० प्रोफ़ेसर (डॉ.) अर्जुन चव्हाण, कोल्हापुर
भारत में तकनीकी शिक्षा के माध्यम के रूप में हिंदी की प्रयोजनमूलकता
सारांश:
कुंजी शब्द : हिंदी माध्यम शिक्षा, तकनीकी शिक्षा, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020, मातृभाषा-आधारित शिक्षा, AICTE, तकनीकी शब्दावली, मशीन अनुवाद, ज्ञान-लोकतंत्रीकरण
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प्राक्कथन :
भारत की भाषिक व्यवस्था विश्व की सर्वाधिक समृद्ध संरचनाओं में से एक है। संविधान की आठवीं अनुसूची में सूचीबद्ध बाईस भाषाओं में हिंदी, जो अनुच्छेद 343 के अंतर्गत राजभाषा है, सर्वाधिक व्यापक भाषिक समुदाय की प्रतिनिधि भाषा है। देश ही नहीं, विदेशों में भी हिंदी के प्रति लगाव और आदर भाव बढने लगा हैI इन पंक्तियों के लेखक की मान्यता है कि ‘‘आज विश्वपटल पर हिंदी एक सक्षम, समृद्ध, सुप्रतिष्ठित संस्कार सम्पन्न राष्ट्र की भाषा के रूप में मान्यता प्राप्त भाषा हैI’’1
शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 29(च) स्पष्ट करती है कि शिक्षण का माध्यम यथासंभव बालक की मातृभाषा में होना चाहिएI2 यह इस मनोवैज्ञानिक तथ्य पर आधारित है कि मस्तिष्क उस भाषा में सर्वाधिक ग्रहणशील होता है जिसमें वह बाल्यकाल से चिंतन करता रहा है। तकनीकी विषयों में, जहाँ अवधारणात्मक स्पष्टता केंद्रीय है, यह सिद्धान्त विशेष महत्त्व रखता है।
हिंदी माध्यम के अंगीकरण से विषय एवं भाषा के दोहरे बोझ से मुक्ति मिलती है तथा ग्रामीण-वंचित विद्यार्थियों की सहभागिता बढ़ती है। इसके विपरीत, माध्यम के अभाव से शैक्षणिक पिछड़ापन, वर्गीय असमानता तथा राष्ट्रीय मानव-संसाधन क्षमता की सीमितता जैसे बहुस्तरीय नुकसान उत्पन्न होते हैं। इन्हीं चुनौतियों के परिप्रेक्ष्य में यह लेख हिंदी की प्रयोजनमूलकता का विवेचन करता है।
विषय-विवेचन :
1. तकनीकी शिक्षा की आवश्यकता एवं वर्तमान माध्यम-स्थिति
भारत की विशाल युवा जनसंख्या के लिए तकनीकी शिक्षा रोजगार-सृजन, कौशल-विकास, नवाचार तथा वैश्विक प्रतिस्पर्धा की दृष्टि से राष्ट्रीय अनिवार्यता है। तथापि, स्वातंत्र्योत्तर भारत में इसका माध्यम मुख्यतः अंग्रेजी रहाI एक औपनिवेशिक विरासत जबकि बहुसंख्यक जनसंख्या की भाषिक क्षमता हिंदी तथा क्षेत्रीय भाषाओं में निहित है। AICTE ने 2021-22 से बारह भारतीय भाषाओं (हिंदी, मराठी, गुजराती, बांग्ला, तमिल, तेलुगु, कन्नड, मलयालम आदि) में तकनीकी पाठ्यपुस्तकों के निर्माण की योजना आरंभ की, जिसके अंतर्गत द्वितीय वर्ष की सामग्री हेतु 18.6 करोड़ रुपये आवंटित किए गएI3 AICTE अध्यक्ष प्रो. टी.जी. सीतारम के अनुसार लगभग 600 पाठ्यपुस्तकें इन भाषाओं में तैयार हो चुकी हैं, और AI-आधारित अनुवाद प्रणाली किसी पुस्तक का 80% यथार्थता के साथ दस मिनट में अनुवाद कर सकती है।4 यह व्यवस्था वैकल्पिक है, अनिवार्य नहीं। तथापि चौबीस लाख इंजीनियरिंग सीटों में से मात्र अठारह लाख ही भर पाती हैं, जो अंग्रेजी की प्रधानता अभी भी सुदृढ़ बने रहने का संकेत है।
2. पिछड़ने के कारण :
भाषाई अवरोध सर्वाधिक मूलभूत कारण हैI विषय और भाषा का युगपत् बोध संज्ञानात्मक भार बढ़ाता है। शिक्षा की पहुँच में असमानता, अंग्रेजी पर अत्यधिक निर्भरता तथा भारतीय भाषाओं में मानकीकृत तकनीकी शब्दावली का अभाव अतिरिक्त बाधाएँ हैं। वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग (CSTT) ने 1961 से कार्य करते हुए लगभग आठ लाख शब्दों का मानकीकरण किया है5 परन्तु इनका शिक्षण-प्रक्रिया में व्यावहारिक प्रचलन सीमित है। इन सबका संचयी परिणाम शोध एवं नवाचार में राष्ट्रीय सीमाओं के रूप में प्रकट होता है।
3. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 तथा मातृभाषा का महत्त्व :
NEP 2020 के अनुच्छेद 4.11 के अनुसार, जहाँ संभव हो, शिक्षण का माध्यम कम से कम कक्षा पाँच तक, अधिमानतः कक्षा आठ तक, मातृभाषा/स्थानीय भाषा होनी चाहिएI6 यह RTE अधिनियम 2009 की धारा 29(च) से सुसंगत है। नीति मूलतः त्रिभाषा सूत्र, समावेशी शिक्षा तथा ज्ञान के लोकतंत्रीकरण पर बल देती है और किसी भाषा को थोपने का निषेध करती है। दीक्षा पोर्टल जैसी पहले पहली से बारहवीं कक्षा तक तैंतीस भारतीय भाषाओं में सामग्री उपलब्ध कराती हैं।7 AICTE की बारह-भाषा पाठ्यपुस्तक योजना इस नीतिगत संकल्प का प्रत्यक्ष संस्थागत क्रियान्वयन है।
4. तकनीकी, अभियांत्रिकी एवं चिकित्सा शिक्षा में हिंदी का महत्त्व :
ज्ञान ग्रहण की सहजता तथा अवधारणात्मक स्पष्टता हिंदी माध्यम का सर्वप्रथम लाभ हैI भाषिक अपरिचय भ्रम उत्पन्न कर सकता है, भले ही अंतर्निहित सिद्धान्त सरल हो। यह ग्रामीण-वंचित वर्गों के सशक्तीकरण तथा राष्ट्रीय ज्ञान-संरचना के विकास से जुड़ा है, जो आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा से संगत है। सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में भाषिणी (BHASHINI) जुलाई 2022 में आरंभ राष्ट्रीय भाषा अनुवाद मिशनबाईस भाषाओं में वाक् पहचान, मशीन अनुवाद तथा लिप्यंतरण सुविधाएँ देता हैI8 IIT मद्रास के AI4 भारत केंद्र द्वारा विकसित इंडिकट्रांस2 मॉडल सभी बाईस अनुसूचित भाषाओं को समर्थन देने वाला प्रथम अनुवाद मॉडल है, जो 23 करोड़ से अधिक द्विभाषिक वाक्य-युगलों पर प्रशिक्षित हैI9 अभियांत्रिकी में हिंदी सहित आठ भारतीय भाषाओं में कंप्यूटर विज्ञान एवं इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम 2021-22 से उपलब्ध कराए गए हैं; AICTE अध्यक्ष डॉ. अनिल सहस्रबुद्धे के अनुसार मातृभाषा में तकनीकी शिक्षा विद्यार्थियों की आधारभूत समझ को सशक्त करती है।10 चिकित्सा शिक्षा में मातृभाषा रोगी-चिकित्सक संवाद तथा जनस्वास्थ्य जागरूकता को अधिक प्रभावी बनाती है, यद्यपि यह क्षेत्र अभी आरंभिक अवस्था में है।
5. प्रमुख समस्याएँ एवं समाधान :
मानकीकृत शब्दावली का अभाव, गुणवत्तापूर्ण पाठ्यसामग्री की कमी, प्रशिक्षित शिक्षकों का अभाव, अनुवाद-संबंधी सीमाएँ, AI-अनुवाद की विश्वसनीयता 80% से अधिक न होना, तथा यह व्यापक धारणा कि भारतीय भाषाएँ जीवन में आगे नहीं ले जा सकतींI ये सभी संस्थागत-मानसिक अवरोध इस परिवर्तन के मार्ग की प्रमुख बाधाएँ हैं। समाधान हेतु आवश्यक है: CSTT के 'शब्द' डिजिटल भंडार (बाईस लाख से अधिक प्रविष्टियाँ)11 का व्यापक संस्थागत उपयोग; AICTE की पाठ्यपुस्तक योजना का सभी वर्षों-शाखाओं तक विस्तार; शिक्षक-प्रशिक्षण कार्यक्रम; AI अनुवाद प्रणालियों का निरंतर परिष्कार; तथा NEP 2020 के मातृभाषा-प्रावधानों के क्रियान्वयन हेतु सतत नीतिगत एवं बजटीय सहायता। जिस गति से समाधान का क्रियान्वयन होगा, उसी के अनुपात में तकनीकी शिक्षा के माध्यम भाषा के रूप में हिंदी को सुस्थापित करना सुलभ होगा I साथ ही उस राष्ट्र का भी भला होगा, जिसके हम निवासी हैं और जिसकी भाषा हिंदी है I
निष्कर्ष :
भारत में तकनीकी शिक्षा के माध्यम के रूप में हिंदी की प्रयोजनमूलकता एक बहुआयामी एवं व्यावहारिक रूप से क्रियान्वयन-योग्य संभावना है। NEP 2020 ने मातृभाषा-आधारित शिक्षा को संवैधानिक तथा नीतिगत आधार दिया है और AICTE की पहलों ने इसे संस्थागत कार्यक्रमों में रूपांतरित करना आरंभ किया है। बारह भारतीय भाषाओं में निर्मित होती पाठ्यपुस्तकें, तथा अठारह से अधिक संस्थानों में पहले से ही प्रारंभ हुए क्षेत्रीय-भाषा पाठ्यक्रम, यह प्रमाणित करते हैं कि यह परिवर्तन अब केवल कागजी नीति नहीं अपितु ज़मीनी क्रियान्वयन की दिशा में अग्रसर है। तथापि, तकनीकी तथा पारिभाषिक शब्दावली, पाठ्यसामग्री तथा शिक्षक-प्रशिक्षण संबंधी संरचनात्मक बाधाएँ अभी भी विद्यमान हैं, जिनके समाधान हेतु बहु-हितधारक, समन्वित तथा सतत प्रयासों की आवश्यकता हैI केवल नीतिगत घोषणाओं से यह परिवर्तन पूर्ण नहीं हो सकता। भाषिणी तथा इंडिकट्रांस2 जैसी AI आधारित अनुवाद प्रणालियों के विकास ने इस परिवर्तन को पहले से कहीं अधिक व्यावहारिक एवं सुगम बना दिया है, जिससे अनुवाद की पारंपरिक बाधा समय एवं व्यय दोनों की दृष्टि से उल्लेखनीय रूप से कम हुई है।
अंततः यह रेखांकित करना अत्यंत आवश्यक लगता है कि हिंदी को तकनीकी शिक्षा के माध्यम के रूप में अपनाना केवल भाषाई प्रश्न नहीं, अपितु यह ज्ञान-लोकतंत्रीकरण, सामाजिक न्याय, शैक्षिक समानता, कौशल विकास तथा आत्मनिर्भर भारत के निर्माण से जुड़ा एक व्यापक शिक्षा-दार्शनिक प्रश्न है। जब तकनीकी ज्ञान भाषिक अवरोधों से मुक्त होकर देश के प्रत्येक कोने तक ग्रामीण से नगरीय, वंचित से संभ्रांत समान रूप से सुलभ होगा, तभी भारत अपनी संपूर्ण मानव-संसाधन क्षमता का सही रूप में उपयोग कर सकेगा। इसकी सफलता पर ज्ञान-समृद्ध तथा आत्मनिर्भर भारत के निर्माण को गति मिलेगी, इसमें संदेह नहीं।
संदर्भ सूची (APA Style):
1. विश्वमंच पर हिंदी : विविध आयाम – प्रोफेसर (डॉ.) अर्जुन चव्हाण, पृष्ठ 8, अमन प्रकाशन, कानपुर, प्रथम सं. 2021
2. Government of India. (2009). The Right of Children to Free and Compulsory Education Act, 2009 (Section 29(f)). https://www.education.gov.in/rte
3. India Education Diary. (2022, July 15). AICTE bets big on engineering in Indian languages, undertakes the translation of technical books in 12 scheduled languages. https://indiaeducationdiary.in/aicte-bets-big-on-engineering-in-indian-languages-undertakes-the-translation-of-technical-books-in-12-scheduled-languages/
4. Elets digitalLEARNING. (2025, April 8). AICTE to provide engineering textbooks in 12 Indian languages by 2026. https://digitallearning.eletsonline.com/2025/04/aicte-to-provide-engineering-textbooks-in-12-indian-languages-by-2026/
5. Commission for Scientific and Technical Terminology. (n.d.). About CSTT. Ministry of Education, Government of India. https://www.cstt.education.gov.in/en
6. Government of India. (2020). National Education Policy 2020 (Para 4.11). Ministry of Education. https://www.education.gov.in/sites/upload_files/mhrd/files/NEP_Final_English_0.pdf
7. Press Information Bureau, Government of India. (n.d.). Education in mother tongue. https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=1847061
8. Digital India Bhashini Division. (n.d.). Bhashini. Ministry of Electronics and Information Technology, Government of India. https://en.wikipedia.org/wiki/Bhashini
9. Gala, J., Chitale, P. A., AK, R., Gumma, V., Doddapaneni, S., Kumar, A., Nawale, J., Sujatha, A., Puduppully, R., Raghavan, V., Kumar, P., Khapra, M. M., Dabre, R., & Kunchukuttan, A. (2023). IndicTrans2: Towards high-quality and accessible machine translation models for all 22 scheduled Indian languages. Transactions on Machine Learning Research. https://arxiv.org/abs/2305.16307
10. Punekar News. (2021, May 27). Students can now take classes of engineering in their mother tongue: AICTE. https://www.punekarnews.in/students-can-now-take-classes-of-engineering-in-their-mother-tongue-aicte/
11. ForumIAS. (2024, September 13). Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT). https://forumias.com/blog/commission-for-scientific-and-technical-terminology-cstt/
० अरुण अर्णव खरे
डिजिटल युग, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और हिंदी तकनीकी कंटेंट : अवसर, चुनौतियाँ और भविष्य
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बदलती हुई समय की तस्वीर
पिछले एक दशक में भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। सस्ते स्मार्टफोन, 4जी–5जी नेटवर्क, डिजिटल भुगतान, ई-गवर्नेंस और ऑनलाइन शिक्षा ने तकनीक को आम नागरिक तक पहुँचा दिया है। गाँवों और छोटे शहरों का युवा अब केवल मनोरंजन के लिए इंटरनेट का उपयोग नहीं करता, बल्कि प्रोग्रामिंग, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल मार्केटिंग, साइबर सुरक्षा, कृषि तकनीक और उद्यमिता जैसे विषय भी सीखना चाहता है।
यूट्यूब, ब्लॉग, पॉडकास्ट, ऑनलाइन पाठ्यक्रम और सोशल मीडिया ने हिंदी तकनीकी कंटेंट की माँग को कई गुना बढ़ा दिया है। पिछले कुछ वर्षों में हिंदी तकनीकी सामग्री की मात्रा तेजी से बढ़ी है, फिर भी उसकी गुणवत्ता और गहराई में पर्याप्त सुधार की आवश्यकता है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि अधिकांश सामग्री अभी भी अंग्रेज़ी स्रोतों के अनुवाद पर आधारित है। अनेक यूट्यूब वीडियो और ब्लॉग केवल विदेशी लेखों का सरलीकृत रूप प्रस्तुत करते हैं। उनमें मूल अवधारणाओं की व्याख्या, भारतीय संदर्भ, व्यावहारिक उदाहरण और आलोचनात्मक विश्लेषण का अभाव रहता है। उदाहरण के लिए यदि कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर चर्चा हो, तो कई लेख केवल यह बता देते हैं कि एआई क्या है, लेकिन यह नहीं समझाते कि स्वास्थ्य, न्याय, शिक्षा, कृषि या प्रशासन में इसका व्यावहारिक उपयोग कैसे हो सकता है। इसी प्रकार साइबर सुरक्षा, ब्लॉकचेन, क्लाउड कंप्यूटिंग, क्वांटम कंप्यूटिंग अथवा मशीन लर्निंग जैसे विषयों पर अधिकांश हिंदी सामग्री परिचयात्मक स्तर से आगे नहीं बढ़ पाई है।
दूसरी समस्या तकनीकी शब्दावली की है। एक ही शब्द के लिए अलग-अलग लेखक अलग-अलग हिंदी शब्दों का प्रयोग करते हैं। उदाहरण के लिए Cache के लिए कहीं कैश, कहीं अंतरिम स्मृति, तो कहीं अस्थायी भंडार लिखा जाता है। Cloud Computing को कोई क्लाउड कंप्यूटिंग लिखता है, तो कोई मेघ संगणन। Computer के लिए कंप्यूटर और संगणक दोनों प्रचलित हैं। ऐसी विविधता विद्यार्थियों और सामान्य पाठकों में भ्रम उत्पन्न करती है।
मेरे विचार से मानकीकरण आवश्यक है, लेकिन अति-हिंदीकरण नहीं। भाषा का उद्देश्य संप्रेषण है, परीक्षा लेना नहीं। यदि कोई शब्द पहले से ही विश्वभर में प्रचलित है और हिंदी समाज ने उसे सहज रूप से स्वीकार कर लिया है, तो उसका कृत्रिम अनुवाद करने का कोई विशेष लाभ नहीं है। आज कोई भी व्यक्ति कंप्यूटर, मोबाइल, इंटरनेट, ई-मेल, डाउनलोड, प्रिंटर, स्कैनर, सर्वर, ब्राउज़र, ऐप जैसे शब्द सहजता से समझ लेता है। यदि इनके स्थान पर संगणक, अंतरजाल, अधोभारण, मुद्रक या अनुप्रयोग जैसे शब्द अनिवार्य कर दिए जाएँ, तो तकनीकी लेखन आम पाठक से दूर हो जाएगा। हाँ, जिन शब्दों के लिए सरल, सुबोध और व्यापक रूप से स्वीकार्य हिंदी उपलब्ध है, उनका प्रयोग अवश्य होना चाहिए। उदाहरण के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence), साइबर सुरक्षा (Cyber Security), डेटा गोपनीयता (Data Privacy), डिजिटल भुगतान (Digital Payment) आदि। अर्थात् सर्वोत्तम नीति वही होगी जिसे भाषा-विज्ञानी व्यावहारिक द्विभाषिकता (Pragmatic Bilingualism) कहते हैं। व्यापक रूप से स्वीकृत अंग्रेज़ी शब्दों को देवनागरी में अपनाया जाए और जहाँ आवश्यक हो वहाँ उनके साथ सरल हिंदी अर्थ भी दिए जाएँ।
एआई ने बदल दी लेखन की दुनिया
एआई ने लेखन प्रक्रिया का स्वरूप बदल दिया है। पहले किसी तकनीकी विषय पर लेख लिखने के लिए लेखक को अनेक पुस्तकों, शोध-पत्रों और वेबसाइटों से सामग्री एकत्र करनी पड़ती थी। प्रारंभिक मसौदा तैयार करने में ही कई घंटे, कभी-कभी कई दिन लग जाते थे। अब वही प्रारंभिक मसौदा एआई कुछ ही मिनटों में तैयार कर सकता है। इससे लेखक का समय बचता है, जिसे वह तथ्यों की जाँच, संदर्भों की पुष्टि, भाषा को अधिक प्रभावशाली बनाने और अपने मौलिक विचार जोड़ने में लगा सकता है। इस प्रकार एआई लेखक का प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि उसका सक्षम सहायक बन सकता है।
उदाहरण के लिए, यदि किसी लेखक को 'क्वांटम कंप्यूटिंग' पर लेख लिखना है, तो एआई कुछ ही क्षणों में उसकी रूपरेखा, प्रमुख अवधारणाएँ, तकनीकी शब्दों की व्याख्या और विश्व में हुए नवीनतम शोधों का संक्षिप्त परिचय उपलब्ध करा सकता है, किंतु यह तय करना कि कौन-सी जानकारी विश्वसनीय है, भारतीय पाठकों के लिए कौन-से उदाहरण अधिक उपयुक्त होंगे, किन तथ्यों का संदर्भ देना चाहिए और लेख में किस प्रकार का विश्लेषण या निष्कर्ष प्रस्तुत किया जाए, यह कार्य अभी भी लेखक को ही करना पड़ता है। एआई लेखन की गति बढ़ा सकता है, लेकिन लेखन की गुणवत्ता और विश्वसनीयता अभी भी मानव लेखक के विवेक पर निर्भर करती है।
एक और उदाहरण से मैं अपनी बात स्पष्ट करना चाहता हूँ। किसी शिक्षक को "साइबर सुरक्षा" पर विद्यार्थियों के लिए व्याख्यान तैयार करना हो तो एआई कुछ ही मिनटों में व्याख्यान का प्रारूप, उदाहरण, प्रश्नोत्तरी और प्रस्तुति तैयार कर सकता है, लेकिन शिक्षक को अपने विद्यार्थियों की आयु, समझ, स्थानीय परिस्थितियों और कक्षा के स्तर के अनुसार उसमें आवश्यक परिवर्तन करने होंगे। इसलिए अंतिम प्रभावी व्याख्यान एआई और शिक्षक, दोनों के संयुक्त प्रयास का परिणाम होता है।
मेरे विचार से यह उदाहरण विशेष रूप से प्रभावी है, क्योंकि यह स्पष्ट करता है कि एआई "पहला ड्राफ्ट" लिखता है, जबकि "अंतिम लेख" लेखक की बौद्धिक क्षमता, अनुभव और दृष्टि से तैयार होता है। यही अंतर एआई को सहायक और मनुष्य को रचनाकार बनाता है।
हिंदी तकनीकी कंटेंट का भविष्य
आने वाले पाँच से दस वर्षों में हिंदी तकनीकी कंटेंट का स्वरूप आज से बिल्कुल अलग होगा। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में हिंदी माध्यम के विद्यार्थियों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित व्यक्तिगत शिक्षण उपलब्ध होगा। विद्यार्थी अपनी गति और क्षमता के अनुसार पढ़ सकेंगे तथा एआई उन्हें तत्काल प्रतिक्रिया, अभ्यास और त्रुटि-सुधार उपलब्ध कराएगा।
सॉफ्टवेयर, प्रोग्रामिंग टूल्स, एपीआई दस्तावेज़, तकनीकी प्रशिक्षण और शोध सामग्री भी धीरे-धीरे हिंदी में उपलब्ध होने लगेगी। ओपन-सोर्स समुदाय, विश्वविद्यालय और उद्योग यदि मिलकर कार्य करें तो तकनीकी शब्दावली का मानकीकरण भी संभव होगा। इससे हिंदी केवल साहित्य की भाषा नहीं रहेगी, बल्कि विज्ञान, इंजीनियरिंग, चिकित्सा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भी प्रभावी भाषा बन सकेगी।
पिछले कुछ वर्षों में हिंदी तकनीकी पारिस्थितिकी ने उल्लेखनीय प्रगति की है। भारतीय भाषाओं में कंप्यूटिंग के विकास की आधारशिला रखने में सी-डैक (C-DAC) की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही है। आज उसी दिशा को भाषिणी, अनुवादिनी और अन्य एआई आधारित परियोजनाएँ नई गति प्रदान कर रही हैं। भारत सरकार की भाषिणी (BHASHINI) परियोजना भारतीय भाषाओं के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित अनुवाद, वाणी पहचान और टेक्स्ट-टू-स्पीच जैसी सुविधाओं के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। अनुवादिनी (Anuvadini), दीक्षा (DIKSHA), स्वयं (SWAYAM) तथा उमंग (UMANG) जैसे प्लेटफॉर्म हिंदी में शिक्षा, ई-गवर्नेंस और डिजिटल सेवाओं की पहुँच बढ़ा रहे हैं। दूसरी ओर ChatGPT, Gemini, Copilot तथा अन्य एआई आधारित उपकरणों ने हिंदी में तकनीकी लेखन, अनुवाद और अध्ययन सामग्री तैयार करना अत्यंत सरल बना दिया है। YouTube पर हजारों हिंदी चैनल अब प्रोग्रामिंग, डेटा साइंस, साइबर सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और वेब डेवलपमेंट जैसे जटिल विषयों को सहज भाषा में समझा रहे हैं। फिर भी अधिकांश सामग्री अभी अंग्रेज़ी स्रोतों पर आधारित अनुवाद या प्रारंभिक स्तर की व्याख्या तक सीमित है। उदाहरणस्वरूप मशीन लर्निंग, क्वांटम कंप्यूटिंग, ब्लॉकचेन या साइबर सुरक्षा जैसे विषयों पर गहन और शोधपरक हिंदी सामग्री अभी भी अपेक्षाकृत कम उपलब्ध है।
एआई बनाम मानव का आईक्यू : क्या मशीन वास्तव में अधिक बुद्धिमान है?
कृत्रिम बुद्धिमत्ता की बढ़ती क्षमताओं को देखकर अक्सर यह प्रश्न उठता है कि क्या एआई मनुष्य से अधिक बुद्धिमान हो जाएगी। इसका उत्तर सरल "हाँ" या "नहीं" में नहीं दिया जा सकता। आईक्यू परीक्षण मनुष्यों के लिए बनाए गए हैं जबकि एआई के प्रदर्शन को बेंचमार्क (जैसे MMLU, GPQA, ARC, SWE-Bench आदि) से आँका जाता है। फिर भी कुछ शोधकर्ताओं ने जिज्ञासावश आधुनिक एआई मॉडलों पर मानव आईक्यू परीक्षणों के प्रश्न चलाए हैं लेकिन ये अनौपचारिक या प्रयोगात्मक तुलनाएँ भर हैं, न कि एआई का आधिकारिक आईक्यू। कुछ प्रयोगों में ChatGPT-4, Claude और Gemini जैसे मॉडलों ने तर्कशक्ति, भाषा-समझ, गणित और पैटर्न पहचान से जुड़े अनेक प्रश्नों के सही उत्तर दिए। कुछ शोधों में इनके प्रदर्शन की तुलना 120 से 150 या उससे अधिक आईक्यू वाले मनुष्यों के स्तर से की गई। इसके सामानांतर टेरेन्स टाओ या मर्लिन वोस सावंट जैसे व्यक्तियों का अनुमानित आईक्यू 220-230 के आसपास माना जाता है। इतिहास की महानतम महिला शतरंज खिलाड़ियों में से एक जूडित पोल्गार का आई क्यू 170 माना गया है। इसके बावजूद यह तुलना भ्रामक हो सकती है, क्योंकि एआई का मूल्यांकन मानव आईक्यू परीक्षणों से नहीं, बल्कि विशेष बेंचमार्कों से किया जाता है। मनुष्य की मौलिकता, संवेदना, नैतिक विवेक और अनुभवजन्य निर्णय क्षमता का अभी तक कोई समकक्ष माप एआई में उपलब्ध नहीं है।
एआई की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विशाल स्मृति, तीव्र गणना क्षमता और कुछ ही सेकंड में लाखों दस्तावेज़ों का विश्लेषण करने की योग्यता है। इसके विपरीत मनुष्य सीमित जानकारी के आधार पर भी अनुभव, अंतर्ज्ञान, संवेदना, नैतिक विवेक और रचनात्मक कल्पना के सहारे निर्णय ले सकता है। उदाहरण के लिए कोई एआई शेक्सपीयर, प्रेमचंद और निराला की शैली में कविता लिख सकता है, किंतु कविता की अनुभूति नहीं कर सकता, वह करुणा पर लेख लिख सकता है, किंतु करुणा का अनुभव नहीं कर सकता। इसी प्रकार एआई किसी रोग के हजारों शोध-पत्रों का विश्लेषण कर सकता है, पर किसी चिकित्सक की मानवीय सहानुभूति और परिस्थितिजन्य निर्णय क्षमता का स्थान नहीं ले सकता। इसलिए एआई और मनुष्य की तुलना प्रतिस्पर्धियों के रूप में नहीं, बल्कि सहयोगियों के रूप में अधिक उपयुक्त है। भविष्य उसी का होगा जो एआई की गति, विशाल ज्ञान-संग्रह और मानव की विवेकपूर्ण बुद्धि, संवेदना तथा नैतिक निर्णय क्षमता का संतुलित उपयोग करना सीखेगा।
हिंदी के सामने सबसे बड़ी चुनौती
अधिकांश बड़े एआई मॉडल अंग्रेज़ी और पश्चिमी डेटा पर प्रशिक्षित हैं। परिणामस्वरूप भारतीय सामाजिक संदर्भ, पारिवारिक संरचना और सांस्कृतिक प्रतीकों की व्याख्या कई बार अधूरी या पश्चिमी दृष्टिकोण से प्रभावित दिखाई देती है। इसलिए भारतीय भाषाओं के लिए स्थानीय डेटा, स्थानीय विशेषज्ञता और भारतीय संदर्भों पर आधारित प्रशिक्षण अत्यंत आवश्यक है।
दूसरा प्रश्न है, क्या हिंदी में तकनीकी कंटेंट विकसित करने से हम दुनिया से कट जाएँगे? यह आशंका स्वाभाविक है कि यदि तकनीकी ज्ञान हिंदी में उपलब्ध कराया जाएगा, तो कहीं हम वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय से अलग-थलग तो नहीं पड़ जाएँगे। वास्तव में यह चिंता निराधार है। दुनिया के अनेक विकसित देशों ने अपनी मातृभाषा में शिक्षा, शोध और तकनीकी सामग्री का विशाल भंडार तैयार किया है, फिर भी वे वैश्विक विज्ञान और तकनीक के अग्रणी देशों में शामिल हैं। जापान में अधिकांश इंजीनियरिंग शिक्षा जापानी भाषा में होती है। जर्मनी ने उच्च शिक्षा और औद्योगिक अनुसंधान में जर्मन भाषा को मजबूत बनाए रखा है। फ्रांस आज भी विज्ञान, प्रशासन और तकनीकी दस्तावेज़ों में फ्रेंच को प्राथमिकता देता है। चीन ने इंटरनेट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इंजीनियरिंग और डिजिटल प्रौद्योगिकी का विशाल पारिस्थितिकी तंत्र मंदारिन भाषा में विकसित किया है। दक्षिण कोरिया ने भी तकनीकी शिक्षा और डिजिटल सेवाओं का अधिकांश आधार कोरियाई भाषा में तैयार किया है। इन देशों के वैज्ञानिक अंग्रेज़ी जानते हैं, अंतरराष्ट्रीय शोध-पत्र अंग्रेज़ी में भी प्रकाशित करते हैं, किंतु अपने नागरिकों के लिए ज्ञान का प्राथमिक माध्यम अपनी मातृभाषा को ही बनाए रखते हैं।
भारत के लिए भी यही संतुलित मॉडल अधिक उपयुक्त होगा। प्रारंभिक शिक्षा, तकनीकी प्रशिक्षण, डिजिटल साक्षरता और जनसामान्य के लिए ज्ञान-विज्ञान की सामग्री हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में उपलब्ध होनी चाहिए, जबकि वैश्विक शोध, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और नवीनतम वैज्ञानिक साहित्य तक पहुँच के लिए अंग्रेज़ी का ज्ञान भी समान रूप से आवश्यक है। प्रश्न "हिंदी या अंग्रेज़ी" का नहीं, बल्कि "हिंदी और अंग्रेज़ी" का है। मातृभाषा में ज्ञान सीखने से समझ गहरी होती है, जबकि अंग्रेज़ी वैश्विक संवाद का माध्यम बनती है। यदि हिंदी में उच्च गुणवत्ता का तकनीकी कंटेंट विकसित किया जाता है, तो वह करोड़ों भारतीयों को ज्ञान की मुख्यधारा से जोड़ेगा, न कि उन्हें दुनिया से अलग करेगा। वास्तव में जो समाज अपनी भाषा में ज्ञान का सृजन करता है, वही वैश्विक ज्ञान-समुदाय में अधिक आत्मविश्वास के साथ योगदान देने में सक्षम होता है।
आवश्यकता ऐसे लेखकों, शिक्षकों और शोधकर्ताओं की है जो सीधे हिंदी में सोचें, लिखें और तकनीकी विषयों को भारतीय संदर्भों के साथ प्रस्तुत करें। तकनीकी शब्दावली का संतुलित प्रयोग भी आवश्यक है। अत्यधिक संस्कृतनिष्ठ शब्द पाठक को दूर कर देते हैं, जबकि अत्यधिक हिंग्लिश भाषा की गरिमा घटा सकती है। इसलिए वही शब्द अपनाने चाहिए जो सरल, प्रचलित और अर्थ-स्पष्ट हों।
डिजिटल युग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता हिंदी के लिए अभूतपूर्व अवसर लेकर आए हैं। आज पहली बार यह संभावना बनी है कि विश्वस्तरीय तकनीकी ज्ञान करोड़ों हिंदी भाषियों तक उनकी अपनी भाषा में पहुँचे। इससे शिक्षा, उद्यमिता, शोध, नवाचार और सामाजिक समावेशन को नई गति मिलेगी। यह भविष्य स्वतः निर्मित नहीं होगा। इसके लिए सरकार, विश्वविद्यालयों, उद्योग, भाषा विशेषज्ञों, तकनीकी समुदाय और लेखकों को मिलकर कार्य करना होगा। एआई को अंतिम लेखक नहीं, बल्कि एक दक्ष सहायक के रूप में स्वीकार करना होगा। तथ्य-जाँच, मौलिक चिंतन, सांस्कृतिक संवेदनशीलता और मानवीय विवेक की भूमिका भविष्य में और अधिक महत्वपूर्ण होगी।
संदर्भ:1. The Ethics of Artificial Intelligence (Unesco), 2. डिजिटल इंडिया भाषिणी (BHASHINI) – राष्ट्रीय भाषा प्रौद्योगिकी मिशन, 3. सी-डैक (C-DAC) – भारतीय भाषा प्रौद्योगिकी एवं डिजिटल नवाचार संबंधी प्रकाशन, 4. OECD – Artificial Intelligence Policy Observatory, 5. स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय – AI Index Report (वार्षिक वैश्विक एआई रिपोर्ट)
- से.नि. मुख्य अभियंता लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग म.प्र., बी.ई. मेकेनिकल भोपाल विश्व विद्यालय, २ उपन्यास, ५ कहानी संग्रह, ५ व्यंग्य संग्रह, ३ काव्य संग्रह १० पुस्तकें खेलों पर प्रकाशित। आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर वार्ताओं का प्रसारण। अनेक सम्मान। आवास- डी-1/35 दानिश नगर भोपाल (म.प्र.) 462026 चलभाष 9893007744, ईमेल: sportsbharti@gmail.com
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आज के समय में हम एक विचित्र स्थिति देख रहे हैं। हमारे बच्चों के पास पहले से अधिक सुविधाएँ हैं, बेहतर शिक्षा है, बेहतर संसाधन हैं, असीमित जानकारी उपलब्ध है फिर भी कई बच्चे असफलता, आलोचना, अस्वीकृति और तुलना की जाने के कारण पहले की पीढ़ियों के बच्चों की तुलना में अधिक असन्तुष्ट दिखाई देते हैं। इसलिए आज हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी केवल बुद्धिमान बच्चे बनाना नहीं है। हमें ऐसे बच्चे तैयार करने हैं जो जीवन की चुनौतियों का सामना कर सकें।जो गिरें लेकिन फिर उठ खड़े हों। इसी क्षमता को रेज़िलियेंस कहते हैं।
रेज़िलियेंस क्या और क्यों ?
रेसीलिएंस और मातृभाषा
क्या बच्चों को हर कठिनाई से बचाना चाहिए? हर माता-पिता अपने बच्चे को दुख से बचाना चाहते हैं। यह स्वाभाविक है। यदि हम बच्चे के सामने आनेवाली हर छोटी कठिनाई को हटा देंगे, तो वह चुनौतियों से निपटना नहीं सीख पाएगा। जैसे मांसपेशियाँ उपयोग से मजबूत होती हैं, वैसे ही मानसिक मजबूती भी अनुभवों से विकसित होती है। हिंदी में तकनीकी विषय सुनना-समझना, पढ़ना और लिखना एक मानसिक चुनौती प्रस्तुत करती है। आरंभ में तकनीकी जानकारी हिंदी में बोलना -राजा कठिन प्रतीत होता है किंतु क्रमश: सरल होता जाता है। जब बच्चा साइकिल सीखता है तो वह कई बार गिरता है। यदि हर बार हम उसे साइकिल से उतार दें तो वह कभी सीख नहीं पाएगा। लेकिन यदि हम उसके पास खड़े रहें, उसे प्रोत्साहित करें, और दोबारा प्रयास करने दें, तो वह सीख जाता है। जीवन भी कुछ ऐसा ही है।
प्रयास की प्रशंसा कीजिए
बच्चों की केवल उपलब्धियों की नहीं, बल्कि उनके प्रयासों की भी प्रशंसा कीजिए। जब बच्चा समझता है कि उसकी मेहनत महत्वपूर्ण है, तो वह असफलता से कम डरता है। तुलना रेज़िलियेंस की दुश्मन है।
"देखो, शर्मा जी का बेटा..."
यह वाक्य अनेक बच्चों के आत्मविश्वास को नुकसान पहुँचाता है। हर बच्चा अलग है। हर बच्चे की यात्रा अलग है। तुलना की बजाय प्रगति पर ध्यान दीजिए। समस्या नहीं, समाधान सोचने की आदत डालिए। जब बच्चे के सामने कोई समस्या आए तो तुरंत समाधान देने की बजाय पूछिए- "तुम्हारे अनुसार इसका समाधान क्या हो सकता है?" धीरे-धीरे बच्चा मस्या सुलझाने वाला व्यक्ति बनता है। भावनाओं को स्वीकार कीजिए। रेज़िलियेंस का अर्थ भावनाओं को दबाना नहीं है। यदि बच्चा दुखी है, तो उसे दुखी होने का अधिकार है। यदि वह निराश है, तो उसकी बात सुनिए। सुनना-समझना और समर्थन देना मानसिक मजबूती का आधार है।
परिवार सबसे बड़ा सुरक्षा कवच
जो बच्चे प्रेम, स्वीकृति और सुरक्षा का अनुभव करते हैं, वे कठिन परिस्थितियों से बेहतर उबर पाते हैं। उन्हें पता होता है कि दुनिया चाहे जैसी हो घर उनका सुरक्षित स्थान है।गलतियों को सीखने का अवसर मानिए गलती करना असफलता नहीं है।गलती करना सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा है। जो बच्चे गलतियों से डरते नहीं, वे नई चीज़ें सीखने का साहस रखते हैं।
जीवन में सफलता केवल प्रतिभा से नहीं मिलती। मैंने ऐसे अनेक बच्चों को देखा है जो बहुत प्रतिभाशाली थे, लेकिन चुनौतियों के सामने टूट गए और ऐसे भी बच्चे देखे हैं जो साधारण क्षमताओं के बावजूद असाधारण उपलब्धियाँ प्राप्त कर गए। जो जीत गए उनमें एक बात समान थी वे हार मानना नहीं जानते थे। यदि हम अपने बच्चों को गिरकर फिर उठना सिखा दें, तो हमने उन्हें जीवन की सबसे मूल्यवान सीख दे सकेंगे और यह सीख केवल और केवल अपनी भाषा में दी जा सकती है, किसी विदेशी भाषा में नहीं।