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गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026

अक्टूबर ८, ग़ज़ल, कहमुकरी, दोहा गीत, हाइकु, मुक्तक, चित्रगुप्त, लघुकथा, यमक, गीत

सलिल सृजन अक्टूबर ८
*
आज आगस्टा एडा किंग जयंती
आगस्टा एडा किंग (१०.१२.१८१५ लंदन इंग्लैंड - २७.११.१८५२ मेरिलिबोन लंदन, माता अन्ने इसाबेला मिलबान्के; वेन्टवर्थ की ११ वीं बरोनेस - पिता जॉर्ज गॉर्डन बायरन, ६ वे बैरो,पति विलियम किंग नोएल; लवलेस के पहले अर्ल, बच्चे- १. बायरन किंग नोएल, विस्काउंट ओखम तथा वेनत्वर्थ के १२ वे बैरो, २. एन्ने ब्लंट वेनत्वर्थ की १५ वीं बरोनेस तथा ३. राल्फ किंग मिलबान्के लवलेस का २ रा अर्ल), लवलेस की काउन्टेस एक अंग्रेज गणितज्ञ तथा लेखिका थीं। उन्होने चार्ल्स बैबेज द्वारा प्रस्तावित यांत्रिक जनरल-परपज कम्प्यूटर पर कार्य किया और सबसे पहले यह समझा कि यह मशीन 'शुद्ध गणना' के साथ साथ बहुत कुछ और भी कर सकती है। उन्होने मशीन पर चलने वाली प्रथम कलनविधि का निर्माण किया। एडा ही पहली व्यक्ति थीं जिसने 'कम्प्यूटिंग मशीन' की पूरी क्षमता को समझा। वे दुनिया की पहली प्रोग्रामर थीं।
*

ग़ज़लिका
०
हमें आपसे क्या गिला हो भला?
बमुश्किल हुईं दूर, संकट टला।।
.
लिए साथ फरमाइशें अनगिनत।
गईं आप तो रुक गया सिलसिला।।
.
जो वादे किए, हाय जुमले हुए।
छप्पन का सीना मिला पिलपिला।।
.
हुआ चाक सीना उमीदों का भी।
दिया बेवफ़ा हो वफ़ा का सिला।।
.
शुकर है खुदाया सहे जुल्म पर।
न टूटा कभी बावफ़ाई किला।।
.
भले देर लेकिन न अंधेर है।
परेशां रहा दिल, पड़ा खिलखिला।।
.
खुशी नर्मदा-धार बहती रही।
अमर हो गई सबको पानी पिला।।
८.१०.२०२६
०००
कहमुकरी
•
सुंदरियों की तुलना पाता
विक्रम अरु प्रज्ञान सुहाता
शीश शशीश निहारे शेष
क्या देवेश?
नहीं राकेश।
•
विक्रम के काँधे बेताल
प्रश्न पूछता दे-दे ताल
उत्तर देता सीना तान
क्या अज्ञान?
ना, प्रज्ञान।
•
जहँ जा लिख-पढ़ बनते शिक्षित
कर घुमाई, बिन गए अशिक्षित
मानव मति शशि-रवि छू दक्षा
सखी है शिक्षा?
नहिं सखि कक्षा।
•
घटता-बढ़ता, नष्ट न होता
प्रेम कथाएँ फसलें बोता
पल में चमके, पल में मंदा
गोरखधंधा?
मितवा! चंदा।
•
मन कहता हँस पगले! मत रो
अपने सपने नाहक मत खो
सपने पूरे होते किस रो?
फ़ाइलों-पसरो?
नहिं सखि! इसरो।
•
नयन मूँदते रूप दिखाया
ना अपना नहिं रहा पराया
सँग भीगना कँपना तपना
माला जपना?
नहिं रे! सपना।
•
सुंदरियों की तुलना पाता
विक्रम अरु प्रज्ञान सुहाता
शीश शशीश निहारे शेष
क्या देवेश?
नहीं राकेश।
७.१०.२०२३
•••
दोहा दुनिया
*
कोरी पाती पर विनय, लिख विक्रम के गीत
सिंह गर्जन कर छुड़ा दे, अरि के छक्के रीत
*
लैला की शॉपिंग हुई, मजनू है बेरंग
खत्म बैंक बेलेंस लख, भागी- मजनू दंग
*
लल्ला-लल्ली पर चढ़ा, झट से प्रेम-बुखार
मिले-जुले; लड़-झगड़ कर, खोजें नूतन प्यार
*
'लिव इन' में बरसों रही, अब 'मी टू' में मस्त
रोजगार यह भी हुआ, टैक्सलगे हों पस्त
*
सरल सुबोध न साध्य है, साध्य सरस है बंधु
निर्झर सरवर साथ है, सार्थक होता सिंधु
*
अंग्रेजी शब्दों बिना, हिंदी रुचे न आज
अंग्रेजी में घोलते, हिंदी लगे न लाज
*
डगर-डगर कवियित्रियाँ, गली-गली कवि खूब
पाठक-श्रोता है नहीं, कविता मरती डूब
*
वर्ण-मात्रा गिन हुए, छंदों के सम्राट
निज मुख कर निज प्रशंसा, बनते साहब लाट
८-१०-२०२२
***
मुक्तक
अधर मौन पर नयन बोलते, अनकहनी भी कहते हैं।
हँसी-ठहाकों के मन में भी, आँसू-झरने बहते हैं।
फूल-शूल जन्मों के साथी, धूप-छाँव, पग-डग सहचर-
'सलिल' निरुपमा चाह-राह पा, संजीवित मन रहते हैं।
८-१०-२०२०
***
हाइकु
*
शेरपा शिखर
सफलता पखेरू
आकर गया
*
शेरपा हौसला
जिंदगी है चढ़ाई
कोशिश जयी
*
सिर हो ऊँचा
हमेशा पहाड़ सा
आकाश छुए
*
नदी बनिए
औरों की प्यास बुझा
खुश रहिए
*
आशा-विश्वास
खुद पर भरोसा
शेरपा धनी
८-१०-१९
***
दोहा गीत
*
ब्रम्ह देव बरगद बसें, देवी नीम निवास
अतिप्रिय शिव को धतूरा, बेलपत्र भी ख़ास
*
देवी को जासौन प्रिय,
श्री गणेश को दूब
नवमी पूजें आँवला
सुख बढ़ता है खूब
हरसिंगार हरि को चढ़े,
हो मनहर श्रृंगार
अधर रचाए पान से
राधा-कृष्ण निहार
पुष्प कदंबी कह रहा, कृष्ण कहीं हैं पास
*
कौआ कोसे ढोर कब,
मरते छोड़ो फ़िक्र
नाशुकरों का क्यों करें
कहो जरा भी जिक्र
खिलता लाल पलाश हो,
महके महुआ फूल
पीपल कहता डाल पर
डालो झूला, झूल
भुनती बाली देख हो, होली का आभास
*
धान झुका सरसों तना,
पर नियमित संवाद
सीताफल से रामफल,
करता नहीं विवाद
श्री फल कदली फल नहीं,
तनिक पालते बैर
पुंगी फल हँस मनाता
सदा सभी की खैर
पीपल ऊँचा तो नहीं, हो जामुन को त्रास
***
दोहा सलिला-
तन मंजूषा ने तहीं, नाना भाव तरंग
मन-मंजूषा ने कहीं, कविता सहित उमंग
*
आत्म दीप जब जल उठे, जन्म हुआ तब मान
श्वास-स्वास हो अमिय-घट, आस-आस रस-खान
*
सत-शिव-सुंदर भाव भर, रचना करिये नित्य
सत-चित-आनन्द दरश दें, जीवन सरस अनित्य
८-१०-२०१८
***
लेख-
चित्रगुप्त रहस्य
चित्रगुप्त सर्वप्रथम प्रणम्य हैं:
परात्पर परमब्रम्ह श्री चित्रगुप्त जी सकल सृष्टि के कर्मदेवता हैं, केवल कायस्थों के नहीं। उनके अतिरिक्त किसी अन्य कर्म देवता का उल्लेख किसी भी धर्म में नहीं है, न ही कोई धर्म उनके कर्म देव होने पर आपत्ति करता है। अतः, निस्संदेह उनकी सत्ता सकल सृष्टि के समस्त जड़-चेतनों तक है। पुराणकार कहता है: '
चित्रगुप्त प्रणम्यादौ वात्मानाम सर्व देहिनाम.''
अर्थात श्री चित्रगुप्त सर्वप्रथम प्रणम्य हैं जो आत्मा के रूप में सर्व देहधारियों में स्थित हैं.
आत्मा क्या है?
सभी जानते और मानते हैं कि 'आत्मा सो परमात्मा' अर्थात परमात्मा का अंश ही आत्मा है। स्पष्ट है कि श्री चित्रगुप्त जी ही आत्मा के रूप में समस्त सृष्टि के कण-कण में विराजमान हैं। इसलिए वे सबके पूज्य हैं सिर्फ कायस्थों के नहीं।
चित्रगुप्त निर्गुण परमात्मा हैं:
सभी जानते हैं कि परमात्मा और उनका अंश आत्मा निराकार है। आकार के बिना चित्र नहीं बनाया जा सकता। चित्र न होने को चित्र गुप्त होना कहा जाना पूरी तरह सही है। आत्मा ही नहीं आत्मा का मूल परमात्मा भी मूलतः निराकार है इसलिए उन्हें 'चित्रगुप्त' कहा जाना स्वाभाविक है। निराकार परमात्मा अनादि (आरंभहीन) तथा (अंतहीन) तथा निर्गुण (राग, द्वेष आदि से परे) हैं।
चित्रगुप्त पूर्ण हैं:
अनादि-अनंत वही हो सकता है जो पूर्ण हो। अपूर्णता का लक्षण आरम्भ तथा अंत से युक्त होना है। पूर्ण वह है जिसका क्षय (ह्रास या घटाव) नहीं होता। पूर्ण में से पूर्ण को निकल देने पर भी पूर्ण ही शेष बचता है, पूर्ण में पूर्ण मिला देने पर भी पूर्ण ही रहता है। इसे 'ॐ' से व्यक्त किया जाता है। दूज पूजन के समय कोरे कागज़ पर चन्दन, केसर, हल्दी, रोली तथा जल से ॐ लिखकर अक्षत (जिसका क्षय न हुआ हो आम भाषा में साबित चांवल)से चित्रगुप्त जी पूजन कायस्थ जन करते हैं।
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात पूर्णमुदच्यते पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते
पूर्ण है यह, पूर्ण है वह, पूर्ण कण-कण सृष्टि सब
पूर्ण में पूर्ण को यदि दें निकाल, पूर्ण तब भी शेष रहता है सदा।
चित्रगुप्त निर्गुण तथा सगुण दोनों हैं:
चित्रगुप्त निराकार-निर्गुण ही नहीं साकार-सगुण भी है। वे अजर, अमर, अक्षय, अनादि तथा अनंत हैं। परमेश्वर के इस स्वरूप की अनुभूति सिद्ध ही कर सकते हैं इसलिए सामान्य मनुष्यों के लिये वे साकार-सगुण रूप में प्रगट हुए वर्णित किये गए हैं। सकल सृष्टि का मूल होने के कारण उनके माता-पिता नहीं हो सकते। इसलिए उन्हें ब्रम्हा की काया से ध्यान पश्चात उत्पन्न बताया गया है. आरम्भ में वैदिक काल में ईश्वर को निराकार और निर्गुण मानकर उनकी उपस्थिति हवा, अग्नि (सूर्य), धरती, आकाश तथा पानी में अनुभूत की गयी क्योंकि इनके बिना जीवन संभव नहीं है। इन पञ्च तत्वों को जीवन का उद्गम और अंत कहा गया। काया की उत्पत्ति पञ्चतत्वों से होना और मृत्यु पश्चात् आत्मा का परमात्मा में तथा काया का पञ्च तत्वों में विलीन होने का सत्य सभी मानते हैं।
अनिल अनल भू नभ सलिल, पञ्च तत्वमय देह.
परमात्मा का अंश है, आत्मा निस्संदेह।।
परमब्रम्ह के अंश- कर, कर्म भोग परिणाम
जा मिलते परमात्म से, अगर कर्म निष्काम।।
कर्म ही वर्ण का आधार श्रीमद्भगवद्गीता में श्री कृष्ण कहते हैं: 'चातुर्वर्ण्यमयासृष्टं गुणकर्म विभागशः'
अर्थात गुण-कर्मों के अनुसार चारों वर्ण मेरे द्वारा ही बनाये गये हैं।
स्पष्ट है कि वर्ण जन्म पर आधारित नहीं था। वह कर्म पर आधारित था। कर्म जन्म के बाद ही किया जा सकता है, पहले नहीं। अतः, किसी जातक या व्यक्ति में बुद्धि, शक्ति, व्यवसाय या सेवा वृत्ति की प्रधानता तथा योग्यता के आधार पर ही उसे क्रमशः ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र वर्ग में रखा जा सकता था। एक पिता की चार संतानें चार वर्णों में हो सकती थीं। मूलतः कोई वर्ण किसी अन्य वर्ण से हीन या अछूत नहीं था। सभी वर्ण समान सम्मान, अवसरों तथा रोटी-बेटी सम्बन्ध के लिये मान्य थे। सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक, आर्थिक अथवा शैक्षणिक स्तर पर कोई भेदभाव मान्य नहीं था। कालांतर में यह स्थिति पूरी तरह बदल कर वर्ण को जन्म पर आधारित मान लिया गया।
चित्रगुप्त पूजन क्यों और कैसे?
श्री चित्रगुप्त का पूजन कायस्थों में प्रतिदिन प्रातः-संध्या में तथा विशेषकर यम द्वितीया को किया जाता है। कायस्थ उदार प्रवृत्ति के सनातन (जो सदा था, है और रहेगा) धर्मी हैं। उनकी विशेषता सत्य की खोज करना है इसलिए सत्य की तलाश में वे हर धर्म और पंथ में मिल जाते हैं। कायस्थ यह जानता और मानता है कि परमात्मा निराकार-निर्गुण है इसलिए उसका कोई चित्र या मूर्ति नहीं है, उसका चित्र गुप्त है। वह हर चित्त में गुप्त है अर्थात हर देहधारी में उसका अंश होने पर भी वह अदृश्य है। जिस तरह खाने की थाली में पानी न होने पर भी हर खाद्यान्न में पानी होता है उसी तरह समस्त देहधारियों में चित्रगुप्त अपने अंश आत्मा रूप में विराजमान होते हैं।
चित्रगुप्त ही सकल सृष्टि के मूल तथा निर्माणकर्ता हैं:
सृष्टि में ब्रम्हांड के निर्माण, पालन तथा विनाश हेतु उनके अंश ब्रम्हा-महासरस्वती, विष्णु-महालक्ष्मी तथा शिव-महाशक्ति के रूप में सक्रिय होते हैं। सर्वाधिक चेतन जीव मनुष्य की आत्मा परमात्मा का ही अंश है। मनुष्य जीवन का उद्देश्य परम सत्य परमात्मा की प्राप्ति कर उसमें विलीन हो जाना है। अपनी इस चितन धारा के अनुरूप ही कायस्थजन यम द्वितीय पर चित्रगुप्त पूजन करते हैं। सृष्टि निर्माण और विकास का रहस्य: आध्यात्म के अनुसार सृष्टिकर्ता की उपस्थिति अनहद नाद से जानी जाती है। यह अनहद नाद सिद्ध योगियों के कानों में प्रति पल भँवरे की गुनगुन की तरह गूँजता हुआ कहा जाता है। इसे 'ॐ' से अभिव्यक्त किया जाता है। विज्ञान सम्मत बिग बैंग थ्योरी के अनुसार ब्रम्हांड का निर्माण एक विशाल विस्फोट से हुआ जिसका मूल यही अनहद नाद है। इससे उत्पन्न ध्वनि तरंगें संघनित होकर कण (बोसान पार्टिकल) तथा क्रमश: शेष ब्रम्हांड बना।
यम द्वितीया पर कायस्थ एक कोरा सफ़ेद कागज़ लेकर उस पर चन्दन, हल्दी, रोली, केसर के तरल 'ॐ' अंकित करते हैं। यह अंतरिक्ष में परमात्मा चित्रगुप्त की उपस्थिति दर्शाता है। 'ॐ' परमात्मा का निराकार रूप है। निराकार के साकार होने की क्रिया को इंगित करने के लिये 'ॐ' को सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ काया मानव का रूप देने के लिये उसमें हाथ, पैर, नेत्र आदि बनाये जाते हैं। तत्पश्चात ज्ञान की प्रतीक शिखा मस्तक से जोड़ी जाती है। शिखा का मुक्त छोर ऊर्ध्वमुखी (ऊपर की ओर उठा) रखा जाता है जिसका आशय यह है कि हमें ज्ञान प्राप्त कर परमात्मा में विलीन (मुक्त) होना है।
बहुदेववाद की परंपरा:
इसके नीचे श्री के साथ देवी-देवताओं के नाम लिखे जाते हैं, फिर दो पंक्तियों में 9 अंक इस प्रकार लिखे जाते हैं कि उनका योग 9 बार 9 आये। परिवार के सभी सदस्य अपने हस्ताक्षर करते हैं और इस कागज़ के साथ कलम रखकर उसका पूजन कर दण्डवत प्रणाम करते हैं। पूजन के पश्चात् उस दिन कलम नहीं उठायी जाती। इस पूजन विधि का अर्थ समझें। प्रथम चरण में निराकार निर्गुण परमब्रम्ह चित्रगुप्त के साकार होकर सृष्टि निर्माण करने के सत्य को अभिव्यक्त करने के पश्चात् दूसरे चरण में निराकार प्रभु द्वारा सृष्टि के कल्याण के लिये विविध देवी-देवताओं का रूप धारण कर जीव मात्र का ज्ञान के माध्यम से कल्याण करने के प्रति आभार, विविध देवी-देवताओं के नाम लिखकर व्यक्त किया जाता है। ये देवी शक्तियां ज्ञान के विविध शाखाओं के प्रमुख हैं. ज्ञान का शुद्धतम रूप गणित है।
सृष्टि में जन्म-मरण के आवागमन का परिणाम मुक्ति के रूप में मिले तो और क्या चाहिए? यह भाव पहले देवी-देवताओं के नाम लिखकर फिर दो पंक्तियों में आठ-आठ अंक इस प्रकार लिखकर अभिव्यक्त किया जाता है कि योगफल नौ बार नौ आये व्यक्त किया जाता है। पूर्णता प्राप्ति का उद्देश्य निर्गुण निराकार प्रभु चित्रगुप्त द्वारा अनहद नाद से साकार सृष्टि के निर्माण, पालन तथा नाश हेतु देव-देवी त्रयी तथा ज्ञान प्रदाय हेतु अन्य देवियों-देवताओं की उत्पत्ति, ज्ञान प्राप्त कर पूर्णता पाने की कामना तथा मुक्त होकर पुनः परमात्मा में विलीन होने का समुच गूढ़ जीवन दर्शन यम द्वितीया को परम्परगत रूप से किये जाते चित्रगुप्त पूजन में अन्तर्निहित है। इससे बड़ा सत्य कलम व्यक्त नहीं कर सकती तथा इस सत्य की अभिव्यक्ति कर कलम भी पूज्य हो जाती है इसलिए कलम को देव के समीप रखकर उसकी पूजा की जाती है। इस गूढ़ धार्मिक तथा वैज्ञानिक रहस्य को जानने तथा मानने के प्रमाण स्वरूप परिवार के सभी स्त्री-पुरुष, बच्चे-बच्चियाँ अपने हस्ताक्षर करते हैं, जो बच्चे लिख नहीं पाते उनके अंगूठे का निशान लगाया जाता है। उस दिन कोई सांसारिक कार्य (व्यवसायिक, मैथुन आदि) न कर आध्यात्मिक चिंतन में लीन रहने की परम्परा है।
'ॐ' की ही अभिव्यक्ति अल्लाह और ईसा में भी होती है। सिख पंथ इसी 'ॐ' की रक्षा हेतु स्थापित किया गया। 'ॐ' की अग्नि आर्य समाज और पारसियों द्वारा पूजित है। सूर्य पूजन का विधान 'ॐ' की ऊर्जा से ही प्रचलित हुआ है। उदारता तथा समरसता की विरासत यम द्वितीया पर चित्रगुप्त पूजन की आध्यात्मिक-वैज्ञानिक पूजन विधि ने कायस्थों को एक अभिनव संस्कृति से संपन्न किया है। सभी देवताओं की उत्पत्ति चित्रगुप्त जी से होने का सत्य ज्ञात होने के कारण कायस्थ किसी धर्म, पंथ या सम्प्रदाय से द्वेष नहीं करते। वे सभी देवताओं, महापुरुषों के प्रति आदर भाव रखते हैं। वे धार्मिक कर्म कांड पर ज्ञान प्राप्ति को वरीयता देते हैं। इसलिए उन्हें औरों से अधिक बुद्धिमान कहा गया है. चित्रगुप्त जी के कर्म विधान के प्रति विश्वास के कारण कायस्थ अपने देश, समाज और कर्त्तव्य के प्रति समर्पित होते हैं। मानव सभ्यता में कायस्थों का योगदान अप्रतिम है। कायस्थ ब्रम्ह के निर्गुण-सगुण दोनों रूपों की उपासना करते हैं। कायस्थ परिवारों में शैव, वैष्णव, गाणपत्य, शाक्त, राम, कृष्ण, सरस्वती, लक्ष्मी, दुर्गा आदि देवी-देवताओं के साथ समाज सुधारकों दयानंद सरस्वती, आचार्य श्री राम शर्मा, सत्य साइ बाबा, आचार्य महेश योगी आदि का पूजन-अनुकरण किया जाता है। कायस्थ मानवता, विश्व तथा देश कल्याण के हर कार्य में योगदान करते मिलते हैं.
***
लघुकथा
चट्टान
*
मुझे चैतन्य क्यों नहीं बनाया? वह हमेशा शिकायत करती अपने सृजनहार से। उसे खुद नहीं मालुम कब से वह इसी तरह पड़ी थी, उपेक्षित और अनदेखी। न जाने कितने पतझर और सावन बीत गए लेकिन वह जैसी की तैसी पड़ी रही। कभी कोई भूला-भटका पर्यटक थककर सुस्ताने बैठ जाता तो वह हुलास अनुभव करती किन्तु चंद क्षणों का साथ छूटते ही फिर अकेलापन। इस दीर्घ जीवन-यात्रा में धरती और आकाश के अतिरिक्त उसके साथी थे कुछ पेड़-पौधे, पशु और परिंदे। कहते है सब दिन जात न एक समान। एक दिन कुछ दो पाये जानवर आये, पेड़ों के फल तोड़कर खाये, खरीदी जमीन को समतल कर इमारत खड़ी करने की बात करने लगे।
फिर एक-एक कर आए गड़गड़ - खड़खड़ करते दानवाकार यन्त्र जो वृक्षों का कत्ले-आम कर परिंदों को बेसहारा कर गए, टीलों को खोदने और तालाबों को पाटने लगे। उनका क्रंदन सुनकर उसकी छाती फटने लगी। मरती क्या न करती? उसने बदला लेने की ठानी और उचित अवसर की प्रतीक्षा करने लगी। एक दिन उसकी करुण पुकार सुनकर पसीजे मेघराज की छाती फट गयी। बिजली तांडव करना आरम्भ कर तड़तड़ाती हुई जहाँ-तहाँ गिरी। उसने भी प्रकृति के साथ कदमताल करते हुए अपना स्थान छोड़ा। पहाड़ी नदी की जलधार के साथ लुढ़कती हुई वह हर बाधा को पर कर दो पैरोंवाले जानवरों को रौंदते-कुचलते हुए केदारनाथ की शरण पाकर थम गयी।
खुद को महाबली समझनेवाले जानवरों को रुदन-क्रंदन करते देख उसका मन भर आया किंतु उसे विस्मय हुआ यह देखकर कि उन जानवरों ने अपनी गलती न मान, प्रकृति और भगवान को दोष देती कवितायें लिख-लिखकर टनों कागज़ काले कर दिए, पीड़ितों की सहायता के नाम पर अकथनीय भ्रष्टाचार किया और फिर इमारतें तानने की तैयारी आरंभ कर दी। उसे अनुभव हुआ कि इन चैतन्य जानवरों से लाख गुना बेहतर हैं कम चेतन कहे जानेवाले पशु-पक्षी और जड़ कही जानेवाली वह खुद जिसे कहा जाता है चट्टान।
***
अलंकार सलिला-
जन मन रंजन :
निम्न चित्रपटीय गीतों में अलंकार बताइए :
१. कहीं दूर जब दिन ढल जाए, साँझ की दुल्हन बदन चुराए, चुपके से आये
मेरे ख्यालों के आँगन में कोई सपनों के दीप जलाये, नज़र न आये - आनंद
*
२. दोस्त दोस्त ना रहा, प्यार प्यार ना रहा
ज़िंदगी हमें तेरा ऐतबार ना रहा
*
३. चाँद सी महबूबा हो मेरी, कब ऐसा मैंने सोचा था?
हाँ तुम बिलकुल वैसी हो जैसा मैंने सोचा था
*
४. चाँद सा रौशन चेहरा, ज़ुल्फ़ों का रंग सुनहरा
ये झील सी नीली आँखें, कोई राज है जिनमें गहरा
*
५. चंदन सा वदन, चंचल चितवन, धीरे से तेरा ये मुस्काना
मुझे दोष न देना जगवालों, हो जाऊँ अगर मैं दीवाना
ये काम-कमान भँवें तेरी, पलकों के किनारे कजरारे
माथे पर सिन्दूरी सूरज, होंठों पे दहकते अंगारे
साया भी जो तेरा पड़ जाए, आबाद हो दिल का वीराना
८.१०.२०१५
***
दोहा यमक का
*
कल-कल करते कल हुए, कल न हो सका आज
विकल मनुज बेअकल खो कल, सहता कल-राज
कल = आगामी दिन, अतीत, शांति, यंत्र
कल करूंगा, कल करूंगा अर्थात आज का काम पर कल (अगला दिन) पर टालते हुए व्यक्ति खुद चल बसा (अतीत हो गया) किन्तु आज नहीं आया. बुद्धिहीन मनुष्य शांति खोकर व्याकुल होकर यंत्रों का राज्य सह रहा है अर्थात यंत्रों के अधीन हो गया है.
८.१०.२०१३
***
मुक्तिका...
क्यों है?'
*
रूह पहने हुए ये हाड़ का पिंजर क्यों है?
रूह सूरी है तो ये जिस्म कलिंजर क्यों है??
थी तो ज़रखेज़ ज़मीं, हमने ही बम पटके हैं.
और अब पूछते हैं ये ज़मीं बंजर क्यों है??
गले मिलने की है ख्वाहिश, ये संदेसा भेजा.
आये तो हाथ में दाबा हुआ खंजर क्यों है??
नाम से लगते रहे नेता शरीफों जैसे.
काम से वो कभी उड़िया, कभी कंजर क्यों है??
उसने बख्शी थी हमें हँसती हुई जो धरती.
आज रोती है बिलख, हाय ये मंजर क्यों है?
***
लेख :
हिंदी और हम.
हिंदी जनवाणी तो हमेशा से है...समय इसे जगवाणी बनाता जा रहा है. जैसे-जिसे भारतीय विश्व में फ़ैल रहे हैं वे अधकचरी ही सही हिन्दी भी ले जा रहे हैं. हिंदी में संस्कृत, फ़ारसी, अरबी, उर्दू , अन्य देशज भाषाओँ या अंगरेजी शब्दों के सम्मिश्रण से घबराने के स्थान पर उन्हें आत्मसात करना होगा ताकि हिंदी हर भाव और अर्थ को अभिव्यक्त कर सके. 'हॉस्पिटल' को 'अस्पताल' बनाकर आत्मसात करने से भाषा समृद्ध होती है किन्तु 'फ्रीडम' को 'फ्रीडमता' बनाने से नहीं. दैनिक जीवन में व्याकरण सम्मत भाषा हमेशा प्रयोग में नहीं लाई जा सकती पर वह समीक्षा, शोध या गंभीर अभिव्यक्ति हेतु अनुपयुक्त होती है. हमें भाषा के प्राथमिक, माध्यमिक, उच्च तथा शोधपरक रूपों में भेद को समझना तथा स्वीकारना होगा. तत्सम तथा तद्भव शब्द हिंदी की जान हैं किन्तु इनका अनुपात तो प्रयोग करनेवाले की समझ पर ही निर्भर है. हिन्दी में अहिन्दी शब्दों का मिश्रण दल में नमक की तरह हो किन्तु खीर में कंकर की तरह नहीं.
हिंदी में शब्दों की कमी को दूर करने की ओर भी लगातार काम करना होगा. इस सिलसिले में सबसे अधिक प्रभावी भूमिका चिट्ठाकार निभा सकते हैं. वे विविध प्रदेशों, क्षेत्रों, व्यवसायों, रुचियों, शिक्षा, विषयों, विचारधाराओं, धर्मों तथा सर्जनात्मक प्रतिभा से संपन्न ऐसे व्यक्ति हैं जो प्रायः बिना किसी राग-द्वेष या स्वार्थ के सामाजिक साहचर्य के प्रति असमर्पित हैं. उनमें से हर एक का शब्द भण्डार अलग-अलग है. उनमें से हर एक को अलग-अलग शब्द भंडार की आवश्यकता है. कभी शब्द मिलते हैं कभी नहीं. यदि वे न मिलनेवाले शब्द को अन्य चिट्ठाकारों से पूछें तो अन्य अंचलों या बोलियों के शब्द भंडार में से अनेक शब्द मिल सकेंगे. जो न मिलें उनके लिये शब्द गढ़ने का काम भी चिट्ठा कर सकता है. इससे हिंदी का सतत विकास होगा.
सिविल इन्जीनियरिंग को हिंदी में नागरिकी अभियंत्रण या स्थापत्य यांत्रिकी क्या कहना चाहेंगे? इसके लिये अन्य उपयुक्त शब्द क्या हो? 'सिविल' की हिंदी में न तो स्वीकार्यता है न सार्थकता...फिर क्या करें? सॉइल, सिल्ट, सैंड, के लिये मिट्टी/मृदा, धूल तथा रेत का प्रयोग मैं करता हूँ पर उसे लोग ग्रहण नहीं कर पाते. सामान्यतः धूल-मिट्टी को एक मान लिया जाता है. रोक , स्टोन, बोल्डर, पैबल्स, एग्रीगेट को हिंदी में क्या कहें? मैं इन्हें चट्टान, पत्थर, बोल्डर, रोड़ा, तथा गिट्टी लिखता हूँ . बोल्डर के लिये कोई शब्द नहीं है?
रेत के परीक्षण में 'मटेरिअल रिटेंड ऑन सीव' तथा 'मटेरिअल पास्ड फ्रॉम सीव' को हिंदी में क्या कहें? मुझे एक शब्द याद आया 'छानन' यह किसी शब्द कोष में नहीं मिला. छानन का अर्थ किसी ने छन्नी से निकला पदार्थ बताया, किसी ने छन्नी पर रुका पदार्थ तथा कुछ ने इसे छानने पर मिला उपयोगी या निरुपयोगी पदार्थ कहा. काम करते समय आपके हाथ में न तो शब्द कोष होता है, न समय. कार्य विभागों में प्राक्कलन बनाने, माप लिखने तथा मूल्यांकन करने का काम अंगरेजी में ही किया जाता है जबकि अधिकतर अभियंता, ठेकेदार और सभी मजदूर अंगरेजी से अपरिचित हैं. सामान्यतः लोग गलत-सलत अंगरेजी लिखकर काम चला रहे हैं. लोक निर्माण विभाग की दर अनुसूची आज भी सिर्फ अंगरेजी मैं है. निविदा हिन्दी में है किन्तु उस हिन्दी को कोई नहीं समझ पाता, अंगरेजी अंश पढ़कर ही काम करना होता है. किताबी या संस्कृतनिष्ठ अनुवाद अधिक घातक है जो अर्थ का अनर्थ कर देता है. न्यायलय में मानक भी अंगरेजी पाठ को ही माना जाता है. हर विषय और विधा में यह उलझन है. मैं मानता हूँ कि इसका सामना करना ही एकमात्र रास्ता है किन्तु चिट्ठाजगत हा एक मंच ऐसा है जहाँ ऐसे प्रश्न उठाकर समाधान पाया जा सके तो...? सोचें...
भाषा और साहित्य से सरकार जितना दूर हो बेहतर... जनतंत्र में जन, लोकतंत्र में लोक, प्रजातंत्र में प्रजा हर विषय में सरकार का रोना क्यों रोती है? सरकार का हाथ होगा तो चंद अंगरेजीदां अफसर पाँच सितारेवाले होटलों के वातानुकूलित कमरों में बैठकर ऐसे हवाई शब्द गढ़ेगे जिन्हें जनगण जान या समझ ही नहीं सकेगा. राजनीति विज्ञान में 'लेसीज फेयर' का सिद्धांत है जिसका आशय यह है कि वह सरकार सबसे अधिक अच्छी है जो सबसे कम शासन करती है. भाषा और साहित्य के सन्दर्भ में यही होना चाहिए. लोकशक्ति बिना किसी भय और स्वार्थ के भाषा का विकास देश-काल-परिस्थिति के अनुरूप करती है. कबीर, तुलसी सरकार नहीं जन से जुड़े और जन में मान्य थे. भाषा का जितना विस्तार इन दिनों ने किया अन्यों ने नहीं. शब्दों को वापरना, गढ़ना, अप्रचलित अर्थ में प्रयोग करना और एक ही शब्द को अलग-अलग प्रसंगों में अलग-अलग अर्थ देने में इनका सानी नहीं.
चिट्ठा जगत ही हिंदी को विश्व भाषा बना सकता है? अगले पाँच सालों के अन्दर विश्व की किसी भी अन्य भाषा की तुलना में हिंदी के चिट्ठे अधिक होंगे. क्या उनकी सामग्री भी अन्य भाषाओँ के चिट्ठों की सामग्री से अधिक प्रासंगिक, उपयोगी व् प्रामाणिक होगी? इस प्रश्न का उत्तर यदि 'हाँ' है तो सरकारी मदद या अड़चन से अप्रभावित हिन्दी सर्व स्वीकार्य होगी, इस प्रश्न का उत्तर यदि 'नहीं" है तो हिंदी को 'हाँ' के लिये जूझना होगा...अन्य विकल्प नहीं है. शायद कम ही लोग यह जानते हैं कि विश्व के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने हमारे सौर मंडल और आकाशगंगा के परे संभावित सभ्यताओं से संपर्क के लिये विश्व की सभी भाषाओँ का ध्वनि और लिपि को लेकर वैज्ञानिक परीक्षण कर संस्कृत तथा हिन्दी को सर्वाधिक उपयुक्त पाया है तथा इन दोनों और कुछ अन्य भाषाओँ में अंतरिक्ष में संकेत प्रसारित किए जा रहे हैं ताकि अन्य सभ्यताएँ धरती से संपर्क कर सकें. अमरीकी राष्ट्रपति अमरीकनों को बार-बार हिन्दी सीखने के लिये चेता रहे हैं किन्तु कभी अंग्रेजों के गुलाम भारतीयों में अभी भी अपने आकाओं की भाषा सीखकर शेष देशवासियों पर प्रभुत्व ज़माने की भावना है. यही हिन्दी के लिये हानिप्रद है.
भारत विश्व का सबसे बड़ा बाज़ार है तो भारतीयों की भाषा सीखना विदेशियों की विवशता है. विदेशों में लगातार हिन्दी शिक्षण और शोध का कार्य बढ़ रहा है.
***
नवगीत:
आँचल मैला
मत होने दो...
*
ममता का
सागर पाया है.
प्रायः भीगे
दामन में.
संकल्पों का
धन पाया है,
रीते-रिसते
आँचल में.
श्रृद्धा-निष्ठां को
सहेज लो,
बिखरा-फैला
मत होने दो.
आँचल मैला
मत होने दो...
*
माटी से जब
सलिल मिले तो,
पंक मचेगा
दूर न करना.
खिले पंक में
जब भी पंकज,
पुलक-ललककर
पल में वरना.
श्वास-चदरिया
निर्मल रखना.
जीवन थैला
मत होने दो.
आँचल मैला
मत होने दो...
***
होने दो...
***
नमन नर्मदा:
भव्य नर्मदा
शन्नो अग्रवाल
(रचनाकार भारत की बेटी किन्तु वर्तमान में इंग्लैंड निवासिनी हैं. परदेश में भी उनके मन-प्राण में भारत की माटी की खुशबू समाई रहती है. इस रचना में वे सनातन सौन्दर्यमयी नर्मदा के प्रति अपनी भावांजलि निवेदित कर रही हैं- सं.)
*
दिव्य नर्मदा को मैंने जाना जबसे
लिपट गयी हूँ इसके आलिंगन में
कल-कल में इसकी नवगीत भरे
शीतल,निर्मल धारा के स्पंदन में.
भव्य,शान्तिमय नवरूप धारिणी
सरस,सुगम वेग जल की धारा
छवि सुखद अवलोकन मन में कर
ह्रदय का दुख भी बह जाता सारा.
निश्छल,चपल लहरें भिगो के आयें
छूकर स्वप्निल से अटल किनारों को
बार-बार नहलाती हैं वापस आकर
जल बीच में कितनी ही चट्टानों को.
पंछी आते जल पी उड़ते मंडराते ऊपर
अठखेली करके जल से करते गुंजन
कलरव से भर जातीं सभी दिशायें तब
फेनिल जल का लगता चांदी सा तन.
आता पथ में कोई अवरोह तनिक भी
नहीं जरा सा तब गति में अंतर आता
तन-मन सबके धोकर उज्ज्वल करती
मिल प्रवाह में पाप-मैल सब बह जाता.
८-१०-२००९
***

सोमवार, 22 जून 2026

जून २२, बरसाती जंगल दिवस, सॉनेट, न्याय प्रक्रिया, कहमुकरी, सड़गोड़ासनी, सरस्वती, अभियंता, सवैया

 सलिल सृजन जून २२

बरसाती जंगल दिवस
*
ग़ज़लिका १ ० सीधी अँगुली घी न निकलता है प्यारे! हर जसुदा को लगे लला उसके न्यारे . हो जिसका नापाक इरादा, वह खुद ही हारा करता हिम्मत, खुद को खुद मारे . भक्त लूट ले मंदिर तो अचरज मत कर उसे पता प्रभु भटक रहे द्वारे-द्वारे . सूर निहारें लीला प्रभु की बिन नैना नैना रोएँ प्रभु आ दरस दिखा जा रे! . रहना है बेदाग अगर तो गुर सीखो आपस में मिल बाँट माल गुपचुप खा रे! ००० ग़ज़लिका २ ० भीतर से तो हम सब बिखरे-बिखरे हैं। हैं ढपोरशंखी कहलाते चतुरे हैं।। . पंक लपेटे मुख पर बनते हैं पंकज लेकिन दिखा रहे सबको हम निखरे हैं।। . छुट्टे सिक्के लिए फिरें बाजारों में। सौदागर हैं छुरे लिए हम बकरे हैं।। . आशाओं ने भाषाओं को बदल दिया। तन से नहीं जवान, न मन से डुकरे हैं।। . मीमांसाकारों को पढ़कर बड़े हुए। जो कुछ लिखा-कहा वह सब तो फिकरे हैं।। . मनमानी कर कहते हैं मन की बातें। समझ सके जो वे सज्जन जन सिहरे हैं।। . ऊपर ऊपर तैर रहे हो भेंट चढ़ा। गोलमाल करते जो उतरे गहरे हैं।। . रामालय को लूटालय में बदल दिया। हैं अंगद के पाँव, न सुनते बहरे हैं।। . जाँच कमेटी में भी भक्त हमीं से हैं। बहता सलिल न निर्मल, चंपत ठहरे हैं।। २२.६.२०२६ ०००
सॉनेट
खत्म नहीं जिज्ञासा होती
हर जिज्ञासु अमर होता
ज्ञान समुद में खाता गोता
मति निकाल लाती मोती।
आशा नव सपने बोती
पौरुष नहीं हारकर रोता
धैर्य नहीं विपदा में खोता
पंक सलिल-धारा धोती।
सरगम लय-रस ताना-बाना
शब्द भाव के रंग चढ़ाए
निशि नित चादर बुने मौन रह।
कहे कबीर न जोड़-बचाना
खाली हाथों आए-जाए
रहा हमेशा कभी कौन कह?
२२.६.२०२५
०0०
ग़ज़लिका
भोर भई सूरज टेरत रे!
उसा बुलाउत पथ हेरत रे!
.
छिमा माँग भू माँ पे पग धर
बिलम नें कर आलस घेरत रे!
.
बगुला भगत बजाउत घंटी
भोग तके, माला फेरत रे!
.
आस किरन कुररी की नाईँ
अँधियारा लोफर छेरत रे!
.
'सलिल' दनादन भोग गटक खें
भगतन खौं ठाकुर पेरत रे!
२२.६.२०२५
०0०
विमर्श:
न्याय प्रक्रिया बदलाव जरूरी
*
न्याय क्या?
निर्बल-असहाय को उसका अधिकार दिलाना।
देनेवाला- न्यायाधीश
माध्यम- अधिवक्ता
प्रक्रिया- वाद स्थापित करना।
सुलभता नहीं, सहजता नहीं, सरलता नहीं।
अत्यंत खर्चीली, समयखाऊ, जटिल, उलझन भरी, कानूनी दाँव-पेंच में सत्य की हत्या।
वकालतनामा- मुवक्किल से सभी अधिकार छीनकर वकील को देता है।
वकील मनमानी करता है। फीस लेकर भी पेशी पर नहीं जाता, तारीख बढ़ना कर बार-बार पैसे माँगता है, वाद के सत्य को छिपाकर जीत के लिए झूठे साक्ष्य और साक्षी गढ़कर न्यायालय की आँख में धूल झोंकता है।
कोढ़ में खाज यह कि मुवक्किल के हित संरक्षण के स्थान पर वकील और न्यायपालिका अपने संरक्षण की माँग करते हैं।
अनेक असामाजिक तत्व वकील बन गए हैं जो न्याय पालिका और मुवक्किल दोनों में दहशत फैलाते हैं।
सड़-गल रही व्यवस्था बदलें।
न्याय प्राप्ति के लिए वकील की आवश्यकता समाप्त की जाए।
जूरी प्रणाली लागू की जाए। वाद स्थापित करते समय ही वादी पूरा घटनाक्रम और दस्तावेज न्यायालय और प्रतिवादी को दे। प्रतिवादी अपना उत्तर न्यायालय व वादी को निर्धारित समय सीमा में उपलब्ध कराए। पहली पेशी में जूरी दोनों को सुनकर शेष दस्तावेज या साक्षी प्रस्तुत करने हेतु दूसरी पेशी दे। सामान्य प्रकरणों में तीसरी, महत्वपूर्ण प्रकरणों में पाँचवी पेशी में फैसला हो। न्यायडीश की सहायता के लिए वकील जूरी सदस्य हो जीसे मानदेय/भत्ता मिले। वादी-प्रतिवादी जूरी शुल्क न्यायालय में जमा करें, वकील को फीस न दें।
इससे न्याय प्रक्रिया सरल, सस्ती, सुलभ, शीघ्र तथा निष्पक्ष होगी।
कुछ वर्षों में वाद प्रकरणों के अंबार कम और समाप्त होने लगेंगे।
२२.४.२०२३
***
कविता के शब्द
यदि "आपके दिमाग़ में कविता के शब्द उस तरह नहीं आते हैं जैसे पेड़ों पर पत्ते, तो बेहतर होगा कि आप कविता लिखने के बारे में सोचें ही नहीं। यानी अच्छी कविता वही लिख सकते हैं जिन्हें कविता के शब्द सोचने की ज़रूरत न पड़े । वे ख़ुद-ब-ख़ुद आने शुरू हो जाएँ और कविता बनती जाए ।"
- जाॅन कीट्स
कथा लिखती हूँ इतिहास नहीं
"मैंने जितना भी लिखा है शत-प्रतिशत मेरा भोगा हुआ यथार्थ है, यह मैं नहीं कह सकती क्योंकि मैं कथा लिखती हूँ, इतिहास नहीं । मेरा काम है कहानी को ढूँढ़ना, किन्तु अगाध जलराशि से इस कथा-मीन को पकड़ने में केवल कल्पना के काँटे से ही काम नहीं चलता, यथार्थ के आटे की गोली भी उतनी ही आवश्यक होती है।"
- शिवानी (रमेश बतरा/सतीश चंद्र धींगड़ा के किसी प्रश्न पर - 1983)
*
कहमुकरी
•
जिसने जन्म दिया पाला है
कदम-कदम देखा-भाला है
जिसका सिर पर हाथ हमेशा
क्या सखि! दाता?
ना सखि पिता।
•
थाम कलाई नाजुक कोमल
बात करे मुस्काकर पल-पल
मैं न सकी उसको फटकार
क्या सखि सजना?
ना, मनिहार।
•
जैसे ही आए, छा जाए
बिना कारण ही शोर मचाए
पड़े न उसको पल भर कल
क्या सखि प्रियतम?
न, सखी बादल।
•
पता नहीं पड़ती गहराई
रौद्र नहीं, छवि शांत सुहाई
दे उपहार न पूर्व बताकर
सखि! घरवाला
नहिं रत्नाकर।
•
जब मिलती तभी मिलता चैन
मिलती नहीं तो मन बेचैन
अँखियों को भाए ज्यों सखियाँ
उत्तर बिंदिया?
नहिं सखी निंदिया।
•
याद भुलाए से नहिं भूले
पलक बंद नैनों में झूले
संग सेज पर आए, भाए
यारां बन्नी?
ना रे! निन्नी।
•
बीन बिना वह बीन बजा ले
गैरों से अपनापन पाले
नहीं तनिक भी रखता अंतर
बूझूँ? मच्छर
ना रे! झींगुर।
•
बिन मंडप वह डाले फेरे
मंत्र पढ़े, सजनी को टेरे
भैंस बराबर उसको अक्षर
लालबुझक्कड़?
नहिं रे मच्छर।
•
बिन चेताए करता हमला
रोक न पाता कोई अमला
बिन कारण होता हमलावर
पाक-चाइना?
ना सखि! मच्छर।
•
जब बोले तब मन को भाए
मौन रहे तो याद न जाए
पंथ हेर मन होता बेकल
क्या वह नूपुर?
ना रे हूटर।
•
सचमुच है वह बिल्कुल अपना
नाप न पाता कोई नपना
जब दिखता तब बहुत लुभाता
गुइयाँ सजना?
ना सखि! सपना।
•
स्वप्न दिखाकर तोड़ा करता
मँझधारों में छोड़ा करता
करा न कहता, कहा न करता
समझी, बेटा
ना सखि! नेता।
२२-६-२०२२
•••
मैया शारदे! पत रखियो
*
छंद - सड़गोड़ासनी।
पद - ३, मात्राएँ - १५-१२-१५।
पहली पंक्ति - ४ मात्राओं के बाद गुरु-लघु अनिवार्य।
गायन - दादरा ताल ६ मात्रा।
*
मैया शारदे! पत रखियो
मोखों सद्बुधि दइयो
मैया शारदे! पत रखियो
जा मन मंदिर मैहरवारी
तुरतइ आन बिरजियो
मैया शारदे! पत रखियो
माया-मोह राच्छस घेरे
झट सें मार भगइयो
मैया शारदे! पत रखियो
अनहद नाद सुनइयो माता!
लागी नींद जगइयो
मैया शारदे! पत रखियो
भासा-आखर-कवित मोय दो
लय-रस-भाव लुटइयो
मैया शारदे! पत रखियो
मात्रा-वर्ण; प्रतीक बिम्ब नव
अलंकार झलकइयो
मैया शारदे! पत रखियो
२५-११-२०१९
***
शारद वंदन
*
बीना लेकर प्रगट हों, बीनावादिनी साथ
कृपा कोर कर हो सदय, रखो सीस पै हाथ
मोरी मति चकरानी है, ऐ मैया! मोए बचा लइयो
मो खों गैल भुलानी है, ऐ मैया! पार लगा दइयो
जनम-जनम की मैली चादर
रीती सत करमन की गागर
सदय नईं नटराज हो रए
दया नईँ कर रए नटनागर
प्रभु की कृपा करानी है, रमा-उमा लै आ जइयो
तनक न जानौं पूजन-वंदन
नईँ जुट रए अच्छत्-चंदन
प्रगट नें होते चित्रगुप्त जू
सदय नें होते गिरिजानंदन
दरसन की जिद ठानी है, ऐ मैया! दरस दिला दइयो
सारद! हंसबाहिनी माता
सकल भुवन तुमरे जस गाता
नीर-छीर मति दो ममतामई!
कलम लए कर रऔ जगराता
अलंकार रस छंद न जानूँ, भगतें सुझा लिखा लइयो
११-६-२०२०
***
ॐ
शारद वंदना
सतमात्रिक नवान्वेषित छंद
सूत्र : ननल।
*
सुर सति नमन
नित कर अमन
*
मुख छवि प्रखर
स्वर-ध्वनि मधुर
अविचल अजर
अविकल अमर
कर नव सृजन
सुरसति नमन
*
पद दल असुर
रच पद स-सुर
कर जननि घर
मम हृदयपुर
कर गह सु मन
सुरसति नमन
*
रस बन बरस
नित धरणि पर
शुभ कर मुखर
सुख रच प्रचुर
शुभ मृदु वचन
सुरसति नमन
२२-६-२०२०
***
त्रिअष्टक सवैया
गणसूत्र - जरज रजर जर।
वर्ण यति - ८-८-८ ।
मात्रा यति - १२-१२-१२।
*
तलाशते रहे कमी, न खूबियाँ निहारते, प्रसन्नता कहाँ मिले?
विरासतें रहे हमीं, न और को पुकारते, हँसी-खुशी कहाँ मिले?
बटोरने रहे सदा, न रंकबंधु हो सके, न आसमां-जमीं मिले।
निहारते रहे छिपे, न मीत प्रीत पा सके, मिले- कभी नहीं मिले ।
२२-६-२०१९
९४२५१८३२४४
***
हम अभियंता...
*
हम अभियंता!, हम अभियंता!!
मानवता के भाग्य-नियंता...
*
माटी से मूरत गढ़ते हैं,
कंकर को शंकर करते हैं.
वामन से संकल्पित पग धर,
हिमगिरि को बौना करते हैं.
नियति-नटी के शिलालेख पर
अदिख लिखा जो वह पढ़ते हैं.
असफलता का फ्रेम बनाकर,
चित्र सफलता का मढ़ते हैं.
श्रम-कोशिश दो हाथ हमारे-
फिर भविष्य की क्यों हो चिंता...
*
अनिल, अनल, भू, सलिल, गगन हम,
पंचतत्व औजार हमारे.
राष्ट्र, विश्व, मानव-उन्नति हित,
तन, मन, शक्ति, समय, धन वारे.
वर्तमान, गत-आगत नत है,
तकनीकों ने रूप निखारे.
निराकार साकार हो रहे,
अपने सपने सतत सँवारे.
साथ हमारे रहना चाहे,
भू पर उतर स्वयं भगवंता...
*
भवन, सड़क, पुल, यंत्र बनाते,
ऊसर में फसलें उपजाते.
हमीं विश्वकर्मा विधि-वंशज.
मंगल पर पद-चिन्ह बनाते.
प्रकृति-पुत्र हैं, नियति-नटी की,
आँखों से हम आँख मिलाते.
हरि सम हर हर आपद-विपदा,
गरल पचा अमृत बरसाते.
'सलिल' स्नेह नर्मदा निनादित,
ऊर्जा-पुंज अनादि-अनंता...
***
विमर्श
प्रश्न: भारतीय बोलियाँ हिंदी का हिस्सा हैं या नहीं?
हिस्सा हैं तो अलग मान्य क्यों?,
हिस्सा नहीं हैं तो उनके साहित्यकारों को हिंदी का माना जाए या नहीं??
*
भारत की सभी बोलियाँ भाषाएँ हिंदी की बहनें हैं. विद्यापति भारत और हिंदी के भी हैं. आपस में फूट डालने का कार्य निंदनीय है. सूर को ब्रज, तुलसी को अवधी, जगनिक और ईसुरी को बुंदेली, चंद बरदाई को राजस्थानी, खुसरो-कबीर को उर्दू का कवि बताकर हिंदी को विपन्न करने की दुर्बुद्धि हमें कदापि स्वीकार्य नहीं है. हम हिंदीभाषी तो भारत की हर भाषा और बोली के हर रचनाकार को अपनाते हैं. हिंदी महासागर है. होना तो यह चाहिए कि हर भाषा बोली के सामान्य प्रयोग में आनेवाले शब्द हिंदी शब्दकोष में उसी तरह सम्मिलित किये जाएँ जैसे अंग्रेजी विश्व की विविध भाषाओँ के शब्द लेती है. भारत की सब भाषाओँ केबहु उपयोगी शब्दों से समृद्ध हिंदी उन्हें तभी अपनी लगेगी जब हिंदी में वे अपने शब्द भी पायेंगे. आवश्यकता डॉ. प्रभाकर माचवे जैसे बहुभाषा-बोलीविद होने की है. सब एक-दुसरे की बोलीओं में लिखें. साहित्यकार को राजनीति में पड़ने की कोई जरूरत नहीं है. सियासत सिया के सत से पूरी तरह दूर है. साहित्यकार शब्द-सेतु बनाकर ही सद्भावना-सेतु बना सकेगा.
२२-६-२०१७
***
विमर्श :
हिंदी की शब्द सलिला
*
आजकल हिंदी विरोध और हिनदी समर्थन की राजनैतिक नूराकुश्ती जमकर हो रही है। दोनों पक्षों का वास्तविक उद्देश्य अपना राजनैतिक स्वार्थ साधना है। दोनों पक्षों को हिंदी या अन्य किसी भाषा से कुछ लेना-देना नहीं है। सत्तर के दशक में प्रश्न को उछालकर राजनैतिक रोटियाँ सेंकी जा चुकी हैं। अब फिर तैयारी है किंतु तब आदमी तबाह हुआ और अब भी होगा। भाषाएँ और बोलियाँ एक दूसरे की पूरक हैं, प्रतिस्पर्धी नहीं। खुसरो से लेकर हजारीप्रसाद द्विवेदी और कबीर से लेकर तुलसी तक हिंदी ने कितने शब्द संस्कृत. पाली, प्राकृत, अपभ्रंश, बुंदेली, भोजपुरी, बृज, अवधी, अंगिका, बज्जिका, मालवी निमाड़ी, सधुक्कड़ी, लश्करी, मराठी, गुजराती, बांग्ला और अन्य देशज भाषाओँ-बोलियों से लिये-दिये और कितने अंग्रेजी, तुर्की, अरबी, फ़ारसी, पुर्तगाली आदि से इसका कोई लेख-जोखा संभव नहीं है.
इसके बाद भी हिंदी पर संकीर्णता, अल्प शब्द सामर्थ्य, अभिव्यक्ति में अक्षम और अनुपयुक्त होने का आरोप लगाया जाना कितना सही है? गांधी जी ने सभी भारतीय भाषाओँ को देवनागरी लिपि में लिखने का सुझाव दिया था ताकि सभी के शब्द आपस में घुलमिल सकें और कालांतर में एक भाषा का विकास हो किन्तु प्रश्न पर स्वार्थ की रोटी सेंकनेवाले अंग्रेजीपरस्त गांधीवादियों और नौकरशाहों ने यह न होने दिया और ७० के दशक में हिन्दीविरोध दक्षिण की राजनीति में खूब पनपा।
संस्कृत से हिंदी, फ़ारसी होकर अंग्रेजी में जानेवाले अनगिनत शब्दों में से कुछ हैं: मातृ - मातर - मादर - मदर, पितृ - पितर - फिदर - फादर, भ्रातृ - बिरादर - ब्रदर, दीवाल - द वाल, आत्मा - ऐटम, चर्चा - चर्च (जहाँ चर्चा की जाए), मुनिस्थारि = मठ, -मोनस्ट्री = पादरियों आवास, पुरोहित - प्रीहट - प्रीस्ट, श्रमण - सरमन = अनुयायियों के श्रवण हेतु प्रवचन, देव-निति (देवों की दिनचर्या) - देवनइति (देव इस प्रकार हैं) - divnity = ईश्वरीय, देव - deity - devotee, भगवद - पगवद - pagoda फ्रेंच मंदिर, वाटिका - वेटिकन, विपश्य - बिपश्य - बिशप, काष्ठ-द्रुम-दल(लकड़ी से बना प्रार्थनाघर) - cathedral, साम (सामवेद) - p-salm (प्रार्थना), प्रवर - frair, मौसल - मुसल(मान), कान्हा - कान्ह - कान - खान, मख (अग्निपूजन का स्थान) - मक्का, गाभा (गर्भगृह) - काबा, शिवलिंग - संगे-अस्वद (काली मूर्ति, काला शिवलिंग), मखेश्वर - मक्केश्वर, यदु - jude, ईश्वर आलय - isreal (जहाँ वास्तव इश्वर है), हरिभ - हिब्रू, आप-स्थल - apostle, अभय - abbey, बास्पित-स्म (हम अभिषिक्त हो चुके) - baptism (बपतिस्मा = ईसाई धर्म में दीक्षित), शिव - तीन नेत्रोंवाला - त्र्यम्बकेश - बकश - बकस - अक्खोस - bachenelion (नशे में मस्त रहनेवाले), शिव-शिव-हरे - सिप-सिप-हरी - हिप-हिप-हुर्राह, शंकर - कंकर - concordium - concor, शिवस्थान - sistine chapel (धर्मचिन्हों का पूजास्थल), अंतर - अंदर - अंडर, अम्बा- अम्मा - माँ मेरी - मरियम आदि।
हिंदी में प्रयुक्त अरबी भाषा के शब्द : दुनिया, ग़रीब, जवाब, अमीर, मशहूर, किताब, तरक्की, अजीब, नतीज़ा, मदद, ईमानदार, इलाज़, क़िस्सा, मालूम, आदमी, इज्जत, ख़त, नशा, बहस आदि ।
हिंदी में प्रयुक्त फ़ारसी भाषा के शब्द : रास्ता, आराम, ज़िंदगी, दुकान, बीमार, सिपाही, ख़ून, बाम, क़लम, सितार, ज़मीन, कुश्ती, चेहरा, गुलाब, पुल, मुफ़्त, खरगोश, रूमाल, गिरफ़्तार आदि ।
हिंदी में प्रयुक्त तुर्की भाषा के शब्द : कैंची, कुली, लाश, दारोगा, तोप, तलाश, बेगम, बहादुर आदि ।
हिंदी में प्रयुक्त पुर्तगाली भाषा के शब्द : अलमारी, साबुन, तौलिया, बाल्टी, कमरा, गमला, चाबी, मेज, संतरा आदि ।
हिंदी में प्रयुक्त अन्य भाषाओ से: उजबक (उज्बेकिस्तानी, रंग-बिरंगे कपड़े पहननेवाले) = अजीब तरह से रहनेवाला,
हिंदी में प्रयुक्त बांग्ला शब्द: मोशाय - महोदय, माछी - मछली, भालो - भला,
हिंदी में प्रयुक्त मराठी शब्द: आई - माँ, माछी - मछली,
अपनी आवश्यकता हर भाषा-बोली से शब्द ग्रहण करनेवाली व्यापक में से उदारतापूर्वक शब्द देनेवाली हिंदी ही भविष्य की विश्व भाषा है इस सत्य को जितनी जल्दी स्वीकार किया जाएगा, भाषायी विवादों का समापन हो सकेगा।
***
गीत
अपने अम्बर का छोर
*
मैंने थाम रखी
अपनी वसुधा की डोर
तुम थामे रहना
अपने अंबर का छोर.…
*
हल धर कर
हलधर से, हल ना हुए सवाल
पनघट में
पन घट कर, पैदा करे बवाल
कूद रहे
बेताल, मना वैलेंटाइन
जंगल कटे,
खुदे पर्वत, सूखे हैं ताल
पजर गयी
अमराई, कोयल झुलस गयी-
नैन पुतरिया
टँगी डाल पर, रोये भोर.…
*
लूट सिया-सत
हाय! सियासत इठलायी
रक्षक पुलिस
हुई भक्षक, शामत आयी
अँधा तौले
न्याय, कोट काला ले-दे
शगुन विचारे
शकुनी, कृष्णा पछतायी
युवा सनसनी
मस्ती मौज मजा चाहें-
आँख लड़ायें
फिरा, न पोछें भीगी कोर....
*
सुर करते हैं
भोग प्रलोभन दे-देकर
असुर भोगते
बल के दम पर दम देकर
संयम खो,
छलकर नर-नारी पतित हुए
पाप छिपायें
दोष और को दे-देकर
मना जान की
खैर, जानकी छली गयी-
चला न आरक्षित
जनप्रतिनिधि पर कुछ जोर....
*
सरहद पर
सर हद करने आतंक डटा
दल-दल का
दलदल कुछ लेकिन नहीं घटा
बढ़ी अमीरी
अधिक, गरीबी अधिक बढ़ी
अंतर में पलता
अंतर, बढ़ नहीं पटा
रमा रमा में
मन, आराम-विराम चहे-
कहे नहीं 'आ
राम' रहा नाहक शोर....
*
मैंने थाम रखी
अपनी वसुधा की डोर
तुम थामे रहना
अपने अंबर का छोर.…
२२-६-२०१४
***
सनातन साहित्य : वेद, पुराण स्मृतियाँ
हमारा पारम्परिक सनातन साहित्य विश्व मानवता की अमूल्य धरोहर है. इसकी एक झलका निम्न है। इस में आप भी अपनी जानकारी जोड़िये:
*
वेद हमारे धर्मग्रन्थ हैं । वेद संसार के पुस्तकालय में सबसे प्राचीन ग्रन्थ हैं । वेद का ज्ञान सृष्टि के आदि में परमात्मा ने अग्नि , वायु , आदित्य और अंगिरा – इन चार ऋषियों को एक साथ दिया था । वेद मानवमात्र के लिये हैं ।
वेद चार हैं ----
१. ऋग्वेद – इसमें तिनके से लेकर ब्रह्म – पर्यन्त सब पदार्थो का ज्ञान दिया हुआ है । इसमें १०,५२२ मन्त्र हैं ।
२. यजुर्वेद – इसमें कर्मकाण्ड है । इसमें अनेक प्रकार के यज्ञों का वर्णन है । इसमें १,९७५ मन्त्र हैं ।
३. सामवेद – यह उपासना का वेद है । इसमें १,८७५ मन्त्र हैं ।
४. अथर्ववेद – इसमें मुख्यतः विज्ञान – परक मन्त्र हैं । इसमें ५,९७७ मन्त्र हैं ।
उपवेद – चारों वेदों के चार उपवेद हैं । क्रमशः – आयुर्वेद , धनुर्वेद , गान्धर्ववेद और अर्थवेद ।
वेदांग - ज्योतिष: नेत्र (सौरमंडल, मुहूर्त आदि), निरुक्त, कान: (वैदिक शब्द-व्याख्या आदि), शिक्षा: नासिका ( वेद मंत्र उच्चारण), व्याकरण: मुख (वैदिक शब्दार्थ), कल्प: हाथ (सूत्र / कल्प साहित्य- धर्म सूत्र: वर्ण, आश्रम आदि, श्रोत सूत्र: वृहद यज्ञ विधान, गृह्य सूत्र: लघु यज्ञ विधान, संस्कार, शुल्व सूत्र: वेदी निर्माण), छंद: पैर (काव्य लक्षण, आदि) ।
पुराण - मुख्य १८ ब्रम्ह, पद्म, विष्णु, शिव, नारदीय, श्रीमद्भागवत, मार्कण्डेय, अग्नि, भविष्य, ब्रम्हवैवर्त, लिंग, वाराह, स्कंद, वामन, कूर्म, मत्स्य, गरुड़, वायु (ब्रम्हांड) । स्कंद पुराण का एक भाग नर्मदापुराण के नाम से प्रकाशित है। सेठ गोविन्ददास ने गांधी पुराण लिखा किन्तु वह इस श्रेणी में नहीं है।
उपनिषद – अब तक प्रकाशित होने वाले उपनिषदों की कुल संख्या २२३ है , परन्तु प्रामाणिक उपनिषद ११ ही हैं । इनके नाम हैं --- ईश , केन , कठ , प्रश्न , मुण्डक , माण्डूक्य , तैत्तिरीय , ऐतरेय , छान्दोग्य , बृहदारण्यक और श्वेताश्वतर ।
ब्राह्मण ग्रन्थ – इनमें वेदों की व्याख्या है । चारों वेदों के प्रमुख ब्राह्मणग्रन्थ ये हैं ---
ऐतरेय , शतपथ , ताण्ड्य और गोपथ ।
दर्शनशास्त्र – आस्तिक दर्शन छह हैं – न्याय , वैशेषिक , सांख्य , योग , पूर्वमीमांसा और वेदान्त ।
स्मृतियाँ – स्मृतियों की संख्या ६५ है। मुख्य १८ स्मृतियाँ मनु, याज्ञवल्क्य, अत्रि, विष्णु, अंगिरस, यम, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, पराशर, व्यास, शंख, दक्ष, गौतम, शातातप तथा वशिष्ठ रचित हैं।
इनके अतिरिक्त आरण्यक, विमानशास्त्र आदि अनेक ग्रन्थ हैं।
२२-६-२०१४
***

शुक्रवार, 1 मई 2026

मई १, हाइकु, राधिका छंद, नवगीत, मुक्तक, दोहा, सोनेट, भोजपुरी, सुमित्र, कहमुकरी

सलिल सृजन मई १
*
वक्त रहते कत्ल कर देते तो बेहतर था
कत्ल करते वक्त चुप रहते तो बेहतर था
.
बेगुनाही का करें क्या?, है ना कुछ भी मोल
भूख से ही पेट भर लेते तो बेहतर था
.
आपने वादे किए, जुमला कहा तो क्या?
बेअकल होते अकलवर तो ही बेहतर था
.
बेरहम है वक्त, तू भी, क्या करें या न करें?
हवा होकर हवा हो जाते तो बेहतर था
.
सफर कट ही जाएगा बिन हमसफर यारब
दो कदम बढ़ साथ हो लेते तो बेहतर था
.
दर्दे-दिल की क्यों करें परवा कहें तो आप?
बेदिली ना कर समझ लेते तो बेहतर था
.
देवदासाना कटी पारो बिना ये ज़िंदगी
चंद्रमुखियाँ दगा दे देतीं तो बेहतर था
१.५.२०२६
000
एक दोहा
परी कथा कह सुलाया, माँ ने फिर से आज।
भूखा बच्चा कर रहा, सपने में हँस राज।।
*
सॉनेट
मजदूर
*
कंकर को शंकर करते हम,
माटी से मूरत गढ़ते हैं,
सागर-गिरि पर पग धरते हम,
चित्र सफलता का मढ़ते हैं।
हम हैं नींव; न शिखर-पताका,
हमसे ही सभ्यता बनी है,
मूल्य नहीं अंधों ने आँका,
कसके मन में पीर घनी है।
हाथ हथौड़ा वज्र सरीखा,
लौह-शिला को सिकता कर दे,
भाग्य हमारे कर की रेखा,
हँसते विधि-हरि-हर को वर दे।
मंजिल रहे न हमसे दूर।
भाग्य-विधाता हम मजदूर।।
१ मई २०२४
***
सोनेट
श्रमिक
*
जो मेहनतकर जीवन जीता
सार्थक है उसका ही जीना
जो सोचे बीता सो बीता
गंगाजल है जिसे पसीना।
वह मजदूर श्रेष्ठ मानव है
उससे है यह धरती सजती
श्रम न करे जो वह दानव है
लूट-खसोटे वह यह धरती।
एक दिवस जो मना रहे हैं
मजदूरों के वे शोषक हैं
शेष दिवस जो भुला रहे हैं
वही शोषकों के पोषक हैं।
जो खुद अपना काम करेंगे
भव सागर से वही तरेंगे
१-५-२०२३
***
kahmukari
*
Everywhere now and then
Never asking why and when
Running as much as it can
Is it run way?
No, its Train.
000
मुक्तिका
*
परमपिता ने भेंट दी, देह धरोहर मान
स्वच्छ रखें सत्कारिए, बनिए मीत सुजान
*
मन में तन का वास है, तन में मन का वास
मन की गति है असीमित, तन सीमित पहचान
*
तन को मन सामर्थ्य दे, मन को तन आकार
पूरक; प्रतिद्वंदी नहीं, जीव धरोहर जान
*
मन के साधे तन सधे, तन साधे मन साध
दोनों साधे योगकर, पूर्ण बने इंसान
*
मन का मनका फेर ले, तन का मनका छोड़
तभी झलक दिख सकेगी, उनकी जो भगवान
***
दोहा सलिला
देह देन रघुवीर की, इसको रखें सम्हाल
काया राखे धर्म है, पाकर जीव निहाल
देह धनुष पर अहर्निश, धरें श्वास का तीर
आस किला रक्षित रखे, संयम की प्राचीर
जहाँ देह तहँ राम हैं, हैं विदेह मिथलेश
दश रथ हैं दश इंद्रियाँ, रथी राम अवधेश
को विद? वह जो देह को, जान न पाले मोह
पंचतत्व का समन्वय, कोरो ना विद्रोह
रह एकाकी भरत सम, करें राम से प्रीत
लखन रखें अंतर बना, सिय धीरज की जीत
स्वास्थ्य अवध भेदे न नर, वानर भरत सतर्क
तीर नियम का साधते, करें न कोई फर्क
आशा की संजीवनी, शैली सलिल समान
मुँह कर पग हँस धो रहे, सियाराम सुख मान
***
श्रमिक दिवस पर
गीत
*
आदिशक्ति हम करो अनुकरण
अन्य युक्ति तज करो पथ वरण
करो परिश्रम स्वेद बहाओ
तब दो रोटी खाओ-पचाओ
इंसानों बढ़ तजो आवरण
कंकर-कंकर में शंकर है
द्रोह करे तो प्रलयंकर है
डरो, लोभ निज करो संवरण
तुमसे हम कब?, हमसे तुम हो
हम बिन महलों पल में गुम हो
तोंदों पिचको, तभी संतरण
१-५-२०२०
***
मुक्तिका
पारिजात छंद
गण सूत्र: रगण + लघु
मापनी: २१२१
*
तीन चार
बाँट प्यार
.
खेल खेल
आर-पार
.
जा न भूल
ले उधार
*
रीति नीति
हैं न भार
*
लोक लाज
हो सिंगार
.
मित्र-शत्रु
हैं हजार
.
फूल-शूल
जीत-हार
***
कृति चर्चा:
दोहों में प्रणय-सुवास: यादें बनी लिबास
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
[कृति विवरण: यादें बनीं लिबास, दोहा संग्रह, डॉ. राजकुमार तिवारी 'सुमित्र', प्रथम संकरण, २०१७, आई.एस.बी.एन. ९७८-८१-७६६७-३४६-४, पृष्ठ १०४ मूल्य २००/-, आवरण बहुरंगी, सजिल्द, आकर २१ सेमी x १४ सेमी,भावना प्रकाशन, १०९-ए पटपड़गंज दिल्ली ११००९२, दूरभाष ९३१२८६९९४७, दोहाकार संपर्क ११२ सराफा, मोतीलाल नेहरू वार्ड, निकट कोतवाली जबलपुर ४८२००१, ०७६१ २६५२०२७, ९३००१२१७०२]
*
बाँच सको तो बाँच लो आँखों का अखबार दोहा हिंदी ही नहीं बहुतेरी भारतीय भाषाओँ का कालजयी सर्वाधिक लोकप्रिय ही नहीं लोकोपयोगी छंद भी है। हर काल में दोहा कवियों की काव्याभिव्यक्ति का समर्थ माध्यम रहा है। आदिकाल (१४०० सदी से पूर्व) चंदबरदाई आदि कवियों ने रासो काव्यों में वीर रस प्रधान दोहों की रचना कर योद्धाओं को पराक्रम हेतु प्रेरित किया। भक्तिकाल (१३७५ से ११७०० ई. पू.) में निर्गुण भक्ति धारांतर्गत ज्ञानाश्रयी भाव धारा के कबीर, नानक, दादूदयाल, रैदास, मलूकदास, सुंदरदास, धर्मदास आदि ने तथा प्रेमाश्रयी भाव धारा के मलिक मोहम्मद जायसी, कुतुबन, मंझन, शेख नबी, कासिम शाह, नूर मोहम्मद आदि ने आध्यात्मिक भाव संपन्न दोहे प्रभु-अर्पित किए। सगुण भावधारा की रामाश्रयी शाखा में तुलसीदास, रत्नावली, अग्रदास, नाभा दास, केशवदास, हृदयराम, प्राणचंद चौहान, महाराज विश्वनाथ सिंह, रघुनाथ सिंह आदि ने कृष्णाश्रयी शाखा के सूरदास, नंददास,कुम्भनदास, छीतस्वामी, गोविन्द स्वामी, चतुर्भुज दास, कृष्णदास, मीरा, रसखान, रहीम के साथ मिलकर दोहा को इष्ट के प्रति समर्पण का माध्यम बनाया। रीतिकाल (१७००-१९०० ई. पू. मे केशव, बिहारी, भूषण, मतिराम, घनानन्द, सेनापति आदि ने मुख्यत: श्रृंगार तथा आलंकारिकता की अभिव्यक्ति करने के लिए दोहा को सर्वाधिक उपयुक्त पाया। आधुनिक काल (१८५० ईस्वी के पश्चात) छायावादी, प्रगतिवादी, प्रयोगवादी और यथार्थवादी युग में पारम्परिक हिंदी छंदों की उपेक्षा का शिकार दोहा भी हुआ। नव्योत्तर काल (१९८० ईस्वी के पश्चात) में तथाकथित प्रगतिवादी कविता से मोह भंग होने के साथ-साथ आंग्ल साहित्य के अनुकरण की प्रवृत्ति भी घटी। अंतरजाल पर हिंदी भाषा और साहित्य को नव प्रतिष्ठा मिली। गीत और दोहा फिर उत्कर्ष की ओर अग्रसर हुए।
सनातन सलिला नर्मदा के श्रेष्ठ-ज्येष्ठ कवि डॉ. राजकुमार तिवारी सुमित्र का काव्य प्रवेश लगभग १९५० में हुआ। शिक्षक तथा पत्रकार रहते हुए आपने कलम को तराशा। पारिवारिक संस्कार, अध्ययन वृत्ति तथा साहित्यकारों की संगति ने उम्र के साथ अध्ययन और सृजन के क्षेत्र में उन्हें गहराई और ऊँचाई की ओर बढ़ते रहने की प्रेरणा दी। दोहा संग्रह ''यादें बनीं लिबास'' में यत्र-तत्र ही नहीं सर्वत्र व्याप्ति है उनकी जिन्होंने कवी के जीवन में प्रवेश कर उसे पूर्णता प्रदान की, जो जाकर भी जा न सकी, जिसकी उपस्थिति की प्रतीति कवि को पल-पल होती है। उसे उपस्थित मानते ही अनुपस्थिति अपना अस्तित्व बताने लगती है और तब उसकी संगति के समय की यादें कवि-मन को उसी तरह आवृत्त कर लेती हैं जैसे लिबास तन को ढाँकता है। शीर्षक की सार्थकता पूरी कृति में उसी तरह अनुभव की जा सकती है जैसे बगिया में सुमन-सुरभि। प्रेम, रूप-सौंदर्य, देह-दर्शन, नयन, स्वप्न, वसंत, सावन, फागुन आदि अनेक शीर्षकों के अंतर्गत सहेजे गए दोहे कहे-अनकहे उन्हीं के लिए कहे गए हैं जो विदेह होकर भी जानना छाती हैं कि उनका स्मरण सायास है या अनायास? उन्हें निश्चय ही संतुष्टि होगी यह जानकर कि जब स्मृतियाँ अभिन्न हों तो लिबास बन जाती हैं, तब याद नहीं करना पड़ता।
याद हमारी आ गई, या कुछ किया प्रयास।
अपना तो ये हाल है, यादें बनीं लिबास।।
जिसने आजीवन शैया से उठाकर धरा पर पग रखने से आरंभ कर धरा को छोड़ शैया पर जाने तक पल-पल रीति-रिवाजों का पालन मन-प्राण से किया ही उसे स्मृतियों के दोहांजलि समर्पित करने के पूर्व ईश स्मरण की विरासत की रीति न निभाकर उपालंभ का अवसर नाराज कैसे करें अग्रजवत सुमित्र जी। 'वीणापाणि स्तवन' तथा 'प्रार्थना के स्वर' शीर्षकांतर्गत पाँच-पाँच दोहों से शब्द ब्रम्ह आराधना का श्री गणेश कर बिना कहे कह दिया कि तुम्हारी जीवन पद्धति से ही जीवन जिया जा रहा है। -
वाणी की वरदायिनी, दात्री विमल विवेक।
सुमन अश्रु अक्षर करें, दिव्योपम अभिषेक।।
सुमित्र जी 'रस' को 'काव्य' ही नहीं 'जीवन' का भी 'प्राण' मानते हैं। वे जानते-मानते हैं की प्रकृति बिना पुरुष भले ही वह परम् पुरुष हो, सृष्टि की रचना नहीं कर सकता।
रस ही जीवन-प्राण है, सृष्टि नहीं रसहीन।
पृथ्वी का मतलब रसा, सृष्टि स्वयं रसलीन।।
सामान्यत: प्रकृति के समर्पण की गाथा कवी लिखते आये हैं किन्तु सत्य यह भी है समर्पण तो पुरुष भी करता है। इस सत्य की प्रतीति और अभिव्यक्ति सुमित्र ही कर सकता है, स्वामी नहीं-
साँसों में हो तुम बसे, बचे कहाँ हम शेष।
अहम् समर्पित कर दिया, और करें आदेश।।
कृति में श्रृंगार का इंद्रधनुष विविध रंगों और छटाओं का सौंदर्य बिखरता है। संयोग (रूप ज्योति की दिव्यता) तथा वियोग (तुम बिन दिन पतझर लगें, यादें बनीं लिबास) बिना देखे दिख जाने की तरह सुलभ है।
निर्गुण श्रृंगार को कबीरी फकीरी के बिना जीना दुष्कर है किंतु सुमित्र जी सांसारिकता का निर्वाह करते हुए भी निर्गुण को सगुण में पा सके हैं-
निराकार की साधना, कठिन योग पर्याय।
योग शून्य का शून्य में, शून्य प्रेम संकाय।।
सगुण श्रृंगार को लिखना तलवार पर धार की तरह है। भाव जरा डगमगाया कि मांसलता की राह से होते हुए नश्वरता और क्षण भंगुरता की नियति का शिकार हो जाता है जबकि कोई 'चाहक' अपनी 'चाह' को अकाल काल कवलित होते नहीं देखना चाहता। सुमित्र का तन की बात करते हुए भी मन को रंगारंग रखकर 'नट-कौशल' का परिचय देते हुए बच निकलते हैं-
अनुभव होता प्रेम का जैसे जलधि तरंग।
नस नस में लावा बहे, मन में रंगारंग।।
शिक्षक (टीचर नहीं) रहकर बरसों सिखाने के पूर्व सीखने की नर्मदा में बार-बार डुबकी लगा चुके कवि का शब्द-भंडार समृद्ध होना स्वाभाविक है। वह संस्कृत निष्ठ शब्दों( उच्चार, विन्यास, मकरंद, कुंतल, सुफलित, ऊर्ध्वमुख, तन्मयता, अध्यादेश, जलजात, मनसिज, अवदान, उत्पात, मुक्माताल, शैयाशायी, कल्याणिका, द्युतिमान, विन्यास, तिष्यरक्षिता, निर्झरी, उत्कटता आदि) के साथ देशज शब्दों (गैल, अरगनी, कथरी, मजूर, उजास, दहलान, कुलाँच, कातिक, दरस-परस, तिरती, सँझवाती, अँकवार आदि) का प्रयोग पूरी सहजता के साथ करता है। यही नहीं आंग्ल शब्दों (वैलेंटाइन, स्वेटर, सीट, कूलर, कोर्स, मोबाइल, टाइमपास, इंटरनेटी आदि) यथा स्थान सही अर्थों में प्रयोग करते हुए भी उससे चूक नहीं होती। कवि का पत्रकार समाज में प्रचलित अन्य भाषाओँ के शब्द संपदा से सुपरचित होने के नाते उन्हें पूरी उदारता के साथ यथावसर प्रयोग करता है।अरबी (मतलब, इबादत, तासीर, तकदीर, सवाल, गायब, किताब, कंदील, मियाद, ख़याल, इत्र, फरोश, गलतफहमी, उम्र, करीब, सलीब, नज़ीर, सफर, शरीर, जिला आदि), फ़ारसी (आवाज़, ज़िंदगी, ख्वाब, जागीर, बदर) शब्दों को प्रयोग करने में भी कवि को कोई हिचक नहीं है। अरबी 'जिला' और फ़ारसी 'बदर' को मिलाकर 'जिलाबदर', उम्र (अरबी) और दराज (फारसी) का प्रयोग करने में भी कवि कोताही नहीं करता। स्पष्ट है कि कवि खैरात की उस भाषा का उपयोग कर रहा है जिसे आधुनिक हिंदी कहा जाता है, वह भाषिक शुद्धता के नाम पर भाषिक साम्प्रदायिकता का पक्षधर नहीं है। यहाँ उल्लेखनीय है कि आंग्ल शब्द 'लेन्टर्न' का हिंदीकृत रूप 'लालटेन' भी कवि को स्वीकार है।
अलंकार संपन्नता इस दोहा संग्रह का वैशिष्ट्य है। अनुप्रास, यमक, उपमा, रूपक, श्लेष, संदेह आदि अलंकार यत्र-तत्र पूरी स्वाभाविकता सहित प्रयुक्त हुए हैं। कुछ अलंकारों के एक-एक उदाहरण देखें। दोहा छंद में अन्त्यानुप्रास आवश्यक होता है, अत: वह सर्वत्र है ही। छेकानुप्रास अधरों पर रख बाँसुरी, और बाँध भुजपाश / नदी आग की पी गया, फिर भी बुझी न प्यास, वृत्यानुप्रास (चंचल चितवन चंद्रमुख, चारु चंपई चीर / चौंक चकित चपला चले, चले चाप चौतीर), श्रुत्यानुप्रास ( नींद निगोड़ी बस गई, जाकर उनके पास / धीरे-धीरे कह गई, निर्वासन इतिहास) , लाटानुप्रास (संजीवन की शक्ति है, प्यार प्यार बस प्यार) तथा पुनरुक्ति प्रकाश (आँखों आँखों दे दिया / मन का चाहा दान) की छटा मोहक है।
वृत्नुयाप्रास काबू का प्रिय अलंकार है-
मुख मयंक, मंजुल मुखर, मधुर मदिर मुस्कान।
मन-मरल मोहित मुदित, मनसिज मुक्त मान।।
सुमुखि सलौनी सांवरी, सुखदा सुषमा सार।
सुरभित सुमन सनेह सर, सपन सरोज संवार।।
चंचल चितवन चन्द्रमुख, चारु चंपई चीर।
चौंक चकित चपला चले, चले चाप चौतीर।।
सभंग मुख यमक (कहनी अनकहनी सुनी, भरते रहे हुंकार ) तथा अभंग गर्भ यमक (बालों में हैं अंगुलियाँ, अधर अधर के पास) दृष्टव्य हैं।
उपमा के १६ प्रकारों में से कुछ की झलक देखें- धर्म लुप्तोपमा (नयन तुम्हारे वेद सम), उपमेय लुप्तोपमा (हिरन सरीखी याद है, चौपाई सी चारुता), धर्मोपमेय लुप्तोपमा (अनुप्रास सी नासिका, उत्प्रेक्षा सी छवि-छटा, अक्षर से लगते अधर, मन महुआ सा हो गया)।
यमक अलंकार दोहा दरबार में हाजिरी बजा रहा है-वेणु वेणुधर की बजी, रेशम रेशम तो कहा, हुई रेशमी शाम। / रेशम रेशम सुन कहा, रेशम किसका नाम।। आदि।
श्लेष भी छूटा नहीं है, यहाँ खेत द्विअर्थी है -
सपने बोये खेत में, दी आँसू की खाद।
जब लहराती है फसल, तुम आते हो याद।।
रूपक की छवि मत्तगयंदी चाल लख, काया रस-आगार आदि में है।
कुंतल मानो काव्य घन में उत्प्रेक्षा अलंकार है।
संदेह अलंकार जाग रही है आँख या जाग रही है पीर, मुख सरोज या चन्द्रमा में है।
कवि अपनी प्रेयसी में सर्वत्र अलंकारों का सादृश्य देखता है-
यमक सरीखी दृष्टि है, वाणी श्लेष समान।
अतिशयोक्ति सी मधुरता, रूपक सी मुस्कान।।
विरोधाभास अलंकार 'शब्दों का है मौन व्रत', 'एकाकी संवाद' आदि में है।
दोहे जैसी देह, अनुभव होता प्रेम का, जैसे जलधि तरंग, कोलाहल का कोर्स, यादों के स्तूप, फूल तुम्हारी याद के, कोलाहल का कोर्स, आँखों के आकाश, आँखों का अखबार, पलक पुराण आदि सरस् अभिव्यक्तियाँ पाठक को बाँधती हैं।
कवि ने शब्द युग्मों (रंग-बिरंग, भाषा-भूषा, नदी-नाव, ऊंचे-नीचे, दरस-परस, तन-मन, हर्ष-विषाद, रात-दिन, किसने-कब-कैसे आदि) का प्रयोग कुशलता से लिया है।
इन दोहों में शब्दावृत्ति (धीरे-धीरे कह गई, प्यार प्यार बस प्यार, देख-देखकर विकलता, आँखों-आँखों दे दिया, अभी-अभी जो था यहाँ, अभी-अभी है दूर, सच्ची-सच्ची बताओ, महक-महक मेंहदी कहे, मह-मह करता प्यार, खन-खन करती चूड़ियाँ, उखड़ी-उखड़ी साँस, सुंदर-सुंदर दृश्य हैं, सुंदर-सुंदर लोग, सर-सर चलती पवनिया, फर-फर उड़ते केश, घाटी-घाटी गूँजती, उजली-उजली धूप, रात-रात भर जागता, कभी-कभी ऐसा लगे, सूना-सूना घर मगर, मन-ही-मन, युगों-युगों की प्यास, अश्रु-अश्रु में फर्क है आदि) माधुर्य और लालित्य वृद्धि करती है।
ऐसा प्रतीत होता है कि इन दोहों की रचना भिन्न काल तथा मन:स्थितियों में हुई तथा मुद्रण के पूर्व पाठ्य शुद्धि में सजगता नहीं रखे जा सकी। इससे उपजी त्रुटियाँ खीर में कंकर की तरह बदमजगी उत्पन्न करती हैं। अनुनासिक तथा अनुस्वार सम्बन्धी त्रुटियों के अतिरिक्त कुछ अन्य दोष भी हैं।
दोहे के विषम चरण में १४ मात्रा होने का या अधिकत्व दोष पर्वत हो जाएंगे, प्रेम रंग में जो रंगी, डूब गए मंझधार में, बहुरूपिया बन आ गया आदि में है। सम चरण में १२ मात्रा का मात्राधिक्य दोष जीवन का एहसास, पी गई कविता प्यास आदि में है। सम चरण में न्यूनत्व दोष रूपराशि अमीतिया १२ मात्रा में है।
आँखों के आकाश में, घूमें सोच-विचार में तथ्य दोष है चूँकि सोच-विचार आँख नहीं मन की क्रिया है।
अपवाद स्वरुप पदांत दोष भी है। ऐसा लगता नवोदितों के लिए काव्य दोषों के उदाहरण रखे गए हैं। इन्हें काव्य दोष शीर्षक के अंतर्गत रखा जाता तो उपयोगी होता।
ओर-छोर मन का नहीं, छोटा है आकाश।
लघुतम निर्मल रूप है, जैसे किरन उजास।।
संशय प्रिय करना नहीं, अर्पित जीवन पुण्य।
जनम-जनम तक प्रीती यह, बनी रहे अक्षुण्य।।
मन का विद्यापीठ में लिंग दोष, अक्षुण्य (अक्षुण्ण), रूचता (रुचता) अदि में टंकण दोष है।
औगुनधर्मी, मधुवंती, मधुता, पवनिया आदि नव प्रयोग मोहक हैं।
पत्रकार रहा कवि अख़बार, खबर (बाँच सको तो बाँच लो आँखों का अखबार, शरणार्थी फागुन हुआ, यही ख़बर है आज) और चर्चा (फागुन की चर्चा करो) की अर्चा न करे, यह कैसे संभव है?
कवि स्मरण वैशिष्ट्य-
सुमित्रजी ने कई दोहों में कवियों का स्मरण स्थान-स्थान पर इस तरह किया है कि वह मूल कथ्य के साथ संगुफित होकर समरस हो गया है, आरोपित नहीं प्रतीत होता-
कालिदास का कथाक्रम, तेरा ही संकेत।
पृथ्वी का मतलब रसा, सृष्टि स्वयं रसलीन।।
पारिजात विद्योत्तमा, कालिदास वनगन्ध।
हो दोनों का मिलन जब मिटे द्वैत की धुंध।।
मन मोती यों चुन लिया, जैसे चुने मराल।
मान सरोवर जिंदगी मन हो गया मराल।
रूप-धूप है सिरजती, घनानंद रसखान।।
ले वसंत से मधुरिमा, मन होता रसखान।।
मन के हाथों बिक गए, कितने ग़ालिब-मीर।।
पलक पुलिन अश्रुज तुहिन, पुतली पंकज भान।
नयन सरोवर में बसें, साधें सलिल समान।।
खुसरो ने दोहे कहे, कहे कबीर कमाल।
फिर तुलसी ने खोल दी, दोहों की टकसाल।।
गंग वृन्द दादू वली, या रहीम मतिमान।
दोहों के रसलीन से कितने हुए इमाम।।
किन्तु बिहारी की छटा, घटा न पाया एक।।
तुलसी सूर कबीर के, अश्रु बने इतिहास।
कौन कहे मीरा कथा, आँसू का उपवास।।
घनानंद का अश्रुधान, अर्पित कृष्ण सुजान।
उसी अहज़रु की धार में, डूबे थे रसखान।।
आँसू डूबी साँस से, रचित ईसुरी फाग।
रजऊ ब्रम्ह थी जीव थी, ऐसा था अनुराग।।
आंसू थे जयदेव के, ढले गीत गोविन्द।
विद्यापति का अश्रुदल, खिला गीत अरविन्द।।
सारत: 'यादें बनी लिबास' सुमित्र जी के मानस पटल पर विचरते विचार-परिंदों के कलरव का गुंजन है जो दोहा की लाक्षणिकता, संक्षिप्तता, नव्यता, माधुर्य तथा संप्रेषणीयता के पंचतत्वों का सम्यक सम्मिश्रण कर काव्यानंद की प्रतीति कराती है। पठनीय, मननीय तथा संग्रहणीय कृति से हिंदी के सारस्वत कोष की अभिवृद्धि हुई है।
१-५-२०१९
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मुक्तिका
*
अब गिरि नहीं गिराना
पौधे नए लगाना
जुमले नहीं बताना
वादे किए निभाना
चाहा जिन्हें हँसाना
वे कर रहे बहाना
तूफां न तोड़ पाए
दिल में किया ठिकाना
मंजूर कर लिया है
बिन मोल ही बिकाना
करना न याद यारों
आँसू नहीं बहाना
लाया यहाँ मुझे जो
भूला नहीं भुलाना
१-५-२०१९
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एक दोहा
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भाषा वाहक भाव की, अंतर्मन का चित्र
मित्र शत्रु है कौन-कब, कहे बिन कहे मित्र
*
एक मुक्तक
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चढ़ी काठ की हांडी तजकर ममता-बंधन सारे
खलिश न बाकी, कुसुम हो रहे उसे शूल भी सारे
अगन हुई राकेशी शीतल, भव-बाधा कब व्याधे
कर्माहुति दे धर्मदेव को वह पल-पल आराधे.
एक दोहा
भाषा वाहक भाव की, अंतर्मन का चित्र
मित्र शत्रु है कौन-कब, कहे बिन कहे मित्र
१-५-२०१७
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भोजपुरी दोहा :
दोहा में दो पद (पंक्तियाँ) तथा हर पंक्ति में २ चरण होते हैं. विषम (प्रथम व तृतीय) चरण में १३-१३ मात्राएँ तथा सम (२रे व ४ थे) चरण में ११-११ मात्राएँ, इस तरह हर पद में २४-२४ कुल ४८ मात्राएँ होती हैं. दोनों पदों या सम चरणों के अंत में गुरु-लघु मात्र होना अनिवार्य है. विषम चरण के आरम्भ में एक ही शब्द जगण (लघु गुरु लघु) वर्जित है. विषम चरण के अंत में सगण,रगण या नगण तथा सम चरणों के अंत में जगण या तगण हो तो दोहे में लय दोष स्वतः मिट जाता है. अ, इ, उ, ऋ लघु (१) तथा शेष सभी गुरु (२) मात्राएँ गिनी जाती हैं
*
कइसन होखो कहानी, नहीं साँच को आँच.
कंकर संकर सम पूजहिं, ठोकर खाइल कांच..
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कोई किसी भी प्रकार से झूठा-सच्चा या घटा-बढाकर कहे सत्य को हांनि नहीं पहुँच सकता. श्रद्धा-विश्वास के कारण ही कंकर भी शंकर सदृश्य पूजित होता है जबकि झूठी चमक-दमक धारण करने वाला काँच पल में टूटकर ठोकरों का पात्र बनता है.
*
कतने घाटल के पियल, पानी- बुझल न प्यास.
नेह नरमदा घाट चल, रहल न बाकी आस..
*
जीवन भर जग में यहाँ-वहाँ भटकते रहकर घाट-घाट का पानी पीकर भी तृप्ति न मिली किन्तु स्नेह रूपी आनंद देनेवाली पुण्य सलिला (नदी) के घाट पर ऐसी तृप्ति मिली की और कोई चाह शेष न रही.
*
गुन अवगुन कम- अधिक बा, ऊँच न कोई नीच.
मिहनत श्रम शतदल कमल, मोह-वासना कीच..
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अलग-अलग इंसानों में गुण-अवगुण कम-अधिक होने से वे ऊँचे या नीचे नहीं हो जाते. प्रकृति ने सबको एक सम़ान बनाया है. मेंहनत कमल के समान श्रेष्ठ है जबकि मोह और वासना कीचड के समान त्याग देने योग्य है. भावार्थ यह की मेहनत करने वाला श्रेष्ठ है जबकि मोह-वासना में फंसकर भोग-विलास करनेवाला निम्न है.
*
नेह-प्रेम पैदा कइल, सहज-सरल बेवहार.
साँझा सुख-दुःख बँट गइल, हर दिन बा तिवहार..
*
सरलता तथा स्नेह से भरपूर व्यवहार से ही स्नेह-प्रेम उत्पन्न होता है. जिस परिवार में सुख तथा दुःख को मिल बाँटकर सहन किया जाता है वहाँ हर दिन त्यौहार की तरह खुशियों से भरा होता है..
*
खूबी-खामी से बनल, जिनगी के पिहचान.
धूप-छाँव सम छनिक बा, मान अउर अपमान..
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ईश्वर ने दुनिया में किसी को पूर्ण नहीं बनाया है. हर इन्सान की पहचान उसकी अच्छाइयों और बुराइयों से ही होती है. जीवन में मान और अपमान धुप और छाँव की तरह आते-जाते हैं. सज्जन व्यक्ति इससे प्रभावित नहीं होते.
*
सहरन में जिनगी भयल, कुंठा-दुःख-संत्रास.
केई से मत कहब दुःख, सुन करिहैं उपहास..
*
शहरों में आम आदमी की ज़िन्दगी में कुंठा, दुःख और संत्रास की पर्याय बन का रह गयी है किन्तु अपना अपना दुःख किसी से न कहें, लोग सुनके हँसी उड़ायेंगे, दुःख बाँटने कोई नहीं आएगा. इसी आशय का एक दोहा महाकवि रहीम का भी है:
*
रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही रखियो गोय.
सुन हँस लैहें लोग सब, बाँट न लैहें कोय..
*
फुनवा के आगे पड़ल, चीठी के रंग फीक.
सायर सिंह सपूत तो, चलल तोड़ हर लीक..
समय का फेर देखिये कि किसी समय सन्देश और समाचार पहुँचाने में सबसे अधिक भूमिका निभानेवाली चिट्ठी का महत्व दूरभाष के कारण कम हो गया किन्तु शायर, शेर और सुपुत्र हमेशा ही बने-बनाये रास्ते को तोड़कर चलते हैं.
*
बेर-बेर छटनी क द स, हरदम लूट-खसोट.
दुर्गत भयल मजूर के, लगल चोट पर चोट..
*
दुनिया का दस्तूर है कि बलवान आदमी निर्बल के साथ बुरा व्यव्हार करते हैं. ठेकेदार बार-बार मजदूरों को लगता-निकलता है, उसके मुनीम कम मजदूरी देकर मजदूरों को लूटते हैं. इससे मजदूरों की उसी प्रकार दशा ख़राब हो जाती है जैसे चोट लगी हुई जगह पर बार-बार चोट लगने से होती है.
*
दम नइखे दम के भरम, बिटवा भयल जवान.
एक कमा दू खर्च के, ऊँची भरल उडान..
*
किसी व्यक्ति में ताकत न हो लेकिन उसे अपने ताकतवर होने का भ्रम हो तो वह किसी से भी लड़ कर अपनी दुर्गति करा लेता है. इसी प्रकार जवान लड़के अपनी कमाई का ध्यान न रखकर हैसियत से अधिक खर्च कर परेशान हो जाते हैं..
***
एक रचना:
.
शारद पुत्र कहीं भी हों
वे अक्षर पूजन नित करते हैं.
शब्द ब्रम्ह के चरणों में
रच-रचकर कवितायेँ धरते हैं.
शरद पूर्णिमा को राकेशी
किरण-कटोरा उलट गया सा
रस पीने में लीन हुए तो
आना-जाना सिमट गया सा.
मन मंदिर में छंद देवता
एक बार जो बस पाते हैं.
अंतिम सांस न निकले जब तक
तब तक कहीं नहीं जाते हैं
ललित भाव-भाषा-बिम्बों की
अजब-अनूठी माया नगरी
निजता के अवगुंठन टूटे
सब से मैं ही चिपट गया सा
दूरी सिमट गईं टीवी में
विस्तारित हैं मन में अंतर
अंतर को अंतर बिसरा दे
भूल गया मन ऐसे मंतर
तन का तंत्र कब तलक छलता
आखिर सत्य हुआ उद्घाटित
जनगण का मन दल-दलदल से
मोह-भंग हो उचट गया सा
सन्नाटा अनहद निनाद से
मिलकर गले गीत गाता है
कहीं अपरिचय का परिचय पा
अपनापन ही खो जाता है
भेद-अभेद न मिटते-मिलते
चाहे जितने जतन करें हम
अपना ही मुख मन-दर्पण में
लगे न सच के निकट गया सा
कागज़-कलम रौशनाई ने
रौशन किया ख्यालों को जब
आमंत्रित कर लिया अजाने
शत-शत विकट बबालों को तब
मुक्तक श्वास, आस दोहा बन
प्राणवायु का झोंका लाता
सजल ग़ज़ल अनकहनी कहती
दर्द न छिपता लिपट गया सा
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नवगीत:
.
जो हुआ सो हुआ
.
बाँध लो मुट्ठियाँ
चल पड़ो रख कदम
जो गये, वे गये
किन्तु बाकी हैं हम
है शपथ ईश की
आँख करना न नम
नीलकण्ठित बनो
पी सको सकल गम
वृक्ष कोशिश बने
हो सफलता सुआ
.
हो चुका पूर्व में
यह नहीं है प्रथम
राह कष्टों भरी
कोशिशें हों न कम
शेष साहस अभी
है बहुत हममें दम
सूर्य हैं सच कहें
हम मिटायेंगे तम
उठ बढ़ें, जय वरें
छोड़कर हर खुआ
.
चाहते क्यों रहें
देव का हम करम?
पालते क्यों रहें
व्यर्थ मन में भरम?
श्रम करें तज शरम
साथ रहना धरम
लोक अपना बनाएंगे
फिर श्रेष्ठ हम
गन्स जल स्वेद है
माथ से जो चुआ
१-५-२०१५
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नवगीत:
अनेक वर्णा पत्तियाँ हैं
शाख पर तो क्या हुआ?
अपर्णा तो है नहीं अमराई
सुख से सोइये
बज रहा चलभाष सुनिए
काम अपना छोड़कर
पत्र आते ही कहाँ जो रखें
उनको मोड़कर
किताबों में गुलाबों की
पंखुड़ी मिलती नहीं
याद की फसलें कहें, किस नदी
तट पर बोइये?
सैंकड़ों शुभकामनायें
मिल रही हैं चैट पर
सिमट सब नाते गए हैं
आजकल अब नैट पर
ज़िंदगी के पृष्ठ पर कर
बंदगी जो मीत हैं
पड़ गये यदि सामने तो
चीन्ह पहचाने नहीं
चैन मन का, बचा रखिए
भीड़ में मत खोइए
३०-११-२०१४
***
ॐ
छंद सलिला:
राधिका छंद
*
छंद-लक्षण: जाति महारौद्र , प्रति चरण मात्रा २२ मात्रा, यति १३ - ९ ।
लक्षण छंद:
सँग गोपों राधिका के / नंदसुत - ग्वाला
नाग राजा महारौद्र / कालिया काला
तेरह प्रहार नौ फणों / पर विष न बाकी
गंधर्व किन्नर सुर नरों / में कृष्ण आला
*
राधिका बाईस कला / लख कृष्ण मोहें
तेरह - नौ यति क़ृष्ण-पग / बृज गली सोहें
भक्त जाते रीझ, भय / से असुर जाते काँप
भाव-भूखे कृष्ण कण / कण जाते व्याप
उदाहरण:
१. जब जब जनगण ने फ़र्ज़ / आप बिसराया
तब तब नेता ने छला / देश पछताया
अफसर - सेठों ने निजी / स्वार्थ है साधा
अन्ना आंदोलन बना / स्वार्थ पथ-बाधा
आक्षेप और आरोप / अनेक लगाये
जनता को फ़िर भी दूर / नहीं कर पाये
२. आया है आम चुनाव / चेत जनता रे
मतदान करे चुपचाप / फ़र्ज़ बनता रे
नेता झूठे मक्कार / नहीं चुनना रे
ईमानदार सरकार / स्वप्न बुनना रे
३. नारी पर अत्याचार / जहाँ भी होते
अनुशासन बिन नागरिक / शांति-सुख खोते
जननायक साधें स्वार्थ / न करते सेवा
धन रख विदेश में खूब / उड़ाते मेवा
गणतंत्र वहाँ अभिशाप / सदृश हो जाता
अफसर -सेठों में जुड़े / घूस का नाता
अन्याय न्याय का रूप / धरे पलता है
विश्वास - सूर्य दोपहर / लगे ढलता है
४. राजनीति कोठरी, काजल की कारी
हर युग हर काल में, आफत की मारी
कहती परमार्थ पर, साधे सदा स्वार्थ
घरवाली से अधिक, लगती है प्यारी
५. बोल-बोल थक गये, बातें बेमानी
कोई सुनता नहीं, जनता है स्यानी
नेता और जनता , नहले पर दहला
बदले तेवर दिखा, देती दिल दहला
६. कली-कली चूमता, भँवरा हरजाई
गली-गली घूमता, झूठा सौदाई
बिसराये वायदे, साध-साध कायदे
तोड़े सब कायदे, घर मिला ना घाट
*********
टीप राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त जी ने साकेत में राधिका छंद का प्रयोग किया है.
हा आर्य! भरत का भाग्य, रजोमय ही है,
उर रहते उर्मि उसे तुम्हीं ने दी है.
उस जड़ जननी का विकृत वचन तो पाला
तुमने इस जन की ओर न देखा-भाला।
***
।। हिंदी आटा माढ़िये, उर्दू मोयन डाल । 'सलिल' संस्कृत सान दे, पूरी बने कमाल ।।
१-५-२०१४***
मुक्तिका:
मौन क्यों हो?
*
मौन क्यों हो पूछती हैं कंठ से अब चुप्पियाँ.
ठोकरों पर स्वार्थ की, आहत हुई हैं गिप्पियाँ..
टँगा है आकाश, बैसाखी लिये आशाओं की.
थक गये हैं हाथ, ले-दे रोज खाली कुप्पियाँ..
शहीदों ने खून से निज इबारत मिटकर लिखी.
सितासत चिपका रही है जातिवादी चिप्पियाँ..
बादशाहों को किया बेबस गुलामों ने 'सलिल'
बेगमों की शह से इक्के पर हैं हावी दुप्पियाँ..
तमाचों-मुक्कों ने मानी हार जिद के सामने.
मुस्कुराकर 'सलिल' जीतीं, प्यार की कुछ झप्पियाँ..
***
दोहा
*
महल खंडहर हो रहे, देख रहे सब मौन.
चाह न महलों की करें, ऐसे कितने? कौन?
१.५.२०१०
***
कुछ हाइकु
*
करूँ वंदन
हे कलम के देव!
श्रद्धा सहित
*
वृष देव को
नमन मनुज का
सदा छाँव दो
*
'सलिल' सुमिर
प्रभु पद पद्मों को
बन भ्रमर
*
सब में रब
कभी न भूलना
रब के सब
*
ईंट-रेट का
मंदिर मनहर
ईश लापता
*
मितवा दूँ क्य?
क्षण भंगुर जग
भौतिक सारा
*
है उद्गाता
मनुज धरम की
भारत माता
*
रचना काल १९९८
रासलीला :
*
आँख में सपने सुनहरे झूलते हैं.
रूप लख भँवरे स्वयं को भूलते हैं.
झूमती लट नर्तकी सी डोलती है.
फिजा में रस फागुनी चुप घोलती है.
कपोलों की लालिमा प्राची हुई है.
कुन्तलों की कालिमा नागिन मुई है.
अधर शतदल पाँखुरी से रसभरे हैं.
नासिका अभिसारिका पर नग जड़े हैं.
नील आँचल पर टके तारे चमकते.
शांत सागर मध्य दो वर्तुल उमगते.
खनकते कंगन हुलसते गीत गाते.
राधिका है साधिका जग को बताते.
कटि लचकती साँवरे का डोलता मन.
तोड़कर चुप्पी बजी पाजेब बैरन.
सिर्फ तू ही तो नहीं मैं भी यहाँ हूँ.
खनखना कह बज उठी कनकाभ करधन.
चपल दामिनी सी भुजाएँ लपलपातीं.
करतलों पर लाल मेंहदी मुस्कुराती.
अँगुलियों पर मुन्दरियाँ नग जड़ी सोहें.
कज्जली किनार सज्जित नयन मोहें.
भौंह बाँकी, मदिर झाँकी नटखटी है.
मोरपंखी छवि सुहानी अटपटी है.
कौन किससे अधिक, किससे कौन कम है.
कौन कब दुर्गम-सुगम है?, कब अगम है?
पग युगल द्वय कब धरा पर?, कब अधर में?
कौन बूझे?, कौन-कब?, किसकी नजर में?
कौन डूबा?, डुबाता कब-कौन?, किसको?
कौन भूला?, भुलाता कब-कौन?, किसको?
क्या-कहाँ घटता?, अघट कब-क्या-कहाँ है?
क्या-कहाँ मिटता?, अमिट कुछ-क्या यहाँ है?
कब नहीं था?, अब नहीं जो देख पाये.
सब यहीं था, सब नहीं थे लेख पाये.
जब यहाँ होकर नहीं था जग यहाँ पर.
कब कहाँ सोता-न-जगता जग कहाँ पर?
ताल में बेताल का कब विलय होता?
नाद में निनाद मिल कब मलय होता?
थाप में आलाप कब देता सुनायी?
हर किसी में आप वह देता दिखायी?
अजर-अक्षर-अमर कब नश्वर हुआ है?
कब अनश्वर वेणु गुंजित स्वर हुआ है?
कब भँवर में लहर?, लहरों में भँवर कब?
कब अलक में पलक?, पलकों में अलक कब?
कब करों संग कर, पगों संग पग थिरकते?
कब नयन में बस नयन नयना निरखते?
कौन विधि-हरि-हर? न कोई पूछता कब?
नट बना नटवर, नटी संग झूमता जब.
भिन्न कब खो भिन्नता? हो लीन सब में.
कब विभिन्न अभिन्न हो? हो लीन रब में?
द्वैत कब अद्वैत वर फिर विलग जाता?
कब निगुण हो सगुण आता-दूर जाता?
कब बुलाता?, कब भुलाता?, कब झुलाता?
कब खिझाता?, कब रिझाता?, कब सुहाता?
अदिख दिखता, अचल चलता, अनम नमता.
अडिग डिगता, अमिट मिटता, अटल टलता.
नियति है स्तब्ध, प्रकृति पुलकती है.
गगन को मुँह चिढ़ा, वसुधा किलकती है.
आदि में अनादि बिम्बित हुआ कण में.
साsदि में फिर सांsत चुम्बित हुआ क्षण में.
अंत में अनंत कैसे आ समाया?
दिक् में दिगंत जैसे था समाया.
कंकरों में शंकरों का वास देखा.
और रज में आज बृज ने हास देखा.
मरुस्थल में महकता मधुमास देखा.
नटी नट में, नट नटी में रास देखा.
रास जिसमें श्वास भी था, हास भी था.
रास जिसमें आस, त्रास-हुलास भी था.
रास जिसमें आम भी था, खास भी था.
रास जिसमें लीन खासमखास भी था.
रास जिसमें सम्मिलित खग्रास भी था.
रास जिसमें रुदन-मुख पर हास भी था.
रास जिसको रचाता था आत्म पुलकित.
रास जिसको रचाता परमात्म मुकुलित.
रास जिसको रचाता था कोटि जन गण.
रास जिसको रचाता था सृष्टि-कण-कण.
रास जिसको रचाता था समय क्षण-क्षण.
रास जिसको रचाता था धूलि तृण-तृण..
रासलीला विहारी खुद नाचते थे.
रासलीला सहचरी को बाँचते थे.
राधिका सुधि-बुधि बिसारे नाचतीं थीं.
'सलिल' ने निज बिंदु में वह छवि निहारी.
जग जिसे कहता है श्रीबांकेबिहारी.
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३०-४-२०१०
दोहा
महल खंडहर हो रहे, देख रहे सब मौन.
चाह न महलों की करें, ऐसे कितने? कौन?
१-५-२०१०
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