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बुधवार, 15 अप्रैल 2026

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 सलिल सृजन अप्रैल १५

*
हरिऔध स्मृति अनुष्ठान
सब मिल हिंद और हिंदी की करें आरती।
हो प्रसन्न दें वर नव आशा मातु भारती।।
अनिल अंगिरा पवन अपर्णा ईशाना मिल
यायावर संजीव विनय सह सुमन सकें खिल।
भगवान विराजें, राम किशोर प्रांजल
कुसुम सरोज नीलिमा नीलम अलका निर्मल।
गिरि कैलाश सरोज भावना संगीता शुभ
गोकुल में गोपाल सुरेश मनोहर प्रातिभ।
विजय विवेक हिमांशु हर्ष अमिताभ हो उदित
संदीप प्रदीप प्रगीत मनोज बिहारी प्रमुदित।
पुरुषोत्तम वीरेंद्र कीर्ति दस दिश गुंजित हो ३७ /१
राघवेश सोनम शशि खुशबू दीप जलाएँ
गीत प्रियंका सुना, कला अरविन्द दिखाएँ
मन महेंद्र बल राम बने, नव सूर्य उदय हो ९
सिंह अयोध्या के हरिऔध कृपालु सदय हो।
प्रिय प्रवास, रस कलश, अधखिला फूल धरोहर
वैदेही वनवास, रुक्मिणी परिणय रचकर।
कवि सम्राट, चौपदे चोखे-चुभते देकर
पारिजात, वेनिस का बाँका ज्यों रत्नाकर।
हिन्दी भाषा अरु साहित्य विकास कहानी
चंद्र खिलौना, खेल तमाशा कथा लुभानी।
बाल विलास-विभव, उपदेश कुसुम मन भाए
चाँद सितारे, पद्म प्रसून न युग बिसराए।
लिखी बाल गीतावली, चंदा मामा कृतियाँ
फूल-पत्ते अरु कल्पलता हिन्दी की निधियाँ।
ठाठ ठेठ हिन्दी का बिसरा समय न पाए
बोलचाल, इतिवृत्त सरुआजन की जय जय गाए।
हैं हरिऔध सूर्य हिन्दी के अजर-अमर भी।
कृतियाँ करतीं आप समय के साथ समर भी।
'सलिल' धन्य अभिषेक करे, पद प्रक्षालन भी
है साहित्य ज्ञानवर्धक अरु मन भावन भी।
दें युग को आशीष बने हिन्दी जगवाणी
भारत-भाषा विकसे-फूले जग कल्याणी
०००
शुभकामना यह पोला वैशाख अगिन खुशियाँ ले आए। शिप्रा मति गति निशि-दिन जीवन सुखी बनाए।। स्नेह-सलिल अभिषेक करे नित सुहृद जनों का- बने जीव संजीव, देश को प्रथम बनाए।।
‍छंदशाला दोहा-रोला-कुंडलिया ० १ लक्ष्य नयन थे पार्थ के, नयन भेदते लक्ष्य। लक्ष्य नयन ही साधते, नयनों के उपलक्ष्य।। -अशोक व्यग्र नयनों के उपलक्ष्य, स्वर्ण मृग लक्ष्य बेधते। और कभी ले धनुष, मीन के नयन छेदते।। नयन नयन के भोज्य, अरु नयन नयन के भक्ष्य। नयन तीर धनु हाथ, हों नयन नयन के लक्ष्य।। ००० २. लक्ष्य नयन थे पार्थ के, नयन भेदते लक्ष्य। लक्ष्य नयन ही साधते, नयनों के उपलक्ष्य।। -अशोक व्यग्र नयनों के उपलक्ष्य, नयन जनसेवा करते। कभी लगा नव पौध, हरा धरती को करते।। रक्षें पर्यावरण, न हों दूषण भक्ष्य नयन। हो समता सद्भाव, नीर रक्षा लक्ष्य नयन।। ००० ३ लक्ष्य नयन थे पार्थ के, नयन भेदते लक्ष्य। लक्ष्य नयन ही साधते, नयनों के उपलक्ष्य।। -अशोक व्यग्र नयनों के उपलक्ष्य, नयन ही कोशिश करते। बाधा पीड़ा दर्द, हानि से कभी न डरते।। नयन प्रगति के दूत, सृजन के साक्ष्य नयन थे।। सरहद पर हों सजग, शत्रु के लक्ष्य नयन थे।। ००० ४ लक्ष्य नयन थे पार्थ के, नयन भेदते लक्ष्य। लक्ष्य नयन ही साधते, नयनों के उपलक्ष्य।। -अशोक व्यग्र नयनों के उपलक्ष्य, नयन गत-आगत रचते। हरते नयन अशांति, क्रोध-हिंसा से बचते।। नयन मिटाते उन्हें, साथ जो रहें स्वार्थ के। द्रुपद सुता बेचैन, लक्ष्य नयन थे पार्थ के।। १५.४.२०२६ ०००
अभिनव प्रयोग
पहेली - दोहों में खोजिए साहित्यकारों के नाम
महावीर अरु वीर मिल, देवी सुमिर अधीर।
नमन शिवानी को करें, नीरज ले रघु वीर।।
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गुरु वृंदावन जा रहे, देखें रूप विराट।
चक्र सुभद्रा-बंधु ले, सज्जित देखें ठाट।।
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प्रभा प्रभाकर की निरख, तुलसी करें प्रणाम।
रूप निराला अलौकिक, लाल चक्र उद्दाम।।
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लाला माखन खा रह्यो, पुतो गाल अरु भाल।
जसुदा माई निहाल लख, श्यामल माखन लाल।।
.
उत्तर
महावीर - महावीर प्रसाद द्वुवेदी, महावीर प्रसाद जोशी (राजस्थानी), महावीर रवांल्टा
वीर - वीर सावरकर (मराठी), क्षेत्रि वीर (मणिपुरी)
देवी - महादेवी वर्मा, आशापूर्णा देवी (बांग्ला)
शिवानी - गौरा पंत शिवानी
नीरज - गोपाल प्रसाद सक्सेना नीरज
रघुवीर - डॉ. रघुवीर, रघुवीर सहाय, रघुवीर चौधरी (गुजराती)
गुरु - कामता प्रसाद, रामेश्वर प्रसाद गुरु, गुरु सक्सेना, गुरु गोबिंद सिंह (पंजाबी)
वृन्दावन- वृन्दावन लाल वर्मा
विराट - विष्णु विराट, चन्द्रसेन विराट
चक्र - सुदर्शन सिंह चक्र, कुम्भार चक्र (उड़िया), चक्रधर अशोक
सुभद्रा - सुभद्रा कुमारी चौहान
प्रसाद - जय शंकर प्रसाद, महावीर प्रसाद, हजारी प्रसाद, शत्रुघ्न प्रसाद
प्रभा - प्रभा खेतान
प्रभाकर - विष्णु प्रभाकर, प्रभाकर माचवे , प्रभाकर बैगा, प्रभाकर श्रोत्रिय
तुलसी - गोस्वामी तुलसीदास, आचार्य तुलसी, तुलसी बहादुर क्षेत्री (नेपाली), डॉ, तुलसीराम,
निराला - सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
लाला - लाला भगवान दीन, लाला श्रीनिवास दास, लाला पूरणमल, लाला जगदलपुरी
माखन - माखनलाल चतुर्वेदी 'एक भारतीय आत्मा'
लाल - लक्ष्मी नारायण लाल, श्रीलाल शुक्ल, लाल पुष्प (सिंधी)
१५.४.२०२५
०००
सॉनेट
उषा
उषा ललित लालित्यमयी।
है मनहर चितचोर सखी।
कवि छवि देखे नयी नयी।।
अपनी किस्मत आप लिखी।।
निधि सतरंगी मनोरमा।
सत्य सुनीता नीलाभित।
ज्योति-कन्हैया लिए विमा।।
नीलम-रेखा अरुणाभित।।
बालारुण खेले कैंया।
उछल-कूद बाहर भागे।
कलरव करती गौरैया।।
संग गिलहरी अनुरागे।।
उषा प्रभाती रही सुना।
कनक-जाल रमणीय बुना।।
***
नहले पे दहला
कभी कभी यूँ भी हम ने अपने जी को बहलाया है
जिन बातों को ख़ुद नहीं समझे औरों को समझाया है?
औरों ने हमें नहीं बख्शा वो रास्ता बताया है।
जिस पर उन्होंने अपना पग नहीं बढ़ाया है।
***
प्रश्नोत्तर
छिपकली से जान कैसे बचाएँ?
मत देखें छिप कली
ऐसी हरकत नहीं भली
उसका करा दें विवाह
मिल जाएगा छुटकारा
कली बन जाएगी फूल
नहीं चुभेगी बनकर शूल
१५-४-२०२३
***
सॉनेट
चमन
*
चमन में साथी! अमन हो।
माँ धरित्री को नमन कर।
छत्र निज सिर पर गगन कर।।
दिशा हर तुझको वसन हो।।
पूर्णिमा निशि शशि सँगाती।
पवन पावक सलिल सूरज।
कह रहे ले ईश को भज।।
अनगिनत तारे बराती।
हर जनम हो श्वास संगी।
जिंदगी दे यही चंगी।
आस रंग से रही रंगी।।
न मन यदि; फिर भी नमन कर।
जगति को अपना वतन कर।
सुमन खिल; सुरभित चमन कर।।
१५-४-२०२२
•••
मुक्तिका
अपने हिस्से जितने गम हैं।
गिने न जाते लेकिन कम हैं।।
बरबस देख अधर मुस्काते।
नैना बेबस होते नम हैं।।
महाबली खुद को कहता जो
अधिक न उससे निर्दय यम हैं।।
दिये जगमगाते ऊपर से
पाले अपने नीचे तम हैं।।
मैं-मैं तू-तू तूतू मैंमैं
जब तक मिलकर हुए न हम हैं।।
उनका बम बम नाश कर रहा
मंगलकारी शिव बम बम हैं।।
रम-रम राम रमामय में रम
वे मदहोश गुटककर रम हैं।।
१५-४-२०२२
•••
मुक्तिका
कर्ता करता
भर्ता भरता
इनसां उससे
रहता डरता
बिन कारण जो
डरता; मरता
पद पाकर क्यों
अकड़ा फिरता?
कह क्यों पर का
दुख ना हरता
***
द्विपदियाँ / अशआर
कोरोना के व्याज, अनुशासित हम हो रहे।
घर के करते काज, प्रेम से।।
*
थोड़े जिम्मेदार, हुए आजकल हम सभी।
आपस में तकरार, घट गई।।
*
खूब हो रहा प्यार, मत उत्पादन बढ़ाना।
बंद घरों के द्वार, आजकल।।
*
तबलीगी लतखोर, बातों से मानें नहीं।
मनुज वेश में ढोर, जेल दो।
*
१५-४-२०२०
***
श्रृंगार गीत
तुम
*
तुम हो या साकार है
बेला खुशबू मंद
आँख बोलती; देखती
जुबां; हो गयी बंद
*
अमलतास बिंदी मुई, चटक दहकती आग
भौंहें तनी कमान सी, अधर मौन गा फाग
हाथों में शतदल कमल
राग-विरागी द्वन्द
तुम हो या साकार है
मद्धिम खुशबू मंद
*
कृष्ण घटाओं बीच में, बिजुरी जैसी माँग
अलस सुबह उल्लसित तुम, मन गदगद सुन बाँग
खनक-खनक कंगन कहें
मधुर अनसुने छंद
तुम हो या साकार है
मनहर खुशबू मंद
*
पीताभित पुखराज सम, मृदुल गुलाब कपोल
जवा कुसुम से अधरद्वय, दिल जाता लख डोल
हार कहें भुज हार दो
बनकर आनंदकंद
तुम हो या साकार है
मन्मथ खुशबू मंद
***
संस्मरण
आम चुनाव
***
मुझे एक चुनाव में पीठासीन अधिकारी बनाया गया, आज से ४५ साल पहले, तब ईवीएम नहीं होती थी, न वाहन मिलते थे। मैं अभियंता था। ट्रेनिंग में कोई कठिनाई नहीं हुई। मुख्यालय से ९९ कि मी दूर रेल से तहसील मुख्यालय पहुँचा। अपने दल के किसी सदस्य को जानता नहीं था। माइक से बार-बार घोषणा कराने पर एक साथी मिले जो शिक्षक थे। हमें लोहे की चार भारी पेटियाँ मिलीं। लगभग साढे़ चार हजार मतपत्र मिले जिनका आकार टेब्लॉयड अखबार के बराबर था। अन्य सामग्री और खुद के कपड़े, बिस्तर और खाने नाश्ते का सामान भी था। शामियाना को एक किनारे बैठकर सूची से सामान का मिलान करने और मतपत्रों को गिनकर गलत मतपत्र बदलवाए। तब तक बाकी दो सहायक आए। एक-एक मतपेटी उन्हें थमाई। अब बस पकड़ना थी। दल में दो पुलिस सिपाही भी थे पर गायब, उनके नाम से मुनादी कराई, जब बस में बैठ गए, तब वे प्रकट हुए। मैं समझ गया कि सामान ढोेने से बचने को लिए आस-पास होते हुए भी नहीं, मिले घुटे पीर हैं। डाल-डाल और पात-पात का नीति अपनाना ठीक लगा। बस चलते समय वे उपस्थिति प्रमाण पत्र पर हस्ताक्षर कराने आए। मैंने इंकार कर दिया कि मैं आपकी गैर हाजिरी रिपोर्ट कर चुका हूँ। मैं मतदान केंद्र पर दो कर्मचारी नियुक्त कर चुनाव करा लूँगा, आप वापिस जाएँ और एस. पी. से निलंबन आदेश लेकर जाँच का सामना करें। उनके पैरों तले से जमीन सरकने लगी, बाजी उलटती देख माफी माँगने लगे। मैंने बेरुखी बनाए रखी।
बस से ४५ कि मी दूर ब्लॉक मुख्यालय तक जाना था। वहाँ सिपाहियों ने आगे बढ़कर मतपेटियाँ और मतपत्र सम्हाले जिसके लिए उनकी ड्यूटी लगाई गई थी। अब हमें ८ कि. मी. बैलगाड़ी से जाना था। कोटवार २ बैलगाड़ी लेकर राह देख रहा था। बैलगाड़ी ने नदी किनारे उतारा। यहाँ डोंगी (पेड़ का तना खोखला कर बनाई छोटी नाव) मिलीं। दल के मुखिया के नाते सबको नियंत्रण में रखकर, सब काम समय पर कराना था। मैं २२ साल का, शेष सब मेरे पिता की उम्र के। पहली डोंगी पर मतपत्र, मतपेटी लेकर एक सिपाही को साथ मैं खुद बैठा। दोपहर २ बज रहे थे। सबको भूख लग रही थी, खाने के लिए रुकते तो एक घंटा लगता। मैंने तय किया कि मतदान केंद्र पहुँच ,कर वहाँ व्यवस्था जो कमी हो उसको ठीक कराने की व्यवस्था कराने के बाद भोजन आदि हो। दल के बाकी लोग पहले खाना चाहते थे। अँधेरा होने पर गाँव में कुछ मिलना संभव न होता। कहावत है बुरे वक्त में खोटा सिक्का काम आता है। मैंने वरिष्ठ सिपाही को किनारे ले जाकर पट्टी पढ़ाई कि सीधे बिना रुके मतदान केंद्र चलोगे और पूरे समय मेरे कहे अनुसार काम करेंगे तो शिकायत वापिस लेकर कर्तव्य प्रमाणपत्र दे दूँगा। अंधा क्या चाहे?, दो आँखें। उसने जान बचते देखी तो मेरे साथ आगे बढ़कर मतपेटी लेकर डोंगी में जा बैठा। उसे बढ़ता देख उसका साथी दूसरी डोंगी में जा बैठा। एक डोंगी में दो सवारी, एक मतपेटी और डोंगी चालक, लहर के थपेड़ों को साथ डोंगी डोलती, हमारी जान साँसत में थी। मुझे तो तैरना भी नहीं आता था पर हौसला रखकर बढ़ते रहे।
राम-राम करते दूसरे किनारे पहुँच चैन की साँस ली। सब सामान की जाँच कर कंदों पर लादा और शुरू हुई पदयात्रा, ४ किलोमीटर पैदल कच्चे रास्ते, पगडंडी और वन के बीच से से होते हुए मतदान स्थान पहुँचे। प्राथमिक शाला एक कमरा, परछी, देशी खपरैल का छप्पर, शौचालय या अन्य सुविधा का प्रश्न ही नहीं उठता था। कमरे में सुरक्षित स्थान पर मतदान सामग्री रखवाई। अब तक ४ बज चुके थे, भूखे और थके तो थे ही दल के सदस्य खाने पर टूट पड़े। मैंने उन्हें भोजन आदि करने दिया किंतु खुद पटवारी और कोटवार को लेकर व्यवस्था देखी। सूर्य अस्ताचल की ओर अग्रसर था। बिजली गाँव में नहीं आई थी।
केंद्र में दो मेजें, दो बेंचे, दो कुर्सियाँ, एक स्टूल, एक बाल्टी, एक लोटा, दो गिलास, एक मटका, एक चिमनी, एक फटी-मैली दरी... कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा भानुमती ने कुनबा जोड़ा का तर्ज पर जुटाई गई थी। कमरे के दरवाजे ऐसे कि धक्का देते ही टूट जाएँ। खिड़की बिना पल्लों की चौखट में लोहे के सारी मात्र। यहाँ भी पटवारी और कोटवार दामन बचाते मिले। मुझे एक वरिष्ठ साथी प्रशिक्षण के मध्य गप-शप करते समय बता चुके थे कि पीठासीन अधिकारी के साथ अलग-अलग विभागों के लोग होते हैं जो जानते हैं कि एक दिन बाद अलग हो जाना है। पर्याय: वे सहयोग न कर, जैसे तैसे बेगार टालते हैं जबकि उच्चाधिकारियों को हर कार्य शत-प्रतिशत सही और समय पर चाहिए, न हो तो बिजली पीठासीन अधिकारी पर ही गिरती है। मैंने हालत से निबटने का तरीका पूछ तो वे बोले 'हिकमत अमली'। मैंने यह शब्द पहली बार सुन। वे
संवस, १५.४.२०१९
***
छंद बहर का मूल है: ३
राग छंद
*
छंद परिचय:
बीस मात्रिक महादैशिक जातीय छंद।
तेरह वार्णिक अति जगती जातीय राग छंद।
संरचना: SIS ISI SIS ISI S
सूत्र: रजरजग।
बहर: फ़ाइलुं मुफ़ाइलुं मुफ़ाइलुं फ़अल।
*
आइये! मनाइए, रिझाइए हमें
प्यार का प्रमाण भी दिखाइए हमें
*
चाह में रहे, न सिर्फ बाँह में रहे
क्रोध से तलाक दे न जाइए हमें
*
''हैं न आप संग तो अजाब जिंदगी''
बोल प्यार बाँट संग पाइए हमें
*
जान हैं, बनें सुजान एक हों सदा
दे अजान रोज-रोज भाइये हमें
*
कौन छंद?, कौन बहर?, क्यों पता करें?
शब्द-भाव में पिरो बसाइए हमें
*
संत हों न साधु हों, न देवता बनें
आदमी बने तभी सुहाइये हमें
*
दो, न दो रहें, न एक बनें, क्यों कहो?
जान हमारी बनें बनाइए हमें
१५.४.२०१७
***
खबरदार दोहे
.
केर-बेर का सँग ही, करता बंटाढार
हाथ हाथ में ले सभी, डूबेंगे मँझधार
(समाजवादी एक हुए )
.
खुल ही जाती है सदा, 'सलिल' ढोल की पोल
मत चरित्र या बात में, अपनी रखना झोल
(नेताजी संबंधी नस्तियाँ खुलेंगी)
.
न तो नाम मुमताज़ था, नहीं कब्र है ताज
तेज महालय जब पूजे, तभी मिटेगी लाज
(ताज शिव मंदिर है)
.
जयस्तंभ की मंजिलें, सप्तलोक-पर्याय
कहें क़ुतुब मीनार मत, समझ सत्य-अध्याय
(क़ुतुब मीनार जयस्तंभ है)
.
दोहा सलिला:
रश्मिरथी रण को चले, ले ऊषा को साथ
दशरथ-कैकेयी सदृश, ले हाथों में हाथ
.
तिमिर असुर छिप भागता, प्राण बचाए कौन?
उषा रश्मियाँ कर रहीं, पीछा रहकर कौन
.
जगर-मगर जगमग करे, धवल चाँदनी माथ
प्रणय पत्रिका बाँचता, चन्द्र थामकर हाथ
.
तेज महालय समर्पित, शिव-चरणों में भव्य
कब्र हटा करिए नमन, रखकर विग्रह दिव्य
.
धूप-दीप बिन पूजती, नित्य धरा को धूप
दीप-शिखा सम खुद जले, देखेरूप अरूप
१५-४-२०१५
.
छंद सलिला;
शिव स्तवन
*
(तांडव छंद, प्रति चरण बारह मात्रा, आदि-अंत लघु)
।। जय-जय-जय शिव शंकर । भव हरिए अभ्यंकर ।।
।। जगत्पिता श्वासा सम । जगननी आशा मम ।।
।। विघ्नेश्वर हरें कष्ट । कार्तिकेय करें पुष्ट ।।
।। अनथक अनहद निनाद । सुना प्रभो करो शाद।।
।। नंदी भव-बाधा हर। करो अभय डमरूधर।।
।। पल में हर तीन शूल। क्षमा करें देव भूल।।
।। अरि नाशें प्रलयंकर। दूर करें शंका हर।।
।। लख ताण्डव दशकंधर। विनत वदन चकितातुर।।
।। डम-डम-डम डमरूधर। डिम-डिम-डिम सुर नत शिर।।
।। लहर-लहर, घहर-घहर। रेवा बह हरें तिमिर।।
।। नीलकण्ठ सिहर प्रखर। सीकर कण रहे बिखर।।
।। शूल हुए फूल सँवर। नर्तित-हर्षित मणिधर ।।
।। दिग्दिगंत-शशि-दिनकर। यश गायें मुनि-कविवर।।
।। कार्तिक-गणपति सत्वर। मुदित झूम भू-अंबर।।
।। भू लुंठित त्रिपुर असुर। शरण हुआ भू से तर।।
।। ज्यों की त्यों धर चादर। गाऊँ ढाई आखर।।
।। नव ग्रह, दस दिशानाथ। शरणागत जोड़ हाथ।।
।। सफल साधना भवेश। करो- 'सलिल' नत हमेश।।
।। संजीवित मन्वन्तर। वसुधा हो ज्यों सुरपुर।।
।। सके नहीं माया ठग। ममता मन बसे उमग।।
।। लख वसुंधरा सुषमा। चुप गिरिजा मुग्ध उमा।।
।। तुहिना सम विमल नीर। प्रवहे गंधित समीर।।
।। भारत हो अग्रगण्य। भारती जगत वरेण्य ।।
।। जनसेवी तंत्र सकल। जनमत हो शक्ति अटल।।
।। बलिपंथी हो नरेंद्र। सत्पंथी हो सुरेंद्र।।
।। तुहिना सम विमल नीर। प्रवहे गंधित समीर।।
।। भारत हो अग्रगण्य। भारती जगत वरेण्य ।।
।। जनसेवी तंत्र सकल। जनमत हो शक्ति अटल।।
।। सदय रहें महाकाल। उम्मत हों देश-भाल।।
।। तुहिना सम विमल नीर। प्रवहे गंधित समीर।।
।। भारत हो अग्रगण्य। भारती जगत वरेण्य ।।
।। जनसेवी तंत्र सकल। जनमत हो शक्ति अटल।।
***
दोहा सलिला
सत-चित-आनंद पा सके, नर हो अगर नरेन्द्र.
जीवन की जय बोलकर, होता जीव जितेंद्र..
*
अक्षर की आराधना, हो जीवन का ध्येय.
सत-शिव-सुन्दर हो 'सलिल', तब मानव को ज्ञेय..
*
नर से वानर जब मिले, रावण का हो अंत.
'सलिल' न दानव मारते, कभी देव या संत..
**
प्यार के दोहे:
तन-मन हैं रथ-सारथी:
*
दो पहलू हैं एक ही, सिक्के के नर-नार।
दोनों में पलता सतत, आदि काल से प्यार।।
*
प्यार कभी मनुहार है, प्यार कभी तकरार।
हो तन से अभिव्यक्त या, मन से हो इज़हार।।
*
बिन तन के मन का नहीं, किंचित भी आधार।
बिन मन के तन को नहीं, कर पाते स्वीकार।।
*
दो अपूर्ण मिल एक हों, तब हो पाते पूर्ण।
अंतर से अंतर मिटे, हों तब ही संपूर्ण।।
*
जब लेते स्वीकार तब, मिट जाता है द्वैत।
करते अंगीकार तो, स्थापित हो अद्वैत।।
१५-४-२०१०
*

सोमवार, 2 मार्च 2026

मार्च २, पूर्णिका, इंग्लिश सॉनेट, रामकिंकर, इटेलियन सॉनेट, नवगीत, दोहा, माँ, श्रृंगार, होली, कुण्डलिया

 सलिल सृजन मार्च २

*
एक लघुकथा फागुन की
जुगाड़ टेक्नोलॉजी
फागुन के महीने में एक इंटरव्यू के लिए बुलावा आया। मुझे पता चला कि नौकरी सांसद के रिश्तेदार को दी जाना है, दिखावे के लिये इंटरव्यू हो रहा है। ऐसे सवाल पूछे जा रहे थे, जिनका कोई जवाब संभव नहीं था, एक के बाद एक केंडीडेट आ रहे थे, बिना जवाब दिए असफल होकर जा रहे थे।
मेरी बारी आई तो सवाल पूछा गया- 'आप नदी के बीच एक बोट पर हैं, और आपके पास दो candle के अलावा कुछ भी नहीं है। आपको एक candle जलानी है, कैसे जलाओगे?' मैंने जुगाड़ टेक्नोलॉजी का उपयोग कर उत्तर दिया- 'सर! इसके तीन-चार सोल्युशन हो सकते हैं।' प्रश्नकर्ता को बहुत आश्चर्य हुआ कि जिस सवाल का एक भी जवाब नहीं हो सकता, उसके तीन-चार जवाब कैसे हो सकते हैं? उसने कहा- 'बताओ।' मैंने हिंगलिश में कहा- 'एक candle पानी में फेंक दो, then boat will become lighter (हल्की), और "lighter" से आप candle जला सकते हैं।' इन्टरव्यू बोर्ड के सदस्य एक दूसरे का मुँह ताकने लगे। अब एक दादी अम्मा टाइप की महिला ने दादागिरी करते हुए पूछा- 'दूसरा उत्तर क्या है?' मैंने सोचने की मुद्रा बनाते हुए कहा- 'Throw a candle up and catch it. Catches win the Matches. Using the matches that you win, you can light the candle. दादी अम्मा की बोलती बंद हो गई।
अब बारी थी एक तेज तर्रार आधुनिका की। नायक पर टिके चश्मे में से झाँकते हुए उसने फरमाया- Next option? मैंने उत्तर दिया- 'Take some water in your hand and drop it, drop-by-drop. It will sound like .. Tip.. Tip-Tip.. Tip आधुनिका- So what? मैं- 'Madam! आपने वो गाना नही सुना टिप-टिप बरसा पानी, पानी ने आग लगाई। इस आग से आप अपनी candle जला सकती हैं। यदि ये काफी नही हैं तो एक और उपाय है। आप एक candle से प्यार करने लगिए, दूसरी को जलन होगी, वह अपने आप जलने लगेगी। प्रश्न पूछने वाली चारों खाने चित्त। मैंने जैसे ही कहा आप कहे तो एक और तो सब के सब बोल पड़े- संसद के रिश्तेदार को मारो गोली, नौकरी तो इस जुगाड़ टेक्नोलॉजी वाले को दी जाती है।
००० 
छंद शाला २ छंद के तत्व ० पंक्ति/ पद (मिसरा, लाइन) पंक्ति को पद भी कहा जाता है। पंक्ति संख्या छंद वर्गीकरण का एक आधार भी है। यथा- दो पदिक/दो पदीय छंद- दोहा, सोरठा, चौपाई, शे'र, कप्लेट आदि, त्रिपदिक छंद- माहिया हाइकु, कुकुप, दुमदार दोहा, कबीरा आदि, चतुष्पदिक काव्य- सवैया, दंडक, रोला, मुक्तक, रूबाई आदि, षट्पदिक छंद- कुंडलिया, कुंडलिका आदि, चौदह पदीय छंद- सॉनेट आदि। पद शब्द काव्य रचना के अर्थ में भी प्रयोग किया जाता है। जैसे- सूर के पद, भक्ति के पद आदि।

काव्य के कथ्य को लयबद्ध करने हेतु तुकांत (काव्य-पंक्तियों के अंत में समान ध्वनि/स्वर वाले शब्द का होना यथा- मुक्ति-युक्ति, युद्ध-बुद्ध, सरल-विरल आदि) व पदांत (एंड ऑफ लाइन अर्थात पंक्ति का अंतिम शब्द) का प्रयोग किया जाता है।
पदांत/पंकत्यांत (रदीफ़) पंक्ति के अंत में प्रयुक्त उच्चार/वर्ण/मात्रा को पदांत कहा जाता है। यह 'पद' और 'अंत' शब्दों से मिलकर बना है। यह छंद पंक्ति के अंत में प्रयुक्त शब्द का आखिरी वर्ण होता है। निम्न दोहे में 'र' पदांत है।

तुकांत (अंत्यानुप्रास, काफ़िया, राइम स्कीम)
यह पदांत के पहले आया समान ध्वनि/स्वर (तुक) वाला शब्द होता है। 'काफ़िया मिलाना' एक रोचक खेल है। निम्न दोहे में 'त्योहार' तथा 'उपहार' तुकांत हैं।
पदांत और तुकांत में अंतर- हर तुकांत शब्द पदांत होता है लेकिन हर पदांत शब्द तुकांत नहीं होता। तुकांत का उद्देश्य समान ध्वनि है जबकि पदांत का उद्देश्य केवल पंक्ति का अंत सूचित करना है। 
समांत तुकांत के पूर्व प्रयुक्त समान समान ध्वनि/स्वर (तुक) वाला शब्द समांत कहा जाता है। निम्न दोहे में 'प्रवेश' तथा 'निवेश' समांत हैं। समांत का होना अनिवार्य नहीं होता।

चरणान्त/गणान्त चरण के अंत में प्रयुक्त गण (तीन अक्षर) को चरणान्त कहते हैं। उक्त दोहे में 'त्योहार' व 'उपहार' (२२१ तगण) चरणांत है।

जन्म ब्याह राखी तिलक, गृह-प्रवेश त्योहार।
२ १ २ १ २ २ १ १ १ १ १ १ २ १ २ २ १ पानी पौधे पुस्तकें, शुभ निवेश उपहार।।
२ २ २ २ २ १ २ १ १ १ २ १ १ १ २ १ यह दोहा है, इसमें दो पंक्तियाँ (पद) हैं। पहली पंक्ति पूर्ण विराम तक तथा दूसरी पंक्ति पूर्ण विराम के बाद है। इसमें २ विषम चरण (पहला- तीसरा १३ मात्रिक) 'रहिमन देख बड़ेन को' व 'जहाँ काम आवै सुई' तथा २ सम चरण (दूसरा- चौथा ११ मात्रिक) 'लघु न दीजिए डार' तथा 'कहा करे तरवार' हैं।

दोहा लिखना सीखिए ० दोहा उच्चार काल गणना पर आधारित दो पंक्तियों का छंद है। दो छंद में 'दो' का वर्चस्व है। पंक्ति संख्या २- जन्म ब्याह राखी तिलक, गृह-प्रवेश त्योहार तथा पानी पौधे पुस्तकें, शुभ निवेश उपहार।। हर पंक्ति में चरण २- एक विषम चरण एक सम चरण । तेरह मात्रिक विषम चरण २ (पहला, तीसरा)- जन्म ब्याह राखी तिलक तथा पानी पौधे पुस्तकें । ग्यारह मात्रिक सम चरण २ (दूसरा, चौथा)- गृह-प्रवेश त्योहार तथा शुभ निवेश उपहार। चरण के आरंभ में समान उच्चार २- २ १ तथा २ १ एवं २ २ २ २। सम तुकीय चरणान्त २- २ १ तथा २ १।
***
क्रमश:
कार्यशाला दोहा+रोला=कुंडलिया ० दायें या बायें रहें, उभय नयन के कोर। उत्तर दक्षिण ध्रुव रहें, ज्यों धरती के छोर।। -अशोक व्यग्र ज्यों धरती के छोर, क्षितिज पर भू-नभ मिलते। उषा-सूर्य नव भोर, स्वप्न नयनों में पलते।। कठपुतली की डोर, हाथ में इन्हें नचायें। कभी न करिए शोर, करें श्रम मंज़िल पायें ।। १.३. २०२६ ०००
पूर्णिका
जबलपूर की शान
सच मानो इरफान
कहे बाद में शे'र
पहले फूँके जान
है ऐसा किरदार
कहें जिसे इंसान
आम आदमी की
बोले खरी जुबान
दोस्त जमाने को
मान रहा नादान
'सलिल'-मुहब्बत ही
है इसका उनवान
हुईं सरस्वती जी
इस पर मेहरबान
०००
कुंडलिया
होली खेली एक से, दूजे की सुधि संग।
रंग बदलते देखकर, रंग हो रहे दंग।।
रंग हो रहे दंग, भंग पी हुए नशीले।
मुँदे आप ही आप, अजाने नैन कँटीले।।
अधर अधर बिन विकल,
कहे नहिं सजनी भोली।
थाम अधर से अधर, मना ले साजन होली।।
२.३.२०२५
०००
इंग्लिश सॉनेट
रामकिंकर
हैं रामकिंकर नहीं देह केवल,
भजन-भक्ति में लीन प्रज्ञा सनातन,
नहीं देह उनको रही गेह केवल,
बनी उपकरण राम जप हित पुरातन।
पहना वसन आत्मा ने तभी तक,
जब तक सभी कर्म बंधन न टूटे,
किया स्वच्छ दर्पण मन का गमन तक,
सजग थे कहीं कोई कालिख न छूटे।
न दो हैं किशन-राम जग को बताया,
चरित कैकई का बताया महत्तम,
शिव-राम-हनुमत को मस्तक नवाया,
कहा प्रभु कृपा पाए वह जो लघुत्तम।
थे रामकिंकर कहे जो ग़लत वो,
हैं रामकिंकर जिएँ राम को जो।
२.३.२०२४
•••
इटेलियन सॉनेट
तेरा मेरा साथ
*
तेरा मेरा साथ,
नामी अरु गुमनाम,
ज्यों हों छंद-विराम,
ले हाथों में हाथ।
राजमार्ग-फुटपाथ,
जुमला अरु पैगाम,
खास आदमी आम,
पैर उठाए माथ।
साथ मगर है दूर,
नदिया के दो तीर,
हम हैं नाथ-अनाथ।
आँखें रहते सूर,
लोई और कबीर,
साथ न रहकर साथ।
***
सॉनेट
मीन प्यासी है अपने दरिया में
*
मीन प्यासी है अपने दरिया में
डाल दो जाल फँस ही जाएगी,
इश्क है कीच धँस भी जाएगी,
ज्यों हलाला है बीच शरीआ में।
कौन किसका हुआ है दुनिया में,
साँस अरु आस सँग ही जाएगी,
ज़िंदगी खूब आजमाएगी,
गुन ही होता नहीं है गुनिया में।
आपने खुद को नहीं जाना
आईना व्यर्थ ही सदा देखा,
टकतीं और को रही आँखें।
जान लूँ गैरों को सदा ठाना,
खुद का खुद ही किया कभी लेखा?
काट लीं खुद की खुद सभी शाखें।
२.३.२०२४
***
सॉनेट
जो चले गए; वे नहीं गए।
जो रुके रहे; वे नहीं रहे।
कहें कौन बह के नहीं बहे?
कहें कौन हैं जो सदा नए?
.
जो परे रहे; न परे हुए।
जो जुड़े; नहीं वे कभी जुड़े।
जहाँ राह पग भी वहीं मुड़े।
जो सगे बने; न सगे हुए।
.
न ही आह हो; न ही वाह हो।
नहीं गैर की परवाह हो।
प्रभु! धैर्य दे जो अथाह हो।।
.
पाथेय कुछ न गुनाह हो।
गहराई हो तो अथाह हो।
गर सलिल हो तो प्रवाह हो।।
२-३-२०२३
•••
सॉनेट
प्रार्थना
सरस्वती जी सुमति दीजिए।
अंगुलियों पर रमें रमा माँ।
शिवा शक्ति दे कृपा कीजिए।।
विधि-हरि-हर हृदय सर्वदा।।
चित्र गुप्त मस्तक में बसिए।
गोद खिलाए धरती माता।
पिता गगन हो कभी न तजिए।।
पवन सखा सम शांति प्रदाता।।
आत्म दीप कर अग्नि प्रकाशित।
रहे जीव संजीव सलिल से।
मानवता हित रहें समर्पित।।
खिलें रहें हम शत शतदल से।।
कर जोड़ें, दस दिश प्रणाम कर।
सभी सुखी हों, सबका शुभ कर।।
२-३-२०२२
•••
नवगीत
सुनो शहरियों!
*
सुनो शहरियों!
पिघल ग्लेशियर
सागर का जल उठा रहे हैं
जल्दी भागो।
माया नगरी नहीं टिकेगी
विनाश लीला नहीं रुकेगी
कोशिश पार्थ पराजित होगा
श्वास गोपिका पुन: लुटेगी
बुनो शहरियों !
अब मत सपने
खुद से खुद ही ठगा रहे हो
मत अनुरागो
संबंधों के लाक्षागृह में
कब तक खैर मनाओगे रे!
प्रतिबंधों का, अनुबंधों का
कैसे क़र्ज़ चुकाओगे रे!
उठो शहरियों !
बेढब नपने
बना-बना निज श्वास घोंटते
यह लत त्यागो
साँपिन छिप निज बच्चे सेती
झाड़ी हो या पत्थर-रेती
खेत हो रहे खेत सिसकते
इमारतों की होती खेती
धुनो शहरियों !
खुद अपना सिर
निज ख्वाबों का खून करो
सोओ, मत जागो
१५-११-२०१९
***
दोहा सलिला
माँ
*
माता के दरबार में, आत्म ज्योति तन दीप।
मुक्ता मणि माँ की कृपा, सफल साधना सीप।।
*
मैया कर इतनी कृपा, रहे सत्य का बोध।
लोभ-मोह से दूर रख, बालक भाँति अबोध।।
*
जो पाया पूरा नहीं, कम कुबेर का कोष।
मातु-कृपा बिन किस तरह, हो मन को संतोष।।
*
रचना कर संसार की, माँ लेती है पाल।
माई कब कुछ दे सका, हर शिशु है कंगाल।।
*
जननी ने जाया जिन्हें, जातक सभी समान।
जाति देश या धर्म की, जय बोलें नादान।।
*
अंब! तुम्हीं जगदंब हो, तुमसे सकल जहान।
तुम ही लय गति यति तुम्हीं, तुम ही हो रस-खान।।
*
बेबे आई ई अनो, तल्ली जीजी प्लार।
अमो अमा प्यो मोज मुम, म्ये बा इमा दुलार।।
*
बीजी ब्वे माई इया, मागो पुई युम मम।
अनो मम्ज बीबी इजू, मैडी मुम पुरनम।।
*
आमा मागो मुमा माँ, मामा उम्मा स्नेह।
थाई, माई, नु, अम्मे, अम्मी, भाभी गेह।।
*
मम्मी मदर इमा ममी, अम्मा आय सुशांत।
एमा वाहू चईजी, बाऊ मामा कांत ।।
(माँ के ६० पर्यायवाची शब्द प्रयुक्त)
***
श्रृंगार गीत
*
जीवन की बगिया में
महकाये मोगरा
पल-पल दिन आज का।
*
श्वास-श्वास महक उठे
आस-आस चहक उठे
नयनों से नयन मिलें
कर में कर बहक उठे
प्यासों की अँजुरी में
मुस्काये हरसिंगार
छिन-छिन दिन आज का।
*
रूप देख गमक उठे
चेहरा चुप चमक उठे
वाक् हो अवाक 'सलिल'
शब्द-शब्द गमक उठे
गीतों की मंजरी में
खिलखलाये पारिजात
गिन -गिन दिन आज का।
*
चुप पलाश दहक उठे
महुआ सम बहक उठे
गौरैया मन संझा
कलरव कर चहक उठे
मादक मुस्कानों में
प्रमुदित हो अमलतास
खिल-खिल दिन आज का।
***
कुंडलिया
*
थोड़ी सी मस्ती हमें, दे दे जग के नाथ।
थोड़ी सी सस्ती मिले, ठंडाई भंग साथ।।
ठंडाई भंग साथ, रंग बरसाने जाएँ।
बरसाने की लली दरस दिखलाने आएँ।।
रंग लगाने मची रहे, होड़ाहोड़ी सी।
दे दे मस्ती नाथ, हमें जग के थोड़ी सी।।
***
मुक्तक
*
आप-हम हैं साथ सुख-संतोष है
सृजन सार्थक शांति का जयघोष है
सत्य-शिव-सुंदर रचें साहित्य सब
सत्-चित्-आनंद जीवन कोष है
***
मुक्तिका
*
बेच घोड़े सोइए, अब शांति है
सत्य से मुँह मोड़िए, अब शांति है
मिल गई सत्ता, करें मनमानियाँ
द्वेष नफरत बोइए, अब शांति है
बाँसुरी ले हाथ में, घर बारिए
मार पत्थर रोइए, अब शांति है
फसल जुमलों की उगाई आपने
बोझ शक का ढोइए, अब शांति है
अंधभक्तों! आँख अपनी खोलिए
सत्य को मत खोइए, अब शांति है
हैं सभी नंगे हमामों में यहाँ
शकल अपनी धोइए, अब शांति है
शांत शोलों में छिपीं चिनगारियाँ
जिद्द नाहक छोड़िए, अब शांति है
२-३-२०२०
***
दोहा की होली
*
दीवाली में दीप हो, होली रंग-गुलाल
दोहा है बहुरूपिया, शब्दों की जयमाल
*
जड़ को हँस चेतन करे, चेतन को संजीव
जिसको दोहा रंग दे, वह न रहे निर्जीव
*
दोहा की महिमा बड़ी, कीर्ति निरुपमा जान
दोहा कांतावत लगे, होली पर रसखान
*
प्रथम चरण होली जले, दूजे पूजें लोग
रँग-गुलाल है तीसरा, चौथा गुझिया-भोग
*
दोहा होली खेलता, ले पिचकारी शिल्प
बरसाता रस-रंग हँस, साक्षी है युग-कल्प
*
दोहा गुझिया, पपडिया, रास कबीरा फाग
दोहा ढोलक-मँजीरा, यारों का अनुराग
*
दोहा रच-गा, झूम सुन, होला-होली धन्य
दोहा सम दूजा नहीं. यह है छंद अनन्य
***
होलिकोत्सव २-३-२०१८
***
विमर्श - 'गाय' और सनातन धर्म ?
कहते हैं गाय माता है, ऐसा वेद में लिखा है। गौरव की बात है! माता है तो रक्षा करें; किन्तु वेद में यह कहाँ लिखा है कि गाय सनातन धर्म है, उसकी पूजा करो ?
वेद में लिखा है कि गाय माता है तो वेद में यह भी लिखा है कि उसका पति कौन है? अथर्ववेद के नवम् काण्ड का चतुर्थ ऋषभ सुक्त है, जिसके दूसरे और चौथे मन्त्र में बैल को ''पिता वत्सानां पतिरध्यानाम्'' अर्थात गाय का पति और बछड़ों का पिता कहा गया है।
तो क्या बैल को पिता मानकर पूजना होगा? गाय को ही क्यों,
ऋग्वेद (१०/६२/३१) में पृथ्वी को माता कहा गया है।,
(१०६४/९) में जल को माता कहा गया,
(यजुर्वेद १२/७८) में ''औषधीरिती मातर:'' औषधियों को माता कहा गया, तो क्या इनको पूजने लगें ?
इसी प्रकार मानस में-
''जनु मरेसि गुर बाँभन गाई।''
(मानस २/१४६/३) इनका विशेष महत्त्त्व है, गाय का भी महत्त्त्व है। जो वस्तु विकास में सहयोगी , उसी का महत्त्व होगा।
जैसे आजकल बिजली का बड़ा महत्त्व है, राष्ट्रीय सम्पत्ति है। आविष्कारों का महत्त्व तो घटता-बढ़ता ही रहता है; किन्तु इससे कोई वस्तु धर्म नहीं हो जाती।
वेद में तो यह भी लिखा है कि अत्यन्त झूठ बोलनेवालों को, मारपीट और तोड़फोड़ करनेवाले को, घमण्डी लोगों को हे राजन! उसी प्रकार छेद डालो जैसे;
कूदने वाली गाय को लात से और हाड़ी को एड़ी से मारते हैं। (अथर्ववेद, ८/६/१७)
इसी प्रकार ऋग्वेद में है-
''रजिषठया रज्या पश्व: आ गोस्तू तूर्षति पर्यग्रं दुवस्यु''
(१०/१०१/१२)
अर्थात् जिस प्रकार सेवक गाय आदि, पशु की नाक में रस्सी लगाकर, उसे पीड़ीत करते हुए आगे ले जाता है....।
इस ऋचा में गाय को पशु कहा गया और उसके रखरखाव की एक व्यवस्था दी गई, न कि ऐसा करना कोई धर्म है।
जब श्रीलंका में भारती शान्ति सेना गयी थी तो वहाँ के लिट्टे वाले कहते- जय लंकामाता! यहाँ हम कहते हैं-भारतमाता। कहीं कहते हैं गंगामाता। अमेरिका में अमेजन नदी को पिता कहते हैं।
यह तो मनुष्यों द्वारा दी हुयी मान्यताएँ हैं। उपाधि किसी को भी मिल सकती है, जैसे मदर टेरेसा। हर पादरी को क्रिश्चियन फादर कहते हैं।
हिरोशिमा पर बम गिरा तो उसे बसाने के प्रयास में उनतीस बच्चों को जन्म देनेवाली माता को वहाँ 'मदरलैण्ड' की उपाधि से विभूषित किया गया।
अस्तु परिवर्तनशील सामाजिक व्यवस्था के बारे में कोई भी लिखा-पढ़ी हर समय के लिये उपयोगी नहीं हो सकती।
उसका पीछा करेंगे तो विकसित देशों से सैकड़ों वर्ष पीछे उसी युग में पहूँच जायेंगे।
जब मोरपंख से भोजपत्र पर लिखते थे, अरणीयों को घिस कर- दो लकड़ीयों को घिस कर आग जलाते थे, उसके संग्रह की व्यवस्था भी न थी जैसा कि महाभारत काल तक था- एक ब्राह्मण की अरणी लेकर मृग भागा तो युधिष्ठिर ने पीछा किया।
.... वैदिक काल से परावर्ती पूर्वजों की शोध को नकारना तो अन्याय है ही, धृष्टता की पराकाष्ठा भी है कि उपयोग तो हम भैंस का करें किन्तु गुण गाय के गायें;
उपयोग ट्रैक्टर का करें गीत बैलों का गायें, उर्वरकों के बिना जीवन यापन न हो किन्तु महिमा गोबर की बताएँ।
गाय के पीछे नारेबाजी करनेवाले कितने ऐसे हैं जो उन बैलो को बिठाकर खिलाते हों, जिन्हों ने आजीवन उनका खेत जोता है? शायद ही कोई बैल किसान के खूँटे पर मरता हो? वृद्ध से वृद्ध बैल को सौ-पचास रुपये में बेचनेवाले क्या अपनी बला नहीं टालते? क्या वे नहीं जानते कि लेजाने वाला इनका क्या करेगा ?
(शंका-समाधान से साभार)
# विचार अवश्य करें ।।
|| श्री परमात्मने नम: ||
>~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~<
त्रुटियों हेतु क्षमायाचना पश्चात- धर्मशास्त्र 'धर्म' का मार्ग निर्देशक प्रकाश-स्तम्भ होता है। कहीं भ्रम या भटकाव पर दिशा-निर्देश का कार्य करते हैं, के अभाव में आज हम सनातन-धर्मी इस दशा-दिशा को प्राप्त हो अपेक्षाकृत अति छोटे भूखण्ड वर्तमान 'भारत' में भी अल्पसंख्यक-बहुसंख्क के विवाद में उलझे पड़े हैं। हमारा/समाज/राष्ट्र का व्यापक हित इस में सन्निहित है कि एक सर्वमान्य धर्मशास्त्र का अनुसरण करें जबकि 'गीता' हमारा ही नहीं अपितु मानवमात्र का आदिशास्त्र है।
'गीता' आज की प्रचलित भाषा में नहीं है की हमारे समकालीन महापुरुष (तपस्वी सन्त) की अनुभवगम्य व्याख्या 'यथार्थ गीता' की २-३ आवृत्ति करें और भगवान श्रीकृष्ण के आध्यात्मिक संदेश से अवगत हों। धर्मशास्त्र के रुप में उचित सम्मान प्रदान करें 'हिन्दू' के वास्तविक सम्वर्धन की ओर कदम बढायें।
***
मुक्तिका: तुम
*
तुम कैसे जादू कर देती हो
भवन-मकां में आ, घर देती हो
*
रिश्तों के वीराने मरुथल को
मंदिर होने का वर देती हो
*
चीख-पुकार-शोर से आहत मन
मरहम, संतूरी सुर देती हो
*
खुद भूखी रह, अपनी भी रोटी
मेरी थाली में धर देती हो
*
जब खंडित होते देखा विश्वास
नव आशा निशि-वासर देती हो
*
नहीं जानतीं गीत, ग़ज़ल, नवगीत
किन्तु भाव को आखर देती हो
*
'सलिल'-साधना सफल तुम्हीं से है
पत्थर पल को निर्झर देती हो
***
श्रृंगार गीत
तुम सोईं
*
तुम सोईं तो
मुँदे नयन-कोटर में सपने
लगे खेलने।
*
अधरों पर छा
मंद-मंद मुस्कान कह रही
भोर हो गयी,
सूरज ऊगा।
पुरवैया के झोंके के संग
श्याम लटा झुक
लगी झूलने।
*
थिर पलकों के
पीछे, चंचल चितवन सोई
गिरी यवनिका,
छिपी नायिका।
भाव, छंद, रस, कथ्य समेटे
मुग्ध शायिका
लगी झूमने।
*
करवट बदली,
काल-पृष्ठ ही बदल गया ज्यों।
मिटा इबारत,
सबक आज का
नव लिखने, ले कोरा पन्ना
तजकर आलस
लगीं पलटने।
*
ले अँगड़ाई
उठ-बैठी हो, जमुहाई को
परे ठेलकर,
दृष्टि मिली, हो
सदा सुहागन, कली मोगरा
मगरमस्त लख
लगी महकने।
*
बिखरे गेसू
कर एकत्र, गोल जूड़ा धर
सर पर, आँचल
लिया ढाँक तो
गृहस्वामिन वन में महुआ सी
खिल-फूली फिर
लगी गमकने।
*
मृगनयनी को
गजगामिनी होते देखा तो
मकां बन गया
पल भर में घर।
सारे सपने, बनकर अपने
किलकारी कर
लगे खेलने।
२-३-२०१६
***
श्रृंगार गीत:
.
खफ़ा रहूँ तो
प्यार करोगे
यह कैसा दस्तूर है ?
प्यार करूँ तो
नाजो-अदा पर
मरना भी मंज़ूर है.
.
आते-जाते रंग देखता
चेहरे के
चुप-दंग हो.
कब कबीर ने यह चाहा
तुम उसे देख
यूं तंग हो?
गंद समेटी सिर्फ इसलिए
प्रिय! तुम
निर्मल गंग हो
सोचा न पाया पल आयेगा
तुम्हीं नहीं
जब सँग हो.
होली हो ली
अब क्या होगी?
भग्न आस-सन्तूर है.
खफ़ा रहूँ तो
प्यार करोगे
यह कैसा दस्तूर है ?
प्यार करूँ तो
नाजो-अदा पर
मरना भी मंज़ूर है.
.
फाग-राग का रिश्ता-नाता
कब-किसने
पहचाना है?
द्वेष-घृणा की त्याज्य सियासत
की होली
धधकाना है.
जड़ जमीन में जमा जुड़ सकें
खेत-गाँव
सरसाना है.
लोकनीति की रंग-पिचकारी
संसद में
भिजवाना है.
होली होती
दिखे न जिसको
आँखें रहते सूर है.
खफ़ा रहूँ तो
प्यार करोगे
यह कैसा दस्तूर है ?
प्यार करूँ तो
नाजो-अदा पर
मरना भी मंज़ूर है.
२.३.२०१५
***
मुक्तिका:
रूह से...
*
रूह से रू-ब-रू अगर होते.
इस तरह टूटते न घर होते..
आइना देखकर खुशी होती.
हौसले गर जवां निडर होते..
आसमां झुक सलाम भी करता.
हौसलों को मिले जो पर होते..
बात बोले बिना सुनी जाती.
दिल से निकले हुए जो स्वर होते..
होते इंसान जो 'सलिल' सच्चे.
आह में भी लिए असर होते..
२.३.२०१३
***