:, चैतन्य महाप्रभु, अमीर खुसरो, कबीर, गुरु नानक, मीरां, केशव आदि ही नहीं, तुकाराम, नामदेव, नरसिंह मेहता आदि भी हिन्दी के भक्ति काव्य के दैदीप्यमान नक्षत्र स्वीकारे गए।   

भक्ति काव्य रचनाओं का शिल्प और छंद 

            भक्ति साहित्य अनेक विधाओं और छंदों में लिखा गया है, किंतु गेयपद और दोहा-चौपाई में निबद्ध कड़वकबद्धता उसके प्रधान रचना रूप हैं। गेयपदों की परंपरा हिंदी में सिद्धों से प्रारंभ होती है। नामदेव, नानक, कबीर, सूर,रैदास, दादू, तुलसी, मीराबाई आदि ने गेयपदों में रचना की है। गेयपदों में काव्य और संगीत एक-दूसरे से घुल -मिल-से गए हैं। संभवत: ये कवि राग-रागिनियों को ध्यान में रखकर इन गेयपदों की रचना करते थे। गेयपदों की प्रारंभिक पंक्ति आवर्ती या टेक होती है अर्थात् वह केंद्रीय कथ्य होती है। बीच की पंक्तियों में उस कथ्य की व्याख्या होती है और अंतिम पंक्ति में रचनाकार अपना नाम डालकर गेयपद समाप्त करता है। वह अपने अनुभव से गेयपद के केंद्रीय कथ्य को सत्यापित करता है। भक्ति काव्य में चौपाई, दोहा, सोरठा,  रोला, माहिया, आल्हा, अभंग, सवैया, घनाक्षरी, गीतिका, हरिगीतिका आदि छंदों का प्रयोग प्रचुरता से हुआ। सूरदास के पद, गुरु नानक की बानी, कबीर की साखी आदि अपनी मिसाल आप है। 

भक्ति काव्य में अलंकार 

            अलंकार कविता-कामिनी के सौन्दर्य को बढ़ाने वाले तत्व  हैं।  कहा गया है - 'अलंकरोति इति अलंकारः' (जो अलंकृत करता है, वही अलंकार है।) भारतीय भक्ति साहित्य में प्रयुक्त प्रमुख अलंकार अनुप्रास, उपमा, रूपक, अनन्वय, यमक, श्लेष, उत्प्रेक्षा, संदेह, अतिशयोक्ति, वक्रोक्ति आदि हैं। ये व्युत्पत्ति से उपमा आदि अलंकार कहलाते हैं। उपमा आदि के लिए अलंकार शब्द का संकुचित अर्थ में प्रयोग किया गया है। व्यापक रूप में सौंदर्य मात्र को अलंकार कहते हैं और उसी से काव्य ग्रहण किया जाता है। "काव्यं ग्राह्ममलंकारात्। सौंदर्यमलंकार:" - वामन। चारुत्व को भी अलंकार कहते हैं। (टीका, व्यक्तिविवेक)। भामह के विचार से वक्रार्थविजा एक शब्दोक्ति अथवा शब्दार्थवैचित्र्य का नाम अलंकार है। (वक्राभिधेतशब्दोक्तिरिष्टा वाचामलं-कृति:।) रुद्रट अभिधान प्रकार विशेष को ही अलंकार कहते हैं। (अभिधानप्रकाशविशेषा एव चालंकारा:)। दंडी के लिए अलंकार काव्य के शोभाकर धर्म हैं (काव्यशोभाकरान् धर्मान् अलंकारान् प्रचक्षते)। सौंदर्य, चारुत्व, काव्यशोभाकर धर्म इन तीन रूपों में अलंकार शब्द का प्रयोग व्यापक अर्थ में हुआ है और शेष में शब्द तथा अर्थ के अनुप्रासोपमादि अलंकारों के संकुचित अर्थ में। एक में अलंकार काव्य के प्राणभूत तत्व के रूप में ग्रहीत हैं और दूसरे में सुसज्जितकर्ता के रूप में। भक्ति काव्य में इष्ट के सौंदर्य, पराक्रम, दयालुता आदि के वर्णन हेतु अलंकारों का प्रयोग प्रचुरता से किया जाता है।

भक्ति गीतांजलि का प्रयोजन 

            उक्त पृष्ठभूमि में शीघ्र प्रकाश्य भक्ति काव्य धारा की कृति "भक्ति गीतांजलि'' का अवलोकन करना सुखद है। डॉ. शशि शर्मा की काव्य रचनाओं में उक्त विरासत के दर्शन सहज ही किए जा सकते हैं। शशि जी सुशिक्षित (अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, हिन्दी व संस्कृत में स्नातकोत्तर, एम.एड.तथा आयुर्वेद रत्न), सुरुचि संपन्न सुग्रहणी हैं। वे सामाजिक और सांस्कृतिक धरातल पर सतत सक्रिय हैं। वे विदुषी शिक्षिका भी रही हैं। भारतीय पुरुषार्थ चतुष्टय परंपरा आयु के चतुर्थ चरण का प्राप्य ''मोक्ष'' बताती है जिसकी राह भक्ति से होकर जाती है। शशि साधुवाद की पात्र हैं कि अंतरध्वनि तथा भक्ति गीतांजलि काव्य संग्रहों ए माध्यम से वे जीवन के आरंभ में मिले सात्विक संस्कारों को जीवन के मध्य में सहेजते हुए क्रमश: प्रगति-पथ पर अग्रसर हैं। 

            सामान्यत: साहित्य-सृजन मन-रंजनार्थ अथवा आत्म संतुष्टि हेतु किया जाता है। शशि जी द्वारा रचित भक्ति गीत साक्षी हैं कि वे लेखन कार्य को ''स्व'' तथा ''सर्व'' के उत्थान का कारक ही नहीं, उत्प्रेरक भी मानती हैं। शैशव में प्रस्फुटित, बचपन में अंकुरित, कैशौर्य में पल्लवित, यौवन में पुष्पित और वार्धक्य में फलित भक्ति-भाव की लता के सुफल समाज को देने का उदात्त भाव ही इन रचनाओं के सृजन और प्रकाशन का कारण है। ऐसी काव्य रचनाएँ लोकैषणा अथवा धन प्राप्ति हेतु सप्रयास नहीं की जातीं। ये रचनाएँ नर्मदा का अमला-धवला सलिल-धार की तरह अंतर्मन से स्वयमेव अवतरित होती हैं। इन भक्ति गीतों की भाव-धारा में अवगाहन किए बिना इनका रसास्वादन कर पाना और आनंद में सराबोर हो पाना संभव नहीं होता। भजनीक शशि स्वयं मानती हैं कि ये रचनाएँ केवल भक्ति और समर्पण का साक्ष्य हैं। 

            गोविंद के पहले गुरु के स्मरण की परंपर करते हुए शशि जी गुरु-वंदना नहीं भूलीं- 

मेरे गुरुवर कृपया बनाए रखना 

हमें स्वर व्यंजन का ज्ञान नहीं 

मात्राओं का भी भान नहीं 

ढाई अक्षर परेन पढ़ाए रखना 

            विघ्नेश्वर गणेश के पधारे बिना कोई शुभ कार्य कैसे हो सकता है- 

मेरे बिगड़े सुधारो काज, गणपति आ जाना  

            तुलसी दास जी ने लिखा है ''नारि न मोहि नारि कै रूपा'' किंतु यह सांसारिक संदर्भ में है। इन भजनों में अधिकांश नारी द्वारा नारी की ही उपासना है। आदि शक्ति के मातृ स्वरूप को आराधते हुए शशि मातृ-चरण में शयन को सौभाग्य मानती हैं- 

सौभाग्य है हम मात के चरणों में सो लिएss 

हम माँ के हो लिए sss हम माँ के हो लिए  

            शशि जी की आराध्या भवानी संसार से दूर नहीं, संसार में रहकर संसार के कार्य सुधारती हैं- 

अंबे मेरी जगतारिणी, दुनिया के सुधारे काज होs

            माँ दीन-दुर्बलों के प्रति विशेष दयावान हैं- 

निर्धन हो या बाँझ पुकारे 

माँ सबके शशि कष्ट निवारे 

देखा भक्तों ने तेरा चमत्कार रे! 

            माँ के प्रति भक्ति भाव भक्त को योग की राह पर अग्रसर होने की प्रेरणा देता है-  

तेरी जोगन बन जाऊँगी, मैया तोरे  दर्शन को निश-दिन आऊँगी 

न पहनूँ टीका न सोने का बेंदा चंदन का टीका लगाऊँगी

            मीरा की भक्ति धारा में बाधक स्वजन परिजन ही थे। यह परिदृश्य तब से अब तक नहीं बदला, बदलेगा भी नहीं। शशि मैया से ही व्यथा-कथा कहती हैं- 

सास ननद मैया ताने मारे 

ताने मारे मैया शोर मचावे 

छोड़ ललन कहँ जाए री 

मैया ऊँची अटरिया... 

            यहाँ 'मैया' के प्रयोग में श्लेष अलंकार दृष्टव्य है। माँ के पराक्रम का वर्णन की बिना संतान का मन न भरे, यह स्वाभाविक है। शशि लिखती हैं- 

मात की लीला तो अपंपार है, 

भक्तों का करती तू बेड़ा पार है

जब किया सुमिरन दुखों में मात को 

कर कृपा  सुनती वो आधी रात को  

            भक्ति गीतांजलि के कृष्ण भजनों में वात्सल्य, नटखटपन और उपालंभ आनंदप्रद है- 

बड़ो री शैतान मैया! कृष्ण कन्हाई 

नटखट लाला तेरो बड़ो हरजाई 

वरंदावन की कुंज गलिन में, बैठो राह निकारे 

गुजरेंगीं जब बाँकी गुजरिया, छुप-छुप कंकण मारे 

फोड़े री मटकिया, दध-माखन खाई 

            श्री राम भारत के हर सनातन घर में मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में विराजमान हैं। राम मंदिर बनने की प्रसन्नता एक भजन में अभिव्यक्त हुई है- 

सजी है अयोध्या, श्री राम जी हैं आए 

बड़े भाग्य हमने दर्शन जो पाए

            भक्ति भाव धारा का राष्ट्रीय भाव धारा से संगम ''हिंदू राष्ट्र'' शीर्षक रचना में है-  

बन जैहे हिंदू राष्ट्र सबई संतों ने करी है तैयारी 

            इस रचना का वैशिष्ट्य है कि हिंदू राष्ट्र निर्माण का श्रेय किसी राजनेता, आंदोलन या राजनैतिक दल को न देते हुए संतों को दिया गया है किंतु हिंदू राष्ट्र निर्माण के लिए आजीवन अन्न और नमक ग्रहण न करने की प्रतिज्ञा करने और निभाने तथा गौ हत्या बंद करने के लिए सकल भारत में अनशन करने वाले स्वामी रामचन्द्र शर्मा 'वीर' (आचार्य धर्मेन्द्र के पिता), हिंदू राष्ट्र के लिए त्याग करने वाले करपात्री जी आदि का स्मरण सोने में सुहाग होता। 

            जगतपिता-जगतमाता शिव-पार्वती के विवाह का प्रसंग भक्तों का मन मोहता है- 

आज गौरा को बिहाने चले हैं भोलेनाथ 

शीश चंद्रमा गंग बिराजे, जटाओं में रहीं समाय 

चंदन और त्रिपुण्ड तिलक कर मृगछाला लपटाय 

अंग भभूत रमाय लिए हैं, डमरू त्रिशूल है हाथ 

            भक्ति गीतांजलि का वैशिष्ट्य वीरांगना-वंदन है। नारी भारत की शान शीर्षक रचना पारंपरिक भक्ति गीत न होते हुए भी राष्ट्र-भक्ति परक भजनों का नवाचार है। शिक्षिका के नाते शशि जी ने अनेक नवाचार की होंगे, भजनीक के नाते यह नवाचार स्वागतेय है- 

नारी भारत की शान रही 

है शक्ति अपार महान रही 

            इस रचना में सीता जी, अहल्याबाई, लक्ष्मीबाई, जीजा बाई, दुर्गावती आदि से लेकर भारतीय स्वतंत्रता सत्याग्रह में सम्मिलित नारी रत्नों को स्मरण  किया गया है। यदि महादेवी जी जैसे साहित्यकार, इसरो के चंद्र विजय अभियान में संलग्न वैगणिक महिलाओं को जोड़ा जा सकता तो उत्तम होता। 

            सारत: यह निस्संकोच कहा जा सकता है की शशि जी ने भक्ति काव्य के आकाश में आपनी कारयित्री ज्योत्सना की आभा सफलतापूरवाक बेकहेरी है। इस भक्ति गीत संग्रह में भक्ति गीतों की भावधारा के नए आयामों का संकेत समाहित होना ही इसकी सफलता है। मुझे विश्वास है कि यह कृति भविष्य में कई कर्तियों की प्रेरणा स्तोत्र बनेगी। 

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संपर्क- विश्ववाणी हिन्दी संस्थान अभियान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१ 

चलभाष ९४२५१८३२४४, ईमेल salil.sanjiv@gmail.com

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