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सोमवार, 19 फ़रवरी 2024

बसंत,दोहा,पिंकाट,ककुभ,भजन,१९ फरवरी,सॉनेट,छंद,मधुमास, शिव,गीतिका,

सलिल सृजन १९ फरवरी
*
मधुमास पर दोहे
*
पुरुषोत्तम श्री राम का, दर्शन-पल ''मधुमास''।
रघुकुल भूषण छवि निरख, मुदित सुरेश सहास।। 
*
झूम रहे ऋतुराज-रति, पूर्ण हुई है आस। 
देह विदेह हुई पुलक, अंतर्मन 'मधुमास'।।  
*
मन जिससे जाता उचट, वह लगता खग्रास। 
जिससे मन मिलता सहज, मिल लगता 'मधुमास'।। 
*
सत्ता प्रेयसि से मिले, नेता करे विलास। 
निकट चुनाव दिखे लगे, बीत गया 'मधुमास'।। 
पतझड़ ग्रहणी में दिखे, अन्यों में 'मधुमास'।
समझो निकट विनाश है, सुधरो मिले न त्रास।। 
*
श्वास-श्वास 'मधुमास' हो, जब पूरी हो आस। 
मिलें प्रिया-प्रियतम लपक, भुला विरह-संत्रास।। 
*
निधन बाद प्रिय से मिलन, कब होगा हे राम। 
विरह व्यथा 'मधुमास' बिन, असहनीय सुख-धाम।। 
१९.२.२०२४ 
***
सॉनेट
वह
हमने उसे नहीं पहचाना।
गिला न शिकवा करता है वह।
रूप; रंग; आकार न जाना।।
करे परवरिश हम सबकी वह।।
लिया हमेशा सब कुछ उससे।
दिया न कुछ भी वापिस उसको।
उसकी करें शिकायत किससे?
उसका प्रतिनिधि मानें किसको?
कब भेजे?; कब हमें बुला ले?
क्यों भेजा है हमें जगत में?
कारण कुछ तो कभी बता दे।
मिले न क्यों वह कभी प्रगट में?
करे किसी से नहीं अदावत।
नहीं किसी से करे सखावत।।
•••
सॉनेट
अधिनायक
पत्थर दिल होता अधिनायक।
आत्ममुग्ध, चमचा-शरणागत।
देख न पाता विपदा आगत।।
निज मुख निज महिमा अभिभाषक।।
जन की बात न सुनता, बहरा।
मन की बात कहे मनमानी।
भूला मिट जाता अभिमानी।।
जनमत विस्मृत किया ककहरा।।
तंत्र न जन का, दल का प्यारा।
समझ रहा है मैदां मारा।
देख न पाता, लोक न हारा।।
हो उदार, जनमत पहचाने।
सब हों साथ, नहीं क्यों ठाने।
दल न, देश के पढ़े तराने।।
१९-२-२०२२
•••
'शाम हँसी पुरवाई में' गजल संग्रह बसंत शर्मा विमोचन पर मुक्तिका
*
शाम हँसी पुरवाई में।
ऋतु 'बसंत' मनभाई में।।
झूम उठा 'विश्वास' 'सलीम'।
'विकल' 'नयन' अरुणाई में।।
'दर्शन' कर 'संतोष' 'अमित'।
'सलिल' 'राज' तरुणाई में।।
छंद-छंद 'अमरेंद्र' सरस्।
'प्यासा' तृषा बुझाई में।।
महक 'मंजरी' 'संध्या' संग।
रस 'मीना' प्रभु भाई में।।
मति 'मिथलेश' 'विनीता' हो।
गीत-ग़ज़ल मुस्काई में।।
डगर-डगर 'मक़बूल' ग़ज़ल।
अदब 'अदीब' सुहाई में।
'जयप्रकाश' की कहे कलम।
'किसलय' की पहुनाई में।।
'प्रतुल' प्रवीण' 'तमन्ना' है।
'हरिहर' सुधि सरसाई में।।
'पुरुषोत्तम' 'कुलदीप' 'मनोज'।
हो 'दुर्गेश' बधाई में।।
*
शिव भजन
भज मन महाकाल प्रभु निशदिन।।
*
मनोकामना पूर्ण करें हर, हर भव बाधा सारी।
सच्चे मन से भज महेश को, विपद हरें त्रिपुरारी।।
कल पर टाल न मूरख, कर ले
श्वाश श्वास प्रभु सुमिरन।
भज मन महाकाल प्रभु निशदिन।।
*
महाप्राण हैं महाकाल खुद पिएँ हलाहल हँसकर।
शंका हरते भोले शंकर, बंधन काटें फँसकर।।
कोशिश डमरू बजा करो रे शिव शंभू सँग नर्तन।
भज मन महाकाल प्रभु निशदिन।
*
मोह सर्प से कंठ सजा, पर मन वैराग बसाएँ।
'सलिल'-धार जग प्यास बुझाने, जग की सतत बहाएँ।।
हर हर महादेव जयकारा लगा नित्य ही अनगिन।
भज मन महाकाल प्रभु निशदिन।।
१९-२-२०२१
***
दोहा सलिला
रूप नाम लीला सुनें, पढ़ें गुनें कह नित्य।
मन को शिव में लगाकर, करिए मनन अनित्य।।
*
महादेव शिव शंभु के, नामों का कर जाप।
आप कीर्तन कीजिए, सहज मिटेंगे पाप।।
*
सुनें ईश महिमा सु-जन, हर दिन पाएं पुण्य।
श्रवण सुपावन करे मन, काम न आते पण्य।।
*
पालन संयम-नियम का, तप ईश्वर का ध्यान।
करते हैं एकांत में, निरभिमान मतिमान।।
*
निष्फल निष्कल लिंग हर, जगत पूज्य संप्राण।
निराकार साकार हो, करें कष्ट से त्राण।।
१९-२-२०१८
***
दोहा सलिला
*
मधुशाला है यह जगत, मधुबाला है श्वास
वैलेंटाइन साधना, जीवन है मधुमास
*
धूप सुयश मिथलेश का, धूप सिया का रूप
याचक रघुवर दान पा, हर्षित हो हैं भूप
१९-२-२०१७
***

नवगीत
*
नयनों ने नैनों में
दुनिया को देखा
*
कितनी गहराई
कैसे बतलायें?
कितनी अरुणाई
कैसे समझायें?
सपने ही सपने
देखें-दिखलायें
मन-महुआ महकें तो
अमुआ गदरायें
केशों में शोभित
नित सिंदूरी रेखा
नयनों ने नैनों में
दुनिया को देखा
*
सावन में फागुन या
फागुन में सावन
नयनों में सपने ही
सपने मनभावन
मन लंका में बैठा
संदेही रावन
आओ विश्वास राम
वरो सिया पावन
कर न सके धोबी अब
मुझ-तुम का लेखा
नयनों ने नैनों में
दुनिया को देखा
*
रसानंद दे छंद नर्मदा १७ : गीतिका
दोहा, आल्हा, सार, ताटंक,रूपमाला (मदन), चौपाई तथा उल्लाला छंदों से साक्षात के पश्चात् अब मिलिएगीतिका से.
लक्षण : गीतिका मात्रिक सम छंद है जिसमें २६ मात्राएँ होती हैं। १४ और १२ पर यति तथा अंत में लघु -गुरु आवश्यक है। इस छंद की तीसरी, दसवीं, सत्रहवीं और चौबीसवीं अथवा दोनों चरणों के तीसरी-दसवीं मात्राएँ लघु हों तथा अंत में रगण हो तो छंद निर्दोष व मधुर होता है।
अपवाद- इसमें कभी-कभी यति शब्द की पूर्णता के आधार पर १२-१४ में भी आ पडती है। यथा-
राम ही की भक्ति में, अपनी भलाई जानिए। - जगन्नाथ प्रसाद 'भानु', छंद प्रभाकर
लक्षण छंद:
सूर्य-धरती के मिलन की, छवि मनोहर देखिए।
गीतिका में नर्मदा सी, 'सलिल'-ध्वनि अवरेखिए।।
तीसरा-दसवाँ सदा लघु, हर चरण में वर्ण हो।
रगण रखिये अंत में सुन, झूमिये ऋतु-पर्ण हो।।
*
तीन-दो-दो बार तीनहिं, तीन-दो धुज अंत हो।
रत्न वा रवि मत्त पर यति, चंचरी लक्षण कहो।। -नारायण दास, हिंदी छन्दोलक्षण
टीप- छंद प्रभाकर में भानु जी ने छब्बीस मात्रिक वर्णवृत्त चंचरी (चर्चरी) में 'र स ज ज भ र' वर्ण (राजभा सलगा जभान जभान भानस राजभा) बताये हैं। इसमें कुल मात्राएँ २६ तथा तीसरी, दसवीं, सत्रहवीं और चौबीसवीं अथवा दोनों चरणों के तीसरी-दसवीं मात्राएँ लघु हैं किंतु दूसरे जगण को तोड़े बिना चौदह मात्रा पर यति नहीं आती। डॉ. पुत्तूलाल ने दोनों छंदों को अभिन्न बताया है। भिखारीदास और केशवदास ने २८ मात्रिक हरिगीतिका को ही गीतिका तथा २६ मात्रिक वर्णवृत्त को चंचरी बताया है। डॉ. पुत्तूलाल के अनुसार के द्विकल को कम कर यह छंद बनता है। सम्भवत: इसी कारण इसे हरिगीतिका के आरम्भ के दो अक्षर हटा कर 'गीतिका' नाम दिया गया। इसकी मात्रा बाँट (३+२+२) x ३+ (३+२) बनती है।
मात्रा बाँट:
ऽ । ऽ । । ऽ । ऽ ऽ ऽ । ऽ ऽ ऽ । ऽ
हे दयामय दीनबन्धो, प्रार्थना मे श्रूयतां।
यच्च दुरितं दीनबन्धो, पूर्णतो व्यपनीयताम्।।
चञ्चलानि मम चेन्द्रियाणि, मानसं मे पूयतां।
शरणं याचेऽहं सदा हि, सेवकोऽस्म्यनुगृह्यताम्।।
उदाहरण:
०१. रत्न रवि कल धारि कै लग, अंत रचिए गीतिका।
क्यों बिसारे श्याम सुंदर, यह धरी अनरीतिका।।
पायके नर जन्म प्यारे, कृष्ण के गुण गाइये।
पाद पंकज हीय में धर, जन्म को फल पाइये।। - जगन्नाथ प्रसाद 'भानु', छंद प्रभाकर
०२. मातृ भू सी मातृ भू है , अन्य से तुलना नहीं।
०३. उस रुदंती विरहिणी के, रुदन रस के लेप से।
और पाकर ताप उसके, प्रिय विरह-विक्षेप से।।
वर्ण-वर्ण सदैव जिनके, हों विभूषण कर्ण के।
क्यों न बनते कवि जनों के, ताम्र पत्र सुवर्ण के।। - मैथिलीशरण गुप्त, साकेत
३, ७, १० वीं मात्रा पूर्ववर्ती शब्द के साथ जुड़कर गुरु हो किन्तु लय-भंग न हो तो मान्य की जा सकती है-
०४. कहीं औगुन किया तो पुनि वृथा ही पछताइये - जगन्नाथ प्रसाद 'भानु', छंद प्रभाकर
०५. हे प्रभो! आनंददाता, ज्ञान हमको दीजिए
शीघ्र सारे दुर्गुणों से, दूर हमको कीजिए
लीजिए हमको शरण में, हम सदाचारी बनें
ब्रम्हचारी धर्मरक्षक, वीर व्रतधरी बनें -रामनरेश त्रिपाठी
०६. लोक-राशि गति-यति भू-नभ, साथ-साथ ही रहते
लघु-गुरु गहकर हाथ-अंत, गीतिका छंद कहते
०७. चौपालों में सूनापन, खेत-मेड में झगड़े
उनकी जय-जय होती जो, धन-बल में हैं तगड़े
खोट न अपनी देखें, बतला थका आइना
कोई फर्क नहीं पड़ता, अगड़े हों या पिछड़े
०८. आइए, फरमाइए भी, ह्रदय में जो बात है
क्या पता कल जीत किसकी, और किसकी मात है
झेलिये धीरज धरे रह, मौन जो हालात है
एक सा रहता समय कब?, रात लाती प्रात है
०९. सियासत ने कर दिया है , विरासत से दूर क्यों?
हिमाकत ने कर दिया है , अजाने मजबूर यों
विपक्षी परदेशियों से , अधिक लगते दूर हैं
दलों की दलदल न दल दे, आँख रहते सूर हैं
१९.२.२०१६
***

अंग्रेज दोहाकार फ्रेडरिक पिंकाट
हिंदी छंदों को कठिन और अप्रासंगिक कहनेवाले यह जानकर चकित होंगे कि स्वतंत्रता के पूर्व से कई विदेशी हिंदी भाषा और छंदों पर कार्य करते रहे हैं. एक अंग्रेज के लिये हिन्दी सीखना और उसमें छंद रचना सहज नहीं. श्री फ्रेडरिक पिंकाट ने द्वारा अपने मित्र भारतेंदु हरिश्चंद्र पर रचित निम्न सोरठा एवं दोहा यह भी तो कहता है कि जब एक विदेशी और हिन्दी न जाननेवाला इन छंदों को अपना सकता है तो हम भारतीय इन्हें सिद्ध क्यों नहीं कर सकते? सवाल इच्छाशक्ति का है, छंद तो सभी को गले लगाने के लिए उत्सुक है.
बैस वंस अवतंस, श्री बाबू हरिचंद जू.
छीर-नीर कलहंस, टुक उत्तर लिख दे मोहि.
शब्दार्थ: बैस=वैश्य, वंस= वंश, अवतंस=अवतंश, जू=जी, छीर=क्षीर=दूध, नीर=पानी, कलहंस=राजहंस, तुक=तनिक, मोहि=मुझे.
भावार्थ: हे वैश्य कुल में अवतरित बाबू हरिश्चंद्र जी! आप राजहंस की तरह दूध-पानी के मिश्रण में से दूध को अलग कर पीने में समर्थ हैं. मुझे उत्तर देने की कृपा कीजिये.
श्रीयुत सकल कविंद, कुलनुत बाबू हरिचंद.
भारत हृदय सतार नभ, उदय रहो जनु चंद.
भावार्थ: हे सभी कवियों में सर्वाधिक श्री संपन्न, कवियों के कुल भूषण! आप भारत के हृदयरूपी आकाश में चंद्रमा की तरह उदित हुए हैं.
फ्रेडरिक पिन्काट (१८३६ - ७ फ़रवरी १८९६) इंग्लैण्ड के निवासी एवं किन्तु हिन्दी के परम् हितैषी थे। स्वयं हिन्दी में लेख लिखने तथा हिन्दी पत्रिकाएँ सम्पादित करने के अलावा उन्होने तत्कालीन् हिन्दी लेखकों को भी प्रोत्साहित किया। इंग्लैण्ड में बैठे-बैठे ही उन्होने हिन्दी पर अच्छा अधिकार प्राप्त कर लिया था। भारतीय सिविल सेवा में हिन्दी के प्रतिष्ठापन का श्रेय भी इनको ही है। उन्होंने प्रेस के कामों का बहुत अच्छा अनुभव प्राप्त किया और अंत में लंदन की प्रसिद्ध ऐलन ऐंड कंपनी के विशाल छापेखाने के मैनेजर हुए। वहीं वे अपने जीवन के अंतिम दिनों के कुछ पहले तक शांतिपूर्वक रहकर भारतीय साहित्य और भारतीय जनहित के लिए बराबर उद्योग करते रहे।

संस्कृत की चर्चा पिंकाट साहब लड़कपन से ही सुनते आते थे, इससे उन्होंने बहुत परिश्रम के साथ उसका अध्ययन किया। इसके उपरांत उन्होंने हिन्दी और उर्दू का अभ्यास किया। इंगलैंड में बैठे ही बैठे उन्होंने इन दोनों भाषाओं पर ऐसा अधिकार प्राप्त कर लिया कि इनमें लेख और पुस्तकें लिखने और अपने प्रेस में छपाने लगे। यद्यपि उन्होंने उर्दू का भी अच्छा अभ्यास किया था, पर उन्हें इस बात का अच्छी तरह निश्चय हो गया था कि यहाँ की परंपरागत प्रकृत भाषा हिन्दी है, अत: जीवन भर ये उसी की सेवा और हितसाधना में तत्पर रहे। उनके हिन्दी लेखों, कविताओं और पुस्तकों की चर्चा आगे चलकर भारतेंदुकाल के भीतर की जाएगी।

संवत् १९४७ में उन्होंने उपर्युक्त ऐलन कंपनी से संबंध तोड़ा और 'गिलवर्ट ऐंड रिविंगटन' नामक विख्यात व्यवसाय कार्यालय में पूर्वीय मंत्री नियुक्त हुए। उक्त कंपनी की ओर से एक व्यापार पत्र 'आईन सौदागरी' उर्दू में निकलता था जिसका संपादन पिंकाट साहब करते थे। उन्होंने उसमें कुछ पृष्ठ हिन्दी के लिए भी रखे। कहने की आवश्यकता नहीं कि हिन्दी के लेख वे ही लिखते थे। लेखों के अतिरिक्त हिंदुस्तान में प्रकाशित होनेवाले हिन्दी समाचार पत्रों (जैसे हिंदोस्तान, आर्यदर्पण, भारतमित्र) से उद्धरण भी उस पत्र के हिन्दी विभाग में रहते थे।

भारत का हित वे सच्चे हृदय से चाहते थे। राजा लक्ष्मण सिंह, भारतेंदु हरिश्चंद्र, प्रतापनारायण मिश्र, कार्तिकप्रसाद खत्री इत्यादि हिन्दी लेखकों से उनका बराबर हिन्दी में पत्रव्यवहार रहता था। उस समय के प्रत्येक हिन्दी लेखक के घर में पिंकाट साहब के दो-चार पत्र मिलेंगे। हिन्दी के लेखकों और ग्रंथकारों का परिचय इंगलैंडवालों को वहाँ के पत्रों में लेख लिखकर वे बराबर दिया करते थे। संवत् १९५२ में (नवंबर सन् १८९५) में वे रीआ घास (जिसके रेशों से अच्छे कपड़े बनते थे) की खेती का प्रचार करने हिंदुस्तान में आए, पर साल भर से कुछ ऊपर ही यहाँ रह पाए थे कि लखनऊ में उनका देहांत हो गया। उनका शरीर भारत की मिट्टी में ही मिला।

संवत् १९१९ में जब राजा लक्ष्मणसिंह ने 'शकुंतला नाटक' लिखा तब उसकी भाषा देख वे बहुत ही प्रसन्न हुए और उसका एक बहुत सुंदर परिचय उन्होंने लिखा। बात यह थी कि यहाँ के निवासियों पर विदेशी प्रकृति और रूप-रंग की भाषा का लादा जाना वे बहुत अनुचित समझते थे। अपना यह विचार उन्होंने अपने उस अंग्रेजी लेख में स्पष्ट रूप से व्यक्त किया है जो उन्होंने बाबू अयोध्या प्रसाद खत्री के 'खड़ी बोली का पद्य' की भूमिका के रूप में लिखा था। देखिए, उसमें वे क्या कहते हैं,"फारसी मिश्रित हिन्दी (अर्थात् उर्दू या हिंदुस्तानी) के अदालती भाषा बनाए जाने के कारण उसकी बड़ी उन्नति हुई। इससे साहित्य की एक नई भाषा ही खड़ी हो गई। पश्चिमोत्तार प्रदेश के निवासी, जिनकी यह भाषा कही जाती है, इसे एक विदेशी भाषा की तरह स्कूलों में सीखने के लिए विवश किये जाते हैं।"
***
ककुभ / कुकुभ
*
(छंद विधान: १६ - १४, पदांत में २ गुरु)
*
यति रख सोलह-चौदह पर कवि, दो गुरु आखिर में भाया
ककुभ छंद मात्रात्मक द्विपदिक, नाम छंद ने शुभ पाया
*
देश-भक्ति की दिव्य विरासत, भूले मौज करें नेता
बीच धार मल्लाह छेदकर, नौका खुदी डुबा देता
*
आशिको-माशूक के किस्से, सुन-सुनाते उमर बीती.
श्वास मटकी गह नहीं पायी, गिरी चटकी सिसक रीती.
*
जीवन पथ पर चलते जाना, तब ही मंज़िल मिल पाये
फूलों जैसे खिलते जाना, तब ही तितली मँडराये
हो संजीव सलिल निर्मल बह, जग की तृष्णा हर पाये
शत-शत दीप जलें जब मिलकर, तब दीवाली मन पाये
*
(ककुभ = वीणा का मुड़ा हुआ भाग, अर्जुन का वृक्ष)
***
सामयिक दोहे
*
जो रणछोड़ हुए उन्हें, दिया न हमने त्याग
किया श्रेष्ठता से सदा, युग-युग तक अनुराग।
*
मैडम को अवसर मिला, नहीं गयीं क्या भाग?
त्यागा था पद अटल ने, किया नहीं अनुराग।
*
शास्त्री जी ने भी किया, पद से तनिक न मोह
लक्ष्य हेतु पद छोड़ना, नहिं अपराध न द्रोह।
*
केर-बेर ने मिलाये, स्वार्थ हेतु जब हाथ
छोड़ा जिसने पद विहँस, क्यों न उठाये माथ?
*
करते हैं बदलाव की, जब-जब भी हम बात
पूर्व मानकों से करें, मूल्यांकन क्यों तात?
*
विष को विष ही मारता, शूल निकाले शूल
समय न वह जब शूल ले, आप दीजिये फूल
*
सहन असहमति को नहीं, करते जब हम-आप
तज सहिष्णुता को 'सलिल', करें व्यर्थ संताप
१९-२-२०१४
***

रविवार, 18 फ़रवरी 2024

१८ फरवरी,दोहा ग़ज़ल,बसंत,चंडिका छंद,झाड़ू,प्रेमगीत,संगीत चेतना,नवगीत,तुम,पर्वत अलंकार,सॉनेट,धतूरा,कुंडलिया

सलिल सृजन १८ फरवरी
*
दोहा
सूरज पुजता जगत में, तम हर जग उजियार।
काम करे निष्काम रह, ले-दे नहीं उधार।।
सोरठा
करे न मन की बात, कर्मव्रती रवि शत नमन।
समभावी विख्यात, स्वार्थ न किंचित साधता।।
रोला
भास्कर अपने आप, करता अग्निस्नान क्यों?
आत्मदाह का दोष, क्यों उस पर लगता नहीं?
साधे स्वार्थ न क्रोध, रश्मिरथी जग-हित वरे।
काम-क्रोध कर क्षार, सकल जगत उजियारता।।
नायक छंद 
उगता रह।
ढलता रह।
चमको रवि
पुजते रह।
•••
सॉनेट
धतूरा
*
सदाशिव को है 'धतूरा' प्रिय।
'कनक' कहते हैं चरक इसको।
अमिय चाहक को हुआ अप्रिय।।
'उन्मत्त' सुश्रुत कहें; मत फेंको।।
.
तेल में रस मिला मलिए आप।
शांत हो गठिया जनित जो दर्द।
कुष्ठ का भी हर सके यह शाप।।
मिटाता है चर्म रोग सहर्ष।।
.
'स्ट्रामोनिअम' खाइए मत आप।
सकारात्मक ऊर्जा धन हेतु।
चढ़ा शिव को, मंत्र का कर जाप।
पार भव जाने बनाएँ सेतु।।
.
'धुस्तूर' 'धत्तूरक' उगाता बाल।
फूल, पत्ते, बीज,जड़ अव्याल।।
१७-२-२०२३
...
सॉनेट
शुभेच्छा
नहीं अन्य की, निज त्रुटि लेखें।
दोष मुक्त हो सकें ईश! हम।
सद्गुण औरों से नित सीखें।।
काम करें निष्काम सदा हम।।
नहीं सफलता पा खुश ज्यादा।
नहीं विफल हो वरें हताशा।
फिर फिर कोशिश खुद से वादा।।
पल पल मन में पले नवाशा।।
श्रम सीकर से नित्य नहाएँ।
बाधा से लड़ कदम बढ़ाएँ।
कर संतोष सदा सुख पाएँ।।
प्रभु के प्रति आभार जताएँ।।
आत्मदीप जल सब तम हर ले।
जग जग में उजियारा कर दे।।
१८-२-२०२२
•••
कार्यशाला
कुंडलिया
*
पुष्पाता परिमल लुटा, सुमन सु मन बेनाम।
प्रभु पग पर चढ़ धन्य हो, कण्ठ वरे निष्काम।।
चढ़े सुंदरी शीश पर, कहे न कर अभिमान।
हृदय भंग मत कर प्रिये!, ले-दे दिल का दान।।
नयन नयन से लड़े, झुके मिल मुस्काता।
प्रणयी पल पल लुटा, प्रणय परिमल पुष्पाता।।
१८-२-२०२०
***
नवगीत:
अंदाज अपना-अपना
आओ! तोड़ दें नपना
*
चोर लूट खाएंगे
देश की तिजोरी पर
पहला ऐसा देंगे
अच्छे दिन आएंगे
.
भूखे मर जाएंगे
अन्नदाता किसान
आवारा फिरें युवा
रोजी ना पाएंगे
तोड़ रहे हर सपना
अंदाज अपना-अपना
*
निज यश खुद गाएंगे
हमीं विश्व के नेता
वायदों को जुमला कह
ठेंगा दिखलाएंगे
.
खूब जुल्म ढाएंगे
सांस, आस, कविता पर
आय घटा, टैक्स बढ़ा
बांसुरी बजाएंगे
कवि! चुप माला जपना
अंदाज अपना-अपना
***
१८.२.२०१८
***
चित्रालंकार:पर्वत
गाएंगे
अनवरत
प्रणय गीत
सुर साधकर।
जी पाएंगे दूर हो
प्रिये! तुझे यादकर।
१८-२-२०१८
***
नवगीत-
पड़ा मावठा
*
पड़ा मावठा
घिरा कोहरा
जला अँगीठी
आगी ताप
*
सिकुड़-घुसड़कर बैठ बावले
थर-थर मत कँप, गरम चाय ले
सुट्टा मार चिलम का जी भर
उठा टिमकिया, दे दे थाप
पड़ा मावठा
घिरा कोहरा
जला अँगीठी
आगी ताप
*
आल्हा-ऊदल बड़े लड़ैया
टेर जोर से,भगा लड़ैया
गारे राई,सुना सवैया
घाघ-भड्डरी
बन जा आप
पड़ा मावठा
घिरा कोहरा
जला अँगीठी
आगी ताप
*
कुछ अपनी, कुछ जग की कह ले
ढाई आखर चादर तह ले
सुख-दुःख, हँस-मसोस जी सह ले
चिंता-फिकिर
बना दे भाप
पड़ा मावठा
घिरा कोहरा
जला अँगीठी
आगी ताप
*
बाप न भैया, भला रुपैया
मेरा-तेरा करें न लगैया
सींग मारती मरखन गैया
उठ, नुक्कड़ का
रस्ता नाप
पड़ा मावठा
घिरा कोहरा
जला अँगीठी
आगी ताप
*
जाकी मोंड़ी, बाका मोंड़ा
नैन मटक्का थोडा-थोडा
हम-तुम ने नाहक सर फोड़ा
पर निंदा का
मर कर पाप
पड़ा मावठा
घिरा कोहरा
जला अँगीठी
आगी ताप
***
दोहा दुनिया
*
राजनीति है बेरहम, सगा न कोई गैर
कुर्सी जिसके हाथ में, मात्र उसी की खैर
*
कुर्सी पर काबिज़ हुए, चेन्नम्मा के खास
चारों खाने चित हुए, अम्मा जी के दास
*
दोहा देहरादून में, मिला मचाता धूम
जितने मतदाता बने, सब है अफलातून
*
वाह वाह क्या बात है?, केर-बेर का संग
खाट नहीं बाकी बची, हुई साइकिल तंग
*
आया भाषणवीर है, छाया भाषणवीर
किसी काम का है नहीं, छोड़े भाषण-तीर
*
मत मत का सौदा करो, मत हो मत नीलाम
कीमत मत की समझ लो, तभी बनेगा काम
*
एक मरा दूजा बना, तीजा था तैयार
जेल हुई चौथा बढ़ा, दो कुर्सी-गल हार
***
लघुकथा
सबक
*
'तुम कैसे वेलेंटाइन हो जो टॉफी ही नहीं लाये?'
''अरे उस दिन लाया तो था, अपने हाथों से खिलाई भी थी. भूल गयीं?''
'भूली तो नहीं पर मुझे बचपन में पढ़ा सबक आज भी याद है. तुमने कुछ पढ़ा-लिखा होता तो तुम्हें भी याद होता.'
''अच्छा, तो मैं अनपढ़ हूँ क्या?''
'मुझे क्या पता? कुछ पढ़ा होता तो सबक याद न होता?'
''कौन सा सबक?''
'वही मुँह पर माखन लगा होने के बाद भी मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो कहने वाला सूर का पद. जब मेरे आराध्य को रोज-रोज खाने के बाद भी माखन खाना याद नहीं रहा तो एक बार खाई टॉफी कैसे??? चलो माफ़ किया अब आगे से याद रखना सबक '
१८-२- २०१७
***
नवगीत:
तुमसे सीखा
*
जीवन को
जीवन सा जीना
तुमसे सीखा।
*
गिरता-उठता
पहले भी था
रोता-हँसता
पहले भी था
आँसू को
अमृत सा पीना
तुमसे सीखा।
*
खिलता-झरता
पहले भी था
रुकता-बढ़ता
पहले भी था
श्वासों में
आसों को जीना
तुमसे सीखा।
*
सोता-जगता
पहले भी था
उगता-ढलता
पहले भी था
घर ही
काशी और मदीना
तुमसे सीखा
*
थकता-थमता
पहले भी था
श्रोता-वक्ता
पहले भी था
देव
परिश्रम और पसीना
तुमसे सीखा
***
नवगीत:
ओ' मेरी तुम!
*
श्वास-आस में मुखरित
निर्मल नेह-नर्मदा
ओ मेरी तुम!
हो मेरी तुम!
*
प्रवहित-लहरित
घहरित-हहरित
बूँद-बूँद में मुखरित
चंचल-चपल शर्मदा
ओ' मेरी तुम!
हो मेरी तुम!
*
प्रमुदित-मुकुलित
हर्षित-कुसुमित
कुंद इंदु सम अर्चित
अर्पित अचल वर्मदा
ओ' मेरी तुम!
हो मेरी तुम!
*
कर्षित-वर्षित
चर्चित-तर्पित
शब्द-शब्द में छंदित
वन्दित विमल धर्मदा
ओ' मेरी तुम!
हो मेरी तुम!
१८-२-२०१६
***
प्रेम गीत में संगीत चेतना
*
साहित्य और संगीत की स्वतंत्र सत्ता और अस्तित्व असंदिग्ध है किन्तु दोनों के समन्वय और सम्मिलन से अलौकिक सौंदर्य सृष्टि-वृष्टि होती है जो मानव मन को सच्चिदानंद की अनुभूति और सत-शिव-सुन्दर की प्रतीति कराती है. साहित्य जिसमें सबका हित समाहित हो और संगीत जिसे अनेक कंठों द्वारा सम्मिलित-समन्वित गायन१।
वाराहोपनिषद में अनुसार संगीत 'सम्यक गीत' है. भागवत पुराण 'नृत्य तथा वाद्य यंत्रों के साथ प्रस्तुत गायन' को संगीत कहता है तथा संगीत का लक्ष्य 'आनंद प्रदान करना' मानता है, यही उद्देश्य साहित्य का भी होता है.
संगीत के लिये आवश्यक है गीत, गीत के लिये छंद. छंद के लिये शब्द समूह की आवृत्ति चाहिए जबकि संगीत में भी लयखंड की आवृत्ति चाहिए। वैदिक तालीय छंद साहित्य और संगीत के समन्वय का ही उदाहरण है.
अक्षर ब्रम्ह और शब्द ब्रम्ह से साक्षात् साहित्य करता है तो नाद ब्रम्ह और ताल ब्रम्ह से संगीत। ब्रम्ह की
मतंग के अनुसार सकल सृष्टि नादात्मक है. साहित्य के छंद और संगीत के राग दोनों ब्रम्ह के दो रूपों का प्रतिनिधित्व करते हैं.
साहित्य और संगीत का साथ चोली-दामन का सा है. 'वीणा-पुस्तक धारिणीं भगवतीं जाड्यंधकारापहाम्' - वीणापाणी शारदा के कर में पुस्तक भी है.
'संगीत साहित्य कलाविहीन: साक्षात पशु: पुच्छ विषाणहीनः' में भी साहित्य और संगीत के सह अस्तित्व को स्वीकार किया गया है.
स्वर के बिना शब्द और शब्द के बिना स्वर अपूर्ण है, दोनों का सम्मिलन ही उन्हें पूर्ण करता है.
ग्रीक चिंतक और गणितज्ञ पायथागोरस के अनुसार 'संगीत विश्व की अणु-रेणु में परिव्याप्त है. प्लेटो के अनुसार 'संगीत समस्त विज्ञानों का मूल है जिसका निर्माण ईश्वर द्वारा सृष्टि की विसंवादी प्रवृत्तियों के निराकरण हेतु किया गया है. हर्मीस के अनुसार 'प्राकृतिक रचनाक्रम का प्रतिफलन ही संगीत है.
नाट्य शास्त्र के जनक भरत मुनि के अनुसार 'संगीत की सार्थकता गीत की प्रधानता में है. गीत, वाद्य तथा नृत्य में गीत ही अग्रगामी है, शेष अनुगामी.
गीत के एक रूप प्रगीत (लिरिक) का नामकरण यूनानी वाद्य ल्यूरा के साथ गाये जाने के अधर पर ही हुआ है. हिंदी साहित्य की दृष्टि से गीत और प्रगीत का अंतर आकारगत व्यापकता तथा संक्षिप्तता ही है.
गीत शब्दप्रधान संगीत और संगीत नाद प्रधान गीत है. अरस्तू ने ध्वनि और लय को काव्य का संगीत कहा है. गीत में शब्द साधना (वर्ण अथवा मात्रा की गणना) होती है, संगीत में स्वर और ताल की साधना श्लाघ्य है. गीत को शब्द रूप में संगीत और संगीत को स्वर रूप में गीत कहा जा सकता है.
प्रेम के दो रूप संयोग तथा वियोग श्रृंगार तथा करुण रस के कारक हैं.
प्रेम गीत इन दोनों रूपों की प्रस्तुति करते हैं. आदिकवि वाल्मीकि के कंठ से नि:सृत प्रथम काव्य क्रौंचवध की प्रतिक्रिया था. पंत जी के नौसर: 'वियोगी होगा पहला कवि / आह से उपजा होगा गान'
लव-कुश द्वारा रामायण का सस्वर पाठ सम्भवतः गीति काव्य और संगीत की प्रथम सार्वजनिक समन्वित प्रस्तुति थी.
लालित्य सम्राट जयदेव, मैथिलकोकिल विद्यापति, वात्सल्य शिरोमणि सूरदास, चैतन्य महाप्रभु, प्रेमदीवानी मीरा आदि ने प्रेमगीत और संगीत को श्वास-श्वास जिया, भले ही उनका प्रेम सांसारिक न होकर दिव्य आध्यात्मिक रहा हो.
आधुनिक हिंदी साहित्य में भारतेन्दु हरिश्चंद्र, मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत, बालकृष्ण शर्मा 'नवीन', हरिवंश राय बच्चन आदि कवियों की दृष्टि और सृष्टि में सकल सृष्टि संगीतमय होने की अनुभूति और प्रतीति उनकी रचनाओं की भाषा में अन्तर्निहित संगीतात्मकता व्यक्त करती है.
निराला कहते हैं- "मैंने अपनी शब्दावली को छोड़कर अन्यत्र सभी जगह संगीत के छंदशास्त्र की अनुवर्तिता की है.… जो संगीत कोमल, मधुर और उच्च भाव तदनुकूल भाषा और प्रकाशन से व्यक्त होता है, उसके साफल्य की मैंने कोशिश की है.''
पंत के अनुसार- "संस्कृत का संगीत जिस तरह हिल्लोलाकार मालोपमा से प्रवाहित होता है, उस तरह हिंदी का नहीं। वह लोल लहरों का चंचल कलरव, बाल झंकारों का छेकानुप्रास है.''
लोक में आल्हा, रासो, रास, कबीर, राई आदि परम्पराएं गीत और संगीत को समन्वित कर आत्मसात करती रहीं और कालजयी हो गयीं।
गीत और संगीत में प्रेम सर्वदा अन्तर्निहित रहा. नव गति, नव लय, ताल छंद नव (निराला), विमल वाणी ने वीणा ली (प्रसाद), बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ (महादेवी), स्वर्ण भृंग तारावलि वेष्ठित / गुंजित पुंजित तरल रसाल (पंत) से प्रेरित समकालीन और पश्चात्वर्ती रचनाकारों की रचनाओं में यह सर्वत्र देखा जा सकता है.
छायावादोत्तर काल में गोपालदास सक्सेना 'नीरज', सोम ठाकुर, भारत भूषण, कुंवर बेचैन आदि के गीतों और मुक्तिकाओं (गज़लों) में प्रेम के दोनों रूपों की सरस सांगीतिक प्रस्तुति की परंपरा अब भी जीवित है.
१८-२-२०१४
***
द्विपदी
मिलाकर हाथ खासों ने, किया है आम को बाहर
नहीं लेना न देना ख़ास से, हम आम इन्सां हैं
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विमर्श
झाड़ू
* ज्योतिष-वास्तु एवं पौराणिक मान्यताओं के अनुसार झाड़ू सिर्फ हमारे घर की गंदगी को दूर नहीं करती है, बल्कि हमारे * जीवन में आ रही दरिद्रता को भी घर से बाहर निकालने का कार्य करती है। झाड़ू हमारे घर-परिवार में सुख-समृद्घि लाती है। जिस घर में झाड़ू का अपमान होता है, वहाँ धन हानि होती है।
* झाड़ू में महालक्ष्मी का वास माना गया है। झाड़ू घर से बाहर अथवा छत पर न रखें। इससे चोरी का भय होता है।
* झाड़ू छिपाकर ऐसी जगह पर रखना चाहिए जहाँ से झाड़ू हमें, घर या बाहर के सदस्यों को दिखाई नहीं दें।
* गौ माता या अन्य किसी भी जानवर को झाड़ू से मारकर कभी भी नहीं भगाना चाहिए।
* गलती से भी कभी झाड़ू को लात न मारें अन्यथा लक्ष्मी रुष्ट होकर घर से चली जाती है।
* घर-परिवार के सदस्य अगर खास कार्य से घर से जाएँ तो उनके जाने के उपरांत तुरंत झाड़ू नहीं लगाना चाहिए। यह अपशकुन है। ऐसा करने से बाहर गए व्यक्ति को अपने कार्य में असफलता का मुंह देखना पड़ सकता है।
* झाड़ू को आदर-सत्कार से रखें तो हमारे घर में कभी भी धन-संपन्नता की कमी महसूस नहीं होगी।
* झाड़ू के सम्मान का परिणाम आप दल को सत्ता के रूप में मिल रहा है।
***
छंद सलिला:
चंडिका छंद
*
दो पदी, चार चरणीय, १३ मात्राओं के मात्रिक चंडिका छंद में चरणान्त में गुरु-लघु-गुरु का विधान है.
लक्षण छंद:
१. तेरह मात्री चंडिका, वसु-गति सम जगवन्दिता
गुरु लघु गुरु चरणान्त हो, श्वास-श्वास हो नंदिता
२. वसु-गति आठ व पाँच हो, रगण चरण के अंत में
रखें चंडिका छंद में, ज्ञान रहे ज्यों संत में
उदाहरण:
१. त्रयोदशी! हर आपदा, देती राहत संपदा
श्रम करिये बिन धैर्य खो, नव आशा की फस्ल बो
२. जगवाणी है भारती, विश्व उतारे आरती
ज्ञान-दान जो भी करे, शारद भव से तारती
३. नेह नर्मदा में नहा, राग द्वेष दुःख दें बहा
विनत नमन कर मात को, तम तज वरो उजास को
४. तीन न तेरह में रहे, जो मिथ्या चुगली कहे
मौन भाव सुख-दुःख सहे, कमल पुष्प सम हँस बहे
१८-२-२०१४
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बासंती दोहा ग़ज़ल
*
स्वागत में ऋतुराज के, पुष्पित शत कचनार.
किंशुक कुसुम विहँस रहे, या दहके अंगार..
पर्ण-पर्ण पर छा गया, मादक रूप निखार.
पवन खो रहा होश निज, लख वनश्री श्रृंगार..
महुआ महका देखकर, चहका-बहका प्यार.
मधुशाला में बिन पिए, सिर पर नशा सवार..
नहीं निशाना चूकती, पंचशरों की मार.
पनघट-पनघट हो रहा, इंगित का व्यापार..
नैन मिले लड़ मिल झुके, करने को इंकार.
देख नैन में बिम्ब निज, कर बैठे इकरार..
मैं तुम यह वह ही नहीं, बौराया संसार.
फागुन में सब पर चढ़ा, मिलने गले खुमार..
ढोलक, टिमकी, मँजीरा, करें ठुमक इसरार.
फगुनौटी चिंता भुला. नाचो-गाओ यार..
घर-आँगन, तन धो लिया, अनुपम रूप निखार.
अपने मन का मैल भी, किंचित 'सलिल' बुहार..
बासंती दोहा ग़ज़ल, मन्मथ की मनुहार.
सीरत-सूरत रख 'सलिल', निर्मल सहज सँवार..
१८-२-२०११
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रोमांस, प्रेमगीत, चित्रपट,

हिंदी  चित्रपट पर प्रेम लीला 
*
हिंदी फ़िल्मों में रोमांस उतना ही पुराना है, उतना ही शाश्वत और चिरंतन है जितना कि हिंदी फ़िल्म है, जितना कि हमारा जीवन है, जितना कि यह ब्रह्मांड है। सोचिए कि बिना प्रेम के यह दुनिया होती तो भला कैसी होती? और फिर फ़िल्म और वह भी बिना प्रेम के? शायद सांस भी नहीं ले पाती। और मामला फिर वहीं आ कर सिमट जाता कि 'जब दिल ही टूट गया तो जी के क्या करेंगे?' और फिर जो 'दिल दा मामला' न होता तो 'तू गंगा की मौज मैं जमुना की धारा' भी भला कहां होती और भला कैसे बहती?
हम कैसे गाते भला 'बचपन की मुहब्बत को दिल से न जुदा करना! जब याद मेरी आए मिलने की दुआ करना!' कैसे सुनते 'जब तुम ही चले परदेस/छुड़ा कर देस/ तो प्रीतम प्यारा/ दुनिया में कौन हमारा!' कहां से सुनते 'ओ दुनिया के रखवाले/ सुन दर्द भरे मेरे नाले! मंदिर गिरिजा फिर बन जाता/ दिल को कौन संभाले?' दरअसल हिंदी फ़िल्मों में प्रेम का पाग इतना गहरा, इतना रसीला, इतना मधुर और इतना चटक है कि उसकी महक और उस की चहक झूले में पवन के आई बहार भी प्यार बन के ही छलकती है। इतना कि कोयल कूकने लगती है, मोर नाचने लगता है और मन मल्हार गाने ही लगता है। प्यार की चादर हिंदी फ़िल्मों में इतनी तरह से बीनी गई कि उसे किसी एक रंग, एक पन और एक गंध में नहीं बांध सकते हैं, न जान सकते हैं। परदे पर यों तो प्रेम के जाने कितने पाग हैं पर राजकपूर ने जो चाव, जो चमक और जो धमक प्रेम का उपस्थित किया है वह अविरल है। आवारा हालां कि एक सामाजिक फ़िल्म थी पर चाशनी उस में प्रेम की ही गाढ़ी थी। शायद तभी से प्यार को आवारगी का जामा भी पहना दिया गया। आवारा हूं गाने ने इस की चमक को और धमक दी। हर दिल जो प्यार करेगा वो गाना गाएगा, दीवाना सैकड़ों में पहचाना जाएगा जैसे गीतों के मार्फ़त राज कपूर ने इस आवारगी के जामे को और परवान चढ़ाया।
बाबी में तो वह साफ कहते ही हैं- देती है दिल दे, बदले में दिल ले। संगम, हिना, राम तेरी गंगा मैली हो गई जैसी उन की फ़िल्में प्रेम के ही बखान में पगी हैं तो प्रेम रोग, श्री चार सौ बीस, जिस देस में गंगा बहती है का कथ्य अलग-अलग है, बावजूद इस के बिना प्यार के यह फ़िल्में भी सांस नहीं ले पातीं। प्रेम रोग है तो विधवा जीवन की त्रासदी पर लेकिन उस की बुनियाद और अंजाम प्रेम की मज़बूत नींव पर टिकी है। इसी तरह जिस देस में गंगा बहती है है तो डाकू समस्या पर लेकिन इस की नाव भी प्रेम की नदी में ही तैरती मिलती है। मेरा नाम जोकर तो जैसे राजकपूर के प्रेम की व्याख्या ही में ही, उस की स्थापना में ही रची-बसी है। जाने कहां गए वो दिन कहते थे तेरी याद में नज़रों को हम बिछाएंगे जैसे गीत राजकपूर के प्यार की समुंदर जैसी गहराई का पता देते हैं। प्यार कि जिस विकलता और उस की विफलता को सूत्र दिया है मेरा नाम जोकर में वह अविरल ही नहीं अनूठा और अंतहीन है।
राजकपूर के बाद अगर किसी ने प्यार को उसी बेकली को विभोर हो कर बांचा है तो वह हैं यश चोपड़ा। उन की भी लगभग सभी फ़िल्में प्यार की ही पुलक में पगी पड़ी हैं। वह जैसे प्यार को ही स्वर देने के लिए फ़िल्में बनाते रहे हैं। कभी-कभी से लगायत वीर जारा तक वह एक से एक प्रेम कथाएं परोसते हैं। चांदनी, लम्हे, कुछ कुछ होता है, दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे भी उन की इसी राह का पता देती हैं। लम्हे तो अविस्मरणीय है। प्यार की बनी बनाई लीक से कोसों दूर ही नहीं, पलट कर भी है। गुरुदत्त की कागज के फूल और चौदवीं की रात या फिर साहब बीवी और गुलाम और प्यासा भी प्यार की अकथ कहानी ही कहती हैं। गुरुदत्त की फ़िल्मों में प्यार का जो ठहराव और बुनाव है वह अन्यत्र दुर्लभ है। दिलीप कुमार, देवानंद और राजकपूर जब प्रेम को ग्लैमर में बांध रहे थे तब गुरुदत्त प्यार को सादगी की चांदनी में चटक कर रहे थे। यह आसान नहीं था। दिलीप कुमार अभिनीत और विमल राय द्वारा निर्देशित देवदास हिंदी फ़िल्म में रोमांस का मानक बन कर उभरी तो गुरुदत्त की कागज के फूल रोमांस का एक नया क्राफ़्ट ले कर हमारे सामने उपस्थित है। देवानंद की गाइड प्रेम का एक नया ही बिरवा रचती है। प्रेम पुजारी, तेरे मेरे सपने में प्रेम की दूसरी इबारत वह भले लिखते हैं पर गाइड को वह छू भी नहीं पाते।
प्यार की बात चले और पाकीज़ा को हम भूल जाएं? भला कैसे संभव है। एक सादी सी फ़िल्म हो कर भी अपने गीतों और संवादों के चलते पाकीज़ा प्रेम की एक नई डगर पर हिंदी सिनेमा को ले जाती है। फिरते हैं हम अकेले/ बाहों में कोई ले ले/ आखिर कोई कहां तक तनहाइयों से खेले की जो स्वीकारोक्ति है वह आसान नहीं है। पांव ज़मीन पर मत रखिएगा, नहीं मैले हो जाएंगे या फिर अफ़सोस कि लोग दूध से भी जल जाते हैं जैसे मोहक और मारक संवाद और इस के दिलकश गाने पाकीज़ा को उस की पाकीज़गी तक इस आसानी से ले जाते हैं कि फिर कोई और फ़िल्म इस को छू नहीं पाती। तो कमाल अमरोही के समर्पण और उन के संवादों की ही यह तासीर है कुछ और नहीं। लेकिन जो कहते हैं कि मुहब्बत में बगावत वह पहली बार अपने दाहक रुप में अगर उपस्थित हुआ तो मुगले-आज़म में ही। कमाल अमरोही की ही कलम का यह कमाल है कि मुगले-आज़म में प्यार का जो अंदाज़ पेश किया के आसिफ़ ने उसे अभी तक कोई लांघना या साधना तो बहुत दूर की बात है कोई छू भी नहीं सका है। 'जब प्यार किया तो डरना क्या' का मानक अभी भी सिर चढ़ कर बोलता है। प्रेम कहानी पर इतनी मेहनत, इतना समर्पण, इतनी निष्ठा कभी फिर देखी नहीं गई किसी फ़िल्म में। सोचिए भला कोई निर्देशक फ़िल्म पर इतना आसक्त हो जाए कि फ़िल्म स्टूडियो में ही चटाई बिछा कर रोज-ब-रोज सोने लगे? पर के. आसिफ़ तो सोते थे। इस फ़िल्म को ले कर जाने कितनी कहानियां, किताबें लिखी और सुनाई गई हैं कि पूछिए मत। दो तीन वाकए यहां हम भी सुनाए देते हैं। बल्कि दुहराए देते हैं। सुनाए तो और लोगों ने हैं।
कभी नौशाद साहब यह वाकया सुनाते थे। एक दिन के आसिफ़ ने उन से पूछा कि ये तानसेन वाला गाना किस से गवाया जाए! तो नौशाद साहब ने फ़र्माया कि आज के तानसेन तो बडे़ गुलाम अली साहब हैं। उन्हीं से गवाना चाहिए। पर एक दिक्कत यह है कि वह गाएंगे नहीं। क्यों कि वह प्लेबैक नहीं देते। पर के आसिफ़ ने नौशाद से कहा कि वह गाएंगे। आप चलिए उन के पास। नौशाद ने बहुत ना-नुकुर की। पर के आसिफ़ माने नहीं। पहुंचे नौशाद को ले कर बडे़ गुलाम अली खां साहब के घर। नौशाद ने जैसा कि वह बताते थे बडे़ गुलाम अली साहब से सब कुछ बता दिया यह बताते हुए कि मैं ने इन्हें बता दिया है कि आप प्लेबैक नहीं देते हैं फिर भी यह आ गए हैं हम को ले कर। तो बडे़ गुलाम अली खां ने नौशाद से कहा कि ऐसा करते हैं कि इन से इतना ज़्यादा पैसा मांग लेते हैं कि यह खुद ही भाग जाएंगे। तो नौशाद साहब ने उन से कहा कि इस पर आप को पूरा अख्तियार है। नौशाद साहब बताते थे कि उन दिनों सब से महंगी गायिका थीं लता मंगेशकर। वह एक गाने का तब पांच सौ रुपए लेती थीं। और बडे़ गुलाम अली खां साहब ने के आसिफ़ से तब एक गाने का पचीस हज़ार रुपए मांग लिया। के आसिफ़ तब सिगरेट पी रहे थे। पचीस हज़ार सुनते ही उन्हों ने सिगरेट से राख झाड़ी और बोले, 'डन !' फिर अपनी जेब से दस हज़ार रुपए बडे़ गुलाम अली साहब को देते हुए बोले, 'अभी इसे रखिए बाकी भिजवाता हूं।'
अब जब गाना रिकार्ड होने लगा तो जो चाहते थे नौशाद वह नहीं मिल पा रहा था। अंतत: बडे़ गुलाम अली खां नाराज हो गए। और बोले कि पहले फ़िल्म शूट करो फिर मैं गाऊंगा। अब देखिए रातोंरात दिलीप कुमार और मधुबाला को बुला कर फ़िल्म शूट की गई और फिर गाना रिकार्ड किया गया। नतीज़ा देखिए कि क्या राग आलापा खां सहब ने! ऐसे ही एक दृश्य में तपती रेत पर पृथ्वीराज कपूर को चलवाया के आसिफ़ ने। किसी ने कहा कि तपती रेत पर चलाते या ठंडी रेत पर चलाते कैमरा तो सिर्फ़ रेत ही दिखाएगा। तो के आसिफ़ बोले कि तपती रेत पर जो चेहरे पर तकलीफ़ चाहता था पृथ्वीराज कपूर से वह सिर्फ़ अभिनय से नहीं मिल पाता। इसी तरह एक दृश्य में उन्हों ने दिलीप कुमार को सोने के जूते पहनाए। जूते बनने के जब आर्डर के आसिफ़ दे रहे थे तब कैमरामैन ने उन से कहा कि ब्लैक एंड ह्वाइट में तो हमारा कैमरा वहां जूते को ठीक से दिखा भी नहीं पाएगा कि सोने का है तो क्या फ़ायदा? तो के आसिफ़ ने कहा कि सोने के जूते पहने कर हमारे हीरो के चेहरे पर जो भाव आएगा, जो चमक आएगी वह तो कैमरे में दिखेगा न? तो इतने समर्पण, इतनी निष्ठा से बनाई गई यह फ़िल्म मुगले आज़म रोमेंटिक फ़िल्मों का मानक और मक्का मदीना बन गई। जिस की मिसाल हाल फ़िलहाल तक कोई और नहीं है। एक एक दृश्य, एक एक संवाद और एक एक गाने आज भी उस के सलमे सितारे की तरह टंके हुए हैं।
बाद के दिनों में भी रोमेंटिक फ़िल्में बनीं आज भी बन रही हैं लेकिन मुगले आज़म के एक गाने में ही जो कहें कि पायल के गमों का इल्म नहीं झंकार की बातें करते हैं वाली बात हो कर रह गईं। और जो उस में एक संवाद है न कि दिल वालों का साथ देना दौलत वालों का नहीं। वह बात भी, वह तासीर भी बावजूद तमाम कोशिशों के नहीं बन पाई, नहीं आ पाई। हां प्यार के ट्रेंड ज़रूर बदलते रहे हैं, मिजाज और मूड बदलता रहा है। राजकपूर का अपना तेवर था, उन के प्यार में एक अजब ठहराव था। तो दिलीप कुमार के अंदाज़ में ट्रेजडी वाला ट्रेंड था। इतना कि उन्हें ट्रेजडी किंग कहा जाने लगा। तो वहीं शम्मी कपूर उछल कूद करते हुए याहू ट्रेंड सेटर हो गए। राजेश खन्ना अपनी फ़िल्मों में एक नया अंदाज़ ले कर एक नए तरह के प्रेमी बन कर उपस्थित हुए और एक नया स्टारडम रचा। बीच में अनिल धवन दोराहा और हवस के प्रेमी बन कर चल रहे थे। विजय अरोडा भी थे। हां धर्मेंद्र, जितेंद्र सरीखे नायक भी थे। ठीक वैसे ही जैसे पहले विश्वजीत, जाय मुखर्जी जैसे नायक भी थे। लेकिन राजेश खन्ना की फ़िल्मों का प्रेमी एक साथ प्रेम की कई इबारते बांच रहा था। प्रेम की एक नई पुलक की आंच में वह जो पाग पका रहे थे, उस में एक टटकापन और मस्ती भी थी। सिर्फ़ रोना धोना ही नहीं। अमिताभ बच्चन अभिनीत फ़िल्मों ने प्यार को भी गुस्से में बदलने की फ़ितरत परोसी। मतलब एंग्री यंगमैन अब प्यार कर रहा था। जो कभी अभिमान में गायक था, कभी-कभी में शायर था या एक नज़र में जुनून की हद से गुज़र जाने वाला प्रेमी अब तस्कर था दीवार में और प्यार कर रहा था। उसी तस्करी वाले अंदाज़ में। कि पिता पहले बनता है शादी की बात बाद में सोचता है। यह अनायास नहीं है कि चंदन सा बदन चंचल चितवन जैसा मादक गीत लिखने वाले इंदीवर बाद में सरकाय लेव खटिया जाड़ा लगे लिखने लगे। और अब तो सब कुछ शार्ट में बतलाओ ना, सीधे प्वाइंट पर आओ ना! या फिर इश्क के नाम पर अब सब रचाते रासलीला है मैं करुं तो साला करेक्टर ढीला है! जैसे गानों से हिंदी फ़िल्मों में रोमांस की बरसात हो रही है।
खैर अस्सी के दशक में जब मैंने प्यार किया आई तो सलमान खान प्यार के नए नायक बन गए। प्यार का एक नया ट्रेंड हिंदी फ़िल्मों मे आया। एक नई बयार बहने लगी। एंग्री यंगमैन के अंदाज़ से अब टीन एज अंदाज़ का रोमांस हिंदी फ़िल्मों में सांस लेने लगा। कयामत से कयामत तक की बात आ गई। बात फिर चूडी मजा न देगी, कंगन मजा न देगा से होने लगी। लगा कि रोमांस लौट आया है। लेकिन ओ जो मुकेश ने एक गाना गाया है न कि तुम अगर मुझ को न चाहो तो कोई बात नहीं, गैर के दिल को सराहोगी तो मुश्किल होगी वाले अंदाज़ में हिंदी फ़िल्में सांस लेने लगीं। जिस्म जैसी फ़िल्में आने लगीं जो बिपाशा जैसी खुली तबीयत वाली अभिनेत्रियों के मार्फ़त प्यार के बहाने देह की खिड़की खोल रही थीं और बता रही थीं कि प्यार अब पवित्र ही नहीं रहा सेक्स भी हो गया है। फिर तो प्यार के रंग में सेक्स का रंग सिर चढ़ कर बोलने लगा। और अब फ़सल सामने है। एक से एक चुंबन, एक से एक बोल्ड और न्यूड दृश्य अब आम बात हो चली है। मुन्नी बदनाम और शीला जवान हो गई तो जलेबी बाई भी भला काहे पीछे रहतीं? इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हज़ारों हैं या आप की याद आती रही रात भर अब बिसर कर अब बारह महीने में बारह तरीके से प्यार की इबारत बांचने लगा हिंदी सिनेमा का रोमांस।
एक समय था जब मधुबाला, मीना कुमारी, वैजयंती माला, आशा पारिख, वहीदा रहमान की बाहों और आहों में हिंदी सिनेमा रोमांस की गलबहियां करता था, रोमांस की चादर बीनता था। शोला जो भड़के, दिल मेरा धड़के या फिर जवानी बीत जाएगी ये रात फिर ना आएगी गा कर मन को प्यार के हिडोले पर बैठाता था। अशोक कुमार, राजकुमार, राजेंद्र कुमार, सुनील दत्त के साथ देविका रानी,साधना, नूतन, तनूजा हेमा मालिनी, रेखा, श्रीदेवी, जयाप्रदा, तब्बू के तेवर में प्यार के तराने गाने वाला हिंदी सिनेमा अब इमरान हाशमी और मलिका शेरावत के चुंबनों में चूर होने लगा। रोमांस की यह एक नई धरती एक नया आकाश हिदी सिनेमा के दिल में धड़कना और बसना शुरु हुआ। पहले फ़िल्मी गानों में पेड़ों की डालियां हिलती थीं अब देह हिलने लगी। हिलने क्या लगी उछले कूदने और दौड़ने लगी। रोमांस का एक नया रंग था। आनंद बख्शी कभी लिखते थे देवानंद के लिए बैठ जा बैठ गई और गाते थे किशोर कुमार पर अब तो लिरिक के नाम पर खड़ा का खड़ा गद्य और संगीत के नाम पर शोर सुनाई देने लगा है रोमेंटिक गानों में। गाने अब गाने नहीं डांस नंबर बन चले हैं। लिखते थे कभी चित्रलेखा सरीखी फ़िल्म के लिए साहिर लुधियानवी कि सखी रे मेरा मन उलझे, तन डोले! अब तो यह है कि तन ही तन है मन तो किसी भयानक खोह में समा गया है। शोखियों में घोला जाए थोड़ा सा शबाब उस में फिर मिलाई जाए थोड़ी सी शराब होगा यूं नशा जो तैयार वो प्यार है प्यार! जैसे मादक और दाहक गीत लिखने वाले नीरज और उस को संगीत देने वाले सचिन देव वर्मन को जिस को याद करना हो करे अब तो डेल्ही बेली का गाना सुन रहे हैं लोग भाग बोस डी के। अब इस के उच्चारण में लोगों के मुह से गालियां निकलती हैं तो उन की बला से। यह एक नया रोमांस है।
भारत भूषण और मीना कुमारी का वह दौर नहीं है कि आप तू गंगा की मौज मैं जमुना की धारा के संगीत में आप गोते मारें। एक दूजे के लिए में गाती रही होंगी कभी लता मंगेशकर सोलह बरस की बाली उमर को सलाम ऐ प्यार तेरी पहली नज़र को सलाम! अब तो आप सुनिए ज़रा शार्ट में समझाओ ना सीधे प्वाइंट पर आओ ना! अब सब कुछ हाइटेक है तो रोमांस भी कब तक भला और कैसे भला पीछे रहता? अब उस रोमांस का ज़माना बीत और रीत गया जिस को कभी सहगल, बेगम अख्तर, लता मंगेशकर, मुबारक बेगम,मुहम्मद रफ़ी, मुकेश किशोर, मन्ना डॆ या तलत महमूद, सुमन कल्यानपुर, मनहर हेमलता की गायकी में निर्माता निर्देशक और संगीतकार हिंदी फ़िल्मों मे परोसते थे। कभी लिखते रहे होंगे भरत व्यास, राजा मेंहदी अली खां, शकील बदांयूनी, साहिर लुधियानवी, नरेंद्र शर्मा, शैलेंद्र, नीरज, मज़रूह सुल्तानपुरी, गुलज़ार, जावेद अखतर प्रेम गीत। एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा या फिर चांदनी रात में एक बार तुझे देखा है, या मोरा गोरा अंग लई ले, मोहि श्याम रंग दई दे! भूल जाइए पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है और मत सोचिए कि ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है! आप तो बस सीधे प्वाइंट पर आइए ना! और गाइए भाग बोस डी के !। आज की हिंदी फ़िल्म में रोमांस की यही कैफ़ियत है। आगे और बदलेगी।













शनिवार, 17 फ़रवरी 2024

१७ फरवरी,सॉनेट,लघुकथा,गीत,आँख,मुहावरा,कहावत,हास्य

सृजन १७ फरवरी
*
हास्य रचना
मत कह प्यार किरण से है।

मुश्किल में तू पड़ जाएगा,
कोई नहीं बचा पाएगा।
नादां आफत आमंत्रित कर
बोल तुझे क्या मिल जाएगा?
घरवाली बेलन ले मारे,
झाड़ू लेकर पूजे द्वारे।
मित्र लगाएँ ठहाका जमकर,
प्यार किरण से मत कह हठकर।
थाने में हो जमकर पूजा,
इससे बड़ा न संकट दूजा।
न्यायालय दे नहीं जमानत,
बहुत भयानक है यह शामत।  
मत मौलिक अधिकार बताओ,
वैलेंटाइन गुण मत गाओ।
कूटेंगे मिलकर हुड़दंगी,
नहीं रहेगी हालत चंगी।
चरण किरण के पड़ तज प्यार,
भाई किरण का थानेदार।

मत कह प्यार किरण से है।
१७.२.२०२४
•••
सॉनेट
प्रभु जी
प्रभु जी! तुम नेता, हम जनता।
झूठे सपने हमें दिखाते।
समर चुनावी जब-जब ठनता।।
वादे कर जुमला बतलाते।।
प्रभु जी! अफसर, हम हैं चाकर।
लंच-डिनर ले पैग चढ़ाते।
खाता चालू हम, तुम लॉकर।।
रिश्वत ले, फ़ाइलें बढ़ाते।।
प्रभु जी धनपति, हम किसान हैं।
खेत छीन फैक्टरी बनाते।
प्रभु जी कोर्ट, वकील न्याय हैं।।
दर्शन दुलभ घर बिकवाते।।
प्रभु कोरोना, हम मरीज हैं।
बादशाह प्रभु हम कनीज़ हैं।।
•••
सॉनेट
धीर धरकर
पीर सहिए, धीर धरिए।
आह को भी वाह कहिए।
बात मन में छिपा रहिए।।
हवा के सँग मौन बहिए।।
कहाँ क्या शुभ लेख तहिए।
मधुर सुधियों सँग महकिए।
दर्द हो बेदर्द सहिए।।
स्नेहियों को चुप सुमिरिए।।
असत् के आगे न झुकिए।
श्वास इंजिन, आस पहिए।
देह वाहन ठीक रखिए।
बनें दिनकर, नहीं रुकिए।।
शिला पर सिर मत पटकिए।
मान सुख-दुख सम विहँसिए।।
१७-२-२०२२
•••
सॉनेट
सैनिक
सीमा मुझ प्रहरी को टेरे।
फल की चिंता करूँ न किंचित।
करूँ रक्त से धरती सिंचित।।
शौर्य-पराक्रम साथी मेरे।।
अरिदल जब-जब मुझको घेरे।
माटी में मैं उन्हें मिलाता।
दूध छठी का याद कराता।।
महाकाल के लगते फेरे।।
सैखों तारापुर हमीद हूँ।
होली क्रिसमस पर्व ईद हूँ।
वतन रहे, होता शहीद हूँ।।
जान हथेली पर ले चलता।
अरि-मर्दन के लिए मचलता।
काली-खप्पर खूब से भरता।।
१७-२-२०२२
•••
लघुकथा
सबक
*
'तुम कैसे वेलेंटाइन हो जो टॉफी ही नहीं लाये?'
''अरे उस दिन लाया तो था, अपने हाथों से खिलाई भी थी।भूल गयीं?''
'भूली तो नहीं पर मुझे बचपन में पढ़ा सबक आज भी याद है। तुमने कुछ पढ़ा-लिखा होता तो तुम्हें भी याद होता।'
''अच्छा, तो मैं अनपढ़ हूँ क्या?''
'मुझे क्या पता? कुछ पढ़ा होता तो सबक याद न होता?'
''कौन सा सबक?''
'वही मुँह पर माखन लगा होने के बाद भी 'मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो' कहनेवाला सूर का पद। जब मेरे आराध्य को रोज-रोज खाने के बाद भी माखन खाना याद नहीं रहा तो एक बार खाई टॉफी कैसे??? चलो माफ़ किया अब आगे से याद रखना सबक। '
***
गीत :
समा गया तुम में
---------------------
समा गया है तुममें
यह विश्व सारा
भरम पाल तुमने
पसारा पसारा
*
जो आया, गया वह
बचा है न कोई
अजर कौन कहिये?
अमर है न कोई
जनम बीज ने ही
मरण बेल बोई
बनाया गया तुमसे
यह विश्व सारा
भरम पाल तुमने
पसारा पसारा
*
किसे, किस तरह, कब
कहाँ पकड़ फाँसे
यही सोच खुद को
दिये व्यर्थ झाँसे
सम्हाले तो पाया
नहीं शेष साँसें
तुम्हारी ही खातिर है
यह विश्व सारा
वहम पाल तुमने
पसारा पसारा
१७-२-२०१७
***
आँख पर मुहावरे:

आँख अंगारा होना = क्रोधित होना।
बेटे की अंक सूची देखते ही पिता की आँखें अंगारा हो गईं।
आँख का अंधा, गाँठ का पूरा = मूर्ख धनवान l
आँख का अंधा, गाँठ का पूरा पति पाकर वह अपने सब शौक पूरे कर रही है।
आँख का अंधा, नाम नयन सुख = लक्षणों से विपरीत नाम होना।
भिक्षुक का नाम लक्ष्मीनारायण सुनकर वह बोल पड़ा 'आँख का अंधा, नाम नयन सुख'।
आँख बचाना = किसी से छिपाकर उसके सामने ही कोई कार्य कर लेना।
घरवाली की आँख बचकर पड़ोसन को मत ताको। आँख मारना = इंगित / इशारा करना।
मुझे आँख मारते देख गवाह मौन हो गया।
आँखें आना = आँखों का रोग होना।
आँखें आने पर काला चश्मा पहनें।
आँखें खुलना = सच समझ में आना ।
स्वप्न टूटते ही उसकी आँखें खुल गईं।
आँखें चार होना = प्रेम में पड़ना l
राधा-कृष्ण की आँखें चार होते ही गोप-गोपियाँ मुस्कुराने लगे lआँखें चुराना = छिपाना।
उसने समय पर काम नहीं किया इसलिए आँखें चुरा रहा है।
आँखें झुकना = शर्म आना।
वर को देखते ही वधु की आँखें झुक गयीं।
आँखें झुकाना = शर्म आना।
ऐसा काम मत करो कि आँखें झुकाना पड़े।
आँखें टकराना = चुनौती देना।
आँखें टकरा रहे हो तो परिणाम भोगने की तैयारी भी रखो।
आँखें तरसना = न मिल पाना।
पत्नी भक्त बेटे को देखने के लिए माँ की आँखें तरस गईं।
आँखें तरेरना/दिखाना = गुस्से से देखना।
दुश्मन की क्या मजाल जो हमें आँखें दिखा सके?
आँखें फूटना = अंधा होना, दिखाई न पड़ना l
क्या तुम्हारी आँखें फूट गईं हैं जो मटके से टकराकर उसे फोड़ डाला?आँखें फेरना = अनदेखी करना।
आज के युग में बच्चे बूढ़े माँ-बाप से आँखें फेरने लगे हैं।
आँखें बंद होना = मृत्यु होना।
हृदयाघात होते ही उसकी आँखें बंद हो गईं।
आँखें भर आना - आँख में आँसू आना l
भक्त की दिन दशा देखकर प्रभु की आँखें भर आईं lआँखें मिलना = प्यार होना।
आँखें मिल गयी हैं तो विवाह के पथ पर चल पड़ो।
आँखें मिलाना = प्यार करना।
आँखें मिलाई हैं तो जिम्मेदारी से मत भागो।
आँखों में आँखें डालना = प्यार करना।
लैला मजनू की तरह आँखों में ऑंखें डालकर बैठे हैं।
आँखें मुँदना = नींद आना, मर जाना।
लोरी सुनते ही ऑंखें मुँद गयीं।
माँ की आँखें मुँदते ही भाई लड़ने लगे।
आँखें मूँदना = सो जाना।
उसने थकावट के कारण आँखें मूँद लीं।
आँखें मूँदना = मर जाना। डॉक्टर इलाज कर पते इसके पहले ही घायल ने आँखें मूँद लीं।
आँखें लगना = नींद आ जाना। जैसे ही आँखें लगीं, दरवाज़े की सांकल बज गयी।
आँखें लड़ना = प्रेम होना।
आँखें लड़ गयी हैं तो सबको बता दो।
आँखें लड़ाना = प्रेम करना।
आँखें लड़ाना आसान है, निभाना कठिन।
आँखें लाल करना = क्रोध करना l
दुश्मन को देखते ही सैनिक आँखें लाल कर उस पर टूट पड़ाlआँखें बिछाना = स्वागत करना।
मित्र के आगमन पर उसने आँखें बिछा दीं।
आँखों का काँटा = शत्रु।
घुसपैठिए सेना की आँखों का काँटा हैं।
आँखों का नूर/तारा होना = अत्यधिक प्रिय होना।
अपने गुणों के कारण बहू सास की आँखों का नूर हो गई।
आँखों की किरकिरी = जो अच्छा न लगे।
आतंकवादी मानव की आँखों की किरकिरी हैं।
आँखों के आगे अँधेरा छाना = कुछ दिखाई न देना, कुछ समझ न आना।
साइबर ठग द्वारा बैंक से धन लूटने की खबर पाते ही आँखों के आगे अँधेरा छ गया।
आँखों पर पट्टी बाँध लेना = नज़र अंदाज़ करना l
राजनैतिक दल एक दूसरे की उपलब्धियों को देखकर आँखों पट पट्टी बाँध लेते हैंl
आँखों में खटकना = अच्छा न लगना l
करवों की आँखों में पांडव हमेशा खटकते रहेlआँखों में खून उतरना = अत्यधिक क्रोध आना।
कसाब को देखते ही जनता की आँखों में खून उतर आया।
आँखों में चमक आना = खुशी होना।
परीक्षामें प्रथम आने का समाचार पाते ही उसकी आँखों में चमक आ गई।
आँखों में धूल झोंकना = धोखा देना।
खड़गसिंग बाबा भारती की आँखों में धूल झोंक कर भाग गया।
आँखों में बसना = किसी से प्रेम होना।
मीरा की आँखों में बचपन से ही नंदलाल बस गए।
आँखों में बसाना = अत्यधिक प्रेम करना l
पुष्पवाटिका में देखते ही श्री राम की छवि को सीता जी ने आँखों में बसा लिया।
आँखों से काजल चुराना = बहुत चालाकी से काम करना l
नेतागण आँख से काजल चुरा लें तो भी मतदाता को मलूँ नहीं हो पाता lआँखों से गिरना = सम्मान समाप्त होना।
झूठे आश्वासन देकर नेता मतदाताओं की आँखों से गिर गए हैं।
आँखों से गंगा-जमुना बहना / बहाना = रोना।
रक्षा बंधन पर भाई को न पाकर बहिन की आँखों से गंगा-जमुना बहने लगी।
आँखों-आँखों में बात होना = इशारे से बात करना।
आँखों-आँखों में बात हुई और दोनों कक्षा से बाहर हो गए।
आँखों ही आँखों में इशारा हो गया / बैठे-बैठे जीने का सहारा हो गया।
आँखों-आँखों में बात होने दो / मुझको अपनी बाँहों में सोने दो।


एक आँख से देखना = समानता का व्यवहार करना।
समाजवाद तो नाम मात्र का है, अपने दाल और अन्य दलों के लोगों को कोई भी एक आँख से कहाँ देखता है?
खुली आँख सपने देखना = कल्पना में लीन होना, सच से दूर होना।
खुली आँखों सपने देखने से सफलता नहीं मिलती।
फूटी आँखों न सुहाना = एकदम नापसंद करना।
माली की बेटी रानी को फूटी आँखों न सुहाती थी।

अंधे की लाठी = किसी बेबस का सहारा l
पत्नी को असाध्य रोग होते ही वह अंधे की लाठी बन गया।अंधो मेँ काना राजा = अयोग्यों में खुद को योग्य बताना।
अंधा बांटे रेवड़ी, चीन्ह चीन्ह कर देय / अंधा बांटे रेवड़ी, फिर फिर खुद को देय = पक्षपात करना / स्वार्थ साधना।
राज्यपाल भी निष्पक्ष न होकर अंधा बांटे रेवड़ी, चीन्ह चीन्ह कर देय की मिसाल पेश कर रहा है। अंधों में काना राजा बनने से योग्यता सिद्ध नहीं होती।


कहावत
अंधे के आगे रोना, अपने नैना खोना = नासमझ/असमर्थ के सामने अपनीव्यथा कहना।
नेताओं से सत्य कहना अंधे के आगे रोना, अपने नैना खोना ही है।
आँख का अंधा नाम नैन सुख = नाम के अनुसार गुण न होना।
उसका नाम तो बहादुर पर छिपकली से डर भी जाता हैं, इसी को कहते हैं आँख का अँधा नाम नैन सुख।
***
नवगीत:
.
सबके
अपने-अपने मानक
.
‘मैं’ ही सही
शेष सब सुधरें.
मेरे अवगुण
गुण सम निखरें.
‘पर उपदेश
कुशल बहुतेरे’
चमचे घेरें
साँझ-सवेरे.
जो न साथ
उसका सच झूठा
सँग-साथ
झूठा भी सच है.
कहें गलत को
सही बेधड़क
सबके
अपने-अपने मानक
.
वही सत्य है
जो जब बोलूँ.
मैं फरमाता
जब मुँह खोलूँ.
‘चोर-चोर
मौसेरे भाई’
कहने से पहले
क्यों तोलूँ?
मन-मर्जी
अमृत-विष घोलूँ.
बैल मरखना
बनकर डोलूँ
शर-संधानूं
सब पर तक-तक.
सबके
अपने-अपने मानक
.
‘दे दूँ, ले लूँ
जब चाहे जी.
क्यों हो कुछ
चिंता औरों की.
‘आगे नाथ
न पीछे पगहा’
दुःख में सब संग
सुख हो तनहा.
बग्घी बैठूँ,
घपले कर लूँ
अपनी मूरत
खुद गढ़-पूजूं.
मेरी जय बोलो
सब झुक-झुक.
सबके
अपने-अपने मानक
१७.२.२०१५
***
नवगीत
.
मैं नहीं नव
गीत लिखता
उजासों की
हुलासों की
निवासों की
सुवासों की
खवासों की
मिदासों की
मिठासों की
खटासों की
कयासों की
प्रयासों की
कथा लिखता
व्यथा लिखता
मैं नहीं नव
गीत लिखता
.
उतारों की
चढ़ावों की
पड़ावों की
उठावों की
अलावों की
गलावों की
स्वभावों की
निभावों की
प्रभावों की
अभावों की
हार लिखता
जीत लिखता
मैं नहीं नव
गीत लिखता
.
चाहतों की
राहतों की
कोशिशों की
आहटों की
पूर्णिमा की
‘मावसों की
फागुनों की
सावनों की
मंडियों की
मन्दिरों की
रीत लिखता
प्रीत लिखता
मैं नहीं नव
गीत लिखता
१७.२.२०१५
***
सामयिक लघुकथा:
ढपोरशंख
*
कल राहुल के पिता उसके जन्म के बाद घर छोड़कर सन्यासी हो गए थे, बहुत तप किया और बुद्ध बने. राहुल की माँ ने उसे बहुत अरमानों से पाला-पोसा बड़ा किया पर इतिहास में कहीं राहुल का कोई योगदान नहीं दीखता.
आज राहुल के किशोर होते ही उसके पिता आतंकवादियों द्वारा मारे गए. राहुल की माँ ने उसे बहुत अरमानों से पाला-पोसा बड़ा किया पर देश के निर्माण में कहीं राहुल का कोई योगदान नहीं दीखता.
सबक : ढपोरशंख किसी भी युग में हो ढपोरशंख ही रहता है.
१७-२-२०१३