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मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

अक्टूबर ६, ग़ज़ल, दोहा, सॉनेट, दशहरा, सरस्वती, गणेश, नदी, गीत, लघुकथा, पैरोडी, मुक्तक

सलिल सृजन अक्टूबर ६
*
ग़ज़लिका
० 
तुम भी ग़ालिब कमाल करते हो
हक की खातिर बवाल करते हो
.
सामने जब सियाहियाँ होतीं
हौसलों को मशाल करते हो
.
हुस्न देगा ही दगा, फितरत है
इश्क जां दे, मिसाल करते हो
.
है हकीकत में वायदा जुमला
जानकर भी धमाल करते हो
.

कौन किसका कभी कहीं होता
बावफ़ा हो, सवाल करते हो
.
न तो देते हो जीने ही खुद को
न तो जां दे निहाल करते हो
.
बेखयाली में कह नहीं देना
रात-दिन तुम खयाल करते हो
६.१०.२०२६
०००
दोहा सलिला
कर
.
कर ने कर के साथ मिल, करतल-ध्वनि की खूब।
कर माँगा सरकार ने, गए सोग में डूब।।
. 
कर देकर बे-कर नहीं हो सकते हम मित्र
नेता से कर लीजिए, तब सुधरेगा चित्र।।
.
कर-मत कर की कशमकश, कर देती हैरान।
सोच-समझ कर कार्य कर, पर मत कर अभियान।।
.
जो कर जोकर की तरह, मत कर हो गंभीर।
नौ कर नौकर के नहीं, धैर्य न धरे सुधीर।।
.
चाक कलेजा कर दिया, जाकर सुख ने यार।
आकर दुख पड़ता गले, गले मिले संसार।।
.
कर देकर कुछ रो रहे, कर न दिया कुछ रोय।
करनी कर कर मैं हुआ, मरा न धीरज खोय।।
६.१०.२०२६
०००
सॉनेट
दशहरा
●
दश हरा, मन जीत जाता
पंच ज्ञानेंद्रिय न रीतें
पंच कर्मेंद्रिय न बीतें
ईश पद सिर सिर नवाता।
नाद प्रभु का गान करता
ताल हँस संगति निभाता
थाप अविचल संग आता
वाक् लहरित तान भरता।
शब्द आप निशब्द होते
अर्थ अपने अर्थ खोते
जागते नहिं, नहीं सोते।
भाव हो बेभाव जाता
रसिक रस में डूब जाता
खुद खुदी को, खुदा पाता।
संवस
६-१०-२०२२
•••
माँ सरस्वती के द्वादश नाम
माँ सरस्वती के स्तोत्र, मंत्र, श्लोक का ज्ञान न हो तो श्रद्धा सहित इन १२ नामों का १२ बार जप करना पर्याप्त है-
हंसवाहिनी बुद्धिदायिनी भारती।
गायत्री शारदा सरस्वती तारती।।
ब्रह्मचारिणी वागीश्वरी! भुवनेश्वरी!
चंद्रकांति जगती कुमुदी लो आरती।।
***
नव गीत
*
भोर हुई
छाई अरुणाई
जगना तनिक न भला लगा
*
छायद तरु
नर बना कुल्हाड़ी
खोद रहा अरमान-पहाड़ी
हुआ बस्तियों में जल-प्लावन
मनु! तूने ही बात बिगाड़ी।
अनगिन काटे जंगल तूने
अब तो पौधा नया लगा
*
टेर; नहीं
गौरैया आती
पवन न गाती पुलक प्रभाती
धुआँ; धूल; कोलाहल बेहद
सौंप रहे जहरीली थाती
अय्याशी कचरे की जननी
नाता एक न नेह पगा
*
रिश्तों की
रजाई थी दादी
बब्बा मोटी धूसर खादी
नाना-नानी खेत-तलैया
लगन-परिश्रम से की शादी
सुविधा; भोग-विलास मिले जब
संयम से तब किया दगा
*
रखा काम से
काम काम ने
छोड़ दिया तब सिया-राम ने
रिश्ते रिसती झोपड़िया से
बेच-खरीदी करी दाम ने
नाम हुआ पद; नाम न कोई
संग रहा न हुआ सगा
*
दोष तर्जनी
सबको देती
करती मोह-द्रोह की खेती
संयम; त्याग; योग अंगुलियाँ
कहें; न भूलो चिंतन खेती
भौंरा बना नचाती दुनिया
मन ने तन को 'सलिल' ठगा
***
ॐ
गीत:
नदी मर रही है
*
नदी नीरधारी, नदी जीवधारी,
नदी मौन सहती उपेक्षा हमारी
नदी पेड़-पौधे, नदी जिंदगी है-
भुलाया है हमने, नदी माँ हमारी
नदी ही मनुज का
सदा घर रही है।
नदी मर रही है
*
नदी वीर-दानी, नदी चीर-धानी
नदी ही पिलाती बिना मोल पानी,
नदी रौद्र-तनया, नदी शिव-सुता है-
नदी सर-सरोवर नहीं दीन, मानी
नदी निज सुतों पर सदय, डर रही है
नदी मर रही है
*
नदी है तो जल है, जल है तो कल है
नदी में नहाता जो वो बेअकल है
नदी में जहर घोलती देव-प्रतिमा
नदी में बहाता मनुज मैल-मल है
नदी अब सलिल का नहीं घर रही है
नदी मर रही है
*
नदी खोद गहरी, नदी को बचाओ
नदी के किनारे सघन वन लगाओ
नदी को नदी से मिला जल बचाओ
नदी का न पानी निरर्थक बहाओ
नदी ही नहीं, यह सदी मर रही है
नदी मर रही है
*
नदी भावना की, बहे हर-हराकर
नदी कामना की, सुखद हो दुआ कर
नदी वासना की, बदल राह, गुम हो
नदी कोशिशों की, हँसें हम बहाकर
नदी देश की, विश्व बन फल रही है
नदी मर रही है
६-१०-२०१९
***
गणपति वंदन
जागिए गणराज होती भोर
कर रहे पंछी निरंतर शोर
धोइए मुख, कीजिए झट स्नान
जोड़कर कर कर शिवा-शिव ध्यान
योग करिए दूर होंगे रोग
पाइए मोदक लगाएँ भोग
प्रभु! सिखाएँ कोई नूतन छंद
भर सके जग में नवल मकरंद
मातु शारद से कृपा-आशीष
पा सलिल सा मूर्ख बने मनीष
***
नवगीत
*
महरी पर गड़ती
गृद्ध-दृष्टि सा
हो रहा पर्यावरण
*
दोष अपना और पर मढ़
सभी परिभाषा गलत पढ़
जिस तरह हो सीढ़ियाँ चढ़
देहरी के दूर
मिट्टी गंदगी सा
कर रहे क्यों? आचरण
*
हवस के बनकर पुजारी
आरती तन की उतारी
नियति अपनी खुद बिगाड़ी
चीर डाला
असुर बनकर
माँ धरा का आवरण
*
करें हम किस पर भरोसा
नफ़रतों को सतत पोसा
अंध श्रद्धा के सहारे
चाहते हैं
कर सकें हम
स्नेह पाकर संतरण
***
मुक्तक
मित्रों से पाया-दिया, मित्रों को उपहार।
'सलिल' नर्मदा का पिया, है जीवन त्यौहार।।
पाकर संग ब्रजेश को, है सुरेश मन-प्राण
नव प्रभात संतोष दे, अकलुष हो ब्यौहार।।
*
सरला वसुधा अर्जिता, मुकुल अस्मिता मुक्ति।
काया-छाया साथ मिल, बन माया दें शक्ति।।
बुद्धि विनीता देह हो, जब विदेह मिथलेश
सफल सलिल अभियान हो, संग साधना युक्ति।।
*
काव्य कामिनी मोहती धीरे-धीरे मीत
धीरे-धीरे ही बढ़े मानव मन में प्रीत
यथा समय आते अरुण तारागण रजनीश
धीरे-धीरे श्वास ही बन जाती है गीत।।
*पुष्प सम पुष्पा हमेशा मुस्कुराए
मन मिलन के, वन सृजन के गीत गाए
बहारें आ राह में स्वागत करें नित-
लक्ष्य पग छू कर खुदी को धन्य पाए
*
मेघ आकर बरसते हैं, अरुण लगता लापता है।
फिक्र क्यों?, करना समय पर क्या कहाँ उसको पता है?
नित्य उगता है, ढले भी पर नहीं शिकवा करे-
नर्म दिल वह, हम कहें कठोर क्या उसकी खता है।।
*
साथ है रजनीश तो फिर छू सकें आकाश मुमकिन।
बाँधते जो तोड़ पाएँ हम सभी वे पाश मुमकिन।।
'सलिल' हो संजीव आओ! प्रदूषण से हम बचाएँ-
दीन हितकारी बने सरकार प्रभु हो काश मुमकिन।।
६-१०-२०१९
***
विमर्श :
मंदिरों का स्वर्ण मंडन
*
बचपन में सुना था ईश्वर दीनबंधु है, माँ पतित पावनी हैं।
आजकल मंदिरों के राजप्रासादों की तरह वैभवशाली बनाने और सोने से मढ़ देने की होड़ है।
माँ दुर्गा को स्वर्ण समाधि देने का समाचार विचलित कर गया।
इतिहास साक्षी है देवस्थान अपनी अकूत संपत्ति के कारण ही लूट को शिकार हुए।
मंदिरों की जमीन-जायदाद पुजारियों ने ही खुर्द-बुर्द कर दी।
सनातन धर्म कंकर कंकर में शंकर देखता है।
वैष्णो देवी, विंध्यवासिनी, कामाख्या देवी आदि प्राचीन मंदिरों में पिंड या पिंडियाँ ही विराजमान हैं।
परम शक्ति अमूर्त ऊर्जा है किसी प्रसूतिका गृह में उसका जन्म नहीं होता, किसी श्मशान घाट में उसका दाह भी नहीं किया जा सकता।
थर्मोडायनामिक्स के अनुसार 'इनर्जी कैन नीदर बी क्रिएटेड नॉर बी डिस्ट्रायड, कैन ओनली बी ट्रांसफार्म्ड' अर्थात ऊर्जा का निर्माण या विनाश नहीं केवल रूपांतरण संभव है।
ईश्वर तो परम ऊर्जा है, उसकी जयंती मनाएँ तो पुण्यतिथि भी मनानी होगी।
निराकार के साकार रूप की कल्पना अबोध बालकों को अनुभूति कराने हेतु उचित है किंतु मात्र वहीं तक सीमित रह जाना कितना उचित है?
माँ के करोड़ों बच्चे बाढ़ में सर्वस्व गँवा चुके हैं, अर्थ व्यवस्था के असंतुलन से रोजगार का संकट है, सरकारें जनता से सहायता हेतु अपीलें कर रही हैं और उन्हें चुननेवाली जनता का अरबों-खरबों रुपया प्रदर्शन के नाम पर स्वाहा किया जा रहा है।
एक समय प्रधान मंत्री को अनुरोध पर सोमवार अपराह्न भोजन छोड़कर जनता जनार्दन ने सहयोग किया था। आज अनावश्यक साज-सज्जा छोड़ने के लिए भी तैयार न होना कितना उचित है?
क्या सादगीपूर्ण सात्विक पूजन कर अपार राशि से असंख्य वंचितों को सहारा दिया जाना बेहतर न होगा?
संतानों का घर-गृहस्थी नष्ट होते देखकर माँ स्वर्णमंडित होकर प्रसन्न होंगी या रुष्ट?
***
प्रात स्वागत
*
स्वाति-सलिल की बूँद से, को सीपी की दरकार।
पानी तब ही ले सके, मोती का आकार।।
*
त्रिगुणात्मकता प्रकृति का, प्राकृत सहज स्वभाव।
एक तत्व भी न्यून तो, रहता शेष अभाव।।
*
छाया छा या शीश पर, कुहरा बरखा घाम।
पड़े झेलना हो सखे!, पल में काम तमाम।।
*
वीतराग मिथलेश पर, जान जानकी मोह।
मौन-शांत कब तक सहें, कहिए विरह-विछोह?
*
बुद्धि विनीता ही रहे, करता ग्यान घमंड।
मन न मुकुल हो सके तो, समझें पाया दंड।।
*
वसुंधरा बिन दे सके, कहें कौन आधार?
पग भू पर रख उड़ नहीं, नभ में खो आधार।।
*
बिंदु बिना रेखा नहीं, मिल गढ़ती हैं चित्र।
सीधी रह मत वक्र हो, रेखा बनकर मित्र।।
*
मंडन-मंडल बिन कहाँ, मंडला गहे महत्व।
नेह नर्मदा नहा ले, मूल यही है तत्व।।
*
नवधा भक्ति न कर्म बिन, आलस करे न लोक।
बिन वेतन मजदूर रवि, दे दिनकर आलोक।।
***
दोहा गीत-
बंद बाँसुरी
*
बंद बाँसुरी चैन की,
आफत में है जान।
माया-ममता घेरकर,
लिए ले रही जान।।
*
मंदिर-मस्जिद ने किया, प्रभु जी! बंटाधार
यह खुश तो नाराज वह, कैसे पाऊँ पार?
सर पर खड़ा चुनाव है,
करते तंग किसान
*
पप्पू कहकर उड़ाया, जिसका खूब मजाक
दिन-दिन जमती जा रही, उसकी भी अब धाक
रोहिंग्या गल-फाँस बन,
करते हैं हैरान
*
चंदा देते सेठ जो, चाहें ऊँचे भाव
जनता का क्या, सहेगी चुप रह सभी अभाव
पत्रकार क्रय कर लिए,
करें नित्य गुणगान
*
तिलक जनेऊ राम-शिव, की करता जयकार
चैन न लेने दे रहा, मैया! चतुर सियार
कैसे सो सकता कहें,
लंबी चादर तान?
*
गीदड़ मिलकर शेर को, देते धमकी रोज
राफेल से कैसे बचें, रहे तरीके खोज
पाँच राज्य हैं जीतना
लिया कमल ने ठान
६.१०.२०१८
***
एक गीत -एक पैरोडी
*
ये रातें, ये मौसम, नदी का किनारा, ये चंचल हवा ३१
कहा दो दिलों ने, कि मिलकर कभी हम ना होंगे जुदा ३०
*
ये क्या बात है, आज की चाँदनी में २१
कि हम खो गये, प्यार की रागनी में २१
ये बाँहों में बाँहें, ये बहकी निगाहें २३
लो आने लगा जिंदगी का मज़ा १९
*
सितारों की महफ़िल ने कर के इशारा २२
कहा अब तो सारा, जहां है तुम्हारा २१
मोहब्बत जवां हो, खुला आसमां हो २१
करे कोई दिल आरजू और क्या १९
*
कसम है तुम्हे, तुम अगर मुझ से रूठे २१
रहे सांस जब तक ये बंधन न टूटे २२
तुम्हे दिल दिया है, ये वादा किया है २१
सनम मैं तुम्हारी रहूंगी सदा १८
फिल्म –‘दिल्ली का ठग’ १९५८
***
पैरोडी
है कश्मीर जन्नत, हमें जां से प्यारी, हुए हम फ़िदा ३०
ये सीमा पे दहशत, ये आतंकवादी, चलो दें मिटा ३१
*
ये कश्यप की धरती, सतीसर हमारा २२
यहाँ शैव मत ने, पसारा पसारा २०
न अखरोट-कहवा, न पश्मीना भूले २१
फहराये हरदम तिरंगी ध्वजा १८
*
अमरनाथ हमको, हैं जां से भी प्यारा २२
मैया ने हमको पुकारा-दुलारा २०
हज़रत मेहरबां, ये डल झील मोहे २१
ये केसर की क्यारी रहे चिर जवां २०
*
लो खाते कसम हैं, इन्हीं वादियों की २१
सुरक्षा करेंगे, हसीं घाटियों की २०
सजाएँ, सँवारें, निखारेंगे इनको २१
ज़न्नत जमीं की हँसेगी सदा १७
***
लघुकथा
समाधि
*
विश्व पुस्तक दिवस पर विश्व विद्यालय के ग्रंथागार में पधारे छात्र नेताओं, प्राध्यापकों, अधिकारियों, कुलपति तथा जनप्रतिनिधियों ने क्रमश: पुस्तकों की महत्ता पर लंबे-लंबे व्याख्यान दिए।
द्वार पर खड़े एक चपरासी ने दूसरे से पूछा- 'क्या इनमें से किसी को कभी पुस्तकें लेते, पढ़ते या लौटाते देखा है?'
'चुप रह, सच उगलवा कर नौकरी से निकलवायेगा क्या? अब तो विद्यार्थी भी पुस्तकें लेने नहीं आते तो ये लोग क्यों आएंगे?'
'फिर ये किताबें खरीदी ही क्यों जाती हैं?
'सरकार से प्राप्त हुए धन का उपयोग होने की रपट भेजना जरूरी होता है तभी तो अगले साल के बजट में राशि मिलती है, दूसरे किताबों की खरीदी से कुलपति, विभागाध्यक्ष, पुस्तकालयाध्यक्ष आदि को कमीशन भी मिलता है।'
'अच्छा, इसीलिये हर साल सैंकड़ों किताबों को दे दी जाती है समाधि।'
***
लघुकथा
काँच का प्याला
*
हमेशा सुरापान से रोकने के लिए तत्पर पत्नी को बोतल और प्याले के साथ बैठा देखकर वह चौंका। पत्नी ने दूसरा प्याला दिखाते हुए कहा 'आओ, तुम भी एक पैग ले लो।'
वह कुछ कहने को हुआ कि कमरे से बेटी की आवाज़ आयी 'माँ! मेरे और भाभी के लिए भी बना दे। '
'क्या तमाशा लगा रखा है तुम लोगों ने? दिमाग तो ठीक है न?' वह चिल्लाया।
'अभी तक तो ठीक नहीं था, इसीलिए तो डाँट और कभी-कभी मार भी खाती थी, अब ठीक हो गया है तो सब साथ बैठकर पियेंगे। मूड मत खराब करो, आ भी जाओ। ' पत्नी ने मनुहार के स्वर में कहा।
वह बोतल-प्याले समेत कर फेंकने को बढ़ा ही था कि लड़ैती नातिन लिपट गयी- 'नानू! मुझे भी दो न'
उसके सब्र का बाँध टूट गया, नातिन को गले से लगाकर फुट पड़ा वह 'नहीं, अब कभी हाथ भी नहीं लगाऊँगा। तुम सब ऐसा मत करो। हे भगवान्! मुझे माफ़ करों' और लपककर बोतल घर के बाहर फेंक दी। उसकी आँखों से बह रहे पछतावे के आँसू समेटकर मुस्कुरा रहा था काँच का प्याला।
६.१०.२०१६
***
उपमा अलंकार
*
जब दो शब्दों में मिले, गुण या धर्म समान.
'उपमा' इंगित कर उसे, बन जाता रस-खान..
जो वर्णन का विषय हो, जिसको कहें समान.
'सलिल' वही 'उपमेय' है, निसंदेह लें मान..
जिसके सदृश बता रहे, वह प्रसिद्ध 'उपमान'
जोड़े 'वाचक शब्द' औ', 'धर्म' हुआ गुण-गान..
'उपमा' होता 'पूर्ण' जब, दिखते चारों अंग.
होता वह 'लुप्तोपमा', जब न दिखे जो अंग..
आरोपित 'उपमेय' में होता जब 'उपमान'.
'वाचक शब्द' न 'धर्म' हो, तब 'रूपक' अनुमान..
उपमा इकटक हेरता:
साम्य सेतु उपमा रचे, गुण बनता आधार.
साम्य बिना दुष्कर 'सलिल', जीवन का व्यापार..
उपमा इकटक हेरता, टेर रहा उपमान.
न्यून नहीं हूँ किसी से, मैं भी तो श्रीमान..
इस गुहार की अनसुनी न कर हम उपमा से ही साक्षात् करते हैं.
जब किन्हीं दो भिन्न व्यक्तियों या वस्तुओं में किसी गुन या वृत्ति के आधार पर समानता स्थापित होती है तो वहाँ उपमा अलंकार होता है.
उपमा के ४ अंग होते हैं.
१. उपमेय:
वर्णन का विषय या जिसके सम्बन्ध में बात की जाए या जिसे किसी अन्य के सामान बताया जाए वह 'उपमेय' है.
2. उपमान:
उपमेय की समानता जिस वस्तु से की जाए या उपमेय को जिसके समान बताया जाये वह उपमान होता है.
३. वाचक शब्द:
उपमेय और उपमान के बीच जिस शब्द के द्वारा समानता बताई जाती है, उसे वाचक शब्द कहते हैं.
४. साधारण धर्म:
उपमेय और उपमान दोनों में पाया जानेवाला गुन जो समानता का कारक हो, उसे साधारण धर्म कहते हैं.
उदाहरण:
शब्द बचे रहें
जो चिड़ियों की तरह कभी पकड़ में नहीं आते
- मंगेश डबराल, साहित्य शिल्पी में
यहाँ 'शब्द' उपमेय, 'चिडियों' उपमान, 'तरह' वाचक शब्द तथा 'पकड़ में नहीं आते' साधारण धर्म है.
उपमा अलंकार के प्रकार:
१. पूर्णोपमा- जहाँ उपमेय, उपमान, वाचक शब्द व साधारण धर्म इन चारों अंगों का उल्लेख हो.
२. लुप्तोपमा- जहाँ उक्त चार अंगों में से किसी या किन्हीं का उल्लेख न हो अर्थात वह लुप्त हो.
लुप्तोपमा के ४ भेद
(१) उपमेय लुप्तोपमा: जब उपमेय का उल्लेख न हो,
(२) उपमान लुप्तोपमा: जब उपमान का उल्लेख न हो,
(३) धर्म लुप्तोपमा: जब धर्म का उल्लेख न हो तथा
(४) वाचक लुप्तोपमा: जब वाचक शब्द का उल्लेख न हो, हैं.
यथा:
१. 'माँगते हैं मत भिखारी के समान' - यहाँ भिखारी उपमान, समान वाचक शब्द, माँगना साधारण धर्म हैं किन्तु मत कौन मांगता है, इसका उल्लेख नहीं है. अतः, उपमेय न होने से यहाँ उपमेय लुप्तोपमा है.
२. 'भारत सा निर्वाचन कहीं नहीं है'- उपमेय 'भारत', वाचक शब्द 'सा', साधारण धर्म 'निर्वाचन' है किन्तु भारत की तुलना किस से की जा रही है?, यह उल्लेख न होने से यहाँ उपमान लुप्तोपमा है.
३. 'जनता को मंत्री खटमल सा'- यहाँ मंत्री उपमेय, खटमल उपमान, सा वाचक शब्द है किन्तु खून चूसने के गुण का उल्लेख नहीं है. अतः, धर्म लुप्तोपमा है.
४. 'नव शासन छवि स्वच्छ गगन'- उपमेय नव शासन, उपमान गगन, साधारण धर्म स्वच्छ है किन्तु वाचक शब्द न होने से 'वाचक लुप्तोपमा' है.
***********
उदाहरण :
१. सागर सा गंभीर ह्रदय हो,
गिरि सा ऊँचा हो जिसका मन.
ध्रुव सा जिसका लक्ष्य अटल हो,
दिनकर सा हो नियमित जीवन.
२. यहीं कहीं पर बिखर गयी वह,
भग्न विजय माला सी.
उनके फूल यहाँ संचित हैं,
यह स्मृति शाला सी.
३. सुनि सुरसरि सम पावन बानी.
४. अति रमणीय मूर्ति राधा की.
५. नव उज्जवल जल-धार हार हीरक सी सोहित.
६. भोगी कुसुमायुध योगी सा बना दृष्टिगत होता है.
७. नव अम्बुज अम्बर छवि नीक.
८. मुख मयंक सम मंजु मनोहर.
९. सागर गरजे मस्ताना सा.
१०. वह नागिन सी फुफकार गिरी.
११. राधा वदन चन्द्र सौं सुन्दर.
१२. नवल सुन्दर श्याम शरीर की.
सजल नीरद सी कल कांति थी.
१३. कुंद इंदु सम देह.
१४. पडी थी बिजली सी विकराल,
लपेटे थे घन जैसे बाल.
१५. जीते हुए भी मृतक सम रहकर न केवल दिन भरो.
१६. मुख बाल रवि सम लाल होकर ज्वाल सा बोधित हुआ.
१७. छत्र सा सर पर उठा था प्राणपति का हाथ.
१८. लज संकोच विकल भये मीना, विविध कुटुम्बी जिमि धन हीना.
१९. सहे वार पर वार अंत तक लड़ी वीर बाला सी.
२०.माँ कबीर की साखी जैसी, तुलसी की चौपाई सी.
माँ मीरा की पदावली सी माँ है ललित रुबाई सी.
माँ धरती के धैर्य सरीखी, माँ ममता की खान है.
माँ की उपमा केवल माँ है, माँ सचमुच भगवान है.
जगदीश व्योम, साहित्य शिल्पी में.
२१. पूजा की जैसी
हर माँ की ममता है
प्राण शर्मा, साहित्य शिल्पी में
२२. माँ की लोरी में
मुरली सा जादू है
प्राण शर्मा, साहित्य शिल्पी में
२३. रिश्ता दुनियाँ में जैसे व्यापार हो गया।
श्यामल सुमन, साहित्य शिल्पी में
२४. चहकते हुए पंछियों की सदाएं,
ठुमकती हुई हिरणियों की अदाएं! - धीरज आमेटा, साहित्य शिल्पी में
===
नवगीत :
समय के संतूर पर
सरगम सुहानी
बज रही.
आँख उठ-मिल-झुक अजाने
आँख से मिल
लज रही.
*
सुधि समंदर में समाई लहर सी
शांत हो, उत्ताल-घूर्मित गव्हर सी
गिरि शिखर चढ़ सर्पिणी फुंकारती-
शांत स्नेहिल सुधा पहले प्रहर सी
मगन मन मंदाकिनी
कैलाश प्रवहित
सज रही.
मुदित नभ निरखे न कह
पाये कि कैसी
धज रही?
*
विधि-प्रकृति के अनाहद चिर रास सी
हरि-रमा के पुरातन परिहास सी
दिग्दिन्तित रवि-उषा की लालिमा
शिव-शिवा के सनातन विश्वास सी
लरजती रतनार प्रकृति
चुप कहो क्या
भज रही.
साध कोई अजानी
जिसको न श्वासा
तज रही.
*
पवन छेड़े, सिहर कलियाँ संकुचित
मेघ सीचें नेह, बेलें पल्ल्वित
उमड़ नदियाँ लड़ रहीं निज कूल से-
दमक दामिनी गरजकर होती ज्वलित
द्रोह टेरे पर न निष्ठा-
राधिका तज
ब्रज रही.
मोह-मर्यादा दुकूलों
बीच फहरित
ध्वज रही.
६.१०.२०१५
***

शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

जुलाई २४, सेल्फ़् केयर, सॉनेट, देव, पैरोडी, यमक, नवगीत, हास्य, छत्तीसगढ़ी घनाक्षरी, अंगिका दोहा ग़ज़ल

सलिल सृजन जुलाई २४

अंतर्राष्ट्रीय स्व देखभाल (सेल्फ़् केयर) दिवस
*
ग़ज़लिका
चलो बुलाता देश हमें, दो तंत्र बदल
भक्तों की खुल गई पोल, है मंद अकल
.
बात सनातन की कर, मंदिर में डाका
फर्जी डिग्री दिखा कह रहे यही असल
.
सीधी पूँछ न होती कुत्ते की बरसों
वादों को जुमला बतला, बन रहे अटल
.
बहुत दुहाई दी दोस्ती की, धोखा खा
बोल न पाते सच, चुप झाँकें आप बगल
.
राष्ट्र-संपदा की करते नित नीलामी
पेपर लीक कराते, करते आप नकल
.
संतानों के हित संरक्षण की खातिर
उगा रहे हैं ई ट्वंटी की रोज फसल
.
एपस्टीन फ़ाइलें कुछ तो कहती हैं
नजरें झुकीं कह रहीं जाते आप फिसल
.
काक्रोची सेना ले जान हथेली पर
करे नाक में दम पाओगे नहीं मसल
.
जिम्मेदारी तय हो, त्यागपत्र भी हों
सभी समस्याओं का केवल इतना हल
२४.७.२०२६
ooo
सॉनेट
•
अंबर में संसद बादल की,
हर बादल गरज गरज बोले,
चिंता न किसी को छागल की,
रोके न रुके जो मुँह खोले।
यह बादल मन की बात करे,
जुमलेबाजी वह करता है,
यह अंध भक्ति को शीश धरे,
ले-दे सरकार पलटता है।
कुछ आपस में टकराते हैं,
मुंँह की खाते हैं नाहक कुछ,
मंदिर-मस्जिद लड़वाते हैं,
आपाधापी के वाहक कुछ।
निज मुख निज कीर्ति पड़े छलकी।
पूजा करते छल-बल-खल की।।
२४-७-२०२३
•••
सॉनेट
•
डम डम डम डिम, डिम डिम डम डम,
है काल शीश पर बोल रहा,
मत कर विनाश बोलो विकास,
क्यों प्रलय द्वार मनु खोल रहा?
डम डम डम डिम, डिम डिम डम डम
जंगल काटे पर्वत खोदे,
नदियों का नाश किया तू ने,
किसका बूता फिर वन बो दे,
ग्लेशियर मिटे गरमी भूने।
डम डम डम डिम, डिम डिम डम डम
मैं ही नारी-नर, मैं किन्नर,
हो क्रुद्ध कर रहा मैं विनाश,
मैं ही शंकर मैं ही कंकर,
माया-काया मैं मोह-पाश।
डम डम डम डिम, डिम डिम डम डम
हूँ अर्ध नारी-नर-ईश्वर मैं।
तू क्षणभंगुर परमेश्वर मैं।।
डम डम डम डिम, डिम डिम डम डम
२४-७-२०२३
•••
सॉनेट
प्रभुजी
*
प्रभु जी! तुम मयूर, हम कागा
बाल कृष्ण के शीश मुकुट तुम
पुरखों के मुख, क्यों निकृष्ट हम?
तुम हो सुई, हम बेबस धागा
प्रभु जी! तुम सत्ता, हम वोटर
प्रभु जी तुम श्लोक, हम बानी
तुम हो ज्ञानी, हम अज्ञानी
मत पाते तुम, हम दे ठोकर
प्रभु जी! तुम सलिला, हम पानी
तुम धरती, हम पत्ते धानी
निरभिमान तुम, हम अभिमानी
प्रभु जी! पवन, मगर हम तिनका
तुम माला हम केवल मनका
तुम मन-मालिक दास मैं तन का
२४-७-२०२२
***
विमर्श : देवता
उत्तर-
देवता, 'दिव्' धातु से बना शब्द है, अर्थ 'प्रकाशमान होना' है। भावार्थ परालौकिक शक्ति जो अमर, पराप्राकृतिक है और पूजनीय है। देवता या देव इस तरह के पुरुष और देवी इस तरह की स्त्रियों को कहा गया है। देवता परमेश्वर (ब्रह्म) का लौकिक या सगुण रूप माने गए हैं।
बृहदारण्य उपनिषद के एक आख्यान में प्रश्न है कि कितने देव हैं? उत्तर - वास्तव में देव केवल एक है जिसके कई रूप हैं। पहला उत्तर है ३३ कोटि (प्रकार); और पूछने और पूछने पर ३ (विधि-हरि-हर या ब्रम्हा-विषय-महेश) फिर डेढ और फिर केवल एक (निराकार जिसका चित्र गुप्त है अर्थात नहीं है)। वेद मन्त्रों के विभिन्न देवता है। प्रत्येक मन्त्र का ऋषि, कीलक और देवता होता है।
देवताओं का वर्गीकरण- चार मुख्य प्रकार
१. स्थान क्रम से वर्णित देवता -- द्युस्थानीय यानी ऊपरी आकाश में निवास करने वाले देवता, मध्यस्थानीय यानी अन्तरिक्ष में निवास करने वाले देवता, और तीसरे पृथ्वीस्थानीय यानी पृथ्वी पर रहने वाले देवता माने जाते हैं।
२. परिवार क्रम से वर्णित देवता -- इन देवताओं में आदित्य, वसु, रुद्र आदि को गिना जाता है।
३. वर्ग क्रम से वर्णित देवता -- इन देवताओं में इन्द्रावरुण, मित्रावरुण आदि देवता आते हैं।
४. समूह क्रम से वर्णित देवता -- इन देवताओं में सर्व देवा (स्थान, वस्तु, राष्ट्र, विश्व
आदि) की गिनती की जाती है।
ऋग्वेद में स्तुतियों से देवताओं की पहचान की जाती है। ये देवता अग्नि, वायु, इंद्र, वरुण, मित्रावरुण, अश्विनीकुमार, विश्वदेवा, सरस्वती, ऋतु, मरुत, त्वष्टा, ब्रहस्पति, सोम, दक्षिणा इन्द्राणी, वरुणानी, द्यौ, पृथ्वी, पूषा आदि हैं। बहु देवता न माननेवाले सब नामों का अर्थ परब्रह्म परमात्मा वाचक करते है। बहुदेवतावादी परमात्मात्मक रूप में इनको मानते है। पुराणों में इन देवताओं का मानवीकरण अथवा लौकिकीकरण हुआ, फ़िर इनकी मूर्तियाँ, सम्प्रदाय, अलग अलग पूजा-पाठ बनाये गए।
धर्मशास्त्र में सबसे "तिस्त्रो देवता".(तीन देवता) ब्रह्मा, विष्णु और शिव का उदय हुआ। इनका कार्य सृष्टि का निर्माण, इसका पालन और संहार माना जाता है। काल-क्रम से देवों की संख्या बढ़ती गयी। निरुक्तकार यास्क के अनुसार," देवताऒ की उत्पत्ति आत्मा से है"। महाभारत के (शांति पर्व) में आदित्यगण क्षत्रिय देवता, मरुदगण वैश्य देवता, अश्विनी गण शूद्र देवता और अंगिरस ब्राहमण देवता माने गए हैं। शतपथ ब्राह्मण में भी इसी प्रकार से देवताओं को माना गया है।
आदित्या: क्षत्रियास्तेषां विशस्च मरुतस्तथा, अश्विनौ तु स्मृतौ शूद्रौ तपस्युग्रे समास्थितौ, स्मृतास्त्वन्गिरसौ देवा ब्राहमणा इति निश्चय:, इत्येतत सर्व देवानां चातुर्वर्नेयं प्रकीर्तितम
शुद्ध बहु ईश्वरवादी धर्मों में देवताओं को पूरी तरह स्वतन्त्र माना जाता है।प्रमुख वैदिक देवता गणेश (प्रथम पूज्य), सरस्वती, श्री देवी (लक्ष्मी), विष्णु, शक्ति (दुर्गा, पार्वती), शंकर, कृष्ण, इन्द्र, सूर्य, हनुमान, ब्रह्मा, राम, वायु, वरुण, अग्नि, शनि , कार्तिकेय, शेषनाग, कुबेर, धन्वंतरि, विश्वकर्मा आदि हैं।
२४-७-२०२०
***
मुक्तक
स्वप्न दिखा, लापता राम जी
कर बिसरा दें, ख़ता राम जी
देख मुसीबत, सीता पीछे
छिप जाते हैं, सता राम जी
*
कही सुनी हो माफ़ राम जी
बचा रहे इंसाफ़ राम जी
मिले मौत को मौत न क्यों अब?
हो न ज़िन्दगी भाप राम जी
*
जीत हार है भाग खेल का शुभ प्रभात
है विराग अनुराग ज़िन्दगी शुभ प्रभात
दीन बंधु बन करो बन्दगी शुभ प्रभात
देश हरा रख बोलो हिन्दी शुभ प्रभात
२४-७-२०१७
***
हास्य रचना
ई मित्रता पर पैरोडी:
*
(बतर्ज़: अजीब दास्तां है ये,
कहाँ शुरू कहाँ ख़तम...)
*
हवाई दोस्ती है ये,
निभाई जाए किस तरह?
मिलें तो किस तरह मिलें-
मिली नहीं हो जब वज़ह?
हवाई दोस्ती है ये...
*
सवाल इससे कीजिए?
जवाब उससे लीजिए.
नहीं है जिनसे वास्ता-
उन्हीं पे आप रीझिए.
हवाई दोस्ती है ये...
*
जमीं से आसमां मिले,
कली बिना ही गुल खिले.
न जिसका अंत है कहीं-
शुरू हुए हैं सिलसिले.
हवाई दोस्ती है ये...
*
दुआ-सलाम कीजिए,
अनाम नाम लीजिए.
न पाइए न खोइए-
'सलिल' न न ख्वाब देखिए.
हवाई दोस्ती है ये...
***
दोहा सलिला
गले मिले दोहा-यमक ३
*
गरज रहे बरसे नहीं, आवारा घन श्याम
नहीं अधर में अधर धर, वेणु बजाते श्याम
*
कृष्ण वेणु के स्वर सुने, गोप सराहें भाग
सुन न सके वे जो रहे, श्री के पीछे भाग
*
हल धर कर हलधर चले, हलधर कर थे रिक्त
चषक थाम कर अधर पर, हुए अधर द्वय सिक्त
*
बरस-बरस घन बरस कर, करें धरा को तृप्त
गगन मगन बादल नचे, पर नर रहा अतृप्त
*
असुर न सुर को समझते, अ-सुर न सुर के मीत
ससुर-सुता को स-सुर लख, बढ़ा रहे सुर प्रीत
*
पग तल पर रख दो बढें, उनके पग तल लक्ष्य
हिम्मत यदि हारे नहीं, सुलभ लगे दुर्लक्ष्य
*
ताल तरंगें पवन संग, लेतीं पुलक हिलोर
पत्ते देते ताल सुन, ऊषा भाव-विभोर
*
दिल कर रहा न संग दिल, जो वह है संगदिल
दिल का बिल देता नहीं, नाकाबिल बेदिल
*
हसीं लबों का तिल लगे, कितना कातिल यार
बरबस परबस दिल हुआ, लगा लुटाने प्यार
*
दिलवर दिल वर झूमता, लिए दिलरुबा हाथ
हर दिल हर दिल में बसा, वह अनाथ का नाथ
*
रीझा हर-सिंगार पर, पुष्पित हरसिंगार
आया हरसिंगार हँस, बनने हर-सिंगार
२४-७-२०१६
***
नवगीत:
*
गैर कहोगे जिनको
वे ही
मित्र-सगे होंगे
*
ना माँगेंगे पानी-राशन
ना चाहेंगे प्यार
नहीं लगायेंगे वे तुमको
अनचाहे फटकार
शिकवे-गिले-शिकायत
तुमसे?, होगी कभी नहीं
न ही जतायेंगे वे तुम पर
कभी तनिक अधिकार
काम पड़े पर नहीं
आचरण
प्रेम-पगे होंगे
गैर कहोगे जिनको
वे ही
मित्र-सगे होंगे
*
अगर न चाहो तो वे किंचित
निकट नहीं आते
काम पड़े तो अ
अपनापन दे
तनिक न भरमाते
लेन-देन साँसों के
आने-जाने सा व्यापार
कहो कभी क्या किंचित भी वे
तुमको तरसाते?
नाम न उनके, मन-
खूँटी पर
कभी टँगे होंगे
गैर कहोगे जिनको
वे ही
मित्र-सगे होंगे
*
सगा कह रहे जिनको वे ही
रहे निभाते बैर
सम्राटों की शहजादों से
कहो रही कब खैर?
जन्मा, गोद खिलाया-पाला
जिसको देता फूँक
बाप गधे को कहता, कहिए
जीते जी क्या गैर?
वे न जगेंगे,
जिनकी खातिर
आप जगे होंगे
गैर कहोगे जिनको
वे ही
मित्र-सगे होंगे
***
दोहा
नेह नर्मदा कलम बन, लिखे नया इतिहास
प्राची तम का अन्त कर, देती रहे उजास
*
प्राची पर आभा दिखी, हुआ तिमिर का अन्त
अंतर्मन जागृत करें, कंत बन सकें संत
*
हास्य षट्पदी
*
फिक्र न ज्यादा कीजिए, आसमान पर भाव
भेज उसे बाजार दें, जिसको आता ताव
जिसको आता ताव, शान्त वह हो जायेगा
थैले में पैसे ले खुश होकर जाएगा
सब्जी जेबों में लेकर रोता आएगा
'सलिल' अजायबघर में सब्जी देखें बच्चे
जियें फास्ट फुड खाकर, बनें नंबरी लुच्चे
२४-७-२०१४
***
छत्तीसगढ़ी घनाक्षरी
*
अँचरा मा भरे धान, टूरा गाँव का किसान, धरती मा फूँक प्राण, पसीना बहावथे.
बोबरा-फार बनाव, बासी-पसिया सुहाव, महुआ-अचार खाव, पंडवानी भावथे..
बारी-बिजुरी बनाय, उरदा के पीठी भाय, थोरको न ओतियाय, टूरी इठलावथे.
भारत के जय बोल, माटी मा करे किलोल, घोटुल मा रस घोल, मुटियारी भावथे..
*
नवी रीत बनन दे, नीक न्याब चलन दे, होसला ते बढ़न दे, कउवा काँव-काँव.
अगुवा के कोचिया, फगुवा के लोटिया, बिटिया के बोझिया, पिपल्या के छाँव..
अगोर पुरवईया, बटोर माछी भइया, अंजोर बैल-गइया, कुठरिया के ठाँव.
नमन माटी मइया, गले लगाये सइयां , बढ़ाव बैल-गइया, सुरग होथ गाँव....
*
देस के बिकास बर, सबन उजास बर, सुरसती दाई माई, दया बरसाय दे.
नव-नवा काम होथ, देस स्वर्ग धाम होथ, धरती म धान बोथ, फसल उगाय दे..
टूरा-टूरी गुणी होथ, मिहनती-धुनी होथ, हिरदा से नेह होथ, सलीका सिखाय दे.
डौका-डौकी चाह पाल, भाड़ मा दें डाह डाल, ऊँचा ही रखें कपाल, रीत नव बनाय दे..
२४-७-२०१४
रचना विधान: वार्निक छंद, चार पद, हर पद में चार चरण, हर चरण में ८-८-८-७ पर यति, चरणान्त दीर्घ,
***
अंगिका दोहा ग़ज़ल
*
काल बुलैले केकर, होतै कौन हलाल?
मौन अराधें दैव कै, एतै प्रातःकाल..
*
मौज मनैतै रात-दिन, हो लै की कंगाल.
संग न आवै छाँह भी, आगे कौन हवाल?
*
एक-एक कै खींचतै, बाल- पकड़ लै खाल.
नींन नै आवै रात भर, पलकें करैं सवाल..
*
के हमरो रच्छा करै, मन में 'सलिल' मलाल.
केकरा से बिनती करभ, सब्भै हवै दलाल..
*
धूल झौंक दैं आँख में, कज्जर लेंय निकाल.
जनहित कै नाटक रचैं, नेता निगलैं माल..
*
मत शंका कै नजर सें, देख न मचा बवाल.
गुप-चुप हींसा बाँट लै, 'सलिल' बजा नैं गाल..
*
ओकर कोय जवाब नै, जेकर सही सवाल.
लै-दै कै मूँ बंद कर, ठंडा होय उबाल..
२५-५-२०१३
***

बुधवार, 25 मार्च 2026

मार्च २४, ग़ज़लिका, पैरोडी, चित्रगुप्त, दुर्गा, समरेंद्र मित्रा, कुंडलिया, महादेवी, होली

सलिल सृजन मार्च २४
*
छंद शाला
ग़ज़ल
उनको ये लगता है उनके राज़ खुल सकते नहीं,
आईना बनकर के सच्चाई दिखा सकती हूँ मैं।
.
जो निगाहें ढूँढती हैं सिर्फ़ मेरी हार को,
उनकी उम्मीदों पे भी पानी फिरा सकती हूँ मैं। - डॉ. भावना कुँवर, आस्ट्रेलिया
.
फिक्र है जिनको कि नदियाँ सूखती सब जा रहीं
जान लें कि आँख से गंगा बहा सकती हूँ मैं
.
कम न मुझको आँकना जब आकलन मेरा करो
ईश्वर को भी जमीं पर ला-खिला सकती हूँ मैं
.
भावना जब लापता तो गीत कैसे जी सके
शब्द कर संजीव हँस ग़ज़लें सुना सकती हूँ मैं
000
छंद शाला दोहा-रोला-कुंडलिया ० संबंधों के छंद नव, रच दे यह नव वर्ष। जन जन के मन में नवल, पूरित कर दे हर्ष।। -अशोक व्यग्र पूरित कर दे हर्ष, विमल उत्कर्ष साथ दे। सुख समृद्धि संतोष, सफलता हाथ-हाथ दे।। लिखें नित्य अध्याय, लगन श्रम अनुबंधों के। सहिष्णुता सद्भाव, स्नेहमय संबंधों के।। ००० नयन अकर पर कर सकें, विग्रह सन्धि समास। शब्दशक्तियाँ हैं सभी, मौन नयन के पास। - अशोक व्यग्र मौन नयन के पास, छंद हैं गीत-ग़ज़ल भी। मिथक-बिंब रस-राग, पुरातन संग नवल भी।। मिलें अगर तो फेर न, तोड़ ना कभी भी वचन। प्रवास न, वास करें, नयन में 'सलिल' नित नयन।। २४.३.२०२६ ०००
000
समरेंद्र कुमार मित्रा
समरेंद्र कुमार मित्रा (१४ मार्च १९१६-२६ सितंबर १९९८) वह भारतीय वैज्ञानिक और गणितज्ञ थे जिन्होंने १९५३ - ५४ में भारतीय सांख्यिकी संस्थान (ISI) में भारत का पहला कंप्यूटर (एक इलेक्ट्रॉनिक एनालॉग कंप्यूटर) डिजाइन विकसित और निर्मित किया। मित्रा को कलकत्ता मैथमैटिकल सोसाइटी द्वारा भारत में कंप्यूटर के पिता के रूप में मान्यता दी गई थी। मित्रा भारतीय सांख्यिकी संस्थान (ISI) में कम्प्यूटिंग मशीन और इलेक्ट्रॉनिक्स डिवीजन के संस्थापक और पहले प्रमुख थे।
हममें से कितने इन्हें पहचानते या इनके बारे में कुछ जानते हैं।
०००
ग़ज़लिका
परिवार
*
चोट एक को, दर्द शेष को, जिनमें वे ही, हैं परिवार।
जहाँ रहें वे,उसी जगह हो, स्वर्ग करें सुख, सभी विहार।।
मेरा-तेरा, स्वार्थ नहीं हो, सबसे सबको, प्यार असीम।
सब सबका हित, रहें साधते, करें सभी का, सब उद्धार।।
नेह नर्मदा, रहे प्रवाहित, विमल सलिल की, धार अपार।
जो अवगाहे, वही सुखी हो, पाप मिटें सब, दें-पा प्यार।।
शूल फूल हों, पतझर सावन, दर्द हर्ष हो, संग न दूर।
हो मनभेद न, रहे एकता, मरुथल में भी, रहे बहार।।
मुझको वर दो, प्रभु बन पाए, मेरा भारत, घर-परिवार।
बने रवायत, जनसेवा कर, बने सियासत, हरि का द्वार।।
(मात्रिक सवैया, यति ८-८-८-७, पदांत गुरु लघु)
२४.३.२०२३
***
दोहा
है भवि शुचि तो कीजिए, खुश रहकर आनंद.
'सलिल' जीव संजीव हो, रचकर गाए छंद.
***
महीयसी महादेवी की अद्भुत होली
*
हिंदी साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान रखनेवाली बुआ श्री (महीयसी महादेवी वर्मा) से जुड़े संस्मरण की शृंखला में इस बार होली चर्चा। बुआ श्री ने बताया था कि रंग पर्व पर भंग की तरंग में मस्ती करने में साहित्यकार भी पीछे नहीं रहते थे किंतु मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया जाता था। हिन्दू पंचांग के अनुसार होली बुआ श्री का जन्म दिवस भी है। प्रयाग राज (तब इलाहाबाद) में अशोक नगर स्थित बंगले में साहित्यकारों का जमघट दो उद्देश्यों की पूर्ति हेतु होता था। पहला महादेवी जी को जन्म दिवस की बधाई देना और दूसरा उनके स्नेह पूर्ण आतिथ्य के साथ साहित्यकारों की फागुनी रचनाओं का रसास्वादन कर धन्य होना। बुआ श्री होली की रात्रि अपने आँगन में होलिका दहन करती थीं। उसके कुछ दिन पूर्व से बुआश्री के साथ उनके मानस पुत्र डॉ. रामजी पांडेय का पूरा परिवार होली के लिए गुझिया, पपड़िया, सेव, मठरी आदि तैयार करा लेता था। एक एक पकवान इतनी मात्रा में बनता कि कई पीपों (कनस्तरों) और टोकनों में रखा जाता। होली का विशेष पकवान गुझिया (कसार की, खोवे की, मेवा की, नारियल चूर्ण की, चाशनी में पगी), सेव (नमकीन, तीखे, मोठे गुण की चाशनी में पगे), पपड़ी (बेसन की, माइडे की, मोयन वाली), खुरमे व मठरी, दही बड़ा, ठंडाई आदि आदि बड़ी मात्रा में तैयार करे जाते कि कम न हों।
होली खेलत रघुवीरा
सवेरा होते ही शहर के ही नहीं, अन्य शहरों से भी साहित्यकार आते, राई-नोन से उनकी नजर उतरी जाती, बुआ श्री स्वयं उन्हें गुलाल का टीका लगाकर आशीष देतीं। आगंतुक साहित्यिक महारथियों में आकर्षण का केंद्र होते महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, फिराक गोरखपुरी, सुमित्रानंदन पंत, डॉ. हरिवंशराय बच्चन, उमाकांत मालवीय, रघुवंश, अमृत राय, सुधा चौहान, कैलाश गौतम, एहतराम इस्लाम आदि आदि। साहित्यकारों पर किंशुक कुसुम (टेसू के फूल) उबालकर बनाया गया कुसुंबी रंग डाला जाता था। यह रंग भी बुआ श्री की देख-रेख में घर पर ही तैयार किया जाता था। क्लाइव रोड से बच्चन जी की अगुआई में एक टोली 'होली खेलत रघुवीरा, बिरज में होली खेलत रघुवीरा' आदि होली के लोक गीत गाते, झूमते मस्ताते हुए पहुँचती। बच्चन जी स्वयं बढ़िया ढोलक बजाते थे।
'बस करो भइया...'
महाप्राण निराला बुआ श्री को अपनी छोटी बहिन मानते थे, फिर होली पर बहिन से न मिलें यह तो हो ही नहीं सकता था। उनके व्यक्तित्व की दबंगई के कारण अनकहा अनुशासन बना रहता था। निराला विजय भवानी (भाँग) का सेवन भी करते थे। एक वर्ष अलीगंज स्थित निराला जी के घर कुछ साहित्यकार भाँग लेकर पहुच गए, निराला जी को ठंडाई में मिलाकर जमकर भाँग पिला दी गई। भाँग के नशे में व्यक्ति जो करता है करता ही चला जाता है। यह टोली जब महादेवी निवास पहुँची तो गुझिया बाँटी-खाई जा रही थीं। निराला जी ने गुझिया खाना आरभ किया तो बंद ही न करें, किसका साहस कि उन्हें टोंककर अपनी मुसीबत बुलाए। बुआ जी अन्य अतिथियों का स्वागत कर रही थी, किसी ने यह स्थिति बताई तो वे निराला जी के निकट पहुँचकर बोलीं- ''भैया! अब बस भी करो और लोग भी हैं, उन्हें भी देना है, गुझिया कम पड़ जाएँगी।'' निराला जी ने झूमते हुआ कहा- 'तो क्या हुआ? भले ही कम हो जाए मैं तो जी भर खाऊँगा, तुम और बनवा लो।'' उपस्थित जनों के ठहाकों के बीच फिर गुझिया खत्म होने के पहले ही फिर से बनाने का अनुष्ठान आरंभ कर दिया गया।
राम की शक्ति पूजा
एक वर्ष होली पर्व पर बुआ श्री के निवास पर पधारे साहित्यकारों ने निराला जी से उनकी प्रसिद्ध रचना ''राम की शक्ति पूजा'' सुनाने का आग्रह किया। निराला जी ने मना कर दिया। आग्रहकर्ता ने बुआ श्री की शरण गही। बुआ श्री ने खुद निराला जी से कहा- ''भैया! मुझे शक्ति पूजा सुना दो।'' निराला जी ने ''अच्छा, इन लोगों ने तुम्हें वकील बना लिया, तब तो सुनानी ही पड़ेगी। उन्होंने अपने ओजस्वी स्वर में समा बाँध दिया। सभी श्रोता सुनकर मंत्रमुग्ध हो गए।
खादी की साड़ी
महादेवी जी सादगी-शालीनता की प्रतिमूर्ति, निराला जी के शब्दों में 'हिंदी के विशाल मंदिर की वीणापाणी' थीं।वे खादी की बसंती अथवा मैरून बार्डर वाली साड़ी पहनती थीं। प्रेमचंद जी के पुत्र अमृत राय उन्हें प्रतिवर्ष जन्मदिन के उपहार स्वरूप खादी की साड़ी भेंट करते थे। उल्लेखनीय है कि अमृत राय का विवाह महादेवी जी की अभिन्न सखी सुभद्रा कुमारी चौहान की पुत्री सुधा चौहान के साथ बुआ श्री की पहल पर ही हुआ था।
बिटिया काहे ब्याहते
बुआ श्री अपने पुत्रवत डॉ. रामजी पाण्डेय के परिवार को अपने साथ ही रखती थीं। उनके निकटस्थ लोगों में प्रसिद्ध पत्रकार उमाकांत मालवीय भी रहे। रामजी भाई की पुत्री के विवाह हेतु स्वयं महादेवी जी ने पहल की तथा यश मालवीय जी को जामाता चुना। विवाह का निमात्रण पत्र भी बुआ श्री ने खुद ही लिखा था। वर्ष १९८६ में यश जी होली की सुबह अमृत राय जी के घर पहुँच गए, वहाँ भाग मिली ठंडाई पीने के बाद सब महादेवी जी के घर पहुँचे। जमकर होली खेल चुके यश जी का चेहरा लाल-पीले-नीले रंगों से लिपा-पूत था, उस पर भाग का सुरूर, हँसी-मजाक होते होते यश जी ने हँसना शुरू किया तो रुकने का नाम ही न लें, ठेठ ग्रामीण ठहाके। बुआ श्री ने स्वयं भी हँसते हुई चुटकी ली '' पहले जाना होता ये रूप-रंग है तो अपनी बिटिया काहे ब्याहते?''
बुआ श्री ने हमेश अपना जन्मोत्सव अंतरंग आत्मीय सरस्वती पुत्रों के के साथ ही मनाया। वे कभी किसी दिखावे के मोह में नहीं पड़ीं। होली का रंग पर्व किस तरह मनाया जाना चाहिए यह बुआ श्री के निवास पर हुए होली आयोजनों से सीखा जा सकता है।
***
पैरोडी
'लेट इज बैटर दैन नेवर', कबहुँ नहीं से गैर भली
होली पर दिवाली खातिर धोनी और सब मनई के
मुट्ठी भर अबीर और बोतल भर ठंडाई ......
होली पर एगो ’भोजपुरी’ गीत रऊआ लोग के सेवा में ....
नीक लागी तऽ ठीक , ना नीक लागी तऽ कवनो बात नाहीं....
ई गीत के पहिले चार लाईन अऊरी सुन लेईं
माना कि गीत ई पुरान बा
हर घर कऽ इहे बयान बा
होली कऽ मस्ती बयार मे-
मत पूछऽ बुढ़वो जवान बा--- कबीरा स र र र र ऽ
अब हमहूँ७३-के ऊपरे चलत, मग्गर ३७ का हौसला रखत बानी ..
भोजपुरी गीत : होली पर....
कईसे मनाईब होली ? हो धोनी !
कईसे मनाईब होली..ऽऽऽऽऽऽ
बैटिंग के गईला त रनहू नऽ अईला
एक गिरउला ,तऽ दूसर पठऊला
कईसे चलाइलऽ चैनल चरचा
कोहली त धवन, रनहू कम दईला
निगली का भंग की गोली? हो धोनी !
मिलके मनाईब होली ?ऽऽऽऽऽ
ओवर में कम से कम चउका तऽ चाही
मौका बेमौका बाऽ ,छक्का तऽ चाही
बीस रनन का रउआ रे टोटा
सम्हरो न दुनिया में होवे हँसाई
रीती न रखियो झोली? हो राजा !
लड़ के मनाईब होली ?,ऽऽऽऽऽऽऽ
मारे बँगलदेसीऽ रह-रह के बोली
मुँहझँऊसा मुँह की खाऽ बिसरा ठिठोली
दूध छठी का याद कराइल
अश्विन-जडेजा? कऽ टोली
बद लीनी बाजी अबोली हो राजा
भिड़ के मनाईब होली ?,ऽऽऽऽऽऽऽ
जमके लगायल रे! चउआ-छक्का
कैच भयल गए ले के मुँह लटका
नानी स्टंपन ने याद कराइल
फूटा बजरिया में मटका
दै दिहिन पटकी सदा जय हो राजा
जम के मनाईब होली ?,ऽऽऽऽऽऽऽ
अरे! अईसे मनाईब होली हो राजा,
अईसे मनाईब होली...
२४.३.२०१६
***
सत श्लोकी दुर्गा
हिंदी भावानुवाद
•
शिव बोले- हो सुलभ भक्त को, कार्य नियंता हो देवी!
एक उपाय प्रयत्न मात्र है, कार्य-सिद्धि की कला यही।।
•
देवी बोलीं- सुनें देव हे!, कला साधना उत्तम है।
स्नेह बहुत है मेरा तुम पर, स्तुति करूँ प्रकाशित मैं।।
•
ॐ मंत्र सत् श्लोकी दुर्गा, ऋषि ‌नारायण छंद अनुष्टुप।
देव कालिका रमा शारदा, दुर्गा हित हो पाठ नियोजित।।
•
ॐ चेतना ज्ञानी जन में, मात्र भगवती माँ ही हैं।
मोहित-आकर्षित करती हैं, मातु महामाया खुद ही।१।
•
भीति शेष जो है जीवों में, दुर्गा-स्मृति हर लेती,
स्मृति-मति हो स्वस्थ्य अगर तो, शुभ फल हरदम है देती।
कौन भीति दारिद्रय दुख हरे, अन्य न कोई है देवी।
कारण सबके उपकारों का, सदा आर्द्र चितवाली वे।२।
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मंगलकारी मंगल करतीं, शिवा साधतीं हित सबका।
त्र्यंबका गौरी, शरणागत, नारायणी नमन तुमको।३।
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दीन-आर्त जन जो शरणागत, परित्राण करतीं उनका।
सबकी पीड़ा हर लेती हो, नारायणी नमन तुमको।४।
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सब रूपों में, ईश सभी की, करें समन्वित शक्ति सभी।
देवी भय न अस्त्र का किंचित्, दुर्गा देवि नमन तुमको।५।
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रोग न शेष, तुष्ट हों तब ही, रुष्ट काम से, अभीष्ट सबका।
जो आश्रित वह दीन न होता, आश्रित पाता प्रेय अंत में।६।
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सब बाधाओं को विनाशतीं, हैं अखिलेश्वरी तीन लोक में।
इसी तरह सब कार्य साधतीं, करें शत्रुओं का विनाश भी।७।
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चित्रगुप्त-रहस्य
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चित्रगुप्त पर ब्रम्ह हैं, ॐ अनाहद नाद
योगी पल-पल ध्यानकर, कर पाते संवाद
निराकार पर ब्रम्ह का, बिन आकार न चित्र
चित्र गुप्त कहते इन्हें, सकल जीव के मित्र
नाद तरंगें संघनित, मिलें आप से आप
सूक्ष्म कणों का रूप ले, सकें शून्य में व्याप
कण जब गहते भार तो, नाम मिले बोसॉन
प्रभु! पदार्थ निर्माण कर, डालें उसमें जान
काया रच निज अंश से, करते प्रभु संप्राण
कहलाते कायस्थ- कर, अंध तिमिर से त्राण
परम आत्म ही आत्म है, कण-कण में जो व्याप्त
परम सत्य सब जानते, वेद वचन यह आप्त
कंकर कंकर में बसे, शंकर कहता लोक
चित्रगुप्त फल कर्म के, दें बिन हर्ष, न शोक
मन मंदिर में रहें प्रभु!, सत्य देव! वे एक
सृष्टि रचें पालें मिटा, सकें अनेकानेक
अगणित हैं ब्रम्हांड, है हर का ब्रम्हा भिन्न
विष्णु पाल शिव नाश कर, होते सदा अभिन्न
चित्रगुप्त के रूप हैं, तीनों- करें न भेद
भिन्न उन्हें जो देखता, तिमिर न सकता भेद
पुत्र पिता का पिता है, सत्य लोक की बात
इसी अर्थ में देव का, रूप हुआ विख्यात
मुख से उपजे विप्र का, आशय उपजा ज्ञान
कहकर देते अन्य को, सदा मनुज विद्वान
भुजा बचाये देह को, जो क्षत्रिय का काम
क्षत्रिय उपजे भुजा से, कहते ग्रन्थ तमाम
उदर पालने के लिये, करे लोक व्यापार
वैश्य उदर से जन्मते, का यह सच्चा सार
पैर वहाँ करते रहे, सकल देह का भार
सेवक उपजे पैर से, कहे सहज संसार
दीन-हीन होता नहीं, तन का कोई भाग
हर हिस्से से कीजिये, 'सलिल' नेह-अनुराग
सकल सृष्टि कायस्थ है, परम सत्य लें जान
चित्रगुप्त का अंश तज, तत्क्षण हो बेजान
आत्म मिले परमात्म से, तभी मिल सके मुक्ति
भोग कर्म-फल मुक्त हों, कैसे खोजें युक्ति?
सत्कर्मों की संहिता, धर्म- अधर्म अकर्म
सदाचार में मुक्ति है, यही धर्म का मर्म
नारायण ही सत्य हैं, माया सृष्टि असत्य
तज असत्य भज सत्य को, धर्म कहे कर कृत्य
किसी रूप में भी भजे, हैं अरूप भगवान्
चित्र गुप्त है सभी का, भ्रमित न हों मतिमान
२४.३.२०१४

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