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गुरुवार, 12 मार्च 2026

मार्च १२, राम किंकर, सॉनेट, सोरठा, नीरा आर्य, लीलावती, शिव, भव छंद, सवैया, ग़ज़लिका, नवगीत, सरहद

 सलिल सृजन मार्च १२

*
ग़ज़लिका ० बहुत बोला, तनिक सुन भी आँख मूँदे, ख्वाब बुन भी . पढ़ रहा तो समझ भी ले समझकर सच जरा गुन भी . गला है तो गा सकेगा सीख पगले! सही धुन भी . समय की चक्की निठुर है साथ गेहूँ पिसे घुन भी . है महज़ बाज़ार दुनिया क्या जरूरी 'सलिल' चुन भी १२.३.२०२६ ०००
०००
स्मरण युग तुलसी
मुक्तक
युगतुलसी के ग्रंथ पढ़ें नित।
रामभक्ति के सूत्र गुनें नित॥
भवसागर से मुक्ति मिलेगी-
रखें भरोसा स्वप्न बुनें नित॥
*
रामभक्ति मंदाकिनी पावन।
रूप राम जी का मनभावन॥
युगतुलसी का हाथ पकड़ बढ़-
राम नाम जप पाप नसावन॥
*
हनुमत कृपा मिलेगी उसको।
सिया-राम रुचते हैं जिसको॥
अगर न किंकर-धर्म सुहाता-
जन्म-जन्म भव सागर भटको॥
*
किंकर का किंकर बन जा मन।
सिया-राम जी के गुन गा मन॥
हनुमत चरण न छोड़ रख हृदय-
भक्ति-भाव रस में सन जा मन॥
*
रामायणम् सुपावन आश्रम।
राम-नाम गुंजित हो हर दम॥
मूर्ति मनोहर किंकर जी की-
कार दर्शन मिट जाते दुख-गम॥
***
सॉनेट
नटखट
*
नटखट चंचल पवन छेड़ता,
आँचल उड़ा-उड़ा मुस्काता,
भँवरा गुन-गुन गीत सुनाता,
ज़ुल्फ़ों से हँस खेल खेलता।
तिरस्कार रह मौन झेलता,
कली-कली पर जान लुटाता,
रंग देख जग दूर भगाता,
मन बेदाग न कोई देखता।
नटखट भ्रमर न धर्म छोड़ता,
सुंदरता की करता पूजा,
जिसको जो कहना हो कह ले।
नटखट पवन न हृदय तोड़ता,
मंदिर मन समान नहिं दूजा,
प्रेम भाव से इसमें रह ले।
१२.३.२०२४
***
सोरठा सलिला
*
मन के अंदर झाँक, सुन्दरतम है ह्रदय में।
नहीं रूप को ताक, मिट्टी मिट्टी में मिले।।
*
गेह गेह का नाथ, है केवल विश्वास तक।
देह देह के साथ, रहती केवल श्वास तक।।
*
करने रास का पान, भँवरा झूमे कली पर।
कली न छोड़े आन, नहीं शाख को छोड़ती।।
*
नहीं गुलामी नाम, अनुशासन को दीजिए।
आजादी का काम, उच्छंखलता करती नहीं।।
*
चरणबद्ध हो कार्य, हो विकास केवल तभी।
मनमानी स्वीकार्य, उन्नति को होती नहीं।।
*
ग्यारह होते रूद्र, त्रयोदिशी तिथि तेरहीं।
पीकर शोक समुद्र, शिव भज अमृत पाइए।।
*
नेह नर्मदा स्नान, सलिल पान कर मौन हो।
करिए तट पर ध्यान, नाद अनहद भी सुनें।।
१२-३-२०२३
***
अमर शहीद नीरा आर्य
एक थीं श्रीमती नीरा आर्य ( ०५-०३-१९०२ / २६-०७-१९९८) - नेताजी सुभाषचंद्र बोस की रक्षा के लिए इस बहादुर महिला का "स्तन" तक काट दिया गया। नीरा आर्य ने श्रीकांत जोइरोंजोन दास से शादी की, जो ब्रिटिश पुलिस में एक सीआईडी ​​इंस्पेक्टर थे।
नीरा आर्य एक सच्ची राष्ट्रवादी थीं, उनके पति एक सच्चे ब्रिटिश नौकर थे। देशभक्त होने के नाते नीरा सुभाषचंद्र बोस के नेतृत्व वाली भारतीय राष्ट्रीय सेना की झांसी रेजिमेंट में शामिल हुईं। नीरा आर्य के पति इंस्पेक्टर श्रीकांत जोइरोंजोन दास सुभाषचंद्र बोस की जासूसी कर रहे थे और जोइरोंजोन दास ने एक बार सुभाषचंद बोस पर गोलियाँ चला दीं लेकिन सौभाग्य से सुभाष चंद जी बाल-बाल बच गए। सुभाष चंद बोस को बचाने के लिए नीरा आर्य ने अपने पति की चाकू मार कर हत्या कर दी थी।
I.N.A के आत्म समर्पण के बाद लाल किले में फ़ौज के सैनिकों पर एक मुकदमा नवंबर-१९४५ से मई-१९४६ तक चला। नीरा आर्य को छोड़कर सभी कैदियों को रिहा कर दिया गया । वहीं उसे सेलूर जेल, अंडमान ले जाया गया, जहाँ उसे हर दिन प्रताड़ित किया जाता था। एक लोहार लोहे की जंजीरें और बेड़ियाँ हटाने आया। उसने जान बूझकर बेड़ियाँ हटाने के बहाने उनकी त्वचा का थोड़ा सा हिस्सा भी काट दिया और उनके पैरों को हथौड़े से कई बार जानबूझ चोट पहुँचाई। नीरा आर्य ने असहनीय दर्द को असाधारण धैर्य रखकर सहा। जेलर, जो इस पर पीड़ा का आनंद ले रहा था, जेलर ने नीरा को रिहा करने की पेशकश इस शर्त के साथ की कि वह सुभाष चंद बोस के ठिकाने का भेद बता दें। नीरा आर्य ने जवाब दिया कि बोस की मृत्यु एक विमान दुर्घटना में हुई थी और पूरी दुनिया इसके बारे में जानती है।
जेलर ने विश्वास करने से इनकार कर दिया और जवाब दिया, तुम झूठ बोल रही हो, सुभाष चंद बोस अभी भी जीवित हैं। तब नीरा आर्य ने कहा "हाँ, वो ज़िंदा हैं, वो मेरे दिल में रहते हैं ! जेलर ने गुस्से में आकर कहा, "फिर हम सुभाष चंद बोस को तुम्हारे दिल से निकाल देंगे" जेलर ने उनको गलत तरीके से छुआ और कपड़ों को फाड़ दिया। कपड़े अलग किए और लोहार को उनके स्तन काटने का आदेश दिया। लोहार ने तुरंत ब्रेस्ट रिपर लिया और उसके दाहिने शरीर को कुचलने लगा। बर्बरता यहीं नहीं रुकी, जेलर ने उनकी गर्दन पकड़ ली और कहा कि मैं आपके दोनों 'हिस्सों" को उनके स्थान से अलग कर दूँगा।
उन्होंने आगे बर्बर मुस्कान के साथ कहा गनीमत है "ये ब्रेस्ट रिपर गर्म नहीं हुआ है वरना आपके ब्रेस्ट पहले ही कट चुके होते"। नीरा आर्य ने अपने जीवन के अंतिम दिन फूल बेचने में बिताए और वह फलकनुमा, भाग्य नगरम में एक छोटी सी झोपड़ी में रहती थीं। सरकार ने उनकी झोपड़ी को सरकारी जमीन पर बनाने का आरोप लगाते हुए गिरा दिया।
नीरा आर्य की मृत्यु २६-०७- १९९८ को एक बेसहारा, लावारिस, अनजानी के रूप में हुई, जिसके लिए पूरी पृथ्वी पर कोई रोने वाला तक नहीं था।
***
लीलावती
गणितज्ञ लीलावती का नाम हममें से अधिकांश लोगों ने नहीं सुना है। उनके बारे में कहा जाता है कि वो पेड़ के पत्ते तक गिन लेती थी। आज यूरोप सहित विश्व के सैंकड़ो देश जिस गणित की पुस्तक से गणित को पढ़ा रहे हैं, उसकी रचयिता भारत की एक महान गणितज्ञ महर्षि भास्कराचार्य की पुत्री “लीलावती” है।
दसवीं सदी की बात है, दक्षिण भारत में भास्कराचार्य नामक गणित और ज्योतिष विद्या के एक बहुत बड़े पंडित थे। उनकी कन्या का नाम लीलावती था। वही उनकी एकमात्र संतान थी। उन्होंने ज्योतिष की गणना से जान लिया कि वह विवाह के थोड़े दिनों के ही बाद विधवा हो जाएगी। उन्होंने बहुत कुछ सोचने के बाद ऐसा लग्न खोज निकाला, जिसमें विवाह होने पर कन्या विधवा न हो। विवाह की तिथि निश्चित हो गई। जलघड़ी से ही समय देखने का काम लिया जाता था।
एक बड़े कटोरे में छोटा-सा छेद कर पानी के घड़े में छोड़ दिया जाता था। सूराख के पानी से जब कटोरा भर जाता और पानी में डूब जाता था, तब एक घड़ी होती थी। कहते हैं अपने मन कुछ और है, कर्ता के कुछ और, होनी होकर ही रहती है। लीलावती सोलह श्रृंगार किए सजकर बैठी थी, सब लोग उस शुभ लग्न की प्रतीक्षा कर रहे थे कि एक मोती लीलावती के आभूषण से टूटकर कटोरे में गिर पड़ा और सूराख बंद हो गया; शुभ लग्न बीत गया और किसी को पता तक न चला।
विवाह दूसरे लग्न पर ही करना पड़ा। लीलावती विधवा हो गई, पिता और पुत्री के धैर्य का बांध टूट गया। लीलावती अपने पिता के घर में ही रहने लगी। पुत्री का वैधव्य-दु:ख दूर करने के लिए भास्कराचार्य ने उसे गणित पढ़ाना आरंभ किया। उसने भी गणित के अध्ययन में ही शेष जीवन की उपयोगिता समझी। थोड़े ही दिनों में वह उक्त विषय में पूर्ण पंडिता हो गई। पाटी-गणित, बीजगणित और ज्योतिष विषय का एक ग्रंथ ‘सिद्धांतशिरोमणि’ भास्कराचार्य ने बनाया है। इसमें गणित का अधिकांश भाग लीलावती की रचना है।
पाटीगणित के अंश का नाम ही भास्कराचार्य ने अपनी कन्या को अमर कर देने के लिए ‘लीलावती’ रखा है। भास्कराचार्य ने अपनी बेटी लीलावती को गणित सिखाने के लिए गणित के ऐसे सूत्र निकाले थे जो काव्य में होते थे। वे सूत्र कंठस्थ करना होते थे। उसके बाद उन सूत्रों का उपयोग करके गणित के प्रश्न हल करवाए जाते थे। कंठस्थ करने के पहले भास्कराचार्य लीलावती को सरल भाषा में, धीरे-धीरे समझा देते थे। वे बच्ची को प्यार से संबोधित करते चलते थे, “हिरन जैसे नयनों वाली प्यारी बिटिया लीलावती, ये जो सूत्र हैं…।” बेटी को पढ़ाने की इसी शैली का उपयोग करके भास्कराचार्य ने गणित का एक महान ग्रंथ लिखा, उस ग्रंथ का नाम ही उन्होंने “लीलावती” रख दिया।
आजकल गणित एक शुष्क विषय माना जाता है पर भास्कराचार्य का ग्रंथ ‘लीलावती‘ गणित को भी आनंद के साथ मनोरंजन, जिज्ञासा आदि का सम्मिश्रण करते हुए कैसे पढ़ाया जा सकता है। लीलावती का एक उदाहरण देखें- ‘निर्मल कमलों के एक समूह के तृतीयांश, पंचमांश तथा षष्ठमांश से क्रमश: शिव, विष्णु और सूर्य की पूजा की, चतुर्थांश से पार्वती की और शेष छ: कमलों से गुरु चरणों की पूजा की गई।
अये, बाले लीलावती, शीघ्र बता कि उस कमल समूह में कुल कितने फूल थे..?‘
उत्तर-कमल के १२० फूल।
वर्ग और घन को समझाते हुए भास्कराचार्य कहते हैं ‘अये बाले,लीलावती, वर्गाकार क्षेत्र और उसका क्षेत्रफल वर्ग कहलाता है। दो समान संख्याओं का गुणन भी वर्ग कहलाता है। इसी प्रकार तीन समान संख्याओं का गुणनफल घन है और बारह कोष्ठों और समान भुजाओं वाला ठोस भी घन है।‘
‘मूल” शब्द संस्कृत में पेड़ या पौधे की जड़ के अर्थ में या व्यापक रूप में किसी वस्तु के कारण, उद्गम अर्थ में प्रयुक्त होता है। इसलिए प्राचीन गणित में वर्ग मूल का अर्थ था ‘वर्ग का कारण या उद्गम अर्थात् वर्ग एक भुजा‘।
इसी प्रकार घनमूल का अर्थ भी समझा जा सकता है। वर्ग तथा घनमूल निकालने की अनेक विधियां प्रचलित थीं।
लीलावती के प्रश्नों का जबाब देने के क्रम में ही “सिद्धान्त शिरोमणि” नामक एक विशाल ग्रन्थ लिखा गया, जिसके चार भाग हैं- (१) लीलावती (२) बीजगणित (३) ग्रह गणिताध्याय और (४) गोलाध्याय।
‘लीलावती’ में बड़े ही सरल और काव्यात्मक तरीके से गणित और खगोल शास्त्र के सूत्रों को समझाया गया है।
बादशाह अकबर के दरबार के विद्वान फैजी ने सन् १५६७ में “लीलावती” का फारसी भाषा में अनुवाद किया। अंग्रेजी में “लीलावती” का पहला अनुवाद जे. वेलर ने सन् १७१६ में किया। कुछ समय पहले तक भी भारत में कई शिक्षक गणित को दोहों में पढ़ाते थे। जैसे कि पन्द्रह का पहाड़ा…तिया पैंतालीस, चौके साठ, छक्के नब्बे… अट्ठ बीसा, नौ पैंतीसा…।
इसी तरह कैलेंडर याद करवाने का तरीका भी पद्यमय सूत्र में था-
सित अप जू नव तीस के, बाकी के इकतीस।
अट्ठाइस की फरवरी चौथे सन उनतीस।।
गणित अपने पिता से सीखने के बाद लीलावती भी एक महान गणितज्ञ एवं खगोल शास्त्री के रूप में जानी गयी। मनुष्य के मरने पर उसकी कीर्ति ही रह जाती है। आज गणितज्ञो को गणित के प्रचार और प्रसार के क्षेत्र में "लीलावती पुरूस्कार" से सम्मानित किया जाता है।
***
शिव पूजन
शिवलिंग पर बेलपत्र, धतूरा, चंदन और अक्षत चढ़ाने से शंकर भगवान जल्दी प्रसन्न होते हैं।शिव पुराण के अनुसार किस द्रव्य से अभिषेक करने से क्या फल मिलता है? जानिए-
जल से रुद्राभिषेक करने पर वृष्टि होती है।
- कुशा जल से अभिषेक करने पर रोग व दु:ख से छुटकारा मिलता है।
- दही से अभिषेक करने पर पशु, भवन तथा वाहन की प्राप्ति होती है।
- गन्ने के रस से अभिषेक करने पर लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।
- मधुयुक्त जल से अभिषेक करने पर धनवृद्धि होती है।
- तीर्थ जल से अभिषेक करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है।
- इत्र मिले जल से अभिषेक करने से रोग नष्ट होते हैं।
- दूध से अभिषेक करने से पुत्र प्राप्ति होगी। प्रमेह रोग की शांति तथा मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
- गंगा जल से अभिषेक करने से ज्वर ठीक हो जाता है।
- दूध-शर्करा मिश्रित अभिषेक करने से सद्बुद्धि की प्राप्ति होती है।
- घी से अभिषेक करने से वंश विस्तार होता है।
१२-३-२०२२
***
मुक्तक
सूरज चमक रहा माथे पर, बिखरी धूप कपोलों पर
नव विचार कर रहे सवारी, बहते पवन-झकोरों पर
शांत सलिल में बिंबित रवि-छवि, लहर-लहर सिंदूरी कर
कांति नई पाकर कांता से, हो कविता दृग-कोरों पर
*
क्षणिका
*
जानेमन
अब तक रही
क्यों दुश्मने-जां हो गई?
चैन उसके बिन न था
बेचैनियाँ क्यों बो रही?
आस मेरी
प्यास मेरी
श्वास की दुश्मन बनी
हास को छोड़ा नहीं
संत्रास फिर-फिर बो गई।
*
अठ सलल सवैया
११२-११२-११२-११२-११२-११२-११२-११२-११
*
जय हिंद कहें, सब संग रहें, हँस हाथ गहें, मिल जीत वरें हम
अरि जूझ थकें, हथियार धरें, अरमान यही, कबहूँ न डरें हम
मत-भेद भले, मन-भेद नहीं, हम एक रहे, सच नेक रहें हम
अरि मार सकें, रण जीत तरें, हँस स्वर्ग वरें, मर के न मरें हम
१२-३-२०१९
***
नवगीत:
सरहद
*
तुम
स्वीकार सकीं मुझको
जब, सरहद पार
गया मैं लेने।
*
उठा हुआ सर
हद के पार
चला आया तब
अनजाने का
हाथ थाम कर।
मैं बहुतों के
साथ गया था
तुम आईं थीं
निपट अकेली।
किन्तु अकेली
कभी नहीं थीं,
सँग आईं
बचपन-यौवन की
यादें अनगिन।
तुम
स्वीकार सकीं मुझको
जब, पहुँच गया
मैं खुद को देने।
*
था दहेज भी
मैके की
शुभ परम्पराओं
शिक्षा, सद्गुण,
संस्कार का।
ले पतवारें
अपनेपन की
नाव हमें थी
मिलकर खेनी।
मतभेदों की
खाई, अंतरों के
पर्वत लँघ
मधुर मिलन के
सपने बुन-बुन।
तुम
स्वीकार सकीं मुझको
जब, संग हुए हम
अंतर खोने।
*
खुद को खोकर
खुद को पाकर
कही कहानी
मन से मन ने,
नित मन ही मन।
खन-खन कंगन
रुनझुन पायल
केश मोगरा
लटें चमेली।
शंख-प्रार्थना
दीप्ति-आरती
सांध्य-वंदना ,
भुवन भारती
हँसी कीर्ति बन।
तुम
स्वीकार सकीं मुझको
जब, मिली राजश्री
सार्थक होने।
*
भवसागर की
बाधाओं को
मिल-जुलकर
था हमने झेला
धैर्य धारकर।
सावन-फागुन
खुशियाँ लाये
सोहर गूँजे
बजी ढोलकी।
किलकारी
पट्टी पूजन कर,
धरा नापने
नभ को छूने
बढ़ी कदम बन।
तुम
स्वीकार सकीं मुझको
जब, अँगना खेले
मूर्त खिलौने।
*
देख आँख पर
चश्मे की
मोहिनी हँसे हम,
धवल केश की
आभा देखें।
नव पीढ़ी
दौड़े, हम थकते
शांति अंजुला
हुई सहेली।
अन्नपूर्णा
कम साधन से
अधिक लक्ष्य पा
अर्थशास्त्र को
करतीं सार्थक।
तुम
स्वीकार सकीं मुझको
जब, सपने देखे
संग सलोने।
१२-३-२०१६
***
छंद सलिला:
भव छंद
*
लक्षण: जाति रौद्र, पद २, चरण ४, प्रति चरण मात्रा ११, चरणान्त लघु गुरु गुरु या गुरु
लक्षण छंद:
एकादश पग रखो, भवसिंधु पार करो
चरण आदि मन चाहा, चरण अंत गुरु से हो
उदाहरण:
१. आशा का बीज बो, कोशिश से फसल लो
श्रम सीकर नर्मदा, भव तारें वर्मदा
२. सूर्य चन्द्र सितारा, सकल जगत निखारा
भव को जब निहारा, खुद को भी बिसारा
रूप-रंग सँवारा, असुंदर न गवारा
सच जिसने बिसारा, रण न लड़ रण हारा
३. समय शिला पर लिखो, सबसे आगे दिखो
शब्द नये उकेरो, नव उजास बिखेरो
४. नित्य हरि गुण गाओ, मन में शांति पाओ
छन्दों में मन रमा, कष्टों को दो भुला
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, ककुभ, कीर्ति, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, छवि, जाया, तांडव, तोमर, दीप, दोधक, नित, निधि, प्रदोष, प्रेमा, बाला, भव, मधुभार, मनहरण घनाक्षरी, माया, माला, ऋद्धि, रामा, लीला, वाणी, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शिव, शुभगति, सार, सिद्धि, सुगति, सुजान, हंसी)
१२-३-२०१४
***
नव गीत:
ऊषा को लिए बाँह में
*
ऊषा को लिए बाँह में,
संध्या को चाह में.
सूरज सुलग रहा है-
रजनी के दाह में...
*
पानी के बुलबुलों सी
आशाएँ पल रहीं.
इच्छाएँ हौसलों को
दिन-रात छल रहीं.
पग थक रहे, मंजिल
कहीं पाई न राह में.
सूरज सुलग रहा है-
रजनी के दाह में...
*
तृष्णाएँ खुद ही अपने
हैं हाथ मल रहीं.
छायाएँ तज आधार को
चुपचाप ढल रहीं.
मोती को रहे खोजते
पाया न थाह में.
सूरज सुलग रहा है-
रजनी के दाह में...
*
शिशु शशि शशीश शीश पर
शशिमुखी विलोकती.
रति-मति रतीश-नाश को
किस तरह रोकती?
महाकाल ही रक्षा करें
लेकर पनाह में.
सूरज सुलग रहा है-
रजनी के दाह में...
***
कुण्डलिया
*
हिंदी की जय बोलिए, हो हिंदीमय आप.
हिंदी में नित कार्य कर, सकें विश्व में व्याप..
सकें विश्व में व्याप, नाप लें सकल ज्ञान का.
नहीं व्यक्ति का, बिंदु 'सलिल' राष्ट्रीय आन का..
नेह-नरमदा नहा बोलिए होकर निर्भय.
दिग्दिगंत में गूँज उठे, फिर हिंदी की जय..
१२-३-२०१०
***

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

२८ फरवरी,राम किंकर,सॉनेट,मुक्तक,मौली,बुंदेली, सरस्वती,हास्य,मुक्तिका, सुमित्र

सृजन २८ फरवरी
*
स्मरण युग तुलसी ३
आरती
आरती करें गुरुवर की करें, हनुमंत संग रघुवर की।
आरती करें गुरुवर की...
जन्म नर्मदा तट पर पाया, हनुमत ने आ पंथ दिखाया।
सिया-राम गुण निशि-दिन गाया, बंधन कोई रोक न पाया।।
सफल साधना पूर्ण कामना मिली कृपा शंकर की।
आरती करो गुरुवर की...
नाम राम किंकर शुभ पाया, तुलसी मानस हृदय बसाया।
शब्द-शब्द का अर्थ बताया, जन-गण पग-रज पाने धाया।
भिन्न राम ना, अलग श्याम ना, ऐक्य दृष्टि सुंदर की।
आरती करो गुरुवर की...
आत्मजयी सुत प्रभु मन भाया, प्रवचन सुनने पास बुलाया।
अवधपुरी प्रभुधाम सुहाया, आत्मदेव परमात्म मिलाया।
पुण्य पावना भक्ति भावना, युगतुलसी मनहर की।
आरती करो गुरुवर की...
२८.२.२०२४
•••
सॉनेट
माणिक जब बन गया मुसाफिर
मिला जवाहर तरुण अचानक
कृष्ण पथिक कर पकड़े फिर-फिर
दे गोपाल मधुर छवि अनथक
रोटी-कमल द्वार पर सोहे
हेमलता का मधुर हास जब
संगीता होकर मन मोहे
नवनीता अस्मिता आस तब
आस्था के शतदल शत महके
यादों के पलाश हँसते हैं
मिल यात्राओं की तलाश में
ज्वाल गीत गा पग बढ़ते हैं
तमसा के दिन करो नमन
तमसा के दिनकरो नमन
●●●
मुक्तक
जय जयंत की बोलिए जय का कभी न अंत हो
बन बसंत हँस डोलिए रंग कुसुम्बी संत हो
बरस बरस रस कह रहा तरस नहीं डूब जा
बाहर क्यों खोजता है विदेह देह-कन्त हो
●●●
पद
मौली पा मयूर मन नाचे
करे अर्चना मीरा मधु निशि, कांत कल्पना क्षिप्रा बाँचे
सदा शुभागत हो प्रबोध, पंकज पीयूष पान कर छककर
हो सुरेश शशिकांत तथागत, तरुणा अरुणा रुके न थककर
नमन शिवानी विहँस प्रियंका, गरिमा करतल ध्वनि कर साँचे
मौली पा मयूर मन नाचे
●●●
बुंदेली सारद वंदना
सारद माँ! परनाम हमाओ।
नैया पार लगा दे रे।।
मूढ़ मगज कछु सीख नें पाओ।
तन्नक सीख सिखा दे रे।।
माई! बिराजीं जा परबत पै।
मैं कैसउ चढ़ पाऊँ ना।।
माई! बिराजीं स्याम सिला मा।
मैं मूरत गढ़ पाऊँ ना।।
ध्यान धरूँ आ दरसन देओ।
सुन्दर छबि दिखला दे रे।।
सारद माँ! परनाम हमाओ।
नैया पार लगा दे रे।।
मैया आखर मा पधराई।
मैं पोथी पढ़ पाऊँ ना।
मन मंदिर मा माँ पधराओ
तबआगे बढ़ पाऊँ ना।।
थाम अँगुरिया राह दिखाखें ।
मंज़िल तक पहुँचा दे रे।।
सारद माँ! परनाम हमाओ।
नैया पार लगा दे रे।।
●●●
सॉनेट
चूहे को पंजे में दाब शेर मुस्काए।
चीं-चीं कर चूहा चाहे निज जान बचाए।
शांति वार्ता का नाटक जग के मन भाए।।
बंदर झूल शाख पर जय-जयकार गुँजाए।।
'भैंस उसी की जिसकी लाठी' अटल सत्य है।
'माइट इज राइट' निर्बल ही पीटता आया।
महाबली जो करे वही होता सुकृत्य है।।
मानव का इतिहास गया है फिर दुहराया।।
मनमानी को मन की बात बताते नेता।
देश नहीं दल की जय-जय कर चमचे पाले।
जनवाणी जन की बातों पर ध्यान न देता।।
गुटबंदी सीता को दोषी बोल निकाले।।
निज करनी पर कहो बेशरम कब शरमाए।
चूहे को पंजे में दाब शेर मुस्काए।।
२८-२-२०२२
●●●
मुक्तिका
*
इसने मारा, उसने मारा
इंसानों को सबने मारा
हैवानों की है पौ बारा
शैतानों का जै-जैकारा
सरकारों नें आँखें मूँदीं
टी वी ने मारा चटखारा
नफरत द्वेष घृणा का फोड़ा
नेताओं ने मिल गुब्बारा
आम आदमी है मुश्किल में
खासों ने खुद को उपकारा
भाषणबाजों लानत तुम पर
भारत माता ने धिक्कारा
हाथ मिलाओ, गले लगाओ
अब न बहाओ आँसू खारा
२८-२-२०२०
●●●

सोमवार, 31 मार्च 2025

मार्च ३१, राम किंकर, सॉनेट, भवानी, बुंदेली, हास्य, लघुकथा, वैजंती, गीत

सलिल सृजन मार्च ३१
भक्ति गीत 
बजरंग बली! मेरे भारत को स्वर्गोपम  श्रेष्ठ बना देना। 
शिव-शिवा की लीला भूमि यही, श्रद्धा-विश्वास जगा देना।। 
.
हर सलिला पवन गंगा हो,हर कर में ध्वजा तिरंगा हो।
हर पर्वत हर-भर हो प्रभु!, हर मानव मन सत्संगा हो।।
आतंकवाद की लुटिया को , सागर में देव! गड़ा देना। 
बजरंग बली! मेरे भारत को स्वर्गोपम  श्रेष्ठ बना देना। 
भाषा-भूषा का द्वंद न हो, ित्योहार-पर्व बदरंग न हो। 
शासन जनहित का रक्षक हो, यौवन का लक्ष्य अनंग न हो।। 
घर-घर को सीता-रामालय,हे आंजनेय! बनवा देना। 
बजरंग बली! मेरे भारत को स्वर्गोपम  श्रेष्ठ बना देना। 
गोधन-गजधन की कमी नहो, तकनीक और विज्ञान बढ़े। 
ब्रज-रज पा तरने सुर आएँ , इसरो उन्नति सोपान चढ़े।। 
रामेश्वर पवन दिव्य छटा,हे पवनपुत्र! दिखला देना। 
बजरंग बली! मेरे भारत को स्वर्गोपम  श्रेष्ठ बना देना।  
भारत में ढाका-हिंगलाज, पशुपति देवालय आ जाए। 
कामाख्या मैया-सोमनाथ की जय जय जन-गण मिल गाए।। 
अठ सिद्धि नवों निधि से हनुमत!, भारत माँ को सजवा देना। 
बजरंग बली! मेरे भारत को स्वर्गोपम  श्रेष्ठ बना देना।  
.
हो चित्र गुप्त साकार सदा,हाथों से अपना भाग्य गढ़ें। 
साधन सफलहो हे कपीन्द्र!, सत्कर्म करें हम मुक्तिवरें।। 
अभिषेक करे नित ‘सलिल’ विहँस, पग-रज देकर अपना लेना। 
बजरंग बली! मेरे भारतको स्वर्गोपम  श्रेष्ठ बना देना। 
००० 
गीत 

विजय वैजयंती दिला, दे भव सागर तार। 
कान्हा का प्रिय पुष्प यह, बीज बने गलहार।। 
रक्त बहाता शत्रु का, अरि हो भय से पीत। 
मुक्ता मणि सम बीज हों, श्वेत दिलाते प्रीत।। 
चाहे उर पर वारिए, या पहनें भुजहार। 
विजय वैजयंती दिला, दे भव सागर तार।।
हरित पर्ण सुख वृद्धि कर, देते हैं धन धान्य। 
वैजंती धारण करे, जो वह हो सम्मान्य।। 
कृष्ण मित्र वत्सल हुए, कर कृष्णा उद्धार। 
विजय वैजयंती दिला, दे भव सागर तार।
किडनी को दे स्वस्थ कर, श्वास रोग भी दूर। 
वर्धक इम्युनिटी का, दे चेहरे को नूर।। 
वायु स्वच्छ कर देह का, करे मुफ्त उपचार। 
विजय वैजयंती दिला, दे भव सागर तार।। 
३१.३.२०२५ 
०००
स्मरण राम किंकर
*
सहज-सरल जीवन जिया, रहे राम में लीन।
प्रभु गुण वर्णन मगन हो, स्व को करें विलीन।।
*
सात्विक वृत्ति सदा रही, आडंबर से मुक्त।
राम नाम महिमा अगम, सुगम भक्ति से युक्त।।
*
वाक् विमल नर्मदा सी, बहा भक्ति रस धार।
श्रोताओं को मुग्ध कर, व्यक्त किए उद्गार।।
*
धोती-कुर्ता धवल शुचि, शाल-अंगरखा धार।
खादी-रेशम-ऊन प्रिय, करें सरल व्यवहार।।
*
तुलसी माला हाथ में, जप अनवरत अखंड।
पाप-ताप के शाप पर, वाक्-प्रहार प्रचंड।।
*
शैली शुचि संवाद मय, प्रश्नोत्तरी मन पैठ।
शंकाओं का शमन नित, करें संतजन बैठ।।
*
राम कथा संवाद सुन, शिव से शिवा प्रसन्न।
मानस में हो कथा शुभ, रहें राम आसन्न।।
*
मोती मिले न सतह पर, पाने गहरे डूब।
मानस मानस में बसे, रसानन्द दे खूब॥
*
शब्द-विधान न आप तक, सीमित रहता आप।
एक-दूसरे से जुड़े, व्याख्या, सत में व्याप।।
*
सिया-राम सर्वत्र हैं, लीन उन्हीं में सृष्टि।
करे विवेचन राम मय, निरासक्त हो दृष्टि।।
*
सी सत ईश्वर जानिए, ता तप आगम युक्त।
रा रम आत्म मधुर मृदुल, म मंथन उन्मुक्त।।
*
स्मरण युग तुलसी

रामकिंकर चरण वंदन नित करो मन।
बनो किंकर राम किंकर के तरो तन।।
है न आत्मा राम जिसमें कौन ऐसा?
सभी में वह, मत किसी से करो अनबन।।
नहीं छोटे-बड़े सम हैं प्राण सबके।
राख मुट्ठी भर न हम भू भवन कंचन।।
मत अकड़, कर प्रार्थना, वंदना चुप रह।
सत्य-शिव-सुंदर चयन कर आत्म साधन।।
राम ही हैं कृष्ण, शिव भी, ब्रह्म भी हैं।
नर्मदा बन करें मंदाकिनी दर्शन।।
३१.३.२०२४
•••
सॉनेट
भवानी

भोर भई आईं किरनें
मूँद न नैना जाग उठो।
टेर चिरैया मौन भई
धो मुँह मैया रे सपरो।।
आ पटियाँ दूँ पार जरा
लो गुड़ रोटी भोग लगा
छाछ पिओ जीरा बघरा
गौ बछड़े को रोट खिला।।
झाँक चिरैया टेर रही
जा कुछ दाने तो बिखरा
दे हमको छैंया अपनी
मातु भवानी आ अँगना।।
माँ न बिसारो, हो बिटिया
वास करो मोरे मन मां।।
३१-३-२०२२
•••
सॉनेट
(लय सूत्र : जभभ गल)

जगा दिया तुमने झकझोर।
कहाँ चले सजना मुँह मोड़।
चुरा लिया चित ही चितचोर।।
फिरा रहे अँखियाँ दिल तोड़।।
सुनो हुआ मन भाव विभोर।
गले मिलो, कर दो मत छोड़।
छिपा रखी छवि श्याम अँजोर।।
नहीं किसी सँग है कुछ होड़।।
लुको-छिपो मत, छोड़ न डोर।
छलो नहीं, छलिया रणछोड़।
हरो सभी तम, दो कर भोर।।
सदा रहे तुमसे गठजोड़।।
रहें बसी मन साथ किशोर।
लली न भूल, न हीं मुँह मोड़।।
३१-३-२०२२
•••
बुंदेली हास्य रचना:
उल्लू उवाच
*
मुतके दिन मा जब दिखो, हमखों उल्लू एक.
हमने पूछी: "कित हते बिलमे? बोलो नेंक"
बा बोलो: "मुतके इते करते रैत पढ़ाई.
दो रोटी दे नई सके, बो सिच्छा मन भाई.
बिन्सें ज्यादा बड़े हैं उल्लू जो लें क्लास.
इनसें सोई ज्यादा बड़े, धरें परिच्छा खास.
इनसें बड़े निकालते पेपर करते लीक.
औरई बड़े खरीदते कैते धंधा ठीक.
करें परीच्छा कैंसिल बिन्सें बड़े तपाक.
टीवी पे इनसें बड़े, बैठ भौंकते आप.
बिन्सें बड़े करा रए लीक काण्ड की जाँच.
फिर से लेंगे परिच्छा, और बड़े रए बाँच
इतने उल्लुन बीच में अपनी का औकात?
एई काजे लुके रए, जान बचाखें भ्रात.
***
हास्य रचना
भोर भई शुभ, पड़ोसन हिला रही थी हाथ
देख मुदित मन हो गया, तना गर्व से माथ
तना गर्व से माथ, हिलाते हाथ रहे हम
घरवाली ने होली पर, था फोड़ दिया बम
निर्ममता से तोड़ दिल, बोल रही थी साँच
'तुम्हें नहीं वह हेरती, पोंछे खिड़की- काँच'
*
दोहा सलिला
(अभिनव प्रयोग - सतचरणी दोहा)
छाया की काया नहीं, पर माया बेजोड़
हटे शीश से तब लगे, पाने खातिर होड़
किसी के हाथ न आती
उजाला सखा सँगाती
तिमिर को धता बताती
*
गुझिया खा मीना कहें, मी ना कोई और
सीख यही इतिहास की, तन्नक करिए गौर
परीक्षार्थी हों गुरु जब
परीक्षाफल नकली तब
देखते भौंचक हो सब
*
करता शोक अशोक नित, तमचर है आलोक
लछमीपति दर दर फिरे, जनपथ पर है रोक
विपक्षी मुक्त देश हो
तर्क कुछ नहीं शेष हो
प्रैस चारण विशेष हो
*
रंग उड़ गया देखकर, बीबी का मुख लाल
रंग जम गया जब मिली, साली लिए गुलाल
रँगे सरहज मूँ कारा
भई बिनकी पौ बारा
कि बोलो सा रा रा रा
*
उषा दुपहरी साँझ सँग, सूरज करता डेट
थक वसुधा को सुमिरता, रजनी शैया लेट
नमन फिर भी जग करता
३१-३-२०२१
***
लघुकथा
सन्नाटा
*
घन् घन्, टन् टन्, ठक् ठक्, पों पों... सुबह से शाम तक आवाजें ही आवाजें।
चौराहे के केंद्र में खड़ी वह पूरी ताकत के साथ सीटी बजाती पर शोरगुल में सीटी की आवाज दबकर रह जाती।
बचपन से बाँसुरी की धुन उसे बहुत पसंद थी। श्रीकृष्ण जी के बाँसुरीवादन के प्रभाव के बारे में पढ़ा था। हरिप्रसाद चौरसिया जी का बाँसुरी वादन सुनती तो मन शांति अनुभव करता।
यातायात पुलिस में शहर के व्यस्ततम चौराहे पर घंटों रुकने-बढ़ने का संकेत देने से हुई थकान वह सहज ही सह लेती पर असहनीय हो जाता था सैंकड़ों वाहनों के रुकने-चलने, हॉर्न देने का शोर सहन कर पाना। बहुधा कानों में रुई लगा लेती पर वह भी बेमानी हो जाती।
अकस्मात कोरोना महामारी का प्रकोप हुआ। माननीय प्रधानमंत्री जी के चाहे अनुसार शहरवासी घरों में बंद हो गए। वह चौराहे के आसपास के इलाके में कानून-व्यवस्था का पालन करा रही है कि कोई अकारण बाहर न घूमे। अब तक शोर से परेशान उसे याद आ रहे हैं पिछले दिन और असहनीय प्रतीत हो रहा है सन्नाटा।
३१-३-२०२०
***
सामयिक रचना
भक्तों से सावधान
*
जो दुश्मन देश के, निश्चय ही हारेंगे
दिख रहे विरोधी जो वे भी ना मारेंगे
जो तटस्थ-गुरुजन हैं, वे ही तो तारेंगे
मुट्ठी में कब किसके, बँधता है आसमान
भक्तों से सावधान
*
देशभक्ति नारा है, आडंबर प्यारा है
सेना का शौर्य भी स्वार्थों पर वारा है
मनमानी व्याख्या कर सत्य को बुहारा है
जो सहमत केवल वे, हैं इनको मानदान
भक्तों से सावधान
*
अनुशासन तुम चाहो, ये पल-पल तोड़ेंगे
शासन की वल्गाएँ स्वार्थ हेतु मोड़ेंगे
गाली गुस्सा नफरत, हिंसा नहिं छोड़ेंगे
कंधे पर विक्रम के लदे लगें भासमान
भक्तों से सावधान
३१.३.२०१९
***
नव गीत
*
अरिहंत
करते अंत
किसका?
अरि कौन?
अपना अहं?
संचय वृत्ति?
मोह-माया?
स्वार्थ?
इन्द्रियाँ?
जिन्होंने नहीं जीता
एक भी अरि,
वह कैसे अनुयायी हुआ
महावीर का?
सिर्फ इसलिए
कि उसने
जैन नामधारी
परिवार में जन्म लिया.
इन्द्रियों को
जीतकर भी,
अरिओं का
अंत करने के बाद भी
दूसरा नहीं हो सका जैन
क्योंकि उसके जनक
नहीं थे जैन.
कितना उचित
कौन करे परिभाषित?
३१-३-२०१८
***
समीक्षा
यह ‘काल है संक्रांति का’
- राजेंद्र वर्मा
गद्य-पद्य की विभिन्न विधाओं में निरंतर सृजनरत और हिंदी भाषा के व्याकरण तथा पिंगल के अधिकारी विद्वान आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ने खड़ी हिंदी के समांतर बुंदेली, ब्रज, भोजपुरी, अवधी, छत्तीसगढ़ी, मालवी, निमाड़ी, राजस्थानी, हरियाणवी, सिरायकी तथा अंग्रेजी में भी लेखन किया है। अपनी बुआश्री महीयसी महादेवी जी तथा माताजी कवयित्री शांति देवी को साहित्य व भाषा-प्रेम की प्रेरणा माननेवाले ‘सलिल’ जी आभासी दुनिया में भी वे अपनी सतत और गंभीर उपस्थिति से हिंदी के साहित्यिक पाठकों को लाभान्वित करते रहे हैं। गीत, नवगीत, ग़ज़ल और कविता के लेखन में छंद की प्रासंगिकता और उसके व्याकरण पर भी उन्होंने अपेक्षित प्रकाश डाला है। रस-छंद- अलंकारों पर उनका विशद ज्ञान लेखों के माध्यम से हिंदी संसार को लाभान्वित करता रहा है। वस्तु की दृष्टि से शायद ही कोई ऐसा विषय हो जो उनकी लेखनी से अछूता रहा हो- भले ही वह गीत हो, कविता हो अथवा लेख! नवीन विषयों पर पकड़ के साथ-साथ उनकी रचनाओं में विशद जीवनानुभव बोलता-बतियाता है और पाठकों-श्रोताओं में संजीवनी भरता है।
‘काल है संक्रांति का’ संजीव जी का नवीनतम गीत-संग्रह है जिसमें ६५ गीत-नवगीत हैं। जनवरी २०१४ से मार्च २०१६ के मध्य रचे गये ये गीत शिल्प और विषय, दोनों में बेजोड़ हैं। संग्रह में लोकगीत, सोहर, हरगीतिका, आल्हा, दोहा, दोहा-सोरठा मिश्रित, सार आदि नए-पुराने छंदों में सुगठित ये गीति-रचनाएँ कलात्मक अभिव्यक्ति में सामयिक विसंगतियों और विद्रूपताओं की ख़बर लेते हुए आम आदमी की पीड़ा और उसके संघर्ष-संकल्प को जगर-मगर करती चलती हैं। नवगीत की शक्ति को पहचानकर शिल्प और वास्तु में अधिकाधिक सामंजस्य बिठाकर यथार्थवादी भूमि पर रचनाकार ने आस-पास घटित हो रहे अघट को कभी सपाट, तो कभी प्रतीकों और मिथकों के माध्यम से उद्घाटित किया है। विसंगतियों के विश्लेषण और वर्णित समस्या का समाधान प्रस्तुत करते अधिकांश गीत टटकी भाव-भंगिमा दर्शाते हैं। बिम्ब-प्रतीक, भाषा और टेक्नीक के स्तरों पर नवता का संचार करते हैं। इनमें ऐंद्रिक भाव भी हैं, पर रचनाकार तटस्थ भाव से चराचर जगत को सत्यम्-शिवम्- सुन्दरम् के वैचारिक पुष्पों से सजाता है।
शीर्षक गीत, ‘काल है संक्रांति का’ में मानवीय मूल्यों और प्राची के परिवेश से च्युत हो रहे समाज को सही दिशा देने के उद्देश्य से नवगीतकार, सूरज के माध्यम से उद्बोधन देता है। यह सूरज आसमान में निकलने वाला सूरज ही नहीं, वह शिक्षा, साहित्य, विज्ञान आदि क्षेत्रों के पुरोधा भी हो सकते हैं जिन पर दिग्दर्शन का उत्तरदायित्व है—
काल है संक्रांति का / तुम मत थको सूरज!
दक्षिणायन की हवाएँ / कँपाती हैं हाड़
जड़ गँवा, जड़ युवा पीढ़ी / काटती है झाड़
प्रथा की चूनर न भाती / फेंकती है फाड़
स्वभाषा को भूल, इंग्लिश / से लड़ाती लाड़
टाल दो दिग्भ्रांति को / तुम मत रुको सूरज!
.......
प्राच्य पर पाश्चात्य का / अब चढ़ गया है रंग
कौन, किसको सम्हाले / पी रखी मद की भंग
शराफत को शरारत / नित कर रही है तंग
मनुज-करनी देखकर है / ख़ुद नियति भी दंग
तिमिर को लड़, जीतना / तुम मत चुको सूरज! (पृ.१६)
एक अन्य गीत, ‘संक्रांति काल है’ में रचनाकार व्यंग्य को हथियार बनाता है। सत्ता व्यवस्था में बैठे लोगों से अब किसी भले काम की आशा ही नहीं रही, अतः गीतकार वक्रोक्ति का सहारा लेता है-
प्रतिनिधि होकर जन से दूर / आँखे रहते भी हो सूर
संसद हो चौपालों पर / राजनीति तज दे तंदूर
अब भ्रान्ति टाल दो / जगो, उठो!
अथवा,
सूरज को ढाँके बादल / सीमा पर सैनिक घायल
नाग-साँप फिर साथ हुए / गुँजा रहे बंसी-मादल
झट छिपा माल दो / जगो, उठो!
गीतकार सत्ताधीशों की ही खबर नहीं लेता, वह हममें-आपमें बैठे चिन्तक-सर्जक पर भी व्यंग्य करता है; क्योंकि आज सत्ता और सर्जना में दुरभिसंधि की उपस्थिति किसी से छिपी नहीं हैं--
नवता भरकर गीतों में / जन-आक्रोश पलीतों में
हाथ सेंक ले कवि, तू भी / जी ले आज अतीतों में
मत खींच खाल दो / जगो, उठो! (पृ.२०)
शिक्षा जीवन की रीढ़ है। इसके बिना आदमी पंगु है, दुर्बल है और आसानी से ठगा जाता है। गीतकार ने सूरज (जो प्रकाश देने का कार्य करता है) को पढने का आह्वान किया है, क्योंकि जब तक ज्ञान का प्रकाश नहीं फैलता है, तब तक किसी भी प्रकार के विकास या उन्नयन की बात निरर्थक है। सन्देश रचने और अभिव्यक्त करने में रचनाकार का प्रयोग अद्भुत है—
सूरज बबुआ! / चल स्कूल।
धरती माँ की मीठी लोरी / सुनकर मस्ती ख़ूब करी।
बहिन उषा को गिरा दिया / तो पिता गगन से डाँट पड़ी।
धूप बुआ ने लपक चुपाया
पछुआ लायी बस्ता-फूल।
......
चिड़िया साथ फुदकती जाती / कोयल से शिशु गीत सुनो।
‘इकनी एक’ सिखाता तोता / ’अ’ अनार का याद रखो।
संध्या पतंग उड़ा, तिल-लडुआ
खा, पर सबक़ न भूल। (पृ.३५)
परिवर्तन प्रकृति का नियम है। नव वर्ष का आगमन हर्षोल्लास लाता है और मानव को मानवता के पक्ष में कुछ संकल्प लेने का अवसर भी, पर हममें से अधिकांश की अन्यमनस्कता इस अवसर का लाभ नहीं उठा पाती। ‘सलिल’ जी दार्शनिक भाव से रचना प्रस्तुत करते हैं जो पाठक पर अन्दर-ही- अन्दर आंदोलित करती चलती है—
नये साल को/आना है तो आएगा ही।
करो नमस्ते या मुँह फेरो।
सुख में भूलो, दुख में टेरो।
अपने सुर में गायेगा ही/नये साल...।
एक-दूसरे को ही मारो।
या फिर, गले लगा मुस्काओ।
दर्पण छवि दिखलायेगा ही/नये साल...।
चाह, न मिटना, तो ख़ुद सुधरो।
या कोसो जिस-तिस को ससुरो!
अपना राग सुनायेगा ही/नये साल...। (पृ.४७)
विषयवस्तु में विविधता और उसकी प्रस्तुति में नवीनता तो है ही, उनके शिल्प में, विशेषतः छंदों को लेकर रचनाकार ने अनेक अभिनव प्रयोग किये हैं, जो रेखांकित किये जाने योग्य हैं। कुछ उद्धरण देखिए—
सुन्दरिये मुन्दरिये, होय!
सब मिल कविता करिये होय!
कौन किसी का प्यारा होय!
स्वार्थ सभी का न्यारा होय!
जनता का रखवाला होय!
नेता तभी दुलारा होय!
झूठी लड़ै लड़ाई होय!
भीतर करें मिताई होय!
.....
हिंदी मैया निरभै होय!
भारत माता की जै होय! (पृ.४९)
उपर्युक्त रचना पंजाब में लोहड़ी पर्व पर राय अब्दुल्ला खान भट्टी उर्फ़ दुल्ला भट्टी को याद कर गाये जानेवाले लोकगीत की तर्ज़ पर है। इसी प्रकार निम्नलिखित रचना बुन्देली लोककवि ईसुरी की चौकड़िया फागों (पद भार१६/१२) पर आधारित है। दोनों ही गीतों की वस्तु में युगबोध उमगता हुआ दिखता है—
मिलती काय नें ऊँचीवारी / कुर्सी हमको गुइयाँ!
हमखों बिसरत नहीं बिसारे / अपनी मन्नत प्यारी
जुलुस, विसाल भीर जयकारा / सुविधा संसद न्यारी
मिल जाती, मन की कै लेते / रिश्वत ले-दे भइया!
......
कौनउ सगो हमारो नैयाँ / का काऊ से काने?
अपने दस पीढ़ी खें लाने / हमें जोड़ रख जानें।
बना लई सोने की लंका / ठेंगे पे राम-रमैया! (पृ.५१)
इसी छंद में एक गीत है, ‘जब लौं आग’, जिसमें कवि ने लोक की भाषा में सुन्दर उद्बोधन दिया है। कुछ पंक्तियाँ देखें—
जब लौं आग न बरिहै, तब लौं / ना मिटिहै अन्धेरा!
सबऊ करो कोसिस मिर-जुर खें / बन सूरज पगफेरा।
......
गोड़-तोड़ हम फ़सल उगा रए / लूट रए व्यापारी।
जन के धन से तनखा पा खें / रौंद रए अधिकारी।
जागो, बनो मसाल / नई तो / घेरे तुमै / अँधेरा! (पृ.६४)
गीत ‘सच की अरथी’ (पृ.55) दोहा छंद में है, तो अगले गीत, ‘दर्पण का दिल’ का मुखड़ा दोहे छंद में है और उसके अंतरे सोरठे में हैं, तथापि गीत के ठाठ में कोई कमी नहीं आयी है। कुछ अंश देखिए—
दर्पण का दिल देखता, कहिए, जब में कौन?
आप न कहता हाल, भले रहे दिल सिसकता।
करता नहीं ख़याल, नयन कौन-सा फड़कता!
सबकी नज़र उतारता, लेकर राई-नौन! (पृ.५७)
छंद-प्रयोग की दृष्टि से पृष्ठ ५९, ६१ और ६२ पर छोटे-छोटे अंतरों के गीत ‘हरगीतिका’ में होने के कारण पाठक का ध्यान खींचते हैं। एक रचनांश का आनंद लीजिए—
करना सदा, वह जो सही।
........
हर शूल ले, हँस फूल दे
यदि भूल हो, मत तूल दे
नद-कूल को पग-धूल दे
कस चूल दे, मत मूल दे
रहना सदा, वह जो सही। (पृ.६२)
सत्ता में बैठे छद्म समाजवादी और घोटालेबाजों की कमी नहीं है। गीतकार ने ऐसे लोगों पर प्रहार करने में कसर नहीं छोड़ी है—
बग्घी बैठा / बन सामंती समाजवादी।
हिन्दू-मुस्लिम की लड़वाये
अस्मत की धज्जियाँ उड़ाये
आँसू, सिसकी, चीखें, नारे
आश्वासन कथरी लाशों पर
सत्ता पाकर / उढ़ा रहा है समाजवादी! (पृ.७६)
देश में तमाम तरक्क़ी के बावजूद दिहाड़ी मज़दूरों की हालत ज्यों-की- त्यों है। यह ऐसा क्षेत्र है जिसके संगठितहोने की चर्चा भी नहीं होती, परिणाम यह कि मजदूर को जब शाम को दिहाड़ी मिलती है, वह खाने-पीने के सामान और जीवन के राग को संभालने-सहेजने के उपक्रमों को को जुटाने बाज़ार दौड़ता है। ‘सलिल’ जी ने इस क्षण को बखूबी पकड़ा है और उसे नवगीत में सफलतापूर्वक ढाल दिया है—
मिली दिहाड़ी / चल बाज़ार।
चावल-दाल किलो-भर ले ले / दस रुपये की भाजी
घासलेट का तेल लिटर-भर / धनिया- मिर्चा ताज़ी
तेल पाव-भर फल्ली का / सिन्दूर एक पुड़िया दे-
दे अमरूद पाँच का / बेटी की न सहूँ नाराजी
ख़ाली ज़ेब, पसीना चूता / अब मत रुक रे! / मन बेज़ार! (पृ.८१)
आर्थिक विकास, सामाजिक विसंगतियों का जन्मदाता है। समस्या यह भी है कि हमारे अपनों ने अपने चरित्र में भी संकीर्णता भर ली है। ऐसे हम चाहते भी कुछ नहीं कर पाते और उच्छवास ले-ले रह जाते हैं। ऐसी ही व्यथा का चित्रांकन एक गीत, ‘राम बचाये’ में द्रष्टव्य है। इसके दो बंद देखें—
अपनी-अपनी मर्यादा कर तार-तार / होते प्रसन्न हम,
राम बचाये!
वृद्धाश्रम-बालाश्रम और अनाथालय / कुछ तो कहते हैं!
महिलाश्रम की सुनो सिसकियाँ / आँसू क्यों बहते रहते हैं?
राम-रहीम बीनते कूड़ा / रजिया-रधिया झाडू थामे
सड़क किनारे, बैठे लोटे बतलाते / कितने विपन्न हम,
राम बचाये!
अमराई पर चौपालों ने / फेंका क्यों तेज़ाब, पूछिए!
पनघट ने खलिहानों को क्यों / नाहक़ भेजा जेल बूझिए।
सास-बहू, भौजाई-ननदी / क्यों माँ-बेटी सखी न होती?
बेटी-बेटे में अंतर कर / मन से रहते सदा खिन्न हम,
राम बचाये! (पृ.९४)
इसी क्रम में एक गीत, ख़ुशियों की मछली’ उल्लेखनीय है जिसमें समाज और सत्ता का गँठजोड़ आम आदमी को जीने नहीं दे रहा है। गीत की बुनावट में युगीन यथार्थ के साथ दार्शनिकता का पुट भी है—
ख़ुशियों की मछली को / चिंता का बगुला/खा जाता है।
श्वासों की नदिया में / आसों की लहरें
कूद रही हिरनी-सी / पल भर ना ठहरें
आँख मूँद मगन / उपवासी साधक / ठग जाता है।
....
श्वेत वसन नेता है / लेकिन मन काला
अंधे न्यायालय ने / सच झुठला डाला
निरपराध फँस जाता / अपराधी शातिर बच जाता है।। (पृ.९८)
गीत, ‘लोकतंत्र’ का पंछी’ में भी आम आदमी की व्यथा का यथार्थ चित्रांकन है। सत्ता-व्यवस्था के दो प्रमुख अंग- विधायिका और न्यायपालिका अपने उत्तरदायित्व से विमुख होते जा रहे हैं और जनमत की भूमिका भी संदिग्ध होती जा रही है। लोकतांत्रिक व्यवस्था ही ध्वस्त होती जा रही है—
लोकतंत्र का पंछी बेबस!
नेता पहले डालें दाना / फिर लेते पर नोच
अफ़सर रिश्वत-गोली मारें / करें न किंचित सोच
व्यापारी दे नाश रहा डँस!
.......
राजनीति नफ़रत की मारी / लिए नींव में पोच
जनमत बहरा-गूंगा खो दी / निज निर्णय की लोच
एकलव्य का कहीं न वारिस! (पृ.१००)
प्रकृति के उपादानों को लेकर मानवीय कार्य-व्यापार की रचना विश्वव्यापक होती है, विशेषतः जब उसमें चित्रण-भर न हो, बल्कि उसमें मार्मिकता, और संवेदनापूरित जीवन्तता हो। ‘खों-खों करते’ ऐसा ही गीत है जिसमें शीत ऋतु में एक परिवार की दिनचर्या का जीवन्त चित्र है—
खों-खों करते बादल बब्बा / तापें सूरज सिगड़ी।
आसमान का आँगन चौड़ा / चंदा नापे दौड़ा-दौड़ा
ऊधम करते नटखट तारे / बदरी दादी, ‘रुको’ पुकारे
पछुआ अम्मा बड़-बड़ करती / डाँट लगाती तगड़ी!
धरती बहिना राह हेरती / दिशा सहेली चाह घेरती
ऊषा-संध्या बहुएँ गुमसुम / रात और दिन बेटे अनुपम
पाला-शीत / न आये घर में / खोल न खिड़की अगड़ी!
सूर बनाता सबको कोहरा / ओस बढ़ाती संकट दोहरा
कोस न मौसम को नाहक़ ही / फ़सल लायगी राहत को ही
हँसकर खेलें / चुन्ना-मुन्ना / मिल चीटी-ढप- लँगड़ी! (पृ.१०३)
इन विषमताओं और विसंगतियों के बाबजूद गीतकार अपना कवि-धर्म नहीं भूलता। नकारात्मकता को विस्मृत कर वह आशा की फ़सल बोने और नये इतिहास लिखने का पक्षधर है—
आज नया इतिहास लिखें हम।
अब तक जो बीता, सो बीता
अब न आस-घट होगा रीता
अब न साध्य हो स्वार्थ सुभीता,
अब न कभी लांछित हो सीता
भोग-विलास न लक्ष्य रहे अब
हया, लाज, परिहास लिखें हम।
आज नया इतिहास लिखें हम।।
रहें न हमको कलश साध्य अब
कर न सकेगी नियति बाध्य अब
स्नेह-स्वेद- श्रम हों अराध्य अब
कोशिश होगी महज माध्य अब
श्रम-पूँजी का भक्ष्य न हो अब
शोषक हित खग्रास लिखें हम।। (पृ.१२२)
रचनाकार को अपने लक्ष्य में अपेक्षित सफलता मिली है, पर उसने शिल्प में थोड़ी छूट ली है, यथा तुकांत के मामले में, अकारांत शब्दों का तुक इकारांत या उकारांत शब्दों से (उलट स्थिति भी)। इसी प्रकार, उसने अनुस्वार वाले शब्दों को भी तुक के रूप में प्रयुक्त कर लिया है, जैसे- गुइयाँ / भइया (पृ.५१), प्रसन्न / खिन्न (पृ.९४) सिगड़ी / तगड़ी / लंगड़ी (पृ.१०३)। एकाध स्थलों पर भाषा की त्रुटि भी दिखायी पड़ी है, जैसे- पृष्ठ १२७ पर एक गीत में‘दम’ शब्द को स्त्रीलिंग मानकर ‘अपनी’ विशेषण प्रयुक्त हुआ है। तथापि, इन छोटी-मोटी बातों से संग्रह का मूल्य कम नहीं हो जाता।
गीतकार ने गीतों की भाषा में अपेक्षित लय सुनिश्चित करने के लिए हिंदी-उर्दू के बोलचाल शब्दों को प्राथमिकता दी है; कहीं-कहीं भावानुसार तत्सम शब्दावली का चयन किया है। अधिकांश गीतों में लोक का पुट दिखलायी देता है जिससे पाठक को अपनापन महसूस होता है। आज हम गद्य की औपचारिक शब्दावली से गीतों की सर्जना करने में अधिक लगे हैं, जिसका परिणाम यह हो रहा है कि उनमें मार्मिकता और अपेक्षित संवेदना का स्तर नहीं आ पाता है। भोथरी संवेदनावाली कविता से हमें रोमावलि नहीं हो सकती, जबकि आज उसकी आवश्यकता है। ‘सलिल’ जी ने इसकी भरपाई की पुरज़ोर कोशिश की है जिसका हिंदी नवगीत संसार द्वारा स्वागत किया जाना चाहिए।
वर्तमान संग्रह निःसंदेह नवगीत के प्रसार में अपनी सशक्त भूमिका निभा रहा है और आने वाले समय में उसका स्थान इतिहास में अवश्य लिया जाएगा, यह मेरा विश्वास है।... लोक की शक्ति को सोद्देश्य नवगीतों में ढालने हेतु ‘सलिल’ जी साधुवाद के पात्र है।
- 3/29, विकास नगर, लखनऊ-226 022 (मो.80096 60096)
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[कृति विवरण- पुस्तक का नाम- काल है संक्रांति का (नवगीत-संग्रह); नवगीतकार- आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’, प्रकाशक- समन्वय प्रकाशन अभियान, २०४ विजय अपार्टमेन्ट, सुभद्रा वार्ड, नेपियर टाउन, जबलपुर- ४८२००१ संस्करण- प्रथम, २०१६; पृष्ठ संख्या- १२८, मूल्य- पुस्तकालय संस्करण: तीन सौ रुपये; जनसंस्करण: दो सौ रुपये।]
४-६-२०१६
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शनिवार, 1 मार्च 2025

फरवरी २८, राम किंकर, बुंदेली सारद वंदना, सॉनेट, मुक्तिका, पूर्णिका, गंगा

 सलिल सृजन फरवरी २८

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गीत हर हर गंगे, हर हर गंगे। ० नभ से शंकरी जटाओं में उतरीं फिर अटक-भटक प्रवहीं। गंगोत्री हिम गिरि से भू पर अठखेली करतीं हुलस बहीं। कुछ हहराई, कुछ घहराईं कुछ इठलाईं, कुछ इतराईं। टुक ठिठकीं उठ दौड़ी-धाईं रुक मंथर गति पा मुसकाईं। कोई नृप मुग्ध हुआ सुधि खो कोई सुत जगा सका बुधि को। कोई कन्या मछलीगंधा कोई मुनि हुआ काम-अंधा। तापस द्वैपायन व्यास बना सुरसरि का यश चहुँ ओर घना। हरि द्वार खड़े होकर चंगे हर हर गंगे! हर हर गंगे!! ० ऋषि केश लहर सम लहराए हिमगिरि निज छवि लख इठलाए। मैदानों में जब उतर बहीं नव मूल्यों की नित कथा कहीं। हा कानपूर में दूषित हो निज निर्मलता दी तुमने खो। आ अनुजा जमुना भुज भेंठी थी दृश्य अदृश्य हुई जेठी। अनगिन पंडे अनगिनत झंडे मुस्टंडे कर थामे डंडे। अंधी श्रद्धा लख हुईं दुखी गंगा लहरी सुन हुईँ सुखी। जन धीर धरे लख कल्प वृक्ष झट शीश उठाए, तान वक्ष। कुछ उदर पलें हो भिखमंगे हर हर गंगे!,,हर हर गंगे!! ० जय जय काशी, जय विश्वनाथ संसार असार न सार नाथ। पट ना खोले पटना बिहार थे शुद्ध बुद्ध अंतस निहार। कौटिल्य-चंद्र आ तीर तरे गंगा सागर की ओर बढ़े। मिल ब्रह्मपुत्र से हर्षाईं सागर वर पाकर सँकुचाईँ। सुंदर मन तन्मय हो पुलका सुंदर वन मृण्मय हँस किलका। सागर भेंटा बाँहे पसार लहराया पहना लहर हार। हो संजीवित पा दर्प चूर्ण नत मस्तक हो सलिलेश पूर्ण। गंगेश-गंग युग-युग संगे हर हर गंगे!, हर हर गंगे!! २८.२.२५ ०००
पूर्णिका गंगा ० लहर लहर लहराती गंगा सबके पाप मिटाती गंगा . महादेव के शीश विराजे भक्त तार तर जाती गंगा . निर्मल सलिल प्रवाहित कल-कल जग की प्यास बुझाती गंगा . सबसे स्नेह समन्वय करिए जीवन-पाठ पढ़ाती गंगा . ऊँच-नीच अरु भेद-भाव को ठेंगा दिखा मिटाती गंगा . उतर शिखर से नगरों में आ गटर बने दुख पाती गंगा . गुरु-गुरुकुल ऋषि-आश्रम गायब श्री खोकर पछताती गंगा . मिटे किनारे उथली होकर पल पल मरती जाती गंगा . शंकर-भागीरथ आ तारें प्रभु से नित्य मनाती गंगा . गहरी स्वच्छ प्रवाहमयी हो नवजीवन पा गाती गंगा . नदी नहीं, गंगा संस्कृति है नव्या पा हर्षाती गंगा २८.२.२०२५ ०००
स्मरण युग तुलसी ३
आरती
आरती करें गुरुवर की करें, हनुमंत संग रघुवर की।
आरती करें गुरुवर की...
जन्म नर्मदा तट पर पाया, हनुमत ने आ पंथ दिखाया।
सिया-राम गुण निशि-दिन गाया, बंधन कोई रोक न पाया।।
सफल साधना पूर्ण कामना मिली कृपा शंकर की।
आरती करो गुरुवर की...
नाम राम किंकर शुभ पाया, तुलसी मानस हृदय बसाया।
शब्द-शब्द का अर्थ बताया, जन-गण पग-रज पाने धाया।
भिन्न राम ना, अलग श्याम ना, ऐक्य दृष्टि सुंदर की।
आरती करो गुरुवर की...
आत्मजयी सुत प्रभु मन भाया, प्रवचन सुनने पास बुलाया।
अवधपुरी प्रभुधाम सुहाया, आत्मदेव परमात्म मिलाया।
पुण्य पावना भक्ति भावना, युगतुलसी मनहर की।
आरती करो गुरुवर की...
२८.२.२०२४
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सुमित्र दिवंगत
जबलपुर २८.२.२०२४। नगर के प्रख्यात साहित्यकार-पत्रकार राजकुमार तिवारी 'सुमित्र' का गत रात्रि निधन हो गया। विश्ववाणी हिंदी संस्थान परिवार अपने शुभ चिंतक के महाप्रयाण से स्तब्ध और शोकाकुल है। सब की ओर से प्रणतांजलि।
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सॉनेट
माणिक जब बन गया मुसाफिर
मिला जवाहर तरुण अचानक
कृष्ण पथिक कर पकड़े फिर-फिर
दे गोपाल मधुर छवि अनथक
रोटी-कमल द्वार पर सोहे
हेमलता का मधुर हास जब
संगीता होकर मन मोहे
नवनीता अस्मिता आस तब
आस्था के शतदल शत महके
यादों के पलाश हँसते हैं
मिल यात्राओं की तलाश में
ज्वाल गीत गा पग बढ़ते हैं
तमसा के दिन करो नमन
तमसा के दिनकरो नमन
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मुक्तक
जय जयंत की बोलिए जय का कभी न अंत हो
बन बसंत हँस डोलिए रंग कुसुम्बी संत हो
बरस बरस रस कह रहा तरस नहीं डूब जा
बाहर क्यों खोजता है विदेह देह-कन्त हो
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पद
मौली पा मयूर मन नाचे
करे अर्चना मीरा मधु निशि, कांत कल्पना क्षिप्रा बाँचे
सदा शुभागत हो प्रबोध, पंकज पीयूष पान कर छककर
हो सुरेश शशिकांत तथागत, तरुणा अरुणा रुके न थककर
नमन शिवानी विहँस प्रियंका, गरिमा करतल ध्वनि कर साँचे
मौली पा मयूर मन नाचे
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बुंदेली सारद वंदना
सारद माँ! परनाम हमाओ।
नैया पार लगा दे रे।।
मूढ़ मगज कछु सीख नें पाओ।
तन्नक सीख सिखा दे रे।।
माई! बिराजीं जा परबत पै।
मैं कैसउ चढ़ पाऊँ ना।।
माई! बिराजीं स्याम सिला मा।
मैं मूरत गढ़ पाऊँ ना।।
ध्यान धरूँ आ दरसन देओ।
सुन्दर छबि दिखला दे रे।।
सारद माँ! परनाम हमाओ।
नैया पार लगा दे रे।।
मैया आखर मा पधराई।
मैं पोथी पढ़ पाऊँ ना।
मन मंदिर मा माँ पधराओ
तबआगे बढ़ पाऊँ ना।।
थाम अँगुरिया राह दिखाखें ।
मंज़िल तक पहुँचा दे रे।।
सारद माँ! परनाम हमाओ।
नैया पार लगा दे रे।।
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सॉनेट
चूहे को पंजे में दाब शेर मुस्काए।
चीं-चीं कर चूहा चाहे निज जान बचाए।
शांति वार्ता का नाटक जग के मन भाए।।
बंदर झूल शाख पर जय-जयकार गुँजाए।।
'भैंस उसी की जिसकी लाठी' अटल सत्य है।
'माइट इज राइट' निर्बल ही पीटता आया।
महाबली जो करे वही होता सुकृत्य है।।
मानव का इतिहास गया है फिर दुहराया।।
मनमानी को मन की बात बताते नेता।
देश नहीं दल की जय-जय कर चमचे पाले।
जनवाणी जन की बातों पर ध्यान न देता।।
गुटबंदी सीता को दोषी बोल निकाले।।
निज करनी पर कहो बेशरम कब शरमाए।
चूहे को पंजे में दाब शेर मुस्काए।।
२८-२-२०२२
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मुक्तिका
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इसने मारा, उसने मारा
इंसानों को सबने मारा
हैवानों की है पौ बारा
शैतानों का जै-जैकारा
सरकारों नें आँखें मूँदीं
टी वी ने मारा चटखारा
नफरत द्वेष घृणा का फोड़ा
नेताओं ने मिल गुब्बारा
आम आदमी है मुश्किल में
खासों ने खुद को उपकारा
भाषणबाजों लानत तुम पर
भारत माता ने धिक्कारा
हाथ मिलाओ, गले लगाओ
अब न बहाओ आँसू खारा
२८-२-२०२०
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