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गुरुवार, 10 दिसंबर 2015

navgeet

एक रचना:
चालीस चोर
*
चालीस चोर - अलीबाबा
क्योें करते बंटाढार?
*
जनता माँगे
दो हिसाब
क्यों की तुमने मनमानी?
घपले पकड़े गये 
आ रही याद 
तुम्हें अब नानी
सजा दे रहा जनगण
 नाहक क्यों करते तकरार?
चालीस चोर - अलीबाबा
क्योें करते बंटाढार?
*
जननायक से
रार कर रहे
गैरों के पड़ पैर
अपनों से
चप्पल उठवाते 
कैसे होगी खैर?
असंसदीय आचरण
बनाते संसद को बाज़ार
चालीस चोर - अलीबाबा
क्योें करते बंटाढार?
*
जनता समझे
कर नौटंकी
फैलाते पाखंड
देना होगा
फिर जवाब
हो कितने भी उद्दंड 
सम्हल जाओ चुक जाए न धीरज
जन गण हो बेज़ार 
चालीस चोर - अलीबाबा
क्योें करते बंटाढार?
*

navgeet

एक रचना
जनता भई परायी
*
सत्ता पा घोटाले करते
तनकऊ लाज न आयी
जाँच भयी खिसियाये लल्ला
जनता भई परायी
*
अपनी टेंट न देखे कानी
औरों को दे दोस
छिपा-छिपाकर ऐब जतन से
बरसों पाले  पोस
सौ चूहे खा बिल्ली हज को
चली, न क्यों पछतायी?
जाँच भयी खिसियाये लल्ला
जनता भई परायी
*
रातों - रात करोड़पति
व्ही आई पी भये जमाई
आम आदमी जैसा जीवन
जीने -गैल भुलाई
न्यायालय की गरिमा
संसद में घुस आज भुलाई
जाँच भयी खिसियाये लल्ला
जनता भई परायी
*
सहनशीलता की दुहाई दें
जो छीनें आज़ादी
अब लौं भरा न मन
जिन्ने की मनमानी बरबादी
लगा तमाचा जनता ने
दूजी सरकार बनायी  
जाँच भयी खिसियाये लल्ला
जनता भई परायी
*



                                                   

सोमवार, 7 दिसंबर 2015

laghukatha

लघुकथा -
परीक्षा
*
अभियांत्रिकी महाविद्यालय में प्रायोगिक परीक्षाएँ चल रहीं हैं। कक्षा में विद्यार्थियों का झुण्ड अपनी प्रयोग पुस्तिका, किताबों, कैलकुलेटर तथा चलभाष आदि से सुसज्जित होकर होकर रणक्षेत्र में करतब दिखा रहा है। एक अन्य कक्ष में गरमागरम नमकीन तथा मिष्ठान्न का स्वाद लेते परीक्षक तथा प्रभारी मौखिक प्रश्नोत्तर कर रहे हैं जिसका छवि-अंकन निरंतर हो रहा है।  

पर्यवेक्षक के नाते परीक्षार्थियों से पूछा कौन सा प्रयोग कर रहे हैं? कुछ ने उत्तर पुस्तिका से पढ़कर दिया, कुछ मौन रह गये। परिचय पत्र माँगने पर कुछ बाहर भागे और अपने बस्तों में से निकालकर लाये, कुछ की जेब में थे।जो बिना किसी परिचय पत्र के थे उन्हें परीक्षा नियंत्रक के कक्ष में अनुमति पत्र लेने भेजा। कुतूहलवश कुछ प्रयोग पुस्तिकाएँ उठाकर देखीं किसी में नाम अंकित नहीं था, कोई अन्य महाविद्यालय के नाम से सुसज्जित थीं, किसी में जाँचने के चिन्ह या जाँचकर्ता के हस्ताक्षर नहीं मिले। 

प्रभारी से चर्चा में उत्तर मिला 'दस हजार वेतन में जैसा पढ़ाया जा सकता है वैसा ही पढ़ाया गया है. ये पाठ्य पुस्तकों नहीं कुंजियों से पढ़ते हैं, अंग्रेजी इन्हें आती नहीं है, हिंदी माध्यम है नहीं। शासन से प्राप्त छात्रवृत्ति के लोभ में पात्रता न होते हुए भी ये प्रवेश ले लेते हैं। प्रबंधन इन्हें प्रवेश न दे तो महाविद्यालय बंद हो जाए। हम इन्हें मदद कर उत्तीर्ण न करें तो हम पर अक्षमता का आरोप लग जाएगा। आप को तो कुछ दिनों पर्यवेक्षण कर चला जाना है, हमें यहीं काम करना है। आजकल विद्यार्थी नहीं प्राध्यापक की होती है परीक्षा कि वह अच्छा परिणाम देकर नौकरी बचा पाता है या नहीं?

*** 




laghukatha

लघु कथा -
मुट्ठी से रेत
*
आजकल बिटिया रोज शाम को सहेली के घर पढ़ाई करने का बहाना कर जाती है और सवेरे ही लौटती है। समय ठीक नहीं है, मना करती हूँ तो मानती नहीं। कल पड़ोसन को किसी लडके के साथ पार्क में घूमते दिखी थी।

यह तो होना ही है, जब मैंने आरम्भ में उसे रोक था तो तुम्हीं झगड़ने लगीं थीं कि मैं दकियानूस हूँ, अब लडकियों की आज़ादी का ज़माना है। अब क्या हुआ, आज़ाद करो और खुश रहो।

मुझे क्या मालूम था कि वह हाथ से बाहर निकल जाएगी, जल्दी कुछ करो।
दोनों बेटी के कमरे में गए तो मेज पर दिखी एक चिट्ठी जिसमें मनपसंद लडके के साथ घर छोड़ने की सूचना थी।

दोनों अवाक, मुठ्ठी से फिसल चुकी थी रेत।

****

laghukatha

लघुकथा -
समरसता
*
भृत्यों, सफाईकर्मियों और चौकीदारों द्वारा वेतन वृद्धि की माँग मंत्रिमंडल ने आर्थिक संसाधनों के अभाव में ठुकरा दी।

कुछ दिनों बाद जनप्रतिनिधियों ने प्रशासनिक अधिकारियों की कार्य कुशलता की प्रशंसा कर अपने वेतन भत्ते कई गुना अधिक बढ़ा लिये।

अगली बैठक में अभियंताओं और प्राध्यापकों पर हो रहे व्यय को अनावश्यक मानते हुए सेवा निवृत्ति से रिक्त पदों पर नियुक्तियाँ न कर दैनिक वेतन के आधार पर कार्य कराने का निर्णय सर्व सम्मति से लिया गया और स्थापित हो गयी समरसता।

***

रविवार, 6 दिसंबर 2015

laghukatha

चित्र पर लघु कथा - 


सहिष्णुता 


कहा-सुनी के बाद वह चली गयी रसोई में और वह घर के बाहर, चलते-चलते थक गया तो एक पेड़ के नीचे

बैठ गया. कब झपकी लगी पता ही न चला, आँख खुली तो थकान दूर हो गयी थी, कानों में कोयल के कूकने की 

मधुर ध्वनि पड़ी तो मन प्रसन्न हुआ. तभी ध्यान आया उसका जिसे छोड़ आया था घर में, पछतावा हुआ कि 

क्यों नाहक उलझ पड़ा?       

कुछ सोच तेजी से चल पड़ा घर की ओर, वह डबडबाई आँखों से उसी को चिंता में परेशान थी, जैसे ही उसे अपने 

सामने देखा, राहत की साँस ली. चार आँखें मिलीं तो आँखें चार होने में देर न लगी. 

दोनों ने एक-दुसरे का हाथ थामा और पहुँच गये वहीं जहाँ अनेकता में एकता का सन्देश दे नहीं, जी रहे थे वे सब 

जिन्हें अल्पबुद्धि जीव कहते हैं वे सब जो पारस्परिक विविधता के प्रति नहीं रख पा रहे अपने मन में सहिष्णुता। 

*

laghukatha

लघुकथा-
ओवर टाइम
*
अभी तो फैक्ट्री में काम का समय है, फिर मैं पत्ते खेलने कैसे आ सकता हूँ? ५ बजे के बाद खेल लेंगे।
तुम भी यार! रहे लल्लू के लल्लू। शाम को देर से घर जाकर कौन अपनी खाट खड़ी करवाएगा? चल अभी खेलते हैं काम बाकी रहेगा तभी तो प्रबंधन समय पर कराने के लिये देगा ओवर टाइम।
*

चन्द माहिया : क़िस्त 23

चन्द माहिया : क़िस्त 23
:1:
रिश्तों की तिजारत में
ढूँढ रहे हो क्या
नौ फ़स्ल-ए-रवायत में

:2:

कुछ ख़ास नहीं बदला
छोड़ गई जब से
अब तक हूँ नहीं सँभला

:3:
ये ख़ून बहा किसका
मैं क्या जानू रे !
कुर्सी से रहा चिपका

:4:
अच्छा न बुरा जाना
दिल ने कहा जो भी
बस वो ही सही माना

:5:
वो आग लगाते है
अपना भी ईमां
हम आग बुझाते हैं

-आनन्द.पाठक-
09413395592

शनिवार, 5 दिसंबर 2015

atishayokti alankar

अलंकार सलिला ३९

अतिशयोक्ति सीमा हनें
*





















जब सीमा को तोड़कर, होते सीमाहीन
अतिशयोक्ति तब जनमती, सुनिए दीन-अदीन..
बढा-चढ़ाकर जब कहें, बातें सीमा तोड़.
अतिशयोक्ति तब जानिए, सारी शंका छोड़..

जहाँ लोक-सीमा का अतिक्रमण करते हुए किसी बात को अत्यधिक बढा-चढाकर कहा गया हो, वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है।
जहाँ पर प्रस्तुत या उपमेय को बढा-चढाकर शब्दांकित किया जाये वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है।

उदाहरण:
१. परवल पाक, फाट हिय गोहूँ।
यहाँ प्रसिद्ध कवि मालिक मोहम्मद जायसी ने नायिका नागमती के विरह का वर्णन करते हुए कहा है कि उसके विरह के ताप के कारण परवल पक गये तथा गेहूँ का ह्रदय फट गया।

२. मैं तो राम विरह की मारी, मोरी मुंदरी हो गयी कँगना।
इन पंक्तियों में श्री राम के विरह में दुर्बल सीताजी की अँगूठी कंगन हो जाने का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन है।

३. ऐसे बेहाल बेबाइन सों, पग कंटक-जल लगे पुनि जोये।
हाय! महादुख पायो सखा, तुम आये न इतै कितै दिन खोये।।
देखि सुदामा की दीन दसा, करुना करि के करुनानिधि रोये।
पानी परात को हाथ छुओ नहिं, नैनन के जल सौं पग धोये।।

४. बूँद-बूँद मँह जानहू।

५. कहुकी-कहुकी जस कोइलि रोई।

६. रकत आँसु घुंघुची बन बोई।

७. कुंजा गुन्जि करहिं पिऊ पीऊ।

८. तेहि दुःख भये परास निपाते।

९. हनुमान की पूँछ में, लगन न पाई आग।

लंका सारी जल गयी, गए निसाचर भाग।। -तुलसी

१०. देख लो साकेत नगरी है यही।

स्वर्ग से मिलने गगन को जा रही।। -मैथिलीशरण गुप्त

११. प्रिय-प्रवास की बात चलत ही, सूखी गया तिय कोमल गात।

१२. दसन जोति बरनी नहिं जाई. चौंधे दिष्टि देखि चमकाई.

१३. आगे नदिया पडी अपार, घोड़ा कैसे उतरे पार।

राणा ने सोचा इस पार, तब तक था चेतक उस पार।।

१४. भूषण भनत नाद विहद नगारन के, नदी नाद मद गैबरन के रलत है।

१५. ये दुनिया भर के झगडे, घर के किस्से, काम की बातें।

बला हर एक टल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ।। -जावेद अख्तर

१६. मैं रोया परदेस में, भीगा माँ का प्यार।

दुःख ने दुःख से बात की, बिन चिट्ठी बिन तार।। -निदा फाज़ली

अतिशयोक्ति अलंकार के निम्न ८ प्रकार (भेद) हैं।

१. संबंधातिशयोक्ति-

जब दो वस्तुओं में संबंध न होने पर भी संबंध दिखाया जाए अथवा जब अयोग्यता में योग्यता प्रदर्शित की जाए तब संबंधातिशयोक्ति अलंकार होता है।

उदाहरण-

१. फबि फहरहिं अति उच्च निसाना।
जिन्ह मँह अटकहिं बिबुध बिमाना।।
फबि = शोभा देना, निसाना = ध्वज, बिबुध = देवता।
यहाँ झंडे और विमानों में अटकने का संबंध न होने पर भी बताया गया है।

२. पँखुरी लगे गुलाब की, परिहै गात खरोंच
गुलाब की पँखुरी और गात में खरोंच का संबंध न होने पर भी बता दिया गया है।

३. भूलि गयो भोज, बलि विक्रम बिसर गए, जाके आगे और तन दौरत न दीदे हैं।
राजा-राइ राने, उमराइ उनमाने उन, माने निज गुन के गरब गिरबी दे हैं।।
सुजस बजाज जाके सौदागर सुकबि, चलेई आवै दसहूँ दिशान ते उनींदे हैं।
भोगी लाल भूप लाख पाखर ले बलैया जिन, लाखन खरचि रूचि आखर ख़रीदे हैं।।
यहाँ भुला देने अयोग्य भोग आदि भोगीलाल के आगे भुला देने योग्य ठहराये गये हैं।

४. जटित जवाहर सौ दोहरे देवानखाने, दूज्जा छति आँगन हौज सर फेरे के।
करी औ किवार देवदारु के लगाए लखो, लह्यो है सुदामा फल हरि फल हेरे के।।
पल में महल बिस्व करमै तयार कीन्हों, कहै रघुनाथ कइयो योजन के घेरे में।
अति ही बुलंद जहाँ चंद मे ते अमी चारु चूसत चकोर बैठे ऊपर मुंडेरे के।।
५. आपुन के बिछुरे मनमोहन बीती अबै घरी एक कि द्वै है।  
ऐसी दसा इतने भई रघुनाथ सुने भय ते मन भ्वै है।।
गोपिन के अँसुवान को सागर बाढ़त जात मनो नभ छ्वै है।
बात कहा कहिए ब्रज की अब बूड़ोई व्है है कि बूडत व्है हैं।।

२. असम्बन्धातिशयोक्ति

जब दो वस्तुओं में संबंध होने पर भी संबंध न दिखाया जाए अथवा जब योग्यता में अयोग्यता प्रदर्शित की जाए तब असंबंधातिशयोक्ति अलंकार होता है।

उदाहरण-

१. जेहि वर वाजि राम असवारा। तेहि सारदा न बरनै पारा।।
वाजि = घोडा, न बरनै पारा = वर्णन नहीं कर सकीं।

२. अति सुन्दर लखि सिय! मुख तेरो। आदर हम न करहिं ससि केरो।।
करो = का। चन्द्रमा में मुख- सौदर्य की समानता के योग्यता होने पर भी अस्वीकार गया है।

३. देखि गति भासन ते शासन न मानै सखी
कहिबै को चहत गहत गरो परि जाय
कौन भाँति उनको संदेशो आवै रघुनाथ
आइबे को न यो न उपाय कछू करि जाय
विरह विथा की बात लिख्यो जब चाहे तब
ऐसे दशा होति आँच आखर में भरि जाय
हरि जाय चेत चित्त सूखि स्याही छरि जाय

३. चपलातिशयोक्ति- 

जब कारण के होते ही तुरंत कार्य हो जाए।

उदाहरण-

१. तव सिव तीसर नैन उघारा। चितवत काम भयऊ जरि छारा।।
शिव के नेत्र खुलते ही कामदेव जलकर राख हो गया।

२. आयो-आयो सुनत ही सिव सरजा तव नाँव।
बैरि नारि दृग जलन सौं बूडिजात अरिगाँव।।
४. अक्रमातिशयोक्ति-

जब कारण और कार्य एक साथ हों। 

उदाहरण-

१. बाणन के साथ छूटे प्राण दनुजन के। 
सामान्यत: बाण छूटने और लगने के बाद प्राण निकालेंगे पर यहाँ दोनों क्रियाएं एक साथ होना बताया गया है। 

२. पाँव के धरत, अति भार के परत, भयो एक ही परत, मिली सपत पताल को। 
३. सन्ध्यानों प्रभु विशिख कराला, उठी उदधि उर अंतर ज्वाला। 

४. क्षण भर उसे संधानने में वे यथा शोभित हुए। 
है भाल नेत्र जवाल हर, ज्यों छोड़ते शोभित हुए।। 
वह शर इधर गांडीव गुण से भिन्न जैसे ही हुआ।
धड से जयद्रथ का उधर सिर छिन्न वैसे ही हुआ।।  

५. अत्यंतातिशयोक्ति-

जब कारण के पहले ही कार्य संपन्न हो जाए।

उदाहरण:

१. हनूमान की पूँछ में, लगन न पाई आग।
लंका सगरी जर गयी, गये निसाचर भाग।।  

२. धूमधाम ऐसी रामचद्र-वीरता की मची, लछि राम रावन सरोश सरकस तें।
बैरी मिले गरद मरोरत कमान गोसे, पीछे काढ़े बाण तेजमान तरकस तें।। 

६. भेदकातिशयोक्ति-

जहाँ उपमेय या प्रस्तुत का अन्यत्व वर्णन किया जाए, अभेद में भी भेद दिखाया जाए अथवा जब और ही, निराला, न्यारा, अनोखा आदि शब्दों का प्रयोग कर किसी की अत्यधिक या अतिरेकी प्रशंसा की जाए।

उदाहरण-

१. न्यारी रीति भूतल, निहारी सिवराज की।

२. औरे कछु चितवनि चलनि, औरे मृदु मुसकान।
औरे कछु सुख देत हैं, सकें न नैन बखान।।
अनियारे दीरघ दृगनि, किती न तरुनि समान।
वह चितवन औरे कछू, जेहि बस होत सुजान।।

७. रूपकातिशयोक्ति-

उदाहरण-

१. जब केवल उपमान या अप्रस्तुत का कथन कर उसी से उपमेय या प्रस्तुत का बोध कराया जाए अथवा उपमेय का लोप कर उपमान मात्र का कथा किया जाए अर्थात उपमान से ही अपमान का भी अर्थ अभीष्ट हो तब रूपकातिशयोक्ति होता है। रूपकातिशयोक्ति का अधिक विक्सित और रूढ़ रूप प्रतिक योजना है।

उदाहरण-

१. कनकलता पर चंद्रमा, धरे धनुष दो बान।
कनकलता = स्वर्ण जैसी आभामय शरीर, चंद्रमा = मुख, धनुष = भ्रकुटी, बाण = नेत्र, कटाक्षकनकलता यहाँ नायिका के सौन्दर्य का वर्णन है। शरीर, मुख, भ्रकुटी, कटाक्ष आदि उप्मेयों का लोप कर केवल लता, चन्द्र, धनुष, बाण आदि का कथन किया गया है किन्तु प्रसंग से अर्थ ज्ञात हो जाता है।

२. गुरुदेव! देखो तो नया यह सिंह सोते से जगा।
यहाँ उपमेय अभिमानु का उल्लेख न कर उपमान सिंह मात्र का उल्लेख है जिससे अर्थ ग्रहण किया जा सकता है।

३.विद्रुम सीपी संपुट में, मोती के दाने कैसे।
है हंस न शुक यह फिर क्यों, चुगने को मुक्त ऐसे।। 

४. पन्नग पंकज मुख गाहे, खंजन तहाँ बईठ।
छत्र सिंहासन राजधन, ताकहँ होइ जू दीठ।।

८. सापन्हवातिशयोक्ति-

यह अपन्हुति और रूपकातिशयोक्ति का सम्मिलित रूप है। जहाँ रूपकातिशयोक्ति प्रतिषेधगर्भित रूप में आती है वहाँ सापन्हवातिशयोक्ति होता है।

उदाहरण-
१. अली कमल तेरे तनहिं, सर में कहत अयान। 

यहाँ सर में कमल का निषेध कर उन्हें मुख और नेत्र के रूप में केवल उपमान द्वारा शरीर में वर्णित किया गया है।
टिप्पणी: उक्त ३, ४, ५ अर्थात चपलातिशयोक्ति, अक्रमातिशयोक्ति तथा अत्यंतातिशयोक्ति का भेद कारण के आधार पर होने के कारण कुछ विद्वान् इन्हें कारणातिशयोक्ति के भेद-रूप में वर्णित करते हैं।
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navgeet

एक रचना:
(तरह मात्रिक जनक छंद )
*
आँसू हैं 
हर आँख में 
आसमान फट पड़ा 
आँसू हैं
हर आँख में
*
अंकुर सूखे वृष्टि बिन
धरती की छाती फटी
कृषक आत्महत्या करें
पत्ते रहे
न शाख में
फूट रहा धीरज-घड़ा
आसमान फट पड़ा
आँसू हैं
हर आँख में
*
अतिरेकी बम फोड़ते
निरपराध मारे गये
बेबस आँसू पोंछते
हाथ न
सूझे हाथ को
शीश चढ़ा, संकट बड़ा
आसमान फट पड़ा
आँसू हैं
हर आँख में
*
जल-प्लावन ने लील लीं
जाने कितनी जिंदगीं
रो - रो सूखी आँख भी
पानी - पानी
हो रही
वज्र सरीखा मन कड़ा
आँसू हैं
हर आँख में
*

muktika

एक रचना-
*
महाकाल के पूजक हैं हम
पाश काल के नहीं सुहाते
नहीं समय-असमय की चिंता
कब विलंब से हम घबराते?
*
खुद की ओर उठीं त्रै ऊँगली
अनदेखी ही रहीं हमेशा
एक उठी जो औरों पर ही
देख उसी को ख़ुशी मनाते
*
कथनी-करनी एक न करते
द्वैत हमारी श्वासों में है
प्यासों की कतार में आगे
आसों पर कब रोक लगाते?
*
अपनी दोनों आँख फोड़ लें
अगर तुम्हें काना कर पायें
संसद में आचरण दुरंगा
हो निलज्ज हम रहे दिखाते
*
आम आदमी की ताकत ही
रखे देश को ज़िंदा अब तक
नेता अफसर सेठ बेचकर
वरना भारत भी खा जाते
*

navgeet

एक रचना:
*
या तो वो देता नहीं 
या देता छप्पर फाड़ के 
*
मर्जी हो तो पंगु को
गिरि पर देता है चढ़ा
अंधे को देता दिखा
निर्धन को कर दे धनी
भक्तों को लेता बचा
वो खुले-आम, बिन आड़ के
या तो वो देता नहीं
या देता छप्पर फाड़ के
*
पानी बिन सूखा कहीं
पानी-पानी है कहीं
उसका कुछ सानी नहीं
रहे न कुछ उससे छिपा
मनमानी करता सदा
फिर पत्ते चलता ताड़ के
या तो वो देता नहीं
या देता छप्पर फाड़ के
*
अपनी बीबी छुड़ाने
औरों को देता लड़ा
और कभी बंसी बजा
करता डेटिंग रास कह
चने फोड़ता हो सलिल
ज्यों भड़भूंजा भाड़ बिन
या तो वो देता नहीं
या देता छप्पर फाड़ के
*
३-१२-२०१५

बुधवार, 2 दिसंबर 2015

laghukatha

लघुकथा
गुलामी का अनुबंध
*
आप कैसे जनप्रतिनिधि हैं जो जनमत जानते हुए भी संसद में व्यक्त नहीं करते?

क्या करूँ मजबूर हूँ?

कैसी मजबूरी?

दल की नीति जनमत की विरोधी है. मैं दल का उम्मीदवार था, चुने जाने के बाद मुझे संसद में वही कहना पड़ेगा जो दल चाहता है.

अरे! तब तो दल का प्रत्याशी बनने का अर्थ बेदाम का गुलाम होना है, उम्मीदवार क्या हुए जैसे गुलामी का अनुबंध कर लिया हो.

***

laghukatha

लघु कथा:
खरीददार
*
अखबार में प्रायः पढ़ता हूँ अमुक चौराहे पर कामचोरी का अभिनन्दन हुआ, रिश्वतखोरी का सम्मान समारोह है, जुगाड़ू साहित्यकार को पुरस्कृत किया गया आदि.
देखा एक कोने में मेहनत,ईमानदारी और लगन मुँह लटकाये बैठे थे. मैंने हालचाल पूछा तो समवेत स्वर में बोले आज फिर भूखा रहना होगा कोई नहीं है हमारा खरीददार।
***

laghukatha

लघुकथा
उत्तराधिकारी
*
दोपहर संसद में कुछ हनुमानवंशी अशोक वाटिका कांड की पुनरावृत्ति करने लगे।
अध्यक्षता कर रही मंदोदरी ने उन्हें शांत होने की हिदायत दी तो मतभेदों के दशानन और दलीय स्वार्थों के मेघनाथ ने साथ मिलकर मेजें थपथपाना आरम्भ कर दिया।
स्थिति को नियंत्रण से बाहर होते देख राम ने सुविधाओं के सत्ताभिषेक की घोषणा कर दी। तत्काल एकत्र हो गये विभीषण के उत्तराधिकारी ।
***

laghukatha

लघुकथा:
मुझे जीने दो
*
कश्मीरी पंडितों पर आतंकी हमलों से उत्पन्न आँसुओं की बाढ़, नेताओं और प्रशासन की उपेक्षा से जमी बर्फ, युवाओं के आतंकी संगठनों से जुड़ने के ज्वालामुखी, सीमाओं पर रोज मुठभेड़ों और सिपाहियों की शहादत के भूकम्प तथा दूरदर्शनी निरर्थक बहसों के तूफ़ान के बीच घिरी असहाय लोकतांत्रिक प्रणाली असहाय बिटिया की तरह लगातार गुहार रही है मुझे जीने दो पर गूंगी जनता और बहरी संसद दोनों मजबूर हैं.
***

laghukatha

लघुकथा:
निर्माण
*
जनप्रतिनिधि महोदय के ३-४ सन्देश मिले तो कोई काम न होते हुए भी मिलना आवश्यक प्रतीत हुआ।
कहिये क्या चल रहा है? कार्यों की प्रगति कैसी है? पूछा गया। जिलाध्यक्ष कार्यालय में बैठक में जानकारी दी थी मैंने बताया। महोदय ने कहा आपके संभाग में इतनी योजनाओं के लिए इतने करोड़ रुपये स्वीकृत कराये हैं, आपको समझना चाहिए, मिलना चाहिए। मेरे समर्थन के बिना कोई मेरे क्षेत्र में नहीं रह सकता। मेरे कारण ही आपको कोई तकलीफ नहीं हुई जबकि लोग कितनी शिकायतें करते हैं।
मैंने धन्यवाद दे निवेदन किया कि निर्माण कार्यों की गुणवत्ता देखना मेरा कार्य है, इससे जुडी कोई शिकायत हो तो बतायें अथवा मेरे साथ भ्रमण कर स्वयं कार्य देख लें। विभाग के सर्वोच्च अधिकारी तथा जाँच अधिकारी कार्यों की प्रगति तथा गुणवत्ता से संतुष्ट हैं। केंद्र और राज्य की योजनाओं में उपलब्ध राशि के लिए सर्वाधिक प्रस्ताव भेजे और स्वीकृत कराये गये हैं, कार्यालय में किसी ठेकेदार की कोई निविदा या देयक लंबित नहीं है। पारिवारिक स्थितियों के कारण मैं कार्यालय संलग्न रहना चाहता हूँ।
काम तो आपका ठीक है। भोपाल में भी आपके काम की तारीफ सुनी है पर हम लोगों का भी आपको ध्यान रखना चाहिए, वे बोले।
मैंने निवेदन किया कि आपका सहयोग इसी तरह कर सकता हूँ कि कार्य उत्तम और समय पर हों, शासन की छवि उज्जवल हो तो चुनाव के समय प्रतिनिधि को ही लाभ होगा।
वह तो जब होगा तब होगा, कौन जानता है कि टिकिट किसे मिलेगा? आप तो बताएं कि अभी क्या मदद कर सकते हैं?
मेरे यह कहते ही कि समय पर अच्छे से अच्छा निर्माण ही मेरी ऒर से मदद है, बोले मेरे बच्चे तो नहीं जायेंगे कभी सरकारी स्कूल-कॉलेज में फिर क्या लाभ मुझे ऐसे निर्माण से? आपको हटाना ही पड़ेगा।
मैं अभिवादन कर चला आया।
*** 

मंगलवार, 1 दिसंबर 2015

ullekha alankaar

अलंकार सलिला ३८ 

उल्लेख अलंकार 
*




*
'सलिल' सत्य हो विदित यदि, भली-भाँति लें देख।

वर्ण्य एक वर्णन कई, अलंकार उल्लेख।।

संस्कृत में उक्ति है 'एकं सत्यम विप्रं बहुधा वदन्ति' अर्थात एक ही सत्य को लोग कई प्रकार से कहते हैं। उल्लेख अलंकार तभी होता है जब उक्त उक्ति के अनुसार एक वर्ण्य का अनेक प्रकार से वर्णन विषयगत तथा ग्रहण करनेवालों के भेद से किया जाता है। 

विषयगत तथा ग्रहण करनेवालों के भेद से जहाँ एक वर्ण्य का अनेक प्रकार (कोणों) से अथवा अनेक व्यक्तियों द्वारा अपने - अपने तरीके से वर्णन किया जाता है, वहाँ उल्लेख अलंकार होता है।  इसी आधार पर उल्लेख अलंकार के दो भेद माने गये हैं।

अ. बहुकोणीय उल्लेख अलंकार -

जब एक व्यक्ति विविध कोणों से किसी प्रस्तुत अथवा वर्ण्य विषय का वर्णन करता है तो बहुकोणीय उल्लेख अलंकार होता है।

उदाहरण:

१. हम सागर के धवल हंस हैं, जल के धूम्र, गगन की धूल

    अनिल-फेन, ऊषा के पल्लव, वारि-वसन, वसुधा के मूल।।

२. सूरदास की ब्रज-भाषा ने, मुझको दूध पिलाया है।

    तुलसी की अवधी ने भी ख़ूब, स्तनपान कराया है।।

    पंचमेल खिचडी कबीर की, सुंदर स्वाद चखाया है।

    बिहारी के मारक दोहों ने, मेरा श्रृंगार रचाया है।।   -डी. के. सिंह

३. जन-गण की भाषा हिंदी है,

    अपनों की आशा हिंदी है। 

    जो लिखते हैं वह पढ़ते हैं-

    नये-नये सपने गढ़ते हैं।

    अलंकार रस छंद सरस हैं,

    दस दिश व्यापा इसका यश है।    -सलिल

४. ये दुनिया गोल है, ऊपर से खोल है।  

    अन्दर से देखो प्यारे! बिलकुल पोलम-पोल है।। 

५. लहूलुहान टेसू 
     परेशान गुलमोहर 
     सेमल त्रस्त 
     अमलतास, कनैले, सरसों पीलियाग्रस्त 
     अमराई को पित्त 
     महुए को वात 
     ओ फागुन! तेरे रंग 
     अब आज़ाद ।                     - सौरभ पाण्डेय, इकड़ियाँ जेबी से 

आ. बहुदृष्टीय उल्लेख अलंकार 

जहाँ एक वस्तु का अनेक व्यक्तियों द्वारा अनेक प्रकार से वर्णन किया जाता है।

उदाहरण:

१. जानति सौति अनीति है, जानति सखी सुनीति।

    गुरुजन जानत लाज है, प्रियतम जानति प्रीति।।

२. कोऊ कहै गगन की गंगा को सरोरुह है,

    कोऊ कहै व्योम वानी रानी को सदन है।

    कोऊ कहै जल को जम्यों है बिम्ब रघुनाथ,

    कोऊ कहै सागर को सुधा मै नदन है।।

    कोऊ कहै यामिनी को कंद है आनंद मढ़यो

    कोऊ कहै यश जाको करता मदन है।

    मोहि परयो जानी मेरी मत अनुमानि यह

    चाँदनी तिया है ताको चन्द्रमा वदन है।।     

३. कोई कहे राम-नाम, कोई कहे श्याम-नाम, कोई शिव शंकर की कर रहा जय-जय।     

    कोई पूजे अम्बा जी को, कोई जय गणेश बोले कोई हनुमान जी को पूज रहा निर्भय।।

४. नेता को सरकार देश है / बनिए को बाज़ार है,
    अफसर को कुर्सी, बेकारों / को ताज़ा अखबार है।
    पंडों खातिर देश चढ़ोत्री / गृहणी को घर-द्वार है, 
    सैनिक कहता देश वीरता / यौवन कहे बहार है।  
    हरे हित हरिनाम, 'सलिल' को /  देश नर्मदा धार है।।  

५. सीढ़ी कठिन चढ़ाव किसी को, कोई कहे उतार है। 
    शिशु को चढ़ गिरने का भय है,  बूढ़ों को दुश्वार है।। 
    एक कहे सोपान प्रगति है, अवनति दूजा बता रहा।
    कहे विषमता कोई तीसरा, चौथा लेता मजा रहा।।  
     
उल्लेख अलंकार की चर्चा कम ही होती है. पाठ्य पुस्तकों में यह प्रायः अप्राप्य है. आधुनिक कवियों और समकालिक साहित्य में अनजाने ही इसका प्रयोग प्रचुरता से हुआ है. 

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veepsa alankar

अलंकार सलिला ३७ 

वीप्सा अलंकार 
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कविता है सार्थक वही, जिसका भाव स्वभाव

वीप्सा घृणा-विरक्ति है, जिससे कठिन निभाव

अलंकार वीप्सा वहाँ, जहाँ घृणा-वैराग

घृणा हरे सुख-चैन भी, भर जीवन में आग।

जहाँ शब्द की पुनरुक्ति द्वारा घृणा या विरक्ति के भाव की अभिव्यक्ति की जाती है वहाँ वीप्सा अलंकार होता है

उदाहरण:

१. शिव शिव शिव कहते हो यह क्या?

    ऐसा फिर मत कहना। 

    राम राम यह बात भूलकर,

    मित्र कभी मत गहना        

२. राम राम यह कैसी दुनिया?

    कैसी तेरी माया?

    जिसने पाया उसने खोया,

    जिसने खोया पाया

३. चिता जलाकर पिता की, हाय-हाय मैं दीन

    नहा नर्मदा में हुआ, यादों में तल्लीन

४  उठा लो ये दुनिया, जला दो ये दुनिया,

    तुम्हारी है तुम ही सम्हालो ये दुनिया

    ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है?

    ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है?'

५. मेरे मौला, प्यारे मौला, मेरे मौला...

    मेरे मौला बुला ले मदीने मुझे,

    मेरे मौला बुला ले मदीने मुझे

६. नगरी-नगरी, द्वारे-द्वारे ढूँढूँ रे सँवरिया!
   
    पिया-पिया  रटते मैं तो हो गयी रे बँवरिया!!

७. मारो-मारो मार भगाओ आतंकी यमदूतों को 

    घाट मौत के तुरत उतारो दया न कर अरिपूतों को

वीप्सा में शब्दों के दोहराव से घृणा या वैराग्य के भावों की सघनता दृष्टव्य है.

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