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बुधवार, 30 सितंबर 2026

सितंबर ३०, चित्रगुप्त, हाइकु, क्षमा, दोहा गजल, रावण ​वध, दहेज, सोरठा, चंद्र, तरही

सलिल सृजन सितंबर ३०

*
वंदना . चित्रगुप्ताय नादनादाय सृष्टिसृष्टाय प्रभु नमन। धर्मधर्माय वर्णवर्याय फलप्रदाताय विधि नमन।। नंदिनीनाथाय दक्षिणाभर्ताय लोकलोकाय हरि नमन। कर्मदेवाय फलप्रदाताय सत्यतथ्याय हर नमन।। अग्निदेवाय सर्वऊर्जाय जीवप्राणाय नित नमन। वायुवरदाय धरणिमाताय गगन पितृायशत नमन।। सूर्य-चंद्राय नखत ताराय नीर-क्षीराय आचमन। वृक्ष-पौधाय जंतु-जीवायसर्वभाषाय आगमन।। स्नेह-प्रेमाय राग-द्वेषाय वाक्-भाषाय मसि नमन। शौर्य-वीराय दानदाताय मान रक्षाय असि नमन।। ३०.९.२०२६ ००० हाइकु क्षमा . क्षमा माँगते हो जाते सुरक्षित शत्रु-हानि से। . क्षमा न कर ले लेते हैं बदला सावधान हो। . क्षमा माँगता कब कोई खुद से? करे पराया। . क्षमा कर दें सीमा पर सैनिक क्या दुश्मन को? . क्षमा लें या दें सदा रखें ध्यान धर्म-मर्म का। ३०.९.२०२६ ०००
पूर्णिका
०
मन का दर्द समझता कौन
तन देखे डॉक्टर, रह मौन
.
दुनिया हँसी ठिठोली करती
छिड़क जले पर राई-नौन
.
सिर्फ एक ही पूर्ण सृष्टि में
हम चौथाई-अद्धा-पौन
.
बारहखड़ी नहीं पढ़ पाते
जो उनकी दुनिया है यौन
.
जौन लूटते हैं जनता को
नेता 'सलिल' कहाते तौन
०००
दोहा गजल
जहाँ तृप्ति संतोष है, वहीं सफलता कोश
तजकर अहं विनम्र हो,लेकिन कमे न जोश
०
कच्छप सतत प्रयास कर, पा लेता है जीत
विजय सुनिश्चित मानकर, गया हार खरगोश
०
गर घर रखना स्वच्छ हो, तो मत मढ़िए स्वर्ण
दरवाजे पर डालिए, बाहर झट पगपोश
०
वंशज सभी कबीर के, रहें मञ्च से दूर
लेन-देन जो कर रहे, वे हैं गीत-फ़रोश
०
पुष्प शीश हरि के चढ़े, झट मिल जाता धूल
पग पखारता है 'सलिल', तृषा हरे रख होश
०००
हिंदी गजल
.
सकल सृष्टि में, दसों दिशा में गुंजित ध्वनि अनुनाद है २९
कर अनेक को एक रहा भाषाई पुल अनुवाद है
.
मानव हुआ विभाजित मजहब धर्म रिलीजन देश में
राजनीति-दलनीति शिकारी, मनु शिकार बर्बाद है
.
खून चखा शोषण का जिसने, उसे किसी से स्नेह नहीं
मानव बस्ती का विनाश कर, दनु होता आबाद है
.
जो विचारधारा का कैदी, हुआ स्वार्थ ही साध्य उसे
घृणा-द्वेष-बदला ही उसको, सत्य मानिए खाद है
.
लंका हो या कुरुक्षेत्र हो, या हो विश्व युद्ध कोई
जीवन हारे; मौत जीतती, नष्ट नीति-मर्याद है
.
आहें-आँसू चीख-कराहें, विरसे में इंसान दे
सभ्य; असभ्य कहे क्यों खुद को, पूछे प्रश्न विषाद है
.
मजनू-लैला; ढोला-मारू, या शीरीं-फरहाद का
'सलिल' रहा जो प्रेम मिटाता वही रहा बेदाद है
३०.९.२०२५
०००
: शोध :
रावण ​वध ​की तिथि दशहरा ​नहीं​
*
रावण ब्राम्हण था जिसके वध से लगे ब्रम्ह हत्या के पाप हेतु सूर्यवंशी राम को प्रायश्चित्य करना पड़ा था। रावण वध के बाद उसकी अंत्येष्टि उसके अनुज विभीषण ने की थी, राम ने नहीं। रामलीला के बाद राम के बाण से रावण का दाह संस्कार किया जाना तथ्यात्मक रूप से पूरी तरह गलत, अप्रामाणिक और अस्वीकार्य है। रावण का जन्म दिल्ली के समीप एक गाँव में हुआ, सुर तथा असुर मौसेरे भाई थे जिन्होंने दो भिन्न संस्कृतियों और राज सत्ताओं को जन्म दिया। उनमें वैसा ही विकराल युद्ध हुआ जैसा द्वापर में चचेरे भाइयों कौरव-पांडव में हुआ, उसी तरह एक पक्ष से सत्ता छिन गई। पदम पुराण, पातालखंड ​के अनुसार युद्धकाल पौष शुक्ल द्वितीया से चैत्र कृष्ण चौदस तक ८७ दिन तक था। संग्राम के मध्य विविध कारणों से १५ दिन युद्ध बंद रहा। ​इस महासंग्राम​ का समापन लंकाधिराज रावण के संहार से हुआ। राम द्वारा रावण वध क्वार सुदी दशमी को नहीं चैत्र बदी चतुर्दशी को किया गया था।
ऋषि आरण्यक द्वारा सत्योद्घाटन- ​
पद्मपुराण​, पाताल खंड में श्रीराम के अश्वमेध यज्ञ के प्रसंग में अश्व रक्षा के लिए जा रहे शत्रुध्न ऋषि आरण्यक के आश्रम में ​पहुँचकर, परिचय देकर प्रणाम करते ​हैं। शत्रुघ्न को गले से लगाकर प्रफुल्लित आरण्यक ऋषि बोले- ''गुरु का वचन सत्य हुआ। सारुप्य मोक्ष का समय आ गया।'' उन्होंने गुरू लोमश द्वारा पूर्णावतार राम के माहात्म्य ​के उपदेश ​का उल्लेख कर बताया ​कि गुरु ने कहा ​था कि जब श्रीराम के अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा ​आश्रम में आयेगा, रामानुज शत्रुघ्न से भेंट होगी। वे तुम्हें राम के पास ​पहुँचा देंगे। ऋषि आरण्यक रामनाम की महिमा के साथ नर रूप में राम के जीवन वृत्त को तिथिवार उद्घाटित करते हैं- ''जनकपुरी में धनुष यज्ञ में राम-लक्ष्मण के साथ विश्वामित्र का पहुँचना​,​ राम द्वारा धनुष-भंग, राम-सीता विवाह ​आदि प्रसंग सुनाते हुए आरण्यक ने बताया विवाह के समय राम ​१५ वर्ष के और सीता ​६ वर्ष की ​थीं। विवाहोपरांत वे ​१२ वर्ष अयोध्या में रहे,​ २७ वर्ष की आयु में राम के अभिषेक की तैयारी हुई मगर रानी कैकेई द्वारा राम वनवास का वर ​माँगने पर सीता व लक्ष्मण के साथ श्रीराम को चौदह वर्ष के वनवास में जाना पड़ा।
वनवास में राम प्रारंभिक ३ दिन जल पीकर रहे, चौथे दिन से फलाहार लेना शुरू किया। ​पाँचवे दिन वे चित्रकूट पहुँचे। श्री राम ​ने ​चित्रकूट में​ १२ वर्ष ​प्रवास किया। ​१३ वें वर्ष के प्रारंभ में ३९ वर्षीय राम, लक्ष्मण और ३० वर्षीय सीता के साथ पंचवटी पहुँचे और शूर्प​णखा को कुरूप किया। माघ कृष्ण अष्टमी को वृन्द मुहूर्त में लंकाधिराज दशानन ने साधुवेश में सीता हरण किया। श्रीराम व्याकुल होकर सीता की खोज में लगे रहे। जटायु का उद्धार व शबरी मिलन के बाद ऋष्यमूक पर्वत पर पहुँचे, सुग्रीव से मित्रता कर बालि का बध किया।​ बाल्मीकि रामायण, राम चरित मानस तथा अन्य ग्रंथों के अनुसार राम ने वर्षाकाल में चार माह ऋष्यमूक पर्वत पर ​बिताए थे। ​मानस में श्री राम लक्ष्मण से कहते हैं-
'​घन घमंड गरजत चहु ओरा। प्रियाहीन डरपत मन मोरा।।'
आषाढ़ सुदी एकादशी से चातुर्मास प्रारंभ हुआ। शरद ऋतु के उत्तरार्द्ध यानी कार्तिक शुक्लपक्ष से वानरों ने सीता की खोज आरंभ की गई। समुद्र तट पर कार्तिक शुक्ल नवमी को संपाति नामक गिद्ध ने बताया कि सीता लंका की अशोक वाटिका में हैं। तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवोत्थानी) को हनुमान ने ​सागर पार किया और रात में लंका प्रवेश कर सीता की खोज-बीन ​आरम्भ की।कार्तिक शुक्ल द्वादशी को अशोक वाटिका में शिंशुपा वृक्ष पर छिप गये और माता सीता को रामकथा सुनाई। कार्तिक शुक्ल तेरस को अशोक वाटिका विध्वं​सकर, उसी दिन अक्षय कुमार का वध किया। कार्तिक शुक्ल चौदस को मेघनाद के ब्रह्मपाश में ​बँधकर दरबार में गए और लंकादहन किया। हनुमानजी ​ने ​कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा को वापसी में समुद्र पार किया। प्रफुल्लित वानर​ दल ​ने नाचते​-​गाते ​५ दिन मार्ग में लगाये और अगहन कृष्ण षष्ठी को मधुवन में आकर वन ध्वंस किया हनुमान की अगवाई में सभी वानर अगहन कृष्ण सप्तमी को श्रीराम के समक्ष पहुँचे, हाल-चाल दिये। मानस के अनुसार श्री राम ने सुग्रीव से कहा- 'अब विलंब केहि कारन कीजे, तुरन कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे'।
यात:, अगहन कृष्ण अष्टमी ​उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र विजय मुहूर्त में श्रीराम ने वानरों के साथ दक्षिण दिशा को कूच किया और ​७ दिन में किष्किंधा से समुद्र तट पहुँचे। अगहन शुक्ल प्रतिपदा से तृतीया तक विश्राम किया। अगहन शुक्ल चतुर्थ को रावणानुज श्रीरामभक्त विभीषण शरणागत हुआ। अगहन शुक्ल पंचमी को समुद्र पार जाने के उपायों पर चर्चा हुई। सागर से मार्ग ​की ​याचना में श्रीराम ने अगहन शुक्ल षष्ठी से नवमी तक ​४ दिन उपवास किया। नवमी को अग्निवाण का संधान हुआ तो रत्नाकर प्रकट हुए और सेतुबंध का उपाय सुझाया। अगहन शुक्ल दशमी से तेरस तक ​४ दिन में श्रीराम सेतु बनकर तैयार हुआ।
अगहन शुक्ल चौदस को श्रीराम ने समुद्र पार सुवेल पर्वत पर प्रवास किया, अगहन शुक्ल पूर्णिमा से पौष कृष्ण द्वितीया तक ​३ दिन में वानरसेना सेतुमार्ग से समुद्र पार कर पाई। पौष कृष्ण तृतीया से दशमी तक एक सप्ताह लंका का घेराबंदी चली। पौष कृष्ण एकादशी को ​रावण के गुप्तचर ​सुक​-​सारन ​वानर वेश धारण कर ​वानर सेना में घुस आए। पौष कृष्ण द्वादशी को वानरों की गणना हुई और ​उन्हें ​पहचान कर​ ​पकड़ा गया और शरणागत होने पर श्री राम द्वारा अभयदान दिया। पौष कृष्ण तेरस से अमावस्या तक रावण ने गोपनीय ढंग से सैन्याभ्यास किया।
​श्री राम द्वारा शांति-प्रयास का अंतिम उपाय करते हुए ​पौष शुक्ल प्रतिपदा को अंगद को दूत बनाकर भेजा गया।​ ​अंगद के विफल लौटने पर ​पौष शुक्ल द्वितीया से युद्ध आरंभ हुआ। अष्टमी तक वानरों व राक्षसों में घमासान युद्ध हुआ। पौष शुक्ल नवमी को मेघनाद द्वारा राम लक्ष्मण को नागपाश में ​जकड़ दिया गया। श्रीराम के कान में कपीश द्वारा पौष शुक्ल दशमी को गरुड़ मंत्र का जप किया गया, पौष शुक्ल एकादशी को गरुड़ का प्राकट्य हुआ और उन्होंने नागपाश काटकर राम-लक्ष्मण को मुक्त किया। पौष शुक्ल द्वादशी को ध्रूमाक्ष्य बध, पौष शुक्ल तेरस को कंपन बध, पौष शुक्ल चौदस से माघ कृष्ण प्रतिपदा तक ३ दिनों में कपीश नील द्वारा प्रहस्तादि का वध किया गया।
माघ कृष्ण द्वितीया से राम-रावण में विकराल युद्ध प्रारम्भ हुआ। माघ कृष्ण चतुर्थी को रावण को भागना पड़ा। रावण ने माघ कृष्ण पंचमी से अष्टमी तक ​४ दिन में कुंभकरण को जगाया। माघ कृष्ण नवमी से शुरू हुए युद्ध में छठे दिन चौदस को कुंभकरण को श्रीराम ने मार गिराया। कुंभकरण वध पर माघ कृष्ण अमावस्या को शोक में रावण द्वारा युद्ध विराम किया गया। माघ शुक्ल प्रतिपदा से चतुर्थी तक युद्ध में विसतंतु आदि ​५ राक्षसों का वध हुआ। माघ शुक्ल पंचमी से सप्तमी तक युद्ध में अतिकाय मारा गया। माघ शुक्ल अष्टमी से द्वादशी तक युद्ध में निकुम्भ-कुम्भ ​वध, माघ शुक्ल तेरस से फागुन कृष्ण प्रतिपदा तक युद्ध में मकराक्ष वध हुआ।
फागुन कृष्ण द्वितीया को लक्ष्मण-मेघनाद युद्ध प्रारंभ हुआ। फागुन कृष्ण सप्तमी को लक्ष्मण मूर्छित हुए, उपचार आरम्भ हुआ। इस घटना के कारण फागुन कृष्ण तृतीया से सप्तमी तक ​५ दिन युद्ध विराम रहा। फागुन कृष्ण अष्टमी को वानरों ने यज्ञ विध्वंस किया, फागुन कृष्ण नवमी से फागुन कृष्ण तेरस तक चले युद्ध में लक्ष्मण ने मेघनाद को मार गिराया। इसके बाद फागुन कृष्ण चौदस को रावण की यज्ञ दीक्षा ली और फागुन कृष्ण अमावस्या को युद्ध के लिए प्रस्थान किया।
फागुन शुक्ल प्रतिपदा से पंचमी तक भयंकर युद्ध में अनगिनत राक्षसों का संहार हुआ। फागुन शुक्ल षष्ठी से अष्टमी तक युद्ध में महापार्श्व आदि का राक्षसों का वध हुआ। फागुन शुक्ल नवमी को पुनः लक्ष्मण मूर्छित हुए, सुखेन वैद्य के परामर्श पर हनुमान द्रोणागिरि लाये और लक्ष्मण पुनः चैतन्य हुए।
राम-रावण युद्ध फागुन शुक्ल दशमी को पुनः प्रारंभ हुआ। फागुन शुक्ल एकादशी को मातलि द्वारा श्रीराम को विजयरथ दान किया। फागुन शुक्ल द्वादशी से रथारूढ़ राम का रावण से तक ​१८ दिन युद्ध चला। ​अंतत:, ​चैत्र कृष्ण चौदस को दशानन रावण मौत के घाट उतारा गया।
युद्धकाल पौष शुक्ल द्वितीया से चैत्र कृष्ण चौदस तक ​८७ दिन​ युद्ध ​(७२ दिन​ ​युद्ध, ​१५ दिन ​​युद्ध विराम​)​ चला और श्रीराम विजयी हुए। चैत्र कृष्ण अमावस्या को विभीषण द्वारा रावण का दाह संस्कार किया गया।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (नव संवत्सर) से लंका में नए युग का प्रारंभ हुआ। चैत्र शुक्ल द्वितीया को विभीषण का राज्याभिषेक किया गया। अगले दिन चैत्र शुक्ल तृतीया का सीता की अग्निपरीक्षा ली गई और चैत्र शुक्ल चतुर्थी को पुष्पक विमान से राम, लक्ष्मण, सीता उत्तर दिशा में ​उड़कर, चैत्र शुक्ल पंचमी को भरद्वाज ​ऋषि ​के आश्रम में पहुँचे। चैत्र शुक्ल षष्ठी को नंदीग्राम में राम-भरत मिलन हुआ। चैत्र शुक्ल सप्तमी को अयोध्या में श्रीराम का राज्याभिषेक किया गया। यह पूरा आख्यान ऋषि आरण्यक ने शत्रुघ्न को सुनाया। फिर शत्रुघ्न ने आरण्यक को अयोध्या पहुँचाया, जहाँ अपने आराध्य पूर्णावतार श्रीराम के सान्निध्य में ब्रह्मरंध्र द्वारा सारूप्य मोक्ष पाया।
यह निर्विवाद है कि दशहरा को रावण वध तथा दीपावली को श्री राम के अयोध्या लौटने पर प्रजा द्वारा दीप पर्व मनाए जाने की लोक धारणा मिथ्या, अप्रामाणिक और निराधार है। ​इस धारणा के प्रचलित होने का कारण वाराणसी से गंगा नदी के पार स्थित रामनगर, वाराणसी में रामलीला के मंचन की परंपरा है। यह राम लीला १८३० में काशी नरेश महाराजा उदित नारायण सिंह द्वारा पंडित लक्ष्मी नारायण पांडे के परिवार (रामनगर की रामलीला के वर्तमान व्यास जी) की मदद से शुरू की गई थी। उनके उत्तराधिकारी महाराज ईश्वरी प्रसाद नारायण सिंह के शासनकाल के दौरान राम लीला की लोकप्रियता अतिशय बढ़ गई और दर्शक संख्या एक लाख तक होती थी।रामनगर रामलीला ३१ दिनों में आयोजित की जाती थी, जहाँ रामचरितमानस का संपूर्ण पाठ किया जाता था। यह अपने भव्य सेट, संवाद और दृश्य तमाशे के लिए जाना जाता था।
इस काल में नव दुर्गा से दीपावली तक विद्यालयों में शासकीय अवकाश हुआ करता था। नवदुर्गा पर्व का आरंभ आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से होकर समापन आश्विन शुक्ल दशमी को होता है। कार्तिक मास अमावस्या को दीवाली होती है। नव दुर्गा और राम लीला का समायोजन करते हुए विजय दशमी पर रावण वध की प्रथा आरंभ हुई होगी जो रूढ़ हो गई। यदि दशहरे पर रावण वध और दीपावली पर अयोध्या प्रवेश को सही मानें तो प्रश्न यह है कि इस अवधि में राम क्या करते रहे। क्या राम लंका से पुष्पक विमान द्वारा न आकर पैदल अयोध्या लौटे? ऐसा होता तो रावणजयी राम के वापसी यात्रा पथ का उल्लेख मिलता, जो नहीं है। भरत द्वारा १४ वर्ष पूर्ण होते ही राम के न लौटने पर प्राण त्यागने का संकल्प किया गया था, इसलिए राम को उस अवधि के पूर्व अयोध्या लौटना ही था। ऐसी स्थिति में दशहरे से दीवाली के बीच के १९ दिन राम क्या करते रहे?
अत:, यह सुनिश्चित है कि न तो रावण वाढ दशहरे को हुआ, न राम दीवाली पर अयोध्या लौटे।
०००
एक दोहा
अमिधा हो या लक्षणा, बिना व्यंजना सून
दोहे में हो व्यंजना, रसानन्द हो दून
३०.९.२०२०
दोहे दहेज़ पर
*
लें दहेज़ में स्नेह दें, जी भरकर सम्मान
संबंधों को मानिए, जीवन की रस-खान
*
कुलदीपक की जननी को, रखिए चाह-सहेज
दान ग्रहण कर ला सके, सच्चा यही दहेज
*
तीसमारखां गए थे, ले बाराती साथ
जीत न पाए हैं किला, आए खाली हाथ
*
शत्रुमर्दिनी अकेली, आयी बहुत प्रबुद्ध
कब्ज़ा घर भर पर किया, किया न लेकिन युद्ध
*
जो दहेज की माँग कर, घटा रहे निज मान
समझें जीवन भर नहीं, पाएँगे सम्मान
३०-९-२०१८
***
सामयिक कविता: फेर समय का
*
फेर समय का ईश्वर को भी बना गया- देखो फरियादी.
फेर समय का मनुज कर रहा निज घर की खुद ही बर्बादी..
फेर समय का आशंका, भय, डर सारे भारत पर हावी.
फेर समय का चैन मिला जब सुना फैसला, हुई मुनादी..
फेर समय का कोई न जीता और न हारा कोई यहाँ पर.
फेर समय का वहीं रहेंगे राम, रहे हैं अभी जहाँ पर..
फेर समय का ढाँचा टूटा, अब न दुबारा बन पायेगा.
फेर समय का न्यायालय से खुश न कोई भी रह पायेगा..
फेर समय का यह विवाद अब लखनऊ से दिल्ली जायेगा.
फेर समय का आम आदमी देख ठगा सा रह जायेगा..
फेर समय का फिर पचास सालों तक यूँ ही वाद चलेगा?
फेर समय का नासमझी का चलन देश को पुनः छलेगा??
फेर समय का नेताओं की फितरत अब भी वही रहेगी.
फेर समय का देश-प्रेम की चाहत अब भी नहीं जगेगी..
फेर समय का जातिवाद-दलवाद अभी भी नहीं मिटेगा.
फेर समय का धर्म और मजहब में मानव पुनः बँटेगा..
फेर समय का काले कोटोंवाले फिर से छा जायेंगे.
फेर समय का भक्तों से भगवान घिरेंगे-घबराएंगे..
फेर समय का सच-झूठे की परख तराजू तौल करेगी.
फेर समय का पट्टी बाँधे आँख ज़ख्म फिर हरा करेगी..
फेर समय का ईश्वर-अल्लाह, हिन्दू-मुस्लिम एक न होंगे.
फेर समय का भक्त और बंदे झगड़ेंगे, नेक न होंगे..
फेर समय का सच के वधिक अवध को अब भी नहीं तजेंगे.
फेर समय का छुरी बगल में लेकर नेता राम भजेंगे..
फेर समय का अख़बारों-टी.व्ही. पर झूठ कहा जायेगा.
फेर समय का पंडों-मुल्लों से इंसान छला जायेगा..
फेर समय का कब बदलेगा कोई तो यह हमें बताये?
फेर समय का भूल सियासत काश ज़िंदगी नगमे गाये..
फेर समय का राम-राम कह गले राम-रहमान मिल सकें.
फेर समय का रसनिधि से रसलीन मिलें रसखान खिल सकें..
फेर समय का इंसानों को भला-बुरा कह कब परखेगा?
फेर समय का गुणवानों को आदर देकर कब निरखेगा?
फेर समय का अब न सियासत के हाथों हम बनें खिलौने.
फेर समय का अब न किसी के घर में खाली रहें भगौने..
फेर समय का भारतवासी मिल भारत की जय गायें अब.
फेर समय का हिन्दी हो जगवाणी इस पर बलि जाएँ सब..
***
शुभकामना
विजयदशमी पर हम जीत सकें निज मन को
देश-धर्म के शत्रु हनें पल-पल निर्भय हो
रचें पंक्तियाँ ऐसी हों नव ऊर्जा वाहक
नमन मातु को करें जगतवाणी हिंदी हो
३०.९.२०१७
***
कार्य शाला
निम्न पंक्ति से सोरठा पूरा करें
*
मेरे प्यासे नैन, रात-रात भर जागते -मिथलेश बड़गैयां
मिलें नैन से नैन, सोचे दिल धड़कनें गिन -संजीव
*
मेरे प्यासे नैन, मीठी वाणी सुने बिन
कटे न काटे रैन, प्रभु सुमिरन कर निरंतर
*
मेरे प्यासे नैन, प्रिय गैरों की बाँह में
मिले न मन को चैन, विधि न दिखाना वह दिवस
३०.९.२०१६
***
दोहा
सज्जन के सत्संग को, मान लीजिये स्वर्ग
दुर्जन से पाला पड़े, जितने पल है नर्क
*
मिले पूर्णिमा में शशि-किरणों के संग खीर
स्वर्गोपम सुख पा 'सलिल', तज दे- धर मत धीर
*
आँखों में सपने हसीं, अधरों पर मुस्कान
सुख-दुःख की सीमा नहीं, श्रम कर हों गुणवान
३०.९.२०१५
***
चंद्र मंत्र
चंद्र देव को भी प्रत्यक्ष भगवान माना जाता है। अमावस्या को छोड़कर चंद्रदेव अपनी सोलह कलाओं परिपूर्ण होकर साक्षात दर्शन देते हैं। सोमवार चंद्रदेव का दिन है।
चंद्रमा से शुभ फल प्राप्त करने के लिए इस दिन खीर जरूर खाना चाहिए। यदि कुंडली में चंद्र नीच का हो तो सफेद कपड़े पहनना चाहिए और श्वेत चंदन का तिलक लगाना चाहिए।
चंद्रमा का रत्न मोती है। चंद्र रत्न मोती को चांदी की अंगूठी में जड़वा कर कनिष्ठिका अंगुली में पहनना चाहिए। शीत से पीड़ित होने पर गले में मोतीयुक्त चांदी का अर्धचंद्र लॉकेट पहनने से फायदा होता है।
चंद्र मंत्र -
दधिशंखतुषाराभं क्षीरोदार्णव सम्भवम ।
नमामि शशिनं सोमं शंभोर्मुकुट भूषणं ।।
ॐ श्रां श्रीं श्रौं स: चन्द्रमसे नम:।।
ॐ ऐं क्लीं सोमाय नम:।
ॐ भूर्भुव: स्व: अमृतांगाय विदमहे कलारूपाय धीमहि तन्नो सोमो प्रचोदयात्।
***
दोहा सलिला:
राम सत्य हैं, राम शिव.......
*
राम सत्य हैं, राम शिव, सुन्दरतम हैं राम.
घट-घटवासी राम बिन सकल जगत बेकाम..
वध न सत्य का हो जहाँ, वही राम का धाम.
अवध सकल जग हो सके, यदि मन हो निष्काम..
न्यायालय ने कर दिया, आज दूध का दूध.
पानी का पानी हुआ, कह न सके अब दूध..
देव राम की सत्यता, गया न्याय भी मान.
राम लला को मान दे, पाया जन से मान..
राम लला प्रागट्य की, पावन भूमि सुरम्य.
अवधपुरी ही तीर्थ है, सुर-नर असुर प्रणम्य..
शुचि आस्था-विश्वास ही, बने राम का धाम.
तर्क न कागज कह सके, कहाँ रहे अभिराम?.
आस्थालय को भंगकर, आस्थालय निर्माण.
निष्प्राणित कर प्राण को, मिल न सके सम्प्राण..
मन्दिर से मस्जिद बने, करता नहीं क़ुबूल.
कहता है इस्लाम भी, मत कर ऐसी भूल..
बाबर-बाकी ने कभी, गुम्बद गढ़े- असत्य.
बनीं बाद में इमारतें, निंदनीय दुष्कृत्य..
सिर्फ देवता मत कहो, पुरुषोत्तम हैं राम.
राम काम निष्काम है, जननायक सुख-धाम..
जो शरणागत राम के, चरण-शरण दें राम.
सभी धर्म हैं राम के, चाहे कुछ हो नाम..
पैगम्बर प्रभु के नहीं, प्रभु ही हैं श्री राम.
पैगम्बर के प्रभु परम, अगम अगोचर राम..
सदा रहे, हैं, रहेंगे, हृदय-हृदय में राम.
दर्शन पायें भक्तजन, सहित जानकी वाम..
रामालय निर्माण में, दें मुस्लिम सहयोग.
सफल करें निज जन्म- है, यह दुर्लभ संयोग..
पंकिल चरण पखार कर, सलिल हो रहा धन्य.
मल हर निर्मल कर सके, इस सा पुण्य न अन्य..
***
तरही मुक्तिका ३ :
क्यों है?
*
रूह पहने हुए ये हाड़ का पिंजर क्यों है?
रूह सूरी है तो ये जिस्म कलिंजर क्यों है??
थी तो ज़रखेज़ ज़मीं, हमने ही बम पटके हैं.
और अब पूछते हैं ये ज़मीं बंजर क्यों है??
गले मिलने की है ख्वाहिश, ये संदेसा भेजा.
आये तो हाथ में दाबा हुआ खंजर क्यों है??
नाम से लगते रहे नेता शरीफों जैसे.
काम से वो कभी उड़िया, कभी कंजर क्यों है??
उसने बख्शी थी हमें हँसती हुई जो धरती.
आज रोती है बिलख, हाय ये मंजर क्यों है?
३०.९.२०१०
***

बुधवार, 2 सितंबर 2026

सितंबर २, बुन्देली पर्व, बेटी, बहू, कुंडलिया, सोरठा, शिव परिवार, देवता, त्रयोदशी छंद ,यमक, दोहा, नवगीत, मुक्तिका

सलिल सृजन सितंबर २
*
बेटी और बहु के अनुपम बुन्देली पर्व
हरियाली अमावस्या पर बुंदेलखंड में बेटियों को पूजने की परम्परा रही है। पूजा स्थल पर बेटियों के चित्र उकेरने/बनाने की भी परम्परा है। इस दिन बेटियों को घर बुलाकर उनका पूजन किया जाना, उपहार देना, गीत-संगीत करना और घर के आंगन में पौधा लगाना, जो हरियाली अमावस्या का प्रतीक भी है, की परम्परा रही है।
बुंदेलखंड की लोक संस्कृति में एक त्यौहार बहुओं का भी होता है- "कुंघुसु" या "कुन घुसू"। यह भाद्रपद मास में हरतालिका तीज के आसपास मनाया जाता है। यह त्यौहार सिर्फ घर की बहुओं के लिए मनाया जाता है और इस दिन सास-ससुर बहुओं को सम्मान देते हैं और उपहार देते हैं। पूजन होता है। बुंदेलखंड संस्कृति में यह दिन बहुत महत्व का होता है। इन पर्वों पर व्रत-पूजा, श्रृंगार, पौधारोपण, वृक्ष-पूजा, भजन-गीत, खेल आदि के माध्यम से सपरिवार आनंद पाते हैं।
०००
कुंडलिया
दिल
दिल दिल से दिल हारकर, बन बैठा दिलदार।
हुई दिल्लगी दिल लगी, पहुँच गई दिल-द्वार।।
पहुँच गई दिल द्वार, न जोड़ा दिल जो तोड़ा।
बेदिल फेवीकोल, न लाई हाथ मरोड़ा।।
दिल बस दिल में बसा, न पाई कर दिल घायल।
दिल डाक्टर दर पहुँच, भर रहा दिल दिल का बिल।।
२-८-२०२३
•••
सोरठा
रवि भास्कर मार्तण्ड, रश्मिरथी दिनकर दिनद।
लोहित भानु प्रचंड, सूरज सविता सूर्य शुभ।।
*
आदिदेव भुवनेश, दीप्त दिवाकर प्रभाकर।
छाया-स्वामी दिनेश, किरणकांत किरणेश हे।।
*
अरुणकांत अरुणेश, त्रिभुवनपति भुवनेsश्वर।
दिवाकान्त दीप्तेश, ज्योतिपुंज जगदीsश्वर।
*
रात अलार्म लगा रहे, प्रात जग सकें मीत।
रहें ना रहें अनिश्चित, हुई आस की जीत।।
२-९-२०२२
***
विमर्श - परिवार
क्या एक पति विवाह पश्चात अपनी पत्नी के पुत्र को (जो उसका नहीं है) स्वीकार करेगा?
क्या एक पत्नी अपने पति के पुत्र को (जो उसका नहीं है) स्वीकार करेगी?
सामान्यत: उत्तर होगा नहीं।
अगर कर लें तो क्या चारों साथ-साथ सहज और प्रसन्न रह सकेंगे, एक दूसरे पर विश्वास कर सकेंगे?
इस प्रश्न का उत्तर है शिव परिवार। शिव-पार्वती विवाह पश्चात उनके जीवन में आए कार्तिकेय शिवपुत्र हैं, पार्वती पुत्र नहीं हैं। गणेश पार्वती पुत्र हैं, शिव पुत्र नहीं। क्या इससे शिव-पार्वती का दांपत्य प्रभावित हुआ? नहीं।
वे एक दूसरे की संतानों को अपना मानकर जगत्कर्ता और जगज्जननी हो गए। अद्वैत में द्वैत के लिए स्थान नहीं होता। पति-पत्नी एक हो गए तो दूरी, निजता या गैरियत क्यों?
कौन किसका पोषण या शोषण कर सकता है?
किसका त्याग कम, किसका अधिक? ऐसे प्रश्न ही बेमानी हैं।
छोटी-छोटी बातों के अहं को चश्मे से बड़ा बनाकर विलग हो रहे दंपति देखें कि क्या उनके जीवन की समस्या शिव-पार्वती के जीवन की समस्याओं से अधिक बड़ी हैं?
विषमताओं का हलाहल कंठ में धारण करनेवाला ही, शंकाओं को जयकर शंकर बनता है।
पर्वत की तरह बड़ी समस्याओं से अहं की लड़ाई न लड़कर, पुत्री की तरह स्नेहभाव से सुलझानेवाली ही पार्वती हो सकती है।
प्रकृति प्रदत्त विषमता को समभाव से ग्रहण कर, एक दूसरे पर बदलने का दबाव बनाए बिना सहयोग करने पर अरिहंता कार्तिकेय ही नहीं, विघ्नहर्ता गणेश भी पुत्र बनकर पूर्णता तक ले जाते हैं, यही नहीं ऋद्धि-सिद्धि भी पुत्रवधुओं के रूप में सुख-समृद्धि की वर्षा करती हैं।
गणेश चतुर्थी का पर्व सहिष्णुता, समन्वय और सद्भाव का महापर्व है।
आइए! हम सब ऐक्य-सूत्र में बँधकर, जमीन में जड़ जमानेवाली दूर्वा से प्रेरणा ग्रहणकर गणपति गणनायक को प्रणाम करने की पात्रता अर्जित करें।
हम शिव परिवार की तरह भिन्न होकर अभिन्न हों, अनेकता को पचाकर एक हो सकें।
गणेश चौथ
२-९-२०१९
***
क्षणिका: कृपा
"कृपा चाहता हूँ"
न कहना कभी भी,
वरना नहीं तुम
रिहा हो सकोगे।
बहिन है 'कृपा'
इन जज साहिबा की
माँगा जो,
मुश्किल में
ज्यादा फँसोगे।
२.९.२०१८
***
विमर्श - देवता कौन हैं?
देवता, 'दिव्' धातु से बना शब्द है, अर्थ 'प्रकाशमान होना' है। भावार्थ परालौकिक शक्ति जो अमर, पराप्राकृतिक है और पूजनीय है। देवता या देव इस तरह के पुरुष और देवी इस तरह की स्त्रियों को कहा गया है। देवता परमेश्वर (ब्रह्म) का लौकिक या सगुण रूप माने गए हैं।
बृहदारण्य उपनिषद के एक आख्यान में प्रश्न है कि कितने देव हैं? उत्तर - वास्तव में देव केवल एक है जिसके कई रूप हैं। पहला उत्तर है ३३ कोटि (प्रकार); और पूछने और पूछने पर ३ (विधि-हरि-हर या ब्रम्हा-विषय-महेश) फिर डेढ और फिर केवल एक (निराकार जिसका चित्र गुप्त है अर्थात नहीं है)। वेद मन्त्रों के विभिन्न देवता है। प्रत्येक मन्त्र का ऋषि, कीलक और देवता होता है।
देवताओं का वर्गीकरण- चार मुख्य प्रकार
१. स्थान क्रम से वर्णित देवता -- द्युस्थानीय यानी ऊपरी आकाश में निवास करने वाले देवता, मध्यस्थानीय यानी अन्तरिक्ष में निवास करने वाले देवता, और तीसरे पृथ्वीस्थानीय यानी पृथ्वी पर रहने वाले देवता माने जाते हैं।
२. परिवार क्रम से वर्णित देवता -- इन देवताओं में आदित्य, वसु, रुद्र आदि को गिना जाता है।
३. वर्ग क्रम से वर्णित देवता -- इन देवताओं में इन्द्रावरुण, मित्रावरुण आदि देवता आते हैं।
४. समूह क्रम से वर्णित देवता -- इन देवताओं में सर्व देवा (स्थान, वस्तु, राष्ट्र, विश्व
आदि) की गिनती की जाती है।
ऋग्वेद में स्तुतियों से देवताओं की पहचान की जाती है। ये देवता अग्नि, वायु, इंद्र, वरुण, मित्रावरुण, अश्विनीकुमार, विश्वदेवा, सरस्वती, ऋतु, मरुत, त्वष्टा, ब्रहस्पति, सोम, दक्षिणा इन्द्राणी, वरुणानी, द्यौ, पृथ्वी, पूषा आदि हैं। बहु देवता न माननेवाले सब नामों का अर्थ परब्रह्म परमात्मा वाचक करते है। बहुदेवतावादी परमात्मात्मक रूप में इनको मानते है। पुराणों में इन देवताओं का मानवीकरण अथवा लौकिकीकरण हुआ, फ़िर इनकी मूर्तियाँ, सम्प्रदाय, अलग अलग पूजा-पाठ बनाये गए।
धर्मशास्त्र में सबसे "तिस्त्रो देवता".(तीन देवता) ब्रह्मा, विष्णु और शिव का उदय हुआ। इनका कार्य सृष्टि का निर्माण, इसका पालन और संहार माना जाता है। काल-क्रम से देवों की संख्या बढ़ती गयी। निरुक्तकार यास्क के अनुसार," देवताऒ की उत्पत्ति आत्मा से है"। महाभारत के (शांति पर्व) में आदित्यगण क्षत्रिय देवता, मरुदगण वैश्य देवता, अश्विनी गण शूद्र देवता और अंगिरस ब्राहमण देवता माने गए हैं। शतपथ ब्राह्मण में भी इसी प्रकार से देवताओं को माना गया है।
आदित्या: क्षत्रियास्तेषां विशस्च मरुतस्तथा, अश्विनौ तु स्मृतौ शूद्रौ तपस्युग्रे समास्थितौ, स्मृतास्त्वन्गिरसौ देवा ब्राहमणा इति निश्चय:, इत्येतत सर्व देवानां चातुर्वर्नेयं प्रकीर्तितम
शुद्ध बहु ईश्वरवादी धर्मों में देवताओं को पूरी तरह स्वतन्त्र माना जाता है।प्रमुख वैदिक देवता गणेश (प्रथम पूज्य), सरस्वती, श्री देवी (लक्ष्मी), विष्णु, शक्ति (दुर्गा, पार्वती), शंकर, कृष्ण, इन्द्र, सूर्य, हनुमान, ब्रह्मा, राम, वायु, वरुण, अग्नि, शनि , कार्तिकेय, शेषनाग, कुबेर, धन्वंतरि, विश्वकर्मा आदि हैं।
२-९-२०१६
***
दोहा
आरक्षण सब चाहते, रहा न कोई छोड़
संविधान को स्वार्थ हित, नेता रहे मरोड़
*
चाँद देखता चाँद को, हवा-चाँदनी मौन
ठगे रह गये पूछते, किससे सुन्दर कौन?
***
नवगीत:
*
वाजिब है
वे करें शिकायत
भेदभाव की आपसे
*
दर्जा सबसे अलग दे दिया
चार-चार शादी कर लें.
पा तालीम मजहबी खुद ही
अपनी बर्बादी वर लें.
अलस् सवेरे माइक गूँजे
रब की नींद हराम करें-
अपनी दुख्तर जिन्हें न देते
उनकी दुख्तर खुद ले लें.
फ़र्ज़ भूल दफ़्तर से भागें
कहें इबादत ही मजहब।
कट्टरता-आतंकवाद से
खुश हो सकता कैसे रब?
बिसरा दी
सूफी परंपरा
बदतर फतवे खाप से.
वाजिब है
वे करें शिकायत
भेदभाव की आपसे
*
भारत माँ की जय से दूरी
दें न सलामी झंडे को.
दहशतगर्दों से डरते हैं
तोड़ न पाते डंडे को.
औरत को कहते जो जूती
दें तलाक जब जी चाहे-
मिटा रहे इतिहास समूचा
बजा सलामी गुंडे को.
रिश्ता नहीं अदब से बाकी
वे आदाब करें कैसे?
अपनों का ही सर कटवाते
देकर मुट्ठी भर पैसे।
शासन गोवध
नहीं रोकता
नहीं बचाता पाप से
वाजिब है
वे करें शिकायत
भेदभाव की आपसे
*
दो कानून बनाये हैं क्यों?
अलग उन्हें क्यों जानते?
उनकी बिटियों को बहुएँ
हम कहें नहीं क्यों मानते?
दिये जला, वे होली खेलें
हम न मनाते ईद कभी-
मिटें सभी अंतर से अंतर
ज़िद नहीं क्यों ठानते?
वे बसते पूरे भारत में
हम चलकर कश्मीर बसें।
गिले भुलाकर गले मिलें
हँसकर बाँहों में बाँध-गसें।
एक नहीं हम
नज़र मिलायें
कैसे अपने आपसे?
वाजिब है
वे करें शिकायत
भेदभाव की आपसे
*
(उपराष्ट्रपति श्री हामिद अंसारी द्वारा मुस्लिमों से भेदभाव की शिकायत पर)
आरक्षण सब चाहते, रहा न कोई छोड़
संविधान को स्वार्थ हित, नेता रहे मरोड़
२-९-२०१५
विमर्श:
देवताओं को खुश करने पशु बलि बंद करो : हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय
हमाचल प्रदेश उच्च न्यायलय ने देवताओं को प्रसन्न करने के लिए की जानेवाली पशुबलि पर प्रतिबन्ध लगते हुए कहा है कि हजारों पशुओं को बलि के नाम पर मौत के घाट उतरा जाता है. इसके लिए पशुओं को असहनीय पिद्दा साहनी पड़ती है. न्यायमूर्ति राजीव शर्मा और सुरेश्वर ठाकुर की खंडपीठ के अनुसार इस सामाजिक कुरीति को समाप्त किया जाना जरूरी है. नेयाले ने आदेश किया है कि कोई भी पशुओं की बलि नहीं देगा।
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के माननीय न्यायाधीशों के निर्णय के मुताबिक पशुओं को हो रही असनीय पीड़ा और मौत देना सही नहीं है. प्रश्न यह है कि क्या केवल देव बलि के लिए अथवा मानव की उदर पूर्ती लिए भी? देवबली के नाम पर मरे जा रहे हजारों जानवर बच जाएँ और फिर मानव भोजन के नाम पर मारे जा रहे जानवरों के साथ मारे जाएँ तो निर्णय बेमानी हो जायेगा। यदि सभी जानवरों को किसी भी कारण से मारने पर प्रतिबंध है तो माँसाहारी लोग क्या करेंगे? क्या मांसाहार बंद किया जायेगा?
इस निर्णय का यह अर्थ तो नहीं है की हिन्दु मंदिर में बलि गलत और बकरीद पर मुसलमान बलि दे तो सही? यदि ऐसा है तो यह दुर्भाग्यपूर्ण है. आप सोचें और पानी बात यहाँ कहने के साथ संबंधित अधिकारीयों और जनप्रतिनिधियों तक भी पहुंचाएं।
मुक्तक सलिला:
(त्रयोदशी छंद)
*
मनमानी कर रहे हैं
गधे वेद पढ़ रहे हैं
पंडित पत्थर फोड़ते
उल्लू पद वर रहे हैं
*
कौन किसी का सगा है
अपना देता दगा है
छुरा पीठ में भोंकता
कहे प्रेम में पगा है
*
आप टेंट देखे नहीं,
काना पर को दोष दे
कुर्सी पा रहता नहीं,
कोई अपने होश में
*
भाई-भतीजावाद ने
कमर देश की तोड़ दी
धारा दीन-विकास की
धनवानों तक मोड़ दी
*
आय नौकरों की गिने,
लेते टैक्स वसूल वे
मालिक बाहर पकड़ से,
कहते सही उसूल है
२-९-२०१४
***
मुक्तक
देखकर चलिए बुरा है यह जमाना
लगे ठोकर तो न औरों को बताना
दर्द बाँटेगा न कोई, हँसी होगी
बेहतर है चोट चुप सह मुस्कुराना
***
दोहा
रश्मिरथी दिनकर नमन, रवि भास्कर मार्तण्ड
सूरज सूर्य दिनज नमन, लोहित भानु प्रचंड
*
रात अलार्म लगा रहे, प्रात जग सकें मीत
रहें ना रहें अनिश्चित, हुई आस की जीत
२-९-२०१३
***
दोहा सलिला:
यमक का रंग दोहा के संग-
....नहीं द्वार का काम
*
मन मथुरा तन द्वारका, नहीं द्वार का काम.
प्राणों पर छा गये है, मेरे प्रिय घनश्याम..
*
बजे राज-वंशी कहे, जन-वंशी हैं कौन?
मिटे राजवंशी- अमिट, जनवंशी हैं मौन..
*
'सज ना' सजना ने कहा, कहे: 'सजाना' प्रीत.
दे सकता वह सजा ना, यही प्रीत की रीत..
*
'साजन! साज न लाये हो, कैसे दोगे संग?'
'संग-दिल है संगदिल नहीं, खूब जमेगा रंग'..
*
रास खिंची घोड़ी उमग, लगी दिखने रास.
दर्शक ताली पीटते, खेल आ रहा रास..
*
'किसना! किस ना लौकियाँ, सकूँ दही में डाल.
जीरा हींग बघार से, आता स्वाद कमाल'..
*
भोला भोला ही 'सलिल', करते बम-बम नाद.
फोड़ रहे जो बम उन्हें, कर भी दें बर्बाद..
*
अर्ज़ किया 'आदाब' पर, वे समझे आ दाब.
वे लपके मैं भागकर, बचता फिर जनाब..
*
शब्द निशब्द अशब्द हो, हो जाते जब मौन.
मन से मन तक 'सबद' तब, कह जाता है कौन??
२-९-२०११
***
मुक्तिका
मछलियाँ
*
कामनाओं की तरह, चंचल-चपल हैं मछलियाँ.
भावनाओं की तरह, कोमल-सबल हैं मछलियाँ..
मन-सरोवर-मथ रही हैं, अहर्निश ये बिन थके.
विष्णु का अवतार, मत बोलो निबल हैं मछलियाँ..
मनुज तम्बू और डेरे, बदलते अपने रहा.
सियासत करती नहीं, रहतीं अचल हैं मछलियाँ..
मलिनता-पर्याय क्यों मानव, मलिन जल कर रहा?
पूछती हैं मौन रह, सच की शकल हैं मछलियाँ..
हो विदेहित देह से, मानव-क्षुधा ये हर रहीं.
विरागी-त्यागी दधीची सी, 'सलिल' है मछलियाँ..
***
मुक्तिका:
हाथ में हाथ रहे...
*
हाथ में हाथ रहे, दिल में दूरियाँ आईं.
दूर होकर ना हुए दूर- हिचकियाँ आईं..
चाह जिसकी न थी, उस घर से चूड़ियाँ आईं..
धूप इठलाई तनिक, तब ही बदलियाँ आईं..
गिर के बर्बाद ही होने को बिजलियाँ आईं.
बाद तूफ़ान के फूलों पे तितलियाँ आईं..
जीते जी जिद ने हमें एक तो होने न दिया.
खाप में तेरे-मेरे घर से पूड़ियाँ आईं..
धूप ने मेरा पता जाने किस तरह पाया?
बदलियाँ जबके हमेशा ही दरमियाँ आईं..
कह रही दुनिया बड़ा, पर मैं रहा बच्चा ही.
सबसे पहले मुझे ही दो, जो बरफियाँ आईं..
दिल मिला जिससे, बिना उसके कुछ नहीं भाता.
बिना खुसरो के न फिर लौट मुरकियाँ आईं..
नेह की नर्मदा बहती है गुसल तो कर लो.
फिर न कहना कि नहीं लौट लहरियाँ आईं..
२.९.२०१०
***

मंगलवार, 21 जुलाई 2026

जुलाई २१, सेमल, सॉनेट, हाइकु, माहिया, दोह, मुक्त्क, सुगती, दीप, निधि, छंद, लघुकथा, वर्ष गीत

 सलिल सृजन जुलाई २१

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सामयिक गीत . देश हमारा है, सरकार हमारी है फिर क्यों आईं बुलडोजर की बारी है? . हमने जिनको जनसेवा के हेतु चुना। वे ही जन से दूर हुए सिर लिए तना।। अहंकार ने नाप बताया छाती का- निज महिमा मंडन का भ्रामक पंथ चुना।। आत्म मोह की नागिन नित फुँफकारी है देश हमारा है, सरकार हमारी है फिर क्यों आईं बुलडोजर की बारी है? . पक्ष-विपक्ष न दुश्मन, हैं दोनों आँखें। कैसे उड़े परिंदा अगर न दो पाँखें।। जड़ होती मजबूत वृक्ष की केवल तब जब होती हैं अलग दिशाओं में शाखें।। मतभेदों में सहमति, राह बिसारी है देश हमारा है, सरकार हमारी है फिर क्यों आईं बुलडोजर की बारी है? . हर दल हिस्सा लोकतंत्र का है मानो। बहुमत पा मत कुचलो औरों को स्यानो।। सबका सबसे स्नेह बढ़े वह राह चुनो- सिर्फ तुम्हीं हो सही, गलत मत अनुमानो।। सहें असहमति, यह तहजीब हमारी है देश हमारा है, सरकार हमारी है फिर क्यों आईं बुलडोजर की बारी है? . सिक्के के दो पहलू पक्ष-विपक्ष रहें। नाव और पतवार सरीखे साथ बहें।। देश और जनता की उन्नति हो कैसे? नीति बनाएँ, नव उपाय नित सुनें-कहें।। बहु दल जनहित लक्ष्य, भोर उजियारी है देश हमारा है, सरकार हमारी है फिर क्यों आईं बुलडोजर की बारी है? . दो एंजिन सरकार न संविधान में है। कोटि-कोटि इंजन अपनी पहचान में है।। अगिन देवता अगिन भक्त हैं एक सखे! है कुटुंब दुनिया सारी, भगवान में है।। गैर विपक्षी नहीं, शक्ति दोधारी है देश हमारा है, सरकार हमारी है फिर क्यों आईं बुलडोजर की बारी है? २१.७.२०२६ ०००
सेमल
०
अनुभूति की मिट्टी में
विचारों के बीज
संवेदना का पानी पीकर
फूले न समाए।
फट गया कठोरता का
कृत्रिम आवरण,
सृजन के अंकुर
पैर जमाकर मुस्काए।
संकल्प की जड़ें
जमीं में जमीँ,
प्रयास के पल्लव हरियाए।
गगन चूमने को आतुर
तना तना और
शाखाओं ने हाथ फैलाए।
सूर्य की तपिश झेली
पवन संग करी अठखेली
चाँदनी संग आँख मिचौली
चाँद संग खिलखिलाए।
कभी सब्जी बन मिटाई क्षुधा
कभी चर्म रोग मिटाए
घटाकर बढ़ती उम्र के प्रभाव
रक्त शोधन के काम आए।
लोक कल्याण के लिए
किया आत्म बलिदान
रहकर मौन और बेदाम
इसलिए कुदरत ने सिर पर
लाल फूलों के मुकुट सजाए।
रेशमी कपास का देकर उपहार
बीजों से भरकर पशुओं का पेट
काष्ठ से बनाकर नाव और वाद्य यंत्र
हम पर्णपाती शाल्मली उर्फ़ सेमल
मरकर भी जी पाए,
जिंदगी के तराने गुंजाए।
२१.७.२०२५
***
छंद सलिला
•
हाइकु
पानी बरसे
मेघ-नयन से
रुके न रोके।।
•
घन श्याम से
वर माँगते सब
घनश्याम से।।
•
आँखों में आँखें
डाल डाल झूमती
शाखें ही शाखें।।
•
माहिया
बिन बारिश रोते हैं
बारिश हो जमकर
झट नयन भिगोते हैं।
•
बुलडोजर बाबा जी!
अपने न रहे अपने
काशी या काबा जी।।
•
किस्से ही किस्से हैं,
सुख भोगें नेता
दुख जन के हिस्से हैं।।
•••
जनक छंद
कंकर में शंकर मिले
देख सके तो देख ले
व्यर्थ न कर शिकवे गिले।।
•
हरयाया है ठूँठ हर
हैं विषाक्त फिर भी शहर
हुआ प्रदूषण ही कहर।।
•
खुशगवार मौसम कहे
नाच-झूम, चिंता न कर
होनी होकर ही रहे।।
•••
मुक्तक
आपमें बच्चा सदा जिंदा रहे
झूठ में सच्चा सदा जिंदा रहे
पक रहे, थक-चुक रहे हैं तन सभी
सभी का मन मृदुल अरु कच्चा रहे
•
कौन किसका कब हुआ कहिए कभी
खुद खुदी को जान पाए क्या सभी?
और पर रहते उठाते अँगुलियाँ
अँगुलियाँ खुद पर उठी देखें अभी।।
•
बात मत कर, काम कर
यह न हो बस नाम कर
आत्मश्लाघा दूर रख
नहीं विधि को वाम कर।।
•••
दोहा
कृष्णा कृष्णा कह रहे, रहे कृष्ण से दूर।
दो न, एक यह जान जप, हो दीदार जरूर।।
•
गुरु से गुर जो सीख ले, वही शिष्य मतिमान।
जान, अजान न रह कभी, गुरु ही गुण की खान।।
•
सरला वसुधा दे सदा, जोड़े कभी न कोष।
झोली खाली हो नहीं, यदि मन में संतोष।।
•••
सोरठा
करिए सरस विनोद, अगर समय विपरीत हो।
दे आलोक प्रमोद, संकट टल जाते सभी।।
•
रेखा लंबी आप, खींचें सदा हुजूर जी!
मिटा और की पाप, करें न पाल गुरूर जी।।
•
करें प्रशंसा गैर, निज मुख से करिए नहीं।
सदा रहेगी खैर, करें न निंदा गैर की।।
•••
सुगती छंद
जो भला है
झुक चला है।
बुरा है जो
तना है वो।
आइए हम
मिटाएँ तम।
बाँट दें सुख
माँग लें दुख।
खुश रहें प्रभु!
जीव सब विभु।
•••
छबि छंद
जपिए रमेश
हर दिन हमेश।
छबि में निखार
लाता सुधार।
कर ले प्रयास
फैले सुवास।
मत चाह मोह
मत पाल द्रोह।
चल अंत नाम
कह राम राम।
•••
गंग छंद
घन गरज घूमे
गिरि शिखर चूमे।
झट हुई वर्षा
मन मुकुल हर्षा।
बीज अंँकुराया
भू यश गुँजाया।
फुदक गौरैया
कर ता ता थैया।
मिल बजा ताली
वरो खुशहाली।
•••
निधि छंद
सिय राम निहार
गईं सुधि बिसार।
लख राम सीता
कहते पुनीता।
रसना न बोले
दृग राज खोले।
पल में बनाया
अपना पराया।
दीपक दिपा है
प्रभु की कृपा है।
•••
दीप छंद
दीपक अगिन बाल
नर्तित विहँस बाल।
किरणें थिरक गोल
लाईं मुदित ढोल।
गातीं हुलस गीत
पालें पुलक प्रीत।
सज्जित सुगृह द्वार
हर्षित सुमन वार।
गृहणी मदिर नैन
रुचिकर सुखद बैन।
हैं प्रि‌यतम निहाल
कुंजित पिंक रसाल।
गुरु पूर्णिमा
२१.७.२०२४
•••
सॉनेट
बूँदें
तपती धरती पर पड़ीं बूँदें
तपिश मन की हो गई शांत
भीगकर घर आ गए कांत
पर्ण पर मणि सम जड़ी बूँदें
हाय! लज्जा से गड़ीं बूँदें
देखकर गंदी नदी सूखी
गृह लक्ष्मी हो ज्यों दुखी-भूखी
ठिठक मेघों संग उड़ी बूँदें
हैं महज शुभ की सगी बूँदें
बिकें नेता सम नहीं बूँदें
स्नेह से मिलती पगी बूँदें
आँख से छिप-छिप बहीं बूँदें
गाल पर छप-छप गईं बूँदें
धैर्य धर; ढहती नहीं बूँदें
२१-७-२०२२
***
लघुकथा
सिसकियाँ
सिसकियों की आवाज सुनकर मैंने पीछे मुड़के देखा। सांझ के झुरमुट में घुटनों में सर झुकाए वह सिसक रही थी। उसकी सिसकियाँ सुनकर पूछे बिना न रहा गया। पहले तो उसने कोई उत्तर न दिया, फिर धीरे धीरे बोली- 'क्या कहूँ? मेरे अपने ही जाने-अनजाने मेरे बैरी हो गए।
- तुम उनसे कोई अपेक्षा ही क्यों करती हो?
= अपेक्षा मैं नहीं करती, मुझसे ही अपेक्षा की जाती है कि मैं सबके और हर एक के मन के अनुसार ही खुद को ढाल लूँ। मैं किस-किस के अनुसार खुद को बदलूँ?
- बदलाव ही तो जीवन है। सृष्टि में बदलाव न हो एक सा मौसम, एक से हालात रहें तो विकास ही रुक जाएगा।
= वही तो मैं भी कहती हूँ। मेरा जन्म लोक में हुआ। माताएँ अपने बच्चों को बहलाने के लिए मुझे बुला लेतीं। किसान-मजदूर अपनी थकान भुलाने के लिए मुझे अपना हमसाया पाते। गुरुजन अपने विद्यार्थियों को समझाने, राह दिखाने के लिए मुझे सहायक पाते रहे।
- यह तो बहुत अच्छा है, तुम्हारा होना तो सार्थक हो गया।
= होना तो ऐसा ही चाहिए पर जो होना चाहिए वह होता कहाँ है? हुआ यह कि वर्तमान ने अतीत को पहचनाने से ही इंकार कर दिया। पत्तियों और फूलों ने बीज, अंकुर और जड़ों को अपना मूल मानने से ही इंकार कर दिया।
- यह तो वाकई दुर्भाग्यपूर्ण है।
= बात यहीं तक नहीं है। अब तो अलग अलग फलों ने अलग-अलग यह निर्धारित करना शुरू कर दिया है कि जड़ों, तने और शाखाओं को कैसा होना चाहिए, उनका आकार-प्रकार कैसा हो?, रूप रंग कैसा हो?
- ऐसा तो नहीं होना चाहिए। पत्तियों, फूलों और फलों को समझना चाहिए कि अतीत को बदला नहीं जा सकता, न झुठलाया जा सकता है।
= कौन किसे समझाए? हर पत्ती, फूल और फल खुद को नियामक मानकर नित नए मानक तय कर खुद को मसीहा मान बैठे हैं।
- तुम कौन हो? किसके बारे में बात कर रही हो?
= मैं उस वृक्ष की जीवन शक्ति हूँ जिसे तुम कहते हो लघुकथा।
२१.७.२०२१ ***
दोहा सलिला
*
प्रभु सारे जग का रखे, बिन चूके नित ध्यान।
मैं जग से बाहर नहीं, इतना तो हैं भान।।
*
कौन किसी को कर रहा, कहें जगत में याद?
जिसने सब जग रचा है, बिसरा जग बर्बाद
*
जिसके मन में जो बसा वही रहे बस याद
उसकी ही मुस्कान से सदा रहे दिलशाद
*
दिल दिलवर दिलदार का, नाता जाने कौन?
दुनिया कब समझी इसे?, बेहतर रहिए मौन
*
स्नेह न कांता से किया, समझो फूटे भाग
सावन की बरसात भी, बुझा न पाए आग
*
होती करवा चौथ यदि, कांता हो नाराज
करे कृपा तो फाँकिये, चूरन जिस-तिस व्याज
*
प्रभु सारे जग का रखें, बिन चूके नित ध्यान।
मैं जग से बाहर नहीं, इतना तो हैं भान।।
*
कौन किसी को कर रहा, कहें जगत में याद?
जिसने सब जग रचा है, बिसरा जग बर्बाद
*
जिसके मन में जो बसा वही रहे बस याद
उसकी ही मुस्कान से सदा रहे दिलशाद
*
दिल दिलवर दिलदार का, नाता जाने कौन?
दुनिया कब समझी इसे?, बेहतर रहिए मौन
*
स्नेह न कांता से किया, समझो फूटे भाग
सावन की बरसात भी, बुझा न पाए आग
*
होती करवा चौथ यदि, कांता हो नाराज
करे कृपा तो फाँकिये, चूरन जिस-तिस व्याज
***
बरसाती गीत
*
नहा रहे हैं
बरसातों में
हरे-भरे बतियाते झाड़
अपनी जगह
हमेशा ठांड़े
झूम-झूम मस्ताते झाड़
*
सूर्य-बल्ब
जब होता रौशन
मेक'प करते बिना छिपे.
शाखाओं,
कलियों फूलों से
मिलते, नहीं लजाते झाड़
नहा रहे हैं
बरसातों में
हरे-भरे बतियाते झाड़
अपनी जगह
हमेशा ठांड़े
झूम-झूम मस्ताते झाड़
*
बऊ धरती
आँखें दिखलाये
बहिना हवा उड़ाये मजाक
पर्वत दद्दा
आँख झुकाये,
लता संग इतराते झाड़
नहा रहे हैं
बरसातों में
हरे-भरे बतियाते झाड़
अपनी जगह
हमेशा ठांड़े
झूम-झूम मस्ताते झाड़
*
कमसिन सपने
देख थिरकते
डेटिंग करें बिना हिचके
बिना गये
कर रहे आउटिंग
कभी नहीं पछताते
नहा रहे हैं
बरसातों में
हरे-भरे बतियाते झाड़
अपनी जगह
हमेशा ठांड़े
झूम-झूम मस्ताते झाड़
***
हाइकू सलिला
*
हाइकू लिखा
मन में झाँककर
अदेखा दिखा।
*
पानी बरसा
तपिश शांत हुई
मन विहँसा।
*
दादुर कूदा
पोखर में झट से
छप - छपाक।
*
पतंग उड़ी
पवन बहकर
लगा डराने
*
हाथ ले डोर
नचा रहा पतंग
दूसरी ओर
२१.७.२०१९
***
नवगीत:
*
मेघ बजे
नभ ठाकुर की ड्योढ़ी पर
फिर मेघ बजे
ठुमुक बिजुरिया
नचे बेड़नी बिना लजे
*
दादुर देते ताल,
पपीहा-प्यास बुझी
मिले मयूर-मयूरी
मन में छाई खुशी
तोड़ कूल-मरजाद
नदी उफनाई तो
बाबुल पर्वत रूठे
तनया तुरत तजे
*
पल्लव की करताल
बजाती नीम मुई
खेत कजलियाँ लिये
मेड़ छुईमुई हुई
जन्मे माखनचोर
हरीरा भक्त पिये
गणपति बप्पा, लाये
मोदक हुए मजे
*
टप-टप टपके टीन
चू गयी है बाखर
डूबी शाला हाय!
पढ़ाये को आखर?
डूबी गैल, बके गाली
अभियंता को
डुकरो काँपें, 'सलिल'
जोड़ कर राम भजे
***
दोहा सलिला:
कुछ दोहे बरसात के
*
गरज नहीं बादल रहे, झलक दिखाकर मौन
बरस नहीं बादल रहे, क्यों? बतलाये कौन??
*
उमस-पसीने से हुआ, है जनगण हैरान
जल्द न देते जल तनिक, आफत में है जान
*
जो गरजे बरसे नहीं, हुई कहावत सत्य
बिन गरजे बरसे नहीं, पल में हुई असत्य
*
आँख और पानी सदृश, नभ-पानी अनुबंध
बन बरसे तड़पे जिया, बरसे छाये धुंध
*
पानी-पानी हैं सलिल, पानी खो घनश्याम
पानी-पानी हो रहे, दही चुरा घनश्याम
*
बरसे तो बरपा दिया, कहर न बाकी शांति
बरसे बिन बरपा दिया, कहर न बाकी कांति
*
धन-वितरण सम विषम क्यों, जल वितरण जगदीश?
कहीं बाढ़ सूखा कहीं, पूछे क्षुब्ध गिरीश
*
अधिक बरस तांडव किया, जन-जीवन संत्रस्त
बिन बरसे तांडव किया, जन-जीवन अभिशप्त
*
महाकाल से माँगते, जल बरसे वरदान
वर देकर डूबे विवश, महाकाल हैरान
२०.७.२०१९
***
जा विदेश में बोलिए, हिन्दी तब हो गर्व.
क्या बोला सुन समझ लें, भारतीय हम सर्व.
कर किताब से मित्रता, रह तनाव से दूर.
शान्त चित्त खेलो क्रिकेट, मिले वाह भरपूर.
चौको से यारी करो, छक्को से हो प्यार.
शतक साथ डेटिग करो, मीताली सौ बार.
अंग्रेजी का मोह तज, कर हिन्दी में बात.
राज दिलों पर राज का, यह मीताली राज.
राज मिताली राज का, तूफानी रफ़्तार.
राज कर रही विकेट पर, दौड़ दौड़ हर बार.
खेलो हर स्ट्रोक तुम, पीटो हँस हर गेंद.
गेंदबाज भयभीत हो, लगा न पाए सेंध.
दस हजार का लक्ष्य ले, खेलो धरकर धीर.
खेल नायिका पा सको, नया नाम रन वीर.
चौको छक्को की करी, लगातार बरसात.
हक्का बक्का रह गए, कंगारू खा मात.
हरमन पर हर मन फिदा, खूब दिखाया खेल.
कंगारू पीले पड़े, पल में निकला तेल.
सरहद सारी सुरक्षित, दुश्मन फौज फ़रार.
पता पड़ गया आ रही, हरमन करने वार.
हरमन ने की दनादन, चोट, चोट पर चोट.
दीवाली की बम लडी, ज्यों करती विस्फ़ोट.
षटपदी
गेंदबाज चकरा गए, भूले सारे दाँव.
पंख उगे हैं गेंद के, या ऊगे हैं पाँव.
या ऊगे हैं पाँव विकेटकीपर को भूली.
आँख मिचौली खेल, भीड़ के हाथों झूली.
हरमन से कर प्रीत, शोट खेल में छा गए.
भूले सारे दाँव, गेदबाज चकरा गए.
***
मुक्तिका:
बरसात में
*
बन गयी हैं दूरियाँ, नज़दीकियाँ बरसात में.
हो गये दो एक, क्या जादू हुआ बरसात में..
आसमां का प्यार लाई जमीं तक हर बूँद है.
हरी चूनर ओढ़ भू, दुल्हन बनीं बरसात में..
तरुण बादल-बिजुरिया, बारात में मिल नाचते.
कुदरती टी.वी. का शो है, नुमाया बरसात में..
डालियाँ-पत्ते बजाते बैंड, झूमे है हवा.
आ गयीं बरसातियाँ छत्ते लिये बरसात में..
बाँह उनकी राह देखे चाह में जो हैं बसे.
डाह हो या दाह, बहकर गुम हुई बरसात में..
चू रहीं कवितायेँ-गज़लें, छत से- हम कैसे बचें?
छंद की बौछार लायीं, खिड़कियाँ बरसात में..
राज-नर्गिस याद आते, भुलाये ना भूलते.
बन गये युग की धरोहर, काम कर बरसात में..
बाँध,झीलें, नदी विधवा नार सी श्री हीन थीं.
पा 'सलिल' सधवा सुहागन, हो गयीं बरसात में..
मुई ई कविता! उड़ाती नींद, सपने तोड़कर.
फिर सजाती नित नये सपने 'सलिल' बरसात में..
***
मुक्तिका
*
कल दिया था, आज लेता मैं सहारा
चल रहा हूँ, नहीं अब तक तनिक हारा
सांस जब तक, आस तब तक रहे बाकी
जाऊँगा हँस, ईश ने जब भी पुकारा
देह निर्बल पर सबल मन, हौसला है
चल पड़ा हूँ, लक्ष्य भूलूँ? ना गवारा
पाँव हैं कमजोर तो बल हाथ का ले
थाम छड़ियाँ खड़ा पैरों पर दुबारा
साथ दे जो मुसीबत में वही अपना
दूर बैठा गैर, चुप देखे नज़ारा
मैं नहीं निर्जीव, हूँ संजीव जिसने
अवसरों को खोजकर फिर-फिर गुहारा
शक्ति हो तब संग जब कोशिश करें खुद
सफलता हो धन्य जब मुझको निहारा
२१.७.२०१६
***
दोहा - सोरठा गीत
पानी की प्राचीर
*
आओ! मिलकर बचाएँ,
पानी की प्राचीर।
पीर, बाढ़ - सूखा जनित
हर, कर दे बे-पीर।।
*
रखें बावड़ी साफ़,
गहरा कर हर कूप को।
उन्हें न करिये माफ़,
जो जल-स्रोत मिटा रहे।।
चेतें, प्रकृति का कहीं,
कहर न हो, चुक धीर।
आओ! मिलकर बचाएँ,
पानी की प्राचीर।।
*
सकें मछलियाँ नाच,
पोखर - ताल भरे रहें।
प्रणय पत्रिका बाँच,
दादुर कजरी गा सकें।।
मेघदूत हर गाँव को,
दे बारिश का नीर।
आओ! मिलकर बचाएँ,
पानी की प्राचीर।।
*
पर्वत - खेत - पठार पर
हरियाली हो खूब।
पवन बजाए ढोलकें,
हँसी - ख़ुशी में डूब।।
चीर अशिक्षा - वक्ष दे ,
जन शिक्षा का तीर।
आओ मिलकर बचाएँ,
पानी की प्राचीर।।
२०-७-२०१६
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सोरठा - दोहा गीत
संबंधों की नाव
*
संबंधों की नाव,
पानी - पानी हो रही।
अनचाहा अलगाव,
नदी-नाव-पतवार में।।
*
स्नेह-सरोवर सूखते,
बाकी गन्दी कीच।
राजहंस परित्यक्त हैं,
पूजते कौए नीच।।
नहीं झील का चाव,
सिसक रहे पोखर दुखी।
संबंधों की नाव,
पानी - पानी हो रही।।
*
कुएँ - बावली में नहीं,
शेष रहा विश्वास।
निर्झर आवारा हुआ,
भटके ले निश्वास।।
घाट घात कर मौन,
दादुर - पीड़ा अनकही।
संबंधों की नाव,
पानी - पानी हो रही।।
*
ताल - तलैया से जुदा,
देकर तीन तलाक।
जलप्लावन ने कर दिया,
चैनो - अमन हलाक।।
गिरि खोदे, वन काट
मानव ने आफत गही।
संबंधों की नाव,
पानी - पानी हो रही।।
२०-७-२०१६
***
अश्'आर
बसा लो दिल में, दिल में बस जाओ / फिर भुला दो तो कोई बात नहीं
*
खुद्कुशी अश्क की कहते हो जिसे / वो आंसुओं का पुनर्जन्म हुआ
*
अल्पना कल्पना की हो ऐसी / द्वार जीवन का जरा सज जाये.
*
गौर गुरु! मीत की बातों पे करो / दिल किसी का दुखाना ठीक नहीं
*
श्री वास्तव में हो वहीं, जहां रहे श्रम साथ / जीवन में ऊन्चा रखे श्रम ही हरदम माथ
*
खरे खरा व्यव्हार कर, लेते हैं मन जीत / जो इन्सान न हो खरे, उनसे करें न प्रीत.
*
गौर करें मन में नहीं, 'सलिल' तनिक हो मैल / कोल्हू खीन्चे द्वेष का, इन्सां बनकर बैल
*
काया की माया नहीं जिसको पाती मोह, वही सही कायस्थ है, करे गलत से द्रोह.
२१.७.२०१४
०००
नवगीत:
संजीव
*
हर चेहरे में
अलग कशिश है
आकर्षण है
*
मिलन-विरह में,
नयन-बयन में
गुण-अवगुण या
चाल-चलन में
कहीं मोह का
कहीं द्रोह का
संघर्षण है
*
मन की मछली,
तन की तितली
हाथ न आयी
पल में फिसली
क्षुधा-प्यास का
हास-रास का
नित तर्पण है
*
चितवन चंचल
सद्गुण परिमल
मृदु मिठासमय
आनन मंजुल
हाव-भाव ये
ताव-चाव ये
प्रभु-अर्पण है
*
गिरि सलिलाएँ
काव्य-कथाएँ
कहीं-अनकहीं
सुनें-सुनाएँ
कलरव-गुंजन
माटी-कंचन
नव दर्पण है
*
बुनते सपने
मन में अपने
समझ न आते
जग के नपने
जन्म-मरण में
त्याग-वरण में
संकर्षण है
*
प्रयास अलीगढ में दिसंबर २००७ में प्रकाशित