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रविवार, 18 अक्टूबर 2026

अक्टूबर १८, हाइकु, दोहा, भाषा गीत, व्यंग्य गीत, धन तेरस, लक्ष्मी,

सलिल सृजन अक्टूबर १८
*
हाइकु सलिला
.
भूख मिटाने
संयम ही है राह
चाह अथाह।
.
भूख न देखे
अमीर या गरीब
जाति या धर्म।
.
ज्ञान की भूख
सदा बढ़ती रहे
समझदारी।
.
कभी न घटे
दुनिया जहान से
भूख के मारे।
.
धन की भूख
निरंतर बढ़ती
कमा-लुटाओ।
.
दे बदनामी
गर न नियंत्रित
तन की भूख।
.
नाम की भूख
मिटकर न मिटे
रक्तबीज है।
०००
दोहा सलिला
श्रवण
०
श्रवण-मनन-चिंतन करें, करें न चिंता आप।
काम करें निष्काम हर, सुख जाए मन-व्याप।।
.
श्रवण न संसद में करें, नेता बोलें खूब।
बात बिना सिर-पैर की, सुनकर होती ऊब।।
.
बिना मनन केवल श्रवण, हो जाता है व्यर्थ।
सुनें-गुनें आचरण में, अपनाएँ तब अर्थ।।
.
करें श्रमण सम जो श्रवण, रमण करें दिन-रात।
"सलिल" सत्य की प्राप्ति हो, जिसे न करता बात।।
.
सन इस कान निकाल दे, उससे मन की बात।
श्रवण करो केवल "सलिल", जन-गण-मन की बात।।
१८.१०.२०२६
०००
धन-तेरस
०
धन-तेरस सब जानें
धन ते रस सब मानें
धन ते प्रिय हँसता क्या?
धन ते सुख मिलता क्या?
ज्यों की त्यों चादर को
धन पा जन रखता क्या?
धन बिन सार्थक जीवन
कब मिलता धन ते जस?
परमात्मा-आत्मा का
बंधन के धन के बस?
धन कब किसको करता
बोल तनिक भी तेजस?
बस में जो धन के हो
उसका जीवन नीरस,
बस में धन जिसके हो
पाता वह ही षड्-रस।
०००
धन्वन्तरि प्राकट्य- दिवस
(धनतेरस)
=========
आरोग्यशास्त्र के प्रवर्तक भगवान धन्वन्तरि के समुद्र से अवतरण की तिथि कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी "धन्वंतरि- जयंती" के रूप मे प्रतिष्ठित है। श्रीमद्भागवत के अनुसार धन्वंतरि भगवान विष्णु के अंशावतार थे। भगवान धन्वंतरि का अनुग्रह न केवल सांसारिक प्राणियों पर ही है, अपितु देवता भी इन्हीं के आश्रय से असुरों की विभीषिका से मुक्त होकर स्वस्थ, निर्भीक एवं आनंदित हो सके थे। बात उस समय की है, जब देवगणों से महर्षि दुर्वासा जी का अपराध बन पड़ा था और इसके परिणामस्वरूप न केवल देवता अपितु त्रिलोक श्रीहीन हो गया था। दैवीसम्पद के विलुप्त हो जाने से सर्वत्र आसुरी साम्राज्य स्थापित हो चुका था। दुखी हो देवता ब्रह्माजी को साथ लेकर भगवान नारायण की शरण मे पहुंचे। नारायण ने उन्हे असुरों को साथ लेकर समुद्र मंथन का परामर्श दिया और बताया कि इस मंथन से अमृत का कलश लेकर स्वयं मै धन्वन्तरि नाम से प्रकट होऊँगा और इस अमृत के बल पर आप लोग सदा के लिए अमर हो जाएंगे।
वेदव्यासजी श्रीमद्भागवत मे धन्वन्तरि के अवतरण का वर्णन करते हुये कहते हैं कि उस समय समुद्र के मध्य से जो दिव्यपुरुष प्रकट हुए थे, वे बड़े ही सुंदर तथा मनोज्ञ थे।उनके सभी अंग अनेक प्रकार के दिव्याभूषणों तथा अलंकारों से अलंकृत थे। उनकी तरुण अवस्था थी तथा उनका सौंदर्य अनुपम था। चिकने और घुंघराले बाल लहराते हुए उनकी छवि बड़ी अनोखी थी। उन्होंने अमृत से पूर्ण कलश धारण कर रखा था। वे साक्षात विष्णु के अंशावतार थे। वे ही आयुर्वेद के प्रवर्तक तथा यज्ञभोक्ता धन्वंतरि के नाम से सुप्रसिद्ध हुए। महर्षि वाल्मीकि ने उन्हें "आयुर्वेदमय" कहा है। वे नारायण के अंश से ही अवतरित थे।उस समय भगवान विष्णु ने अप् (जल) से उत्पन्न होने के कारण उनका "अब्ज" यह नाम रखा और अनेक वर प्रदान करते हुए उनसे कहा वत्स! तुम्हारा आविर्भाव तीनों लोकों का कल्याण करने के लिए हुआ है ।अब अमृत प्राप्त कर देवता असुरों के उत्पीड़न से मुक्त हो जाएंगे। दूसरे जन्म मे तुम आयुर्वेद को परावर्तित करके उसे आठ अंगों में विभाजित कर आरोग्य के दान से जीवमात्र का कल्याण करोगे। देवताओं के अजर, अमर तथा निरामय आदि नाम भगवान धन्वंतरि के प्रभाव से ही सार्थक हुये और भगवान धन्वंतरि आयुर्वेद के प्रवर्तक तथा आरोग्य के देवता रूप में प्रतिष्ठित हो गये।
इन्हीं भगवान धन्वंतरि ने कालांतर मे काशिराज 'धन्व' के यहां जन्म लिया और उनका नाम भी धन्वंतरि ही पड़ा। वे भी नारायण के ही परंपरा- प्राप्त अवतार थे ।उनमे सब प्रकार के रोगों को दूर करने की शक्ति प्रतिष्ठित थी। हरिवंशपुराण मे भगवान धन्वंतरि ने स्वयं कहा है कि देवताओं की वृद्धावस्था, रोग तथा मृत्यु को दूर करनेवाला आदिदेव धन्वंतरि मै ही हूं ।आयुर्वेद के अन्य अंगों सहित शल्यतंत्र का उपदेश करने के लिए फिर से इस पृथ्वी पर आया हूं। भागवत आदि अनेक ग्रंथों मे इन्हें "दीर्घतमा" का पुत्र भी कहा गया है। शल्यशास्त्र के प्रमुख ग्रंथ 'सुश्रुत संहिता' मे अंकित है कि काशिराज धन्वंतरि से ही महर्षि सुश्रुत ने सम्पूर्ण आयुर्वेद ग्रहण किया। वहां धन्वंतरि को "दिवोदास धन्वन्तरि" कहा गया है। इस प्रकार भगवान नारायण पहले अब्ज धन्वंतरि के रूप मे, पुनः काशिराज धन्वंतरि के रूप में अवतरित हुए। उनके समुद्र से अवतरण की तिथि कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी "धन्वंतरि -जयन्ती" के रूप मे प्रतिष्ठित है। आरोग्य के अधिष्ठातृ देवता के रूप मे इस तिथि को इनका विशेष पूजन आराधन आदि समारोह किया जाता है तथा आरोग्य के अवदान एवं कृपा प्राप्ति की प्रार्थना की जाती है।
दक्षिण भारत मे विशेष रूप से केरल मे भगवान धन्वंतरि के अनेक मंदिर और विग्रह प्रतिष्ठित हैं।तमिलनाडु के श्री रंगनाथस्वामी मंदिर के आवरण मे एक धन्वंतरि मंदिर है। वहां स्थानीय लोग रोगों से छुटकारा पाने के लिए धन्वंतरि की पूजा ,अभिषेक आदि करवाते हैं। इसी प्रकार कांचीपुरम के वरदराज स्वामी के मंदिर के परिसर मे भी धन्वंतरि का एक छोटा सा मंदिर है। सबसे अधिक सुंदर, विशाल तथा प्रत्येक रूप का मंदिर केरल के नेल्लूवायि मे है। यह पलक्कड़ तथा त्रिशूर के बीच स्थित है ।इस मंदिर के मुख्य देवता धन्वंतरि हैं। बहुत दूर से रोगग्रस्त लोग आकर यहां कुछ दिन रहकर सेवा करते हैं और रोगों से मुक्त होकर आनंद से वापस लौटते हैं ।केरल मे "अष्टवैद्य" नामक वैद्यों के वंश प्रसिद्ध हैं। उनके वंशज अभी भी वैद्य -चिकित्सा से जनता की सेवा कर रहे हैं। इन वैद्य -वंशजों मे धन्वंतरि पूजा का विशिष्ट संप्रदाय चला आ रहा है।
भगवान धन्वन्तरि हम सभी को आरोग्य प्रदान करें। स्वास्थ्य ही सबसे बडा धन है।"धन" तेरस पर अपने स्वास्थ्य का भी चिंतन किया जाय।
१८.१०.२०१५
०००
अनुष्ठान:
लक्ष्मी मंत्र : क्यों और कैसे?
सहस्त्रों वर्ष पूर्व रचित भागवत पुराण के अनुसार कलियुग में एक अच्छा कुल (परिवार) वही कहलाएगा, जिसके पास सबसे अधिक धन होगा। आजकल धन जीवन की आवश्यकता पूर्ति का साधन मात्र नहीं, समाज में सम्मान पाने आधार है। जीवन में सफलता के दो आधार भाग्य और पौरुष हैं। तुलसी 'हुईहै सोहि जो राम रचि राखा / को करि तरक बढ़ावै साखा' के साथ 'कर्म प्रधान बिस्व करि राखा / जो जस करहि सो तस फल चाखा' कहकर इस द्वैत को व्यक्त करते हैं। शास्त्रों में 'उद्यमेन हि सिद्धन्ति कार्याणि न मनोरथैः / नहिं सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशंति मुख्य मृगा:' कहकर कर्म का महत्त्व दर्शाया गया है। गीता भी 'कर्मण्येवाधिकारस्ते माँ फलेषु कदाचन' अर्थात 'कर्म मात्र अधिकार तुम्हारा, क्या फल होगा सोच न कऱ निष्काम कर्म हेतु प्रेरित करती है।
यह भी देखा जाता है कि भाग्य में धन लिखा है तो किसी न किसी प्रकार मिल जाता है, भाग्य में न हो तो सकल सावधानी के बाद भी सब वैभव नष्ट हो जाता है। सत्य नारायण की कथा के अनुसार अपने पूर्व जन्मों के कर्म का फल भी जीव को भोगना पड़ता है। ज्योतिष शास्त्र तथा धार्मिक कर्मकांड के अनुसार अनेक शास्त्रीय उपाय हैं जिन्हें करने से मनुष्य अपनी इच्छाओं को पूर्ण करने में सक्षम होता है। ये शास्त्रीय उपाय मंत्र जाप, दान-पुण्य आदि हैं। धनवान बनने हेतु जातक की राशि के अनुसार धन की देवी लक्ष्मी के मंत्र का जाप करने से जातक पर धन-वर्षा होकर जीवन से दरिद्रता दूर होती है और वह सुखी बनता है। लक्ष्मी का आशीर्वाद जीवन में धन और खुशहाली दोनों लाते हैं।
मेष राशि- मंगल ग्रह से प्रभावित मेष जातक में कम साधनों में गुजारा करने का गुण नहीं होता। ये हमेशा जीवन से अधिक की अपेक्षा रखते हैं। मेष जातक को धन हेतु ‘श्रीं’ मंत्र का जाप १०००८ बार करना चाहिए।
वृषभ राशि- परिवार व जीवन के प्रति संवेदनशील वृषभ जातक 'ॐ सर्व बढ़ा विनिर्मुक्तो धन-धान्यसुतान्वित:। मनुष्योमत्प्रसादेन भविष्यति न संशय:।।' मंत्र की एक माला नित्य जपें।
मिथुन राशि- दोहरे व्यक्तित्ववाले मिथुन जातक अपनी धुन के पक्के तथा कार्य के प्रति समर्पित होते हैं। इन्हें 'ॐ श्रीं श्रींये नम:' मंत्र की एक माला नित्य जपनी चाहिए ।
कर्क राशि- परिवार की हर आवश्यकतापूर्ति को अपनी जिम्मेदारी समझनेवाले कर्क जातक 'ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ॐ॥' मंत्र की एक माला नित्य जपें।
सिंह राशि- सम्मान, यश व धन के प्रति बेहद आकर्षित रहनेवाले सिंह जातक 'ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नम:' मंत्र की एक माला नित्य जपें।
कन्या राशि- समझदार और सभी लोगों को साथ लेकर चलने वाले कन्या जातकों की जीवन के प्रति सोच सरल किन्तु शेष से भिन्न होती है। ये 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्मी नम:' मंत्र की एक माला नित्य प्रात: जपें।
तुला राशि- समझदार और सुलझे तुला जातक' ॐ श्रीं श्रीय नम:' मंत्र की एक या अधिक माला नित्य जपें।
वृश्चिक राशि- जीवनारंभ में परेशानियाँ झेल, २८ वर्ष के होने तक संपन्न होनेवाले वृश्चिक जातक अधिक उन्नति हेतु 'ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीभयो नम:' मन्त्र की एक माला नित्य जपें।
मकर राशि- मेहनती-समझदार मकर जातक जल्दबाजी न कर, हर काम सोच-विचार कर करते हैं। ये ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौं ॐ ह्रीं क्लीं ह्रीं श्रीं ह्रीं क्लीं ह्रीं ॐ सौं ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं ॐ॥' मंत्र की एक माला नित्य जपें।
कुंभ राशि- कुम्भ राशि स्वामी शनि कर्मानुसार फल देने वाला ग्रह है। कुम्भ जातक कर्मानुसार शुभाशुभ फल शीघ्र पाते हैं। इन्हें 'ऐं ह्रीं श्रीं अष्टलक्ष्यम्ये ह्रीं सिद्धये मम गृहे आगच्छागच्छ नमः स्वाहा।' मंत्र की एक माला जाप नित्य जपना चाहिए।
मीन राशि- राशि स्वामी देवगुरु बृहस्पतिधन-धान्य प्रदाता हैं। मीन जातक को ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नम:' मंत्र की दो माला नित्य जपने से फल की प्राप्ति होगी।
१८-१०-२०१७
***
धन तेरस
बरसे रस...
*
मत निन्दित
बन वन्दित।
कर ले श्रम
मन चंदित।
रचना कर
बरसे रस।
मनती तब
धन तेरस ...
*
कर साहस
वर ले यश।
ठुकरा मत
प्रभु हों खुश।
मन की सुन
तन को कस।
असली तब
धन तेरस ...
*
सब की सुन
कुछ की गुन।
नित ही नव
सपने बुन।
रख चादर
जस की तस।
उजली तब
धन तेरस
***
एक शेर -
मुहब्बत भी सिमट कर रह गयी है चंद घंटों की
कि जिस दिन याद करते हैं , उसी दिन भूल जाते हैं.. -सुरेंद्र श्रीवास्तव
तुड़ा उपवास करवाचौथ का नेता सियासत में
लपटकर गैर की बाँहों में अपने भूल जाते हैं - संजीव
१८-१०-२०१६
***
भाषा गीत
(९० भाषाएँ सम्मिलित)
.
हिंद और हिंदी की जय-जयकार करें हम
भारत की सब भाषाओं से प्यार करें हम
*
भाषा सहोदरी होती है, हर प्राणी की
अक्षर-शब्द बसी छवि, शारद कल्याणी की
नाद-ताल, रस-छंद, व्याकरण शुद्ध सरलतम
जो बोले वह लिखें-पढ़ें, विधि जगवाणी की
संस्कृत सुरवाणी अपना, गलहार करें हम
हिंद और हिंदी की, जय-जयकार करें हम
भारत की माटी, हिंदी से प्यार करें हम
*
असमी, उड़िया, कश्मीरी, डोगरी, कोंकणी,
कन्नड़, तमिल, तेलुगु, गुजराती, नेपाली,
मलयालम, मणिपुरी, मैथिली, बोडो, उर्दू
पंजाबी, बांगला, मराठी सह संथाली
सिंधी पश्तो बोल, लिखें व्यवहार करें हम
​​हिंद और हिंदी की, जय-जयकार करें हम
भारत की माटी, हिंदी से प्यार करें हम
*
ब्राम्ही, प्राकृत, पाली, बृज, अपभ्रंश, बघेली,
अवधी, कैथी, गढ़वाली, गोंडी, बुन्देली,
राजस्थानी, हल्बी, छत्तीसगढ़ी, मालवी,
भोजपुरी, मारिया, कोरकू, मुड़िया, नहली,
परजा, गड़वा, कोलमी का सत्कार करें हम
​हिंद और हिंदी की, जय-जयकार करें हम
भारत की माटी, हिंदी से प्यार करें हम
*
शेखावाटी, डिंगल, हाड़ौती, मेवाड़ी
​कन्नौजी, ​​​​मागधी, ​​​खोंड​,​ ​सादरी, निमाड़ी​,
​सरायकी​, डिंगल​, ​खासी, ​​​​अंगिका,​ ​बज्जिका,
​जटकी, हरयाणवी,​ बैंसवाड़ी,​ ​​मारवाड़ी,​
मीज़ो​,​ मुंडा​री​​,​​ ​गारो​ ​​ ​​भुज-हार करें हम ​
​​​​​​हिन्द और हिंदी की जय-जयकार करें हम
भारत की माटी, हिंदी से प्यार करें हम
*
कुई​,​ मिशिंग​,​​​ ​तुलु​, ​हो​, ​भीली, खाड़ो में गाएँ
कुरूख, खानदेशी​, नागा, शेमा पढ़ पाएँ
कोकबराक, म्हार, आओ, निशि, मिकिर, सावरा
कोया, खडिया, मालतो, कोन्याक गुंजाएँ
जौनसारी, कच्छी, मुंडा, उच्चार करें हम
​हिन्द और हिंदी की जय-जयकार करें हम
भारत की माटी, हिंदी से प्यार करें हम
*
देवनागरी लिपि, स्वर-व्यंजन, अलंकार पढ़
शब्द-शक्तियाँ, तत्सम-तद्भव, संधि, बिंब गढ़
गीत, कहानी, लेख, समीक्षा, नाटक रचकर
समय, समाज, मूल्य मानव के नए सकें मढ़
'सलिल' विश्व, मानव, प्रकृति-उद्धार करें हम
हिन्द और हिंदी की जय-जयकार करें हम
भारत की माटी, हिंदी से प्यार करें हम
***
व्यंग्य गीत :
मेरी आतुर आँखों में हैं
*
मेरी आतुर आँखों में हैं
सपना मैं भी लौटा पाऊँ
कभी कहीं तो एक इनाम।
*
पहला सुख सूचना मिलेगी
कोई मुझे सराह रहा.
मुझे पुरस्कृत करना कोई
इस दुनिया में चाह रहा.
अपने करते रहे तिरस्कृत
सदा छिपाया कड़वा सच-
समाचार छपवा सुख पाऊँ
खुद से खुद कह वाह रहा.
मेरी आतुर आँखों में हैं
नपना, छपता अख़बारों में
मैं भी देख सकूँ निज नाम।
*
दूजा सुख मैं लेने जाऊँ
पुरस्कार, फूले छाती.
महसूसूं बिन-दूल्हा-घोड़ा
मैं बन पाया बाराती.
फोटू खिंचे-छपे, चर्चा हो
बिके किताब हजारों में
भाषण - इंटरव्यू से गर्वित
हों मेरे पोते-नाती।
मेरी आतुर आँखों में हैं
समारोह करतल ध्वनि
सभागार की दिलकश शाम।
*
तीजा सुख मैं दोष किसी को
दे, सिर ऊँचा कर पाऊँ.
अपनी करनी रहूँ छिपाये
दोष अन्य के गिनवाऊँ.
चुनती जिसे करोड़ों जनता
मैं उसको ही कोसूँगा-
अहा! विधाता सारी गड़बड़
मैं उसके सर थोपूँगा.
मेरी आतुर आँखों में हैं
गर्वित निज छवि, देखूँ
उसका मिटता नाम।
१८-१०-२०१५
***
अंध श्रद्धा और अंध आलोचना के शिकंजे में भारतीय फलित विद्याएँ
भारतीय फलित विद्याओं (ज्योतषशास्त्र, सामुद्रिकी, हस्तरेखा विज्ञान, अंक ज्योतिष आदि) तथा धार्मिक अनुष्ठानों (व्रत, कथा, हवन, जाप, यज्ञ आदि) के औचित्य, उपादेयता तथा प्रामाणिकता पर प्रायः प्रश्नचिन्ह लगाये जाते हैं. इनपर अंधश्रद्धा रखनेवाले और इनकी अंध आलोचना रखनेवाले दोनों हीं विषयों के व्यवस्थित अध्ययन, अन्वेषणों तथा उन्नयन में बाधक हैं. शासन और प्रशासन में भी इन दो वर्गों के ही लोग हैं. फलतः इन विषयों के प्रति तटस्थ-संतुलित दृष्टि रखकर शोध को प्रोत्साहित न किये जाने के कारण इनका भविष्य खतरे में है.
हमारे साथ दुहरी विडम्बना है
१. हमारे ग्रंथागार और विद्वान सदियों तक नष्ट किये गए. बचे हुए कभी एक साथ मिल कर खोये को दुबारा पाने की कोशिश न कर सके. बचे ग्रंथों को जन्मना ब्राम्हण होने के कारण जिन्होंने पढ़ा वे विद्वान न होने के कारण वर्णित के वैज्ञानिक आधार नहीं समझ सके और उसे ईश्वरीय चमत्कार बताकर पेट पालते रहे. उन्होंने ग्रन्थ तो बचाये पर विद्या के प्रति अन्धविश्वास को बढ़ाया। फलतः अंधविरोध पैदा हुआ जो अब भी विषयों के व्यवस्थित अध्ययन में बाधक है.
२. हमारे ग्रंथों को विदेशों में ले जाकर उनके अनुवाद कर उन्हें समझ गया और उस आधार पर लगातार प्रयोग कर विज्ञान का विकास कर पूरा श्रेय विदेशी ले गये. अब पश्चिमी शिक्षा प्रणाली से पढ़े और उस का अनुसरण कर रहे हमारे देशवासियों को पश्चिम का सब सही और पूर्व का सब गलत लगता है. लार्ड मैकाले ने ब्रिटेन की संसद में भारतीय शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन पर हुई बहस में जो अपन लक्ष्य बताया था, वह पूर्ण हुआ है.
इन दोनों विडम्बनाओं के बीच भारतीय पद्धति से किसी भी विषय का अध्ययन, उसमें परिवर्तन, परिणामों की जाँच और परिवर्धन असीम धैर्य, समय, धन लगाने से ही संभव है.
अब आवश्यक है दृष्टि सिर्फ अपने विषय पर केंद्रित रहे, न प्रशंसा से फूलकर कुप्पा हों, न अंध आलोचना से घबरा या क्रुद्ध होकर उत्तर दें. इनमें शक्ति का अपव्यय करने के स्थान पर सिर्फ और सिर्फ विषय पर केंद्रित हों.
संभव हो तो राष्ट्रीय महत्व के बिन्दुओं जैसे घुसपैठ, सुरक्षा, प्राकृतिक आपदा (भूकंप, तूफान. अकाल, महत्वपूर्ण प्रयोगों की सफलता-असफलता) आदि पर पर्याप्त समयपूर्व अनुमान दें तो उनके सत्य प्रमाणित होने पर आशंकाओं का समाधान होगा। ऐसे अनुमान और उनकी सत्यता पर शीर्ष नेताओं, अधिकारियों-वैज्ञानिकों-विद्वानों को व्यक्तिगत रूप से अवगत करायें तो इस विद्या के विधिवत अध्ययन हेतु व्यवस्था की मांग की जा सकेगी।
***
मुक्तिका:
मुक्त कह रहे मगर गुलाम
तन से मन हो बैठा वाम
कर मेहनत बन जायेंगे
तेरे सारे बिगड़े काम
बद को अच्छा कह-करता
जो वह हो जाता बदनाम
सदा न रहता कोई यहाँ
किसका रहा हमेशा नाम?
भले-बुरे की फ़िक्र नहीं
करे कबीरा अपना काम
बन संजीव, न हो निर्जीव
सुबह, दुपहरी या हो शाम
खिला पंक से भी पंकज
सलिल निरंतर रह निष्काम
*
बाल गीत:
अहा! दिवाली आ गयी
आओ! साफ़-सफाई करें
मेहनत से हम नहीं डरें
करना शेष लिपाई यहाँ
वहाँ पुताई आज करें
हर घर खूब सजा गयी
अहा! दिवाली आ गयी
कचरा मत फेंको बाहर
कचराघर डालो जाकर
सड़क-गली सब साफ़ रहे
खुश हों लछमी जी आकर
श्री गणेश-मन भा गयी
अहा! दिवाली आ गयी
स्नान-ध्यान कर, मिले प्रसाद
पंचामृत का भाता स्वाद
दिया जला उजियारा कर
फोड़ फटाके हो आल्हाद
शुभ आशीष दिला गयी
अहा! दिवाली आ गयी
*
मुक्तक:
मँहगा न मँहगा सस्ता न सस्ता
सस्ता विदेशी करे हाल खस्ता
लेना स्वदेशी कुटियों से सामां-
उसका भी बच्चा मिले ले के बस्ता
उद्योगपतियों! मुनाफा घटाओ
मजदूरी थोड़ी कभी तो बढ़ाओ
सरकारों कर में रियायत करो अब
मरा जा रहा जन उसे मिल जिलाओ
कुटियों का दीपक महल आ जलेगा
तभी स्वप्न कोई कुटी में पलेगा
शहरों! की किस्मत गाँवों से चमके
गाँवों का अपना शहर में पलेगा
*
क्षणिका :
तुम्हारा हर गलत 
सच है
हमारा
हर सच गलत है
यही है
अब की सियासत
दोस्त ही
करते अदावत
१८-१०-२०१४
*
दोहा सलिला:
जिज्ञासा ही धर्म है
*
धर्म बताता है यही, निराकार है ईश.
सुनते अनहद नाद हैं, ऋषि, मुनि, संत, महीश..
मोहक अनहद नाद यह, कहा गया ओंकार.
सघन हुए ध्वनि कण, हुआ रव में भव संचार..
चित्र गुप्त था नाद का. कण बन हो साकार.
परम पिता ने किया निज, लीला का विस्तार..
अजर अमर अक्षर यही, 'ॐ' करें जो जाप.
ध्वनि से ही इस सृष्टि में, जाता पल में व्याप..
'ॐ' बना कण फिर हुए, ऊर्जा के विस्फोट.
कोटि-कोटि ब्रम्हांड में, कण-कण उसकी गोट..
चौसर पाँसा खेल वह, वही दाँव वह चाल.
खिला खेलता भी वही, होता करे निहाल..
जब न देख पाते उसे, लगता भ्रम जंजाल.
अस्थि-चर्म में वह बसे, वह ही है कंकाल..
धूप-छाँव, सुख-दुःख वही, देता है पोशाक.
वही चेतना बुद्धि वह, वही दृष्टि वह वाक्..
कर्ता-भोक्ता भी वही, हम हैं मात्र निमित्त.
कर्ता जानें स्वयं को, भरमाता है चित्त..
जमा किया सत्कर्म जो, वह सुख देता नित्य.
कर अकर्म दुःख भोगती, मानव- देह अनित्य..
दीनबन्धु वह- आ तनिक, दीनों के कुछ काम.
मत धनिकों की देहरी, जा हो विनत प्रणाम..
धन-धरती है उसी की, क्यों करता भण्डार?
व्यर्थ पसारा है 'सलिल', ढाई आखर सार..
ज्यों की त्यों चादर रहे, लगे न कोई दाग.
नेह नर्मदा नित नहा, तज सारा खटराग..
जिज्ञासा ही धर्म है, ज्ञान प्राप्ति ही कर्म.
उसकी तनिक प्रतीति की, चेतनता का मर्म..
१८-१०-२०१०
*

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

अक्टूबर १६, हाइकु, मुक्तक, दोहा गीत, लक्ष्मी, स्थानापन्न शब्द, रूपक अलंकार, हुदहुद,

सलिल सृजन अक्टूबर १६
*
हाइकु सलिला
माला
.
मालाकार ने
आस माला बनाई
श्वास फूल से।
.
जयमाला दे
ठगा गया दूल्हा
ले वरमाला।
.
खिलती कली
मायके, ससुराल
फूल बनती।
.
हृदय छेद
माली बनाता माला
ले वनमाली।
.

ईश्वर-अल्ला
दोनों का पड़ता है
माला से पल्ला।
.
अश'आर 
० 
मेरा किरदार गुनाहों का है मजमा साकी।
देख ले आ के न कोई भी रहा है बाकी।।
.
मेरा किरदार गुनाहों का है मजमा साकी।
संत औ' पीर सभी, साथ रहे हैं मेरे।।
.
मेरा किरदार गुनाहों का है मजमा साकी।
दें सजा वो न जिसने कभी गुनाह किया।।
.
मेरा किरदार गुनाहों का है मजमा साकी।
मैंने चाहा ही नहीं वरना फरिश्ता होता।
.
मेरा किरदार गुनाहों का है मजमा साकी।
नहीं है बज़्म में कोई भी कम गुनाह किए।।
१६.१०.२०२६ 
०००
मुक्तक
*
'पुष्पा' महका जीवन पूरा, 'गीता' पढ़कर हर मानव का।
'राम रतन' जड़ गया श्वास में, गहना आस ध्येय हो सबका।।
'छाया' है 'बसंत' की पल-पल, यह 'प्रताप' रेवा मैया का-
'निशि'-वासर 'जिज्ञासु' रहे मन, दर्श करें 'गिरीश' तांडव का।।
*
'आकांक्षा' 'अनुकृति' हो पाएँ, अपने आदर्शों की हम भी।
आँसू पोंछ सकें कोई हम, हों 'एकांश' प्रकृति संग ही।।
बनें सहारा निर्बल का हरि, दीनबंधु बन पाए सत्ता-
लिखें कहानी बार-बार हम, नचिकेता यम की।।
*
'विजय' वर सके 'ममता' नारी, 'श्रद्धा' की सींचें फुलवारी।
भाष 'सुभाष' छू सके दिल को, महका दें भारत की क्यारी।।
जगवाणी हो हिन्दी अपनी, बुद्धि 'विनीता' रहे हमेशा -
कंकर में शंकर देखें हम, आदमियत हो मंज़िल न्यारी।।
१६-१०-२०२१
***
गीत
*
लछमी मैया!
माटी का कछु कर्ज चुकाओ
*
देस बँट रहो,
नेह घट रहो,
लील रई दीपक खों झालर
नेह-गेह तज देह बजारू
भई; कैत है प्रगतिसील हम।
हैप्पी दीवाली
अनहैप्पी बैस्ट विशेज से पिंड छुड़ाओ
*
मूँड़ मुड़ाए
ओले पड़ रए
मूरत लगे अवध में भारी
कहूँ दूर बनवास बिता रई
अबला निबल सिया-सत मारी
हाय! सियासत
अंधभक्त हौ-हौ कर रए रे
तनिक चुपाओ
*
नकली टँसुए
रोज बहाउत
नेता गगनबिहारी बन खें
डूब बाढ़ में जनगण मर रओ
नित बिदेस में घूमें तन खें
दारू बेच;
पिला; मत पीना कैती जो
बो नीति मिटाओ
१६-१०-२०१९
***
स्थानापन्न शब्द
क्रमांक - वाक्यांश या शब्द-समूह - शब्द
०१.जिसका जन्म नहीं होता अजन्मा
०२. पुस्तकों की समीक्षा करने वाला समीक्षक , आलोचक
०३. जिसे गिना न जा सके अगणित
०४. जो कुछ भी नहीं जानता हो अज्ञ
०५ . जो बहुत थोड़ा जानता हो अल्पज्ञ
०६. जिसकी आशा न की गई हो अप्रत्याशित
०७. जो इन्द्रियों से परे हो अगोचर
०८. जो विधान के विपरीत हो अवैधानिक
०९. जो संविधान के प्रतिकूल हो असंवैधानिक
१०. जिसे भले -बुरे का ज्ञान न हो अविवेकी
११. जिसके समान कोई दूसरा न हो अद्वितीय
१२. जिसे वाणी व्यक्त न कर सके अनिर्वचनीय
१३. जैसा पहले कभी न हुआ हो अभूतपूर्व
१४. जो व्यर्थ का व्यय करता हो अपव्ययी
१५. बहुत कम खर्च करने वाला मितव्ययी
१६. सरकारी गजट में छपी सूचना अधिसूचना
१७. जिसके पास कुछ भी न हो अकिंचन
१८. दोपहर के बाद का समय अपराह्न
१९. जिसका निवारण न हो सके अनिवार्य
२०. देहरी पर चित्रकारी अल्पना
२१. आदि से अन्त तक
२२. जिसका परिहार सम्भव न हो अपरिहार्य
२३. जो ग्रहण करने योग्य न हो अग्राह्य
२४ जिसे प्राप्त न किया जा सके अप्राप्य
२५. जिसका उपचार सम्भव न हो असाध्य
२६. जिसे भगवान में विश्वास हो आस्तिक
२७. जिसे भगवान में विश्वास न हो नास्तिक
२८. आशा से अधिक आशातीत
२९. ऋषि की कही गई बात आर्ष
३०. पैर से मस्तक तक आपादमस्तक
३१. अत्यंत लगन एवं परिश्रम वाला अध्यवसायी
३२. आतंक फैलाने वाला आंतकवादी
३३. विदेश से कोई वस्तु मँगाना आयात
३४. जो तुरंत कविता बना सके आशुकवि
३५. नीले रंग का फूल इन्दीवर
३६. उत्तर-पूर्व का कोण ईशान
३७. जिसके हाथ में चक्र हो चक्रपाणि
३८. जिसके मस्तक पर चन्द्रमा हो चन्द्रमौलि
३९. जो दूसरों के दोष खोजे छिद्रान्वेषी
४०. जानने की इच्छा जिज्ञासा
४१. जानने को इच्छुक जिज्ञासु
४२. जीवित रहने की इच्छा जिजीविषा
४३. इन्द्रियों को जीतनेवाला जितेन्द्रिय
४४. जीतने की इच्छा वाला जिगीषु
४५. जहाँ सिक्के ढाले जाते हैं टकसाल
४६. जो त्यागने योग्य हो त्याज्य
४७. जिसे पार करना कठिन हो दुस्तर
४८. जंगल की आग दावाग्नि
४९. गोद लिया हुआ पुत्र दत्तक
५०. बिना पलक झपकाए हुए निर्निमेष
५१. जिसमें कोई विवाद ही न हो निर्विवाद
५२. जो निन्दा के योग्य हो निन्दनीय
५३. मांस रहित भोजन निरामिष
५४. रात्रि में विचरण करनेवाला निशाचर
५५. किसी विषय का पूर्ण ज्ञाता पारंगत
५६. पृथ्वी से सम्बन्धित पार्थिव
५७. रात्रि का प्रथम प्रहर प्रदोष
५८. जिसे तुरंत उचित उत्तर सूझ जाए प्रत्युत्पन्नमति
५९. मोक्ष का इच्छुक मुमुक्षु
६०. मृत्यु का इच्छुक मुमूर्षु
६१. युद्ध की इच्छा रखनेवाला युयुत्सु
६२. जो विधि के अनुकूल है वैध
६३. जो बहुत बोलता हो वाचाल
६४. शरण पाने का इच्छुक शरणार्थी
६५. सौ वर्ष का समय शताब्दी
६६. शिव का उपासक शैव
६७. देवी का उपासक शाक्त
६८. समान रूप से ठंडा और गर्म समशीतोष्ण
६९. जो सदा से चला आ रहा हो सनातन
७०. समान दृष्टि से देखने वाला समदर्शी
७१. जो क्षण भर में नष्ट हो जाए क्षणभंगुर
७२. फूलों का गुच्छा स्तवक
७३. संगीत जाननेवाला संगीतज्ञ
७४. जिसने मुकदमा किया है वादी
७५. जिसके विरुद्ध मुकदमा हो प्रतिवादी
७६. मधुर बोलने वाला मधुरभाषी
७७. धरती-आकाश के बीच का स्थान अंतरिक्ष
७८. महावत के हाथ का लोहे का हुक अंकुश
७९. जो बुलाया न गया हो अनाहूत,
८०. सीमा का अनुचित उल्लंघन अतिक्रमण
८१. जिसका पति विदेश चला गया हो प्रोषित पतिका
८२. जिसका पति विदेश से आया हो आगत पतिका
८३. जिसका पति परदेश जानेवाला हो प्रवत्स्यत्पतिका
८४. जिसका मन दूसरी ओर हो अन्यमनस्क
८५. संध्या और रात्रि के बीच की वेला गोधूलि
८६. माया करनेवाला मायावी
८७. टूटी-फूटी इमारत का अंश भग्नावशेष
८८. दोपहर से पहले का समय पूर्वाह्न
८९. कनक जैसी आभावाला कनकाभ
९०. हृदय को विदीर्ण कर देनेवाला हृदय विदारक
९१. हाथ से कार्य करने का कौशल हस्तलाघव
९२. स्त्रियों से हाव-भाववाला पुरुष स्त्रैण
९३. जो लौटकर आया है प्रत्यागत
९४. जो कार्य कठिनता से हो सके दुष्कर
९५. जो देखा न जा सके अलक्ष्य
९६. बाएँ हाथ से तीर चला सकनेवाला सव्यसाची
९७. वह स्त्री जिसे सूर्य ने भी न देखा हो असूर्यम्पश्या
९८. हाथी पर बैठने हेतु आसंदी हौदा
९९. जिसे साधना सम्भव न हो असाध्य
१००. अन्य की जगह अस्थाई नियुक्त स्थानापन्न***
***
दोहा
पहले खुद को परख लूँ, तब देखूँ अन्यत्र
अपना खत खोला नहीं, पा औरों का पत्र
१६-१०-२०१७
***
अलंकार सलिला : २२ : रूपक अलंकार
एक वर्ण्य का हो 'सलिल', दूजे पर आरोप
अलंकार रूपक करे, इसका उसमें लोप
*
इसको उसका रूप दे, रूपक कहता बात
रूप-छटा मन मोह ले, अलंकार विख्यात
*
किसी वस्तु को दे 'सलिल', जब दूजी का रूप
अलंकार रूपक कहे, निरखो छटा अनूप
*
जब कवि एक व्यक्ति या वस्तु को किसी दूसरे व्यक्ति या वस्तु रूप देता है तो रूपक अलंकार होता है। रूपक में मूल का अन्य में उसी तरह लोप होना बताया बताया जाता है जैसे नाटक में पात्र के रूप में अभिनेता खुद को विलीन कर देता है।
उदाहरण:
१. चरन-सरोज पखारन लागा
२. निष्कलंक यश- मयंक,
पैठ सलिल-धार-अंक
रूप निज निहारता
जब प्रस्तुत या उपमेय पर अप्रस्तुत या उपमान का निषेधरहित आरोप किया जाता है तब रूपक अलंकार होता है। यह आरोप २ प्रकार का होता है। प्रथम अभेदात्मक या वास्तविक तथा द्वितीय भेदात्मक, तद्रूपात्मक या आहार्य। इस आधार पर रूपक के २ प्रकार या रूप हैं। अ. अभेद रूपक एवं आ. तद्रूप रूपक।
उक्त दोनों के ३ उप भेद क. सम, ख. अधिक तथा ग. न्यून हैं।
उदाहरण:
क. सम अभेद रूपक:
१. उदित उदय गिरि मंच पर, रघुवर बाल पतंग
विकसे संत सरोज सब, हरषे लोचन भृंग
२. नेह-नर्मदा नहाकर, मन-मयूर के नाम
तन्मय तन ने लिख दिया, चिन्मय चित बेदाम
ख. अधिक अभेद रूपक:
जिस अभेद रूपक में समानता होते हुए भी उपमेय को उपमान से कुछ अधिक दिखाया या बताया जाता वहाँ अधिक अभेद रूपक अलंकार होता है।
उदाहरण:
१. नव वधु विमल तात जस तोरा। रघुवर किंकर कुमुद चकोरा ।।
उदित सदा अथ इहि कबहू ना। घटिहि न जग नभ दिन-दिन दूना।।
२. केसरि रंग के अंग की वास वसी रहै याही से पास घनेरी।
चित्रमयी क्षिति भीति सवै रघुनाथ लसै प्रतिबिंबिनि घेरी।।
प्यारी के रूप अनूप की और कहाँ लौ कहौं महिमा बहुतेरी।
आनन चंद की कैसी अमंद रहै घर में दिन-रात उजेरी।।
ग. न्यून या हीन अभेद रूपक:
जहाँ उपमेय में उपमान से कुछ कमी होने पर भी अभेदता स्पष्ट की जाती है, वहाँ न्यून या हीन अभेद रूपक अलंकार होता है।
उदाहरण:
१. उषा रंगीली किन्तु सजनि उसमें वह अनुराग नहीं
निर्झर में अक्षय स्वर-प्रवाह है पर वह विकल विराग नहीं
ज्योत्स्ना में उज्ज्वलता है पर वह प्राणों का मुस्कान नहीं
फूलों में हैं वे अधर किंतु उनमें वह मादक गान नहीं
२. आई हौं देखि सराहे न जात हैं, या विधि घूँघट में फरके हैं
मैं तो जानी मिले दोउ पीछे ह्वै कान लख्यो कि उन्हें हरके हैं
रंगनि ते रूचि ते रघुनाथ विचारु करें कर्ता करके हैं
अंजन वारे बड़े दृग प्यारि के खंजन प्यारे बिना परके हैं
च. सम तद्रूप रूपक :
जहाँ उपमेय को उपमान का दूसरा रूप कहा जाता है वहाँ सम रूपक अलंकार होता है।
उदाहरण:
१. दृग कूँदन को दुखहरन, सीत करन मनदेस
यह वनिता भुव लोक की, चन्द्रकला शुभ वेस
२. मन-मेकल गिरिशिखर से, नेह-नर्मदा धार
बह तन-मन की प्यास हर, बाँटे हर्ष अपार
छ. अधिक तद्रूप :
जब उपमेय और उपमान की तद्रूपता दर्शायी जाते समय उपमेय में कोई बात अधिक हो, तब अधिक तद्रूप रूपक अलंकार होता है।
उदाहरण:
१. लगत कलानिधि चाँदनी, निशि में ही अभिराम
दिपति अपर विधु वदन की, आभा आठों जाम
२. अर्धांगिनी बहिना सुता, नहीं किसी का मोल
माँ की ममता है मगर, सचमुच ही अनमोल
ज. न्यून या हीन तद्रूप रूपक :
जहाँ उपमेय में उपमान से यत्किंचित न्यून गुण होने पर भी तद्रूपता दिखाई जाए, वहाँ न्यून तद्रूप रूपक अलंकार होता है।
उदाहरण:
१. दुइ भुज के हरि रघुवर सुंदर वेष
एक जीभ के लछिमन दूसर सेष
रस भरे यश भरे कहै कवि रघुनाथ रंग भरे रूप भरे खरे अंग कल के
कमलनिवास परिपूरन सुवास आस भावते के चंचरीक लोचन चपल के
जगमग करत भरत ड्यटी दीह पोषे जोबन दिनेश के सुदेश भुजबल के
गाइबे के जोग भये ऐसे हैं अम्मल फूले तेरे नैन कोमल कमल बिनु जल के
२. राम-श्याम अभिराम हैं, दोनों हरि के रूप
लड़ते-लड़वाते रहे, जीत-जिता अपरूप
रूपक के ३ अन्य भेद सांग, निरंग तथा परम्परित हैं।
इ. सांग रूपक :
जब उपमेय का उपमान पर आरोप करते समय उपमेय के अंगों का भी उपमान के अंगों पर आरोप किया जाए तो वहां सांग (अंग सहित) रूपक होता है। सांग में उपमेय-उपमान समानता स्थापित करते समय उनके अंगों की भी समानता स्थापित की जाती है।
उदाहरण:
१. ऊधो! मेरा हृदयतल था एक उद्यान न्यारा
शोभा देतीं अमित उसमें कल्पना-क्यारियाँ थीं
न्यारे-न्यारे कुसुम कितने भावों के थे अनेकों
उत्साहों के विपुल विटपी मुग्धकारी महा थे
लोनी-लोनी नवल लतिका थीं अनेकों उमंगें
सद्वाञ्छा के विहग उसके मंजुभाषी बड़े थे
धीरे-धीरे मधुर हिलतीं वासना-बेलियाँ थीं
प्यारी आशा-पवन जब थी डोलती स्निग्ध हो के
यहाँ ह्रदय को उद्यान बताते हुए उद्यान के अंगों की हृदय के अंगों से सामंता स्थापित की गई है: उद्यान - ह्रदय, क्यारियाँ -कल्पनाएँ, कुसुम - ह्रदय के विविध भाव, वृक्ष - उत्साह, लतिकाएँ - उमंगें, पक्षी - सदवांछाएँ, बेलें - वासनाएँ, पवन - आशा। लोनी = सुन्दर।
२. मेरे मस्तक के छत्र मुकुट वसुकाल सर्पिणी के शतफन
मुझ चिर कुमारिका के ललाट में नित्य नवीन रुधिर चंदन
आँजा करती हूँ चितधूम् का ड्रग में अंध तिमिर अञ्जन
श्रृंगार लपट की चीयर पहन, नचा करती मैं छूमछनन
क्रांति की नर्तकी से सामंता स्थापित करते हुए उनके अंगों की समानता (छत्र मुकुट - शत फन, रुधिर - चन्दन, चिताधूम - तिमिरअंजन, लपट - चीर) दर्शायी गयी है।
३. निर्वासित थे राम, राज्य था कानन में भी
सच ही है श्रीमान! भोगते सुख वन में भी
चंद्रातप था व्योम तारका रत्न जड़े थे
स्वच्छ दीप था सोम, प्रजा तरु-पुञ्ज खड़े थे
शांत नदी का स्रोत बिछा था, अति सुखकारी
कमल-कली का नृत्य हो रहा था मन-हारी
यहाँ कानन और राज्य का साम्य स्थापित करते समय अंगोंपांगों का साम्य (चन्द्रातप - व्योम, रत्न - तारे, दीप - चन्द्रमा, प्रजा - तरु-पुञ्ज, बिछावन - शांत नदी का स्रोत, नर्तकी - कमल कली) दृष्टव्य है।
४. कौशिक रूप पयोनिधि पावन, प्रेम-वारि अवगाह सुहावन
राम-रूप राकेस निहारी, बढ़ी बीचि पुलकावलि बाढ़ी
विश्वामित्र - समुद्र, प्रेम - पानी, राम - चण्द्रमा, पुलकावलि - लहर। कौशिक = विश्वामित्र, पयोनिधि - समुद्र, बीचि = तरंग।
५. बरखा ऋतु रघुपति-भगति, तुलसी सालि-सु-दास
राम-नाम बर बरन जुग, सावन-भदों मास
राम-भक्ति - वर्षा, तुलसी जैसे रामभक्त = धान, रा म - सावन-भादों।
६. हरिमुख पंकज भ्रुव धनुष, खंजन लोचन नित्त
बिम्ब अधर कुंडल मकर, बसे रहत मो चित्त
हरिमुख - पंकज, भ्रुव - धनुष, खंजन - लोचन, बिम्ब - अधर, कुंडल - मकर।
७. चन्दन सा वदन, चंचल चितवन, धीरे से तेरा ये मुस्काना
मुझे दोष न देना जग वालों, हो जाऊँ अगर मैं दीवाना
ये काम कमान भँवें तेरी, पलकों के किनारे कजरारे
माथे पर सिंदूरी सूरज, ओंठों पे दहकते अंगारे
साया भी जो तेरा पड़ जाए, आबाद हो दिल का वीराना
ई. निरंग रूपक :
जब उपमेय मात्र का आरोप उपमान पर किया जाए अर्थात उपमेय-अपमान की समनता बताई उनके अंगों का उल्लेख न हो तो निरंग रूपक होता है।
उदाहरण:
१. चरण-कमल मृदु मंजु तुम्हारे
२. हरि मुख मृदुल मयंक
३. ईश्वर-अल्लाह एक समान
४. धरती मेरी माता, पिता आसमान
मुझको तो अपना सा लागे सारा जहान
५.
उ. परम्परित रूपक:
जहाँ प्रधान रूपक अन्य रूपक पर आश्रित हो, अथवा उपमेय का उपमान पर आरोपण किसी अन्य आरोप पर आधारित हो वहां परंपरित रूपक होता है। ।परंपरित में दो रूपक होते हैं। एक रूपक का कारण आधार दूसरा रूपक होता है।
उदाहरण:
१. आशा मेरे हृदय-मरु की मंजु मंदाकिनी है
यहाँ ह्रदय-मरु तथा मंजु-मंदाकनी दो रूपक हैं। आशा को मंदाकिनी बनाया जाना तभी उपयुक्त है जब हृदय को मरु बताया जा चुका हो।
२. रविकुल-कैरव विधु-रघुनायक
रविकुल को कैरव बताने के पश्चात रघुनायक को विधु बताया गया है। यहाँ २ रूपक हैं। पश्चात्वर्ती रूपक पूर्ववर्ती रूपक पर आधारित है।
३. किसके मनोज-मुख चन्द्र को निहारकर
प्रेम उर सागर सदैव है उछलता
यहाँ मुख-चन्द्र रूपक उर-सागर रूपक का आधार है।
४. प्रेम-अतिथि है खड़ा द्वार पर, ह्रदय-कपाट खोल दो तुम!
ह्रदय-कपाट का रूपक प्रेम-अतिथि के रूपक बिना अपूर्ण प्रतीत होगा।
५. यह छोटा सा शिशु है मेरा, जीवन-निशि का शुभ्र सवेरा
जीवन-निशि के रूपक पर शिशु-शुभ्र सवेरा का रूपक आधृत है.
***
हुदहुद
हुदहुद इसराइल का राष्ट्रीय पक्षी है.
साल २००८ में एक लाख ५५ हज़ार लोगों के बीच किए गए सर्वेक्षण के बाद तत्कालीन इसराइली राष्ट्रपति शिमोन पेरेज़ ने देश की ६० वीं सालगिरह पर इसे राष्ट्रीय पक्षी घोषित किया था.
कहा जाता है कि यह पक्षी यहूदियों और मुसलमानों के पैग़म्बर हज़रत सुलेमान के दूत के तौर पर काम किया करता था. बादशाह हज़रत सुलेमान का क़ुरान में भी ज़िक्र है. उनके बारे में कहा जाता है कि वह एक मात्र बादशाह थे जिनका हुक्म हवा, पानी, मछली, पशु, पक्षी सब मानते थे.
तूफ़ान का हुदहुद नाम तो ओमान का दिया हुआ है लेकिन हुदहुद चिड़िया हज़रत सुलेमान की जासूस चिड़िया भी कही जाती है.
बादशाह सुलेमान के शीबा (आज का यमन) की रानी यानी मलिका बिलक़ीस के बारे में भी इसी चिड़िया ने ख़बर दी थी के वो सूर्य की पूजा करती हैं. हज़रत सुलेमान ने रानी को अपने पास लाने का आदेश दिया था, जहां मलिका ने उनको पैग़म्बर माना था.
इसके सिर की कलग़ी की भी अजीब कहानी है.
यहूदी लोक कथाओं के मुताबिक़ एक बार हज़रत सुलेमान अपने सफ़ेद बाज़ पर उड़े जा रहे थे और धूप की वजह से बेहाल थे कि हुदहुद का एक गिरोह उनके पास से गुज़रा और उन्हें उस हालत में देख कर अपने परों को फैलाकर उनके ऊपर उड़ने लगा ताकि वह धूप से बच जाएं.
लालच और वरदान
हज़रत सुलेमान ने प्रसन्न होकर उन्हे वरदान मांगने को कहा. हुदहुद पक्षियों के राजा ने कई दिन सोचने के बाद सभी के सिर पर सोने का ताज होने की मन्नत मांग ली.
उनकी मांग सुनकर, सुलेमान हंस पड़े और कहने लगे अरे नादान तूने अपने लिए मुसीबत मांग ली है. शिकारी तुझे ज़िंदा नहीं छोड़ेंगे.
फिर भी, उनकी मांग पूरी हुई और वह इस पर इतराने लगे. लेकिन सोने के लालच में शिकारी उनके पीछे पड़ गए यहां तक कि उनकी संख्या बेहद कम हो गई तो सभी हुदहुद हज़रत सुलेमान के पास वापस आए.
उनकी मुश्किल जानकर हज़रत सुलेमान ने ताज हटा कर उनके सिर पर कलग़ी दे दी जिस से उनकी सुंदरता बरक़रार रही और उनकी प्रजाति भी बच गई.
***
अलंकार पहचानिए:
चन्दन सा वदन, चंचल चितवन, धीरे से तेरा ये मुस्काना
मुझे दोष न देना जग वालों, हो जाऊँ अगर मैं दीवाना
ये काम कमान भँवें तेरी, पलकों के किनारे कजरारे
माथे पर सिंदूरी सूरज, ओंठों पे दहकते अंगारे
साया भी जो तेरा पड़ जाए, आबाद हो दिल का वीराना
*
अर्धांगिनी बहिना सुता, नहीं किसी का मोल
माँ की ममता है मगर, सचमुच ही अनमोल
*
मन-मेकल गिरिशिखर से, नेह-नर्मदा धार
बह तन-मन की प्यास हर, बाँटे हर्ष अपार
१६-१०-२०१५
***
नवगीत:
रोगों से
मत डरो
दम रहने तक लड़ो
आपद-विपद
न रहे
हमेशा आते-जाते हैं
संयम-धैर्य
परखते हैं
तुमको आजमाते हैं
औषध-पथ्य
बनेंगे सबल
अवरोधों से भिड़ो
जाँच परीक्षण
शल्य क्रियाएँ
योगासन व्यायाम न भायें
मन करता है
कुछ मत खायें
दवा गोलियाँ आग लगायें
खूब खिजाएँ
लगे चिढ़ाएँ
शांत चित्त रख अड़ो
***
मुक्तक:
कुसुम कली जब भी खिली विहँस बिखेरी गंध
रश्मिरथी तम हर हँसा दूर हट गयी धुंध
मधुकर नतमस्तक करे पा परिमल गुणगान
आँख मूँद संजीव मत सोना होकर अंध
१६-१०-२०१४
***
हाइकु
*
ईंट-रेट का
मंदिर मनहर
देव लापता
*
श्रम-सीकर
चरणामृत से है
ज्यादा पावन
*
मर मदिरा
मत मुझे पिलाना
दे विनम्रता
*
पर पीड़ा से
तनिक न पिघले
मानव कैसे?
*
मैले मन को
उजला तन प्रभु!
देते क्यों कर?
***
मुक्तक
सिक्के 'सलिल' खरे नहीं, खोटे ही चल सके
जो वाष्प थे टकसाल में किंचित न ढल सके
सोना मिलावटों बिना गहना नहीं बना-
गह ना किसी की आँख में सपने न पल सके
१६-१०-२०१३
***
गीत :
दस दिशा में चलें छंद-सिक्के खरे..
*
नील नभ नित धरा पर बिखेरे सतत, पूर्णिमा रात में शुभ धवल चाँदनी.
अनगिनत रश्मियाँ बन कलम रच रहीं, देख इंगित नचे काव्य की कामिनी..
चुप निशानाथ राकेश तारापति, धड़कनों की तरह रश्मियों में बसा.
भाव, रस, बिम्ब, लय, कथ्य पंचामृतों का किरण-पुंज ले कवि हृदय है हँसा..
नव चमक, नव दमक देख दुनिया कहे, नीरजा-छवि अनूठी दिखा आरसी.
बिम्ब बिम्बित सलिल-धार में हँस रहा, दीप्ति -रेखा अचल शुभ महीपाल की..
श्री, कमल, शुक्ल सँग अंजुरी में सुमन, शार्दूला विजय मानोशी ने लिये.
घूँट संतोष के पी खलिश मौन हैं, साथ सज्जन के लाये हैं आतिश दिये..
शब्द आराधना पंथ पर भुज भरे, कंठ मिलते रहे हैं अलंकार नत.
गूँजती है सृजन की अनूपा ध्वनि, सुन प्रतापी का होता है जयकार शत..
अक्षरा दीप की मालिका शाश्वती, शक्ति श्री शारदा की त्रिवेणी बने.
साथ तम के समर घोर कर भोर में, उत्सवी शामियाना उषा का तने..
चहचहा-गुनगुना नर्मदा नेह की, नाद कलकल करे तीर हों फिर हरे.
खोटे सिक्के हटें काव्य बाज़ार से, दस दिशा में चलें छंद-सिक्के खरे..
वर्मदा शर्मदा कर्मदा धर्मदा, काव्य कह लेखनी धन्यता पा सके.
श्याम घन में झलक देख घनश्याम की, रासलीला-कथा साधिका गा सके..
१८-१०-२०११
***
गीत
अरे मन !
*
सहज हो ले रे अरे मन !
*
मत विगत को सच समझ रे.
फिर न आगत से उलझ रे.
झूमकर ले आज को जी-
स्वप्न सच करले सुलझ रे.
प्रश्न मत कर, कौन बूझे?
उत्तरों से कौन जूझे?
भुलाकर संदेह, कर-
विश्वास का नित आचमन.
सहज हो ले रे अरे मन !
*
उत्तरों का क्या करेगा?
अनुत्तर पथ तू वरेगा?
फूल-फलकर जब झुकेगा-
धरा से मिलने झरेगा.
बने मिटकर, मिटे बनकर.
तने झुककर, झुके तनकर.
तितलियाँ-कलियाँ हँसे,
ऋतुराज का हो आगमन.
सहज हो ले रे अरे मन !
*
स्वेद-सीकर से नहा ले.
सरलता सलिला बहा ले.
दिखावे के वसन मैले-
धो-सुखा, फैला-तहा ले.
जो पराया वही अपना.
सच दिखे जो वही सपना.
फेंक नपना जड़ जगत का-
चित करे सत आकलन.
सहज हो ले रे अरे मन !
*
सारिका-शुक श्वास-आसें.
देह पिंजरा घेर-फाँसे.
गेह है यह नहीं तेरा-
नेह-नाते मधुर झाँसे.
भग्न मंदिर का पुजारी
आरती-पूजा बिसारी.
भारती के चरण धो,
कर-निज नियति का आसवन.
सहज हो ले रे अरे मन !
*
कैक्टस सी मान्यताएँ.
शूल कलियों को चुभाएँ.
फूल भरते मौन आहें-
तितलियाँ नाचें-लुभाएँ.
चेतना तेरी न हुलसी.
क्यों न कर ले माल-तुलसी?
व्याल मस्तक पर तिलक है-
काल का है आ-गमन.
सहज हो ले रे अरे मन !
१६-१०-२०१०
***
शब्दों की दीपावली
जलकर भी तम हर रहे, चुप रह मृतिका-दीप.
मोती पलते गर्भ में, बिना कुछ कहे सीप.
सीप-दीप से हम मनुज तनिक न लेते सीख.
इसीलिए तो स्वार्थ में लीन पड़ रहे दीख.
दीप पर्व पर हों संकल्पित रह हिल-मिलकर.
दें उजियारा आत्म-दीप बन निश-दिन जलकर.
- छंद अमृतध्वनि
***
दोहा गीत
विजय विषमता तिमिर पर,
कर दे- साम्य हुलास..
मातृ ज्योति- दीपक पिता,
शाश्वत चाह उजास....
*
जिसने कालिख-तम पिया,
वह काली माँ धन्य.
नव प्रकाश लाईं प्रखर,
दुर्गा देवी अनन्य.
भर अभाव को भाव से,
लक्ष्मी हुईं प्रणम्य.
ताल-नाद, स्वर-सुर सधे,
शारद कृपा सुरम्य.
वाक् भारती माँ, भरें
जीवन में उल्लास.
मातृ ज्योति- दीपक पिता,
शाश्वत चाह उजास...
*
सुख-समृद्धि की कामना,
सबका है अधिकार.
अंतर से अंतर मिटा,
ख़त्म करो तकरार.
जीवन-जगत न हो महज-
क्रय-विक्रय व्यापार.
सत-शिव-सुन्दर को करें
सब मिलकर स्वीकार.
विषम घटे, सम बढ़ सके,
हो प्रयास- सायास.
मातृ ज्योति- दीपक पिता,
शाश्वत चाह उजास....
१६-१०-२००९
***

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026

अक्टूबर ८, ग़ज़ल, कहमुकरी, दोहा गीत, हाइकु, मुक्तक, चित्रगुप्त, लघुकथा, यमक, गीत

सलिल सृजन अक्टूबर ८
*
आज आगस्टा एडा किंग जयंती
आगस्टा एडा किंग (१०.१२.१८१५ लंदन इंग्लैंड - २७.११.१८५२ मेरिलिबोन लंदन, माता अन्ने इसाबेला मिलबान्के; वेन्टवर्थ की ११ वीं बरोनेस - पिता जॉर्ज गॉर्डन बायरन, ६ वे बैरो,पति विलियम किंग नोएल; लवलेस के पहले अर्ल, बच्चे- १. बायरन किंग नोएल, विस्काउंट ओखम तथा वेनत्वर्थ के १२ वे बैरो, २. एन्ने ब्लंट वेनत्वर्थ की १५ वीं बरोनेस तथा ३. राल्फ किंग मिलबान्के लवलेस का २ रा अर्ल), लवलेस की काउन्टेस एक अंग्रेज गणितज्ञ तथा लेखिका थीं। उन्होने चार्ल्स बैबेज द्वारा प्रस्तावित यांत्रिक जनरल-परपज कम्प्यूटर पर कार्य किया और सबसे पहले यह समझा कि यह मशीन 'शुद्ध गणना' के साथ साथ बहुत कुछ और भी कर सकती है। उन्होने मशीन पर चलने वाली प्रथम कलनविधि का निर्माण किया। एडा ही पहली व्यक्ति थीं जिसने 'कम्प्यूटिंग मशीन' की पूरी क्षमता को समझा। वे दुनिया की पहली प्रोग्रामर थीं।
*

ग़ज़लिका
०
हमें आपसे क्या गिला हो भला?
बमुश्किल हुईं दूर, संकट टला।।
.
लिए साथ फरमाइशें अनगिनत।
गईं आप तो रुक गया सिलसिला।।
.
जो वादे किए, हाय जुमले हुए।
छप्पन का सीना मिला पिलपिला।।
.
हुआ चाक सीना उमीदों का भी।
दिया बेवफ़ा हो वफ़ा का सिला।।
.
शुकर है खुदाया सहे जुल्म पर।
न टूटा कभी बावफ़ाई किला।।
.
भले देर लेकिन न अंधेर है।
परेशां रहा दिल, पड़ा खिलखिला।।
.
खुशी नर्मदा-धार बहती रही।
अमर हो गई सबको पानी पिला।।
८.१०.२०२६
०००
कहमुकरी
•
सुंदरियों की तुलना पाता
विक्रम अरु प्रज्ञान सुहाता
शीश शशीश निहारे शेष
क्या देवेश?
नहीं राकेश।
•
विक्रम के काँधे बेताल
प्रश्न पूछता दे-दे ताल
उत्तर देता सीना तान
क्या अज्ञान?
ना, प्रज्ञान।
•
जहँ जा लिख-पढ़ बनते शिक्षित
कर घुमाई, बिन गए अशिक्षित
मानव मति शशि-रवि छू दक्षा
सखी है शिक्षा?
नहिं सखि कक्षा।
•
घटता-बढ़ता, नष्ट न होता
प्रेम कथाएँ फसलें बोता
पल में चमके, पल में मंदा
गोरखधंधा?
मितवा! चंदा।
•
मन कहता हँस पगले! मत रो
अपने सपने नाहक मत खो
सपने पूरे होते किस रो?
फ़ाइलों-पसरो?
नहिं सखि! इसरो।
•
नयन मूँदते रूप दिखाया
ना अपना नहिं रहा पराया
सँग भीगना कँपना तपना
माला जपना?
नहिं रे! सपना।
•
सुंदरियों की तुलना पाता
विक्रम अरु प्रज्ञान सुहाता
शीश शशीश निहारे शेष
क्या देवेश?
नहीं राकेश।
७.१०.२०२३
•••
दोहा दुनिया
*
कोरी पाती पर विनय, लिख विक्रम के गीत
सिंह गर्जन कर छुड़ा दे, अरि के छक्के रीत
*
लैला की शॉपिंग हुई, मजनू है बेरंग
खत्म बैंक बेलेंस लख, भागी- मजनू दंग
*
लल्ला-लल्ली पर चढ़ा, झट से प्रेम-बुखार
मिले-जुले; लड़-झगड़ कर, खोजें नूतन प्यार
*
'लिव इन' में बरसों रही, अब 'मी टू' में मस्त
रोजगार यह भी हुआ, टैक्सलगे हों पस्त
*
सरल सुबोध न साध्य है, साध्य सरस है बंधु
निर्झर सरवर साथ है, सार्थक होता सिंधु
*
अंग्रेजी शब्दों बिना, हिंदी रुचे न आज
अंग्रेजी में घोलते, हिंदी लगे न लाज
*
डगर-डगर कवियित्रियाँ, गली-गली कवि खूब
पाठक-श्रोता है नहीं, कविता मरती डूब
*
वर्ण-मात्रा गिन हुए, छंदों के सम्राट
निज मुख कर निज प्रशंसा, बनते साहब लाट
८-१०-२०२२
***
मुक्तक
अधर मौन पर नयन बोलते, अनकहनी भी कहते हैं।
हँसी-ठहाकों के मन में भी, आँसू-झरने बहते हैं।
फूल-शूल जन्मों के साथी, धूप-छाँव, पग-डग सहचर-
'सलिल' निरुपमा चाह-राह पा, संजीवित मन रहते हैं।
८-१०-२०२०
***
हाइकु
*
शेरपा शिखर
सफलता पखेरू
आकर गया
*
शेरपा हौसला
जिंदगी है चढ़ाई
कोशिश जयी
*
सिर हो ऊँचा
हमेशा पहाड़ सा
आकाश छुए
*
नदी बनिए
औरों की प्यास बुझा
खुश रहिए
*
आशा-विश्वास
खुद पर भरोसा
शेरपा धनी
८-१०-१९
***
दोहा गीत
*
ब्रम्ह देव बरगद बसें, देवी नीम निवास
अतिप्रिय शिव को धतूरा, बेलपत्र भी ख़ास
*
देवी को जासौन प्रिय,
श्री गणेश को दूब
नवमी पूजें आँवला
सुख बढ़ता है खूब
हरसिंगार हरि को चढ़े,
हो मनहर श्रृंगार
अधर रचाए पान से
राधा-कृष्ण निहार
पुष्प कदंबी कह रहा, कृष्ण कहीं हैं पास
*
कौआ कोसे ढोर कब,
मरते छोड़ो फ़िक्र
नाशुकरों का क्यों करें
कहो जरा भी जिक्र
खिलता लाल पलाश हो,
महके महुआ फूल
पीपल कहता डाल पर
डालो झूला, झूल
भुनती बाली देख हो, होली का आभास
*
धान झुका सरसों तना,
पर नियमित संवाद
सीताफल से रामफल,
करता नहीं विवाद
श्री फल कदली फल नहीं,
तनिक पालते बैर
पुंगी फल हँस मनाता
सदा सभी की खैर
पीपल ऊँचा तो नहीं, हो जामुन को त्रास
***
दोहा सलिला-
तन मंजूषा ने तहीं, नाना भाव तरंग
मन-मंजूषा ने कहीं, कविता सहित उमंग
*
आत्म दीप जब जल उठे, जन्म हुआ तब मान
श्वास-स्वास हो अमिय-घट, आस-आस रस-खान
*
सत-शिव-सुंदर भाव भर, रचना करिये नित्य
सत-चित-आनन्द दरश दें, जीवन सरस अनित्य
८-१०-२०१८
***
लेख-
चित्रगुप्त रहस्य
चित्रगुप्त सर्वप्रथम प्रणम्य हैं:
परात्पर परमब्रम्ह श्री चित्रगुप्त जी सकल सृष्टि के कर्मदेवता हैं, केवल कायस्थों के नहीं। उनके अतिरिक्त किसी अन्य कर्म देवता का उल्लेख किसी भी धर्म में नहीं है, न ही कोई धर्म उनके कर्म देव होने पर आपत्ति करता है। अतः, निस्संदेह उनकी सत्ता सकल सृष्टि के समस्त जड़-चेतनों तक है। पुराणकार कहता है: '
चित्रगुप्त प्रणम्यादौ वात्मानाम सर्व देहिनाम.''
अर्थात श्री चित्रगुप्त सर्वप्रथम प्रणम्य हैं जो आत्मा के रूप में सर्व देहधारियों में स्थित हैं.
आत्मा क्या है?
सभी जानते और मानते हैं कि 'आत्मा सो परमात्मा' अर्थात परमात्मा का अंश ही आत्मा है। स्पष्ट है कि श्री चित्रगुप्त जी ही आत्मा के रूप में समस्त सृष्टि के कण-कण में विराजमान हैं। इसलिए वे सबके पूज्य हैं सिर्फ कायस्थों के नहीं।
चित्रगुप्त निर्गुण परमात्मा हैं:
सभी जानते हैं कि परमात्मा और उनका अंश आत्मा निराकार है। आकार के बिना चित्र नहीं बनाया जा सकता। चित्र न होने को चित्र गुप्त होना कहा जाना पूरी तरह सही है। आत्मा ही नहीं आत्मा का मूल परमात्मा भी मूलतः निराकार है इसलिए उन्हें 'चित्रगुप्त' कहा जाना स्वाभाविक है। निराकार परमात्मा अनादि (आरंभहीन) तथा (अंतहीन) तथा निर्गुण (राग, द्वेष आदि से परे) हैं।
चित्रगुप्त पूर्ण हैं:
अनादि-अनंत वही हो सकता है जो पूर्ण हो। अपूर्णता का लक्षण आरम्भ तथा अंत से युक्त होना है। पूर्ण वह है जिसका क्षय (ह्रास या घटाव) नहीं होता। पूर्ण में से पूर्ण को निकल देने पर भी पूर्ण ही शेष बचता है, पूर्ण में पूर्ण मिला देने पर भी पूर्ण ही रहता है। इसे 'ॐ' से व्यक्त किया जाता है। दूज पूजन के समय कोरे कागज़ पर चन्दन, केसर, हल्दी, रोली तथा जल से ॐ लिखकर अक्षत (जिसका क्षय न हुआ हो आम भाषा में साबित चांवल)से चित्रगुप्त जी पूजन कायस्थ जन करते हैं।
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात पूर्णमुदच्यते पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते
पूर्ण है यह, पूर्ण है वह, पूर्ण कण-कण सृष्टि सब
पूर्ण में पूर्ण को यदि दें निकाल, पूर्ण तब भी शेष रहता है सदा।
चित्रगुप्त निर्गुण तथा सगुण दोनों हैं:
चित्रगुप्त निराकार-निर्गुण ही नहीं साकार-सगुण भी है। वे अजर, अमर, अक्षय, अनादि तथा अनंत हैं। परमेश्वर के इस स्वरूप की अनुभूति सिद्ध ही कर सकते हैं इसलिए सामान्य मनुष्यों के लिये वे साकार-सगुण रूप में प्रगट हुए वर्णित किये गए हैं। सकल सृष्टि का मूल होने के कारण उनके माता-पिता नहीं हो सकते। इसलिए उन्हें ब्रम्हा की काया से ध्यान पश्चात उत्पन्न बताया गया है. आरम्भ में वैदिक काल में ईश्वर को निराकार और निर्गुण मानकर उनकी उपस्थिति हवा, अग्नि (सूर्य), धरती, आकाश तथा पानी में अनुभूत की गयी क्योंकि इनके बिना जीवन संभव नहीं है। इन पञ्च तत्वों को जीवन का उद्गम और अंत कहा गया। काया की उत्पत्ति पञ्चतत्वों से होना और मृत्यु पश्चात् आत्मा का परमात्मा में तथा काया का पञ्च तत्वों में विलीन होने का सत्य सभी मानते हैं।
अनिल अनल भू नभ सलिल, पञ्च तत्वमय देह.
परमात्मा का अंश है, आत्मा निस्संदेह।।
परमब्रम्ह के अंश- कर, कर्म भोग परिणाम
जा मिलते परमात्म से, अगर कर्म निष्काम।।
कर्म ही वर्ण का आधार श्रीमद्भगवद्गीता में श्री कृष्ण कहते हैं: 'चातुर्वर्ण्यमयासृष्टं गुणकर्म विभागशः'
अर्थात गुण-कर्मों के अनुसार चारों वर्ण मेरे द्वारा ही बनाये गये हैं।
स्पष्ट है कि वर्ण जन्म पर आधारित नहीं था। वह कर्म पर आधारित था। कर्म जन्म के बाद ही किया जा सकता है, पहले नहीं। अतः, किसी जातक या व्यक्ति में बुद्धि, शक्ति, व्यवसाय या सेवा वृत्ति की प्रधानता तथा योग्यता के आधार पर ही उसे क्रमशः ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र वर्ग में रखा जा सकता था। एक पिता की चार संतानें चार वर्णों में हो सकती थीं। मूलतः कोई वर्ण किसी अन्य वर्ण से हीन या अछूत नहीं था। सभी वर्ण समान सम्मान, अवसरों तथा रोटी-बेटी सम्बन्ध के लिये मान्य थे। सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक, आर्थिक अथवा शैक्षणिक स्तर पर कोई भेदभाव मान्य नहीं था। कालांतर में यह स्थिति पूरी तरह बदल कर वर्ण को जन्म पर आधारित मान लिया गया।
चित्रगुप्त पूजन क्यों और कैसे?
श्री चित्रगुप्त का पूजन कायस्थों में प्रतिदिन प्रातः-संध्या में तथा विशेषकर यम द्वितीया को किया जाता है। कायस्थ उदार प्रवृत्ति के सनातन (जो सदा था, है और रहेगा) धर्मी हैं। उनकी विशेषता सत्य की खोज करना है इसलिए सत्य की तलाश में वे हर धर्म और पंथ में मिल जाते हैं। कायस्थ यह जानता और मानता है कि परमात्मा निराकार-निर्गुण है इसलिए उसका कोई चित्र या मूर्ति नहीं है, उसका चित्र गुप्त है। वह हर चित्त में गुप्त है अर्थात हर देहधारी में उसका अंश होने पर भी वह अदृश्य है। जिस तरह खाने की थाली में पानी न होने पर भी हर खाद्यान्न में पानी होता है उसी तरह समस्त देहधारियों में चित्रगुप्त अपने अंश आत्मा रूप में विराजमान होते हैं।
चित्रगुप्त ही सकल सृष्टि के मूल तथा निर्माणकर्ता हैं:
सृष्टि में ब्रम्हांड के निर्माण, पालन तथा विनाश हेतु उनके अंश ब्रम्हा-महासरस्वती, विष्णु-महालक्ष्मी तथा शिव-महाशक्ति के रूप में सक्रिय होते हैं। सर्वाधिक चेतन जीव मनुष्य की आत्मा परमात्मा का ही अंश है। मनुष्य जीवन का उद्देश्य परम सत्य परमात्मा की प्राप्ति कर उसमें विलीन हो जाना है। अपनी इस चितन धारा के अनुरूप ही कायस्थजन यम द्वितीय पर चित्रगुप्त पूजन करते हैं। सृष्टि निर्माण और विकास का रहस्य: आध्यात्म के अनुसार सृष्टिकर्ता की उपस्थिति अनहद नाद से जानी जाती है। यह अनहद नाद सिद्ध योगियों के कानों में प्रति पल भँवरे की गुनगुन की तरह गूँजता हुआ कहा जाता है। इसे 'ॐ' से अभिव्यक्त किया जाता है। विज्ञान सम्मत बिग बैंग थ्योरी के अनुसार ब्रम्हांड का निर्माण एक विशाल विस्फोट से हुआ जिसका मूल यही अनहद नाद है। इससे उत्पन्न ध्वनि तरंगें संघनित होकर कण (बोसान पार्टिकल) तथा क्रमश: शेष ब्रम्हांड बना।
यम द्वितीया पर कायस्थ एक कोरा सफ़ेद कागज़ लेकर उस पर चन्दन, हल्दी, रोली, केसर के तरल 'ॐ' अंकित करते हैं। यह अंतरिक्ष में परमात्मा चित्रगुप्त की उपस्थिति दर्शाता है। 'ॐ' परमात्मा का निराकार रूप है। निराकार के साकार होने की क्रिया को इंगित करने के लिये 'ॐ' को सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ काया मानव का रूप देने के लिये उसमें हाथ, पैर, नेत्र आदि बनाये जाते हैं। तत्पश्चात ज्ञान की प्रतीक शिखा मस्तक से जोड़ी जाती है। शिखा का मुक्त छोर ऊर्ध्वमुखी (ऊपर की ओर उठा) रखा जाता है जिसका आशय यह है कि हमें ज्ञान प्राप्त कर परमात्मा में विलीन (मुक्त) होना है।
बहुदेववाद की परंपरा:
इसके नीचे श्री के साथ देवी-देवताओं के नाम लिखे जाते हैं, फिर दो पंक्तियों में 9 अंक इस प्रकार लिखे जाते हैं कि उनका योग 9 बार 9 आये। परिवार के सभी सदस्य अपने हस्ताक्षर करते हैं और इस कागज़ के साथ कलम रखकर उसका पूजन कर दण्डवत प्रणाम करते हैं। पूजन के पश्चात् उस दिन कलम नहीं उठायी जाती। इस पूजन विधि का अर्थ समझें। प्रथम चरण में निराकार निर्गुण परमब्रम्ह चित्रगुप्त के साकार होकर सृष्टि निर्माण करने के सत्य को अभिव्यक्त करने के पश्चात् दूसरे चरण में निराकार प्रभु द्वारा सृष्टि के कल्याण के लिये विविध देवी-देवताओं का रूप धारण कर जीव मात्र का ज्ञान के माध्यम से कल्याण करने के प्रति आभार, विविध देवी-देवताओं के नाम लिखकर व्यक्त किया जाता है। ये देवी शक्तियां ज्ञान के विविध शाखाओं के प्रमुख हैं. ज्ञान का शुद्धतम रूप गणित है।
सृष्टि में जन्म-मरण के आवागमन का परिणाम मुक्ति के रूप में मिले तो और क्या चाहिए? यह भाव पहले देवी-देवताओं के नाम लिखकर फिर दो पंक्तियों में आठ-आठ अंक इस प्रकार लिखकर अभिव्यक्त किया जाता है कि योगफल नौ बार नौ आये व्यक्त किया जाता है। पूर्णता प्राप्ति का उद्देश्य निर्गुण निराकार प्रभु चित्रगुप्त द्वारा अनहद नाद से साकार सृष्टि के निर्माण, पालन तथा नाश हेतु देव-देवी त्रयी तथा ज्ञान प्रदाय हेतु अन्य देवियों-देवताओं की उत्पत्ति, ज्ञान प्राप्त कर पूर्णता पाने की कामना तथा मुक्त होकर पुनः परमात्मा में विलीन होने का समुच गूढ़ जीवन दर्शन यम द्वितीया को परम्परगत रूप से किये जाते चित्रगुप्त पूजन में अन्तर्निहित है। इससे बड़ा सत्य कलम व्यक्त नहीं कर सकती तथा इस सत्य की अभिव्यक्ति कर कलम भी पूज्य हो जाती है इसलिए कलम को देव के समीप रखकर उसकी पूजा की जाती है। इस गूढ़ धार्मिक तथा वैज्ञानिक रहस्य को जानने तथा मानने के प्रमाण स्वरूप परिवार के सभी स्त्री-पुरुष, बच्चे-बच्चियाँ अपने हस्ताक्षर करते हैं, जो बच्चे लिख नहीं पाते उनके अंगूठे का निशान लगाया जाता है। उस दिन कोई सांसारिक कार्य (व्यवसायिक, मैथुन आदि) न कर आध्यात्मिक चिंतन में लीन रहने की परम्परा है।
'ॐ' की ही अभिव्यक्ति अल्लाह और ईसा में भी होती है। सिख पंथ इसी 'ॐ' की रक्षा हेतु स्थापित किया गया। 'ॐ' की अग्नि आर्य समाज और पारसियों द्वारा पूजित है। सूर्य पूजन का विधान 'ॐ' की ऊर्जा से ही प्रचलित हुआ है। उदारता तथा समरसता की विरासत यम द्वितीया पर चित्रगुप्त पूजन की आध्यात्मिक-वैज्ञानिक पूजन विधि ने कायस्थों को एक अभिनव संस्कृति से संपन्न किया है। सभी देवताओं की उत्पत्ति चित्रगुप्त जी से होने का सत्य ज्ञात होने के कारण कायस्थ किसी धर्म, पंथ या सम्प्रदाय से द्वेष नहीं करते। वे सभी देवताओं, महापुरुषों के प्रति आदर भाव रखते हैं। वे धार्मिक कर्म कांड पर ज्ञान प्राप्ति को वरीयता देते हैं। इसलिए उन्हें औरों से अधिक बुद्धिमान कहा गया है. चित्रगुप्त जी के कर्म विधान के प्रति विश्वास के कारण कायस्थ अपने देश, समाज और कर्त्तव्य के प्रति समर्पित होते हैं। मानव सभ्यता में कायस्थों का योगदान अप्रतिम है। कायस्थ ब्रम्ह के निर्गुण-सगुण दोनों रूपों की उपासना करते हैं। कायस्थ परिवारों में शैव, वैष्णव, गाणपत्य, शाक्त, राम, कृष्ण, सरस्वती, लक्ष्मी, दुर्गा आदि देवी-देवताओं के साथ समाज सुधारकों दयानंद सरस्वती, आचार्य श्री राम शर्मा, सत्य साइ बाबा, आचार्य महेश योगी आदि का पूजन-अनुकरण किया जाता है। कायस्थ मानवता, विश्व तथा देश कल्याण के हर कार्य में योगदान करते मिलते हैं.
***
लघुकथा
चट्टान
*
मुझे चैतन्य क्यों नहीं बनाया? वह हमेशा शिकायत करती अपने सृजनहार से। उसे खुद नहीं मालुम कब से वह इसी तरह पड़ी थी, उपेक्षित और अनदेखी। न जाने कितने पतझर और सावन बीत गए लेकिन वह जैसी की तैसी पड़ी रही। कभी कोई भूला-भटका पर्यटक थककर सुस्ताने बैठ जाता तो वह हुलास अनुभव करती किन्तु चंद क्षणों का साथ छूटते ही फिर अकेलापन। इस दीर्घ जीवन-यात्रा में धरती और आकाश के अतिरिक्त उसके साथी थे कुछ पेड़-पौधे, पशु और परिंदे। कहते है सब दिन जात न एक समान। एक दिन कुछ दो पाये जानवर आये, पेड़ों के फल तोड़कर खाये, खरीदी जमीन को समतल कर इमारत खड़ी करने की बात करने लगे।
फिर एक-एक कर आए गड़गड़ - खड़खड़ करते दानवाकार यन्त्र जो वृक्षों का कत्ले-आम कर परिंदों को बेसहारा कर गए, टीलों को खोदने और तालाबों को पाटने लगे। उनका क्रंदन सुनकर उसकी छाती फटने लगी। मरती क्या न करती? उसने बदला लेने की ठानी और उचित अवसर की प्रतीक्षा करने लगी। एक दिन उसकी करुण पुकार सुनकर पसीजे मेघराज की छाती फट गयी। बिजली तांडव करना आरम्भ कर तड़तड़ाती हुई जहाँ-तहाँ गिरी। उसने भी प्रकृति के साथ कदमताल करते हुए अपना स्थान छोड़ा। पहाड़ी नदी की जलधार के साथ लुढ़कती हुई वह हर बाधा को पर कर दो पैरोंवाले जानवरों को रौंदते-कुचलते हुए केदारनाथ की शरण पाकर थम गयी।
खुद को महाबली समझनेवाले जानवरों को रुदन-क्रंदन करते देख उसका मन भर आया किंतु उसे विस्मय हुआ यह देखकर कि उन जानवरों ने अपनी गलती न मान, प्रकृति और भगवान को दोष देती कवितायें लिख-लिखकर टनों कागज़ काले कर दिए, पीड़ितों की सहायता के नाम पर अकथनीय भ्रष्टाचार किया और फिर इमारतें तानने की तैयारी आरंभ कर दी। उसे अनुभव हुआ कि इन चैतन्य जानवरों से लाख गुना बेहतर हैं कम चेतन कहे जानेवाले पशु-पक्षी और जड़ कही जानेवाली वह खुद जिसे कहा जाता है चट्टान।
***
अलंकार सलिला-
जन मन रंजन :
निम्न चित्रपटीय गीतों में अलंकार बताइए :
१. कहीं दूर जब दिन ढल जाए, साँझ की दुल्हन बदन चुराए, चुपके से आये
मेरे ख्यालों के आँगन में कोई सपनों के दीप जलाये, नज़र न आये - आनंद
*
२. दोस्त दोस्त ना रहा, प्यार प्यार ना रहा
ज़िंदगी हमें तेरा ऐतबार ना रहा
*
३. चाँद सी महबूबा हो मेरी, कब ऐसा मैंने सोचा था?
हाँ तुम बिलकुल वैसी हो जैसा मैंने सोचा था
*
४. चाँद सा रौशन चेहरा, ज़ुल्फ़ों का रंग सुनहरा
ये झील सी नीली आँखें, कोई राज है जिनमें गहरा
*
५. चंदन सा वदन, चंचल चितवन, धीरे से तेरा ये मुस्काना
मुझे दोष न देना जगवालों, हो जाऊँ अगर मैं दीवाना
ये काम-कमान भँवें तेरी, पलकों के किनारे कजरारे
माथे पर सिन्दूरी सूरज, होंठों पे दहकते अंगारे
साया भी जो तेरा पड़ जाए, आबाद हो दिल का वीराना
८.१०.२०१५
***
दोहा यमक का
*
कल-कल करते कल हुए, कल न हो सका आज
विकल मनुज बेअकल खो कल, सहता कल-राज
कल = आगामी दिन, अतीत, शांति, यंत्र
कल करूंगा, कल करूंगा अर्थात आज का काम पर कल (अगला दिन) पर टालते हुए व्यक्ति खुद चल बसा (अतीत हो गया) किन्तु आज नहीं आया. बुद्धिहीन मनुष्य शांति खोकर व्याकुल होकर यंत्रों का राज्य सह रहा है अर्थात यंत्रों के अधीन हो गया है.
८.१०.२०१३
***
मुक्तिका...
क्यों है?'
*
रूह पहने हुए ये हाड़ का पिंजर क्यों है?
रूह सूरी है तो ये जिस्म कलिंजर क्यों है??
थी तो ज़रखेज़ ज़मीं, हमने ही बम पटके हैं.
और अब पूछते हैं ये ज़मीं बंजर क्यों है??
गले मिलने की है ख्वाहिश, ये संदेसा भेजा.
आये तो हाथ में दाबा हुआ खंजर क्यों है??
नाम से लगते रहे नेता शरीफों जैसे.
काम से वो कभी उड़िया, कभी कंजर क्यों है??
उसने बख्शी थी हमें हँसती हुई जो धरती.
आज रोती है बिलख, हाय ये मंजर क्यों है?
***
लेख :
हिंदी और हम.
हिंदी जनवाणी तो हमेशा से है...समय इसे जगवाणी बनाता जा रहा है. जैसे-जिसे भारतीय विश्व में फ़ैल रहे हैं वे अधकचरी ही सही हिन्दी भी ले जा रहे हैं. हिंदी में संस्कृत, फ़ारसी, अरबी, उर्दू , अन्य देशज भाषाओँ या अंगरेजी शब्दों के सम्मिश्रण से घबराने के स्थान पर उन्हें आत्मसात करना होगा ताकि हिंदी हर भाव और अर्थ को अभिव्यक्त कर सके. 'हॉस्पिटल' को 'अस्पताल' बनाकर आत्मसात करने से भाषा समृद्ध होती है किन्तु 'फ्रीडम' को 'फ्रीडमता' बनाने से नहीं. दैनिक जीवन में व्याकरण सम्मत भाषा हमेशा प्रयोग में नहीं लाई जा सकती पर वह समीक्षा, शोध या गंभीर अभिव्यक्ति हेतु अनुपयुक्त होती है. हमें भाषा के प्राथमिक, माध्यमिक, उच्च तथा शोधपरक रूपों में भेद को समझना तथा स्वीकारना होगा. तत्सम तथा तद्भव शब्द हिंदी की जान हैं किन्तु इनका अनुपात तो प्रयोग करनेवाले की समझ पर ही निर्भर है. हिन्दी में अहिन्दी शब्दों का मिश्रण दल में नमक की तरह हो किन्तु खीर में कंकर की तरह नहीं.
हिंदी में शब्दों की कमी को दूर करने की ओर भी लगातार काम करना होगा. इस सिलसिले में सबसे अधिक प्रभावी भूमिका चिट्ठाकार निभा सकते हैं. वे विविध प्रदेशों, क्षेत्रों, व्यवसायों, रुचियों, शिक्षा, विषयों, विचारधाराओं, धर्मों तथा सर्जनात्मक प्रतिभा से संपन्न ऐसे व्यक्ति हैं जो प्रायः बिना किसी राग-द्वेष या स्वार्थ के सामाजिक साहचर्य के प्रति असमर्पित हैं. उनमें से हर एक का शब्द भण्डार अलग-अलग है. उनमें से हर एक को अलग-अलग शब्द भंडार की आवश्यकता है. कभी शब्द मिलते हैं कभी नहीं. यदि वे न मिलनेवाले शब्द को अन्य चिट्ठाकारों से पूछें तो अन्य अंचलों या बोलियों के शब्द भंडार में से अनेक शब्द मिल सकेंगे. जो न मिलें उनके लिये शब्द गढ़ने का काम भी चिट्ठा कर सकता है. इससे हिंदी का सतत विकास होगा.
सिविल इन्जीनियरिंग को हिंदी में नागरिकी अभियंत्रण या स्थापत्य यांत्रिकी क्या कहना चाहेंगे? इसके लिये अन्य उपयुक्त शब्द क्या हो? 'सिविल' की हिंदी में न तो स्वीकार्यता है न सार्थकता...फिर क्या करें? सॉइल, सिल्ट, सैंड, के लिये मिट्टी/मृदा, धूल तथा रेत का प्रयोग मैं करता हूँ पर उसे लोग ग्रहण नहीं कर पाते. सामान्यतः धूल-मिट्टी को एक मान लिया जाता है. रोक , स्टोन, बोल्डर, पैबल्स, एग्रीगेट को हिंदी में क्या कहें? मैं इन्हें चट्टान, पत्थर, बोल्डर, रोड़ा, तथा गिट्टी लिखता हूँ . बोल्डर के लिये कोई शब्द नहीं है?
रेत के परीक्षण में 'मटेरिअल रिटेंड ऑन सीव' तथा 'मटेरिअल पास्ड फ्रॉम सीव' को हिंदी में क्या कहें? मुझे एक शब्द याद आया 'छानन' यह किसी शब्द कोष में नहीं मिला. छानन का अर्थ किसी ने छन्नी से निकला पदार्थ बताया, किसी ने छन्नी पर रुका पदार्थ तथा कुछ ने इसे छानने पर मिला उपयोगी या निरुपयोगी पदार्थ कहा. काम करते समय आपके हाथ में न तो शब्द कोष होता है, न समय. कार्य विभागों में प्राक्कलन बनाने, माप लिखने तथा मूल्यांकन करने का काम अंगरेजी में ही किया जाता है जबकि अधिकतर अभियंता, ठेकेदार और सभी मजदूर अंगरेजी से अपरिचित हैं. सामान्यतः लोग गलत-सलत अंगरेजी लिखकर काम चला रहे हैं. लोक निर्माण विभाग की दर अनुसूची आज भी सिर्फ अंगरेजी मैं है. निविदा हिन्दी में है किन्तु उस हिन्दी को कोई नहीं समझ पाता, अंगरेजी अंश पढ़कर ही काम करना होता है. किताबी या संस्कृतनिष्ठ अनुवाद अधिक घातक है जो अर्थ का अनर्थ कर देता है. न्यायलय में मानक भी अंगरेजी पाठ को ही माना जाता है. हर विषय और विधा में यह उलझन है. मैं मानता हूँ कि इसका सामना करना ही एकमात्र रास्ता है किन्तु चिट्ठाजगत हा एक मंच ऐसा है जहाँ ऐसे प्रश्न उठाकर समाधान पाया जा सके तो...? सोचें...
भाषा और साहित्य से सरकार जितना दूर हो बेहतर... जनतंत्र में जन, लोकतंत्र में लोक, प्रजातंत्र में प्रजा हर विषय में सरकार का रोना क्यों रोती है? सरकार का हाथ होगा तो चंद अंगरेजीदां अफसर पाँच सितारेवाले होटलों के वातानुकूलित कमरों में बैठकर ऐसे हवाई शब्द गढ़ेगे जिन्हें जनगण जान या समझ ही नहीं सकेगा. राजनीति विज्ञान में 'लेसीज फेयर' का सिद्धांत है जिसका आशय यह है कि वह सरकार सबसे अधिक अच्छी है जो सबसे कम शासन करती है. भाषा और साहित्य के सन्दर्भ में यही होना चाहिए. लोकशक्ति बिना किसी भय और स्वार्थ के भाषा का विकास देश-काल-परिस्थिति के अनुरूप करती है. कबीर, तुलसी सरकार नहीं जन से जुड़े और जन में मान्य थे. भाषा का जितना विस्तार इन दिनों ने किया अन्यों ने नहीं. शब्दों को वापरना, गढ़ना, अप्रचलित अर्थ में प्रयोग करना और एक ही शब्द को अलग-अलग प्रसंगों में अलग-अलग अर्थ देने में इनका सानी नहीं.
चिट्ठा जगत ही हिंदी को विश्व भाषा बना सकता है? अगले पाँच सालों के अन्दर विश्व की किसी भी अन्य भाषा की तुलना में हिंदी के चिट्ठे अधिक होंगे. क्या उनकी सामग्री भी अन्य भाषाओँ के चिट्ठों की सामग्री से अधिक प्रासंगिक, उपयोगी व् प्रामाणिक होगी? इस प्रश्न का उत्तर यदि 'हाँ' है तो सरकारी मदद या अड़चन से अप्रभावित हिन्दी सर्व स्वीकार्य होगी, इस प्रश्न का उत्तर यदि 'नहीं" है तो हिंदी को 'हाँ' के लिये जूझना होगा...अन्य विकल्प नहीं है. शायद कम ही लोग यह जानते हैं कि विश्व के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने हमारे सौर मंडल और आकाशगंगा के परे संभावित सभ्यताओं से संपर्क के लिये विश्व की सभी भाषाओँ का ध्वनि और लिपि को लेकर वैज्ञानिक परीक्षण कर संस्कृत तथा हिन्दी को सर्वाधिक उपयुक्त पाया है तथा इन दोनों और कुछ अन्य भाषाओँ में अंतरिक्ष में संकेत प्रसारित किए जा रहे हैं ताकि अन्य सभ्यताएँ धरती से संपर्क कर सकें. अमरीकी राष्ट्रपति अमरीकनों को बार-बार हिन्दी सीखने के लिये चेता रहे हैं किन्तु कभी अंग्रेजों के गुलाम भारतीयों में अभी भी अपने आकाओं की भाषा सीखकर शेष देशवासियों पर प्रभुत्व ज़माने की भावना है. यही हिन्दी के लिये हानिप्रद है.
भारत विश्व का सबसे बड़ा बाज़ार है तो भारतीयों की भाषा सीखना विदेशियों की विवशता है. विदेशों में लगातार हिन्दी शिक्षण और शोध का कार्य बढ़ रहा है.
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नवगीत:
आँचल मैला
मत होने दो...
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ममता का
सागर पाया है.
प्रायः भीगे
दामन में.
संकल्पों का
धन पाया है,
रीते-रिसते
आँचल में.
श्रृद्धा-निष्ठां को
सहेज लो,
बिखरा-फैला
मत होने दो.
आँचल मैला
मत होने दो...
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माटी से जब
सलिल मिले तो,
पंक मचेगा
दूर न करना.
खिले पंक में
जब भी पंकज,
पुलक-ललककर
पल में वरना.
श्वास-चदरिया
निर्मल रखना.
जीवन थैला
मत होने दो.
आँचल मैला
मत होने दो...
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होने दो...
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नमन नर्मदा:
भव्य नर्मदा
शन्नो अग्रवाल
(रचनाकार भारत की बेटी किन्तु वर्तमान में इंग्लैंड निवासिनी हैं. परदेश में भी उनके मन-प्राण में भारत की माटी की खुशबू समाई रहती है. इस रचना में वे सनातन सौन्दर्यमयी नर्मदा के प्रति अपनी भावांजलि निवेदित कर रही हैं- सं.)
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दिव्य नर्मदा को मैंने जाना जबसे
लिपट गयी हूँ इसके आलिंगन में
कल-कल में इसकी नवगीत भरे
शीतल,निर्मल धारा के स्पंदन में.
भव्य,शान्तिमय नवरूप धारिणी
सरस,सुगम वेग जल की धारा
छवि सुखद अवलोकन मन में कर
ह्रदय का दुख भी बह जाता सारा.
निश्छल,चपल लहरें भिगो के आयें
छूकर स्वप्निल से अटल किनारों को
बार-बार नहलाती हैं वापस आकर
जल बीच में कितनी ही चट्टानों को.
पंछी आते जल पी उड़ते मंडराते ऊपर
अठखेली करके जल से करते गुंजन
कलरव से भर जातीं सभी दिशायें तब
फेनिल जल का लगता चांदी सा तन.
आता पथ में कोई अवरोह तनिक भी
नहीं जरा सा तब गति में अंतर आता
तन-मन सबके धोकर उज्ज्वल करती
मिल प्रवाह में पाप-मैल सब बह जाता.
८-१०-२००९
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