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शुक्रवार, 27 नवंबर 2015

laghukatha

लघुकथा 
बर्दाश्तगी  
*
एक शायर मित्र ने आग्रह किया कि मैं उनके द्वारा संपादित किये जा रहे हम्द (उर्दू काव्य-विधा जिसमें परमेश्वर की प्रशंसा में की गयी कवितायेँ) संकलन के लिये कुछ रचनाएँ लिख दूँ, साथ ही जिज्ञासा भी की कि  इसमें मुझे, मेरे धर्म या मेरे धर्मगुरु को आपत्ति तो न होगी? मैंने तत्काल सहमति देते हुए कहा कि यह तो मेरे लिए ख़ुशी का वायस (कारण) है 

कुछ दिन बाद मित्र आये तो मैंने लिखे हुए हम्द सुनाये, उन्होंने प्रशंसा की और ले गये 

कई दिन यूँ ही बीत गये, कोई सूचना न मिली तो मैंने समाचार पूछा, उत्तर मिला वे सकुशल हैं पर किताब के बारे में मिलने पर बताएँगे। एक दिन वे आये कुछ सँकुचाते हुए। मैंने कारण पूछा तो बताया कि उन्हें मना कर दिया गया है कि अल्लाह के अलावा किसी और की तारीफ में हम्द नहीं कहा जा सकता जबकि मैंने अल्लाह के साथ- साथ चित्रगुप्त जी, शिव जी, विष्णु जी, ईसा मसीह, गुरु नानक, दुर्गा जी, सरस्वती जी, लक्ष्मी जी, गणेश जी व भारत माता पर भी हम्द लिख दिये थे। कोई बात नहीं, आप केवल अल्लाह पर लिख हम्द ले लें। उन्होंने बताया कि किसी गैरमुस्लिम द्वारा अल्लाह पर लिख गया हम्द भी क़ुबूल नहीं किया गया

किताब तो आप अपने पैसों से छपा रहे हैं फिर औरों का मश्वरा मानें या न मानें यह तो आपके इख़्तियार में है -मैंने पूछा

नहीं, अगर उनकी बात नहीं मानूँगा तो मेरे खिलाफ फतवा जारी कर  हुक्का-पानी बंद दिया जाएगा। कोई मेरे बच्चों से शादी नहीं करेगा -वे चिंताग्रस्त थे। 

अरे भाई! फ़िक्र मत करें, मेरे लिखे हुए हम्द लौटा दें, मैं कहीं और उपयोग कर लूँगा। मैंने उन्हें राहत देने के लिए कहा

उन्हें तो कुफ्र कहते हुए ज़ब्त कर लिया गया। आपकी वज़ह से मैं भी मुश्किल में पड़ गया -वे बोले

कैसी बात करते हैं? मैं आप के घर तो गया नहीं था, आपकी गुजारिश पर ही मैंने लिखे, आपको ठीक न लगते तो तुरंत वापिस कर देते। आपके यहां के अंदरूनी हालात से मुझे क्या लेना-देना? मुझे थोड़ा गरम होते देख वे जाते-जाते फिकरा कस गये 'आप लोगों के साथ यही मुश्किल है, बर्दाश्तगी का माद्दा ही नहीं है।' 

***

दिव्य नर्मदा हिंदी पत्रिका divyanarmada Hindi patrika : sahishnuta

दिव्य नर्मदा हिंदी पत्रिका divyanarmada Hindi patrika : sahishnuta: अब तो मानेंगे कि देश में घट रही है सहिष्णुता -  * सहिष्णुता के प्रश्न पर आक्रामकता अख्तियार करनेवाले और अभद्र भाषा बोलनेवाले अब बगल...

sahishnuta

अब तो मानेंगे कि देश में घट रही है सहिष्णुता - 
*

सहिष्णुता के प्रश्न पर आक्रामकता अख्तियार करनेवाले और अभद्र भाषा बोलनेवाले अब बगलें झाँकते नजर आयेंगे। पिछले दिनों विश्वख्यात संगीतकार ए. आर. रहमान ने उनके खिलाफ फतवा जरी होने की घटना का ज़िक्र कर सहिष्णुता कम होने की शिकायत की। लोगों को नज़रें आमिर की बात पर दिए गए समर्थन पर टिक गयीं किन्तु फतवे की बात भूल गये। क्या बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद् इस फतवे के समर्थन में है? यदि नहीं हैं तो खुलकर बोलते क्यों नहीं? इतना ही डर लगता है तो चुप रहें वातावरण ख़राब न करें।
केरल की एक महिला पत्रकार वीपी राजीना जमात-ए-इस्लामी के मलयाली दैनिक मध्यमम में उप-संपादक हैं। उन्होंने 21 नवंबर २०१५ को फेसबुक पर कोझीकोड के सुन्नी मदरसा में लड़कों के साथ उस्ताद (टीचर) द्वारा यौन शोषण का मामला उठाया तथा जिसमें उन्होंने मदरसे में अपनी दो दशक पहले की जिंदगी का हवाला देते हुए लिखा था कि कैसे मदरसों में टीचर छात्रों का यौन उत्पीड़न करते थे? उन्होंने लिखा, ‘जब मैं पहली क्लास में पहली बार मदरसे गई तो वहाँ मौजूद अधेड़ शिक्षक ने पहले तो सभी लड़कों को खड़ा किया और बाद में उन्हें पैंट खोलकर बैठने को कहा। इसके बाद वह हर सीट पर गये और और गलत इरादे से उनके प्राइवेट पार्ट को छुआ। राजीना ने दावा किया, ‘उन्होंने यह काम आखिरी छात्र को छेड़ने के बाद ही बंद किया। राजीना ने यह भी कहा था कि खुद उन्होंने मदरसा में 6 साल तक पढ़ाई की और वे जानती थीं कि उस्ताद लड़कियों को भी नहीं बख्शते थे। उन्होंने इस मामले में एक घटना का जिक्र भी किया, जिसमें बताया कि किस तरह से एक उम्रदराज उस्ताद (टीचर) ने बिजली गुल होने के दौरान क्लास में नाबालिग लड़कियों के साथ अभद्र व्यवहार किया था। ज्या‍दातर छात्राएं डर की वजह से कुछ नहीं बोलती थीं। कोई छात्र या छात्रा आवाज उठाने की कोशिश करता भी था तो उसे धमकी दे कर डराया धमकाया जाता था।

इस पोस्ट के बाद राजीना मुस्लिम कट्टरपंथियों के निशाने पर आ गई हैं, न केवल उनके फेसबुक अकाउंट को ब्लॉक करा दिया गया बल्कि मुस्लिम कट्टरपंथियों से लगातार जान से मारने की धमकियाँ भी मिल रही हैं। क्या इस बहादुर महिला पत्रकार और रहमान के साथ खड़े होने की हिम्मत दिखा सकेंगे हम भारतीय??
इस जज्बे और हौसले को सलाम।

गुरुवार, 26 नवंबर 2015

tulyayogita alankar

अलंकार सलिला: ३२ 

तुल्ययोगिता अलंकार


तुल्ययोगिता में क्रिया, या गुण मिले समान 
*


*


जब उपमेयुपमान में, क्रिया साम्य हो मित्र.

तुल्ययोगिता का वहाँ, अंकित हो तब चित्र.

तुल्ययोगिता में क्रिया, या गुण मिले समान.

एक धर्म के हों 'सलिल', उपमेयो- उपमान..

जिन अलंकारों में क्रिया की समानता का चमत्कारपूर्ण वर्णन होता है, वे क्रिया साम्यमूलक अलंकार कहे जाते हैं 
ये पदार्थगत या गम्यौपम्याश्रित अलंकार भी कहे जाते हैं. इस वर्ग का प्रमुख अलंकार तुल्ययोगिता अलंकार है

जहाँ प्रस्तुतों और अप्रस्तुतों या उपमेयों और उपमानों में गुण या क्रिया के आधार पर एक धर्मत्व की स्थापना  

की जाए वहाँ तुल्ययोगिता अलंकार होता है 

जब अनेक प्रस्तुतों या अनेक अप्रस्तुतों को एक ही (सामान्य / कॉमन) धर्म से अन्वित किया जाए तो वहाँ तुल्य 

योगिता अलंकार होता है


उदाहरण:

१. गुरु रघुपति सब मुनि मन माहीं। मुदित भये पुनि-पुनि पुलकाहीं

यहाँ विश्वामित्र जी, राम जी, और मुनियों इस सभी प्रस्तुतों का एक समान धर्म मुदित और पुलकित होना है 

२. सब कर संसय अरु अज्ञानू । मंद महीपन्ह कर अभिमानू

    भृगुपति केरि गरब-गरुआई। सुर-मुनिबरन्ह केरि कदराई 

    सिय कर सोच जनक पछितावा। रानिन्ह कर दारुन दुःख-दावा

    संभु-चाप बड़ बोहित पाई। चढ़े जाइ सब संग बनाई

यहाँ अनेक अप्रस्तुतों (राजाओं, परशुराम, देवतनों, मुनियों, सीता, जनक, रानियों) का एक समान धर्म शिव धनुष रूपी 

जहाज पर चढ़ना है राम ने शिव धनुष भंग किया तो सब यात्री अर्थात भय के कारण (सबका संशय और अज्ञान, 

दुष्ट राजाओं का अहंकार, परशुराम का अहं, देवों  व मुनियों का डर, सीता की चिंता, जनक का पश्चाताप, रानियों 

की दुखाग्नि) नष्ट हो गये

३. चन्दन, चंद, कपूर नव, सित अम्भोज तुषार 
    
    तेरे यश के सामने, लागें मलिन अपार

यहाँ चन्दन, चन्द्रमा, कपूर तथा श्वेत कमल व तुषार इन अप्रस्तुतों (उपमानों) का एक ही धर्म 'मलिन लगना' है

४. विलोक तेरी नव रूप-माधुरी, नहीं किसी को लगती लुभावनी
   
    मयंक-आभा, अरविंद मालिका, हंसावली, हास-प्ररोचना उषा

यहाँ कई अप्रस्तुतों का एक ही धर्म 'लुभवना न लगना' है 

५. कलिंदजा के सुप्रवाह की छटा, विहंग-क्रीड़ा, कलनाद माधुरी

    नहीं बनाती उनको विमुग्ध थीं, अनूपता कुञ्ज-लता-वितान की

६. सरोवरों की सुषमा, सुकंजता सुमेरु की, निर्झर की सुरम्यता

    न थी यथातथ्य उन्हें विमोहती, अनंत-सौंदर्यमयी वनस्थली

७. नाग, साँप, बिच्छू खड़े, जिसे करें मतदान

   वह कुर्सी पा दंश दे, लूटे कर अभिमान

तुल्ययोगिता अलंकार के चार प्रमुख  प्रकार हैं-

अ. प्रस्तुतों या उपमेयों की एकधर्मता:

१. मुख-शशि निरखि चकोर अरु, तनु पानिप लखु मीन

    पद-पंकज देखत भ्रमर, होत नयन रस-लीन

२. रस पी कै सरोजन ऊपर बैठि दुरेफ़ रचैं बहु सौंरन कों

    निज काम की सिद्धि बिचारि बटोही चलै उठि कै चहुं ओरन को

    सब होत सुखी रघुनाथ कहै जग बीच जहाँ तक जोरन को

    यक सूर उदै के भए दुःख होत चोरन और चकोरन को

आ. अप्रस्तुतों या उपमानों में एकधर्मता:

१. जी के चंचल चोर सुनि, पीके मीठे बैन

    फीके शुक-पिक वचन ये, जी के लागत हैं न

२. बलि गई लाल चलि हूजिये निहाल आई हौं लेवाइ कै यतन बहुबंक सों

    बनि आवत देखत ही बानक विशाल बाल जाइ न सराही नेक मेरी मति रंक सों

    अपने करन करतार गुणभरी कहैं रघुनाथ करी ऐसी दूषण के संक सों

    जाकी मुख सुषमा की उपमा से न्यारे भए जड़ता सो कमल कलानिध कलंक सों

इ. गुणों की उत्कृष्टता में प्रस्तुत की एकधर्मिता:

१. शिवि दधीचि के सम सुयस इसी भूर्ज तरु ने लिया

    जड़ भी हो कर के अहो त्वचा दान इसने दिया

यहाँ भूर्ज तरु को शिवि तथा दधीचि जैसे महान व्यक्तियों के समान उत्कृष्ट गुणोंवाला बताया गया है

ई. हितू और अहितू दोनों के साथ व्यवहार में एकधर्मता:

१. राम भाव अभिषेक समै जैसा रहा,

   वन जाते भी समय सौम्य वैसा रहा

   वर्षा हो या ग्रीष्म सिन्धु रहता वही,

   मर्यादा की सदा साक्षिणी है मही

२. कोऊ काटो क्रोध करि, कै सींचो करि नेह

    बढ़त वृक्ष बबूल को, तऊ दुहुन की देह
                                                                             ..... निरंतर 

******

गीत

एक रचना:
*
चढ़ा, बैठ फिर उतर रहा है 
ये पहचाना, 
वो अनजाना 
दुनिया एक मुसाफिर खाना 
*
साँसों का कर सफर मौन रह
औरों की सुन फिर अपनी कह
हाथ आस का छोड़ नहीं, गह
मत बन गैरों का दीवाना
दुनिया एक मुसाफिर खाना
*
जो न काम का उसे बाँट दे
कोई रोके डपट-डाँट दे
कंटक पथ से बीन-छाँट दे
बन मधुकर कुछ गीत सुनाना
दुनिया एक मुसाफिर खाना
*
कौन न माँगे? सब फकीर हैं
केवल वे ही कुछ अमीर हैं
जिनके मन रमते कबीर हैं
ज्यों की त्यों चादर धर जाना
दुनिया एक मुसाफिर खाना
*
गैर आज, कल वही सगा है
रिश्ता वह जो नेह पगा है
साये से ही पायी दगा है
नाता मन से 'सलिल' निभाना
दुनिया एक मुसाफिर खाना
*

एक रचना

एक रचना:
*
आत्म मोह से
रहे ग्रस्त जो
उनकी कलम उगलती विष है
करें अनर्थ
अर्थ का पल-पल
पर निन्दाकर
हँस सोते हैं
*
खुद को
कहते रहे मसीहा
औरों का
अवदान न मानें
जिसने गले लगाया उस पर
कीच डालने का हठ ठानें
खुद को नहीं
तोलते हैं जो
हल्कापन ही
जिनकी फितरत
खोल न पाते
मन की गाँठें
जो पाया आदर खोते हैं
*
मनमानी
व्याख्याएँ  करते
लिखें उद्धरण
नकली-झूठे
पढ़ पाठक, सच समझ
नहीं क्यों
ऐसे लेखक ऊपर थूके?
सबसे अधिक
बोलते हैं वे
फिर भी शिकवा
बोल न पाए
ऐसे वक्ता
अपनी गरिमा खो
जब भी मिलते रोते हैं
*

बुधवार, 25 नवंबर 2015

लघु कथा

लघु कथा-
दोषी कौन?
*
कहते हैं अफवाहें पर लगाकर उगती हैं और उनसे फ़ैली गलतफहमी को दहशत बनते देर नहीं लगती। ऐसी ही कुछ दहशत मेरी पत्नी के मन में समा गयी। यह जानते हुए भी कि मैं उसकी बात से सहमत नहीं होऊँगा उसे मुझसे बात कहनी हो पड़ी क्योंकि उसके मत में वह बच्चों की सुरक्षा से जुडी थी। माँ बच्चों के लिए क्या कुछ नहीं कर गुजरती, यहाँ तो बात सिर्फ मेरी नाराजी की थी।  

पिछले कुछ दिनों से सांप्रदायिक तनाव के चर्चे सुनकर उसने सलाह दी कि हमें स्थान परिवर्तन करने पर विचार करना चाहिए। हम दो भिन्न धर्मों के हैं, प्रेम विवाह करने के कारण हमारे रिश्तेदार संबंध तोड़ बैठे हैं। दोनों की नौकरी के कारण बच्चों को घर पर अकेला भी रहना होता है और पडोसी हमसे भिन्न धर्म के हैं। मैंने उसे विश्वास में लेकर मना लिया कि वह पड़ोसियों पर भरोसा रखे और बच्चों से यह बात न करे। 

दफ्तर में मैने अपने सहयोगी से अन्य बातों की तरह इस बात की चर्चा की। दुर्भाग्य से वहाँ एक पत्रकार बैठा था, उसने मोबाइल पर मेरी बात का ध्वन्यांकन कर लिया और भयादोहन करने का प्रयास किया। मेरे न डरने पर उसने नमक-मिर्च लगाकर अधिकारी और नेता से चुगली कर मेरा स्थानांतरण करा दिया। स्थानीय अखबार और खबर चैनल पर मेरे विरुद्ध प्रचार होने लगा। मेरे घर के बाहर लोग एकत्र होकर नारेबाजी करने लगे तो बहसों ने घबराकर मुझे और पत्नी को फोन किया। हमारे घर पहुँचने के पहले ही एक पडोसी पीछे की गली से अपने घर ले गये वे बच्चों को भी ले आये थे। 

बहार कुछ लोग मेरे पक्ष में कुछ विपक्ष में बहस और नारेबाजी करने लगे। मैं समझ ही नहीं पा रहा था कि दोषी कौन है? 

*******         

नवगीत:

नवगीत:
संजीव 
*
वैलेंटाइन 
चक्रवात में 
तिनका हुआ
वसन्तोत्सव जब,
घर की नींव
खोखली होकर
हिला रही दीवारें जब-तब.
*
हम-तुम
देख रहे खिड़की के
बजते पल्ले
मगर चुप्प हैं.
दरवाज़ों के बाहर
जाते डरते
छाये तिमिर घुप्प हैं.
अन्तर्जाली
सेंध लग गयी
शयनकक्ष
शिशुगृह में आया.
जसुदा-लोरी
रुचे न किंचित
पूजागृह में
पैग बनाया.
इसे रोज
उसको दे टॉफी
कर प्रपोज़ नित
किसी और को,
संबंधों के
अनुबंधों को
भुला रही सीत्कारें जब-तब.
वैलेंटाइन
चक्रवात में
तिनका हुआ
वसन्तोत्सव जब,
घर की नींव
खोखली होकर
हिला रही दीवारें जब-तब.
*
पशुपति व्यथित
देख पशुओं से
व्यवहारों की
जय-जय होती.
जन-आस्था
जन-प्रतिनिधियों को
भटका देख
सिया सी रोती.
मन 'मॉनीटर'
पर तन 'माउस'
जाने क्या-क्या
दिखा रहा है?
हर 'सीपीयू'
है आयातित
गत को गर्हित
बता रहा है.
कर उपयोग
फेंक दो तत्क्षण
कहे पूर्व से
पश्चिम वर तम
भटकावों को
अटकावों को
भुना रही चीत्कारें जब-तब.
वैलेंटाइन
चक्रवात में
तिनका हुआ
वसन्तोत्सव जब,
घर की नींव
खोखली होकर
हिला रही दीवारें जब-तब.
*

चर्चा:

अमीर का बयान मेरा दृष्टिकोण दोषी पत्रकार

भाई तिल का ताड़ बनाने की पत्रकारों की आदत इस तरह की बेसिर- पैर की बातें फैलाती रहती है.

आमिर और उसकी बीबी क्या बात करते हैं यह आमिर को कहाँ नहीं चाहिए, कह दी तो वहीं ख़त्म हो जानी चाहिए। पत्नी की शंका का समर्थन तो आमिर ने किया नहीं। हिन्दू पत्नी को चिंता और मुसलमान पति बेफिक्र लेकिन लोगों ने उसे कठघरे में खड़ा कर ही दिया। सवाल पूछना है तो किरण राव से पूछो।

पत्नी को शंका क्यों हुई? पत्रकारों द्वारा असहिष्णुता की झोथी कहानियाँ फ़ैलाने के कारण।

न मैं पहले आमिर का समर्थक था न अब विरोधी हूँ. विडम्बना यह है कि देश का निर्माण करनेवाले, खोज करनेवाले, रक्षा करनेवाले, पढ़ानेवाले, अन्न उपजानेवाले इन पत्रकारों के लिए महत्वपूर्ण नहीं होते। इनके लिए महत्वपूर्ण होते हैं अपराध करनेवाले, खेलनेवाले, अभिनय करनेवाले, और शासन करने वाले । इनके लिए रोटी, कपडा, मकान और शिक्षा से पहले मनोरंजन है. यह न होता तो ऐसी बेसिर-पैर की बातें क्यों पैदा हों?

rasanand de chhnad namada 7


रसानंद दे छंद नर्मदा: ७ 



दोहा है रस-खान 

गौ भाषा को दूह कर, कर दोहा-पय पान 
शेष छंद रस-धार है, दोहा है रस-खान  

रसः काव्य को पढ़ने या सुनने से मिलनेवाला आनंद ही रस है। काव्य मानव मन में छिपे भावों को जगाकर रस की अनुभूति कराता है। भरत मुनि के अनुसार "विभावानुभाव संचारी संयोगाद्रसनिष्पत्तिः" अर्थात् विभाव, अनुभाव व संचारी भाव के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। रस के ४ अंग स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव व संचारी भाव हैं-


स्थायी भावः मानव ह्र्दय में हमेशा विद्यमान, छिपाये न जा सकनेवाले, अपरिवर्तनीय भावों को स्थायी भाव कहा जाता है।


रस            श्रृंगार हास्य करुण रौद्र   वीर     भयानक वीभत्स  अद्भुत   शांत   वात्सल्य
स्थायी भाव  रति   हास  शोक  क्रोध उत्साह    भय       घृणा  विस्मय निर्वेद शिशु प्रेम

विभावः
किसी व्यक्ति के मन में स्थायी भाव उत्पन्न करनेवाले कारण को विभाव कहते हैं। व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति भी विभाव हो सकती है। ‌विभाव के दो प्रकार आलंबन व उद्दीपन हैं। ‌

आलंबन विभाव के सहारे रस निष्पत्ति होती है। इसके दो भेद आश्रय व विषय हैं ‌

आश्रयः जिस व्यक्ति में स्थायी भाव स्थिर रहता है उसे आश्रय कहते हैं। ‌शृंगार रस में नायक नायिका एक दूसरे के आश्रय होंगे।‌


विषयः जिसके प्रति आश्रय के मन में रति आदि स्थायी भाव उत्पन्न हो, उसे विषय कहते हैं ‌ "क" को "ख" के प्रति प्रेम हो तो "क" आश्रय तथा "ख" विषय होगा।‌

उद्दीपन विभाव- आलंबन द्वारा उत्पन्न भावों को तीव्र करनेवाले कारण उद्दीपन विभाव कहे जाते हैं। जिसके दो भेद बाह्य वातावरण व बाह्य चेष्टाएँ हैं। वन में सिंह गर्जन सुनकर डरनेवाला व्यक्ति आश्रय, सिंह विषय, निर्जन वन, अँधेरा, गर्जन आदि उद्दीपन विभाव तथा सिंह का मुँह फैलाना आदि विषय की बाह्य चेष्टाएँ हैं ।

अनुभावः आश्रय की बाह्य चेष्टाओं को अनुभाव या अभिनय कहते हैं। भयभीत व्यक्ति का काँपना, चीखना, भागना आदि अनुभाव हैं। ‌

संचारी भावः आश्रय के चित्त में क्षणिक रूप से उत्पन्न अथवा नष्ट मनोविकारों या भावों को संचारी भाव कहते हैं। भयग्रस्त व्यक्ति के मन में उत्पन्न शंका, चिंता, मोह, उन्माद आदि संचारी भाव हैं। मुख्य ३३ संचारी भाव निर्वेद, ग्लानि, मद, स्मृति, शंका, आलस्य, चिंता, दैन्य, मोह, चपलता, हर्ष, धृति, त्रास, उग्रता, उन्माद, असूया, श्रम, क्रीड़ा, आवेग, गर्व, विषाद, औत्सुक्य, निद्रा, अपस्मार, स्वप्न, विबोध, अवमर्ष, अवहित्था, मति, व्याथि, मरण, त्रास व वितर्क हैं।

रस
अ. श्रृंगार रस : स्थाई भाव रति श्रृंगार रस के दो प्रकार संयोग तथा वियोग हैं

संयोगः 
तुमने छेड़े प्रेम के, ऐसे राग हुजूर 
बजते रहते हैं सदा, तन-मन में संतूर। -अशोक अंजुम, नई सदी के प्रतिनिधि दोहाकार

द्वैत भुला अद्वैत वर, बजा रहे हैं बीन 
कौन कह सके कौन है, कबसे किसमें लीन। -सलिल   


वियोगः
हाथ छुटा तो अश्रु से, भीग गये थे गाल ‌
गाड़ी चल दी देर तक, हिला एक रूमाल - चंद्रसेन "विराट", चुटकी चुटकी चाँदनी

देख रहे कुछ और हैं, दीख रहा कुछ और 
उन्मन मन करा रहा है, चित्तचोर पर गौर। - सलिल  


हास्य रस : स्थाई भाव हास 
आफिस में फाइल चले, कछुए की रफ्तार ‌
बाबू बैठा सर्प सा, बीच कुंडली मार।        राजेश अरोरा"शलभ", हास्य पर टैक्स नहीं

लालू-लीला देखिये, लिए राबड़ी गोद
सारा चारा चर गए, कहते किया विनोद।  - सलिल 


व्यंग्यः
अंकित है हर पृष्ठ पर, बाँच सके तो बाँच ‌
सोलह दूनी आठ है, अब इस युग का साँच। -जय चक्रवर्ती, संदर्भों की आग

नेता जी को रेंकते, देख गधा नाराज
इन्हें गधा मत बोलिए, भले पहन लें ताज। -सलिल 


करुण रस : स्थाई भाव शोक 
हाय, भूख की बेबसी, हाय, अभागे पेट ‌
बचपन चाकर बन गया, धोता है कप-प्लेट- डॉ. अनंतराम मिश्र 'अनंत', उग आयी फिर दूब

चिंदी-चिंदी चीर से, ढाँक रही है लाज
गड़ी शर्म से जा रही,धरती में बिन व्याज। - सलिल   


रौद्र रस : स्थाई भाव क्रोध

बलि का बकरा मत बनो, धम-धम करो न व्यर्थ
दाँत तोड़ने के लिए, जन-जन यहाँ समर्थ।       - डॉ. गणेशदत्त सारस्वत, नई सदी के प्रतिनिधि दोहाकार 
शिखर कारगिल पर मचल, फड़क रहे भुजपाश ‌
जान हथेली पर लिये, अरि को करते लाश     -सलिल


वीर रस : स्थाई भाव उत्साह   
रणभेरी जब-जब बजे, जगे युद्ध संगीत ‌
कण-कण माटी का लिखे, बलिदानों के गीत। - डॉ. रामसनेहीलाल शर्मा "यायावर", आँसू का अनुवाद

नेट जेट को पीटते, रचते नव इतिहास
टैंकों की धज्जी उड़ा, सैनिक करते हास - सलिल   


भयानक रस : स्थाई भाव भय      
उफनाती नदियाँ चलीं, क्रुद्ध खोलकर केश ‌
वर्षा में धारण किया, रणचंडी का वेश।   - आचार्य भगवत दुबे, शब्दों के संवाद

काल बनीं काली झपट, घातक किया प्रहार
लहू उगलता गिर गया, दानव कर चीत्कार। -सलिल 


वीभत्स रस : स्थाई भाव घृणा


हा, पशुओं की लाश को, नोचें कौए गिद्ध ‌
खुश जनता का खून पी, नेता अफसर सिद्ध। -सलिल


अद्भुत रस : स्थाई भाव विस्मय 
पांडुपुत्र ने उसी क्षण, उस तन में शत बार ‌
पृथक-पृथक संपूर्ण जग, देखे विविथ प्रकार।-डॉ. उदयभानु तिवारी 'मधुकर', श्री गीता मानस


विस्मय से आँखें फटीं, देखा मायाजाल
काट-जोड़, वापिस किया, पल में जला रुमाल। -सलिल 


शांतः स्थाई भाव निर्वेद 
जिसको यह जग घर लगे, वह ठहरा नादान ‌
समझे इसे सराय जो, वह है चतुर सुजान-डॉ. श्यामानंद सरस्वती 'रौशन', होते ही अंतर्मुखी


हर्ष-शोक करना नहीं, रखना राग न द्वेष
पंकज सम रह पंक में, पा सुख-शांति अशेष। -सलिल   


वात्सल्यः स्थाई भाव शिशु प्रेम
छौने को दिल से लगा, हिरनी चाटे खाल ‌
पान करा पय मनाती, चिरजीवी हो लाल। -सलिल


भक्तिः स्थाई भाव विराग
दूब दबाये शुण्ड में, लंबोदर गजमुण्ड ‌
बुद्धि विनायक हे प्रभो!, हरो विघ्न के झुण्ड। -भानुदत्त त्रिपाठी "मधुरेश", दोहा कुंज

वंदे भारत-भारती, नभ भू दिशा दिगंत
मैया गौ नर्मदा जी, सदय रहें शिव कंत  -सलिल   


रसराज दोहा में हर रस को भली-भांति अभिव्यक्त करने की सामर्थ्य है। इसलिए इसे महाकाव्यों में अन्य छंदों के साथ गूँथकर कथाक्रम को विस्तार दिया जाता है। राम चरित मानस में तुलसीदास जी ने चौपाई के बीच में दोहा का प्रयोग किया है। दोहा में पचास, शतक, सतसई और सहस्त्रई लिखने की परंपरा है। किसी और छंद को यह सौभाग्य प्राप्त नहीं है
-------------------- निरंतर 
-समन्वयम, २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१, salil.sanjiv@gmail.com, ९४२५१८३२४४