कुल पेज दृश्य

हास्य लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
हास्य लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 20 मई 2026

मई २०, रूपमाला, अपूर्णान्वयी, छंद, मधुमक्खी, दोहा, आँख, शे 'र, हास्य, नवगीत, कुण्डलिया, ग़ज़ल, सोरठा

सलिल सृजन मई २०
विश्व मधुमक्खी दिवस
*
सोरठा सलिला
.
कार हुई बेकार, चला साइकिल यार अब।
बहा पसीना धार, देशभक्त बन सके तब।।
.
खर्च घटाएँ आप, नेता भत्ते  छोड़कर।
क्षेत्र पैर से नाप, भू से खुद को जोड़कर।।
.
कर सड़कों पर सैर, जज जज कर पाए समस्या।
मनु कम ज्यादा कार, दुर्घटना का हेतु क्या?? 
.
घर का जेवर बेच, हो जा तू कंगाल अब।
कहें क्रिकेट प्रभु क्यों, आप जोड़कर माल सब।।
.
राजमार्ग पर खूब, बैलगाड़ियाँ अब चलें।
गधे गधों पर बैठ, जन प्रतिनिधि बनकर छलें।।
.
मिले कलेक्टर रोज, चौराहों पर सिपाही। 
माँग सके नहिं घूस, वाहा वाही खूब हो।। 
जीना लें अब सीख, जीवन है तो खा हवा।। 
तू जनता सा दीख, नेताजी से मत कहें ।। 
दोस्त ट्रम्प का मौन, देख रहा है छल-कपट। 
दुख समझेगा कौन, सगा सियासत में नहीं।। 
दर दर भटके व्यर्थ, मिले खूब सम्मान पर। 
कहीं न पाया अर्थ, सब मतलब के यार हैं।। 
पत्रकार नीलाम, हर चैनल के हो रहे। 
जो भी देगा दाम, गीत उसी के गा रहे।। 
सत्ता बिना लगाम, राजमार्ग पर दौड़ती। 
नियम बनाती आप, आप स्वार्थ हित तोड़ती।। 
००० 
छंद शाला
दोहा+रोला=कुंडलिया
नर पर नारी के पड़ें, नयन सर्वदा बीस।
पड़े कभी जब आँकड़ा,
नयनों का छत्तीस।। - अशोक व्यग्र
नयनों का छत्तीस, सुहाए कभी न नाता।
रहे तिरेसठ सदा, 'सलिल' सबके मन भाता।।
नयन नयन में डूब, संग रहें पर नहिं गड़ें।
नयन सर्वदा बीस, नर पर नारी के पड़ें।।
नर पर नारी के पड़ें, नयन सर्वदा बीस।
पड़े कभी जब आँकड़ा,
नयनों का छत्तीस।। - अशोक व्यग्र
नयनों का छत्तीस, नहीं अनुबंध कभी हो।
नयन फेर लें नयन, नहीं प्रतिकूल कभी हो।।
नयन चलाए व्यग्र, नयन पर कभी न आरी।
नयन रहें संजीव, न भारी नर पर नारी।।
२०.५.२०२६
०००
आभूषण धारण करने से शरीर पर प्रभाव

* अगर आपका चंद्रमा कमजोर है तो आपको अंगूठी और कड़े ज़रूर पहननी चाहिए , अपने हाथ के अंगूठे मैं अगर आप चाँदी का छल्ला डालते है और साथ में अपनी कलाई का हिस्सा टाइट करके रखते है कड़े पहन कर तो उससे आपके मानसिक विकार दूर होते है , चांदी अपने आप में ही एक ANTIBIOTIC है | चांदी का प्रयोग करने से हमारे शरीर में ठंडक और शीतलता आती है , हमारे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ्ने लगती है , एकाग्रता और आत्मविश्वास में भी वृद्धि आती है |

* पुराने जमाने में बाजूबंद का चलन हुआ करता था , पर आजकल ज्यादा नहीं रह गया है | बाजूबंद हमारी कोहनी और कंधे के बिल्कुल बीचों बीच पहना जाता है , अगर हम इस्स हिस्से को बांधकर रखते है , यानि की हम बाजूबंद पहन कर रखते है तो यहा कुछ ऐसे Acupressure points होते है जो हमारी भूख और पेट से संबंधित बीमारियों को नियंत्रण में रखता है , अगर बाजूबंद पहने , तो जिनको गैस और धूप के कारण Migraine या सर दर्द जैसी शिकायतों से निजात पा सकते है , तनाव से होने वाले सर दर्द में भी यह बाजूबंद पहना चाहिए , और अगर आप सोना , चांदी और तांबे से बना हुआ त्रिधातु का बाजूबंद पहनते है तो यह आपका लिवर और भूख को ठीक रखता है |

नाभि हमारे पूरे शरीर का ऊर्जा का केंद्र है , Kidney , urine , liver , carbohydrate management , uterus यह सब यही से नियंत्रित होता है , नाभि हमारी मानसिक शक्ति को भी नियंत्रित रखती है , अगर इन में से आपको कही पर भी दिक्कत आ रही है तो कमरबंद पहना चाहिए नाभि से तीन उंगल ऊपर या नीचे |

हमारे कान हमारे दिमाग तक जा रहे खून का दौरा नियंत्रित रखता है , जहा कान छेदा जाता है और जहा पुरुष और महिलायें बालियाँ पहनती है , वह कुछ ऐसे प्रैशर पॉइंट्स होते है जो दिमाग तक जा रहे खून के दौरे में मदद करते है , अगर कानो में चांदी और तांबे से मिली हुई बालियाँ पहनते है तो काफी सारी बीमारियों से बचा जा सकता है | कन छेदन 3 वर्ष के बाद कभी भी करवाया जा सकता है |

* नाक हमारे शरीर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है क्यूंकी यही से हम वायु अपने शरीर के अंदर लेकर जीवन शक्ति उत्पन्न करते है , हमारे शरीर की तीन नाड़ियों का स्वर यही आकर मिलता है , सूर्य , चन्द्र और सुषुम्ना , नथ पहनने से हमारी ज्ञान की शक्ति बड़ती है , और हमारे दिमाग में शक्ति का संचालन सही ढंग से होने लगता है |

* जहा महिलायें पायल पहनती है वह हिस्सा हमारे शरीर की बलता और शक्ति को दर्शाता है , पायल पहनने से हमारे पूरे शरीर में रक्त संचार सही ढंग से होने लगता है , शरीर में शक्ति बढ़ने लगती है , पेट और लिवर से जुड़ी समस्या में भी कमी आती है , अगर आप पायल नहीं पहन सकते तो आप पायल की जगह एक सूती काला धागा भी बांध सकते है |
०००
कुण्डलिया 
गुरु से कुछ गुर बिन लिए, सलिल न हो संजीव।
सासों के फँदे फँसे, जामाता निर्जीव।।
जामाता निर्जीव, डुकरिया की कर सेवा।
बीबी बेटी हुई, खिलाए गुल हे देवा।।
कर भविष्य की फिक्र, ब्याह वह करे न फिर से।
सास जमाई साथ, न जाए गुर ले गुरु से।।
२०.५.२०२५
***
दोहा सलिला
*
नारी नदिया पुरुष की, नाव लगाती पार।
मचले तो देती डुबा, रूठ बीच मझधार।।
*
कांता जैसी चाँदनी, लिये हाथ में हाथ।
कांत चाँद सा सोहता, सदा उठाए माथ।।
*
कैसे हैं? क्या होएँगे?, सोच न आती काम।
जैसा चाहे विधि रखे, करे न बस बेकाम।
*
मन बच्चा-सच्चा रहे, कच्चा तन बदनाम।
बिन टूटे बादाम हो, टूटे तो बेदाम।।
*
मार न पड़ती उम्र की, बढ़ता अनुभव-तेज।
तब करते थे जंग, अब जमा रहे हैं रंग।।
*
समय छोड़ पाया नहीं, अपना तनिक प्रभाव।
तब सा अब भी चेहरा, आदत, सृजन, स्वभाव।।
*
छीन रहे थे और के, मुँह से रोटी-कौर।
अपने मुँह से छिन गया, आया ऐसा दौर।।
*
मन बच्चा-सच्चा रहे, कच्चा तन बदनाम।
बिन टूटे बादाम हो, टूटे तो बेदाम।।
*
कैसे हैं? क्या होएँगे?, सोच न आती काम।
जैसा चाहे विधि रखे, करे न बस बेकाम।
*
कांता जैसी चाँदनी, लिये हाथ में हाथ।
कांत चाँद सा सोहता, सदा उठाए माथ।।
*
मिल कर भी मिलती नहीं, मंजिल खेले खेल।
यात्रा होती रहे तो, हर मुश्किल लें झेल।।
*
मार न पड़ती उम्र की, बढ़ता अनुभव संग।
तब करते थे जंग, अब जमा रहे हैं रंग।।
२०-५-२०१८
***
पुस्तक चर्चा-
संक्रांतिकाल की साक्षी कवितायें
आचार्य भगवत दुबे
*
[पुस्तक विवरण- काल है संक्रांति का, गीत-नवगीत संग्रह, आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', प्रथम संस्करण २०१६, आकार २२ से.मी. x १३.५ से.मी., आवरण बहुरंगी, पेपरबैक जैकेट सहित, पृष्ठ १२८, मूल्य जन संस्करण २००/-, पुस्तकालय संस्करण ३००/-, समन्वय प्रकाशन, २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१]
कविता को परखने की कोई सर्वमान्य कसौटी तो है नहीं जिस पर कविता को परखा जा सके। कविता के सही मूल्याङ्कन की सबसे बड़ी बाधा यह है कि लोग अपने पूर्वाग्रहों और तैयार पैमानों को लेकर किसी कृति में प्रवेश करते हैं और अपने पूर्वाग्रही झुकाव के अनुरूप अपना निर्णय दे देते हैं। अतः, ऐसे भ्रामक नतीजे हमें कृतिकार की भावना से सामंजस्य स्थापित नहीं करने देते। कविता को कविता की तरह ही पढ़ना अभी अधिकांश पाठकों को नहीं आता है। इसलिए श्री दिनकर सोनवलकर ने कहा था कि 'कविता निश्चय ही किसी कवि के सम्पूर्ण व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति है। किसी व्यक्ति का चेहरा किसी दूसरे व्यक्ति से नहीं मिलता, इसलिए प्रत्येक कवी की कविता से हमें कवी की आत्मा को तलाशने का यथासम्भव यत्न करना चाहिए, तभी हम कृति के साथ न्याय कर सकेंगे।' शायद इसीलिए हिंदी के उद्भट विद्वान डॉ. रामप्रसाद मिश्र जब अपनी पुस्तक किसी को समीक्षार्थ भेंट करते थे तो वे 'समीक्षार्थ' न लिखकर 'न्यायार्थ' लिखा करते थे।
रचनाकार का मस्तिष्क और ह्रदय, अपने आसपास फैले सृष्टि-विस्तार और उसके क्रिया-व्यापारों को अपने सोच एवं दृष्टिकोण से ग्रहण करता है। बाह्य वातावरण का मन पर सुखात्मक अथवा पीड़ात्मक प्रभाव पड़ता है। उससे कभी संवेद नात्मक शिराएँ पुलकित हो उठती हैं अथवा तड़प उठती हैं। स्थूल सृष्टि और मानवीय भाव-जगत तथा उसकी अनुभूति एक नये चेतन संसार की सृष्टि कर उसके साथ संलाप का सेतु निर्मित कर, कल्पना लोक में विचरण करते हुए कभी लयबद्ध निनाद करता है तो कभी शुष्क, नीरस खुरदुरेपन की प्रतीति से तिलमिला उठता है।
गीत-नवगीत संग्रह 'काल है संक्रांति का' के रचनाकार आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' श्रेष्ठ साहित्यिक पत्रिका 'दिव्य नर्मदा' के यशस्वी संपादक रहे हैं जिसमें वे समय के साथ चलते हुए १९९४ से अंतरजाल पर अपने चिट्ठे (ब्लॉग) के रूप में निरन्तर प्रकाशित करते हुए अब तक ४००० से अधिक रचनाएँ प्रकाशित कर चुके हैं। अन्य अंतर्जालीय मंचों (वेब साइटों) पर भी उनकी लगभग इतनी ही रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। वे देश के विविध प्रांतों में भव्य कार्यक्रम आयोजित कर 'अखिल भारतीय दिव्य नर्मदा अलंकरण' के माध्यम से हिंदी के श्रेष्ठ रचनाकारों के उत्तम कृतित्व को वर्षों तक विविध अलंकरणों से अलंकृत करने, सत्साहित्य प्रकाशित करने तथा पर्यावरण सुधर, आपदा निवारण व् शिक्षा प्रसार के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने का श्रेय प्राप्त अभियान संस्था के संस्थापक-अध्यक्ष हैं। इंजीनियर्स फॉर्म (भारत) के महामंत्री के अभियंता वर्ग को राष्ट्रीय-सामाजिक दायित्वों के प्रति सचेत कर उनकी पीड़ा को समाज के सम्मुख उद्घाटित कर सलिल जी ने सथक संवाद-सेतु बनाया है। वे विश्व हिंदी परिषद जबलपुर के संयोजक भी हैं। अभिव्यक्ति विश्वम दुबई द्वारा आपके प्रथम नवगीत संग्रह 'सड़क पर...' की पाण्डुलिपि को 'नवांकुर अलंकरण २०१६' (१२०००/- नगद) से अलङ्कृत किया गया है। अब तक आपकी चार कृतियाँ कलम के देव (भक्तिगीत), लोकतंत्र का मक़बरा तथा मीत मेरे (काव्य संग्रह) तथा भूकम्प ले साथ जीना सीखें (लोकोपयोगी) प्रकाशित हो चुकी हैं।
सलिल जी छन्द शास्त्र के ज्ञाता हैं। दोहा छन्द, अलंकार, लघुकथा, नवगीत तथा अन्य साहित्यिक विषयों के साथ अभियांत्रिकी-तकनीकी विषयों पर आपने अनेक शोधपूर्ण आलेख लिखे हैं। आपको अनेक सहयोगी संकलनों, स्मारिकाओं तथा पत्रिकाओं के संपादन हेतु साहित्य मंडल श्रीनाथद्वारा ने 'संपादक रत्न' अलंकरण से सम्मानित किया है। हिंदी साहित्य सम्मलेन प्रयाग ने संस्कृत स्त्रोतों के सारगर्भित हिंदी काव्यानुवाद पर 'वाग्विदाम्बर सम्मान' से सलिल जी को सम्मानित किया है। कहने का तात्पर्य यह है कि सलिल जी साहित्य के सुचर्चित हस्ताक्षर हैं। 'काल है संक्रांति का' आपकी पाँचवी प्रकाशित कृति है जिसमें आपने दोहा, सोरठा, मुक्तक, चौकड़िया, हरिगीतिका, आल्हा अदि छन्दों का आश्रय लेकर गीति रचनाओं का सृजन किया है।
भगवन चित्रगुप्त, वाग्देवी माँ सरस्वती तथा पुरखों के स्तवन एवं अपनी बहनों (रक्त संबंधी व् मुँहबोली) के रपति गीतात्मक समर्पण से प्रारम्भ इस कृति में संक्रांतिकाल जनित अराजकताओं से सजग करते हुए चेतावनी व् सावधानियों के सन्देश अन्तर्निहित है।
'सूरज को ढाँके बादल
सीमा पर सैनिक घायल
नाग-सांप फिर साथ हुए
गुँजा रहे वंशी मादल
लूट-छिप माल दो
जगो, उठो।'
उठो सूरज, जागो सूर्य आता है, उगना नित, आओ भी सूरज, उग रहे या ढल रहे?, छुएँ सूरज, हे साल नये आदि शीर्षक नवगीतों में जागरण का सन्देश मुखर है। 'सूरज बबुआ' नामक बाल-नवगीत में प्रकृति उपादानों से तादात्म्य स्थापित करते हुए गीतकार सलिल जी ने पारिवारिक रिश्तों के अच्छे रूपक बाँधे हैं-
'सूरज बबुआ!
चल स्कूल।
धरती माँ की मीठी लोरी
सुनकर मस्ती खूब करी।
बहिम उषा को गिर दिया
तो पिता गगन से डाँट पड़ीं।
धूप बुआ ने लपक उठाया
पछुआ लायी
बस्ते फूल।'
गत वर्ष के अनुभवों के आधार पर 'में हिचक' नामक नवगीत में देश की सियासी गतिविधियों को देखते हुए कवी ने आशा-प्रत्याशा, शंका-कुशंका को भी रेखांकित किया है।
'नये साल
मत हिचक
बता दे क्या होगा?
सियासती गुटबाजी
क्या रंग लाएगी?
'देश एक' की नीति
कभी फल पाएगी?
धारा तीन सौ सत्तर
बनी रहेगी क्या?
गयी हटाई
तो क्या
घटनाक्रम होगा?'
पाठक-मन को रिझाते ये गीत-नवगीत देश में व्याप्त गंभीर समस्याओं, बेईमानी, दोगलापन, गरीबी, भुखमरी, शोषण, भ्रष्टाचार, उग्रवाद एवं आतंक जैसी विकराल विद्रूपताओं को बहुत शिद्दत के साथ उजागर करते हुए गम्भीरता की ओर अग्रसर होते हैं।
बुंदेली लोकशैली का पुट देते हुए कवि ने देश में व्याप्त सामाजिक, आर्थिक, विषमताओं एवं अन्याय को व्यंग्यात्मक शैली में उजागर किया है।
मिलती काय ने ऊँचीबारी
कुर्सी हमखों गुईंया
पैला लेऊँ कमिसन भारी
बेंच खदानें सारी
पाँछू घपले-घोटालों सों
रकम बिदेस भिजा री
समीक्ष्य कृति में 'अच्छे दिन आने वाले' नारे एवं स्वच्छता अभियान को सटीक काव्यात्मक अभिव्यक्ति दी गयी है। 'दरक न पायेन दीवारें नामक नवगीत में सत्ता एवं विपक्ष के साथ-साथ आम नागरिकों को भी अपनी ज़िम्मेदारियों के प्रति सचेष्ट करते हुए कवि ने मनुष्यता को बचाये रखने की आशावादी अपील की है।
कवी आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने वर्तमान के युगबोधी यथार्थ को ही उजागर नहीं किया है अपितु अपनी सांस्कृतिक अस्मिता के प्रति सुदृढ़ आस्था का परिचय भी दिया है। अतः, यह विश्वास किया जा सकता है कि कविवर सलिल जी की यह कृति 'काल है संक्रांति का' सारस्वत सराहना प्राप्त करेगी।
आचार्य भगवत दुबे
महामंत्री कादंबरी
***
दोहों के रंग आँख के संग
*
आँख लड़ी झुक उठ मिली, मुंदी कहानी पूर्ण
लाड़ मुहब्बत ख्वाब सँग, श्वास-आस का चूर्ण
*
आँख कहानी लघुकथा, उपन्यास रस छंद
गीत गजल कविता भजन, सुख-दुःख परमानंद
*
एक आँख से देखते, धूप-छाँव जो मीत
वही उतार-चढ़ाव पर, चलकर पाते जीत
*
धूल झोंकते आँख में, आँख बिछाकर लोग
चुरा-मिला आँखें दिखा, झूठ मनाते सोग
*
कभी किसी की आँख का, बनें न काँटा आप
कभी आप की आँख में, सके न काँटा व्याप
*
***
नवगीत:
*
जिंदगी के गणित में
कुछ इस तरह
उलझे हैं हम.
बंदगी के गणित
कर लें हल
रही बाकी न दम.
*
इंद्र है युग लीन सुख में
तपस्याओं से डरे.
अहल्याओं को तलाशे
लाख मारो न मरे.
जन दधीची अस्थियाँ दे
बनाता विजयी रहा-
हुई हर आशा दुराशा
कभी कुछ संयम वरे.
कामनाओं से ग्रसित
होकर भ्रमित
बिखरे हैं हम.
वासनाओं से जड़ित
होते दमित
अँखियाँ न नम.
जिंदगी के गणित में
कुछ इस तरह
उलझे हैं हम.
बंदगी के गणित
कर लें हल
चलो मिलकर सनम.
*
पडोसी के द्वार पर जा
रोज छिप कचरा धरें.
चाह आकर विधाता-
नित व्याधियाँ-मुश्किल हरें .
सुधारों का शंख जिसने
बजाया विनयी रहा-
सिया को वन भेजता जो
देह तज कैसे तरे?
भूल को स्वीकार
संशोधन किये
निखरे हैं हम.
शूल से कर प्यार
वरते कूल
लहरें हैं न कम.
जिंदगी के गणित में
कुछ इस तरह
उलझे हैं हम.
बंदगी के गणित
कर लें हल
बढ़ें संग रख कदम.
*
***
द्विपदी सलिला:
*
जो दिखता होता नहीं, केवल उतना सत्य
छोटे तन में बड़ा मन, करता अद्भुत कृत्य
*
ओझा कर दे टोटका, फूंक कभी तो मन्त्र
मन-अँगना में भी लगे, फूलों का संयंत्र
*
नित मन्दिर में माँगते, किन्तु न होते तृप्त
दो चहरे ढोते फिरे, नर-पशु सदा अतृप्त
*
जब जो जी चाहे करे, राजा वह ही न्याय
लोक मान्यता कराती, राजा से अन्याय
*
पर उपकारी हैं बहुत, हम भारत के लोग
मुफ्त मशवरे दें 'सलिल', यही हमारा रोग
*
वक़्त सुनता ही नहीं सिर्फ सुनाता रहता
नजर घरवाली की ही इसमें अदा आती है
*
दिखाया आईना मैंने कि वो भी देख सके
आँख में उसकी बसा चेहरा मेरा ही है
*
आसमां को थाम लें हाथों में अपने हम अगर
पैर ज़माने के लिये जमीं रब हमें दे दे
*
तुम्हें जानना है महज इसलिए ही
दुनिया के सारे शिखर नापते हैं
*
दिले-दिलवर को खटखटाते रहे नज़रों से
आँख का डाकिया पैगाम कभी तो देगा
*
बेरुखी लाख दिखाये वो सरे-आम मगर
नज़र जो मिल के झुके प्यार भी हो सकती है
*
अंत नहीं है प्यास का, नहीं मोह का छोर
मुट्ठी में ममता मिली, दिनकर लिया अँजोर
*
लेन-देन जिंदगी में इस कदर बढ़ा
बाकी नहीं है फर्क आदमी-दूकान में
*
साथ चलते हाथ छूटे कब-कहाँ- कैसे कहें
बेहतर है फिर मिलें मन मीत! हम कुछ मत कहें
*
सारे सौदे वो नगद करता है जन्म से ही रहे उधार हैं हम
सारी दुनिया में जाके कहते हैं भारत में हुए सुधार हैं हम
२०-५-२०१५
*

छंद सलिला:
रूपमाला छंद
*
छंद-लक्षण: जाति अवतारी, प्रति चरण मात्रा २४ मात्रा, यति चौदह-दस, पदांत गुरु-लघु (जगण)
लक्षण छंद:
रूपमाला रत्न चौदह, दस दिशा सम ख्यात
कला गुरु-लघु रख चरण के, अंत उग प्रभात
नाग पिंगल को नमनकर, छंद रचिए आप्त
नव रसों का पान करिए, ख़ुशी हो मन-व्याप्त
उदाहरण:
१. देश ही सर्वोच्च है- दें / देश-हित में प्राण
जो- उन्हीं के योग से है / देश यह संप्राण
करें श्रद्धा-सुमन अर्पित / यादकर बलिदान
पीढ़ियों तक वीरता का / 'सलिल'होगा गान
२. वीर राणा अश्व पर थे, हाथ में तलवार
मुगल सैनिक घेर करते, अथक घातक वार
दिया राणा ने कई को, मौत-घाट उतार
पा न पाये हाय! फिर भी, दुश्मनों से पार
ऐंड़ चेटक को लगायी, अश्व में थी आग
प्राण-प्राण से उड़ हवा में, चला शर सम भाग
पैर में था घाव फिर भी, गिरा जाकर दूर
प्राण त्यागे, प्राण-रक्षा की- रुदन भरपूर
किया राणा ने, कहा: 'हे अश्व! तुम हो धन्य
अमर होगा नाम तुम हो तात! सत्य अनन्य।
२०-५-२०१४
***
अपूर्णान्वयी छंद:
(Enjambment poetry in Hindi)
झूठ न होता झूठ
*
'झूठ कभी मत बोलना', शिक्षक ने दी सीख
पूछा बालक ने: 'कहाँ इससे बढ़कर झूठ।
झूठ न बोलें तो कहें, कैसे होगा काम?
काम बिना हो जाएगा, अपना काम तमाम।
झूठ बिना क्या कहेगा? नेता, पंडित, चोर।
रहे मौन तो नहीं क्या, होगा संकट घोर?
झूठ बिना थाने सभी, हो जायेंगे बंद।
सभी वकील-अदालतें, गायेंगे क्या छंद?
झूठ बिना क्या कहेंगे, दफ्तर जाकर लेट?
छापा मारे आयकर, जिस पर वह अपसेट।
झूठ बिना खुद सत्य भी, मर जाए बिन मौत।
क्या कह दें? पूछे पुलिस कौन हुआ है फौत?
'झूठ न होता झूठ गर सच दें उसको नाम।'
शिक्षक बोला, छात्र ने सविनय किया प्रणाम।।
***
हास्य रचना
बतलायेगा कौन?
*
मैं जाता था ट्रेन में, लड़ा मुसाफिर एक.
पिटकर मैंने तुरत दी, धमकी रखा विवेक।।
मुझको मारा भाई को, नहीं लगाना हाथ।
पल में रख दे फोड़कर, हाथ पैर सर माथ ।।
भाई पिटा तो दोस्त का, उच्चारा था नाम।
दोस्त और फिर पुत्र को, मारा उसने थाम।।
रहा न कोई तो किया, उसने एक सवाल।
आप पिटे तो मौन रह, टाला क्यों न बवाल?
क्यों पिटवाया सभी को, क्या पाया श्रीमान?
मैं बोला यह राज है, किन्तु लीजिये जान।।
अब घर जाकर सभी को रखना होगा मौन।
पीटा मुझको किसी ने, बतलायेगा कौन??
२०-५-२०१३
+++

शनिवार, 2 मई 2026

मई २, हास्य, दोहा, लघुकथा, देवरहा बाबा, नज़्म, घनाक्षरी, प्रभाती उड़ियाना छंद,

सलिल सृजन मई २
*
नर्मदांचल (मध्य प्रदेश) के नवगीतकार
नवगीत विधा के विकास में नर्मदांचल में जन्में,  निवास कर रहे ,  कार्यरत रहे नवगीतकारों का विपुल योगदान रहा है किन्तु उस अनुपात में उनके अवदान पर चर्चा नहीं हुई।  नवगीत के अध्येताओं/समलीचकों से अनुरोध है कि सहमति लेकर किसी एक नवगीतकार पर लगभग ६ पृष्ठ का समालोचनात्मक आलेख ९४२५१८३२४४ पर वाट्स ऐप करें। 
००० 
हास्य कविता
*
प्रभु! तुम करते गड़बड़ झाला
हमसे कह मत कर घोटाला
दुनिया रच दी तुमने गोल
बाहर-भीतर पोलमपोल
चूहे को बिल्ली धमकाती
खुद कुत्ते से है भय खाती
देख आदमी कुत्ता डरता
जैसा मालिक बोले करता
डरे आदमी बीबी जी से
बेमन से या मनमर्जी से
चूहे से बीबी डरती है
कहती है पति पर मरती है
पति जीता कह तुझ पर मरता
नज़र पड़ोसन पर है धरता
जहाँ सफेद वहीं है काला
प्रभु! तुम करते गड़बड़ झाला
२-५-२०२१
***
भूमिका
हस्तिनापुर की बिथा कथा
डॉ. सुमन श्रीवास्तव
*
बुन्देलखण्ड के बीसेक जिलों में बोली जाबे बारी बोली बुंदेली कित्ती पुरानी है, कही नईं जा सकत। ई भासा की माता सौरसैनी प्राकृत और पिता संस्कृत हैं, ऐंसी मानता है। मनों ई बूंदाबारी की अलग चाल है, अलग ठसक है, अलग कथनी है और अलगइ सुभाव है। औरंगजेब और सिबाजी के समय, हिन्दू राजाओं के लानें सरकारी सन्देसे, बीजक, राजपत्र और भतम-भतम के दस्ताबेज बुन्देली र्मेंइं लिखे जात ते। गोंड़ राजाओं की सनदें ऐइ भासा में धरोहर बनीं रखीं हैं। बुन्देली साहित्य कौ इतिहास सात सौ साल पुरानौ है। ई में मुलामियत भी है और तेज भी; ललितपनौ भी है और बीर रस की ललकार भी। पग-पग पे संस्कृति और जीबन-दरसन की छाप है। रचैताओं में प्रसिद्ध नाम हैं - केशवदास, पद्माकर, प्रबीनराय, ईसुरी, पंडत हरिराम ब्यास और कितेक। सबसें पहलो साहित्य जगनिक के रचे भये महाकाब्य ‘आल्हखंड’ खों मानने चइये। ए कौ लिखित रूप नें हतौ, मनों मौखिक परम्परा में जौ काब्य आज लौं खूब चल रओ। चौदवीं सताब्दी में बिश्नुदास नें सन 1435 में महाभारत और 1443 में रामायन की कथा गद्यकाब्य के रूप में लिखी हती। जइ परम्परा डाक्टर मुरारीलाल जी खरे निबाह रय। 2012 में रामान की कथा लिखी और अब 2019 में महाभारत की कथा आपके सामनें ‘हस्तिनापुर की बिथा-कथा’ नांव सें आ रइ है। महाकाब्य के लच्छनों में पहली बात कही जात है कै कथानक ऐतिहासिक होय कै होय इतिहासाश्रित। ई में मानबजीबन कौ पूरौ चित्र, पूरौ बैभव और पूरौ बैचित्र्य दिखाई देबै। महाकाब्य ब्यक्ति के लानें नईं, समस्टि के लानें रचै जाय, बल्कि कही जाय तौ ई में पूरे रास्ट्र की चेतना सामिल रहै। संस्कृत बारे साहित्यदर्पण के रचैता विश्वनाथ के कहे अनुसार महाकाब्य में आठ, नांतर आठ से जादा सर्ग रहनें चइए। मुरारीलाल जी के महाकाब्य कौ आयाम ऐंसौ है कै ई में नौ अध्याय दय हैं - 1. हस्तिनापुर कौ राजबंस, 2. कुबँरन की सिक्षा और दुर्योधन की ईरखा, 3. द्रौपदी स्वयंबर और राज्य कौ बँटबारौ, 4. छल कौ खेल और पाण्डव बनबास, 5. अग्यातबास में पाण्डव, 6. दुर्योधन को पलटबौ और युद्ध के बदरा, 7. महायुद्ध (भाग-1) पितामह की अगुआई में , 8. महायुद्ध (भाग-2) आखिरी आठ दिन, 9. महायुद्ध के बाद। सर्गों कौ बँटबारौ और नामकरन ऐंसी सोच-समझ सें करौ गओ है कै पूरौ कथानक और कथा की घटनाओं कौ क्रम स्पस्ट हो जात है और कथा कौ सिलसिलौ निरबाध रहौ आत है। अध्याय समाप्त होत समय कबि अगले अध्याय की घटना कौ आभास देत चलत हैं। कबि नें हर अध्याय में प्रसंग और घटनाओं के माफिक उपसीर्सक भी दय हैं। जैंसे - पाण्डु की मौत, धृतराष्ट्र भए सम्राट, दुर्योधन की कसक और बैमनस्य, भीम खौं मारबे के जतन । एक तौ कथानक बिकास-क्रम सें बँधो है, और दूसरे कथा खों ग्राह्य बनाओ गओ है। असल कथा मानें अधिकारिक कथा और बाकी प्रकरनों में ‘उपकार्य-उपकारक’ भाव बनौ रहत है। महाभारतीय ‘हस्तिनापुर की बिथा-कथा’ में बीच-बीच के प्रसंग ऐंसे गुँथे हैं कै मूल कथा खों बल देत हैं और ‘फिर का भओ?’ कौ कुतूहल भी बनौ रहत है।
महाकाब्य में चाय एक नायक होबै, चाय एक सें जादा, मनों उच्च कोटि के मनुस्य, देवताओं के समान ऊँचे चरित्र बारे भओ चइये, जो जनसमाज में आदर्स रख सकें और चित्त खों ऊँचे धरातल पै लै जाबें। नायक होय छत्रिय, महासत्त्व, गंभीर, छमाबन्त, स्थिरमति, गूढ़ और बात कौ धनी। ‘हस्तिनापुर की बिथा-कथा’ में भीष्म पितामह हैं, धर्मराज युधिष्ठिर घाईं सत्य पै प्रान देबै बारे पांडव तो हैंइं, सबसे बड़कें हैं स्रीकृष्ण। जे सब धीरोदात्त गुनों सें परिपूरन हैं। बात के पक्के की बात करें, तो राजा सान्तनु के पुत्र देबब्रत तो अपनी प्रतिग्या के कारनइ भीष्म कहाय गय - ऐसी भीष्म प्रतिज्ञा पै रिषि मुनि सुर बोले ‘भीष्म-भीष्म’। आसमान सें फूल बरस गए, सब्द गूँज गओ ‘भीष्म-भीष्म’।। काव्यालंकार लिखबे बारे रुद्रट ने अपेक्छा करी है कै प्रतिनायक के भी कुल कौ पूरौ बिबरन भओ चइये, सो ई रचना में प्रतिनायक कौरव और उनकौ संग दैबे बारों के जन्म, उनके कुल और उनकी मनोबृत्ती कौ बिस्तार में बरनन करौ गओ है। काव्यादर्श में दण्डी को कहबौ है - ‘आशीर्नमस्क्रिया वस्तुनिर्देशो वापि तन्मुखम्।’ मानें आंगें आशीरबाद, नमस्कार जौ सब लिखौ जाबै, नईं तौ बिशयबस्तु को निरदेस दऔ जाबै। डाॅ. मुरारीलाल खरे जी नें अपनें ग्रन्थ के सीर्सक कौ औचित्य भी बताओ है। कैसी बिथा ? ईकौ मर्म कैंसें धर में बरत दिया की लौ भड़क परी और ओई सें घर में आग लग गई, पाँच छंदों में सुरुअइ में समझा दओ है - कुरुक्षेत्र के महायुद्ध में घाव हस्तिनापुर खा गओ। राजबंस की द्वेष आग में झुलस आर्याबत्र्त गओ।। बीर महाकाब्य कौ गुन कहात है कै आख्यान भी होबै, भाव भी होबैं आरै ओज भरी और सरल भासा होबै। आख्यान खों गरओ और रोचक बनाबे के लानें संग-साथ में उपाख्यान भी चलत रहैं, जी सें मूल कथानक खों बल मिलत रहै, चरित्र सोई उभर कें सामनें आत रहैं और पड़बे-सुनबे बारे के मन में प्रभाव जमत रहै। चोट खाई अम्बा कौ भीष्म खों साप दैबौ और सिखंडी के रूप में जनम लैकें भीष्म की मृत्यु कौ कारन बनबौ; कै फिर उरबसी के शाप सें अर्जुन कौ सिखंडी के भेस में रहबौ ऐंसेइ उपाख्यान डारे गए हैं। खरे जी ने बड़ी साबधानी बरती है कै बिरथां कौ बिस्तार नें होय। ई की सफाई बे खुदई ‘अपनी बात’ में दै रय कै महाभारत की बड़ी कथा खों छोटौ करबे में कैऊ प्रसंग छोड़ने परे हैं। अरस्तू महाकाब्य खों त्रासदी की तर्ज पै देखत हैं कै ई में चार चीजें अवस्य भओ चइये - कथावस्तु, चरित्र, विचारतत्व और पदावली मानें भाषा। चरित्र महाभारत में जैंसे दय गए हैं, ऊँसइ खरे जी ने भी उतारे हैं। भीष्म पितामह कौ तेज, बीरभाव, दृढ़चरित्र, प्रताप और परिबार के लानें सबकौ हितचिन्तन सबसें ऊपर रचै गओ है। दुर्योधन के मन में सुरु से ईरखा, जलन, स्वारथ की भावना है, जौन आगें बढ़तइ गई। युधिष्ठिर धर्म के मानबे बारे, धीर-गंभीर, भइयन की भूलों पै छमा करबे बारे हैं। द्रोणाचार्य उत्तम धनुर्बिद्या सिखाबे बारे हैं, मनों द्रुपद सें बैर पाल लेत हैं, अर्जुन सें छल करकें अपने पुत्र खों जादा सिखाबो चाहत हैं, एकलब्य सें अन्याय करत हैं, कर्ण खों छत्रिय नें होबे के कारण विद्या नइं देत हैं, अभिमन्यु खों घेर कें तरबार टोर डारत हैं। सुख होत है कै राजा पांडु खों खरे जी ने हीन और दुर्बल नइं बताकें कुसल राजा बताओ है। धृतराष्ट्र पुत्र के लानें मोह में पड़े रहत हैं। श्रीकृष्ण राजनीति, धर्मनीति, युद्धनीति के महा जानकार ठहरे। बे भी युद्ध नईं चाहत ते। मनों जब बिपक्छी बेर-बेर नियम टोरै, तौ बेइ अर्जुन खों नियम टोरबे की सिक्छा दैन लगे - सुनो, नियम जो नईं मानत, ऊके लानें कायको नियम ? ‘हस्तिनापुर की बिथा-कथा’ में बिचारतत्त्व देखें, तौ कबि को मानबो है - जब जब घर में फूट परत, तौ बैर ईरखा बड़न लगत।
स्वारथ भारी परत नीति पै, तब तब भइयइ लड़न लगत।।
जब जब अनीति भइ है, कबि ने चेता दओ है। महाप्रतापी राजा सान्तनु को राज सुख सें चल रओ तौ मनों ‘सरतों पै ब्याओ सान्तनु ने करौ।’ इतइं अनीति हो गई -
पर कुल की परम्परा टूटी, बीज अनीति कौ पर गओ।
और फिर -
आगें जाकें अंकुर फूटे, बड़ अनीति बिष बेल बनी।
जीसें कुल में तनातनी भइ, भइयन बीच लड़ाई ठनी।।
फिर एक अनीति भीष्म ने कर लइ। कासिराज की कन्याओं कौ हरन करौ अपने भइयों के लयं। हरकें उनें ल्याओ जो बीर, बौ नइं उनकौ पति हो रओ; जा अनीति जेठी अंबा खौं बिलकुल नई स्वीकार भई।’ और बाद में ‘बिडम्बना’ बड़त गई।
गान्धारी ब्याह कैं आईं, तौ आँखों पै पट्टी बाँध लई। बे मरम धरम कौ जान न पाईं। आँखें खुली राख कें अंधे की लठिया नइं भईं। आगें जाकें भइ अनर्थ कौ कारन ऊ की नासमझी। माता गान्धारी ने नियोग की ब्यवस्था करी-
लेकिन ई के लानें मंसा बहुअन की पूंछी नईं गइ।
आग्या नईं टार पाईं बे, एक अनीति और हो गइ।।
‘हस्तिनापुर की बिथा-कथा’ में जइ बिथा है कै अनीति पे अनीति होत रइ और परिनाम ? -
कुरुक्षेत्र के महायुद्ध में घाव हस्तिनापुर खा गओ।
राजबंस की द्वेष आग में झुलस आर्याबत्र्त गओ।।
महाकाब्य कौ फल मनुस्य के चार पुरुसार्थों में से एक भओ चइये। इतै अन्त में सिव और सत्य की स्थापना करत भय धरम को झंडा फहराओ गओ है। युद्ध के बाद अश्वमेध यज्ञ कराओ गओ। पन्द्रह बरस बाद धृतराष्ट्र गान्धारी, कुन्ती, संजय और बिदुर के संगै बन में निबास करबै ब्यास-आश्रम पौंचे और इतै हस्तिनापुर में राज पाण्डव सुख सें करत रयै।
‘प्रसादात्मक शैली; में जौ पूरौ महाकाब्य लिखौ गओ है। मनों दो अध्यायों में युद्ध को बर्नन चित्रात्मक शैली में ऐंसो करौ है कै पूरो दृस्य सामने खिंच जात है। देखें -
कैंसे जगा जगा जोड़ी बन गईं आपस में भओ दुन्द उनमें।
द्रोणाचार्य-बिराट, भीष्म-अर्जुन, संगा-द्रोण, युधिष्ठिर-स्रुतायुस, सिखंडी-अश्वत्थामा, धृष्टकेतु-भूरिश्रवा, भागदत्त-घटोत्कच, सहदेव नकुल-सल्य की जोड़िएँ सातएँ दिना की लड़ाई में भिड़ परीं। कुरुच्छेत्र में कहाँ का हो रऔ, सब खूब समजाकें लिखो गओ है। कितेक अस्त्रों के नाम - अग्नि अस्त्र, बारुणास्त्र, ब्रह्मास्त्र, पाशुपतास्त्र, ऐन्दे्रयास्त्र, मोहनी अस्त्र, प्रमोहनास्त्र, नारायणास्त्र, भार्गबास्त्र, नागास्त्र और कितेक व्यूहों के नाम दए गए हैं - बज्रव्यूह, क्रौंचव्यूह, मकरव्यूह, मण्डलव्यूह, उर्मिव्यूह, शृंगतकव्यूह, सकटव्यूह, चक्रव्यूह। गांडीव धनुष भी चलौ और क्षुर बाण भी। भीष्म के गिरबे कौ चित्र देखबे जोग हैं -
हो निढाल ढड़के पीछे खौं, गिरे चित्त होकें रथ सें।
धरती पीठ नईं छू पाई, अतफर टँग रए बानन सें।।
सब्दों, मुहाबरों और कहनावतौं (सूक्तियों) कौ प्रयोग बुंदेली जानबे बारों के मन में गुदगुदी कर देत हैं- ताईं, बल्लरयियन, खुदैया, दुभाँती, अतफर, लड़वइयन, मुरका कें, नथुआ फूले, टूंका-टूंका, मुड्ड-मुड्ड, पुटिया लओ, बेपेंदी के लोटा घाईं लुड़क दूसरी तरफ गये, बैर पतंग और ऊपर चड़ गई, एक बेर के जरे आग में हाँत जराउन फिर आ गए। कबि ने सिल्प की अपेक्छा कहानी के धाराप्रबाह पै जादा जोर दओ है। कहौ जा सकत है कै भासा कौ बहाव गंगा मैया घाईं सान्त और समरस नइं, बल्कि अल्हड़ क्वाँरी रेबा घाईं बंधन-बाधा की परबाह नें करकैं बड़त जाबे बारौ है। कहुँ गति झूला में झूलो, धाय के दूध पै पलो। औरन की ओली में खेलो, ऐसें दिन दिन बड़त चलो।।
हास्य - फिर देखकें खुलौ दरबाजौ, जैसइं घुसन लगे भीतर। माथो टकरा गओ भींत सें, ऊपै गूमड़ आओ उभर।।
करुण - किलकत तो जो नगर खुसी में, लगन लगो रोउत जैंसौ। चहल-पहल गलियन की मिट गइ, पुर हो गओ सोउत जैंसौ।।
वीर-तरबारें चमकीं, गदाएँ खनकीं, बरछा भाला छिद गए। सरसरात तीरन सें कैऊ बीरन के सरीर भिद गए।।
रौद्र - तब गुस्सा सें घटोत्कच पिल परो सत्रु की सैना पै। भौतइ उग्र भओ मानों कंकाली भइ सवार ऊ पै।।
भयानक - दोऊ तरफ के लड़वइयन की भौतइ भारी हानि भई। मानों रणचण्डी खप्पर लएँ युद्धभूमि में प्रगट भई।।
वीभत्स - ऊपै रणचण्डी सवार भइ, नची नोंक पै बानन की। पी गइ सट सट लोऊ, भींत पै भींत उठा दइ लासन की।।
अद्भुत - चमत्कार तब भओ, चीर ना जानें कित्तौ बड़ौ भओ। खेंचत खेंचत थको दुसासन, अंत चीर कौ नईं भओ।।
भक्ति - जी पै कृपा कृष्ण की होय, बाकौ अहित कभउँ नइँ होत। दुख के दिन कट जात और अंत में जै सच्चे की होत।।
आज भी कइअक घरों में महाभारत को ग्रन्थ रखबौ-पड़बौ बर्जित है। नासमझ दकियानूसी जनें कहन लगत हैं - ‘आहाँ, घरों में महाभारत की किताब नैं रखौ। रखहौ, तो महाभारत होन लगहै।’ बनइं समझत कै का सीख दइ है ब्यासजू महाराज नें। अब जा सीदी-सरल भासा में लिखी भइ महाभारत की कथा ‘हस्तिनापुर की बिथा-कथा’ के नांव सें घरों में प्रबेस पा लैहै और महिलाएँ भी ईकौ लाभ उठा सकहैं। जा पूरी रचना गेय है मानें लय बाँधकें गाबे जोग है। हमाइ तो इच्छा होत है कै बुंदेलखंड के गाँव-गाँव में तिरपालों में उम्दा गायकों की गम्मत जमै और नौ दिनां में डाॅ. मुरारीलाल जी खरे के रचे महाकाब्य के नौ अध्यायों कौ पाठ कराओ जाए, जी सें पांडव-कौरव की गाथा सबके मन में समा जाए और जनता समजै कै एक अनीति कैंसे समाज में और अनीतिएँ करात जात हैं - जो अनीति अन्याय करत है, दुरगत बड़ी होत ऊ की। जो अधर्म की गैल चलत है, हानि बड़ी होत ऊ की।। पांडव भइयों कौ आपसी मेल-प्रेम, महतारी और गुरुओं के लानें सम्मान-भाव, उनकी आग्या कौ पालन भारतीय संस्कृति को नमूनौ है। उननें भगवान कृष्ण की माया नइं लइ, सरबसर कृष्णइ खों अपने पक्छ में रक्खौ और उनइं के कहे पै चलत रय, जी सें बिजय पाइ। गीता कौ उपदेस है - है अधिकार कर्म पै अपनौ फल पै कछु अधिकार नईं। बुद्धिमान जन कर्म करत हैं, फल की इच्छा करत नईं।।
***
संपर्क-- डाॅ. सुमनलता श्रीवास्तव 107, इन्द्रपुरी, ग्वारीघाट रोड जबलपुर सम्पर्क: 9893107851
दोहा सलिला
*
मोड़ मिलें स्वागत करो, नई दिशा लो देख
पग धरकर बढ़ते चलो, खींच सफलता रेख
*
कोटा अभी न फिक्स है, चाह-राह का मीत
उसी मोड़ पर चल पड़ें, जहाँ मिल सके प्रीत
*चंद्र-भानु को साथ ही, देख गगन है मौन.
किसकी सुषमा अधिक है, बता सकेगा कौन?
*
वैसी ही पूजा करें, जैसा पाएँ दैव.
लतखोरों को लात ही, भाती 'सलिल' सदैव..
*पत्थरबाजी वे करें, हम देते हैं फूल .
काश फूल को फूल दें, और शूल को शूल..
*
मोड़ मिलें स्वागत करो, नई दिशा लो देख
पग धरकर बढ़ते चलो, खींच सफलता रेख
*
सेंक रही रोटी सतत, राजनीति दिन-रात।
हुई कोयला सुलगकर, जन से करती घात।।
*
देख चुनावी मेघ को, दादुर करते शोर।
कहे भोर को रात यह, वह दोपहरी भोर।।
*
कथ्य, भाव, लय, बिंब, रस, भाव, सार सोपान।
ले समेट दोहा भरे, मन-नभ जीत उड़ान।।
*
सजन दूर मन खिन्न है, लिखना लगता त्रास।
सजन निकट कैसे लिखूँ, दोहा हुआ उदास।।
२-५-२०१८
***
एक कुंडलिया
दिल्ली का यशगान ही, है इनका अस्तित्व
दिल्ली-निंदा ही हुआ, उनका सकल कृतित्व
उनका सकल कृतित्व, उडी जनगण की खिल्ली
पीड़ा सह-सह हुई तबीयत जिसकी ढिल्ली
संसद-दंगल देख, दंग है लल्ला-लल्ली
तोड़ रहे दम गाँव, सज रही जमकर दिल्ली
***
लघुकथा
अकेले
*
'बिचारी को अकेले ही सारी जिंदगी गुजारनी पड़ी।'
'हाँ री! बेचारी का दुर्भाग्य कि उसके पति ने भी साथ नहीं दिया।'
'ईश्वर ऐसा पति किसी को न दे।'
दिवंगता के अन्तिम दर्शन कर उनके सहयोगी अपनी भावनाएँ व्यक्त कर रहे थे।
'क्यों क्या आप उनके साथ नहीं थीं? हर दिन आप सब सामाजिक गतिविधियाँ करती थीं। जबसे उनहोंने बिस्तर पकड़ा, आप लोगों ने मुड़कर नहीं देखा।
उन्होंने स्वेच्छा से पारिवारिक जीवन पर सामाजिक कार्यक्रमों को वरीयता दी। पिता जी असहमत होते हुए भी कभी बाधक नहीं हुए, उनकी जिम्मेदारी पिताजी ने निभायी। हम बच्चों को पिता के अनुशासन के साथ-साथ माँ की ममता भी दी। तभी माँ हमारी ओर से निश्चिन्त थीं। पिताजी बिना बताये माँ की हर गतिविधि में सहयोग करते रहेऔर आप लोग बिना सत्य जानें उनकी निंदा कर रही हैं।' बेटे ने उग्र स्वर में कहा।
'शांत रहो भैया! ये महिला विमर्श के नाम पर राजनैतिक रोटियाँ सेंकने वाले प्यार, समर्पण और बलिदान क्या जानें? रोज कसमें खाते थे अंतिम दम तक साथ रहेंगे, संघर्ष करेंगे लेकिन जैसे ही माँ से आर्थिक मदद मिलना बंद हुई, उन्हें भुला दिया। '
'इन्हें क्या पता कि अलग होने के बाद भी पापा के पर्स में हमेश माँ का चित्र रहा और माँ के बटुए में पापा का। अपनी गलतियों के लिए माँ लज्जित न हों इसलिए पिता जी खुद नहीं आये पर माँ की बीमारी की खबर मिलते ही हमें भेजा कि दवा-इलाज में कोई कसर ना रहे।' बेटी ने सहयोगियों को बाहर ले जाते हुए कहा 'माँ-पिताजी पल-पल एक दूसरे के साथ थे और रहेंगे। अब गलती से भी मत कहियेगा कि माँ ने जिंदगी गुजारी अकेले।
२-५-२०१७
***
आरती:
देवरहा बाबाजी
*
जय अनादि,जय अनंत,
जय-जय-जय सिद्ध संत.
देवरहा बाबाजी,
यश प्रसरित दिग-दिगंत.........
*
धरा को बिछौनाकर,
नील गगन-चादर ले.
वस्त्रकर दिशाओं को,
अमृत मन्त्र बोलते.
सत-चित-आनंदलीन,
समयजयी चिर नवीन.
साधक-आराधक हे!,
देव-लीन, थिर-अदीन.
नश्वर-निस्सार जगत,
एकमात्र ईश कंत.
देवरहा बाबाजी,
यश प्रसरित दिग-दिगंत.........
*
''दे मत, कर दर्शन नित,
प्रभु में हो लीन चित.''
देते उपदेश विमल,
मौन अधिक, वाणी मित.
योगिराज त्यागी हे!,
प्रभु-पद-अनुरागी हे!
सतयुग से कलियुग तक,
जीवित धनभागी हे..
'सलिल' अनिल अनल धरा,
नभ तुममें मूर्तिमंत.
देवरहा बाबाजी,
यश प्रसरित दिग-दिगंत.........
***
नज़्म:
*
ग़ज़ल
मुकम्मल होती है तब
जब मिसरे दर मिसरे
दूरियों पर
पुल बनाती है बह्र
और एक दूसरे को
अर्थ देते हैं
गले मिलकर
मक्ते और मतले
काश हम इंसान भी
साँसों और
आसों के मिसरों से
पूरी कर सकें
ज़िंदगी की ग़ज़ल
जिसे गुनगुनाकर कहें:
आदाब अर्ज़
आ भी जा ऐ अज़ल!
***
घनाक्षरी सलिला:१
घनाक्षरी: एक परिचय
*
हिंदी के मुक्तक छंदों में घनाक्षरी सर्वाधिक लोकप्रिय, सरस और प्रभावी छंदों में से एक है. घनाक्षरी की पंक्तियों में वर्ण-संख्या निश्चित (३१, ३२, या ३३) होती है किन्तु मात्रा गणना नहीं की जाती. अतः, घनाक्षरी की पंक्तियाँ समान वर्णिक किन्तु विविध मात्रिक पदभार की होती हैं जिन्हें पढ़ते समय कभी लघु का दीर्घवत् उच्चारण और कभी दीर्घ का लघुवत् उच्चारण करना पड़ सकता है. इससे घनाक्षरी में लालित्य और बाधा दोनों हो सकती हैं. वर्णिक छंदों में गण नियम प्रभावी नहीं होते. इसलिए घनाक्षरीकार को लय और शब्द-प्रवाह के प्रति अधिक सजग होना होता है. समान पदभार के शब्द, समान उच्चार के शब्द, आनुप्रासिक शब्द आदि के प्रयोग से घनाक्षरी का लावण्य निखरता है. वर्ण गणना करते समय लघु वर्ण, दीर्घ वर्ण तथा संयुक्ताक्षरों को एक ही गिना जाता है अर्थात अर्ध ध्वनि की गणना नहीं की जाती है।
२ वर्ण = कल, प्राण, आप्त, ईर्ष्या, योग्य, मूर्त, वैश्य आदि.
३ वर्ण = सजल,प्रवक्ता, आभासी, वायव्य, प्रवक्ता आदि.
४ वर्ण = ऊर्जस्वित, अधिवक्ता, अधिशासी आदि.
५ वर्ण. = वातानुकूलित, पर्यावरण आदि.
घनाक्षरी के ९ प्रकार होते हैं;
१. मनहर: कुल वर्ण संख्या ३१. समान पदभार, समतुकांत, पदांत गुरु अथवा लघु-गुरु, चार चरण ८-८-८-७ वर्ण।
२. जनहरण: कुल वर्ण संख्या ३१. समान पदभार, समतुकांत, पदांत गुरु शेष सब वर्ण लघु।
३. कलाधर: कुल वर्ण संख्या ३१. समान पदभार, समतुकांत, पदांत गुरु-लघु, चार चरण ८-८-८-७ वर्ण ।
४. रूप: कुल वर्ण संख्या ३२. समान पदभार, समतुकांत, पदांत गुरु-लघु, चार चरण ८-८-८-८ वर्ण।
५. जलहरण: कुल वर्ण संख्या ३२. समान पदभार, समतुकांत, पदांत लघु-लघु, चार चरण ८-८-८-८ वर्ण।
६. डमरू: कुल वर्ण संख्या ३२. समान पदभार, समतुकांत, पदांत बंधन नहीं, चार चरण ८-८-८-८ सभी लघु वर्ण।
७. कृपाण: कुल वर्ण संख्या ३२. समान पदभार, समतुकांत, पदांत गुरु-लघु, चार चरण, प्रथम ३ चरणों में समान अंतर तुकांतता, ८-८-८-८ वर्ण।
८. विजया: कुल वर्ण संख्या ३२. समान पदभार, समतुकांत, पदांत लघु-गुरु, चार चरण ८-८-८-८ वर्ण।
९. देव: कुल वर्ण संख्या ३३. समान पदभार, समतुकांत, पदांत ३ लघु-गुरु, चार चरण ८-८-८-९ वर्ण।
___
घनाक्षरी सलिला: २
घनाक्षरी से परिचय की पूर्व कड़ी में घनाक्षरी के लक्षणों तथा प्रकारों की चर्चा के साथ कुछ घनाक्षरियाँ भी संलग्न की गयी हैं। उन्हें पढ़कर उनके तथा निम्न भी रचना में रूचि हो का प्रकार तथा कमियाँ बतायें, हो सके तो सुधार सुझायें। जिन्हें घनाक्षरी रचना में रुचि हो लिखकर यहाँ प्रस्तुत करिये.
चाहते रहे जो हम / अन्य सब करें वही / हँस तजें जो भी चाह / उनके दिलों में रही
मोह वासना है यह / परार्थ साधना नहीं / नेत्र हैं मगर मुँदे / अग्नि इसलिए दही
मुक्त हैं मगर बँधे / कंठ हैं मगर रुँधे / पग बढ़े मगर रुके / सर उठे मगर झुके
जिद्द हमने ठान ली / जीत मन ने मान ली / हार छिपी देखकर / येन-केन जय गही
२-५-२०१५
***
छंद सलिला:
प्रभाती (उड़ियाना) छंद
संजीव
*
छंद-लक्षण: जाति महारौद्र , प्रति चरण मात्रा २२ मात्रा, यति १२ - १०, चरणान्त गुरु (यगण, मगण, रगण, सगण, ) ।
लक्षण छंद:
राग मिल प्रभाती फ़िर / झूम-झूम गाया
बारहमासा सुन- दस / दिश नभ मुस्काया
चरण-अन्त गुरु ने गुर / हँसकर बतलाया
तज विराम पूर्णकाम / कर्मपथ दिखाया
उदाहरण:
१. गौरा ने बौराकर / ब्यौरा को हेरा
बौराये अमुआ पर / कोयल ने टेरा
मधुकर ने कलियों को, जी भर भरमाया
सारिका की गली लगा / शुक का पगफेरा
२. प्रिय आये घर- अँगना / खुशियों से चहका
मन-मयूर नाच उठा / महुआ ज्यों महका
गाल पर गुलाल लाल / लाज ने लगाया
पलकों ने अँखियों पर / पहरा बिठलाया
कँगना भी खनक-खनक / गीत गुनगुनाये
बासंती मौसम में / कोयलिया गाये
करधन कर-धन के सँग लिपट/लिपट जाए
उलझी लट अनबोली / बोल खिलखिलाये
३. राम-राम सिया जपे / श्याम-श्याम राधा
साँवरें ने भक्तों की / काटी हर बाधा
हरि ही हैं राम-कृष्ण / शिव जी को पूजें
सत-चित-आनंद त्रयी / जग ने आराधा
कंकर-कंकरवासी / गिरिजा मस्जिद में
जिसको जो रूप रुचा / उसने वह साधा
२.५.२०१४
***
गीत:
कोई अपना यहाँ
*
मन विहग उड़ रहा,
खोजता फिर रहा.
काश! पाये कभी-
कोई अपना यहाँ??
*
साँस राधा हुई, आस मीरां हुई,
श्याम चाहा मगर, किसने पाया कहाँ?
चैन के पल चुके, नैन थककर झुके-
भोगता दिल रहा
सिर्फ तपना यहाँ...
*
जब उजाला मिला, साथ परछाईं थी.
जब अँधेरा घिरा, सँग तनहाई थी.
जो थे अपने जलाया, भुलाया तुरत-
बच न पाया कभी
कोई सपना यहाँ...
*
जिंदगी का सफर, ख़त्म-आरंभ हो.
दैव! करना दया, शेष ना दंभ हो.
बिंदु आगे बढ़े, सिंधु में जा मिले-
कैद कर ना सके,
कोई नपना यहाँ...
२-५-२०१२
*

बुधवार, 8 अप्रैल 2026

अप्रैल ८, दोहा, नवगीत, ग़ज़लिका, अम्मी, हास्य, कुंडलिया, रोला,

सलिल सृजन अप्रैल ८
छंद शाला
दोहा+रोला=कुंडलिया
० 
अमृत मुख शुक नासिका, कर्णफूल द्युतिमान।
स्वर्ण हिरण आभित त्वचा, खञ्जन नयन प्रधान।। - अशोक व्यग्र
खञ्जन नयन प्रधान, तीर तीखे उर भेदें।
लौह कवच दृढ़ चीर, विरागी मन भी छेदें।।
विस्मय छीनें चैन, नैन देते हैं सुख-दुख।
मित्र-शत्रु ज्यों बैन, नैन भी हों अमृत मुख।।
८.४.२०२६
०००
मुक्तक
जो हमारा है उसी की चाहकर।
जो न अपना तनिक मत परवाह कर।।
जो मिला उसको सहेजो उम्र भर-
गैर की खातिर न नाहक आह भर।।
***
पत्रिका सलिला
साहित्य संस्कार - पठनीय महिला कथाकार अंक
संस्कारधानी जबलपुर से प्रकाशित त्रैमासिकी साहित्य संस्कार का जनवरी-मार्च अंक 'महिला कथाकार अंक' के रूप में प्रकाशित हुआ है। ५६ पृष्ठीय पत्रिका में ४ लेख, ८ महानियाँ, २ संस्मरण, ७ लघुकथाएँ, ४ कवितायें, १ व्यंग्य लेख, २ समीक्षाएँ तथा २ संपादकीय समाहित हैं। प्रधान संपादक श्री शरद अग्रवाल 'आत्म निर्भर भारत' शीर्षक संपादकीय में भारत को किस्से-कहानियों का देश कहते हुए अपनी जड़ों से जुड़ने को अपरिहार्य बताते हैं। वे हिंदी की प्रथम महिला कहानीकार जबलपुर निवासी उषा देवी मित्रा जी तथा विद्रोहिणी सुभद्रा कुमारी चौहान जी को स्मरण करते हुए भारत के विकास का जिक्र करते हैं। 'कहानियाँ कभी खत्म नहीं होतीं' शीर्षक संपादकीय में अभियंता सुरेंद्र पवार आंग्ल भाषा चालित संस्था इंस्टीट्यूशन ऑफ़ इंजीनियर्स द्वारा प्रकाशित वार्षिकांक 'अभियंता बंधु' के दक्षिण भारत में हुए विमोचन की चर्चा कर जान सामान्य से जीवंत संपर्क का उल्लेख करते हैं।
हिंदी कहानी के विकास पर डॉ. अनिल कुमार का आलेख पठनीय है। शशि खरे जी 'नई कहानी और महिला कथाकार' में जरूरी प्रश्न पूछती हैं- 'क्या महिला कहानीकार की कहानियाँ कहानी जगत में अलग परिचय रखती हैं अथवा कहानी, कहानी है पुरुष या स्त्री लेखक किसी ने भी लिखी हो?' सबका हित साधनेवाले साहित्य का मूल्याङ्कन उसकी गुणवत्ता के आधार पर हो या रचनाकार के लिंग, जाति, धर्म, व्यवसाय आधी के आधार पर? शशि जी ने सवाल पाठकों के चिंतन हेतु उठाया किन्तु इस पर विमर्श नहीं किया। एक लेख में सभी महिला कथाकारों पर चर्चा संभव नहीं हो सकती। शशि जी ने तीन पीढ़ियों की ३ महिला कथाकारों नासिरा शर्मा, नमिता सिंह तथा अमिता श्रीवास्तव की कहानी कला पर प्रकाश डाला है। 'कालजयी कहानीकार उषादेवी मित्रा' शीर्षक लेख में आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने उषा देवी जी के जीवन की विषम परिस्थतियों, कठिन संघर्ष, कर्मठता, सृजनशीलता, कृतियों तथा सम्मान आदि पर संक्षिप्त पर सामान्यत: अनुपलब्ध सारगर्भित जानकारी दी है। अपने साहित्य को अपनी ही चिता पर जला दिए जाने की अंतिम अभिलाषा व्यक्त करनेवाली उषा देवी के कार्य पर हिंदीभाषी अंचल के हिंदी प्राध्यापकों ने अब तक शोध न कराकर अक्षम्य कृतघ्नता का परिचय दिया है जबकि दक्षिण भारत में सेंट थॉमस कॉलेज पाला की छात्रा प्रीति आर. ने वर्ष २०१४ में ;उषा देवी मित्रा के साहित्य में नारी जीवन के बदलते स्वरूप' विषय पर शोध किया है। उपेक्षा की हद तो यह कि उषा देवी जी का एक चित्र तक उपलब्ध नहीं है। 'मालवा की मीरा - मालती जोशी' शीर्षक लेखा में प्रतिमा अखिलेश ने गागर में सागर भरने का सफल प्रयास किया है।
अंक की कहानियों में जया जादवानी की कहानी 'हमसफर' परिणय सूत्र में बँधने जा रहे स्त्री-पुरुष के वार्तालाप में जिआवन के विविध पहलुओं पर केंद्रित हैं। दोनों के अतीत के विविध पहलुओं की चर्चा में अंग्रेजी भाषा का अत्यधिक प्रयोग और विस्तार खटकता है। अर्चना मलैया की छोटी कहानी 'चीख' मर्मस्पर्शी है। अंक की सर्वाधिक प्रभावी कहानी 'वृद्धाश्रम' में सरस दरबारी ने पद के मद में डूबे सेवानिवृत्त उच्चधिकारी के अहंकार के कारण हुए पारिवारिक विघटन के सटीक चित्रण किया है। अनीता श्रीवास्तव की कहानी 'कवि सम्मेलन' साहित्यिक मंचों पर छाए बाजारूपन पर प्रहार करती है। गीता भट्टाचार्य लिखित 'नारी तेरे रूप अनेक' में कहानी और संस्मरण का मिश्रण है। पुष्पा चिले की कहने 'मुक्ति' में प्रेम की पवित्रता स्थापित की गई है। 'लिव इन' में टुकड़े-टुकड़े होती श्रद्धा के इस दौर में ऐसी कहानी किशोरों और युवाओं को राह दिखा सकती है। उभरती कहानीकार वैष्णवी मोहन पुराणिक का कहानी 'प्यार का अहसास' देहातीत प्रेम की सात्विकता प्रतिपादित करती है।
मालती जोशी तथा लता तेजेश्वर 'रेणुका' लिखित संस्मरण सरस हैं।डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव के कहानी संग्रह 'जिजीविषा' की डॉ. साधना वर्मा द्वारा प्रस्तुत समीक्षा में नीर-क्षीर विवेचन किया गया है। डॉ. सरोज गुप्ता द्वारा लिखित 'कि याद जो करें सभी' पुस्तक पर समीक्षा संतुलित तथा पठनीय है।
गीतिका श्रीवास्तव के व्यंग्य लेख 'रोम जलता रहा, नीरो बाँसुरी बजाता रहा' में अभियांत्रिकी शिक्षा और अभियंताओं की दुर्दशा उद्घाटित की गई है। डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव की तीन लघुकथाएँ 'गारंटी', 'प्रतिशोध' तथा 'मरकर भी' विधा तथा अंक की श्रीवृद्धि करती हैं। लघुकथांतर्गत छाया सक्सेना की 'बरसों बाद', श्रद्धा निगम की 'ये हुई न बात' तथा मीना पंवार की 'बेटे की शादी में जरूर आऊँगी' अच्छे प्रयास हैं। कविता कानन के कुसुम गुच्छ में सुवदनी देवी रचित 'उपकार', अंकुर सिंह रचित 'माँ मुझे जन्म लेने दो', आरती रचित 'आतंकवाद' तथा गरिमा सिंह रचित 'निश्छल प्रेम' नवांकुरित प्रयास हैं।
सारत: साहित्य संस्कार का सोलहवाँ अंक इसके कैशोर्य प्रवेश पर्व का निनाद कर रहा है। आगामी अंक इसे तरुणाई की ओर ले जाएँगे। शहीद भगत सिंह के देश के किशोर को क्रांतिधर्मा होना चाहिए। मेरा सुझाव है कि महिला कथाकारअंक के पश्चात् आगामी अंक 'पुरुष विमर्श विशेषांक' के रूप में प्रकाशित किया जाए जिसमें स्त्री विमर्श के रूप में हो रहे इकतरफा आंदोलनों के दुष्प्रभावों, पुरुष के अवदान, विवशता, त्याग, समर्पण आदि पर केंद्रित रचनाओं का प्रकाशन हो। पत्रिका के स्थायित्व के लिए आगामी कुछ अंकों के विषय निर्धारण करसम्यक-प्रामाणिक सामग्री जुटाई जा सकती है। बुंदेला विद्रोह १८४२, स्वातंत्र्य समर १८५७ में बुंदेलखंड का योगदान, बुंदेली साहित्य कल और आज, महकौशल में पर्यटन, विकास कार्य, तकनीकी शिक्षण, साहित्य, कला, उद्योग आदि पर क्रमश: विशेषांक हों तो वे संग्रहणीय होंगे। प्रकाशक और संपादक मंडल साधुवाद का पर्याय है।
८-४-२०२३
***
दोहा सलिला
*
शुभ प्रभात होता नहीं, बिन आभा है सत्य
आ भा ऊषा से कहे, पुलकित वसुधा नित्य
*
मार्निंग गुड होगी तभी, जब पहनेंगे मास्क
सोशल डिस्टेंसिंग रखें, मीत सरल है टास्क
*
भाप लाभदायक बहुत, लें दिन में दो बार
पीकर पानी कुनकुना, हों निरोग हर वार
*
कोल्ड ड्रिंक से कीजिए, बाय बाय कर दूर
आइसक्रीम न टेस्ट कर, रहिए स्वस्थ्य हुजूर
*
नीबू रस दो बूँद लें, आप नाक में डाल
करें गरारे दूर हो, कोरोना बेहाल
*
जिंजर गार्लिक टरमरिक, रियल आपके फ्रैंड्स
इन सँग डेली बाँधिए, फ्रैंड्स फ्रेंडशिप बैंड्स
*
सूर्य रश्मि से स्नानकर, सुबह शाम हों धन्य
घूमें ताजी हवा में, पाएँ खुशी अनन्य
*
हार्म करे एक सी बहुत, घटती है ओजोन
बिना सुरक्षा पर्त के, जीवन चाहे क्लोन
*
दूर शीतला माँ हुईं, कोरोना माँ पास
रक्षित रह रखिए सुखी, करें नहीं उपहास
*
हग कल्चर से दूर रह, करिए नमन प्रणाम
ब्लैसिंग लें दें दूर से, करिए दोस्त सलाम
*
कोविद माता सिखातीं, अनुशासन का पाठ
धन्यवाद कह स्वस्थ्य रह, करिए यारों ठाठ
८-४-२०२१
***
दोहा सलिला
पानी-पानी हो गया, पानी मिटी न प्यास।
जंगल पर्वत नदी-तल, गायब रही न आस।।
*
दो कौड़ी का आदमी, पशु का थोड़ा मोल।
मोल न जिसका वह खुदा, चुप रह पोल न खोल।।
*
तू मारे या छोड़ दे, है तेरा उपकार।
न्याय-प्रशासन खड़ा है, हाथ बाँधकर द्वार।।
*
आज कदर है उसी की, जो दमदार दबंग।
इस पल भाईजान हो, उस पल हो बजरंग।।
*
सवा अरब है आदमी, कुचल घटाया भार।
पशु कम मारे कर कृपा, स्वीकारो उपकार।।
*
हम फिल्मी तुम नागरिक, आम न समता एक।
खल बन रुकते हम यहाँ, मरे बने रह नेक।।
८.४.२०१८
***
नवगीत:
.
कुनबा
गीति विधा का है यह
.
महाकाव्य बब्बा की मूँछें, उजली पगड़ी
खण्डकाव्य नाना के नाना किस्से रोचक
दादी-नानी बन प्रबंध करती हैं बतरस
सुन अंग्रेजी-गिटपिट करते बच्चे भौंचक
ईंट कहीं की, रोड़ा आया और कहीं से
अपना
आप विधाता है यह
कुनबा
गीति विधा का है यह
.
लक्षाधिक है छंद सरस जो चाहें रचिए
छंदहीन नीरस शब्दों को काव्य न कहिए
कथ्य सरस लययुक्त सारगर्भित मन मोहे
फिर-फिर मुड़कर अलंकार का रूप निरखिए
बिम्ब-प्रतीक सलोने कमसिन सपनों जैसे
निश-दिन
खूब दिखाता है यह
कुनबा
गीति विधा का है यह
.
दृश्य-श्रव्य-चंपू काव्यों से भाई-भतीजे
द्विपदी, त्रिपदी, मुक्तक अपनेपन से भीजे
ऊषा, दुपहर, संध्या, निशा करें बरजोरी
पुरवैया-पछुवा कुण्डलि का फल सुन खीजे
बौद्धिकता से बोझिल कविता
पढ़ता
पर बिसराता है यह
कुनबा
गीति विधा का है यह
.
गीत प्रगीत अगीत नाम कितने भी धर लो
रच अनुगीत मुक्तिका युग-पीड़ा को स्वर दो
तेवरी या नवगीत शाख सब एक वृक्ष की
जड़ को सींचों, माँ शारद से रचना-वर लो
खुद से
खुद बतियाता है यह
कुनबा
गीति विधा का है यह
८.४.२०१७
...
एक गीत
धत्तेरे की
*
धत्तेरे की
चप्पलबाज।
*
पद-मद चढ़ा, न रहा आदमी
है असभ्य मत कहो आदमी
चुल्लू भर पानी में डूबे
मुँह काला कर
चप्पलबाज
धत्तेरे की
चप्पलबाज।
*
हाय! जंगली-दुष्ट आदमी
पगलाया है भ्रष्ट आदमी
अपना ही थूका चाटे फिर
झूठ उचारे
चप्पलबाज
धत्तेरे की
चप्पलबाज।
*
गलती करता अगर आदमी
क्षमा माँगता तुरत आदमी
गुंडा-लुच्चा क्षमा न माँगे
क्या हो बोलो
चप्पलबाज?
धत्तेरे की
चप्पलबाज।
८.४.२०१७
***
पुस्तक सलिला-
‘सरे राह’ मुखौटे उतारती कहानियाॅ
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
[पुस्तक परिचय- सरे राह, कहानी संग्रह, डाॅं. सुमनलता श्रीवास्तव, प्रथम संस्करण २०१५, आकार २१.५ से.मी. x १४ से.मी., आवरण बहुरंगी पेपरबैक लेमिनेटेड जैकट सहित, मूल्य १५० रु., त्रिवेणी परिषद प्रकाशन, ११२१ विवेकानंद वार्ड, जबलपुर, कहानीकार संपर्क १०७ इंद्रपुरी, नर्मदा मार्ग, जबलपुर।]
0
‘कहना’ मानव के अस्तित्व का अपरिहार्य अंग है। ‘सुनना’,‘गुनना’ और ‘करना’ इसके अगले चरण हैं। इन चार चरणों ने ही मनुष्य को न केवल पशु-पक्षियों अपितु सुर, असुर, किन्नर, गंधर्व आदि जातियों पर जय दिलाकर मानव सभ्यता के विकास का पथ प्रशस्त किया। ‘कहना’ अनुशासन और उद्दंेश्य सहित हो तो ‘कहानी’ हो जाता है। जो कहा जंाए वह कहानी, क्या कहा जाए?, वह जो कहे जाने योग्य हो, कहे जाने योग्य क्या है?, वह जो सबके लिये हितकर है। जो सबके हित सहित है वही ‘साहित्य’ है। सबके हित की कामना से जो कथन किया गया वह ‘कथा’ है। भारतीय संस्कृति के प्राणतत्वों संस्कृत और संगीत को हृदयंगम कर विशेष दक्षता अर्जित करनेवाली विदुषी डाॅ. सुमनलता श्रीवास्तव की चैथी कृति और दूसरा कहानी संग्रह ‘सरे राह’ उनकी प्रयोगधर्मी मनोवृत्ति का परिचाायक है।
विवेच्य कृति मुग्धा नायिका, पाॅवर आॅफ मदर, सहानुभूति, अभिलषित, ऐसे ही लोग, सेवार्थी, तालीम, अहतियात, फूलोंवाली सुबह, तीमारदारी, उदीयमान, आधुनिका, विष-वास, चश्मेबद्दूर, क्या वे स्वयं, आत्मरक्षा, मंजर, विच्छेद, शुद्धि, पर्व-त्यौहार, योजनगंधा, सफेदपोश, मंगल में अमंगल, सोच के दायरे, लाॅस्ट एंड फाउंड, सुखांत, जीत की हार तथा उड़नपरी 28 छोटी पठनीय कहानियों का संग्रह है।
इस संकलन की सभी कहानियाॅं कहानीकार कम आॅटोरिक्शा में बैठने और आॅटोरिक्शा सम उतरने के अंतराल में घटित होती हैं। यह शिल्यगत प्रयोग सहज तो है पर सरल नहीं है। आॅटोरिक्शा नगर में एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुॅंचाने में जो अल्प समय लेता है, उसके मध्य कहानी के तत्वों कथावस्तु, चरित्रचित्रण, पात्र योजना, कथेपकथन या संवाद, परिवेश, उद्देश्य तथा शैली का समावेश आसान नहीं है। इस कारण बहुधा कथावस्तु के चार चरण आरंभ, आरोह, चरम और अवरोह कां अलग-अलग विस्तार देे सकना संभव न हो सकने पर भी कहानीकार की कहन-कला के कौशल ने किसी तत्व के साथ अन्याय नहीं होने दिया है। शिल्पगत प्रयोग ने अधिकांश कहानियों को घटना प्रधान बना दिया है तथापि चरित्र, भाव और वातावरण यथावश्यक-यथास्थान अपनी उपस्थिति दर्शाते हैं।
कहानीकार प्रतिष्ठित-सुशिक्षित पृष्ठभूमि से है, इस कारण शब्द-चयन सटीक और भाषा संस्कारित है। तत्सम-तद्भव शब्दों का स्वाभविकता के साथ प्रयोग किया गया है। संस्कृत में शोधोपाधि प्राप्त लेखिका ने आम पाठक का ध्यानकर दैनंदिन जीवन में प्रयोग की जा रही भाषा का प्रयोग किया है। ठुली, फिरंगी, होंड़ते, गुब्दुल्ला, खैनी, हीले, जीमने, जच्चा, हूॅंक, हुमकना, धूरि जैसे शब्दकोष में अप्राप्त किंतु लोकजीवन में प्रचलित शब्द, कस्बाई, मकसद, दीदे, कब्जे, तनख्वाह, जुनून, कोफ्त, दस्तखत, अहतियात, कूवत आदि उर्दू शब्द, आॅफिस, आॅेडिट, ब्लडप्रैशर, स्टाॅप, मेडिकल रिप्रजेन्टेटिव, एक्सीडेंट, केमिस्ट, मिक्स्ड जैसे अंग्रेजी शब्द गंगो-जमनी तहजीब का नजारा पेश करते हैं किंतु कहीं-कहंी समुचित-प्रचलित हिंदी शब्द होते हुए भी अंग्रेजी शब्द का प्रयोग भाषिक प्रदूषण प्रतीत होतं है। मदर, मेन रोड, आफिस आदि के हिंदी पर्याय प्रचलित भी है और सर्वमान्य भी किंतु वे प्रयोग नहीं किये गये। लेखिका ने भाषिक प्रवाह के लिये शब्द-युग्मों चक्कर-वक्कर, जच्चा-बच्चा, ओढ़ने-बिछाने-पहनने, सिलाई-कढ़ाई, लोटे-थालियाॅं, चहल-पहल, सूर-तुलसी, सुविधा-असुविधा, दस-बारह, रोजी-रोटी, चिल्ल-पों, खोज-खबर, चोरी-चकारी, तरो-ताजा, मुड़ा-चुड़ा, रोक-टोक, मिल-जुल, रंग-बिरंगा, शक्लो-सूरत, टांका-टाकी आदि का कुशलतापूर्वक प्रयोग किया है।
किसी भाषा का विकास साहित्य से ही होता है। हिंदी विश्वभाषा बनने का सपना तभी साकार कर सकती है जब उसके साहित्य में भाषा का मानक रूप हो। लेखिका सुशिक्षित ही नहीं सुसंस्कृत भी हैं, उनकी भाषा अन्यों के लिये मानक होगी। विवेच्य कृति में बहुवचन शब्दों में एकरूपता नहीं है। ‘महिलाएॅं’ में हिंदी शब्दरूप है तो ‘खवातीन’ में उर्दू शब्दरूप, जबकि ‘रिहर्सलों’ में अंग्रेजी शब्द को हिंदी व्याकरण-नियमानुसार बहुवचन किया ंगया है।
सुमन जी की इन कहानियों की शक्ति उनमें अंतर्निहित रोचकता है। इनमें ‘उसने कहा था’ और ‘ताई’ से ली गयी प्रेरणा देखी जा सकती है। कहानी की कोई रूढ़ परिभाषा नहीं हो सकती। संग्रह की हर कहानी में कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में लेखिका और आॅटोरिक्शा है, सूत्रधार, सहयात्री, दर्शक, रिपोर्टर अथवा पात्र के रूप में वह घटना की साक्ष्य है। वह घटनाक्रम में सक्रिय भूमिका न निभाते हुए भी पा़त्र रूपी कठपुतलियों की डोरी थामे रहती है जबकि आॅटोेरिक्शा रंगमंच बन जाता है। हर कहानी चलचित्र के द्श्य की तरह सामने आती है। अपने पात्रों के माघ्यम से कुछ कहती है और जब तक पाठक कोई प्रतिकिया दे, समाप्त हो जाती है। समाज के श्वेत-श्याम दोनों रंग पात्रों के माघ्यम ेंसे सामने आते हैं।
अनेकता में एकता भारतीय समाज और संस्कृति दोनों की विशेषता है। यहाॅं आॅटोरिक्शा और कहानीकार एकता तथा घटनाएॅं और पात्र अनेकता के वाहक है। इन कहानियों में लघुकथा, संस्मरण, रिपोर्ताज और गपशप का पुट इन्हें रुचिकर बनाता है। ये कहानियाॅं किसी वाद, विचार या आंदोलन के खाॅंचे में नहीं रखी जा सकतीं तथापि समाज सुधार का भाव इनमें अंतर्निहित है। ये कहानियाॅं बच्चों नहीं बड़ों, विपन्नों नहीं संपन्नों के मुखौटों के पीछे छिपे चेहरों को सामने लाती हैं, उन्हें लांछित नहीं करतीं। ‘योजनगंधा’ और ‘उदीयमान’ जमीन पर खड़े होकर गगन छूने, ‘विष वास’, ‘सफेदपोश’, ‘उड़नपरी’, ‘चश्मेबद्दूर आदि में श्रमजीवी वर्ग के सदाचार, ‘सहानूभूति’, ‘ऐसे ही लोग’, ‘शुद्धि’, ‘मंगल में अमंगल’ आदि में विसंगति-निवारण, ‘तालीम’ और ‘सेवार्थी’ में बाल मनोविज्ञान, ‘अहतियात’ तथा ‘फूलोंवाली सुबह’में संस्कारहीनता, ‘तीमारदारी’, ‘विच्छेद’ आदि में दायित्वहीनता, ‘आत्मरक्षा’ में स्वावलंबन, ‘मुग्धानायिका’ में अंधमोह को केंद्र में रखकर कहानीकार ने सकारात्मक संदेष दिया है।
सुमन जी की कहानियों का वैशिष्ट्य उनमें व्याप्त शुभत्व है। वे गुण-अवगुण के चित्रण में अतिरेकी नहीं होतीं। कालिमा की न तो अनदेखी करती हैं, न भयावह चित्रण कर डराती हैं अपितु कालिमा के गर्भ में छिपी लालिमा का संकेत कर ‘सत-शिव-सुंदर’ की ओर उन्मुख होने का अवसर पाने की इच्छा पाठक में जगााती हैं। उनकी आगामी कृति में उनके कथा-कौशल का रचनामृत पाने की प्रतीक्षा पाठक कम मन में अनायास जग जाती है, यह उनकी सफलता है।
८.४.२०१६
...
ग़ज़लिका:
.
दिल में पड़ी जो गिरह उसे खोल डालिए
हो बाँस की गिरह सी गिरह तो सम्हालिए
रखिये न वज्न दिल पे ज़रा बात मानिए
जो बात सच है हँस के उसे बोल डालिए
है प्यार कठिन, दुश्मनी करना बहुत सरल
जो भाये न उस बात को मन से बिसारिये
संदेह-शुबह-शक न कभी पालिए मन में
क्या-कैसा-कौन है विचार, तौल डालिए
जिसकों भुलाना आपको मुश्किल लगे 'सलिल'
उसको न जाने दीजिए दिल से पुकारिए
दूरी को पाट सकना हमेशा हुआ कठिन
दूरी न आ सके तनिक तो झोल डालिए
कर्जा किसी तरह का हो, आये न रास तो
दुश्वारियाँ कितनी भी हों कर्जा उतारिये
***
ग़ज़लिका:
.
मंझधार में हो नाव तो हिम्मत न हारिए
ले बाँस की पतवार घाट पर उतारिए
मन में किसी के फाँस चुभे तो निकाल दें
लें साँस चैन की, न खाँसिए-खखारिए
जो वंशलोचनी है वही नेह नर्मदा
बन कांस सुरभि-रज्जु से जीवन संवारिए
बस हाड़-माँस-चाम नहीं, नारि शक्ति है
कर भक्ति प्रेम से 'सलिल' जीवन गुजारिए
तम सघन हो तो निकट मान लीजिए प्रकाश
उठ-जाग कोशिशों से भोर को पुकारिए
८.४.२०१५
***
ग़ज़लिका
अम्मी
0
माहताब की जुन्हाई में
झलक तुम्हारी पाई अम्मी
दरवाजे, कमरे आँगन में
हरदम पडी दिखाई अम्मी
कौन बताये कहाँ गयीं तुम
अब्बा की सूनी आँखों में
जब भी झाँका पडी दिखाई
तेरी ही परछाईं अम्मी
भावज जी भर गले लगाती
पर तेरी कुछ बात और थी
तुझसे घर अपना लगता था
अब बाकी पहुनाई अम्मी
बसा सासरे केवल तन है
मन तो तेरे साथ रह गया
इत्मीनान हमेशा रखना-
बिटिया नहीं परायी अम्मी
अब्बा में तुझको देखा है
तू ही बेटी-बेटों में है
सच कहती हूँ, तू ही दिखती
भाई और भौजाई अम्मी.
तू दीवाली, तू ही ईदी
तू रमजान फाग होली है
मेरी तो हर श्वास-आस में
तू ही मिली समाई अम्मी
000
दोहा सलिला
ठिठुर रहा था तुम मिलीं, जीवन हुआ बसंत
दूर हुईं पतझड़ हुआ, हेरूँ हर पल कन्त
तुम मैके मैं सासरे, हों तो हो आनंद
मैं मैके तुम सासरे, हों तो गाएँ छन्द
तू-तू मैं-मैं तभी तक, जब तक हों मन दूर
तू-मैं ज्यों ही हम हुए, साँस हुई संतूर
0
दो हाथों में हाथ या, लो हाथों में हाथ
अधरों पर मुस्कान हो, तभी सार्थक साथ
0
नयन मिला छवि बंदकर, मून्दे नयना-द्वार
जयी चार, दो रह गये, नयना खुद को हार
८.४.२०१३
000
नवगीत:
समाचार है...
*
बैठ मुड़ेरे चिड़िया चहके'
समाचार है.
सोप-क्रीम से जवां दिख रही
दुष्प्रचार है...
*
बिन खोले- अख़बार जान लो,
कुछ अच्छा, कुछ बुरा मान लो.
फर्ज़ भुला, अधिकार माँगना-
यदि न मिले तो जिद्द ठान लो..
मुख्य शीर्षक अनाचार है.
और दूसरा दुराचार है.
सफे-सफे पर कदाचार है-
बना हाशिया सदाचार है....
पैठ घरों में टी. वी. दहके
मन निसार है...
*
अब भी धूप खिल रही उज्जवल.
श्यामल बादल, बरखा निर्मल.
वनचर-नभचर करते क्रंदन-
रोते पर्वत, सिसके जंगल..
घर-घर में फैला बजार है.
अवगुन का गाहक हजार है.
नहीं सत्य का चाहक कोई-
श्रम सिक्के का बिका चार है..
मस्ती, मौज-मजे का वाहक
नित उधर, अ-असरदार है...
*
लाज-हया अब तलक लेश है.
चुका नहीं सब, बहुत शेष है.
मत निराश हो बढ़े चलो रे-
कोशिश अब करनी विशेष है..
अलस्सुबह शीतल बयार है.
खिलता मनहर हरसिंगार है.
मन दर्पण की धूल हटायें-
चेहरे-चेहरे पर निखार है..
एक साथ मिल मुष्टि बाँधकर
संकल्पित करना प्रहार है...
८.४.२०११
***
हास्य दोहे:
*
बेचो घोड़े-गधे भी, सोओ होकर मस्त.
खर्राटे ऊँचे भरो, सब जग को कर त्रस्त..
*
कौन किसी का सगा है, और पराया कौन?
जब भी चाहा जानना, उत्तर पाया मौन
*
दूर रहो उससे सदा, जो धोता हो हाथ.
गर पीछे पड़ जायेगा, मुश्किल होगा साथ..
*
टाँग अड़ाना है 'सलिल', जन्म सिद्ध अधिकार.
समझ सको कुछ या नहीं, दो सलाह हर बार..
*
देवी इतनी प्रार्थना, रहे हमेशा होश
काम 'सलिल' करता रहे, घटे न किंचित जोश
*
देवी दर्शन कीजिए, भंडारे के रोज
देवी खुश हो जब मिले, बिना पकाए भोज
*
हर ऊँची दूकान के, फीके हैं पकवान
भाषण सुन कर हो गया, बच्चों को भी ज्ञान
*
नोट वोट नोटा मिलें, जब हों आम चुनाव
शेष दिनों मारा गया, वोटर मिले न भाव
८.४.२०१०
***

मंगलवार, 3 मार्च 2026

मार्च ३,वन्य जीवन दिवस, हाइकु गीत, सॉनेट, विकास, दोहा, होली, लघुकथा, बरवै, नवगीत, हास्य

सलिल सृजन मार्च ३
*
जोगी जी सा रा रा रा
होली खेलें छंद की, पिएँ गीत की भांग।
गुझियाँ बने कहानियाँ, व्यंग लेख हों स्वांग।।
जोगी जी सा रा रा रा
टैरिफ-लकड़ी सँग जले, अकड़ ट्रंप की आज।
पुतिन-पिंग हों गुलेरी, भारत पहने ताज।।
जोगी जी सा रा रा रा
राहुल के माथे मलें, मोदी लाल गुलाल।
ममता को रंग निर्मला, कर दें नया धमाल।।
जोगी जी सा रा रा रा
आप केजरीवाल की, पिचकारी की मार।
अमित शाह चुप झेलते, रेखा पांय न पार।।
जोगी जी सा रा रा रा
तेजस्वी-अखिलेश मिल, बाँह बाँह में डाल।
भाँग चढ़ा खा रहे हैं, गुझिया भरकर थाल।
जोगी जी सा रा रा रा
योगी बुलडोजर लिए, जा पहुँचे जापान।
राजदूत से कह रहे,
ला झटपट जा पान।।
जोगी जी सा रा रा रा
३.३.२०२६
०००
मैं
मैं खुद पर ही मुग्ध रहा हूँ
काश! मुग्ध हो पाते मुझ पर
कुछ अपने
कुछ पुरा-पड़ोसी
कुछ दुश्मन, अनजान बटोही।
यह न हुआ तो
चोटिल-घायल
अहंकार दानव फुँफकारा,
मैंने उसको आप न रोका
क्रोध सुरा देकर पुचकारा
डॉलर की नगरी में बैठा
हिरनकशिपु मैं
माँग रहा था नोबल केबल।
नहीं दे सकी गर दुनिया तो
अब देखे मेरी नफ़रत को,
शांति दूत कह सकी न दुनिया
अब अशांति-रक्षक ही माने,
खोज-खोजकर नए ठिकाने
मैं विनाश को दावत दूँगा।
कहीं उठाऊँगा शासक को
पलक झपकते राजमहल से,
कहीं पलट दूँगा सत्ता मैं,
कहीं हड़प लूँ खनिज-तेल सब
और लगा टैरिफ मनमाना
सबको कर हैरान-परेशां
अट्टहास कर कथा लिखूँगा
अहंकार के तुष्टिकरण की।
विश्व शांति को कफन उढ़ाकर
निजी लाभ ले, दफन करूँगा,
लौकतंत्र को रौंद बूट से
नित स्वार्थों हित हवन करूँगा।
आसमान से बरसा गोले
आग लगा दूँगा दुनिया में,
शकुनि तुम्हारा नाटा-बौना
अगर महाभारत रच पाया,
तो मैं ऊँचा महाबली हूँ
उससे हार नहीं मानूँगा।
मेरा दृढ़ संकल्प यही है
हिटलर, गोरी, चंगेजों से
इतना आगे जाना मुझको,
जितना कोई कभी न जाए।
जितने तारे झंडे में हैं
उतने महायुद्ध करवाऊँ।
मानवता को धता बताकर
दानवता की जय जय गाऊँ।
मात्र तीन पाँसों से भारत
झुलस महाभारत कर पाया,
लिए हाथ में बावन पत्ते
ट्रंप कार्ड का अहंकार भी
रक्त बीज को पीछे छोड़ूँ।
शुंभ-निशुंभ दशानन के भी
हर रिकॉर्ड को मसलूँ-तोड़ूँ।
हो मसान यह दुनिया सारी
खुद को खुद तब दूँगा नोबल
३.३.२०२६
०००
हास्य  लघुकथा  
जुगाड़ टेक्नोलॉजी
फागुन के महीने में एक इंटरव्यू के लिए बुलावा आया। मुझे पता चला कि नौकरी सांसद के रिश्तेदार को दी जाना है, दिखावे के लिये इंटरव्यू हो रहा है। ऐसे सवाल पूछे जा रहे थे, जिनका कोई जवाब संभव नहीं था, एक के बाद एक केंडीडेट आ रहे थे, बिना जवाब दिए असफल होकर जा रहे थे।
मेरी बारी आई तो सवाल पूछा गया- 'आप नदी के बीच एक बोट पर हैं, और आपके पास दो candle के अलावा कुछ भी नहीं है। आपको एक candle जलानी है, कैसे जलाओगे?'
मैंने जुगाड़ टेक्नोलॉजी का उपयोग कर उत्तर दिया- 'सर! इसके तीन-चार सोल्युशन हो सकते हैं।'
प्रश्नकर्ता को बहुत आश्चर्य हुआ कि जिस सवाल का एक भी जवाब नहीं हो सकता, उसके तीन-चार जवाब कैसे हो सकते हैं? उसने कहा- 'बताओ।'
मैंने हिंगलिश में कहा- 'एक candle पानी में फेंक दो, then boat will become lighter (हल्की), और "lighter" से आप candle जला सकते हैं।'
इन्टरव्यू बोर्ड के सदस्य एक दूसरे का मुँह ताकने लगे।
अब एक दादी अम्मा टाइप की महिला ने दादागिरी करते हुए पूछा- 'दूसरा उत्तर क्या है?'
मैंने सोचने की मुद्रा बनाते हुए कहा- 'Throw a candle up and catch it. Catches win the Matches. Using the matches that you win, you can light the candle. दादी अम्मा की बोलती बंद हो गई।
अब बारी थी एक तेज तर्रार आधुनिका की। नायक पर टिके चश्मे में से झाँकते हुए उसने फरमाया- Next option?
मैंने उत्तर दिया- 'Take some water in your hand and drop it, drop-by-drop. It will sound like .. Tip.. Tip-Tip.. Tip
आधुनिका- So what?
मैं- 'Madam! आपने वो गाना नही सुना टिप-टिप बरसा पानी, पानी ने आग लगाई। इस आग से आप अपनी candle जला सकती हैं। यदि ये काफी नही हैं तो एक और उपाय है। आप एक candle से प्यार करने लगिए, दूसरी को जलन होगी, वह अपने आप जलने लगेगी।
प्रश्न पूछने वाली चारों खाने चित्त। मैंने जैसे ही कहा आप कहे तो एक और तो सब के सब बोल पड़े- संसद के रिश्तेदार को मारो गोली, नौकरी तो इस जुगाड़ टेक्नोलॉजी वाले को दी जाती है।
कार्य शाला
दोहा + रोला = कुंडलिया
नयन नयन को देखते, दोनों नयन विलोम!
ज्यों वसुधा को देखता, सदा सर्वदा व्योम।। - अशोक व्यग्र भोपाल
सदा सर्वदा व्योम, निरंतर रंग बदलता।
मलती उषा गुलाल, हरा वन झूम मचलता।।
नीले पीले लाल, गुलाबी सुमन कर चयन।
करे गगन को भेंट, धरा हँस मूँदकर नयन।।
०००
वन्य जीवन दिवस
हाइकु
वन्य जीवन
शहरी जीवन से
अधिक नैतिक।
.
जानवर है
अधिक अहिंसक
इंसान से।
.
कभी न देखा
रिश्वत लेते हुए
पशु-पक्षी को
.
नहीं जानते
बलात्कार करना
ये जानवर।
.
बेइज्जती है
इंसान को कहना
पशु, पशु की।
.
जमा करते
नहीं परदेश में
ये पशु धन।
.
कभी देखा है
दगाबाजी करते
जानवरों को?
.
होते हैं नंगे
पर बेशर्म नहीं
जंगलवासी।
३.३.२०२५
***
हाइकु गीत
प्रभु कृपा से / राम किंकर हुए / युग तुलसी।
नर्मदा तट / अवतरित फिर / रामबोला ही।।
जबलपुर / नगरी सुपावन / है मनोहर।
नर्मदा तट / सलिल अविकल / नाद सुंदर।।
कथावाचक / बसे शिवनायक / सरल मन।
मृदु स्वभावी / धनेसरा का साथ / था पावन।।
सुत हुआ था / श्याम सुंदर छवि / सुदर्शन थी।
प्रभु कृपा से / राम किंकर हुए / युग तुलसी।।
शांत बालक / प्रखर मतिमय / श्लोक रुचते।
लीन होकर / कथा सुनता / पिता कहते।।
भजन गातीं / दोउ बेरा जननि / सुनता वह।
मौन रहता / अर्थ उनमें छिपा / गुनता वह।।
पुलकते थे / पिता-माता सहित परिजन भी।
प्रभु कृपा से / राम किंकर हुए / युग तुलसी।।
सीख आखर / पढ़े-पूछे अर्थ भी / चिंतन करे।
संस्कृत-हिंदी / पढ़े, हल गणित कर/ कीर्तन करे।।
पितृ ममता / मातृ अनुशासन / सुखद पल।
विधि विचारे / घटित अघटित / हो न खो कल।।
नहीं कहतीं / कभी कुछ माँ पर / नहीं हुलसी।
प्रभु कृपा से / राम किंकर हुए / युग तुलसी।।
३.३.२०२४
•••
क्रमश:
***
सॉनेट
हम
हम अपने ही दुश्मन क्यों हैं?
कहें भला पर बुरा कर रहे।
आत्मनाश से नहीं डर रहे।।
बिना काम के कंचन क्यों हैं?
बिना नींव, प्रासाद बनाते।
कह विकास करते विनाश हम।
तम फैलाते कालांश हम।।
अपनों की बलि, बली चढ़ाते।
अहं-दंभ की सुरा पी रहे।
शंका भय के साथ जी रहे।
नाश-यज्ञ दुष्कर्म घी रहे।।
वन पर्वत सलिलाएँ सिसकें।
करें अनसुनी मनुज न हिचकें।
हाय विधाता! कहीं तो रुकें।।
३.३.२०२२
•••
मुक्तिका
°
खामियाँ खोजते नादां ऐसे।
खुद नहीं हैं, हुए खुदा जैसे।।
ख्वाहिशें ही हमें नचाती हैं।
बिक रहे हम खरीदते पैसे।।
आँसू पोछें नहीं, न दें राहत।
जिंदगी जी,न जी कभी कैसे?
आदमी कह रहे, न हैं लेकिन।
हम हुए जंगली बली भैंसे।।
काश रब दे अकल जरा हमको।
हों नहीं हम डरावने ऐसे।।
३-३-२०२२
•••
लेख:
सतत स्थाई विकास : मानव सभ्यता की प्राथमिक आवश्यकता
*
स्थायी-निरंतर विकास : हमारी विरासत
मानव सभ्यता का विकास सतत स्थाई विकास की कहानी है। निस्संदेह इस अंतराल में बहुत सा अस्थायी विकास भी हुआ है किन्तु अंतत: वह सब भी स्थाई विकास की पृष्ठ भूमि या नींव ही सिद्ध हुआ। विकास एक दिन में नहीं होता, एक व्यक्ति द्वारा भी नहीं हो सकता, किसी एक के लिए भी नहीं किया जाता। 'सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामय:, सर्वे भद्राणु पश्यन्ति, माँ कश्चिद दुःखभाग्भवेद" अर्थात ''सभी सुखी हों, सभी स्वस्थ्य हों, शुभ देखें सब, दुःख न कहीं हो"का वैदिक आदर्श तभी प्राप्त हो सकता है जब विकास, निरंतर विकास, सबकी आवश्यकता पूर्ति हित विकास, स्थाई विकास होता रहे। ऐसा सतत और स्थाई विकास जो मानव की भावी पीढ़ियों की आवश्यकताओं और उनके समक्ष उपस्थित होने वाले संकटों और अभावों का पूर्वानुमान कर किया जाए, ही हमारा लक्ष्य हो सकता है। सनातन वैदिक चिंतन धारा द्वारा प्रदत्त वसुधैव कुटुम्बकम" तथा 'विश्वैक नीडं' के मन्त्र ही वर्तमान में 'ग्लोबलाइज विलेज' की अवधारणा का आधार हैं।
'सस्टेनेबल डेवलपमेंट अर्थ स्थायी या टिकाऊ विकास से हमारा अभिप्राय विकास ऐसे कार्यों की निरन्तरता से है जो मानव ही नहीं, सकल जीव जंतुओं की भावी पीढ़ियों का आकलन कर, उनकी प्राप्ति सुनिश्चित करते हुए, वर्तमान समय की आवश्यकताएँ पूरी करे। दुर्गा सप्तशतीकार कहता है 'या देवी सर्व भूतेषु प्रकृतिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:'। पौर्वात्य चिन्तन प्रकृति को 'माँ' और सभी प्राणियों को उसकी संतान मानता है। इसका आशय यही है कि जैसे शिशु माँ का स्तन पान इस तरह करता है की माँ को कोई नहीं होती, अपितु उसका जीवन पूर्णता पता है, वैसे ही मनुष्य प्रकृति संसाधनों का उपयोग इस कि प्रकृति अधिक समृद्ध हो। भारतीय परंपरा में प्रकृति के अनुकूल विकास की मानता है, प्रकृति के प्रतिकूल विकास की नहीं।'सस्टेनेबल डवलेपमेन्ट कैन ओनली बी इन एकॉर्डेंस विथ नेचर एन्ड नॉट, अगेंस्ट और एक्सप्लोयटिंग द नेचर।'
प्रकृति माता - मनुष्य पुत्र
स्वयं को प्रकृति पुत्र मानने की अवधारणा ही पृथ्वी, नदी, गौ और भाषा को माता मानने की परंपरा बनकर भारत के जान-जन के मन में बसी है। गाँवों में गरीब से गरीब परिवार भी गाय और कुत्ते के लिए रोटी बनाकर उन्हें खिलाते हैं। देहरी से भिक्षुक को खाली हाथ नहीं लौटाते। आंवला, नीम, पीपल, बेल, तुलसी, कमल, दूब, महुआ, धान, जौ, लाई, आदि पूज्यनीय हैं। नर्मदा ,गंगा, यमुना, क्षिप्रा आदि नदियाँ पूज्य हैं। नर्मदा कुम्भ, गंगा दशहरा, यमुना जयंती आदि पर्व मनाये जाते हैं। पोला लोक पर्व पोला पर पशुधन का पूजन किया जाता है। आँवला नवमी, तुलसी जयंती आदि लोक पर्व मनाये जाते हैं। नीम व जासौन को देवी, बेल व धतूरा को शिव, कदंब व करील को कृष्ण, कमल व धान को लक्ष्मी, हरसिंगार को विष्णु से जोड़कर पूज्यनीय कहा गया है। यही नहीं पशुओं और पक्षियों को भी देवी-देवताओं से संयुक्त किया गया ताकि उनका शोषण न कर, उनका ध्यान रखा जाए। बैल, सर्प व नीलकंठ को शिव, शेर व बाघ को देवी, राजहंस व मोर को सरस्वती, हाथी को लक्ष्मी, मोर को कृष्ण आदि देवताओं के साथ संबद्ध बताया गया ताकि उनका संरक्षण किया जाता रहे। यही नहीं हनुमान जी को वायु, लक्ष्मी जी को जल, पार्वती जी को पर्वत, सीता जी भूमि की संतान कहा गया ताकि जन सामान्य इन प्राकृतिक तत्वों तत्वों की शुद्धता और सीमित सदुपयोग के प्रति सचेष्ट हो।
विश्व रूपांतरण : युग की महती आवश्यकता
हम पृथ्वी को माता मानते है और सतत विकास सदैव हमारे दर्शन और विचारधारा का मूल सिद्धांत रहा है। सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अनेक मोर्चों पर कार्य करते हुए हमें महात्मा गांधी की याद आती है, जिन्होंने हमें चेतावनी दी थी कि धरती प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकताओं को तो पूरा कर सकती है, पर प्रत्येक व्यक्ति के लालच को नहीं। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा पारित 'ट्रांस्फॉर्मिंग आवर वर्ल्ड : द 2030 एजेंडा फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट' के संकल्प कोभारत सहित १९३ देशों ने सितंबर, २०१५ में संयुक्त राष्ट्र महासभा की उच्च स्तरीय पूर्ण बैठक में स्वीकार और इसे एक जनवरी, २०१६ से लागू किया। इसे सतत विकास लक्ष्यों के घोषणापत्र के नाम से भी जाना जाता है। सतत विकास का उद्देश्य सबके लिए समान, न्यायसंगत, सुरक्षित, शांतिपूर्ण, समृद्ध और रहने योग्य विश्व का निर्माण हेतु विकास में सामाजिक परिवेश, आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण को व्यापक रूप से समाविष्ट करना है। २००० से २०१५ तक के लिए निर्धारित नए लक्ष्यों का उद्देश्य विकास के अधूरे कार्य को पूरा करना और ऐसे विश्व की संकल्पना को मूर्त रूप देना है, जिसमें चुनौतियाँ कम और आशाएँ अधिक हों। भारत विश्व कल्याणपरक विकास के मूलभूत सिद्धांतों को अपनी विभिन्न विकास नीतियों में आराम से ही सम्मिलित करता रहा है। वर्तमान विश्वव्यापी अर्थ संकट के संक्रमण काल में भी विकास की अच्छी दर बनाए रखने में भारत सफल है। गाँधी जी ने 'आखिरी आदमी के भले', विनोबा जी ने सर्वोदय और दीनदयाल उपाध्याय ने अंत्योदय के माध्यम से निर्धनों को को गरीबी रेखा से ऊपर लाने और निर्बल को सबल बनाने की संकल्पना का विकास किया। वर्ष २०३० तक निर्धनता को समाप्त करने का लक्ष्य हमारा नैतिक दायित्व ही नहीं, शांतिपूर्ण, न्यायप्रिय और चिरस्थायी भारत और विश्व को सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य प्राथमिकता भी है।
सतत विकास कार्यक्रम : लक्ष्य
वित्तीय लक्ष्य:
विकसित देश सरकारी विकास सहायत का अपना लक्ष्य प्राप्त कर, अपनी सकल राष्ट्रीय आय का ०.७%० विकासशील देशों को तथा ०.१५% से ०.२०% सबसे कम विकसित राष्ट्रों को दें। विकासशील देश एकाधिक स्रोत से साधन जुटाएँ तथा समन्वित नीतियों द्वारा दीर्घिकालिक ऋण संवहनीयता प्राप्त कर अत्यधिक ऋणग्रस्त निर्धन देशों पर ऋण बोझ कम कर निवेश संवर्धन को करें।
तकनीकी लक्ष्य:
विकसित, विकासशील व् अविकसित देशों के मध्य विज्ञान, प्रौद्योगिकी, तकनालोजी व नवाचार सुलभ कर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना। वैश्विक तकनॉलॉजी तंत्र का विकास करना। परस्पर सहमति पर रियायती और वरीयता देते हुए हितकारी शर्तों पर पर्यावरण अनुकूल तकनोलॉजी का विकास, हस्तांतरण, प्रसार व् समन्वय करना। तकनोलॉजी बैंक बनाकर सामर्थ्यवान तकनोलॉजी का प्रयोग बढ़ाना।
क्षमता निर्माण तथा व्यापार :
विकाशील देशों में लक्ष्य क्षमता निर्माण कर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना। राष्ट्रीय योजनाओं को समर्थन दिलाना। विश्व व्यापार संगठन के अन्तर्गत सार्वभौम, नियमाधारित, भेदभावहीन, खुली और समान बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली को प्रोत्साहित करना। विकासशील देशों के निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि कर, सबसे कम देशों की भागीदारी दोगुनी करना। सबसे कम विकसित देशों को शुल्क और कोटा मुक्त बाजार प्रवेश सुविधा देना, पारदर्शी व् सरल व्यापार नियम बनाकर बाजार में प्रवेश सरल बनाना।
नीतिगत-संस्थागत सामंजस्य:
सतत विकास हेतु वैश्विक वृहद आर्थिक स्थिरता वृद्धि हेतु नीतिगत-संस्थागत सामंजस्य बनाना। गरीबी मिटाने हेतु पारस्परिक नीतिगय क्षमता और नेतृत्व का सम्मान करना। सभी देशों के साथ सतत विकास लक्ष्य पाने में सहायक बहुहितकारी भागीदारियाँ कर विशेषज्ञता, तकनोलॉजी, तहा संसाधन जुटाना। प्रभावी सार्वजनिक व् निजी संसाधन जुटाना। सबसे कम विकसित, द्वीपीय व विकासशील देशों के लिए क्षमता निर्माण समर्थन बढ़ाना। २०३० तक सकल घेरलू उत्पाद के पूरक प्रगति के पैमाने विकसित करना।
स्थायी विकास लक्ष्य : केंद्र के प्रयास
सतत् विकास लक्ष्‍यों को हासिल करने के लिए खरबों डॉलर के निजी संसाधनों की काया पलट ताकत जुटाने, पुनःनिर्देशित करने और बंधन मुक्‍त करने हेतु तत्‍काल कार्रवाई करने, विकासशील देशों में संवहनीय ऊर्जा, बुनियादी सुविधाओं, परिवहन - सूचना - संचार प्रौद्योगिकी आदि महत्‍वपूर्ण क्षेत्रों में प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश सहित दीर्घकालिक निवेश जुटाने के साथ सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के लिए एक स्‍पष्‍ट दिशा निर्धारित करनी है। इस हेतु सहायक समीक्षा व निगरानी तंत्रों के विनियमन और प्रोत्‍साहक संरचनाओं हेतु नए साधन जुटाकर निवेश आकर्षित कर सतत विकास को पुष्‍ट करना प्राथमिक आवश्यकता है। सर्वोच्‍च ऑडिट संस्‍थाओं, राष्‍ट्रीय निगरानी तंत्र और विधायिका द्वारा निगरानी के कामकाज को अविलंब पुष्‍ट किया जाना है। हमारे मेक इन इंडिया, स्वच्छ भारत अभियान, बेटी बचाओ-बेटी पढाओ, राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, प्रधानमंत्री ग्रामीण और शहरी आवास योजना, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, डिजिटल इंडिया, दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना, स्किल इंडिया और प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना शामिल हैं। इसके अलावा अधिक बजट आवंटनों से बुनियादी सुविधाओं के विकास और गरीबी समाप्त करने से जुड़े कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जा रहा है। केंद्र सरकार ने सतत विकास लक्ष्यों के कार्यान्वयन पर निगरानी रखने तथा इसके समन्वय की जिम्मेदारी नीति आयोग को, संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक परिषद द्वारा प्रस्तावित संकेतकों की वैश्विक सूची से उपयोगी संकेतकों की पहचान कर राष्ट्रीय संकेतक तैयार करने का कार्य सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय को सौंपा है।न्यूयार्क में जुलाई, २०१७ में आयोजित होने वाले उच्च स्तरीय राजनीतिक मंच (एचएलपीएफ) पर अपनी पहली स्वैच्छिक राष्ट्रीय समीक्षा (वीएनआर) प्रस्तुत कर भारत सरकार ने सतत विकास लक्ष्यों के सफल कार्यान्वयन को सर्वोच्च महत्व दिया है।
राज्यों की भूमिका :
भारत के संविधान केंद्रों और राज्यों के मध्य राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक शक्ति संतुलन के अनुरूप राज्यों में विभिन्न राज्य स्तरीय विकास योजनायें कार्यान्वित की जा रही हैं। इन योजनाओं का सतत विकास लक्ष्यों के साथ तालमेल है। केंद्र और राज्य सरकारों को सतत विकास लक्ष्यों के कार्यान्वयन में आनेवाली विभिन्न चुनौतियों का मुकाबला मिलकर करना है। भारतीय संसद विभिन्न हितधारकों के साथ सतत विकास लक्ष्यों के कार्यान्वयन को सुविधाजनक बनाने के लिए सक्रिय है। अध्यक्षीय शोध कदम (एसआरआई) सतत विकास लक्ष्यों से संबंधित विभिन्न मुद्दों पर सांसदों और विशेषज्ञों के मध्य विमर्श हेतु है। नीति आयोग सतत विकास लक्ष्यों पर राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर परामर्श शृंखलाएं आयोजित कर विशेषज्ञों, विद्वानों, संस्थाओं, सिविल सोसाइटियों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों और केंद्रीय मंत्रालयों राज्य सरकारों व हितधारकों के साथ गहन विचार-विमर्श कर रहा है। पर्यावरण संरक्षण व संपूर्ण विकास हेतु जन आकांक्षा पूर्ण करने हेतु राष्ट्रीय, राज्यीय, स्थानीय प्रशासन तथा जन सामान्य द्वारा सतत समन्वयकर कार्य किये जा रहे हैं।
जन सामान्य की भूमिका :
भारत के संदर्भ में दृष्टव्य है कि सतत स्थाई कार्यक्रमों की प्रगति में जान सामान्य की भूमिका नगण्य है। इसका कारण उनका समन्वयहीन धार्मिक-राजनैतिक संगठनों से जुड़ाव, प्रशासन तंत्र में जनमत और जनहित के प्रति उपेक्षा, व्यापारी वर्ग में येन-केन-प्रकारेण अधिकतम लाभार्जन की प्रवृत्ति तथा संपन्न वर्ग में विपन्न वर्ग के शोषण की प्रवृत्ति का होना है। किसी लोकतंत्र में सब कुछ तंत्र के हाथों में केंद्रित हो तो लोक निराशा होना स्वाभाविक है। सतत विकास नीतियाँ गाँधी के 'आखिरी आदमी' अर्थात सबसे कमजोर को उसकी योग्यता और सामर्थ्य के अनुरूप आजीविका साधन उपलब्ध करा सकें तभी उनकी सार्थकता है। सरकारी अनुदान आश्रित जनगण कमजोर और तंत्र द्वारा शोषित होता है। भारत के राजनीतिक नेतृत्व को दलीय हितों पर राष्ट्रीय हितों को वरीयता देकर राष्ट्रोन्नयनपरक सतत विकास कार्यों में परस्पर सहायक होना होगा तभी संविधान की मंशा के अनुरूप लोकहितकारी नीतियों का क्रियान्वय कर मानव ही नहीं, समस्त प्राणियों और प्रकृति की सुरक्षा और विकास का पथ प्रशस्त सकेगा।
३.३.२०२०
===
दोहा की होली
*
दीवाली में दीप हो, होली रंग-गुलाल
दोहा है बहुरूपिया, शब्दों की जयमाल
*
जड़ को हँस चेतन करे, चेतन को संजीव
जिसको दोहा रंग दे, वह न रहे निर्जीव
*
दोहा की महिमा बड़ी, कीर्ति निरुपमा जान
दोहा कांतावत लगे, होली पर रसखान
*
प्रथम चरण होली जले, दूजे पूजें लोग
रँग-गुलाल है तीसरा, चौथा गुझिया-भोग
*
दोहा होली खेलता, ले पिचकारी शिल्प
बरसाता रस-रंग हँस, साक्षी है युग-कल्प
*
दोहा गुझिया, पपडिया, रास कबीरा फाग
दोहा ढोलक-मँजीरा, यारों का अनुराग
*
दोहा रच-गा, झूम सुन, होला-होली धन्य
दोहा सम दूजा नहीं. यह है छंद अनन्य
होलिकोत्सव २-३-२०१८
***
लघुकथा-
बदलाव का मतलब
*
जन प्रतिनिधियों के भ्रष्टाचरण, लगातार बढ़ते कर और मँहगाई, संवेदनहीन प्रशासन ने जीवन दूभर कर दिया तो जनता जनार्दन ने अपने वज्रास्त्र का प्रयोग कर सत्ताधारी दल को चारों खाने चित्त कर वोपक्षवोपक्ष को सत्तासीन कर दिया।
अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में निरंतर पेट्रोल-डीजल की कीमत में गिरावट के बावजूद ईंधन के दाम न घटने, बीच सत्र में अहिनियमों के द्वारा परोक्ष कर वृद्धि और बजट में आम कर्मचारी को मजबूर कर सरकार द्वारा काटे और कम ब्याज पर लंबे समय तक उपयोग किये गये भविष्य निधि कोष पर करारोपण से ठगा अनुभव कर रहे मतदाता को समझ ही नहीं आया बदलाव का मतलब।
***
मुक्तिका:
*
जब भी होती है हव्वा बेघर
आदम रोता है मेरे भीतर
*
आरक्षण की फाँस बनी बंदूक
जले घोंसले, मरे विवश तीतर
*
बगुले तालाबों को दे धाढ़स
मार रहे मछली घुसकर भीतर
*
नहीं चेतना-चिंतन संसद में
बजट निचोड़े खूं थोपे जब कर
*
खुद के हाथ तमाचा गालों पर
मार रहे जनतंत्र अश्रु से तर
*
पीड़ा-लाश सियासत का औज़ार
शांति-कपोतों के कतरें नित पर
*
भक्षक के पहरे पर रक्षक दीन
तक्षक कुंडली मार बना अफसर
***
छंद शाला
बरवै (नंदा दोहा)
बरवै अर्ध सम मात्रिक छंद है जिसके विषम चरण (प्रथम, तृतीय) में बारह तथा सम चरण ( द्वितीय, चतुर्थ) में सात मात्राएँ रखने का विधान है। सम चरणों के अन्त में जगण (जभान = लघु गुरु लघु) या तगण (ताराज = गुरु गुरु लघु) होने से बरवै की मिठास बढ़ जाती है।
बरवै छंद के प्रणेता अकबर के नवरत्नों में से एक महाकवि अब्दुर्रहीम खानखाना 'रहीम' कहे जाते हैं। किंवदन्ती है कि रहीम का कोई सेवक अवकाश लेकर विवाह करने गया। वापिस आते समय उसकी विरहाकुल नवोढा पत्नी ने उसके मन में अपनी स्मृति बनाये रखने के लिए दो पंक्तियाँ लिखकर दीं। रहीम का साहित्य-प्रेम सर्व विदित था सो सेवक ने वे पंक्तियाँ रहीम को सुनायीं।सुनते ही रहीम चकित रह गये। पंक्तियों में उन्हें ज्ञात छंदों से अलग गति-यति का समायोजन था। सेवक को ईनाम देने के बाद रहीम ने पंक्ति पर गौर किया और मात्रा गणना कर उसे 'बरवै' नाम दिया। मूल पंक्ति में प्रथम चरण के अंत 'बिरवा' शब्द का प्रयोग होने से रहीम ने इसे बरवै कहा। रहीम के लगभग २२५ तथा तुलसी के ७० बरवै हैं। विषम चरण की बारह (भोजपुरी में बरवै) मात्रायें भी बरवै नाम का कारण कही जाती है। सम चरण के अंत में गुरु लघु (ताल या नन्द) होने से इसे 'नंदा' और दोहा की तरह दो पंक्ति और चार चरण होने से नंदा दोहा कहा गया। पहले बरवै की मूल पंक्तियाँ इस प्रकार है:
प्रेम-प्रीति कौ बिरवा, चले लगाइ।
सींचन की सुधि लीज्यौ, मुरझि न जाइ।।
रहीम ने इस छंद का प्रयोग कर 'बरवै नायिका भेद' नामक ग्रन्थ की रचना की। गोस्वामी तुलसीदास की कृति 'बरवै रामायण में इसी का प्रयोग किया गया है। भारतेंदु हरिश्चंद्र तथा जगन्नाथ प्रसाद 'रत्नाकर' आदि ने भी इसे अपनाया। उस समय बरवै रचना साहित्यिक कुशलता और प्रतिष्ठा का पर्याय था। दोहा की ही तरह दो पद, चार चरण तथा लय के लिए विख्यात छंद नंदा दोहा या बरवै लोक काव्य में प्रयुक्त होता रहा है। ( सन्दर्भ: डॉ. सुमन शर्मा, मेकलसुता, अंक ११, पृष्ठ २३२)
रहीम ने फ़ारसी में भी इस छंद का प्रयोग किया-
मीं गुज़रद ईं दिलरा, बेदिलदार।
इक-इक साअत हमचो, साल हज़ार।।
इस दिल पर यूँ बीती, हृदयविहीन!
पल-पल वर्ष सहस्त्र, हुई मैं दीन
बरवै को 'ध्रुव' तथा' कुरंग' नाम भी मिले। ( छ्न्दाचार्य ओमप्रकाश बरसैंया 'ओंकार', छंद-क्षीरधि' पृष्ठ ८८)
मात्रा बाँट-
बरवै के चरणों की मात्रा बाँट ८+४ तथा ४+३ है। छन्दार्णवकार भिखारीदास के अनुसार-
पहिलहि बारह कल करु, बहरहुँ सत्त।
यही बिधि छंद ध्रुवा रचु, उनीस मत्त।।
पहले बारह मात्रा, बाहर सात।
इस विधि छंद ध्रुवा रच, उन्निस मात्र।।
उदाहरण-
०१. वाम अंग शिव शोभित, शिवा उदार ।
SI SI II SII IS ISI
सरद सुवारिद में जनु, तड़ित बिहार ॥
III ISII S II III ISI
०२. चंपक हरवा अँग मिलि, अधिक सुहाय।
जानि परै सिय हियरे, जब कुम्हलाय।।
०३. गरब करहु रघुनन्दन, जनि मन मांह।
देखहु अपनी मूरति, सिय की छांह।। -तुलसीदास
०४. मन-मतंग वश रह जब, बिगड़ न काज।
बिन अंकुश विचलत जब, कुचल समाज।। -ओमप्रकाश बरसैंया 'ओंकार'
०५. 'सलिल' लगाये चन्दन, भज हरि नाम।
पण्डे ठगें जगत को, नित बेदाम।।
०६. हाय!, हलो!! अभिवादन, तनिक न नेह।
भटक शहर में भूले, अपना गेह।।
०७. पाँव पड़ें अफसर के, भूले बाप।
रोज पुण्य कह करते, छिपकर पाप।।
शन्नो अग्रवाल -
०८. उथल पुथल करे पेट, न पचे बात।
मंत्री को पचे नोट, बन सौगात।।
०९. चश्में बदले फिर भी, नहीं सुझात।
मन के चक्षु खोल तो, बनती बात।।
१०. गरीब के पेट नहीं, मारो लात।
कम पैसे से बिगड़े, हैं हालात।।
११. पैसे ठूंसे फिर भी, भरी न जेब।
हर दिन करते मंत्री, नये फरेब।।
१२. मैं हूँ छोटा सा कण, नश्वर गात।
परम ब्रह्म के आगे, नहीं बिसात।।
१३. महुए के फूलों का, पा आभास।
कागा उड़-उड़ आये, उनके पास।।
१४. अकल के खोले पाट, जो थे बंद।
आया तभी समझ में, बरवै छंद।
अजित गुप्ता-
१५. बारह मात्रा पहले, फिर लिख सात।
कठिन बहुत है लिख ले, मिलती मात।।
१६. कैसे पकडूँ इनको, भागे छात्र।
रचना आवे जिनको, रहते मात्र।।
३-३-२०१६
***
नवगीत:
गीत! हाज़िर हो
.
समय न्यायाधीश की
लगती अदालत.
गीत! हाज़िर हो.
.
लगा है इलज़ाम
तुम पर
गिरगिटों सा
बदलते हो रंग.
श्रुति-ऋचा
या अनुष्टुप बन
छेड़ डी थी
सरसता की जंग.
रूप धरकर
मन्त्र का
या श्लोक का
शून्य करते भंग.
काल की
बनकर कलम तुम
स्वार्थ को
करते रहे हो तंग.
भुलाई ना
क्यों सखावत?
गीत! हाज़िर हो.
.
छेड़ते थे
जंग हँस
आक्रामकों
से तुम.
जान जाए
या बचे
करते न सुख
या गम.
जूझते थे
बूझते थे
मनुजता को
पूजते थे.
ढाल बनकर
देश की
दस दिशा में
घूमते थे.
मिटायी क्यों
हर अदावत?
गीत! हाज़िर हो.
.
पराजित होकर
न हारे,
दैव को
ले आये द्वारे.
भक्ति सलिला
में नहाये
कर दिये
सब तम उजारे.
बने संबल
भीत जन का-
‘त्राहि’ दनु हर
हर पुकारे.
दलित से
लगकर गले तुम
सत्य का
बनते रहे भुजदंड .
अनय की
क्यों की मलामत?
गीत! हाज़िर हो.
.
एक पल में
जिरह-बखतर
दूसरे पल
पहन चीवर.
योग के सँग
भोग अनुपम
रूप को
वरकर दिया वर.
नव रसों में
निमज्जित हो
हर असुन्दर
किया सुंदर.
हास की
बनकर फसल
कर्तव्य का ही
भुला बैठे संग?
नाश की वर
ली अलामत?
गीत! हाज़िर हो.
.
श्रमित काया
खोज छाया,
लगी कहने-
‘जगत माया’.
मूर्ति में भी
अमूरत को
छिपा- देखा,
पूज पाया.
सँग सुन्दर के
वरा शिव
शिवा को
मस्तक नवाया.
आज का आधार
कल कर,
स्वप्न कल का
नव सजाया.
तंत्र जन का
क्यों नियामत?
गीत! हाज़िर हो.
.
स्वप्न टूटा,
धैर्य छूटा.
सेवकों ने
देश लूटा.
दीनता का
प्रदर्शन ही -
प्रगतिवादी
बेल-बूटा.
छंद से हो तंग
कर रस-भंग
कविता गढ़ी
श्रोता मिला सोता.
हुआ मरकर
पुनर्जीवित
बोल कैसे
गीत-तोता?
छंद अब भी
क्यों सलामत?
गीत! हाज़िर हो.
.
हो गये इल्जाम
पूरे? तो बतायें
शेष हों कुछ और
तो वे भी सुनायें.
मिले अनुमति अगर
तो मैं अधर खोलूँ.
बात पहले आप तोलूँ
बाद उसके असत्य बोलूँ
मैं न मैं था,
हूँ न होऊँ.
अश्रु पोछूं,
आस बोऊँ.
बात जन की
है न मन की
फ़िक्र की
जग या वतन की.
साथ थी हर-
दम सखावत
प्रीत! हाज़िर हो.
.
नाम मुझको
मिले कितने,
काम मैंने
किये कितने.
याद हैं मुझको
न उतने-
कह रहा है
समय जितने.
छंद लय रस
बिम्ब साधन
साध्य मेरा
सत सुपावन
चित रखा है
शांत निश-दिन
दिया है आनंद
पल-छिन
इष्ट है परमार्थ
आ कह
नीत! हाज़िर हो.
.
स्वयंभू जो
गढ़ें मानक,
हो न सकते
वे नियामक.
नर्मदा सा
बह रहा हूँ.
कुछ न खुद का
गह रहा हूँ.
लोक से ले
लोक को ही,
लोक को दे-
लोक का ही.
रहा खाली हाथ
रखा ऊँचा माथ,
सब रहें सानंद
वरें परमानन्द.
विवादों को भूल
रच नव
रीत! हाज़िर हो.
.