*
रूप चतुर्दशी
०
रूप चतुर्दशी रूप निखारे,
तन-मन दोनों सजा-सँवारे।
.
कचरा रहे न शेष, साफ करो परिवेश सब
जो भी है अधिशेष, दो औरों को, देर बिन।।
श्रम हो अपना साध्य अब,
स्वास्थ्य रहे आराध्य रे!
रूप चतुर्दशी रूप निखारे,
तन-मन दोनों सजा-सँवारे।
.
तन पर उबटन-तेल, मल-मल रगड़ न मैल हो।
मन में ममता-स्नेह, दीप जला, नहिं बैर हो।।
जो अपने, अपने न हो सके,
उनको अपना कह अपना रे!
रूप चतुर्दशी रूप निखारे,
तन-मन दोनों सजा-सँवारे।
.
नरकासुर मन बसा, मोह-वासना-बैर बन।
अंतर्मन में धँसा, वहम अहं का रख न मन।।
तन दीपक मुख बाती कर ले,
मन-मंदिर में ज्योति जला रे!
रूप चतुर्दशी रूप निखारे,
तन-मन दोनों सजा-सँवारे।
०००
दोहा गीत
दीपक
.
दीप दिया दीपक रहा, पाता कीर्ति सुनाम।
जलें तेल-बाती सिसक, जग उजियार अनाम।।
श्रेय क्यों नहीं पा रहे
गीत हम नहीं गा रहे
.
दीपक बाती तेल ज्यों, तन-मन अरु संसार।
मिलें त्रिवेणी सदृश जब, तब मेटें अँधियार।।
उजाला व्याप सके तब
मिटा तम-शाप सकें तब
.
तम को अशुभ न मानता, नहीं मिटाता दीप।
रखे सुरक्षित छिपाकर, जैसे मोती सीप।।
न मानो नीचे देखो
तिमिर रक्षित है लेखो
.
तम में छिपा प्रकाश है, यही दीप का सत्य।
सृष्टि जन्म अँधियार से, होता सत्य अनित्य।।
गर्भ में रहे अँधेरा
जीव जी करे सवेरा
.
तम न अगर हो रात में, हो न शयन-विश्राम।
चौबिस घंटे उजाला, करे दीप अविराम।।
कहो क्या सुखद रहेगा?
तिमिर को जगत भजेगा
.
शिव-हरि दोनों श्याम तम, शिवा-रमा गौरांग।
श्याम-श्वेत का मिलन ही, है माया की माँग।।
मोह-ममता-माया से
दीप जीवन काया से
.
दीपक करें प्रदीप्त जब, तम को रखिए याद
माटी बाती तेल सँग, अग्नि इन्हें आभार
पंच तत्वी जग-जीवन
स्वच्छ रख कर दें मधुवन
.
नयन दीप पा सराहो, सकल सृष्टि व्यापार
सबके प्रति अभिव्यक्त कर, धन्यवाद आभार
दिवाली सलिल मनेगी
जिंदगी-कली खिलेगी
७.११.२०२६
०००
हिन्दी के नये छंद १३
सप्तोच्चारिक अमरकंटक छंद
विधान-
१. प्रति पंक्ति ७ मात्रा।
२. प्रति पंक्ति उच्चार क्रम लघु लघु लघु गुरु लघु लघु।
गीत
नरक चौदस
.
मनुज की जय
नरक चौदस।
.
चल मिटा तम
मिल मिटा गम
विमल हो मन
नयन हों नम
पुलकती खिल
विहँस चौदस
मनुज की जय
नरक चौदस।
.
घट सके दुःख
बढ़ सके सुख
सुरभि गंधित
दमकता मुख
धरणि पर हो
अमर चौदस
मनुज की जय
नरक चौदस।
.
विषमता हर
सुसमता वर
दनुजता को
मनुजता कर
तब मने नित
विजय चौदस
मनुज की जय
नरक चौदस।
.
मटकना मत
भटकना मत
अगर चोटिल
चटकना मत
नियम-संयम
वरित चौदस
मनुज की जय
नरक चौदस।
.
बहक बादल
मुदित मादल
चरण नर्तित
बदन छागल
नरमदा मन
'सलिल' चौदस
मनुज की जय
नरक चौदस।
६-११-२०१८
०००
ग़ज़ल
०
चंपई शबाब का दीदार है ग़ज़ल
गुलाबी उद्गार का इज़हार है ग़ज़ल
नफरतों के दौर को देती चुनौतियाँ
प्यार प्यार प्यार सिर्फ प्यार है ग़ज़ल
आदाब कह रही है, आ दाब मत समझ
नेकियों के वास्ते आभार है ग़ज़ल
छुईमुई नहीं रही, लड़ जंग जीतती
राहें न रोक तीर है, तलवार है ग़ज़ल
हाले-दिल, हकीकतें भी कर रही बयां
इंतिजार है, विसाले-यार है गजल
पलक पाँवड़े बिछा सब राह देखते
हैं चाह हर बशर की, इतवार है ग़ज़ल
पूर्णिका या मुक्तिका, सजल या तेवरी
गीतिका साहित्य का सिंगार है ग़ज़ल
•••
अवधी गीत
सुनो कथा यह चंदावाली
भारत सुखी भवा।
उतरो दक्खिन ध्रुव पै इसरो
जग में प्रथम हुआ।
राम-बान सम राकिट छोड़िन
नील गगन चीरन।
कक्षा पे कक्षाएँ बदलिन
सब दुनिया हेरन।
कूद-फाँद के चंदा की
कक्षा में पैठि गवा।
सुनो कथा यह चंदावाली
भारत सुखी भवा।
छटा देखि चंदा की पप्पू
हुलस-पुलक नाचब।
सुमिर रह्यो बजरंगबली के
जिन सागर लाँघव।
लैंडर बिकरम झट चंदा के
झुककर नमन किया।
सुनो कथा यह चंदावाली
भारत सुखी भवा।
दर्वज्जे से निकरब बहिरे
रोवर घूमि रहा।
पद-चिन्हन के फोटू भेजब
सब जग जाँचि रहा।
गड्ढा लाँघिब, पानी खोजब
अघटित घटित हुआ।
सुनो कथा यह चंदावाली
भारत सुखी भवा।
७.११.२०२४
•••
मुक्तिका
क्यों चाहते हो खुशी, यश, सुख, प्यार?
क्या पता कितनी हैं श्वास उधार?
तुम कह रहे हो जिसे अपना यार
वह सिर्फ सपना सच करो स्वीकार
अनुबंध हैं; संबंध सचमुच मीत
हैं सत्य पर प्रतिबंध नित्य हजार
बावरी है आस, प्यास अनंत है
संत्रास; जग-उपहास कह उपहार
जग पूजता है मौन रह दिन-रात
प्रभु को; पुजारी कर रहा व्यापार
है श्रेष्ठ कृति; खुद को समझ मत दीन
पुरुषार्थ ही परमार्थ का आगार
नपना न कोई है सनातन सत्य
तपना नियति कर सूर्य अंगीकार
***
मुक्तक
परिंदों ने किया कलरव सुन तुम्हारी हँसी निर्मल
निर्झरों की तरंगों ने की नकल तो हुई कलकल
ज़िन्दगी हँसती रहे कर बंदगी चाहा खुदा से
मिटेगा दुःख का प्रदूषण रहो हँसते 'सलिल' पल-पल
७.११.२०१९
मुक्तक
'समझ लेंगे' मिली धमकी बताओ क्या करें हम?
समर्पण में कुशल है, रहेंगे संबंध कायम
कहो सबला या कि अबला, बला टलती नहीं है
'सलिल' चाहत बिना राहत कभी मिलती नहीं है
७.११.`०१६
***
रसानंद दे छंद नर्मदा :५
दोहा गीत
दीपक
.
दीप दिया दीपक रहा, पाता कीर्ति सुनाम।
जलें तेल-बाती सिसक, जग उजियार अनाम।।
श्रेय क्यों नहीं पा रहे
गीत हम नहीं गा रहे
.
दीपक बाती तेल ज्यों, तन-मन अरु संसार।
मिलें त्रिवेणी सदृश जब, तब मेटें अँधियार।।
उजाला व्याप सके तब
मिटा तम-शाप सकें तब
.
तम को अशुभ न मानता, नहीं मिटाता दीप।
रखे सुरक्षित छिपाकर, जैसे मोती सीप।।
न मानो नीचे देखो
तिमिर रक्षित है लेखो
.
तम में छिपा प्रकाश है, यही दीप का सत्य।
सृष्टि जन्म अँधियार से, होता सत्य अनित्य।।
गर्भ में रहे अँधेरा
जीव जी करे सवेरा
.
तम न अगर हो रात में, हो न शयन-विश्राम।
चौबिस घंटे उजाला, करे दीप अविराम।।
कहो क्या सुखद रहेगा?
तिमिर को जगत भजेगा
.
शिव-हरि दोनों श्याम तम, शिवा-रमा गौरांग।
श्याम-श्वेत का मिलन ही, है माया की माँग।।
मोह-ममता-माया से
दीप जीवन काया से
.
दीपक करें प्रदीप्त जब, तम को रखिए याद
माटी बाती तेल सँग, अग्नि इन्हें आभार
पंच तत्वी जग-जीवन
स्वच्छ रख कर दें मधुवन
.
नयन दीप पा सराहो, सकल सृष्टि व्यापार
सबके प्रति अभिव्यक्त कर, धन्यवाद आभार
दिवाली सलिल मनेगी
जिंदगी-कली खिलेगी
७.११.२०२६
०००
हिन्दी के नये छंद १३
सप्तोच्चारिक अमरकंटक छंद
विधान-
१. प्रति पंक्ति ७ मात्रा।
२. प्रति पंक्ति उच्चार क्रम लघु लघु लघु गुरु लघु लघु।
गीत
नरक चौदस
.
मनुज की जय
नरक चौदस।
.
चल मिटा तम
मिल मिटा गम
विमल हो मन
नयन हों नम
पुलकती खिल
विहँस चौदस
मनुज की जय
नरक चौदस।
.
घट सके दुःख
बढ़ सके सुख
सुरभि गंधित
दमकता मुख
धरणि पर हो
अमर चौदस
मनुज की जय
नरक चौदस।
.
विषमता हर
सुसमता वर
दनुजता को
मनुजता कर
तब मने नित
विजय चौदस
मनुज की जय
नरक चौदस।
.
मटकना मत
भटकना मत
अगर चोटिल
चटकना मत
नियम-संयम
वरित चौदस
मनुज की जय
नरक चौदस।
.
बहक बादल
मुदित मादल
चरण नर्तित
बदन छागल
नरमदा मन
'सलिल' चौदस
मनुज की जय
नरक चौदस।
६-११-२०१८
०००
ग़ज़ल
०
चंपई शबाब का दीदार है ग़ज़ल
गुलाबी उद्गार का इज़हार है ग़ज़ल
नफरतों के दौर को देती चुनौतियाँ
प्यार प्यार प्यार सिर्फ प्यार है ग़ज़ल
आदाब कह रही है, आ दाब मत समझ
नेकियों के वास्ते आभार है ग़ज़ल
छुईमुई नहीं रही, लड़ जंग जीतती
राहें न रोक तीर है, तलवार है ग़ज़ल
हाले-दिल, हकीकतें भी कर रही बयां
इंतिजार है, विसाले-यार है गजल
पलक पाँवड़े बिछा सब राह देखते
हैं चाह हर बशर की, इतवार है ग़ज़ल
पूर्णिका या मुक्तिका, सजल या तेवरी
गीतिका साहित्य का सिंगार है ग़ज़ल
•••
अवधी गीत
सुनो कथा यह चंदावाली
भारत सुखी भवा।
उतरो दक्खिन ध्रुव पै इसरो
जग में प्रथम हुआ।
राम-बान सम राकिट छोड़िन
नील गगन चीरन।
कक्षा पे कक्षाएँ बदलिन
सब दुनिया हेरन।
कूद-फाँद के चंदा की
कक्षा में पैठि गवा।
सुनो कथा यह चंदावाली
भारत सुखी भवा।
छटा देखि चंदा की पप्पू
हुलस-पुलक नाचब।
सुमिर रह्यो बजरंगबली के
जिन सागर लाँघव।
लैंडर बिकरम झट चंदा के
झुककर नमन किया।
सुनो कथा यह चंदावाली
भारत सुखी भवा।
दर्वज्जे से निकरब बहिरे
रोवर घूमि रहा।
पद-चिन्हन के फोटू भेजब
सब जग जाँचि रहा।
गड्ढा लाँघिब, पानी खोजब
अघटित घटित हुआ।
सुनो कथा यह चंदावाली
भारत सुखी भवा।
७.११.२०२४
•••
मुक्तिका
क्यों चाहते हो खुशी, यश, सुख, प्यार?
क्या पता कितनी हैं श्वास उधार?
तुम कह रहे हो जिसे अपना यार
वह सिर्फ सपना सच करो स्वीकार
अनुबंध हैं; संबंध सचमुच मीत
हैं सत्य पर प्रतिबंध नित्य हजार
बावरी है आस, प्यास अनंत है
संत्रास; जग-उपहास कह उपहार
जग पूजता है मौन रह दिन-रात
प्रभु को; पुजारी कर रहा व्यापार
है श्रेष्ठ कृति; खुद को समझ मत दीन
पुरुषार्थ ही परमार्थ का आगार
नपना न कोई है सनातन सत्य
तपना नियति कर सूर्य अंगीकार
***
मुक्तक
परिंदों ने किया कलरव सुन तुम्हारी हँसी निर्मल
निर्झरों की तरंगों ने की नकल तो हुई कलकल
ज़िन्दगी हँसती रहे कर बंदगी चाहा खुदा से
मिटेगा दुःख का प्रदूषण रहो हँसते 'सलिल' पल-पल
७.११.२०१९
मुक्तक
'समझ लेंगे' मिली धमकी बताओ क्या करें हम?
समर्पण में कुशल है, रहेंगे संबंध कायम
कहो सबला या कि अबला, बला टलती नहीं है
'सलिल' चाहत बिना राहत कभी मिलती नहीं है
७.११.`०१६
***
रसानंद दे छंद नर्मदा :५
दोहा की छवियाँ अमित
- आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
*
दोहा की छवियाँ अमित, सभी एक से एक ।
निरख-परख रचिए इन्हें, दोहद सहित विवेक ।।
रम जा दोहे में तनिक, मत कर चित्त उचाट।
ध्यान अधूरा यदि रहा, भटक जायेगा बाट।।
दोहा की गति-लय पकड़, कर किंचित अभ्यास।
या मात्रा गिनकर 'सलिल', कर लेखन-अभ्यास।।
दोहा छंद शब्दाक्षरों के उच्चार के अनुसार रचा जाता है। इसमें दो पद (पंक्ति), प्रत्येक पद में दो चरण (विषम १३ उच्चार तथा सम ११ उच्चार) होते हैं। चरणों के अंत में यति (विराम) होती है। दोहा के विषम चरण के आरम्भ में एक शब्द में जगण निषिद्ध कहा गया है। विषम चरणों में कल-क्रम (मात्रा-बाँट) ३ ३ २ ३ २ या ४ ४ ३ २ तथा सम चरणों में ३ ३ २ ३ या ४ ४ ३ हो तो लय सहज होती है, किन्तु अन्य निषिद्ध नहीं हैं।संक्षिप्तता, लाक्षणिकता, सार्थकता, मर्मबेधकता तथा सरसता उत्तम दोहे के गुण हैं।
कथ्य, भाव, रस, बिम्ब, लय, अलंकार, लालित्य।
गति-यति नौ गुण नौलखा, दोहा हो आदित्य।। - संजीव ''सलिल'
दोहे में अनिवार्य हैं, कथ्य-शिल्प-लय-छंद।
ज्यों गुलाब में रूप-रस, गंध और मकरंद ।। - डॉ. श्यामानन्द सरस्वती 'रौशन', खड़ी हिंदी
गुरु ने दीन्ही चीनगी, शिष्य लेहु सुलगाय ।
चित चकमक लागे नहीं, याते बुझ-बुझ जाय।। - रामनारायण 'बौखल', बुंदेली
कामधेनु दोहावली, दुहवत ज्ञानी वृन्द।
सरल, सरस, रुचिकर,गहन, कविवर को वर छंद।। - मृदुल कीर्ति, अवधी
शब्द ब्रम्ह जाना जबहिं, कियो उच्चरित ॐ।
होने लगे विकार सब, ज्ञान यज्ञ में होम।। - सावित्री शर्मा, बृज भाषा
वृक्ष-कर्तनं करिष्यति, भूत्वांधस्तु भवान्।
पदे स्वकीये कुठारं, रक्षकस्तु भगवान्।। - शास्त्री नित्य गोपाल कटारे, संस्कृत
की हो रहल समाज में?, की करैत समुदाय?
किछु न करैत समाज अछि, अपनहिं सैं भरिपाय।। - ब्रम्हदेव शास्त्री, मैथिली
पहलां बरगा ना रिहा, लोकां दा किरदार।
मतलब दी है दोस्ती, मतलब दे ने यार।। - डॉ. हरनेक सिंह 'कोमल', पंजाबी
कागा करंग ढढोलिया, सगल खाइया मासु ।
ए दुई नैना मत छुहऊ, पिऊ देखन कि आसु ।। - बाबा शेख फरीद शकरगंज (११७३-१२६५)
दोहा के २३ प्रकार लघु-गुरु मात्राओं के संयोजन पर निर्भर हैं।
भ्रमर सुभ्रामर शरभ श्येन मंडूक बखानहु।
मरकत करभ सु और नरहि हंसहि परिमानहु।।
गनहु गयंद सु और पयोधर बल अवरेखहु।
वानर त्रिकल प्रतच्छ, कच्छपहु मच्छ विसेखहु।।
शार्दूल अहिबरहु व्यालयुत वर विडाल अरु.अश्वगनि।
उद्दाम उदर अरु सर्प शुभ तेइस विधि दोहा करनि।। -गजाधर कवि, दोहा मंजरी
दोहा के तेईस हैं, ललित-ललाम प्रकार।
व्यक्त कर सकें भाव हर, कवि विधि के अनुसार।।
भ्रमर-सुभ्रामर में रहें, गुरु बाइस-इक्कीस।
शरभ-श्येन में गुरु रहें, बीस और उन्नीस।।
रखें चार-छ: लघु सदा, भ्रमर सुभ्रामर छाँट।
आठ और दस लघु सहित, शरभ-श्येन के ठाठ।।
भ्रमर- २२ गुरु, ४ लघु=४८
बाइस गुरु, लघु चार ले, रचिए दोहा मीत।
भ्रमर सद्रश गुनगुन करे, बना प्रीत की रीत।।
सांसें सांसों में समा, दो हो पूरा काज।
मेरी ही तो हो सखे, क्यों आती है लाज ?
सुभ्रामर - २१ गुरु, ६ लघु=४८
इक्किस गुरु छ: लघु सहित, दोहा ले मन मोह।
कहें सुभ्रामर कवि इसे, सह ना सकें विछोह।।
पाना-खोना दें भुला, देख रहा अज्ञेय।
हा-हा,ही-ही ही नहीं, है सांसों का ध्येय।।
शरभ- २० गुरु, ८ लघु=४८
रहे बीस गुरु आठ लघु का उत्तम संयोग।
कहलाता दोहा शरभ, हरता है भव-रोग।।
हँसे अंगिका-बज्जिका, बुन्देली के साथ।
मिले मराठी-मालवी, उर्दू दोहा-हाथ।।
श्येन- १९ गुरु, १० लघु=४८
उन्निस गुरु दस लघु रहें, श्येन मिले शुभ नाम।
कभी भोर का गीत हो, कभी भजन की शाम।।
ठोंका-पीटा-बजाया, साधा सधा न वाद्य।
बिना चबाये खा लिया, नहीं पचेगा खाद्य।।
मंडूक- १८ गुरु, १२ लघु=४८
अट्ठारह-बारह रहें, गुरु-लघु हो मंडूक।
अड़तालीस आखर गिनें, कहे कोकोल कूक।।
दोहा में होता सदा, युग का सच ही व्यक्त।
देखे दोहाकार हर, सच्चे स्वप्न सशक्त।।
मरकत- १७ गुरु, १४ लघु=४८
सत्रह-चौदह से बने, मरकत करें न चूक।।
निराकार-निर्गुण भजै, जी में खोजे राम।
गुप्त चित्र ओंकार का, चित में रख निष्काम।।
करभ- १६ गुरु, १६ लघु=४८
दोहा करभ कहे अगर, लघु-गुरु रहें समान।
सोलह-सोलह साथ ले, गा बत्तीसी गान।।
जान हथेली पर लिए, खड़ा सिपाही मौन।
योगी इस सम दूसरा, कहिए तो है कौन।।
नर- १५ गुरु, १८ लघु=४८
गुरु-लघु पंद्रह-अठारह, नर दोहा रस-खान।
थोथा-थोथा बाजता, चना न गाता गान।।
मरा-मरा का जाप कर, बने दस्यु से संत।
जो शरणागत राम का, जगन्नाथ हों कंत।।
हंस- १४ गुरु, २० लघु=४८
चौदह गुरु लघु बीस ले, भरता हंस उड़ान।
चौंतिस आखर कह-सुने, प्रमुदित हो गा गान।।
ठाकुर पूजन कर जपें, ठाकुर जी का नाम।
ठकुराइन मुस्का रहीं, आज पड़ा फिर काम।।
गयंद- १३ गुरु, २२ लघु=४८
तेरह-बाईस गुरु-लघु, पैंतीस अक्षर झूम।
दोहा रचें गयंद मिल, सदा सफलता चूम।।
सूर्य-चाँद-आकाश का, साथ सनातन रीत।
समलैंगिक अनुकरण कर, पाल रहे हैं प्रीत।।
पयोधर- १२ गुरु, २४ लघु=४८
छत्तीसा है पयोधर, गुरु भज बारह मास।
चौबिस गुरु अभ्यास कर, करे भाव सँग रास।।
उषा सुंदरी भाल पर, है दिनेश रवि दिव्य।
सदा सुहागिन छवि-छटा, मनमोहक अति भव्य।।
चल/बल- ११ गुरु, २६ लघु=४८
ग्यारह गुरु चल-बल रखे, छब्बिस लघु पग रोज।
सैंतिस आखर हँस रहे, क्यों करिए कवि खोज।।
शारद ब्रह्मा लक्ष्मी, जगन्नाथ लख साथ।
उमा उमापति गजवदन, जगत झुकत नत माथ।।
वानर- १० गुरु, २८ लघु=४८
अट्ठाइस लघु कुलाटी, खा वानर है मस्त।
जगन्नाथ अवतार सम, दस गुरु सिर पर हस्त।।
जनक लली दशरथ लला, साथ रहे वनवास।
अवध न मिथिला पति गए, कहता है इतिहास।।
त्रिकल- ९ गुरु, ३० लघु=४८
उन्चालिस अक्षर त्रिकल, ले नौ गुरु से जान।
सिखलाता लघु तीस को, सच्चा दोहा-ज्ञान।।
रिमझिम रिमझिम बरसकर, शुष्क धरणि को सींच।
जागा रह जल बीज को, झट उठ आँख न मींच।।
कच्छप- ८ गुरु, ३२ लघु=४८
बत्तिस् लघु कच्छप रखे, पग गुरु आठ न भूल।
चालिस आखर मिल रहे, खिला सुगंधित फूल।।
नयन-नयन मिल चुप न हों, बात करें बिन बात।
पल-छन जैसे कट गई, सुन-कह, कह-सुन रात।।
मच्छ- ७ गुरु, ३४ गुरु=४८
इकतालिस लहरें गिनें, मच्छ महातम संग।
चौंतिस लघु सप्तर्षि गुरु, हँसे देख जग दंग।।
अमरस बतरस छंद रस, मधुर मधुरतर मान।
निंदा रस विश-घट सदृश, तजो कहें मतिमान।।
शार्दूल- ६ गुरु, ३६ लघु=४८
छ: छक्के लघु मानकर, छ: गुरु रखें मनोज।
दोहा हँस धरदुल हो, ब्यालिस् आखर खोज।।
सुख-दुख सम रह सहनकर, विधि का मान विधान।
कुछ मत कह गम सह 'सलिल', भूल मान-अपमान।।
अहिवर- ५ गुरु, ३८ लघु=४८
मन मनोज पच तीर गुरु, अड़तिस लघु शर साथ।
तैंतालिस तरकस भरे, चले उठाकर माथ।।
कलकल कलरव ध्वनि सुबह, सुनकर हो मन शांत।
हिलमिल खुश रहते विहग, पल भर चित्त न भ्रांत।।
व्याल- ४ गुरु, ४० लघु=४८
व्याल चार-चालीस ले, गुरु-लघु मात्रा साथ।
योग चवालिस आखरी, मिले हाथ से हाथ।।
सजल नयन चुप रह विकल, कहे न कह हर बात।
मधुर वचन दुख हर सकल, विकल न करते तात।।
विडाल- ३ गुरु, ४२ लघु=४८
हैण विडाल के सँग लघु, ब्यालिस गुरु बस तीन।
पैंतालिस आखर कहें, रच कुछ छंद नवीन।।
अटपट लटपट वचन कह, किशन रुदन कर हार।
नटवट अभिनय कर सतत, जसुमति रहा निहार।।
श्वान- २ गुरु ४४ लघु=४८
लिए चवालिस लघु सहित, दो गुरु दोहा श्वान।
कहे सतत संघर्ष कर, किंतु न छोड़े जान।।
रघुकुल मणि रघुवर-लखन, सिय सँग नत शिर-माथ।
महल-निकल पथ-डगर चल, वन-उपवन मग साथ।।
उदर- १ गुरु, ४६ लघु=४८
छयालिस लघु गुरु एक से, 'उदर' करे संतोष।
सैंतालिस आखर भरे, अलंकार रस कोष।।
रख न असहमति सुमति यदि, सहमति कर वर विजय।
पग-पग कर-कर सँग यदि, डॉ न तनिक रह अभय।।
सर्प- ० गुरु, ४८ लघु
अड़तालिस लघु अक्षरी, सर्प रहा फुंफकार।
कंठ लपेटें शिव हँसें, भी से तुरत उबार।।
बीम मतलब मत बहस कर, चुप रह बन मन सुमन।
नम न, नमन कर, न मन यदि, तन-मन खुद रख मन अमन।।
***
नवगीत:
*
एक हाथ मा
छुरा छिपा
दूजे से मिले गले
ताहू पे शिकवा
ऊगे से पैले
भोर ढले.
*
केर-बेर खों संग
बिधाता हेरें
मुंडी थाम.
दोउन खों
प्यारी है कुर्सी
भली करेंगे राम.
उंगठा छाप
लुगाई-मोंड़ा
सी एम - दावेदार।
पिछड़ों के
हम भये मसीहा
अगड़े मरें तमाम।
बात नें मानें जो
उनखों जुटे के तले मलें
ताहू पे शिकवा
ऊगे से पैले
भोर ढले.
एक हाथ मा
छुरा छिपा
दूजे से मिले गले
*
सहें न तिल भर
कोसें दिन भर
पीड़ित तबहूँ हम.
अपनी लाठी
अपन ई भैंसा
लैन न देंहें दम.
सहनशीलता
पाठ पढ़ायें
खुद न पढ़ें, लो जान-
लुच्चे-लोफर
फूंके पुतला
रोको तो मातम।
देस-हितों से
का लेना है
कैसउ ताज मिले.
ताहू पे शिकवा
ऊगे से पैले
भोर ढले.
एक हाथ मा
छुरा छिपा
दूजे से मिले गले
*
***
नवगीत:
नौटंकियाँ
*
नित नयी नौटंकियाँ
हो रहीं मंचित
*
पटखनी खाई
हुए चित
दाँव चूके
दिन दहाड़े।
छिन गयी कुर्सी
बहुत गम
पढ़ें उलटे
मिल पहाड़े।
अब कहो कैसे
जियें हम?
बीफ तजकर
खायें चारा?
बना तो सकते
नहीं कुछ
बन सके जो
वह बिगाडें।
न्याय-संटी पड़ी
पर सुधरे न दंभित
*
'सहनशीली
हो नहीं
तुम' दागते
आरोप भारी।
भगतसिंह, आज़ाद को
कब सहा तुमने?
स्वार्थ साधे
चला आरी।
बाँट-रौंदों
नीति अपना
सवर्णों को
कर उपेक्षित-
लगाया आपात
बापू को
भुलाया
ढोंगधारी।
वाममार्गी नाग से
थे रहे दंशित
*
सह सके
सुभाष को क्या?
क्यों छिपाया
सच बताओ?
शास्त्री जी के
निधन को
जाँच बिन
तत्क्षण जलाओ।
कामराजी योजना
जो असहमत
उनको हटाओ।
सिक्ख-हत्या,
पंडितों के पलायन
को भी पचाओ।
सह रहे क्यों नहीं जनगण ने
किया जब तुम्हें दंडित?
७.११.२०१५
***
प्रयोगात्मक यमकीय दोहे:
*
रखें नोटबुक निज नहीं, कलम माँगते रोज
नोट कर रहे नोट पर, क्यों करिये कुछ खोज
*
प्लेट-फॉर्म बिन आ रहे, प्लेटफॉर्म पर लोग
है चुनाव बन जायेगा, इस पर भी आयोग
*
हुई गर्ल्स हड़ताल क्यों?, पूरी कर दो माँग
'माँग भरो' है माँग तो, कौन अड़ाये टाँग?
*
एग्रीगेट कर लीजिये, एग्रीगेट का आप
देयक तब ही बनेगा, जब हो पूरी माप
एग्रीगेट = योग, गिट्टी
*
फेस न करते फेस को, छिपते फिरते नित्य
बुक न करे बुक फुकटिया, पाठक सलिल अनित्य
*
सर! प्राइज़ किसको मिला, अब तो खोलें राज
सरप्राइज़ हो खत्म तो, करें शेष जो काज
*
नवगीत:
*
जो जी चाहे करें
हमारा राज है
.
मंत्री से संत्री तक जो है, अपना है
मनमाफिक कानून-व्यवस्था सपना है
जनता का क्या? वह रौंदी ही जानी है
फाँसी पर लटकाना और लटकना है
बने मियाँ मिट्ठू
सर धारा ताज है
जो जी चाहे करें
हमारा राज है
.
बस से धक्का दें या रौंद-कुचल मारें
अनुग्रहित हो, हम जैसे चाहें-तारें
जान गयी तो रुपये ले मुँह बंद रखो
मुँह खोलें जो वे अपना जीवन हारें
कहीं न कहना
हुआ कोढ़ में खाज है
जो जी चाहे करें
हमारा राज है
.
बादल बरपा करे कहर तो मत बोलो
आप शाप हो तो अपने लब मत खोलो
कमल सदा कीचड़ में खिलते, मौन रहो
पंजा रिश्वत गिने, न लेकिन तुम डोलो
सत्ताधारी सदा
गिराता गाज है
जो जी चाहे करें
हमारा राज है
५.५.२०१५
०००
नवगीत:
*
एक हाथ मा
छुरा छिपा
दूजे से मिले गले
ताहू पे शिकवा
ऊगे से पैले
भोर ढले.
*
केर-बेर खों संग
बिधाता हेरें
मुंडी थाम.
दोउन खों
प्यारी है कुर्सी
भली करेंगे राम.
उंगठा छाप
लुगाई-मोंड़ा
सी एम - दावेदार।
पिछड़ों के
हम भये मसीहा
अगड़े मरें तमाम।
बात नें मानें जो
उनखों जुटे के तले मलें
ताहू पे शिकवा
ऊगे से पैले
भोर ढले.
एक हाथ मा
छुरा छिपा
दूजे से मिले गले
*
सहें न तिल भर
कोसें दिन भर
पीड़ित तबहूँ हम.
अपनी लाठी
अपन ई भैंसा
लैन न देंहें दम.
सहनशीलता
पाठ पढ़ायें
खुद न पढ़ें, लो जान-
लुच्चे-लोफर
फूंके पुतला
रोको तो मातम।
देस-हितों से
का लेना है
कैसउ ताज मिले.
ताहू पे शिकवा
ऊगे से पैले
भोर ढले.
एक हाथ मा
छुरा छिपा
दूजे से मिले गले
*
***
नवगीत:
नौटंकियाँ
*
नित नयी नौटंकियाँ
हो रहीं मंचित
*
पटखनी खाई
हुए चित
दाँव चूके
दिन दहाड़े।
छिन गयी कुर्सी
बहुत गम
पढ़ें उलटे
मिल पहाड़े।
अब कहो कैसे
जियें हम?
बीफ तजकर
खायें चारा?
बना तो सकते
नहीं कुछ
बन सके जो
वह बिगाडें।
न्याय-संटी पड़ी
पर सुधरे न दंभित
*
'सहनशीली
हो नहीं
तुम' दागते
आरोप भारी।
भगतसिंह, आज़ाद को
कब सहा तुमने?
स्वार्थ साधे
चला आरी।
बाँट-रौंदों
नीति अपना
सवर्णों को
कर उपेक्षित-
लगाया आपात
बापू को
भुलाया
ढोंगधारी।
वाममार्गी नाग से
थे रहे दंशित
*
सह सके
सुभाष को क्या?
क्यों छिपाया
सच बताओ?
शास्त्री जी के
निधन को
जाँच बिन
तत्क्षण जलाओ।
कामराजी योजना
जो असहमत
उनको हटाओ।
सिक्ख-हत्या,
पंडितों के पलायन
को भी पचाओ।
सह रहे क्यों नहीं जनगण ने
किया जब तुम्हें दंडित?
७.११.२०१५
***
प्रयोगात्मक यमकीय दोहे:
*
रखें नोटबुक निज नहीं, कलम माँगते रोज
नोट कर रहे नोट पर, क्यों करिये कुछ खोज
*
प्लेट-फॉर्म बिन आ रहे, प्लेटफॉर्म पर लोग
है चुनाव बन जायेगा, इस पर भी आयोग
*
हुई गर्ल्स हड़ताल क्यों?, पूरी कर दो माँग
'माँग भरो' है माँग तो, कौन अड़ाये टाँग?
*
एग्रीगेट कर लीजिये, एग्रीगेट का आप
देयक तब ही बनेगा, जब हो पूरी माप
एग्रीगेट = योग, गिट्टी
*
फेस न करते फेस को, छिपते फिरते नित्य
बुक न करे बुक फुकटिया, पाठक सलिल अनित्य
*
सर! प्राइज़ किसको मिला, अब तो खोलें राज
सरप्राइज़ हो खत्म तो, करें शेष जो काज
*
नवगीत:
*
जो जी चाहे करें
हमारा राज है
.
मंत्री से संत्री तक जो है, अपना है
मनमाफिक कानून-व्यवस्था सपना है
जनता का क्या? वह रौंदी ही जानी है
फाँसी पर लटकाना और लटकना है
बने मियाँ मिट्ठू
सर धारा ताज है
जो जी चाहे करें
हमारा राज है
.
बस से धक्का दें या रौंद-कुचल मारें
अनुग्रहित हो, हम जैसे चाहें-तारें
जान गयी तो रुपये ले मुँह बंद रखो
मुँह खोलें जो वे अपना जीवन हारें
कहीं न कहना
हुआ कोढ़ में खाज है
जो जी चाहे करें
हमारा राज है
.
बादल बरपा करे कहर तो मत बोलो
आप शाप हो तो अपने लब मत खोलो
कमल सदा कीचड़ में खिलते, मौन रहो
पंजा रिश्वत गिने, न लेकिन तुम डोलो
सत्ताधारी सदा
गिराता गाज है
जो जी चाहे करें
हमारा राज है
५.५.२०१५
०००
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें