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मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

वास्तु विज्ञान की प्रासंगिकता

वास्तु विज्ञान की प्रासंगिकता
- इं. संजीव वर्मा 'सलिल'
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                    वास्तु विज्ञान मनुष्य द्वारा प्रकृति के साथ समन्वय स्थापित कर किए गए निर्माण का विज्ञान है। वास्तु विज्ञान किसी निर्माण को निर्जीव इमारत मात्र न मानकर उसे जीवंत संरचना मानता है। निर्माण को 'वास्तु पुरुष' की संज्ञा देकर उसका रूपांकन और इस तरह तरह किया जाता है जैसे वह कोई जीवित व्यक्ति हो और उसमें वे सब तत्व यथास्थान हों जिनसे जीवित व्यक्ति सुविधा अनुभव करता है। वास्तु में मनुष्य, प्रकृति, ब्रह्माण्ड और ब्रह्म का समन्वय सन्निहित होता है। वास्तु शब्द अपने आप में एक विराट दर्शन को समेटे है, न केवल स्थूल स्तर पर, अपितु सूक्ष्म चेतना तक। वास्तु शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत की धातु 'वस'  से हुई है। इसका अर्थ है वास करना, बसना, रहना, आदि। वस धातु 'वसति' (मैं रहता हूँ), 'वसुमति' (वास योग्य पृथ्वी), 'वास' (इमार), 'निवास' (मकान), 'प्रवास' (घर से दूर रहना), 'निवासी' (रहने वाला), 'आदिवासी' (मूल निवासी)। अंनिवासी' (न रहने वाला) आदि शब्दों की जननी है। वस्तुत: वास्तु' इस समूचे भाव-जगत का मूर्त रूप  एक ऐसा स्थान जहाँ केवल देह नहीं, आत्मा भी वास करती है।

वास्तु विज्ञान और पंच तत्व 

अनिल अनल भू नभ सलिल, पंच तत्व मय सृष्टि। 
रखे समन्वय-संतुलन, वास्तु ज्ञान की दृष्टि।।  

                    वास्तु अर्थात निर्माण पाँच तत्वों अग्नि, वायु, धरती, आकाश और जल से होता है। इन तत्वों के गुण-धर्म का ध्यान रखकर उनका उपयोग इस प्रकार किया जाता है कि वास्तु के उपयोगकर्ता पर उनका शुभ प्रभाव हो किंतु अशुभ प्रभाव न हो। अग्नि तत्व ताप व ऊर्जा देता है। ब्रह्मांड में ऊर्जा का अखंड स्तोत्र सूर्य है। वास्तु में ऊर्जा के प्रवेश हेतु सूर्य की ओर द्वार। वातायन एवं गवाक्ष रखे जाना वास्तु विज्ञान शुभ मानता है तो आधुनिक विज्ञान सूर्य प्रकाश को रोगाणु नाशक बता कर निर्माण में इसे आवश्यक बताता है। वायु जीवन दाई है। हम श्वास में वायु का सेवन करते हैं। वास्तु विज्ञान और सिविल इंजीनियरिंग दोनों घर के आस पास वृक्ष लगाए जाने को आवश्यक मानते हैं ताकि निवासियों को पर्याप्त प्राण वायु मिले और वे स्वस्थ्य रहें। गर्म-सर्द मौसम में वृक्ष तापमान पर नियंत्रण रखते हैं। धरती पर वास्तु का निर्माण होता है। वास्तु विज्ञान और स्थापत्य अभियांत्रिकी दोनों धरती अर्थात मिट्टी की गुणवत्ता और मजबूती को महत्व देते हैं। सॉइल मेकेनिक्स के परीक्षण मिट्टी के तत्व और गुण को यंत्र से परखते हैं, वास्तु निरीक्षण से। आकाश तत्व को वास्तु आध्यात्मिक दृष्टि से देखता है, वास्तु की ऊँचाई आकाश तत्व का निर्धारण करती है। निवास की तुलना में देवालय अधिक ऊँचा होता है। अंतिम तत्व पानी का जीवन और स्वास्थ्य दोनों के साथ अभिन्न संबंध है। 

 वास्तु और दिशा  

दिशा-दशा के मध्य है, जो संबंध विचार। 
वास्तु ज्ञान कहता रखें, सदा उचित आचार।।  
 
                    कोई भी निर्माण 4 दिशाओं पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण एवं 4 उप दिशाओं ईशान, आग्नेय, नैऋत्य, वायव्य के बीच होता है। वास्तु विज्ञान दिशाओं को बहुत महत्व देता है और उनके प्रभाव के अनुसार वास्तु निर्माण को अनुशंसित करता है।  तदनुसार पूर्व और पूर्वोत्तर (ईशान) दिशा में उपासना कक्ष अथवा ऐश्वर्य वर्धक सामान, कोष आदि रखे जा सकते हैं। यह दिशा सूर्योदय की जीवन वर्धक रश्मियों  के कारण सकारात्मक ऊर्जा प्रवाह की कारक है। दक्षिण पश्चिम दिशा में अग्नि तत्व का प्राधान्य होने के करण यहाँ जीवन-मृत्यु का संगम है। इस दिशा में पाकशाला, पावर हाउस, बिजली का मीटर आदि होना चाहिए। दक्षिण दिशा यम अथवा मृत्यु की दिशा है। यहाँ शयन कक्ष का न हो। दक्षिण-पूर्व दिशाएँ में अशुभ तत्व के दमन हेतु भारी सामान या जीना हो सकता है। पश्चिम दिशा शुभ व समृद्धि दायक है। पश्चिमी उत्तर दिशा (वायव्य)  में चंचलता/अस्थिरता  होगी। इसलिए इस दिशा में अविवाहित पुत्री का कक्ष, शोरूम, अतिथि कक्ष आदि बनाएँ। उत्तर दिशा में सुख प्राप्ति का स्थान है।  यहाँ गृह स्वामी का कक्षा हो सकता है। भूखंड के केंद्र ब्रह्म स्थान पर कोई निर्माण न किया जाए।  

                    सिविल इंजीनियर की दृष्टि से बात करें तो पूर्व पूर्वोत्तर दिशाएँ सूर्य प्रकाश को घर में प्रवेश देती है जिससे स्वास्थ्यवर्धक वातावरण का निर्माण होता है, सूर्य की किरणों से रोगाणु नाश होता है। पृथ्वी एक चुंबक की तरह व्यवहार करती है उत्तर दिशा उत्तर ध्रुव की तरह उत्तर और दक्षिण दिशा दक्षिण ध्रुव की तरह व्यवहार करती है।  सोते समय अगर हमारा सर जो उत्तर दिशा का प्रतीक है दक्षिण की दिशा में हो तो नींद गहरी आती है, स्वास्थ्यवर्धक होती है।  इसके विपरीत दिशा में विपरीत प्रभाव देखे गए हैं।  स्पष्ट है कि वास्तु विज्ञान प्रकृति और मनुष्य के बीच समन्वय सामंजस्य और साहचर्य पर आधारित है जबकि आधुनिक सिविल इंजीनियरिंग भौतिक पदार्थों के गुण दोष पर आधारित है। 


वेद में वास्तु  

                    वास्तु विज्ञान का जन्म वेदपूर्व काल में हुआ और उसका विकास वैदिक युग में अपने चरम पर पहुँचा। ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद में हमें जिन स्थापत्य अवधारणाओं के दर्शन होते हैं, वे आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर भी पूर्णतः खरे उतरते हैं। ऋग्वेद (2.41.5) में मित्र और वरुण के भव्य राजप्रासाद का उल्लेख है। मंत्र 5.62.6 में “सहस्त्रस्थूणम्” अर्थात वरुण के विशाल महल का संकेत है। ऋग्वेद 8.47.5 में 'त्रिधातु' और 'त्रिभूमिक' भवनों का यानि तीन मंजिलों वाले भवन का वर्णन है। “त्रिधातु यद् वरुथ्यम्” में तीन भौतिक तत्वों से बना भवन वर्णित है। यह लौह, पाषाण और काष्ठ के मिश्रित उपयोग का संकेत है। ऋग्वेद 4.30.20 में 'पत्थर के नगर' का वर्णन है। 2.20.8 में लौह दुर्ग सौंदर्य के साथ सुरक्षा वास्तु का एक मुख्य उद्देश्य रहा। भवन की विशेषता ‘भद्र’ (सुखद) और ‘अनातुरम्’ (रोग रहित) बताई गई है एक ऐसा निर्माण जो शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य को बढ़ावा दे।

               आधुनिक भवन निर्माण कला के तत्व बायोफिलिक डिज़ाइन, हरित भवन, प्राकृतिक प्रकाश- वेंटिलेशन, एयर-कंडीशनिंग, इंटीरियर थर्मल कंडीशनिंग, ह्यूमन साइकोलॉजी आदि वैदिक वास्तु विज्ञान में सन्निहित रहे हैं, यजुर्वेद 17.5 और 17.7 में उसका बीज रूप मिलता है। 

                    अथर्ववेद 9.3.1 में ब्रह्मा को भवन का मानचित्र बनानेवाला अभियंता कहा गया है।  उस युग में वास्तुविद का दर्जा देवतुल्य था। 9.3.19 में भवन को नापकर बनाने की बात कही गई है। यह आधुनिक सर्वेक्षण अभियांत्रिकी का मूल है। 9.3.6 में मकान ऊँचाई (कुर्सी-प्लिंथ) पर बनाने का सूत्र है ताकि आर्द्रता से सुरक्षा हो। 9.3.21 में दो से दस कमरों की योजना यह स्पष्ट करती है कि परिवारिक आवश्यकता के अनुसार घर की योजना बनाई जाती थी। 9.3.8 में बड़े-बड़े दरवाज़े और खिड़कियों का उल्लेख है — जिससे प्रकाश और वायु का समुचित प्रवाह संभव हो। यही तो आज का 'पैसिव वेंटिलेशन' है।

वास्तु : केवल भवन नहीं, संस्कार भी

वास्तु शास्त्र केवल भवन-निर्माण की तकनीक नहीं है; यह एक संस्कार है, एक जीवन पद्धति। गृहप्रवेश पूजन में  नींव रखते समय वेद-मंत्रों के साथ यज्ञ, पूजा, स्त्रोत पाठ दर्शाता है कि वास्तु केवल भौतिक ढांचा नहीं, आध्यात्मिक चेतना का केंद्र है। ‘गृहस्थ’ शब्द में जुड़ा ‘स्थ’ ठहराव/स्थिरता है।  यह ठहराव संबंध और सुख-समृद्धि दोनों में होना चाहिए। आज जब हम ऊँची-ऊँची इमारतों में रहते हैं, वातानुकूलित जीवन जीते हैं, तब भी सुखी नहीं हैं। संबंध तार-तार हो रहे हैं। वास्तु विज्ञान वह प्रकाश-स्तंभ है, जो आधुनिक स्थापत्य को दिशा देता है। वास्तु विज्ञान समय की कसौटी पर खरा उतरा है।  

आधुनिक काल में वास्तु विज्ञान की उपयोगिता

                    आधुनिक वास्तुकला भी वास्तु के सिद्धांतों का सदुपयोग कर भवनों को स्वास्थ्यप्रद और ऊर्जा-कुशल बनाने पर बल देती है। भवन में पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था कर न्यून ऊर्जा-खपत , वायु-परिवहन से अधिक कार्य क्षमता, जल बच व संरक्षण, सहज सुलभ मजबूत निर्माण सामग्री, संरचना के उपयोगअनुसार रूपांकन, हरित भवन आदि तत्व  वास्तु विज्ञान से सिविल इंजीनियरिंग ने ग्रहण किए हैं।  वास्तु विज्ञानके नियमों का पर्यावरणीय प्रभावों से सीधा कोई तार्किक संबंध न  दिखाने पर भी विविध प्राकृतिक बलों (पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र, सूर्य-चंद्रमा की स्थिति इत्यादि) का आज की तकनीकी व्यवस्थाएँ (एयर कंडीशनिंग, आधुनिक निर्माण सामग्री, परिरक्षण प्रणालियाँ) विचार करती हैं। वास्तु विज्ञान गणितीय और ज्यामितीय सिद्धांतों के साथ पर्यावरण संरक्षण पर आधारित है।  

            इंजीनियरिंग के दृष्टिकोण से देखा जाए तो वास्तुशास्त्र में संरचनात्मक और भौतिक मापों का समावेश है। वास्तु योजना की गणना में इंजीनियरिंग ज्यामिति तथा मापन तकनीकें का उपयोग होता है। उदाहरण के लिए, किसी भवन के रेखांकनों में सही स्केल, कोणीय निर्देश (कम्पास आधारित पूर्व-दिशा निर्धारण) और दूरी मापन आवश्यक हैं।  वास्तुयोजना के लिए आवश्यक मापदण्ड स्केल सेट करना, जमीन की लंबाई-चौड़ाई मापना, ध्रुवीय दिशाएँ (उत्तर-दक्षिण) पता करना आदि  वास्तु और अभियांत्रिकी दोनों में हैं। दिशा गया करने के लिए प्राचीन काल की सूक्तिका आधुनिक युग में चुंबकीय कम्पास एवं जीआईएस तकनीक की पूर्वज है। 

निष्कर्ष

                     वास्तु विज्ञान को अंध विश्वास से दूर कर आधुनिकअभियांत्रिकी में इसके मानकों और विधानों का परीक्षण और प्रयोग किया जाना आवश्यक है। आज की आवश्यकता प्रकृति के साथ समन्वय स्थापित कर विकास करना है। प्रकृति का शोषण और उपेक्षा विनाशकारी दुर्घटनाओं को जन्म दे रही है। वास्तु विज्ञान की सटीकता का प्रमाण भारत और अन्यत्र निर्मित सदियों पुराने कालजयी निर्माण हैं जिन पर समय का प्रभाव नहीं हुआ। शिव निर्मित 2 पुरातन जल प्रवाह पथ नर्मदा और गंगा, राम सेतु, सिंधु में डूब गया द्वारका नगर, पूरी तरह शुद्ध ज्योतिष गणनाएँ, सोमनाथ में बिना धरती को छुए दक्षिण ध्रुव का पथ इंगित करता तीर, कुतुब मीनार के निकट जंग मुक्त लोहे का स्तंभ, अनेक दुर्ग और मंदिर आदि अनेक निर्मितियाँ वास्तु विज्ञान की देन हैं। वर्तमान में पर्वतांचलों में हो रहे भूस्खलन, जल प्लावन, जंगलों की अग्नि, पिघलते ही खंड, ओज छिद्र, बढ़ता वायु और जल प्रदूषण आदि पर नियंत्रण करने में  वास्तु विज्ञान के सिद्धांत और तकनीक बहुत प्रभावी हो सकती है।     

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संदर्भ

1.  vastu vidya -satish sharma। 

2. संपूर्ण वास्तु शास्त्र - भोजराज द्विवेदी ।  

3. वास्तु शास्त्र - ए. आर. तारखेडकर । 

4. भारतीय वास्तु एवं भवन निर्माण - जगदीश शर्मा । 

  
5. Hotwani, M. & Rastogi, P. “Vastu Shastra: A Vedic Approach To Architecture 

6. वास्तुदीप स्मारिका- संपादक संजीव वर्मा 'सलिल' वास्तु विज्ञान संस्थान (भारत) जबलपुर ईकाई। 

मैकाले, शिक्षा नीति

Minute on Indian Education थॉमस बेबिंगटन मैकाले, वर्ष १८३५, पृष्ठ ९  

मैकाले गवर्नर जनरल की काउंसिल में लॉ मेम्बर और पब्लिक इंस्ट्रक्शन कमेटी के प्रसिडेंट थे। तब साल १८१३ के एक एक्ट में शिक्षा पर ख़र्च को लेकर बहस हो रही थी। कमेटी में लोग इस बात को लेकर बँटे थे। आधे सदस्यचाहते थे कि संस्कृत और अरबी शिक्षा पर ख़र्च हो आधे चाहते थे कि ख़र्च अंग्रेज़ी और पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान पर हो। मैकाले ने इस विषय पर एक मेमोरेंडम दिया जिसे मिनट कहा गया। इस मिनट के आख़िरी पैराग्राफ में मैकाले ने कहा- ''If the decision of His Lordship in Council should be such as I anticipate, I shall enter on the performance of my duties with the greatest zeal and alacrity. If, on the other hand,it be the opinion of the Government that the present system ought to remain unchanged, I beg that I may be permitted to retire from the chair of the Committee.''

जैसा कि मैं अनुमान करता हूँ यदि लॉर्ड्शिप और उनकी परिषद 

I believe that the present system tends not to accelerate the progress of truth but to delay the natural death of expiring errors.

उन्होंने   Arabic और Sanskrit learning को Expiring Errors कहा। ज़ालिम ने क्या शब्द प्रयोग किया है मज़ा आ गया Expiring Errors ।

अब शुरुआत पर आ जाते हैं। बात शुरू होती है चार्टर एक्ट के इस प्रोविजन को लेकर कि इसका अर्थ क्या है।


"for the revival and promotion of literature, and the encouragement of the learned natives of India, and for the introduction and promotion of a knowledge of the sciences among the inhabitants of the British territories."

यहाँ दो फ्रेज हैं Promotion of literature तथा Promotion of the sciences

मैकाले ने कहा अक़्ल के दुश्मनों क़ानून में ये लिखा है और आप क्या कर रहे हो? आप Literature का मतलब सिर्फ़ Arabic and Sanskrit literature समझ रहे हो। आप दो ग़लती कर रहे हो । एक तो आपको क़ानून की समझ नहीं है। दूसरी बात जिस पर आप ख़र्च कर रहे हो उससे कुछ फ़ायदा नहीं हो रहा Natives को। जॉन लॉक क्यों न पढ़ाया जाए? मिल्टन क्यों नहीं? न्यूटन क्यों नहीं?

वो एक उदाहरण देते हैं कि मान लो आपने एक सैनिटोरियम खोला ये सोचकर कि इससे लोगों का स्वास्थ्य ठीक रहेगा लेकिन अब उसका रिजल्ट ठीक नहीं तो क्या चिपके रहोगे इस पर ये कहकर कि बहुत सालों से ये हो रहा है तो चलने दो। यहाँ ध्यान देने वाली बात है वो अभी अपने देश के मूर्खों की तरफ़ देखकर बात कर रहे हैं भारतीय देशी मूर्खों की तरफ़ देखकर नहीं।

एक और उदाहरण देते हैं कि देखो Edward Jenner ने स्मॉल पॉक्स की वैक्सीन बनाई मान लो इससे पहले किसी सरकार ने क़ानून बनाया हो कि इस बीमारी से बचने के लिए लोगों को Variolation से इनोक्युलेट किया जाए( ये पहले का ख़तरनाक तरीका था जिसमें Pus को बीमार आदमी से लेकर स्वस्थ आदमी में डाला जाता था अब तो वैक्सीन आ गई है जिसमें Weakened pathogen प्रयोग करते हैं) तो क्या वैक्सीन आने पर भी आप ज़िद करोगे कि हम तो पुराना तरीका ही प्रयोग करेंगे?

अब वो एक विवादित बात कहते हैं


I have conversed, both here and at home, with men distinguished by their proficiency in the Eastern tongues. I am quite ready to take the oriental learning at the valuation of the orientalists themselves. I have never found one among them who could deny that a single shelf of a good European library was worth the whole native literature of India and Arabia.


यही कि इंडिया और अरेबिया का पूरा लिटरेचर एक अच्छी यूरोपियन लाइब्रेरी के एक शेल्फ में रखी किताबों के बराबर है। अब आगे वो प्रशंसा भी करते हैं । देख लो देख लो क्या पढ़ लो ओरिजिनल दस्तावेज़ में


It will hardly be disputed, I suppose, that the department of literature in which the Eastern writers stand highest is poetry.


पोएट्री में तो वो हमें ही ऊँचा मान रहा है ( कालिदास वगैरह) अब आगे


But when we pass from works of imagination to works in which facts are recorded and general principles investigated, the superiority of the Europeans becomes absolutely immeasurable.


यहाँ वो आधुनिक ज्ञान विज्ञान की बात कर रहे हैं। तो उसमें तो भारत उस वक्त यूरोप के मुक़ाबले कहीं नहीं था और आज भी नहीं है। मैकाले ने क्या ग़लत कहा? अब संस्कृत में ये ज्ञान उपलब्ध नहीं है तो जिसमें उपलब्ध है उसको पढ़ाया जाए। वो कहते हैं कि आप पब्लिक के पैसे को कहाँ ख़र्च कर रहे हो? ये पढ़ाने में कि तीस फीट का राजा तीस हज़ार साल तक राज करता है। भूगोल के नाम पर मक्खन भरे समुद्र के बारे में पढ़ाते हो। मैकाले कहते हैं कि भाई हमें देखो हम ख़ुद अपने देश की भाषा से चिपके नहीं रहे। एक वक्त पर ज्ञान का भंडार ग्रीक और रोमन वर्क्स में था तो हमने उनकी भाषा सीखी तो यहाँ भारतीयों को नया ज्ञान क्यों न दिया जाए।

मैकाले कहते हैं कि मेरा बस चले तो मैं कलकत्ता के सारे मदरसे और संस्कृत कॉलेज बंद कर दूँ। उनका कहना था कि एक लिमिटेड अमाउंट हमारे पास है और उसे हमें संस्कृत और अरेबिक साहित्य पढ़कर बर्बाद नहीं करना चाहिए बल्कि अंग्रेजी माध्यम से विज्ञान की शिक्षा देनी चाहिए। वो कहते हैं कि कितनी बड़ी मूर्खता है कि आप इन्हें संस्कृत पढ़ा रहे हो और Stipend देते हो और ये ही लोग गवर्नर जनरल के पास पिटीशन डालते हैं कि अब हमें नौकरी भी दो। अर्थात ये शिक्षा बेकार है। दूसरी तरफ़ अंग्रेज़ी माध्यम से पढ़ने के लिए भारत का कुलीन वर्ग पैसे दे रहा है। तो कौन सी शिक्षा काम की है?

एक जगह वो कहते हैं कि हमें भारतीयों का Intellectual taste नहीं उनकी Intellectual health का ध्यान रखना है। कितनी बड़ी बात कही है।

जिस बात को लेकर अक्सर रुदाली होती है वो ये है।


it is impossible for us, with our limited means, to attempt to educate the body of the people. We must at present do our best to form a class who may be interpreters between us and the millions whom we govern, -a class of persons Indian in blood and colour, but English in tastes, in opinions, in morals and in intellect.


उन्होंने कहा हमारे पास थोड़ा पैसा है तो सबको तो ये शिक्षा नहीं दे पाएंगे लेकिन हमें एक ऐसी क्लास तैयार करनी चाहिए जो हमारे और बाक़ी के नेटिव्स के बीच बातचीत का ज़रिया बने और जो रंग और ख़ून से भारतीय हो लेकिन इंटेलेक्ट और मोरल्स, राय इत्यादि को लेकर इंग्लिश हो। इसमें क्या ग़लत है कि आपकी सोच पर जॉन लॉक का असर पड़े, न्यूटन का असर पड़े?

ये जो सुषमा स्वराज थी , अरुण जेटली जिन्होंने मरने से पहले अमेरिका में इलाज कराया। इन राष्ट्रवादियों को आप Taste में इंडियन मानोगे या इंग्लिश? सोनिया गाँधी ने इलाज विदेश में कराया, ग़ुलाम नबी आज़ाद ने विदेश में इलाज कराया । बच्चे इनके विदेशों में पढ़ते हैं और तुम्हें देशी पाठ पढ़ाते हैं। जो लाखों का सूट पहनते हैं। 4200 करोड़ का B 777 जहाज हमारे प्रधानमंत्री यूज़ करते हैं। ये कैसा Taste है? इंडियन या इंग्लिश?

एक जगह तो वो गुस्से में कहते हैं कि क्या हम इस बात के लिए युवाओं की ज़वानी बर्बाद कर दे कि कैसे गधे को छूकर अपने को शुद्ध करे या एक बकरा मारने पर कैसे इस अपराध से मुक्ति पाने के लिए किस वैदिक टेक्स्ट को बार बार पढ़े।

उनके सारे तर्कों को और उदाहरणों को मैंने नहीं लिखा बो काफ़ी बड़ा हो जाता लेकिन ये कमाल का दस्तावेज है हर भारतीय को पढ़ना चाहिए।

'केशव कल्चर

मासिकी 'केशव कल्चर' / राधा-कृष्ण संदेश /  (ई पत्रिका, हिन्दी-अंग्रेजी पत्रिका)

शुल्क- संरक्षक २५०००/-, आजीवन ११,०००/-, वार्षिक ५००/-, एक अंक ५०/- 

विज्ञापन दर- पिछला आवरण बहुरंगी ५०,०००/- भीतरी आवरण ४०,०००/-, मध्य पृष्ठ ३०,०००/-, अन्य पृष्ठ २५,०००/-। 

निदेशक मण्डल- प्रकाशक, प्रधान संपादक, प्रबंध संपादक, २ संरक्षक।    

प्रधान संपादक- 

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सहसंपादक- 

प्रबंध संपादक- 

प्रकाशक- 

अंक १- कृष्ण दर्शन विशेषांक 

अंक २- कृष्ण चिंतन विशेषांक 

अंक ३- कृष्ण जीवन विशेषांक  

अंक ४- कृष्ण धाम विशेषांक

अंक ५- रास लीला विशेषांक 

अंक ६- कर्म योग विशेषांक 

पृष्ठ संख्या ६४ 

स्थायी स्तंभ- संपादकीय, पाठकीय, अग्रलेख, कृष्ण पहेली, कृष्ण साहित्य समीक्षा, कृष्ण काव्य, कृष्णोपासक, केशव कल्चर परिवार।  

 


२८ फरवरी,राम किंकर,सॉनेट,मुक्तक,मौली,बुंदेली, सरस्वती,हास्य,मुक्तिका, सुमित्र

सृजन २८ फरवरी
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स्मरण युग तुलसी ३
आरती
आरती करें गुरुवर की करें, हनुमंत संग रघुवर की।
आरती करें गुरुवर की...
जन्म नर्मदा तट पर पाया, हनुमत ने आ पंथ दिखाया।
सिया-राम गुण निशि-दिन गाया, बंधन कोई रोक न पाया।।
सफल साधना पूर्ण कामना मिली कृपा शंकर की।
आरती करो गुरुवर की...
नाम राम किंकर शुभ पाया, तुलसी मानस हृदय बसाया।
शब्द-शब्द का अर्थ बताया, जन-गण पग-रज पाने धाया।
भिन्न राम ना, अलग श्याम ना, ऐक्य दृष्टि सुंदर की।
आरती करो गुरुवर की...
आत्मजयी सुत प्रभु मन भाया, प्रवचन सुनने पास बुलाया।
अवधपुरी प्रभुधाम सुहाया, आत्मदेव परमात्म मिलाया।
पुण्य पावना भक्ति भावना, युगतुलसी मनहर की।
आरती करो गुरुवर की...
२८.२.२०२४
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सॉनेट
माणिक जब बन गया मुसाफिर
मिला जवाहर तरुण अचानक
कृष्ण पथिक कर पकड़े फिर-फिर
दे गोपाल मधुर छवि अनथक
रोटी-कमल द्वार पर सोहे
हेमलता का मधुर हास जब
संगीता होकर मन मोहे
नवनीता अस्मिता आस तब
आस्था के शतदल शत महके
यादों के पलाश हँसते हैं
मिल यात्राओं की तलाश में
ज्वाल गीत गा पग बढ़ते हैं
तमसा के दिन करो नमन
तमसा के दिनकरो नमन
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मुक्तक
जय जयंत की बोलिए जय का कभी न अंत हो
बन बसंत हँस डोलिए रंग कुसुम्बी संत हो
बरस बरस रस कह रहा तरस नहीं डूब जा
बाहर क्यों खोजता है विदेह देह-कन्त हो
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पद
मौली पा मयूर मन नाचे
करे अर्चना मीरा मधु निशि, कांत कल्पना क्षिप्रा बाँचे
सदा शुभागत हो प्रबोध, पंकज पीयूष पान कर छककर
हो सुरेश शशिकांत तथागत, तरुणा अरुणा रुके न थककर
नमन शिवानी विहँस प्रियंका, गरिमा करतल ध्वनि कर साँचे
मौली पा मयूर मन नाचे
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बुंदेली सारद वंदना
सारद माँ! परनाम हमाओ।
नैया पार लगा दे रे।।
मूढ़ मगज कछु सीख नें पाओ।
तन्नक सीख सिखा दे रे।।
माई! बिराजीं जा परबत पै।
मैं कैसउ चढ़ पाऊँ ना।।
माई! बिराजीं स्याम सिला मा।
मैं मूरत गढ़ पाऊँ ना।।
ध्यान धरूँ आ दरसन देओ।
सुन्दर छबि दिखला दे रे।।
सारद माँ! परनाम हमाओ।
नैया पार लगा दे रे।।
मैया आखर मा पधराई।
मैं पोथी पढ़ पाऊँ ना।
मन मंदिर मा माँ पधराओ
तबआगे बढ़ पाऊँ ना।।
थाम अँगुरिया राह दिखाखें ।
मंज़िल तक पहुँचा दे रे।।
सारद माँ! परनाम हमाओ।
नैया पार लगा दे रे।।
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सॉनेट
चूहे को पंजे में दाब शेर मुस्काए।
चीं-चीं कर चूहा चाहे निज जान बचाए।
शांति वार्ता का नाटक जग के मन भाए।।
बंदर झूल शाख पर जय-जयकार गुँजाए।।
'भैंस उसी की जिसकी लाठी' अटल सत्य है।
'माइट इज राइट' निर्बल ही पीटता आया।
महाबली जो करे वही होता सुकृत्य है।।
मानव का इतिहास गया है फिर दुहराया।।
मनमानी को मन की बात बताते नेता।
देश नहीं दल की जय-जय कर चमचे पाले।
जनवाणी जन की बातों पर ध्यान न देता।।
गुटबंदी सीता को दोषी बोल निकाले।।
निज करनी पर कहो बेशरम कब शरमाए।
चूहे को पंजे में दाब शेर मुस्काए।।
२८-२-२०२२
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मुक्तिका
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इसने मारा, उसने मारा
इंसानों को सबने मारा
हैवानों की है पौ बारा
शैतानों का जै-जैकारा
सरकारों नें आँखें मूँदीं
टी वी ने मारा चटखारा
नफरत द्वेष घृणा का फोड़ा
नेताओं ने मिल गुब्बारा
आम आदमी है मुश्किल में
खासों ने खुद को उपकारा
भाषणबाजों लानत तुम पर
भारत माता ने धिक्कारा
हाथ मिलाओ, गले लगाओ
अब न बहाओ आँसू खारा
२८-२-२०२०
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सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

फरवरी २, हरिगीतिका, शे'र, दोहा , समीक्षा , सुनीता सिंह, कविता, बजट

 पुरोवाक

एक रचना बजट ० सत्ता कहती- 'बजट श्रेष्ठ है।' 'है कंडम' विपक्ष बतलाता। बेसिर-पैर कवायद लगता जनता को कुछ समझ न आता। ऐंकर-नेता गर्दभ सुर में चीख रहे ताल ठोंककर। हार गए हैं सारमेय सब जीत न पाए, थके भौंककर। पाना क्या है?, क्या खोना है? कोई न जाने यह रोना है । जिसको दिया, न उसको मिलता। दिया न जिसको वह पा खिलता। थोड़ा-ज्यादा, ज्यादा-थोड़ा भानुमती ने कुनबा जोड़ा। नहीं आज तक राहत आई बिगड़ी बात न बनने पाई। कल क्या होगा, किसे खबर है? वादा-जुमला गुजर-बसर है। ट्रंप कार्ड है अमरीकी हित ढोना अपनी मजबूरी है। बुलडोजर अपनों पर चलता सत्ता-मद की मगरूरी है। पक्ष-विपक्ष न सहमत होते नौटंकी जनता चुप देखे। लोक उपेक्षित, तंत्र प्रबल है मंत्र न समरसता का लेखे। मोहित हुआ जेन जी हर दिन देख रहा क्या नया गजट है? अखबारों से खबर लापता हर पन्ने पर सिर्फ गजट है। २.२.२०२६ ०००

ओस की बूँद - भावनाओं का सागर
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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सर्वमान्य सत्य है कि सृष्टि का निर्माण दो परस्पर विपरीत आवेगों के सम्मिलन का परिणाम है। धर्म दर्शन का ब्रह्म निर्मित कण हो या विज्ञान का महाविस्फोट (बिग बैंग) से उत्पन्न आदि कण (गॉड पार्टिकल) दोनों आवेग ही हैं जिनमें दो विपरीत आवेश समाहित हैं। इन्हें पुरुष-प्रकृति कहें या पॉजिटिव-निगेटिव इनर्जी, ये दोनों एक दूसरे से विपरीत (विरोधी नहीं) तथा एक दूसरे के पूरक (समान नहीं) हैं। इन दोनों के मध्य राग-विराग, आकर्षण-विकर्षण ही प्रकृति की उत्पत्ति, विकास और विनाश का करक होता है। मानव तथा मानवेतर प्रकृति के मध्य राग-विराग की शाब्दिक अनुभूति ही कविता है। सृष्टि में अनुभूतियों को अभियक्त करने की सर्वाधिक क्षमता मनुष्य में है। अपने अस्तित्व की रक्षा करने के लिए मनुष्य को संघर्ष, सहयोग और सृजन तीनों चरणों से साक्षात करना होता है। इन तीनों ही क्रियाओं में अनुभूत को अभिव्यक्त करना अपरिहार्य है। अभिव्यक्ति में रस और लास्य (सौंदर्य) का समावेश कला को जन्म देता है। रस और लास्य जब शब्दाश्रित हों तो साहित्य कहलाता है। मनुष्य के मन की रमणीय, और लालित्यपूर्ण सरस अभिव्यक्ति लय (गति-यति) के एककारित होकर काव्य कला की संज्ञा पाती हैं। काव्य कला साहित्य (हितेन सहितं अर्थात हित के साथ) का अंग है। साहित्य के अंग बुद्धि तत्व, भाव तत्व, कल्पना तत्व, कला तत्व ही काव्य के तत्व हैं।
काव्य प्रकाशकार मम्मट के अनुसार "तद्दौषौ शब्दार्थौ सगुणावनलंकृति पुन: क्वापि" अर्थात काव्य ऐसी जिसके शब्दों और अर्थों में दोष नहीं हो किन्तु गुण अवश्य हों, चाहे अलंकार कहीं कहीं न भी हों। जगन्नाथ के मत में "रमणीयार्थ प्रतिपादक: शब्द: काव्यम्" रमणीय अर्थ प्रतिपादित करने वाले शब्द ही काव्य हैं। अंबिकादत्त व्यास के शब्दों में "लोकोत्तरआनंददाता प्रबंधक: काव्यानामभक्" जिस रचना का वचन कर लोकोत्तर आनंद की प्राप्ति हो, वही काव्य है। विश्वनाथ के मत में "रसात्मकं वाक्यं काव्यं" रसात्मक वाक्य ही काव्य हैं।
हिंदी के शिखर समालोचक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के मतानुसार कविता से मनुष्य-भाव की रक्षा होती है। सृष्टि के पदार्थ या व्यापार-विशेष को कविता इस तरह व्यक्त करती है मानो वे पदार्थ या व्यापार-विशेष नेत्रों के सामने नाचने लगते हैं। वे मूर्तिमान दिखाई देने लगते हैं। उनकी उत्तमता या अनुत्तमता का विवेचन करने में बुद्धि से काम लेने की जरूरत नहीं पड़ती। कविता की प्रेरणा से मनोवेगों के प्रवाह जोर से बहने लगते हैं। तात्पर्य यह कि कविता मनोवेगों को उत्तेजित करने का एक उत्तम साधन है। यदि क्रोध, करूणा, दया, प्रेम आदि मनोभाव मनुष्य के अन्तःकरण से निकल जाएँ तो वह कुछ भी नहीं कर सकता। कविता हमारे मनोभावों को उच्छवासित करके हमारे जीवन में एक नया जीव डाल देती है।
मेरे विचार से काव्य वह भावपूर्ण रसपूर्ण लयबद्ध रचना है जो मानवानुभूति को अभिव्यक्त कर पाठक-श्रोता के ह्रदय को प्रभावित क्र उसके मन में अलौकिक आनंद का संचार करती है। मानवानुभूति स्वयं की भी हो सकती है जैसे 'मैं नीर भरी दुःख की बदली, उमड़ी थी कल मिट आज चली .... ' नयनों में दीपक से जलते, पलकों में निर्झरिणी मचली - महादेवी वर्मा या किसी अन्य की भी हो सकती है यथा 'वह आता पछताता पथ पर आता, पेट-पीठ दोनों हैं मिलकर एक, चल रहा लकुटिया टेक, मुट्ठी भर दाने को, भूख मिटाने को, मुँह फ़टी पुरानी झोली का फैलाता -निराला। कविता कवि की अनुभूति को पाठकों - श्रोताओं तक पहुँचाती है। वह मानव जीवन की सरस् एवं हृदयग्राही व्याख्या कर लोकोत्तर आनंद की सृष्टि ही नहीं वृष्टि भी करती है। इह लोक (संसार) में रहते हुए भी कवि हुए पाठक या श्रोता अपूर्व भाव लोक में विचरण करने लगता है। काव्यानंद ही न हो तो कविता बेस्वाद या स्वाधीन भोजनकी तरह निस्सार प्रतीत होगी, तब उसे न कोई पढ़ना चाहेगा, न सुनना।
काव्यानंद क्या है? भारतीय काव्य शास्त्रियों ने काव्यानंद को परखने के लिए काव्यालोचन की ६ पद्धतियों की विवेचना की है जिन्हें १. रस पद्धति, २. अलंकार पद्धति, ३. रीति पद्धति, ४. वक्रोक्ति पद्धति, ५. ध्वनि पद्धति तथा ६. औचित्य पद्धति कहा गया है। साहित्य शास्त्र के प्रथम तत्वविद भरत तथा नंदिकेश्वर ने नाट्य शास्त्र में रूपक की विवेचना करते हुए रस को प्रधान तत्व कहा है। पश्चात्वर्ती आचार्य काव्य के बाह्य रूप या शिल्पगत तत्वों तक सीमित रह गए। दण्डी के अनुसार 'काव्यशोभाकरान् धर्मान् अलंकारान् प्रचक्षते' अर्थात काव्य की शोभा तथा धर्म अलंकार है। वामन रीति (विशिष्ट पद रचना, शब्द या भाव योजना) को काव्य की आत्मा कहा "रीतिरात्मा काव्यस्य"। कुंतक ने "वक्रोक्ति: काव्य जीवितं" कहकर उक्ति वैचित्र्य को प्रमुखता दी। ध्वनि अर्थात नाद सौंदर्य को आनंदवर्धन ने काव्य की आत्मा बताया "काव्यस्यात्मा ध्वनिरीति"। क्षेमेंद्र की दृष्टि में औचित्य ही काव्य रचना का प्रमुख तत्व है "औचित्यं रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितं"। भरत के मत का अनुमोदन करते हुए विश्वनाथ ने रस को काव्य की आत्मा कहा है। अग्नि पुराणकार "वाग्वैदग्ध्यप्रधानेsपि रस एवात्र जीवितं" कहकर रस को ही प्रधानता देता है। स्पष्ट है कि शब्द और अर्थ काव्य-पुरुष के आभूषण हैं जबकि रस उसकी आत्मा है।
शिल्प पर कथ्य को वरीयता देने की यह सनातन परंपरा जीवित है युवा कवयित्री सुनीता सिंह के काव्य संग्रह 'ओस की बूँद' में। सुनीता परंपरा का निर्वहन मात्र नहीं करतीं, उसे जीवंतता भी प्रदान करती हैं। ईश वंदना से श्री गणेश करने की विरासत को ग्रहण करते हुए 'शिव धुन' में वे जगतपिता से सकल शूल विनाशन की प्रार्थना करती हैं -
पाशविमोचन भव गणनाथन! कर दो सारे शूल विनाशन॥
महाकाल सुरसूदन कवची!
पीड़ा तक परिणति जा पहुँची।
गिरिधन्वा गिरिप्रिय कृतिवासा!
दे दो हिय में आन दिलासा ॥
पशुपतिनाथ पुरंदर पावन! कर दो सारे शूल विनाशन॥
पाशविमोचन भव गणनाथन! कर दो सारे शूल विनाशन॥
शिव राग और विराग को सम भाव से जीते हैं। कामारि होते हुए भी अर्धनारीश्वर हैं। शिवाराधिका को प्रणय का रेशमी बंधन लघुता में विराट की अनुभूति कराता है-
नाजुक सी रेशम डोरी से, मन के गहरे सागर में।
बांध रहे हो प्राण हमारे, प्रियतम किरणों के घर में।।
अंतरतम में चिर - परिचित सा,
अक्स उभरता किंचित सा।
सदियों का ये बंधन लगता,
लघुता में भी विस्तृत सा।।
अब तक की सारी सुलझन भी, उलझ गई इस मंजर में।
बांध रहे हो प्राण हमारे, प्रियतम किरणों के घर में।।
तुम मुझको याद आओगे, शीर्षक गीत श्रृंगार के विविध पक्षों को शब्दायित करते हैं।
सुनीता की नारी समाज के आहतों स्त्री-गौरव की अवहेलना देखकर आक्रोशित और दुखी होती है। "नहिं तव आदि मध्य अवसाना, अमित प्रभाव वेद नहिं जाना" कहकर नारी की वंदना करनेवाले समाज में बालिका भ्रूण हत्या का महापाप होते देख कवयित्री 'कन्या भ्रूण संवाद' में अपनी मनोवेदना को मुखर करती है -
चलती साँस पर भी चली जब,
कैचियों की धारियां, ये तो बताओ।
एक-एक कर कट रहे सभी,
अंग की थी बारियाँ, ये तो सुनाओ।
फिर मौन चीखो से निकलता,
आह का होगा धुआं, क्या कह सकोगी?
क्या सोच कर, आयी यहाँ पर,
और क्या तुमको मिला, क्या कह सकोगी?
इस संकलन का वैशिष्ट्य उन पहलुओं को स्पर्श करना है जो प्राय: गीतकारों की दृष्टि से ओझल हो जाते हैं। काम काजी माँ के बच्चे की व्यथा कथा कहता गीत 'खड़ा गेट पर' मर्मस्पर्शी है -
खड़ा गेट पर राह तुम्हारी, देखा करता हूँ मैं माँ ।
शाम हो गई अब आओगी, ऑफिस से जानू मैं माँ ॥
रोज सवेरे मुझे छोड़ कर,
कैसे आखिर जाती हो
कैसे मेरे रोने पर भी,
तुम खुद को समझाती हो ?
बिना तुम्हारे दिन भर रहना, बहुत अखरता मुझको माँ ।
खड़ा गेट पर राह तुम्हारी, देखा करता हूँ मैं माँ ॥
सावन को मनभावन कहा गया है। सुनीता सावन को अपनी ही दृष्टि से देखती हैं। सावनी बौछारों से मधु वर्षण, मृदा का रससिक्त होना, कण-कण में आकर्षण, पत्तों का धुलना, अवयवों का नर्तन करना, धरा का हरिताम्बरा होना गीत को पूर्णता प्रदान करता है।
मृदा आसवित, वर्षा जल को,
अंतःतल ले जाती।
तृण की फैली, दरी मखमली,
भीग ओस से जाती।
बादल से घन, छनकर दशहन, निर्झर झरते जाते।
हर क्षण कण-कण, में आकर्षण, सरगम भरते जाते।
गीतिकाव्य का उद्गम दर्द या पीड़ा से मान्य है। कवयित्री अंतिम खत कोरा रखकर अर्थात कुछ न कहकर भी सब कुछ कह देने को ही काव्य कला का चरम मानती हैं। ग़ालिब कहते हैं 'दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना'। अति क्रंदन के पार उतर कर ही दिल को हँसते पाती हैं।
शब्दहीन था कोरा-कोरा, मौन पीर का था गठजोरा।
इतना पीड़ा ने झकझोरा, छोड़ दिया अंतिम खत कोरा।।
अंधियारे में बादल बनकर,
अखियाँ बरसीं अंतस कर तर।
राहें सूझें भी तो कैसे
जड़ जब होती रूह सिहरकर।।
अति क्रंदन के पार उतर ही, खोल हँसा दिल पोरा- पोरा।
'हृदय तल के गहरे समंदर में तैरें, / ये ख्वाबों की मीने मचलती बड़ी हैं' , 'मैं लिखती नहीं गीत लिख जाता है' , 'दर्द का मोती सजाए / ह्रदय की सीपी लहे', 'क्षण-प्रतिक्षण नूतन परिवर्तन / विस्मय करते नित दृग लोचन', 'प्रीत चुनरिया सिर पर ओढ़ी / बीच रंग के कोरी थोड़ी', 'झंझा की तम लपटों से, लड़कर भी जीना सीखो / तीखा मीठा जो भी है, जीवन रस पीना सीखो', 'सन सनन सन वायु लहरे, घन घनन घन मेघ बरसे / मन मयूरा पंख खोले', मौसमों को देख हरसे', 'तकते - तकते नयना थकते, मन सागर बीहड़ मथते, प्राण डगर अमृत वर्षा के, धुंध भरी पीड़ा चखते' जैसी अभिव्यक्तियाँ आश्वस्त करती हैं कि कवयित्री सुनीता का गीतकार क्रमश: परिपक्व हो रहा है। गीत की कहन और ग़ज़ल की तर्ज़े-बयानी के अंतर को समझकर और अलग-अलग रखकर रचे ेगयी रचनाएँ अपेक्षाकृत अधिक प्रभावमय हैं।
इन गीतों में भक्ति काल और रीतिकाल को गलबहियां डाले देखना सुखद है। सरस्वती, शिव, राम, कृष्ण आदि पर केंद्रित रचनाओं के साथ 'प्रीत तेरी मान मेरा, रूह का परिधान है / हाथ तेरा हाथ में जब, हर सफर आसान है', 'देख छटा मौसम की मन का, मयूर - नर्तन करता है' जैसी अंतर्मुखी अभिव्यक्तियों के साथ बहिर्मुखता का गंगो-जमुनी सम्मिश्रण इन गीतों को पठनीय और श्रणीय बनाता है।
कर में लेकर, गीली माटी,
अगर कहो तो।
नव प्रयोग भी, करने होंगे
माटी की संरचनाओं में।
सांचे लेकर, कुम्हारों के
रंग भरेंगे घटनाओं में।
किरण-किरण को, भर कण-कण में
रौशन भी कर, दूं रज खाटी,
अगर कहो तो।
यह देखना रुचिकर होगा कि सुनीता की यह सृजन यात्रा भविष्य में किस दिशा में बढ़ती है? वे पारम्परिक गीत ही रचती हैं या नवगीत की और मुड़ती हैं। उनमें संवेदना, शब्द भंडार तथा अभिव्यक्ति सामर्थ्य की त्रिवेणी प्रवाहित हो रही है। इन रचनाओं में व्यंग्योक्ति और वक्रोक्ति की अनुपस्थिति है जो नवगीत हेतु आवश्यक है। सुनीता की भाषा प्रकृति से ही आलंकारिक है। उन्हें अलंकार ठूँसना नहीं पड़ते, स्वाभाविक रूप से अनुप्रास, रूपक, उपमा, उत्प्रेक्षा अपनी छटा बखेरते हैं। प्रसाद गुण सम्पन्न भाषा गीतों को माधुर्य देती है। युवा होते हुए भी अतिरेकी 'स्त्री विमर्श', राजनैतिक परिदृश्य और अनावश्यक विद्रोह से बच पाना उनके धीर-गंभीर व्यक्तित्व के अनुकूल होने के साथ उनकी गीति रचनाओं को संतुलित और सारगर्भित बनाता है। मुझे विश्वास है यह संकलन पाठकों और समलीचकों दोनों के द्वारा सराहा जायेगा।
२ . २ . २०२०
===
एक दोहा
गौ भाषा को दूहकर, दोहा कर पय-पान।
छंद राज बन सच कहे, समझ बनो गुणवान।।
२ . २ . २०१८
***
द्विपदि (शेर)
*
औरों की ताकिए न 'सलिल' आप घूम-घूम
बीबी, बहिन, दौलत कभी अपनी निहारिए
*
सिंदूर-तेल पोत देव हो गये पत्थर
धंधा ये ब्यूटीपार्लर का आज का नहीं
*
आखर ही आखिरी में रहा आदमी के साथ
बाकी कलम-दवात से रिश्ते फना हुए
*
जिसको न अपने आप पर विश्वास रह गया
वो आसरा तलाश खुद ही दास हो गया
*
हर हसीं हँसी न होगी दिलरुबा कभी
दिल पंजीरी नहीं जो हर को आप बाँट दें
*
औरों से पूछताछ की तूने बहुत 'सलिल'
खुद अपने आप से भी कभी बातचीत कर
***
रसानंद दे छंद नर्मदा १५ : हरिगीतिका हरिगीतिका X 4 = 11212 की चार बार आवृत्ति
दोहा, आल्हा, सार ताटंक,रूपमाला (मदन),चौपाई, छंदों से साक्षात के पश्चात् अब मिलिए हरिगीतिका से.
हरिगीतिका मात्रिक सम छंद हैं जिसके प्रत्येक चरण में २८ मात्राएँ होती हैं । यति १६ और १२ मात्राओं पर होती है। पंक्ति के अंत में लघु और गुरु का प्रयोग होता है। भिखारीदास ने छन्दार्णव में गीतिका नाम से 'चार सगुण धुज गीतिका' कहकर हरिगीतिका का वर्णन किया है। हरिगीतिका के पारम्परिक उदाहरणों के साथ कुछ अभिनव प्रयोग, मुक्तक, नवगीत, समस्यापूर्ति (शीर्षक पर रचना) आदि नीचे प्रस्तुत हैं।
छंद विधान:
०१. हरिगीतिका २८ मात्रा का ४ समपाद मात्रिक छंद है।
०२. हरिगीतिका में हर पद के अंत में लघु-गुरु ( छब्बीसवी लघु, सत्ताइसवी-अट्ठाइसवी गुरु ) अनिवार्य है।
०३. हरिगीतिका में १६-१२ या १४-१४ पर यति का प्रावधान है।
०४. सामान्यतः दो-दो पदों में समान तुक होती है किन्तु चारों पदों में समान तुक, प्रथम-तृतीय-चतुर्थ पद में समान तुक भी हरिगीतिका में देखी गयी है।
०५. काव्य प्रभाकरकार जगन्नाथ प्रसाद 'भानु' के अनुसार हर सतकल अर्थात चरण में (11212) पाँचवी, बारहवीं, उन्नीसवीं तथा छब्बीसवीं मात्रा लघु होना चाहिए। कविगण लघु को आगे-पीछे के अक्षर से मिलकर दीर्घ करने की तथा हर सातवीं मात्रा के पश्चात् चरण पूर्ण होने के स्थान पर पूर्व के चरण काअंतिम दीर्घ अक्षर अगले चरण के पहले अक्षर या अधिक अक्षरों से संयुक्त होकर शब्द में प्रयोग करने की छूट लेते रहे हैं किन्तु चतुर्थ चरण की पाँचवी मात्रा का लघु होना आवश्यक है।
मात्रा बाँट: I I S IS S SI S S S IS S I I IS या ।। ऽ। ऽ ऽ ऽ।ऽ।।ऽ। ऽ ऽ ऽ। ऽ
कहते हुए यों उत्तरा के नेत्र जल से भर गए ।
हिम के कणों से पूर्ण मानो हो गए पंकज नए ॥
उदाहरण :
०१. मम मातृभूमिः भारतं धनधान्यपूर्णं स्यात् सदा।
नग्नो न क्षुधितो कोऽपि स्यादिह वर्धतां सुख-सन्ततिः।
स्युर्ज्ञानिनो गुणशालिनो ह्युपकार-निरता मानवः,
अपकारकर्ता कोऽपि न स्याद् दुष्टवृत्तिर्दांवः ॥
०२. निज गिरा पावन करन कारन, राम जस तुलसी कह्यो. (रामचरित मानस)
(यति १६-१२ पर, ५वी मात्रा दीर्घ, १२ वी, १९ वी, २६ वी मात्राएँ लघु)
०३. दुन्दुभी जय धुनि वेद धुनि, नभ नगर कौतूहल भले. (रामचरित मानस)
(यति १४-१४ पर, ५वी मात्रा दीर्घ, १२ वी, १९ वी, २६ वी मात्राएँ लघु)
०४. अति किधौं सरित सुदेस मेरी, करी दिवि खेलति भली। (रामचंद्रिका)
(यति १६-१२ पर, ५वी-१९ वी मात्रा दीर्घ, १२ वी, २६ वी मात्राएँ लघु)
०५. जननिहि बहुरि मिलि चलीं उचित असीस सब काहू दई। (रामचरित मानस)
(यति १६-१२ पर, १२ वी, २६ वी मात्राएँ दीर्घ, ५ वी, १९ वी मात्राएँ लघु)
०६. करुना निधान सुजान सील सनेह जानत रावरो। (रामचरित मानस)
(यति १६-१२ पर, ५ वी, १२ वी, १९ वी, २६ वी मात्राएँ लघु)
०७. इहि के ह्रदय बस जानकी जानकी उर मम बास है। (रामचरित मानस)
(यति १६-१२ पर, ५ वी, १२ वी, २६ वी मात्राएँ लघु, १९ वी मात्रा दीर्घ)
०८. तब तासु छबि मद छक्यो अर्जुन हत्यो ऋषि जमदग्नि जू।(रामचरित मानस)
(यति १६-१२ पर, ५ वी, २६ वी मात्राएँ लघु, १२ वी, १९ वी मात्राएँ दीर्घ)
०९. तब तासु छबि मद छक्यो अर्जुन हत्यो ऋषि जमदग्नि जू।(रामचंद्रिका)
(यति १६-१२ पर, ५ वी, २६ वी मात्राएँ लघु, १२ वी, १९ वी मात्राएँ दीर्घ)
१०. जिसको न निज / गौरव तथा / निज देश का / अभिमान है।
वह नर नहीं / नर-पशु निरा / है और मृतक समान है। (मैथिलीशरण गुप्त )
(यति १६-१२ पर, ५ वी, १२ वी, १९ वी, २६ वी मात्राएँ लघु)
११. जब ज्ञान दें / गुरु तभी नर/ निज स्वार्थ से/ मुँह मोड़ता।
तब आत्म को / परमात्म से / आध्यात्म भी / है जोड़ता।।(संजीव 'सलिल')
अभिनव प्रयोग:
हरिगीतिका मुक्तक:
पथ कर वरण, धर कर चरण, थक मत चला, चल सफल हो.
श्रम-स्वेद अपना नित बहा कर, नव सृजन की फसल बो..
संचय न तेरा साध्य, कर संचय न मन की शांति खो-
निर्मल रहे चादर, मलिन हो तो 'सलिल' चुपचाप धो..
*
करता नहीं, यदि देश-भाषा-धर्म का, सम्मान तू.
धन-सम्पदा, पर कर रहा, नाहक अगर, अभिमान तू..
अभिशाप जीवन बने तेरा, खो रहा वरदान तू-
मन से असुर, है तू भले, ही जन्म से इंसान तू..
*
करनी रही, जैसी मिले, परिणाम वैसा ही सदा.
कर लोभ तूने ही बुलाई शीश अपने आपदा..
संयम-नियम, सुविचार से ही शांति मिलती है 'सलिल'-
निस्वार्थ करते प्रेम जो, पाते वही श्री-संपदा..
*
धन तो नहीं, आराध्य साधन मात्र है, सुख-शांति का.
अति भोग सत्ता लोभ से, हो नाश पथ तज भ्रान्ति का..
संयम-नियम, श्रम-त्याग वर, संतोष कर, चलते रहो-
तन तो नहीं, है परम सत्ता उपकरण, शुचि क्रांति का..
*
करवट बदल ऋतुराज जागा विहँस अगवानी करो.
मत वृक्ष काटो, खोद पर्वत, नहीं मनमानी करो..
ओजोन है क्षतिग्रस्त पौधे लगा हरियाली करो.
पर्यावरण दूषित सुधारो अब न नादानी करो..
*
उत्सव मनोहर द्वार पर हैं, प्यार से मनुहारिए.
पथ भोर-भूला गहे संध्या, विहँसकर अनुरागिए ..
सबसे गले मिल स्नेहमय, जग सुखद-सुगढ़ बनाइए.
नेकी विहँसकर कीजिए, फिर स्वर्ग भू पर लाइए..
*
हिल-मिल मनायें पर्व सारे, बाँटकर सुख-दुःख सभी.
जलसा लगे उतरे धरा पर, स्वर्ग लेकर सुर अभी.
सुर स्नेह के छेड़ें अनवरत, लय सधे सद्भाव की.
रच भावमय हरिगीतिका, कर बात नहीं अभाव की..
*
त्यौहार पर दिल मिल खिलें तो, बज उठें शहनाइयाँ.
मड़ई मेले फेसटिवल या हाट की पहुनाइयाँ..
सरहज मिले, साली मिले या संग हों भौजाइयाँ.
संयम-नियम से हँसें-बोलें, हो नहीं रुस्वाइयाँ..
*
कस ले कसौटी पर 'सलिल', खुद आप निज प्रतिमान को.
देखे परीक्षाकर, परखकर, गलतियाँ अनुमान को..
एक्जामिनेशन, टेस्टिंग या जाँच भी कर ले कभी.
कविता रहे कविता, यही है, इम्तिहां लेना अभी..
*
अनुरोध विनती निवेदन है व्यर्थ मत टकराइए.
हर इल्तिजा इसरार सुनिए, अर्ज मत ठुकराइए..
कर वंदना या प्रार्थना हों अजित उत्तम युक्ति है.
रिक्वेस्ट है इतनी कि भारत-भक्ति में ही मुक्ति है..
*
समस्यापूर्ति
बाँस (हरिगीतिका)
*
रहते सदा झुककर जगत में सबल जन श्री राम से
भयभीत रहते दनुज सारे त्रस्त प्रभु के नाम से
कोदंड बनता बाँस प्रभु का तीर भी पैना बने
पतवार बन नौका लगाता पार जब अवसर पड़े
*
बँधना सदा हँस प्रीत में, हँसना सदा तकलीफ में
रखना सदा पग सीध में, चलना सदा पग लीक में
प्रभु! बाँस सा मन हो हरा, हो तीर तो अरि हो डरा
नित रीत कर भी हो भरा, कस लें कसौटी हो खरा
*
नवगीत:
*
पहले गुना
तब ही चुना
जिसको ताजा
वह था घुना
*
सपना वही
सबने बना
जिसके लिए
सिर था धुना
*
अरि जो बना
जल वो भुना
वह था कहा
सच जो सुना
.
(प्रयुक्त छंद: हरिगीतिका)
नवगीत:
*
करना सदा
वह जो सही
*
तक़दीर से मत हों गिले
तदबीर से जय हों किले
मरुभूमि से जल भी मिले
तन ही नहीं मन भी खिले
वरना सदा
वह जो सही
भरना सदा
वह जो सही
*
गिरता रहा, उठता रहा
मिलता रहा, छिनता रहा
सुनता रहा, कहता रहा
तरता रहा, मरता रहा
लिखना सदा
वह जो सही
दिखना सदा
वह जो सही
*
हर शूल ले, हँस फूल दे
यदि भूल हो, मत तूल दे
नद-कूल को पग-धूल दे
कस चूल दे, मत मूल दे
सहना सदा
वह जो सही
तहना सदा
वह जो सही
*
(प्रयुक्त छंद: हरिगीतिका )
२ . २ . २०१६
***

रविवार, 1 फ़रवरी 2026

फरवरी १, सॉनेट, माहिया, हास्य, नीबू, उल्लाला गीत, रोल, दोहा, कुण्डलिया, मुक्तिका, गीत, मुक्तक

सलिल सृजन फरवरी १

फरवरी कब?-क्या??
भारतीय तटरक्षक दिवस ४६ वाँ
- विश्व आर्द्रभूमि दिवस का आयोजन आर्द्रभूमि की महत्त्वपूर्ण भूमिका के बारे में वैश्विक जागरूकता बढ़ाने के लिये किया जाता है। इसी दिन वर्ष १९७१ में ईरान के शहर रामसर में कैस्पियन सागर के तट पर आर्द्रभूमि पर एक अभिसमय (Convention on Wetlands) को अपनाया गया था। विश्व आर्द्रभूमि दिवस पहली बार २ फरवरी १९९७ को रामसर सम्मेलन के १६ वर्ष पूरे होने पर मनाया गया था।
- आरए जागरूकता दिवस रुमेटीइड गठिया जागरूकता दिवस पीड़ित रोगियों में जागरूकता फैलाने के लिए मनाया जाता है।
- सूरजकुंड शिल्प मेला २ फरवरी से १८ फरवरी २०२४ तक सूरजकुंड, जिला फरीदाबाद, हरियाणा में है। यह भारतीय लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत का उत्सव है। हरियाणा पर्यटन विभाग द्वारा हर साल दिल्ली के पास सूरजकुंड में आयोजित इस मेले में भारत के हस्तशिल्प, हथकरघा और सांस्कृतिक ताने-बाने की समृद्धि और विविधता देखने को मिलती है।
- राष्ट्रीय गोल्डन रिट्रीवर दिवस गोल्डन रिट्रीवर श्वान अपने शांत स्वभाव, बुद्धिमत्ता और चंचलता के कारण उत्सव और प्रशंसा का कारण हैं।
- विश्व कैंसर दिवस WHO द्वारा लोगों को कैंसर बीमारी के बारे में जागरूक करने के लिएमनाया जाता है।
- श्रीलंका का राष्ट्रीय दिवस ४ फरवरी १९४८ को श्रीलंका को ब्रिटिश शासन से आजादी मिली थी।
- ३८ वाँ अंतरराष्ट्रीय विकास सप्ताह (४ - १२ फरवरी) अंतरराष्ट्रीय विकास क्षेत्र में विभिन्न भूमिकाओं व करियर पथों संबंधी जानकारी देता है।
- महिला जननांग विकृति के प्रति शून्य सहनशीलता का अंतरराष्ट्रीय दिवस लोगों को जननांग विकृति के कारण होने वाले परिणामों और समस्याओं के बारे में शिक्षित करने के लिए मनाया जाता है।
७ - १४ फरवरी
- वैलेंटाइन वीक फरवरी को प्यार का महीना कहते हैं। वैलेंटाइन वीक आरंभ ७ फरवरी से, मुख्य वैलेंटाइन डे १४ फरवरी।
- सुरक्षित इंटरनेट दिवस इंटरनेट को सभी के लिए सुरक्षित और बेहतर जगह बनाने का आह्वान करता है।
९ - बाबा आमटे की पुण्य तिथि कुष्ठ रोग से पीड़ित लोगों के पुनर्वास और सशक्तिकरण के लिए स्मरणीय।
१०
- राष्ट्रीय कृमि मुक्ति दिवस प्रत्येक बच्चे को कृमि मुक्त बनाने के लिए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय भारत सरकार की एक पहल।
- विश्व दलहन दिवस दालों के पोषण और पर्यावरणीय लाभों के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए।
११
- विश्व बीमार दिवस पोप जॉन पॉल द्वितीय द्वारा विश्वासियों द्वारा बीमारी से पीड़ित लोगों के लिए प्रार्थना करने के लिए।
- विज्ञान में महिलाओं और लड़कियों का अंतरराष्ट्रीय दिवस महिलाओं और लड़कियों के लिए विज्ञान तक पूर्ण और समान पहुंच और भागीदारी प्राप्त करने पर केंद्रित।
१२
- डार्विन दिवस १८०९ में विकासवादी जीव विज्ञान के जनक चार्ल्स डार्विन की जयंती। विकासवादी और पादप विज्ञान में डार्विन के योगदान पर प्रकाश हेतु । २०१५ में डार्विन की 'ओरिजिन ऑफ स्पीशीज़' इतिहास की सबसे प्रभावशाली अकादमिक पुस्तक चुनी गई।
- अब्राहम लिंकन का जन्मदिन
- राष्ट्रीय उत्पादकता दिवस भारत में उत्पादकता संस्कृति को बढ़ाने के लिएराष्ट्रीय उत्पादकता परिषद (एनपीसी) द्वारा।
- विश्व रेडियो दिवस जागरूकता बढ़ाने के लिए।
१३
- सरोजिनी नायडू जयंती १८७९ हैदराबाद, पिता वैज्ञानिक और दार्शनिक अघोरनाथ चट्टोपाध्याय-माँ बरदा सुंदरी देवी, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली भारतीय महिला अध्यक्ष, संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश) की पहली महिला राज्यपाल।
- अंतरराष्ट्रीय मिर्गी दिवस
१४
- संत वैलेंटाइन दिवस एक कैथोलिक पादरी जो तीसरी शताब्दी में रोम में रहते थे।
- विश्व जन्मजात हृदय दोष जागरूकता दिवस
१५
- विश्व मानव विज्ञान दिवस आम जनता को मानव विज्ञान के बारे में शिक्षित करने के लिए।
१७- २७
- ताज महोत्सव
२०
- अरुणाचल प्रदेश स्थापना दिवस
- मिजोरम स्थापना दिवस १९८७, २३ वाँ राज्य।
- विश्व सामाजिक न्याय दिवस उद्देश्य पूर्ण रोजगार प्राप्त करना और सामाजिक एकीकरण के लिए समर्थन प्राप्त करना।
२१
- अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस भाषा की विविधता और उसकी विविधता के प्रति जागरूकता हेतु। १९९९ में यूनेस्को द्वारा पहली घोषणा।
२२
- विश्व चिंतन दिवस १५० देशों में गर्ल स्काउट्स और गर्ल गाइड्स द्वारा मनाया जाता है।
२३
- विश्व शांति और समझ दिवस रोटरी इंटरनेशनल के उद्घाटन सम्मेलन की स्मृति में।
२४
- केंद्रीय उत्पाद शुल्क दिवस विभाग के कर्मचारियों को विनिर्माण व्यवसाय में भ्रष्टाचार को रोकने हेतु।
२७
- विश्व एनजीओ दिवस गैर-सरकारी और गैर-लाभकारी संगठनों को सम्मान देने के लिए।
२८
- राष्ट्रीय विज्ञान दिवस भारतीय भौतिक विज्ञानी सर चन्द्रशेखर वेंकट रमन द्वारा रमन प्रभाव की खोज १९२८ को चिह्नित करने के लिए। उन्हें १९३० में भौतिकी विषय में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
- दुर्लभ रोग दिवस आम लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए।
***
प्रात-गीत
सपने देखे सुंदर सुंदर
अब जग जाएँ रे!
भोर भई उठ जग को
मंगल गान सुनाएँ रे!
.
करतल बसते हैं विधि-हरि-हर
सुमिर प्रणाम करो रे सादर।
शारद-उमा-रमा में रमकर
नमन करो भू-नभ को, पगधर
सुख दे-पाएँ रे!
.
चित्रगुप्त प्रभु का मन-मंदिर
कर्म देव का यह तन है घर
काम करें हर प्रभु-अर्पण कर
फल जो-जितना उचित मानकर
प्रभु-यश गाएँ रे।
.
पंछी नाचें फुदक-चहककर
फूल खिल रहे नित्य महककर
हम क्यों दुर्बल व्यर्थ फिक्रकर
जीवन जैसा जिएँ हर्षकर
खुशी मनाएँ रे!
१.२.२०२६
०००
सॉनेट
उल्लू
*
एक ही उल्लू काफी था।
हर शाख पे उल्लू बैठा है।
केवल मन मंदिर बाकी था।।
भय कोरोना का पैसा है।।
सोहर बन्ना बन्नी गाने।
जुड़ने से हम कतराते हैं।
लाशें बिन काँध पड़ी रहतीं।।
हम बलिपंथी भय खाते हैं।।
हमसे नारे लगवालो तुम।
हम संसद में जा झगड़ेंगे।
कविताएँ सौ लिख लेंगे हम।।
हर दर पर नाकें रगड़ेंगे।।
उल्लू को उल्लू मत बोलो।
उल्लू वंदन कर यश ले लो।।
१-२-२०२२
•••
कार्यशाला
दोहा से कुण्डलिया
*
मन जब स्थिर है नहीं, तब क्या पूजा पाठ।
पढ़ा रही है जिन्दगी,सोलह दूनी आठ।। -सुनीता पांडेय 'सुरभि'
प्रथम चरण - ११ ११ ११ २ १२ = ११ मात्रा, १३ होनी चाहिए। 'स्थि' की मात्रा 'त्य' की तरह १ है।
'मन एकाग्र न हो अगर' या 'जब मन हो एकाग्र न तब' करने से अर्थ बदले बिना न्यून मात्रा दोष समाप्त किया जा सकता है।
दोहा
जब मन हो एकाग्र न तब, क्या पूजा क्या पाठ?
पढ़ा रही है ज़िंदगी, सोलह दूनी आठ।। -सुनीता पांडेय 'सुरभि'
रोला
सोलह दूनी आठ, पुत्र है पिता पिता का।
लगे गलत पर सत्य, लक्ष्य है जन्म चिता का।।
अपने गैर; गैर अपने, मन मत हो उन्मन।
सार्थक पूजा-पाठ, अगर एकाग्र रहे मन।। - संजीव
*
दोहा
आओ पर जाना नहीं, जाने का क्या काम।
नेह नर्मदा छोड़ कर, लें क्यों दूजा नाम।। -संतोष शुक्ला
रोला
लें क्यों दूजा नाम, एक जब पार लगाए।
गुरु-गोविंद प्रणाम, सिंधु भव पार कराए।।
मन में रख संतोष, सलिल नव गीत सुनाओ।
सरस भाव लय बिंब, गीत में भरकर गाओ।। - संजीव
***
माहिया
*
हो गई सुबह आना
उषा से सूर्य कहे
आकर फिर मत जाना
*
तुम साथ सदा देना
हाथ हाथ में ले
जीवन नौका खेना
*
मैं प्राण देह है तू
दो होकर भी एक
मैं प्रीत; नेह है तू
*
रस-भाव; अर्थ-आखर
गति-यति; रूप-अरूप
प्रकृति-पुरुष; वधु-वर
*
कारक किसका कौन?
जीव न जो संजीव
साध-साधना मौन
*
कौन कहाँ भगवान?
देह अगेह अजान
गुणमय ही गुणवान
*
सर्व व्याप्त ओंकार
वही एक आधार
मैं-तुम हम साकार
*
जीवन पूजन जान
नेह नर्मदा-स्नान
कर; तज निज-पर भान
*
मत अहंकार में डूब
गिरते झाड़-पहाड़
पर दूब खूब की खूब
१-२-२०२०
***
मुक्तक
शब्देश है, भावेश है, छ्न्देश मौन बसंत है
मिथलेश है, करुणेश है, कहिए न कौन बसंत है?
कांता है, कल्पना है, ज्योति, आभा-प्रभा भी
विनीता, मधु, मंजरी, शशि, पूर्णिमा बसंत है
*
वंदना है, प्रार्थना है, अर्चना बसंत है
साधना-आराधना है, सर्जना बसंत है
कामना है, भावना है, वायदा है, कायदा है
मत इसे जुमला कहो उपासना बसंत है
*
मन में लड्डू फूटते आया आज बसंत
गजल कह रही ले मजा लाया आज बसंत
मिली प्रेरणा शाल को बोली तजूं न साथ
सलिल साधना कर सतत छाया आज बसंत
*
मुश्किल से जीतेंगे कहता बसन्त हो
किंचित ना रीतेंगे कहता बसन्त हो
पत्थर को पिघलाकर मोम सदृश कर देंगे
हम न अभी बीतेंगे कहता बसन्त हो
*
अक्षर में, शब्दों में, बसता बसन्त हो
छंदों में, बन्दों में हँसता बसन्त हो
विरहा में नागिन सा डँसता बसन्त हो
साजन बन बाँहों में कसता बसन्त हो
*
अपना हो, सपना हो, नपना बसन्त हो
पूजा हो, माला को जपना बसन्त हो
मन-मन्दिर, गिरिजा, गुरुद्वारा बसन्त हो
जुम्बिश खा अधरों का हँसना बसन्त हो
*
साथ-साथ थाम हाथ ख्वाब में बसन्त हो
अँगना में, सड़कों पर, बाग़ में बसन्त हो
तन-मन को रँग दे बासंती रंग में विहँस
राग में, विराग में, सुहाग में बसन्त हो
*
श्वास-श्वास आस-आस झूमता बसन्त हो
मन्ज़िलों को पग तले चूमता बसन्त हो
भू-गगन हुए मगन दिग-दिगन्त देखकर
लिए प्रसन्नता अनंत घूमता बसन्त हो
१-२-२०१७
***
मुक्तिका
*
कौए अब तो बाज हुए
जुगनू कहते गाज हुए
*
चमरौधा भी सर चढ़कर
बोला हम तो ताज हुए
*
नाम मात्र के कपड़े ही
अब नारी की लाज हुए
*
कल के जिम्मे 'सलिल' सभी
जो करने हैं काज हुए
*
गूँगे गाते हैं ठुमरी
सुरविहीन सब साज हुए
***
मुक्तिका-
*
चुप नाज़नीं के कीजिए नखरे सभी कुबूल
वरना हिलेगी जिंदगी की एक-एक चूल
*
जो कह रहे, कर लो वही, क्या हर्ज़?, फर्ज़ है
आँखों में ख्वाब वस्ल का पल भर भी सके झूल
*
मुस्कान आतिशी मिले तो मान लेना मन
उनका हरेक लफ्ज़ बना जिंदगी का रूल
*
तकनीक प्यार की करो तकरार चंद पल
इज़हार हार का खिलाये धूल में भी फूल
*
हमने 'खलिश' को दिल में बसा सर लिया झुका
तुमने नजर चुरा 'सलिल' को कर लिया कबूल
***
मुक्तिका -
अपना रिश्ता ढहा मकान
आया तूफां उड़ा मचान
*
जिसमें गाहक कोई नहीं
दिल का नाता वही दूकान
*
आँसू, आहें, याद हसीं
दौलत मैं हूँ शाहजहान
*
गम गुम हो गर दुनिया से
कैसे ख़ुशी बने मेहमान?
*
अजय न होना युग-युग तक
विजय मिटाये बना निशान
१.२.२०१६
***
हास्य सलिला:
नीबू
*
फरमाइश मेहमान की सुन लालू हैरान
लालू पूछें: समस्या क्या है मेरी जान?
पल में हल कर दूँ कहो, फिर करने दो प्यार'
लाली तुनकी: 'हटो जी! बिगड़ेगा सिंगार
नीबू घर में है नहीं, रहे शिकंजी माँग
लाओ नीबू या नहीं व्यर्थ अड़ाओ टाँग'
लालू मुस्काए कहा: 'चिंता है बेकार
सौ नीबू की शक्ति ले आया है विम बार
दो बूँदें दो डाल फिर करो शिकंजी पेश'
लाली खीजी: 'आज लूँ नोच तुम्हारे केश?'
१.२.२०१४
***
अभिनव प्रयोग-
उल्लाला गीत:
जीवन सुख का धाम है
*
जीवन सुख का धाम है,
ऊषा-साँझ ललाम है.
कभी छाँह शीतल रहा-
कभी धूप अविराम है...*
दर्पण निर्मल नीर सा,
वारिद, गगन, समीर सा,
प्रेमी युवा अधीर सा-
हर्ष, उदासी, पीर सा.
हरी का नाम अनाम है
जीवन सुख का धाम है...
*
बाँका राँझा-हीर सा,
बुद्ध-सुजाता-खीर सा,
हर उर-वेधी तीर सा-
बृज के चपल अहीर सा.
अनुरागी निष्काम है
जीवन सुख का धाम है...
*
वागी आलमगीर सा,
तुलसी की मंजीर सा,
संयम की प्राचीर सा-
राई, फाग, कबीर सा.
स्नेह-'सलिल' गुमनाम है
जीवन सुख का धाम है...
१-२-२०१३
***