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बुधवार, 24 जनवरी 2024

सलिल २४ जनवरी, चित्रगुप्त, बसंत पंचमी, सोरठा, मुक्तिका, लघुकथा, सॉनेट, प्रभात

सलिल सृजन २४ जनवरी
प्रश्न- अदालत झूठ-सच को कैसे पहचाने?
उत्तर-
हुई अदा लत झूठ की, सच से है परहेज।
क्यों न अदालत झूठ को, सच कह रखे सहेज।।
*
प्रश्न- अगला प्रधान मंत्री कौन? मोदी या योगी?
उत्तर-
मोदी-योगी भुलाकर, अपनी करिए फिक्र।
कुछ तो ऐसा कीजिए, सदियों तक हो जिक्र।।
*
सोरठा सलिला
कंठ करोड़ों वास, हिंदी जगवाणी नमन।
हर मन भरे उजास, हर जन हरि जन हो विहँस।।
हिंदी है रसवान, जी भरकर रस-पान कर।
हो रसनिधि रसलीन, बन रसज्ञ रसखान भी।।
हिंदी प्राची लाल, कर प्रकाश कहती उठो।
कलरव करे निहाल, नभ नापो आगे बढ़ो।।
नेह नर्मदा धार, हिंदी कलकल कर बहे।
बाँटे पाया प्यार, कभी नहीं कुछ भी गहे।।
सरला तरला वाक्, बोलें-सुनिए मुग्ध हों।
मौन न रहें अवाक्, गले मिलें मत दग्ध हों।।
२४-१-२०२३
•••

सॉनेट
शुभ प्रभात
*
सबका शुभ-मंगल करिए प्रभु!
हर चेहरे पर हो प्रसन्नता।
हृदय हृदय से मिले, खिले विभु!
कहीं न किंचित् हो विपन्नता।।
शरणागत हम राह दिखाओ।
मति दो सबके काम आ सकें।
भूल-चूक हर हँस बिसराओ।।
सबसे शुभ आशीष पा सकें।।
अहंकार हर, हर लो, हे हर!
डमडम डमरू नाद सुनाओ।
कार्य सधे सब हे अभ्यंकर!
गणपति-कार्तिक मंगल गाओ।
जगजननी ममता बरसाओ।
मन मंदिर से कहीं न जाओ।।
२४-१-२०२२
***

सोरठा सलिला
*
गुमी स्नेह की छाँव, नदिया रूठी गाँव से।
घायल युग के पाँव, छेद हुआ है नाव में।।
*
फूलों की मुस्कान, शूलों से है प्रताड़ित।
कली हुई बेजान, कभी रही जो सुवासित।।
*
हैं जिज्ञासु न आज, नादां दाना बन रहे।
राज न हो नाराज, कवि भी मुँह देखी कहे।।
*
देखें भ्रमित विकास, सिसकती अमराइयाँ।
पैर झेलते त्रास, एड़ी लिए बिमाइयाँ।।
*
जो नाजुक बेजान, जा बैठी शोकेस में।
थामे रही कमान, जो वह जीती रेस में।।
***
कृति चर्चा-
रस सागर - फागों ३३७ फागों की गागर
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
कृति विवरण - रस सागर, फाग संग्रह, संकलक-संपादक : भगीरथ शुक्ल 'योगी', तृतीय संस्करण, आवरण पेपरबैक बहुरंगी, पृष्ठ १६४, मूल्य ६०/-, प्रकाशक- खेमराज श्रीकृष्ण दास, श्री वैंकटेश्वर प्रेस, खेमराज श्रीकृष्ण दास मार्ग, मुंबई ४००००४।
*
भारत का तंत्र भले ही लोक को महत्व न दे किंतु भारत की संस्कृति लोक को ही प्रधानता देती है। लोक गाँवों में बसता है। 'भारत माता ग्रामवासिनी है। मानव सभ्यता के बढ़ते चरणों के साथ लोक जैसे-जैसे अस्तित्व में आता गया वैसे-वैसे लोक गीत, लोक संगीत और लोक नृत्य का उद्भव और विकास होता गया। भारतीय लोक मानस ने गीत-संगीत-नृत्य को केवल मनरंजन या बौद्धिक विलास का साधन नहीं माना अपितु इसे सामाजिक समरसता, सद्भाव, सहकार और आध्यात्मिक उन्नयन का स्रोत भी माना। ऋतुराज बसंत के आगमन के साथ विंध्याटवी ही नहीं समस्त भारत के ग्राम्यांचलों में लघ्वाकारी पदों की स्वर लहरी गूँजने लगती है। विविध अंचलों में भिन्न-भिन्न भाषाओँ में इन पदों के नाम भले ही अलग-अलग हों, उनमें लालित्य, चारुत्व, उत्साह, उल्लास और जीवंतता भरपूर होती है। मध्य और उत्तर भारत में ऐसे पदों में 'फाग' का स्थान अनन्य है।
विवेचय कृति हिंदी का प्रथम काव्य संग्रह है जिसमें ३३७ फागों का प्रकाशन हुआ है। फाग हमारी गौरवपूर्ण सांस्कृतिक लोक संस्कृति की अनमोल धरोहर है। फाग केवल मनबहलाव का साधन नहीं है, यह समस्या ग्रस्त जीवन में संघर्ष कर थके-हारे-टूटे जन-मन में नव चेतना, नव जागरण, उमंग और सामाजिक सहकार बढ़ानेवाला अमृत है। फाग सकल मनोमालिन्य को लोपकर जन-मन को निर्मल कर देता है। फाग के अनुष्ठान में गति-यति, स्वर-ताल और नाद की त्रिवेणी प्रवाहित होती है। फाग नर-नारी, संपन्न-विपणन, शिक्षित-अशिक्षित, उच्च-निम्न माँ भेद-भाव मिटाकर समानता और सद्भाव की नेह नर्मदा बहा देती है। फाग शब्द सुनते ही मन में फगुहारों की टोली, ढोलक पर पड़ती लयबद्ध थाप, मंजीरों को कारण प्रिय झंकार, गायकों की मधुर वाणी और नर्तकों के थिरकते पदों की स्मृति मन को प्रमुदित कर बरबस गुनगुनाने के लिए प्रवृत्त कर देती है।
शास्त्रीय संगीत के विपरीत लोक श्रेष्ठि वर्ग पर संगीत जन सामान्य को वरीयता देता है। फाग रचयिता कालजयी कवियों ने फागों में श्रृंगार (संयोग-वियोग), हास्य-व्यंग्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, वीभत्स, अद्भुत, शांत, वात्सल्य आदि रसों का सम्यक समावेशन कर फागों को अमर कर दिया है। सूर, कबीर, तुलसी, मीरा, ईसुरी आदि ने फागों को रस सागर बना दिया। संभवत:, पहली बार ३३७ फागों का संकलन-संपादन कर भगीरथ शुक्ल 'योगी' ने 'रस सागर' संकलन का प्रकाशन किया है। इस संकलन का वैशिष्ट्य केवल धमार फागों का संकलन किया जाना है। जिन फागों में अश्लीलता या असमाजिकता मिली उन्हें संकलन में नहीं लिया गया है। इस नीति ने संकलन को स्तरीय तथा सुरुचिपूर्ण बनाया है।
संपादक ने शंकर, राम तथा कृष्ण विषयक फागों को पृथक-पृथक वर्गीकृत किया है। परस्पर जुड़े हुए, प्रश्नोत्तरी अथवा एक साथ गाए जानेवाले फाग एक साथ रखकर सुसंगति स्थापित की गई है। संकलन में सम्मिलित फागों की वर्ण माला क्रमानुसार सूची ने इच्छित फाग की तलाश को सुगम बना दिया है। फाग गेयता (लय) पर आधारित पद्य रचना हैं। संपादक ने फागों का पाठ देते समय अर्थ-बोध पर गेयता को वरीयता दी है। अन्य लोक गीतों की तरह फागों के भी भिन्न-भिन्न रूप भिन्न-भिन्न भागों में प्रचलित हैं। फागों में प्रक्षिप्त पंक्तियाँ भी पाई जाती हैं, इसलिए कुशल संपादन आवश्यक है। योगी जी ने अप्रचलित तथा स्वरचित फागों को भी संकलन में स्थान दिया है।
संकलन के द्वितीय विभाग श्रीकृष्ण चरित्र में १४९ (क्रमांक ६९ से क्रमांक २१८ तक) फागें हैं। इनमें कृष्ण जन्म, बाल लीला, वृंदावन का प्राकृतिक वैभव, बसंत, गोपियों के संग फाग, होरी, यमुना किनारे बाल लीला, दधि लूटना, कृष्ण वंदना, कृष्ण महिमा, मुरली वादन, वर्षा, पुष्प-सौंदर्य, कंदुक क्रीड़ा, अबीर क्रीड़ा, रंग वृष्टि, कृष्ण सौंदर्य, राधा महिमा, राधा सौंदर्य, बृज की होली, विष्णु अवतार, राधा की होरी क्रीड़ा, गोपियों द्वारा छेड़, सावन वर्णन, इंद्र प्रकरण, बरसाने में होरी, कुञ्ज क्रीड़ा, रास लीला, कृष्ण द्वारा बिसाती रूप रख राधा से मिलना, मोर मुकुट, गैल छेकना, द्वारकाधीश, ऊधौ प्रकरण, कुब्जा प्रकरण, बृज से बिदाई, बृज वनिताओं की व्याकुलता, सुदामा प्रसंग, कृष्ण द्वारा वैद्य रूप, दधि गगरिया भंग, गाय दुहना, गौ पालन, यशोदा का दाढ़ी मंथन, मधुबन लीला, गेंद चोरी, वंशी चोरी, नटवर वेश, शिव द्वारा कृष्ण दर्शन, चंद्र खिलौना, वेणु वादन, वस्त्र हरण,भजन, कृष्ण प्रेम आदि सभी महत्वपूर्ण प्रसंग हैं।
उल्लेखनीय है कि फागों में राक्षस वध, कंस वध, कृष्ण-पांडव, कृष्ण-द्रौपदी, कृष्ण-कौरव, कृष्ण-कुरुक्षेत्र, गीता, द्वारक विवाद, महाप्रस्थान जैसे प्रसंग नहीं है। स्पष्ट है कि फागकारों ने लोक मंगल और रसानंद को लक्ष्य माना है और नकारात्मक, हिंसा प्रधान घटनाओं को अनदेखा किया है। रचनाकर्म में सकारात्मकता और शुभता के प्रति आग्रह तथाकथित प्रगतिवादियों के लिए ग्रहणीय है। दूसरी और फागकारों ने वर्ण विभाजन, उंच-नीच, छूआछूत, विप्र माहात्म्य, अंध श्रद्धा, पूजाडंबर आदि से भी परहेज किया है। संकीर्ण अंधविश्वासियों को फाग से औदार्य तथा समानता का पाठ ग्रहण करना चाहिए। संकलन में शैव-वैष्णव विभाजन को शिव फागों का सम्मिलन कर अमान्य किया गया है। एक भी फाग में अन्य धर्मावलंबियों यहाँ तक कि असुरों आदि की भी निन्दा नहीं है। स्पष्ट है की कृष लीलाओं और फागों का लक्ष्य सामाजिक समरसता, लोक मांगल्य और शुभता का प्रसार ही है।
२४-१-२०२२
***
विशेष लेख
नवगीत और देश
आचार्य संजीव 'सलिल'
*
विश्व की पुरातनतम संस्कृति, मानव सभ्यता के उत्कृष्टतम मानव मूल्यों, समृद्धतम जनमानस, श्रेष्ठतम साहित्य तथा उदात्ततम दर्शन के धनी देश भारत वर्तमान में संक्रमणकाल से गुजर रहा है।पुरातन श्रेष्ठता, विगत पराधीनता, स्वतंत्रता पश्चात संघर्ष और विकास के चरण, सामयिक भूमंडलीकरण, उदारीकरण, उपभोक्तावाद, बाजारवाद, दिशाहीन मीडिया के वर्चस्व, विदेशों के प्रभाव, सत्तोन्मुख दलवादी राजनैतिक टकराव, आतंकी गतिविधियों, प्रदूषित होते पर्यावरण, विरूपित होते लोकतंत्र, प्रशासनिक विफलताओं तथा घटती आस्थाओं के इस दौर में साहित्य भी सतत परिवर्तित हुआ।छायावाद के अंतिम चरण के साथ ही साम्यवाद-समाजवाद प्रणीत नयी कविता ने पारम्परिक गीत के समक्ष जो चुनौती प्रस्तुत की उसका मुकाबला करते हुए गीत ने खुद को कलेवर और शिल्प में समुचित परिवर्तन कर नवगीत के रूप में ढालकर जनता जनार्दन की आवाज़ बनकर खुद को सार्थक किया ।
किसी देश को उसकी सभ्यता, संस्कृति, लोकमूल्यों, धन-धान्य, जनसामान्य, शिक्षा स्तर, आर्थिक ढाँचे, सैन्यशक्ति, धार्मिक-राजनैतिक-सामाजिक संरचना से जाना जाता है। अपने उद्भव से ही नवगीत ने सामयिक समस्याओं से दो-चार होते हुए, आम आदमी के दर्द, संघर्ष, हौसले और संकल्पों को वाणी दी। कथ्य और शिल्प दोनों स्तर पर नवगीत ने वैशिष्ट्य पर सामान्यता को वरीयता देते हुए खुद को साग्रह जमीन से जोड़े रखा प्रेम, सौंदर्य, श्रृंगार, ममता, करुणा, सामाजिक टकराव, चेतना, दलित-नारी विमर्श, सांप्रदायिक सद्भाव, राजनैतिक सामंजस्य, पीढ़ी के अंतर, राजनैतिक विसंगति, प्रशासनिक अन्याय आदि सब कुछ को समेटते हुइ नवगीत ने नयी पीढ़ी के लिये आशा, आस्था, विश्वास और सपने सुरक्षित रखने में सफलता पायी है।
पुरातन विरासत:
किसी देश की नींव उसके अतीत में होती है। नवगीत ने भारत के वैदिक, पौराणिक, औपनिषदिक काल से लेकर अधिक समय तक के कालक्रम, घटना चक्र और मिथकों को अपनी ताकत बनाये रखा है। वर्तमान परिस्थितियों और विसंगतियों का विश्लेषण और समाधान करता नवगीत पुरातन चरित्रों और मिथकों का उपयोग करते नहीं हिचकता। (जागकर करेंगे हम क्या? / सोना भी हो गया हराम / रावण को सौंपकर सिया / जपता मारीच राम-राम - मधुकर अष्ठाना, वक़्त आदमखोर), अंधों के आदेश / रात-दिन ढोता राजमहल / मिला हस्तिनापुर को / जाने किस करनी का फल (जय चक्रवर्ती, थोड़ा लिखा समझना ज्यादा) में देश की पुरातन विरासत पर गर्वित नवगीत सहज दृष्टव्य है।
संवैधानिक अधिकार:
भारत का संविधान देश के नागरिकों को अधिकार देता है किन्तु यथार्थ इसके विपरीत है- मौलिक अधिकारों से वंचित है / भारत यह स्वतंत्र नागरिक / वैचारिक क्रांति अगर आये तो / ढल सकती दोपहरी कारुणिक (आनंद तिवारी, धरती तपती है), क्यों व्यवस्था / अनसुना करते हुए यों / एकलव्यों को / नहीं अपना रही है? (जगदीश पंकज, सुनो मुझे भी), तंत्र घुमाता लाठियाँ / जन खाता है मार / उजियारे की हो रही अन्धकार से हार / सरहद पर बम फट रहे / सैनिक हैं निरुपाय / रण जीतें तो सियासत / हारें, भूल बताँय / बाँट रहे हैं रेवाड़ी / अंधे तनिक न गम / क्या सचमुच स्वाधीन हम? (आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', सड़क पर) आदि में नवगीत देश के आम नागरिक के प्रति चिंतित है।
गणतंत्र:
देश के संविधान, ध्वज हर नागरिक के लिये बहुमूल्य हैं। गणतंत्र की महिमा गायन कर हर नागरिक का सर गर्व से उठ जाता है - गणतंत्र हर तूफ़ान से गुजर हुआ है / पर प्यार से फहरा हुआ है ताल दो मिलकर / की कलियुग में / नया भारत बनाना है (पूर्णिमा बर्मन, चोंच में आकाश)। नवगीत केवक विसंकटी और विडम्बना का चित्रण नहीं है, वह देश के प्रति गर्वानुभूति भी करता है - पेट से बटुए तलक का / सफर तय करते मुसाफिर / बात तू माने न माने / देश पर अभिमान करने / के अभी लाखों बहाने (रामशंकर वर्मा, चार दिन फागुन के), मुक्ति-गान गूँजे, जब / मातृ-चरण पूजें जब / मुक्त धरा-अम्बर से / चिर कृतज्ञ अंतर से / बरबस हिल्लोल उठें / भावाकुल बोल उठें / स्वतंत्रता- संगरो नमन / हुंकृत मन्वन्तरों नमन (जवाहर लाल चौरसिया 'तरुण', तमसा के दिन करो नमन) आदि में देश के गणतंत्र और शहीदों को नमन कर रहा है नवगीत।
वर्ग संघर्ष-शोषण:
कोई देश जब परिवर्तन और विकास की राह पर चलता है तो वर्ग संघर्ष होना स्वाभाविक है. नवगीत ने इस टकराव को मुखर होकर बयान किया है- हम हैं खर-पतवार / सड़कर खाद बनते हैं / हम जले / ईंटे पकाने / महल तनते हैं (आचार्य भगवत दुबे, हिरन सुगंधों के), धूप का रथ / दूर आगे बढ़ गया / सिर्फ पहियों की / लकीरें रह गयीं (प्रो. देवेंद्र शर्मा 'इंद्र'), सड़क-दर-सड़क / भटक रहे तुम / लोग चकित हैं / सधे हुए जो अस्त्र-शास्त्र / वे अभिमंत्रित हैं (कुमार रवीन्द्र), व्यर्थ निष्फल / तीर और कमान / राजा रामजी / क्या करे लक्षमण बड़ा हैरान / राजा राम जी (स्व. डॉ. विष्णु विराट) आदि में नवगीत देश में स्थापित होते दो वर्गों का स्पष्ट संकेत करता है।
विकासशील देश में बदलते जीवन मूल्य शोषण के विविध आयामों को जन्म देता है. स्त्री शोषण के लिए सहज-सुलभ है. नवगीत इस शोषण के विरुद्ध बार-बार खड़ा होता है- विधवा हुई रमोली की भी / किस्मत कैसी फूटी / जेठ-ससुर की मैली नजरें / अब टूटीं, तब टूटीं (राजा अवस्थी, जिस जगह यह नाव है), कहीं खड़ी चौराहे कोई / कृष्ण नहीं आया / बनी अहल्या लेकिन कोई राम नहीं पाया / कहीं मांडवी थी लाचार घुटने टेक पड़ी (गीता पंडित, अब और नहीं बस), होरी दिन भर बोझ ढोता / एक तगाड़ी से / पत्नी भूखी, बच्चे भूखे / जब सो जाते हैं / पत्थर की दुनिया में आँसू तक खो जाते हैं (जगदीश श्रीवास्तव) कहते हुए नवगीत देश में बढ़ रहे शोषण के प्रति सचेत करता है।
परिवर्तन-विस्थापन:
देश के नवनिर्माण की कीमत विस्थापित को चुकानी पड़ती है. विकास के साथ सुरसाकार होते शहर गाँवों को निगलते जाते हैं- खेतों को मुखिया ने लूटा / काका लुटे कचहरी में / चौका सूना भूखी गैया / प्यासी खड़ी दुपहरी में (राधेश्याम /बंधु', एक गुमसुम धूप), सन्नाटों में गाँव / छिपी-छिपी सी छाँव / तपते सारे खेत / भट्टी बनी है रेत / नदियां हैं बेहाल / लू-लपटों के जाल (अशोक गीते, धुप है मुंडेर की), अंतहीन जलने की पीड़ा / मैं बिन तेल दिया की बाती / मन भीतर जलप्रपात है / धुआँधार की मोहक वादी / सलिल कणों में दिन उगते ही / माचिस की तीली टपका दी (रामकिशोर दाहिया, अल्लाखोह मची), प्रतिद्वंदी हो रहे शहर के / आसपास के गाँव / गाये गीत गये ठूंठों के / जीत गये कंटक / ज़हर नदी अपना उद्भव / कह रही अमरकंटक / मुझे नर्मदा कहो कह रहा / एक सूखा तालाब (गिरिमोहन गुरु, मुझे नर्मदा कहो), बने बाँध / नदियों पर / उजड़े हैं गाँव / विस्थापित हुए / और मिट्टी से कटे / बच रहे तन / पर अभागे मन बँटे / पथरीली राहों पर / फिसले हैं पाँव (जयप्रकाश श्रीवास्तव, परिंदे संवेदना के) आदि भाव मुद्राओं में देश विकास के की कीमत चुकाते वर्ग को व्यथा-कथा शब्दित कर उनके साथ खड़ा है नवगीत।
पर्यावरण प्रदूषण:
देश के विकास साथ-साथ की समस्या सिर उठाने लगाती है। नवगीत ने पर्यावरण असंतुलन को अपना कथ्य बनाने से गुरेज नहीं किया- इस पृथ्वी ने पहन लिए क्यों / विष डूबे परिधान? / धुआँ मंत्र सा उगल रही है / चिमनी पीकर आग / भटक गया है चौराहे पर / प्राणवायु का राग / रहे खाँसते ऋतुएँ, मौसम / दमा करे हलकान (निर्मल शुक्ल, एक और अरण्य काल), पेड़ कब से तक रहा / पंछी घरों को लौट आएं / और फिर / अपनी उड़ानों की खबर / हमको सुनाएँ / अनकहे से शब्द में / फिर कर रही आगाह / क्या सारी दिशाएँ (रोहित रूसिया, नदी की धार सी संवेदनाएँ) कहते हुए नवगीत देश ही नहीं विश्व के लिए खतरा बन रहे पर्यावरण प्रदूषण को काम करने के प्रति अपनी चिंता व्यक्त करता है।
भ्रष्टाचार:
देश में पदों और अधिकारों का का दुरुपयोग करनेवाले काम नहीं हैं। नवगीत उनकी पोल खोलने में पीछे नहीं रहता- लोकतंत्र में / गाली देना / है अपना अधिकार / अपना काम पड़े तो देना / टेबिल के नीचे से लेना (ओमप्रकाश तिवारी, खिड़कियाँ खोलो) स्वर्णाक्षर सम्मान पत्र / नकली गुलदस्ते हैं / चतुराई के मोल ख़रीदे / कितने सस्ते हैं (महेश अनघ), आत्माएँ गिरवी रख / सुविधाएँ ले आये / लोथड़ा कलेजे का, वनबिलाव चीलों में / गंगा की गोदी में या की ताल-झीलों में / क्वाँरी माँ जैसे, अपना बच्चा दे आये (नईम), अंधी नगरी चौपट राजा / शासन सिक्के का / हर बाज़ी पर कब्जा दिखता / जालिम इक्के का (शीलेन्द्र सिंह चौहान) आदि में नवगीत देश में शिष्टाचार बन चुके भ्रष्टाचार को उद्घाटित कर समाप्ति हेतु प्रेरणा देता है।
उन्नति और विकास:
नवगीत विसंगति और विडम्बनाओं तक सीमित नहीं रहता, वह आशा-विश्वास और विकास की गाथा भी कहता है- देखते ही देखते बिटिया / सयानी हो गयी / उच्च शिक्षा प्राप्त कर वह नौकरी करने चली / कल तलक थी साथ में / अब कर्म पथ वरने चली (ब्रजेश श्रीवास्तव, बाँसों के झुरमुट से), मुश्किलों को मीत मानो / जीत तय होगी / हौसलों के पंख हों तो।/ चिर विजय होगी (कल्पना रामानी, हौसलों के पंख) कहते हुए नवगीत देश की युवा पीढ़ी को आश्वस्त करता है की विसंगतियों और विडम्बनाओं की काली रात के बाद उन्नति और विकास का स्वर्णिम विहान निकट है।
प्यार :
किसी देश का निर्माण सहयोग, सद्भाव और प्यार से हो होता है. टकराव से सिर्फ बिखराव होता है. नवगीत ने प्यार की महत्ता को भी स्वर दिया है- प्यार है / तो ज़िंदगी महका / हुआ एक फूल है / अन्यथा हर क्षण / ह्रदय में / तीव्र चुभता शूल है / ज़िंदगी में / प्यार से दुष्कर / कहीं कुछ भी नहीं (महेंद्र भटनागर, दृष्टि और सृष्टि), रातरानी से मधुर / उन्वान हम / फिर से लिखेंगे / बस चलो उस और सँग तुम / प्रीत बंधन है जहाँ (सीमा अग्रवाल, खुशबू सीली गलियों की) में नवगीत जीवन में प्यार और श्रृंगार की महक बिखेरता है।
आव्हान :
सपनों से नाता जोड़ो पर / जाग्रति से नाता मत तोड़ो तथा यह जीवन / कितना सुन्दर है / जी कर देखो... शिव समान / संसार हेतु / विष पीकर देखो (राजेंद्र वर्मा, कागज़ की नाव), सबके हाथ / बराबर रोटी बाँटो मेरे भाई (जयकृष्ण तुषार), गूंज रहा मेरे अंतर में / ऋषियों का यह गान / अपनी धरती, अपना अम्बर / अपना देश महान (मधु प्रसाद, साँस-साँस वृन्दावन) आदि अभिव्यक्तियाँ नवगीत के अंतर में देश के नव निर्माण की आकुलता की अभव्यक्ति करते हुई आश्वस्त करती हैं की देश का भविष्य उज्जवल है और युवाओं को विषमता का अंत कर समता-ममता के बीज बोने होंगे।
***
मुक्तिका
*
ये राजनीति लोक को छलती चली गई
ऊषा उदित हुई ही कि ढलती चली गई
रोटी बना रही थी मगर देख कर उसे
अनजाने ही पूड़ियाँ तलती चली गई
कोशिश बहुत की उसने मुझे कर सके निराश
आशा मनस में आप ही पलती चली गई
आभा का राज दूनवी घाटी ने कह दिया
छाया तिमिर घना मिटे, जलती चली गई
हिंदी गजल है, बर्फ की सिल्ली न मानना
जो हार कर तपिश से पिघलती चली गई
है जिंदगी या नाजनीं कोई कहे सलिल
संजीव होके हँसती मचलती चली गई
*
२४-१-२०२०
***
मुक्तिका :
*
तुममें मैं हूँ , मुझमें तुम हो
खोज न बाहर, मिलकर हम हो
*
ईश-देश या नियति-प्रकृति सँग
रहो प्रकाशित, शेष न तम हो
*
पीर तुझे हो, दर्द मुझे हो
सुख-दुःख में मिल अँखियाँ नम हो
*
संबंधों के अनुबंधों में
साधक संयम और नियम हो
*
मंतर मार सकें कुछ ऐसा
अंतर से ही अंतर गुम हो
*
मन-प्राणों को देह टेरती
हो विदेह सुख वही परम हो
*
देना-पाना, मिल-खो जाना
आना-जाना संग धरम हो
***
लघुकथा-
स्थानांतरण
*
चाची! जमाना खराब है, सुना है बहू अकेली बाहर गाँव जा रही है। कैसे और कहाँ रहेगी? समय खराब है।
भतीज बहू की बात सुनकर चाची ने कहा 'तुम चिंता मत करो, बहू के साथ पढ़ा एक दोस्त वही परिवार सहित रहता है। उसके घर कुछ दिन रहेगी, फिर मकान खोजकर यहाँ से सामान बुला लेगी। बीच-बीच में आती-जाती रहेगी। बेटा बिस्तर से न लगा होता तो साथ जाता। उसके पैर का प्लास्टर एक माह बाद खुलेगा, फिर २-३ माह में चलने लायक होगा।'
'ज़माने का क्या है? भला कहता नहीं, बुरा कहने से चूकता नहीं। समय नहीं मनुष्य भले-बुरे होते हैं। अपन भले तो जग भला.… बहू पढ़ी-लिखी समझदार है। हम सबको एक-दूसरे का भरोसा है, फिर फ़िक्र क्यों?
माँ की बात सुनकर स्थानांतरण आदेश पाकर परेशान श्रीमती जी के अधरों पर मुस्कान झलकी, अभी तक मैं उन्हें हिम्मत बँधा रहा था कि किसी न किसी प्रकार साथ जाऊँगा। अब वे बोल रही थीं आपके जाने की जरूरत नहीं, आप सब यहाँ रहेंगे तो बच्चों को स्कूल नहीं छोड़ना होगा। वहाँ अच्छे स्कूल नहीं हैं। मैं सब कर लूँगी। आप अपना और बच्चों का ध्यान रखना, समय पर दवाई लेना। माँ ने साथ चलने को कहा तो बोलीं आप यहाँ रहेंगी तो मुझे इन सबकी चिंता न होगी। मैं आपकी बहू हूँ, सब सम्हाल लूँगी।
मैं अवाक देख रहा था विचारों का स्थानान्तरण।
***
मुक्तक
काश! आँखो में नींद आ जाए
तू जो सपनों में आके छा जाए
फिर मुझे जागने की चाह नहीं
तू जो लोरी मुझे सुना जाए
२४.१.२०१६
***
बसंत पंचमी
.
महत्व
भारत में जीवन के हर पहलू को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है | और इसी आधार पर पूजा - उपासना की व्यवस्था की गयी है | अगर धन के लिए दीपावली पर माता लक्ष्मी की उपासना की जाती है तो नेघा और बुद्धि के लिए माघ शुक्ल पंचमी को माता सरस्वती की भी उपासना की जाती है | धार्मिक और प्राकृतिक पक्ष को देखे तो इस समय व्यक्ति का मन अत्यधिक चंचल होता है | और भटकाव बड़ता है | इसीलिए इस समय विद्याऔर बुद्धि की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती की उपासना से हम अपने मन को नियंत्रित और बुद्धि को कुशाग्र करते है | वर्तमान संदर्भो की बात करे तो आजकल विधार्थी भटकाव से परेशान है | पढाई में एकाग्रता की समस्या है | और चीजो को लम्बे समय तक याद नहीं रख सकते है , इस दशा में बसंत पंचमी को की गयी माँ सरस्वती की पूजा से न केवल एकाग्रता में सुधार होगा बल्कि बेहतर यादाश्त और बुद्धि की बदोलत विधार्थी परीक्षा में बेहतरीन सफलता भी पायेंगे | विधार्थियों के आलावा बुद्धि का कार्य करने वाले तमाम लोग जैसे पत्रकार , वकील , शिक्षक आदि भी इस दिन का विशेष लाभ ले सकते है |
राशी अनुसार पूजन विधान :-
मेष :- स्वभावत: चंचल राशी होती है | इसीलिए अक्सर इस राशी के लोगो को एकाग्रता की समस्या परेशान करती है | बसंत पंचमी को सरस्वती को लाल गुलाब का पुष्प और सफ़ेद तिल चढ़ा दे | इससे चंचलता और भटकाव से मुक्ति मिलेगी |
वृष:- गंभीर और लक्ष के प्रति एकाग्र होते है परन्तु कभी कभी जिद और कठोरता उनकी शिक्षा और करियर में बाधा उत्पन्न कर देती है | चूँकि इनका कार्य ही आम तौर पर बुद्धि से सम्बन्ध रखने वाला होता है , अत : इनको नीली स्याही वाली कलम और अक्षत सरस्वती को समर्पित करना चाहिए | ताकि बुद्धि सदेव नियंत्रित रहती है |
मिथुन : - बहुत बुद्धिमान होने के बावजूद भ्रम की समस्या परेशान करती है | इसीलिए ये अक्सर समय पर सही निर्णय नहीं ले पाते | बसंत पंचमी के दिन सरस्वती को सफ़ेद पुष्प और पुस्तक अर्पित करने से भ्रम समाप्त हो जाता है एवं बुद्धि प्रखर होती है |
कर्क : - इन पर ज्यादातर भावनाए हावी हो जाती है | यही समस्या इनको मुश्किल में डाले रखती है | अगर बसंत पंचमी के दिन सरस्वती को पीले फूल और सफ़ेद चन्दन अर्पित करे तो भावनाए नियंत्रित कर सफलता पाई जा सकती है |
सिंह : - अक्सर शिक्षा में बदलाव व् बाधाओ का सामना करना पड़ता है | ये योग्यता के अनुसार सही जगह नहीं पहुच पाते है शिक्षा और विधा की बाधाओ से निपटने के लिए सरस्वती को पीले फूल विशेष कर कनेर और धान का लावा अर्पित करना चाहिए |
कन्या : - अक्सर धन कमाने व् स्वार्थ पूर्ति के चक्कर में पड़ जाते है | कभी कभी बुद्धि सही दिशा में नहीं चलती है | बुद्धि सही दिशा में रहे इसके लिए सरस्वती को कलम और दावत के साथ सफ़ेद फूल अर्पित करना चाहिए |
तुला :- जीवन में भटकाव के मौको पर सबसे जल्दी भटकने वाले होते है | चकाचोंध और शीघ्र धन कमाने की चाहत इसकी शिक्षा और करियर में अक्सर बाधा ड़ाल देती है | भटकाव और आकर्षण से निकल कर सही दिशा पर चले इसके लिए नीली कमल और शहद सरस्वती को अर्पित करे |
वृश्चिक : - ये बुद्धिमान होते है | लेकिन कभी कभार अहंकार इनको मुश्किल में ड़ाल देता है | अहंकार और अति आत्म विश्वास के कारण ये परीक्षा और प्रतियोगिता में अक्सर कुछ ही अंको से सफलता पाने से चुक जाते है | इस स्थिति को बेहतर करने के लिए सरस्वती को हल्दी और सफ़ेद वस्त्र अर्पित करना चाहिए |
धनु : - इस राशी के लोग भी बुद्धिमान होते है | कभी कभी परिस्थितिया इनकी शिक्षा में बाधा पहुचाती है | और शिक्षा बीच में रुक जाती है | जिस कारण इन्हें जीवन में अत्यधिक संघर्ष करना पड़ता है | इस संघर्ष को कम करने के लिए इनको सरस्वती को रोली और नारियल अर्पित करना चाहिए |
मकर : - अत्यधिक मेहनती होते है | पर कभी कभी शिक्षा में बाधाओ का सामना करना पड़ता है | और उच्च शिक्षा पाना कठिन होता है | शिक्षा की बाधाओ को दूर करके उच्च शिक्षा प्राप्ति और सफलता प्राप्त करने के लिए इनको सरस्वती को चावल की खीर अर्पित करनी चाहिए |
कुम्भ :- अत्यधिक बुद्धिमान होते है | पर लक्ष के निर्धारण की समस्या इनको असफलता तक पंहुचा देती है | इस समस्या से बचने के लिए और लक्ष पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए इसको बसंत पंचमी के दिन सरस्वती को मिश्री का भोग चडाना चाहिए |
मीन : - इस राशी के लोग सामान्यत : ज्ञानी और बुद्धिमान होते है | पर इनको अपने ज्ञान का बड़ा अहंकार होता है | और यही अहंकार इनकी प्रगति में बाधक बनता है | अहंकार दूर करके जीवन में विनम्रता से सफलता प्राप्त करने के लिए इनको बसंत पंचमी के दिन सरस्वती को पंचामृत समर्पित करना चाहिए |
बसंत पंचमी के दिन अगर हर राशी के जातक इन सरल उपायों को अपनाये तो उनको बागिस्वरी , सरस्वती से नि: संदेह विधा और बुद्धि का वरदान मिलेगा |
कैसे करे सरस्वती आराधना : -
बसंत पंचमी के दिन प्रात: कल स्नान करके पीले वस्त्र धारण करे | सरस्वती का चित्र स्थापित करे यदि उनका चित्र सफ़ेद वस्त्रो में हो तो सर्वोत्तम होगा | माँ के चित्र के सामने घी का दीपक जलाए और उनको विशेष रूप से सफ़ेद फूल अर्पित करे | सरस्वती के सामने बैठ " ऍ सरस्वतये नम : " का कम से कम १०८ बार जप करे | एसा करने से विधा और बुद्धि का वरदान मिलेगा तथा मन की चंचलता दूर होगी |
पूजा अर्चना और उसके लाभ : -
लाल गुलाब , सफ़ेद तिल अर्पित करे तथा अक्षत चढाए |
सफ़ेद पुष्प , पुस्तक अर्पित करे |
पीले फूल , सफ़ेद चन्दन अर्पित करे |
पीले पुष्प , धान का लावा चढाए |
कलम - दवात , सफ़ेद फूल अर्पित करे |
नीली कलम , शहद अर्पित करे |
हल्दी और सफ़ेद वस्त्र अर्पित कर रोली , नारियल अर्पित करे |
चावल की खीर और मिश्री का भोग अर्पित करे |
लाभ : -
मन की स्थिरता और ताजगी महसूस होगी तथा बुद्धि विवेक नियंत्रित होंगे |
मन की कशमकश ख़त्म होगी बुद्धि प्रखर होगी |
भावनाए काबू में रहेगी , सफलता मिलेगी |
शिक्षा में सफलता , बुद्धि में वृद्धि होगी |
बुद्धि तेज , सोच सकारात्मक होगी |
सही दिशा मिलेगी |
अहंकार से मुक्ति मिलेगी |
संघर्ष और बाधाऍ कम होगी |
एकाग्रचित्तता में बढ़ोतरी होगी |
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स्तवन:
शरणागत हम
.
शरणागत हम
चित्रगुप्त प्रभु!
हाथ पसारे आये
.
अनहद अक्षय अजर अमर हे!
अमित अभय अविजित अविनाशी
निराकार-साकार तुम्हीं हो
निर्गुण-सगुण देव आकाशी
पथ-पग लक्ष्य विजय यश तुम हो
तुम मत मतदाता प्रत्याशी
तिमिर मिटाने
अरुणागत हम
द्वार तिहारे आये
.
वर्ण जात भू भाषा सागर
सुर नर असुर समुद नद गागर
ताण्डवरत नटराज ब्रम्ह तुम
तुम ही बृजरज के नटनागर
पैगंबर ईसा गुरु बनकर
तारो अंश 'सलिल' हे भास्वर!
आत्म जगा दो
चरणागत हम
झलक निहारें आये
२४-१-२०१५
***
हास्य सलिला:
प्यार
*
चौराहे पर खड़े हुए थे लालू हो ग़मगीन
कालू पूछे: 'का हुआ?, काहे लागत दीन??
' का बतलाऊँ तोहरी भउजी का परताप?
चाह करूँ वरदान की, बे देतीं अभिशाप'
'वर तुम, वधु बे किस तरह फिर देंगी वरदान?
बतलाओ काहे किया भउजी का गुणगान?'
लालू बोले: 'रूप का मैंने किया बखान'
फिर बोला: 'प्रिय! प्यार का प्यासा हूँ मैं खूब.'
मेरे मुँह पर डालकर पानी बोलीं: 'डूब"
'दाँत निपोर मजाक कह लेते तुम आनंद
निकट न आ ठेंगा दिखा बे करती हैं तंग'
२४.१.२०१४
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राम लला


राम नाम जीवन के अंधकार को दूर कर देने के समान है। जीवन कितनी ही कठिनाइयों के दौर से गुजर रहा हो, राम नाम मात्र से ही विकट से विकट परिस्थितियों का सामना करने का साहस हमें मिल जाता है। भारत! हमेशा से अवतारों और महानायकों की जन्मस्थलि के रूप में पूज्यनीय रहा है। यही वो धरा है, जहां आदर्श और चमत्कारों की अनेका-नेक प्रतिभूतियों ने जन्म लिया और उसे पल्लवित किया। इनका चरित्र और जीवनशैली ऐसी रही, जिसे लाखों बरसों की संभ्यता में मनुष्य ने मूल्यों की तरह स्वीकार किया है। ऐसी ही शाश्वत चरित्र गाथा है, प्रभु श्री राम की। सूर्यवंशी श्रीराम की चरित गाथा भी भारतीय जनमानस में ऐसी ही स्थाई भाव की तरह रच- बस गयी है। श्री राम की देवता छवि से हटकर उनके मानवीय जीवन के उन सरोकारों से प्रेरणा का सन्दर्भ जुड़ता है, जहाँ वे अपने हिस्से में आयी हर भूमिका और चुनौती का पूरी आतंरिक शक्ति से सामना करते हैं और समाधान की राहें खोजते हैं।
राम लला
 *
रामलला की प्रतिमा को गहन गहराई से निहारेंगे, तो अनुभव होगा कि बाल्यरूप श्री राम के नेत्र सजल और अधरों पर मृदुल मुस्कान है। मन में अतिशय हर्ष हो तो नेत्र सजल हो जाते हैं। मूर्ति बनाते समय मूर्तिकार भाव मग्न होकर प्रतिमा में ही समहित हो जाता है। छैनी हथोड़े कहाँ-कैसे  चलने-चलाने हैं आदि आगे का कार्य ईश्वर अनुरूप स्वत: होता जाता है। श्रीराम मंदिर अयोध्या में स्थापित श्रीरामलला की मूर्ति तिरुपति बाला जी की तरह आकर्षक, नयनाभिराम और मनोहर है। देव मूर्तियों के आकार-प्रकार आदि संबंधी विधान पुराणों में वर्णित हैं।  

क्यों हैं मर्यादा पुरुषोत्तम? 

विपत्ती हो, उत्पत्ति हो, साहस हो या संयम हो, राम नाम ही है जो दुख-दारुण दूर करने वाला और सुख-सतयुग, त्रेता और द्वापर में समान रूप से उल्लेखित आदिकवि वाल्मीकि द्वारा रचित महाकाव्य रामायण के जाने कितने ही अध्यायों और प्रसंगों ने राम के माध्यम से आने वाली अनगिनत पीढ़ियों के लिए जीवन, कर्म और चिंतन को नया आधार दिया। उनके इन्हीं मूल्यों को आगे बढ़ाया गोस्वामी तुलसीदास ने। उन्होंने लिखा है

जेहि यह कथा सुनी नहिं होई। जनि आचरजु करै सुनि सोई॥
कथा अलौकिक सुनहिं जे ग्यानी। नहिं आचरजु करहिं अस जानी॥

रामकथा कै मिति जग नाहीं। असि प्रतीति तिन्ह के मन माहीं॥
नाना भाँति राम अवतारा। रामायनं सत कोटि अपारा॥

अर्थात, जिसने यह कथा पहले न सुनी हो, वह सुनकर आश्चर्य न करे। जो ज्ञानी इस विचित्र कथा को सुनते हैं, वे यह जानकर आश्चर्य नहीं रते कि संसार में रामकथा की कोई सीमा नहीं है। उनके मन में ऐसा विश्वास रहता है। नाना प्रकार राम के अवतार हुए हैं और सौ करोड़ तथा अपार रामायणें हैं।

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने भी अपनी रचना 'साकेत' में लिखा है-

 'राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है, कोई कवि बन जाए सहज सम्भाव्य है'।

सूर्यकांत त्रिपाठी, निराला जैसा हिंदी का अप्रतिम कवि 'राम की शक्ति पूजा' के चरम पर राम के मुख से कहता है - 
'आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर'।

लोकनायक- आदिपुरुष - श्रीरामराम सांसारिक जीवन के हर मोर्चे पर उन्हें अनुकरणीय हैं। राम को समझकर व्यक्ति यह निर्णय ले सकता है कि आज के दौर में हमारी नैतिक शक्ति और मर्यादाओं का वजन कितना शेष रह गया है?

न सिर्फ भारतीय, अपितु वैश्विक साहित्य में भी राम का उल्लेख न सिर्फ एक ऐसे चरित्र के रूप में किया जाता है जो मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में भय को दूर कर आशा के दीपक जलाकर समस्त समस्याओं के समाधान की राह भी दिखाता है।

भारतीय परिवेश के रोम-रोम में रामराम लोक नायक हैं। लोक उनकी गाथा को याद कर मुश्किल समय में प्रेरणा लेता है। राम त्याग की प्रतिमूर्ति हैं, राजवंश के होने के बावजूद अपने पिता के आदेश पर सब कुछ त्याग कर साधु जीवन जीने को निकल पड़े थे।
हर परिस्थिति का सामना, बिना डरे, डटकर किया, हार नहीं मानी। हमेशा सत्य, साहस, त्याग, न्याय और पराक्रम के परचम लहराए, लेकिन उसके साथ ही अपने व्यक्तित्व से लगातार प्रेम, दया, करुणा को कभी अलग नहीं होने दिया।
राम वह नायक , जिनका शत्रु भी उनके हाथों संहार के बाद उनका नाम लेता हुआ अपने प्राणों को त्याग गया। राम अलग-अलग वर्ग के लिए अलगअलग रूप में मान्य हैं।
एक वर्ग के लिए राम जहां आस्था और आराधना की मूरत हैं, तो वहीं दूसरे वर्ग के लिए वह मर्यादा पुरुषोत्तम व नीति विद पराक्रम के रूप में मान्य हैं।
राम हमारी रक्षा के प्रतीक हैं, बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रमाण हैं। एक उम्मीद हैं, कि असत्य पर सत्य की जीत निश्चित है। इससे यह प्रमाणित होता है कि राम न सिर्फ हर दौर में प्रासंगिक हैं, बल्कि हर वर्ग के लिए भी किसी न किसी तरह आदर्श का प्रतीक है।
राम एक ऐसा चरित्र है, जो सत्यं - शिवम सुंदरम है। किसी भी दौर में राम परिस्थितियों पर विजय पाने वाले महानायक हैं।
भारत अखंड है- राम सर्वव्यापी हैं। भारत और राम अपने आचारविचार और प्रकार से एक दूसरे के पर्याय हैं।
भारतीय परिवेश में न सिर्फ दैवीय राम की बल्कि मानवीय राम का चरित्र भी प्रमुख पहचान है।
विश्व में शायद ही कोई ऐसा लोकप्रिय, महान और प्रेरणा दायी चरित्र, शायद ही कोई ऐसा किवदंती-पुरुष होगा जिस पर एकाग्र कोई महाकाव्य, मात्र धार्मिक रूप से या ऐतिहासिक रूप से ही महत्वपूर्ण नहीं हो, बल्कि जीवन में आने वाली छोटी-बड़ी समस्याओं से लड़ने की प्रेरणा भी देता हो।

घर पधारेंगे श्री राम

भारत की अगली पीढ़ी में, आज्ञापालन और त्याग रहे।

संघर्षों में भी रहे धीर, मर्यादा का अनुराग रहे।

माता पिता शिक्षकों में यदि, विश्वामित्र सी निष्ठा हो।

अयोध्या संग पुरुषोत्तम की घर घर में प्राण प्रतिष्ठा हो।II रमन्ते योगिनः अस्मिन सा रामं उच्यते।। अर्थात योगी ध्यान में जिस शून्य में रमते हैं उसे राम कहते हैं।

कोशलो नाम मुदिताः स्फीतो जनपदो महान।

निविष्ट: सरयूतीरे प्रभूत धनधान्यवान्

अयोध्या नाम नगरी तत्रऽऽसीत् लोकविश्रुता।

मनुना मानवेन्द्रेण या पुरी निर्मिता स्वयम्।अर्थात सरयू नदी के तट पर संतुष्ट जनों से पूर्ण धनधान्य से भरा-पूरा कोसल नामक एक बड़ा देश है। इसी देश में मनुष्यों के आदिराजा प्रसिद्ध महाराज मनु की बसाई हुई तथा तीनों लोकों में विख्यात अयोध्या नामक नगरी है।

सप्तपुरियों में सर्वप्रथम रामजन्म भूमि अयोध्यापुराणों में सात पवित्र नगरों या तीर्थों की बात कही गई है। कहा गया है कि ये सात तीर्थ मोक्षदायक अर्थात् इन तीर्थों की यात्रा करने वाला व्यक्ति अंत में जीवन-मरण के बंधन से मुक्त होकर भगवान की शरण में पहुंच जाता है। और उसका कल्याण होता है। अयोध्या इन सात नगरों में प्रथम स्थान पर है।

अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवन्तिका।

पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदांयिकाः॥हिंदू मान्यताओं के अनुसार सात पवित्र नगरों में क्रमशः मथुरा, (हार), शी, हिंदु मान्यताओं अयोध्या, (कांचीपुरम), अवंतिका, उज्जैन और द्वारिका शामिल हैं। इन सात नगरों को सप्तपुरी भी कहा जाता है।
अयोध्या के धार्मिक महत्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इन प्राचीन सप्तपुरियों में पहला स्थान अयोध्या को दिया गया है।

अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या।

तस्यां हिरण्ययः कोशः स्वर्गो ज्योतिषावृतः।।अर्थात आठ चक्र और नौ द्वारों वाली अयोध्या देवों की पुरी है, उसमें प्रकाश वाला कोष है, जो आनन्द और प्रकाश से युक्त है।

अयोध्या स्वर्ग के समान है : अथर्ववेदअयोध्या का वर्णन पुराणों और वेदों में भी समान रूप से किया गया है। चार वेदों में से एक अथर्ववेद में अयोध्या को स्वर्ग के बराबर बताया गया है। अथर्ववेद में कहा गया है
आठ चक्र और नौ द्वारों वाली अयोध्या देवताओं की नगरी है। ये अथर्ववेद के 10वें मंडल के दूसरे सूक्त में मंत्र है।
इस वैदिक ऋचा से ज्ञात होता है कि अपने काल में भी अयोध्या न सिर्फ मौजूद थी, बल्कि काफी संपन्न थी। सरयू नदी के तट पर संतुष्ट जनों से पूर्ण धन-धान्य से भरा-पूरा, उत्तरोत्तर उन्नति को प्राप्त कोसल नामक एक बड़ा देश था।
वाल्मीकि रामायण के बालकांड के पंचम सर्ग में 23 श्लोकों में अयोध्या का भूगोल समझाया गया है। इसके मुताबिक अयोध्या 12 योजन लंबी और 3 योजन चौड़ी थी।' इस हिसाब से देखें तो अयोध्या करीब 5200 किमी. में फैली हुई थी।
आज का अयोध्या शहर 120.8 किमी. में ही बसा है। यानी उस काल में अयोध्या आज की अयोध्या से करीब 44 गुना बड़ी थी।

जैन धर्म के पांच तीर्थंकरों की जन्मस्थली है अयोध्याजैन धर्म के अनुसार 24 जैन तीर्थंकरों में से पांच का जन्म अयोध्या में हुआ था। इनमें जैन धर्म के पहले तीर्थंकर ऋषभनाथ दूसरे अजितनाथ, चौथे अभिनंदननाथ, पांचवें सुमितनाथ और 14वें तीर्थंकर अनंतनाथ का जन्म अयोध्या में हुआ के सभी तीर्थकरों को भगवान राम के इक्ष्वाकु वंश का ही माना जाता है।

वैवस्वत मनु महाराज ने की थी अयोध्या की स्थापनारामायण में सरयू नगर के तट पर बसी अयोध्या की स्थापना बारे में कहा गया है कि विवस्वान (सूर्य) के पुत्र वैवस्वत मनु महाराज ने यह नगरी बसाई थी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ब्रह्मा की संतान मरीचि थे, मरीचि की संतान कश्यप, कश्यप की संतान विवस्वान और उनके पुत्र वैवस्वत थे।
अयोध्यापति मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की लीला के अतिरिक्त अयोध्या में श्रीहरि के अन्य सात प्राकट्य हुए हैं, जिन्हें सप्तहरि के नाम से जाना जाता है।
अलग-अलग समय देवताओं और मुनियों की तपस्या से प्रकट हुए भगवान विष्णु के सात स्वरूपों को ही सप्तहरि के नाम से जाना जाता है। इनके नाम भगवान गुप्तहरि, विष्णुहरि, चक्रहरि, पुण्यहरि, चन्द्रहरि, धर्महरि और बिल्वहरि हैं।

भगवान विष्णु के चक्र पर विराजमान है अयोध्यास्कंदपुराण में अयोध्या के बारे में एक रोचक बात कही गई है। इसके अनुसार अयोध्या भगवान विष्णु के चक्र पर विराजमान है। कहते हैं कि जब मनु ने ब्रह्मा से अपने लिए एक नगर बसाने की बात कही तो ब्रह्मा उन्हें भगवान विष्णु के पास ले गए। विष्णु ने साकेत धाम (अयोध्या) में स्थान बताया, जहां विश्वकर्मा ने नगर निर्माण किया।

अयोध्या का अर्थ है योध्या रहित भूमिवेदों के बाद अयोध्या शब्द का जिक्र सदा शुक शिव संहिता, वशिष्ठ संहिता और में भी है जहां इसे 'साकेत लोक' और 'राम लोक' भी कहा जा रहा है।
सारे वेदों, उपनिषद, उपनिषदों और संहिताओं को खंगालें तो अयोध्या के 12 नाम मिलते हैं। ये 12 नाम हैं- अयोध्या, आनंदिनी, सत्या, सत, साकेत, कोशला, विमला, अपराजिता, ब्रह्मपुरी, प्रमोदवन, सांतानिकलोका और दिव्यलोका।

क्या होता है तीर्थ जल और स्नान?मान्यता है कि पवित्र नदी, कुओं, बंदियों का जल अत्यंत ऊर्जादायक और शुद्ध होता है। इसी कारण मूर्ति प्राण प्रतिष्ठा के समय इन्हीं जल से समान कराया जाता है।
स्कन्दपुराण के अनुशीलन से ज्ञात होता है कि तीर्थ तथा प्रकृति का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है। तीर्थों के प्रति उस समय जो श्रद्धापूर्ण भावना का आधार मानव के अन्तर्मन में दृढ़ था, वह भावना तीर्थ का सर्वतोभावेन संरक्षण कर रही थी।
तीर्थ जल प्रधान होते हैं। जल ही रस है । रस ही प्रेम है। तीर्थस्नान अर्थात् भगवद् प्रेम रस से सराबोर हो जाना। यह जलमय प्रेमरस (जलहीनता) न होना ही विरह है। जिसके हृदय में भगवत् प्रेमरूपी रसधारा बह रही है, उसका हृदय भी तीर्थ है । जो परदुःख कातर है, उसका यह भाव भी तीर्थ है। जिसकी दृष्टि करुणार्द्र है, जो सबके अन्दर एक ही तत्व का दर्शन करते हैं, उनकी दृष्टि भी तीर्थ है । यह स्कन्दपुराण का उद्घोष है।
तीर्थों के प्रसंग में एक लोकोक्ति सुनी गई थी। हो सकता है, यह लोकोक्ति किसी पुराण अथवा प्राचीन ग्रंथों में वर्णित हो! भगवान् शंकर मातापार्वती के साथ बैल पर बैठे जा रहे थे।
हठात् वे वाहन से उतरे तथा एक वृक्ष के नीचे बने चबूतरे को प्रणाम किया। पार्वती ने इसका कारण जानना चाहा । भगवान् त्रिपुरारि ने कहा कि “यहां दो शताब्दी पहले एक महापुरुष ने तप किया था। अतः मैं इस पुण्यस्थल को प्रणाम कर रहा हूं।
तदनन्तर कुछ आगे बढ़ने पर शंकर ने बैल से उतर कर एक वृक्ष के नीचे की भूमि को प्रणाम किया। पार्वती द्वारा पूछे जाने पर भगवान् शंकर ने कहा "यहां आज से दो हजार वर्ष के पश्चात् एक महापुरुष आकर कुछ समय विश्राम करेंगे। तभी मैं इस पुण्यभूमि को प्रणाम कर रहा हूं।
इस कथा से यह स्पष्ट होता है कि कोई भी सामान्य स्थान किसी महान् आत्मा की सन्निधि के कारण तीर्थ हो जाता है। जो स्थान आज तीर्थ नहीं है, वह आसन्न भविष्य में तीर्थक्षेत्र बन सकता है। इसमें भूमि कारण नहीं है। महापुरुष ही तीर्थ बनाते हैं। उनकी सन्निधि के कारण सामान्य भूमि भी सदियों तक वन्दनीय बनी रहती है। वहां का शुभ स्पन्दन दीर्घकाल तक मनुष्य के लिये शान्तिप्रद हो जाता है।
तीर्थतत्व अगम-अपार है। यहां सब भावना का ही खेल है। उत्तम भावना का संचार होने में प्रभुकृपा ही कारण है। भाव की प्रेरणा से ही कर्म विकसित होता है। भाव का तो कणमात्र ही मानव अस्तित्व में व्यक्त हो पाता है।
बाकी भाव एक महासागर जैसा अन्तर्लीन ही रह जाता है। प्रभुकृपा से भावुकों में ही यह भाव विकसित तथा व्यक्त हो पाता है। भावमयता के अभाव के कारण सामान्य मनुष्य की बुद्धि में स्कन्दपुराण में वर्णित तीर्थरहस्य व्यक्त हो सकना दुष्कर है ।
प्रभु श्री राम की जन्म भूमि अयोध्या राम नाम से जगमगा रही है। सोमवार 22 जनवरी के दिन प्रभु की मूर्ति की प्राण पर प्रतिष्ठा होनी है। प्राण प्रतिष्ठा का अनुष्ठान 16 जनवरी से शुरू हो गया था।
श्रीराम के 5 वर्षीय बाल रूप स्वरूप में मूर्ति का निर्माण किया गया है, जो श्यामल रंग की है। ऐसे में कई लोगों में असमंजस की स्थिति बनी हुई है कि आखिर भगवान श्री राम की मूर्ति काले रंग की ही क्यों बनाई गयी है। इसलिए आइए जानते हैं क्या है भगवान राम की मूर्ति के रंग के पीछे का रहस्य

मूर्ति का रंग काला ही क्योंमहर्षि वाल्मीकि रामायण में भगवान श्री राम के श्यामल रूप का वर्णन किया गया है। इसलिए प्रभु को श्यामल रूप में पूजा जाता है। वहीं, श्री राम की मूर्ति का निर्माण श्याम शिला के पत्थर से किया गया है। यह पत्थर बेहद खास है।
श्याम शिला की आयु हजारों वर्ष मानी जाती है। यही वजह है की मूर्ति हजारों सालों तक अच्छी अवस्था में रहेगी और इसमें किसी तरह का बदलाव नहीं आएगा। वहीं, हिंदू धर्म में पूजा पाठ के दौरान अभिषेक किया जाता है।
ऐसे में मूर्ति को जल, चंदन, रोली या दूध जैसी चीजों से भी नुकसान नहीं पहुंचेगा।

बालस्वरूप में क्यों बनाई गई प्रतिमा?मान्यताओं के अनुसार, जन्म भूमि में बाल स्वरूप की उपासना की जाती है। इसीलिए भगवान श्री राम की मूर्ति बाल स्वरूप में बनाई गयी है।

आचार्य लक्ष्मीकांत दीक्षित कराएंगे रामलला की प्रतिष्ठाइनकी उम्र 85 साल है जो काशी के विद्वान पंडित हैं।, रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के मुख्य पुजारी, उम्र 85 साल।- पट्टी खोलकर नेत्रोन्मिलन संपन्न; आज 84 सेकंड में प्राण स्थिरीकरण के बाद प्रभु दर्शन
प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में 22 जनवरी सबसे अहम है। इसमें लग्नस्थ गुरु की दृष्टि पंचम, सप्तम एवं नवम पर होने से मुहूर्त उत्तम है। मकर का सूर्य हो जाने से पौषमास का दोष समाप्त हो जाता है।
भगवान की कृपा और गुरुजनों के आशीर्वाद से उपर्युक्त उत्तम मुहूर्त मिला है। 22 जनवरी को सबसे पहले दैनिक मंडप में उन देवताओं का पूजन होगा, जिनका आह्वान किया गया है।
फिर भगवान रामलला को जगाया जाएगा। इसके लिए विशेष मंत्र- 'उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविंद उत्तिष्ठ गरुड़ध्वज।
उत्तिष्ठ कमलाकांत त्रैलोक्यं मंगलमं कुरु ।' (यानी प्रभु उठिए, हमारे त्रिलोक का मंगल कीजिए... 1 ) का उच्चारण होगा। तालियों और मंत्रोच्चार से रामलला जगाए जाएंगे। फिर स्नान कराया जाएगा। इसके बाद उनका विधिवत शृंगार होगा।
रामलला विराजमान अब तक अस्थाई मंदिर में थे। उन्हें रविवार रात नए मंदिर में लाकर विधि अनुसार सुला दिया गया।
सुबह 11-12 बजे के बीच चारों वेदों के मंत्रों द्वारा मंगलाचरण किया जाएगा। 84 सेकंड के मुख्य मुहूर्त में रामलला के प्राणों का स्थिरीकरण किया जाएगा।
इसी बीच, पीएम मोदी मां सरयू में स्नान करेंगे। वहां से मंदिर प्रांगण में पूर्व दिशा से प्रवेश करेंगे। उसके बाद आचार्यों के द्वारा दशविधि स्नान एवं प्रायश्चित दान संपादित कराने के बाद गर्भगृह में प्रवेश करेंगे।
जहां आचार्यों के द्वारा तिलक एवं स्वस्तिवाचन एवं पौराणिक मंगल मंत्रों का पाठ किया जाएगा।
पुनः संकल्प संपादित होगा और श्रीरामलला सरकार की षोडशोपचार पूजा होगी। इसमें कुल 16 तरह से पूजा की जाएगी। सबसे पहले विग्रह के पैर धोए जाएंगे, फिर हाथ। आचमन कराया जाएगा। फिर विविध स्नान ( घी, शहद, शर्करा आदि) कराएंगे।
इसके बाद शुद्ध जल से स्नान कराया जाएगा। फिर वस्त्र, उपवस्त्र और यज्ञोपवीत पहनाया जाएगा। चंदन, अक्षत, फूल, माला, तुलसी पत्र, नाना प्रकार के परिमल द्रव्य (अबीर-गुलाल, अभ्रक आदि) अर्पण किए जाएंगे। इसके उपरांत इत्र, धूपदीप देंगे। फिर भोग लगेगा। कपूर की आरती होगी। इसके बाद पुष्पांजलि और स्तुति होगी।
इससे पहले रविवार को गतिमान अनुष्ठान में कई महत्वपूर्ण विधियां संपादित की गई। इस मौके पर कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य पूज्य श्री विजयेंद्र सरस्वती जी के द्वारा विशेष न्यास विधि एवं समर्चना की गई। इस पूजा में समस्त अंगों का आह्वान एवं पूजन होता है। इसके बाद भगवान का नेत्रोन्मिलन, दर्पण दर्शन और शय्याधिवास का विधिवत अनुष्ठान किया गया।
नेत्रोन्मिलन में मंत्रों के बीच रामलला के नेत्रों से पट्टी हटाई गई। फिर दर्पण दिखाया गया और आंखों में काजल लगाया गया। प्राणप्रतिष्ठा का मुख्य उद्देश्य यह होता है कि परमात्मा की सारी शक्तियां इस विग्रह में समाहित हो जाएं।

मंगलवार, 23 जनवरी 2024

सोरठे कृष्ण, सॉनेट, सलिल २३ जनवरी, सुभाष, खरे एम.एल., नवगीत, लघुकथा



सलिल सृजन २३ जनवरी
सोरठे कृष्ण के
.
जो पूजे तर जाए, द्वादश विग्रह कृष्ण के।
पुनर्जन्म नहिं पाए, मिले कृष्ण में कृष्ण हो।।
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विग्रह-छाया रूप, राधा रुक्मिणी दो नहीं।
दोनों एक अनूप, जो जाने पा कृष्ण ले।।
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नहीं आदि; नहिं अंत, कल-अब-कल के भी परे।
कृष्ण; कहें सब संत, कंत सृष्टि के कृष्ण जी।।
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श्वेत रक्त फिर पीत हों, अंत श्याम श्रीकृष्ण।
भिन्न-अभिन्न प्रतीत हों, हो न कभी संतृष्ण।।
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भेद दिखे होता नहीं, विधि-हरि-हर त्रय एक हैं।
चित्र गुप्त है त्रयी का, मति-विवेक अरु कर्म ज्यों।।
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'अ उ म' सह प्रणव मिल, कृष्ण सृष्टि पर्याय।
कृष्णाराधन नहिं जटिल, 'क्लीं' जपे प्रभु पाय।।
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कृष्ण सुलभ हैं भक्त को, व्यक्ताव्यक्त सुमूर्त हैं।
नयन मूँद कर ध्यान नित, भक्त-हृयदे में मूर्त हैं।।
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हर अंतर कर दूर, कहें उपनिषद निकट जा।
हरि-दर्शन भरपूर, मन में कर तू तर सके।।
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विप्र-भोज के बाद ही, सुनें कथा कर ध्यान।
कर्म खरे अनुपम सही, करते सदा सुजान।।
२३-१-२०२३
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सॉनेट
स्नेह सलिल में सभी नहाओ
सद्भावों का करो कीर्तन
सदाचारमय रहे आचरण
सुमन सुमन सुरभि फैलाओ
सतत सजग सहकार न भूलो
स्वजनों का सत्कार सदा हो
सबका सबसे हित साधन हो
सुख-सपनों में झूल न फूलो
स्वेद नर्मदा नित्य नहाना
श्रम सौभाग्य निरंतर पाना
सत्य सखा को गले लगाना
ठोकर लगे, सम्हल उठ बढ़ना
पग-पग आगे-आगे बढ़ना
प्रभु अर्पित सारा फल करना
२३-१-२०२३
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यमकीय सोरठा
मन को हो आनंद, सर! गम सरगम भुला दे।
क्यों कल? रव कर आज, कलरव कर कर मिला ले।।
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सॉनेट
सुभाष
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नरनाहर शार्दूल था, भारत माँ का लाल।
आजादी का पहरुआ, परचम बना सुभाष।
जान हथेली पर लिए, ऊँचा रख निज भाल।।
मृत्युंजय है अमर यश, कीर्ति छुए आकाश।।
जीवन का उद्देश्य था, हिंद करें आजाद।
शत्रु शत्रु का मित्र कह, उन्हें ले लिया साथ।
जैसे भी हो कर सकें, दुश्मन को बर्बाद।।
नीति-रीति चाणक्य की, झुके न अपना माथ।।
नियति नटी से जूझकर, लिखा नया इतिहास।
काम किया निष्काम हर, कर्मयोग हृद धार।
बाकी नायक खास थे, तुम थे खासमखास।।
ख्वाब तुम्हारे करें हम, मिल-जुलकर साकार।।
आजादी की चेतना, तुममें थी जीवंत।
तुम जैसा दूजा नहीं, योद्धा नायक संत।।
२३-१-२०२२
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हस्तिनापुर की बिथा कथा : मानव मूल्यों को गया मथा
आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
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मनुष्य सामाजिक जीव है। समाज में रहते हुए उसे सामाजिक मान्यताओं और संबंधों का पालन करना होता है। आने से जाने तक वह अपनी अनुभूतियों को अभिव्यक्त और अन्यों की अनुभूतिजनित अभिव्यक्तियों को ग्रहण करता है। अभिव्यक्ति के विविध माध्यम अंग संचालन, भाव मुद्रा, रेखांकन, गायन, वादन नृत्य, वाणी आदि हैं। अनुभूतियों की वाणी द्वारा की गयी अभिव्यक्ति साहित्य की जननी है। साहित्य मानव-मन की सुरुचिपूर्ण ललित अभिव्यक्ति है। यह अभिव्यक्ति निरुद्देश्य नहीं होती। संस्कृत में साहित्य को ‘सहितस्य भाव’ अथवा ‘हितेन सहितं’ अर्थात ‘समुदाय के साथ’ जोड़ा जाता है। जिसमें सबका हित समाहित हो वही साहित्य है। विख्यात साहित्यकार जैनेन्द्र कुमार के शब्दों में - “मनुष्य का और मनुष्य जाति का भाषाबद्ध या अक्षर व्यक्त ज्ञान ही ‘साहित्य’ है। व्यापक अर्थ में साहित्य मानवीय भावों और विचारों का मूर्त रूप है।
बुंदेली और बुंदेलखंड
बुंदेली भारत के एक विशेष क्षेत्र बुन्देलखण्ड में बोली जाती है। बुंदेली की प्राचीनता का ठीक-ठीक अनुमान संभव नहीं है। संवत ५०० से १०० विक्रम अपभृंश काल है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार "भारत मुनि (तीसरी सदी) ने अपभृंश नाम न देकर 'देश भाषा' कहा है। डॉ. उदयनारायण तिवारी के मत में अपभृंश का विसात राजस्थान, गुजरात, बुंदेलखंड, पश्चिमोत्तर भारत, बंगाल और दक्षिण में मान्यखेत तक था। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार अपभृंश लोक प्रचलित भाषा है जो विभिन्न समयों में विभिन्न रूपों में बोली जाती थी। बुंदेली पैशाची से निकली शौरसेनी से विकसित पश्चिमी हिंदी का एक देशज रूप है। 'बिंध्याचल' की लोकमाता 'बिंध्येश्वरी' हैं। यहाँ की लोकभाषा का नाम 'बिंध्याचली' से बदलते-बदलते 'बुंदेली' हो जाना स्वाभाविक है।
ठेठ बुंदेली शब्द अनूठे हैं। वे सदियों से ज्यों के त्यों लोक द्वारा प्रयोग किये जा रहे हैं। बुंदेलखंडी के ढेरों शब्दों के अर्थ बांग्ला, मैथिली, भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी, बघेली आदि बोलने वाले आसानी से बता सकते हैं। प्राचीन काल में बुंदेली में हुए शासकीय पत्राचार, संदेश, बीजक, राजपत्र, मैत्री संधियों के अभिलेख प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। औरंगजेब और शिवाजी भी क्षेत्र के हिंदू राजाओं से बुंदेली में ही पत्र व्यवहार करते थे। बुंदेली में एक-एक क्षण के लिए अलग-अलग शब्द हैं। संध्या के लिए बुंदेली में इक्कीस शब्द हैं। बुंदेली में वैविध्य है, इसमें बांदा का अक्खड़पन है तो जबलपुर की मधुरता भी है।
वर्तमान बुंदेलखंड चेदि, दशार्ण एवं कारुष से जुड़ा था। यहाँ कोल, निषाद, पुलिंद, किराद, नाग आदि अनेक जनजातियाँ निवास करती थीं जिनकी स्वतंत्र भाषाएँ थीं। भरतमुनि के नाट्य शास्‍त्र में बुंदेली बोली का उल्लेख है। बारहवीं सदी में दामोदर पंडित ने 'उक्ति व्यक्ति प्रकरण' की रचना की। इसमें पुरानी अवधी तथा शौरसेनी ब्रज के अनेक शब्दों का उल्लेख है। इसी काल (एक हजार ईस्वी) के बुंदेली पूर्व अपभ्रंश के उदाहरणों में देशज शब्दों, की बहुलता हैं। हिंदी शब्दानुशासन (पं॰ किशोरीलाल वाजपेयी) के अनुसार हिंदी एक स्वतंत्र भाषा है, उसकी प्रकृति संस्कृत तथा अपभ्रंश से भिन्न है। बुंदेली की माता प्राकृत-शौरसेनी मौसी संस्कृत तथा बृज व् कन्नौजी सहोदराएँ हैं। बुंदेली भाषा की अपनी चाल, अपनी प्रकृति तथा वाक्य विन्यास को अपनी मौलिक शैली है। भवभूति (उत्तर रामचरितकार) के ग्रामीणजनों की भाषा विंध्‍येली प्राचीन बुंदेली ही है। संभवतः चंदेल नरेश गंडदेव (सन् ९४० से ९९९ ई.) तथा उसके उत्तराधिकारी विद्याधर (९९९ ई. से १०२५ ई.) के काल में बुंदेली के प्रारंभिक रूप में महमूद गजनवी की प्रशंसा की कतिपय पंक्तियाँ लिखी गई। इसका विकास रासो काव्य धारा के माध्यम से हुआ। जगनिक आल्हाखंड तथा परमाल रासो प्रौढ़ भाषा की रचनाएँ हैं। बुंदेली के आदि कवि के रूप में प्राप्त सामग्री के आधार पर जगनिक एवं विष्णुदास सर्वमान्य हैं, जो बुंदेली की समस्त विशेषताओं से मंडित हैं। बुंदेली के बारे में कहा गया है: 'बुंदेली वा या है जौन में बुंदेलखंड के कवियों ने अपनी कविता लिखी, बारता लिखवे वारों ने वारता (गद्य वार्ता) लिखी।
बुंदेली वैविध्य
बोली के कई रूप जगा के हिसाब से बदलत जात हैं। जई से कही गई है कि- 'कोस-कोस पे बदले पानी, गाँव-गाँव में बानी'। बुंदेलखंड में जा हिसाब से बहुत सी बोली चलन में हैं जैसे डंघाई, चौरासी, पवारी, पछेली, बघेली आदि। उत्तरी क्षेत्र (भिंड, मुरैना, ग्वालियर, आगरा, मैनपुरी, दक्षिणी इटावा आदि में बृज मिश्रित बुंदेली (भदावरी ) प्रचलित है। दक्षिणी क्षेत्र (उत्तरी छिंदवाड़ा (अमरवाड़ा, चौरई) व् सिवनी जिला (महाराष्ट्र से सटे गाँव छोड़कर) बुंदेली भाषी है। पूर्वी क्षेत्र (जालौन, हमीरपुर, पूर्वी छतरपुर, पन्ना, कटनी) में शुद्ध बुंदेली बोली जाती है किन्तु उत्तर-पश्चिम हमीरपुर व् दक्षिणी जालौन में बुंदेली का 'लोधांती' रूप तथा यमुना के दक्षिणी भाग में 'निभट्टा' प्रचलित है। दक्षिणी पन्ना की बुंदेली पर बघेली का प्रभाव (बनाफरी) है। पश्चिमी क्षेत्र में (मुरैना, श्योपुर, शिवपुरी, गुना, विदिशा, पश्चिमी होशंगाबाद (हरदा मिश्रित बुंदेली भुवाने की बोली') व सीहोर (मालवी मिश्रित बुंदेली) सम्मिलित है। मध्यवर्ती क्षेत्र (दतिया, छतरपुर, झाँसी, टीकमगढ़, विदिशा, सागर दमोह, जबलपुर, रायसेन, नरसिंहपुर) में शुद्ध बुंदेली लोक भाषा है।
बुंदेली वैशिष्ट्य
बुंदेली में क्रियापदों में गा, गे, गी का अभाव है। होगा - हुइए, बढ़ेगा - बढ़हे, मरेगा - मरहै, खायेगा - खाहै हो जाते हैं। 'थ' का 'त' तथा 'ह' का 'अ' हो जाता है, नहीं था - नई हतो, ली थी - लई तीं, जाते थे - जात हते आदि। कर्म कारक परसर्ग में 'खों' और 'कों' प्रचलित हैं। संज्ञा शब्दों का बहुवचन 'न' और 'ऐं' प्रत्यय लगकर बनाये जाते हैं। करन कारक 'से' 'सें' हो जाता है। संयुक्त वर्ण को विभाजन हो जाता है ' प्रजा से' 'परजा सें' हो जाता है। हकार का लोप हो जाता है - बहिनें - बैनें, कहता - कैत, कहा - कई, उन्होंने - उन्नें, बहू - बऊ, पहुँची - पौंची, शाह - शाय आदि। लोच और माधुर्यमयी बुंदेली 'ण' को 'न' तथा 'ड़' को 'र' में बदल लेती है। उच्चारण में 'अनुस्वार' को प्रधानता है - कोई - कोनउँ, उसने - ऊनें, आदि। संज्ञा एकवचन को बहुवचन में बदलने हेतु 'न' व 'ए' प्रत्यय लगाए जाते हैं। यथा सैनिक - सैनिकन, आदमी - आदमियन, पुस्तक - पुस्तकें आदि। शब्दों के संयुक्त रूप भी प्रयोग किये जाते हैं। यथा जैसे ही - जैसई, हद ही कर दी - हद्दई कर दई आदि। अकारान्त संज्ञा-विशेषणों का उच्चारण औकारांत हो जाता है। पखवाड़ा - पखवाडो, धोकर - धोकेँ आदि। लेकिन के लिए 'पै' का प्रयोग होता है। तृतीय पुरुष में एकवचन 'वह' का 'बौ / बो' हो जाता है। इसके कारकीय रूप बा, बासें, बाने, बाकी, बह वगैरह हैं। सानुनासिकता बुंदेली की विशेषता है। उन्नें, नईं, हतीं, सैं आदि। था, थी, थे आदि क्रमश: हतौ, हती, हते आदि हो जाते हैं। भविष्यवाची प्रत्यय गा, गी, गे का रूप बदल जाता है। होगा - हुइए, चढ़ेगा - चढ़हे, चढ़ चूका होगा - चढ़ चुकौ हुइए।
बुंदेली साहित्य सृजन परंपरा
बुंदेली साहित्य और लोक साहित्य की सुदीर्घ परंपरा १००० वि. से अब तक अक्षुण्ण है। जगनिक (संवत १२३०), विष्णुदास, मानिक कवि, थेपनाथ, छेहल अग्रवाल,गुलाब कायस्थ (१५०० वि.), बलभद्र मिश्र (१६०० वि.), हरिराम व्यास, कृपाराम, गोविंद स्वामी, बलभद्र कायस्थ (१६१० वि.), केशवदास (१६१२ वि.), खड़गसेन कायस्थ (१६६० वि.), सुवंशराय कायस्थ (१६८० वि.), अंबाप्रसाद श्रीवास्तव 'अक्षर अनन्य', बख्शी हंसराज,ईसुरी (१८०० वि.), पद्माकर (१८१० वि.), गंगाधर व्यास, ख्यालीराम, घनश्याम कायस्थ (१७२९ वि.), रघुराम कायस्थ (१७३७ वि.), लाल कवि, हिम्मद सिंह कायस्थ (१७४८ वि.), रसनिधि (१७५० वि.), हंसराज कायस्थ (१७५२ वि.), खंडन कायस्थ (१७५५ वि.), खुमान कवि, नवल सिंह कायस्थ (१८५० वि.), फतेहसिंह कायस्थ (१७८० वि.), शिवप्रसाद कायस्थ (१७९८ वि.), गुलालसिंह बख्शी (१९२२ वि.), मदनेश (१९२४ वि.), मुंशी अजमेरी (१९३९ वि.), रामचरण हयारण 'मित्र' (१९४७ वि.), जीवनलाल वर्मा 'विद्रोही व भगवान सिंह गौड़ (१९७२ वि.), कन्हैयालाल 'कलश' (१९७६ वि.), भैयालाल व्यास (१९७७ वि.), वासुदेव प्रसाद खरे (१९७९ वि.), नर्मदाप्रसाद गुप्त ( १९८८ वि.) के क्रम में इस प्रबंध काव्य के रचयिता महाकवि मुरारीलाल खरे (१९८९ वि.) ने बुंदेली और हिंदी वांग्मय को अपनी विलक्षण काव्य प्रतिभा से समृद्ध किया है। वाल्मीकि रामायण का ७ भागों में हिंदी पद्यानुवाद, रामकथा संबंधी निबंध संग्रह यावत् स्थास्यन्ति महीतले, संक्षिप्त बुंदेली रामायण तथा रघुवंशम के हिंदी पद्यानुवाद, के पश्चात् बुंदेली में संक्षिप्त महाभारत 'कुरुक्षेत्र की बिथा कथा रचकर हिंदी-बुंदेली दोनों को समृद्ध है। भौतिकी के आचार्य डॉ. एम. एल. खरे भाषिक शुद्धता और कथा-क्रम के प्रति आग्रही हैं। वे छंद की वाचिक परंपरा के रचनाकार हैं। वार्णिक-मात्रिक छंदों मानकों का पालन करने के लिए कथ्य या कथा वस्तु से समझौता स्वीकार्य नहीं है। इसलिए उनका काव्य कथानक के साथ न्याय कर पाता है।
बुंदेली में वीर काव्य
विश्व की सभी प्रधान भाषाओँ में वीर काव्य लेखन की परंपरा रही है। रामनारायण दूगड़ 'रहस' या 'रहस्य' से तथा आचार्य रामचंद्र शुक्ल, प्रो। ललिता प्रसाद सुकुल आदि 'रसायण' से रासो की उत्पत्ति मानते हैं। डॉ. काशीप्रसाद जायसवाल कविराज श्यामदास आदि 'रहस्य - रहस्सो - रअस्सो - रासो' विकासक्रम के समर्थक हैं। मुंशी देवी प्रसाद के मत में बुंदेली में वीर काव्य को 'रासो' कहा जाता है। डॉ. ग्रियर्सन राज्यादेश से रासो उत्पत्ति मानते हैं। महामहोपाध्याय डॉ. हरप्रसाद शास्त्री रासा (क्रीड़ा या झगड़ा) को रासो का जनक बताते हैं। महामहोपाध्याय डॉ.गौरीशंकर हीराचंद ओझा संस्कृत 'रास' रासो की उत्पत्ति के पक्षधर हैं। बुंदेलखंड में 'हों लगे सास-बहू के राछरे' जैसी पक्तियाँ रासो का उद्भव राछरे से इंगित करती हैं। रासो में किसी वीर नायक का चरित्र, संघर्ष, जय-पराजय आदि गीतमय वर्णन होता है। रासो शोकांत (ट्रेजिक एंड) जान मानस में सफल होता है। जगनिक कृत आल्ह खंड, चंद बरदाई रचित पृथ्वीराज रासो, दलपति विजय कवि कृत खुमान रासो, नरपति नाल्ह द्वारा लिखित बीसलदेव रासो आदि अपने कथानायकों के शौर्य का अतिरेकी, अतिशयोक्तिपूर्ण अतिरंजित वर्णन। अवास्तविक भले ही हो श्रोताओं-पाठकों को मोहता है। जगनिक "एक को मारे दो मर जाँय, तीजा गिरे कुलाटी खाँय'' लिखकर इस परंपरा का बीजारोपण करते हैं। रासो काव्यों की ऐतिहासिकता भी प्रश्नों के घेरे में रही है।
संस्कृत काव्यशास्त्र में महाकाव्य (एपिक) का प्रथम सूत्रबद्ध लक्षण आचार्य भामह ने प्रस्तुत किया है और परवर्ती आचार्यों में दंडी, रुद्रट तथा विश्वनाथ ने अपने अपने ढंग से इस महाकाव्य(एपिक)सूत्रबद्ध के लक्षण का विस्तार किया है। आचार्य विश्वनाथ का लक्षण निरूपण इस परंपरा में अंतिम होने के कारण सभी पूर्ववर्ती मतों के सार-संकलन के रूप में उपलब्ध है। महाकाव्य में भारत को भारतवर्ष अथवा भरत का देश कहा गया है तथा भारत निवासियों को भारती अथवा भरत की संतान कहा गया है ,
महाभारत रासो काव्यों के लक्षणों से युक्त महाकाव्य है। रासो की तरह नायकों की अतिरेकी शौर्य कथाएँ और वंश परिचय महाभारत में है। रासों से भिन्नता यह कि नायक कई हैं तथा नायकों के अवगुणों, पराजयों व पीड़ाओं का उल्लेख है। भिन्न-भिन्न प्रसंगों में उदात्त-वीर नायक बदलते हैं। एक सर्ग का नायक अन्य सर्ग में खलनायक की तरह दिखता है। इस दृष्टि से महाभारत रासो-का समुच्चय प्रतीत है।महाभारत की कथा चिर काल से सृजनधर्मियों का चित्त हरण करती रही है। अनेक रचनाकारों ने गद्य और पद्य दोनों में महाभारत की कथा के विविध आयाम उद्घाटित किये हैं। डॉ. मुरारीलाल खरे जी द्वारा रचित यह प्रबंध काव्य कृति रासो काव्य लक्षणों से यथास्थान अलंकृत है।
श्रव्य काव्य : प्रबंध काव्य और महाकाव्य
श्रव्य काव्य का लक्षण श्रवण में आनंद मिलना है। प्रबंध काव्य में श्रवयत्व और पाठ्यत्व दोनों गुण होते हैं।
प्रबंध का अर्थ है प्रबल रूप से बँधा हुआ। प्रबंध का प्रत्येक अंश अपने पूर्व और पर अंश के साथ निबध्द होता है। प्रबंध काव्य में कोई प्रमुख कथा काव्य के आदि से अंत तक क्रमबद्ध रूप में चलती है। कथा का क्रम बीच में कहीं नहीं टूटता और गौण कथाएँ बीच-बीच में सहायक बन कर आती हैं। प्रबंध काव्य के दो भेद होते हैं -
महाकाव्य
खण्डकाव्य
महाकाव्य में किसी ऐतिहासिक या पौराणिक महापुरुष की संपूर्ण जीवन कथा का आद्योपांत वर्णन होता है। खंडकाव्य में किसी की संपूर्ण जीवनकथा का वर्णन न होकर केवल जीवन के किसी एक ही भाग का वर्णन होता है। महाकाव्य अपने देश की जातीय और युगीन सभ्यता-संस्कृति के वाहक होते हैं। इनमें ऐतिहासिक घटनाओं के साथ मिथकों का अंतर्गुफन रहता है। इन महाकाव्यों के केन्द्र में युद्ध रहता है जो व्यक्तिगत तथा वंशगत सीमाओं से ऊपर उठकर जातीय युद्ध का रूप धारण कर लेता है। भारतीय महाकाव्यों में ये 'धर्मयुद्ध' के रूप में लड़े गए हैं। इलियड और ओडिसी में ये युद्ध मूलतः जातीय युद्ध हैं- धर्मयुद्ध नहीं। इसका कारण यह है कि यूनानी चिंतक भाग्यवादी रहा है किन्तु यहाँ भी धर्म की पराजय और अधर्म की विजय को मान्यता नहीं दी गई। रचनाबद्ध होने से पहले इनकी मूलवर्ती घटनाएं मौखिक परंपरा के रूप में रहती हैं। इसलिए सार्वजनिक प्रस्तुति के साथ किसी-न-किसी रूप में इनका प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष संबंध रहता है। इनकी शैली पर वाचन-शैली का प्रभाव अनिवार्यतः लक्षित होता है।
हिंदी में आल्ह खंड (जगनिक), पृथ्वीराज रासो (चंदबरदाई), पद्मावत (जायसी), रामचरित मानस (तुलसीदास), साकेत (मैथिलीशरण गुप्त), साकेत संत (बलदेव प्रसाद मिश्र), प्रियप्रवास (अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध'), कृष्णायण (द्वारिकाप्रसाद मिश्र), कामायनी (जयशंकर प्रसाद), वैदेही वनवास (हरिऔध), सिद्धार्थ (अनूप शर्मा), हल्दीघाटी (श्यामनारायण नारायण पांडेय), कुरुक्षेत्र (दिनकर), आर्यावर्त (मोहन लाल महतो), नूरजहां (गुरुभक्त सिंह), गांधी पारायण (अंबिकाप्रसाद दिव्य), कैकेयी (इंदु सक्सेना), उत्तर रामायण तथा उत्तर भागवत (डॉ. किशोर काबरा), दधीचि (आचार्य भगवत दुबे), महिजा तथा रत्नजा (डॉ. सुशीला कपूर), वीरांगना दुर्गावती ( गोविंद प्रसाद तिवारी), विवेक श्री (श्रीकृष्ण सरल), मृत्युंजय मानव गणेश (डॉ. जगन्नाथ प्रसाद 'मिलिंद'), कुटिया का राजपुरुष (विश्वप्रकाश दीक्षित 'बटुक'), कुँअर सिंह (चंद्रशेखर मिश्र), उत्तर कथा (प्रतिभा सक्सेना), महामात्य, सूतपुत्र तथा कालजयी (दयाराम गुप्त 'पथिक'), दलितों का मसीहा (जयसिंह व्यथित), क्षत्राणी दुर्गावती (केशव सिंह दिखित), रणजीत राय (गोमतीप्रसाद विकल), स्वयं धरित्री ही थी (रमाकांत श्रीवास्तव), परे जय पराजय के (डॉ. रमेश कुमार बुधौलिआ), मानव (डॉ. गार्गीशरण मिश्र 'मराल'), महानायक वीरवर तात्या टोपे (वीरेंद्र अंशुमाली), दमयंती (नर्बदाप्रसाद गुप्त), महाराणा प्रताप व् आहुति (डॉ. बृजेश सिंह), राष्ट्र पुरुष नेताजी सुभाषचंद्र बोस (रामेश्वर नाथ मिश्र 'अनुरोध'), मांडवी एक विस्मृता (सरोज गौरिहार), शौर्य वंदन (रवींद्र नाथ तिवारी) आदि महाकाव्य के रत्नहार में 'हस्तिनापुर की बिथा कथा' एक दीप्तिमान रत्न की तरह विश्ववाणी हिंदी के रत्नागार की श्रीवृद्धि करेगा।
'हस्तिनापुर की बिथा कथा' महाभारत में वर्णित कौरव-पांडव संघर्ष केंद्रित होते हुए भी स्वतंत्र काव्य कृति है। हस्तिनापुर नायक है जिसकी व्यथा कारण कुरु कुलोत्पन्न धृतराष्ट्र पुत्र और पाण्डु पुत्र बने। वस्तुत: हस्तिनापुर मानव संस्कृति और मानव मूल्यों के अतिरेक का शिकार हुआ। आदर्शवादियों ने आत्मकेंद्रित होकर मूल्यों का मनमाना अर्थ लगाया और नीति पर चलते-चलते अनीति कर बैठे। स्वार्थ-संचालित जनों ने 'स्व' के लिए 'पर' ही नहीं 'सर्व' को भी नाश नहीं किया, बिन यह सोचे कि वे स्वयं नहीं बच सकेंगे। डॉ.खरे ने आरंभ में ही राजवंश में अंतर्व्याप्त द्वेष को द्वन्द का मूल कारण बताते हुए 'गेहूँ के साथ घुन पिसने' की तरह आर्यावर्त अर्थात आम जन का बिना किसी कारण विनाश होने का संकेत किया है।
राजबंस की द्वेष आग में झुलस आर्यावर्त गओ
घर में आग लगाई घर में बरत दिया की भड़की लौ
कौरव-पांडवों की द्वेषाग्नि और कुल की रक्षा हेतु राजकुमारों को दिलायी गयी शिक्षा और अस्त्र-शस्त्र ही कुल के विनाश में सहायक हुए।
दिव्य अस्त्र पाए ते जतन सें होवे खों कुल के रक्षक
नष्ट भये आपस में भिड़कें , बने बंधुअन के भक्षक
महाभारत के विस्तृत कथ्य को समेटते हुए मौलिकता की रक्षा करने के साथ-साथ पाठकीय अभिरुचि, आंचलिक बोली का वैशिष्ट्य, छांदस लयबद्धता और लालित्य बनाये रखने पञ्च निकषों पर खरी कृति जी रचना कर पाना खरे जी के ही बस की बात है।संस्कृत काव्य शास्त्र में भामह, डंडी, रुद्रट, विश्वनाथ आदि आचार्यों ने कथानक की ऐतिहासिकता, कथानक का अष्टसर्गीय अथवा अधिक विस्तार, कथानक का क्रमिक विकास, धीरोदात्त नायक, अंगी रस (श्रृंगार, वीर, शांत व् करुण में से एक), लोक कल्याण की प्राप्ति, छंद वैविध्य, भाषिक लालित्य आदि महाकाव्य के तत्व कहे हैं। अरस्तू के अनुसार महाकाव्य की भाषा प्रसन्नतादायी हो किंतु क्षुद्र (अशुद्ध) न हो। स्पेंसर महाकाव्य के लिए वैभव-गरिमा को आवश्यक मानते हैं। औदात्य और औदार्य, शौर्य और पराक्रम, श्रृंगार और विलास, त्याग और वैराग, गुण और दोष के पञ्च निकषों पर ' हस्तिनापुर की बिथा कथा' अपनी मिसाल आप है।
मौलिकता
महाकाव्य में मौलिकता का अपना महत्त्व है। खरे जी ने यत्र - तत्र पात्रों और घटनाओं पर अपनी ओर से गागर में सागर की तरह टिप्पणियाँ की हैं। द्रोणाचार्य के मनोविज्ञान पर दो पंक्तियाँ देखें -
द्रोण चाउतते उनकौ बेटा अर्जुन सें बड़केँ जानें
सो अर्जुन खों पौंचाउतते पानी ल्याबे के लाने
सत्यवती के पोतों में से विदुर में क्षत्रिय रक्त न होने के कारण स्वस्थ्य व योग्य होते हुए भी सिंहासन योग्य न माने जाने की तर्कसम्मत स्थापना खरे जी है। गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित महाभारत में भीष्म का लालन-पालन गंगा द्वारा करना वर्णित है जबकि खरे जी ने शांतनु द्वारा बताया है। अशिक्षित सत्यवती द्वारा उचित-अनुचित का विचार किये बिना, पुत्र वधुओं की सहमति के बिना वंश वृद्धि के मोह में बलात सन्तानोपत्ति हेतु विवश करना और उसका दुष्प्रभाव संतान पर होना विज्ञान सम्मत है।
गांधारी द्वारा अंधे पति की आँखें न बनकर खुद भी आँखों पर पट्टी बाँधकर नेत्रहीन होने के दुष्प्रभाव को भी इंगित किया गया है।
पतिब्रता धरम जानकेँ धरमसंगिनी तौ हो गइ
आँखें खुली राख के भोली अंधे की लठिया नइं भइ
आदर्श और पराक्रमी माने जाने वाले भीष्म धृतराष्ट्र को सम्राट बनाते समय यह नहीं सोच सके कि पदका का नशा चढ़ता है, उतरता नहीं -
धृतराष्ट्र को पुत्र जेठो अधिकार माँगहै गद्दी पै
जौ नइं सोचे भीष्म , बिचार कर सकोतो धीवर जी पै
बुंदेलखंड में दोहा प्रचलित है 'जब जैसी भबितब्यता, तब तैसी बने सहाय / आप न जावै ताहि पै, ताहि तहाँ लै जाए', तुलसीदास जी लिखते हैं 'होइहै सोही जो राम रचि राखा', खरे जी के अनुसार हैं हस्तिनापुर में भी 'भावी प्रबल' थी जिसे भीष्म नहीं जान या टाल सके-
सोचन लगे पितामह घर में इत्ते सूरबीर हैं जब
कोऊ दुस्मन कर नइं पाये ई राज पै आक्रमन अब
बे का जानतते जा शिक्षा मिली परस्पर लड़बे खों
अस्त्र - सस्त्र जे काम आउनें आपुस में मर मिटवे खों
धृतराष्ट्र के बुलाने पर पांडव दोबारा जुआं खेलने पहुँचे। कवि इस पर टिप्पणी करता है -
काका की आज्ञा को पालन मानत धरम युधिष्ठिर रए
एक बेर के जरे आग में हाँत जराउन फिर आ गए
ऐसी ही टिप्पणी गंधर्वराज से लड़-हार कर बंदी बने कौरवों को पांडवों द्वारा मुक्त कराये जाने के प्रसंग में भी है -
नीच सुभाव होत जिनकौ , ऐसान कौऊ कौ नइं मानत
बदी करत नेकी के बदलैं , होशयार खुद खों जानत
ऐसी टिप्पणियाँ कथा - प्रवाह में बाधक न होकर , पाठक के मन की बात व्यक्त कर उसे कथा से जोड़ने में सफल हुई हैं।
पांडवों के मामा शल्य उनकी सहायता हेतु आते हुए मार्ग दुर्योधन के कपट जाल में फँसकर उसके पक्ष में फिसल गए। यहाँ (अन्यत्र भी) कवि ने मुहावरे का सटीक प्रयोग किया है - ' बेपेंदी के लोटा घाईं लुड़क दूसरी तरफ गए ' ।
दिशा - दर्शन
महाकवि खरे जी ने यत्र - तत्र नीतिगत संकेत इस तरह किये हैं कि वे कथा - प्रवाह को अवरुद्ध किये बिना पाठकों और राष्ट्र नायकों को राह दिखा सकें -
' सत्यानास देस का भओ तो , नई बंस कौ भओ भलो '
संकेत स्पष्ट है कि देश को हानि पहुँचाकर खुद का भला नहीं किया जा सकता। ऐसे अनेक संकेत कृति को प्रासंगिक और उपादेय बनाते हैं।
जीवन में अव्यवहारिक, अस्वाभाविक निर्णय दुखद तथा विनाशकारी परिणाम देते हैं। आत्मगौरव को सर्वोच्च मानने और कुल अथवा समाज के हित को गौड़ मानने का परिणाम दुखद हुआ -
महात्याग से नाव भीष्म कौ जग में भौत बड़ो हो गओ
पर कुल की परंपरा टूटी , बीज अनीति कौ पर गओ
आगें जाकर अंकुर फूटे , बड़ अनीति विष बेल बनी
जीसें कुल में तनातनी भइ , भइयन बीच लड़ाई ठनी
रक्त शुद्धता न होने कारण सर्वथा योग्य विदुर की अवमानना , जाति के आधार पर एकलव्य और कर्ण के साथ अन्याय , अंबा , अंबिका , अंबालिका द्रौपदी आदि स्त्री रत्नों की अवहेलना , पुत्र मोह , ईर्ष्या , द्वेष अहंकार आदि यथास्थान यथोचित विवेचना कर खरे जी ने कृति को युगबोध, सामयिकता लोकोपयोगिता के निकष पर खरा रचा है।
कथाक्रम सुविदित होने कारण उत्सुकता और कौतुहल बनाये रखने की चुनौती को खरे ने स्वीकारा और जीता है। देश - काल की परिस्थितियों और चुनौतियों के परिप्रेक्ष्य में सर्पोवोपयोगी कृति का प्रणयन कर खरे जी ने हिंदी - बुंदेली रत्नागार को समृद्ध किया है। उनकी आगामी कृति की प्रतीक्षा पाठकों को रहेगी।
२३.१.२०२१
***
नवगीत
सड़क पर
*
सड़क पर
सिसकती-घिसटती
हैं साँसें।
*
इज्जत की इज्जत
यहाँ कौन करता?
हल्ले के हाथों
सिसक मौन मरता।
झुठला दे सच,
अफसरी झूठ धाँसे।
जबरा यहाँ जो
वही जीतता है।
सच का घड़ा तो
सदा रीतता है।
शरीफों को लुच्चे
यहाँ रोज ठाँसें।
*
सौदा मतों का
बलवा कराता।
मज़हबपरस्तों
को, फतवा डरता।
सतत लोक को तंत्र
देता है झाँसे।
*
यहाँ गूँजते हैं
जुलूसों के नारे।
सपनों की कोशिश
नज़र हँस उतारे।
भोली को छलिए
बिछ जाल फाँसें।
*
विरासत यही तो
महाभारती है।
सत्ता ही सत को
रही तारती है
राजा के साथी
हुए हाय! पाँसे।
२०.१.२०१८
***

लघु कथा -
जैसे को तैसा
*
कत्ल के अपराध में आजीवन कारावास पाये अपराधी ने न्यायाधीश के सामने ही अपने पिता पर घातक हमला कर दिया। न्यायाधीश ने कारण पूछा तो उसने नाट्य की उसके अपराधी बनने के मूल में पिता का अंधा प्यार ही था। बचपन में मामा की शादी में उसने पिता के एक साथी की पिस्तौलसे ११ गोलियाँ चला दी थीं। पिता ने उसे डाँटने के स्थान पर जाँच करने आये पुलिस निरीक्षक को राजनैतिक पहुँच से रुकवा दिया तथा झूठा बयान दिलवा दिया की उसने खिलौनेवाली पिस्तौल चलायी थी। पहली गलती पर सजा मिल गयी होती तो वह बात-बात पर पिस्तौल का उपयोग करना नहीं सीखता और आज आजीवन कारावास नहीं पाता। पिता उसका अपराधी है जिसे दुनिया की कोई अदालत या कानून दोषी नहीं मानेगा इसलिए वह अपने अपराधी को दंडित कर संतुष्ट है, अदालत उसे एक जन्म के स्थान पर दो जन्म का कारावास दे दे तो भी उसे स्वीकार है।
२३.१.२०१६
***
गीतः
सुग्गा बोलो
जय सिया राम...
सन्जीव
*
सुग्गा बोलो
जय सिया राम...
*
काने कौए कुर्सी को
पकड़ सयाने बन बैठे
भूल गये रुकना-झुकना
देख आईना हँस एँठे
खिसकी पाँव तले धरती
नाम हुआ बेहद बदनाम...
*
मोहन ने फिर व्यूह रचा
किया पार्थ ने शर-सन्धान
कौरव हुए धराशायी
जनगण सिद्‍ध हुआ मतिमान
खुश मत हो, सच याद रखो
जन-हित बिन होगे गुमनाम...
*
हर चूल्हे में आग जले
गौ-भिक्षुक रोटी पाये
सांझ-सकारे गली-गली
दाता की जय-जय गाये
मौका पाये काबलियत
मेहनत पाये अपना दाम...
*
१३-७-२०१४

रविवार, 21 जनवरी 2024

पुरोवाक्, अमिता मिश्रा "मीतू"

पुरोवाक्
मन से मन के तार जोड़ती कविताएँ
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
कविता क्या है?  एक यक्ष प्रश्न जिसके उत्तर उत्तरदाताओं की संख्या से भी अधिक होते हैं। कविता क्यों है?,  कविता कैसे हो? आदि प्रश्नों के साथ भी यही स्थिति है। किसी प्रकाशक से काव्य संग्रह छापने बात कीजिए उत्तर मिलेगा 'कविता बिकती नहीं'। पाठक कविता पढ़ते नहीं हैं, पढ़ लें तो समझते नहीं हैं, जो समझते हैं वे सराहते नहीं हैं। विचित्र किंतु सत्य यह कि इसके बाद भी कविता ही सर्वाधिक लिखी जाती है। देश और दुनिया की किसी भी भाषा में कविता लिखने और कविता की किताबें छपानेवाले सर्वाधिक हैं। इसका सीधा सा अर्थ है कि तथाकथित  प्रकाशकों के घर का चूल्हा कविता ही जलाती है। 

दुनिया में लोगों की  केवल दो जातियाँ हैं। पहली वह जिसका समय नहीं कटता,  दूसरी वह जिसको समय नहीं मिलता। मजेदार बात यह है की कविता का वायरस दोनों को कोरोना-वायरस की  तरह पड़कता-जकड़ता है और फिर कभी नहीं छोड़ता।

दरवाजे पर खड़े होकर 'जो दे उसका भी भला, जो न दे उसका भी भला' की टेर लगानेवाले की तरह कहें तो 'जो कविता लिखे उसका भी भला, जो कविता न लिखे उसका भी भला'। कविता है ऐसी बला कि जो कविता पढ़े उसका भी भला, जो कविता न पढ़े उसका भी भला', 'जो कविता समझे उसका भी भला, जो कविता न समझे उसका भी भला'। 

कविता अबला भी है, सबला भी है और तबला भी है। अबला होकर कविता आँसू बहाती है, सबला होकर सामाजिक क्रांति को जनम देती है और तबला होकर अपनी बात डंके पर चोट की तरह कहती है। 

'कहते हैं जो गरजते हैं वे बरसते नहीं', कविता इस बात को झुठलाती और नकारती है, वह गरजती भी, बरसती भी है और तरसती-तरसाती भी है।

कविता के सभी लक्षण और गुण कामिनी में भी होते हैं। शायद इसीलिए कि दोनों समान लिंगी हैं। कविता और कामिनी के तेवर किसी के सम्हालते नहीं सम्हलते। 

मीतू मिश्रा की कविता भी ऐसी ही है। सदियों से सड़ती-गलती सामाजिक कुरीतियों और कुप्रथाओं पर पूरी निर्ममता के साथ शब्दाघात करते हुए मीतू चलभाष और अंतर्जाल के इस समय में शब्दों का अपव्यय किए बिना 'कम लिखे से अधिक समझना' की भुलाई जा चुकी प्रथा को कविताई में जिंदा रखती है। मीतू की कविताओं के मूल में स्त्री विमर्श है किंतु यह स्त्री विमर्श तथा कथित प्रगति शीलों के अश्लील और दिग्भ्रमित स्त्री विमर्श की तरह न होकर शिक्षा, तर्क और स्वावलंबन पर आधारित सार्थक स्त्री विमर्श है। कुरुक्षेत्र में कृष्ण के शंखनाद की तरह मीतू इस संग्रह के शाब्दिक शिलालेख पर लिखती है-    

'निकल पड़ी है वो सतरंगी ख्वाबों में
भरती रंग.... स्वयं सिद्धा बनने की ओर।' 

मीतू यहीं नहीं रुकती, वह समय और समाज को फिर चेताती है- 

'चल पड़ी है वो औरत अकेली
छीनने अपने हिस्से का आसमान।' 

लोकोक्ति है 'अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता' लेकिन मीतू की यह 'अकेली औरत' हिचकती-झिझकती नहीं। यह तेवर इन कविताओं को जिजीविषाजयी बनाता है। अकेली औरत किसी से कुछ अपेक्षा न करे इसलिए कवयित्री उसे झकझोरकर कहती है-  

'हे स्त्री! मौन हो जाओ
नही है कोई जो महसूस कर सके
तुम्हारी अव्यक्त पीड़ा..
लगा सके मरहम, पोंछे आँसू 
कभी विद्रोही, कभी चरित्रहीन
कहकर चल देंगे समाज के जागरूक लोग
धीरे धीरे तुम्हें सुलगता छोड़कर।' 

समाज के जिन जागरूक लोगों (लुगाइयों समेत) की मनोवृत्ति का संकेत यहाँ है, वे हर देश-काल में रहे हैं। सीता हों या द्रौपदी, राधा हों या मीरां इन जागरूक लोगों ने पूरी एकाग्रता और पुरुषार्थ के साथ उन्हें कठघरे में खड़ा किया, बावजूद इस सच के कि वे कन्या पूजन भी करते रहे और त्रिदेवियों की उपासना भी। दोहरे चेहरे, दोहरे आचरण और दोहरे मूल्यों के पक्षधरों को मीतू बताती है-  

'कण कण में ही नारी है
नारी है तो नर जीवन है
बिन नारी क्या सृष्टि है?'

यह भी कहती है- 

'नारी
ढूँढ ही लेती है
निराशाओं के बीच
एक आशा की डोर
थामे टिमटिमाती लौ आस की
बीता देती है जीवन के अनमोल पल
एक धुँधले सुकून की तलाश में
एक पल जीती ..फिर टूटती अगले ही पल' 

इयान कविताओं की 'नारी' अंत में इन तथाकथित 'लोगों' की अक्षमता और असमर्थता को आईना दिखाते हुए  'साम्राज्य के आधे भाग की जगह केवल पाँच गाँव' की चाह करती है-   

'मध्यमवर्ग की कोमल स्त्री
जिंदगी की जमापूंजी से
खर्च करना चाहती है
कुछ वक्त अपने लिए अपने ही संग' 

इतिहास पाने को दुहराता है, पाँच गाँव चाहने पर 'सुई की नोक के बराबर भूमि भी नहीं दूँगा' की गर्वोक्ति करने वाले सत्ताधीशों और उन्हें पोषित करनेवाले नेत्रहीनों को समय ने कुरुक्षेत्र में सबक सिखाया। वर्तमान समाज के ये 'लोग' भी यही आचरण कर रहे हैं। ये आँखवाले आँखें होते हुए भी नहीं देख पाते कि-     

'एक चेहरा
ढोता बोझ
कई किरदारों का' 

वे महसूस नहीं कर पाते कि- 

'नारी सबको उजियारा दे
खुद अँधियारे में रोती है।'

यह समाज जानकार भी नहीं जानना चाहता कि- 

'अपने ही हाथों
जला लेती हैं
अपना आशियाना
घर फूँक तमाशा देखती हैं
प्रपंच और दुनियादारी में
उलझी किस्सा फरेब
बेचारी औरतें'

इस समाज की आँखें खोलने का एक ही उपाय है कि औरत 'बेचारी' न होकर 'दुधारी' बने और बता दे-  

'कोमल देह इरादे दृढ़ हैं
हालातों से नही डरे
तोड़ पुराने बंधन देखो
नव समाज की नींव गढ़े।'

औरत के सामने एक ही राह है। उसे समझना और समझाना होगा कि वह खिलौना नहीं खिलाड़ी है, बेचारी नहीं चिंगारी है। मीतू की काव्य नायिका समय की आँखों में आँखें डालकर कहती है- 

'जीत पाओगे नहीं
पौरुष जताकर यूँ कभी
हार जाऊंगी स्वयं ही
प्रीत करके देखलो!
दंभ सारे तोड़कर
निश्छल प्रणय स्वीकार लो,
मैं तुम्हारी परिणीता
अनुगामिनी बन जाऊंगी!' 

समाज इन कविताओं के मर्म को धर्म की तरह ग्रहण कर सके तो ही शर्म से बच सकेगा। ये कविताएँ वाग्विलास नहीं हैं। इनमें कसक है, दर्द है, पीड़ा है, आँसू हैं लेकिन बेचारगी नहीं है, असहायता नहीं है, निरीहता नहीं है, यदि है तो संकल्प है, समर्पण है, प्रतिबद्धता है। ये कविताएँ तथाकथित स्त्री विमर्श से भिन्न होकर सार्थक दिशा तलाशती हैं। स्त्री पुरुष को एक दूसरे के पूरक और सहयोगी की तरह बनाना चाहती हैं। तरुण कवयित्री मीतू का प्रौढ़ चिंतन उसे कवियों की भीड़ में 'आम' से 'खास' बनाता है। उसकी कविता निर्जीव के संजीव होने की परिणति हेतु किया गया सार्थक प्रयास है। इस संग्रह को बहुतों के द्वारा पढ़, समझा और सराहा जाना चाहिए। 

***
संपर्क - विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१ 
चलभाष ९४२५१८३२४४, ईमेल salil.sanjiv@gmail.com 





नाम-अमिता मिश्रा"मीतू"

जन्मतिथि -17/10/1978

जन्मस्थान -हरदोई(उत्तर प्रदेश)

माता-श्रीमती मधुबाला मिश्रा

पिता-स्व श्रीकांत मिश्रा

पति संजीव मिश्रा

निवास-हरदोई(उ.प्रदेश)

शिक्षा-स्नातक(माइक्रोबायोलॉजी),बी.एड और डिप्लोमा इन न्यूट्रीशन एंड हेल्थ एजुकेशन

पुस्तकें-पारुल और सुगंधा उपन्यास

दीप छंद, यमक, मुक्तिका, महाभागवत छंद, नवगीत, दोहा, व्यंग्य, सोरठा, द्विपदी, २१ जनवरी

सलिल सृजन २१ जनवरी 
द्विपदी
राम मरा है, मरा राम है, माया छाया एक समान।
जिसने यह सच जान लिया है, वह इंसान बना भगवान।।
२१.१.२०२४
***
सोरठा सलिला
दृष्टि देखती द्वैत, श्याम-गौर दो हैं नहीं।
आत्म अमिट अद्वैत, दोनों में दोनों कहे।।
कान्ह कन्हैया लाल, कान्हा लला गुपाल जू।
श्याम कृष्ण गोपाल, गिरिधर मुरलीधर भजो।।
नटखट नटवर नैन, नटनागर के जब मिलें।
छीने मन का चैन, मिलन बिना बेचैन कर।।
वेणु हाथ आ; अधर चढ़, रही गर्व से ऐंठ।
रेणु चरण छू कह रही, यहाँ न तेरी पैठ।।
होता भव से पार, कृष्ण कांत जिसके वही।
वह सकता भव-तार, इष्ट जिसे हो राधिका।।
२१-१-२०२३
•••
सॉनेट
संकल्प
जैसी भी है यह दुनिया
हमको है रहकर जीना
शीश उठा तानें सीना
काँपे कभी न कहीं जिया
संकट जब जो भी आएँ
टकराकर हम जीतेंगे
विष भी हँसकर पी लेंगे
गीत सफलता के गाएँ
छोटा कद हौसला बड़ा
वार करेंगे हम तगड़ा र
ह न सकेगा शत्रु खड़ा
हिम्मत कभी न हारेंगे
खुद को सच पर वारेंगे
सारे जग को तारेंगे
२१-१-२०२३
•••
लघु व्यंग्य
विकास
*
हे गुमशुदा! तुम जहाँ कहीं हो चुपचाप लौट आओ. तुम्हें कोई कुछ नहीं कहेगा. तुम्हारे दुःख में युवा बेरोजगार, दलित शोषण के शिकार, पिछड़े
परवरदिगार और अगड़े धारदार हथियार हो रहे हैं.
तुम्हारे बिना आयकर का बढ़ना, मँहगाई का चढ़ना और पड़ोसी का लड़ना बदस्तूर जारी है.
तुम्हारे नाम पर बनते शौचालय, महामार्ग और स्मार्ट शहर तुम्हारे वियोग में उद्घाटन होते ही चटकने लगते हैं. तुम्हारे आने का दावा कर रहे नेता जुमलों का हिमालय खड़ा कर चुनाव जीत रहे हैं. हम अपने घर को न सम्हाल पाने पर भी खुद को विश्व का मसीहा मानकर बूँद-बूँद रीत रहे हैं.
हम तुम्हारे वियोग में सद्भावों का कर रहे हैं विनाश, चौराहे पर रखे बैठे हैं सत्य की लाश, इससे पहले कि आशा हो जाए हताश अपने घर लौट आओ नहीं आना है तो भाड़ में जाओ हे विकास.
***
दोहा
लपक आपने ले लिया, हमसे हिंदी-फूल.
हाय! क्या कहें दे रहीं, हैं अंगरेजी-फूल
*द्विपदी
बोलती हैं अबोले ही बात कुछ आँखें.
भर सकें परवाज़ पंछी, खोलते पाँखें.
२१.१.२०१८
***
नवगीत:
*
मिली दिहाड़ी
चल बाजार
चावल-दाल किलो भर ले-ले
दस रुपये की भाजी
घासलेट का तेल लिटर भर
धनिया-मिर्ची ताजी
तेल पाव भर फ़ल्ली का
सिंदूर एक पुडिया दे
दे अमरूद पांच का, बेटी की
न सहूं नाराजी
खाली जेब पसीना चूता
अब मत रुक रे!
मन बेजार
निमक-प्याज भी ले लऊँ तन्नक
पत्ती चैयावाली
खाली पाकिट हफ्ते भर को
फिर छाई कंगाली
चूड़ी-बिंदी दिल न पाया
रूठ न मो सें प्यारी
अगली बेर पहलऊँ लेऊँ
अब तो दे मुस्का री!
चमरौधे की बात भूल जा
सहले चुभते
कंकर-खार
***
अभिनव प्रयोग:
नवगीत :
.
मिलती काय न ऊँचीवारी
कुरसी हमखों गुइयाँ
.
हमखों बिसरत नहीं बिसारे
अपनी मन्नत प्यारी
जुलुस, विशाल भीड़ जयकारा
सुविधा-संसद न्यारी
मिल जाती, मन की कै लेते
रिश्वत ले-दे भैया
.
पैलां लेऊँ कमीशन भारी
बेंच खदानें सारी
पाछूं घपले-घोटाले सौ
रकम बिदेस भिजा री
होटल फैक्ट्री टाउनशिप
कब्जा लौं कुआ तलैया
.
कौनौ सैगो हमरो नैयाँ
का काऊ सेन काने?
अपनी दस पीढ़ी खें लाने
हमें जोड़ रख जानें
बना लई सोने की लंका
ठेंगे पे राम-रमैया
.
(बुंदेली लोककवि ईसुरी की चौकड़िया फागों की लय पर आधारित, प्रति पद १६-१२ x ४ पंक्तियाँ, महाभागवत छंद )
***
मुक्तक:
*
चिंता न करें हाथ-पैर अगर सर्द हैं
कुछ फ़िक्र न हो चहरे भी अगर ज़र्द हैं
होशो-हवास शेष है, दिल में जोश है
गिर-गिरकर उठ खड़े हुए, हम ऐसे मर्द हैं.
*
जीत लेंगे लड़ के हम कैसा भी मर्ज़ हो
चैन लें उतार कर कैसा भी क़र्ज़ हो
हौसला इतना हमेशा देना ऐ खुदा!
मिटकर भी मिटा सकूँ मैं कैसा भी फ़र्ज़ हो
२१-१-२०१५
***
छंद सलिला:
दस मात्रिक दैशिक छंद:
*
दस दिशाओं के आधार पर दस मात्रिक छंदों को दैशिक छंद कहा जाता है. विविध मात्रा बाँट से ८९ प्रकार के दैशिक छंद रचे जा सकते हैं.
(अब तक प्रस्तुत छंद: अग्र, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रा वज्रा, उपेन्द्र वज्रा, कीर्ति, घनाक्षरी, छवि, दीप, दोधक, निधि, प्रेमा, माला, वाणी, शक्तिपूजा, शाला, सार, सुगति/शुभगति, सुजान, हंसी)
दस मात्रिक दीप छंद
*
दस मात्रक दीप छंद के चरणान्त में ३ लघु १ गुरु १ लघु अर्थात एक नगण गुरु-लघु या लघु सगण लघु या २ लघु १ जगण की मात्रा बाँट होती है.
उदाहरण:
१. दीप दस नित बाल, दे कुचल तम-व्याल
स्वप्न नित नव पाल, ले 'सलिल' करताल
हो न तनिक मलाल, विनत रख निज भाल
दे विकल पल टाल, ले पहन कर-माल
२. हो सड़क-पग-धूल, नाव-नद-नभ कूल
साथ रख हर बार, जीत- पर मत हार
अनवरत बढ़ यार, आस कर पतवार
रख सुदृढ़ निज मूल, फहर नभ पर झूल
३. जहाँ खरपतवार, करो जड़ पर वार
खड़ी फसल निहार, लुटा जग पर प्यार
धरा-गगन बहार, सलामत सरकार
हुआ सजन निसार, भुलाकर सब रार
२१.१.२०१४
***
अभिनव प्रयोग:
यमकमयी मुक्तिका:
*
नहीं समस्या कोई हल की.
कोशिश लेकिन रही न हलकी..
विकसित हुई सोच जब कल की.
तब हरि प्रगटें बनकर कलकी..
सुना रही है सारे बृज को
छल की कथा गगरिया छलकी..
बिन पानी सब सून हो रहा
बंद हुई जब नलकी नल की..
फल की ओर निशाना साधा
कौन करेगा फ़िक्र न फल की?
नभ लाया चादर मखमल की.
चंदा बिछा रहा मलमल की..
खल की बात न बट्टा सुनता.
जब से संगत पायी खल की..
श्रम पर निष्ठां रही सलिल की
दुनिया सोचे लकी-अनलकी..
कर-तल की ध्वनि जग सुनता है.
'सलिल' अनसुनी ध्वनि पग-तल की..
२३-२-२०११
===

धनुर्वेद



जिस तीर से सर काटा जाता था वो अर्ध चंद्राकार तीर होता था। तीरों और धनुषों के कई प्रकार और उनके अलग अलग उपयोग होते थे।


नीचे धवुर्वेद से लिए हुए कुछ चित्र हैं। अब आप लोग ही बताइए की इनके बारे में आपको कितना ज्ञान था?



प्रथम महिला पीएच.डी., कमला सोहनी,

 विज्ञान में पी. एच. डी करने वाली पहली भारतीय महिला

कमला सोहनी 😊

साल 1933 की बात है। उन दिनों महिलाओं की शिक्षा पर ख़ास तवज्जो नहीं दी जाती थी। फिर भी, कमला ने बॉम्बे विश्वविद्यालय से की डिग्री हासिल की। उनके मुख्य विषय थे रसायन विज्ञान, सहायक विषय भौतिक विज्ञान।ग्रेजुएशन में उन्हें अपनी कक्षा में सबसे अधिक अंक प्राप्त हुए। इसके बादपोस्ट ग्रेजुएशन के लिए उन्होंने भारतीय विज्ञान संस्थान में रिसर्च फेलोशिप में दाखिले के लिए आवेदन किया। लेकिन संसथान के प्रमुख प्रोफेसर और नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. सी.वी रमन ने इस आवेदन को सिर्फ इसलिए खारिज कर दिया क्योकि कमला एक महिला थीं।

रमन के अनुसार वह जगह महिलाओं के लिए नहीं थी, महिलाएं विज्ञान के उस संस्थान में रिसर्च कर पाने जितनी क़ाबिल नहीं होती थीं, वह अनुसंधान के काम को आगे बढ़ाने में सक्षम नहीं थीं। इसका विरोध करने के लिए कमला सत्याग्रह पर बैठ गयी और आखिर डॉ. रमन ने कुछ शर्तों के साथ उन्हें दाखिला दिया।

यह कहानी उसी कमला सोहनी की है, जो आगे चलकर विज्ञान में पीएचडी करने वाली पहली भारतीय महिला बनीं!

आईआईएससी में कमला के गुरु श्री श्रीनिवासय्या थे। यहां अपने कार्यकाल के दौरान, उन्होंने दूध, दालों और फलियां (एक ऐसा विषय जो भारतीय संदर्भ में विशेष रूप से महत्वपूर्ण था) में प्रोटीन पर काम किया। उनके समर्पण और शोध क्षमता ने प्रो. रमन के 1936 में विशिष्ट रूप से एमएससी की डिग्री पूरी करने के एक साल बाद महिलाओं को आईआईएससी में प्रवेश देने के निर्णय को प्रभावित किया।

फिर उन्हें फ्रेडरिक जी. हॉपकिंस प्रयोगशाला में डॉ. डेरेक रिक्टर के अधीन काम करने के लिए यूके के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में आमंत्रित किया गया । वह न्यूनहैम कॉलेज की छात्रा थी , 1937 में मैट्रिक पास कर रही थी और जैविक प्राकृतिक विज्ञान ट्राइपोज़ का अध्ययन कर रही थी।

जब रिक्टर चले गए, तो उन्होंने डॉ रॉबिन हिल के अधीन काम किया और पौधों के ऊतकों का अध्ययन किया। आलू पर अपने काम से, उन्होंने एंजाइम 'साइटोक्रोम सी' की खोज की, जो पौधों, मानव और पशु कोशिकाओं में पाए जाने वाले इलेक्ट्रॉन परिवहन श्रृंखला (जिस प्रक्रिया से जीवों के लिए ऊर्जा का निर्माण होता है) में एक आवश्यक भूमिका निभाता है।

इस विषय पर उनकी थीसिस 14 महीनों में पूरी हुई और 40 पेज लंबी थी, जो आमतौर पर बहुत लंबे समय तक पीएचडी सबमिशन से एक प्रस्थान था।

पीएचडी प्राप्त करने के बाद, कमला 1939 में भारत लौट आईं।

महात्मा गांधी के समर्थक के रूप में , वह अपने देश वापस आना चाहती थीं और राष्ट्रवादी संघर्ष में योगदान देना चाहती थीं।

उन्हें नई दिल्ली में लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज में जैव रसायन विभाग का प्रोफेसर और प्रमुख नियुक्त किया गया था । बाद में, उन्होंने पोषण अनुसंधान प्रयोगशाला, कुन्नूर में सहायक निदेशक के रूप में काम किया, विटामिन के प्रभावों पर ध्यान केंद्रित किया।

कमला सोहोनी ने भारत में अपने बाद की उन महिलाओं के लिए विज्ञान के क्षेत्र में राह आसान की। उन्होंने स्त्री विरोधी मानसिकता से भरी राय रखने वाले वैज्ञानिक स्पेस में पहला कदम रखा और इसके लिए हमारी इस पुरखिन को हमेशा नारीवादी विमर्श याद रखेगा। एक महिला जिसके घर में शिक्षा का माहौल था, जो उस ज़माने में विदेश पढ़ने जाने में सक्षम हो सकीं, जब उनके लिए जेंडर के आधार पर चीजें इतनी मुश्किल थी तो वंचित समुदाय से कोई महिला कितनी भी क़ाबिल हुई होंगी उनके लिए दोहरा तिरहरा शोषण पार करना कितना मुश्किल होगा और आज भी है।