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शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2026

अक्टूबर ९, सरस्वती, अक्षर गीत, माहिया, सॉनेट, हरिगीतिका, गीत, गजल, मुक्तक, बुंदेली, बाल,

सलिल सृजन अक्टूबर ९
* 
हँसासीना वीणावादिनी श्वेत अमलवासना माता
कर जोड़े हम खड़े द्वार पर वर दो हे जग विख्याता 
. 
चित्र गुप्त है बुद्धि-ज्ञान का, आत्म बोध दो सत पाएँ 
ॐ वाक्-उच्चार जान कर, छंद सरस नव रच जाएँ 
चरण-शरण दो हमको मैया, पाप-ताप-भव से त्राता 
कर जोड़े हम खड़े द्वार पर वर दो हे जग विख्याता 
. 
मंत्र-तंत्र या यंत्र न जानें, नाम तुम्हारा ही बल है 
नेह नर्मदा में नहला दो, कृपा दृष्टि ही आँचल है 
तुमसे हम हैं, हममें तुम हो, जननी-संतति शुभ नाता
कर जोड़े हम खड़े द्वार पर वर दो हे जग विख्याता 
. 
सह पाएँ जितना उतना ही, पुरस्कार या दंड मिले 
और नहीं कुछ चाह मनस में, मैया! भजन अखंड मिले 
'सलिल' करे अभिषेक, आचमन कर लो, धन्य करो माता 
कर जोड़े हम खड़े द्वार पर वर दो हे जग विख्याता 
000  

सोरठा सलिला
०
बारिश का मजदूर, पानी बरसाकर थका।
सूखा मौसम सूर, गर्म हो रहा हाय रे! 
 .
मौसम गिरगिट भाँति, रंग बदलता रोज ही।
बदलावों की पाँति, बीमारी फैला रही।।
.
मौसम से कर प्रीत, रंग बदलता है दिवस।
है अनहोनी रीत, बारिश में पानी नहीं।।
.
मो सम कौन अजान, मौसम पूछे मौन हो। 
दो दिन का महमान, क्या यह सत्य न जानता।। 
. 
देस-भेस परदेस में, बदल रहा दिन-रात। 
चार दिनों की चाँदनी, चुप मौसम बदजात।।   
. 
मौसम को मत दोष दो, जुमलेबाजी सीख। 
ठेंगा हमें बात रहा, सबसे आगे दीख।। 
. 
करता कभी प्रणाम, और कोसता है कभी।
देता नहीं छदाम, मौसम को मानव सदा।। 
000  

पहेली-सहेली
.
शब्द न अर्थ विकार नहीं
सौंदर्य वृद्धि कर देता मैं।
लालित्य बढ़ा, चारुत्व बढ़ा
मनमोहकता भर देता मैं।
ज्ञानी जन जान समझते हैं।
पा काव्य कथन सब सजते हैं।
मेरे प्रकार अनगिनत जानो
हूँ कौन? बताओ मतिमानो।
९.१०.२०२६  
०
अक्षर गीत
*
अक्षर स्वर-व्यंजन सुन-पढ़-लिख
आओ! गाएँ अक्षर गीत।
माँ शारद को नमस्कार कर
शुभाशीष पा हँसिए मीत।
स्वर :
'अ' से अनुपम; अवनि; अमर; अब,
'आ' से आ; आई; आबाद।
'इ' से इरा; इला; इमली; इस,
'ई' ईश्वरी; ईख; ईजाद।
'उ' से उषा; उजाला; उगना,
'ऊ' से ऊर्जा; ऊष्मा; ऊन।
'ए' से एड़ी; एक; एकता,
'ऐ' ऐश्वर्या; ऐनक; ऐन।
'ओ' से ओम; ओढ़नी; ओला,
'औ' औरत; औषधि; औलाद।
'अं' से अंक; अंग, अंगारा,
'अ': खेल-हँस हो फौलाद।
*
व्यंजन :
'क' से कमल; कलम; कर; करवट,
'ख' खजूर; खटिया; खरगोश।
'ग' से गणपति; गज; गिरि; गठरी,
'घ' से घट; घर; घाटी; घोष।
'ङ' शामिल है वाङ्मय में
पंचम ध्वनि है सार्थक रीत।
अक्षर स्वर-व्यंजन सुन-पढ़-लिख
आओ! गायें अक्षर गीत।
*
'च' से चका; चटकनी; चमचम,
'छ' छप्पर; छतरी; छकड़ा।
'ज' जनेऊ; जसुमति; जग; जड़; जल,
'झ' झबला; झमझम, झरना।
'ञ' हँस व्यञ्जन में आ बैठा,
व्यर्थ न लड़ना; करना प्रीत।
अक्षर स्वर-व्यंजन सुन-पढ़-लिख
आओ! गायें अक्षर गीत।
*
'ट' टमटम; टब; टका; टमाटर,
'ठ' ठग; ठसक; ठहाका; ठुमरी।
'ड' डमरू; डग; डगर; डाल; डफ,
'ढ' ढक्कन; ढोलक; ढल; ढिबरी।
'ण' कण; प्राण; घ्राण; तृण में है
मन लो जीत; तभी है जीत।
अक्षर स्वर-व्यंजन सुन-पढ़-लिख
आओ! गायें अक्षर गीत।
*
'त' तकिया; तबला; तसला; तट,
'थ' से थपकी; थप्पड़; थान।
'द' दरवाजा; दवा, दशहरा,
'ध' धन; धरा; धनुष; धनवान।
'न' नटवर; नटराज; नगाड़ा,
गिर न हार; उठ जय पा मीत।
अक्षर स्वर-व्यंजन सुन-पढ़-लिख
आओ! गायें अक्षर गीत।
*
'प' पथ; पग; पगड़ी; पहाड़; पट,
'फ' फल; फसल; फलित; फलवान।
'ब' बकरी; बरतन, बबूल; बस,
'भ' से भवन; भक्त; भगवान।
'म' मइया; मछली; मणि; मसनद,
आगे बढ़; मत भुला अतीत।
अक्षर स्वर-व्यंजन सुन-पढ़-लिख
आओ! गायें अक्षर गीत।
*
'य' से यज्ञ; यमी-यम; यंत्री,
'र' से रथ; रस्सी; रस, रास।
'ल' लकीर; लब; लड़का-लड़की;
'व' से वन; वसंत; वनवास।
'श' से शतक; शरीफा; शरबत,
मीठा बोलो; अच्छी नीत।
अक्षर स्वर-व्यंजन सुन-पढ़-लिख
आओ! गायें अक्षर गीत।
*
'ष' से षट; षटकोण; षट्भुजी,
'स' से सबक; सदन; सरगम।
'ह' से हल; हलधर; हलवाई,
'क्ष' क्षमता; क्षत्रिय; क्षय; क्षम।
'त्र' से त्रय, त्रिभुवन; त्रिलोचनी,
'ज्ञ' से ज्ञानी; ज्ञाता; ज्ञान।
'ऋ' से ऋषि, ऋतु, ऋण, ऋतंभरा,
जानो पढ़ो; नहीं हो भीत
अक्षर स्वर-व्यंजन सुन-पढ़-लिख
आओ! गायें अक्षर गीत।
***
माहिया
(पंजाबी छंद)
•
विधान
१२-१०-१२
सम तुकांत पहला-तीसरा चरण।
•
मानव शशि पर जाना
द्वेष-घृणा-नफरत
तुम साथ न ले जाना।
•
रंगों का बंँटवारा
धर्म व मजहब में
चंदा पर भी होगा?
•
खाई जो है खोदी
जनता के मन में
चंदा पर भी होगी?
•
९-१०-२०२३
•••
व्यंग्य गीत
●
हिंदी लिखते डर लगता है
शब्द-अर्थ बेघर लगता है
खाल बाल की एक निकाले
दूजा डाल अक्ल पर ताले
खींचेगा बेमतलब टाँग
'शब्द बदल' कर देगा माँग
वह गर्दभ का स्वर लगता है
हिंदी लिखते डर लिखता है
होती आस्था पल में घायल
करें सियासत पल पल पागल
अच्छा अपना, बुरा और का
चिंतन स्वार्थी हुआ दौर का
बिखरा उजड़ा घर लगता है
हिंदी लिखते डर लगता है
पैसे दे किताब छपवाओ
हाथ जोड़ घर घर दे आओ
पढ़े न कोई, बेचे रद्दी
फिर दूजी दो बनकर जिद्दी
दस्यु प्रकाशक हर लगता है
हिंदी लिखते डर लगता है
कथ्य भाव रस से नहिं नाता
गति-यति-लय द्रोह रहा मन भाता
मठाधीश बन चेले पाले
दे-ले अभिनंदन घोटाले
लघु रवि बड़ा तिमिर लगता है
हिंदी लिखते डर लगता है
इसको हैडेक हुआ पेट में
फ्रीडमता लेडियाँ भेंट लें
'लिव इन' नया मंच नित भाए
सुना चुटकुले कवि कहलाए
सूना पूजा-घर लगता है
हिंदी लिखते डर लगता है
९-१०-२०२२
●●●
सॉनेट
वीणा
●
वीणा की झंकार, मौन सुन
आँख मूँद ले पहले पगले!
छेड़े मन के तार कौन सुन।
सँभल न दुनिया तुझको ठग ले।
तू है कौन?, कहाँ से आया?
जाना कहाँ न तुझको मालुम
करे सफर, सामान जुटाया।
मेला-ठेला देख गया गुम।
रो-पछता मत, मन बहला ले
गिर, रो चुप हो, धीरज धरना
लूट न लुटना, खो दे, पा ले।
जैसे भी हो बढ़ना-तरना।
वीणा-तार कहें क्या सुन ले
टूटे तार न सपने बुन ले।
९-१०-२०२२
●●●
सॉनेट
शरत्चंद्र
*
शरत्चंद्र की शुक्ल स्मृति से
मन नीलाभ गगन हो हँसता
रश्मिरथी दे अमृत, झट से
कंकर हो शंकर भुज कसता
सलज उमा, गणपति आहट पा
मग्न साधना में हो जाती
ऋद्धि-सिद्धि माँ की चौखट आ
शीश नवा, माँ के जस गाती
हो संजीव सलिल लहरें उठ
गौरी पग छू सकुँच ठिठकती
अंजुरी भर कर पान उमा झुक
शिव को भिगा रिझाकर हँसती
शुक्ल स्मृति पायस सब जग को
दे अमृत कण शरत्चंद्र का
९-१०-२०२२, १५-४३
●●●
मुक्तक-
माँ की मूरत सजीं देख भी आइये।
कर प्रसादी ग्रहण पुण्य भी पाइये।।
मन में झाँकें विराजी हैं माता यहीं
मूँद लीजै नयन, क्यों कहीं जाइये?
*
आस माता, पिता श्वास को जानिए
साथ दोनों रहे आप यदि ठानिए
रास होती रहे, हास होता रहे -
ज़िन्दगी का मजा रूठिए-मानिए
*
९-१०-२०१६
***
एक रचना:
*
ओ मेरी नेपाली सखी!
एक सच जान लो
समय के साथ आती-जाती है
धूप और छाँव
लेकिन हम नहीं छोड़ते हैं
अपना गाँव।
परिस्थितियाँ बदलती हैं,
दूरियाँ घटती-बढ़ती हैं
लेकिन दोस्त नहीं बदलते
दिलों के रिश्ते नहीं टूटते।
मुँह फुलाकर रूठ जाने से
सदियों की सभ्यताएँ
समेत नहीं होतीं।
हम-तुम एक थे,
एक हैं, एक रहेंगे।
अपना सुख-दुःख
अपना चलना-गिरना
संग-संग उठना-बढ़ना
कल भी था,
कल भी रहेगा।
आज की तल्खी
मन की कड़वाहट
बिन पानी के बदल की तरह
न कल थी,
न कल रहेगी।
नेपाल भारत के ह्रदय में
भारत नेपाल के मन में
था, है और रहेगा।
इतिहास हमारी मित्रता की
कहानियाँ कहता रहा है,
कहता रहेगा।
आओ, हाथ में लेकर हाथ
कदम बढ़ाएँ एक साथ
न झुकाया है, न झुकाएँ
हमेशा ऊँचा रखें अपना माथ।
नेता आयेंगे-जायेंगे
संविधान बनेंगे-बदलेंगे
लेकिन हम-तुम
कोटि-कोटि जनगण
न बिछुड़ेंगे, न लड़ेंगे
दूध और पानी की तरह
शिव और भवानी की तरह
जन्म-जन्म साथ थे, हैं और रहेंगे
ओ मेरी नेपाली सखी!
***
मुक्तिका :
सूखी नदी भी रेत सीपी शंख दे देती हमें
हम मनुज बहती नदी को नित्य गन्दा कर रहे
.
कह रहे मैया! मगर आँसू न इसके पोंछते
झाड़ पत्थर रेत मछली बेच धंधा कर रहे
.
काल आ मारे हमें इतना नहीं है सब्र अब
गले मिलकर पीठ पर चाकू चलाकर हँस रहे
.
व्यथित प्रकृति रो रही, भूचाल-तूफां आ रहे
हम जलाने लाश अपनी आप चंदा कर रहे
.
सूरज ठहाका लगाता है, देख कोशिश बेतुकी
मलिन छवि भायी नहीं तो दीप मंदा कर रहे
.
वाह! शाबाशी खुदी को दे रहे कर रतजगा
बाँह में ये, चाह में वो आह फंदा कर रहे
.
सभ्यता-तरु पौल डाला, मूल्य अवमूल्यित किये
पांच अँगुली हों बराबर, 'सलिल' रंदा कर रहे
९-१०-२०१५
***
काव्य का रचना शास्त्र : १
।-संजीव 'सलिल'
-ध्वनि कविता की जान है...
ध्वनि कविता की जान है, भाव श्वास-प्रश्वास।
अक्षर तन, अभिव्यक्ति मन, छंद वेश-विन्यास।।
अपने उद्भव के साथ ही मनुष्य को प्रकृति और पशुओं से निरंतर संघर्ष करना पड़ा। सुन्दर, मोहक, रमणीय प्राकृतिक दृश्य उसे रोमांचित, मुग्ध और उल्लसित करते थे। प्रकृति की रहस्यमय-भयानक घटनाएँ उसे डराती थीं । बलवान हिंस्र पशुओं से भयभीत होकर वह व्याकुल हो उठता था। विडम्बना यह कि उसका शारीरिक बल और शक्तियाँ बहुत कम। अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए उसके पास देखे-सुने को समझने और समझाने की बेहतर बुद्धि थी।
बाह्य तथा आतंरिक संघर्षों में अपनी अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने और अन्यों की अभिव्यक्ति को ग्रहण करने की शक्ति का उत्तरोत्तर विकास कर मनुष्य सर्वजयी बन सका। अनुभूतियों को अभिव्यक्त और संप्रेषित करने के लिए मनुष्य ने सहारा लिया ध्वनि का। वह आँधियों, तूफानों, मूसलाधार बरसात, भूकंप, समुद्र की लहरों, शेर की दहाड़, हाथी की चिंघाड़ आदि से सहमकर छिपता फिरता। प्रकृति का रौद्र रूप उसे डराता।
मंद समीरण, शीतल फुहार, कोयल की कूक, गगन और सागर का विस्तार उसमें दिगंत तक जाने की अभिलाषा पैदा करते। उल्लसित-उत्साहित मनुष्य कलकल निनाद की तरह किलकते हुए अन्य मनुष्यों को उत्साहित करता। अनुभूति को अभिव्यक्त कर अपने मन के भावों को विचार का रूप देने में ध्वनि की तीक्ष्णता, मधुरता, लय, गति की तीव्रता-मंदता, आवृत्ति, लालित्य-रुक्षता आदि उसकी सहायक हुईं। अपनी अभिव्यक्ति को शुद्ध, समर्थ तथा सबको समझ आने योग्य बनाना उसकी प्राथमिक आवश्यकता थी।
सकल सृष्टि का हित करे, कालजयी आदित्य।
जो सबके हित हेतु हो, अमर वही साहित्य।।
भावनाओं के आवेग को अभिव्यक्त करने का यह प्रयास ही कला के रूप में विकसित होता हुआ साहित्य के रूप में प्रस्फुटित हुआ। सबके हित की यह मूल भावना 'हितेन सहितं' ही साहित्य और असाहित्य के बीच की सीमा रेखा है जिसके निकष पर किसी रचना को परखा जाना चाहिए। सनातन भारतीय चिंतन में 'सत्य-शिव-सुन्दर' की कसौटी पर खरी कला को ही मान्यता देने के पीछे भी यही भावना है। 'शिव' अर्थात 'सर्व कल्याणकारी, 'कला कला के लिए' का पाश्चात्य सिद्धांत पूर्व को स्वीकार नहीं हुआ। साहित्य नर्मदा का कालजयी प्रवाह 'नर्मं ददाति इति नर्मदा' अर्थात 'जो सबको आनंद दे, वही नर्मदा' को ही आदर्श मानकर सतत सृजन पथ पर बढ़ता रहा।
मानवीय अभिव्यक्ति के शास्त्र 'साहित्य' को पश्चिम में 'पुस्तकों का समुच्चय', 'संचित ज्ञान का भंडार', जीवन की व्याख्या', आदि कहा गया है। भारत में स्थूल इन्द्रियजन्य अनुभव के स्थान पर अन्तरंग आत्मिक अनुभूतियों की अभिव्यक्ति को अधिक महत्व दिया गया। यह अंतर साहित्य को मस्तिष्क और ह्रदय से उद्भूत मानने का है। आप स्वयं भी अनुभव करेंगे के बौद्धिक-तार्किक कथ्य की तुलना में सरस-मर्मस्पर्शी बात अधिक प्रभाव छोड़ती है। विशेषकर काव्य (गीति या पद्य) में तो भावनाओं का ही साम्राज्य होता है।
होता नहीं दिमाग से, जो संचालित मीत।
दिल की सुन दिल से जुड़े, पा दिलवर की प्रीत।।
साध्य आत्म-आनंद है :काव्य का उद्देश्य सर्व कल्याण के साथ ही निजानंद भी मान्य है। भावानुभूति या रसानुभूति काव्य की आत्मा है किन्तु मनोरंजन मात्र ही साहित्य या काव्य का लक्ष्य या ध्येय नहीं है। आजकल दूरदर्शन पर आ रहे कार्यक्रम सिर्फ मनोरंजन पर केन्द्रित होने के कारण समाज को कुछ दे नहीं पा रहे जबकि साहित्य का सृजन ही समाज को कुछ देने के लिये किया जाता है।
जन-जन का आनंद जब, बने आत्म-आनंद।
कल-कल सलिल-निनाद सम, तभी गूँजते छंद।।
काव्य के तत्व:
बुद्धि भाव कल्पना कला, शब्द काव्य के तत्व।
तत्व न हों तो काव्य का, खो जाता है स्वत्व।।
बुद्धि या ज्ञान तत्व काव्य को ग्रहणीय बनाता है। सत-असत, ग्राह्य-अग्राह्य, शिव-अशिव, सुन्दर-असुंदर, उपयोगी-अनुपयोगी में भेद तथा उपयुक्त का चयन बुद्धि तत्व के बिना संभव नहीं। कृति को विकृति न होने देकर सुकृति बनाने में यही तत्व प्रभावी होता है।
भाव तत्व को राग तत्व या रस तत्व भी कहा जाता है। भाव की तीव्रता ही काव्य को हृद्स्पर्शी बनाती है। संवेदनशीलता तथा सहृदयता ही रचनाकार के ह्रदय से पाठक तक रस-गंगा बहाती है।
कल्पना लौकिक को अलौकिक और अलौकिक को लौकिक बनाती है। रचनाकार के ह्रदय-पटल पर बाह्य जगत तथा अंतर्जगत में हुए अनुभव अपनी छाप छोड़ते हैं। साहित्य सृजन के समय अवचेतन में संग्रहित पूर्वानुभूत संस्कारों का चित्रण कल्पना शक्ति से ही संभव होता है। रचनाकार अपने अनुभूत तथ्य को यथावत कथ्य नहीं बनाता। वह जाने-अनजाने सच=झूट का ऐसा मिश्रण करता है जो सत्यता का आभास कराता है।
कला तत्त्व को शैली भी कह सकते हैं। किसी एक अनुभव को अलग-अलग लोग अलग-अलग तरीके से व्यक्त करते हैं। हर रचनाकार का किसी बात को कहने का खास तरीके को उसकी शैली कहा जाता है। कला तत्व ही 'शिवता का वाहक होता है। कला असुंदर को भी सुन्दर बना देती है।
शब्द को कला तत्व में समाविष्ट किया जा सकता है किन्तु यह अपने आपमें एक अलग तत्व है। भावों की अभिव्यक्ति का माध्यम शब्द ही होता है। रचनाकार समुचित शब्द का चयन कर पाठक को कथ्य से तादात्म्य स्थापित करने के लिए प्रेरित करता है।
साहित्य के रूप :
दिल-दिमाग की कशमकश, भावों का व्यापार।
बनता है साहित्य की, रचना का आधार।।
बुद्धि तत्त्व की प्रधानतावाला बोधात्मक साहित्य ज्ञान-वृद्धि में सहायक होता है। हृदय तत्त्व को प्रमुखता देनेवाला रागात्मक साहित्य पशुत्व से देवत्व की ओर जाना की प्रेरणा देता है। अमर साहित्यकार डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ऐसे साहित्य को 'रचनात्मक साहित्य' कहा है।
लक्ष्य और लक्षण ग्रन्थ :
रचनात्मक या रागात्मक साहित्य के दो भेद लक्ष्य ग्रन्थ और लक्षण ग्रन्थ हैं । साहित्यकार का उद्देश्य अलौकिक आनंद की सृष्टि करना होता है जिसमें रसमग्न होकर पाठक रचना के कथ्य, घटनाक्रम, पात्रों और सन्देश के साथ अभिन्न हो सके।
लक्ष्य ग्रन्थ में रचनाकार नूतन भावः लोक की सृष्टि करता है जिसके गुण-दोष विवेचन के लिए व्यापक अध्ययन-मनन पश्चात् कुछ लक्षण और नियम निर्धारित किये गए हैं ।
लक्ष्य ग्रंथों के आकलन अथवा मूल्यांकन (गुण-दोष विवेचन) संबन्धी साहित्य लक्षण ग्रन्थ होंगे। लक्ष्य ग्रन्थ साहित्य का भावः पक्ष हैं तो लक्षण ग्रन्थ विचार पक्ष।
काव्य के लक्षणों, नियमों, रस, भाव, अलंकार, गुण-दोष आदि का विवेचन 'साहित्य शास्त्र' के अंतर्गत आता है 'काव्य का रचना शास्त्र' विषय भी 'साहित्य शास्त्र' का अंग है।
साहित्य के रूप -- १. लक्ष्य ग्रन्थ : (क) दृश्य काव्य, (ख) श्रव्य काव्य।
२.लक्षण ग्रन्थ: (क) समीक्षा, (ख) साहित्य शास्त्र।
***
मौसम बदल रहा
मौसम बदल रहा है, टेर रही अमराई
परिवर्तन की आहट, पनघट तज पछताई
जन-आकांक्षा नभ को छूती, नहीं अचंभा
छाँव हुई जन प्रतिनिधि, ज्यों बिजली का खंभा
आश्वासन की गर्मी, सूरज पीटे डंका
शासन भरमाता है, जनगण-मन में शंका
अपचारी ने निष्ठा, बरगद पर लटकाई
मौनी बाबा गायब, दूजा बड़बोला है
रंग भंग में मिलकर बाकी ने घोला है
पत्नी रुग्णा लेकिन रास रचाये बुढ़ापा
सुत से छोटी बीबी,लाई घर में स्यापा
घोटालों में पीछे, ना सुत नहीं जमाई
अच्छे दिन आए हैं, रखो साल भर रोजा
घाटा घटा सकें हम, यही रास्ता खोजा
हिंदी की बिंदी भी रुचे, न माँ-मस्तक पर
धड़क रहा दिल जन का, सुन द्वारे पर दस्तक
क्यों विरोध की खातिर ही विरोध हो भाई?
***
नवगीत
आस कबीर
नहीं हो पायी
हास भले कल्याणी है
प्यास प्राण को
देती है गति
रास न करने
देती है मति
परछाईं बन
त्रास संग रह
रुद्ध कर रहा वाणी है
हाथ हाथ के
साथ रहे तो
उठा रख सकें
विनत माथ को
हाथ हाथ मिल
कर जुड़ जाए
सुख दे-पाता प्राणी है
नयन मिलें-लड़
झुक-उठ-बसते
नयनों में तो
जीवन हँसते
श्वास-श्वास में
घुलकर महके
जीवन चोखी ढाणी है
***
नवगीत:
नेताजी को
श्रद्धांजलि है
नेताजी की
अनुयायी के
विरोध में हैं
कहते बिलकुल
अबोध ये हैं
कई बरस का
साथ न प्यारा
प्यारी सत्ता
नहीं मित्रता
नेताजी की
अपनी कथनी
अपना काम
मुँह पर
गाँधीजी का नाम
गह नव आशा
गढ़ नव भाषा
निज हितकारक
साफ़-सफाई
नेताजी की
९-१०-२०१४
***
नवगीत:
उत्सव का मौसम
*
उत्सव का मौसम
बिन आये ही सटका है...
*
मुर्गे की टेर सुन
आँख मूँद सो रहे.
उषा की रूप छवि
बिन देखे खो रहे.
ब्रेड बटर बिस्कुट
मन उन्मन ने
गटका है.....
*
नाक बहा, टाई बाँध
अंगरेजी बोलेंगे.
अब कान्हा गोकुल में
नाहक ना डोलेंगे..
लोरी को राइम ने
औंधे मुँह पटका है...
*
निष्ठा ने मेहनत से
डाइवोर्स चाहा है.
पद-मद ने रिश्वत का
टैक्स फिर उगाहा है..
मलिन बिम्ब देख-देख
मन-दर्पण चटका है...
*
देह को दिखाना ही
प्रगति परिचायक है.
राजनीति कहे साध्य
केवल खलनायक है.
पगडंडी भूल
राजमार्ग राह भटका है...
*
मँहगाई आयी
दीवाली दीवाला है.
नेता है, अफसर है
पग-पग घोटाला है.
अँगने को खिड़की
दरवाजे से खटका है...
***
हरिगीतिका:
*
उत्सव सुहाने आ गये हैं, प्यार सबको बाँटिये.
भूलों को जाएँ भूल, नाहक दण्ड दे मत डाँटिये..
सबसे गले मिल स्नेह का, संसार सुगढ़ बनाइये.
नेकी किये चल 'सलिल', नेकी दूसरों से पाइये..
*
हिल-मिल मनायें पर्व सारे, बाँटकर सुख-दुःख सभी.
ऐसा लगे उतरे धरा पर, स्वर्ग लेकर सुर अभी.
सुर स्नेह के छेड़ें, सुना सरगम 'सलिल' सद्भाव की.
रच भावमय हरिगीतिका, कर बात नहीं अभाव की..
*
दिल से मिले दिल तो बजे त्यौहार की शहनाइयाँ.
अरमान हर दिल में लगे लेने विहँस अँगड़ाइयाँ..
सरहज मिले, साली मिले या सँग हों भौजाइयाँ.
संयम-नियम से हँसें-बोलें, हो नहीं रुस्वाइयाँ..
*
कस ले कसौटी पर 'सलिल', खुद आप अपने काव्य को.
देखे परीक्षाकर, परखकर, गलतियां संभाव्य को..
एक्जामिनेशन, टेस्टिंग या जाँच भी कर ले कभी.
कविता रहे कविता, यहे एही इम्तिहां लेना अभी..
*
अनुरोध है हम यह न भूलें एकता में शक्ति है.
है इल्तिजा सबसे कहें सर्वोच्च भारत-भक्ति है..
इसरार है कर साधना हों अजित यह ही युक्ति है.
रिक्वेस्ट है इतनी कि भारत-भक्ति में ही मुक्ति है..
९-१०-२०११
***
नवगीत:
समय पर अहसान अपना...
*
समय पर अहसान अपना
कर रहे पहचान,
हम न होते तो समय का
कौन करता गान?.....
*
हम समय का मान करते,
युगों पल का ध्यान धरते.
नहीं असमय कुछ करें हम-
समय को भगवान करते..
अमिय हो या गरल- पीकर
जिए मर म्रियमाण.
हम न होते तो समय का
कौन करता गान?.....
*
हमीं जड़, चेतन हमीं हैं.
सुर-असुर केतन यहीं हैं..
कंत वह है, तंत हम हैं-
नियति की रेतन नहीं हैं.
गह न गहते, रह न रहते-
समय-सुत इंसान.
हम न होते तो समय का
कौन करता गान?.....
*
पीर हैं, बेपीर हैं हम,
हमीं चंचल-धीर हैं हम.
हम शिला-पग, तरें-तारें-
द्रौपदी के चीर हैं हम..
समय दीपक की शिखा हम
करें तम का पान.
हम न होते तो समय का
कौन करता गान?.....
***
बुंदेली गीत:
हाँको न हमरी कार.....
*
पोंछो न हमरी कार
ओ बलमा!
हाँको न हमरी कार.....
हाँको न हमरी कार,
ओ बलमा!
हाँको न हमरी कार.....
*
नाज़ुक-नाज़ुक मोरी कलाई,
गोरी काया मक्खन-मलाई.
तुम कागा से सुघड़,
कहे जग -
'बिजुरी-मेघ' पुकार..
ओ सैयां! पोछो न हमरी कार.
पोछो न हमरी कार,
ओ बलमा! हाँको न हमरी कार.....
*
संग चलेंगी मोरी गुइयां,
तनक न हेरो बिनको सैयां.
भरमाये तो कहूँ राम सौं-
गलन ना दइहों दार..
ओ सैयां! पोछो न हमरी कार.
पोछो न हमरी कार,
ओ बलमा! हाँको न हमरी कार.....
*
बनो डिरेवर, हाँको गाड़ी.
कैहों सबसे 'बलम अनाड़ी'.
'सलिल' संग केसरिया कुल्फी-
खैहों, न करियो रार..
ओ सैयां! पोछो न हमरी कार.
पोछो न हमरी कार,
ओ बलमा! हाँको न हमरी कार.....
***
नव गीत:
कैसी नादानी??...
*
मानव तो रोके न अपनी मनमानी.
'रुको' कहे प्रकृति से कैसी नादानी??...
*
जंगल सब काट दिये
दरके पहाड़.
नदियाँ भी दूषित कीं-
किया नहीं लाड़..
गलती को ले सुधार, कर मत शैतानी.
'रुको' कहे प्रकृति से कैसी नादानी??...
*
पाट दिये ताल सभी
बना दीं इमारत.
धूल-धुंआ-शोर करे
प्रकृति को हताहत..
घायल ऋतु-चक्र हुआ, जो है लासानी...
'रुको' कहे प्रकृति से कैसी नादानी??...
*
पावस ही लाता है
हर्ष सुख हुलास.
तूने खुद नष्ट किया
अपना मधु-मास..
मेघ बजें, कहें सुधर, बचा 'सलिल' पानी.
'रुको' कहे प्रकृति से कैसी नादानी??...
****
बाल गीत / नव गीत:
खोल झरोखा....
*
खोल झरोखा, झाँक-
ज़िंदगी के मानी मिल जायेंगे.
मेघ बजेंगे, पवन बहेगा,
पत्ते नृत्य दिखायेंगे.....
*
बाल सूर्य के संग ऊषा आ,
शुभ प्रभात कह जाएगी.
चूँ-चूँ-चूँ-चूँ कर गौरैया
रोज प्रभाती गायेगी..
टिट-टिट-टिट-टिट करे टिटहरी,
करे कबूतर गुटरूं-गूं-
कूद-फांदकर हँसे गिलहरी
तुझको निकट बुलायेगी..
आलस मत कर, आँख खोल,
हम सुबह घूमने जायेंगे.
खोल झरोखा, झाँक-
ज़िंदगी के मानी मिल जायेंगे.....
*
आई गुनगुनी धूप सुनहरी
माथे तिलक लगाएगी.
अगर उठेगा देरी से तो
आँखें लाल दिखायेगी..
मलकर बदन नहा ले जल्दी,
प्रभु को भोग लगाना है.
टन-टन घंटी मंगल ध्वनि कर-
विपदा दूर हटाएगी.
मुक्त कंठ-गा भजन-आरती,
सरगम-स्वर सध जायेंगे.
खोल झरोखा, झाँक-
ज़िंदगी के मानी मिल जायेंगे.....
*
मेरे कुँवर कलेवा कर फिर,
तुझको शाला जाना है.
पढ़ना-लिखना, खेल-कूदना,
अपना ज्ञान बढ़ाना है..
अक्षर,शब्द, वाक्य, पुस्तक पढ़,
तुझे मिलेगा ज्ञान नया.
जीवन-पथ पर आगे चलकर
तुझे सफलता पाना है..
सारी दुनिया घर जैसी है,
गैर स्वजन बन जायेंगे.
खोल झरोखा, झाँक-
ज़िंदगी के मानी मिल जायेंगे.....
***
बाल गीत:
माँ-बेटी की बात
*
रानी जी को नचाती हैं महारानी नाच.
झूठ न इसको मानिये, बात कहूँ मैं साँच..
बात कहूँ मैं साँच, रूठ पल में जाती है.
पल में जाती बहल, बहारें ले आती है..
गुड़िया हाथों में गुड़िया ले सजा रही है.
लोरी गाकर थपक-थपक कर सुला रही है.
मारे सिर पर हाथ कहे: ''क्यों तंग कर रही?
क्यों न रही सो?, क्यों निंदिया से जंग कर रही?''
खीज रही है, रीझ रही है, हो बलिहारी.
अपनी गुड़िया पर मैया की गुड़िया प्यारी..
रानी माँ हैरां कहें: ''महारानी सो जाओ.
आँख बंद कर अनुष्का! सपनों में मुस्काओ.
तेरे पापा आ गए, खाना खिला, सुलाऊँ.
जल्दी उठना है सुबह, बिटिया अब मैं जाऊँ?''
बिटिया बोली ठुमक कर: ''क्या वे डरते हैं?'
क्यों तुमसे थे कह रहे: 'तुम पर मरते हैं?
जीते जी कोई कभी कैसे मर सकता?
बड़े झूठ कहते तो क्यों कुछ फर्क नहीं पड़ता?''
मुझे डाँटती: ''झूठ न बोलो तुम समझाती हो.
पापा बोलें झूठ, न उनको डाँट लगाती हो.
मेरी गुड़िया नहीं सो रही, लोरी गाओ, सुलाओ.
नाम न पापा का लेकर, तुम मुझसे जान बचाओ''..
हुई निरुत्तर माँ गोदी में ले बिटिया को भींच.
लोरी गाकर सुलाया, ममता-सलिल उलीच..
९-१०-२०१०
***

सोमवार, 7 सितंबर 2026

सितंबर ७, द्विपदी, सॉनेट, माहिया, दोहा, नवगीत, इसरो, देव, मुक्तक

सलिल सृजन सितंबर ७
द्विपदी
*
दोस्ती का जाम पी जिसने लिया
उतरता ही नहीं फिर उसका सरूर।
. 
दोस्त है वह शख्स जिसको दोस्त पर 
बिना कारण भी रहा आता गुरूर।
७.९.२०२६  
*
सॉनेट
मैं-तू; तू-तू मैं-मैं करते
एक-नेक जब मिलकर हों हम
मिले ख़ुशी हों दूर सभी गम
जग के सब सुख मिलकर वरते
मेरा-तेरा कर दुःख पाते
गैर न कोई कहीं सृष्टि में
दिखे गैर तो खोट दृष्टि में
सबकी खातिर मर; जी जाते
सारे मानव सदा एक हों
साथी नैतिकता-विवेक हों
सदा इरादे सभी नेक हों
नीर-क्षीर जैसे मिल पाएँ
भुज भेंटें; हँस गले लगाएँ
सु-मन सुमन जैसे खिल पाएँ
७-९-२०२२
***
माहिया
*
सेविन जी न घबराना
फिर करना कोशिश
चंदा पे उतर जाना।
*
है गर्व बहुत सबको
आँखों का तारा
इसरो है बहुत प्यारा।
*
मंजिल न मिली तो क्या
सही दिशा में पग
रख पा ही लेंगे कल।
***
आज की प्रात
इसरो परिवार के लगन, श्रम, साहस, समर्पण और योग्यता को नमन
*
शोभित है आलोक से, कुछ मायूस विहान।
कित भरमाया है कहो, अपना प्रिय प्रग्यान।।
*
हाथी निकले जहाँ से, वहीं अटकती पूँछ।
सत्य हुई लोकोक्ति पर, तनिक न नीची मूँछ।।
*
फिर कोशिश कर सफलता, पाएँगे हम मीत।
गिर-उठ जाला बनाकर, मकड़ी के रण जीत।।
*
विक्रम कभी न हारता, लिखता है तकदीर।
हर बाधा को जय करे, तकनीकी तदबीर।।
*
भारत जाकर चाँद पर, रचे नया इतिहास।
यह कोशिश जारी रखें, ले अधरों पर हास।।
*
सबका यह संकल्प है, तनिक न लेंगे चैन।
ध्वजा तिरंगी चंद्र पर, जो चक लखें न नैन।।
*
बाधा-संकट से न डर, बाकी है अरमान।
आस न तज पूरा करें, सब मिलकर अभियान।।
***
जीवन सलिला
*
जीवन जीते हैं सभी,
किंतु नहीं जिंदा
जिंदा है वही जीवन
जो करे न पर निंदा।
*
जीवन तो बहाना है
असली नकली परहित
कर हमको जाना है।
*
जीवन है चलना
गिर रुक उठकर बढ़ना
बिन चुक पर्वत चढ़ना।
*
जीवन जी वन में तू
महसूस तभी होगा
क्या मिला न शहरों में?
*
जीवन सलिला बहती
प्रयासों को दे पानी
कुछ साथ नहीं तहती।
*
जीवन में सहारा हो
जब तक न किसी का तू
तब तक न जिया जीवन।
***
बाल कविता
*
इसरोवाले कक्का जी
*
इसरोवाले कक्का जी
हम हैं हक्का-बक्का जी
*
चंदा मामा दूर के,
अब लगते हैं हमें समीप
आसमान के सागर में
गो-आ सकते ऐसा द्वीप
गोआ जैसा सागर भी
क्या हमको मिल पाएगा?
छप्-छपाक्-छप् लहरों संग
क्या पप्पू कर गाएगा?
आर्बिटर का कक्षा क्या
मेरी कक्षा जैसी है?
मेरी मैडम कड़क बहुत
क्या मैडम भी वैसी है?
बैल-रेल गाड़ी जैसा
लैंडर कौन चलाएगा?
चंदा मामा से मिलने
कोई बच्चा जाएगा?
कक्का मुझको भिजवा दो
जिद न करूँगा मैं बिल्कुल
रोवर से ना झाँकूँगा
नहीं करूँगा मैं हिलडुल
इतने ऊपर जाऊँगा
ज्यों धोना का छक्का जी
बहिना को भी सँग भेजो
इसरोवाले कक्का जी
७-९-२०१९
***
विमर्श: २
देवता कौन हैं?
देवता, 'दिव्' धातु से बना शब्द है, अर्थ 'प्रकाशमान होना', भावार्थ परालौकिक शक्ति जो अमर, परा-प्राकृतिक है और पूजनीय है। देवता या देव इस तरह के पुरुष और देवी इस तरह की स्त्रियों को कहा गया है। देवता परमेश्वर (ब्रह्म) का लौकिक या सगुण रूप माने गए हैं।
बृहदारण्य उपनिषद के एक आख्यान में प्रश्न है कि कितने देव हैं? उत्तर- वास्तव में देव केवल एक है जिसके कई रूप हैं। पहला उत्तर है ३३ कोटि (प्रकार); और पूछने ३ (विधि-हरि-हर या ब्रम्हा-विष्णु-महेश) फिर डेढ़ और फिर केवल एक (निराकार जिसका चित्र गुप्त है अर्थात नहीं है)। वेद मंत्रों के विभिन्न देवता (उपास्य, इष्ट) हैं। प्रत्येक मंत्र का ऋषि, कीलक और देवता होता है।
देवताओं का वर्गीकरण- चार मुख्य प्रकार
१. स्थान क्रम से वर्णित देवता- द्युस्थानीय यानी ऊपरी आकाश में निवास करनेवाले देवता, मध्यस्थानीय यानी अंतरिक्ष में निवास करने वाले देवता, और तीसरे पृथ्वीस्थानीय यानी पृथ्वी पर रहनेवाले देवता।
२. परिवार क्रम से वर्णित देवता- इन देवताओं में आदित्य, वसु, रुद्र आदि हैं।
३. वर्ग क्रम से वर्णित देवता- इन देवताओं में इन्द्रावरुण, मित्रावरुण आदि देवता हैं।
४. समूह क्रम से वर्णित देवता -- इन देवताओं में सर्व देवा (स्थान, वस्तु, राष्ट्र, विश्व आदि) गण्य हैं।
ऋग्वेद में स्तुतियों से देवता पहचाने जाते हैं। ये देवता अग्नि, वायु, इंद्र, वरुण, मित्रावरुण, अश्विनीकुमार, विश्वदेवा, सरस्वती, ऋतु, मरुत, त्वष्टा, ब्रहस्पति, सोम, दक्षिणा इन्द्राणी, वरुणानी, द्यौ, पृथ्वी, पूषा आदि हैं। बहु देवता न माननेवाले सब नामों का अर्थ परब्रह्म परमात्मावाचक करते हैं। बहुदेवतावादी परमात्मात्मक रूप में इनको मानते है। पुराणों में इन देवताओं का मानवीकरण अथवा लौकिकीकरण हुआ, फ़िर इनकी मूर्तियाँ, संप्रदाय, अलग-अलग पूजा-पाठ बनाये गए।
धर्मशास्त्र में "तिस्त्रो देवता" (तीन देवता) ब्रह्मा, विष्णु और शिव का का कार्य सृष्टि का निर्माण, पालन और संहार माना जाता है। काल-क्रम से देवों की संख्या बढ़ती गई। निरुक्तकार यास्क के अनुसार,"देवताऒ की उत्पत्ति आत्मा से है"। महाभारत (शांति पर्व) तथा शतपथ ब्राह्मण में आदित्यगण क्षत्रिय देवता, मरुदगण वैश्य देवता, अश्विनी गण शूद्र देवता और अंगिरस ब्राहमण देवता माने गए हैं।
आदित्या: क्षत्रियास्तेषां विशस्च मरुतस्तथा, अश्विनौ तु स्मृतौ शूद्रौ तपस्युग्रे समास्थितौ, स्मृतास्त्वन्गिरसौ देवा ब्राहमणा इति निश्चय:, इत्येतत सर्व देवानां चातुर्वर्नेयं प्रकीर्तितम।।
शुद्ध बहु ईश्वरवादी धर्मों में देवताओं को पूरी तरह स्वतंत्र माना जाता है। प्रमुख वैदिक देवता गणेश (प्रथम पूज्य), सरस्वती, श्री देवी (लक्ष्मी), विष्णु, शक्ति (दुर्गा, पार्वती, काली), शंकर, कृष्ण, इंद्र, सूर्य, हनुमान, ब्रह्मा, राम, वायु, वरुण, अग्नि, शनि , कार्तिकेय, शेषनाग, कुबेर, धन्वंतरि, विश्वकर्मा आदि हैं।
देवता का एक वर्गीकरण जन्मा तथा अजन्मा होना भी है। त्रिदेव, त्रिदेवियाँ आदि अजन्मा हैं जबकि राम, कृष्ण, बुद्ध आदि जन्मा देवता हैं इसी लिए उन्हें अवतार कहा गया है।
देवता मानव तथा अमानव भी है। राम, कृष्ण, सीता, राधा आदि मानव, जबकि हनुमान, नृसिंह आदि अर्ध मानव हैं जबकि मत्स्यावतार, कच्छपावतार आदि अमानव हैं।
प्राकृतिक शक्तियों और तत्वों को भी देवता कहा गया हैं क्योंकि उनके बिना जीवन संभव न होता। पवन देव (हवा), वैश्वानर (अग्नि), वरुण देव (जल), आकाश, पृथ्वी, वास्तु आदि ऐसे ही देवता हैं।
सार यह कि सनातन धर्म (जिसका कभी आरंभ या अंत नहीं होता) 'कंकर-कंकर में शंकर' कहकर सृष्टि के निर्माण में छोटे से छोटे तत्व की भूमिका स्वीकारते हुए उसके प्रति आभार मानता है और उसे देवता कहता है।इस अर्थ में मैं, आप, हम सब देवता हैं। इसीलिए आचार्य रजनीश ने खुद को 'ओशो' कहा और यह भी कि तुम सब भी ओशो हो बशर्ते तुम यह सत्य जान और मान पाओ।
अंत में प्रश्न यह कि हम खुद से पूछें कि हम देवता हैं तो क्या हमारा आचरण तदनुसार है? यदि हाँ तो धरती पर ही स्वर्ग है, यदि नहीं तो फिर नर्क और तब हम सब एक-दूसरे को स्वर्गवासी बनाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर रहे। हमारा ऐसा दुराचरण ही पर्यावरणीय समस्याओं और पारस्परिक टकराव का मूल कारण है।
आइए, प्रयास करें देवता बनने का।
७-९-२०१८
***
दोहा सलिला
*
श्याम-गौर में भेद क्या, हैं दोनों ही एक
बुद्धि-ज्ञान के द्वैत को, मिथ्या कहे विवेक
*
राम-श्याम हैं एक ही, अंतर तनिक न मान
परमतत्व गुणवान है, आदिशक्ति रसखान
*
कृष्ण कर्म की प्रेरणा, राधा निर्मल नेह
सँग अनुराग-विराग हो, साधन है जग-देह
*
कण-कण में श्री कृष्ण हैं, देख सके तो देख
करना काम अकाम रह, खींच भाग्य की रेख
*
मुरलीधर ने कर दिया, नागराज को धन्य
फण पर पगरज तापसी, पाई कृपा अनन्य
*
आत्म शक्ति राधा अजर, श्याम सुदृढ़ संकल्प
संग रहें या विलग हों, कोई नहीं विकल्प
*
हर घर में गोपाल हो, मातु यशोदा साथ
सदाचार बढ़ता रहे, उन्नत हो हर माथ
*
मातु यशोदा चकित चित, देखें माखनचोर
दधि का भोग लगा रहा, होकर भाव विभोर
***
नवगीत
*
पल में बारिश,
पल में गर्मी
गिरगिट सम रंग बदलता है
यह मौसम हमको छलता है
*
खुशियों के ख्वाब दिखाता है
बहलाता है, भरमाता है
कमसिन कलियों की चाह जगा
सौ काँटे चुभा, खिजाता है
अपना होकर भी छाती पर
बेरहम! दाल दल हँसता है
यह मौसम हमको छलता है
*
जब एक हाथ में कुछ देता
दूसरे हाथ से ले लेता
अधिकार न दे, कर्तव्य निभा
कह, यश ले, अपयश दे देता
जन-हित का सूर्य बिना ऊगे
क्यों, कौन बताये ढलता है?
यह मौसम हमको छलता है
*
गर्दिश में नहीं सितारे हैं
हम तो अपनों के मारे हैं
आधे इनके, आधे उनके
कुटते-पिटते बंजारे हैं
घरवाले ही घर के बाहर
क्या ऐसे भी घर चलता है?
यह मौसम हमको छलता है
*
तुम नकली आँसू बहा रहे
हम दुःख-तकलीफें तहा रहे
अंडे कौओं के घर में धर
कोयल कूके, जग अहा! कहे
निर्वंश हुए सद्गुण के तरु
दुर्गुण दिन दूना फलता है
यह मौसम हमको छलता है
*
है यहाँ गरीबी अधनंगी
है वहाँ अमीरी अधनंगी
उन पर जरुरत से ज़्यादा है
इन पर हद से ज्यादा तंगी
धीरज का पैर न जम पाता
उन्मन मन रपट-फिसलता है
यह मौसम हमको छलता है
७.९.२०१७
***
दोहा सलिला
*
पुंगी फल पर विराजे, श्री गणेश विघ्नेश
यही विनय है 'सलिल' की, काटो सकल कलेश
*
श्याम-गौर में भेद क्या, हैं दोनों ही एक
बुद्धि-ज्ञान के द्वैत को, मिथ्या कहे विवेक
*
राम-श्याम हैं एक ही, अंतर तनिक न मान
परमतत्व गुणवान है, आदिशक्ति रसखान
*
कृष्ण कर्म की प्रेरणा, राधा निर्मल नेह
सँग अनुराग-विराग हो, साधन है जग-देह
*
कण-कण में श्री कृष्ण हैं, देख सके तो देख
करना काम अकाम रह, खींच भाग्य की रेख
*
मुरलीधर ने कर दिया, नागराज को धन्य
फण पर पगरज तापसी, पाई कृपा अनन्य
*
आत्म शक्ति राधा अजर, श्याम सुदृढ़ संकल्प
संग रहें या विलग हों, कोई नहीं विकल्प
*
हर घर में गोपाल हो, मातु यशोदा साथ
सदाचार बढ़ता रहे, उन्नत हो हर माथ
*
मातु यशोदा चकित चित, देखें माखनचोर
दधि का भोग लगा रहा, होकर भाव विभोर
*
मन मंदिर में विराजो, हे लड्डू गोपाल
जिव्हा पर तव नाम हो, कर में हो करताल
*
जहाँ दृष्टि जाती वहीं, दीखते हैं श्रीनाथ
चाह रहे श्री मात्र को, जो वे अधम अनाथ
*
माया है संसार यह, देवी हरें विकार
नेकी रतन बटोर तब, पर का हो उद्धार
*
रजत ताम्र या काष्ठ का, कोई नहीं है मोल
ह्रदय-सिंहासन बैठिए, प्रभुजी रहें अडोल
*
शिला गण्डकी नदी की, शालिगराम अमोल
शंख दक्षिणावर्त संग, पूजें नवरस घोल
*
बैठ जिलहरी शिव हँसें, नाग देखता मौन
माला ले रुद्राक्ष की, फेरे पल-पल कौन?
*
जाम सांवली विराजित, लेटे श्री हनुमान
भूत-प्रेत बाधा हरें, सबकी दयानिधान
*
सीपी में मोती बनें, हैं लक्ष्मी के वास
नित्य पूजिए- पाइए, शांति-सौख्य अहसास
७.९.२०१५
***
मुक्तक
*
मॉर्निंग नून ईवनिंग नाइट
खुद से करते है हम फाइट
रॉंग लग रहा है जो हमको
उसे जमाना कहता राइट
*
आते अच्छे दिन सुना
गुड डे कह हम मस्त
गुंडे मिलकर छेड़ते
गुड्डे-गुड्डी त्रस्त
७-९-२०१४
.

सोमवार, 31 अगस्त 2026

अगस्त ३१, फार्माकोग्नोसी, सॉनेट, दोहा, ट्विन टॉवर, बुन्देली, निमाड़ी, माहिया, हाइकु, ककुप, गीत, कल्पना


सलिल सृजन अगस्त ३१ 
*
द्विपदी 
शेष रिश्ते चाय चालू जानिए 
दोस्ती को चाय 'पेशल मानिए 
. 
दोस्त न हर परिचित को बोलें 
मन न सामने सबके खोलें 
. 
दोस्त वही जो दोस्त के दुख में देता साथ 
सिर्फ सुखों में साथ जो थाम न उसका हाथ 
३१.८.२०२६ 
००० 
प्राकृतिक-औषधि विज्ञान (फार्माकोग्नोसी)
•
प्राकृतिक औषधि विज्ञान क्या है?
प्रकृति का निर्माण पाँच तत्वों अग्नि, आकाश, हवा, धरती और पानी से हुआ है। ये पाँचों तत्व हर पदार्थ और हर जीव में मौजूद होते हैं। इनका असंतुलन रोगों का कारण होता है। इन्हें संतुलित कर रोग को दूर किया जा सकता है। प्रकृति से प्राप्त अकृत्रिम पदार्थों व जीवों अथवा उनसे प्राप्त पदार्थों का अध्ययन, विश्लेषण व परीक्षण कर उनके प्रभाव को जानने की विधा का नाम प्राकृतिक- औषधि विज्ञान (फार्माकोग्नोसी) है।
प्राकृतिक औषधि विज्ञान में पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, मिट्टी-पत्थरों, खनिजों आदि का परीक्षण कर उनसे बनाई गई औषधियों के प्रभावों का विधिवत अध्ययन किया जाता है।
प्राकृतिक औषधि विज्ञान : जन्म और विकास
प्राकृतिक उपादानों के उपयोग व उनसे रोग निवारण की समझ मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षियों में भी पाई गई है।
कब्ज़ होने पर शेर, कुत्ते आदि घास खाते देखे गए हैं। पक्षी बेस्वाद, सड़े-गले, हानिप्रद फल नहीं खाते जबकि पके फल खा लेते हैं। प्राकृतिक- औषधि पहचानने और सेवन करने की प्रवृत्ति आदिमानवों, आदिवासियों तथा ग्रामीणों में पीढ़ी दर पीढ़ी विकसित होती रही है। ऋषि-मुनियों के आश्रमों में प्राकृत औषध विज्ञान का विकास हुआ। आयुर्विज्ञान संबंधी ग्रंथों में आयुर्वेद महत्वपूर्ण है। वेद पूर्व, वैदिक तथा वेदोत्तर काल में प्राकृतिक-औषधियों का व्यवस्थित अध्ययन व शोध कार्य हुआ। आधुनिक काल में विज्ञान की उन्नति विदेशों विशेषकर पश्चिम में हुई।
000 
दोहा सलिला
कल था कल आता नहीं, जो करना कर आज।
कल कल करते कल न हो, कलकल सुन कर काज।।
•
अकल अ कल हो विकल है, नकल न देती साथ।
किलकिल कर गुमसुम शकल, रुके हाथ नत माथ।।
•
खुद को दुहराता सदा, कहते हैं इतिहास।
कल फिर कल आ आज हो, विरह मिलन दें हास।।
३१.८.२०२४
•
सॉनेट
*
थोथा चना बाजे घना
जोर-जोर से रेंके गधा
भले रहे खूंटे से बँधा
जो न जानता रहता तना।
पहले पढ़ो-लिखो-सोचो
बिना जरूरत मत बोलो
यदि बोलो पहले तोलो
कहा न कुछ बेमतलब हो
लाखों की है बंद जुबान
पहचानो बातों का मोल
ज़हर-अमिय सकती है घोल
करो नहीं नाहक अभिमान
बिना बात कर वाद-विवाद
खुद को करों नहीं बर्बाद
२९-८-२०२२
***
विमर्श : ट्विन टॉवर ध्वंस
वॉटरफॉल = झरना जिसमें पानी बिना रुके सीधे नीचे गिरता है।
इम्पलोड = फटना, इम्प्लोजन = विस्फोट।
वॉटरफॉल इम्प्लोजन = गगनचुंबी इमारत में इस तरह विस्फोट करना की मलबा बिना बिखरे झरने की धार की तरह सीधे नीचे गिरे।
वाटरफॉल इंप्लोजन तकनीक का मतलब है कि मलबा सचमुच पानी की तरह गिरेगा. इम्प्लोजन ऐसे शहरी विस्फोट के लिए उपयोग की जाने वाली विधि है जिसे नियंत्रित विस्फोटों की आवश्यकता होती है.
नोएडा (Noida) में सुपरटेक ट्विन टावरों (Supertec twin tower) के विस्फोट की उलटी गिनती शुरू होने के साथ ही अंतिम जांच चल रही है. टावरों को सुरक्षित रूप से जमीन पर गिराने की जरूरत है. इसका मतलब है कि आसपास की इमारतों को कम से कम नुकसान सुनिश्चित करना है जिसमें 5,000 लोग रहते हैं, जो मुश्किल से 9 मीटर दूर हैं. इस अत्यंत सटीक कार्य के लिए विस्फोट विशेषज्ञों का जवाब एक तकनीक है जिसे 'वाटरफॉल इम्प्लोजन' (waterfall implosion) के रूप में जाना जाता है. वाटरफॉल तकनीक का मतलब है कि मलबा सचमुच पानी की तरह गिरेगा. इम्प्लोजन ऐसे शहरी विस्फोट के लिए उपयोग की जाने वाली विधि है जिसे नियंत्रित विस्फोटों की आवश्यकता होती है. इसके विपरीत, एक विस्फोट के परिणामस्वरूप मलबा दूर-दूर दिशाओं में बह जाएगा. एक और कहावत यह है कि 'ताश का घर' कैसे गिरता है. नियंत्रित विस्फोट कुछ ही सेकंड में 55,000 टन बड़े पैमाने पर मलबे को नीचे लाएगा. साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि टावर को ढहाते समय कोई अन्य क्षति तो नहीं हो रही है.
नोएडा ट्विन टावर गिराने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा सटीक दृष्टिकोण
इस तकनीक को भारत में उस समय प्रयोग किया गया था जब उसी कंपनी ने 2020 में कोच्चि में 4 ऊंची इमारतों को ध्वस्त कर दिया था. वही प्रयोग 15 सेकंड से भी कम समय में ट्विन टावरों को ढहा देगी. पूरी टीम 150 प्रतिशत आश्वस्त है कि ढांचा उस दिशा में और सटीक तरीके से नीचे गिरेंगी, जिस तरह से उन्होंने बड़े पैमाने पर विध्वंस की परिकल्पना की है. विस्फोट में एक ढांचा अपने आप में गिर जाती है. तकनीक गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांतों का उपयोग करती है. यह ढांचों के आधार को इस तरह से हटा देगा कि गुरुत्वाकर्षण का केंद्र मिलीमीटर से शिफ्ट हो जाए, जिससे ढांचा नीचे आ जाए.
दोनों टावरों को ढहाने के लिए 3700 किलो विस्फोटक
विध्वंस टीम के एक इंजीनियर के हवाले से कहा गया, "गुरुत्वाकर्षण कभी नहीं सोता है. यह पूरे दिन और पूरी रात काम करता है. यह विस्फोट का पूरा विचार है. उन्होंने कहा, "विध्वंस की इस पद्धति के लिए कोई संदर्भ पुस्तक नहीं है. इसे करने का कोई विशेष तरीका नहीं है या इसे कैसे करना है, इस पर दुनिया में कहीं भी कोई शब्द नहीं लिखा गया है. यह केवल व्यक्तियों के कौशल और इसे करने के उनके अनुभवों पर निर्भर करता है. सटीक कार्य के हिस्से के रूप में 2.634 मिलीमीटर मापने वाले 9,640 छेद जो कि अंतिम दशमलव अंक के लिए सटीक हैं, को 3,700 किलोग्राम विस्फोटक के लिए टावरों में ड्रिल किया गया है जो इसे विस्फोट कर देगा. कई स्थानों पर उच्च और निम्न गति वाले कैमरों जैसे उपकरण टीम द्वारा घटना के बाद के विश्लेषण के लिए विध्वंस को कैप्चर करेंगे. पैसे से ज्यादा टीम हाथ में बड़े पैमाने पर उपलब्धि के साथ अपनी प्रतिष्ठा को दांव पर लगाती है.
क्या विध्वंस से आस-पास की इमारतों को कोई नुकसान होगा?
विस्फोटक टीम ने आश्वासन दिया कि कोई संरचनात्मक क्षति नहीं होगी. अधिक से अधिक पेंट और प्लास्टर या टूटी खिड़कियों में कुछ कॉस्मेटिक दरारें होंगी जहां वे पहले से ही कमजोर हो गई हैं या ढीली हो गई हैं. मलबे को हटाने के लिए ठेकेदारों की पहले से ही व्यवस्था कर ली गई है. रविवार को 2:30 बजे पुलिस की मंजूरी के बाद विस्फोट किया जाएगा. सफाई कर्मचारियों की सहायता के लिए यांत्रिक स्वीपिंग मशीन, एंटी-स्मॉग गन और पानी के छिड़काव के साथ धूल साफ करने की व्यवस्था की गई है.
३१-८-२०२२
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निमाड़ी दोहा सलिला
*
सिंदूरी सुभ भोर छे, चटक दुफेरी धूप।
संझा सरस सुहावणी,रात रूपहलो रूप।।
*
खेती बाड़ी बावड़ी, अमरित पाणी सीच।
ठुमका प$ ओरावणी, नाच सयाणी मीच।।
*
सूनी गोद भरावणी, संजा चारइ पूज
बरसूद् या खs लावणी, हिवड़ा कहीं न दूज
*
दाणी मइया नरबदा, पाणी अमरित धार
माणी घऊँ जुआर दs, धाणी जीवन सार।।
*
सांस-सांस मं$ हर घड़ी,अमर प्यार का बोल
परकम्मा कर पुन्न लइ, चल्या टोळ का टोळ।।
*
बुन्देली दोहे
महुआ फूरन सों चढ़ो, गौर धना पे रंग।
भाग सराहें पवन के, चूम रहो अॅंग-अंग।।
मादल-थापों सॅंग परंे, जब गैला में पैर।
धड़कन बाॅंकों की बढ़े, राम राखियो खैर।।
हमें सुमिर तुम हो रईं, गोरी लाल गुलाल।
तुमें देख हम हो रए, कैसें कएॅं निहाल।।
मन म्रिदंग सम झूम रौ, सुन पायल झंकार।
रूप छटा नें छेड़ दै, दिल सितार कें तार।।
नेह नरमदा में परे, कंकर घाईं बोल।
चाह पखेरू कूक दौ, बानी-मिसरी घोल।।
सैन धनुस लै बेधते, लच्छ नैन बन बान।
निकरन चाहें पै नईं, निकर पा रए प्रान।।
तड़प रई मन मछरिया, नेह-नरमदा चाह।
तन भरमाना घाट पे, जल जल दे रौ दाह।।
अंग-अंग अलसा रओ, पोर-पोर में पीर।
बैरन ननदी बलम सें, चिपटी छूटत धीर।।
कोयल कूके चैत मा, देख बरे बैसाख।
जेठ जिठानी बिन तपे, सूरज फेंके आग।।
३१-८-२०१९
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एकाक्षरी द्विपदी
*
भूल भुलाई, भूल न भूली, भूलभुलैयां भूली भूल.
भुला न भूले भूली भूलें, भूल न भूली भाती भूल.
*
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एकाक्षरी दोहा
*
न नोननुन्नो नुन्नोनो नाना नानानना ननु। 
नुन्नोअ्नुन्नो ननुन्नेनो नानेना नुन्ननुन्ननुत।। 

अर्थ: इस श्लोक का अर्थ बहुत ही गहरा और वीरता से भरा हुआ है:जो मनुष्य अपने से दुर्बल या हारे हुए इंसान से हार गया है, वह वास्तव में मनुष्य (वीर) नहीं है।
इसी तरह, अपने से श्रेष्ठ या वीर पुरुष के द्वारा हराया गया व्यक्ति भी पराजित नहीं माना जाता (क्योंकि उसने वीर से युद्ध किया)।
जिसका स्वामी (नेता) पराजित न हुआ हो, वह सैनिक कभी हारा हुआ नहीं कहलाता।
जो वीर पुरुषों को घायल या पराजित करता है, वह व्यक्ति वास्तव में पाप रहित (निर्दोष) होता है।
महर्षि भारवि, किरातार्जुनीयम सर्ग १५, श्लोक १४ 
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माहिया
फागों की तानों से
मन से मन मिलते
मधुरिम मुस्कानों से
*
ककुप
मिल पौधे लगाइए
वसुंधरा हरी-भरी बनाइये
विनाश को भगाइए
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हाइकु
गाओ कबीर
बुरा न माने कोई
लगा अबीर
३१-८-२०१७
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द्विपदियों में कल्पना
*
कल्पना की विरासत जिसको मिली
उस सरीखा धनी दूजा है नहीं
*
कल्पना की अल्पना गृह-द्वार पर
डाल देखो सुखों का हो सम्मिलन
*
कल्पना की तूलिका, रंग शब्द के
भाव चित्रों में झलकती ज़िन्दगी
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कल्पना उड़ चली फैला पंख जब
सच कहूँ?, आकाश छोटा पड़ गया
*
कल्पना कंकर को शंकर कर सके
चाह ले तो कर सके विपरीत भी
*
कल्पना से प्यार करना है अगर
आप अवसर को कभी मत चूकिए
*
कल्पना की कल्पना कैसे करे?
प्रश्न का उत्तर न खोजे भी मिला
*
कल्पना सरिता बदलती रूप नित
कभी मन्थर, चपल जल प्लावित कभी
*
कल्पना साकार होकर भी विनत
'सलिल' भट नागर यही है, मान लो
*
कल्पना की शरण जा कवि धन्य है
गीत दोहे ग़ज़ल रचकर गा सका
*
कल्पना मेरी हक़ीक़त हो गयी
नर्मदा अवगाह कर सुख पा लिया
*
कल्पना को बाँह में भर, चूमकर
कोशिशों ने मंज़िलें पायीं विहँस
*
कल्पना नाचीज़ है यह सत्य है
चीज़ तो बेजान होती है 'सलिल'
*
३१-८-२०१६
वीणा की झंकार में, सच है अन्तर्व्याप्त
बहारों के संसार में, व्यर्थ वचन हैं आप्त
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मुक्तिका:
*
ये शायरी जबां है किसी बेजुबान की.
ज्यों महकती क्यारी हो किसी बागबान की..
आकाश की औकात क्या जो नाप ले कभी.
पाई खुशी परिंदे ने पहली उड़ान की..
हमको न देखा देखकर तुमने तो क्या हुआ?
दिल ले गया निशानी प्यार के निशान की..
जौहर किया या भेज दी राखी अतीत ने.
हर बार रही बात सिर्फ आन-बान की.
उससे छिपा न कुछ भी रहा कह रहे सभी.
किसने कभी करतूत कहो खुद बयान की..
रहमो-करम का आपके सौ बार शुक्रिया.
पीछे पड़े हैं आप, करूँ फ़िक्र जान की..
हम जानते हैं और कोई कुछ न जानता.
यह बात है केवल 'सलिल' वहमो-गुमान की..
३१-८-२०११
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गीत :
स्वागत है...
*
पीर-दर्द-दुःख-कष्ट हमारे द्वार पधारो स्वागत है.
हम बिगड़े हैं जनम-जनम के, हमें सुधारो स्वागत है......
*
दिव्य विरासत भूल गए हम, दीनबंधु बन जाने की.
रूखी-सूखी जो मिल जाए, साथ बाँटकर खाने की..
मुट्ठी भर तंदुल खाकर, त्रैलोक्य दान कर देते थे.
भार भाई, माँ-बाप हुए, क्यों सोचें गले लगाने की?..
संबंधों के अनुबंधों-प्रतिबंधों तुम पर लानत है.
हम बिगड़े हैं जनम-जनम के, हमें सुधारो स्वागत है......
*
सात जन्म तक साथ निभाते, सप्त-पदी सोपान अमर.
ले तलाक क्यों हार रहे हैं, श्वास-आस निज स्नेह-समर?
मुँह बोले रिश्तों की महिमा 'सलिल' हो रही अनजानी-
मनमानी कलियों सँग करते, माली-काँटे, फूल-भ्रमर.
सत्य-शांति, सौन्दर्य-शील की, आयी सचमुच शामत है.
हम बिगड़े हैं जनम-जनम के, हमें सुधारो स्वागत है......
*
वसुधा सकल कुटुंब हमारा, विश्व नीड़वत माना था.
सबके सुख, कल्याण, सुरक्षा में निज सुख अनुमाना था..
सत-शिव-सुन्दर रूप स्वयं का, आज हो रहा अनजाना-
आत्म-दीप बिन त्याग-तेल, तम निश्चय हम पर छाना था.
चेत न पाया व्हेतन मन, दर पर विनाश ही आगत है.
हम बिगड़े हैं जनम-जनम के, हमें सुधारो स्वागत है......
*
पंचतत्व के देवों को हम दानव बनकर मार रहे.
प्रकृति मातु को भोग्या कहकर, अपनी लाज उघार रहे.
धैर्य टूटता काल-चक्र का, असगुन और अमंगल नित-
पर्यावरण प्रदूषण की हर चेतावनी बिसार रहे.
दोष किसी को दें, विनाश में अपने स्वयं 'सलिल' रत हैं.
हम बिगड़े हैं जनम-जनम के, हमें सुधारो स्वागत है......
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गीत
आपकी सद्भावना में
*
आपकी सद्भावना में कमल की परिमल मिली.
हृदय-कलिका नवल ऊष्मा पा पुलककर फिर खिली.....
*
उषा की ले लालिमा रवि-किरण आई है अनूप.
चीर मेघों को गगन पर है प्रतिष्टित दैव भूप..
दुपहरी के प्रयासों का करे वन्दन स्वेद-बूँद-
साँझ की झिलमिल लरजती, रूप धरता जब अरूप..
ज्योत्सना की रश्मियों पर मुग्ध रजनी मनचली.
हृदय-कलिका नवल आशा पा पुलककर फिर खिली.....
*
है अमित विस्तार श्री का, अजित है शुभकामना.
अपरिमित है स्नेह की पुष्पा-परिष्कृत भावना..
परे तन के अरे! मन ने विजन में रचना रची-
है विदेहित देह विस्मित अक्षरी कर साधना.
अर्चना भी, वंदना भी, प्रार्थना सोनल फली.
हृदय-कलिका नवल ऊष्मा पा पुलककर फिर खिली.....
*
मौन मन्वन्तर हुआ है, मुखरता तुहिना हुई.
निखरता है शौर्य-अर्णव, प्रखरता पद्मा कुई..
बिखरता है 'सलिल' पग धो मलिनता को विमल कर-
शिखरता का बन गयी आधार सुषमा अनछुई..
भारती की आरती करनी हुई सार्थक भली.
हृदय-कलिका नवल ऊष्मा पा पुलककर फिर खिली.....
***
गीत
पुकार
*
आजा, जल्दी से घर आजा, भटक बाँवरे कहाँ रहा?
तुझसे ज्यादा विकल रही माँ, मुझे बता तू कहाँ रहा?...
जहाँ रहा तू वहाँ सफल था, सुन मैं गर्वित होती थी.
सबसे मिलकर मुस्काती थी, हो एकाकी रोती थी..
आज नहीं तो कल आएगा कैयां तुझे सुलाऊँगी-
मौन-शांत थी मन की दुनिया में सपने बोती थी.
कान्हा सम तू गया किन्तु मेरी यादों में यहाँ रहा.
आजा, जल्दी से घर आजा, भटक बाँवरे कहाँ रहा?
तुझसे ज्यादा विकल रही माँ, मुझे बता तू कहाँ रहा?...
*
दुनिया कहती बड़ा हुआ तू, नन्हा ही लगता मुझको .
नटखट बाल किशन में मैंने पाया है हरदम तुझको..
दुनिया कहती अचल मुझे तू चंचल-चपल सुहाता है-
आँचल-लुकते, दूर भागते, आते दिखता तू मुझको.
आ भी जा ओ! छैल-छबीले, ना होकर भी यहाँ रहा.
आजा, जल्दी से घर आजा, भटक बाँवरे कहाँ रहा?
तुझसे ज्यादा विकल रही माँ, मुझे बता तू कहाँ रहा?...
*
भारत मैया-हिन्दी मैया, दोनों रस्ता हेर रहीं.
अब पुकार सुन पाया है तू, कब से तुझको टेर रहीं.
कभी नहीं से देर भली है, बना रहे आना-जाना
सारी धरती तेरी माँ है, ममता-माया घेर रहीं?
मेरे दिल में सदा रहा तू, निकट दूर तू जहाँ रहा.
आजा, जल्दी से घर आजा, भटक बाँवरे कहाँ रहा?
तुझसे ज्यादा विकल रही मैं, मुझे बता तू कहाँ रहा?...
***
नवगीत
आराम चाहिए.....
*
हम भारत के जन-प्रतिनिधि हैं
हमको हर आराम चाहिए.....
*
प्रजातंत्र के बादशाह हम,
शाहों में भी शहंशाह हम.
दुष्कर्मों से काले चेहरे
करते खुद पर वाह-वाह हम.
सेवा तज मेवा के पीछे-
दौड़ें, ऊँचा दाम चाहिए.
हम भारत के जन-प्रतिनिधि हैं
हमको हर आराम चाहिए.....
*
पुरखे श्रमिक-किसान रहे हैं,
मेहनतकश इन्सान रहे हैं.
हम तिकड़मी,घोर छल-छंदी-
धन-दौलत अरमान रहे हैं.
देश भाड़ में जाये हमें क्या?
सुविधाओं संग काम चाहिए.
हम भारत के जन-प्रतिनिधि हैं
हमको हर आराम चाहिए.....
*
स्वार्थ साधते सदा प्रशासक.
शांति-व्यवस्था के खुद नाशक.
अधिनायक हैं लोकतंत्र के-
हम-वे दुश्मन से भी घातक.
अवसरवादी हैं हम पक्के
लेन-देन बेनाम चाहिए.
हम भारत के जन-प्रतिनिधि हैं
हमको हर आराम चाहिए.....
*
सौदे करते बेच देश-हित,
घपले-घोटाले करते नित.
जो चाहो वह काम कराओ-
पट भी अपनी, अपनी ही चित.
गिरगिट जैसे रंग बदलते-
हमको ऐश तमाम चाहिए.
हम भारत के जन-प्रतिनिधि हैं
हमको हर आराम चाहिए.....
*
वादे करते, तुरत भुलाते.
हर अवसर को लपक भुनाते.
हो चुनाव तो जनता ईश्वर-
जीत उन्हें ठेंगा दिखलाते.
जन्म-सिद्ध अधिकार लूटना
'सलिल' स्वर्ग सुख-धाम चाहिए.
हम भारत के जन-प्रतिनिधि हैं
हमको हर आराम चाहिए.....
***
गीत:
है हवन-प्राण का.........
*
है हवन-प्राण का, तज दूरियाँ, वह एक है .
सनातन सम्बन्ध जन्मों का, सुपावन नेक है.....
*
दीप-बाती के मिलन से, जगत में मनती दिवाली.
अंशु-किरणें आ मिटातीं, अमावस की निशा काली..
पूर्णिमा सोनल परी सी, इन्द्रधनुषी रंग बिखेरे.
आस का उद्यान पुष्पा, ॐ अभिमंत्रित सवेरे..
कामना रथ, भावना है अश्व, रास विवेक है.
है हवन-प्राण का..........
*
सुमन की मनहर सुरभि दे, जिन्दगी हो अर्थ प्यारे.
लक्ष्मण-रेखा गृहस्थी, परिश्रम सौरभ सँवारे..
शांति की सुषमा सुपावन, स्वर्ग ले आती धरा पर.
आशुतोष निहारिका से, नित प्रगट करता दिवाकर..
स्नेह तुहिना सा विमल, आशा अमर प्रत्येक है..
है हवन-प्राण का..........
*
नित्य मन्वंतर लिखेगा, समर्पण-अर्पण की भाषा.
साधन-आराधना से, पूर्ण होती सलिल-आशा..
गमकती पूनम शरद की, चकित नेह मयंक है.
प्रयासों की नर्मदा में, लहर-लहर प्रियंक है..
चपल पथ-पाथेय, अंश्चेतना ही टेक है.
है हवन-प्राण का..........
*
बाँसुरी की रागिनी, अभिषेक सरगम का करेगी.
स्वरों की गंगा सुपावन, भाव का वैभव भरेगी..
प्रकृति में अनुकृति है, नियंता की निधि सुपावन.
विधि प्रणय की अशोका है, ऋतु वसंती-शरद-सावन..
प्रतीक्षा प्रिय से मिलन की, पल कठिन प्रत्येक है.
है हवन-प्राण का..........
*
श्वास-सर में प्यास लहरें, तृप्ति है राजीव शतदल.
कृष्णमोहन-राधिका शुभ साधिका निशिता अचंचल..
आन है हनुमान की, प्रतिमान निष्ठा के रचेंगे.
वेदना के, प्रार्थना के, अर्चन के स्वर सजेंगे..
गँवाने-पाने में गुंजित भाव का उन्मेष है.
है हवन-प्राण का..........
३१-८-२०१०
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