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शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

सितंबर १८, गीत, हिंदी, यमक अलंकार,

सलिल सृजन सितंबर १८

*
बज रही घंटी
सुनो या मत सुनो
*
कह रहा वह
बिदाई की घड़ी आती।
आज का कर आज
तुझको सच बताती।
कल कभी आए
न आए, कौन जाने?
छोड़ मत कल पर
कहे यह मुसकुराती।
जो पढ़ा या सुना
उसको अब गुनो
बज रही घंटी
सुनो या मत सुनो
*
तुम न बदले
कर रहे कल का भरोसा।
गर न आए कल
न खुद को कभी कोसा।
आज ही क्यों कर न
कल पर टालते क्यों?
बिना दीपक-तेल
बाती बालते क्यों।
जो मिला तन
रहा माटी, सिर धुनो
बज रही घंटी
सुनो या मत सुनो
*
निभाते चल
निभ सकें जो नेह-नाते ।
आज तो हैं साथ
कल जो छूट जाते।
छोड़ना क्या विरासत
रच आज ले वह?
दे न पाया कुछ
न पछता सोचकर दह।
रहे चादर साफ
वह जो नित बुनो
बज रही घंटी
सुनो या मत सुनो
१८.९ २०२६ 
०००
युगीय गीत
----------
हो रही खंडित ईकाई प्रभु बचाए
पूर्ण कंपित, अंश डँसता मुस्कुराए
०
एक पर निष्ठा नहीं रह गई बाकी
दो न अनगिन को पिलाए सुरा साकी
बाँह में इक, चाह में दुई, देख तीजी-
बहक मन ने खोज चौथी राह ताकी
आ प्रपंचन पाँचवी घर-घट दिखाए
हो रही खंडित ईकाई प्रभु बचाए
०
दूध छठ का छठी को लख याद आए
सातवीं आ दिवस में तारे दिखाए
आठवीं ने खड़ी कर दी खाट पल में-
नाश करने आई नौवीं पथ भुलाए
देह दुर्गज दहाई को शून्य पाए
हो रही खंडित ईकाई प्रभु बचाए
०
घटा-जोड़ा जो नहीं कुछ हाथ आया
गुणा गुण का भाग दे अवगुण बनाया
भिन्न ने अभिन्न हो अवमूल्यन कर-
नीति को बेदाम कर बेदम कराया
वरण कर बदनाम का अंधे कहाए
हो रही खंडित ईकाई प्रभु बचाए
०
पीढ़ियों की सीढ़ियों की नींव खोई
माँग जा बाजार में बेजार रोई
पूर्ति को मंहगाई ने बंधक बनाया-
मूलधन की नाव ब्याजों ने डुबोई
पूंजियों ने प्राण श्रम के नोच खाए
हो रही खंडित ईकाई प्रभु बचाए
०
अर्थ ने न्योता अनर्थों को अजाने
पुजारी रख पूज्य गिरवी लगा खाने
वर्गमूलों पर करें आघात घातें-
वक्फ की दौलत लगा मुल्ला उड़ाने
पादरी को ननों का सौंदर्य भाए
हो रही खंडित ईकाई प्रभु बचाए
०
सियासत ने सिया-सत को खो दिया है
आग घर में लगाता जलता दिया है
शारदा को लक्ष्मी नीलाम करती-
प्रेयसी-हाथों छला जाता पिया है
नाव में पतवार बच, नौका डुबाए
हो रही खंडित ईकाई प्रभु बचाए
०
दस दिशाओं से तिमिर ने हमें घेरा
आठ प्रहरों से दुखी संध्या-सवेरा
बजा बारह बारहों महिने ठठाते-
हुआ बेघर घर, लगे भूतों का डेरा
न्याय को अन्याय नीलामी चढ़ाए
हो रही खंडित ईकाई प्रभु बचाए
१८.९.२०२५
०००
हिंदी की तस्वीर
*
हिंदी की तस्वीर के, अनगिन उजले पक्ष
जो बोलें वह लिख-पढ़ें, आम लोग, कवि दक्ष
*
हिदी की तस्वीर में, भारत एकाकार
फूट डाल कर राज की, अंग्रेजी आधार
*
हिंदी की तस्वीर में, सरस सार्थक छंद
जितने उतने हैं कहाँ, नित्य रचें कविवृंद
*
हिंदी की तस्वीर या, पूरा भारत देश
हर बोली मिलती गले, है आनंद अशेष
*
हिंदी की तस्वीर में, भरिए अभिनव रंग
उनकी बात न कीजिए, जो खुद ही भदरंग
*
हिंदी की तस्वीर पर अंग्रेजी का फेम
नौकरशाही मढ़ रही, नहीं चाहती क्षेम
*
हिंदी की तस्वीर में, गाँव-शहर हैं एक
संस्कार-साहित्य मिल, मूल्य जी रहे नेक
१८.९.२०१६
***
:अलंकार चर्चा ०९ :
यमक अलंकार
भिन्न अर्थ में शब्द की, हों आवृत्ति अनेक
अलंकार है यमक यह, कहते सुधि सविवेक
पंक्तियों में एक शब्द की एकाधिक आवृत्ति अलग-अलग अर्थों में होने पर यमक अलंकार होता है. यमक अलंकार के अनेक प्रकार होते हैं.
अ. दुहराये गये शब्द के पूर्ण- आधार पर यमक अलंकार के ३ प्रकार १. अभंगपद, २. सभंगपद ३. खंडपद हैं.
आ. दुहराये गये शब्द या शब्दांश के सार्थक या निरर्थक होने के आधार पर यमक अलंकार के ४ भेद १.सार्थक-सार्थक, २. सार्थक-निरर्थक, ३.निरर्थक-सार्थक तथा ४.निरर्थक-निरर्थक होते हैं.
इ. दुहराये गये शब्दों की संख्या अर्थ के आधार पर भी वर्गीकरण किया जा सकता है.
उदाहरण :
१. झलके पद बनजात से, झलके पद बनजात
अहह दई जलजात से, नैननि सें जल जात -राम सहाय
प्रथम पंक्ति में 'झलके' के दो अर्थ 'दिखना' और 'छाला' तथा 'बनजात' के दो अर्थ 'पुष्प' तथा 'वन गमन' हैं. यहाँ अभंगपद यमक अलंकार है.
द्वितीय पंक्ति में 'जलजात' के दो अर्थ 'कमल-पुष्प' और 'अश्रु- पात' हैं. यहाँ सभंग यमक अलंकार है.
२. कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय
या खाये बौराय नर, वा पाये बौराय
कनक = धतूरा, सोना -अभंगपद यमक
३. या मुरली मुरलीधर की, अधरान धरी अधरा न धरैहौं
मुरली = बाँसुरी, मुरलीधर = कृष्ण, मुरली की आवृत्ति -खंडपद यमक
अधरान = पर, अधरा न = अधर में नहीं - सभंगपद यमक
४. मूरति मधुर मनोहर देखी
भयेउ विदेह विदेह विसेखी -अभंगपद यमक, तुलसीदास
विदेह = राजा जनक, देह की सुधि भूला हुआ.
५. कुमोदिनी मानस-मोदिनी कहीं
यहाँ 'मोदिनी' का यमक है. पहला मोदिनी 'कुमोदिनी' शब्द का अंश है, दूसरा स्वतंत्र शब्द (अर्थ प्रसन्नता देने वाली) है.
६. विदारता था तरु कोविदार को
यमक हेतु प्रयुक्त 'विदार' शब्दांश आप में अर्थहीन है किन्तु पहले 'विदारता' तथा बाद में 'कोविदार' प्रयुक्त हुआ है.
७. आयो सखी! सावन, विरह सरसावन, लग्यो है बरसावन चहुँ ओर से
पहली बार 'सावन' स्वतंत्र तथा दूसरी और तीसरी बार शब्दांश है.
८. फिर तुम तम में मैं प्रियतम में हो जावें द्रुत अंतर्ध्यान
'तम' पहली बार स्वतंत्र, दूसरी बार शब्दांश.
९. यों परदे की इज्जत परदेशी के हाथ बिकानी थी
'परदे' पहली बार स्वतंत्र, दूसरी बार शब्दांश.
१०. घटना घटना ठीक है, अघट न घटना ठीक
घट-घट चकित लख, घट-जुड़ जाना लीक
११. वाम मार्ग अपना रहे, जो उनसे विधि वाम
वाम हस्त पर वाम दल, 'सलिल' वाम परिणाम
वाम = तांत्रिक पंथ, विपरीत, बाँया हाथ, साम्यवादी, उल्टा
१२. नाग चढ़ा जब नाग पर, नाग उठा फुँफकार
नाग नाग को नागता, नाग न मारे हार
नाग = हाथी, पर्वत, सर्प, बादल, पर्वत, लाँघता, जनजाति
जबलपुर, १८-९-२०१५
===

शनिवार, 12 सितंबर 2026

सितंबर १२, सॉनेट, दोहा, गणेश, विसर्जन, नवगीत, हिंदी

 सलिल सृजन सितंबर १२

सॉनेट
तुम
●
तुमको शत-शत, साभार नमन
तुमको अर्पित निज अंतर्मन
तुम ही फागुन, तुम ही सावन
तुम ही श्वासों में पली लगन
तुम बिन मरुथल होता जीवन
तुम संग रहीं तो है मधुवन
तुम बनीं नयन, तुम बनीं वचन
तुमको पा जीवन है जीवन
तुम कहो, कौन है तुम सा धन
तुम साध्य, तुम्हीं तो हो साधन
तुम ही वादन, तुम ही गायन
तुम बिन हो पाता नहीं सृजन
तुम-मैं हम हैं कर विविध जतन
शत वर्ष हँसो, महकाओ चमन
१२-९-२०२२
●●●
मुक्तक
गीत पूर्णिमा जगमग तब हो जब राकेश प्रकाशित हो।
शब्द भाव रस लय मय ध्वनि से त्रिभुवन सकल निनादित हो।।
कलकल कलरव सुनकर श्रोता झूमे, करतल ध्वनि गूँजे-
मन से मन मिल सके, प्राण संप्राणित मुदित।।
***
एक विमर्श
विसर्जन क्यों और कैसे?
*
अनंत चतुर्दशी गणेश विसर्जन और पुनरागमन प्रार्थना का पर्व।
चतुर्थी पर स्थापना, दस दिन पूजन और फिर विसर्जन के नाम पर प्रतिभाओं की दुर्दशा और अकल्पनीय प्रदूषण।
यह त्रासदी नव दुर्गा महोत्सव पर दोहराई जाएगी।
शोचनीय है कि जिन्हें विघ्नेश कहकर उनसे विघ्न निवारण हेतु प्रार्थना की, उन्हीं को विघ्नेश में डाल दिया। मूर्तियों की दुर्दशा करने से बेहतर है परंपरा का पालन करते हुए हल्दी और सुपारी में दैवीय शक्तियों का आव्हान-पूजन कर विसर्जन हो। इससे न तो प्रदूषण फैलेगा, न मूर्तियों की दुर्दशा होगी।
पुष्प तथा अन्य पूजन सामग्री महानगरों में नगर निगम वालों को दें तथा गाँवों में एक गड्ढा खोदकर उसमें दबा दें।
प्लास्टिक, रसायनों, एस्बेस्टस, प्लास्टर अॉफ पेरिस आदि का प्रयोग कतई न करें।
मूर्ति पूजन में श्रद्धा हो तो धातु (सोना, चाँदी, ताँबा, पीतल, अष्टधातु, पत्थर या एल्यूमीनियम) की मूर्ति का पूजन करें। इसे पूरे वर्ष भी पूज सकते हैं और विसर्जन के बाद अगले वर्ष के लिए सुरक्षित भी रखते सकते हैं। इससे घर वर्ष मूर्ति पर और उसे लाने-ले जाने में होने वाला खर्च भी बचेगी जो मँहगाई का मार कुछ कम करेगा।
अन्य उपाय मिट्टी की ६ इंच तक की मूर्ति को विसर्जन पश्चात घर में ही स्वच्छ जल में विसर्जित कर उसे पेड़-पौधों का जड़ में डाल देना है।
चित्र का पूजन भी समान फल देता है। इसे विसर्जित न करें।
सनातन धर्म की मूल परंपरा प्रतीक पूजन है। वैष्णव देवी जैसे पुरातन स्थलों पर अनगढ़ पाषाण पिंड ही पूजे जाते हैं। यह सर्वमान्य है कि ईश्वर निराकार हैं। 'जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी' के अनुसार भक्त अपने इष्ट को रूपाकार देकर पूजते हैं। कई बार माताएँ पुत्र को पुत्री के रूप में अथवा पुत्री को पुत्री के रूप में सज्जित कर अपनी मनस्तुष्टि करती हैं । यही भाव भक्त से प्रतिमा बनाता है। इसीलिए कहा जाता है 'भगत के बस में हैं भगवान। भगवान सौजन्यता वश भक्त के 'बस' में होने पर भी 'बेबस' नहीं है। भक्त अपने इष्ट की प्रतिमा की दुर्दशा का निमित्त बनकर अपने ही कष्ट को आमंत्रित करता है।
आवश्यक है कि हम दैवीय शक्तियों का आह्वान अपने अंतर्मन में करें। प्रतिमा पूजन कम और लघ्वाकारी विग्रहों का हो। शिवलिंग पूजन प्रतीक पूजन का कालजयी उदाहरण है।
सनातन धर्म की परंपरानुसार बुद्ध ने भी मूर्ति का निषेध किया, भक्तों ने सबसे अधिक मूर्तियाँ बुद्ध की बनाकर समझा कि महान कार्य किया पर काल साक्षी है कि वे मूर्तियाँ तोड़ा गईं, बौद्ध धर्म का पराभव हुआ। पुरातात्त्विक अवशेषों में बड़ी संख्या में मूर्तियों के ध्वंसावशेषों को देखकर भी हम उनकी निस्सारता न समझें तो हमारी समझ का ही दोष है।
मूर्तियों के निर्माण में लगने वाला श्रम और सामग्री किसी जीवनोपयोगी निर्माण में लगे तो सबका भला होगा। 'मंदिर मंदिर मूरत तेरी, कहुँ न देखी सूरत तेरी' का अर्थ समझ मम मंदिर में देव स्थापना कर सकें तो विसर्जन करने का मन ही न होगा।
क्या हम प्रतिमा के स्थान पर देव और दिव्यता को पूजकर दैवीय गुणों से युक्त हो सकेंगे?
अनंत चौदस
१२-९-२०१९
७९९९५५९६१८
***
नवगीत:
हिंदी की जय हो...
संजीव 'सलिल'
*
हिंद और
हिंदी की जय हो...
*
जनगण-मन की
अभिलाषा है.
हिंदी भावी
जगभाषा है.
शत-शत रूप
देश में प्रचलित.
बोल हो रहा
जन-जन प्रमुदित.
ईर्ष्या, डाह, बैर
मत बोलो.
गर्व सहित
बोलो निर्भय हो.
हिंद और
हिंदी की जय हो...
*
ध्वनि विज्ञानं
समाहित इसमें.
जन-अनुभूति
प्रवाहित इसमें.
श्रुति-स्मृति की
गहे विरासत.
अलंकार, रस,
छंद, सुभाषित.
नेह-प्रेम का
अमृत घोलो.
शब्द-शक्तिमय
वाक् अजय हो.
हिंद और
हिंदी की जय हो...
*
शब्द-सम्पदा
तत्सम-तद्भव.
भाव-व्यंजना
अद्भुत-अभिनव.
कारक-कर्तामय
जनवाणी.
कर्म-क्रिया कर
हो कल्याणी.
जो भी बोलो
पहले तौलो.
जगवाणी बोलो
रसमय हो.
हिंद और
हिंदी की जय हो...
***
नवगीत:
अपना हर पल है हिन्दीमय....
संजीव 'सलिल'
*
अपना हर पल है हिन्दीमय
एक दिवस क्या खाक मनाएँ?
बोलें-लिखें नित्य अंग्रेजी
जो वे एक दिवस जय गाएँ...
*
निज भाषा को कहते पिछडी.
पर भाषा उन्नत बतलाते.
घरवाली से आँख फेरकर
देख पडोसन को ललचाते.
ऐसों की जमात में बोलो,
हम कैसे शामिल हो जाएँ?...
*
हिंदी है दासों की बोली,
अंग्रेजी शासक की भाषा.
जिसकी ऐसी गलत सोच है,
उससे क्या पालें हम आशा?
इन जयचंदों की खातिर
हिंदीसुत पृथ्वीराज बन जाएँ...
*
ध्वनिविज्ञान-नियम हिंदी के
शब्द-शब्द में माने जाते.
कुछ लिख, कुछ का कुछ पढने की
रीत न हम हिंदी में पाते.
वैज्ञानिक लिपि, उच्चारण भी
शब्द-अर्थ में साम्य बताएँ...
*
अलंकार, रस, छंद बिम्ब,
शक्तियाँ शब्द की बिम्ब अनूठे.
नहीं किसी भाषा में मिलते,
दावे करलें चाहे झूठे.
देश-विदेशों में हिन्दीभाषी
दिन-प्रतिदिन बढ़ते जाएँ...
*
अन्तरिक्ष में संप्रेषण की
भाषा हिंदी सबसे उत्तम.
सूक्ष्म और विस्तृत वर्णन में
हिंदी है सर्वाधिक सक्षम.
हिंदी भावी जग-वाणी है
निज आत्मा में 'सलिल' बसाएँ...
१२.९.२०१६
***
दोहा दुनिया
जो अच्छा उसको दिखे, अच्छा सब संसार
धन्य भाग्य जो पा रहा, 'सलिल' स्नेह उपहार
*
शरण मिली कमलेश की, 'सलिल' हुआ है धन्य
दिव्या कविता सा नहीं, दूज मीत अनन्य
*
शब्दों के संसार में, मिल जाते हैं मीत
पता न चलता समय का, कब जाता दिन बीत
*
दोहा सलिला:
करना है साहित्य बिन, भाषा का व्यापार
भाषा का करती 'सलिल', सत्ता बंटाधार
*
मनमानी करते सदा, सत्ताधारी लोग
अब भाषा के भोग का, इन्हें लगा है रोग
*
करता है मन-प्राण जब, अर्पित रचनाकार
तब भाषा की मृदा से, रचना ले आकार
*
भाषा तन साहित्य की, आत्मा बिन निष्प्राण
शिवा रहित शिव शव सदृश, धनुष बिना ज्यों बाण
*
भाषा रथ को हाँकता, सत्ता सूत अजान
दिशा-दशा साहित्य दे, कैसे? दूर सुजान
*
अवगुंठन ही ज़िन्दगी, अनावृत्त है ईश
प्रणव नाद में लीन हो, पाते सत्य मनीष
*
पढ़ ली मन की बात पर, ममता साधे मौन
अपनापन जैसा भला, नाहक तोड़े कौन
*
जीव किरायेदार है, मालिक है भगवान
हुआ किरायेदार के, वश में दयानिधान
*
रचना रचनाकार से, रच ना कहे न आप
रचना रचनाकार में, रच जाती है व्याप
*
जल-बुझकर वंदन करे, जुगनू रजनी मग्न
चाँद-चाँदनी का हुआ, जब पूनम को लग्न
*
तिमिर-उजाले में रही, सत्य संतान प्रीति
चोली-दामन के सदृश, संग निभाते रीति
*
जिसे हुआ संतोष वह, रंक अमीर समान
असंतोषमय धनिक सम, दीन न कोई जा
अवगुंठन ही ज़िन्दगी, अनावृत्त है ईश
प्रणव नाद में लीन हो, पाते सत्य मनीष
*
पढ़ ली मन की बात पर, ममता साधे मौन
अपनापन जैसा भला, नाहक तोड़े कौन
*
जीव किरायेदार है, मालिक है भगवान
हुआ किरायेदार के, वश में दयानिधान
*
रचना रचनाकार से, रच ना कहे न आप
रचना रचनाकार में, रच जाती है व्याप
*
जल-बुझकर वंदन करे, जुगनू रजनी मग्न
चाँद-चाँदनी का हुआ, जब पूनम को लग्न
*
तिमिर-उजाले में रही, सत्य संतान प्रीति
चोली-दामन के सदृश, संग निभाते रीति
*
जिसे हुआ संतोष वह, रंक अमीर समान
असंतोषमय धनिक सम, दीन न कोई जान
***
नवगीत:
संजीव
*
सिसक रही है
हिंदी मैया
कॉन्वेंट स्कूल में
*
शानदार सम्मलेन होता
किन्तु न इसमें जान है.
बुंदेली को जगह नहीं है
न ही मालवी-मान है.
रुद्ध प्रवेश निमाड़ी का है
छत्तीसगढ़ी न श्लाघ्य है
बृज, अवधी, मैथिली न पूछो
हल्बी का न निशान है.
भोजपुरी को भूल
नहीं क्या
घिरते हैं हम भूल में?
सिसक रही है
हिंदी मैया
कॉन्वेंट स्कूल में
*
महीयसी को बिठलाया है
प्रेस गैलरी द्वार पर.
भारतेंदु क्या छोड़ गये हैं
सम्मेलन ही हारकर?
मातृशक्ति की अनदेखी
क्यों संतानें ही करती हैं?
घाघ-भड्डरी को बिसराया
देशजता से रार कर?
बिंधी हुई है
हिंदी कलिका
अंग्रेजी के शूल में
सिसक रही है
हिंदी मैया
कॉन्वेंट स्कूल में
*
रास, राई, बंबुलिया रोये
जगनिक-आल्हा यहाँ नहीं.
भगतें, जस, कजरी गायब हैं
गीत बटोही मिला नहीं.
सुआ गीत, पंथी या फागें
बिन हिंदी है कहाँ कहो?
जड़ बिसराकर पत्ते गिनते
माटी का संग मिला नहीं।
ताल-मेल बिन
सपने सारे
मिल जाएंगे धूल में.
सिसक रही है
हिंदी मैया
कॉन्वेंट स्कूल में
*
(१०-९-१५ को विश्व हिंदी सम्मेलन भोपाल में उद्घाटन के पूर्व लिखा गया)
१२.९.२०१५
०००

शनिवार, 17 जनवरी 2026

जनवरी १७, दोहा, दोस्त, नयन, हास्य, सॉनेट, स्वास्थ्य मानक, बुंदेली, हाड़ौती, सरस्वती, हिंदी ग़ज़ल

सलिल सृजन जनवरी १७
०
दोहा सलिला
दोस्त-नयन
.
दरवाजा-खिड़की हुए, नयन हमेशा बंद? 
दस्तक दे लौटे विवश, दोस्त हवा आनंद।।
.

नयन दोस्त मिलते हुलस,भुज भर दे मुस्कान।
देख नयन में झाँककर, भरें जान में जान।।
.
नयन खींच रेखा कहें, मर्यादा मत तोड़। 
तुझे दोस्त से स्नेह है, 'सलिल' न लेना होड़।।
१७-१-२०२६ 
... 
हास्य सॉनेट
दावत
*
दावत कुबूल कीजिए कविराज! आइए।
नेवता पठा रहीं हैं कवयित्रि जी हुलस।
क्या खूब खयाली पुलाव बना, खाइए।।
खट्टे करेंगीं दाँत एक साथ मिल पुलक।।
लोहे के चने चाब धन्यवाद दीजिए।
दिमाग का दही न सिर्फ दाल में काला।
मौन रह छठी का दूध याद कीजिए।।
किस खेत की मूली से पड़ गया पाला।।
घी में हुईं न अँगुलियाँ, टेढ़ी खीर है।
खट्टे हुए अंगूर पानी घड़ों पड़ गया।
हाय! गुड़ गोबर हुआ, नकली पनीर है।।
जले पे नमक व्यंग्य बाण कह छिड़क दिया।।
बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद देख लो।
दाल न गली तो तिल का ताड़ मत करो।।
०००
दंत निपोरी
सामान्यत: 'हाँ' और 'ना' एक दूसरे के विरुद्धार्थी  होते हैं। निम्न रिक्त स्थानों में 'हाँ' रखें या 'ना' अर्थ समान रहता है। है न हिन्दी का चमत्कार?  
रिक्त स्थान में 'हाँ' या 'नहीं' लिखकर जानें अपना-अपना  सच

............ मैं इंसान नहीं, बंदर हूँ।
............ मैं ही पागल हूँ।
............ मेरे दिमाग का कोई इलाज नहीं।
............ मुझे पागलखाना जाना है।
०००
मुक्तक
मत हों अशांत, शांत रहें, शांति पाइए।
भज राधिका के कांत को कुछ कांति पाइए।।
कह देवकीनंदन यशोदा लाल यह रहा-
वसुदेव-नंद की तरह सब साथ आइए।।
१७.१.२०२५
०००
छंद शाला
दोहा २
•
दोहा में दो की प्रमुखता है।
दोहा ने दोहा सदा, शब्द गाय से अर्थ।
चुनता शब्द सटीक ही, तज अनर्थ या व्यर्थ।।
दोहा में दो पंक्तियाँ, कल-कल भाव प्रवाह।
अलंकार रस मिल करें, चमत्कार पा वाह।।
दो पद दोनों पंक्ति में, जैसे हों दिन-रात।
दो सम दो ही विषम हैं, रवि-शशि जैसे तात।।
विषम चरण आरंभ में, यदि मात्रिक दोहराव।
गति-यति लय की सहजता, सुगठित करें रचाव।।
सम चरणों के अंत में, गुरु-लघु है अनिवार्य।
तीनों लघु से अंत भी, हो सकता स्वीकार्य।।
कारक का उपयोग कम, करिए रहे कसाव।
संयोजक शब्दों बिना, बेहतर करें निभाव।।
सुमिर गुनगुना साधिए, दोहे की लय मीत।
अलंकार लालित्यमय, मोहें करिए प्रीत।।
१७.१.२०२४
•••
विश्व स्वास्थ्य दिवस
: महत्वपूर्ण मानक :
०१.रक्त चाप : १२०/८०
०२. नाड़ी : ७०-१००
०३. तापमान: ३६.८-३७
०४. श्वास: १२-१६
०५. हीमोग्लोबिन: पुरुष - १३.५-२८, स्त्री - ११.५-१६
०६.कोलेस्ट्रॉल: १३०-२००
०७.पोटेशियम: ३.५-५
०८. सोडियम: १३५-१४५
०९. ट्राइग्लिसराइड्स: २२०
१०. शरीर में खून की मात्रा: पीसीवी ३०%-४०%
११. शुगर लेवल: बच्चे ७०-१३०, वयस्क: ७०-११५
१२. आयरन :८-१५ मिलीग्राम
१३. श्वेत रक्त कोशिकाएँ WBC: ४,०००-११,०००
१४. प्लेटलेट्स: १,५०,०००-४,००,०००
१५. लाल रक्त कोशिकाएँ आरबीसी: ४.५-६.० मिलियन।
१६. कैल्शियम: .६-१०.३ mg/dL
१७. विटामिन डी३: २०-५० एनजी/एमएल।
१८. विटामिन B१२: २००-९०० पीजी/एमएल।
स्वास्थ्य सूत्र :
१: पानी पिएँ, किसी को पानी पिलाने का विचार छोड़ दें। अधिकांश स्वास्थ्य समस्याएँ शरीर में पानी की कमी से होती हैं।
२: शरीर से जितना हो सके उतना काम करें, शरीर को चल, तैर या खेल कर गतिशील रखें।
३: भूख से कम खाएँ। ज्यादा खाने की लालसा छोड़ें। प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, जीवन सत्व (विटामिन) युक्त खाद्य पदार्थों का अधिक प्रयोग करें।
४: वाहन का प्रयोग अत्यंत आवश्यक होने पर ही करें। अधिक से अधिक चलने की कोशिश करें। लिफ्ट, एस्केलेटर पर सीढ़ी को वरीयता दें। ५; गुस्सा-चिंता करना छोड़ दें। अप्रियबातों को अनदेखा करें। सकारात्मक लोगों से बात करें और उनकी बात सुनें।
६: छठा निर्देश सबसे पहले धन, स्वाद और ईर्ष्या का मोह त्याग दें।
७: जो न पा सकें उसे भूल जाइए। दूसरों को क्षमा करें।
८: धन, पद, प्रतिष्ठा, शक्ति, सौंदर्य, मोह और अहंकार तजें । विनम्र बनें।
९: सच को स्वीकारें। बुढ़ापा जीवन का अंत नहीं है। पूर्णता की शुरुआत है। आशावादी रहें, परिस्थितियों का आनंद लें।
***
बुंदेली वंदना
सारद माँ
●
सारद माँ! परनाम हमाओ।
नैया पार लगा दे रे!।।
मूढ़ मगज कछु सीख नें पाओ।
तन्नक सीख सिखा दे रे!।।
माई! बिराजीं जा परबत पै।
मैं कैसउं चढ़ पाऊँ ना।।
माई! बिराजीं स्याम सिला मा।
मैं मूरत गढ़ पाऊँ ना।।
ध्यान धरूँ आ दरसन देओ।
सुन्दर छबि दिखला दे रे!।।
सारद माँ! परनाम हमाओ।
नैया पार लगा दे रे!।।
मैया आखर मा पधराई।
मैं पोथी पढ़ पाऊँ ना।
मन मंदिर मा माँ पधराओ
तबआगे बढ़ पाऊँ ना।।
थाम अँगुरिया राह दिखाखें।
मंज़िल तक पहुँचा दे रे!।।
सारद माँ! परनाम हमाओ।
नैया पार लगा दे रे!।।
***
सॉनेट
कण-कण में जो बस रहा
सकल सृष्टि जो रच रहा
कहिए किसके बस रहा?
बाँच रहा, खुद बँच रहा।
हँसा रहा चुप हँस रहा
लगे झूठ पर सच कहा
जीव पंक में फँस रहा
क्यों न मोह से बच रहा।
काल निरंतर डँस रहा
महाकाल जो नच रहा
बाहुबली में कस रहा
जो वह प्रेमिल टच रहा।
सबको प्रिय निज जस रहा।
कौन कहे टू मच रहा।।
१७-१-२०२२
***
दोहागीत
संकट में हैं प्राण
*
लोकतंत्र तरु बचाओ
संकट में हैं प्राण
*
अफसरशाही मत्त गज
चाहे सके उखाड़
तना लोकमत तोड़ता
जब-तब मौका ताड़
दलबंदी विषकूप है
विषधर नेता लोग
डँसकर आँसू बहाते
घड़ियाली है सोग
ईश्वर देख; न देखता
कैसे होगा त्राण?
लोकतंत्र तरु बचाओ
संकट में हैं प्राण
*
धनपति चूहे कुतरते
स्वार्थ साधने डाल
शोषण करते श्रमिक का
रहा पेट जो पाल
न्यायतंत्र मधु-मक्षिका
तौला करता न्याय
सुविधा मधु का भोगकर
सूर करे अन्याय
मुर्दों का सा आचरण
चाहें हों संप्राण
लोकतंत्र तरु बचाओ
संकट में हैं प्राण
*
आवश्यकता-डाल पर
आम आदमी झूल
चीख रहा है 'बचाओ
श्वास-श्वास है शूल
पत्रकार पत्ते झरें
करें शहद की आस
आम आदमी मर रहा
ले अधरों पर प्यास
वादों को जुमला कहे
सत्ता डँस; ले प्राण
लोकतंत्र तरु बचाओ
संकट में हैं प्राण
*
१४-१-२०२१
हाड़ौती
सरस्वती वंदना
*
जागण दै मत सुला सरसती
अक्कल दै मत रुला सरसती
बावन आखर घणां काम का
पढ़बो-बढ़बो सिखा सरसती
ज्यूँ दीपक; त्यूँ लड़ूँ तिमिर सूं
हिम्मत बाती जला सरसती
लीक पुराणी डूँगर चढ़बो
कलम-हथौड़ी दिला सरसती
आयो हूँ मैं मनख जूण में
लख चौरासी भुला सरसती
नांव सुमरबो घणूं कठण छै
चित्त न भटका, लगा सरसती
जीवण-सलिला लांबी-चौड़ी
धीरां-धीरां तिरा सरसती
१८-११-२०१९
***
मुक्तिका
*
बाग़ क्यारी फूल है हिंदी ग़ज़ल
या कहें जड़-मूल है हिंदी ग़ज़ल
.
बात कहती है सलीके से सदा-
नहीं देती तूल है हिंदी ग़ज़ल
.
आँख में सुरमे सरीखी यह सजी
दुश्मनों को शूल है हिंदी ग़ज़ल
.
'सुधर जा' संदेश देती है सदा
न हो फिर जो भूल है हिंदी ग़ज़ल
.
दबाता जब जमाना तो उड़ जमे
कलश पर वह धूल है हिंदी ग़ज़ल
.
है गरम तासीर पर गरमी नहीं
मिलो-देखो कूल है हिंदी ग़ज़ल
.
मुक्तिका या गीतिका या पूर्णिका
तेवरी का तूल है हिंदी गजल
.
सजल अरु अनुगीत में भी समाहित
कायदा है, रूल है हिंदी ग़ज़ल
.
१७.९.२०१८
***
सामयिक लेख
हिंदी के समक्ष समस्याएं और समाधान
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
सकल सृष्टि में भाषा का विकास दैनंदिन जीवन में और दैनन्दिन जीवन से होता है। भाषा के विकास में आम जन की भूमिका सर्वाधिक होती है। शासन और प्रशासन की भूमिका अत्यल्प और अपने हित तक सीमित होती है। भारत में तथाकथित लोकतंत्र की आड़ में अति हस्तक्षेपकारी प्रशासन तंत्र दिन-ब-दिन मजबूत हो रहा है जिसका कारण संकुचित-संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ तथा बढ़ती असहिष्णुता है। राजनीति जब समाज पर हावी हो जाती है तो सहयोग, सद्भाव, सहकार और सर्व स्वीकार्यता ​के लिए स्थान नहीं रह जाता। दुर्भाग्य से भाषिक परिवेश में यही वातावरण है। हर भाषा-भाषी अपनी सुविधा के अनुसार देश की भाषा नीति चाहता है। यहाँ तक कि परंपरा, प्रासंगिकता, भावी आवश्यकता या भाषा विकास की संभावना के निष्पक्ष आकलन को भी स्वीकार्यता नहीं है।
निरर्थक प्रतिद्वंद्विता
संविधान की ८वीं अनुसूची में सम्मिलित होने की दिशाहीन होड़ जब-तब जहाँ-तहाँ आंदोलन का रूप लेकर लाखों लोगों के बहुमूल्य समय, ऊर्जा तथा राष्ट्रीय संपत्ति के विनाश का कारण बनता है। ८वीं अनुसूची में जो भाषाएँ सम्मिलित हैं उनका कितना विकास हुआ या जो भाषाएँ सूची में नहीं हैं उनका कितना विकास अवरुद्ध हुआ इस का आकलन किये बिना यह होड़ स्थानीय नेताओं तथा साहित्यकारों द्वारा निरंतर विस्तारित की जाती है। विडंबना यह है कि 'राजस्थानी' नाम की किसी भाषा का अस्तित्व न होते हुए भी उसे राज्य की अधिकृत भाषा घोषित कर दिया जाता है और उसी राज्य में प्रचलित ५० से अधिक भाषाओँ के समर्थक पारस्परिक प्रतिद्वंदिता के कारण यह होता देखते रहते हैं।
राष्ट्र भाषा और राज भाषा
राज-काज चलाने के लिए जिस भाषा को अधिसंख्यक लोग समझते हैं उसे राज भाषा होना चाहिए किंतु विदेशी शासकों ने खुद कि भाषा को गुलाम देश की जनता पर थोप दिया। उर्दू और अंग्रेजी इसी तरह थोपी और बाद में प्रचलित रह गयीं भाषाएँ हैं. शासकों की भाषा से जुड़ने की मानसिकता और इनका उपयोग कर खुद को शासक समझने की भ्रामक धारणा ने इनके प्रति आकर्षण को बनाये रखा है। देश का दुर्भाग्य कि अंग्रेजों के जाने के बाद भी अंग्रेजीप्रेमी प्रशासक और भारतीय अंग्रेज प्रधान मंत्री के कारण अंग्रेजी का महत्व बना रहा तथा राजनैतिक टकराव में भाषा को घसीट कर हिंदी को विवादस्पद बना दिया गया।
किसी देश में जितनी भी भाषाएँ जन सामान्य द्वारा उपयोग की जाती हैं, उनमें से कोई भी अराष्ट्र भाषा नहीं है अर्थात वे सभी राष्ट्र भाषा हैं और अपने-अपने अंचल में बोली जा रही हैं, बोली जाती रहेंगी। निरर्थक विवाद की जड़ मिटाने के लिए सभी भाषाओँ / बोलियों को राष्ट्र भाषा घोषित कर अवांछित होड़ को समाप्त किया जा सकता है। इससे अनचाहे हो रहा हिंदी-विरोध अपने आप समाप्त हो जाएगा। ७०० से अधिक भाषाएँ राष्ट्र भाषा हो जाने से सब एक साथ एक स्तर पर आ जाएँगी। हिंदी को इस अनुसूची में रखा जाए या निकाल दिया जाए कोई अंतर नहीं पड़ना है। हिंदी विश्व वाणी हो चुकी है। जिस तरह किसी भी देश का धर्म न होने के बावजूद सनातन धर्म और किसी भी देश की भाषा न होने के बावजूद संस्कृत का अस्तित्व था, है और रहेगा वैसे ही हिंदी भी बिना किसी के समर्थन और विरोध के फलती-फूलती रहेगी।
शासन-प्रशासन के हस्तक्षेप से मुक्ति
७०० से अधिक भाषाएँ/बोलियां राष्ट्र भाषा हो जाने पाए पारस्परिक विवाद मिटेगा, कोई सरकार इन सबको नोट आदि पर नहीं छाप सकेगी। इनके विकास पर न कोई खर्च होगा, न किसी अकादमी की जरूरत होगी। जिसे जान सामान्य उपयोग करेगा वही विकसित होगी किंतु राजनीति और प्रशासन की भूमिका नगण्य होगी।
हिंदी को प्रचार नहीं चाहिए
विडम्बना है कि हिंदी को सर्वाधिक क्षति तथाकथित हिंदी समर्थकों से ही हुई और हो रही है। हिंदी की आड़ में खुद के हिंदी-प्रेमी होने का ढिंढोरा पीटनेवाले व्यक्तियों और संस्थाओं ने हिंदी का कोई भला नहीं किया, खुद का प्रचार कर नाम और नामा बटोर तथा हिंदी-विरोध के आंदोलन को पनपने का अवसर दिया। हिंदी को ऐसी नारेबाजी और भाषणबाजी ने बहुत हानि पहुँचाई है। गत जनवरी में ऐसे ही हिंदी प्रेमी भोपाल में मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री और सरकार की प्रशंसा में कसीदे पढ़कर साहित्य और भाषा में फूट डालने का काम कर रहे थे। उसी सरकार की हिंदी विरोधी नीतियों के विरोध में ये बगुला भगत चुप्पी साधे बैठे हैं।
हिंदी समर्थक मठाधीशों से हिंदी की रक्षा करें
हिंदी के नाम पर आत्म प्रचार करनेवाले आयोजन न हों तो हिंदी विरोध भी न होगा। जब किसी भाषा / बोली के क्षेत्र में उसको छोड़कर हिंदी की बात की जाएगी तो स्वाभाविक है कि उस भाषा को बोलनेवाले हिंदी का विरोध करेंगे। बेहतर है कि हिंदी के पक्षधर उस भाषा को हिंदी का ही स्थानीय रूप मानकर उसकी वकालत करें ताकि हिंदी के प्रति विरोध-भाव समाप्त हो।
हिंदी सम्पर्क भाषा
किसी भाषा/बोली को उस अंचल के बाहर स्वीकृति न होने से दो विविध भाषाओँ/बोलियों के लोग पारस्परिक वार्ता में हिंदी का प्रयोग करेंगे ही। तब हिंदी की संपर्क भाषा की भूमिका अपने आप बन जाएगी। आज सभी स्थानीय भाषाएँ हिंदी को प्रतिस्पर्धी मानकर उसका विरोध कर रही हैं, तब सभी स्थानीय भाषाएँ हिंदी को अपना पूरक मानकर समर्थन करेंगी। उन भाषाओँ/बोलियों में जो शब्द नहीं हैं, वे हिंदी से लिए जाएंगे, हिंदी में भी उनके कुछ शब्द जुड़ेंगे। इससे सभी भाषाएँ समृद्ध होंगी।
हिंदी की सामर्थ्य और रोजगार क्षमता
हिंदी के हितैषियों को यदि हिंदी का भला करना है तो नारेबाजी और सम्मेलन बन्द कर हिंदी के शब्द सामर्थ्य और अभिव्यक्ति सामर्थ्य बढ़ाएं। इसके लिए हर विषय हिंदी में लिखा जाए। ज्ञान - विज्ञान के हर क्षेत्र में हिंदी का प्रयोग किया जाए। हिंदी के माध्यम से वार्तालाप, पत्राचार, शिक्षण आदि के लिए शासन नहीं नागरिकों को आगे आना होगा। अपने बच्चों को अंग्रेजी से पढ़ाने और दूसरों को हिंदी उपदेश देने का पाखण्ड बन्द करना होगा।
हिंदी की रोजगार क्षमता बढ़ेगी तो युवा अपने आप उस ओर जायेंगे। भारत दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है और इस बाजार में आम ग्राहक सबसे ज्यादा हिंदी ही समझता है। ७०० राष्ट्र भाषाएँ तो दुनिया का कोई देश या व्यापारी नहीं सीख-सिखा सकता इसलिए विदेशियों के लिए हिंदी ही भारत की संपर्क भाषा होगी. स्थिति का लाभ लेने के लिए देश में द्विभाषी रोजगार पार्क पाठ्यक्रम हों। हिंदी के साथ कोई एक विदेशी भाषा सीखकर युवजन उस देश में जाकर हिंदी सिखाने का काम कर सकेंगे। ऐसे पाठ्यक्रम हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ाने के साथ बेरोजगारी कम करेंगे। कोई दूसरी भारतीय भाषा इस स्थिति में नहीं है कि यह लाभ ले और दे सके।
हिंदी में हर विषय की किताबें लिखी जाने की सर्वाधिक जरूरत है। यह कार्य सरकार नहीं हिंदी के जानकारों को करना है। किताबें अंतरजाल पर हों तो इन्हें पढ़ा-समझ जाना सरल होगा। हिंदी में मूल शोध कार्य हों, केवल नकल करना निरर्थक है। तकनीकी, यांत्रिकी, विज्ञान और अनुसंधान क्षेत्र में हिंदी में पर्याप्त साहित्य की कमी तत्काल दूर की जाना जरूरी है। हिंदी की सरलता या कठिनता के निरर्थक व्यायाम को बन्द कर हिंदी की उपयुक्तता पर ध्यान देना होगा। हिंदी अन्य भारतीय भाषाओँ को गले लगाकर ही आगे बढ़ सकती है, उनका गला दबाकर या गला काटकर हिंदी भी आपने आप समाप्त हो जाएगी।
***
मुक्तिका
*
नाव ले गया माँग, बोल 'पतवार तुम्हें दे जाऊँगा'
यह न बताया सलिल बिना नौका कैसे खे पाऊँगा?
.
कहा 'अनुज' हूँ, 'अग्रज' जैसे आँख दिखाकर चला गया
कोई बताये क्या उस पर आशीष लुटाने आऊँगा?
.
दर्पण दरकाया संबंधों का, अनुबंधों ने बरबस
प्रतिबंधों के तटबंधों को साथ नहीं ले पाऊँगा
.
आ 'समीप' झट 'दूर' हुआ क्यों? बेदर्दी बतलाए तो
यादों के डैनों-नीचे पीड़ा चूजे जन्माऊँगा
.
अंबर का विस्तार न मेरी लघुता को सकता है नाप
बिंदु सिंधु में समा, गीत पल-पल लहरों के गाऊँगा
.
बुद्धि विनीतामय विवेक ने गर्व त्याग हो मौन कहा
बिन अवधेश न मैं मिथलेश सिया को अवध पठाऊँगा
.
कहो मुक्तिका सजल तेवरी ग़ज़ल गीतिका या अनुगीत
शब्द-शब्द रस भाव बिंब लय सलिला में नहलाऊँगा
१७-१-२०१७
***
समीक्षा:
आश्वस्त करता नवगीत संग्रह 'सड़क पर'
देवकीनंदन 'शांत'
*
[कृति विववरण: सड़क पर, गीत-नवगीत संग्रह, आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', प्रथम संस्करण २०१८, आकार २१ x १४ से.मी., आवरण पेपरबैक बहुरंगी, कलाकार मयंक वर्मा, पृष्ठ ९६, मूल्य २५०/-, समन्वय प्रकाशन अभियान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१, चलभाष ७९९९५५९६१८, ९४२५१८३२४४, ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com]
*
मुझे नवगीत के नाम से भय लगने लगा है। एक वर्ष पूर्व ५० नवगीत लिखे। नवगीतकार श्री मधुकर अष्ठाना जो हमें वर्षों से जानते हैं, ने कई महीनों तक रखने के पश्चात् ज्यों का त्यों हमें मूल रूप में लौटते हुए कहा कि गीत के हिसाब से सभी रचनाएँ ठीक हैं किंतु 'नवगीत' में तो कुछ न कुछ नया होना ही चाहिए। हमने उनके डॉ. सुरेश और राजेंद्र वर्मा के नवगीत सुने हैं। अपने नवगीतों में जहाँ नवीनता का भाव आया, हमने प्रयोग भी किया जो अन्य सब के नवगीतों जैसा ही लगा लेकिन आज तक वह 'आँव शब्द समझ न आया जो मधुकर जी चाहते थे। थकहार कर हमने साफ़-साफ़ मधुकर जी की बात कह दी डॉ. सुरेश गीतकार से जिन्होंने कहा कि सजन्त जी! आप चिंता न करें हमने नवगीत देखे हैं, बहुत सुंदर हैं लेकिन हम इधर कुछ अस्त-व्यस्त हैं, फिर भी शीघ्र ही आपको बुलाकर नवगीत संग्रह दे देंगे। आज ४ माह हो चुके हैं, अब थक हार कर हम बगैर उनकी प्रतिक्रिया लिए वापस ले लेंगे।
यह सब सोचकर 'सड़क पर' अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने में हाथ काँप रहा है। तारीफ में कुछ लिखा तो लोग कहेंगे ये ग़ज़ल, दोहे, मुक्तक, छंद और लोकगीत का कवि नवगीत के विषय में क्या जाने? तारीफ पर तारीफ जबरदस्ती किये जा रहा है। यदि कहीं टिप्पणी या आलोचनात्मक बात कह दी तो यही नवगीत के बने हुए आचार्य हमें यह कहकर चुप करा देंगे कि जो नवगीत प्रशंसा के सर्वतः तयोग्य था, उसी की यह आलोचना? आखिर है तो ग़ज़ल और लोक गीतवाला, नवगीत क्या समझेगा? हमें सिर्फ यह सोचकर बताया जाए कि कि नवगीत लिखनेवाले कवि क्या यह सोचकर नवगीत लिखते हैं कि इन्हें सिर्फ वही समझ सकता है जो 'नवगीत' का अर्थ समझता हो?
हम एक पाठक के नाते अपनी बात कहेंगे जरूर....
सर्वप्रथम सलिल जी प्रथम नवगीत संग्रह "काल है संक्रांति का" पर निकष के रूप में निम्न साहित्यकारों की निष्पक्ष टिप्पणी हेतु अभिवादन।
* श्री डॉ. सुरेश कुमार वर्मा का यह कथन वस्तुत: सत्य प्रतीत होता है -
१. कि मुचुकुन्द की तरह शताब्दियों से सोये हुए लोगों को जगाने के लिए शंखनाद की आवश्यकता होती है और
२. 'सलिल' की कविता इसी शंखनाद की प्रतिध्वनि है।
बीएस एक ही कशिश डॉ. सुरेश कुमार वर्मा ने जो जबलपुर के एक भाषा शास्त्री, व्याख्याता हैं ने अपनी प्रतिक्रिया में "काल है संक्रांति का" सभी गीतों को सहज गीत के रूप में हे ेदेखा है। 'नवगीत' का नाम लेना उनहोंने मुनासिब नहीं समझा।
* श्री (अब स्व.) चन्द्रसेन विराट जो विख्यात कवि एवं गज़लकार के रूप में साहित्य जगत में अच्छे-खासे चर्चित रहे हैं। इंदौर से सटीक टिप्पणी करते दिखाई देते हैं- " श्री सलिल जी की यह पाँचवी कृति विशुद्ध 'नवगीत' संग्रह है। आचार्य संजीव सलिल जी ने गीत रचना को हर बार नएपन से मंडित करने की कोशिश की है। श्री विराट जी अपने कथन की पुष्टि आगे इस वाक्य के साथ पूरी करते हैं- 'छंद व कहन' का नयापन उन्हें सलिल जी के नवगीत संग्रह में स्पष्ट दिखाई देना बताता है कि यह टिप्पणी नवगीतकार की न होकर किसी मंजे हुए कवी एवं शायर की है - जो सलिल के कर्तृत्व से अधिक विराट के व्यक्तित्व को मुखर करता है।
* श्री रामदेवलाल 'विभोर' न केवल ग़ज़ल और घनाक्षरी के आचार्य हैं बल्कि संपूर्ण हिंदुस्तान में उन्हें समीक्षक के रूप में जाना जाता है- " कृति के गीतों में नव्यता का जामा पहनाते समय भारतीय वांग्मय व् परंपरा की दृष्टी से लक्षण-व्यंजना शब्द शक्तियों का वैभव भरा है। वे आगे स्पष्ट करते हैं कि बहुत से गीत नए लहजे में नव्य-दृष्टी के पोषक हैं। यही उपलब्धि उपलब्धि आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' को नवगीतकारों की श्रेणी में खड़ा करने हेतु पर्याप्त है।
* डॉ. रोहिताश्व अस्थाना, हरदोई बड़ी साफगोई के साथ रेखांकित कर देते हैं कि भाई 'सलिल' के गीतों और नवगीतों की उल्लेखनीय प्रस्तुति है "काल है संक्रांति का" कृति। नवीन मूल्यों की प्रतिस्थापना 'सलिल' जी को नवगीतकार मानने हेतु विवश करती है। कृति के सभी नवगीत एक से एक बढ़कर सुंदर, सरस, भाव-प्रवण एवं नवीनता से परिपूर्ण हैं। वे एक सुधी समीक्षक, श्रेष्ठ एवं ज्येष्ठ साहित्यकार हैं लेकिन गीत और नवगीतों दोनों का जिक्र वे करते हैं- पाठकों को सोचने पर विवश करता है।
* शेष समीक्षाकारों में लखनऊ के इंजी. संतोष कुमार माथुर, राजेंद्र वर्मा, डॉ. श्याम गुप्ता तथा इंजी. अमरनाथ जी ने 'गीत-नवग़ीत, तथा गीत-अगीत-नवजीत संग्रह कहकर समस्त भ्रम तोड़ दिए।
* इंजी. सुरेंद्र सिंह पवार समीक्षक जबलपुर ने अपनी कलम तोड़कर रख दी यह कहकर कि "सलिल जैसे नवगीतकार ही हैं जो लीक से हटने का साहस जुटा पा रहे हैं, जो छंद को साध रहे हैं और बोध को भी। सलिल जी के गीतों/नवगीतों को लय-ताल में गाया जा सकता है।
अंत में "सड़क पर", आचार्य संजीव 'सलिल' की नवीनतम पुस्तक की समीक्षा उस साहित्यकार-समीक्षक के माध्यम से जिसने विगत दो दशकों तक नवगीत और तीन दशकों से मधुर लयबढ़ गीत सुने तथा विगत दस माह से नवगीत कहे जिन्हें लखनऊ के नवगीतकार नवगीत इसलिए नहीं मानते क्योंकि यह पारम्परिक मधुरता, सहजता एवं सुरीले लय-ताल में निबद्ध हैं।
१. हम क्यों निज भाषा बोलें? / निज भाषा पशु को भाती / प्रकृति न भूले परिपाटी / संचय-सेक्स करे सीमित / खुद को करे नहीं बीमित / बदले नहीं कभी चोलें / हम क्यों निज भाषा बोलें?
आचार्य संजीव 'सलिल' ने स्पष्ट तौर पर स्वीकार कर लिया है कि 'नव' संज्ञा नहीं, विशेषण के रूप में ग्राह्य है। गीत का उद्गम कलकल-कलरव की लय (ध्वन्यात्मक उतार-चढ़ाव) है। तदनुसार 'गीत' का नामकरण लोक गीत, ऋतु गीत, पर्व गीत, भक्ति गीत, जनगीत, आव्हान गीत, जागरण गीत, नव गीत, बाल गीत, युवा गीत, श्रृंगार गीत, प्रेम गीत, विरह गीत, सावन गीत आदि हुआ।
परिवर्तन की 'सड़क पर' कदम बढ़ाता गीत-नवगीत, समय की चुनौतियों से आँख मिलता हुआ लोकाभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बना है। नव भाव-भंगिमा में प्रस्तुत होनेवाला प्रत्येक गीत नवगीत है जो हमारे जीवन की उत्सानधर्मिता, उमंग, उत्साह, उल्लास, समन्वय तथा साहचर्य के तत्वों को अंगीकार कर एकात्म करता है। पृष्ठ ८६ से ९६ तक के गीतों की बोलिया बताएंगी कि उन्हें "सड़क पर" कदम बढ़ाते नवगीत क्यों न कहा जाए?
सड़क पर सतत ज़िंदगी चल रही है / जमूरे-मदारी रुँआसे सड़क पर / बसर ज़िंदगी हो रहे है सड़क पर / सड़क को बेजान मत समझो / रही सड़क पर अब तक चुप्पी, पर अब सच कहना ही होगा / सड़क पर जनम है, सड़क पर मरण है, सड़क खुद निराश्रित, सड़क ही शरण है / सड़क पर आ बस गयी है जिंदगी / सड़क पर, फिर भीड़ ने दंगे किये / दिन-दहाड़े, लुट रही इज्जत सड़क पर / जन्म पाया था, दिखा दे राह सबको, लक्ष्य तक पहुँचाए पर पहुंचा न पाई, देख कमसिन छवि, भटकते ट्रक न चूके छेड़ने से, हॉर्न सुनकर थरथराई पा अकेला, ट्रॉलियों ने चींथ डाला, बमुश्किल, चल रही हैं साँसें सड़क पर।
'सड़क पर' ऐसा नवगीत संग्रह है जिसे हर उस व्यक्ति को पढ़ना चाहिए जो कवि हो, अकवि हो पर सहृदय हो।
६.१.२०१९
संपर्क: १०/३०/२ इंदिरा नगर, लखनऊ २२६०१६, चलभाष ९९३५२१७८४१
***
समय
*
है सभी कुछ
समय के आधीन लेकिन
समय डिक्टेटर नहीं है।
*
समय रहता मौन
गुपचुप देखता सब।
आप माने या न माने
देखता कब?
चाल चलता
बिना पूछे या बताये
हेरते हैं आप
उसकी चाल जब-तब।
वृत्त का आरंभ या
आखिर न देखा
तो कहें क्या
वृत्त ही भास्वर नहीं है?
है सभी कुछ
समय के आधीन लेकिन
समय डिक्टेटर नहीं है.
*
समय को असमय
करें मत काल-कवलित
समय असमय में
नहीं क्या रहा करता?
सदा सुसमय बन
रहे वह साथ बेहतर
देव कुसमय से
सदा ही मनुज डरता।
समय ने सामर्थ्य दी
तुझको मनुज, ले मान
वह वेटर नहीं है।
है सभी कुछ
समय के आधीन लेकिन
समय डिक्टेटर नहीं है।
१७.१.२०१६
***
नवगीत:
.
कल का अपना
आज गैर है
.
मंज़िल पाने साथ चले थे
लिये हाथ में हाथ चले थे
दो मन थे, मत तीन हुए फिर
ऊग न पाये सूर्य ढले थे
जनगण पूछे
कहें: 'खैर है'
.
सही गलत हो गया अचंभा
कल की देवी, अब है रंभा
शीर्षासन कर रही सियासत
खड़ा करे पानी पर खंभा
आवारापन
हुआ सैर है
.
वही सत्य है जो हित साधे
जन को भुला, तंत्र आराधे
गैर शत्रु से अधिक विपक्षी
चैन न लेने दे, नित व्याधे
जन्म-जन्म का
पला बैर है
===
नवगीत:
.
कल के गैर
आज है अपने
.
केर-बेर सा संग है
जिसने देखा दंग है
गिरगिट भी शरमा रहे
बदला ऐसा रंग है
चाह पूर्ण हों
अपने सपने
.
जो सत्ता के साथ है
उसका ऊँचा माथ है
सिर्फ एक है वही सही
सच नाथों का नाथ है
पल में बदल
गए हैं नपने
.
जैसे भी हो जीत हो
कैसे भी रिपु मीत हो
नीति-नियम बस्ते में रख
मनमाफिक हर रीत हो
रोज मुखौटे
चहिए छपने
.
१६.१. २०१५
***
आइये कविता करें: ५
आज हमारे सम्मुख आभा सक्सेना जी के ३ दोहे हैं।
दोहा द्विपदिक (दो पंक्तियों का), चतुश्चरणिक (चार चरणों का), अर्द्धसम मात्रिक छंद है।
दोहा की दोनों पंक्तियों में १३-११, १३-११ मात्राएँ होती हैं। छंद प्रभाकर के अनुसार तेरह मात्रीय विषम चरणारंभ में एक शब्द में जगण (१२१) वर्जित कहा जाता है। दो शब्दों में जगण हो तो वर्जित नहीं होता। विषम चरणांत में सगण (लघु लघु गुरु), रगण (गुरु लागु गुरु) या नगण (लघु लघु लघु) का विधान है। ग्यारह मात्रीय सम (२,४) चरणों में चरणांत में जगण (लघु गुरु लघु) या तगण (गुरु गुरु लघु) सारतः गुरु लघु आवश्यक है।
लघु-गुरु मात्रा के विविध संयोजनों के आधार पर दोहा के २३ प्रकार हैं। दोहा नाम-गुरु मात्रा-लघु मात्रा-कुल वर्ण क्रमशः इस प्रकार हैं: भ्रमर २२-४-२६, भ्रामर २१-६-२७, शरभ २०-८-२८, श्येन १९-१०-२९, मंडूक १८-१२-३०, मर्कट १७-१४-३१ , करभ १६-१६-३२, नर १५-१८-३३, हंस १४- २०-३४, गयंद १३-२२-३५, पयोधर १२-२४-३६, बल ११-२६-३७, पान १०-२८-३८, त्रिकल ९-३०-३९, कच्छप ८-३२-४०, मच्छ ७-३४-४१, शार्दूल ६-३६-४२, अहिवर ५-३८-४३, व्याल ४-४०-४४, विडाल ३-४२-४५, श्वान २-४४-४६, उदर १-४६-४७, सर्प ०-४८-४८।
दोहा की विशेषता १. संक्षिप्तता (कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक कहना), २. लाक्षणिकता (संकेत या इंगित से कहना, विस्तार की कल्पना पाठक के लिये छोड़ना), ३. मार्मिकता या बेधकता (मन को छूना या भेदना), ४. स्पष्टता (साफ़-साफ़ कहना), ५. सरलता (अनावश्यक क्लिष्टता नहीं), ६. सम-सामयिकता तथा ७. युगबोध है। बड़े ग्रंथों में मंगलाचरण अथवा आरम्भ दोहों से करने की परंपरा रही है। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में दोहा का उपयोग चौपाई समूह के अंत में कड़ी के रूप में किया है।
दोहा कालजयी और सर्वाधिक लोकप्रिय छंद है। दोहा रचना के उक्त तथा नया नियमों का सार यह है की लय भंग नहीं होना चाहिए। लय ही छंद का प्राण है। दोहे में अन्त्यानुप्रास (पंक्त्यांत में समान वर्ण) उसकी लालित्य वृद्धि करता है।
.
१. क्यारी क्यारी खिल रहे, हरे हरे से पात
पूछ रहे हर फूल से, उनसे उनकी जात।।
यह दोहा मात्रिक संतुलन के साथ रचा गया है। द्वितीय पंक्ति में कथ्य में दोष है। 'फूल से' और 'उनसे' दोनों शब्दों का प्रयोग फूल के लिए ही हुआ है, दूसरी ओर कौन पूछ रहा है? यह अस्पष्ट है। केवल एक शब्द बदल देने से यह त्रुटि निराकृत हो सकती है:
क्यारी-क्यारी खिल रहे, हरे-हरे से पात
पूछ रहे हर फूल से, भँवरे उनकी जात
कुछ और बदलाव से इस दोहे को एक विशेष आयाम मिलता है और यह राजनैतिक चुनावों के परिप्रेक्ष्य में विशिष्ट हो जाता है:
क्यारी-क्यारी खिल रहे, हरे-हरे से पात
पूछ रहे जन फूल को, भँवरे नेता जात
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२. कठिनाई कितनी पड़ें, ना घबराना यार
सुख के दिन भी आयेंगे, दुख आयें जित बार।।
इस दोहे के तीसरे चरण में १४ मात्रा होने से मात्राधिक्य दोष है। खड़ी (टकसाली) हिंदी में 'न' शुद्ध तथा 'ना' अशुद्ध कहा गया है। इस दृष्टि से 'जित' अशुद्ध क्रिया रूप है, शुद्ध रूप 'जितनी' है। कठिनाई 'पड़ती' नहीं 'होती' है। इस दोहे को निम्न रूप देना ठीक होगा क्या? विचार करें:
कितनी हों कठिनाइयाँ, मत घबराना यार
सुख के दिन भी आएँगे, दुःख हो जितनी बार
३. रूखा सूखा खाइके, ठंडा पानी पीव
क्या करें बताइये जब, चाट मांगे जीभ।।
इस दोहे के सम चरणान्त में अन्त्यानुप्रास न मिलने से तुकांत दोष है। 'खाइके' तथा 'पीव' अशुद्ध शब्द रूप हैं। द्वितीय पंक्ति में लय भंग है, चतुर्थ चरण में १० मात्राएँ होने से मात्राच्युति दोष है। कथ्य में हास्य का पुट है किंतु दोहे के पूर्वार्ध और उत्तरार्ध के कथ्य में अंतर्संबंध नहीं है।
रूखा-सूखा जो मिले, खा कर ले जल-पान।
जीभ माँगती चाट दें, प्रगटें दयानिधान।।
यहाँ इंगित सुधार अन्य काव्य विधाओं के लिए भी उपयोगी हैं, इन्हें दोहा तक सीमित मत मानिये।
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हास्य सलिला:
चाय-कॉफी
*
लाली का आदेश था: 'जल्दी लाओ कॉफ़ी
देर हुई तो नहीं मिलेगी ए लालू जी! माफ़ी'
लालू बोले: 'मैडम! हमको है तुमरी परवाह
का बतलायें अधिक सोनिया जी से तुमरी चाह
चाय बनायी गरम-गरम पी लें, होगा आभार'
लाली डपटे: 'तनिक नहीं है तुममें अक्कल यार
चाय पिला मोड़ों-मोड़िन को, कॉफी तुरत बनाओ
कहे दुर्गत करवाते हो? अपनी जान बचाओ
लोटा भर भी पियो मगर चैया होती नाकाफ़ी
चम्मच भर भी मिले मगर कॉफ़ी होती है काफ़ी'
१७.१.२०१४
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नवगीत:
सड़क पर....
*
सड़क पर
मछलियों ने नारा लगाया:
'अबला नहीं, हम हैं
सबला दुधारी'.
मगर काँप-भागा,
तो घड़ियाल रोया.
कहा केंकड़े ने-
मेरा भाग्य सोया.
बगुले ने आँखों से
झरना बहाया...
*
सड़क पर
तितलियों ने डेरा जमाया.
ज़माने समझना
न हमको बिचारी.
भ्रमर रास भूला
क्षमा माँगता है.
कलियों से काँटा
डरा-काँपता है.
तूफां ने डरकर
है मस्तक नवाया...
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सड़क पर
बिजलियों ने गुस्सा दिखाया.
'उतारो, बढ़ी कीमतें
आज भारी.
ममता न माया,
समता न साया.
हुआ अपना सपना
अधूरा-पराया.
अरे! चाँदनी में है
सूरज नहाया...
*
सड़क पर
बदलियों ने घेरा बनाया.
न आँसू बहा चीर
अपना भीगा री!
न रहते हमेशा,
सुखों को न वरना.
बिना मोल मिलती
सलाहें न धरना.
'सलिल' मिट गया दुःख
जिसे सह भुलाया...
१७-१-२०११

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