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बुधवार, 21 फ़रवरी 2024

२१ फरवरी,सॉनेट,नदी,छंद विधान,शेर,चित्रालंकार,हाइकु,सदोका,तांका,नवगीत,सवैया,हास्य,लघुकथा,सुमन लता श्रीवास्तव,

सलिल सृजन २१ फरवरी
*
लघुकथा
शेर नहीं हिरण
*
- 'जियो तो ऐसे जियो जैसे सब तुम्हारा है' ज़िंदगी जीना है तो राजा की तरह जियो, शेर की तरह जिओ। जहाँ जाता है वानर उसके आगमन की सूचना देते हैं, हिरण भागने लगते हैं फिर भी मारे जाते हैं।' गुरु जी शिष्य को उपदेश दे रहे थे।
= 'मगर गुरु जी! शेर की तरह जीकर क्या फायदा? शेर अपने १०० हमलों में ७५ से ८० बार नाकामयाब रहता है, जबकि हिरण बच जाता है।'
- 'इससे क्या? शेर आखिर शेर है।'
= 'सो तो है, शेर आखिर शेर है जो दुनिया से लापता होने की कगार पर आ पहुँचा है। बेचारा अपने सबसे बड़े दुश्मन और हत्त्यारे आदमी के रहमो-करम पर जिन्दा है चिड़ियाघरों में तमाशा बनकर। इससे तो हिरण ही अच्छा है, दिखता कमजोर है पर आज तक मिटा नहीं। शेर ही नहीं आदमी, चीता, बाघ, तेंदुआ और अन्य कई हत्यारे मिलकर भी उसे मिटा नहीं सके। जानवर मारने को न मिलें तो शेर भूख से मर जाएगा पर हिरण घास-फूस खाकर काम चला लेगा। इसलिए ताकत नहीं लचीलापन, सहनशीलता और सद्भाव रखकर हिरन बनना ही बेहतर है।'
२१-२-२०२२
***
सॉनेट
नदी
नदी नहीं है सिर्फ नदी।
जीवन-मृत्यु किनारे इसके।
सपने पलें सहारे इसके।।
देख नदी में अगिन सदी।।
मरु को मधुवन नदी बनाती।
मिले मेघ से जितना पानी।
सागर को जा देती दानी।।
जीवन को जीना सिखलाती।।
गर्मी-सर्दी, धूप-छाँव में।
पर्वत-जंगल नगर गाँव में।
बहती रुके न एक ठाँव में।।
जननी जन्मे, विहँस पालती।
काम न किंचित कभी टालती।
नव आशा का दीप बालती।।
२१-२-२०२२
•••
लेख :
छंद और छंद विधान
*
वेद को सकल विद्याओं का मूल माना गया है । वेद के ६ अंगों (छंद, कल्प, ज्योतिऽष , निरुक्त, शिक्षा तथा व्याकरण) में छंद का प्रमुख स्थान है ।
छंदः पादौतु वेदस्य हस्तौ कल्पोऽथ कथ्यते ।
ज्योतिऽषामयनं नेत्रं निरुक्तं श्रोत्र मुच्यते ।।
शिक्षा घ्राणंतुवेदस्य मुखंव्याकरणंस्मृतं
तस्मात् सांगमधीत्यैव ब्रम्हलोके महीतले ।।
वेद का चरण होने के कारण छंद पूज्य है । छंदशास्त्र का ज्ञान न होने पर मनुष्य पंगुवत है, वह न तो काव्य की यथार्थ गति समझ सकता है न ही शुद्ध रीति से काव्य रच सकता है । छंदशास्त्र को आदिप्रणेता महर्षि पिंगल के नाम पर पिंगल तथा पर्यायवाची शब्दों सर्प, फणि, अहि, भुजंग आदि नामों से संबोधित कर शेषावतार माना जाता है । जटिल से जटिल विषय छंदबद्ध होने पर सहजता से कंठस्थ ही नहीं हो जाता, आनंद भी देता है ।
नरत्वं दुर्लभं लोके विद्या तत्र सुदुर्लभा ।
कवित्वं दुर्लभं तत्र, शक्तिस्तत्र सुदुर्लभा ।।
अर्थात संसार में नर तन दुर्लभ है, विद्या अधिक दुर्लभ, काव्य रचना और अधिक दुर्लभ तथा सुकाव्य-सृजन की शक्ति दुर्लभतम है । काव्य के पठन-पाठन अथवा श्रवण से अलौकिक आनंद की प्राप्ति होती है ।
काव्यशास्त्रेण विनोदेन कालो गच्छति धीमताम ।
व्यसने नच मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा ।।
विश्व की किसी भी भाषा का सौंदर्य उसकी कविता में निहित है । प्राचीन काल में शिक्षा का प्रचार-प्रसार कम होने के कारण काव्य-सृजन केवल कवित्व शक्ति संपन्न प्रतिभावान महानुभावों द्वारा किया जाता था जो श्रवण परंपरा से छंद की लय व प्रवाह आत्मसात कर अपने सृजन में यथावत अभिव्यक्त कर पाते थे । वर्तमान काल में शिक्षा का सर्वव्यापी प्रचार-प्रसार होने तथा भाषा या काव्यशास्त्र से आजीविका के साधन न मिलने के कारण सामान्यतः अध्ययन काल में इनकी उपेक्षा की जाती है तथा कालांतर में काव्याकर्षण होने पर भाषा का व्याकरण- पिंगल समझे बिना छंदहीन तथा दोषपूर्ण काव्य रचनाकर आत्मतुष्टि पाल ली जाती है जिसका दुष्परिणाम आमजनों में कविता के प्रति अरुचि के रूप में दृष्टव्य है । काव्य के तत्वों रस, छंद, अलंकार आदि से संबंधित सामग्री व उदाहरण पूर्व प्रचलित भाषा / बोलियों में होने के कारण उनका आशय हिंदी के वर्तमान रूप से परिचित छात्र पूरी तरह समझ नहीं पाते । प्राथमिक स्तर पर अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा के चलन ने हिंदी की समझ और घटायी है ।
छंद विषयक चर्चा के पूर्व हिंदी भाषा की आरंभिक जानकारी दोहरा लेना लाभप्रद होगा ।
भाषा :
अनुभूतियों से उत्पन्न भावों को अभिव्यक्त करने के लिए भंगिमाओं या ध्वनियों की आवश्यकता होती है। भंगिमाओं से नृत्य, नाट्य, चित्र आदि कलाओं का विकास हुआ। ध्वनि से भाषा, वादन एवं गायन कलाओं का जन्म हुआ।
चित्र गुप्त ज्यों चित्त का, बसा आप में आप।
भाषा सलिला निरंतर करे अनाहद जाप।।
भाषा वह साधन है जिससे हम अपने भाव एवं विचार अन्य लोगों तक पहुँचा पाते हैं अथवा अन्यों के भाव और विचार गृहण कर पाते हैं। यह आदान-प्रदान वाणी के माध्यम से (मौखिक) या लेखनी के द्वारा (लिखित) होता है।
निर्विकार अक्षर रहे मौन, शांत निः शब्द।
भाषा वाहक भाव की, माध्यम हैं लिपि-शब्द ।।
व्याकरण ( ग्रामर ) -
व्याकरण ( वि + आ + करण ) का अर्थ भली-भाँति समझना है. व्याकरण भाषा के शुद्ध एवं परिष्कृत रूप सम्बन्धी नियमोपनियमों का संग्रह है। भाषा के समुचित ज्ञान हेतु वर्ण विचार (ओर्थोग्राफी) अर्थात वर्णों (अक्षरों) के आकार, उच्चारण, भेद, संधि आदि, शब्द विचार (एटीमोलोजी) याने शब्दों के भेद, उनकी व्युत्पत्ति एवं रूप परिवर्तन आदि तथा वाक्य विचार (सिंटेक्स) अर्थात वाक्यों के भेद, रचना और वाक्य विश्लेष्ण को जानना आवश्यक है।
वर्ण शब्द संग वाक्य का, कविगण करें विचार।
तभी पा सकें वे 'सलिल', भाषा पर अधिकार।।
वर्ण / अक्षर :
वर्ण के दो प्रकार स्वर (वोवेल्स) तथा व्यंजन (कोंसोनेंट्स) हैं।
अजर अमर अक्षर अजित, ध्वनि कहलाती वर्ण।
स्वर-व्यंजन दो रूप बिन, हो अभिव्यक्ति विवर्ण।।
स्वर ( वोवेल्स ) :
स्वर वह मूल ध्वनि है जिसे विभाजित नहीं किया जा सकता. वह अक्षर है। स्वर के उच्चारण में अन्य वर्णों की सहायता की आवश्यकता नहीं होती। यथा - अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ ए, ऐ, ओ, औ, अं, अ:. स्वर के दो प्रकार १. हृस्व ( अ, इ, उ, ऋ ) तथा दीर्घ ( आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अ: ) हैं।
अ, इ, उ, ऋ हृस्व स्वर, शेष दीर्घ पहचान।
मिलें हृस्व से हृस्व स्वर, उन्हें दीर्घ ले मान।।
व्यंजन (कांसोनेंट्स) :
व्यंजन वे वर्ण हैं जो स्वर की सहायता के बिना नहीं बोले जा सकते। व्यंजनों के चार प्रकार १. स्पर्श (क वर्ग - क, ख, ग, घ, ङ्), (च वर्ग - च, छ, ज, झ, ञ्.), (ट वर्ग - ट, ठ, ड, ढ, ण्), (त वर्ग त, थ, द, ढ, न), (प वर्ग - प,फ, ब, भ, म) २. अन्तस्थ (य वर्ग - य, र, ल, व्, श), ३. (उष्म - श, ष, स ह) तथा ४. (संयुक्त - क्ष, त्र, ज्ञ) हैं। अनुस्वार (अं) तथा विसर्ग (अ:) भी व्यंजन हैं।
भाषा में रस घोलते, व्यंजन भरते भाव।
कर अपूर्ण को पूर्ण वे मेटें सकल अभाव।।
शब्द :
अक्षर मिलकर शब्द बन, हमें बताते अर्थ।
मिलकर रहें न जो 'सलिल', उनका जीवन व्यर्थ।।
अक्षरों का ऐसा समूह जिससे किसी अर्थ की प्रतीति हो शब्द कहलाता है। यह भाषा का मूल तत्व है। शब्द के निम्न प्रकार हैं-
१. अर्थ की दृष्टि से :
सार्थक शब्द : जिनसे अर्थ ज्ञात हो यथा - कलम, कविता आदि एवं
निरर्थक शब्द : जिनसे किसी अर्थ की प्रतीति न हो यथा - अगड़म बगड़म आदि ।
२. व्युत्पत्ति (बनावट) की दृष्टि से :
रूढ़ शब्द : स्वतंत्र शब्द - यथा भारत, युवा, आया आदि ।
यौगिक शब्द : दो या अधिक शब्दों से मिलकर बने शब्द जो पृथक किए जा सकें यथा - गणवेश, छात्रावास, घोडागाडी आदि एवं
योगरूढ़ शब्द : जो दो शब्दों के मेल से बनते हैं पर किसी अन्य अर्थ का बोध कराते हैं यथा - दश + आनन = दशानन = रावण, चार + पाई = चारपाई = खाट आदि ।
३. स्रोत या व्युत्पत्ति के आधार पर:
तत्सम शब्द : मूलतः संस्कृत शब्द जो हिन्दी में यथावत प्रयोग होते हैं यथा - अम्बुज, उत्कर्ष आदि।
तद्भव शब्द : संस्कृत से उद्भूत शब्द जिनका परिवर्तित रूप हिन्दी में प्रयोग किया जाता है यथा - निद्रा से नींद, छिद्र से छेद, अर्ध से आधा, अग्नि से आग आदि।
अनुकरण वाचक शब्द : विविध ध्वनियों के आधार पर कल्पित शब्द यथा - घोड़े की आवाज से हिनहिनाना, बिल्ली के बोलने से म्याऊँ आदि।
देशज शब्द : आदिवासियों अथवा प्रांतीय भाषाओँ से लिये गये शब्द जिनकी उत्पत्ति का स्रोत अज्ञात है यथा - खिड़की, कुल्हड़ आदि।
विदेशी शब्द : संस्कृत के अलावा अन्य भाषाओँ से लिये गये शब्द जो हिन्दी में जैसे के तैसे प्रयोग होते हैं। यथा - अरबी से - कानून, फकीर, औरत आदि, अंग्रेजी से - स्टेशन, स्कूल, ऑफिस आदि।
४. प्रयोग के आधार पर:
विकारी शब्द : वे शब्द जिनमें संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया या विशेषण के रूप में प्रयोग किये जाने पर लिंग, वचन एवं कारक के आधार पर परिवर्तन होता है। यथा - लड़का, लड़के, लड़कों, लड़कपन, अच्छा, अच्छे, अच्छी, अच्छाइयाँ आदि।
अविकारीशब्द : वे शब्द जिनके रूप में कोई परिवर्तन नहीं होता। इन्हें अव्यय कहते हैं। यथा - यहाँ, कहाँ, जब, तब, अवश्य, कम, बहुत, सामने, किंतु, आहा, अरे आदि। इनके प्रकार क्रिया विशेषण, सम्बन्ध सूचक, समुच्चय बोधक तथा विस्मयादि बोधक हैं।
नदियों से जल ग्रहणकर, सागर करे किलोल।
विविध स्रोत से शब्द ले, भाषा हो अनमोल।।
कविता के तत्वः
कविता के 2 तत्व बाह्य तत्व (लय, छंद योजना, शब्द योजना, अलंकार, तुक आदि) तथा आंतरिक तत्व (भाव, रस, अनुभूति आदि) हैं ।
कविता के बाह्य तत्वः
लयः
भाषा के उतार-चढ़ाव, विराम आदि के योग से लय बनती है । कविता में लय के लिये गद्य से कुछ हटकर शब्दों का क्रम संयोजन इस प्रकार करना होता है कि वांछित अर्थ की अभिव्यक्ति भी हो सके ।
छंदः
मात्रा, वर्ण, विराम, गति, लय तथा तुक (समान उच्चारण) आदि के व्यवस्थित सामंजस्य को छंद कहते हैं । छंदबद्ध कविता सहजता से स्मरणीय, अधिक प्रभावशाली व हृदयग्राही होती है । छंद के 2 मुख्य प्रकार मात्रिक (जिनमें मात्राओं की संख्या निश्चित रहती है) तथा वर्णिक (जिनमें वर्णों की संख्या निश्चित तथा गणों के आधार पर होती है) हैं । छंद के असंख्य उपप्रकार हैं जो ध्वनि विज्ञान तथा गणितीय समुच्चय-अव्यय पर आधृत हैं ।
शब्दयोजनाः
कविता में शब्दों का चयन विषय के अनुरूप, सजगता, कुशलता से इस प्रकार किया जाता है कि भाव, प्रवाह तथा गेयता से कविता के सौंदर्य में वृद्धि हो ।
तुकः
काव्य पंक्तियों में अंतिम वर्ण तथा ध्वनि में समानता को तुक कहते हैं । अतुकांत कविता में यह तत्व नहीं होता । मुक्तिका या ग़ज़ल में तुक के 2 प्रकार तुकांत व पदांत होते हैं जिन्हें उर्दू में क़ाफि़या व रदीफ़ कहते हैं ।
अलंकारः
अलंकार से कविता की सौंदर्य-वृद्धि होती है और वह अधिक चित्ताकर्षक प्रतीत होती है । अलंकार की न्यूनता या अधिकता दोनों काव्य दोष माने गये हैं । अलंकार के 2 मुख्य प्रकार शब्दालंकार व अर्थालंकार तथा अनेक भेद-उपभेद हैं ।
कविता के आंतरिक तत्वः
रस:
कविता को पढ़ने या सुनने से जो अनुभूति (आनंद, दुःख, हास्य, शांति आदि) होती है उसे रस कहते हैं । रस को कविता की आत्मा (रसात्मकं वाक्यं काव्यं), ब्रम्हानंद सहोदर आदि कहा गया है । यदि कविता पाठक को उस रस की अनुभूति करा सके जो कवि को कविता करते समय हुई थी तो वह सफल कविता कही जाती है । रस के 9 प्रकार श्रृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, भयानक, वीर, वीभत्स, शांत तथा अद्भुत हैं । कुछ विद्वान वात्सल्य को दसवां रस मानते हैं ।
अनुभूतिः
गद्य की अपेक्षा पद्य अधिक हृद्स्पर्शी होता है चूंकि कविता में अनुभूति की तीव्रता अधिक होती है इसलिए कहा गया है कि गद्य मस्तिष्क को शांति देता है कविता हृदय को ।
भावः
रस की अनुभूति करानेवाले कारक को भाव कहते हैं । हर रस के अलग-अलग स्थायी भाव इस प्रकार हैं । श्रृंगार-रति, हास्य-हास्य, करुण-शोक, रौद्र-क्रोध, भयानक-भय, वीर-उत्साह, वीभत्स-जुगुप्सा/घृणा, शांत-निर्वेद/वैराग्य, अद्भुत-विस्मय तथा वात्सल्य-ममता ।
***
अशआर
*
चंद पैसे हैं तो सवेरे हैं।
जेब खाली तो बस अँधेरे हैं।।
*
दिल की बातें कहें कहो कैसे,
बेदिलों तुम्हारी महफिल में?
*
आज किश्तों में बात करनी है।
टैक्स बातों पे लग न जाए कहीं।।
*
तालियाँ सुनके फूलना न सलिल।
गालियाँ साथ दूनी मिलती हैं।।
२१-२-२०२१
***
चित्रालंकार 🗻 पर्वत
सनम
गले लग।
नयन मिला
हो न विलग।
दो न रहें, एक हों
प्रिय! इरादे नेक हों
***
हाइकु
लोग दें फूल
जुमला कह नेता
बोले- fool।
*
सदोका
है चौकीदार
वफादार लेकिन
चोरियाँ होती रही।
लुटती रहीं
देश की तिजोरियाँ
जनता रोती रही।
*
नवगीत:
अंतर में
पल रही व्यथाएँ
हम मुस्काएँ क्या?
*
चौकीदार न चोरी रोके
वादे जुमलों को कब टोंके?
संसद में है शोर बहुत पर
नहीं बैंक में कुत्ते भौंके।
कम पहनें
कपड़े समृद्ध जन
हम शरमाएँ क्या?
*
रंग बदलने में हैं माहिर
राजनीति में जो जगजाहिर।
मुँह में राम बगल में छूरी
कुर्सी पूज रहे हैं काफिर।
देख आदमी
गिरगिट लज्जित
हम भरमाएँ क्या?
*
लोक फिर रहा मारा-मारा,
तंत्र कर रहा वारा-न्यारा।
बेच देश को वही खा रहे
जो कहते यह हमको प्यारा।।
आस भग्न
सांसों लेने को भी
तड़पाएँ क्या?
***
दोहा
शुभ प्रभात अरबों लुटा, कहो रहो बेफिक्र।
चौकीदारी गजब की, सदियों होगा जिक्र।।
*
पिया मेघ परदेश में, बिजली प्रिय उदास।
धरती सासू कह रही, सलिल बुझाए प्यास।।
*
बहतरीन सर हो तभी, जब हो तनिक दिमाग।
भूसा भरा अगर लगा, माचिस लेकर आग।।
*
नया छंद
जाति: सवैया
विधान: ८ मगण + गुरु लघु
प्रकार: २६ वार्णिक, ५१ मात्रिक छंद
बातों ही बातों में, रातों ही रातों में, लूटेंगे-भागेंगे, व्यापारी घातें दे आज
वादों ही वादों में, राजा जी चेलों में, सत्ता को बाँटेंगे, लोगों को मातें दे आज
यादें ही यादें हैं, कुर्सी है प्यादे हैं, मौका पा लादेंगे, प्यारे जो लोगों को आज
धोखा ही धोखा है, चौका ही चौका है, छक्का भी मारेंगे, लूटेंगे-बाँटेंगे आज
२१-२-२०१८
***
पुस्तक सलिला:
संगीताधिराज हृदयनारायण देव - संगीत संबंधी जानकारियों का कोष
चर्चाकार- आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
[पुस्तक विवरण: संगीताधिराज हृदयनारायण देव, कृतिकार डॉ. सुमन लता श्रीवास्तव, शोध-सन्दर्भ ग्रंथ, आकार २४ से. मी. X १६ से. मी., आवरण सजिल्द, बहुरंगी, जैकेट सहित, क्लॉथ बंधन, पृष्ठ ३५२, ८००/-, विद्यानिधि प्रकाशन डी १० / १०६१ समीप श्री महागौरी मंदिर, खजुरी खास दिल्ली ११००९४, ०११ २२९६७६३८, कृतिकार संपर्क १०७ इन्द्रपुरी कॉलोनी, जबलपुर ४८२००१]
*
अतीत को भूलनेवालेवाली कौमें भविष्य का निर्माण नहीं कर सकतीं। डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव इस सनातन सत्य से सुपरिचित हैं इसलिए उन्होंने सत्रहवीं सदी के पूर्वार्ध में गोंड शासक हृदयनारायण देव द्वारा संस्कृत में रचित संगीत विषयक दो ग्रंथों हृदय कौतुकम् और ह्रदय प्रकाश: के प्रकाश में भारतीय संगीत के आधारभूत तत्वों और सिद्धांतों के परीक्षण का दुष्कर कार्य किया है। वैदिक काल से गार्गी, मैत्रेयी. लोपामुद्रा जैसी विदुषियों की परंपरा को जीवंत करती सुमन जी की यह कृति पाश्चात्य मूल्यों और जीवनपद्धति के अंध मोह में ग्रस्त युवाओं के लिये प्रेरणा स्त्रोत हो सकती है।
हिंदी में प्रतिदिन प्रकाशित होनेवाली सहस्त्राधिक पुस्तकों में से हर महाविद्यालय और पुस्तकालय में रखी जाने योग्य कृतियाँ अँगुलियों पर गिनने योग्य होती हैं। विवेच्य कृति के विस्तृत फलक को दस परिच्छेदों में विभक्त किया गया है। भारतीय संगीत की परंपरा: उद्भव और विकास शीर्षक प्रथम परिच्छेद में नाद तथा संगीत की उत्पत्ति, प्रभाव और उपादेयता, संगीत और काव्य का अंतर्संबंध, भारतीय संगीत का वैशिष्ट्य, मार्गी और देशी संगीत, शास्त्रीय और सुगम संगीत, उत्तर भारतीय व् दक्षिण भारतीय संगीत, संगीत ग्रन्थ परंपरा व सूची आदि का समावेश है। द्वितीय परिच्छेद ह्रदय नारायण देव: महराज हृदयशाह के रूप में परिचय के अंतर्गत महराज हृदयशाह और गढ़ा राज्य, गोंड वंश और शासक, लोकहितकारी कार्य, हृदय कौतुकम् और ह्रदय प्रकाश: की विषयवस्तु, सिद्धांत विवेचन, रचनाकाल, तत्कालीन राजनैतिक परिस्थितियों का संकेत है। आदि की प्रामाणिक जानकारी का सार प्रस्तुत किया गया है। श्रुति और स्वर: ह्रदय नारायण देव की श्रुति-स्वर व्यवस्था शीर्षक परिच्छेद में श्रुति का अर्थ व स्वरूप, संख्या व नामावली, श्रुति व स्वर में भेद, सप्तक का निर्माण आदि का तुलनात्मक अध्ययन है। चतुर्थ अनुच्छेद के अंतर्गत ग्रंथ द्वय में उल्लिखित पारिभाषिक शब्दों का विवेचन, संवाद, वादी-संवादी-अनुवादी-परिवादी, गमक, अलंकार, तान, मूर्च्छना आदि परिभाषिक शब्दों का विवेचन किया गया है।
वीणा के तार पर ज्यामितीय स्वर-स्थापना का निदर्शन पंचम परिच्छेद में है। राग वर्गीकरण और संस्थान की अवधारणा शीर्षक षष्ठम परिच्छेद राग-रागिनी वर्गीकरण से उत्पन्न विसंगतियों के निराकरण हेतु हृदयनारायण द्वारा अन्वेषित 'थाट-राग व्यवस्था' का विश्लेषण है। सप्तम परिच्छेद प्रचलित और स्वरचित रागों की व्याख्या में ह्रदयनारायण देव द्वारा गृह-अंश-न्यास, वर्ज्यावर्ज्य स्वर, स्वरकरण, ९२ रागों का निरूपण तथा तुलनात्मक अध्ययन है। ग्रन्थ द्वय की भाषा शैली के विवेचन पर अष्टम परिच्छेद केंद्रित है। पौर्वापर्य्य विचार नामित नवम परिच्छेद में हृदयनारायण देव के साथ पंडित लोचन तथापंडित अहोबल के सम्बन्ध में तुलनात्मक अध्ययन है। अंतिम दशम परिच्छेद 'ह्रदय नारायण देव का संगीतशास्त्र को योगदान' में ग्रंथनायक का मूल्यांकन किया गया है। ग्रंथांत में हृदय कौतुकम् और ह्रदय प्रकाश: का अविकल हिंदी अनुवाद सहित पाठ संदर्भ ग्रंथ सूची, ग्रंथनायक की राजधानी मंडला के रंगीन छायाचित्रादि तथा ग्रन्थारंभ में विदुषी डॉ. इला घोष लिखी सम्यक भूमिका ने ग्रन्थ की उपादेयता तथा महत्व बढ़ाया है।
पद्य साहित्य में रस-छंद-अलंकार में रूचि रखनेवाले रचनाकार गति-यति तथा लय साधने में संगीत की जानकारी न होने के कारण कठिनाई अनुभव कर छंद मुक्त कविता की अनगढ़ राह पर चल पड़ते हैं। आलोच्य कृति के विद्यार्थी को ऐसी कठिनाई से सहज ही मुक्ति मिल सकती है। छंद लेखन-गायन-नर्तन की त्रिवेणी में छिपे अंतर्संबंध को अनुमानने में सांगीतिक स्वर लिपि की जानकारी सहायक होगी। महाप्राण निराला की रचनाओं में पारम्परिक छंद विधान के अंधानुकरण न होने पर भी जो गति-यति-लय अन्तर्निहित है उसका कारण रवीन्द्र संगीत और लोक काव्य की जानकारी ही है। गीत-नवगीत के निरर्थक विवाद में उलझी मनीषाएँ इस ग्रन्थ का अध्ययन कर अपनी गीति रचनाओं में अन्तर्व्याप्त रागों को पहचान कर उसे शुद्ध कर सकें तो रचनाओं की रसात्मकता श्रोताओं को मंत्र मुग्ध कर सकेगी।
संगीत ही नहीं साहित्य संसार भी सुमन जी की इस कृति हेतु उनका आभारी होगा। संस्कृत में स्नातकोत्तर उपाधि और शोध कार्य कर चुकी और बुद्धिजीवी कायस्थ परिवार की प्रमुख सुमन जी का भाषा पर असाधारण अधिकार होना स्वाभाविक है। ग्रन्थ की जटिल विषयवस्तु को सुरुचिपूर्वक सरलता से प्रस्तुतीकरण लेखिका के विषय पर पूर्णाधिकार का परिचायक है। पूरे ग्रन्थ में संस्कृत व हिंदी सामग्री के पाठ को त्रुटि रहित रखने के लिये टंकण, पृष्ठ रूपांकन तथा पाठ्य शुद्धि का श्रमसाध्य कार्य उन्होंने स्वयं किया है। वे कुलनाम 'श्रीवास्तव' के साथ-साथ वास्तव में भी 'श्री' संपन्न तथा साधुवाद की पात्र हैं। उनकी लेखनी ऐसे ही कालजयी ग्रंथों का प्रणयन करे तो माँ शारदा का कोष अधिक प्रकाशमान होगा। हिंदी को विश्व वाणी बनाने की दिशा में विविध विषयों की पारिभाषिक शब्दावली के निर्माण और सक्षम भावाभिव्यक्ति संपन्न शब्दावली के विकास में ऐसे ग्रन्थ सहायक होंगे।
***
लघुकथा
योग्यता
*
गत कुछ वर्षों से वे लगातार लघुकथा मंच का सभापति बनाने पधार रहे थे। हर वर्ष आयोजनों में बुलाते, लघुकथा ले जाकर पत्रिका में प्रकाशित करते। संस्थाओं की राजनीति से उकता चुका वह विनम्रता से हाथ जोड़ लेता। इस वर्ष विचार आया कि समर्पित लोग हैं, जुड़ जाना चाहिए। उसने संरक्षकता निधि दे दी।
कुछ दिन बाद एक मित्र ने पूछा आप लघु कथा के आयोजन में नहीं पधारे? वे चुप्पी लगा गये, कैसे कहते कि जब से निधि दी तब से किसी ने रचना लेने, आमंत्रित करने या संपर्क साधने योग्य ही नहीं समझा।
***
नवगीत
घर तो है
*
घर तो है
लेकिन आँगन
या तुलसी चौरा
रहा नहीं है।
*
अलस्सुबह
उगता है सूरज
किंतु चिरैया
नहीं चहकती।
दलहन-तिलहन,
फटकन चुगने
अब न गिलहरी
मिले मटकती।
कामधेनुएँ
निष्कासित हैं,
भैरव-वाहन
चाट रहे मुख।
वन न रहे,
गिरि रहे न गौरी
ब्यौरा गौरा
रहा नहीं है।
*
घरनी छोड़
पड़ोसन ताकें।
अमिय समझ
विष गुटखा फाँकें।
नगदी सौदा
अब न सुहाये,
लुटते नित
उधार ला-ला के।
संबंधों की
नीलामी कर-
पाल रहे खुद
दुःख
कहकर सुख।
छिपा सकें मुख
जिस आँचल में
माँ का ठौरा
रहा नहीं है।
२१-२-२०१६
***
नवगीत
.
मैं नहीं नव
गीत लिखता
उजासों की
हुलासों की
निवासों की
सुवासों की
खवासों की
मिदासों की
मिठासों की
खटासों की
कयासों की
प्रयासों की
कथा लिखता
व्यथा लिखता
मैं नहीं नव
गीत लिखता
.
उतारों की
चढ़ावों की
पड़ावों की
उठावों की
अलावों की
गलावों की
स्वभावों की
निभावों की
प्रभावों की
अभावों की
हार लिखता
जीत लिखता
मैं नहीं नव
गीत लिखता
.
चाहतों की
राहतों की
कोशिशों की
आहटों की
पूर्णिमा की
‘मावसों की
फागुनों की
सावनों की
मंडियों की
मन्दिरों की
रीत लिखता
प्रीत लिखता
मैं नहीं नव
गीत लिखता
***
श्रृंगार गीत:
.
चाहता मन
आपका होना
.
शशि ग्रहण से
घिर न जाए
मेघ दल में
छिप न जाए
चाह अजरा
बने तारा
रूपसी की
कीर्ति गाये
मिले मन में
एक तो कोना
.
द्वार पर
आ गया बौरा
चीन्ह भी लो
तनिक गौरा
कूक कोयल
गाए बन्ना
सुना बन्नी
आम बौरा
मार दो मंतर
करो टोना
.
माँग इतनी
माँग भर दूँ
आप का
वर-दान कर दूँ
मिले कन्या-
दान मुझको
जिंदगी को
गान कर दूँ
प्रणय का प्रण
तोड़ मत देना
२१.२.२०१५
....
गीत:
*
द्रोण में
पायस लिये
पूनम बनी,
ममता सनी,
आई सुजाता,
बुद्ध बन जाओ.
.
सिसकियाँ
कब मौन होतीं?
अश्रु
कब रुकते?
पर्वतों सी पीर पीने
मेघ रुक झुकते.
धैर्य का सागर
पियें कुम्भज
नहीं थकते.
प्यास में,
संत्रास में
नवगीत का
अनुप्रास भी
मन को न भाता.
क्रुद्ध हो गाओ.
.
लहरियाँ
कब रुकीं-हारीं.
भँवर कब थकते?
सागरों सा धीर
धरकर
मलिनता तजते.
स्वच्छ सागर सम
करो मंथन
नहीं चुकना.
रास में
खग्रास में
परिहास सा
आनंद पाओ
शुद्ध बन जाओ.
२१-२-२०१५
***
आभा सक्सेना, देहरादून
‘सलिल’ जी से हुआ है जब से वार्तालाप
कविता लिखनी आ गई, आया मात्रा नाप
आया मात्रा नाप मात्रा गिननी सीखी
कविता मन को भाई लगती छंद सरीखी
कह आभा मुस्काय लगे अब गीत सरल है
छाने लगे छंद कविता में गन्ध ‘सलिल’ है
२१-२-२०१५
***
हाइकु नवगीत :
.
टूटा विश्वास
शेष रह गया है
विष का वास
.
कलरव है
कलकल से दूर
टूटा सन्तूर
जीवन हुआ
किलकिल-पर्याय
मात्र संत्रास
.
जनता मौन
संसद दिशाहीन
नियंता कौन?
प्रशासन ने
कस लिया शिकंजा
थाम ली रास
.
अनुशासन
एकमात्र है राह
लोक सत्ता की.
जनांदोलन
शांत रह कीजिए
बढ़े उजास
.
***
हाइकु
.
दर्द की धूप
जो सहे बिना झुलसे
वही है भूप
.
चाँदनी रात
चाँद को सुनाते हैं
तारे नग्मात
.
शोर करता
बहुत जो दरिया
काम न आता
.
गरजते हैं
जो बादल वे नहीं
बरसते हैं
.
बैर भुलाओ
वैलेंटाइन मना
हाथ मिलाओ
.
मौन तपस्वी
मलिनता मिटाये
नदी का पानी
.
नहीं बिगड़ा
नदी का कुछ कभी
घाट के कोसे
.
गाँव-गली के
दिल हैं पत्थर से
पर हैं मेरे
.
गले लगाते
हँस-मुस्काते पेड़
धूप को भाते
***
तांका
.
बिना आहट
सांझ हो या सवेरे
लिये चाहत
ओस बूँद बिखेरे
दूब पर मौसम
.
मंजिल मिली
हमसफर बिछड़े
सपने टूटे
गिला मत करना
फिर चल पड़ना
.
तितली उड़ी
फूल की ओर मुड़ी
मुस्काई कली
हवा गुनगुनाई
झूम फागें सुनाईं
.
घमंड थामे
हाथ में तलवार
लड़ने लगा
अपने ही साये से
उलटे मुँह गिरा
....
जगवाणी हिंदी का वैशिऽष्टय् छंद और छंद विधान: 1
*
वेद को सकल विद्याओं का मूल माना गया है । वेद के 6 अंगों 1. छंद, 2. कल्प, 3. ज्योतिऽष , 4. निरुक्त, 5. शिक्षा तथा 6. व्याकरण में छंद का प्रमुख स्थान है ।
छंदः पादौतु वेदस्य हस्तौ कल्पोऽथ कथ्यते ।
ज्योतिऽषामयनं नेत्रं निरुक्तं श्रोत्र मुच्यते ।।
शिक्षा घ्राणंतुवेदस्य मुखंव्याकरणंस्मृतं
तस्मात् सांगमधीत्यैव ब्रम्हलोके महीतले ।।
वेद का चरण होने के कारण छंद पूज्य है । छंदशास्त्र का ज्ञान न होने पर मनुष्य पंगुवत है, वह न तो काव्य की यथार्थ गति समझ सकता है न ही शुद्ध रीति से काव्य रच सकता है । छंदशास्त्र को आदिप्रणेता महर्षि पिंगल के नाम पर पिंगल तथा पर्यायवाची शब्दों सर्प, फणि, अहि, भुजंग आदि नामों से संबोधित कर शेषावतार माना जाता है । जटिल से जटिल विषय छंदबद्ध होने पर सहजता से कंठस्थ ही नहीं हो जाता, आनंद भी देता है ।
नरत्वं दुर्लभं लोके विद्या तत्र सुदुर्लभा ।
कवित्वं दुर्लभं तत्र, शक्तिस्तत्र सुदुर्लभा ।।
अर्थात संसार में नर तन दुर्लभ है, विद्या अधिक दुर्लभ, काव्य रचना और अधिक दुर्लभ तथा सुकाव्य-सृजन की शक्ति दुर्लभतम है । काव्य के पठन-पाठन अथवा श्रवण से अलौकिक आनंद की प्राप्ति होती है ।
काव्यशास्त्रेण विनोदेन कालो गच्छति धीमताम ।
व्यसने नच मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा ।।
विश्व की किसी भी भाषा का सौंदर्य उसकी कविता में निहित है । प्राचीन काल में शिक्षा का प्रचार-प्रसार कम होने के कारण काव्य-सृजन केवल कवित्व शक्ति संपन्न प्रतिभावान महानुभावों द्वारा किया जाता था जो श्रवण परंपरा से छंद की लय व प्रवाह आत्मसात कर अपने सृजन में यथावत अभिव्यक्त कर पाते थे । वर्तमान काल में शिक्षा का सर्वव्यापी प्रचार-प्रसार होने तथा भाषा या काव्यशास्त्र से आजीविका के साधन न मिलने के कारण सामान्यतः अध्ययन काल में इनकी उपेक्षा की जाती है तथा कालांतर में काव्याकर्षण होने पर भाषा का व्याकरण- पिंगल समझे बिना छंदहीन तथा दोषपूर्ण काव्य रचनाकर आत्मतुष्टि पाल ली जाती है जिसका दुष्परिणाम आमजनों में कविता के प्रति अरुचि के रूप में दृष्टव्य है । काव्य के तत्वों रस, छंद, अलंकार आदि से संबंधित सामग्री व उदाहरण पूर्व प्रचलित भाषा / बोलियों में होने के कारण उनका आशय हिंदी के वर्तमान रूप से परिचित छात्र पूरी तरह समझ नहीं पाते । प्राथमिक स्तर पर अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा के चलन ने हिंदी की समझ और घटायी है ।
छंद विषयक चर्चा के पूर्व हिंदी भाषा की आरंभिक जानकारी दोहरा लेना लाभप्रद होगा ।
भाषा :
अनुभूतियों से उत्पन्न भावों को अभिव्यक्त करने के लिए भंगिमाओं या ध्वनियों की आवश्यकता होती है। भंगिमाओं से नृत्य, नाट्य, चित्र आदि कलाओं का विकास हुआ। ध्वनि से भाषा, वादन एवं गायन कलाओं का जन्म हुआ।
चित्र गुप्त ज्यों चित्त का, बसा आप में आप।
भाषा सलिला निरंतर करे अनाहद जाप।।
भाषा वह साधन है जिससे हम अपने भाव एवं विचार अन्य लोगों तक पहुँचा पाते हैं अथवा अन्यों के भाव और विचार गृहण कर पाते हैं। यह आदान-प्रदान वाणी के माध्यम से (मौखिक) या लेखनी के द्वारा (लिखित) होता है।
निर्विकार अक्षर रहे मौन, शांत निः शब्द।
भाषा वाहक भाव की, माध्यम हैं लिपि-शब्द ।।
व्याकरण ( ग्रामर ) -
व्याकरण ( वि + आ + करण ) का अर्थ भली-भाँति समझना है. व्याकरण भाषा के शुद्ध एवं परिष्कृत रूप सम्बन्धी नियमोपनियमों का संग्रह है। भाषा के समुचित ज्ञान हेतु वर्ण विचार (ओर्थोग्राफी) अर्थात वर्णों (अक्षरों) के आकार, उच्चारण, भेद, संधि आदि, शब्द विचार (एटीमोलोजी) याने शब्दों के भेद, उनकी व्युत्पत्ति एवं रूप परिवर्तन आदि तथा वाक्य विचार (सिंटेक्स) अर्थात वाक्यों के भेद, रचना और वाक्य विश्लेष्ण को जानना आवश्यक है।
वर्ण शब्द संग वाक्य का, कविगण करें विचार।
तभी पा सकें वे 'सलिल', भाषा पर अधिकार।।
वर्ण / अक्षर :
वर्ण के दो प्रकार स्वर (वोवेल्स) तथा व्यंजन (कोंसोनेंट्स) हैं।
अजर अमर अक्षर अजित, ध्वनि कहलाती वर्ण।
स्वर-व्यंजन दो रूप बिन, हो अभिव्यक्ति विवर्ण।।
स्वर ( वोवेल्स ) :
स्वर वह मूल ध्वनि है जिसे विभाजित नहीं किया जा सकता. वह अक्षर है। स्वर के उच्चारण में अन्य वर्णों की सहायता की आवश्यकता नहीं होती। यथा - अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ ए, ऐ, ओ, औ, अं, अ:. स्वर के दो प्रकार १. हृस्व ( अ, इ, उ, ऋ ) तथा दीर्घ ( आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अ: ) हैं।
अ, इ, उ, ऋ हृस्व स्वर, शेष दीर्घ पहचान।
मिलें हृस्व से हृस्व स्वर, उन्हें दीर्घ ले मान।।
व्यंजन (कांसोनेंट्स) :
व्यंजन वे वर्ण हैं जो स्वर की सहायता के बिना नहीं बोले जा सकते। व्यंजनों के चार प्रकार १. स्पर्श (क वर्ग - क, ख, ग, घ, ङ्), (च वर्ग - च, छ, ज, झ, ञ्.), (ट वर्ग - ट, ठ, ड, ढ, ण्), (त वर्ग त, थ, द, ढ, न), (प वर्ग - प,फ, ब, भ, म) २. अन्तस्थ (य वर्ग - य, र, ल, व्, श), ३. (उष्म - श, ष, स ह) तथा ४. (संयुक्त - क्ष, त्र, ज्ञ) हैं। अनुस्वार (अं) तथा विसर्ग (अ:) भी व्यंजन हैं।
भाषा में रस घोलते, व्यंजन भरते भाव।
कर अपूर्ण को पूर्ण वे मेटें सकल अभाव।।
शब्द :
अक्षर मिलकर शब्द बन, हमें बताते अर्थ।
मिलकर रहें न जो 'सलिल', उनका जीवन व्यर्थ।।
अक्षरों का ऐसा समूह जिससे किसी अर्थ की प्रतीति हो शब्द कहलाता है। यह भाषा का मूल तत्व है। शब्द के निम्न प्रकार हैं-
१. अर्थ की दृष्टि से :
सार्थक शब्द : जिनसे अर्थ ज्ञात हो यथा - कलम, कविता आदि एवं
निरर्थक शब्द : जिनसे किसी अर्थ की प्रतीति न हो यथा - अगड़म बगड़म आदि ।
२. व्युत्पत्ति (बनावट) की दृष्टि से :
रूढ़ शब्द : स्वतंत्र शब्द - यथा भारत, युवा, आया आदि ।
यौगिक शब्द : दो या अधिक शब्दों से मिलकर बने शब्द जो पृथक किए जा सकें यथा - गणवेश, छात्रावास, घोडागाडी आदि एवं
योगरूढ़ शब्द : जो दो शब्दों के मेल से बनते हैं पर किसी अन्य अर्थ का बोध कराते हैं यथा - दश + आनन = दशानन = रावण, चार + पाई = चारपाई = खाट आदि ।
३. स्रोत या व्युत्पत्ति के आधार पर:
तत्सम शब्द : मूलतः संस्कृत शब्द जो हिन्दी में यथावत प्रयोग होते हैं यथा - अम्बुज, उत्कर्ष आदि।
तद्भव शब्द : संस्कृत से उद्भूत शब्द जिनका परिवर्तित रूप हिन्दी में प्रयोग किया जाता है यथा - निद्रा से नींद, छिद्र से छेद, अर्ध से आधा, अग्नि से आग आदि।
अनुकरण वाचक शब्द : विविध ध्वनियों के आधार पर कल्पित शब्द यथा - घोड़े की आवाज से हिनहिनाना, बिल्ली के बोलने से म्याऊँ आदि।
देशज शब्द : आदिवासियों अथवा प्रांतीय भाषाओँ से लिये गये शब्द जिनकी उत्पत्ति का स्रोत अज्ञात है यथा - खिड़की, कुल्हड़ आदि।
विदेशी शब्द : संस्कृत के अलावा अन्य भाषाओँ से लिये गये शब्द जो हिन्दी में जैसे के तैसे प्रयोग होते हैं। यथा - अरबी से - कानून, फकीर, औरत आदि, अंग्रेजी से - स्टेशन, स्कूल, ऑफिस आदि।
४. प्रयोग के आधार पर:
विकारी शब्द : वे शब्द जिनमें संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया या विशेषण के रूप में प्रयोग किये जाने पर लिंग, वचन एवं कारक के आधार पर परिवर्तन होता है। यथा - लड़का, लड़के, लड़कों, लड़कपन, अच्छा, अच्छे, अच्छी, अच्छाइयाँ आदि।
अविकारीशब्द : वे शब्द जिनके रूप में कोई परिवर्तन नहीं होता। इन्हें अव्यय कहते हैं। यथा - यहाँ, कहाँ, जब, तब, अवश्य, कम, बहुत, सामने, किंतु, आहा, अरे आदि। इनके प्रकार क्रिया विशेषण, सम्बन्ध सूचक, समुच्चय बोधक तथा विस्मयादि बोधक हैं।
नदियों से जल ग्रहणकर, सागर करे किलोल।
विविध स्रोत से शब्द ले, भाषा हो अनमोल।।
कविता के तत्वः
कविता के 2 तत्व बाह्य तत्व (लय, छंद योजना, शब्द योजना, अलंकार, तुक आदि) तथा आंतरिक तत्व (भाव, रस, अनुभूति आदि) हैं ।
कविता के बाह्य तत्वः
लयः
भाषा के उतार-चढ़ाव, विराम आदि के योग से लय बनती है । कविता में लय के लिये गद्य से कुछ हटकर शब्दों का क्रम संयोजन इस प्रकार करना होता है कि वांछित अर्थ की अभिव्यक्ति भी हो सके ।
छंदः
मात्रा, वर्ण, विराम, गति, लय तथा तुक (समान उच्चारण) आदि के व्यवस्थित सामंजस्य को छंद कहते हैं । छंदबद्ध कविता सहजता से स्मरणीय, अधिक प्रभावशाली व हृदयग्राही होती है । छंद के 2 मुख्य प्रकार मात्रिक (जिनमें मात्राओं की संख्या निश्चित रहती है) तथा वर्णिक (जिनमें वर्णों की संख्या निश्चित तथा गणों के आधार पर होती है) हैं । छंद के असंख्य उपप्रकार हैं जो ध्वनि विज्ञान तथा गणितीय समुच्चय-अव्यय पर आधृत हैं ।
शब्दयोजनाः
कविता में शब्दों का चयन विषय के अनुरूप, सजगता, कुशलता से इस प्रकार किया जाता है कि भाव, प्रवाह तथा गेयता से कविता के सौंदर्य में वृद्धि हो ।
तुकः
काव्य पंक्तियों में अंतिम वर्ण तथा ध्वनि में समानता को तुक कहते हैं । अतुकांत कविता में यह तत्व नहीं होता । मुक्तिका या ग़ज़ल में तुक के 2 प्रकार तुकांत व पदांत होते हैं जिन्हें उर्दू में क़ाफि़या व रदीफ़ कहते हैं ।
अलंकारः
अलंकार से कविता की सौंदर्य-वृद्धि होती है और वह अधिक चित्ताकर्षक प्रतीत होती है । अलंकार की न्यूनता या अधिकता दोनों काव्य दोष माने गये हैं । अलंकार के 2 मुख्य प्रकार शब्दालंकार व अर्थालंकार तथा अनेक भेद-उपभेद हैं ।
कविता के आंतरिक तत्वः
रस:
कविता को पढ़ने या सुनने से जो अनुभूति (आनंद, दुःख, हास्य, शांति आदि) होती है उसे रस कहते हैं । रस को कविता की आत्मा (रसात्मकं वाक्यं काव्यं), ब्रम्हानंद सहोदर आदि कहा गया है । यदि कविता पाठक को उस रस की अनुभूति करा सके जो कवि को कविता करते समय हुई थी तो वह सफल कविता कही जाती है । रस के 9 प्रकार श्रृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, भयानक, वीर, वीभत्स, शांत तथा अद्भुत हैं । कुछ विद्वान वात्सल्य को दसवां रस मानते हैं ।
अनुभूतिः
गद्य की अपेक्षा पद्य अधिक हृद्स्पर्शी होता है चूंकि कविता में अनुभूति की तीव्रता अधिक होती है इसलिए कहा गया है कि गद्य मस्तिष्क को शांति देता है कविता हृदय को ।
भावः
रस की अनुभूति करानेवाले कारक को भाव कहते हैं । हर रस के अलग-अलग स्थायी भाव इस प्रकार हैं । श्रृंगार-रति, हास्य-हास्य, करुण-शोक, रौद्र-क्रोध, भयानक-भय, वीर-उत्साह, वीभत्स-जुगुप्सा/घृणा, शांत-निर्वेद/वैराग्य, अद्भुत-विस्मय तथा वात्सल्य-ममता ।
२१-२-२०१४
***
लक्ष्मण रामानुज लड़ीवाला, जयपुर
*
आग्रह स्वीकार कर किन्ही कृपा गुरुदेव
मित्रवत भाव से अब लेसकू सलाह सदैव
हार्दिक आभार आपका श्री संजीव सलिल
स्वागत करता 'लक्ष्मण' दे तुम्हे ये दिल ।
२१-२-२०१३
***
दोहा सलिला मुग्ध
*
दोहा सलिला मुग्ध है, देख बसंती रूप.
शुक प्रणयी भिक्षुक हुआ, हुई सारिका भूप..
चंदन चंपा चमेली, अर्चित कंचन-देह.
शराच्चन्द्रिका चुलबुली, चपला करे विदेह..
नख-शिख, शिख-नख मक्खनी, महुआ सा पीताभ.
पाटलवत रत्नाभ तन, पौ फटता अरुणाभ..
सलिल-बिंदु से सुशोभित, कृष्ण कुंतली भाल.
सरसिज पंखुड़ी से अधर, गुलकन्दी टकसाल..
वाक् सारिका सी मधुर, भौंह-नयन धनु-बाण.
वार अचूक कटाक्ष का, रुकें न निकलें प्राण..
देह-गंध मादक मदिर, कस्तूरी अनमोल.
ज्यों गुलाब-जल में 'सलिल', अंगूरी दी घोल..
दस्तक कर्ण कपट पर, देते रसमय बोल.
वाक्-माधुरी हृदय से, कहे नयन-पट खोल..
दाड़िम रद-पट मौक्तिकी, संगमरमरी श्वेत.
रसना मुखर सारिका, पिंजरे में अभिप्रेत..
वक्ष-अधर रस-गगरिया, सुख पा कर रसपान.
बीत न जाये उमरिया, शुष्क न हो रस-खान..
रसनिधि हो रसलीन अब, रस बिन दुनिया दीन.
तरस न तरसा, बरस जा, गूंजे रस की बीन..
रूप रंग मति निपुणता, नर्तन-काव्य प्रवीण.
बहे नर्मदा निर्मला, हो न सलिल-रस क्षीण..
कंठ सुराहीदार है, भौंह कमानीदार.
पिला अधर रस-धार दो, तुमसा कौन उदार..
रूपमती तुम, रूप के कद्रदान हम भूप.
तृप्ति न पाये तृषित गर, व्यर्थ 'सलिल' जल-कूप..
गाल गुलाबी शराबी, नयन-अधर रस-खान.
चख-पी डूबा बावरा, भँवरा पा रस-दान..
जुही-चमेली वल्लरी, बाँहें कमल मृणाल.
बंध-बँधकर भुजपाश में, होता 'सलिल' रसाल..
***
हास्य रचना:
साहिब जी मोरे...
*
साहिब जी मोरे मैं नहीं रिश्वत खायो.....
झूठो सारो जग मैं साँचो, जबरन गयो फँसायो.
लिखना-पढ़ना व्यर्थ, न मनभर नोट अगर मिल पायो..
खन-खन दै तब मिली नौकरी, खन-खन लै मुसक्यायो.
पुरुस पुरातन बधू लच्छमी, चंचल बाहि टिकायो..
पैसा लै कारज निब्टायो, तन्नक माल पचायो.
जिनके हाथ न लगी रकम, बे जल कम्प्लेंट लिखायो..
इन्क्वायरी करबे वारन खों अंगूरी पिलबायो.
आडीटर-लेखा अफसर खों, कोठे भी भिजवायो..
दाखिल दफ्तर भई सिकायत, फिर काहे खुल्वायो?
सूटकेस भर नागादौअल लै द्वार तिहारे आयो..
बाप न भैया भला रुपैया, गुपचुप तुम्हें थमायो.
थाम हँसे अफसर प्यारे, तब चैन 'सलिल'खों आयो..
लेन-देन सभ्यता हमारी, शिष्टाचार निभायो.
कसम तिहारी नेम-धरम से भ्रष्टाचार मिटायो..
अपनी समझ पड़ोसन छबि, निज नैनं मध्य बसायो.
हल्ला कर नाहक ही बाने तिरिया चरित दिखायो..
अबला भाई सबला सो प्रभु जी रास रचा नई पायो.
साँच कहत हो माल परयो 'सलिल' बाँटकर खायो..
साहब जी दूना डकार गये पर बेदाग़ बचायो.....
***
हास्य पद:
जाको प्रिय न घूस-घोटाला
*
जाको प्रिय न घूस-घोटाला...
वाको तजो एक ही पल में, मातु, पिता, सुत, साला.
ईमां की नर्मदा त्यागयो, न्हाओ रिश्वत नाला..
नहीं चूकियो कोऊ औसर, कहियो लाला ला-ला.
शक्कर, चारा, तोप, खाद हर सौदा करियो काला..
नेता, अफसर, व्यापारी, वकील, संत वह आला.
जिसने लियो डकार रुपैया, डाल सत्य पर ताला..
'रिश्वतरत्न' गिनी-बुक में भी नाम दर्ज कर डाला.
मंदिर, मस्जिद, गिरिजा, मठ तज, शरण देत मधुशाला..
वही सफल जिसने हक छीना,भुला फ़र्ज़ को टाला.
सत्ता खातिर गिरगिट बन, नित रहो बदलते पाला..
वह गर्दभ भी शेर कहाता बिल्ली जिसकी खाला.
अख़बारों में चित्र छपा, नित करके गड़बड़ झाला..
निकट चुनाव, बाँट बन नेता फरसा, लाठी, भाला.
हाथ ताप झुलसा पड़ोस का घर धधकाकर ज्वाला..
सौ चूहे खा हज यात्रा कर, हाथ थाम ले माला.
बेईमानी ईमान से करना, 'सलिल' पान कर हाला..
है आराम ही राम, मिले जब चैन से बैठा-ठाला.
परमानंद तभी पाये जब 'सलिल' हाथ ले प्याला..
(महाकवि तुलसीदास से क्षमाप्रार्थना सहित)
***
गीत : *
सबको हक है जीने का,
चुल्लू-चुल्लू पीने का.....
*
जिसने पाई श्वास यहाँ,
उसने पाई प्यास यहाँ.
चाह रचा ले रास यहाँ.
हर दिन हो मधुमास यहाँ.
आह न हो, हो हास यहाँ.
आम नहीं हो खास यहाँ.
जो चाहा वह पा जाना
है सौभाग्य नगीने का.....
*
कोई अधूरी आस न हो,
स्वप्न काल का ग्रास न हो.
मनुआ कभी उदास न हो,
जीवन में कुछ त्रास न हो.
विपदा का आभास न हो.
असफल भला प्रयास न हो.
तट के पार उतरना तो
है अधिकार सफीने का.....
*
तम है सघन, उजास बने.
लक्ष्य कदम का ग्रास बने.
ईश्वर का आवास बने.
गुल की मदिर सुवास बने.
राई, फाग हुलास बने.
खास न खासमखास बने.
ज्यों की त्यों चादर रख दें
फन सीखें हम सीने का.....
२१-२-२०११
***
गीत :
*
सबको हक है जीने का,
चुल्लू-चुल्लू पीने का.....
*
जिसने पाई श्वास यहाँ,
उसने पाई प्यास यहाँ.
चाह रचा ले रास यहाँ.
हर दिन हो मधुमास यहाँ.
आह न हो, हो हास यहाँ.
आम नहीं हो खास यहाँ.

जो चाहा वह पा जाना
है सौभाग्य नगीने का.....
*
कोई अधूरी आस न हो,
स्वप्न काल का ग्रास न हो.
मनुआ कभी उदास न हो,
जीवन में कुछ त्रास न हो.
विपदा का आभास न हो.
असफल भला प्रयास न हो.

तट के पार उतरना तो
है अधिकार सफीने का.....
*
तम है सघन, उजास बने.
लक्ष्य कदम का ग्रास बने.
ईश्वर का आवास बने.
गुल की मदिर सुवास बने.
राई, फाग हुलास बने.
खास न खासमखास बने.

ज्यों की त्यों चादर रख दें
फन सीखें हम सीने का.....
२१.२.२०१०
***

कला और साहित्य

कला और साहित्य 
*
किसी कथ्य  या वस्तु की सुरुचिपूर्ण प्रस्तुति  विधि कला, प्रस्तुतिकर्ता कलाकार तथा प्रस्तुति कलकृति है।  
कला दो तरह की होती है - उपयोगी कला तथा ललित कला। उपयोगी कला में उपयोगिता का पक्ष प्रधान होता है और वह भौतिक आवश्यकता की पूर्ति में सहायक होती है जैसे बढ़ई की कलाकारी से सुंदर फर्नीचर आदि बनना कलात्मक है लेकिन भौतिक रूप से उपयोगी है।

ललित कला में भाव पक्ष प्रधान होता है। भावनाओं को सुसंस्कृत, अहलादित उदात्त तथा परिमार्जित करने में ललित कला का प्रयोग होता है। ललित कला भी पाँच तरह की तरह होती है - संगीत, काव्य (साहित्य), चित्र, वास्तु और मूर्ति।

काव्य ललित कला के वर्ग में आता है। संस्कृत तथा अन्य पुरानी भाषाएँ पहले छंदों में बोली जाती थीं। अतः भावनात्मक, सौष्ठव एवं सारगर्भित भाषा, कला का भाव पक्ष रखती थी। काव्य में सौंदर्य वर्णन, शौर्य गाथाएँ, करुण वेदना, शांत संदेश, हास्य, करुण आदि भावों से ओत प्रोत पद्य, राजा प्रजा तथा दरबार में कहे जाते थे । ये सारे कथन राजा, प्रजा समाज तथा देश की भलाई के लिए होते थे। मनोभावों को उदात्त करके जो पद्य निकलते थे, एक उद्देश्य, समाज के हित और वीरों के शौर्य बढ़ाने के लिए किया जाता था। श्रृंगार द्वारा राजा की सौंदर्य के प्रति कोमलता तथा करुणा द्वारा प्रजा की वेदना व्यक्त की जाती थी। यह सब कलात्मक विवरण, मूलतः समाज के हित के लिए होता था। अतः जो छंद समाज के हित के लिए हो, समाज को साथ लेकर चले वह साहित्य कहलाता है। जैसे जैसे गद्य का विकास हुआ, विधाएँ भी बढ़ गईं और साहित्य का आयाम भी। अब साहित्य गद्य पद्य, दोनो को लेकर चलता है। साहित्य शब्द, सहित में "व्यत्र" प्रत्यय लगाकर बना है। सहित यानी साथ साथ और सह हित माने, हित सहित या हितकारी। शब्द के साथ साथ शब्दों के सही और अर्थपूर्ण भाषा को साहित्य कहते हैं। अगर निरर्थक शब्द हैं या कोई विशेष हितकारी संदेश नही देते तो वे साहित्य श्रेणी में नही आते। जब शब्द कोई सुरुचि पूर्ण अर्थ दें या जनमानस की भावनाओं को जगा दें तब वह भाषा कलात्मक हो जाती है और साहित्य के वर्ग में आती है। स्नेह, करुणा, शौर्य, हास्य, संयोग, वियोग , शांति घृणा, क्रोध, भक्ति आदि भाव हमारे मन में छिपे होते हैं। भावों को हितकारी बना के लोगों के बीच में रखकर उनकी भावनाओं को जगाना ही साहित्य है।

सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता - खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी, पढ़िए, पढ़ते पढ़ते दुश्मनों के विरुद्ध भावना बरबस जग उठती है। वहीं सूरदास का पद - मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो, में एक बच्चे के प्रति वात्सल्य उमड़ पड़ता है।

उदाहरण के लिए-

बच्चे की रोटी खाते खाते डाल में गिर गई और वह गर्म दाल से रोटी निकल कर खा लेता है।

यह बात आप को साधारण लगेगी, लेकिन इसको अगर इस तरह बोलें

जब गिरी रोटी दाल में, बचवा रोवन लाग

गरम दल में हाथ दिय, गया रोटी लेकर भाग।

इसमें आप को एक दृश्य दिखाई देगा कि गर्म दल में रोटी गिरने से बच्चा रोने लगा, फिर रोटी उठाई और दोबारा न गिर जाए, या सोच कर भागा।

दोनो में बातें एक हैं लेकिन कहने का अंदाज अलग है। एक साधारण है दूसरा कलात्मक है, पढ़ने पर एक दृश्य दिखाता है। हल्का मनोरंजन भी करता है अतः यह भाषा साहित्यिक हो गई।

संथाली भाषा, ओल चिकी लिपि

संथाली भाषा, ओल चिकी लिपि
*

संथाली (ओल चिकि: ᱥᱟᱱᱛᱟᱲᱤ) संथाल परिवार की प्रमुख भाषा है। यह असम, झारखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ, बिहार, त्रिपुरा तथा बंगाल में बोली जाती है। संथाली,  हो और मुंडारी भाषाएँ ऑस्ट्रो-एशियाई भाषा-परिवार में मुंडा शाखा में आती हैं। भारत, बांग्लादेश, नेपाल और भूटान में लगभग ७६ लाख लोग यह भाषा बोलते हैं। उसकी अपनी पुरानी लिपि का नाम 'ओल चिकी' है। अंग्रेजी काल में संथाली रोमन में लिखी जाती थी। भारत के उत्तर झारखण्ड के कुछ हिस्सोँ मे संथाली लिखने के लिये ओल चिकी लिपि का प्रयोग होता है। संथाली की बोलियों में कमारी-संताली, करमाली (खोले), लोहारी-संताली, महाली, मांझी, पहाड़िया शामिल हैं।

परंपरागत संथाली भाषा और साहित्य का विकास और प्रचार १८७० के बाद से कुछ विदेशी साहित्य प्रेमियों द्वारा शुरू किया गया। आगे चल कर जी आर्चर ने १९४० के दशक की शुरुआत में संथाल कविता का उल्लेखनीय संग्रह किया। उन्होंने जनजातीय कविता के विशेष संदर्भ के साथ भारत की साहित्यिक परंपरा के प्रति महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उसके बाद बहुत सारे नाटक, लोककथा, लोकगीत, संथाली शब्दकोश और पारंपरिक साहित्य प्रकाशित किया गया।

संथाली भारत की एक आधिकारिक भाषा है। इसे २२ दिसंबर २००३ को भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया। यह दिन संथाली भाषा दिवस मनाया जाता है। संथाली लिपि ओलचिकी फोंट को विश्व स्तर पर संस्करण ५.१.० के रिलीज के साथ चार अप्रैल २००८ को विश्व स्तर पर यूनिकोड मानक से जोड़ा गया। 'भारतीय भाषाओं के लिए प्रौद्योगिकी विकास' (टीडीआईएल) द्वारा दिल्ली में आठ सितंबर, २००९ को सार्वजनिक डोमेन में संथाली ओलचिकी सॉफ्टवेयर टूल्स जारी किया गया।

संथाली भाषा साहित्य के डिजिटलाइजेशन एवं विकास के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सरकारी और गैर-सरकारी संस्थानों द्वारा कार्य हो रहा है, जिनमें मुख्य रूप से ओलचिकी सॉफ्टवेयर विकास परियोजनाएँ शामिल हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यूनिकोड कंसोर्टियम का कार्य अमेरिका द्वारा संथाली में विकिपीडिया का ओलचिकी में कार्य, एशिया और अफ्रीका की भाषाओं और संस्कृतियों के अध्ययन के लिए संस्थान (आईएलसीएएए), टोक्यो यूनिवर्सिटी ऑफ फॉरेन स्टडीज द्वारा ओलचिकी कन्वर्टर पर सॉफ्टवेयर बनाने का कार्य चल रहा है।

सीबीजी, सुंदरबर्ग, स्वीडन द्वारा संथाली कंप्यूटर एडेड ट्रांसलेशन (सीएटी) के लिए काम शुरू किया गया है। लायनब्रिज प्रौद्योगिकी, विंटर स्ट्रीट, मैसाचुसेट्स द्वारा ओलचिकी लिपि में संथाली भाषा गुणवत्ता निरीक्षण के लिए कार्य हो रहा है, जो त्रुटियों की तलाश करते हैं‌।

सिंपल डाइरेक्टमीडिया लेयर (एसडीएल), मेडेनहेड, यूके, ओएलजी और 3डी के माध्यम से ऑडियो, कीबोर्ड, माउस, जॉयस्टिक और ग्राफिक्स हार्डवेयर को निम्न स्तर की पहुंच प्रदान करने के लिए ओलचिकी सामग्री प्रबंधन और भाषा अनुवाद सॉफ्टवेयर के लिए काम कर रहा है। लंदन की एक कंपनी द्वारा संथाली में ओलचिकी स्क्रिप्ट के साथ स्मार्टफोन, टैबलेट और क्लासिक फोन बनाया गया है‌। स्वयं का लेखन प्रणाली होने से भाषा संरक्षण में मदद मिलती है और इसके बोलनेवालों को भी समाज में सही स्थान मिलता है।

संथाली साहित्य राष्ट्र-प्रेम की भावना से ओत-प्रोत है। अपनी संस्कृति के प्रति गौरव-बोध वस्तुत: राष्ट्रीय अस्मिता का हिस्सा है और राष्ट्रीय अस्मिता राष्ट्र-बोध का अभिन्न हिस्सा है। प्रगति, विकास, संस्कृति, इतिहास-भूगोल आदि की जड़ भाषा होती है और भाषा को समृद्ध साहित्य ही करता है।

साहित्य वर्तमान को कलात्मक एवं यथार्थ रूप में समाज के सम्मुख प्रस्तुत करता है. मनुष्य चाहे जितनी प्रगति कर ले, पर जब तक वह भीतर से सभ्य नहीं होता, तब तक उसकी प्रगति नहीं हो सकती. बाहरी सभ्यता भौतिक प्रगति को दर्शाती है, तो भीतरी सभ्यता मानवता को. समाज की आंतरिक और बाह्य प्रगति के लिए साहित्य हमेशा कल्पवृक्ष सिद्ध होता है।

संथाली साहित्य आदिवासी, गैर-आदिवासी साहित्य की अध्ययन परंपरा को विभाजित नहीं करता। संथाली समाज में समरूपता और समानता है, इसलिए संथाली साहित्य वाचिक-लिखित, ग्रामीण-शहरी या प्राचीन-आधुनिक आदि वर्गों में  विभाजित नहीं है। संथाली जन अपने साहित्य को 'ऑरेचर' अर्थात् वाचिक साहित्य (ऑरल+लिटरेचर) कहते हैं। वे आज के लिखित साहित्य को भी अपनी वाचिक यानी पुरखा साहित्य की परंपरा के साहित्य की कड़ी ही मानते हैं।

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सलिल सृजन २० फरवरी
*
गले मिले दोहा यमक
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धमक यमक की जब सुने, चमक-दमक हो शांत।
अटक-मटक मत मति कहे, सटक न होना भ्रांत।।
*
नौ कर आप न चाहते, पर नौकर की चाह।
हो न कलेजा चाक रब, चाकर कर परवाह।।
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हो बस अंत असंत का, यही तंत है तात।
संत बसंत सजा सके, सपनों की बारात।।
*
यम कब यमक समझ सके, सोच यमी हैरान।
तमक बमक कर ले न ले, लपक जान की जान।।
***
सॉनेट
शुभकामना
सुमन करते आपका स्वागत।
भाल पर शोभित तिलक चंदन।
सफलता है द्वार पर आगत।।
हृदय करते आपका वंदन।।
अनिल कर दे श्वास हर सुरभित।
जया दे जय, जयी हो हर आस।
अनल से पा तेज हों प्रमुदित।।
धरा-नभ दे धैर्य शौर्य हुलास।।
सलिल सिंचित माथ हो गर्वित।
वरद हों कर, हृदय करुणापूर्ण।
दिशाएँ वर दें रहो चर्चित।।
हर विपद कर कोशिशें दें चूर्ण।।
वह मिले जो चाहते हैं आप।
यश युगों तक सके जग में व्याप।।
२०-२-२०२२
•••
अशआर
*
अदीब खुदा की नेमत।
मिले न जिसको उसकी शामत।।
*
खुद खुदा हो सको अगर अपने।
पूरे होंगे तभी तेरे सपने।।
*
चाह ही चाह से निकलती है।
आह ही अश्क बन पिघलती है।।
*
साथ किसके हमेशा कौन रहा?
लब न बोले जवाब मौन रहा।।
***
हिंदी आरती
*
भारती भाषा प्यारी की।
आरती हिन्दी न्यारी की।।
*
वर्ण हिंदी के अति सोहें,
शब्द मानव मन को मोहें।
काव्य रचना सुडौल सुन्दर
वाक्य लेते सबका मन हर।
छंद-सुमनों की क्यारी की
आरती हिंदी न्यारी की।।
*
रखे ग्यारह-तेरह दोहा,
सुमात्रा-लय ने मन मोहा।
न भूलें गति-यति बंधन को-
न छोड़ें मुक्तक लेखन को।
छंद संख्या अति भारी की
आरती हिन्दी न्यारी की।।
*
विश्व की भाषा है हिंदी,
हिंद की आशा है हिंदी।
करोड़ों जिव्हाओं-आसीन
न कोई सकता इसको छीन।
ब्रम्ह की, विष्णु-पुरारी की
आरती हिन्दी न्यारी की।।
२०.२.२०२०
***
एक रचना
नामवर
*
लीक से हटकर चला चल
काम कर।
रोकता चाहे जमाना
नाम वर।।
*
जोड़ता जो, वह घटा है
तोड़ता जो, वह जुड़ा है
तना दिखता पर झुका है
पथ न सीधा हर मुड़ा है
श्वास साकी, आस प्याला
जाम भर
रोकता चाहे जमाना
नाम वर
*
जो न जैसा, दिखे वैसा
जो न बदला, वह सड़ा है
महत्तम की चाह मत कर
लघुत्तम सचमुच बड़ा है
कह न मरता कोई किंचित
चाम पर
रोकता चाहे जमाना
नाम वर
*
बात पूरी नहीं हो कह
'जो गलत, वे तोड़ मानक'
क्यों न करता पूर्ण कहकर
'जो सही, मत छोड़ मानक'
बन सिपाही, जान दे दे विहँस सच के
लाम पर
रोकता चाहे जमाना
नाम वर
२०.२.२०१९
***
एक रचना
मन
*
मर रहा पल-पल
अमर मन
जी रहा है.
*
जो सुहाए
कह न पाता, भीत है मन.
जो निभाये
सह न पाता, रीत है मन.
सुन-सुनाये
जी न पाता, गीत है मन.
घुट रहा पल-पल
अधर मन
सी रहा है.
*
मिल गयी पर
मिल न पायी, जीत है मन.
दास सुविधा ने
ख़रीदा, क्रीत है मन.
आँख में
पानी न, पाती पीत है मन.
जी रहा पल-पल
न कुछ कह
मर रहा है.
***
मुक्तक
बीत गईँ कितनी ऋतुएँ, बीते कितने साल
कोयल तजे न कूकना, हिरन न बदले चाल
पर्व बसंती हो गया, वैलेंटाइन आज
प्रेम फूल सा झट झरे, सात जन्म कंगाल
***
पुस्तक चर्चा -
नियति निसर्ग : दोहा दुनिया का नया रत्न
चर्चाकार- आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
[पुस्तक परिचय- नियति निसर्ग, दोहा संग्रह, प्रो. श्यामलाल उपाध्याय, प्रथम संस्करण, २०१५, आकार २२.५ से.मी. x १४.५ से.मी., आवरण सजिल्द, जैकेट सहित, पृष्ठ १२६, मूल्य १३०/-, प्रकाशक भारतीय वांग्मय पीठ, लोकनाथ कुञ्ज, १२७/ए/८ ज्योतिष राय मार्ग, नया अलीपुर कोलकाता ७०००५३]
*
विश्व वाणी हिंदी के छंद कोष के सर्वाधिक प्रखर और मूल्यवान दोहा कक्ष को अलंकृत करते हुए श्रेष्ठ-ज्येष्ठ शारदा-सुत प्रो. श्यामलाल उपाध्याय ने अपने दोहा संकलन रूपी रत्न 'नियति निसर्ग' प्रदान किया है. नियति निसर्ग एक सामान्य दोहा संग्रह नहीं है, यह सोद्देश्य, सारगर्भित,सरस, लाक्षणिक अभिव्यन्जनात्मकता से सम्पन्न दोहों की ऐसी रसधार प्रवाहित का रहा है जिसका अपनी सामर्थ्य के अनुसार पान करने पर प्रगाढ़ रसानंद की अनुभूति होती है.
प्रो. उपाध्याय विश्ववाणी हिंदी के साहित्योद्यान में ऐसे वट-वृक्ष हैं जिनकी छाँव में गणित जिज्ञासु रचनाशील अपनी शंकाओं का संधान और सृजन हेतु मार्गदर्शन पाते हैं. वे ऐसी संजीवनी हैं जिनके दर्शन मात्र से माँ भारती के प्रति प्रगाढ़ अनुराग और समर्पण का भाव उत्पन्न होता है. वे ऐसे साहित्य-ऋषि हैं जिनके दर्शन मात्र से श्नाकों का संधान होने लगता है. उनकी ओजस्वी वाणी अज्ञान-तिमिर का भेदन कर ज्ञान सूर्य की रश्मियों से साक्षात् कराती है.
नियति निसर्ग का श्री गणेश माँ शारदा की सारस्वत वन्दना से होना स्वाभाविक है. इस वन्दना में सरस्वती जी के जिस उदात्त रूप की अवधारणा ही, वह अन्यत्र दुर्लभ है. यहाँ सरस्वती मानवीय ज्ञान की अधिष्ठात्री या कला-संगीत की आदि शक्ति इला ही नहीं हैं अपितु वे सकल विश्व, अंतरिक्ष, स्वर्ग और ब्रम्ह-लोक में भी व्याप्त ब्रम्हाणी हैं. कवि उन्हें अभिव्यक्ति की देवी कहकर नमन करता है.
'विश्वपटल पर है इला, अन्तरिक्ष में वाणि
कहीं भारती स्वर्ग में, ब्रम्ह-लोक ब्रम्हाणि'
'घर की शोभा' धन से नहीं कर्म से होती है. 'कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन' की विरासत नयी पीढ़ी के लिए श्लाघ्य है-
'लक्ष्मी बसती कर्म में, कर्म बनता भाग्य
भाग्य-कर्म संयोग से, बन जाता सौभाग्य'
माता-पिता के प्रति, शिशु के प्रति, बाल विकास, अवसर की खोज, पाठ के गुण विशेष, शिक्षक के गुण, नेता के गुण, व्यक्तित्व की परख जैसे शीर्षकों के अंतर्गत वर्णित दोहे आम आदमी विशेषकर युवा, तरुण, किशोर तथा बाल पाठकों को उनकी विशिष्टता और महत्त्व का भान कराने के साथ-साथ कर्तव्य और अधिकारों की प्रतीति भी कराते हैं. दोहाकार केवल मनोरंजन को साहित्य सृजन का लक्ष्य नहीं मानता अपितु कर्तव्य बोध और कर्म प्रेरणा देते साहित्य को सार्थक मानता है.
राष्ट्रीयता को साम्प्रदायिकता मानने के वर्तमान दौर में कवि-ऋषि राष्ट्र-चिंतन, राष्ट्र-धर्म, राष्ट्र की नियति, राष्ट्र देवो भव, राष्ट्रयता अखंडता, राष्ट्रभाषा हिंदी का वर्चस्व, देवनागरी लिपि आदि शीर्षकों से राष्ट्रीय की ओजस्वी भावधारा प्रवाहित कर पाठकों को अवगाहन करने का सुअवसर उपलब्ध कराते हैं. वे सकल संतापों का निवारण का एकमात्र मार्ग राष्ट्र की सुरक्षा में देखते हैं.
आदि-व्याधि विपदा बचें, रखें सुरक्षित आप
सदा सुरक्षा देश की, हरे सकल संताप
हिंदी की विशेषता को लक्षित करते हुए कवि-ऋषि कहते हैं-
हिंदी जैसे बोलते, वैसे लिखते आप
सहज रूप में जानते, मिटते मन के ताप
हिंदी के जो शब्द हैं, रखते अपने अर्थ
सहज अर्थ वे दे चलें, जिनसे हो न अनर्थ
बस हिंदी माध्यम बने, हिंदी का हो राज
हिंदी पथ-दर्शन करे, हिंदी हो अधिराज
हिंदी वैज्ञानिक सहज, लिपि वैज्ञानिक रूप
इसको सदा सहेजिए, सुंदर स्निग्ध स्वरूप
तकनीकी सम्पन्न हों, माध्यम हिंदी रंग
हिंदी पाठी कुशल हों, रंग न होए भंग
देवनागरी लिपि शीर्षक से दिए दोहे भारत के इतिहास में हिंदी के विकास को शब्दित करते हैं. इस अध्याय में हिंसी सेवियों के अवदान का स्मरण करते हुए ऐसे दोहे रचे गए हैं जो नयी पीढ़ी का विगत से साक्षात् कराते हैं.
संत कबीर, महाबली कर्ण, कविवर रहीम, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, मौनी बाबा तथा श्रीकृष्ण पर केन्द्रित दोहे इन महान विभूतियों को स्मरण मात्र नहीं करते अपितु उनके अवदान का उल्लेख कर प्रेरणा जगाने का काम भी करते हैं.
कबीर का गुरु एक है, राम नाम से ख्यात
निराकार निर्गुण रहा, साई से प्रख्यात
जब तक स्थापित रश्मि है, गंगा जल है शांत
रश्मिरथी का यश रहे, जग में सदा प्रशांत
ऐसा कवि पायें विभो, हो रहीम सा धीर
ज्ञानी दानी वुगी हो, युद्ध क्षेत्र का वीर
महावीर आचार्य हैं, क्या द्विवेद प्रसाद
शेरश जागरण काल के, विषय रहा आल्हाद
मौनी बाबा धन्य हैं, धन्य आप वरदान
जनमानस सुख से रहे, यही बड़ा अवदान
भारत कर्म प्रधान देश है. यहाँ शक्ति की भक्ति का विधान सनातन काल से है. गीता का कर्मयोग भारत ही नहीं, सकल विश्व में हर काल में चर्चित और अर्चित रहा है. सकल कर्म प्रभु को अर्पित कर निष्काम भाव से संपादित करना ही श्लाघ्य है-
सौंपे सरे काज प्रभु, सहज हुए बस जान
सारे संकट हर लिए, रख मान तो मान
कर्म कराता धर्म है, धर्म दिलाता अर्थ
अर्थ चले बहु काम ले, यह जीवन का मर्म
जातीय छुआछूत ने देश की बहुत हानि की है. कविगुरु कर्माधारित वर्ण व्यवस्था के समर्थक हैं जिसका उद्घोष गीत में श्रीकृष्ण 'चातुर्वर्ण्य माया सृष्टं गुण-कर्म विभागश:' कहकर करते हैं.
वर्ण व्यवस्था थी बनी, गुणवत्ता के काज
कुलीनता के अहं ने, अपना किया अकाज
घृणा जन्म देती घृणा, प्रेम बढ़ाता प्रेम
इसीलिए तुम प्रेम से, करो प्रेम का नेम
सर्वधर्म समभाव के विचार की विवेचना करते हुए काव्य-ऋषि धर्म और संप्रदाय को सटीकता से परिभाषित करते हैं-
होता धर्म उदार है, संप्रदाय संकीर्ण
धर्म सदा अमृत सदृश, संप्रदाय विष-जीर्ण
कृषि प्रधान देश भारत में उद्योग्व्र्धक और कृषि विरोधी प्रशासनिक नीतियों का दुष्परिणाम किसानों को फसल का समुचित मूल्य न मिलने और किसानों द्वारा आत्म हत्या के रूप में सामने आ रहा है. कवी गुरु ने कृषकों की समस्या का जिम्मेदार शासन-प्रशासन को ही माना है-
नेता खेलें भूमि से, भूमिग्रहण व्यापार
रोके इसको संहिता, चाँद लगाये चार
रोटी के लाले पड़े, कृषक भूमि से हीन
तडपे रक्षा प्राण को, जल अभाव में मीन
दोहे गोशाला के भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसान की दुर्दशा को बताते हैं. कवी गौ और गोशाला की महत्ता प्रतिपादित करते हैं-
गो में बसते प्राण हैं, आशा औ' विश्वास
जहाँ कृष्ण गोपाल हैं, करनी किसकी आस
गोवध अनुचित सर्वथा, औ संस्कृति से दूर
कर्म त्याज्य अग्राह्य है, दुर्मत कुत्सित क्रूर
राष्ट्र के प्रति कर्तव्य, स्वाधीनता की नियति, मादक द्रव्यों के दुष्प्रभाव, चिंता, दुःख की निरंतरता, आत्मबोध तत्व, परमतत्व बोध, आशीर्वचन, संस्कार, रक्षाबंधन, शिवरात्रि, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी आदि शीर्षकों के अंतर्गत दिए गए दोहे पाठकों का पाठ प्रदर्शन करने क साथ शासन-प्रशासन को भी दिशा दिखाते हैं. पुस्तकांत में 'प्रबुद्ध भारत का प्रारूप' शीर्षक से कविगुरु ने अपने चिंतन का सार तत्व तथा भविष्य के प्रति चिंतन-मंथन क नवनीत प्रस्तुत किया है-
सत्य सदा विजयी रहा, सदा सत्य की जीत
नहीं सत्य सम कुछ जगत, सत्य देश का गीत
सभी पन्थ हैं एक सम, आत्म सन्निकट जान
आत्म सुगंध पसरते, ईश्वर अंश समान
बड़ी सोच औ काम से, बनता व्यक्ति महान
चिंतन औ आचार हैं, बस उनके मन जान
किसी कृति का मूल्याङ्कन विविध आधारों पर किया जाता है. काव्यकृति का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष उसका कथ्य होता है. विवेच्य ८६ वर्षीय कवि-चिन्तक के जीवनानुभवों का निचोड़ है. रचनाकार आरंभ में कटी के शिल्प के प्रति अत्यधिक सजग होता है क्योंकि शिल्पगत त्रुटियाँ उसे कमजोर रचनाकार सिद्ध करती हैं. जैसे-जैसे परिपक्वता आती है, भाषिक अलंकरण के प्रति मोह क्रमश: कम होता जाता है. अंतत: 'सहज पके सो मीठा होय' की उक्ति के अनुसार कवि कथ्य को सरलतम रूप में प्रस्तुत करने लगता है. शिल्प के प्रति असावधानता यत्र-तत्र दिखने पर भी कथ्य का महत्व, विचारों की मौलिकता और भाषिक प्रवाह की सरलता कविगुरु के संदेश को सीधे पाठक के मन-मस्तिष्क तक पहुँचाती है. यह कृति सामान्य पाठक, विद्वज्जनों, प्रशासकों, शासकों, नीति निर्धारकों तथा बच्चों के लिए समान रूप से उपयोगी है. यही इसका वैशिष्ट्य है.
२०.२.२०१७
===
श्रृंगार गीत:
.
चाहता मन
आपका होना
.
शशि ग्रहण से
घिर न जाए
मेघ दल में
छिप न जाए
चाह अजरा
बने तारा
रूपसी की
कीर्ति गाये
मिले मन में
एक तो कोना
.
द्वार पर
आ गया बौरा
चीन्ह भी लो
तनिक गौरा
कूक कोयल
गाए बन्ना
सुना बन्नी
आम बौरा
मार दो मंतर
करो टोना
.
माँग इतनी
माँग भर दूँ
आप का
वर-दान कर दूँ
मिले कन्या-
दान मुझको
जिंदगी को
गान कर दूँ
प्रणय का प्रण
तोड़ मत देना
२०.२.२०१५
.
॥नर्मदाष्टक मणिप्रवाल।।
हिंदी काव्यानुवाद॥
*
देवासुरा सुपावनी नमामि सिद्धिदायिनी,
त्रिपूरदैत्यभेदिनी विशाल तीर्थमेदिनी ।
शिवासनी शिवाकला किलोललोल चापला,
तरंग रंग सर्वदा नमामि देवि नर्मदा ।।१।।
सुर असुरों को पावन करतीं सिद्धिदायिनी,
त्रिपुर दैत्य को भेद विहँसतीं तीर्थमेदिनी।
शिवासनी शिवकला किलोलित चपल चंचला,
.भक्तिभाव में लीन सर्वदा, नमन नर्मदा ॥१॥
विशाल पद्मलोचनी समस्त दोषमोचनी,
गजेंद्रचालगामिनी विदीप्त तेजदामिनी ।।
कृपाकरी सुखाकरी अपार पारसुंदरी,
तरंग रंग सर्वदा नमामि देवि नर्मदा ।।२।।
नवल कमल से नयन, पाप हर हर लेतीं तुम,
गज सी चाल, दीप्ति विद्युत सी, हरती भय तम।
रूप अनूप, अनिन्द्य, सुखद, नित कृपा करें माँ‍
भक्तिभाव में लीन सर्वदा, नमन नर्मदा ॥२॥
तपोनिधी तपस्विनी स्वयोगयुक्तमाचरी,
तपःकला तपोबला तपस्विनी शुभामला ।
सुरासनी सुखासनी कुताप पापमोचनी,
तरंग रंग सर्वदा नमामि देवि नर्मदा ।।३।।
सतत साधनारत तपस्विनी तपोनिधी तुम,
योगलीन तपकला शक्तियुत शुभ हर विधि तुम।
पाप ताप हर, सुख देते तट, बसें सर्वदा,
भक्तिभाव में लीन सर्वदा, नमन नर्मदा ॥३॥
कलौमलापहारिणी नमामि ब्रम्हचारिणी,
सुरेंद्र शेषजीवनी अनादि सिद्धिधकरिणी ।
सुहासिनी असंगिनी जरायुमृत्युभंजिनी,
तरंग रंग सर्वदा नमामि देवि नर्मदा ।।४।।
ब्रम्हचारिणी! कलियुग का मल ताप मिटातीं,
सिद्धिधारिणी! जग की सुख संपदा बढ़ातीं ।
मनहर हँसी काल का भय हर, आयु दे बढ़ा,
भक्तिभाव में लीन सर्वदा, नमन नर्मदा ॥४॥
मुनींद्र ‍वृंद सेवितं स्वरूपवन्हि सन्निभं,
न तेज दाहकारकं समस्त तापहारकं ।
अनंत ‍पुण्य पावनी, सदैव शंभु भावनी,
तरंग रंग सर्वदा नमामि देवि नर्मदा ।।५।।
अग्निरूप हे! सेवा करते ऋषि, मुनि, सज्जन,
तेज जलाता नहीं, ताप हर लेता मज्जन ।
शिव को अतिशय प्रिय हो पुण्यदायिनी मैया,
भक्तिभाव में लीन सर्वदा, नमन नर्मदा ॥५॥
षडंगयोग खेचरी विभूति चंद्रशेखरी,
निजात्म बोध रूपिणी, फणीन्द्रहारभूषिणी ।
जटाकिरीटमंडनी समस्त पाप खंडनी,
तरंग रंग सर्वदा नमामि देवि नर्मदा ।।६।।
षडंग योग, खेचर विभूति, शशि शेखर शोभित,
आत्मबोध, नागेंद्रमाल युत मातु विभूषित ।
जटामुकुट मण्डित देतीं तुम पाप सब मिटा,
भक्तिभाव में लीन सर्वदा, नमन नर्मदा ॥६।।
भवाब्धि कर्णधारके!, भजामि मातु तारिके!
सुखड्गभेदछेदके! दिगंतरालभेदके!
कनिष्टबुद्धिछेदिनी विशाल बुद्धिवर्धिनी,
तरंग रंग सर्वदा नमामि देवि नर्मदा ।।७।।
कर्णधार! दो तार, भजें हम माता तुमको,
दिग्दिगंत को भेद, अमित सुख दे दो हमको ।
बुद्धि संकुचित मिटा, विशाल बुद्धि दे दो माँ!,
भक्तिभाव में लीन सर्वदा, नमन नर्मदा ॥७॥
समष्टि अण्ड खण्डनी पताल सप्त भैदिनी,
चतुर्दिशा सुवासिनी, पवित्र पुण्यदायिनी ।
धरा मरा स्वधारिणी समस्त लोकतारिणी,
तरंग रंग सर्वदा नमामि देवि नर्मदा ।।८।।
भेदे हैं पाताल सात सब अण्ड खण्ड कर,
पुण्यदायिनी! चतुर्दिशा में ही सुगंधकर ।
सर्वलोक दो तार करो धारण वसुंधरा,
भक्तिभाव में लीन सर्वदा, नमन नर्मदा ॥८॥
***
नर्मदा नामावली
*
पुण्यतोया सदानीरा नर्मदा.
शैलजा गिरिजा अनिंद्या वर्मदा.
शैलपुत्री सोमतनया निर्मला.
अमरकंटी शांकरी शुभ शर्मदा.
आदिकन्या चिरकुमारी पावनी.
जलधिगामिनी चित्रकूटा पद्मजा.
विमलहृदया क्षमादात्री कौतुकी.
कमलनयनी जगज्जननि हर्म्यदा.
शाशिसुता रौद्रा विनोदिनी नीरजा.
मक्रवाहिनी ह्लादिनी सौंदर्यदा.
शारदा वरदा सुफलदा अन्नदा.
नेत्रवर्धिनि पापहारिणी धर्मदा.
सिन्धु सीता गौतमी सोमात्मजा.
रूपदा सौदामिनी सुख-सौख्यदा.
शिखरिणी नेत्रा तरंगिणी मेखला.
नीलवासिनी दिव्यरूपा कर्मदा.
बालुकावाहिनी दशार्णा रंजना.
विपाशा मन्दाकिनी चित्रोंत्पला.
रुद्रदेहा अनुसूया पय-अंबुजा.
सप्तगंगा समीरा जय-विजयदा.
अमृता कलकल निनादिनी निर्भरा.
शाम्भवी सोमोद्भवा स्वेदोद्भवा.
चन्दना शिव-आत्मजा सागर-प्रिया.
वायुवाहिनी कामिनी आनंददा.
मुरदला मुरला त्रिकूटा अंजना.
नंदना नाम्माडिअस भव मुक्तिदा.
शैलकन्या शैलजायी सुरूपा.
विपथगा विदशा सुकन्या भूषिता.
गतिमयी क्षिप्रा शिवा मेकलसुता.
मतिमयी मन्मथजयी लावण्यदा.
रतिमयी उन्मादिनी वैराग्यदा.
यतिमयी भवत्यागिनी शिववीर्यदा.
दिव्यरूपा तारिणी भयहांरिणी.
महार्णवा कमला निशंका मोक्षदा.
अम्ब रेवा करभ कालिंदी शुभा.
कृपा तमसा शिवज सुरसा मर्मदा.
तारिणी वरदायिनी नीलोत्पला.
क्षमा यमुना मेकला यश-कीर्तिदा.
साधना संजीवनी सुख-शांतिदा.
सलिल-इष्टा माँ भवानी नरमदा.
१२-१०-२०१४
***
अभिनव प्रयोग-
उल्लाला गीत:
जीवन सुख का धाम है
*
जीवन सुख का धाम है,
ऊषा-साँझ ललाम है.
कभी छाँह शीतल रहा-
कभी धूप अविराम है...
*
दर्पण निर्मल नीर सा,
वारिद, गगन, समीर सा,
प्रेमी युवा अधीर सा-
हर्ष, उदासी, पीर सा.
हरि का नाम अनाम है
जीवन सुख का धाम है...
*
बाँका राँझा-हीर सा,
बुद्ध-सुजाता-खीर सा,
हर उर-वेधी तीर सा-
बृज के चपल अहीर सा.
अनुरागी निष्काम है
जीवन सुख का धाम है...
*
वागी आलमगीर सा,
तुलसी की मंजीर सा,
संयम की प्राचीर सा-
राई, फाग, कबीर सा.
स्नेह-'सलिल' गुमनाम है
जीवन सुख का धाम है...
***
उल्लाला मुक्तिका:
दिल पर दिल बलिहार है
*
दिल पर दिल बलिहार है,
हर सूं नवल निखार है..
प्यार चुकाया है नगद,
नफरत रखी उधार है..
कहीं हार में जीत है,
कहीं जीत में हार है..
आसों ने पल-पल किया
साँसों का सिंगार है..
सपना जीवन-ज्योत है,
अपनापन अंगार है..
कलशों से जाकर कहो,
जीवन गर्द-गुबार है..
स्नेह-'सलिल' कब थम सका,
बना नर्मदा धार है..
***
उल्लाला मुक्तक:
*
उल्लाला है लहर सा,
किसी उनींदे शहर सा.
खुद को खुद दोहरा रहा-
दोपहरी के प्रहर सा.
*
झरते पीपल पात सा,
श्वेत कुमुदनी गात सा.
उल्लाला मन मोहता-
शरतचंद्र मय रात सा..
*
दीप तले अँधियार है,
ज्यों असार संसार है.
कोशिश प्रबल प्रहार है-
दीपशिखा उजियार है..
*
मौसम करवट बदलता,
ज्यों गुमसुम दिल मचलता.
प्रेमी की आहट सुने -
चुप प्रेयसी की विकलता..
*
दिल ने करी गुहार है,
दिल ने सुनी पुकार है.
दिल पर दिलकश वार या-
दिलवर की मनुहार है..
*
शीत सिसकती जा रही,
ग्रीष्म ठिठकती आ रही.
मन ही मन में नवोढ़ा-
संक्रांति कुछ गा रही..
*
श्वास-आस रसधार है,
हर प्रयास गुंजार है.
भ्रमरों की गुन्जार पर-
तितली हुई निसार है..
*
रचा पाँव में आलता,
कर-मेंहदी पूछे पता.
नाम लिखा छलिया हुआ-
कहो कहाँ-क्यों लापता?
*
वह प्रभु तारणहार है,
उस पर जग बलिहार है.
वह थामे पतवार है.
करता भव से पार है..
****
उल्लाला सलिला:
*
(छंद विधान १३-१३, १३-१३, चरणान्त में यति, सम चरण सम तुकांत, पदांत एक गुरु या दो लघु)
*
अभियंता निज सृष्टि रच, धारण करें तटस्थता।
भोग करें सब अनवरत, कैसी है भवितव्यता।।
*
मुँह न मोड़ते फ़र्ज़ से, करें कर्म की साधना।
जगत देखता है नहीं अभियंता की भावना।।
*
सूर सदृश शासन मुआ, करता अनदेखी सतत।
अभियंता योगी सदृश, कर्म करें निज अनवरत।।
*
भोगवाद हो गया है, सब जनगण को साध्य जब।
यंत्री कैसे हरिश्चंद्र, हो जी सकता कहें अब??
*
भृत्यों पर छापा पड़े, मिलें करोड़ों रुपये तो।
कुछ हजार वेतन मिले, अभियंता को क्यों कहें?
*
नेता अफसर प्रेस भी, सदा भयादोहन करें।
गुंडे ठेकेदार तो, अभियंता क्यों ना डरें??
*
समझौता जो ना करे, उसे तंग कर मारते।
यह कड़वी सच्चाई है, सरे आम दुत्कारते।।
*
हर अभियंता विवश हो, समझौते कर रहा है।
बुरे काम का दाम दे, बिन मारे मर रहा है।।
*
मिले निलम्बन-ट्रान्सफर, सख्ती से ले काम तो।
कोई न यंत्री का सगा, दोषारोपण सब करें।।
२०.२.२०१४
***
तेवरी
*
ताज़ा-ताज़ा दिल के घाव।
सस्ता हुआ नमक का भाव।।
मंझधारों-भंवरों को पार,
किया किनारे डूबी नाव।।
सौ चूहे खाने के बाद
सत्य-अहिंसा का है चाव।।
ताक़तवर के चूम कदम
निर्बल को दिखलाया ताव।।
ठण्ड भगाई नेता ने
जला झोपडी, बना अलाव।।
डाकू तस्कर चोर खड़े
मतदाता क्या करे चुनाव?
नेता रावण, जन सीता
कैसे होगा सलिल निभाव?
२०.२.२०१३
***
हास्य पद:
जाको प्रिय न घूस-घोटाला
*
जाको प्रिय न घूस-घोटाला...
वाको तजो एक ही पल में, मातु, पिता, सुत, साला.
ईमां की नर्मदा त्यागयो, न्हाओ रिश्वत नाला..
नहीं चूकियो कोऊ औसर, कहियो लाला ला-ला.
शक्कर, चारा, तोप, खाद हर सौदा करियो काला..
नेता, अफसर, व्यापारी, वकील, संत वह आला.
जिसने लियो डकार रुपैया, डाल सत्य पर ताला..
'रिश्वतरत्न' गिनी-बुक में भी नाम दर्ज कर डाला.
मंदिर, मस्जिद, गिरिजा, मठ तज, शरण देत मधुशाला..
वही सफल जिसने हक छीना,भुला फ़र्ज़ को टाला.
सत्ता खातिर गिरगिट बन, नित रहो बदलते पाला..
वह गर्दभ भी शेर कहाता बिल्ली जिसकी खाला.
अख़बारों में चित्र छपा, नित करके गड़बड़ झाला..
निकट चुनाव, बाँट बन नेता फरसा, लाठी, भाला.
हाथ ताप झुलसा पड़ोस का घर धधकाकर ज्वाला..
सौ चूहे खा हज यात्रा कर, हाथ थाम ले माला.
बेईमानी ईमान से करना, 'सलिल' पान कर हाला..
है आराम ही राम, मिले जब चैन से बैठा-ठाला.
परमानंद तभी पाये जब 'सलिल' हाथ ले प्याला..
२०.२.२०११
***

मंगलवार, 20 फ़रवरी 2024

स्पर्श चिकित्सा, हस्त मुद्रा, डी.सी. जैन

कृति चर्चा-
'स्पर्श चिकित्सा एवं मुद्रा विज्ञान रहस्य' - काया रखिए स्वस्थ्य
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
                    तरंगाें से छूकर दी जाने वाली ऊर्जा ही स्पर्श चिकित्सा है। शरीर की व्याधियाँ, बीमारियाँ या रोग दाे प्रकार से दूर किए जा सकते हैं। रासायनिक ऊर्जा (केमिकल एनर्जी) अर्थात आहार अथवा औषधियाओं द्वारा तथा ब्रह्मांडीय ऊर्जा (यूनिवर्सल एनर्जी) अर्थात तरंगाें के माध्यम से किया जाने वाला इलाज। रोगी को छूकर तरंगों के माध्यम से की जानेवाली चिकित्सा पद्धति ही स्पर्श चिकित्सा है। प्राचीन जापानी उपचार तकनीक रेकी में हाथों का उपयोग कर बाधित ऊर्जा को शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य सुधारने के लिए प्रयोग किया जाता है। हमारी काया (देह, तन या शरीर) में आत्मा के रूप में ऊर्जा जन्मजात होती है। यह ऊर्जा शिथिल हो तो व्यक्ति बीमार होता है। औषधि (दवा, मेडिसन) या शल्यक्रिया (सर्जरी) का उपयोग बाह्य हस्तक्षेप कर शरीर का रसायन (केमेस्ट्री) बदलने का प्रयास किया जाता है। यह तरीका बीमारी से छुटकारा दिलाता है किंतु किसी अन्य स्तर पर भिन्न दुष्प्रभाव (साइड इफेक्ट) उत्पन्न कर देता है। योगाभ्यास अथवा स्पर्श चिकित्सा अपनाकर ऐसे दुष्प्रभाव से बचा जा सकता है। लाक्षणिक चिकित्सा पद्धतियाँ रोग के लक्षणों का शमन करती हैं किंतु रोग की जड़ का उन्मूलन नहीं करतीं। स्पर्श चिकित्सा पद्धति रोग के लक्षणों का उपचार नहीं, रोग की जड़ का उन्मीलन ऊर्जा संचार द्वारा करते हैं जिसका कोई अन्य दुष्प्रभाव नहीं होता। स्पर्श साधना सिद्धि से हम अपनी सामान्य सीमाओं को पार कर ऐसी शक्ति प्राप्त कर पाते हैं जो व्याधियों की जड़ का उन्मूलन करती हैं।

                    भारत में प्राचीन काल से स्पर्श चिकित्सा तथा मुद्रा विज्ञान की साधना की जाती रही है। भगवान शिव, महावीर, बुद्ध आदि को देखें तो वे एक विशिष्ट आसान में बैठे होते हैं, उनके नेत्र और हाथ विशिष्ट भंगिमा में होते हैं। जन सामान्य इसे देखकर भी अनदेखा कर देता है चूँकि उसे इस विषय पर कोई जानकारी प्राप्त नहीं होती। अभियंता डी. सी. जैन जी ने सपार्ष चिकित्सा तथा मुद्रा विज्ञान विषयक सनातन सिद्धांतों का अध्ययन और अभ्यास कर इसे लोक कल्याण हेतु पुस्तक के रूप में उपलब्ध कराकर पुण्य अर्जित किया है। हिंदी में इस विषय पर साहित्य का नितांत अभाव है। कुछ व्यावसायिक जन आधा-अधूरा ज्ञान प्राप्त कर स्पर्श चिकित्सा करते हैं किंतु वे रोगी को संपूरण ज्ञान नहीं देते ताकि रोगी उनके परामर्श हेतु बाध्य होकर उन्हें अर्थ लाभ कराता रहे। श्री जैन ने 'स्पर्श चिकित्सा एवं मुद्रा विज्ञान रहस्य' सहर्षक कृति का लेखन-प्रकाशन कर इस दुर्लभ ज्ञान को सर्व साधारण के लिए सुलभ किया है। 

                    'स्पर्श चिकित्सा एवं मुद्रा विज्ञान रहस्य' पुस्तक में सात चक्रों, ऊर्जा बंध, प्रतिरोधक शक्ति वृद्धि, नाड़ी संस्थान, विशुद्धि चक्र, मणिपुर चक्र, मूलाधार चक्र, स्वाधिसठन चक्र, कोणीय ऊर्जा आदि को कहलाने तथा ऊर्जित करने की प्रामाणिक जानकारी दी गई है। विशिष्ट रोगों (हृदरोग, सिर दर्द, चक्कर आना, कमर दर्द, आँखों और गले के रोग, पाचन रोग, मूत्र विकार, थायराइड ग्रन्थि, माइग्रेन, गाल ब्लेडर, लीवर, रक्त प्रवाह, साइटिका आदि) से उपजे विकारों की स्पर्श चिकित्सा संबंधी विधि चित्रों सहित दी गई है। श्री जैन ने स्वयं स्पर्श चिकित्सा तथा हस्त मुद्राओं का अभ्यास कार अपनी व्याधियों पर नियंत्रण किया है। लगभग ९० वर्ष की आयु में भी श्री जैन सक्रिय हैं, इसका कारण वे अपनी स्वास्थ्य-साधना को ही मानते हैं। यह लोकोपयोगी कृति हर घर में होना चाहिए और हर व्यक्ति को आवश्यकतानुसार हस्त मुद्राओं, स्पर्श चिकित्सा और योग आसनों का अभ्यास करना चाहिए। 

वास्तव में शालेय स्तर पर इस पुस्तक की विषय वस्तु प्राथमिक कक्षाओं के पाठ्यक्रम में सम्मिलित की जाना चाहिए। अध्यापकों को स्पर्श चिकित्सा और हस्त मुद्राओं का प्रशिक्षण दिया जाए ताकि वे विद्यार्थियों को सिखा सकें और हमारी भावी पीढ़ी शारीरिक मानसिक रूप से स्वस्थ्य रहकर जियावन के हर क्षेत्र में विजय पटक फहरा सके। हमारे प्राचीन ऋषि-मुनि इन्हीं प्राकृतिक चिकित्सा पद्धतियों का अनुशीलन और अभ्यास दीर्घायु रहते रहे हैं। श्री जैन इस स्तुत्य कार्य हेतु साधुवाद के पात्र हैं। 
***
  

   

रानू राठौड़ 'रूही', जबलपुर, लेख संकलन

कृति चर्चा-
'दृष्टिपात जबलपुर' : लोकोपयोगी आलेख संग्रह
- आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
                    
वर्तमान संक्रमण काल में द्रुत गति से हो रहे सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक परिवर्तनों से भारत की पारिवारिक वुअवस्था चरमरा रही है। दो पीढ़ियों के मध्य अंततराल को पाटकर संवेदना सेतु निर्माण करने में साहित्य की महती भूमिका है। दुर्भाग्य वश हर शिक्षित व्यक्ति खुद को साहित्यकार समझकर मनमाना साहित्य लिखा रहा है और वैज्ञानिक विकास द्वारा सस्ती-सुलभ हुई मुद्रण तकनीक ने नव धनाढ्य वर्ग में पुस्तक छाप लेने मात्र को साहित्यकार होने की पात्रता बना दिया है। इस कारण स्तरहीन-निरुपयोगी पुस्तकों का ढेर लगता जा रहा है। इस कारण साहित्य पढ़ने से आम जन विमुख होता जा रहा है। इस पारिस्थितिक चक्रव्यूह ने सर्वाधिक अहित कविता का किया है। गद्य अपेक्षाकृत कम लिखा जाने से स्तरहीनता का अपेक्षाकृत कम शिकार हुआ है। गद्य में कहानी, लघुकथा, व्यंग्य लेख जैसी विधाएँ नकारात्मकता को कला मान कर समाज में संवेदनहीनता का प्रचार कर रही हैं। तथाकथित समीक्षा साहित्य के नाम पर व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर लिखी गई पाठकीय प्रतिक्रिया ही स्थान पा रही है। गद्य की प्रमुख विधाओं में नाटक, एकांकी, उपन्यास, कहानी, लघुकथा, निबंध, मीमांसा, जीवनी, आत्मकथा, यात्रा वृत्त, संस्मरण, रेखाचित्र, गद्य काव्य, रपट, दैनंदिनी, भेंट वार्ता (साक्षात्कार), गद्य काव्य, पत्र साहित्य, पत्र लेखन, आलेख, रिपोर्ट, गद्य  गीत आदि उल्लेखनीय हैं किंतु इनमें लेखन काव्य की तुलना में बहुत कम है। इस परिस्थिति में 
संस्कारधानी की समर्थ साहित्यकार रानू रुही का आलेख संकल 'दृष्टिपात जबलपुर' का प्रकाशित होना महत्वपूर्ण है।

                    लेख से पूर्व ”आ” उपसर्ग जोड़ने से आलेख शब्द बनता है। आलेख निबंध लेखन का ही एक लघु रूप है। ‘आ’ उपसर्ग लेख के सम्यक और सर्वांग-सम्पूर्ण होने को व्यंजित करता है। आलेख वास्तव में लेख का ही प्रतिरूप होता है। यह आकार में लेख से बड़ा होता है।  इसे निबंध का एक रूप कहा जा सकता  है। लेख में सामान्यत: किसी एक विषय से संबंधित विचार होते हैं। आलेख में ‘आ’ उपसर्ग लगता है जो कि यह प्रकट करता है कि आलेख सम्यक् और संपूर्ण होना चाहिए। आलेख गद्य की वह विधा है जो किसी एक विषय पर सर्वांगपूर्ण और सम्यक् विचार प्रस्तुत करती है। आलेख लेखन अपने आप में विज्ञान और कला दोनों है। सामान्यत:, आलेख में किसी घटना अथवा किसी विषय (आध्यात्मिक, धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, वैधानिक, भौगोलिक आदि) पर संक्षिप्त किंतु पूर्ण जानकारी सारगर्भित शब्दावली के माध्यम से प्रस्तुत की जाती है। लेखक द्वारा चयनित विषय पर अपने स्वतंत्र-संक्षिप्त-प्रामाणिक भावों की सहज-सरल अभिव्यक्ति ही आलेख है। आलेख संबंधित विषय पर लेखक के मन के भावों को अभिव्यक्त कर पाठक/श्रोता तक पहुँचाता है। आलेख के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित विषयों का ज्ञान पाकर पाठकों का मानसिक विकास होता है। आलेख लेखन से जन जाग्रति और  जनमत निर्माण भी किया जा सकता है। 
                    
                    वर्तमान दूषित शिक्षा प्रणाली ने बालकों व किशोरों को पारिवारिक-सामाजिक पृष्ठ भूमि से दूर किया है। आलेख लेखन में प्रयुक्त सहज-सरल प्रसाद गुण व अमिधा शब्द शक्ति युक्त भाषा कॉनवेंट के छात्रों, ग्राम्य, नगरीय व महिला पाठकों के लिए सर्वथा उपयुक्त और ग्राह्य होती है। विषयों का वैविध्य और आम जन से संबद्धता आलेख विधाता को लोक प्रिय ही नहीं लोकोपयोगी भी बनाती है। आलेख विचार प्रधान गद्य है जिसमें कल्पनाशीलता का स्थान दाल में नमक की तरह ही होता है।  आलेख में भ्रामक अथवा विवादास्पद जानकारी नहीं होनी चाहिए।एक अच्छे आलेख का पाठक आलेख को पढ़कर न केवल जानकार बनता है अपितु उसमें विषय को और अधिक जानने की जिज्ञासा से अधिक जानने की दिशा में प्रवृत्त होता है। आलेख लेखन में भूमिका, विषय प्रतिपादन और निष्कर्ष अहम होता है। जन सामान्य के लिए आलेख की भाषा सहज, सरल, सुबोध, स्पष्ट तथा सारगर्भित होना चाहिए। किसी विषय के विद्वानों के लिए लिखे गए आलेख की भाषा प्रांजल, शुद्ध, विषय विशेष के उपयुक्त शब्दावली युक्त, अतीत की विरासत, वर्तमान की उन्नति तथा भावी प्रगति की प्रामाणिक जानकारी, तथ्यों-आँकड़ों आदि से सज्जित होना चाहिए। जो आलेख में शोध पर केंद्रित होते हैं उन्हें 'शोधालेख' तथा तकनीकी जानकारी से परिपूर्ण आलेख को 'तकनीकी आलेख' कहा जाता है।   

                    आलेख में व्यक्त किए गए विचार विचार कथात्मक न हो कर विवेचन व विश्लेषण युक्त होने चाहिए। आलेख से पाठक की जिज्ञासा शांत हो तथा कुछ और जानने की जिज्ञासा उत्पन्न होना चाहिए। आलेख ज्वलंत मुद्दों, लोकप्रिय विषयों, महत्वपूर्ण अनुष्ठानों-अनुसंधानों-प्रतिष्ठानों आदि  पर हो सकते हैं। आलेख में भावुकता पर यथार्थता को वरीयता डी जानी चाहिए। आलेख का आकार विषय वस्तु, लक्ष्य पाठक वर्ग तथा उपादेयता को देखते हुए होना चाहिए। आलेख लिखने से पहले विषय का गहन अध्ययन कार उस पर मौलिक मन-चिंतन किया जाना चाहिए। आलेख का कथ्य अनुमान नहीं, तथ्य पर  आधृत होता है। आलेख के आखिरी में निष्कर्ष अनिवार्य होता है।

                    उक्त पृष्ठ भूमि में 'दृष्टिपात जबलपुर' का प्रकाशन महत्वपूर्ण इसलिए है कि यह संस्कारधानी के साहित्यकारों की प्रकाशित कृतियों में अपनी मिसाल आप इसलिए है की इसका लक्ष्य पाठक वर्ग शालेय किशोर-तरुण तथा अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा पा रहे ऐसे छात्र हैं जिन्हें हिंदी कठिन लगती है, जो अंग्रेजी को विकास के लिए आवश्यक मानते हैं तथा जिन्हें हिंदी से पिछड़े होने की प्रतीति होती है। स्वाभाविक है कि इस वर्ग के लिए आलेखों की भाषा सहज-सरल-सुबोध हो। किसी विषय को सरलता से व्यक्त करना ही सबसे अधिक कठिन होता है। 'दृष्टिपात जबलपुर की लेखिका रानू 'रुही' समाचार पत्र में समाचार लेखिका रही हैं। उन्हें जन सामान्य के लिए कठिन विषयों को सरल कर प्रस्तुत करने में महारत हासिल है। रानू स्वयं शोध कर चुकी हैं, इसलिए उन्हें विषय वस्तु को क्रमबद्ध प्रस्तुत कार निष्कर्ष की ओर ले जाने का अभ्यास है। रानू अध्यापन से भी जुड़ी हैं, इस नाते वे किशोर विद्यार्थियों की मानसिकता तथा कठिनाइयों से न केवल अवगत हैं, अपितु किसी विषय को रुचिकर बनाकर  प्रस्तुत करने में भी समर्थ हैं। यह कार्य किसी बच्चे को शक्कर में लपेटकर कुनैन की कड़वी गोली खिलाने की तरह है। 'दृष्टिपात जबलपुर' का आकलन करते समय यह ध्यान रख जाना आवश्यक है कि इसका लक्ष्य शालेय किशोरों को उनके परिवेश, पर्यावरण, विगत और वर्तमान से अवगत कराकर भविष्य के प्रति संवेदनशील बनाना है। लेखिका अभीष्ट की प्राप्ति में सफल है।  

                    'दृष्टिपात जबलपुर' में ३३ आलेख संकलित हैं। पुस्तक के शीर्षक से स्पष्ट है कि सभी लेख जबलपुर से संबंधित हैं। इनके विषय सनातन सलिला नर्मदा, पहला हिंदी गजेटियर, पौराणिक तीर्थ तथा भू वैज्ञानिकों के लिए महत्वपूर्ण स्थल लम्हेटा घाट, कलचुरी कालीन नर्मदा प्रतिमा, चौंसठ योगिनी मंदिर, प्रभु पार्श्वनाथ की पुरातन प्रतिमा, विवेचना नाट्य मण्डल, संकट मोचन हनुमान मंदिर ग्वारीघाट, सर्वाधिक खंड काव्यकार मनोज जी, तांत्रिक सिद्ध स्थल बाजना मठ, पहले कुलपति पद्मभूषण कुंजीलाल दुबे, दुर्दान्त पिंडारी, गोंड़ रानी दुर्गावती, भारत में रेडियो, गोंड़ राजा संग्राम शाह, मध्य प्रदेश विद्युत मण्डल, आचार्य रजनीश, पहला चर्च, गाँधी जी के प्रवास, डाक विभाग, पहला अशासकीय विद्यालय, सर्वाधिक पुराना बाजार, रानी दुर्गावती संग्रहालय, शहर के ब्यूटी पार्लर, पहला महाविद्यालय, पहला विश्व विद्यालय,  पहला समाचार पत्र, पहला ब्रास बैंड दल, पहला कवि, शहीद स्मारक, सूर्य मंदिर, पहला ऑर्केस्ट्रा, तथा रानीताल हैं। संतोष का विषय यह है कि ये आलेख किशोरों के पाठ्य क्रम का हिस्सा न होते हुए भी उनके बौद्धिक विकास, पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनाने और परिवेश को जानने की उत्सुकता जगाने के लिए उपयोगी हैं।  

                     'दृष्टिपात जबलपुर' के लक्ष्य पाठक वर्ग को देखते हुए विषय-मंथन का विस्तार और विवेचन सीमित होना स्वाभाविक है। विद्वानों को यह प्रतीति हो सकती है की लेखों में पिष्ट पेषण है किंतु जिनके लिए यह कृति लिखी गए है, उन छात्रों के ज्ञान कोश को समृद्ध करने में इस पुस्तक की उपादेयता असंदिग्ध है। सामान्यत: किशोर वर्ग पाठ्य पुस्तकों के सीमित विषयों के अतिरिक्त केवल मनरंजन परक साहित्य के संपर्क में आते हैं किंतु यह कृति किशोरों को अतीत से लेकर वर्तमान तक की जानकारी देती और भविष्य के प्रति संवेदनशील बनाती है। पुटक की भाषा जबलपुर के आम लोगों द्वारा बोले जाने वाली आधुनिक हिंदी है। लेखिका ने देशज बुंदेली, शुद्ध संस्कृत, अदबी उर्दू मिश्रित और दूषित हिंगलिश से परहेज कर पाठक वर्ग के लिए सर्वथा उपयुक्त आधुनिक हिंदी को अभिव्यक्ति का माध्यम उचित ही बनाया है। इन आलेखों को पढ़ते समय धयं रखा जाना चाहिए कि ये आलेख आरंभिक हैं अंतिम नहीं। 

                    हिंदी में आलेख लेखन कला पर पुस्तकों का अभाव है तथापि सुधीर निगम कृत  लेख-आलेख था नंद किशोर 'नवल' लिखित लेख-आलेख, रंजीत देसाई- आलेख आदि इस अभाव की पूर्ति की दिशा में उल्लेखनीय हैं। अंग्रेजी में स्टीवन पिनके- द सेंस ऑफ स्टाइल, जेफ गोइन्स- यू आर अ राइटर, स्टीफन किंग- ऑन राइटिंग आदि कई पुस्तकें लेखन संबंधी मार्गदर्शन हेतु लिखी गई हैं।       

                     हिंदी में लुप्त प्राय होती लेखन-विधाओं में सभी आयुवर्गों,  सामाजिक परिवेशों और बौद्धिक स्तरों के पाठकों के लिए श्रेष्ठ साहित्य रचना इस काल की आवश्यकता है, यह कृति इस दिशा में एक उपयुक्त कदम है। ऐसी कृतियों की मीमांसा करते समय उदार दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए और छिद्रान्वेषण कार अपनी विद्वता प्रदर्शित करने से दूर रहा जाना चाहिए ताकि नई कलमें निरंतर फलती-फूलती रहें। 'दृष्टिपात जबलपुर' के लेखन-प्रकाशन हेतु प्रिय रानू राठौड़ 'रुही' को किशोरों के बौद्धिक विकास और सुरुचि सम्पन्नता के प्रति संवेदनशीलता हेतु बधाई दी ही जाना चाहिए।  

संदर्भ -
१. बी.एल. शर्मा- हिन्दी शिक्षण  
२. डाॅ. पाण्डेय- हिन्दी शिक्षण
३. डाॅ. एस.के. त्यागी - हिन्दी भाषा शिक्षण 
४. आलोचना शास्त्र -पंत 
५. हिंदी साहित्य का इतिहास - आचार्य रामचन्द्र शुक्ल