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शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

२७ फरवरी, सॉनेट, पंकज उधास, सरस्वती, तुम, सवैया, कला त्रयोदशी छंद, मुक्तक, दोहा, गीत

सलिल सृजन २७ फरवरी
कार्य शाला दोहा पर कुंडलिया 
० 
इन्दु गगन का एक जो, उगे नियति अनुपात। 
इन्दु नयन के द्वय उगे, मन अंबर दिन-रात।। -अशोक 'व्यग्र' भोपाल 
मन अंबर दिन-रात, नयन का इंदु चमकता। 
लगे ग्रहण तो जीव, एक अक्षी हो खलता।। 
करे अमावस सूरदास, दिख सके न बिंदु। 
ताल-मेल बिन अलग, अलग देखें नयन-इंदु।। - संजीव
***
लघुकथा 
ईमान 
० 
वकील साहब को शिकायत थी कि पेशी बढ़वाने, स्टैंप लेने, रिकार्ड निकलवाने जैसे काम बिना रुपए दिए होते ही नहीं। 
समय का फेर कि वे काजी बना दिए गए और कड़ी मेहनत कर सदर काजी भी बन गए। 
एक अखबारनवीस ने अदालती कामों में हो रही रिश्वतखोरी पर लंबा लेख छाप दिया। यह जानकारी मिलते ही सदर काजी का होता जमीर ज़ख़्मी हो गया, फौरन से पेश्तर फतवा जारी कर अखबार को बंद और अखबारनवीस के कैदे-बा-मशक्कत की सजा सुनाकर बचा लिया अपना और अदालत का ईमान।
०००
कार्य शाला साहित्यकार को शब्दों का चयन करते समय सजग होना चाहिए। रचना पूर्ण होने पर भाव, अर्थ, प्रभाव आदि के प्रति सजग रहना चाहिए। कभी कभी अनजाने ही रचना से वह आशय सामने आता है जो रचनाकार कहना नहीं चाहता। निम्न पंक्तियाँ पढ़ें- साईं गुलाब से बगिया महके, दे जाए आनंद, सुख दुख है, जीवन का फेरा, साईं परमानंद प्रथम चरण में दो मात्रा अधिक हैं जिन्हें साई के स्थान पर 'हरि' या 'प्रभु' का प्रयोग कर ठीक किया जा सकता है। कथ्य पर विचार करें। प्रथम पंक्ति में 'दे जाए आनंद' अर्थात आनंद देकर (बगिया चली) जाए, सूख जाए। यह आशय रचनाकार का प्रतीत नहीं होता। यदि 'दे पाए आनंद' कर दिया जाए तो अर्थ यह कि बगिया आनंद दे और स्वयं भी आनंद पाए अर्थात हरी,-भरी रहे इसी तरह तीसरे चरण में 'सुख-दुख है जीवन का फेरा' या 'जीवन है सुख दुख का फेरा'? जीवन में सुख-दुख आते हैं या सुख-दुख में जीवन आता है? इस दृष्टिकोण से विचार करें तो सुख-दुख क्षणिक हैं, जीवन उससे अधिक बड़ा है अगर सृष्टि या प्रभु के संदर्भ में बात हो तो जीवन छोटा है, आ-जा सकता है लेकिन जीवन और सुख-दुख के संदर्भ में जब बात हो तो सुख-दुख की अवधि छोटी होती है जीवन की अवधि बड़ी। यह रचना अपने आप में सरसरी तौर पर पड़ने पर निर्दोष प्रतीत होती है लेकिन मनन करने पर परिस्थिति बदल जाती है। मेरा आशय रचनाकार को हतोत्साहित करना नहीं है, निवेदन सिर्फ यह है कि हम सब रचना करने के बाद उसको स्वयं पढ़ें और प्रकाशन के पूर्व सुधार कर लें। मेरे घनिष्ठ मित्र चंद्र सेन विराट कहा करते थे "सलिल भाई! प्रकाशन के पहले रचनाकार रचना सृष्टि का ब्रह्मा है लेकिन छप जाने के बाद वह सिर्फ आलोचना का पात्र बन सकता है, कोई सुधार नहीं कर सकता।" रचनाकार के नाते मुझसे भी कई बार ऐसी चूक होती है तथापि सजग रहने का प्रयास हम सब करते रहें यही निवेदन है। धन्यवाद।
०००
प्रिय अंशु की ५० वीं सालगिरह पर 
० 
अंशुमान का पचास सोनल किरण कर रहीं अभिनंदन 
ॐ प्रकाश लखे पुष्पा कर, आशा करें तिलक वंदन 
आशुतोष दर पर छवि निरखें, अर्णव लगा रहा चंदन 
श्री-समृद्धि श्रेया-आरोही, गृह बगिया है नंदन वन 

करे मेघना हँस शुभ वर्षण, ऋत्विक अवि कान्हा सरनाम 
कर अभिषेक मुदित मन्वन्तर, नेहा-निशिता तुहिन ललाम 
जुही अर्पिता टीना तनु अंबिका, कुहू-काव्या हुलसित  
भेज साधना सुषमा पूनम शुभाशीष अतिशय हर्षित 

अक्षौहिणी दिया की सज्जित, दें सिद्धार्थ पुलक आशीष 
अतुल प्रसून सलिल करतल ध्वनि, करें मनाएँ शुभ कर ईश
हो हो शतायु सानंद स्वस्थ्य रह, कीर्ति पताका फहराओ 
नेह नर्मदा सुमन-लक्ष्मण, करो नमन आशीष पाओ 
००० 
सॉनेट
पंकज उधास
नाद के अनुपम पुजारी,
वाक् के थे धनी अनुपम,
कीर्ति है दस दिश तुम्हारी,
रेशमी आवाज मद्धम।
मर्म छूते तराने गा,
भा गए माँ शारदा को,
लोक ने तुमको सराहा,
वरा गायन शुद्धता को।
गीत ग़ज़लें भजन गाए,
प्राण फूँके भाव रस भर,
विधाता को खूब भाए,
बुलाया अब सुने जी भर।
नाम पंकज का अमर है,
काम पंकज का अमर है।
२७-२-२०२४
•••
कार्यशाला
एक कुण्डलिया- दो कवि
घाट कुआँ खग मृग जगे,तेरी नींद विचत्र।
देख उठाता तर्जनी, सूरज तुझ पर मित्र। -राजकुमार महोबिया
सूरज तुझ पर मित्र, चढ़ाते जल अंजुरी भर।
नेह नर्मदा सलिल, समर्पित भास्कर भास्वर।।
उजियारो मन-प्राण, प्रकाशित कर घर-बाट।
शत वंदन जग-नाथ, न तम व्यापे घर-घाट।। -संजीव
***
सॉनेट
शारदा
*
हृदय विराजी मातु शारदा
सलिल करे अभिषेक निरंतर
जन्म सफल करता नित यश गा
सुमति मिले विनती सिर, पग धर
वीणा अनहद नाद गुँजाती
भव्य चारुता अनुपम-अक्षय
सातों स्वर-सरगम दे थाती
विद्या-ज्ञान बनाते निर्भय
अपरा-परा नहीं बिसराएँ
जड़-चेतन में तुम ही तुम हो
देख सकें, नित महिमा गाएँ
तुमसे आए, तुममें गुम हों
सरस्वती माँ सरसवती हे!
भव से तार, दिव्य दर्शन दे
४-२-२०२३
•••
पुस्तक परिचय
श्रीमद्भागवत रसामृतम् - सनातन मूल्यों एवं मान्यताओं का कोष
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
[कृति विवरण - श्रीमद्भागवत रसामृतम्, विधा आध्यात्मिक समालोचना, लेखक - व्याकरणाचार्य डॉ. विनोद शास्त्री, आवरण सजिल्द क्लॉथ बाइंडिंग, आकार २५ से.मी. x २१ से.मी., द्वितीय संस्करण बसंत पंचमी २०२१, पृष्ठ संख्या ८००, मूल्य रु ७४०/-, प्रकाशक भागवत पीयूषधाम समिति दिल्ली।]
*
पुस्तकें मनुष्य की श्रेष्ठ मित्र और मार्गदर्शक हैं। मानव जीवन के हर मोड़ पर पुस्तकों की उपादेयता होती है। अधिकांश पुस्तकें जीवन के एक सोपान पर उपयोगी होने के पश्चात् अपनी उपयोगिता खो बैठती हैं किन्तु कुछ पुस्तकें ऐसी भी होती है जो सतत सनातन ज्ञान सलिला प्रवाहित करती हैं। ऐसी पुस्तकें मित्र मात्र नहीं पथ प्रदर्शक और व्यक्तित्व विकासक भी होती हैं। ऐसी ही एक पुस्तक है 'श्रीमद्भागवत रसामृतम्'। वास्तव में यह ग्रंथराज है। महर्षि वेदव्यास द्वारा प्रणीत श्रीमद्भागवत महापुराण पर की कथा को सात भागों में विभाजित कर साप्ताहिक कथा वाचन की उद्देश्य पूर्ति इस ग्रंथ ने की है। ग्रंथकार डॉ. विनोद शास्त्री जी ने श्रीमद्भागवत पर ही शोधोपाधि प्राप्त की है। यह ग्रंथ प्रामाणिक और सरस बन पड़ा है।
ग्रंथारंभ में श्रीगोवर्धन मठ पुरी पीठाधीश्वर श्रीमज्जगद्गुरु स्वामी निश्चलानंद जी सरस्वती आशीष देते हुए लिखते हैं- 'डॉ. विनोद शास्त्री महाभागके द्वारा विरचित श्रीमद्भागवत रसामृतम् (साप्ताहिक कथा) आस्थापूर्वक अध्ययन, अनुशीलन और श्रवण करने योग्य है। श्री शास्त्री जी ने अत्यंत गहन विषय को सरलतम शब्दों में व्यक्त किया है। इस ग्रंथ में शब्द विमर्श सहित तात्विक विवेचन के माध्यम से दार्शनिक भाव व्यक्त किए गए हैं।' रमणरेती गोकुल से जगद्गुरु कार्ष्णि श्री गुरु शरणानंद जी महामंडलेश्वर के शब्दों में - 'ग्रंथ में दुरूह स्थलों एवं प्रसंगों को अत्यंत सरल शब्दों एवं भावों में व्यक्त किया गया है। बीच-बीच में संस्कृत श्लोकों की व्याख्या एवं वैयाकरण सौरभ दृष्टिगोचर होता है। रणचरित मानस एवं भगवद्गीता के उद्धरण देने से ग्रंथ की उपादेयता और भी बढ़ गई है। जगद्गुरु द्वाराचार्य मलूक पीठाधीश्वर श्री राजेंद्रदास जी के अनुसार 'श्री वंशीधरी आदि टीकाओं का भाव, सभी प्रसंगों का सरल तात्विक विवेचन, प्रत्येक स्कंध, अध्याय, प्रमुख श्लोकों का व्याख्यान इस ग्रंथ का अनुपम वैशिष्ट्य है। इस अनुपम ग्रंथ की श्री गोदा हरिदेव पीठाधीश्वर जगद्गुरु देवनारायणाचार्य, स्वामी श्री किशोरीरमणाचार्य जी, मारुतिनन्दन वागीश जी, कृष्णचन्द्र शास्त्री जी जैसे विद्वानों ने भी भूरि-भूरि प्रशंसा की है।
ग्रंथ में श्रीमद्भागवद माहात्म्य के पश्चात् बारह स्कन्धों में कथा का वर्णन है। माहत्म्य के अंतर्गत नाद-भक्ति संवाद, भक्ति का कष्ट विमोचन, गोकर्ण की कथा, धुंधकारी की मुक्ति तथा सप्ताह यज्ञ की विधि वर्णित है। प्रथम स्कंध में भगवद्भक्ति का माहात्म्य, अवतारों का वर्ण, व्यास-नारद संवाद, भागवत रचना, द्रौपदी-सुतों का वध, अश्वत्थामा का मान मर्दन, परीक्षित की रक्षा, भीष्म का देह त्याग, कृष्ण का द्वारका में स्वागत, परीक्षित जन्म, धृतराष्ट्र-गांधारी का हिमालय गमन, परीक्षित राज्याभिषेक, पांडवों का स्वर्ग प्रस्थान, परीक्षित की दिग्विजय, कलियुग का दमन, शृंगी द्वारा शाप तथा शुकदेव द्वारा उपदेश वर्णित हैं। दूसरे स्कंध में ध्यान विधि, विराट स्वरूप, भक्ति माहात्म्य, शुकदेव द्वारा सृष्टि वर्णन, विराट रूप की विभूति का वर्णन, अवतार कथा, ब्रह्मा द्वारा चतुश्लोकी भगवत तथा भागवत के दस लक्षण समाहित हैं। तृतीय स्कंध में उद्धव-विदुर भेंट, कृष्ण की बाल लीला, विदुर - मैत्रेय संवाद, ब्रह्मा की उत्पत्ति, सृष्टि व काल का वर्णन, वाराह अवतार, जय-विजय कथा, हिरण्याक्ष- हिरण्यकशिपु प्रसंग, देवहूति-कर्दम प्रसंग, कपिल जन्म, सांख्ययोग, अष्टांग योग, भक्तियोग आदि प्रसंग हैं। चतुर्थ स्कंध में स्वायंभुव मनु प्रसंग, शंकर-दक्ष प्रसंग, ध्रुव की कथा, वेन, पृथु तथा पुरंजन की कथाओं का विवेचन किया गया है। पंचम स्कंध में प्रियव्रत, आग्नीध्र, नाभि, ऋषभदेव, भारत, राजा रहूगण के प्रसंग, गंगावतरण, भारतवर्ष, षडद्वीप, लोकलोक पर्वत, सूर्य, राहु तथा नरकादि का वर्णन किया गया है। षष्ठ स्कंध में अजामिल आख्यान, नारद-दक्ष प्रसंग, विश्वरूप प्रसंग, दधीचि प्रसंग, वृत्तासुर वध, चित्रकेतु प्रसंग तथा अदिति व दिति प्रसंगों की व्याख्या की गई है।
नारद-युधिष्ठिर संवाद, जय-विजय कथा, हिरण्यकशिपु-प्रह्लाद-नृसिंह प्रसंग, मानव-धर्म, वर्ण-धर्म, स्त्री-धर्म, सन्यास धर्म तथा गृहस्थाश्रम महत्व का वर्णन सप्तम स्कंध में है। आठवें स्तंभ में मन्वन्तरों का वर्णन, गजेंद्र प्रसंग, समुद्र मंथन, शिव द्वारा विष-पान, देवासुर प्रसंग, वामन-बलि प्रसंग तथा मत्स्यावतार की कथा मही गयी है। नौवें स्कंध में वैवस्वत मनु, महर्षि च्यवन, रहा शर्याति, अम्ब्रीश, दुर्वासा, इक्ष्वाकु वंश, मान्धाता, त्रिशंकु, हरिश्चंद्र, सगर, भगीरथ, श्री राम, निमि, चन्द्रवंश, परशुराम, ययाति, पुरु वंश, दुष्यंत, भरत आदि प्रांगण पर प्रकश डाला गया है। दसवें स्कंध के पूर्वार्ध में वासुदेव-देवकी विवाह, श्री कृष्ण जन्म, पूतनादि उद्धार, ब्रह्मा को मोह, कालिय नाग, चीरहरण, गोवर्धन-धारण, रासलीला, अरिष्टासुर वध, कुब्जा पर कृपा, भ्रमर गीत आदि पतसंग हैं। दसवें स्कंध के उत्तरार्ध में जरासंध वध, द्वारका निर्माण, कालयवन-मुचुकुंद प्रसंग, रुक्मिणी से विवाह, प्रद्युम्न जन्म, शंबरासुर वध, जांबवती व सत्यभाभा के साथ विवाह, सीमन्तक हरण. भौमासुर उद्धार, रुक्मि वध, उषा-अनिरुद्ध प्रसंग, श्रीकृष्ण-बाणासुर युद्ध, राजसूय यज्ञ, शिशुपाल उद्धार, शाल्व उद्धार, सुदामा प्रसंग, वसुदेव यज्ञोत्सव, त्रिदेव परीक्षा लीलाविहार आदि प्रसंगों का वर्णन है। ग्यारहवें स्कंध में यदुवंश को ऋषि-शाप, कर्म योग निरूपण, अवतार कथा, अवधूत प्रसंग, भक्ति योग की महिमा, भगवन की विभूतियों का वर्णन, वर्ण धर्म, ज्ञान योग, सांख्य योग, क्रिया योग, परमार्थ निरूपण आदि प्रसंगों का विश्लेषण है। अंतिम बारहवें स्कंध में कलियुग के राजाओं का वर्णन, प्रलय, परीक्षित प्रसंग, अथर्ववेद की शाखाएँ, मार्कण्डेय प्रसंग, श्रीमद्भागवत महिमा आदि का समावेश है।
डॉ. विनोद शास्त्री जी ने श्रीमद्भागवत के विविध प्रसंगों का वर्णन मात्र नहीं किया अपितु उनमें अन्तर्निहित गूढ़ सिद्धांतों, सनातन मूल्यों आदि का सहल-सरल भाषा में सम्यक विश्लेषण भी किया है। श्रीमद्भागवत के हर प्रसंग का समावेश इस ग्रंथ में है। अध्यायों में प्रयुक्त श्लोकों का शब्द विमर्श, पाठक को श्लोक के हर शब्द को समझकर अर्थ ग्रहण करने में सहायक है। शब्द विमर्श में श्लोक का अर्थ, समास, व्युत्पत्ति आदि का अध्ययन कर पाठक अपने ज्ञान, भाषा और अभिव्यक्ति सामर्थ्य की गुणवत्ता वृद्धि कर सकता है। विविध प्रांगण पर प्रकाश डालते समय श्रीमद्भगवतगीता, श्री रामचरित मानस से संबंधित उद्धरणों का समावेश कथ्य के मूलार्थ के साथ-साथ भावार्थ, निहितार्थ को भी समझने में सहायक है। दर्शन के गूढ़ सिद्धांतों को जन सामान्य के लिए सुग्राह्य तथा सहज बोधगम्य बनाने के लिए विनोद जी ने मुख्य आख्यान के साथ-साथ सहायक उपाख्यानों का यथास्थान सटीक प्रयोग किया है। किसी मांगलिक कार्य का श्री गणेश करने के पूर्व ईश वंदना की सनातन परंपरा का पालन करते हुए कृत्यारंभ में मंगलाचरण के अंतर्गत बारह श्लोकों में देव वंदना की गई है। ग्रंथ की श्रेष्ठता का पूर्वानुमान विद्वान् जगद्गुरुओं द्वारा दिए गए शुभाशीष संदेशों से किया जा सकता है।
विनोद जी द्वारा प्रयुक्त शैली के परिचयार्थ स्कंध १, अध्याय ४ से 'विरक्त' का तात्पर्य प्रसंग प्रस्तुत है-
'विष्णो: रक्त: विरक्त:' अर्थात भगवन की भक्ति में अनुरक्त होकर जीवन यापन करो। 'जीवस्यतत्वजिज्ञासा' (भाग. १/२/१०) - जीवन का लक्ष्य है परमात्मा के स्वरूप (तत्व) का ज्ञान करना।
विवेकेन भवत्किं में पुत्रं देहि ब्लादपि।
नोचेत्तयजाम्यहं प्राणांस्त्वदग्रे शोकमूर्छित:।। ३७
आत्मदेव ने कहा- मुझे विवेक से क्या मतलब है? मुझे तो संतान दें। यदि मेरे भाग्य में संतान नहीं है तो अपने भाग्य से दें, नहीं तो मैं शोक मूर्छित हो प्राण त्याग करता हूँ। आत्मदेव - मरने के बाद मेरा पिंडदान कौन करेगा? सन्यासी ने कहा- केवल इतनी सी बात के लिए प्राण त्याग करना चाहते हो। संतान बुढ़ापे में सेवा करेगी, इसकी क्या गारंटी है? आशा ही दुख का कारण है। दशरथ जी के चार पुत्र थे लेकिन अंतिम समय में कोई पास में नहीं था। २० दिन तक तेल की कढ़ाई में शव रखा रहा। इसलिए इस शरीर रूपी पिंड को भगवद्कार्य (सेवा) में समर्पित करो।
उद्धरेदात्म नात्मानं नात्मानमवसादयेत्। (गीता) ६/५
आत्मा से ही आत्मा का उद्धार होगा। याद रखो संतान से तुम्हें सुख मिलनेवाला नहीं है। सन्यासी ने कहा पुत्र ही पिंडदान करेगा, ऐसी आशा छोड़ दो। परमात्मा के अपरोक्ष साक्षात्कार के बिना मुक्ति नहीं मिलती। तमेव विदित्वा अति मृत्युं एति नान्य: पंथा: विद्यते अनयाय। शास्त्रों में कहा है- ऋते ज्ञानान्नमुक्ति: बिना ज्ञान के मुक्ति नहीं मिलती। अपना पिंडदान अपने हाथ से करो। सन्यासी के उपदेश का आत्मदेव के मन पर कोइ प्रभाव नहीं हुआ। तब सन्यासी को ब्राह्मण पर दया आ गई और उन्होंने आम का एक फल आत्मदेव के हाथ में दिया और कहा- जाओ अपनी पत्नी को यह फल खिला दो।
इदं भक्षय पत्न्या त्वं तट: पुत्रो भविष्यति। ४१
सत्यं शौचं दयादानमेकभक्तं तू भोजनम्।। ४२
इस फल के खाने से तुम्हारी स्त्री के गर्भ से एक सुंदर सात्विक स्वभाववाला पुत्र होगा।
वर्षावधि स्त्रिया कार्य तेन पुत्रोsतिनिर्मल:।। ४२
तुम्हारी स्त्री को सत्य, शौच, दया, एक समय नियम लेना होगा। यह कहकर सन्यासी (योगिराज) चले गए। ब्राम्हण ने घर आकर वह फल अपनी पत्नी (धुंधली) के हाथ में दिया और स्वयं किसी कार्यवश बाहर चला गया। कुटिल पत्नी अपनी सखी से रो-रोकर अपनी व्यथा कहने लगी, बोली- फल खाकर गर्भ रहने पर मेरा पेट बढ़ेगा। मैं अस्वस्थ्य हो जाऊँगी। मेरी जैसी कोमल सुकुमार स्त्री से एक वर्ष तक नियम पालन नहीं होगा। उसने उस फल को नहीं खाया, अपने पति से असत्य कह दिया कि मैंने फल खा लिया है।
पत्या पृष्टं फलं भुक्तं चेति तयेरितं। ५०
धुंधली को पुत्र (फल) प्राप्त करने की इच्छा तो है किंतु बिना दुःख झेले। मनुष्य पुण्य करना नहीं, फल भोगना चाहता है। शास्त्र न जानने के कारण धुंधली ने अनर्थ किया। आत्मा पर बुद्धि का वर्चस्व आ जाता है तो सर्वनाश हो जाता है। पत्नी यदि परमात्मा की और चले तो कल्याण होता है।
पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीमं। (दुर्गा सप्तशती)
सरस्वती की कृपा होने पर गृहस्थ को अच्छी पत्नी मिलती है। संतों पर सरस्वती की कृपा होने पर विद्वान बनते हैं। भारतीय पत्नी को पति में ही नारायण के दर्शन होते हैं। पति की सेवा नारायण सेवा ही है। प्रसंग में आगे धुंधकारी कौन है (दार्शनिक भाव), आत्मदेव का चरित्र (दार्शनिक भाव) जोड़ते हुए अंत में धुंधकारी के चरित्र से शिक्षा वर्णित है। विनोद जी ने पौराणिक प्रसंगों को समसामयिक परिस्थितियों और परिवेश से जोड़ते हुए व्यावहारिक उपयोगिता बनाये रखने में सफलता पाई है।
•••
सॉनेट
मानव वह जो कोशिश करता।
कदम-कदम नित आगे बढ़ता।
गिर-गिर, उठ-उठ फिर-फिर चलता।।
असफल होकर वरे सफलता।।
मानव ऐंठे नहीं अकारण।
लड़ बाधा का करे निवारण।
शरणागत का करता तारण।।
संयम-धैर्य करें हँस धारण।।
मानव सुर सम नहीं विलासी।
नहीं असुर सम वह खग्रासी।
कुछ यथार्थ जग, कुछ आभासी।।
आत्मोन्नति हित सदा प्रयासी।।
मानव सलिल-धार सम निर्मल।
करे साधना सतत अचंचल।।
२७-२-२०२२
•••
मुक्तक
हम मतवाले पग पगडंडी पर रख झूमे।
बाधाओं को जय कर लें मंज़िल पग चूमे।।
कंकर को शंकर कर दें हम रखें हौसला-
मेहनत कोशिश लगन साथ ले सब जग घूमे।।
*
मंज़िल की मत फ़िक्र करो हँस कदम बढ़ाओ।
राधा खुद आए यदि तुम कान्हा बन जाओ।।
शिव न उमा के पीछे जाते रहें कर्मरत-
धनुष तोड़ने काबिल हो तो सिय को पाओ।।
*
यायावर राही का राहों से याराना।
बिना रुके आगे, फिर आगे, आगे जाना।।
नई चुनौती नित स्वीकार उसे जय करना-
मंज़िल पर पग धर झट से नव मंज़िल वरना।।
*
काव्य मंजरी छंद राज की जय जय गाए।
काव्य कामिनी अलंकार पर जान लुटाए।।
रस सलिला में नित्य नहा, आनंद पा-लुटा-
मंज़िल लय में विलय हो सके श्वास सिहाए।।
*
मंज़िल से याराना अपना।
हर पल नया तराना अपना।।
आप बनाते अपना नपना।
पूरा करें देख हर सपना।।
२७-२-२०२१
***
छंद सलिला
२९ मात्रिक महायौगिक जातीय, कला त्रयोदशी छंद
*
विधान :
प्रति पद प्रथम / विषम चरण १६ कला (मात्रा)
प्रति पद द्वितीय / सम चरण १३ कला
नामकरण संकेत: कला १६, त्रयोदशी तिथि १३
यति १६ - १३ पर, पदांत गुरु ।
*
लक्षण छंद:
कला कलाधर से गहता जो, शंकर प्रिय तिथि साथी।
सोलह-तेरह पर यति सज्जित, फागुन भंग सुहाती।।
उदाहरण :
शिव आभूषण शशि रति-पति हँस, कला सोलहों धारता।
त्रयोदशी पर व्रत कर चंदा, बाधा-संकट टारता।।
तारापति रजनीश न भूले, शिव सम देव न अन्य है।
कालकूट का ताप हर रहा, शिव सेवा कर धन्य है।।
२२.४.२०१९
*
मुक्तक
सरहद पर संकट का हँसकर, जो करता है सामना।
उसकी कसम तिरंगा कर में, सर कटवाकर थामना।।
बड़ा न कोई छोटा होता, भला-बुरा पहचानना-
वह आदम इंसान नहीं जो, करे किसी का काम ना।।
***
दोहा सलिला
*
नदी नेह की सूखती, धुँधला रहा भविष्य
महाकाल का हो रहा, मानव आप हविष्य
*
दोहा सलिला निर्मला, प्रवहित सतत अखंड
नेह निनादित नर्मदा, रखिए प्रबल प्रचंड
*
कलकल सलिल प्रवाहमय, नदी मिटाती प्यास
अमल विमल जल कमल दल, परिमल हरते त्रास
*
नदी तीर पर सघन वन, पंछी कलरव गान
सनन सनन प्रवहे पवन, पड़े जान में जान
*
नदी न गंदी कीजिए, सविनय करें प्रणाम
मैया कह आशीष लें, स्वर्ग बने भू धाम
*
नदी तीर पर सभ्यता, जन्मे विकसे नित्य
नदी मिटा खुद भी मिटे, अटल यही है सत्य
*
नद निर्झर सर सरोवर, ईश्वर के वरदान
करे नष्ट खुद नष्ट हो, समझ सँभल इंसान
२७-२-२०२०
***
एक रचना
*
जब
जिद, हठधर्मी और
गुंडागर्दी को
मान लिया जाए
एक मात्र राह,
जब
अनदेखी-अनसुनी
बना ली जाए
अंतर्मन की चाह,
तब
विनाश करता है
नंगा नाच
जब
कमर कसकर कोई
दृढ़संकल्पी
उतरता है
जमीन पर,
जब
होता है भरोसा
नायक को
सही दिशा और
गति का
तब
लोगों में सद्भावना
जागती है
भाषणबाज नेताओ
अपने आप पर
शर्म करो
पछताओ
तुम सब सिद्ध हुए
हो नाकारा
और कायर,
अब नहीं है
कोई गाँधी
हम
भारत की संतानें
भाईचारा
मजबूत करें
न डराएँ,
न डरें
राजनीति-दलनीति
जिम्मेदार हैं
दूरियों के लिए
हम बढ़ाएँ
नजदीकियाँ
घृणा की आँधी
रोकें
हमें
अंकित शर्मा के
बलिदान की
कसम है
हम जागें
भड़कानेवाले
नेताओं को
दिखाएँ ठेंगा
देश में कायम करें
अमन-शांति
देश हमारा और
हम देश के हैं
***
कार्यशाला
दोहा से कुंडलिया
*
तुम्हें पुकारे लेखनी, पकड़ नाम की डोर ।
हे बजरंगी जानिए, तिमिर घिरा चहुँ ओर ।। - आशा शैली
तिमिर घिरा चहुँ ओर, हाथ को हाथ न सूझे
दूर निराशा करें, देव! हल अन्य न सूझे
सलिल बुझाने प्यास, तुम्हारे आया द्वारे
आशा कर दो पूर्ण, लेखनी तुम्हें पुकारे - सलिल
*
२७-२-२०२०
***
कार्यशाला
दोहा से कुंडलिया
*
तुम्हें पुकारे लेखनी, पकड़ नाम की डोर ।
हे बजरंगी जानिए, तिमिर घिरा चहुँ ओर ।। - आशा शैली
तिमिर घिरा चहुँ ओर, हाथ को हाथ न सूझे
दूर निराशा करें, देव! हल अन्य न सूझे
सलिल बुझाने प्यास, तुम्हारे आया द्वारे
आशा कर दो पूर्ण, लेखनी तुम्हें पुकारे - सलिल
***
सवैया
विधान : प्रति पद २४ वर्ण, पदांत मगण
*
छंद नहीं स्वच्छंद, नहीं प्रच्छंद सहज छा पाते हैं, मन भाते हैं
सुमन नहीं निर्गंध, लुटाएँ गंध, सु मन मुस्काते हैं, जी जाते हैं
आप करें संतोष, न पाले रोष, न जोड़ें कोष, यहीं रह जाते हैं
छंद मिटाते प्यास, हरें संत्रास, लुटाते हास, होंठ हँस पाते हैं
२७-२-२०२०
***
सावरकर
सावरकर को प्रिय नहीं, रही स्वार्थ अनुरक्ति
उन सा वर कर पंथ हम, करें देश की भक्ति
वीर विनायक ने किया, विहँस आत्म बलिदान
डिगे नहीं संकल्प से, कब चाहा प्रतिदान?
भक्तों! तजकर स्वार्थ हों, नीर-क्षीर वत एक
दोषारोपण बंद कर, हों जनगण मिल एक
मोटी-छोटी अँगुलियाँ, मिल मुट्ठी हों आज
गले लगा-मिल साधिए, सबके सारे काज
२६-२-२०२०
•••
एक रचना
यमराज मिराज ने
*
छोड़ दिए अनलास्त्र
यमराज बने मिराज ने
*
कठपुतली सरकार के
बनकर खान प्रधान
बोल बोलते हैं बड़े,
बुद्धू कहे महान
लिए कटोरा भीख का
साड़ी दुनिया घूम-
पाल रहे आतंक का
हर पगलाया श्वान
भारत से कर शत्रुता
कोढ़ पाल ली खाज ने
छोड़ दिए अनालास्त्र
यमराज बने मिराज ने
*
कोई साथ न दे रहा
रोज खा रहे मार
पाक हुआ दीवालिया
फ़ौज भीरु-बटमार
एटम से धमका रहा
पाकर फिर-फिर मात
पाठ पढ़ा भारत रहा
दे हारों का हार
शांति कपोतों से घिरा
किया समर्पण बाज ने
छोड़ दिए अनालास्त्र
यमराज बने मिराज ने
*
सैबरजेटों को किया
था नैटों ने ढेर
बोफ़ोर्सों ने खदेड़ा
करगिल से बिन देर
पाजी गाजी डुबो दी
सागर में रख याद
छेड़ न, छोड़ेंगे नहीं
अब भारत के शेर
गीदड़भभकी दे रहा
छोड़ दिया क्या लाज ने?
छोड़ दिए अनालास्त्र
यमराज बने मिराज ने
२६-२-२०१९
***
एक गीत
*
सरहद से
संसद तक
घमासान जारी है
*
सरहद पर आँखों में
गुस्सा है, ज्वाला है.
संसद में पग-पग पर
घपला-घोटाला है.
जनगण ने भेजे हैं
हँस बेटे सरहद पर.
संसद में.सुत भेजें
नेता जी या अफसर.
सरहद पर
आहुति है
संसद में यारी है.
सरहद से
संसद तक
घमासान जारी है
*
सरहद पर धांय-धांय
जान है हथेली पर.
संसद में कांव-कांव
स्वार्थ-सुख गदेली पर.
सरहद से देश को
मिल रही सुरक्षा है.
संसद को देश-प्रेम
की न मिली शिक्षा है.
सरहद है
जांबाजी
संसद ऐयारी है
सरहद से
संसद तक
घमासान जारी है
*
सरहद पर ध्वज फहरे
हौसले बुलंद रहें.
संसद में सत्ता हित
नित्य दंद-फंद रहें.
सरहद ने दुश्मन को
दी कड़ी चुनौती है.
संसद को मिली
झूठ-दगा की बपौती है.
सरहद जो
रण जीते
संसद वह हारी है.
सरहद से
संसद तक
घमासान जारी है
२७-२-२०१८
***
एक रचना :
मानव और लहर
*
लहरें आतीं लेकर ममता,
मानव करता मोह
क्षुब्ध लौट जाती झट तट से,
डुबा करें विद्रोह
*
मानव मन ही मन में माने,
खुद को सबका भूप
लहर बने दर्पण कह देती,
भिक्षुक! लख निज रूप
*
मानव लहर-लहर को करता,
छूकर सिर्फ मलीन
लहर मलिनता मिटा बजाती
कलकल-ध्वनि की बीन
*
मानव संचय करे, लहर ने
नहीं जोड़ना जाना
मानव देता गँवा, लहर ने
सीखा नहीं गँवाना
*
मानव बहुत सयाना कौआ
छीन-झपट में ख्यात
लहर लुटाती खुद को हँसकर
माने पाँत न जात
*
मानव डूबे या उतराये
रहता खाली हाथ
लहर किनारे-पार लगाती
उठा-गिराकर माथ
*
मानव घाट-बाट पर पण्डे-
झण्डे रखता खूब
लहर बहाती पल में लेकिन
बच जाती है दूब
*
'नानक नन्हे यूँ रहो'
मानव कह, जा भूल
लहर कहे चंदन सम धर ले
मातृभूमि की धूल
*
'माटी कहे कुम्हार से'
मनुज भुलाये सत्य
अनहद नाद करे लहर
मिथ्या जगत अनित्य
*
'कर्म प्रधान बिस्व' कहता
पर बिसराता है मर्म
मानव, लहर न भूले पल भर
करे निरंतर कर्म
*
'हुईहै वही जो राम' कह रहा
खुद को कर्ता मान
मानव, लहर न तनिक कर रही
है मन में अभिमान
*
'कर्म करो फल की चिंता तज'
कहता मनुज सदैव
लेकिन फल की आस न तजता
त्यागे लहर कुटैव
*
'पानी केरा बुदबुदा'
कह लेता धन जोड़
मानव, छीने लहर तो
डूबे, सके न छोड़
*
आतीं-जातीं हो निर्मोही,
सम कह मिलन-विछोह
लहर, न मानव बिछुड़े हँसकर
पाले विभ्रम -विमोह
२७-२-२०१८
***
नवगीत:
जब तुम आईं
*
कितने रंग
घुले जीवन में
जब तुम आईं।
*
हल्दी-पीले हाथ द्वार पर
हुए सुशोभित।
लाल-लाल पग-चिन्ह धरा को
करें विभूषित।
हीरक लौंग, सुनहरे कंगन
करें विमोहित।
स्वर्ण सलाई ले
दीपक की
जोत मिलाईं।
*
गोर-काले भाल-बाल
नैना कजरारे।
मैया ममता के रंग रंगकर
नजर उतारे।
लिये शरारत का रंग देवर
नकल उतारे।
लिए चुहुल का
रंग, ननदी ने
गजल सुनाईं।
*
माणिक, मूंगा, मोती, पन्ना,
हीरा, नीलम,
लहसुनिया, पुखराज संग
गोमेद नयन नम।
नौरत्नों के नौ रंगों की
छटा हरे तम।
सतरंग साड़ी
नौरंग चूनर
मन को भाईं।
*
विरह-मिलन की धूप-छाँव
जाने कितने रंग।
नाना नाते नये जुड़े जितने
उतने संग।
तौर-तरीके, रीति-रस्म के
नये-नये ढंग।
नीर-क्षीर सी मिलीं, तनिक
पहले सँकुचाईं
२७-२-२०१६
***
*
नवगीत:
.
सूरज
मुट्ठी में लिये,
आया लाल गुलाल.
देख उषा के
लाज से
हुए गुलाबी गाल.
.
महुआ महका,
टेसू दहका,
अमुआ बौरा खूब.
प्रेमी साँचा,
पनघट नाचा,
प्रणय रंग में डूब.
अमराई में,
खलिहानों में,
तोता-मैना झूम
गुप-चुप मिलते,
खुस-फुस करते,
सबको है मालूम.
चूल्हे का
दिल भी हुआ
हाय! विरह से लाल.
कुटनी लकड़ी
जल मरी
सिगड़ी भई निहाल.
सूरज
मुट्ठी में लिये,
आया लाल गुलाल.
देख उषा के
लाज से
हुए गुलाबी गाल.
.
सड़क-इमारत
जीवन साथी
कभी न छोड़ें हाथ.
मिल खिड़की से,
दरवाज़े ने
रखा उठाये माथ.
बरगद बब्बा
खों-खों करते
चढ़ा रहे हैं भाँग.
पीपल भैया
शेफाली को
माँग रहे भर माँग.
उढ़ा
चमेली को रहा,
चम्पा लकदक शाल.
सदा सुहागन
छंद को
सजा रही निज भाल.
सूरज
मुट्ठी में लिये,
आया लाल गुलाल.
देख उषा के
लाज से
हुए गुलाबी गाल.
२६.२.२०१५
***

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2026

फरवरी ६, सोरठा, सॉनेट, लता, सावित्री, गीतिका, तितली, गीत, छंद, उल्लाला, मुक्तक, भाभी,

सलिल सृजन फरवरी ६
गीत
.
गीत हो रहा है
नवगीत सुन दुखी, 
पिता-पुत्र 
सोच भिन्न है... 
जिंदगी भर यह, लिहाज पालता रहा
मन दुखा मसोसकर, कभी न कुछ कहा।
वह प्रगल्भ छोड़कर संकोच जी रहा
कौन-क्या कहे-सुने, न कभी कुछ तहा।
कर न सका मन की
जिस-तिस का ध्यान धर
वह मलंग-मस्त, सब
ठेंगे पे मारकर। 
यह हुआ उदास
खिन्न है।
गीत हो रहा है
नवगीत सुन दुखी, 
पिता-पुत्र 
सोच भिन्न है... 
.
अपनी जमीन से यह रहा जुड़ा
चूपड़ी पराई फेंक, हाथ से छुड़ा।
आसमान का वितान नापे वह रोज
गति क्या कटी पतंग की न करी खोज।
डेटिंग-लिव इन जिए
मन मोड़, तन-मुखी
एक पल उन्नत मुखी
फिर रो अधोमुखी। 
स्वार्थ का सवार
जिन्न है।
गीत हो रहा है
नवगीत सुन दुखी, 
पिता-पुत्र 
सोच भिन्न है... 
६.२.२०२६ 
००० 
कार्यशाला
चित्र पर रचना


माहिया
मन झूम झूम गाना,
कर न मीत चिंता,
कर छप्-छप् सुख पाना।
हाइकु
नील गगन
चाँद-चाँदनी संग
आ पी लें पानी।
दोहा
छप् छपाक् छप् कूद हम, फिर बच्चे हों मीत।
राग-द्वेष से दूर रह, हों सच्चे कर प्रीत।।
सोरठा
बिंब निहारे नीर में, देखे चंदा मुग्ध।
कूद चाँदनी भुज भरे, हो न विरह दिल दग्ध।।
कहमुकरी
हुई लाज से पानी पानी
गगन सुंदरी अनुपम मानी
पीहर आई, पीछे फंदा
प्रेमी बंदा?
ना री! चंदा।
आल्हा
चाँद-चाँदनी रास रचैया, उतर धरा पर नाचें साथ।
सलिल-अंजुरी भर उलीच कर, हर्षित ले हाथों में हाथ।।
नेह नर्मदा नवल बहाएँ, प्रणय ग्रंथ बांँचें हो लीन।
दो थे मिलकर एक हो गए, चाह रहे हो जाएँ तीन।।
चंद्रिका छंद
जल नर्तन कर खुश हुई,
दूर हुई गर्मी मुई।
हँसी खिलखिला चाँदनी।
हूँ न चाँद की बंदिनी।।
रोला
विकल ज्योत्सना कूद, नाचती पीकर पानी।
भुज भर वसुधा मातु, निहारे होकर मानी।।
ले अधरों पर हास, चाँद झुक रूप निहारे।
पिता गगन कर लाड़, सुता पर सब कुछ वारे।।
गीत
छंद - दोहा
पदभार- २४।
यति - १३-११।
पदांत - लघु गुरु।
*
तू चंदा मैं चाँदनी, तेरी-मेरी प्रीत।
युगों-युगों तक रहेगी, अमर रचें कवि गीत।।
*
सपना पाला भगा दें
हम जग से तम दूर।
लोक हितों की माँग हो,
सहिष्णुता सिंदूर।।
अनगिन तारागण बनें,
नभ के श्रमिक-किसान।
श्रम-सीकर वर्षा बने, कोशिश बीज पुनीत।
चल हम चंदा-चाँदनी, रचें अनश्वर रीत।।
*
काम अकाम-सकाम वर,
बन पाएँ निष्काम।
श्वासें अल्प विराम हों,
आसें अर्ध विराम।।
पूर्ण विराम अनाम हो, छोड़ें हम नव नीत।
श्री वास्तव में पा सकें, मन हारें मन जीत।।
*
अमल विमल निर्मल सलिल, छप्-छपाक् संजीव।
शैशव वर वार्धक्य में, हो जाएँ राजीव।।
भू-नभ की कुड़माई हो, भावी बने अतीत।
कलरव-कलकल अमर हो, बन सत स्वर संगीत।।
***
दिव्य नर्मदा.इन - जनवरी में देखी गई १३३१ बार, पाठक शिव दोहे २०७, मालोपमा अलंकार ८५, राम रक्षा स्तोत्र हिंदी काव्यानुवाद ७७।
***
लोकोपयोगी
पपीता खरीदते समय ध्यान रखें
१. पके पपीते पर पीले रंग की धारियाँ हों। पपीते पर पीली या नारंगी धारियां न हों तो वह मीठा नहीं होगा।
२. पपीते की डंडी के आस-पास दबा कर देखें अगर वह दब रहा है तो न खरीदें, फल अंदर से सड़ा य गला होगा।
३. पपीते पर सफेदी (फंगस) हो तो उसे ना खरीदें, यह बीमारी की वजह बन सकता है।
४. पपीते से अगर मीठी खुशबू आ रही है तो वह पका और मीठा होगा।
५. पपीते के छिलके को दबा कर देखें, सख्त हो तो पपीता कच्चा होगा तथा फीका होगा।

पपीते के डंठल वाला स्थान गौर से देखें, यदि वह काला या अधिक गला हुआ अथवा पपीता हल्दी के माफिक पूरा पीला रंग का हो तो भूलकर भी मत लें। आजकल पपीते,आम और केले तरल रसायन से पकाए जाते हैं। यह इतना असरदार होता है कि एक बाल्टी पानी में केवल पाँच बूँद मिलाकर फल या सब्जियाँ डुबा- निकालकर अखबार या बोरी में लपेटकर रखने के पांच घंटों बाद ही कच्चे फलो/सब्जी को पूरा पका देता है, इसकी पहचान यही है कि पूरा फल पूरा एक ही रंग का पीला दिखता है, उसमें हरे रंग का नामोनिशान भी नहीं होता। ऐसे फल देखने में बहुत सुन्दर लगते हैं किन्तु स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है।
***
प्रश्नोत्तर
शादी में जाते वक्त क्या उपहार लेकर जाना चाहिए अपने मेहमानों के लिए अच्छा सा कोई उपाय बताइए ना?
प्रश्न - विवाह के समय उपहार क्या दें ?
उत्तर- पठनीय उपयोगी पुस्तक।

जन्म ब्याह राखी तिलक, गृह प्रवेश त्योहार।
सलिल बचा पौधे लगा, दें पुस्तक उपहार।।

मेरी माताश्री को विवाह के समय मेरे नाना जी रायबहादुर माता प्रयास सिन्हा 'रईस', पूर्व ऑनरेरी मजिस्ट्रेट तथा स्वतंत्रता सत्याग्रही ने कल्याण के महाभारत अंक तथा ताऊ जी धर्म नारायण वर्मा एडवोकेट ने चांदी के पूजा सेट के साथ मानस व गीता भेंट किए थे। शेष उपहार समाप्त हो गए, ये मेरे पास अब तक हैं। विरासत में मेरे नाती-पोतों को मिलेंगे।

मेरे विवाह के समय मिले सैंकड़ों उपहारों में से केवल ३ अब तक सुरक्षित हैं, वे तीनों पुस्तकें हैं।

अपने पुत्र के विवाह के अवसर पर जयमाला के बाद मैंने नव दंपत्ति से अपने लघुकथा संग्रह 'आदमी अब भी जिंदा है' का लोकार्पण कराया।

मेरे साहित्यिक शिष्य डॉ. प्रताप ने अपनी बहिन के विवाह पर नव दंपत्ति से अपने गीत संग्रह का विमोचन कराया।

हम सब इस स्वस्थ्य परंपरा को पुष्ट करें। हमारा अव्यवसायिक प्रकाशन इस हेतु हर तरह से सहयोग करता है। संपर्क ९४२५१८३२४४
***
विमर्श- भाभी 
प्रश्न- एक ओर भाभी को माँ बताया गया है, दूसरी ओर देवर-भाभी के विवाह को मान्य किया गया है। ऐसा क्यों?

उत्तर -  आवश्यकता आविष्कार की जननी है। यह विज्ञान और समाज दोनों के लिए सच है। देवर-भाभी ही नहीं अन्य संबंध भी बहु आयामी हैं। विवाह के पूर्व बाला (वर) के साथ सहबाला (दूल्हे का छोटा भाई ) भी बारात में जाता है, दोनों का स्वागत दरवाजे पर पहले होता है, बाद में अन्य बरातियों का। सहबाला ही विवाह के बाद देवर(द्वि वर अर्थात दूसरा वर) कहा जाता है। भाई की पत्नी उम्र में बहुत बड़ी हो तो माँ के समान, हमउम्र हो तो बहिन की तरह, छोटी हो तो बेटी के सदृश्य। यह मान्यता सामान्य स्थिति के लिए है ताकि पारिवारिक संबंधों में शुचिता तथा शांति बनी रहे। अल्पायु देवर की माँ न रहे तो घर की प्रमुख महिला भाभी देवर-नन्द की देखभाल माँ की तरह ही करती है।  

अगर युवा भाभी शीघ्र विधवा हो जाए तो शेष जीवन अकेले गुजारने में अनेक समस्याओं बच्चों की देख-रेख, खुद की सुरक्षा, आय का साधन, संपत्ति का विभाजन आदि का सामना करना होता है। पूर्व में स्त्रियाँ बहुधा अशिक्षित तथा अजीविकाविहीन होती थी। इसलिए ऐसी स्थिति में देवर-भाभी विवाह को उचित माना गया। चादर उढ़ाना, चूड़ी पहनाना आदि नाम ऐसे संबंध को दिए गए। 

छोटे भाई की पत्नी के साथ जेठ के विवाह को निषिद्ध कहा गया।  श्री राम ने बाली वध को उचित बताते हुए कहा कि उसने छोटे भाई की पत्नी को अपनी पत्नी बना लिया था। श्री राम जिस समाज से थे, वहाँ यह मान्यता थी। आर्यों में सती प्रथा थी, अन्यत्र नहीं। वानर समाज की परंपरा भिन्न थी किन्तु श्री राम ने उसे अधर्म मानकर बाली वाढ में संकोच नहीं किया। 

'अनुज बधू भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी॥
इन्हहि कुदृष्टि बिलोकइ जोई। ताहि बधें कछु पाप न होई॥'

रावण वध के बाद विभीषण-मंदोदरी विवाह को उचित माना गया। इसका कारण यह था कि रक्ष संस्कृति में विधवा विवाह वर्जित नहीं था। रावण, कुम्भ कर्ण तथा मेघनाद आदि के न रहने पर लंका नरेश विभीषण बने किन्तु विभीषण की प्रशासन पर पकड़ कम थी। रावण के पक्षधर विभीषण से घात करते तो वे लंका में शांति कैसे स्थापित कर पाते। देश हित में मंदोदरी ने विभीषण से विवाह को स्वीकृति देकर खुद की और देश की सुरक्षा की। 

लोक में एक कहावत है 'गरीब की लुगाई, गाँव की भौजाई'। यह कहावत निर्धन की पत्नी पर धनवानों द्वारा कुदृष्टि डालने को लेकर बनी है।  
***
सोरठा सलिला
बन जाती है भार, गाड़ी पटरी से उतर।
ढोती रहती भार, रहे जब तक पटरी पर।
चुप रह सह लो पीर, दर्द न कोई बँटाता।
मत हो व्यर्थ अधीर, साथ सभी हों हर्ष में।।
मत करना उपहास, निर्धन-निर्बल का कभी।
मत हों आप उदास, लोग करें उपहास तो।।
तन के भरते घाव, मन के घाव न भर सकें।
व्यर्थ दिखाते ताव, जो वे मान न पा सकें।।
रखें जरा भी फर्क, कथनी-करनी में नहीं।
करिए नहीं कुतर्क, तर्क सम्मत सब मानें।।
६-२-२०२३
•••
सोरठा सलिला

बन जाती है भार, गाड़ी पटरी से उतर।
ढोती रहती भार, रहे जब तक पटरी पर।

चुप रह सह लो पीर, दर्द न कोई बँटाता।
मत हो व्यर्थ अधीर, साथ सभी हों हर्ष में।।

मत करना उपहास, निर्धन-निर्बल का कभी।
मत हों आप उदास, लोग करें उपहास तो।।

तन के भरते घाव, मन के घाव न भर सकें।
व्यर्थ दिखाते ताव, जो वे मान न पा सकें।।

रखें जरा भी फर्क, कथनी-करनी में नहीं।
करिए नहीं कुतर्क, तर्क सम्मत सब मानें।।

६-२-२०२३
•••
सॉनेट
लता

लता ताल की मुरझ सूखती।
काल कलानिधि लूट ले गया।
साथ सुरों का छूट ही गया।।
रस धारा हो विकल कलपती।।
लय हो विलय, मलय हो चुप है।
गति-यति थमकर रुद्ध हुई है।
सुमिर सुमिर सुधि शुद्ध हुई है।।
अब गत आगत तव पग-नत है।।
शारदसुता शारदापुर जा।
शारद से आशीष रही पा।
शारद माँ को खूब रहीं भा।।
हुआ न होगा तुमसा कोई।
गीत सिसकते, ग़ज़लें रोई।
खोकर लता मौसिकी खोई।।
६-२-२०२२
•••
सॉनेट
सावित्री

सावित्री जीती या हारी?
काल कहे क्या?, शीश झुकाए।
सत्यवान को छोड़ न पाए।।
नियति विवशता की बलिहारी।।
प्रेम लगन निस्वार्थ समर्पण।
प्रिय पर खुद को वार दिया था।
निज इच्छा को मार दिया था।।
किया कामनाओं का तर्पण।।
श्वास श्वास के संग गुँथी थी।
आस आस के साथ बँधी थी।
धड़कन जैसे साथ नथी थी।।
अब प्रिय तुममें समा गए हैं।
जग को लगता बिला गए हैं।
तुम्हें पता दो, एक हुए हैं।।
•••
प्रिय बहिन डॉक्टर नीलमणि दुबे प्राण प्रण से तीन दशकीय सेवा करने के बाद भी, अपने सर्वस्व जीवनसाथी को बचा नहीं सकीं। जीवन का पल पल जीवनसाथी के प्रति समर्पित कर सावित्री को जीवन में उतारकर काल को रोके रखा। कल सायंकाल डॉक्टर दुबे नश्वर तन छोड़कर नीलमणि जी से एकाकार हो गए।
मेरा, मेरे परिवार और अभियान परिवार के शत शत प्रणाम।
ओ क्षणभंगुर भव राम राम
***
कृति चर्चा :
एक सूरज मेरे अंदर : भावनाओं का समंदर
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
[कृति विवरण : एक सूरज मेरे अंदर, कविता संग्रह, लक्ष्मी शर्मा, प्रथम संस्करण २००४, ISBN ८१-८१२९-९२५-९, अकार डिमाई, आवरण सजिल्द बहुरंगी, नमन प्रकाशन नई दिल्ली ]
*
मनुष्य संवेदनशील एवं चेतना सम्पन्न प्राणी है। मनुष्य का मन प्रकृति में हो रहे परिवर्तनों से भाव ग्रहण कर, आस-पास होने वाले दु:ख-सुख, आशा-निराशा, प्रेम-घृणा, दया-क्रोध से संवेदित होता है। अनुभूत को अभिव्यक्त करने की प्रवृत्ति सृजन, संचय एवं संवर्द्धन द्वारा साहित्य बनती है। साहित्य का एक अंग कविता है। सुख-दु:ख की भावावेशमयी लयात्मक रचना कविता है। काव्य वह वाक्य रचना है जिससे चित्त किसी रस या मनोवेग से पूर्ण हो अर्थात् वह जिसमें चुने हुए शब्दों के द्वारा कल्पना और मनोवेगों का प्रभाव डाला जाता है। रस गंगाधर में 'रमणीय' अर्थ के प्रतिपादक शब्दों को 'काव्य' कहा गया है। आचार्य कुन्तक ने ‘वक्रोक्ति काव्यजीवितम्’ कहकर कविता को परिभाषित किया है। आचार्य वामन ने रीतिरात्मा काव्यस्य’ रीति के अनुसार रचना को काव्य कहा है। आचार्य विश्वनाथ के अनुसार ‘वाक्यम् रसात्मकम् काव्यम्’ अर्थात् रस युक्त वाक्य ही काव्य है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के मत में “जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, हृदय की इसी मुक्ति साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आई है, उसे कविता कहते है।” मैथ्यू आर्नोल्ड के विचार में- “कविता के मूल में जीवन की आलोचना है।” शैले का मत है “कविता कल्पना की अभिव्यक्ति है।”
एक सूरज मेरे अंदर की कविताएँ भाव प्रधान कवयित्री की हृदयगत अनुभूतियाँ हैं। लक्ष्मी शर्मा जी ने कविता के माध्यम से यथार्थ और कल्पना का सम्यक सम्मिश्रण किया है। उनकी काव्य रचनाएँ छंद पर कथ्य को वरीयता देती हैं। वे समकालिक विसंगतियों और विडंबनाओं से आँखें चार करते हुए प्रश्न करती हैं-
हमने तो गाये थे /गीत प्यार के
नफरत और दुश्मननी के / राग कोई क्यों / आलाप रहा ?
कविता और प्रकृति का साथ चोली-दामन का सा है। कविता में मानविकीकरण मनुष्य के प्रकृति-पुत्र को जगाता है। कवयित्री नदी में अपने आप को रूपांतरित कर नदी की व्यथा-कथा की साक्षी बनती है-
मैं एक नदी हूँ / जब से जन्मी हों / लगातार बाह रही हूँ।
और बहना और बहते रहना / ताकत है मेरी / नियति है मेरी।
'राष्ट्र के आव्हान पर' शीर्षक कविता में सीमा की और जाते हुए सैनिक के मनोभावों का सटीक शब्दांकन है। 'सीमा पर जाते हुए' कविता सैनिक को देखकर देशवासी के मन में उठ रही भावनाओं से लबरेज है। काश होती मैं, आत्म विस्तार, सलाखें, लीक पर चलते हुए, गैस त्रासदी, अडिग आस्था, साथ देते जो मेरा, आतंकवाद, चुनाव आदि रचनाएँ समसामयिक परिवेश और जीवन के विविध प्रसंगों के ताने-बाने बुनते हुए सकारात्मक दृष्टिकोण को सामने रखती हैं।
'गांधारी' कविता में कवयित्री ने एक पौराणिक चरित्र पर प्रश्न उठाये हैं। महाभारत की विभीषिका के लिए गांधारी को जिम्मेदार मानते हुए कवयित्री, नेत्रहीन पति के नेत्र बनने के स्थान पर नेत्रों पर पाती बाँध कर स्वयं भी नेत्रहीनता की स्थिति आमंत्रित करनेवाली गांधारी की लाचारी और कौरवों के दुष्कृत्यों के अन्योन्याश्रित मानती है। उसका मत है की गांधारी खली आँखों देख पाती तो चीरहरण और उसके कारण हुआ युद्ध, न होता।
कितना दयनीय होता है / जो स्वयं दूसरे के / आश्रित हो जाता है
अपनी तीक्ष्ण आँखों से / उस साम्राज्य की / नींव को हिलते देख पातीं
तो सही और गलत का निर्णय ले सकती थीं।
इस संकलन में कवयित्री के विदेश प्रवास से संबंधित कविताएँ उनकी भाव प्रवणता और संवेदनशीलता की बानगी हैं। न्यूयार्क से शारलेट जाते हुए, लॉस बेगास, न्यूयार्क का समुद्री तट 'जॉन्स' आदि रचनाओं में उन स्थानों/स्थलों का मनोरम वर्ण पाठक को आनंदित करता और उन्हें देखने की उत्सुकता जगाता है।
अंतिम रचना 'जो नहीं बदला में' 'कम लिखे से अधिक समझना' की परंपरा का पालन है -
परिवर्तनशील युग में
गतिशील समय में
जो कुछ नहीं बदला
वह है
ईर्ष्या, द्वेष, दुश्मनी
अत्याचार, सामूहिक हत्याएँ
जो युगों युगों से चला आ रहा है
शासन और शोषण
देश बदल गए, शासक बदल गए
पर बेईमानी नहीं बदली
गरीब की गरीबी नहीं बदली।
एक सूरज मेरे अंतर की ये कविताएँ कवयित्री की कारयित्री और भावयित्री प्रतिभा को उद्घाटित कर उन्हें पाठक पंचायत में सशक्त हस्ताक्षर के रूप में स्थापित करती हैं।
***
भजन:
सुन लो विनय गजानन

जय गणेश विघ्नेश उमासुत, ऋद्धि-सिद्धि के नाथ.
हर बाधा हर हर शुभ करें, विनत नवाऊँ माथ..
*
सुन लो विनय गजानन मोरी, सुन लो विनय गजानन.
करो कृपा हो देश हमारा, सुरभित नंदन कानन....
*
करो कृपा आया हूँ देवा, स्वीकारो शत वंदन.
भावों की अंजलि अर्पित है, श्रृद्धा-निष्ठा चंदन..
जनवाणी-हिंदी जगवाणी हो, वर दो मनभावन.
करो कृपा हो देश हमारा, सुरभित नंदन कानन....
*
नेह नर्मदा में अवगाहन, कर हम भारतवासी.
सफल साधन कर पायें,वर दो हे घट-घटवासी.
भारत माता का हर घर हो, शिवसुत! तीरथ पावन.
करो कृपा हो देश हमारा, सुरभित नंदन कानन....
*
प्रकृति-पुत्र बनकर हम मानव, सबकी खुशी मनायें.
पर्यावरण प्रदूषण हरकर, भू पर स्वर्ग बसायें.
रहे 'सलिल' के मन में प्रभुवरश्री गणेश तव आसन.
करो कृपा हो देश हमारा, सुरभित नंदन कानन....
***
नव गीत:

अवध तन,
मन राम हो...
*
आस्था सीता का
संशय का दशानन.
हरण करता है
न तुम चुपचाप हो.
बावरी मस्जिद
सुनहरा मृग- छलावा.
मिटाना इसको कहो
क्यों पाप हो?
उचित छल को जीत
छल से मौन रहना.
उचित करना काम
पर निष्काम हो.
अवध तन,
मन राम हो...
*
दगा के बदले
दगा ने दगा पाई.
बुराई से निबटती
यूँ ही बुराई.
चाहते हो तुम
मगर संभव न ऐसा-
बुराई के हाथ
पिटती हो बुराई.
जब दिखे अंधेर
तब मत देर करना
ढेर करना अनय
कुछ अंजाम
मिटाया क्रूर भ्रम को.
आज फिर संकोच क्यों?
निर्द्वंद बोलो-
सफल कोशिश करी
हरने दीर्घ तम को.
सजा या ईनाम का
भय-लोभ क्यों हो?
फ़िक्र क्यों अनुकूल कुछ
या वाम हो?
अवध तन,
मन राम हो...
***
गीत

निर्झर सम
निर्बंध बहो,
सत नारायण
कथा कहो...
जब से
उजडे हैं पनघट.
तब से
गाँव हुए मरघट.
चौपालों में
हँसो-अहो...
पायल-चूड़ी
बजने दो.
नाथ-बिंदी भी
सजने दो.
पीर छिपा-
सुख बाँट गहो...
अमराई
सुनसान न हो.
कुँए-खेत
वीरान न हो.
धूप-छाँव
मिल 'सलिल' सहो...
***
गीत
एक कोना कहीं घर में, और होना चाहिए...
*
याद जब आये तुम्हारी, सुरभि-गंधित सुमन-क्यारी.
बने मुझको हौसला दे, क्षुब्ध मन को घोंसला दे.
निराशा में नवाशा की, फसल बोना चाहिए.
एक कोना कहीं घर में, और होना चाहिए...
*
हार का अवसाद हरकर, दे उठा उल्लास भरकर.
बाँह थामे दे सहारा, लगे मंजिल ने पुकारा.
कहे- अवसर सुनहरा, मुझको न खोना चाहिए.
एक कोना कहीं घर में, और होना चाहिए...
*
उषा की लाली में तुमको, चाय की प्याली में तुमको.
देख पाऊँ, लेख पाऊँ, दुपहरी में रेख पाऊँ.
स्वेद की हर बूँद में, टोना सा होना चाहिए.
एक कोना कहीं घर में और होना चाहिए...
*
साँझ के चुप झुटपुटे में, निशा के तम अटपटे में.
पाऊँ यदि एकांत के पल, सुनूँ तेरा हास कलकल.
याद प्रति पल करूँ पर, किंचित न रोना चाहिए.
एक कोना कहीं घर में और होना चाहिए...
*
जहाँ तुमको सुमिर पाऊँ, मौन रह तव गीत गाऊँ.
आरती सुधि की उतारूँ, ह्रदय से तुमको गुहारूँ.
स्वप्न में हेरूँ तुम्हें वह नींद सोना चाहिए.
एक कोना कहीं घर में और होना चाहिए...
***
नवगीत:

रूप राशि को
मौन निहारो...
*
पर्वत-शिखरों पर जब जाओ,
स्नेहपूर्वक छू सहलाओ.
हर उभार पर, हर चढ़ाव पर-
ठिठको, गीत प्रेम के गाओ.
स्पर्शों की संवेदन-सिहरन
चुप अनुभव कर निज मन वारो.
रूप राशि को
मौन निहारो...
*
जब-जब तुम समतल पर चलना,
तनिक सम्हलना, अधिक फिसलना.
उषा सुनहली, शाम नशीली-
शशि-रजनी को देख मचलना.
मन से तन का, तन से मन का-
दरस करो, आरती उतारो.
रूप राशि को
मौन निहारो...
*
घटी-गव्ह्रों में यदि उतरो,
कण-कण, तृण-तृण चूमो-बिखरो.
चन्द्र-ज्योत्सना, सूर्य-रश्मि को
खोजो, पाओ, खुश हो निखरो.
नेह-नर्मदा में अवगाहन-
करो 'सलिल' पी कहाँ पुकारो.
रूप राशि को
मौन निहारो...
***
स्मृति दीर्घा:
*
स्मृतियों के वातायन से, झाँक रहे हैं लोग...
*
पाला-पोसा खड़ा कर दिया, बिदा हो गए मौन.
मुझमें छिपे हुए हुए है, जैसे भोजन में हो नौन..
चाहा रोक न पाया उनको, खोया है दुर्योग...
*
ठोंक-ठोंक कर खोट निकली, बना दिया इंसान.
शत वन्दन उनको, दी सीख 'न कर मूरख अभिमान'.
पत्थर परस करे पारस का, सुखमय है संयोग...
*
टाँग मार कर कभी गिराया, छुरा पीठ में भोंक.
जिनने अपना धर्म निभाया, उन्नति पथ को रोक.
उन का आभारी, बचाव के सीखे तभी प्रयोग...
*
मुझ अपूर्ण को पूर्ण बनाने, आई तज घर-द्वार.
कैसे बिसराऊँ मैं उनको, वे मेरी सरकार.
मुझसे मुझको ले मुझको दे, मिटा रहीं हर सोग...
*
बिन शर्तों के नाते जोड़े, दिया प्यार निष्काम.
मित्र-सखा मेरे जो उनको सौ-सौ बार सलाम.
दुःख ले, सुख दे, सदा मिटाए मम मानस के रोग...
*
ममता-वात्सल्य के पल, दे नव पीढी ने नित्य.
मुझे बताया नव रचना से थका न अभी अनित्य.
'सलिल' अशुभ पर जयी सदा शुभ, दे तू भी निज योग...
*
स्मृति-दीर्घा में आ-जाकर, गया पीर सब भूल.
यात्रा पूर्ण, नयी यात्रा में साथ फूल कुछ शूल.
लेकर आया नया साल, मिल इसे लगायें भोग...
***
: एक अगीत :

बिक रहा ईमान है
कौन कहता है कि...
मँहगाई अधिक है?
बहुत सस्ता
बिक रहा ईमान है.
जहाँ जाओगे
सहज ही देख लोगे.
बिक रहा
बेदाम ही इंसान है.
कहो जनमत का
यहाँ कुछ मोल है?
नहीं, देखो जहाँ
भारी पोल है.
कर रहा है न्याय
अंधा ले तराजू.
व्यवस्था में हर कहीं
बस झोल है.
आँख का आँसू,
हृदय की भावनाएँ.
हौसला अरमान सपने
समर्पण की कामनाएँ.
देश-भक्ति, त्याग को
किस मोल लोगे?
कहो इबादत को
कैसे तौल लोगे?
आँख के आँसू,
हया लज्जा शरम.
मुफ्त बिकते
कहो सच है या भरम?
क्या कभी इससे सस्ते
बिक़े होंगे मूल्य.
बिक रहे हैं
आज जो निर्मूल्य?
मौन हो अर्थात
सहमत बात से हो.
मान लेता हूँ कि
आदम जात से हो.
जात औ' औकात निज
बिकने न देना.
मुनाफाखोरों को
अब टिकने न देना.
भाव जिनके अधिक हैं
उनको घटाओ.
और जो बेभाव हैं
उनको बढ़ाओ.
***
नव गीत:

सागर उथला,
पर्वत गहरा...
*
डाकू तो ईमानदार
पर पाया चोर सिपाही.
सौ पाए तो हैं अयोग्य,
दस पायें वाहा-वाही.
नाली का
पानी बहता है,
नदिया का
जल ठहरा.
सागर उथला,
पर्वत गहरा...
*
अध्यापक को सबक सिखाता
कॉलर पकड़े छात्र.
सत्य-असत्य न जानें-मानें,
लक्ष्य स्वार्थ है मात्र.
बहस कर रहा
है वकील
न्यायालय
गूंगा-बहरा.
सागर उथला,
पर्वत गहरा...
*
मना-मनाकर भारत हारा,
लेकिन पाक न माने.
लातों का जो भूत
बात की भाषा कैसे जाने?
दुर्विचार ने
सद्विचार का
जाना नहीं
ककहरा.
सागर उथला,
पर्वत गहरा...
*
नवगीत:
*
हर चहरे पर
नकली चहरा...
*
आँखें रहते
सूर हो गए.
क्यों हम खुद से
दूर हो गए?
हटा दिए जब
सभी आवरण
तब धरती के
नूर हो गए.

रोक न पाया
कोई पहरा.
हर चहरे पर
नकली चहरा...
*
भूत-अभूत
पूर्व की वर्चा.
भूल करें हम
अब की अर्चा.
चर्चा रोकें
निराधार सब.
हो न निरुपयोगी
कुछ खर्चा.

मलिन हुआ जल
जब भी ठहरा.
हर चहरे पर
नकली चहरा...
*
कथनी-करनी में
न भेद हो.
जब गलती हो
तुरत खेद हो.
लक्ष्य देवता के
पूजन हित-
अर्पित अपना
सतत स्वेद हो.

उथलापन तज
हो मन गहरा.
हर चहरे पर
नकली चहरा...
***
नवगीत:

काया माटी,
माया माटी,
माटी में-
मिलना परिपाटी...
*
बजा रहे
ढोलक-शहनाई,
होरी,कजरी,
फागें, राई,
सोहर गाते
उमर बिताई.
इमली कभी
चटाई-चाटी...
*
आडम्बर करना
मन भाया.
खुद को खुद से
खुदी छिपाया.
पाया-खोया,
खोया-पाया.
जब भी दूरी
पाई-पाटी...
*
मौज मनाना,
अपना सपना.
नहीं सुहाया
कोई नपना.
निजी हितों की
माला जपना.
'सलिल' न दांतों
रोटी काटी...
*
चाह बहुत पर
राह नहीं है.
डाह बहुत पर
वाह नहीं है.
पर पीड़ा लख
आह नहीं है.
देख सचाई
छाती फाटी...
*
मैं-तुम मिटकर
हम हो पाते.
खुशियाँ मिलतीं
गम खो जाते.
बिन मतलब भी
पलते नाते.
छाया लम्बी
काया नाटी...
***
नवगीत / भजन:

जाग जुलाहे!
भोर हो गयी...
आशा-पंछी चहक रहा है.
सुमन सुरभि ले महक रहा है..
समय बीतते समय न लगता.
कदम रोक, क्यों बहक रहा है?
संयम पहरेदार सो रहा-
सुविधा चतुरा चोर हो गयी.
जाग जुलाहे!
भोर हो गयी...
*
साँसों का चरखा तक-धिन-धिन.
आसों का धागा बुन पल-छिन..
ताना-बाना, कथनी-करनी-
बना नमूना खाने गिन-गिन.
ज्यों की त्यों उजली चादर ले-
मन पतंग, तन डोर हो गयी.
जाग जुलाहे!
भोर हो गयी...
*
रीते हाथों देख रहा जग.
अदना मुझको लेख रहा जग..
मन का मालिक, रब का चाकर.
शून्य भले अव्रेख रहा जग..
उषा उमंगों की लाली संग-
संध्या कज्जल-कोर हो गयी.
जाग जुलाहे!
भोर हो गयी
***
दोहा गीतिका
*
तुमको मालूम ही नहीं शोलों की तासीर।
तुम क्या जानो ख्वाब की कैसे हो ताबीर?

बहरे मिलकर सुन रहे गूँगों की तक़रीर।
बिलख रही जम्हूरियत, सिसक रही है पीर।

दहशतगर्दों की हुई है जबसे तक्सीर
वतनपरस्ती हो गयी खतरनाक तक्सीर।

फेंक द्रौपदी खुद रही फाड़-फाड़ निज चीर।
भीष्म-द्रोण-कान्हा मिले, घूरें पांडव वीर।

हिम्मत मत हारें- करें, सब मिलकर तदबीर।
प्यार-मुहब्बत ही रहे, मजहब की तफसीर।

सपनों को साकार कर, धरकर मन में धीर।
हर बाधा-संकट बने, पानी की प्राचीर।

हिंद और हिंदी करे, दुनिया को तन्वीर।
बेहतर से बेहतर बने, इन्सां की तस्वीर।

हाय! सियासत रह गई, सिर्फ स्वार्थ-तज़्वीर।
खिदमत भूली, कर रही बातों की तब्ज़ीर।

तरस रहा मन 'सलिल', दे वक़्त एक तब्शीर।
शब्दों के आगे झुके, जालिम की शमशीर।
***
तासीर = असर/ प्रभाव, ताबीर = कहना, तक़रीर = बात/भाषण, जम्हूरियत = लोकतंत्र, दहशतगर्दों = आतंकवादियों, तकसीर = बहुतायत, वतनपरस्ती = देशभक्ति, तकसीर = दोष/अपराध, तदबीर = उपाय, तफसीर = व्याख्या, तनवीर = प्रकाशित, तस्वीर = चित्र/छवि, ताज्वीर = कपट, खिदमत = सेवा, कौम = समाज, तब्जीर = अपव्यय, तब्शीर = शुभ-सन्देश, ज़ालिम = अत्याचारी, शमशीर = तलवार..
गीतिका
तितलियाँ
*
यादों की बारात तितलियाँ.
कुदरत की सौगात तितलियाँ..
बिरले जिनके कद्रदान हैं.
दर्द भरे नग्मात तितलियाँ..
नाच रहीं हैं ये बिटियों सी
शोख-जवां ज़ज्बात तितलियाँ..
बद से बदतर होते जाते.
जो, हैं वे हालात तितलियाँ..
कली-कली का रस लेती पर
करें न धोखा-घात तितलियाँ..
हिल-मिल रहतीं नहीं जानतीं
क्या हैं शाह औ' मात तितलियाँ..
'सलिल' भरोसा कर ले इन पर
हुईं न आदम-जात तितलियाँ..
६-२-२०२१
***
कुण्डलिया
जगवाणी हिंदी नमन, नम न मातु कर नैन
न मन सुतों की जिह्वा है, आंग्ल हेतु बेचैन
आंग्ल हेतु बेचैन, नहीं जो तुझे चाहते
निज भविष्य को मातु, आप हो भ्रमित दाहते
ममी डैड सुन कुपित, न वर दें वीणापाणी
नमन मातु शत बार, उर बसो हे जगवाणी
*
६-२-२०२०
***
सोरठे
दिल मिल हुआ गुलाल, हाथ मिला, ऑंखें मिलीं।
अनगिन किए सवाल, फूल-शूल से धूल ने।।
*
खूब लिख रहे छंद, चैन बिना बेचैन जी।
कल न कला स्वच्छंद , कलाकंद आनंद दे।।
*
कल पर पल-पल शेर, बेकल बे-कल लिख रहे।
करे देर अंधेर, आज कहे कल का पता।।
६-२-२०१८
***

दस मात्रिक छंद
१. पदादि यगण
सुनो हे धनन्जय!
हुआ है न यह जग
किसी का कभी भी।
तुम्हारा, न मेरा
करो मोह क्यों तुम?
तजो मोह तत्क्षण।
न रिश्ते, न नाते
हमेशा सुहाते।
उठाओ धनुष फिर
चढ़ा तीर मारो।
मरे हैं सभी वे
यहाँ हैं खड़े जो
उठो हे परन्तप!
*
२. पदादि मगण
सूनी चौपालें
सूना है पनघट
सूना है नुक्कड़
जैसे हो मरघट
पूछें तो किससे?
बूझें तो कैसे?
बोया है जैसा
काटेंगे वैसा
नाते ना पाले
चाहा है पैसा
*
३. पदादि तगण
चाहा न सायास
पाया अनायास
कैसे मिले श्वास?
कैसे मिले वास?
खोया कहाँ नेह?
खोया कहाँ हास?
बाकी रहा द्वेष
बाकी रहा त्रास
होगा न खग्रास
टूटी नहीं आस
ऊगी हरी घास
भौंरा-कली-रास
होता सुखाभास
मौका यही ख़ास
*
४. पदादि रगण
वायवी सियासत
शेष ना सिया-सत
वायदे भुलाकर
दे रहे नसीहत
हो रही प्रजा की
व्यर्थ ही फजीहत
कुद्ध हो रही है
रोकिए न, कुदरत
फेंकिए न जुमले
हो नहीं बगावत
भूलिए अदावत
बेच दे अदालत
कुश्तियाँ न असली
है छिपी सखावत
*
५. पदादि जगण
नसीब है अपना
सलीब का मिलना
न भोर में उगना
न साँझ में ढलना
हमें बदलना है
न काम का नपना
भुला दिया जिसको
उसे न तू जपना
हुआ वही सूरज
जिसे पड़ा तपना
नहीं 'सलिल' रुकना
तुझे सदा बहना
न स्नेह तज देना
न द्वेष को तहना
*
६. पदादि भगण
बोकर काट फसल
हो तब ख़ुशी प्रबल
भूल न जाना जड़
हो तब नयी नसल
पैर तले चीटी
नाहक तू न मसल
रूप नहीं शाश्वत
चाह न पाल, न ढल
रूह न मरती है
देह रही है छल
तू न 'सलिल' रुकना
निर्मल देह नवल
*
७. पदादि नगण
कलकल बहता जल
श्रमित न आज न कल
रवि उगता देखे
दिनकर-छवि लेखे
दिन भर तपता है
हँसकर संझा ढल
रहता है अविचल
रहता चुप अविकल
कलकल बहता जल
नभचर नित गाते
तनिक न अलसाते
चुगकर जो लाते
सुत-सुता-खिलाते
कल क्या? कब सोचें?
कलरव कर हर पल
कलरव सुन हर पल
कलकल बहता जल
नर न कभी रुकता
कह न सही झुकता
निज मन को ठगता
विवश अंत-चुकता
समय सदय हो तो
समझ रहा निज बल
समझ रहा निर्बल
कलकल बहता जल
*
८. पदादि सगण
चल पंछी उड़ जा
जब आये तूफां
जब पानी बरसे
मत नादानी कर
मत यूँ तू अड़ जा
पहचाने अवसर
फिर जाने क्षमता
जिद ठाने क्यों तू?
झट पीछे मुड़ जा
तज दे मत धीरज
निकलेगा सूरज
वरने निज मंजिल
चटपट हँस बढ़ जा
***
सामयिक गीत :
काम तुम्हारा
*
हम न चलने देंगे
लेकिन
काम तुम्हारा देश चलाना
*
हम जो जी चाहें करें
कोई न सकता रोक
पग-पग पर टोंकें तुम्हें
कोई न सकता टोंक
तुमसे इज्जत चाहते
तुम्हें भाड़ में झोंक
हम न निभाने देंगे
लेकिन
काम तुम्हारा साथ निभाना
*
बढ़ा रहे तुम हाथ या
झुका रहे हो माथ
वादा कर कर भुलाएँ
कभी न देंगे साथ
तुम बोलोगे 'पथ' अगर
हम बोलेंगे 'पाथ'
हम न बनाने देंगे
लेकिन काम तुम्हारा राह बनाना
*
सीधी होती है कभी
क्या कुत्ते की दुम?
क्या नादां यह मानता
अकल हुई है गुम?
हमें शत्रु से भी बड़े
शत्रु लग रह तुम
हम न उठाने देंगे
लेकिन
काम तुम्हारा देश उठाना
६-२-२०१६
***
बाल गीत:
"कितने अच्छे लगते हो तुम "
*
कितने अच्छे लगते हो तुम |
बिना जगाये जगते हो तुम ||
नहीं किसी को ठगते हो तुम |
सदा प्रेम में पगते हो तुम ||
दाना-चुग्गा मंगते हो तुम |
चूँ-चूँ-चूँ-चूँ चुगते हो तुम ||
आलस कैसे तजते हो तुम?
क्या प्रभु को भी भजते हो तुम?
चिड़िया माँ पा नचते हो तुम |
बिल्ली से डर बचते हो तुम ||
क्या माला भी जपते हो तुम?
शीत लगे तो कँपते हो तुम?
सुना न मैंने हँसते हो तुम |
चूजे भाई! रुचते हो तुम |
***
अभिनव प्रयोग-
उल्लाला मुक्तक:
*
उल्लाला है लहर सा,
किसी उनींदे शहर सा.
खुद को खुद दोहरा रहा-
दोपहरी के प्रहर सा.
*
झरते पीपल पात सा,
श्वेत कुमुदनी गात सा.
उल्लाला मन मोहता-
शरतचंद्र मय रात सा..
*
दीप तले अँधियार है,
ज्यों असार संसार है.
कोशिश प्रबल प्रहार है-
दीपशिखा उजियार है..
*
मौसम करवट बदलता,
ज्यों गुमसुम दिल मचलता.
प्रेमी की आहट सुने -
चुप प्रेयसी की विकलता..
*
दिल ने करी गुहार है,
दिल ने सुनी पुकार है.
दिल पर दिलकश वार या-
दिलवर की मनुहार है..
*
शीत सिसकती जा रही,
ग्रीष्म ठिठकती आ रही.
मन ही मन में नवोढ़ा-
संक्रांति कुछ गा रही..
*
श्वास-आस रसधार है,
हर प्रयास गुंजार है.
भ्रमरों की गुन्जार पर-
तितली हुई निसार है..
*
रचा पाँव में आलता,
कर-मेंहदी पूछे पता.
नाम लिखा छलिया हुआ-
कहो कहाँ-क्यों लापता?
*
वह प्रभु तारणहार है,
उस पर जग बलिहार है.
वह थामे पतवार है.
करता भव से पार है..
६-२-२०१३
***
नवगीत / भजन:
*
जाग जुलाहे!
भोर हो गई
*
आशा-पंछी चहक रहा है.
सुमन सुरभि ले महक रहा है..
समय बीतते समय न लगता.
कदम रोक, क्यों बहक रहा है?
संयम पहरेदार सो रहा-
सुविधा चतुरा चोर हो गयी.
जाग जुलाहे!
भोर हो गई
*
साँसों का चरखा तक-धिन-धिन.
आसों का धागा बुन पल-छिन..
ताना-बाना, कथनी-करनी-
बना नमूना खाने गिन-गिन.
ज्यों की त्यों उजली चादर ले-
मन पतंग, तन डोर हो गयी.
जाग जुलाहे!
भोर हो गई
*
रीते हाथों देख रहा जग.
अदना मुझको लेख रहा जग..
मन का मालिक, रब का चाकर.
शून्य भले अव्रेख रहा जग..
उषा उमंगों की लाली संग-
संध्या कज्जल-कोर हो गयी.
जाग जुलाहे!
भोर हो गई
***
नवगीत:
*
हर चहरे पर
नकली चहरा...
*
आँखें रहते
सूर हो गए.
क्यों हम खुद से
दूर हो गए?
हटा दिए जब
सभी आवरण
तब धरती के
नूर हो गए.
रोक न पाया
कोई पहरा.
हर चहरे पर
नकली चहरा...
*
भूत-अभूत
पूर्व की वर्चा.
भूल करें हम
अब की अर्चा.
चर्चा रोकें
निराधार सब.
हो न निरुपयोगी
कुछ खर्चा.
मलिन हुआ जल
जब भी ठहरा.
हर चहरे पर
नकली चहरा...
*
कथनी-करनी में
न भेद हो.
जब गलती हो
तुरत खेद हो.
लक्ष्य देवता के
पूजन हित-
अर्पित अपना
सतत स्वेद हो.
उथलापन तज
हो मन गहरा.
हर चहरे पर
नकली चहरा...
*
***
नवगीत:
*
काया माटी,
माया माटी,
माटी में-
मिलना परिपाटी...
*
बजा रहे
ढोलक-शहनाई,
होरी, कजरी,
फागें, राई,
सोहर गाते
उमर बिताई.
इमली कभी
चटाई-चाटी...
*
आडम्बर करना
मन भाया.
खुद को खुद से
खुदी छिपाया.
पाया-खोया,
खोया-पाया.
जब भी दूरी
पाई-पाटी...
*
मौज मनाना,
अपना सपना.
नहीं सुहाया
कोई नपना.
निजी हितों की
माला जपना.
'सलिल' न दांतों
रोटी काटी...
*
चाह बहुत पर
राह नहीं है.
डाह बहुत पर
वाह नहीं है.
पर पीड़ा लख
आह नहीं है.
देख सचाई
छाती फाटी...
*
मैं-तुम मिटकर
हम हो पाते.
खुशियाँ मिलतीं
गम खो जाते.
बिन मतलब भी
पलते नाते.
छाया लम्बी
काया नाटी...
***
सामयिक दोहे
रश्मि रथी की रश्मि के, दर्शन कर जग धन्य.
तुम्हीं चन्द्र की ज्योत्सना, सचमुच दिव्य अनन्य..
राज सियारों का हुआ, सिंह का मिटा भविष्य.
लोकतंत्र के यज्ञ में, काबिल हुआ हविष्य..
कहता है इतिहास यह, राक्षस थे बलवान.
जिसने उनको मिटाया, वे सब थे इंसान..
इस राक्षस राठोडड़ का होगा सत्यानाश.
साक्षी होंगे आप-हम, धरती जल आकाश..
नारायण के नाम पर, सचमुच लगा कलंक.
मैली चादर हो गई, चुभा कुयश का डंक..
फँसे वासना पंक में, श्री नारायण दत्त.
जैसे मरने जा रहा, कीचड़ में गज मत्त.
कीचड़ में गज मत्त, लाज क्यों इन्हें न आयी.
कभी उठाई थी चप्पल. अब चप्पल खाई..
***
: सामयिक गीत :
बिक रहा ईमान है
*
कौन कहता है कि...
मँहगाई अधिक है?
बहुत सस्ता
बिक रहा ईमान है.
जहाँ जाओगे
सहज ही देख लोगे.
बिक रहा
बेदाम ही इंसान है.
कहो जनमत का
यहाँ कुछ मोल है?
नहीं, देखो जहाँ
भारी पोल है.
कर रहा है न्याय
अंधा ले तराजू.
व्यवस्था में हर कहीं
बस झोल है
आँख का आँसू,
हृदय की भावनाएँ.
हौसला अरमान सपने
समर्पण की कामनाएँ.
देश-भक्ति, त्याग को
किस मोल लोगे?
कहो इबादत को
कैसे तौल लोगे?
आँख के आँसू,
हया लज्जा शरम.
मुफ्त बिकते
कहो सच है या भरम?
क्या कभी इससे सस्ते
बिक़े होंगे मूल्य
बिक रहे हैं
आज जो निर्मूल्य?
मौन हो अर्थात
सहमत बात से हो.
मान लेता हूँ कि
आदम जात से हो.
जात औ' औकात निज
बिकने न देना.
मुनाफाखोरों को
अब टिकने न देना.
भाव जिनके अधिक हैं
उनको घटाओ.
और जो बेभाव हैं
उनको बढ़ाओ.
***
नवगीत
चले श्वास-चौसर पर...
आसों का शकुनी नित दाँव.
मौन रो रही कोयल,
कागा हँसकर बोले काँव...
*
संबंधों को अनुबंधों ने
बना दिया बाज़ार.
प्रतिबंधों के धंधों के
आगे दुनिया लाचार.
कामनाओं ने भावनाओं को
करा दिया नीलम.
बद को अच्छा माने दुनिया
कहे बुरा बदनाम.
ठंडक देती धूप
तप रही बेहद कबसे छाँव...
*
सद्भावों की सती नहीं है,
राजनीति रथ्या.
हरिश्चंद्र ने त्याग सत्य
चुन लिया असत मिथ्या.
सत्ता शूर्पनखा हित लड़ते.
हाय! लक्ष्मण-राम.
खुद अपने दुश्मन बन बैठे
कहें विधाता वाम.
भूखे मरने शहर जा रहे
नित ही अपने गाँव...
*
'सलिल' समय पर
न्याय न मिलता,
देर करे अंधेर.
मार-मारकर बाज खा रहे
कुर्सी बैठ बटेर.
बेच रहे निष्ठाएँ अपनी
पल में लेकर दाम.
और कह रहे हैं संसद में
'भला करेंगे राम.'
अपने हाथों तोड़-खोजते
कहाँ खो गया ठाँव?...
***
खबरदार कविता
राज को पाती:
भारतीय सब एक हैं, राज कौन है गैर?
महाराष्ट्र क्यों राष्ट्र की, नहीं चाहता खैर?
कौन पराया तू बता?, और सगा है कौन?
राज हुआ नाराज क्यों ख़ुद से?रह अब मौन.
उत्तर-दक्षिण शीश-पग, पूरब-पश्चिम हाथ.
ह्रदय मध्य में ले बसा, सब हों तेरे साथ.
भारत माता कह रही, सबका बन तू मीत.
तज कुरीत, सबको बना अपना, दिल ले जीत.
सच्चा राजा वह करे जो हर दिल पर राज.
‘सलिल’ तभी चरणों झुकें, उसके सारे ताज.
६-२-२०१०

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

२८ फरवरी,राम किंकर,सॉनेट,मुक्तक,मौली,बुंदेली, सरस्वती,हास्य,मुक्तिका, सुमित्र

सृजन २८ फरवरी
*
स्मरण युग तुलसी ३
आरती
आरती करें गुरुवर की करें, हनुमंत संग रघुवर की।
आरती करें गुरुवर की...
जन्म नर्मदा तट पर पाया, हनुमत ने आ पंथ दिखाया।
सिया-राम गुण निशि-दिन गाया, बंधन कोई रोक न पाया।।
सफल साधना पूर्ण कामना मिली कृपा शंकर की।
आरती करो गुरुवर की...
नाम राम किंकर शुभ पाया, तुलसी मानस हृदय बसाया।
शब्द-शब्द का अर्थ बताया, जन-गण पग-रज पाने धाया।
भिन्न राम ना, अलग श्याम ना, ऐक्य दृष्टि सुंदर की।
आरती करो गुरुवर की...
आत्मजयी सुत प्रभु मन भाया, प्रवचन सुनने पास बुलाया।
अवधपुरी प्रभुधाम सुहाया, आत्मदेव परमात्म मिलाया।
पुण्य पावना भक्ति भावना, युगतुलसी मनहर की।
आरती करो गुरुवर की...
२८.२.२०२४
•••
सॉनेट
माणिक जब बन गया मुसाफिर
मिला जवाहर तरुण अचानक
कृष्ण पथिक कर पकड़े फिर-फिर
दे गोपाल मधुर छवि अनथक
रोटी-कमल द्वार पर सोहे
हेमलता का मधुर हास जब
संगीता होकर मन मोहे
नवनीता अस्मिता आस तब
आस्था के शतदल शत महके
यादों के पलाश हँसते हैं
मिल यात्राओं की तलाश में
ज्वाल गीत गा पग बढ़ते हैं
तमसा के दिन करो नमन
तमसा के दिनकरो नमन
●●●
मुक्तक
जय जयंत की बोलिए जय का कभी न अंत हो
बन बसंत हँस डोलिए रंग कुसुम्बी संत हो
बरस बरस रस कह रहा तरस नहीं डूब जा
बाहर क्यों खोजता है विदेह देह-कन्त हो
●●●
पद
मौली पा मयूर मन नाचे
करे अर्चना मीरा मधु निशि, कांत कल्पना क्षिप्रा बाँचे
सदा शुभागत हो प्रबोध, पंकज पीयूष पान कर छककर
हो सुरेश शशिकांत तथागत, तरुणा अरुणा रुके न थककर
नमन शिवानी विहँस प्रियंका, गरिमा करतल ध्वनि कर साँचे
मौली पा मयूर मन नाचे
●●●
बुंदेली सारद वंदना
सारद माँ! परनाम हमाओ।
नैया पार लगा दे रे।।
मूढ़ मगज कछु सीख नें पाओ।
तन्नक सीख सिखा दे रे।।
माई! बिराजीं जा परबत पै।
मैं कैसउ चढ़ पाऊँ ना।।
माई! बिराजीं स्याम सिला मा।
मैं मूरत गढ़ पाऊँ ना।।
ध्यान धरूँ आ दरसन देओ।
सुन्दर छबि दिखला दे रे।।
सारद माँ! परनाम हमाओ।
नैया पार लगा दे रे।।
मैया आखर मा पधराई।
मैं पोथी पढ़ पाऊँ ना।
मन मंदिर मा माँ पधराओ
तबआगे बढ़ पाऊँ ना।।
थाम अँगुरिया राह दिखाखें ।
मंज़िल तक पहुँचा दे रे।।
सारद माँ! परनाम हमाओ।
नैया पार लगा दे रे।।
●●●
सॉनेट
चूहे को पंजे में दाब शेर मुस्काए।
चीं-चीं कर चूहा चाहे निज जान बचाए।
शांति वार्ता का नाटक जग के मन भाए।।
बंदर झूल शाख पर जय-जयकार गुँजाए।।
'भैंस उसी की जिसकी लाठी' अटल सत्य है।
'माइट इज राइट' निर्बल ही पीटता आया।
महाबली जो करे वही होता सुकृत्य है।।
मानव का इतिहास गया है फिर दुहराया।।
मनमानी को मन की बात बताते नेता।
देश नहीं दल की जय-जय कर चमचे पाले।
जनवाणी जन की बातों पर ध्यान न देता।।
गुटबंदी सीता को दोषी बोल निकाले।।
निज करनी पर कहो बेशरम कब शरमाए।
चूहे को पंजे में दाब शेर मुस्काए।।
२८-२-२०२२
●●●
मुक्तिका
*
इसने मारा, उसने मारा
इंसानों को सबने मारा
हैवानों की है पौ बारा
शैतानों का जै-जैकारा
सरकारों नें आँखें मूँदीं
टी वी ने मारा चटखारा
नफरत द्वेष घृणा का फोड़ा
नेताओं ने मिल गुब्बारा
आम आदमी है मुश्किल में
खासों ने खुद को उपकारा
भाषणबाजों लानत तुम पर
भारत माता ने धिक्कारा
हाथ मिलाओ, गले लगाओ
अब न बहाओ आँसू खारा
२८-२-२०२०
●●●

गुरुवार, 29 जनवरी 2026

२९ जनवरी, लक्ष्मी सूक्त, सोरठा, नर्मदा, आंकिक उपमान, लघुकथा, देव , गीत, गाँधी , मुक्तक

 सलिल सृजन २९ जनवरी

बीजयुक्त लक्ष्मी सूक्त- सूत्र १५
ॐ वं श्रीं वं ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं गृह गृहलक्ष्म्ये स्वाहा श्री ॐ
या सा पदमासनस्या विपुल कटि तटी पदम्पत्रायताक्षी!
गंभीरा वर्तनाभिस्तनधनन मिता शुक्ल वक्त्रोत्तरीया!!
ॐ वं श्रीं वं ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं गृह गृहलक्ष्म्ये स्वाहा श्री ॐ
***
सोरठा सलिला
अमला-धवला धार, रूपवती लावण्यमय।
सुर-नर चकित निहार, दिव्य नर्मदा द्रुत बहे।।
*
शंकर सके तराश, कंकर-कंकर नर्मदा।
पूजो रख विश्वास, नर्मदेश्वर शिव सदा।।
*
वंशलोचनी परी, नन्हीं ठिठक-मचल रही।
अमरकंटकी खरी, कूद-फाँदकर हँस पड़ी।।
*
रुद्रात्मजा प्रशांत, कलकल गाती गीत नित।
होती नहीं अशांत, जो चाहे ले जीत वह।।
*
मेकलसुता अनन्य, छह-छपाक निर्झर नहा।
हिरणी चपला वन्य, खुद पर खुद ही रीझती।।
*
पद्म पुष्प ले गोद, विहँस बालुकावाहिनी।
निर्झर सह आमोद, करती मकरासीन हो।।
*
अतुल रूप-सौंदर्य, जनहितकारी नर्मदा।
अद्भुत है औदार्य, है जगमाता वर्मदा।।
२९-१-२०२३
***
आंकिक उपमान और छंद शास्त्र :
*
छंद शास्त्र में मात्राओं या वर्णों संकेत करते समय ग्रन्थों में आंकिक शब्दों का प्रयोग किया गया है। ऐसे कुछ शब्द नीचे सूचीबद्ध किये गये हैं। इनके अतिरिक्त आपकी जानकारी में अन्य शब्द हों तो कृपया, बताइये।
क्या नवगीतों में इन आंकिक प्रतिमानों का उपयोग इन अर्थों में किया जाना उचित होगा?
*
एक - ॐ, परब्रम्ह 'एकोsहं द्वितीयोनास्ति', क्षिति, चंद्र, भूमि, नाथ, पति, गुरु।
पहला - वेद ऋग्वेद, युग सतयुग, देव ब्रम्हा, वर्ण ब्राम्हण, आश्रम: ब्रम्हचर्य, पुरुषार्थ अर्थ,
इक्का, एकाक्षी काना, एकांगी इकतरफा, अद्वैत, एकत्व,
दो - देव: अश्विनी-कुमार। पक्ष: कृष्ण-शुक्ल। युग्म/युगल: प्रकृति-पुरुष, नर-नारी, जड़-चेतन। विद्या: परा-अपरा। इन्द्रियाँ: नयन/आँख, कर्ण/कान, कर/हाथ, पग/पैर। लिंग: स्त्रीलिंग, पुल्लिंग।
दूसरा- वेद: सामवेद, युग त्रेता, देव: विष्णु, वर्ण: क्षत्रिय, आश्रम: गृहस्थ, पुरुषार्थ: धर्म,
महर्षि: द्वैपायन/व्यास। द्वैत विभाजन,
तीन/त्रि - देव / त्रिदेव/त्रिमूर्ति: ब्रम्हा-विष्णु-महेश। ऋण: देव ऋण, पितृ-मातृ ऋण, ऋषि ऋण। अग्नि: पापाग्नि, जठराग्नि, कालाग्नि। काल: वर्तमान, भूत, भविष्य। गुण: सत्व, रजस, तम। दोष: वात, पित्त, कफ (आयुर्वेद)। लोक: स्वर्ग, भू, पाताल / स्वर्ग भूलोक, नर्क। त्रिवेणी / त्रिधारा: सरस्वती, गंगा, यमुना। ताप: दैहिक, दैविक, भौतिक। राम: श्री राम, बलराम, परशुराम। ऋतु: पावस/वर्षा शीत/ठंड ग्रीष्म/गर्मी।मामा:कंस, शकुनि, माहुल। व्रत: नित्य, नैमित्तिक, काम्य / मानस, कायिक, वाचिक।
तीसरा- वेद: यजुर्वेद, युग द्वापर, देव: महेश, वर्ण: वैश्य, आश्रम: वानप्रस्थ, पुरुषार्थ: काम,
त्रिकोण, त्रिनेत्र = शिव, त्रिदल बेल पत्र, त्रिशूल, त्रिभुवन, तीज, तिराहा, त्रिमुख ब्रम्हा। त्रिभुज / त्रिकोण तीन रेखाओं से घिरा क्षेत्र।
चार - युग: सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग, कलियुग। धाम: बद्रीनाथ, जगन्नाथपुरी, रामेश्वरम धाम, द्वारिका। पीठ: शारदा पीठ द्वारिका, ज्योतिष पीठ जोशीमठ बद्रीधाम, गोवर्धन पीठ जगन्नाथपुरी, श्रृंगेरी पीठ। वेद: ऋग्वेद, अथर्वेद, यजुर्वेद, सामवेद। आश्रम: ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास। अंतःकरण: मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार। वर्ण: ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र। पुरुषार्थ: अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष। दिशा: पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण। फल: करौंदा (दस्त, ज्वर, पित्त), शहतूत (लू, कृमि, रक्त, सूजन),। अवस्था: शैशव/बचपन, कैशोर्य/तारुण्य, प्रौढ़ता, वार्धक्य। विकार/रिपु: काम, क्रोध, मद, लोभ।
अर्णव, अंबुधि, श्रुति,
चौथा - वेद: अथर्वर्वेद, युग कलियुग, वर्ण: शूद्र, आश्रम: सन्यास, पुरुषार्थ: मोक्ष,
चौराहा, चौगान, चौबारा, चबूतरा, चौपाल, चौथ, चतुरानन गणेश, चतुर्भुज विष्णु, चार भुजाओं से घिरा क्षेत्र।, चतुष्पद चार पंक्ति की काव्य रचना, चार पैरोंवाले पशु।, चौका रसोईघर, क्रिकेट के खेल में जमीन छूकर सीमाँ रेखा पार गेंद जाना, चार रन।
पाँच/पंच - गव्य: गाय का दूध, दही, घी, गोमूत्र, गोबर। देव: गणेश, विष्णु, शिव, देवी, सूर्य। तत्व् : पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश। अमृत: दुग्ध, दही, घृत, मधु, नर्मदा/गंगा जल। अंग/पंचांग: । पंचनद: । ज्ञानेन्द्रियाँ: आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा। कर्मेन्द्रियाँ: हाथ, पैर,आँख, कान, नाक। कन्या: ।, प्राण ।, शर: ।, प्राण: ।, भूत: ।, यक्ष: ।, तिथि: नंदा, भद्रा, विजया, ऋक्ता, पूर्ण वराह मिहिर। गज
इशु: । पवन: । पांडव पाण्डु के ५ पुत्र युधिष्ठिर भीम अर्जुन नकुल सहदेव। शर/बाण: । पंचम वेद: आयुर्वेद।
पंजा, पंच, पंचायत, पंचमी, पंचक, पंचम: पांचवा सुर, पंजाब/पंचनद: पाँच नदियों का क्षेत्र, पंचानन = शिव, पंचभुज पाँच भुजाओं से घिरा क्षेत्र। वृत: एक भुक्त एक समय आहार, अयाचित बिना मांगे जो मिले ग्रहण करना, मितभुक निर्धारित अल्प मात्रा १० ग्रास लेना, चांद्रायण तिथि अनुसार १५ से घटते हुए १ ग्रास लें, प्राजापत्य ३-३ दिन क्रमश: २२, २६, २४ ग्रास अंतिम ३ दिन निराहार।
छह/षट - दर्शन: वैशेषिक, न्याय, सांख्य, योग, पूर्व मीसांसा, दक्षिण मीसांसा। अंग: ।, अरि: ।, कर्म/कर्तव्य: ।, चक्र: ।, तंत्र: ।, रस: ।, शास्त्र: ।, राग:।, ऋतु: वर्षा, शीत, ग्रीष्म, हेमंत, वसंत, शिशिर।, वेदांग: ।, इति:।, अलिपद: ।
षडानन कार्तिकेय, षट्कोण छह भुजाओं से घिरा क्षेत्र। षडपर्व: कृषि,ऋतु, कामना, राष्ट्रीय, जयंती, श्रद्धांजलि।
सात/सप्त - ऋषि - विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्रि, वशिष्ठ एवं कश्यप। पुरी- अयोध्या, मथुरा, मायापुरी हरिद्वार, काशी वाराणसी , कांची (शिन कांची - विष्णु कांची), अवंतिका उज्जैन और द्वारिका। पर्वत: ।, अंध: ।, लोक: ।, धातु: ।, सागर: ।, स्वर: सा रे गा मा पा धा नी।, रंग: सफ़ेद, हरा, नीला, पीला, लाल, काला।, द्वीप: ।, नग/रत्न: हीरा, मोती, पन्ना, पुखराज, माणिक, गोमेद, मूँगा।, अश्व: ऐरावत,
सप्त जिव्ह अग्नि,
सप्ताह = सात दिन, सप्तमी सातवीं तिथि, सप्तपदी सात फेरे,
आठ/अष्ट - वसु- धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्युष और प्रभाष। योग- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि। लक्ष्मी - आग्घ, विद्या, सौभाग्य, अमृत, काम, सत्य , भोग एवं योग लक्ष्मी ! सिद्धियाँ: ।, गज/नाग: गज ^१ संज्ञा पुं॰ [सं॰] [स्त्री॰ गजी]
गज = १. हाथी, २. गजासुर राक्षस(महिषासुर का पुत्र), ३. एक बंदर जो रामचंद्र की सेना में था, ४. आठ की संख्या, ५. मकान की नींच या पुश्ता, ६. ज्योतिष में नक्षत्रों की वीथियों में से एक, ७. लंबाई नापने की एक प्राचीन माप जो साधारणतः ३० अंगुल की होती थी [को॰] । गज २ संज्ञा पुं॰ [फा़॰ गज]
१. लंबाई नापने की एक माप जो सोलह गिरह या तीन फुट की होती है । विशेष - गज कई प्रकार का होता है जिससे कपड़ा, जमीन, लकड़ी, दीवार आदि नापी जाती है । पुराने समय से भिन्न भिन्नः प्रांतों तथा भिन्न भिन्न व्यवसायों में भिन्न भिन्न माप के गज प्रचलित थे और उनके नाम भी अलग अलग थे । उनका प्रचार अभी भी है । सरकारी गज ३ फुट या ३६ इंच का होता है । कपड़ा नापने का गज प्रायः लोहे की छड़ या लकड़ी का होता है जिसमें १६ गिरहें होती हैं और चार चार गिरहों पर चौपाटे का चिह्न होता है । कोई कोई २० गिरह का भी होती है । राजगीरों का गज लकड़ी का होता है और उसमें १४ तसू होते हैं । एक एक इंच के बराबर तसू होता है । यही गज बढ़ई भी काम में लाते हैं । अब इसकी जगह विशेषकर विलायती दो फुटे से काम लिया जाता है । दर्जियों का गज कपड़े के फीते का होता है, जिसमें गिरह के चिह्न बने होते हैं । मुहा॰—गजभर = बनियों की बोलचाल में एक रुपए में सोलह सेर का भाव । गज भर की छाती होना = बहुत प्रसन्नता या संमान का बोध करना । गज भर की जबान होना = बड़बोला होना । उ॰—क्यों जान के दुश्मन हुए हो, इतनी सी जान गज भर की जबान—फिसाना॰, भा॰३, पृ॰ २१९ ।
२. वह पतली लकड़ी जो बैलगाड़ी के पाहिए में मूँड़ी से पुट्ठी तक लगाई जाती है । विशेष—यह आरे से पतली होती है और मूँड़ी के अंदर आरे को छेदकर लगाई जाती है । यह पुट्ठी और औरों को मूड़ी में जकड़े रहती है । गज चार होते हैं ।
३. लोहे या लकड़ी की वह छड़ जिससे पुराने ढंग की बंदूक में ठूसी जाती है । क्रि॰ प्र॰—करना ।
४. कमानी, जिससे सारंगी आदि बजाते हैं ।
५. एक प्रकार का तीर जिसमें पर और पैकान नहीं होता ।
६. लकड़ी की पटरी जो घोड़ियों के ऊपर रखी जाती है ।। दिशा: पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ईशान, आग्नेय, नैऋत्य, वायव्य।, याम: ।,
अष्टमी आठवीं तिथि, अष्टक आठ ग्रहों का योग, अष्टांग: ।,
अठमासा आठ माह में उत्पन्न शिशु,
नौ - दुर्गा - शैल पुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी एवं सिद्धिदात्री। गृह: सूर्य/रवि , चन्द्र/सोम, गुरु/बृहस्पति, मंगल, बुध, शुक्र, शनि, राहु, केतु।, कुंद: ।, गौ: ।, नन्द: ।, निधि: ।, विविर: ।, भक्ति: ।, नग: ।, मास: ।, रत्न ।, रंग ।, द्रव्य ।,
नौगजा नौ गज का वस्त्र/साड़ी।, नौरात्रि शक्ति ९ दिवसीय पर्व।, नौलखा नौ लाख का (हार)।,
नवमी ९ वीं तिथि।,
दस - दिशाएं: पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ईशान, आग्नेय, नैऋत्य, वायव्य, पृथ्वी, आकाश।, इन्द्रियाँ: ५ ज्ञानेन्द्रियाँ, ५ कर्मेन्द्रियाँ।, अवतार - मत्स्य, कच्छप, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, श्री राम, कृष्ण, बुद्ध, कल्कि।
दशमुख/दशानन/दशकंधर/दशबाहु रावण।, दष्ठौन शिशु जन्म के दसवें दिन का उत्सव।, दशमी १० वीं तिथि।, दीप: ।, दोष: ।, दिगपाल: ।
ग्यारह रुद्र- हर, बहुरुप, त्र्यंबक, अपराजिता, बृषाकापि, शँभु, कपार्दी, रेवात, मृगव्याध, शर्वा और कपाली।
एकादशी ११ वीं तिथि,
बारह - आदित्य: धाता, मित, आर्यमा, शक्र, वरुण, अँश, भाग, विवस्वान, पूष, सविता, तवास्था और विष्णु।, ज्योतिर्लिंग - सोमनाथ राजकोट, मल्लिकार्जुन, महाकाल उज्जैन, ॐकारेश्वर खंडवा, बैजनाथ, रामेश्वरम, विश्वनाथ वाराणसी, त्र्यंबकेश्वर नासिक, केदारनाथ, घृष्णेश्वर, भीमाशंकर, नागेश्वर। मास: चैत्र/चैत, वैशाख/बैसाख, ज्येष्ठ/जेठ, आषाढ/असाढ़ श्रावण/सावन, भाद्रपद/भादो, अश्विन/क्वांर, कार्तिक/कातिक, अग्रहायण/अगहन, पौष/पूस, मार्गशीर्ष/माघ, फाल्गुन/फागुन। राशि: मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ, कन्यामेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या।, आभूषण: बेंदा, वेणी, नथ,लौंग, कुण्डल, हार, भुजबंद, कंगन, अँगूठी, करधन, अर्ध करधन, पायल. बिछिया।,
द्वादशी १२ वीं तिथि।, बारादरी ।, बारह आने।
तेरह - भागवत: ।, नदी: ।,विश्व ।
त्रयोदशी १३ वीं तिथि ।
चौदह - इंद्र: ।, भुवन: ।, यम: ।, लोक: ।, मनु: ।, विद्या ।, रत्न: ।
चतुर्दशी १४ वीं तिथि।
पंद्रह - तिथियाँ (प्रतिपदा/परमा, द्वितीय/दूज, तृतीय/तीज, चतुर्थी/चौथ, पंचमी, षष्ठी/छठ, सप्तमी/सातें, अष्टमी/आठें, नवमी/नौमी, दशमी, एकादशी/ग्यारस, द्वादशी/बारस, त्रयोदशी/तेरस, चतुर्दशी/चौदस, पूर्णिमा/पूनो, अमावस्या/अमावस।)
सोलह - षोडश मातृका: गौरी, पद्मा, शची, मेधा, सावित्री, विजय, जाया, देवसेना, स्वधा, स्वाहा, शांति, पुष्टि, धृति, तुष्टि, मातर, आत्म देवता। ब्रम्ह की सोलह कला: प्राण, श्रद्धा, आकाश, वायु, तेज, जल, पृथ्वी, इन्द्रिय, मन अन्न, वीर्य, तप, मंत्र, कर्म, लोक, नाम।, चन्द्र कलाएं: अमृता, मंदा, पूषा, तुष्टि, पुष्टि, रति, धृति, ससिचिनी, चन्द्रिका, कांता, ज्योत्सना, श्री, प्रीती, अंगदा, पूर्ण, पूर्णामृता। १६ कलाओंवाले पुरुष के १६ गुण सुश्रुत शारीरिक से: सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्राण, अपान, उन्मेष, निमेष, बुद्धि, मन, संकल्प, विचारणा, स्मृति, विज्ञान, अध्यवसाय, विषय की उपलब्धि। विकारी तत्व: ५ ज्ञानेंद्रिय, ५ कर्मेंद्रिय तथा मन। संस्कार: गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकरण, कर्णवेध, विद्यारम्भ, उपनयन, वेदारम्भ, केशांत, समावर्तन, विवाह, अंत्येष्टि। श्रृंगार: ।
षोडशी सोलह वर्ष की, सोलह आने पूरी तरह, शत-प्रतिशत।, अष्टि: ।
सत्रह -
अठारह -
उन्नीस -
बीस - कौड़ी, नख, बिसात, कृति ।
चौबीस स्मृतियाँ - मनु, विष्णु, अत्रि, हारीत, याज्ञवल्क्य, उशना, अंगिरा, यम, आपस्तम्ब, सर्वत, कात्यायन, बृहस्पति, पराशर, व्यास, शांख्य, लिखित, दक्ष, शातातप, वशिष्ठ। २४ मिनिट = १ घड़ी।
पच्चीस - रजत, प्रकृति ।
पचीसी = २५, गदहा पचीसी, वैताल पचीसी।
छब्बीस - राशि-रत्न (१४-१२ =२६)
तीस - मास,
तीसी तीस पंक्तियों की काव्य रचना,
बत्तीस - बत्तीसी = ३२ दाँत ।,
तैंतीस - सुर: ।,
छत्तीस - छत्तीसा ३६ गुणों से युक्त, नाई।
चालीस - चालीसा ४० पंक्तियों की काव्य रचना।
अड़तालीस - १ मुहूर्त = ४८ मिनिट या २ घड़ी।
पचास - स्वर्णिम, हिरण्यमय, अर्ध शती।
साठ - षष्ठी।
सत्तर -
पचहत्तर -
सौ -
एक सौ आठ - मंत्र जाप
सात सौ - सतसई।,
सहस्त्र -
सहस्राक्ष इंद्र।,
एक लाख - लक्ष।,
करोड़ - कोटि।,
दस करोड़ - दश कोटि, अर्बुद।,
अरब - महार्बुद, महांबुज, अब्ज।,
ख़रब - खर्व ।,
दस ख़रब - निखर्व, न्यर्बुद ।,
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३३ कोटि देवता
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देवभाषा संस्कृत में कोटि के दो अर्थ होते है, कोटि = प्रकार, एक अर्थ करोड़ भी होता। हिन्दू धर्म की खिल्ली उड़ने के लिये अन्य धर्मावलम्बियों ने यह अफवाह उडा दी कि हिन्दुओं के ३३ करोड़ देवी-देवता हैं। वास्तव में सनातन धर्म में ३३ प्रकार के देवी-देवता हैं:
० १ - १२ : बारह आदित्य- धाता, मित, आर्यमा, शक्रा, वरुण, अँश, भाग, विवस्वान, पूष, सविता, तवास्था और विष्णु।
१३ - २० : आठ वसु- धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्युष और प्रभाष।
२१ - ३१ : ग्यारह रुद्र- हर, बहुरुप, त्र्यंबक, अपराजिता, बृषाकापि, शँभु, कपार्दी, रेवात, मृगव्याध, शर्वा और कपाली।
३२ - ३३: दो देव- अश्विनी और कुमार।
२९.१.२०२०
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लघुकथा
छाया
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गणतंत्र दिवस, देशभक्ति का ज्वार, भ्रष्टाचार के आरोपों से- घिरा अफसर, मत खरीदकर चुनाव जीता नेता, जमाखोर अपराधी, चरित्रहीन धर्माचार्य और घटिया काम कर रहा ठेकेदार अपना-अपना उल्लू सीधा कर तिरंगे को सलाम कर रहे थे।
आसमान में उड़ रहा तिरंगा निहार रहा था जवान और किसान को जो सलाम नहीं, अपना काम कर रहे थे।
उन्हें देख तिरंगे का मन भर आया, आसमान से बोला "जब तक पसीने की हरियाली, बलिदान की केसरिया क्यारी समय चक्र के साथ है तब तक मुझे कोई झुका नहीं सकता।
सहमत होता हुआ कपसीला बादल तीनों पर कर रहा था छाया।
२९.१.२०१९
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एक प्रश्न-उत्तर
संध्या सिंह-
न इतिहास के गौरव से प्रभावित न भविष्य के पतन से आशंकित ...... तटस्थ हो कर आप सबसे एक प्रश्न ;;;कितने लोग बदलती विचारधारा के परिपेक्ष्य में जौहर को आज भी वाजिब कहेंगे ...और महिमामंडित करेंगे .. ...और स्त्री को अस्मिता पर हमले के समय जौहर का सुझाव देंगे ?????
संजीव-
जौहर ऐसा साहस है जो हर कोई नहीं कर सकता. जौहर का सती प्रथा से कोई संबंध नहीं था.
जौहर विधर्मी स्वदेशी सेनाओं की पराजय के बाद शत्रुओं के हाथों में पड़कर बलात्कृत होने से बचने के लिए परजिर सैनिकों कि पत्नियों द्वारा स्वेच्छा से किया जाता था जबकि पति की मृत्यु होने पर पत्नि स्वेच्छा से प्राण त्याग कर सती होती थी. दोनों में कोई समानता नहीं है.
स्मरण हो जौहर अकेली पद्मिनी ने नहीं किया था. एक नारी के सम्मान पर आघात का प्रतिकार १५००० नारियों ने आत्मदाह कर किया जबकि उनके जीवन साथी लड़ते-लड़ते मर गए थे. ऐसा वीरोचित उदाहरण अन्य नहीं है. जब कोई अन्य उपाय शेष न रहे तब मानवीय अस्मिता और आत्म-गरिमा खोकर जीने से बेहतर आत्माहुति होती है. इसमें कोई संदेह नहीं है. ऐसे भी लाखों भारतीय स्त्री-पुरुष हैं जिन्होंने मुग़ल आक्रान्ताओं के सामने घुटने टेक दिए और आज के मुसलमानों को जन्म दिया जो आज भी भारत नहीं मक्का-मदीना को तीर्थ मानते हैं, जन गण मन गाने से परहेज करते हैं. ऐसे प्रसंगों पर इस तरह के प्रश्न जो प्रष्ठभूमि से हटकर हों, आहत करते हैं. एक संवेदनशील विदुषी से यह अपेक्षा नहीं होती. प्रश्न ऐसा हो जो पूर्ण घटना और चरित्रों के साथ न्याय करे.
आज भी यदि ऐसी परिस्थिति बनेगी तो ऐसा ही किया जाना उचित होगा. परिस्थिति विशेष में कोई अन्य मार्ग न रहने पर प्राण को दाँव पर लगाना बलिदान होता है. जौहर करनेवाली रानी पद्मिनी हों, या देश कि आज़ादी के लिए प्राण गँवानेवाले क्रांन्तिकारी या भ्रष्टाचार मिटाने हेतु आमरण अनशन करनेवाले अन्ना सब का कार्य अप्रतिम और अनुकरणीय है.
२९.१.२०१७
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एक रचना-
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दिल मरुथल चमन हुआ
रूप को निहार
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जनप्रतिनिधि अपना ही
भत्ता बढ़वाते।
खेत के पसीने को
मंडी भिजवाते।
ज्ञान - श्रम को बेच
आजीविका कमाते-
जो उन पर बढ़ा - बढ़ा
कर नित लगवाते।
थाने में सज्जन ज्यों
लूट के शिकार-
दिल मरुथल चमन हुआ
रूप को निहार
*
लाठी - गोली खाई
थाम कर तिरंगा।
जिसने वह आज फिरे
भूखा - अधनंगा।
मत ले, जन - जन को ठग
नेता मुस्काते-
संसद में शोहदों सा
करते हैं दंगा।
थाने जलवा हँसती
बेहया सियासत-
जनमत को भेज रही
हुकूमत तिहाड़
दिल मरुथल चमन हुआ
रूप को निहार
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व्यंग्य गीत -
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जहाँ ढोल जितना बड़ा
उतनी ज्यादा पोल।
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हर ढपोरशंखी कहे
लीप-पोत सिंदूर।
चना-चिरौंजी चढ़ाओ
आँख मूँद, हो सूर।
गाल बजाओ जोर से
कहो शंख रस घोल
जहाँ ढोल जितना बड़ा
उतनी ज्यादा पोल।
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झंडे-डंडे थामकर
पंडे हो दिग्भ्रांत।
शोर मचाते, अन्य से
कहें: रहो रे! शांत।
चालू-टालू बदलते
संसद का भूगोल
जहाँ ढोल जितना बड़ा
उतनी ज्यादा पोल।
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रंग भंग में घोलकर
करें रंग में भंग।
तंग हो रहे तंग कर
देखे दुनिया दंग।
धार रहे हैं गले में
अमिय हलाहल बोल
जहाँ ढोल जितना बड़ा
उतनी ज्यादा पोल।
२९.१.२०१६
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मुक्तक
जो हुआ अनमोल, है बहुमूल्य, कैसे मोल दूँ मैं?
बिना परखे ही कहो तो सत्य कैसे तोल दूँ मैं?
बंद है जो उसे रहने बंद दो यह ही उचित है-
लगे हैं पैबंद जिसमें कहो कैसे खोल दूँ मैं?
२९.१.२०१५
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नोट पर गाँधी जी की छवि कहाँ से आई?
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गाँधीजी को देश ही नहीं, पूरी दुनिया में याद किया जाता है। भारत में तो गाँधीजी नोट पर तस्वीरके रूप में हरेक व्यक्ति के साथ रहते हैं।
गाँधीजी की यह तस्वीर कहाँ से आई? दरअसल यह सिर्फ पोट्रेट फोटो नहीं है। गाँधीजी की संलग्न तस्वीर से पोट्रेट के रूप में चेहरा लिया गया है।
यह तस्वीर उस समय खींची गई, जब गाँधीजी ने तत्कालीन बर्मा और भारत में ब्रिटिश सेक्रेटरी के रूप में कार्यरत फ्रेडरिक पेथिक लॉरेंस के साथ कोलकाता स्थित वायसराय हाउस में मुलाकात की थी। इसी तस्वीर से गाँधीजी का चेहरा पोट्रेट के रूप में भारतीय नोटों पर अंकित किया गया। आज हम भारतीय नोटों पर गाँधीजी का चित्र देख रहे हैं, जबकि इससे पहले नोटों पर अशोक स्तंभ अंकित हुआ करता था। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया द्वारा १९९६ में नोटों में परिवर्तन कर अशोक स्तंभ की जगह राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के चित्र के साथ अशोक स्तंभ नोट के बाईं तरफ निचले हिस्से पर अंकित किया गया है।
१९८७ में पहली बार चलन में आए ५०० रु. के नोट में गाँधीजी का वॉटरमार्क छापा गया था। सन् १९९६ के बाद हरेक नोट में गाँधीजी का चित्र अंकित हो गया। अभी तक ५ रुपए से लेकर १ हजार तक के नोट में गाँधीजी का चित्र अंकित किया जा चुका है है।
ब्रिटिश काल में १० रूपए के नोट पर इंग्लैंड के राजा का चित्र होता था, स्वतंत्रता के बाद इसे अशोक स्तंभ से बदला गया।
बाद में मुद्रित दस रूपये के नोट पर एक ओर अशोक स्तंभ तथा दूसरी ओर राष्ट्रीय पक्षी मयूर मुद्रित किया गया।
इसे 1994 से बंद कर दिया गया है। इनकी जगह सिक्कों ने ली है। वहीं, जब एक रुपए का नोट चलन में था, तब उस पर रिजर्व बैंक के गर्वनर की जगह फायनेंस सेक्रेटरी (वित्त सचिव) के हस्ताक्षर अंकित हुआ करते थे।
करंसी ऑफ ऑर्डिनेंस के नियमानुसार एक रुपए का नोट भारत सरकार द्वारा, जबकि दो रुपए से लेकर 1000 रुपए तक की करंसी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया द्वारा जारी की जाती थी। वर्तमान में एक-दो रुपयों का उत्पादन बंद कर दिया गया है, लेकिन पुराने नोट अभी भी चलन में हैं।
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