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मंगलवार, 20 जनवरी 2026

जनवरी २०, पूर्णिका, पेंसिल, राम, सॉनेट, विवाह, दीप, विजाति छंद, सबरीमाला, गीत, कल्पना, शारदा

सलिल सृजन जनवरी २०
*
पूर्णिका 
आम आदमी की है गलती
व्यर्थ आस क्यों मन में पलती
.
क्यों न समझता उगती ऊषा
दिन बीते हो संध्या ढलती
.
अपनी भूल नज़र कब आती? 
औरों की त्रुटि चुभती-खलती
.
साथ छोड़ती परछाईं भी
साथ न तम में पल भर चलती
.
मृगतृष्णा पल-पल भटकाती
माया अपनी बनकर छलती
.
होनी होकर ही रहती है
अनहोनी ही देखी टलती
.
कोशिश 'सलिल' व्यर्थ मत मानो
जिजीविषा मंज़िल बन फलती
२०.१.२०२६
०००
पूर्णिका
रात रानी को बिदा कर रातरानी।
सुबह का स्वागत करे सविनय सयानी।।
.
पहन बाना श्वेत हरियल हँस रही है।
सूर्य माली कर रहा खुद निगहबानी।।
.
धरा जननी 'हो न ओझल आँख से' कह
रहे चिंतित हो रही बिटिया लुभानी।।
.
बाँध सेहरा द्वार पर आ गया गेंदा।
नाच-गाए भ्रमर दल सुन धुन सुहानी।।
.
मिले समधी गले बरगद और पीपल।
गाए गारी कूक कोयल मधुर बानी।।
.
हो न कन्या दान, अब वर दान होगा।
हो तभी गुणवान नव संतति अजानी।।
.
सलिल स्नेहिल सुवासित संबंध सपने।
कर सके साकार जो वह मनुज ज्ञानी।।
०००
नयन नयन को बाँचते, गए नयन में डूब।
नयन नयन को बाँधते, नयन न करते चूक।।
०००
पेंसिल
एक बच्चे ने अपनी दादी को पत्र लिखते हुए देखकर उत्सुकता से पूछा- "दादी, आप क्या लिख ​​रही हो? क्या आप कुछ दिलचस्प बातें लिख रही हो? या क्या आप मेरे बारे में कुछ लिख रही हो?"
दादी ने लिखना बंद कर अपने पोते की ओर मुड़ते हुए कहा- "हाँ बेटा! मैं आपके बारे में ही लिख रही हूँ खत से ज्यादा महत्वपूर्ण यह पेंसिल है, जिसका मैं उपयोग कर रही हूँ। मुझे आशा है कि आप इस पेंसिल से बहुत कुछ सीखेंगे।"
उत्सुकतावश वह बच्चा अपनी दादी की ओर दौड़ता हुआ आया और थोड़ी देर पेंसिल का बारीकी से निरीक्षण करने के बाद उसने पूछा- "इस पेंसिल से सबक? हम एक पेंसिल से क्या सीख सकते हैं?"
उसकी दादी ने जवाब दिया, "बेटे!, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप चीज़ों को कैसे देखते हैं। इस पेंसिल में सात गुण हैं, जिन्हें अगर आप जीवन में शामिल करते हैं, तो आप एक अद्भुत व्यक्ति बन जाएँगे और हमेशा शांति और प्रेम से रहेंगे।"
बच्चे ने पूछा- कैसे?
दादी ने कहा- " पेंसिल में ७ गुण हैं।
पहला- इस पेंसिल की तरह, हम भी काम कर सकते हैं लेकिन याद रखें कि हर समय, किसी का हाथ हमारे हर कार्य के पीछे रहकर हमें आगे बढ़ने के लिए सक्षम बनाता है। हम उसे भगवान कहते हैं।।"
दूसरा- हमें अपनी पेंसिल की नोक को बार-बार नुकीला करना पड़ता है, पेंसिल को पहले कष्ट होता है, लेकिन बाद में यह अधिक दक्षता के साथ काम करती है। इसी तरह, कठिन समय हमें जीवन में बड़ी चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करता है, जो आगे चलकर हमारे आंतरिक विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और हमें एक बेहतर इंसान बनने में मदद करता है।
तीसरा- गलती होने पर पेंसिल उसे सुधारने का मौका देती है। हम रबर से मिटाकर गलती सुधार सकते हैं। गलतियाँ करना मानव स्वभाव है, गलती हो जाए तो उसे स्वीकार कर सुधारें और फिर न दोहराएँ।
चौथा- पेंसिल बाहर से खूबसूरत हो और उसके अंदर का ग्रेफाइट लिखने के काम न आए तो वह निरुपयोगी होगी। इसलिए हमें बाहरी साज-सज्जा के स्थान पर अपने अंदर सद्गुणों को अधिक महत्व देना चाहिए।
पाँचवा- पेंसिल लिखकर अपने पीछे एक छाप छोड़ जाती है जिससे कई जन प्रेरणा लेकर बेहतर बन सकते हैं। हमें भी जीवन में विचारों और कार्यों की छाप छोड़नी चाहिए जिससे अन्य जन प्रेरणा ले सकें।
छठवाँ- पेंसिल दिन-ब-दिन अधिक से अधिक छोटी होती जाती है और उसके समाप्त होने का समय निकट आता जाता है। हमारा जीवन इसी तरह घटता रहता है। उम्र बढ़ती है पर शेष समय घटता है इसलिए काम टालना नहीं चाहिए।
सातवाँ - पेंसिल फेंके जाने तक बिना विरोध या माँग किए लिखती रहती है। इसी तरह हमें भी जितना भी जीवन मिल है उसमें बिना थके-रुके काम करते रहना चाहिए।
बच्चे के पेंसिल को स्नेहपूर्वक निहारा और दादी से लेकर सम्हालकर रख लिया।
२०.१.२०२५
०००
राम लला स्वागत
स्वागत में तैयार, सुरग स्यूं देव पधार्या।
खड़्या अवध र द्वार, सुरज चंदा जस गार्या ।।
पात मिलावै ताल, नाच रय फुलड़ा कलियाँ।
रए झूम तरु शाख, मगन व्है रईं तितलियाँ ।।
ऊषा लए गुलाल, भाल पै टाँके टीका।
रजनी करे मलाल, दरस बिन जीवन फीका।।
सरयू चरन पखार, भई बड़भागी मैया।
सिकता तन लिपटाय, हँस रए चारउं भैया।।
दस रथ थाम लगाम, प्रभाती सुन नृप गदगद।
बिसरे मंत्र सुमंत्र, मातु त्रै सुमधुर गाउत।।
झूम अजुध्या नची, पताका जै कह उछली।
नारी-नर तर रए, लला लख किस्मत बदली।।
बिधि-हर ठाँड़े द्वार, जुरे कर लेखें लीला।
धरा छुए पग मौन, छत्र नभ लै है नीला।।
२०.१.२०२४
***
राम दोहावली
*
राम आत्म परमात्म भी, राम अनादि-अनंत।
चित्र गुप्त है राम का, राम सृष्टि के कंत।।
विधि-हरि-हर श्री राम हैं, राम अनाहद नाद।
शब्दाक्षर लय-ताल हैं, राम भाव रस स्वाद।।
राम नाम गुणगान से, मन होता है शांत।
राम-दास बन जा 'सलिल', माया करे न भ्रांत।।
राम आम के खास के, सबके मालिक-दास।
राम कर्म के साथ हैं, करते सतत प्रयास।।
वाम न राम से हो सलिल, हो जाने दे पार।
केवट के सँग मिलेगा, तुझको सुयश अपार।।
राम न सहते गलत को, राम न रहते मौन।
राम न कहते निज सुयश, नहीं जानता कौन?
राम न बाधा मानते, राम न करते बैर।
करते हैं सत्कर्म वे, सबकी चाहें खैर।।
लक्ष्य रखे जो एक ही, वह जन परम सुजान।
लख न लक्ष मन चुप करे, साध तीर संधान।।
.
लखन लक्ष्मण या कहें, लछ्मन उसको आप।
राम-काम सौमित्र का, हर लेता संताप।।
.
सिया-सिंधु की उर्मि ला, अँजुरी रखें अँजोर।
लछ्मन-मन नभ, उर्मिला मनहर उज्ज्वल भोर।।
.
लखन-उर्मिला देह-मन, इसमें उसका वास।
इस बिन उसका है कहाँ, कहिए अन्य सु-वास।।
.
मन में बसी सुवास है, उर्मि लखन हैं फ़ूल।
सिया-राम गलहार में, शोभित रहते झूल।।
***
राम बारात - बधाई गीत
चलो मिलके सजाएँ बारात, बधाई हो सबको २
*
जुही-चमेली अंजलि छाया, आभा देखे जग चकराया।
वसुधा जगमग करे ज्योत्सना, निशि संग चंदा आया।
चलो मिल के बनाएँ बारात, बधाई हो सबको २
*
विभा सजाए सुंदर टीका, सरला बिन मजमा है फीका।
हैं कमलेश मगन गायन में, रजनी का सेहरा है नीका।
चलो मिल के निकालें बारात, बधाई हो सबको २
*
इंद्रा संग संतोष सुसज्जित, राजकुमार नर्मदा मज्जित।
पाखी नीलम छाया शोभा लख , सुर नर मुनि लज्जित।
चलो मिल के घुमाएँ बारात, बधाई हो सबको २
***
गीत
मधुर मधुर चितवन ने हेरा
मन-पत्थर पर सुमन खिल गए।
मदिर स्वप्न ने डाला डेरा
नज़र उतारें दाई तिल हुए।।
*
अधर रसाल बोल कलरव से
शशि सम बिंदी शोभित उज्ज्वल।
कहती श्याम बसे अंतर्मन
केश राशि सर्पीली श्यामल।
नयन नयन को दे आमंत्रण
ह्रदय हृदय से सँकुच मिल गए।
मधुर मधुर चितवन ने हेरा
मन-पत्थर पर सुमन खिल गए।
*
भाल प्रशस्त गगन सम सुंदर
शशि सम बिंदी शोभित उज्ज्वल।
भौंह-कमान दृष्टि शर बंकिम
मुक्ता मणि रद करते झिलमिल।
प्रणय पत्रिका करते प्रेषित
हस्ताक्षर बन विकल दिल गए
मधुर मधुर चितवन ने हेरा
मन-पत्थर पर सुमन खिल गए।
*
कुंडल डोल रहे कानों में
ग्रीवा राजहंसिनी गर्वित।
भाग्यवान भुज-हार पा सके
करपल्लव गह चंदन चर्चित।
द्वैत मिटा, अद्वैत पंथ चल
अधराधर अनकहे सिल गए।
मधुर मधुर चितवन ने हेरा
मन-पत्थर पर सुमन खिल गए।
*
सॉनेट
विवाह
*
प्रकृति-पुरुष का मिलन ही, सकल सृष्टि का मूल।
द्वैत मिटा अद्वैत वर, रहें साथ गह हाथ।
दो अपूर्ण मिल पूर्ण हों, सुख-सपनों में झूल।।
सप्तपदी पर वचन दें, लें ऊँचा कुल माथ।।
हल्दी-मेंहदी-तेल है, रूप-रंग अरु स्नेह।
पूजें माटी-कूप हँस, जड़ जमीन से जोड़।
लग्न पत्रिका कह रही, लगन लगी चल गेह।।
नीर-क्षीर सम मिल रहें, कोई सके न तोड़।।
श्वास गीतिका आस हो, मन्वन्तर तक रास।
नेह निनादित नर्मदा, कलकल करे सदैव।
प्यास-त्रास से मुक्त हो, सदा बिखेरे हास।।
चित्र गुप्त होकर प्रगट, शुभाशीष दे दैव।।
कलगी अचकन पर रहे, नथ बेंदा बलिहार।
चूड़ी पायल नथ लखे, पटका निज मन हार।।
***
मन से मन का मिलन हो, रोज मने त्यौहार।
सुख-दुख साझा हो सदा, कदम हमेशा संग।
दो कुटुंब मिल एक हों, बाँधें बंदनवार।।
अंतर में अंतर न हो, मनभावन हो संग।।
सात जन्म तक साथ की, कभी न कम हो चाह।
ध्रुव तारे सी प्रीत हो, सहज सरस मनुहार।
अपनापन हो अपरिमित, सबसे पाओ वाह।।
पहनो पहनाए रहो, आस-हास भुजहार।।
गंग-जमुन सम साथ हो, बने प्रेरणा स्रोत।
चाह-राह हो एक ही, सुख-दुख भी हो एक।
सूर्य-उषा जैसी रहे, आनन पर सुख-ज्योत।।
नातों से नाता रखो, तान न ताना नेंक।।
विष्णु-लक्ष्मी हृद बसें, अँगना बाल गुपाल।
विजय तिलक से सुशोभित, रहे हमेशा भाल।।
२०-१-२०२२
***
सॉनेट
दीप प्रज्जवलन
*
दीप ज्योति सब तम हरे, दस दिश करे प्रकाश।
नव प्रयास हो वर्तिका, ज्योति तेल जल आप।
पंथ दिखाएँ लक्ष्य वर, हम छू लें आकाश।।
शिखर-गह्वर को साथ मिल, चलिए हम लें नाप।।
पवन परीक्षा ले भले, कँपे शिखा रह शांत।
जले सुस्वागत कह सतत, कर नर्तन वर दीप।
अगरु सुगंध बिखेर दे, रहता धूम्र प्रशांत।।
भवसागर निर्भीक हो, मन मोती तन सीप।।
एक नेक मिल कर सकें, शारद का आह्वान।
चित्र गुप्त साकार हो, भाव गहें आकार।
श्री गणेश विघ्नेश हर, विघ्न ग्रहणकर मान।।
शुभाशीष दें चल सके, शुभद क्रिया व्यापार।।
दीप जले जलता रहे, हर पग पाए राह।
जिसके मन में जो पली, पूरी हो वह चाह।।
छंद- दोहा
१८-१-२०२२
***
नवगीत
*
रहे तपते गर्मियों में
बारिशों में टपकते थे
सर्दियों में हुए ठन्डे
रौशनी गायब हवा
आती नहीं है
घोंसलें है कॉन्क्रीटी
घुट रही दम
हवा तक दूभर हुई है
सोम से रवि तक न अंतर
एक से सब डे
श्वास नदिया सूखती
है नहीं पानी
आस घाटों पर न मेले
नहीं हलचल
किंतु हटने को नहीं
तैयार तिल भर भी यहाँ से
स्वार्थ के पंडे
अस्पताली तीर्थ पर है
जमा जमघट
पीडितों का, लुटेरों का
रात-दिन नित
रोग पहचाने बिना
परीक्षण-औषधि अनेकों
डॉक्टरी फंडे
***
छंद शाला
* विजाति छंद
* मापनी-१२२२ १२२२
*सूत्र -यरगग
*
निहारा क्या?
गुहारा क्या?
कहो क्या साथ लाया था?
कहो क्या साथ जायेगा?
रहेंगे हाथ खाली ही -
न कोई साथ आयेगा
बनाया क्या?
बिगाड़ा क्या?
न कोई गीत है तेरा
न कोई मीत है तेरा
सुनेगा बात ना कोई
लगेगा व्यर्थ ही टेरा
अँधेरा क्या?
सवेरा क्या?
तुझे तेरे भुला देंगे
सगे साथी जला देंगे
कहेंगे तेरही तेरी
मँगा मीठा मजा लेंगे
हमारा क्या?
तुम्हारा क्या?
२०-१-२०२०
***
एक रचना
सबरीमाला
*
सबरीमाला केंद्र है,
जनगण के विश्वास का।
नर-नारी के साम्य का,
ईश्वर के अहसास का
*
जो पतितों को तारता,
उससे दूर न कोई रहे-
आयु-रंग प्रतिबंध न हो,
हर जन हरिजन व्यथा कहे।।
अन्धकार में देवालय
स्रोत अनंताभास का
*
बना-बदलता परंपरा,
मानव जड़ता ठीक नहीं।
लिंग-भेद हो पूजा में,
सत्य ठीक यह लीक नहीं।
राजनीति ही कारन है,
मानव के संत्रास का
*
पोंगापंथी दूर करें,
एक समान सभी संतान।
अन्धी श्रद्धा त्याज्य सखे!
समता ईश्वर का वरदान।।
आरक्षण कारण बनता
सदा विरोधाभास का
२०-१-२०१९
***
स्तवन
*
सरस्वती शारद ब्रम्हाणी!
जय-जय वीणा पाणी!!
*
अमल-धवल शुचि,
विमल सनातन मैया!
बुद्धि-ज्ञान-विज्ञान
प्रदायिनी छैंया।
तिमिरहारिणी,
भयनिवारिणी सुखदा,
नाद-ताल, गति-यति
खेलें तव कैंया।
अनहद सुनवाई दो कल्याणी!
जय-जय वीणापाणी!!
*
स्वर, व्यंजन, गण,
शब्द-शक्तियां अनुपम।
वार्णिक-मात्रिक छंद
अनगिनत उत्तम।
अलंकार, रस, भाव,
बिंब तव चारण।
उक्ति-कहावत, रीति-
नीति शुभ परचम।
कर्मठ विराजित करते प्राणी
जय-जय वीणापाणी!!
*
कीर्ति-गान कर,
कलरव धन्य हुआ है।
यश गुंजाता गीत,
अनन्य हुआ है।
कल-कल नाद प्रार्थना,
अगणित रूपा,
सनन-सनन-सन वंदन
पवन बहा है।
हिंदी हो भावी जगवाणी
जय-जय वीणापाणी!!
२०.१.२०१८
***
एक रचना
कल्पना
*
जन्म दिन कब कल्पना का?
प्रश्न कौन बूझेगा?
पूछता यथार्थ से मैं
उसे कुछ न सूझेगा।
कल्पना अजन्मी है
अनादि है, अनंत है।
श्वास-श्वास व्याप्त प्रिया
आस-आस कंत है।
कलप ना, सदा खुश हो
कल-पना ले आज ने
काल को बताया है
कल्पना अनंत है
२०.१.२०१७
***
नवगीत
चीनी जैसा नुक्ता
*
चीनी जैसा नुक्ता है या
नुक्ता जैसी चीनी है?
नुक़्ती के लड्डू में खुश्बू
नेह-प्रेम की भीनी है....
*
तकलीफों दरी बिछाई
ढाई आखर की चादर।
मसनद मुसीबतों के रखकर
बैठी कोशिश मुस्काकर।
जरूरतों की दाल गल सके
मिल हर अड़चन बीनी है।
चीनी जैसा नुक्ता है या
नुक्ता जैसी चीनी है?
*
गम ढोलक पर थाप ख़ुशी की
कोकिल-कंठों में कजरी।
मर्यादा की चूड़ी खनकी
उठ उमंग बनरी सज री!
पीस हिया हिना रचायी
अँखियाँ गीली कीनी है।
चीनी जैसा नुक्ता है या
नुक्ता जैसी चीनी है?
*
घोडा चुनौतियों का बाँका
सपना नौशा थामे रास।
आम आदमी भी बाराती
बनकर हो जाता है ख़ास।
ऐ नसीब! मत आँख दिखा
मेहनत ने खुशियाँ दीनी है
चीनी जैसा नुक्ता है या
नुक्ता जैसी चीनी है?
२०-१-२०१६
***
आइये कविता करें: ७
.
एक और प्रयास.......
नव गीत
आभा सक्सेना
.
सूरज ने छाया को ठगा १५
किरनों नेे दिया दग़ा १२
अब कौन है, जो है सगा १४
कांपता थर थर अंधेरा १४
कोहरे का धुन्ध पर बसेरा १७
जागता अल्हड़ सवेरा १४
रोशनी का अधेरों से १४
दीप का जली बाती से १४
रिश्तें हैं बहुत करीब से १५
कांपती झीनी सी छांव १४
पकड़ती धूप की बांह १३
ताकती एक और ठांव १४
इस नवगीत के कथ्य में नवता तथा गेयता है. यह मानव जातीय छंद में रचा गया है. शैल्पिक दृष्टि से बिना मुखड़े के ४ त्रिपंक्तीय समतुकान्ती अँतरे हैं।एक प्रयोग करते हैं, पहले अंतरे की पहली पंक्ति को मुखड़ा बना कर शेष २ पंक्तियों को पहले तीसरे अंतरे के अंत में प्रयोग किया गया है। दूसरे अँतरे के अंत में पंक्ति जोड़ी गई है। आभा जी! क्या इस रूप में यह अपनाने योग्य है? विचार कर बतायें।
सूर्य ने ५
छाया को ठगा ९
काँपता थर-थर अँधेरा १४
कोहरे का है बसेरा १४
जागता अल्हड़ सवेरा १४
किरनों नेे ६
दिया है दग़ा ८
रोशनी का दीपकों से १४
दीपकों का बातियों से १४
बातियों का ज्योतियोँ से १४
नेह नाता ७
क्यों नहीं पगा? ८
सूर्य ने ५
छाया को ठगा ९
छाँव झीनी काँपती सी १४
बाँह धूपिज थामती सी १४
ठाँव कोई ताकती सी १४
अब कौन है ७
किसका सगा? ७
सूर्य ने ५
छाया को ठगा ९
.
***
कार्यशाला
आइये! कविता करें ६ :
.
मुक्तक
आभा सक्सेना
कल दोपहर का खाना भी बहुत लाजबाब था, = २६
अरहर की दाल साथ में भुना हुआ कबाब था। = २६
मीठे में गाजर का हलुआ, मीठा रसगुल्ला था, = २८
बनारसी पान था पर, गुलकन्द बेहिसाब था।। = २६
लाजवाब = जिसका कोई जवाब न हो, अतुलनीय, अनुपम। अधिक या कम लाजवाब नहीं होता, भी'' से ज्ञात होता है कि इसके अतिरिक्त कुछ और भी स्वादिष्ट था जिसकी चर्चा नहीं हुई। इससे अपूर्णता का आभास होता है। 'भी' अनावश्यक शब्द है।
तीसरी पंक्ति में 'मीठा' और 'मीठे' में पुनरावृत्ति दोष है. गाजर का हलुआ और रसगुल्ला मीठा ही होता है, अतः यहाँ मीठा लिखा जाना अनावश्यक है।
पूरे मुक्तक में खाद्य पदार्थों की प्रशंसा है. किसी वस्तु का बेहिसाब अर्थात अनुपात में न होना दोष है, मुक्तककार का आशय दोष दिखाना प्रतीत नहीं होता। अतः, इस 'बेहिसाब' शब्द का प्रयोग अनुपयुक्त है।
कल दोपहर का खाना सचमुच लाजवाब था = २५
दाल अरहर बाटी संग भर्ता-कवाब था = २४
गाजर का हलुआ और रसगुल्ला सुस्वाद था- = २६
अधरों की शोभा पान बनारसी नवाब था = २५

१८-१-२०१५

गुरुवार, 23 अक्टूबर 2025

अक्टूबर २३, मुक्तिका, चंद्रयान, तकनीकी शिक्षा, मुक्तिका, जनक छंद, दोहा, दीप, सलिल

सलिल सृजन अक्टूबर २३
*
मुक्तिका
चंद्रयान को कहो न किस्सा।
है यह नूतन सच का हिस्सा।।
जिस रो में इसरो उस रो में-
जो न खड़ा वह खाए घिस्सा।
भौंचक देखें पाकिस्तानी-
मन ही मन करते हैं गुस्सा।
मिला चंद्र में पानी हमको-
लेकर चलें बाल्टी-रस्सा।
लैंडर-रोवर धूप-छाँव सम
संग रहें ज्यों मिस्सी-मिस्सा।
इसरो ने यह बता दिया है-
नासा का नकली है ठस्सा।
नामकरण शिव-शक्ति अनूठा-
ज्यों कपोल पर सोहे मस्सा।
•••
एक दोहा
अब न पैर फुट लात पग, चरण कमल बलिहार।
रखें न भू पर हों मलिन, सिर पर पैर पखार।।
२३.१०.२०२४
***
मुक्तक
आरज़ू है अंजुमन में बहारें रहें।
आसमां में चाँद खुश हो, सितारे रहें।।
है जमीं का कौन?, सबकी वालिदा है वो
प्यार कर माँ से सलिल तो बहारें रहें।।
***
गीत
*
ओझल हो तुम
किंतु सरस छवि,
मन में अब तक बसी हुई है।
यादों का पल
युग सा बीता,
ज्योति मिलन की जली हुई है।।
*
उषा किरण सम रश्मि रथी का
दर तज मेरी ड्योढ़ी आई।
तुहिन बिंदु सम ठिठकीं-सँकुचीं
अरुणाई ने की पहुनाई।।
दर पर हाथ-
हथेली छापा
घड़ी मिलन की लिखी हुई है।
यादों का पल
युग सा बीता,
ज्योति मिलन की जली हुई है।।
*
दिन भर राह हेरतीं गुमसुम
कब संझा हो दीपक बालो।
रजनी हो तो मिलन पूर्व मिल
गीत मिलन के गुनगुन गा लो।।
चेहरा थाम निहारा, पाया
सिमटी-सिकुड़ी छुई-मुई है।
यादों का पल
युग सा बीता,
ज्योति मिलन की जली हुई है।।
*
दो थे, पल में एक हो गए,
नयन नयन में डूब-उबरते।
अधर अधर पर धर अधरामृत
पीते; उर धर, विहँस सिहरते।।
पाकर खोएँ, खोकर पाएँ
आस अहैतुक पली हुई है।
यादों का पल
युग सा बीता,
ज्योति मिलन की जली हुई है।।
*
२३-१०-२०२२, ९४२५१८३२४४
***
विमर्श- तकनीकी शिक्षा में हिंदी
क्या औचित्य और उपयोग है मध्य प्रदेश में हिंदी माध्यम से एमबीबीएस पाठ्यक्रम शुरू करने का, जबकि सारी पुस्तकों में अधिकांश अंग्रेजी शब्द "जस के तस" हैं और उन्हें केवल देवनागरी लिपि में लिख दिया गया है?
पहले आपकी प्रश्न की पृष्ठभूमि समझें-
पढ़ने-समझने और लिखने में भाषा माध्यम का कार्य करती है। आप भाषा जानते हैं तो विषय या कथ्य को समझते हैं। अगर भाषा ही समझ न सकें तो विषय या कथ्य कैसे समझेंगे?
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार बच्चा सबसे आधी सरलता, सहजता से अपनी मातृभाषा समझता है। नवजात शिशु कुछ न जानने पर भी माँ द्वारा कहे गए शब्दों का भावार्थ समझकर प्रतिक्रिया देता है। किसी भी भारतीय की मातृभाषा अंग्रेजी नहीं है। अंग्रेजी में बताई गयी बात समझना अधिक कठिन होता है। सामान्यत:, हम अपनी मातृभाषा में सोचकर अंग्रेजी में अनुवाद कर उत्तर देते हैं। इसीलिए अटकते हैं, या रुक-सोचकर बोलते हैं।
संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा कराए गए अध्ययन से यह तथ्य सामने आया कि दुनिया में सर्वाधिक उन्नति देश वे हैं जो उच्च तथा तकनीकी शिक्षा अपनी मातृभाषा देते हैं। इनमें रूस, चीन, जापान, फ़्रांस, जर्मनी आदि हैं। यह भी कि दुनिया में सर्वाधिक पिछड़े देश वे हैं जो उच्च तथा तकनीकी शिक्षा किसी विदेश भाषा में देते हैं। इनमें से अधिकांश कभी न कभी अंग्रेजों के गुलाम रहे हैं।
पराधीनता के समय में भारत की शिक्षा नीति पर इंग्लैंड की संसद में हुई बहस में नीति बनानेवाले लार्ड मैकाले ने स्पष्ट कहा था कि उसका उद्देश्य भारत की सनातन ज्ञान परंपरा पर अविश्वास कर पश्चिम द्वारा थूका गया चाटनेवाली पीढ़ी उत्पन्न करना है। दुर्भाग्य से वह सफल भी हुआ। स्वतंत्रता के बाद भारत के शासन-प्रशासन में अंग्रेजी का बोलबाला रहा, आज भी है। इस संवर्ग में स्थान बनाने के लिए सामान्य जनों ने भी अंग्रेजी को सर पर चढ़ा लिया।
१९६२ में चीनी हमले के बाद देश में अभियंताओं की बड़ी संख्या की जरूरत हुई ताकि देश विज्ञान, तकनीक और उद्योग के क्षेत्र में प्रगति कर सके। दक्षिण भारतीय राज्यों ने ६ माह और एक वर्ष के सर्टिफिकेट कोर्स आरंभ किए जिन्हें उत्तीर्ण कर बड़ी संख्या में दक्षिण भाषी, मध्य तथा उत्तर भारत में कार्य विभागों में घुस गए और लगभग ४ दशकों तक पदोन्नत होकर उच्च पदों पर काबिज रहे। मध्य तथा उत्तर भारत में पॉलिटेक्निक आरंभ कर त्रिवर्षीय डिप्लोमा पाठ्यक्रम आरंभ किए गए। इनमें ग्रामीण पृष्ठभूमि के अनेक युवा प्रविष्ट हुए जिन्हें उच्चतर माध्यमिक परीक्षाओं में अच्छे एक मिले थे किन्तु पॉलिटेक्निक तथा अभियांत्रिकी महाविद्यालयों में अंग्रेजी न समझ सकने के कारण ये प्रथम वर्ष में असफल हो गए। कई ने पूरक परीक्षाओं से परीक्षा उत्तीर्ण की किन्तु अंक कम हो गए, कई ने आत्महत्या तक कर लीं। पॉलिटेक्निक जबलपुर के छात्रों ने वर्ष १९७१-७२ में परीक्षा में हिंदी की मांग करते हुए हड़ताल की। तब मैं भी वहाँ एक छात्र था।
डिप्लोमाधारी अभियंताओं ने इस विषमता को समझते हुए पदोन्नति अवसरों के सृजन, वेतनमान में सुधार तथा हिंदी में अभियांत्रिकी शिक्षण के लिए कई बार हड़तालें कीं। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, बिहार, गुजरात, महाराष्ट्र, बंगाल आदि राज्यों के डिप्लोमाधारी अभियंताओं ने अखिल भारतीय महासंघ बनाकर भारत सरकार को अपनी पीड़ा और समाधान के उपायों से वगत कराया। तब जनसंघ और समाजवादी दल विरोध में, कोंग्रेस सत्ता में थी। जनसंघ के कई नेताओं प्यारेलाल खंडेलवाल जी, कुशाभाऊ ठाकरे जी, अटलजी, आडवाणी जी, जोशी जी, आदि ने अभियंताओं के मांग पत्रों का समर्थन किया, विधायिकाओं में प्रश्न उठाए। तभी से यह नीति कि उच्च तथा तकनीकी शिक्षा हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओँ में हो जनसंघ और कालांतर में भाजपा की नीति बन गई। समाजवादी भी इस मांग के पक्ष में थे किन्तु सत्ता में आने पर उन्होंने इस बिंदु को भुला दिया। उस दौर में सर्व अभियंता ब्रह्म दत्त दिल्ली, रामकिशोर दत्त लख़नऊ, संजीव वर्मा जबलपुर, अमरनाथ लखनऊ, नारायण दास यादव ग्वालियर, जयशंकर सिंह महासमुंद, बृजेश सिंह बिलासपुर, रमाकांत शर्मा भोपाल, शिवप्रसाद वशिष्ठ उज्जैन, सतीश सक्सेना ग्वालियर, आदित्यपाल सिंह भोपाल आदि ने सतत संघर्ष किया। संजीव वर्मा ने जबलपुर में इंजीनियर्स फोरम (इंडिया) का गठन कर भारत रत्न सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया के जान दिन को अभियंता दिवस के रूप में मनाकर स्वभाषा में अभियांत्रिकी शिक्षा के आंदोलन को नव स्फूर्ति दी। फलत:, हर विभाग में मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की मूर्ति कार्यालय परिसर में स्थापित कर हिंदी में कार्य करने का संकल्प लिया गया। डिप्लोमाधारी अभियंताओं ने प्राकल्लन (एस्टिमेटिंग), मापन (मेजरमेंट) तथा मूल्याङ्कन (वेल्युएशन) हिंदी में करना आरंभ कर दिया। डिप्लोमा परीक्षाओं में छात्रों ने हिंदी में उत्तर लिखे। शासन के लिए इन्हें अमान्य करने का अर्थ विभागीय कार्य बंद होना होता, जिससे हड़ताल सफल होती। शासन ने हड़ताल को असफल दिखाने के लिए, देयकों का भुगतान होने दिया। मध्य प्रदेश में पॉलिटेक्निक में डिप्लोमा स्तर पर हिंदी में पुस्तकें तथा परीक्षा १९९० के आसपास ही सुलभ हो गयी किन्तु दुर्भाग्य से अन्य हिंदी भाषी प्रदेशों ने जहाँ समाजवादियों की सरकारें थीं ने इसका अनुकरण नहीं किया।
बड़ी संख्या में निजी अभियांत्रिकी महाविद्यालय खुलने पर उनमें भी ग्रामीण छत्रों ने बड़ी संख्या में प्रवेश लिया। इतिहास ने खुद को दुहराया। बी.ई./बी.टेक. तथा एम.ई./एम.टेक. में भी हिंदी का प्रवेश हुआ। अटल बिहारी हिंदी विश्वविद्यालय भोपाल ने मेडिकल की पुस्तकों का हिंदी अनुवाद कर एम.बी.बी.एस. में हिंदी में करना संभव कर दिया। यद्यपि यह आरंभ मात्र है। लगभग एक दशक लगेगा मेडिकल शिक्षा का पूरी तरह हिन्दीकरण होने में।
आपका प्रश्न तकनीकी किताबों में प्रयुक्त भाषा को लेकर है। हिन्दीकरण करते समय यदि शुद्ध संस्कृत निष्ठ हिंदी का प्रयोग किया जाए तो पारिभाषिक शब्द अत्यधिक कठिन तथा अप्रचलित होंगे। विज्ञान विषयों में अध्ययन-अध्यापन एक स्थान पर, प्रश्न पत्र बनाना दूसरे स्थान पर, उत्तर लिखना तीसरे स्थान पर तथा उत्तर पुस्तिका जाँचना चौथे स्थान पर होता है। अत:, भाषा व् शब्दावली ऐसी हो जिसे सब समझकर सही अर्थ निकालें। इसलिए आरंभ में तकनीकी तथा पारिभाषिक शब्दों को यथावत लेना ही उचित है। भाषा हिंदी होने से वाक्य संरचना सरल-सहज होगी। विद्यार्थी जो सोचता है वह लिख सकेगा। अंग्रेजी माध्यम से पढ़ा परीक्षक भी हिंदी के उत्तर में तकनीकी-पारिभाषिक शब्द यथावत भाषांतरित होने पर समझ सकेगा। मैंने बी.ई., एम.ई. की परीक्षाओं में इस तरह की समस्या का अनेक बार सामना किया है तथा हल भी किया है। तकनीकी लेख लिखते समय भी यह समस्या सामने आती है।
तकनीकी शिक्षा के हिन्दीकरण में सबसे बड़ी बाधा इंस्टीट्यूशन ऑफ़ इंजीनियर्स, इंडियन जिओटेक्नीकल सोसायटी, इंडियन मेडिकल असोसिएशन, जैसी संस्थाएं हैं जहाँ हिंदी का प्रयोग वर्जित घोषित न होने पर कभी नहीं किया जाता। सरकार और जनता को इस दिशा में सजग होकर इन संस्थाओं का चरित्र बदलना होगा।
२३-१०-२०२२
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लघुकथा संकलन ‘आदमी जिंदा है’
प्राक्कथन
डॉ. निशा तिवारी
‘आदमी जिंदा है’ लघुकथा संग्रह मेरे अनुजवत संजीव वर्मा ‘सलिल’ की नव्य कृति है. यह नव्यता द्विपक्षीय है. प्रथम यह कृति कालक्रमानुसार नई है और दूसरे परंपरागत कहानी-विधा के सांचे को तोड़ती हुए नव्य रूप का सृजन करती है. यों नई शब्द समय सापेक्ष है. कोई भी सद्य:रचित कृति पुरानी की तुलना में नई होती है. स्वतंत्रता के पश्चात् हिंदी कहानी ने ‘नई कहानी’, ‘अकहानी’, ‘समान्तर कहानी’, ‘सचेतन कहानी’, ‘सहज कहानी’ इत्यादि कथा आंदोलनों के अनेमनेक पड़ावों पर कथ्यगत और रूपगत अनेक प्रतिमान स्थिर किये हैं. अद्यतन कहानी, लघुता और सूक्ष्मता के कम्प्युटरीकृत यथार्थ को रचती हुई अपनी नव्यता को प्रमाणित कर रही है. कंप्यूटर और मोबाइल की क्रांति लघुता और सूक्ष्मता को परिभाषित कर रही है.संप्रति सलिल जी का प्रकाश्य लघुकथा संग्रह भी तकनीकी युग की इसी सूक्ष्मता-लघुता से कहानी विधा को नवता प्रदान करता है. मुक्तक और क्षणिका की तर्ज पर उन्होंने कथा-सूत्र के ताने-बाने बुने हैं. अत्यंत लघु कलेवर में प्रतिपाद्य को सम्पूर्णता प्रदान करना अत्यंत दुष्कर कार्य है किंतु सलिल जी की भावनात्मकता तथा संवेदनशीलता ने समय और परिस्थितिगत वस्तु-चित्रणों को अपनी, इन कहानियों में बखूबी अनुस्यूत किया है. यही कारण है कि उनकी ये कहानियाँ उत्तर आधुनिक ‘पेरोडीज़’, ‘येश्तीज़’ तथा कतरनों की संज्ञाओं से बहुत दूर जाकर घटना और संवेदना का ऐसा विनियोग रचती हैं कि कथा-सूत्र टुकड़ों में नहीं छितराते वरन उन्हें एक पूर्ण परिणति प्रदान करते हैं.
लघुकथा संग्रह का शीर्षक ‘आदमी जिंदा है’ ही इस तथ्य का साक्ष्य है कि संख्या-बहुल ये एक सौ दस कहानियाँ आदमी को प्रत्येक कोण से परखती हुई उसकी आदमियत के विभिन्न रूपों का परिचय पाठक को देती हैं. ये कहानियां संख्या अथवा परिमाण में अधिक अवश्य हैं किन्तु विचार वैविध्य पाठक में जिज्ञासा बनाए रखता है और पाठक प्रत्येक कहानी के प्रतिपाद्य से निरंताराया में साक्षात् करता हुआ ह्बव-निमग्न होकर अगली कथा की और बढ़ जाता है. कहानी के सन्दर्भ में हमेशा यह फतवा दिया जाता है कि ‘जो एक बैठक में पढ़ी जा सके.’ सलिल जी की ये समस्त कहानियाँ पाठक को एकही बैठक में पढ़ी जाने के लिए आतुरता बनाये रखती हैं.
सलिल जी के नवगीत संग्रह ‘काल है संक्रांति का’ के नवगीतों की भांति ‘आदमी जिंदा है’ कथा संग्रह की कहानियों की विषय-वस्तु भी समान है. सामाजिक-पारिवारिक विसंगतियाँ एवं कुरीतियाँ (गाइड, मान-मनुहार, आदर्श), राजनीतिक कुचक्र एवं विडंबनाएँ (एकलव्य, सहनशीलता, जनसेवा, सर पर छाँव, राष्ट्रीय सुरक्षा, कानून के रखवाले, स्वतंत्रता, संग्राम, बाजीगर इत्यादि), पारिवारिक समस्या (दिया, अविश्वासी मन, आवेश आदि), राष्ट्र और लिपि की समस्या (अंधमोह), साहित्य जगत एवं छात्र जगत में फैली अराजकतायें (उपहार, अँगूठा, करनी-भरनी) इत्यादि विषयों के दंश से कहानीकार का विक्षुब्ध मन मानो चीत्कार करने लगता हुआ व्यंग्यात्मकता को वाणी देने लगता है. इस वाणी में हास्य कहीं नहीं है, बस उसकी पीड़ा ही मुखर है.
सलिल जी की कहनियों की सबसे बड़ी विशेषता है कि वे जिन समस्याओं को उठाते हैं उसके प्रति उदासीन और तटस्थ न रहकर उसका समाधान भी प्रस्तुत करते हैं. पारिवारिक समस्याओं के बीच वे नारी का मानवीय रूप प्रस्तुत करते हैं, साथ ही स्त्री-विमर्श के समानांतर पुरुष-विमर्श की आवश्यकता पर भी बल देते हैं. उनकी इन रचनाओं में आस्था की ज्योति है और मनुष्य का अस्मिताजन्य स्वाभिमान. ‘विक्षिप्तता’, ‘अनुभूति’ कल का छोकरा’, ‘सम्मान की दृष्टि’ इत्यादि कहानियाँ इसके उत्तम दृष्टांत हैं. सत्ता से जुड़कर मिडिया के पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण से आहूत होकर वे तनाव तो रचती हैं किन्तु ‘देशभक्ति और जनहित की दुहाई देते खोखले स्वर’ से जनगण की सजग-मानवीय चेतना को विचलित नहीं कर पातीं- ‘मन का दर्पण’ उसके मलिन प्रतिबिम्ब का साक्षी बन जाता है. लेखकीय अनुभति का यह कथा-संसार सचमुच मानवीय आभा से रंजित है. भविष्य में ऐसे ही और इससे भी अधिक परिपक्व सृजन की अपेक्षा है.
संपर्क- डॉ. निशा तिवारी, ६५० नेपियर टाउन, भंवरताल पानी की टंकी के सामने, जबलपुर ४८२००१, चलभाष ९४२५३८६२३४
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निकष पर सलिल
गिरीश पंकज, रायपुर
सलिल जी हमारे समय के एक महत्वपूर्ण कवि है, छंद में उनके प्राण बसते है, वे सिद्ध हस्त है।छान्दसिक वातावरण बने रहे, इस दिशा में प्रतिबद्ध हैं।  
अभिषेक 'अभि'
छंद काव्य की दुनिया में अनेक महारथी हुए हैं। बहुतों को पढ़ा भी है और नित् पढता आ रहा हूँ परन्तु वर्त्तमान काल में जिस तरह की छंद काव्य पर पकड़ परम आदरणीय संजीव वर्मा 'सलिल' सर जी के पास है, वो किसी और में मुझे दूर दूर तक नज़र नहीं आती है। केवल छंद ही नहीं, गीत हो या ग़ज़ल, शब्द और इनकी शैली की तारीफ़ करना, ख़ासकर मेरे जैसे अदने से साहित्यप्रेमी के लिए बहुत मुश्किल होता है।
यहाँ तक की इन्होने कई नव छंदों का निर्माण भी किया है और कई समूहों को बनाकर, छंद काव्य प्रेमी और सीखने वालों को मार्गदर्शन भी करते रहते हैं।आपकी ज्यादातर रचनाएँ मैंने पढ़ी है, सिर्फ़ रचनाएँ ही नहीं लेख भी मैंने पढ़े हैं। हिंदी साहित्य पे जो आपकी पकड़ है, वो उत्कृष्ट है, अनमोल है। आप जैसों के वज़ह से ही आज छंद ज़िंदा है और फल-फूल रहा है। 
क्यू एन जिआ
आदरणीय गुरुदेव श्री संजीव वर्मा 'सलिल' जी को कोटिशः नमन। मैं सोचती थी शायद मैं ही भाग्यशाली हूँ। पर मेरे जैसे अनेक भाई बंधुओ पर गुरुदेव की कृपा है। साहित्य जगत की अद्भुत ज्योत को है गुरुदेव। आप केवल दोहे, छंद ही नहीं, गीत हो या ग़ज़ल, शब्द और इनकी शैली की तारीफ़ करना, ख़ासकर मेरे जैसे अदने से साहित्यप्रेमी के लिए बहुत मुश्किल होता है। यहाँ तक की इन्होंने कई नव छंदों का निर्माण भी किया है और कई समूहों को बनाकर, छंद काव्य प्रेमी और सीखने वालों को मार्गदर्शन भी करते रहते हैं। आज के दौर में स्वार्थ से भरे साहित्यकारों मे अद्भुत छवि लिए है गुरुदेव। नमन आपको
सुनीता सिंह, लखनऊ
मैंने संजीव वर्मा 'सलिल' सर से काफी कुछ सीखा है। आपके सहयोग, सुझावों, और मार्गदर्शन से अपनी रचनाओं को कुछ हद तक परिमार्जित और परिष्कृत कर सकी हूँ। मेरी रचनाओं के प्रति मेरा आत्मविश्वास बढ़ाने में भी आपका बड़ा योगदान है। इसके लिए आपकी सदा आभारी रहूंगी।
मनोरमा जैन 'पाखी' भिंड
नमन ऐसी विभूति को और गर्व है कि इनके सानिन्ध्य में हूँ। बस कुछ सीख लूँ तो फिर सोने पे सुहागा।
योगराज प्रभाकर
तकरीबन 8-9 वर्ष पहले मैंने पहली बार ओपनबुक्स ऑनलाइन डॉट कॉम पर एक कुण्डलिया छंद लिख मारा था। आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने मात्रायों में गड़बड़ी देख मेरी वो खिंचाई की थी कि मैं आजतक मात्रायों की गिनती नहीं भूला। मज़े की बात ये है कि उन्होंने मेरी खिंचाई इसके बावजूद की कि मैं उस वेबसाइट का प्रधान संपादक था।
***
एक लघु कथा - एक चर्चा
खास रिश्ते का स्वप्न
कान्ता राॅय, भोपाल
*
" ये क्या सुना मैने , तुम शादी तोड़ रही हो ? "
" सही सुना तुमने । मैने सोचा था कि ये शादी मुझे खुशी देगी । "
" हाँ ,देनी ही चाहिए थी ,तुमने घरवालों के मर्ज़ी के खिलाफ़, अपने पसंद से जो की थी ! "
" उन दिनों हम एक दुसरे के लिए खास थे , लेकिन आज ....! "
" उन दिनों से ... ! , क्या मतलब है तुम्हारा , और आज क्या है ? "
" आज हम दोनों एक दुसरे के लिये बेहद आम है । "
" ऐसा क्यों ? " उस व्याह की उमंग और उत्तेजना की इस परिणति से वह चकित थी ।
"क्योंकि , दो घंटे रोज वाली पार्क की दोस्ती , पति के रिश्ते में हर दिन औंधे-मुँह गिरता है । "
***
कांता जी!
नमन.
आदर के साथ कहना है कि आप लघुकथेतर कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत करें तो उन पर भी वाह-वाह की झड़ी लग जाएगी। पाठक टिप्पणी के पूर्व प्रस्तुत सामग्री को ध्यान से पढ़ लें तथा लघुकथा के तत्वों पर विचार करते हुए टिप्पणी करें तो वे भी पठनीय होंगी।
शादी जन्म-जन्म का बंधन, इस जन्म में अंत तक साथ चलने का संकल्प या अपनी अपेक्षाओं पर खरी न उतरनेवाली बाई, मित्रता या नौकरी को बदलने की तरह जीवन की एक सामान्य घटना???
कथ्य के तौर पर विवाह जैसे गंभीर संस्कार के साथ-साथ यह लघुकथा न्याय नहीं करती।
विवाह भंग का जो कारण दर्शित है यदि उसे ठीक मानें तो शायद हममें से किसी का विवाह अखंड न रहे.
विवाह एक दूसरे को जो जैसा है, वैसा स्वीकारने और एक-दूसरे के अनुरूप ढलने से मजबूत होता है.
विवाह भंग की प्रक्रिया तो अगणित प्रयासों की असफलता का दुष्परिणाम होता है. लघु कथा में कहीं ऐसा उल्लेख नहीं है कि प्रयास किये गए या असफल हुए.
विवाह भंग का जो कारण 'आज हम दोनों एक दूसरे के लिये बेहद आम हैं' दर्शाया गया है. एक-दूसरे के लिये आम अर्थात सहज होना क्यों गलत है? सहज जीवन तो वरेण्य है. किसी 'ख़ास' के आने पर बनावट या कृत्रिमता का प्रवेश होता है, यह परिवर्तन अल्पकालिक होता है और उसके जाते ही फिर सब कुछ पूर्ववत हो जाता है. जैसे घर में मेहमान का आना-जाना।
'आम' का अर्थ विवाह के विशिष्ट सम्बन्ध का कइयों के साथ दुहराव होना है तो यहाँ दोनों के साथ यह स्थिति है, वह एक के द्वारा भंग का आधार नहीं बनती।'
शिल्प के नाते यह मूलत: संवाद कथा है. लघुकथा के कुछ समीक्षक लघुकथा में संवाद को वर्ज्य मानते हैं. मेरी दृष्टि में लघुता आकारिक मानक है और संवाद शैल्पिक, ध्येय कथ्य को पाठक तक पहुँचाना है. गत ३०-३२ वर्षों में मैंने कई बार संवादात्मक लघुकथाएँ लिखी हैं और एव पाठकों तक कथ्य पहुँचाने के साथ-साथ सराही भी गयी हैं।
इस लघुकथा के संदर्भित संवाद में संबंध एक के लिए 'खास' दूसरे के लिए आम होता तो भी अलगाव का कोई कारण बनता।
शुभाकांक्षी - सलिल
***
मुक्तिका:
*
रात चूहे से चुहिया यूँ बोली
तू है पोरस तो मैं सिकंदर हूँ
.
चौंक चूहा छिपा के मुँह बोला:
तू बँदरिया, मैं तेरा बंदर हूँ
.
शोख चुहिया ने हँस जवाब दिया:
तू न गोरख, न मैं मछंदर हूँ
*
तू सुधा मेरी, मान जा प्यारी!
मैं तेरा अपना दोस्त चन्दर हूँ
.
दिया नहले पे दहला चुहिया ने
तू है मंदर मगर मैं मंदिर हूँ
.
सर झुका चूहे ने सलाम किया:
मलिका तूफान, मैं बवंडर हूँ
.
जा किनारे खड़े लहर गिनना
याद रखना कि मैं समंदर हूँ
.
बाहरी दुनिया मुबारक हो तुझे
तू है बाहर, मैं घर के अंदर हूँ
२३-१०-२०१५
***
जनक मुक्तक
*
मिल त्यौहार मनाइए
गीत ख़ुशी के गाइए
साफ़-सफाई सब जगह
पहले आप कराइए
*
प्रिया रात के माथ पर,
बेंदा जैसा चाँद धर.
कालदेवता झूमता-
थाम बाँह में चूमता।
*
गये मुकदमा लगाने
ऋद्धि-सिद्धि हरि कोर्ट में
माँगी फीस वकील ने
अकल आ गयी ठिकाने
*
नयन न नम कर नतमुखे!
देख न मुझको गिलाकर
जो मन चाहे, दिलाऊं-
समझा कटनी जेब है.
*
हुआ सम्मिलन दियों का
पर न हो सका दिलों का
तेल न निकला तिलों का
धुंआ धुंआ दिलजलों का
*
शैलेन्द्र नगर, रायपुर
***
दोहा दीप
रांगोली से अल्पना, कहे देखकर चौक
चौंक न घर पर रौनकें, सूना लगता चौक
बाती मन, तन दीप से, कहे न देना ढील
बाँस प्रयासों का रखे, ऊँचा श्रम-कंदील
नेता जी गम्भीर हैं, सुनकर हँसते लोग
रोगी का कब डॉक्टर , किंचित करते सोग?
चाह रहे सब रमा को, बिसरा रहे रमेश
याचक हैं सौ सुरा के, चाहें नहीं सुरेश
रूप-दीप किस शिखा का, कहिए अधिक प्रकाश?
धरती धरती मौन जब, पूछे नीलाकाश
दोहा दीप जलाइए, स्नेह स्नेह का डाल
बाल न लेकिन बाल दें, करिए तनिक सम्हाल
कलम छोड़कर बाण जब, लगे चलने बाण
शशि-तारे जा छिप गए हो संकट से त्राण
दीपोत्सव, रायपुर
२३.१०.२०१४.
***
नवगीत:
मंज़िल आकर
पग छू लेगी
ले प्रदीप
नव आशाओं के
एक साथ मिल
कदम रखें तो
रश्मि विजय का
तिलक करेगी
होनें दें विश्वास
न डगमग
देश स्वच्छ हो
जगमग जगमग
भाग्य लक्ष्मी
तभी वरेगी
हरी-भरी हो
सब वसुंधरा
हो समृद्धि तब ही
स्वयंवरा
तब तक़दीर न
कभी ढलेगी
२३-१०-२०१४
***

सोमवार, 21 जुलाई 2025

जुलाई २१, सॉनेट, दीप, गंग, निधि, छबि, सुगती, माहिया, हाइकु, जनक, सुगती, छंद,

सलिल सृजन जुलाई २१

सेमल ० अनुभूति की मिट्टी में विचारों के बीज संवेदना का पानी पीकर फूले न समाए। फट गया कठोरता का कृत्रिम आवरण, सृजन के अंकुर पैर जमाकर मुस्काए। संकल्प की जड़ें जमीं में जमीँ, प्रयास के पल्लव हरियाए। गगन चूमने को आतुर तना तना और शाखाओं ने हाथ फैलाए। सूर्य की तपिश झेली पवन संग करी अठखेली चाँदनी संग आँख मिचौली चाँद संग खिलखिलाए। कभी सब्जी बन मिटाई क्षुधा कभी चर्म रोग मिटाए घटाकर बढ़ती उम्र के प्रभाव रक्त शोधन के काम आए। लोक कल्याण के लिए किया आत्म बलिदान रहकर मौन और बेदाम इसलिए कुदरत ने सिर पर लाल फूलों के मुकुट सजाए। रेशमी कपास का देकर उपहार बीजों से भरकर पशुओं का पेट काष्ठ से बनाकर नाव और वाद्य यंत्र हम पर्णपाती शाल्मली उर्फ़ सेमल मरकर भी जी पाए, जिंदगी के तराने गुंजाए। २१.७.२०२५

***
छंद सलिला
हाइकु
पानी बरसे
मेघ-नयन से
रुके न रोके।।
घन श्याम से
वर माँगते सब
घनश्याम से।।
आँखों में आँखें
डाल डाल झूमती
शाखें ही शाखें।।
माहिया
बिन बारिश रोते हैं
बारिश हो जमकर
झट नयन भिगोते हैं।
बुलडोजर बाबा जी!
अपने न रहे अपने
काशी या काबा जी।।
किस्से ही किस्से हैं,
सुख भोगें नेता
दुख जन के हिस्से हैं।।
•••
जनक छंद
कंकर में शंकर मिले
देख सके तो देख ले
व्यर्थ न कर शिकवे गिले।।
हरयाया है ठूँठ हर
हैं विषाक्त फिर भी शहर
हुआ प्रदूषण ही कहर।।
खुशगवार मौसम कहे
नाच-झूम, चिंता न कर
होनी होकर ही रहे।।
•••
मुक्तक
आपमें बच्चा सदा जिंदा रहे
झूठ में सच्चा सदा जिंदा रहे
पक रहे, थक-चुक रहे हैं तन सभी
सभी का मन मृदुल अरु कच्चा रहे
कौन किसका कब हुआ कहिए कभी
खुद खुदी को जान पाए क्या सभी?
और पर रहते उठाते अँगुलियाँ
अँगुलियाँ खुद पर उठी देखें अभी।।
बात मत कर, काम कर
यह न हो बस नाम कर
आत्मश्लाघा दूर रख
नहीं विधि को वाम कर।।
•••
दोहा
कृष्णा कृष्णा कह रहे, रहे कृष्ण से दूर।
दो न, एक यह जान जप, हो दीदार जरूर।।
गुरु से गुर जो सीख ले, वही शिष्य मतिमान।
जान, अजान न रह कभी, गुरु ही गुण की खान।।
सरला वसुधा दे सदा, जोड़े कभी न कोष।
झोली खाली हो नहीं, यदि मन में संतोष।।
•••
सोरठा
करिए सरस विनोद, अगर समय विपरीत हो।
दे आलोक प्रमोद, संकट टल जाते सभी।।
रेखा लंबी आप, खींचें सदा हुजूर जी!
मिटा और की पाप, करें न पाल गुरूर जी।।
करें प्रशंसा गैर, निज मुख से करिए नहीं।
सदा रहेगी खैर, करें न निंदा गैर की।।
•••
सुगती छंद
जो भला है
झुक चला है।
बुरा है जो
तना है वो।
आइए हम
मिटाएँ तम।
बाँट दें सुख
माँग लें दुख।
खुश रहें प्रभु!
जीव सब विभु।
•••
छबि छंद
जपिए रमेश
हर दिन हमेश।
छबि में निखार
लाता सुधार।
कर ले प्रयास
फैले सुवास।
मत चाह मोह
मत पाल द्रोह।
चल अंत नाम
कह राम राम।
•••
गंग छंद
घन गरज घूमे
गिरि शिखर चूमे।
झट हुई वर्षा
मन मुकुल हर्षा।
बीज अंँकुराया
भू यश गुँजाया।
फुदक गौरैया
कर ता ता थैया।
मिल बजा ताली
वरो खुशहाली।
•••
निधि छंद
सिय राम निहार
गईं सुधि बिसार।
लख राम सीता
कहते पुनीता।
रसना न बोले
दृग राज खोले।
पल में बनाया
अपना पराया।
दीपक दिपा है
प्रभु की कृपा है।
•••
दीप छंद
दीपक अगिन बाल
नर्तित विहँस बाल।
किरणें थिरक गोल
लाईं मुदित ढोल।
गातीं हुलस गीत
पालें पुलक प्रीत।
सज्जित सुगृह द्वार
हर्षित सुमन वार।
गृहणी मदिर नैन
रुचिकर सुखद बैन।
हैं प्रि‌यतम निहाल
कुंजित पिंक रसाल।
गुरु पूर्णिमा
२१.७.२०२४
•••
सॉनेट
बूँदें
तपती धरती पर पड़ीं बूँदें
तपिश मन की हो गई शांत
भीगकर घर आ गए कांत
पर्ण पर मणि सम जड़ी बूँदें
हाय! लज्जा से गड़ीं बूँदें
देखकर गंदी नदी सूखी
गृह लक्ष्मी हो ज्यों दुखी-भूखी
ठिठक मेघों संग उड़ी बूँदें
हैं महज शुभ की सगी बूँदें
बिकें नेता सम नहीं बूँदें
स्नेह से मिलती पगी बूँदें
आँख से छिप-छिप बहीं बूँदें
गाल पर छप-छप गईं बूँदें
धैर्य धर; ढहती नहीं बूँदें
२१-७-२०२२
***
लघुकथा
सिसकियाँ
सिसकियों की आवाज सुनकर मैंने पीछे मुड़के देखा। सांझ के झुरमुट में घुटनों में सर झुकाए वह सिसक रही थी। उसकी सिसकियाँ सुनकर पूछे बिना न रहा गया। पहले तो उसने कोई उत्तर न दिया, फिर धीरे धीरे बोली- 'क्या कहूँ? मेरे अपने ही जाने-अनजाने मेरे बैरी हो गए।
- तुम उनसे कोई अपेक्षा ही क्यों करती हो?
= अपेक्षा मैं नहीं करती, मुझसे ही अपेक्षा की जाती है कि मैं सबके और हर एक के मन के अनुसार ही खुद को ढाल लूँ। मैं किस-किस के अनुसार खुद को बदलूँ?
- बदलाव ही तो जीवन है। सृष्टि में बदलाव न हो एक सा मौसम, एक से हालात रहें तो विकास ही रुक जाएगा।
= वही तो मैं भी कहती हूँ। मेरा जन्म लोक में हुआ। माताएँ अपने बच्चों को बहलाने के लिए मुझे बुला लेतीं। किसान-मजदूर अपनी थकान भुलाने के लिए मुझे अपना हमसाया पाते। गुरुजन अपने विद्यार्थियों को समझाने, राह दिखाने के लिए मुझे सहायक पाते रहे।
- यह तो बहुत अच्छा है, तुम्हारा होना तो सार्थक हो गया।
= होना तो ऐसा ही चाहिए पर जो होना चाहिए वह होता कहाँ है? हुआ यह कि वर्तमान ने अतीत को पहचनाने से ही इंकार कर दिया। पत्तियों और फूलों ने बीज, अंकुर और जड़ों को अपना मूल मानने से ही इंकार कर दिया।
- यह तो वाकई दुर्भाग्यपूर्ण है।
= बात यहीं तक नहीं है। अब तो अलग अलग फलों ने अलग-अलग यह निर्धारित करना शुरू कर दिया है कि जड़ों, तने और शाखाओं को कैसा होना चाहिए, उनका आकार-प्रकार कैसा हो?, रूप रंग कैसा हो?
- ऐसा तो नहीं होना चाहिए। पत्तियों, फूलों और फलों को समझना चाहिए कि अतीत को बदला नहीं जा सकता, न झुठलाया जा सकता है।
= कौन किसे समझाए? हर पत्ती, फूल और फल खुद को नियामक मानकर नित नए मानक तय कर खुद को मसीहा मान बैठे हैं।
- तुम कौन हो? किसके बारे में बात कर रही हो?
= मैं उस वृक्ष की जीवन शक्ति हूँ जिसे तुम कहते हो लघुकथा।
२१.७.२०२१ ***
दोहा सलिला
*
प्रभु सारे जग का रखे, बिन चूके नित ध्यान।
मैं जग से बाहर नहीं, इतना तो हैं भान।।
*
कौन किसी को कर रहा, कहें जगत में याद?
जिसने सब जग रचा है, बिसरा जग बर्बाद
*
जिसके मन में जो बसा वही रहे बस याद
उसकी ही मुस्कान से सदा रहे दिलशाद
*
दिल दिलवर दिलदार का, नाता जाने कौन?
दुनिया कब समझी इसे?, बेहतर रहिए मौन
*
स्नेह न कांता से किया, समझो फूटे भाग
सावन की बरसात भी, बुझा न पाए आग
*
होती करवा चौथ यदि, कांता हो नाराज
करे कृपा तो फाँकिये, चूरन जिस-तिस व्याज
*
प्रभु सारे जग का रखें, बिन चूके नित ध्यान।
मैं जग से बाहर नहीं, इतना तो हैं भान।।
*
कौन किसी को कर रहा, कहें जगत में याद?
जिसने सब जग रचा है, बिसरा जग बर्बाद
*
जिसके मन में जो बसा वही रहे बस याद
उसकी ही मुस्कान से सदा रहे दिलशाद
*
दिल दिलवर दिलदार का, नाता जाने कौन?
दुनिया कब समझी इसे?, बेहतर रहिए मौन
*
स्नेह न कांता से किया, समझो फूटे भाग
सावन की बरसात भी, बुझा न पाए आग
*
होती करवा चौथ यदि, कांता हो नाराज
करे कृपा तो फाँकिये, चूरन जिस-तिस व्याज
***
बरसाती गीत
*
नहा रहे हैं
बरसातों में
हरे-भरे बतियाते झाड़
अपनी जगह
हमेशा ठांड़े
झूम-झूम मस्ताते झाड़
*
सूर्य-बल्ब
जब होता रौशन
मेक'प करते बिना छिपे.
शाखाओं,
कलियों फूलों से
मिलते, नहीं लजाते झाड़
नहा रहे हैं
बरसातों में
हरे-भरे बतियाते झाड़
अपनी जगह
हमेशा ठांड़े
झूम-झूम मस्ताते झाड़
*
बऊ धरती
आँखें दिखलाये
बहिना हवा उड़ाये मजाक
पर्वत दद्दा
आँख झुकाये,
लता संग इतराते झाड़
नहा रहे हैं
बरसातों में
हरे-भरे बतियाते झाड़
अपनी जगह
हमेशा ठांड़े
झूम-झूम मस्ताते झाड़
*
कमसिन सपने
देख थिरकते
डेटिंग करें बिना हिचके
बिना गये
कर रहे आउटिंग
कभी नहीं पछताते
नहा रहे हैं
बरसातों में
हरे-भरे बतियाते झाड़
अपनी जगह
हमेशा ठांड़े
झूम-झूम मस्ताते झाड़
***
हाइकू सलिला
*
हाइकू लिखा
मन में झाँककर
अदेखा दिखा।
*
पानी बरसा
तपिश शांत हुई
मन विहँसा।
*
दादुर कूदा
पोखर में झट से
छप - छपाक।
*
पतंग उड़ी
पवन बहकर
लगा डराने
*
हाथ ले डोर
नचा रहा पतंग
दूसरी ओर
२१.७.२०१९
***
नवगीत:
*
मेघ बजे
नभ ठाकुर की ड्योढ़ी पर
फिर मेघ बजे
ठुमुक बिजुरिया
नचे बेड़नी बिना लजे
*
दादुर देते ताल,
पपीहा-प्यास बुझी
मिले मयूर-मयूरी
मन में छाई खुशी
तोड़ कूल-मरजाद
नदी उफनाई तो
बाबुल पर्वत रूठे
तनया तुरत तजे
*
पल्लव की करताल
बजाती नीम मुई
खेत कजलियाँ लिये
मेड़ छुईमुई हुई
जन्मे माखनचोर
हरीरा भक्त पिये
गणपति बप्पा, लाये
मोदक हुए मजे
*
टप-टप टपके टीन
चू गयी है बाखर
डूबी शाला हाय!
पढ़ाये को आखर?
डूबी गैल, बके गाली
अभियंता को
डुकरो काँपें, 'सलिल'
जोड़ कर राम भजे
***
दोहा सलिला:
कुछ दोहे बरसात के
*
गरज नहीं बादल रहे, झलक दिखाकर मौन
बरस नहीं बादल रहे, क्यों? बतलाये कौन??
*
उमस-पसीने से हुआ, है जनगण हैरान
जल्द न देते जल तनिक, आफत में है जान
*
जो गरजे बरसे नहीं, हुई कहावत सत्य
बिन गरजे बरसे नहीं, पल में हुई असत्य
*
आँख और पानी सदृश, नभ-पानी अनुबंध
बन बरसे तड़पे जिया, बरसे छाये धुंध
*
पानी-पानी हैं सलिल, पानी खो घनश्याम
पानी-पानी हो रहे, दही चुरा घनश्याम
*
बरसे तो बरपा दिया, कहर न बाकी शांति
बरसे बिन बरपा दिया, कहर न बाकी कांति
*
धन-वितरण सम विषम क्यों, जल वितरण जगदीश?
कहीं बाढ़ सूखा कहीं, पूछे क्षुब्ध गिरीश
*
अधिक बरस तांडव किया, जन-जीवन संत्रस्त
बिन बरसे तांडव किया, जन-जीवन अभिशप्त
*
महाकाल से माँगते, जल बरसे वरदान
वर देकर डूबे विवश, महाकाल हैरान
२०.७.२०१९
***
जा विदेश में बोलिए, हिन्दी तब हो गर्व.
क्या बोला सुन समझ लें, भारतीय हम सर्व.

कर किताब से मित्रता, रह तनाव से दूर.
शान्त चित्त खेलो क्रिकेट, मिले वाह भरपूर.

चौको से यारी करो, छक्को से हो प्यार.
शतक साथ डेटिग करो, मीताली सौ बार.

अंग्रेजी का मोह तज, कर हिन्दी में बात.
राज दिलों पर राज का, यह मीताली राज.

राज मिताली राज का, तूफानी रफ़्तार.
राज कर रही विकेट पर, दौड़ दौड़ हर बार.

खेलो हर स्ट्रोक तुम, पीटो हँस हर गेंद.
गेंदबाज भयभीत हो, लगा न पाए सेंध.

दस हजार का लक्ष्य ले, खेलो धरकर धीर.
खेल नायिका पा सको, नया नाम रन वीर.

चौको छक्को की करी, लगातार बरसात.
हक्का बक्का रह गए, कंगारू खा मात.

हरमन पर हर मन फिदा, खूब दिखाया खेल.
कंगारू पीले पड़े, पल में निकला तेल.

सरहद सारी सुरक्षित, दुश्मन फौज फ़रार.
पता पड़ गया आ रही, हरमन करने वार.

हरमन ने की दनादन, चोट, चोट पर चोट.
दीवाली की बम लडी, ज्यों करती विस्फ़ोट.
षटपदी
गेंदबाज चकरा गए, भूले सारे दाँव.
पंख उगे हैं गेंद के, या ऊगे हैं पाँव.
या ऊगे हैं पाँव विकेटकीपर को भूली.
आँख मिचौली खेल, भीड़ के हाथों झूली.
हरमन से कर प्रीत, शोट खेल में छा गए.
भूले सारे दाँव, गेदबाज चकरा गए.
***
मुक्तिका:
बरसात में
*
बन गयी हैं दूरियाँ, नज़दीकियाँ बरसात में.
हो गये दो एक, क्या जादू हुआ बरसात में..

आसमां का प्यार लाई जमीं तक हर बूँद है.
हरी चूनर ओढ़ भू, दुल्हन बनीं बरसात में..

तरुण बादल-बिजुरिया, बारात में मिल नाचते.
कुदरती टी.वी. का शो है, नुमाया बरसात में..

डालियाँ-पत्ते बजाते बैंड, झूमे है हवा.
आ गयीं बरसातियाँ छत्ते लिये बरसात में..

बाँह उनकी राह देखे चाह में जो हैं बसे.
डाह हो या दाह, बहकर गुम हुई बरसात में..

चू रहीं कवितायेँ-गज़लें, छत से- हम कैसे बचें?
छंद की बौछार लायीं, खिड़कियाँ बरसात में..

राज-नर्गिस याद आते, भुलाये ना भूलते.
बन गये युग की धरोहर, काम कर बरसात में..

बाँध,झीलें, नदी विधवा नार सी श्री हीन थीं.
पा 'सलिल' सधवा सुहागन, हो गयीं बरसात में..

मुई ई कविता! उड़ाती नींद, सपने तोड़कर.
फिर सजाती नित नये सपने 'सलिल' बरसात में..
***
मुक्तिका
*
कल दिया था, आज लेता मैं सहारा
चल रहा हूँ, नहीं अब तक तनिक हारा
सांस जब तक, आस तब तक रहे बाकी
जाऊँगा हँस, ईश ने जब भी पुकारा
देह निर्बल पर सबल मन, हौसला है
चल पड़ा हूँ, लक्ष्य भूलूँ? ना गवारा
पाँव हैं कमजोर तो बल हाथ का ले
थाम छड़ियाँ खड़ा पैरों पर दुबारा
साथ दे जो मुसीबत में वही अपना
दूर बैठा गैर, चुप देखे नज़ारा
मैं नहीं निर्जीव, हूँ संजीव जिसने
अवसरों को खोजकर फिर-फिर गुहारा
शक्ति हो तब संग जब कोशिश करें खुद
सफलता हो धन्य जब मुझको निहारा
२१.७.२०१६
***
दोहा - सोरठा गीत
पानी की प्राचीर
*
आओ! मिलकर बचाएँ,
पानी की प्राचीर।
पीर, बाढ़ - सूखा जनित
हर, कर दे बे-पीर।।
*
रखें बावड़ी साफ़,
गहरा कर हर कूप को।
उन्हें न करिये माफ़,
जो जल-स्रोत मिटा रहे।।
चेतें, प्रकृति का कहीं,
कहर न हो, चुक धीर।
आओ! मिलकर बचाएँ,
पानी की प्राचीर।।
*
सकें मछलियाँ नाच,
पोखर - ताल भरे रहें।
प्रणय पत्रिका बाँच,
दादुर कजरी गा सकें।।
मेघदूत हर गाँव को,
दे बारिश का नीर।
आओ! मिलकर बचाएँ,
पानी की प्राचीर।।
*
पर्वत - खेत - पठार पर
हरियाली हो खूब।
पवन बजाए ढोलकें,
हँसी - ख़ुशी में डूब।।
चीर अशिक्षा - वक्ष दे ,
जन शिक्षा का तीर।
आओ मिलकर बचाएँ,
पानी की प्राचीर।।
२०-७-२०१६
-----------------
सोरठा - दोहा गीत
संबंधों की नाव
*
संबंधों की नाव,
पानी - पानी हो रही।
अनचाहा अलगाव,
नदी-नाव-पतवार में।।
*
स्नेह-सरोवर सूखते,
बाकी गन्दी कीच।
राजहंस परित्यक्त हैं,
पूजते कौए नीच।।
नहीं झील का चाव,
सिसक रहे पोखर दुखी।
संबंधों की नाव,
पानी - पानी हो रही।।
*
कुएँ - बावली में नहीं,
शेष रहा विश्वास।
निर्झर आवारा हुआ,
भटके ले निश्वास।।
घाट घात कर मौन,
दादुर - पीड़ा अनकही।
संबंधों की नाव,
पानी - पानी हो रही।।
*
ताल - तलैया से जुदा,
देकर तीन तलाक।
जलप्लावन ने कर दिया,
चैनो - अमन हलाक।।
गिरि खोदे, वन काट
मानव ने आफत गही।
संबंधों की नाव,
पानी - पानी हो रही।।
२०-७-२०१६
***
अश्'आर  
बसा लो दिल में, दिल में बस जाओ / फिर भुला दो तो कोई बात नहीं
*
खुद्कुशी अश्क की कहते हो जिसे / वो आंसुओं का पुनर्जन्म हुआ
*
अल्पना कल्पना की हो ऐसी / द्वार जीवन का जरा सज जाये.
*
गौर गुरु! मीत की बातों पे करो / दिल किसी का दुखाना ठीक नहीं
*
श्री वास्तव में हो वहीं, जहां रहे श्रम साथ / जीवन में ऊन्चा रखे श्रम ही हरदम माथ
*
खरे खरा व्यव्हार कर, लेते हैं मन जीत / जो इन्सान न हो खरे, उनसे करें न प्रीत.
*
गौर करें मन में नहीं, 'सलिल' तनिक हो मैल / कोल्हू खीन्चे द्वेष का, इन्सां बनकर बैल
*
काया की माया नहीं जिसको पाती मोह, वही सही कायस्थ है, करे गलत से द्रोह.
२१.७.२०१४
०००
नवगीत:
संजीव
*
हर चेहरे में
अलग कशिश है
आकर्षण है
*
मिलन-विरह में,
नयन-बयन में
गुण-अवगुण या
चाल-चलन में
कहीं मोह का
कहीं द्रोह का
संघर्षण है
*
मन की मछली,
तन की तितली
हाथ न आयी
पल में फिसली
क्षुधा-प्यास का
हास-रास का
नित तर्पण है
*
चितवन चंचल
सद्गुण परिमल
मृदु मिठासमय
आनन मंजुल
हाव-भाव ये
ताव-चाव ये
प्रभु-अर्पण है
*
गिरि सलिलाएँ
काव्य-कथाएँ
कहीं-अनकहीं
सुनें-सुनाएँ
कलरव-गुंजन
माटी-कंचन
नव दर्पण है
*
बुनते सपने
मन में अपने
समझ न आते
जग के नपने
जन्म-मरण में
त्याग-वरण में
संकर्षण है
*
प्रयास अलीगढ में दिसंबर २००७ में प्रकाशित