सलिल सृजन जुलाई २२
विश्व मस्तिष्क दिवस
*
सामयिक गीत
०
दिल्ली पुलिस लाख धिक्कार
०
जनसेवक जनमित्र नहीं तुम,
न ही देश के भक्त हो।
चरण चूमते नेताओं के
राजनीति अनुरक्त हो।
जो भी कहीं सुधार माँगता
उस पर करते अत्याचार
दिल्ली पुलिस लाख धिक्कार
०
खाकी वर्दी मारपीट का
क्यों बन गई प्रतीक है।
निर्दोषों का खून बहे
गोरे डायर की लीक है।।
शर्म करो कुछ बेटी-बेटे
रोक रहे हैं चीख-पुकार
दिल्ली पुलिस लाख धिक्कार
०
अपराधी से साँठगाँठ है
नेताओं के पहरेदार।
जन-धन से वेतन पा करते
जन-गण पर ही अत्याचार।
लोकतंत्र को शोकतंत्र में
बदल दिया झेलो फटकार
दिल्ली पुलिस लाख धिक्कार
०००
सामयिक दोहे
०
नाकाबिल मंत्री बने, असफल शासन-नीति।
गल्ती मान सुधार लें, सीख न पाए रीति।।
.
हैं भविष्य इस देश का, तरुण तरुणियाँ सत्य।
अनाचार करती पुलिस, निंदनीय है कृत्य।।
.
असंतोष हो जहाँ भी, करते नहीं विमर्श।
बुलडोजर किंचित नहीं, जनतंत्री आदर्श।।
.
लोकतंत्र का प्राण है, आपस में संवाद।
मन की बात न सार्थक, अगर न वाद-विवाद।।
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लांछित करे विपक्ष को, यह न पक्ष का काम।
संसद दोनों से बने, झुक मिल करिए नाम।।
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कुशाभाऊ सम हो अगर, निर्मल पाक चरित्र।
महकें जीवन भर विहँस, जैसे महके इत्र।।
.
नाना जी सम समर्पण, और सादगी साध्य।
लाखों के मँहगे वसन, लोलुप के आराध्य।।
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मिलनसारिता अटल सी, मिटा सके अलगाव।
आदर मिले सभी जगह, जन का बढ़े प्रभाव।।
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बदला चित्र चरित्र तो, बिसरे दीनदयाल।
मंदिर में डाकाजनी, पर उन्नत है भाल।।
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महाशक्ति के हाथ क्यों, बने खिलौना मौन।
प्रैस वार्ता से डरे, दुनिया जाने कौन?
.
सुलझ न पाए परिस्थिति, दें पिछलों को दोष।
जनता सच समझे मगर, रोके रहती रोष।।
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एक इंच भी भूमि जब, सत्ता सके न छोड़।
हो विनाश संवाद बिन, देता दामन छोड़।।
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द्वारे गया विपक्ष तो, पिला न पाए चाय।
साथ बैठने से खुले, सद्भावी अध्याय।।
.
सत्ता निर्बल पर करे, बल प्रयोग हो दीन।
रक्त सड़क पर बहाती, वह सत्ता जो दीन।।
२२.७.२०२६
०००
ग़जलिका
०
मत हो चंचल
मन रह अविचल
देख रहा वह
कण-कण हर पल
देख सका है
कहो कौन कल?
छलिए पर जय
पाने कर छल
सबल वही जो
निर्बल का बल
यदि कल उगना
आज मौन ढल
सलिल नयन में
बन सपना पल
२२.७.२०२५
०0०
मेघ
•
मेघदूत संदेश यक्ष का पहुँचाना भूले,
मेघासुर सम रूप बदलकर लड़ते-भिड़ते हैं,
पवन झुलाता झूला फिर भी शांत न होते हैं,
गरज गरज कर गुस्सा करते, गिरते-उठते हैं।
मल्ल लड़ाते पंजा, पल पल दांँव बदलते हैं,
झपट पकड़ते, बगली देते, टाँग अड़ाते हैं,
रपट फिसलते, सँभल न गिरते, मचल लपकते हैं,
कुछ न किसी को कभी समझते फँसा-गिराते हैं।
रूपवती दामिनी अदा दिखला भरमा गिरती,
घर घमंड का खाली होता फूटे जल-गगरी,
कोष लुटा सिर पीटें पर तकदीर नहीं जगती,
ठेंगा दिखा भागती आती हाथ न गिर बिजुरी।
वसुधा गिरा सलिल संचित कर हँस हरियाती है।
जब दिखता है कहीं बदरवा, मोद मनाती है।।
२२-७-२०२३
•••
छंद सलिला : सॉनेट
तिरंगा
ध्वज न केवल मैं तिरंगा
चिरंतन बलिदान हूँ मैं
लोक के हित सदा बेकल
सनातन अरमान हूँ मैं
सद्भाव हूँ मैं, शांति हूँ
चाहता सबका भला नित
नव सृजन की क्रांति भी हूँ
साध्य केवल लोक का हित
हरितिमा हूँ, भाग्य-भाषा
अहर्निश उन्नति-परिश्रम
स्वेद उपजी नवल आशा
जन प्रगति का चक्र अनुपम
आत्म जेता लो न पंगा
ध्वज न केवल मैं तिरंगा
(शेक्सपीरियन सॉनेट)
●●●
छंद सलिला : (अभिनव प्रयोगः प्रदोष सॉनेट)
मुखिया
●
नव मुखिया को नमन है
सबके प्रति समभाव हो
अधिक न न्यून लगाव हो
हर्षित पूरा वतन है
भवन-विराजी है कुटी
जड़ जमीन से है जुड़ी
जीवटता की है धनी
धीरज की प्रतिमा धुनी
अग्नि परीक्षा है कड़ी
दिल्ली के दरबार में
सीता फिर से है खड़ी
राह न किंचित सहज है
साथ सभी का मिल सके
यह संयोग न महज है
२२-७-२०२२
•••
छंद सलिला : (अभिनव प्रयोगः प्रदोष सॉनेट)
●
प्रदोष रहिए खुशी से
हमेशा करें व्रत-कथा
जीतें हर बाधा-व्यथा
आशीष मिले शिवा से
प्रदोष रचिए हमेशा
अठ-पच कल मिल खेलिए
सुख-दुख सम चुप झेलिए
विनम्र रहिए हमेशा
गुरु लघु हो न पदांत में
आस्था मिले न भ्रांत में
रखिए शांति दिनांत में
चौदह पद सॉनेट में
चौ चौ चौ दो या रहे
चौ चौ त्रै त्रै पद सदा
२२-७-२०२२
•••
नवगीत
तुम्हें प्रणाम
*
मेरे पुरखों!
तुम्हें प्रणाम।
*
सूक्ष्म काय थे,
चित्र गुप्त विधि ,
अणु-परमाणु-विषाणु विष्णु हो धारे तुमने।
कोष-वृद्धि कर
'श्री' पाई है।
जल-थल--नभ पर
कीर्ति-पताका
फहराई है।
पंचतत्व तुम
नाम अनाम।
मेरे पुरखों!
तुम्हें प्रणाम।
*
भू-नभ
दिग्दिगंत यश गाते।
भूत-अभूत तुम्हीं ने नाते, बना निभाए।
द्वैत दिखा,
अद्वैत-पथ वरा।
कहा प्रकृति ने
मनुज है खरा।
लड़, मर-मिटे
सुरासुर लेकिन
मिलकर जिए
रहे तुम आम।
मेरे पुरखों!
तुम्हें प्रणाम।
*
धरा-पुत्र हे!
प्रकृति-मित्र हे!
गही विरासत हाय! न हमने, चूक यही।
रौंद प्रकृति को
'ख़ास' हो रहे।
नाश बीज का
आप बो रहे।
खाली हाथों
जाना फिर भी
जोड़ मर रहे
विधि है वाम।
२२-७-२०१९
***
मुक्तक
दीप्ति तम हरकर उजाला बाँट दे
अब न शर्मा शतक से तम छांट दे
दस दिशाओं से सुनो तुम तालियाँ
फाइनल लो जीत धोबीपाट दे
*
एकता है तो मिलेगी विजय भी
गेंद की गति दिशा होगी मलय सी
खाए चक्कर ब्रिटिश बल्लेबाज सब
तिरंगा फ़हरा सके, हो जयी भी
***
महिला क्रिकेट के दोहे
स्मृति का बल्ला चला, गेंद हुई रॉकेट.
पलक झपकते नभ छुए, गेंदबाज अपसेट.
*
कैसे करती अंगुलियाँ, पल में कहो कमाल.
मात दे रही पेस से, झूलन मचा धमाल.
*
दीप्ति कौंधती दामिनी, गिरे उड़ा दे होश.
चमके दमके निरंतर, कभी न रीते कोश.
*
पूनम उतरी तो हुई, अजब अनोखी बात.
घिरे विपक्षी तिमिर में, कहें अमावस तात.
*
शर संधाना तो हुई, टीम विरोधी ढेर.
मंधाना के वार से, नहीं किसी की खैर.
२२.७.१७
***
मनहरण छन्द
विधान: 8-8-8-7 वर्ण
.
चीनियों को ठोंककर, पाकियों को पीटकर, फ़हरा तिरंगा आज, हम मुसकाएँगे.
लाख मतभेद रहें, पर मनभेद ना हों, जन गण मन, वंदे मातरम गाएँगे.
सिक्किम भूटान नेपाल की न बात करो, तिब्बत को भी 'सलिल', आजाद हम कराएँगे.
भारत के भाग, किसी वक्त जो अलग हुए, एक साथ जोड़, आर्यावर्त हम बनाएँगे.
***
गीत
कारे बदरा
*
आ रे कारे बदरा
*
टेर रही धरती तुझे
आकर प्यास बुझा
रीते कूप-नदी भरने की
आकर राह सुझा
ओ रे कारे बदरा
*
देर न कर अब तो बरस
बजा-बजा तबला
बिजली कहे न तू गरज
नारी है सबला
भा रे कारे बदरा
*
लहर-लहर लहरा सके
मछली के सँग झूम
बीरबहूटी दूब में
नाचे भू को चूम
गा रे कारे बदरा
*
लाँघ न सीमा बेरहम
धरा न जाए डूब
दुआ कर रहे जो वही
मनुज न जाए ऊब
जारे कारे बदरा
*
हरा-भरा हर पेड़ हो
नगमे सुना हवा
'सलिल' बूंद नर्तन करे
गम की बने दवा
जारे कारे बदरा
२२-७-२०१६
***
दोहा-यमक
*
गले मिले दोहा यमक, गणपति दें आशीष।
हो समृद्ध गणतंत्र यह, गणपति बने मनीष।।
*
वीणावादिनि शत नमन, साध सकूं कुछ राग ।
वीणावादिनि है विनत, मन में ले अनुराग। ।
*
अक्षर क्षर हो दे रहा, क्षर अक्षर ज्ञान।
शब्द ब्रह्म को नमन कर, भव तरते मतिमान।।
*
चित्र गुप्त है चित्र में, देख सके तो देख।
चित्रगुप्त प्रति प्रणत हो, अमिट कर्म का लेख।।
*
दोहा ने दोहा सदा, भाषा गौ को मीत।
गीत प्रीत के गुँजाता, दोहा रीत पुनीत।।
*
भेंट रहे दोहा-यमक, ले हाथों में हार।
हार न कोई मानता, प्यार हुआ मनुहार।।
*
नीर क्षीर दोहा यमक, अर्पित पिंगल नाग।
बीन छंद, लय सरस धुन, झूम उठे सुन नाग।।
*
गले मिले दोहा-यमक, झपट झपट-लिपट चिर मीत।
गले भेद के हिम शिखर, दमके ऐक्य पुनीत।।
*
ग्यारह-तेरह यति रखें, गुरु-लघु हो पद अंत।
जगण निषिद्ध पदादि में, गुरु-लघु सम यति संत।।
*
नाहक हक ना त्याग तू, ना हक पीछे भाग।
ना मन में अनुराग रख, ना तन में बैराग।।
*
ना हक की तू माँग कर, कर पहले कर कर्तव्य।
नाहक भूला आज को, सोच रहा भवितव्य।।
२२-६-२०१६
***
एक रचना:
का बिगार दओ?
*
काए फूँक रओ बेदर्दी सें
हो खें भाव बिभोर?
का बिगार दो तोरो मैंने
भइया रामकिसोर??
*
हँस खेलत ती
संग पवन खें
पेंग भरत ती खूब।
तेंदू बिरछा
बाँह झुलाउत
रओ खुसी में डूब।
कें की नजर
लग गई दइया!
धर लओ मो खों तोर।
का बिगार दो तोरो मैंने
भइया रामकिसोर??
*
काट-सुखा
भर दई तमाखू
डोरा दओ लपेट।
काय नें समझें
महाकाल सें
कर लई तुरतई भेंट।
लत नें लगईयो
बीमारी सौ
दैहें तोय झिंझोर
का बिगार दो तोरो मैंने
भइया रामकिसोर??
*
जिओ, जियन दो
बात मान ल्यो
पीओ नें फूकों यार!
बढ़े फेंफडे में
दम तुरतई
गाड़ी हो नें उलार।
चुप्पै-चाप
मान लें बतिया
सुनें न कौनऊ सोर।
का बिगार दो तोरो मैंने
भइया रामकिसोर??
*
अपनों नें तो
मेहरारू-टाबर
का करो ख़याल।
गुटखा-पान,
बिड़ी लत छोड़ो
नई तें होय बबाल।
करत नसा नें
कब्बऊ कौनों
पंछी, डंगर, ढोर।
का बिगार दो तोरो मैंने
भइया रामकिसोर??
*
बात मान लें
निज हित की जो
बोई कहाउत सयानो।
तेन कैसो
नादाँ है बीरन
साँच नई पहचानो।
भौत करी अंधेर
जगो रे!
टेरे उजरी भोर।
का बिगार दो तोरो मैंने
भइया रामकिसोर??
*
२१-११-२०१५
कालिंदी विहार लखनऊ
***
हाड़ौती मुक्तिका:
*
तनखा पूड़ी, घूस मलाई
मत देखै तू पीर पराई
.
अंग्रेजी में गिट-पिट कर लै
हिंदी की मत करै पढ़ाई
.
बेसी धन सूं मन हरखायो
आछी लागी श्याम कमाई
.
कंसराज को खाड कालज्यो
लार सुदामा करी मिताई
.
बना भेंट कै नाक चढ़ावै
ऊँ ई सांचो जगत गुसाई
.
धोला कपड़ा, मैला मन सूं
भव सागर सूँ पार न्ह पाई
.
आतंकी रावण की लंका
सिरी राम ने जा'र ढहाई
.
आपण सबका पाप धो'र भी
यार 'सलिल' नंदी हरखाई
***
दोहे का रंग कविता के संग
*
बाहर कम भीतर अधिक जब-जब झाँकें आप
तब कविता होती प्रगट, अंतर्मन में व्याप
*
औरों की देखें कमी, दुनिया का दस्तूर
निज कमियाँ देखो बजे, कविता का संतूर
*
कविता मन की संगिनी, तन से रखे न काम
धन से रहती दूर यह, प्रिय जैसे संतान
*
कविता सविता तिमिर हर, देते दिव्य प्रकाश
महक उठे मन-मोगरा, निकट लगे आकाश
*
काव्य -कामिनी ने कभी, करी न कोई चाह
बैठे चुप थक-हारकर, कांत न पाएं थाह
***
मुक्तिका
*
मापनी: २१२२ १२१२ २२
*
आँख से आँख जब मिलाते हैं
ख्वाहिशें आप क्यों छिपाते हैं?
आइना गैर को दिखाते हैं
और खुद से नज़र चुराते हैं
वक़्त का दे रहे दुहाई जो
फ़र्ज़ का क़र्ज़ कब चुकाते हैं?
रौशनी भीख माँगती उनसे
जो मशालें जला उठाते हैं
मैं 'सलिल' ज़िंदगी का जीवन हूँ
आप बेकार क्यों बहाते हैं?
२२-७-२०१५
***
गीतः
सुग्गा बोलो
जय सिया राम...
*
सुग्गा बोलो
जय सिया राम...
*
काने कौए कुर्सी को
पकड़ सयाने बन बैठे
भूल गये रुकना-झुकना
देख आईना हँस एँठे
खिसकी पाँव तले धरती
नाम हुआ बेहद बदनाम...
*
मोहन ने फिर व्यूह रचा
किया पार्थ ने शर-सन्धान
कौरव हुए धराशायी
जनगण सिद्ध हुआ मतिमान
खुश मत हो, सच याद रखो
जन-हित बिन होगे गुमनाम...
*
हर चूल्हे में आग जले
गौ-भिक्षुक रोटी पाये
सांझ-सकारे गली-गली
दाता की जय-जय गाये
मौका पाये काबलियत
मेहनत पाये अपना दाम...
२२-७-२०१४
***
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