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रविवार, 4 फ़रवरी 2024

४ फरवरी, यमक, जौहर, गंग, मंडन, गीत, कुण्डलिया, मुक्तिका, चिरैया, सोनेट, सरस्वती, सोरठा, बसंत

सलिल सृजन ४ फरवरी
दोहा
बाली गृहणी नचाती, गेहूँ नाचे झूम।
नजर बचा रवि-धरा की, इक-दूजे को चूम।।
४.२.२०२४
***
सॉनेट
शारदा
हृदय विराजी मातु शारदा
सलिल करे अभिषेक निरंतर
जन्म सफल करता नित यश गा
सुमति मिले विनती सिर, पग धर
वीणा अनहद नाद गुँजाती
भव्य चारुता अनुपम-अक्षय
सातों स्वर-सरगम दे थाती
विद्या-ज्ञान बनाते निर्भय
अपरा-परा नहीं बिसराएँ
जड़-चेतन में तुम ही तुम हो
देख सकें, नित महिमा गाएँ
तुमसे आए, तुममें गुम हों
सरस्वती माँ सरसवती हे!
भव से तार, दिव्य दर्शन दे
४-२-२०२३
•••
सोरठे बसंत के
नहीं जगत में सार, कहते थे माया जिसे।
कहें जरूरी प्यार, संत बसंत निहारते।।
महुआ फूला खूब, वनश्री का शृङगार कर।
गया रंग में डूब, किंशुक वन अंगार भर।।
नेह नर्मदा तीर, योगी साधक सम खड़ा।
टेसू धरकर धीर, पल लगता दिन से बड़ा।।
देख रहा आकाश, करे तपस्या अहर्निश।
होकर लाल पलाश, विचलित तनिक न हो रहा।।
कट-छिद-दग है शांत, बाँस न भरता आह भी।
कृष्ण बनेंगे कान्त, वेणु थाम कर; धर अधर।।
कोयल कूके भोर, गीत विरह के सुर बसे।
साँझ मिले चितचोर, कसकर बाँहों में कसे।।
नहीं मिलन बिन चैन, बिन बोले बोलें नयन।
मन नाहक बेचैन, दिवस चाहता है शयन।।
छीनें मन का चैन, मधु-रस भीगे सोरठे।
दिवस कटे नहिं रैन, प्रिय दर्शन पाए बिना।।
अच्छा लगे बसंत, पुष्पित तरु; गंधित पवन।
संग कामिनी-कंत, पद्मित सलिल, अमित लगन।।
•••
एक अज्ञात महानायक - शंभूनाथ डे
सन १८१७ में 'ब्लू डैथ' (कॉलेरा, हैजा) विश्व में मौत का तांडव करने लगा और इसकी चपेट में आकर उस समय लगभग एक करोड़ अस्सी लाख लोगों की मौत हो गई। दुनिया भर के वैज्ञानिक हैजा का इलाज खोजने में जुट गए ।
सन १८४४ में रॉबर्ट कॉख नामक वैज्ञानिक ने उस जीवाणु का पता लगाया जिसकी वजह से हैजा होता है और उस जीवाणु को नाम दिया 'वाइब्रियो कॉलेरी'। रॉबर्ट कॉक के शोध के अनुसार जीवाणु व्यक्ति के सर्कुलेटरी सिस्टम यानी कि खून में जाकर उसे प्रभावित करता है। कॉख ने जीवाणु का पता तो लगा लिया लेकिन वह यह पता लगाने में नाकाम रहे कि वाइब्रियो कॉलेरी को कैसे निष्क्रिय किया जा सकता है।
हैज़ा फैलता रहा, लोग मरते रहे और इस जानलेवा बीमारी को ब्लू डेथ यानि "नीली मौत" का नाम दे दिया गया।
१ फरवरी १९१५ को पश्चिम बंगाल के एक दरिद्र परिवार में एक बालक का जन्म हुआ, नाम रखा गया 'शंभूनाथ'। शुरुआत से ही शंभूनाथ पढ़ाई में अव्वल रहे। उन्हें कोलकाता मेडिकल कॉलेज में प्रवेश मिल गया। डॉक्टरी से अधिक उनका रुझान शोध कार्य की ओर था। इसलिये १९४७ में उन्होंने यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के कैमरोन लैब में पीएच. डी. में दाखिला लिया। मानव शरीर की संरचना पर शोध करते समय शंभूनाथ डे का ध्यान हैज़ा फैलाने वाले जीवाणु वाइब्रियो कॉलेरी की ओर गया।
माटी का प्यार १९४९ में शंभूनाथ डे को वापिस भारत खींच लाया। उन्हें कलकत्ता मेडिकल कॉलेज के पैथोलॉजी विभाग का निदेशक नियुक्त किया गया और वह महामारी का रूप ले चुके हैज़े का इलाज ढूँढ़ने में जुट गए।
बंगाल उस समय हैज़े के कहर से काँप उठा था। हॉस्पिटल हैजे के मरीजों से भरे हुये थे।
१८४४ में रॉबर्ट कॉख ने गलती की, उन्होंने कभी सोचा ही नहीं कि यह जीवाणु व्यक्ति के किसी और अंग के ज़रिए शरीर में जहर फैला सकता है। शंभूनाथ के शोध से पता चला वाइब्रियो कॉलेरी खून के रास्ते नहीं बल्कि छोटी आंत में जाकर एक टोक्सिन/जहरीला पदार्थ छोड़ता है... इसकी वजह से इंसान के शरीर में खून गाढ़ा होने लगता है और पानी की कमी होने लगती है। शंभूनाथ डे ने अपने शोध के निष्कर्ष से विश्व भर में सनसनी फैला दी।
१९५३ में शंभूनाथ डे का शोध प्रकाशित के पश्चात ही ऑरल डिहाइड्रेशन सॉल्यूशन (ORS) बनाया गया। यह सॉल्यूशन हैजे का रामबाण इलाज साबित हुआ। भारत और अफ्रीका में इस सॉल्यूशन के जरिये लाखों मरीजों को मौत के मुँह से निकाल लिया गया। विश्व भर में शंभूनाथ डे के शोध का डंका बज चुका था परंतु उनका दुर्भाग्य था के वह शोध भारत भूमि पर हुआ था। लाखों करोड़ों लोगों को जीवनदान देने वाले शंभूनाथ को अपने ही राष्ट्र में पहचान व्स सम्मान नहीं मिला। शंभूनाथ आगे इस जीवाणु पर और शोध करना चाहते थे लेकिन भारत में साधनों की कमी के चलते नहीं कर पाये। उनका नाम एक से अधिक बार नोबेल पुरस्कार के लिए भी दिया गया। इसके अलावा, उन्हें दुनिया भर में सम्मानों से नवाज़ा गया लेकिन भारत में वह एक गुमनाम शख्स की ज़िंदगी जीते रहे।
***
एक सत्य कथा
बदला
*
एक पंडित जी और एक ठाकुर साहब जिगरी दोस्त थे- दो जिस्म एक जान। बचपन से चालीसवें तक। फिर जाने क्या हुआ कि दुश्मनी हो गई। हर दूसरे दिन गोली चलना- लठैत ही नहीं, दोनों के कई बेटे तक दुश्मनी की आग का ईंधन बन गए मगर दुश्मनी चलती रही।
नदी का पानी और लड़की की उम्र बढ़ते देर नहीं लगती। ठाकुर साहब की बेटी की शादी तय हो गई। भारत में दुश्मनी कितनी भी बड़ी हो, बहन बेटियों की शादी-ब्याह में बाधक नहीं बनती। बंदूक़ें ख़ामोश हो जाती हैं। एकदम ख़ामोश। और किसी ने यह परंपरा तोड़ी तो वो ज़िंदगी और पूरब दोनों की नज़र से गिर जाता है। उस गाँव में भी यही हुआ।
ठाकुर के दरवाजे पर आ गई बारात गोलियाँ दागती, आतिशबाज़ी करती, तवायफ़ नाचती जैसी उस समय परंपरा थी। पंडित बहुत बेचैन थे, गोद खिलाई बच्ची की शादी और वे में न जा सकने के मलाल और बिना बुलाए न जाने की मजबूरी।अचानक उनकी नाउन ठुमकती हुई बखरी में घुसी और पंडिताइन से बोली- ' ए भौजी-! बरतिया लौटत बा। कुल हेकड़ई ख़त्म ठाकुर साहब के।
पंडिताइन स्तब्ध और पंडित जी को तो काटो तो ख़ून नहीं। बहुत मरी आवाज़ में पूछा कि ‘भवा का’?
नाउन ने बताया कि समधी अचानक कार माँग लिहिन- माने दाम। बाबू साहब के लगे ओतना पैसा रहा नाय तो बरात लौटे वाली है। 'निकालो जीप'दहाड़ते हुए से पंडित जी उठे। पल भर में बाकी बचे बेटे, लठैत सब तैयार होकर दस मिनट में पूरा अमला बाबू साहब के दरवाज़े पर दर्जनों दुनालियों और पचासों लाठियों के साथ जा धमके।
ठाकुर साहब को ख़बर लगी तो वो भागते हुए पहुँचे दुआर पे- 'एतना गिरि गया पंडित। आजे के दिन मिला रहा बदला भजावे की खातिर।'
पंडित जी ने बस इतना कहा- 'दुश्मनी चलत रही, बहुत हिसाब बाकी है, बकिल आज बिटिया के बियाह हा। गलतियो से बीच मा जिन अइहा।' ठाकुर साहब चुपचाप हट गयेए।
पंडित जी पहुँचे समधी के पास- 'पाँव छुए, आश्चर्य की बात। सामान्यत: पंडित लोग पाँव छूते नहीं, 'बोले कार दी।' पीछे खड़े कारिंदे ने सूटकेस थमा दिया। द्वारचार, शादी, अगले दिन बड़हार (बिरादरी भोज) हुआ ।
विदाई के पहले अंतिम भोज में बारात खाने बैठी तो पंडित जी ने दूल्हा छोड़ सबकी थाली में १०१-१०१ रुपए डलवा दिए दक्षिणा के, परंपरानुसार थाली के नीचे नहीं, थाली में।
अब पूरी बारात सदमे में क्योंकि भोजन के बाद थाली में जो बच जाए वह जूठन होता है, जूठन जेब में कैसे रखें? उस सस्ते के ज़माने में १०० रुपए का लोभ छोड़ना भी कठिन और उससे अधिक कठिन पंडित जी की नाराजगी का खतरा उठाना।
समधी ने पंडित जी की तरफ़ देखा, पंडित जी बड़ी शांति से बोले।- 'बिटिया है हमारी देवी, पूजते हैं हम लोग। आपने बारात वापस ले जाने की बात कर देवी का अपमान किया। इसलिए इतना दंड तो बनता है की देवी की जूठन प्रसाद मान कर ग्रहण करें। समधी जी! पलकों पर रही है यहाँ,वहाँ ज़रा सा कष्ट हो गया तो दक्ष प्रजापति और बिटिया सती की कहानी सुने ही होंगे। आप समधी बिटिया की वजह से हैं। दूल्हे को दामाद होने के नाते नहीं छोड़ दिए, इसलिये छोड़े कि उसीके विवाह में उसकी बात कहाँ सुनता है कोई।
सर झुकाकर जीमते रहे बाराती और फिर बारात बिटिया (अपनी बहू) लेकर बिदा हो गई।
पंडित जी वापस घर को हुए। ठाकुर साहब ने हाथ जोड़े तो बोले- 'बस्स, दम निकरि गय ठाकुर? ऊ बिटिया है, गोद मा खेलाये हन, तू दुश्मन, दुश्मनी चली।
लेकिन फिर दोनों ख़ानदानों में कभी गोली न चली। पंडित जी और बाबू साहब न सही, दोनों की पत्नियाँ गले मिलकर ख़ूब रोईं, बच्चों का फिर आना-जाना शुरु हुआ।
भारतीय बेटियों को लेकर बहुत भावुक होते हैं, उनकी बहुत इज़्ज़त करते हैं। फिर चाहे बेटी दुश्मन की ही क्यों न हो।
जो माँ-बहनों की इज्जत नहीं करते वे और चाहे जो हों, भारतीय नहीं हो सकते।
***
विमर्श
मध्यकाल के यमकीय दोहे
*
अब क्यों करिकेँ घर जैयतु है,अरु काही सुनैयतु बीती भई।
कवि मण्डन मोहन ठीक ठगी, सु तो ऐसी लिलार लिखी ती दई।
सखि और भई सो भली ही भई, पर एक जो बात बितीती नई।
रति हूँ ते गई मति हूँ ते गई पति हूँ ते गई पति हू ते गई।- मण्डन
नायिका पति को छोड़कर उपनायक से मिलने जाती है। वह भी धोखा दे जाता है, संकेत स्थल पर नहीं मिलता। नायिका पश्चाताप करती है। अंतिम पंक्ति में पतिहू (पति या स्वामी) तथा पतिहूँ (प्रतिष्ठा या लज्जा) में यमक का चमत्कार है ।
*
जल ढारि सनीचर गंग बधू विनबै कर जोरि सु पीपर सों।
तरुदेव गोसाँई बड़े तुम होयः माँगति दीन ह्वै पी परसों।
आवन के दिन तीस कहे गति औधि की ठीक तपी परसों
भूलि गये हरि दूरि विदेस किधौं अटके कहूँ पी पर सों। -गङ्ग
नायिका प्रोषितपतिका अर्थात जिसका पति प्रदेश में हो, है। एक महीने में आने की कह कर गया अवधि २ दिन पहले बीत गयी ,आया नहीं। शनिवार को पीपल पर जल चढाती है। चमत्कार अंतिम शब्दों में है
1 पीपर सों-अर्थात पीपल के वृक्ष से विनम्रता पूर्वक निवेदन करती है
2-पी परसों-विनम्रता पूर्वक माँगती है कि प्रियतम का स्पर्श करूँ
3-तपी परसों-पति के आने की अवधि परसों ही समाप्त हो गयी
4-पी पर सों -शायद कहीं मेरा प्रियतम किसी अन्य (नारी से)न अटक गया हो उससे प्रेम न कर बैठा हो
***
विमर्श -
ढोल गँवार शूद्र पशु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी।
क्या यह पंक्ति आपत्ति जनक है?
नहीं।
बुंदेली में ताड़ना के दो अर्थ होते हैं।
ताड़ते रहना खेत में जानवर न घुस पाएँ।
ताड़ना = देखना, निगाह रखना, सुरक्षा करना।
पापी को ताड़ना दी ही जाना चाहिए।
ताड़ना = दंड।
ढोल गँवार शूद्र पशु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी।
इस अर्धाली का अर्थ अपनी-अपनी समझ के अनुसार लगाया जाता है।
१. ढोल गँवार शूद्र पशु नारी, ये सभी ताड़ना अर्थात देखभाल के पात्र हैं। ढोल बजने के पहले उसकी डोरी ठीक से कसी है या नहीं?, गँवार (नासमझ) ठीक आचरण कर रहा है या नहीं?, शूद्र (अपात्र) वर्जित कार्य तो नहीं कर रहा?, पशु किसी के खेत में तो नहीं घुस रहा?, नारी को कोई तंग तो नहीं कर रहा?, इसे ताड़ते रहना चाहिए।
२. ढोल बिना थाप, गँवार बिना भय, पशु बिना मार, नारी बिना प्रतिबंध उचित आचरण नहीं करते इसलिए अंकुश आवश्यक है।
३. पशु-नारी = वह नारी जो पशुवत (अमर्यादित) आचरण करे।
'जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखि तिन तैसी।'
पाठक अपनी विचारधारा के अनुसार अर्थ निकालता है। तुलसीदास तो मिल नहीं सकते जो यह बताएँ कि किस अर्थ में लिखा है?
जय-जय गिरिवर राजकिसोरी। जय महेस मुख चंद्र चकोरी।।
जय गजवदन षडानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता।।
लिखकर पार्वती जी की वंदना की है तुलसीदास जी ने।
वाल्मीकि रामायण में जयंत द्वारा सीता जी के वक्ष पर चंचु-प्रहार का उल्लेख होने के बाद भी तुलसीदास जी ने स्त्री सम्मान रक्षा की दृष्टि से पैर पर प्रहार लिखा। वे अन्यत्र भी स्त्री पात्रों के प्रति भी संवेदनशील हैं। इसलिए उन्हें पूर्वाग्रहग्रसित नहीं कहा जा सकता।
४-२-२०२३
***
मुक्तिका
मुस्कुराने लगे।
गीत गाने लगे।।
भूल पाए नहीं
याद आने लगे।।
था भरोसा मगर
गुल खिलाने लगे।।
बात मन की करी
दिल दुखाने लगे।।
जो नहीं थे खरे
आजमाने लगे।।
तोड़ दिल, दर्द दे
आप जाने लगे।।
कह रहे, बिन कहे
हम लुभाने लगे।।
•••
मुक्तिका
खोली किताब।
निकले गुलाब।।
सुधियाँ अनेक
लाए जनाब।।
ऊँची उड़ान
भरते उकाब।।
है फटी जेब
फिर भी नवाब।।
छेड़ें न लोग
ओढ़ो नकाब।।
दाने न चार
देते जुलाब।।
थामो लगाम
पैरों रकाब।।
***
सॉनेट
ऋतुराज
ऋतुराज का स्वागत करो!
पवन पिक हिलमिल रहे हैं
आम्र तरुवर खिल रहे हैं।।
पुलक पल पल सुख वरो।।
सुमन चहके, सुमन महके।
भ्रमर कर रसपान उन्मत।
फलवती हो मिलन चाहत।।
रहीं कलिकाएँ दहक।।
बाग में गुंजार रसमय।
काममय संसार मधुमय।
बिन पिए भी चढ़ी है मय।।
भोगियों को है नहीं भय।
रोगियों का रोग हो क्षय।
योगियों होना न निर्भय।।
४-२-२०२२
•••
कुंडलिया
अगर सफलता चाहता, खुद को बना सुपात्र।
कभी न देती सफलता, केवल किस्मत मात्र।।
केवल किस्मत मात्र, न सिंह-मुख में मृग देती।
जाग दौड़ खुद मार, कौर मुँह में तब देती।।
कहे सलिल संजीव, भुनाए जो हर अवसर।
खुद को साबित करे, करो मत अगर या मगर।।
***
मुक्तक
अपनी धरा; अपना गगन, अपना सलिल, अपना पवन।
अपनी उषा-संध्या-दिशा, अपना सुमन, अपना चमन।।
पुष्पा रहा; मुस्का रहा, पल-पल वतन महका रहा-
तकदीर निज दमका रहा,
अपना युवक, अपना जतन।।
***
दोहा है रस-राज
*
दोहा छंद की भावाभिव्यक्ति क्षमता अनुपम है। हर रस को दोहा छंद भली-भाँति अभिव्यक्त करता है। हर रस को केंद्र में दोहा रखकर दोहा रचने का आनंद अनूठा है।
श्रृंगार रस
रसराज श्रृंगार रसराज अत्यंत व्यापक है। श्रृंगार शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है श्रृंग + आर। 'श्रृंग' का अर्थ है "कामोद्रेक", 'आर' का अर्थ है वृद्धि प्राप्ति। श्रृंगार का अर्थ है कामोद्रेक की प्राप्ति या विधि श्रृंगार रस का स्थाई भाव प्रेम है। पति-पत्नी या प्रेमी-प्रेमिका द्वारा प्रेम की अभिव्यंजना श्रृंगार रस की विषय-वस्तु है। प्राचीन आचार्यों ने स्त्री पुरुष के शुद्ध प्रेम को ही रति कहा है। परकीया प्रिया-चित्रण को रस नहीं रसाभास कहा गया है किंतु 'लिव इन' के इस काल में यह मान्यता अनुपयुक्त प्रतीत होती है। श्रृंगार रस में अश्लीलता का समावेश न होने दें। श्रृंगार रस के २ भेद संयोग और वियोग हैं। प्रेम जीवन के संघर्षों में खेलता है, कष्टों में पलता है, प्रिय के प्रति कल्याण-भाव रखकर खुद कष्ट सहता है। ऐसा प्रेम ही उदात्त श्रृंगार रस का विषय बनता है।
संयोग श्रृंगार:
नायक-नायिका के मिलन, मिलन की कल्पना आदि का शब्द-चित्रण संयोग श्रृंगार का मुख्य विषय है।
उदाहरण:
नयन नयन से मिल झुके, उठे मिले बेचैन।
नयन नयन में बस गए, किंचित मिले न चैन।।
वियोग श्रृंगार:
नायक-नायिका में परस्पर प्रेम होने पर भी मिलन संभव नहीं हो तो वियोग श्रृंगार होता है। यह अलगाव स्थाई भी हो सकता है, अस्थायी भी। कभी मिले बिना भी विरह हो सकता है, मिल चुकने के बाद भी हो सकता है। विरह व्यथा दोनों और भी हो सकती है, एक तरफा भी। प्राचीन काव्य शास्त्र ने वियोग के चार भाग किए हैं :-
१. पूर्व राग पहले का आकर्षण
२. मान रूठना
३. प्रवास छोड़कर जाना
४. करुण विप्रलंभ मरने से पूर्व की करुणा।
उदाहरण:
मन करता चुप याद नित, नयन बहाते नीर।
पल-पल विकल गुहरातीं, सिय 'आओ रघुवीर'।।
हास्यः
हास्य रस का स्थाई भाव 'हास्य 'है। साहित्य में हास्य रस का निरूपण कठिन होता है,थोड़ी सी असावधानी से हास्य फूहड़ मजाक बनकर रह जाता है । हास्य रस के लिए उक्ति व्यंग्यात्मक होना चाहिए। हास्य और व्यंग्य में अंतर है। दोनों का आलंबन विकृत या अनुचित होता है। हास्य खिलखिलाता है, व्यंग्य चुभकर सोचने पर विवश करता है।
उदाहरण:
'ममी-डैड' माँ-बाप को, कहें उठाकर शीश।
बने लँगूरा कूदते, हँसते देख कपीश।।
व्यंग्यः
उदाहरण:
'फ्रीडमता' 'लेडियों' को, मिले दे रहे तर्क।
'कार्य' करें तो शर्म है, गर्व करें यदि 'वर्क'।।
करुणः
भवभूति: 'एकोरसः करुण' अर्थात करूण रस एक मात्र रस है। करुण रस के दो भेद स्वनिष्ठ व परनिष्ठ हैं।
उदाहरण:
चीर द्रौपदी का खिंचा, विदुर रो रहे मौन।
भीग रहा है अंगरखा, धीर धराए कौन?।
रौद्रः
इसका स्थाई भाव क्रोध है विभाव अनुभाव और संचारी भावों के सहयोग से वासना रूप में समाजिक के हृदय में स्थित क्रोध स्थाई भाव आस्वादित होता हुआ रोद्र रस में परिणत हो जाता है ।
उदाहरण:
शिखर कारगिल पर मचल, फड़क रहे भुजपाश। ‌
जान हथेली पर लिये, अरि को करते लाश।।
वीरः
स्थाई भाव उत्साह काव्य-वर्णित विभाव, अनुभाव, संचारी भाव के संयोग से रस अवस्था में आस्वाद योग्य बनकर वीर रस कहलाता है । इसकी मुख्य चार प्रवृत्तियाँ हैं।
उदाहरण:
१.दयावीर: जहाँ दुखी-पीड़ित जन की सहायता का भाव हो।
देख सुदामा दीन को, दुखी द्वारकानाथ।
गंगा-यमुना बह रहीं, सिसकें पकड़े हाथ।।
२. दानवीर : इसके आलंबन में दान प्राप्त करने की योग्यता होना अनिवार्य है।
उदाहरण:
राणा थे निरुपाय झट, उठकर भामाशाह।
चरणों में धन रख कहें, नाथ! न भरिए आह।।
३. धर्मवीर : इसके स्थाई भाव में धर्म का ज्ञान प्राप्त करना या धर्म-पालन करना प्रमुख है।
उदाहरण:
माया दुःख का मूल है, समझे राजकुमार।
वरण किया संन्यास तज, प्रिया पुत्र घर-द्वार।।
4 युद्धवीर : काव्य व लोक में युद्धवीर की प्रतिष्ठा होती है। इसका स्थाई भाव 'शत्रुनाशक उत्साह' है।
उदाहरण:
धवल बर्फ हो गया था, वीर-रक्त से लाल।
झुका न भारत जननि का, लेकिन पल भर भाल।।
भयानकः
विभाव, अनुभाव, संचारी भावों के प्रयोग से जब भय उत्पन्न या प्रकट होकर रस में परिणत हो तब भयानक रस होता है। भय केवल मनुष्य में नहीं, समस्त प्राणी जगत में व्याप्त है।
उदाहरण:
धांय-धांय गोले चले, टैंक हो गए ध्वस्त।
पाकिस्तानी सूर्य झट, सहम हो गया अस्त।।
वीभत्सः
घृणित वस्तुओं को देख, सुन जुगुप्सा नामक स्थाई भाव विभाव, अनुभाव, संचारी भावों के सहयोग से परिपक्व हो वीभत्स रस में परिणत हो जाता है। इसकी विशेषता तीव्रता से प्रभावित करना है। आचार्य विश्वनाथ के अनुसार वीभत्स रस का स्थाई भाव जुगुप्सा है। इसके आलंबन दुर्गंध, मांस-रक्त है, इनमें कीड़े पड़ना उद्दीपन, मोह आवेग व्याधि ,मरण आदि व्यभिचारी भाव है, अनुभाव की कोई सीमा नहीं है। वाचित अनुभाव के रूप में छिँछी की ध्वनि, अपशब्द, निंदा करना आदि, कायिक अनुभावों में नाक-भौं चढ़ाना , थूकना, आँखें बंद करना, कान पर हाथ रखना, ठोकर मारना आदि हैं।
उदाहरण:
हा, पशुओं की लाश को, नोचें कौए गिद्ध। ‌
हा, जनता का खून पी, नेता अफसर सिद्ध।।
अद्भुतः
अद्भुत रस के स्थाई भाव विस्मय में मानव की आदिम वृत्ति खेल-तमाशे या कला-कौशल से उत्पन्न विस्मय उदात्त भाव है। ऐसी शक्तियां और व्यंजना जिसमें चमत्कार प्रधान हो वह अद्भुत रस से संबंधित है। अदभुत रस विस्मयकारी घटनाओं, वस्तुओं, व्यक्तियों तथा उनके चमत्कार कोके क्रिया-कलापों के आलंबन से प्रकट होता है। उनके अद्भुत व्यापार, घटनाएँ, परिस्थितियाँ आदि उद्दीपन बनती हैं। आँखें खुली रह जाना, एकटक देखना प्रसन्नता, रोमांच, कंपन, स्वेद आदि अनुभाव सहज ही प्रकट होते हैं। उत्सुकता, जिज्ञासा, आवेग, भ्रम, हर्ष, मति, गर्व, जड़ता, धैर्य, आशंका, चिंता आदि संचारी भाव धारणकर अद्भुत रस में परिणत हो जाता है।
उदाहरण:
पल में प्रगटे सामने, पल में होता लुप्त।
अट्टहास करता असुर, लखन पड़े चित सुप्त।।
शांतः
शांत रस की उत्पत्ति तत्वभाव व वैराग्य से होती है। विभाव, अनुभाव व संचारी भावों से संयोग से हृदय में विद्यमान निर्वेद स्थाई भाव स्पष्ट होकर शांत रस में परिणित हो जाता है। आनंदवर्धन ने तृष्णा और सुख को शांत रस का स्थाई भाव कहा है। वैराग्यजनित आध्यात्मिक भाव शांत रस का विषय है संसार की अवस्था मृत्यु-जरा आदि इसके आलंबन हैं। जीवन की अनित्यता का अनुभाव, सत्संग-धार्मिक ग्रंथ पठन-श्रवण आदि उद्दीपन विभाव, और संयम स्वार्थ त्याग सत्संग गृहत्याग स्वाध्याय आत्म चिंतन आदि अनुभाव हैं। शांत रस के संचारी में ग्लानि, घृणा ,हर्ष , स्मृति ,संयोग ,विश्वास, आशा दैन्य आदि की परिगणना की जा सकती है।
उदाहरण:
कल तक था अनुराग पर, उपजा आज विराग।
चीवर पहने चल दिया, भिक्षुक माया त्याग।।
वात्सल्यः
वात्सल्य रस के प्रतिष्ठा विश्वनाथ ने की। सूर, तुलसी आदि के काव्य में वात्सल्य भाव के सुंदर विवेचन पश्चात इसे रस स्वीकार कर लिया गया। वात्सल्य रस का स्थाई भाव वत्सलता है। बच्चों की तोतली बोली, उनकी किलकारियाँ, लीलाएँ उद्दीपन है। माता-पिता का बच्चों पर बलिहारी जाना, आनंदित होना, हँसना, उन्हें आशीष देना आदि इसके अनुभाव कहे जा सकते हैं। आवेग, तीव्रता, जड़ता, रोमांच, स्वेद आदि संचारी भाव हैं।वात्सल्य रस के दो भेद हैं।
१ संयोग वात्सल्य
उदाहरण:
छौने को दिल से लगा, हिरनी चाटे खाल। ‌
पिला रही पय मनाती, चिरजीवी हो लाल।।
२ वियोग वात्सल्य
उदाहरण:
चपल छिपा कह खोज ले, मैया करें प्रतीति।
लाल कंस को मारकर, बना रहा नव रीति।।
भक्तिः
संस्कृत साहित्य में व्यक्ति की सत्ता स्वतंत्र रूप से नहीं है। मध्यकालीन भक्त कवियों की भक्ति भावना देखते हुए इसे स्वतंत्र रस के रूप में व्यंजित किया गया। इस रस का संबंध मानव उच्च नैतिक आध्यात्मिकता से है।इसका स्थाई भाव ईश्वर के प्रति रति या प्रेम है। भगवान के प्रति समर्पण, कथा श्रवण, दया आदि उद्दीपन विभाव है। अनुभाव के रूप में सेवा अर्चना कीर्तन वंदना गुणगान प्रशंसा आदि हैं। अनेक कायिक, वाचिक, स्वेद आदि अनुभाव हैं। संचारी रूप में हर्ष, आशा, गर्व, स्तुति, धैर्य, संतोष आदि अनेक भाव संचरण करते हैं।इसमें आलंबन ईश्वर और आश्रय उस ईश्वर के प्रेम के अनुरूप मन है |
उदाहरण:
चित्र गुप्त है नाथ का, सभी नाथ के चित्र।
हैं अनाथ के नाथ भी, दीन जनों के मित्र।।
***
गीत 
चिरैया!
आ, चहचहा
*
द्वार सूना
टेरता है।
राह तोता
हेरता है।
बाज कपटी
ताक नभ से-
डाल फंदा
घेरता है।
सँभलकर चल
लगा पाए,
ना जमाना
कहकहा।
चिरैया!
आ, चहचहा
*
चिरैया
माँ की निशानी
चिरैया
माँ की कहानी
कह रही
बदले समय में
चिरैया
कर निगहबानी
मनो रमा है
मन हमेशा
याद सिरहाने
तहा
चिरैया!
आ चहचहा
*
तौल री पर
हारना मत।
हौसलों को
मारना मत।
मत ठिठकना,
मत बहकना-
ख्वाब अपने
गाड़ना मत।
ज्योत्सना
सँग महमहा
चिरैया!
आ, चहचहा
*
२१-८-२०१९
मुक्तिका
मन
*
सूर्यमुखी बन
झूम-झूम मन
पर्वत सा जड़
हो न व्यर्थ तन
बिजुरी-बादल
सँग हो सावन
सिहर-बिखर लख
पायल-करधन
गा कबीर हो
हर दिन फागुन
है जीवनधन
ही जीवनधन
सुख पा देकर
जोड़ न कंचन
श्वास-श्वास कर
मधुमय मधुवन
४-२-२०२०
***
दोहा,
छंदोंवाले राग ने, छीना मन का चैन।
तन्मय मन उन्मन हुआ, रुद्ध हो गए बैन।।
४.२.२०१८ 
***
विमर्श - जौहर
संध्या सिंह-
न इतिहास के गौरव से प्रभावित न भविष्य के पतन से आशंकित ...... तटस्थ हो कर आप सबसे एक प्रश्न ;;;कितने लोग बदलती विचारधारा के परिपेक्ष्य में जौहर को आज भी वाजिब कहेंगे ...और महिमामंडित करेंगे .. ...और स्त्री को अस्मिता पर हमले के समय जौहर का सुझाव देंगे ?????
संजीव-
जौहर ऐसा साहस है जो हर कोई नहीं कर सकता. जौहर का सती प्रथा से कोई संबंध नहीं था.
जौहर विधर्मी स्वदेशी सेनाओं की पराजय के बाद शत्रुओं के हाथों में पड़कर बलात्कृत होने से बचने के लिए परजिर सैनिकों कि पत्नियों द्वारा स्वेच्छा से किया जाता था जबकि पति की मृत्यु होने पर पत्नि स्वेच्छा से प्राण त्याग कर सती होती थी. दोनों में कोई समानता नहीं है.
स्मरण हो जौहर अकेली पद्मिनी ने नहीं किया था. एक नारी के सम्मान पर आघात का प्रतिकार १५००० नारियों ने आत्मदाह कर किया जबकि उनके जीवन साथी लड़ते-लड़ते मर गए थे. ऐसा वीरोचित उदाहरण अन्य नहीं है. जब कोई अन्य उपाय शेष न रहे तब मानवीय अस्मिता और आत्म-गरिमा खोकर जीने से बेहतर आत्माहुति होती है. इसमें कोई संदेह नहीं है. ऐसे भी लाखों भारतीय स्त्री-पुरुष हैं जिन्होंने मुग़ल आक्रान्ताओं के सामने घुटने टेक दिए और आज के मुसलमानों को जन्म दिया जो आज भी भारत नहीं मक्का-मदीना को तीर्थ मानते हैं, जन गण मन गाने से परहेज करते हैं. ऐसे प्रसंगों पर इस तरह के प्रश्न जो प्रष्ठभूमि से हटकर हों, आहत करते हैं. एक संवेदनशील विदुषी से यह अपेक्षा नहीं होती. प्रश्न ऐसा हो जो पूर्ण घटना और चरित्रों के साथ न्याय करे.
आज भी यदि ऐसी परिस्थिति बनेगी तो ऐसा ही किया जाना उचित होगा. परिस्थिति विशेष में कोई अन्य मार्ग न रहने पर प्राण को दाँव पर लगाना बलिदान होता है. जौहर करनेवाली रानी पद्मिनी हों, या देश कि आज़ादी के लिए प्राण गँवानेवाले क्रांन्तिकारी या भ्रष्टाचार मिटाने हेतु आमरण अनशन करनेवाले अन्ना सब का कार्य अप्रतिम और अनुकरणीय है.
***
मुक्तक
कल्पना के बिना खेल होता नहीं
शब्द का शब्द से मेल होता यहीं
गिर 'सलिल' पर हुईं बिजलियाँ लुप्त खुद
कलप ना, कलपना व्यर्थ होता कहीं?
*
आ भा कहते, आ भा सुनते, आभा चेहरे की बदल गयी
आभा आई-छाई मुख पर, आभा चेहरे की नवल हुई
आते-आते, भाते-भाते, कल बेकल हो फिर चपल हुई
कलकल किलकिल हो विकल हुई, अविचल होकर हँस मचल गयी
***
मुक्तिका
*
नाजनीं को नमन मुस्कुरा दीजिए
मशविरा है बिजलियाँ गिरा दीजिए
*
चिलमनों के न पीछे से अब वार हो
आँख से आँख बरबस मिला दीजिए
*
कल्पना ही सही, क्या बुरा है अगर
प्रेरणा बन के आगे बढ़ा दीजिए
*
जो खलिश दिल में बाकी रही उम्र भर
ले के बाँहों में मुझको सजा दीजिए
*
कांता के हुए कांत अब तो 'सलिल'
बैठ पलकों पे उनको बिठा दीजिए
***
कुंडलिया
जिस पर बिजली गिर गई, वह तो बैठा शांत
गिरा रहे जो वे हुए, अपने आप अशांत
अपने आप अशांत बढ़ा बैठे ब्लड प्रेशर
करें कल्पना हुए, लाल कश्मीरी केसर
'सलिल' हुआ है मुग्ध, अनूठा रूप देखकर
वही हुआ है दग्ध, गिरी बिजली खुद जिस पर।।
४-२-२०१७
***
गीत:
संग समय के...'
*
*
संग समय के चलती रहती सतत घड़ी.
रहे अखंडित कालचक्र की मौन कड़ी.....
*
छोटी-छोटी खुशियाँ मिलकर जी पायें.
पीर-दर्द सह आँसू हँसकर पी पायें..
सभी युगों में लगी दृगों से रही झड़ी.....
*
अंकुर, पल्लव, कली, फूल, फल, बीज बना.
सीख न पाया झुकना तरुवर रहा तना।
तूफां ने आ शीश झुकाया व्यथा बड़ी.....
*
दूब डूब जाती पानी में- मुस्काती.
जड़ें जमा माटी में, रक्षे हरियाती..
बरगद बब्बा बोले रखना जड़ें गडी.....
*
वृक्ष मौलश्री किसको हेरे एकाकी.
ध्यान लगा खो गया, नगर अब भी बाकी..
'ओ! सो मत', ओशो कहते: 'तज सोच सड़ी'.....
*
शैशव यौवन संग बुढ़ापा टहल रहा.
मचल रही अभिलाषा देखे, बहल रहा..
रुक, झुक, चुक मत, आगे बढ़ ले 'सलिल' छड़ी.....
४-२-२०१३
***

गरिमा सक्सेना, नवगीत, समीक्षा

 समीक्षा :

''है छिपा सूरज कहाँ पर'' : खोजिए नवगीत में
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल"
*
[कृति विवरण : है छिपा सूरज कहाँ पर, नवगीत संग्रह, गरिमा सक्सेना, प्रथम संस्करण २०१९, आई.एस.बी.एन. ९७८९३८८९४६१७९, आकार २२ से.मी. x १४.से.मी., आवरण बहुरंगी सजिल्द लेमिनेटेड जैकेट सहित, पृष्ठ १३६, मूल्य २००/-, बेस्ट बुक बडीज टेक्नोलॉजीस प्रा। लि. नई दिल्ली, कृतिकार संपर्क : २१२ ए ब्लॉक, सेंचुरी सरस् अपार्टमनत, अनंतपुरा मार्ग, यलहंका, बेंगलोर ५६००६४, चलभाष ७६९४९२८४४८, ईमेल : garimasaxena1990@gmail.com ]
*
साहित्य समाज का समय सापेक्ष दर्पण है जिसमें उज्जवल-मलिन छवि बिना किसी लाग-लपेट के देखी जा सकती है। साहित्य स्वयं पूरी तरह निरपेक्ष होता है किन्तु साहित्यकार प्राय: तटस्थ नहीं होता। हर रचनाकार की अपनी मान्यताएँ और प्रतिबद्धताएँ होती हैं। साहित्य भाषा, अनुभूति और भाव की त्रिवेणी है जिओ सतत प्रवाहित हो तो निर्मल और किसी प्रतिबद्धता के कुएँ में कैद होकर मलिन हो जाती है। साहित्य लेखन, पठान और समीक्षण तीनों स्तरों पर गतागत का संघर्ष स्वाभाविक है। साहित्यकार जिन्हें पढ़कर लिखने सीखता है, सीखते ही उनसे भिन्न पथ पर जाता है किन्तु किसी वैचारिक खूँटे से बँधे स्वयंभूजन उसे नकारने या अपने खेमे में खींचने-घसीटने का प्रयास करते हैं। समय, भाषा और साहित्य सतत परिवर्तनशील होता है किन्तु ये तथाकथित प्रतिबद्ध मठाधीश परिवर्तन को नकारकर अपनी मान्यताओं को थोपकर खुद को धन्य अनुभव करते हैं। समाज के युवा जनों को आकर्षित करती विधाएँ नवगीत, व्यंग्य लेख हुए लघुकथा के क्षेत्र में यह द्व्न्द सहज दृष्टव्य है।
नवोदित नवगीतकार रचना सक्सेना इस सबसे परिचित होकर भी किसी खेमे में कैद न होकर बेबाकी से अपनी अनुभूतियों को नवगीत में अभिव्यक्त कर सकी हैं, इसके लिए उन्हें सराहा जाना चाहिए। डॉ. कुंअर बेचैन ने ठीक ही लिखा है "जैसे बागों में हर वर्ष पतझर का मौसम भी आता है और वसंत का भी, पतझर में पुराने पत्ते झर जाते हैं और फिर नई कोंपलें आती हैं। ऐसे ही हमारे जीवन में उम्र और परिस्थिति के अलग-अलग पड़ावों पर हमारे भाव, हमारे विचार, हमारी जीवन शैली, हमारे भाषा-व्यवहार और अगर हम साहित्य से जुड़े रचनाकार हैं तो कुछ नया करने का भाव भी बदलता जाता है। गीतकार का मन भी एक वृक्ष की तरह होता है, उस पर भी भावनाओं-अनुभूतियों और उनकी शब्दाभिव्यक्तियों के नए-नए रूप जैसे प्रतीकों की नवीनता, बिम्बों की नवीनता और गीतों के आकार का स्वरूप आदि बदलते जाते हैं। यह नव्यता ही गीत को नवगीत की ओर ले जाती है।" नवगीत के उद्भव से अब तक नवगीतकारों के कथ्य और शिल्प में यह बदलाव सहज दृष्टव्य है। गरिमा के नवगीत इस बदलाव के साक्षी हैं।
गरिमा के व्यक्तित्व में भाव पक्ष और बुद्धि पक्ष के सहल-सार्थक तालमेल की उपज हैं ये नवगीत। गरिमा के शब्दों में "गीत वही है जो किसी एक ह्रदय से उपजकर हर ह्रदय का स्वर स्वत्: ही बन जाये। अधिक निजी पैन लिए गीत या अत्यधिक क्लिष्ट गीत आमजन के मन तक नहीं पहुँच पाते क्योंकि उनका संबंध लोक से स्थापित नहीं हो पता है, न ही वे आम जन के लिए उपयोगी हो पते हैं। गीत का विस्तार तभी हो पायेगा जब गीत समाज में वर्तमान की व्याप्तियों को अभिव्यक्त कर पाएंगे और सबकी पीड़ा का आभास कर सकेंगे और गीत का प्रयोजन तब पूर्ण होगा जब न केवल घाव को इंगित करें बल्कि उन घावों पर समाधान का मरहम भी लगाने का प्रयत्न करें। ऐसे में गीत को सामाजिक यथार्थ को समझना होगा, वह भी गीत के शिल्प, लय, गेयता, भाव आदि विशिष्टताओं को बचाते हुए।"
'है छिपा सूरज कहाँ पर' के गीत तिमिर से भयाक्रांत नहीं हैं। वे तमस की भयावहता का चित्रण कर रुकते भी नहीं, वे अँधेरे में भटकते भी नहीं अपितु उजास देने या राह तलाशने की कोशिश करते हैं। समाज में व्याप्त असंगति का संकेत संकलन के आरम्भ में ही है-
है बदलता आस में पन्ने कलेंडर
पर छाला जाता है बस प्रस्ताव से
ताख पर सिद्धांत
धन की चाह भारी
हो गया है आज
आँगन भी जुआरी
रोज ही गंदला रहा है आँख का जल
स्वार्थ ईर्ष्या के हुए ठहराव से
प्रतिबद्ध रचनाकारों के नवगीत इस ठहराव के आगे नहीं बढ़ पाते क्योंकि उनकी यह मान्यता है की नवगीत वैषम्य धर्मा है, दिशा दर्शन या पीर-हरण से नवगीत को कुछ लेना-देना नहीं है। मेरी कृतियों 'काल है संक्रांति का' और 'सड़क पर' को इसी पूर्वाग्रही दृष्टिका शिकार होना पड़ा। मैं देख पाता हूँ कि मुखपोथी (फेसबुक) पर उदित हो रही नई कलमें ही नहीं नवगीतकारों की प्रतिष्ठित हो रही नई पीढ़ी जिसमें संध्या सिंह, अशोक गीते, मधु प्रधान, मधु प्रसाद, पूर्णिमा बर्मन, जयप्रकाश श्रीवास्तव, बृजमोहन श्रीवास्तव, डॉ. गोपाल कृष्ण भट्ट 'आकुल', रामशंकर वर्मा, डॉ. प्रदीप शुक्ल, शीला पाण्डे, डॉ. रंजना गुप्ता, बसंत शर्मा, अविनाश ब्योहार, रविशंकर मिश्र, धीरज श्रीवास्तव, कृष्ण 'शलभ', छाया सक्सेना आदि भी अपने नवगीतों में सांत्वना, सहानुभूति और सामाजिक सरोकारों को सुदृढ़ करने के स्वर घोल रहे हैं। विडम्बना है कि इनमें से अधिकांश को नवगीत कोष में स्थान नहीं मिला है। कारण उनसे अपिरचय हो या उनकी अवहेलना नवगीत के लिए दोनों ही दृष्टियों से परिवर्तन की पदचाप को अनसुना किया जाना हितकर नहीं है। गरिमा के नवगीत 'समाधान के गीत' लिखकर इस पीढ़ी का प्रतिनिधि स्वर बन पाती है-
हरे-भरे जीवन के पत्ते
हुए जा रहे पीत
आओ हम सब मिलकर गायें
समाधान के गीत
अँधियारे पर कलम चलकर
सूरज नया उगायें
उम्मीदों के पंखों को
विस्तृत आकाश थमायें
चलो हाय-तौबा की, डर की
आज गिरायें भीत
इन गीतों में सामाजिक वैषम्य को विविध बिम्बों, रूपकों और उपमाओं के माध्यम से व्यक्त किया गया है- 'गाँवों के भी मन-मन अब / उग आये हैं शूल / देख चकित हो रहा बबूल', 'बने बिजूके हम सब / वर्षों से चुपचाप ख़डे', 'रेत हो रही नदियाँ / खोया कल-कल का उल्लास', 'क्षरित हुए संबंध नेह के / जीवन के बदलावों से, 'इस सूखे में बीज न पनपे / फिर जीवन से ठना युद्ध है', सुर्ख लावा हो गए हैं / पाँव तपती रेत में', 'वृद्धाश्रम में माँ बेटे की / राह देखती', 'हम अधीन हो गए / सफल हो गया नियोजन', 'धन अर्जित कर सहे जा रहे / निज मूल्यों की मंदी हम', 'राजमार्ग पर सपने सजते / पगडंडी का घाव हरा है', 'ओझल मुद्दों को करना है / हंगामा इसलिए जरूरी', 'राजनीति ने छला हमेशा / नदियों का विश्वास', 'क्षरित हुई ओज़ोन / बनी भू गरम कड़ाही है', 'नख से शिख तक है भ्रष्ट तंत्र / रो-रोकर कहते बाबूजी', सदा सियासत करते रहती / समझौंतों की ता-ता-थैया, आदि आदि पंक्तियों में देश-काल को विविध दृष्टियों से निरख-परख कर यत्र-तत्र ही नहीं सर्वत्र व्याप गयी विसंगतियों का लेखा-जोखा इन नवगीतों के सर्जक की सजगता शब्द-शब्द में निहित है।
गीतों में अंतर्व्याप्त दूसरा तत्व है इन विसंगतियों के प्रति चेतना जागना। प्रथम चरण में विसंगतियों का आकलन तो हो गया यदि उस आकलन पर चिंतन न हो तो आकलन करना उद्देश्यहीन हो जायेगा। ' ढल रहा जो वक़्त / उसकी चाल का स्वर / कह रहा है आगमन का / वक़्त बदतर', 'कब खुलेंगी, धूप देने खिड़कियाँ / मौत का माहौल हैँ', 'हम बिन आखिर प्रतिरोधों के / अक्षर कौन गढ़े', कब तलक हम बरगदों की / छाँव में पलते रहेंगे', 'कोहरे की बढ़ गयी हैं टहनियाँ / मौत का माहौल है', 'पोखर-नाले भी करते हैं / अब उसका उपहास', 'जीवन के सच बतलाते हैं दाग पड़े गहरे / मगर बने प्रोफ़ाइल पिक्चर / दाग मुक्त चेहरे', 'क्षरित हुए संबंध नेह के / जीवन के बदलावों से', 'धन की कमी कहीं अच्छी थी / मन को मिले अभावों से', 'घायल कंधे, मन है व्याकुल / स्वप्न पराजित, समय क्रुद्ध है', 'मैं ही क्यूँ? मेरे हिस्से क्यूँ? / सोचूँ लिखा मुश्किल ढोना', 'नैन मूंदकर बोलबो कब तक / पूजोगे तुम पाहुन को', 'सोच रहे है सुता -भाग्य में / क्यों लिक्खी है सिर्फ रसोई' आदि अभिव्यक्तियाँ केवल विसंगति का शब्दांकन नहीं करतीं उनके प्रति असंतोष को मुखर कर परिवर्तन की चेतना जगाती हैं।
गरिमा सक्सेना के नवगीत जिस तीसरे तत्व को मुखर करते हैं वह है विसगंतियों के आकलन से उपजी चेतना को बदलाव में बदलने का आव्हान या विसंगतियों की प्रतिक्रियावत उपजे प्रश्न। इस अंतर्वस्तु को उद्घाटित करती कुछ पंक्तियाँ देखें - 'हरे-भरे जीवन के पत्ते / हुए जा रहे पीत / आओ हम सब मिलकर गायें / समाधान के गीत', 'कब खुलेंगी, धूप देने खिड़कियाँ?', 'हम बिन आखिर प्रतिरोधों के / अक्षर कौन गढ़े', 'कैसे मानें सत्य, ट्रेंड में जब / जुमला है', 'आओ मिलकर आज लगायें / खुशियों की दो-चार फसल', 'कौन लड़ा है किसकी खातिर / खुद ही लड़ना है', चूक गया सूरज गगन का / अब उजाला कौन देगा?' आदि पंक्तियों से पाठक की मन:स्थिति परिवर्तन हेतु तत्पर होने की बनती है।
ये नवगीत आव्हान मात्र को भी पर्याप्त नहीं मानते। वे उपचार और समाधान भी सुझाते हैं- 'जी रहा जो वृहनला का / रूप धरकर / यदि जगे उस पार्थ के / गांडीव का स्वर / तो सुरक्षित हो सकेगा देश अपना / स्वयं पर ही हो रहे पथराव से', 'अँधियारे पर कलम चलकर / सूरज नया उगायें / उम्मीदों के पंखों को / विस्तृत आकाश थमायें / चलो हाय-तौबा की, डर की / आज गिरायें भीत', 'आग खोजें, कँपकँपाती हड्डियाँ', 'ढूँढ़ते हैं / है छिपा सूरज कहाँ पर .... चेतते हैं जड़ों की जकड़न छुड़ाकर ... चीखते हैं / आइए संयम भुलाकर। ... तोड़ते हैं स्वयं पर हावी हुआ डर ...', 'कुहरे का गुब्बारा / छेड़ गयी पिन / चीर निकल आई हैं / किरणें कमसिन ... साहस ने काट लिए पतझड़ के दिन', 'कूकने है लगी कोयल / देख ऋतु मधुमास की', 'हमें हमारी चिंता खुद ही / करनी होगी / कब तक मन का क्रोध रहेगा / सुविधा भोगी', नए वर्ष में जारी रक्खें / उम्मीदों की चहल-पहल', कब तक हम दीपक बालेंगे / हमको सूर्य उगाना होगा' आदि पंक्तियों में गरिमा परिवर्तन की अभिलाष को संकल्प तक ले जाती हैं।
नवगीतकारों की नयी पीढ़ी नवगीतों को 'अरण्य रोदन' मात्र न बनाकर उन्हें मांगलिक परिवर्तन और शुभत्व से जोड़ रहे है। यह स्वर १९८० से २०१० के मध्य जवाहर लाल चौरसिया 'तरुण' के नवगीतों में था किन्तु तब नवगीतों को वैषम्य चित्रण तक सीमित रखने की जिद ने उन्हें नवगीत की परिधि में स्वीकार नहीं किया। अब नवगीतकारों की नई पीढ़ी नवगीत का सीमा विस्तार कर उसे विसंगति, विसंगति की प्रतीति, प्रतीति से उपजा आक्रोश और आक्रोश से परिवर्तन के संकल्प तक ले जा रही है। गरिमा सक्सेना के शब्दों में -
हवा आज आई है
लाल किले से होकर
बोल रही है नव विकास का
द्वार खुला है
यही नहीं गरिमा एक कदम और आगे बढ़कर परिवर्तन असफल न रह जाए, इसके प्रति भी चेताती हैं। संपूर्ण क्रांति और अन्ना आंदोलन की परिणति को देखते हुए गरिमा का यह चिंतन यथार्थवादी ही कहा जायेगा।
देखना फिर उग न आएँ
नागफनियाँ खेत में
इस कृति में वैचारिक दृष्टि से एक और नवाचार है। अन्न का मोल रुपये से नहीं चुकाया जा सकता। वास्तव में रूपया ममता, शिक्षा, स्नेह, श्रम, त्याग, समर्पण किसी का मोल नहीं चुका सकता।
नहीं अन्न का मोल रुपैया
अन्न बड़ी मेहनत से उगता
इसे उगाने की खातिर ही
कोई धूप, शीत सब सहता
कथ्य में नवता के साथ इस संकलन के नवगीत भाषिक दृष्टी से सटीक शब्दों का चयन कर रचे गए हैं। गरिमा की पारिवारिक पृष्ठभूमि और शिक्षा उन्हें प्रचुरशब्द संपदा और सांस्कारिक भाषा संपन्न बनाती है , यह समृद्धि नवगीतों में झलकती है।
'है छिपा सूरज कहाँ पर' के गीत छंद वैविध्य की दृष्टि से प्रयोगधर्मिता कम है। पारंपरिक छंदों का प्रयोग प्रचुरता से किया गया है। सामान्यत: चार पंक्तियों के तीन अंतरों का प्रयोग कर गीत रचे गए हैं। मुखड़े में २ से ५ पंक्तियों का प्रयोग है। मात्रिक छंदों पर आधृत इन गीतों में लयबढ़ता और गेयता चारुत्व वृद्धि करती है। छंद वैविध्य ने इन नवगीतों की सरसता वृद्धि की है। कुछ उदाहरण देखें-
सरसी छंद
हरे-भरे जीवन के पत्ते,
हुए जा रहे पीत
आओ हम सब मिलकर गायें
समाधान के गीत
पादाकुलक छंद
अम्मा आँखों के स्याही से
नया नहीं कुछ लिख पाती हैं
विष्णुपद छंद
जहाँ कभी थीं हरसिंगार की
टेसू की बातें
चम्पा, बेली के संग कटतीं
थीं प्यारी रातें
अवतारी जातीय छंद
सदियों तक जो
शक्ति रही है जन जीवन की
तट को सींचा, प्यास बुझाई
जिसने तन की
चौपाई छंद
सुता किसी की ब्याह योग्य है
कहीं बीज का कर्जा भरी
जुआ किसानी हुआ गाँव में
मदद नहीं कोई सरकारी
सर्व विदित है कि चन्द्रमा में भी दाग होते हैं। ''है छिपा सूरज कहीं पर'' में क्रिया रूपों में समरूपता नहीं है। यथा - गायें पृष्ठ ३३, वर्जनाएँ पृष्ठ ४६, आई पृष्ठ ४७ , आयी पृष्ठ ७५, भायी पृष्ठ ४९, हुए पृष्ठ ५५ , गए पृष्ठ ५९, नई पृष्ठ ५१, तुरपाई पृष्ठ ६८, बुझायी पृष्ठ ७० आदि। अशुद्ध शब्द प्रयोग दुक्ख पृष्ठ ८२, रक्खें ८५। लिंग दोष - ऊपर से शिक्षा ऋण का / युवकों को गड़ती पिन।
दोहा संग्रह 'दिखते नहीं निशान' के पश्चात् यह गरिमा सक्सेना की दूसरी प्रकाशित कृति है। 'है छिपा सूरज कहीं पर' के नवगीत उनकी कारयित्री प्रतिभा को प्रमाणित करते हैं। यह कृति नवगीत में नवाचार की दृष्टी से महत्वपूर्ण है और नवगीत के नव आयामों में ले जाने में सक्षम है। गरिमा के अगले नवगीत संग्रह की प्रतीक्षा की जाएगी।
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[संपर्क : आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', सभापति विश्ववाणी हिंदी संसथान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, जबलपुर ४८२००१, चलभाष ७९९९५५९६१८, salil.sanjiv@gmail.com ]

शनिवार, 3 फ़रवरी 2024

गोंड़ी लोक कथा नरबदिया

गोंड़ी लोक कथा
नरबदिया
*
                        सतपुड़ा में एक पर्वत है मेकल। मेकल पर्वत के सघन जंगल में कहीं-कहीं कुछ झोपड़ियों की छोटी-छोटी बस्तियाँ थीं। एक बस्ती में दुग्गन नामक एक गोंड़ आदिवासी रहता था। उसकी एक लड़की थी जिसका नाम नरबदिया था। नरबदिया के जन्म के समय ही उसकी माँ की मृत्यु हो गई थी। दुग्गन को बिना आयाल (माँ) की पुत्री नरबदिया से बहुत प्रेम था। नरबदिया ने जन्म के बाद केवल पिता को ही देखा था। वह पूरे समय पिता के साथ रहती थी। बरसात आने को हुई तो दुग्गन को अपनी झोपड़ी की चिंता हुई जिसके छप्पर में हुए छेदों से जगह-जगह पर सूरज की धूप झाँककर जमीन पर सुनहरे चित्र बना रही थी।

                        बस्ती के पास के जंगल में छोटे-पतले बाँस थे लेकिन दुग्गन को मोटे-लंबे बाँस चाहिए थे। ऐसे बाँस दूर मेकल पर्वत की चोटी के जंगल में ही मिल सकते थे। दुग्गन ने मेकल पर्वत के जंगल में जाकर बाँस लाने का फैसला किया। समस्या यह थी कि बेटी नरबदिया को अकेले कहाँ छोड़े। आस-पास की झोपड़ियों में रहने वाले पड़ोसी जंगली फल-फूल, घास यदि लेने जंगल जा चुके थे। दुग्गन ने नरबदिया को अकेली छोड़ना सुरक्षित नहीं लगा, किसी जंगली जानवर के आने पर नरबदिया अपने को कैसे बचाएगी? यह सोचकर दुग्गन ने नरबदिया को साथ लेकर जंगल जाने का फैसला किया।

                        दोनों पिता-पुत्री मेकल पर्वत की ओर चल दिए। धीरे-धीरे चलते हुए दोपहर होने लगी, नरबदिया थकने लगी, वह छोटे-छोटे कदम रख रही थी, उसके कारण दुग्गन की चाल भी धीमी थी। नरबदिया को प्यास लगने लगी किंतु वह धैर्य रखते हुए पिता के साथ आगे बढ़ती रही। कुछ देर बाद उसका गला सूखने लगा, उसे बहुत अधिक व्याकुल देखकर दुग्गन भी विचलित होने लगा। कुछ दूर पर्वत की चोटी पर मोटे-ऊँचे बाँस दिखाई दे रहे थे किंतु नरबदिया वहाँ तक जा पाने में समर्थ नहीं थी। इसलिए दुग्गन ने उसे दुलारकर एक वट वृक्ष की छाँह में लिटा दिया और कहा कि तुम यहाँ सुस्ता लो। मैं जल्दी से काटकर बाँस और तुम्हारे खाने के लिए फल तोड़कर लाता हूँ। 

                        दुग्गन पर्वत पर चढ़ रहा था। सूरज अपनी तेज किरणों से धरा को तपा रहा था। दुग्गन पर भी थकान हावी हो रही थी, उसका गला सूखने लगा पर वह रुका नहीं बढ़ता रहा ताकि रात होने से पहले गाँव लौट सके। थोड़ी देर बाद उसका सिर चकराने लगा। वह अशक्त होकर बैठ गया। मन में विचार आया कि मुझे यातना अधिक कष्ट हो रहा है तो नन्हीं सी नरबदिया ने कैसे सहन किया होगा? उसकी पीड़ा बढ़ी तो नहीं? मैं भी कैसा मूरख हूँ जो उसे ले आया और अकेला छोड़ दिया। उसने आकाश की ओर देखकर बड़ा देव (महादेव जी) को याद किया- 'हे  बड़ा देव! मेरी प्रार्थना सुनो कि मेरी लाड़ली बेटी नरबदिया बिना माता की है, उसे कुछ न हो। उसे पीड़ा से मुक्त कर दो भोलेनाथ!। उस पर कृपा करो।  

                        दूसरी ओर नरबदिया प्यास के कारण अचेतप्राय होने लगी। उसने भी पिता से पाए संस्कारों के अनुसार बाददेव को सुरते हुए आकाश की ओर देख कार हाथ जोड़े और आँखें मूँदकर एकाग्र चित्त प्रार्थना की हे बड़ादेव! मुझ बच्ची पर कृपया करो। मेरे पिता कितना कष्ट उठाकर बाँस लेने गए हैं। उनकी पीड़ा दूर कर दो। मेरे कारण उनको देर हो गई। मुझसे प्यास सही नहीं जा रही है। हे भगवान! मुझे ऐसी ताकत दे दो कि मैं सबकी प्यास बुझा सकूँ। कोई भी प्यास न रहे। मेरे पिता को मेरी चिंता न करना पड़े। अर्ध चेतन अवस्था में  नरबदिया प्रार्थना करती रही। उसे ऐसा लगा कि बड़ादेव और मैया उसे दुलार रहे हैं। 

                       दुग्गन कुछ देर सुध-बुध भुला पड़ा रहा। धीरे-धीरे उसे चेत आया। वह नरबदिया की चिंता कर उसे झाड़ के नीचे पहुँचा जहाँ वह उसे लिटा गया था। नरबदिया वहाँ नहीं थी। दुग्गन घबराया, उसने चारों ओर देखा, जोर जोर से आवाज लगाई। इधर-उधर दौड़ता, पेड़ों के नीचे देखता, जमीन पर देखता कि कोई जानवर तो नहीं आ आया किंतु उसे किसी जानवर के आने के चिन्ह नहीं मिले। नरबदिया को रास्ता भी नहीं मालूम कि गाँव की ओर जा सके, फिर वह गई कहाँ? 'हे बड़ादेव!' उसने फिर प्रभु को पुकारा और नरबदिया को खोजने लगा। कुछ दूर जाने पर अचानक उसके कानों में कुछ आवाज सुनाई दी, पक्षी भी बोल रहे थे। वह समझ गया कि यह पानी बहने की आवाज है। उसने पूरी ताकत लगाकर नरबदिया को पुकारते हुए खोज तेज कर दी। पेड़ों के एक झुरमुट के पीछे उसे बहत हुआ पानी दिखा। दुग्गन ने फिर पुकारा मियाड (बिटिया) नरबदिया! कहाँ गई? जल्दी से आ। देख, पानी मिल गया। अब तू प्यासी नहीं रहेगी।' 

                        'बाबल! (पिता जी)' आवाज सुनकर दुग्गन चौंका। यह आवाज तो नरबदिया की थी। उसने चारों ओर देखा, कोई नहीं दिखा। उसने व्यथित होकर फिर आवाज लगाई मियाड नरबदिया! वह रोने लगा। 'बाबल! इधर देखो मैं नदी बन गई हूँ।' दुग्गन ने देखा नदी की धार उसके पास तक आ गई है। उसने झुककर चुल्लू में पानी भरा । उसमें उसे नरबदिया की झलक दिखी। 

                        'मियाड नरबदिया! तू नदी कैसे?' 

                        'बाबल! मैं बड़ादेव को पुकार रही थी कि मुझसे प्यास सही नहीं जा रही, आकर दूर कर दें।' बड़ादेव ने आकर मुझे उठाया और कहा कि अब से तू ही सबकी प्यास बुझाएगी, तुझे कभी प्यास नहीं लगेगी। तू बार-बार आयाल को याद करती है। अब से सब तुझमें अपनी आयाल देखेंगे। उसके बाद मेरे सिर पर हाथ फेरा तो मैं नदी बन गई। आओ! अपनी प्यास बुझा लो। तब से गोंड़ आदिवासी नर्मदा जी को मैया मानते हैं और उनकी पूजा करते हैं। 
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