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सोमवार, 9 मार्च 2026

मार्च ८, रामकिंकर, सॉनेट, शिव रात्रि, महिला दिवस, दोहा, सुधारानी श्रीवास्तव, धरती, शृंगार, ग़ज़लिका

सलिल सृजन ८ मार्च
*
दोहों में वूमैन डे . गुड मॉर्निंग वूमैन से, कहो झुकाकर हैड। लाइफ गुड होगी तभी, वरना होगी बैड।। . गृहणी को गुड नून कह, नमन करो श्रीमान। पीस चाहिए तो तजो, पड़ोसिनों का ध्यान।। . पीस-पीस कट पीस कर, वाइफ नाइफ थाम। साग-सब्जियों का करे, डटकर काम तमाम।। . झाड़ू-पोछा हँस करो, तब हो युद्ध विराम। अगर सेफ्टी चाहिए, डेली करो सलाम।। . कर मसाज गुड डे कहो, थ्रैडिंग सीखो यार। वैडिंग हो तब ही सफल, हैप्पी हो जब नार।। . संध्या वंदन कीजिए, करिए टी प्रेजेंट। पत्नी चालीसा पढ़ें, बन उनके एजेंट।। . करो सरेंडर बिन लड़े, मियाँ मनाओ खैर। बहा अश्क की दें नदी, बच न सकोगे तैर।। . गुड नाइट फाइट बिना, कहो दबाकर फीट। सपने में भी मत करो, प्यारे! उनको चीट।। . पत्नी परमेश्वर कहो, फ्रैंड गार्जियन जान। टीचर प्रीचर शनीचर, सखी जान की जान।। ०००
छंद शाला
दोहा-रोला-कुंडलिया
.
नारी वंदन कर रहा, पुरुष वर्ग समवेत।
दिवस एक पश्चात् ही, फिर नारी अनिकेत।। -अशोक व्यग्र
फिर नारी अनिकेत, करे जग विजय न हारे।
नर कर जोड़े खड़ा, पूज आरती उतारे।।
हैं भगवन-भगवती, पुजारिन और पुजारी।
कम न अधिक किसी से,
सम हैं नर और नारी।।
०००
ग़ज़लिका
.
कागा खोजें, मिले न ठौर
कहो कौन देगा कागौर?
.
तेल लुटेरा ट्रंप निशाचर
चाह रहा और ही और
.
भूख भूमि की शी जिन पिंग को
बढ़े दिनों-दिन करिए गौर
.
नेतन्याहू भय का मारा
मरघट करता मानव ठौर
.
पुतिन लालची है सत्ता का
है यूक्रेन अधर पर कौर
.
भूख भूख को पैदा करती
सोया है शरीफ जा सौर।
.
मन की कह, मनमानी करता
ब्याही तज, बाँधे सिर मौर
८.३.२०२६
०००
युगतुलसी स्मरण
***
शीलसिंधु राघव छवि अनुपम,
जगजननी जानकी वत्सला,
हनुमत राम भक्ति शुभ प्रबला,
रक्षक राम-नाम जप निरुपम।
मधुर मूर्ति माधव हरती तम,
राधा आद्याशक्ति मंजुला,
भक्ति भावधारा नव मृदुला,
काम करें निष्काम सदा हम।
वाल्मीकि श्रीराम उपासक,
तुलसी राम चरित के रसिया,
युगतुलसी भव तरे राम जप।
राम-कृष्ण भव सागर तारक,
सकल सृष्टि स्वामी उन्नायक,
नाम सुमिरना सहज सरल तप।
८ मार्च २०२४
***
सॉनेट
महाशिवरात्रि / महिला दिवस
*
महाकाल धूनी रमा लेते जब वैराग,
उमा अपर्णा तप करें शिव देते वरदान,
हिमगिरि-मैना मिल करें पुलकित कन्यादान,
द्वैत मिटा अद्वैत वर देते निजता त्याग।
अध नारी-नर में पले कालजयी अनुराग,
कार्तिकेय-गणपति तनय प्रगटे पुत्र महान,
तनया मनसा-नर्मदा देतीं जीवन-दान,
असमय व्यापे काम, दें फूँक लगाकर आग।
महिला दिवस न नर बिना मन सकता लें मान,
पूरक बनकर साथ हों, मिलें हाथ, हो खैर,
नहीं विरोधी हो कभी, रहिए कभी न दूर।
पुरुष दिवस महिला बिना कैसे हो रस-खान?
दें-पाएँ सम्मान नित, कभी न पालें बैर,
शब्द-अर्थ बनकर रहें सँग न जो वे सूर।
***
तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल
हार जाने का हौसला है मुझे -अहमद फ़राज़
गिरहबंदी
हार जाने का हौसला है मुझे
वज़्न - २१२२ १२१२ २२ (११२)
अर्कान -- फ़ाइलातुन--मुफ़ाइलुन--फ़ेलुन
बह्र -- बह्रे-ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़्बून महज़ूफ़ मक़्तूअ
क़ाफ़िया -- हौसला ('आ' की बंदिश)
रदीफ़ -- है मुझे
*
हारना-जीतना नहीं होगा
साथ होने का हौसला है मुझे।
*
चार सौ बीस मैं रहा प्यारे
नेता होने का हौसला है मुझे।
*
लाख फाके करूँ, न हारूँगा
फ़स्ल बोने का हौसला है मुझे।
*
नैन बेचैन नैन से उलझे
खोने-पाने का हौसला है मुझे।
*
बोल वादे किए न, जुमले थे
धोखे खाने का हौसला है मुझे।
***
गीत
मृत्युंजय
*
हे मृत्युंजय! महाकाल हे!!
गौरी को पाकर निहाल हे!
रक्षक सकल सृष्टि के तुम ही-
ऊँचा रखना भक्त-भाल हे!!
हे नटराज! न अधिक नचाओ
भव सागर यह पार कराओ।
चरण-शरण ले लो शिव शंकर
श्वासें-आसें धन्य कराओ।
मुझे न होने दो निढाल हे!
हे मृत्युंजय! महाकाल हे!!
नीलकंठ हे! अमृत-दाता
जो तुमको ध्याता तर जाता।
मन-मंदिर में करे विराजित-
जो वह मनवांछित पा जाता।
कृपा करो सुत पर भुआल हे!
हे मृत्युंजय! महाकाल हे!!
निंगादेव! न मति हो दूषित
बड़ादेव! हों कहीं न शोषित।
उमानाथ त्रिपुरारि सदय हों-
महादेव! प्रभु!! करिए पोषित।
रहे न बाकी कुछ सवाल हे!
हे मृत्युंजय! महाकाल हे!!
***
विरासत
भारत के स्वाधीन होने के कुछ समय बाद इंग्लैण्ड की राष्ट्राध्यक्ष महारानी एलिजाबेथ पहली बार स्वतंत्र भारत में आ रही थीं। राजनैतिक शिष्टाचार के अनुसार भारत के राष्ट्राध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को अपनी पत्नी सहित हाथ मिलाकर उनका स्वागत करना था। प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें इससे अवगत कराया। राजेंद्र बाबू यह सुन कर बोले," प्रोटोकाल के तहत मेरी पत्नी भी साथ होंगी उस समय, फिर तो यह मुझ से न हो पाएगा।"
नेहरूजी ने पूछा,"कठिनाई क्या है?"
राजेंद्र बाबू ने कहा- "किसी और स्त्री से हाथ मिलाने पर पत्नी कहीं भड़क गईं और महारानी के बाल नोचने पर आमादा हो गईं तो अनर्थ हो जाएगा।"
नेहरु बोले- "हाँ, यह दिक्कत तो बड़ी है। फिर नेहरु ने ही सलाह दी कि आप सिर्फ़ हाथ जोड़ लें। मैं आगे बढ़ कर जल्दी से हाथ मिला लूँगा। किसी को कुछ पता ही नहीं चलेगा।"
पद पर रहते हुए अपना कर्तव्य पूर्ण न करना राजेन्द्र प्रसाद जी का स्वभाव नहीं था। जब महारानी आईं तो राजेंद्र प्रसाद ने महारानी से ख़ुद ही हाथ मिला लिया।अब नेहरू घबराए कि कहीं कुछ अनर्थ न हो जाए पर कहीं कुछ भी नहीं हुआ।
राजेंद्र प्रसाद की पत्नी राजवंशी देवी शांत खड़ी रहीं। बाद में जब महारानी की भारत यात्रा सकुशल संपन्न हो गई और वह इंग्लैण्ड लौट गईं तब एक दिन राजेंद्र प्रसाद से नेहरू ने पूछा कि आपने तो हाथ मिला लिया और कुछ नहीं हुआ। तो राजेंद्र बाबू ने नेहरू को बताया कि असल में उस दिन आप के जाने बाद रात में पत्नी से बात की।
"एक संकट आ गया है। एक अंगरेज औरत से हाथ मिलाना पड़ेगा।'' पहले तो वह बहुत नाराज हुईं कि मेरे रहते तो यह संभव नहीं। फिर मैं ने पत्नी को बताया कि मामला नौकरी का है अगर उस अंगरेज औरत से हाथ नहीं मिलाया तो नौकरी चली जाएगी। यह सुनकर पत्नी ने कहा- "अगर बात नौकरी की है तो हाथ मिला लीजिए, नौकरी नहीं जानी चाहिए।"
***
चिंतन: दोहा मंथन १.
*
लाओत्से ने कहा है, भोजन में लो स्वाद।
सुन्दर सी पोशाक में, हो घर में आबाद।।
लाओत्से ने बताया, नहीं सरलता व्यर्थ।
रस बिन भोजन का नहीं, सत्य समझ कुछ अर्थ।।
रस न लिया; रस-वासना, अस्वाभाविक रूप।
ले विकृत हो जाएगी, जैसे अँधा कूप।।
छोटी-छोटी बात में, रस लेना मत भूल।
करो सलिल-स्पर्श तो, लगे खिले शत फ़ूल।
जल-प्रपात जल-धार की, शीतलता अनुकूल।।
जीवन रस का कोष है, नहीं मोक्ष की फ़िक्र।
जीवन से रस खो करें, लोग मोक्ष का ज़िक्र।।
मंदिर-मस्जिद की करे, चिंता कौन अकाम।
घर को मंदिर बना लो, हो संतुष्ट सकाम।।
छोटा घर संतोष से, भर होता प्रभु-धाम।
तृप्ति आदमी को मिले, घर ही तीरथ-धाम।।
महलों में तुम पाओगे, जगह नहीं है शेष।
सौख्य और संतोष का, नाम न बाकी लेश।।
जहाँ वासना लबालब, असंतोष का वास।
बड़ा महल भी तृप्ति बिन, हो छोटा ज्यों दास।।
क्या चाहोगे? महल या, छोटा घर; हो तृप्त?
रसमय घर या वरोगे, महल विराट अतृप्त।।
लाओत्से ने कहा है:, "भोजन रस की खान।
सुन्दर कपड़े पहनिए, जीवन हो रसवान।।"
लाओ नैसर्गिक बहुत, स्वाभाविक है बात।
मोर नाचता; पंख पर, रंगों की बारात।।
तितली-तितली झूमती, प्रकृति बहुत रंगीन।
प्रकृति-पुत्र मानव कहो, क्यों हो रंग-विहीन?
पशु-पक्षी तक ले रहे, रंगों से आनंद।
मानव ले; तो क्या बुरा, झूमे-गाए छंद।।
वस्त्राभूषण पहनते, थे पहले के लोग।
अब न पहनते; क्यों लगा, नाहक ही यह रोग?
स्त्री सुंदर पहनती, क्यों सुंदर पोशाक।
नहीं प्राकृतिक यह चलन, रखिए इसको ताक।।
पंख मोर के; किंतु है, मादा पंख-विहीन।
गाता कोयल नर; मिले, मादा कूक विहीन।।
नर भी आभूषण वसन, बहुरंगी ले धार।
रंग न मँहगे, फूल से, करे सुखद सिंगार।।
लाओ कहता: पहनना, सुन्दर वस्त्र हमेश।
दुश्मन रस के साधु हैं, कहें: 'न सुख लो लेश।।'
लाओ कहता: 'जो सहज, मानो उसको ठीक।'
मुनि कठोर पाबंद हैं, कहें न तोड़ो लीक।।
मन-वैज्ञानिक कहेंगे:, 'मना न होली व्यर्थ।
दीवाली पर मत जला, दीप रस्म बेअर्थ।।'
खाल बाल की निकालें, यह ही उनका काम।
खुशी न मिल पाए तनिक, करते काम तमाम।।
अपने जैसे सभी का, जीवन करें खराब।
मन-वैज्ञानिक शूल चुन, फेंके फूल गुलाब।।
लाओ कहता: 'रीति का, मत सोचो क्या अर्थ?
मजा मिला; यह बहुत है, शेष फ़िक्र है व्यर्थ।।
होली-दीवाली मना, दीपक रंग-गुलाल।
सबका लो आनंद तुम, नहीं बजाओ गाल।।
***
क्षणिका
महिला
*
खुश हो तो
खुशी से दुनिया दे हिला
नाखुश हो तो
नाखुशी से लोहा दे पिघला
खुश है या नाखुश
विधाता को भी न पता चला
अनबूझ पहेली
अनन्य सखी-सहेली है महिला
***
सॉनेट
तुम
*
ट्रेन सरीखी लहरातीं तुम।
पुल जैसे मैं थरथर होता।
अपनों जैसे भरमातीं तुम।।
मैं सपनों सा बेघर होता।।
तुम जुमलों जैसे मन भातीं।
मैं सचाई सम कडुवा लगता।
न्यूज़ सरीखी तुम बहकातीं।।
ठगा गया मैं; खुद को ठगता।।
कहतीं मन की बात, न सुनतीं।
जन की बात अनकही रहती।
ईश न जाने क्या तुम गुनतीं।।
सुधियों की चादर नित तहती।।
तुम केवल तुम, कोई न तुम सा।
तुम में हूँ मैं खुद भी गुम सा।।
८-३-२०२२
***
ग़ज़लिका
*
झुका आँखें कहर ढाए
मिला नज़रें फतह पाए
चलाए तीर जब दिल पर
न कोई दिल ठहर पाए
गहन गंभीर सागर सी
पवन चंचल भी शर्माए
धरा सम धैर्य धारणकर
बदरियों सी बरस जाए
करे शुभ भगवती हो यह
अशुभ हो तो कहर ढाए
कभी अबला, कभी सबला
बला हर पल में हर गाए
न दोधारी, नहीं आरी
सुनारी सभी को भाए
८-३-२०२०
***
महिला दिवस पर विशेष
बहुमुखी प्रतिभा की धनी विधि पंडिता सुधारानी श्रीवास्तव
श्रीमती सुधारानी श्रीवास्तव का महाप्रस्थान रंग पर्व के रंगों की चमक कम कर गया है। इल बहुमुखी बहुआयामी प्रतिभा का सम्यक् मूल्यांकन समय और समाज नहीं कर सका। वे बुंदेली और भारतीय पारंपरिक परंपराओं की जानकार, पाककला में निष्णात, प्रबंधन कला में पटु, वाग्वैदग्धय की धनी, शिष्ट हास-परिहासपूर्ण व्यक्तित्व की धनी, प्रखर व्यंग्यकार, प्रकांड विधिवेत्ता, कुशल कवयित्री, संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू साहित्य की गंभीर अध्येता, संगीत की बारीकियों को समझनेवाली सुरुचिपूर्ण गरिमामयी नारी हैं। अनेकरूपा सुधा दीदी संबंधों को जीने में विश्वास करती रहीं। उन जैसे व्यक्तित्व काल कवलित नहीं होते, कालातीत होकर अगणित मनों में बस जाते हैं।
सुधा दीदी १९ जनवरी १९३२ को मैहर राज्य के दीवान बहादुर रामचंद्र सहाय व कुंतीदेवी की आत्मजा होकर जन्मीं। माँ शारदा की कृपा उन पर हमेशा रही। संस्कृत में विशारद, हिंदी में साहित्य रत्न, अंग्रेजी में एम.ए.तथा विधि स्नातक सुधा जी मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में अधिवक्ता रहीं। विधि साक्षरता के प्रति सजग-समर्पित सुधा जी १९९५ से लगातार दो दशकों तक मन-प्राण से समर्पित रहीं। सारल्य, सौजन्य, ममत्व और जनहित को जीवन का ध्येय मानकर सुधा जी ने शिक्षा, साहित्य और संगीत की त्रिवेणी को बुंदेली जीवनशैली की नर्मदा में मिलाकर जीवनानंद पाया-बाँटा।
वे नारी के अधिकारों तथा कर्तव्यों को एक दूसरे का पूरक मानती रहीं। तथाकथित स्त्रीविमर्शवादियों की उन्मुक्तता को उच्छृंखलता को नापसंद करती सुधा जी, भारतीय नारी की गरिमा की जीवंत प्रतीक रहीं। सुधा दीदी और उन्हें भौजी माननेवाले विद्वान अधिवक्ता राजेंद्र तिवारी की सरस नोंक-झोंक जिन्होंने सुनी है, वे आजीवन भूल नहीं सकते। गंभीरता, विद्वता, स्नेह, सम्मान और हास्य-व्यंग्य की ऐसी सरस वार्ता अब दुर्लभ है। कैशोर्य में
संस्कारधानी के दो मूर्धन्य गाँधीवादी हिंदी प्रेमी व्यक्तित्वों ब्यौहार राजेंद्र सिंह व सेठ गोविंददास द्वारा संविधान में हिंदी को स्थान दिलाने के लिए किए गए प्रयासों में सुधा जी ने निरंतर अधिकाधिक सहयोग देकर उनका स्नेहाशीष पाया।
अधिवक्ता और विधिवेत्ता -
१३ अप्रैल १९७५ को महान हिंदी साहित्यकार, स्त्री अधिकारों की पहरुआ,महीयसी महादेवी जी लोकमाता महारानी दुर्गावती की संगमर्मरी प्रतिमा का अनावरण करने पधारीं। तब किसी मुस्लिम महिला पर अत्याचार का समाचार सामने आया था। महादेवी जी ने मिलने पहुँची सुधा जी से पूछा- "सुधा! वकील होकर तू महिलाओं के लिए क्या कर रही है?" महीयसी की बात मन में चुभ गयी। सुधा दीदी ने इलाहाबाद जाकर सर्वाधिक लोकप्रिय पत्रिका मनोरमा के संपादक को प्रेरित कर महिला अधिकार स्तंभ आरंभ किया। शुरू में ४ अंकों में पत्र और उत्तर दोनों वे खुद ही लिखती रहीं। बाद में यह स्तंभ इतना अधिक लोकप्रिय हुआ कि रोज ही पत्रों का अंबार लगने लगा। यह स्तंभ १९८१ तक चला। विधिक प्रकरणों, पुस्तक लेखन तथा अन्य व्यस्तताओं के कारण इसे बंद किया गया। १९८६ से १९८८ तक दैनिक नवीन दुनिया के साप्ताहिक परिशिष्ट नारी निकुंज में "समाधान" शीर्षक से सुधा जी ने विधिक परामर्श दिया।
स्त्री अधिकार संरक्षक -
सामान्य महिलाओं को विधिक प्रावधानों के प्रति सजग करने के लिए सुधा जी ने मनोरमा, धर्मयुग, नूतन कहानियाँ, वामा, अवकाश, विधि साहित्य समाचार, दैनिक भास्कर आदि में बाल अपराध, किशोर न्यायालय, विवाह विच्छेद, स्त्री पुरुष संबंध, न्याय व्यवस्था, वैवाहिक विवाद, महिला भरण-पोषण अधिकार, धर्म परिवर्तन, नागरिक अधिरार और कर्तव्य, तलाक, मुस्लिम महिला अधिकार, समानता, भरण-पोषण अधिकार, पैतृक संपत्ति अधिकार, स्वार्जित संपत्ति अधिकार, विधिक सहायता, जीवनाधिकार, जनहित विवाद, न्याय प्रक्रिया, नागरिक अधिकार, मताधिकार, दुहरी अस्वीकृति, सहकारिता, महिला उत्पीड़न, मानवाधिकार, महिलाओं की वैधानिक स्थिति, उपभोक्ता संरक्षण, उपभोक्ता अधिकार आदि ज्वलंत विषयों पर शताधिक लेख लिखे। कई विषयों पर उन्होंने सबसे पहले लिखा।
विधिक लघुकथा लेखन-
१९८७ में सुधा जी ने म.प्र.राज्य संसाधन केंद्र (प्रौढ़ शिक्षा) इंदौर के लिए कार्यशालाओं का आयोजन कर नव साक्षर प्रौढ़ों के लिए न्याय का घर, भरण-पोषण कानून, अमन की राह पर, वैवाहिक सुखों के अधिकार, सौ हाथ सुहानी बात, माँ मरियम ने राह सुझाई, भूमि के अधिकार आदि पुस्तकों में विधिक लघुकथाओं के माध्यम से हिंदू, मुस्लिम, ईसाई कानूनों का प्राथमिक ग्यान दिया।
उपभोक्ता हित संरक्षण
१९८६ में उपभोक्ता हित संरक्षण कानून बनते ही सुधा जी ने इसका झंडा थाम लिया और १९९२ में "उपभोक्ता संरक्षण : एक अध्ययन" पुस्तक लिखी। भारत सरकार के नागरिक आपूर्ति और उपभोक्ता मामले मंत्रालय ने इसे पुरस्कृत किया।
मानवाधिकार संरक्षण
वर्ष १९९३ में मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम बना। सुधा जी इसके अध्ययन में जुट गईं। भारतीय सामाजिक अनुसंधान परिषद दिल्ली के सहयोग से शोध परियोजना "मानवाधिकार और महिला उत्पीड़न" पर कार्य कर २००१ में पुस्तकाकार में प्रकाशित कराया। इसके पूर्व म.प्र.हिंदी ग्रंथ अकादमी ने सुधा जी लिखित "मानवाधिकार'' ग्रंथ प्रकाशित किया।
विधिक लेखन
सुधा दीदी ने अपने जीवन का बहुमूल्य समय विधिक लेखन को देकर ११ पुस्तकों (भारत में महिलाओं की वैधानिक स्थिति, सोशियो लीगल अास्पेक्ट ऑन कन्ज्यूमरिज्म, उपभोक्ता संरक्षण एक अध्ययन, महिलाओं के प्रति अपराध, वीमेन इन इंडिया, मीनवाधिकार, महिला उत्पीड़न और मानवाधिकार, उपभोक्ता संरक्षण, भारत में मानवाधिकार की अवधारणा, मानवाधिरार और महिला शोषण, ह्यूमैनिटी एंड ह्यूमन राइट्स) का प्रणयन किया।
सशक्त व्यंग्यकार -
सुधा दीदी रचित वकील का खोपड़ा, दिमाग के पाँव तथा दिमाग में बकरा युद्ध तीन व्यंग्य संग्रह तथा ग़ज़ल-ए-सुधा (दीवान) ने सहृदयों से प्रशंसा पाई।
नर्मदा तट सनातन साधनास्थली है। सुधा दीदी ने आजीवन सृजन साधना कर हिंदी माँ के साहित्य कोष को समृद्ध किया है। दलीय राजनीति प्रधान व्यवस्था में उनके अवदान का सम्यक् मूल्यांकन नहीं हुआ। उन्होंने जो मापदंड स्थापित किए हैं, वे अपनी मिसाल आप हैं। सुधा जी जैसे व्यक्तित्व मरते नहीं, अमर हो जाते हैं। मेरा सौभाग्य है कि मुझे उनका स्नेहाशीष और सराहना निरंतर मिलती रही।
८-३-२०२०
***
गीत
महिला दिवस
*
एक दिवस क्या
माँ ने हर पल, हर दिन
महिला दिवस मनाया।
*
अलस सवेरे उठी पिता सँग
स्नान-ध्यान कर भोग लगाया।
खुश लड्डू गोपाल हुए तो
चाय बनाकर, हमें उठाया।
चूड़ी खनकी, पायल बाजी
गरमागरम रोटियाँ फूली
खिला, आप खा, कंडे थापे
पड़ोसिनों में रंग जमाया।
विद्यालय से हम,
कार्यालय से
जब वापिस हुए पिताजी
माँ ने भोजन गरम कराया।
*
ज्वार-बाजरा-बिर्रा, मक्का
चाहे जो रोटी बनवा लो।
पापड़, बड़ी, अचार, मुरब्बा
माँ से जो चाहे डलवा लो।
कपड़े सिल दे, करे कढ़ाई,
बाटी-भर्ता, गुझिया, लड्डू
माँ के हाथों में अमृत था
पचता सब, जितना जी खा लो।
माथे पर
नित सूर्य सजाकर
अधरों पर
मृदु हास रचाया।
*
क्रोध पिता का, जिद बच्चों की
गटक हलाहल, देती अमृत।
विपदाओं में राहत होती
बीमारी में माँ थी राहत।
अन्नपूर्णा कम साधन में
ज्यादा काम साध लेती थी
चाहे जितने अतिथि पधारें
सबका स्वागत करती झटपट।
नर क्या,
ईश्वर को भी
माँ ने
सोंठ-हरीरा भोग लगाया।
*
आँचल-पल्लू कभी न ढलका
मेंहदी और महावर के सँग।
माँ के अधरों पर फबता था
बंगला पानों का कत्था रँग।
गली-मोहल्ले के हर घर में
बहुओं को मिलती थी शिक्षा
मैंनपुरी वाली से सीखो
तनक गिरस्थी के कुछ रँग-ढंग।
कर्तव्यों की
चिता जलाकर
अधिकारों को
नहीं भुनाया।
८-३-२०१७
***
श्रृंगार गीत
रहवासी
*
ओ मन-मन्दिर की रहवासी!
तुम बिन घर
क्यों भवन हो रहा?
*
खनक-झनक सुनने के आदी
कान तुम्हारे बिन व्याकुल हैं।
''ए जी! ओ जी!!'' मंत्र-ऋचा बिन
कहा नहीं पर प्राण विकल हैं।
नाकाफी लगती है कॉफ़ी
फीके क्यों लगते गुड-शक्कर?
बिना काम क्यों शयन कक्ष के
लगा रहा चक्कर घनचक्कर?
खबर न रुचती, चर्चा नीरस
गीत अगीत हुए जाते हैं
बिन मुखड़ा हर एक अंतरा
लय-गति-रस
आधार खो रहा
ओ मन-मन्दिर की रहवासी!
तुम बिन घर
क्यों भवन हो रहा?
*
डाले लेकिन गौरैया आ
बैठ मुँडेरे चुगे न दाना।
दरवाजे पर डाली रोटी
नहीं गाय का मगर ठिकाना।
बिना गुहारे चला गया है
भिक्षुक भी मुझको निराश कर
मन न हो रहा दफ्तर छोडूँ
जल्दी से जल्दी जाऊँ घर।
अधिकारी हो चकित पूछता
कहो, आज क्या घडी बंद है?
क्या बतलाऊँ उसे लघुकथा
का भूली है
कलम ककरहा
ओ मन-मन्दिर की रहवासी!
तुम बिन घर
क्यों भवन हो रहा?
*
सब्जी नमक हलाल नहीं है
खाने लायक दाल नहीं है।
चाँवल की संसद में कंकर
दाँत कौन बेहाल नहीं है?
राम राज्य आना है शायद
बही दूध की नदी आज भी।
असल डूबना हुआ सुनिश्चित
हाथ न लगता कुफ़्र ब्याज भी।
अर्थशास्त्र फिकरे कसता है
हार गया रे गीतकार तू!
तेरे बस में नहीं रहा कुछ
क्यों पत्थर पर
फसल बो रहा?
ओ मन-मन्दिर की रहवासी!
तुम बिन घर
क्यों भवन हो रहा?
८-३-२०१६
***
कविता महिला दिवस पर :
धरती
*
धरती काम करने
कहीं नहीं जाती
पर वह कभी भी
बेकाम नहीं होती.
बादल बरसता है
चुक जाता है.
सूरज सुलगता है
ढल जाता है.
समंदर गरजता है
बँध जाता है.
पवन चलता है
थम जाता है.
न बरसती है,
न सुलगती है,
न गरजती है,
न चलती है
लेकिन धरती
चुकती, ढलती,
बंधती या थमती नहीं.
धरती जन्म देती है
सभ्यता-संस्कृति को,
धरती जन्म देती है
तभी ज़िंदगी
बंदगी बन पाती है.
धरती कामगार नहीं
कामगारों की माँ होती है.
इसीलिये इंसानियत ही नहीं
भगवानियत भी
उसके पैर धोती है..
८-३-२०११
***
ग़ज़लिका
*
भुज पाशों में कसता क्या है?
अंतर्मन में बसता क्या है?
*
जितना चाहा फेंक निकालूँ
उतना भीतर धँसता क्या है?
*
ऊपर से तो ठीक-ठाक है
भीतर-भीतर रिसता क्या है?
*
दिल ही दिल में रो लेता है.
फिर होठों से हँसता क्या है?
*
दाने हुए नसीब न जिनको
उनके घर में पिसता क्या है?
*
'सलिल' न पाई खलिश अगर तो
क्यों है मौन?, सिसकता क्या है?
८-३-२०१०

*** 

शनिवार, 2 मार्च 2024

२ मार्च, तुम, मुक्तिका, नवगीत, शृंगार, सॉनेट, सरस्वती, शहरियों, रामकिंकर

सलिल सृजन २.३.२०२४
*
इंग्लिश सॉनेट
रामकिंकर
हैं रामकिंकर नहीं देह केवल,
भजन-भक्ति में लीन प्रज्ञा सनातन,
नहीं देह उनको रही गेह केवल,
बनी उपकरण राम जप हित पुरातन।
पहना वसन आत्मा ने तभी तक,
जब तक सभी कर्म बंधन न टूटे,
किया स्वच्छ दर्पण मन का गमन तक,
सजग थे कहीं कोई कालिख न छूटे।
न दो हैं किशन-राम जग को बताया,
चरित कैकई का बताया महत्तम,
शिव-राम-हनुमत को मस्तक नवाया,
कहा प्रभु कृपा पाए वह जो लघुत्तम।
थे रामकिंकर कहे जो ग़लत वो,
हैं रामकिंकर जिएँ राम को जो।
२.३.२०२४
•••
इटेलियन सॉनेट
तेरा मेरा साथ
*
तेरा मेरा साथ,
नामी अरु गुमनाम,
ज्यों हों छंद-विराम,
ले हाथों में हाथ। 
राजमार्ग-फुटपाथ, 
जुमला अरु पैगाम, 
खास आदमी आम, 
पैर उठाए माथ। 
साथ मगर है दूर, 
नदिया के दो तीर,
हम हैं नाथ-अनाथ। 
आँखें रहते सूर,
लोई और कबीर,
साथ न रहकर साथ। 
*** 
सॉनेट
मीन प्यासी है अपने दरिया में
*
मीन प्यासी है अपने दरिया में
डाल दो जाल फँस ही जाएगी,
इश्क है कीच धँस भी जाएगी,
ज्यों हलाला है बीच शरीआ में।
कौन किसका हुआ है दुनिया में,
साँस अरु आस सँग ही जाएगी,
ज़िंदगी खूब आजमाएगी,
गुन ही होता नहीं है गुनिया में।
आपने खुद को नहीं जाना
आईना व्यर्थ ही सदा देखा,
टकतीं और को रही आँखें।
जान लूँ गैरों को सदा ठाना,
खुद का खुद ही किया कभी लेखा?
काट लीं खुद की खुद सभी शाखें।
२.३.२०२४
***
सॉनेट
जो चले गए; वे नहीं गए।
जो रुके रहे; वे नहीं रहे।
कहें कौन बह के नहीं बहे?
कहें कौन हैं जो सदा नए?
.
जो परे रहे; न परे हुए।
जो जुड़े; नहीं वे कभी जुड़े।
जहाँ राह पग भी वहीं मुड़े।
जो सगे बने; न सगे हुए।
.
न ही आह हो; न ही वाह हो।
नहीं गैर की परवाह हो।
प्रभु! धैर्य दे जो अथाह हो।।
.
पाथेय कुछ न गुनाह हो।
गहराई हो तो अथाह हो।
गर सलिल हो तो प्रवाह हो।।
२-३-२०२३
•••
सॉनेट
प्रार्थना
सरस्वती जी सुमति दीजिए।
अंगुलियों पर रमें रमा माँ।
शिवा शक्ति दे कृपा कीजिए।।
विधि-हरि-हर हृदय सर्वदा।।
चित्र गुप्त मस्तक में बसिए।
गोद खिलाए धरती माता।
पिता गगन हो कभी न तजिए।।
पवन सखा सम शांति प्रदाता।।
आत्म दीप कर अग्नि प्रकाशित।
रहे जीव संजीव सलिल से।
मानवता हित रहें समर्पित।।
खिलें रहें हम शत शतदल से।।
कर जोड़ें, दस दिश प्रणाम कर।
सभी सुखी हों, सबका शुभ कर।।
२-३-२०२२
•••
नवगीत
सुनो शहरियों!
*
सुनो शहरियों!
पिघल ग्लेशियर
सागर का जल उठा रहे हैं
जल्दी भागो।
माया नगरी नहीं टिकेगी
विनाश लीला नहीं रुकेगी
कोशिश पार्थ पराजित होगा
श्वास गोपिका पुन: लुटेगी
बुनो शहरियों !
अब मत सपने
खुद से खुद ही ठगा रहे हो
मत अनुरागो
संबंधों के लाक्षागृह में
कब तक खैर मनाओगे रे!
प्रतिबंधों का, अनुबंधों का
कैसे क़र्ज़ चुकाओगे रे!
उठो शहरियों !
बेढब नपने
बना-बना निज श्वास घोंटते
यह लत त्यागो
साँपिन छिप निज बच्चे सेती
झाड़ी हो या पत्थर-रेती
खेत हो रहे खेत सिसकते
इमारतों की होती खेती
धुनो शहरियों !
खुद अपना सिर
निज ख्वाबों का खून करो
सोओ, मत जागो
१५-११-२०१९
***
दोहा सलिला
माँ
*
माता के दरबार में, आत्म ज्योति तन दीप।
मुक्ता मणि माँ की कृपा, सफल साधना सीप।।
*
मैया कर इतनी कृपा, रहे सत्य का बोध।
लोभ-मोह से दूर रख, बालक भाँति अबोध।।
*
जो पाया पूरा नहीं, कम कुबेर का कोष।
मातु-कृपा बिन किस तरह, हो मन को संतोष।।
*
रचना कर संसार की, माँ लेती है पाल।
माई कब कुछ दे सका, हर शिशु है कंगाल।।
*
जननी ने जाया जिन्हें, जातक सभी समान।
जाति देश या धर्म की, जय बोलें नादान।।
*
अंब! तुम्हीं जगदंब हो, तुमसे सकल जहान।
तुम ही लय गति यति तुम्हीं, तुम ही हो रस-खान।।
*
बेबे आई ई अनो, तल्ली जीजी प्लार।
अमो अमा प्यो मोज मुम, म्ये बा इमा दुलार।।
*
बीजी ब्वे माई इया, मागो पुई युम मम।
अनो मम्ज बीबी इजू, मैडी मुम पुरनम।।
*
आमा मागो मुमा माँ, मामा उम्मा स्नेह।
थाई, माई, नु, अम्मे, अम्मी, भाभी गेह।।
*
मम्मी मदर इमा ममी, अम्मा आय सुशांत।
एमा वाहू चईजी, बाऊ मामा कांत ।।
(माँ के ६० पर्यायवाची शब्द प्रयुक्त)
***
श्रृंगार गीत
*
जीवन की बगिया में
महकाये मोगरा
पल-पल दिन आज का।
*
श्वास-श्वास महक उठे
आस-आस चहक उठे
नयनों से नयन मिलें
कर में कर बहक उठे
प्यासों की अँजुरी में
मुस्काये हरसिंगार
छिन-छिन दिन आज का।
*
रूप देख गमक उठे
चेहरा चुप चमक उठे
वाक् हो अवाक 'सलिल'
शब्द-शब्द गमक उठे
गीतों की मंजरी में
खिलखलाये पारिजात
गिन -गिन दिन आज का।
*
चुप पलाश दहक उठे
महुआ सम बहक उठे
गौरैया मन संझा
कलरव कर चहक उठे
मादक मुस्कानों में
प्रमुदित हो अमलतास
खिल-खिल दिन आज का।
***
कुंडलिया
*
थोड़ी सी मस्ती हमें, दे दे जग के नाथ।
थोड़ी सी सस्ती मिले, ठंडाई भंग साथ।।
ठंडाई भंग साथ, रंग बरसाने जाएँ।
बरसाने की लली दरस दिखलाने आएँ।।
रंग लगाने मची रहे, होड़ाहोड़ी सी।
दे दे मस्ती नाथ, हमें जग के थोड़ी सी।।
***
मुक्तक
*
आप-हम हैं साथ सुख-संतोष है
सृजन सार्थक शांति का जयघोष है
सत्य-शिव-सुंदर रचें साहित्य सब
सत्-चित्-आनंद जीवन कोष है
***
मुक्तिका
*
बेच घोड़े सोइए, अब शांति है
सत्य से मुँह मोड़िए, अब शांति है
मिल गई सत्ता, करें मनमानियाँ
द्वेष नफरत बोइए, अब शांति है
बाँसुरी ले हाथ में, घर बारिए
मार पत्थर रोइए, अब शांति है
फसल जुमलों की उगाई आपने
बोझ शक का ढोइए, अब शांति है
अंधभक्तों! आँख अपनी खोलिए
सत्य को मत खोइए, अब शांति है
हैं सभी नंगे हमामों में यहाँ
शकल अपनी धोइए, अब शांति है
शांत शोलों में छिपीं चिनगारियाँ
जिद्द नाहक छोड़िए, अब शांति है
२-३-२०२०
***
दोहा की होली
*
दीवाली में दीप हो, होली रंग-गुलाल
दोहा है बहुरूपिया, शब्दों की जयमाल
*
जड़ को हँस चेतन करे, चेतन को संजीव
जिसको दोहा रंग दे, वह न रहे निर्जीव
*
दोहा की महिमा बड़ी, कीर्ति निरुपमा जान
दोहा कांतावत लगे, होली पर रसखान
*
प्रथम चरण होली जले, दूजे पूजें लोग
रँग-गुलाल है तीसरा, चौथा गुझिया-भोग
*
दोहा होली खेलता, ले पिचकारी शिल्प
बरसाता रस-रंग हँस, साक्षी है युग-कल्प
*
दोहा गुझिया, पपडिया, रास कबीरा फाग
दोहा ढोलक-मँजीरा, यारों का अनुराग
*
दोहा रच-गा, झूम सुन, होला-होली धन्य
दोहा सम दूजा नहीं. यह है छंद अनन्य
***
होलिकोत्सव २-३-२०१८
***
विमर्श - 'गाय' और सनातन धर्म ?
कहते हैं गाय माता है, ऐसा वेद में लिखा है। गौरव की बात है! माता है तो रक्षा करें; किन्तु वेद में यह कहाँ लिखा है कि गाय सनातन धर्म है, उसकी पूजा करो ?
वेद में लिखा है कि गाय माता है तो वेद में यह भी लिखा है कि उसका पति कौन है? अथर्ववेद के नवम् काण्ड का चतुर्थ ऋषभ सुक्त है, जिसके दूसरे और चौथे मन्त्र में बैल को ''पिता वत्सानां पतिरध्यानाम्'' अर्थात गाय का पति और बछड़ों का पिता कहा गया है।
तो क्या बैल को पिता मानकर पूजना होगा? गाय को ही क्यों,
ऋग्वेद (१०/६२/३१) में पृथ्वी को माता कहा गया है।,
(१०६४/९) में जल को माता कहा गया,
(यजुर्वेद १२/७८) में ''औषधीरिती मातर:'' औषधियों को माता कहा गया, तो क्या इनको पूजने लगें ?
इसी प्रकार मानस में-
''जनु मरेसि गुर बाँभन गाई।''
(मानस २/१४६/३) इनका विशेष महत्त्त्व है, गाय का भी महत्त्त्व है। जो वस्तु विकास में सहयोगी , उसी का महत्त्व होगा।
जैसे आजकल बिजली का बड़ा महत्त्व है, राष्ट्रीय सम्पत्ति है। आविष्कारों का महत्त्व तो घटता-बढ़ता ही रहता है; किन्तु इससे कोई वस्तु धर्म नहीं हो जाती।
वेद में तो यह भी लिखा है कि अत्यन्त झूठ बोलनेवालों को, मारपीट और तोड़फोड़ करनेवाले को, घमण्डी लोगों को हे राजन! उसी प्रकार छेद डालो जैसे;
कूदने वाली गाय को लात से और हाड़ी को एड़ी से मारते हैं। (अथर्ववेद, ८/६/१७)
इसी प्रकार ऋग्वेद में है-
''रजिषठया रज्या पश्व: आ गोस्तू तूर्षति पर्यग्रं दुवस्यु''
(१०/१०१/१२)
अर्थात् जिस प्रकार सेवक गाय आदि, पशु की नाक में रस्सी लगाकर, उसे पीड़ीत करते हुए आगे ले जाता है....।
इस ऋचा में गाय को पशु कहा गया और उसके रखरखाव की एक व्यवस्था दी गई, न कि ऐसा करना कोई धर्म है।
जब श्रीलंका में भारती शान्ति सेना गयी थी तो वहाँ के लिट्टे वाले कहते- जय लंकामाता! यहाँ हम कहते हैं-भारतमाता। कहीं कहते हैं गंगामाता। अमेरिका में अमेजन नदी को पिता कहते हैं।
यह तो मनुष्यों द्वारा दी हुयी मान्यताएँ हैं। उपाधि किसी को भी मिल सकती है, जैसे मदर टेरेसा। हर पादरी को क्रिश्चियन फादर कहते हैं।
हिरोशिमा पर बम गिरा तो उसे बसाने के प्रयास में उनतीस बच्चों को जन्म देनेवाली माता को वहाँ 'मदरलैण्ड' की उपाधि से विभूषित किया गया।
अस्तु परिवर्तनशील सामाजिक व्यवस्था के बारे में कोई भी लिखा-पढ़ी हर समय के लिये उपयोगी नहीं हो सकती।
उसका पीछा करेंगे तो विकसित देशों से सैकड़ों वर्ष पीछे उसी युग में पहूँच जायेंगे।
जब मोरपंख से भोजपत्र पर लिखते थे, अरणीयों को घिस कर- दो लकड़ीयों को घिस कर आग जलाते थे, उसके संग्रह की व्यवस्था भी न थी जैसा कि महाभारत काल तक था- एक ब्राह्मण की अरणी लेकर मृग भागा तो युधिष्ठिर ने पीछा किया।
.... वैदिक काल से परावर्ती पूर्वजों की शोध को नकारना तो अन्याय है ही, धृष्टता की पराकाष्ठा भी है कि उपयोग तो हम भैंस का करें किन्तु गुण गाय के गायें;
उपयोग ट्रैक्टर का करें गीत बैलों का गायें, उर्वरकों के बिना जीवन यापन न हो किन्तु महिमा गोबर की बताएँ।
गाय के पीछे नारेबाजी करनेवाले कितने ऐसे हैं जो उन बैलो को बिठाकर खिलाते हों, जिन्हों ने आजीवन उनका खेत जोता है? शायद ही कोई बैल किसान के खूँटे पर मरता हो? वृद्ध से वृद्ध बैल को सौ-पचास रुपये में बेचनेवाले क्या अपनी बला नहीं टालते? क्या वे नहीं जानते कि लेजाने वाला इनका क्या करेगा ?
(शंका-समाधान से साभार)
# विचार अवश्य करें ।।
|| श्री परमात्मने नम: ||
>~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~<
त्रुटियों हेतु क्षमायाचना पश्चात- धर्मशास्त्र 'धर्म' का मार्ग निर्देशक प्रकाश-स्तम्भ होता है। कहीं भ्रम या भटकाव पर दिशा-निर्देश का कार्य करते हैं, के अभाव में आज हम सनातन-धर्मी इस दशा-दिशा को प्राप्त हो अपेक्षाकृत अति छोटे भूखण्ड वर्तमान 'भारत' में भी अल्पसंख्यक-बहुसंख्क के विवाद में उलझे पड़े हैं। हमारा/समाज/राष्ट्र का व्यापक हित इस में सन्निहित है कि एक सर्वमान्य धर्मशास्त्र का अनुसरण करें जबकि 'गीता' हमारा ही नहीं अपितु मानवमात्र का आदिशास्त्र है।
'गीता' आज की प्रचलित भाषा में नहीं है की हमारे समकालीन महापुरुष (तपस्वी सन्त) की अनुभवगम्य व्याख्या 'यथार्थ गीता' की २-३ आवृत्ति करें और भगवान श्रीकृष्ण के आध्यात्मिक संदेश से अवगत हों। धर्मशास्त्र के रुप में उचित सम्मान प्रदान करें 'हिन्दू' के वास्तविक सम्वर्धन की ओर कदम बढायें।
***
मुक्तिका: तुम
*
तुम कैसे जादू कर देती हो
भवन-मकां में आ, घर देती हो
*
रिश्तों के वीराने मरुथल को
मंदिर होने का वर देती हो
*
चीख-पुकार-शोर से आहत मन
मरहम, संतूरी सुर देती हो
*
खुद भूखी रह, अपनी भी रोटी
मेरी थाली में धर देती हो
*
जब खंडित होते देखा विश्वास
नव आशा निशि-वासर देती हो
*
नहीं जानतीं गीत, ग़ज़ल, नवगीत
किन्तु भाव को आखर देती हो
*
'सलिल'-साधना सफल तुम्हीं से है
पत्थर पल को निर्झर देती हो
***
श्रृंगार गीत
तुम सोईं
*
तुम सोईं तो
मुँदे नयन-कोटर में सपने
लगे खेलने।
*
अधरों पर छा
मंद-मंद मुस्कान कह रही
भोर हो गयी,
सूरज ऊगा।
पुरवैया के झोंके के संग
श्याम लटा झुक
लगी झूलने।
*
थिर पलकों के
पीछे, चंचल चितवन सोई
गिरी यवनिका,
छिपी नायिका।
भाव, छंद, रस, कथ्य समेटे
मुग्ध शायिका
लगी झूमने।
*
करवट बदली,
काल-पृष्ठ ही बदल गया ज्यों।
मिटा इबारत,
सबक आज का
नव लिखने, ले कोरा पन्ना
तजकर आलस
लगीं पलटने।
*
ले अँगड़ाई
उठ-बैठी हो, जमुहाई को
परे ठेलकर,
दृष्टि मिली, हो
सदा सुहागन, कली मोगरा
मगरमस्त लख
लगी महकने।
*
बिखरे गेसू
कर एकत्र, गोल जूड़ा धर
सर पर, आँचल
लिया ढाँक तो
गृहस्वामिन वन में महुआ सी
खिल-फूली फिर
लगी गमकने।
*
मृगनयनी को
गजगामिनी होते देखा तो
मकां बन गया
पल भर में घर।
सारे सपने, बनकर अपने
किलकारी कर
लगे खेलने।
२-३-२०१६
***
श्रृंगार गीत:
.
खफ़ा रहूँ तो
प्यार करोगे
यह कैसा दस्तूर है ?
प्यार करूँ तो
नाजो-अदा पर
मरना भी मंज़ूर है.
.
आते-जाते रंग देखता
चेहरे के
चुप-दंग हो.
कब कबीर ने यह चाहा
तुम उसे देख
यूं तंग हो?
गंद समेटी सिर्फ इसलिए
प्रिय! तुम
निर्मल गंग हो
सोचा न पाया पल आयेगा
तुम्हीं नहीं
जब सँग हो.
होली हो ली
अब क्या होगी?
भग्न आस-सन्तूर है.
खफ़ा रहूँ तो
प्यार करोगे
यह कैसा दस्तूर है ?
प्यार करूँ तो
नाजो-अदा पर
मरना भी मंज़ूर है.
.
फाग-राग का रिश्ता-नाता
कब-किसने
पहचाना है?
द्वेष-घृणा की त्याज्य सियासत
की होली
धधकाना है.
जड़ जमीन में जमा जुड़ सकें
खेत-गाँव
सरसाना है.
लोकनीति की रंग-पिचकारी
संसद में
भिजवाना है.
होली होती
दिखे न जिसको
आँखें रहते सूर है.
खफ़ा रहूँ तो
प्यार करोगे
यह कैसा दस्तूर है ?
प्यार करूँ तो
नाजो-अदा पर
मरना भी मंज़ूर है.
२.३.२०१५
***
मुक्तिका:
रूह से...
*
रूह से रू-ब-रू अगर होते.
इस तरह टूटते न घर होते..
आइना देखकर खुशी होती.
हौसले गर जवां निडर होते..
आसमां झुक सलाम भी करता.
हौसलों को मिले जो पर होते..
बात बोले बिना सुनी जाती.
दिल से निकले हुए जो स्वर होते..
होते इंसान जो 'सलिल' सच्चे.
आह में भी लिए असर होते..
२.३.२०१३
***
 

बुधवार, 20 सितंबर 2023

गणेश, सॉनेट, मुक्तिका, मुक्तक, भक्ति गीत, नव गीत, शृंगार

गणपति
वरद विनायक मयूरेश्वरा, 16
गणधीश्वर विघ्न हरो। 12
गिरिजात्मजा बल्लारेश्वरा, 16
ओमकार पार्वति तनया नमो। 17

चिंतामणि ही सिद्धिविनायक, 16
गुणप्रदायका नमो नमो। 14
महा गणपतये विघ्नेश्वरा, 16
प्रथम पूज्य की जय बोलो। 14

प्रणव स्वरूपा गण नाथा, 14
अंबा भवानी कुमार शंभो। 17
कारूण्य लावण्य लंबोदरा, 17
शरणम् शरणम् प्रभो।11

महादेवादिदेव विनायका, 17
अष्ट विनायक श्री गणराया।। 16

सॉनेट की सभी 14 पंक्तियों का पदभार समान होना जरूरी है।
*
सॉनेट
गणपति
(16 मात्रिक)
*
वरद विनायक मयूरेश्वरा,
हे गणधीश्वर! विघ्न हरो प्रभु,
गिरिजात्मजा बल्लारेश्वरा,
हे ओंकार! पार्वती-तनय विभु।

चिंतामणि श्री सिद्धिविनायक,
गुणप्रदायका नमो नमो हे!
श्री गणपतये विघ्न ईश्वरा,
प्रथम पूज्य की जय बोलो रे!

प्रणव स्वरूपा हे गणनाथा!,
अंबा भवानी-शंभु कुमार,
शरणम् शरणम् हे जगनाथ!
क्षमा करें प्रभो! परम उदार।

श्री गणराया हे विनायका!
नमन नमन प्रभु वर प्रदायका।।
20-९-२०२३
*
सॉनेट
अरण्य वाणी
*
मनुज पुलक; सुन अरण्य वाणी
जीवन मधुवन बन जाएगा
कंकर शंकर बन गाएगा
श्वास-आस होगी कल्याणी
भुज भेंटे आलोक तिमिर से
बारी-बारी आए-जाए
शयन-जागरण चक्र चलाए
सीख समन्वय गिरि-निर्झर से
टिट्-टिट् करती विहँस टिटहरी
कुट-कुट कुतरे सुफल गिलहरी
गरज करे वनराज अफसरी
खेलें-खाएँ हिल-मिल प्राणी
मधुरस पूरित टपरी-ढाणी
दस दिश गुंजित अरण्य वाणी
२०-९-२०२२
***
मुक्तिका
निराला हो
*
जैसे हुए, न वैसा ही हो, अब यह साल निराला हो
मेंहनतकश ही हाथों में, अब लिये सफलता प्याला हो
*
उजले वसन और तन जिनके, उनकी अग्निपरीक्षा है
सावधान हों सत्ता-धन-बल, मन न तनिक भी काला हो
*
चित्र गुप्त जिस परम शक्ति का, उसके पुतले खड़े न कर
मंदिर-मस्जिद के झगड़ों में, देव न अल्लाताला हो
*
कल को देख कलम कल का निर्माण आज ही करती है
किलकिल तज कलकल वरता मन-मंदिर शांत शिवाला हो
*
माटी तन माटी का दीपक बनकर तिमिर पिये हर पल
आए-रहे-जाए जब भी तब चारों ओर उजाला हो
*
क्षर हो अक्षर को आराधें, शब्द-ब्रम्ह की जय बोलें
काव्य-कामिनी रसगगरी, कवि-आत्म छंद का प्याला हो
*
हाथ हथौड़ा कन्नी करछुल कलम थाम, आराम तजे
जब जैसा हो जहाँ 'सलिल' कुछ नया रचे, मतवाला हो
२०-९-२०१७
***
मुक्तक सलिला:
*
प्रभु ने हम पर किया भरोसा, दिया दर्द अनुपम उपहार
धैर्य सहित कर कद्र, न विचलित हों हम, सादर कर स्वीकार
जितनी पीड़ा में खिलता है, जीवन कमल सुरभि पाता-
'सलिल' गौरवान्वित होता है, अन्यों का सुख विहँस निहार
***
भक्ति गीत:
*
हे प्रभु दीनानाथ दयानिधि
कृपा करो, हर विघ्न हमारे.
जब-जब पथ में छायें अँधेरे
तब-तब आशा दीप जला रे….
*
हममें तुम हो, तुममें हम हों
अधर हँसें, नैन ना नम हों.
पीर अधीर करे जब देवा!
धीरज-संबल कहबी न कम हों.
आपद-विपदा, संकट में प्रभु!
दे विवेक जो हमें उबारे….
*
अहंकार तज सकें ज्ञान का
हो निशांत, उद्गम विहान का.
हम बेपर पर दिए तुम्हीं ने
साहस दो हरि! नव उड़ान का.
सत-शिव-सुंदर राह दिखाकर
सत-चित-आनंद दर्श दिखा रे ….
*
शब्द ब्रम्ह आराध्य हमारा
अक्षर, क्षर का बना सहारा.
चित्र गुप्त है जो अविनाशी
उसने हो साकार निहारा.
गुप्त चित्र तव अगम, गम्य हो
हो प्रतीत जो जन्म सँवारे ….
२०-९-२०१३
***
नव गीत :
उत्सव का मौसम.....
*
तुम मुस्काईं जिस पल
उस पल उत्सव का मौसम.....
*
लगे दिहाड़ी पर हम
जैसे कितने ही मजदूर.
गीत रच रहे मिलन-विरह के
आँखें रहते सूर..
नयन नयन से मिले झुके
उठ मिले मिट गया गम.
तुम शर्माईं जिस पल
उस पल उत्सव का मौसम.....
*
देखे फिर दिखलाये
एक दूजे को सपन सलोने.
बिना तुम्हारे छुए लग रहे
हर पकवान अलोने..
स्वेद-सिंधु में नहा लगी
हर नेह-नर्मदा नम.
तुम अकुलाईं जिस पल
उस पल उत्सव का मौसम.....
*
कंडे थाप हाथ गुबरीले
सुना रहे थे फगुआ.
नयन नशीले दीपित
मना रहे दीवाली अगुआ..
गाल गुलाबी 'वैलेंटाइन
डे' की गाते सरगम.
तुम भर्माईं जिस पल
उस पल उत्सव का मौसम.....
***
प्रार्थना
भक्ति-भाव की विमल नर्मदा में अवगाहन कर तर जाएँ.
प्रभु ऐसे रीझें, भू पर आ, भक्तों के संग नाचें-गाएँ..
हम आरती उतारें प्रभु की, उनके चरणों पर गिर जाएँ.
जय महेश! जय बम-बम भोले, सुन प्रभु हमको कंठ लगाएँ..
स्वप्न देख ले 'सलिल' सुनहरे, पूर्व जन्म के पुण्य भुनाएँ..
प्रभु को मन-मंदिर में पाकर, तन को हँसकर भेंट चढ़ाएँ..
२०-९-२०१०
***

गुरुवार, 25 मई 2023

बुन्देली, मुक्तिका, आरक्षण, रत्ना ओझा, दोहा, शृंगार, हिंदी, सोनेट, निशा तिवारी, आदमी अभी जिन्दा है




सॉनेट
*
मन की बात करें सब खुलकर 
सॉनेट लिखें न थकिए रुककर
फैलाएं सुगंध हिलमिलकर
फूलों जैसे झूमें झुककर

चौ चौ चौ त्रै पंक्ति भार सम
एक-तीन, दो-चार मिला तुक
प्रथम अंतरा हो वसुधा नम
दूजा किसलय झांक सके टुक 

पल्लव-पुष्प मनोरम भाएं 
महकाएं मिल मन-आंगन को
धूप-छांव नित गले लगाएं
पर्व मना सावन फागुन को

तंत समेटे फलित अंत में
कंत मन रमे ईश-संत में
24-5-2023
सॉनेट
दर्पण
दाएँ को बायाँ दिखलाए
फिर भी दुनिया यह कहती है
दर्पण केवल सत्य बताए।
असत सत्य सम चुप तहती है।
धूल नहीं मन पर जमती है
सही समझ सबको यह आए
दर्पण पोंछ धूल जमती है।
मत कह मन दर्पण कहलाए।
तेरे पीछे जो रहती है
वस्तु उसे आगे दिखलाए
हाथ बढ़ा तो कब मिलती है?
दर्पण हरदम ही भरमाए।
मत बन रे मन मूरख भोले।
मत कह दर्पण झूठ न बोले।।
२४-५-२०२२
•••
मुक्तिका
*
जब हुए जंजीर हम
तब हुए गंभीर हम
फूल मन भाते कभी हैं
कभी चुभते तीर हम
मीर मानो या न मानो
मन बसी हैं पीर हम
संकटों से बचाएँगे
घेरकर प्राचीर हम
भय करो किंचित न हमसे
नहीं आलमगीर हम
जब करे मन तब परख लो
संकटों में धीर हम
पर्वतों के शिखर हैं हम
हैं नदी के तीर हम
***
मुक्तिका
क्या बताएँ कौन हैं?
कुछ न बोले मौन हैं।
आँख में पानी सरीखे
या समझ लो नौन हैं।
कहीं तो हम नर्मदा हैं
कहीं पर हम दौन हैं।
पूर्व संयम था कभी पर
आजकल यह यौन है।
पूर्णता पहचान अपनी
नहीं अद्धा-पौन हैं।
***
गीत
*
सोते-सोते उमर गँवाई
खुलीं न अब तक आँखें
आँख मूँदने के दिन आए
काम न दें अब पाँखें
कोई सुनैना तनिक न ताके
अब जग बगलें झाँके
फना हो गए वे दिन यारों
जब हम भी थे बाँके
व्यथा कथा कुछ कही न जाए
मन की मन धर मौन
हँसी उड़ाएगा जग सारा
आँसू पोछे कौन?
तन की बाखर रही न बस में
ढाई आखर भाग
मन की नागर खाए न कसमें
बिसर कबीरा-फाग
चलो समेटो बोरा-बिस्तर
रहे न छाया संग
हारे को हरिनाम सुमिरकर
रंग जा हरी के रंग
***
कृति चर्चा
'आदमी अभी जिन्दा है', लघुकथा संग्रह, आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल
डॉ. निशा तिवारी
*
‘आदमी जिंदा है’ लघुकथा संग्रह मेरे अनुजवत संजीव वर्मा ‘सलिल’ की नव्य कृति है। यह नव्यता द्विपक्षीय है, प्रथम यह कृति कालक्रमानुसार नई है और दूसरे परंपरागत कहानी-विधा के साँचे को तोड़ती हुए नव्य रूप का सृजन करती है। यों नवीन शब्द समय सापेक्ष है। कोई भी सद्य:रचित कृति पुरानी की तुलना में नई होती है। स्वतंत्रता के पश्चात् हिंदी कहानी ने ‘नई कहानी’, ‘अकहानी’, ‘समान्तर कहानी’, ‘सचेतन कहानी’, ‘सहज कहानी’ इत्यादि कथा आंदोलनों के अनेमनेक पड़ावों पर कथ्यगत और रूपगत अनेक प्रतिमान स्थिर किये हैं। अद्यतन कहानी, लघुता और सूक्ष्मता के कम्प्युटरीकृत यथार्थ को रचती हुई अपनी नव्यता को प्रमाणित कर रही है। कंप्यूटर और मोबाइल की क्रांति लघुता और सूक्ष्मता को परिभाषित कर रही है। संप्रति सलिल जी का प्रकाश्य लघुकथा संग्रह भी तकनीकी युग की इसी सूक्ष्मता-लघुता से कहानी विधा को नवता प्रदान करता है। मुक्तक और क्षणिका की तर्ज पर उन्होंने कथा-सूत्र के ताने-बाने बुने हैं। अत्यंत लघु कलेवर में प्रतिपाद्य को सम्पूर्णता प्रदान करना अत्यंत दुष्कर कार्य है किंतु सलिल जी की भावनात्मकता तथा संवेदनशीलता ने समय और परिस्थितिगत वस्तु-चित्रणों को अपनी, इन कहानियों में बखूबी अनुस्यूत किया है। यही कारण है कि उनकी ये कहानियाँ उत्तर आधुनिक ‘पेरोडीज़’, ‘येश्तीज़’ तथा कतरनों की संज्ञाओं से बहुत दूर जाकर घटना और संवेदना का ऐसा विनियोग रचती हैं कि कथा-सूत्र टुकड़ों में नहीं छितराते वरन उन्हें एक पूर्ण परिणति प्रदान करते हैं।
लघुकथा संग्रह का शीर्षक ‘आदमी जिंदा है’ ही इस तथ्य का साक्ष्य है कि संख्या-बहुल ये एक सौ दस कहानियाँ आदमी को प्रत्येक कोण से परखती हुई उसकी आदमियत के विभिन्न रूपों का परिचय पाठक को देती हैं। ये कहानियाँ संख्या अथवा परिमाण में अधिक अवश्य हैं किन्तु विचार वैविध्य पाठक में जिज्ञासा बनाए रखता है और पाठक प्रत्येक कहानी के प्रतिपाद्य से निरंतरता में साक्षात् करता हुआ भाव-निमग्न होकर अगली कथा की ओर बढ़ जाता है। कहानी के सन्दर्भ में हमेशा यह फतवा दिया जाता है कि ‘जो एक बैठक में पढ़ी जा सके.’ सलिल जी की ये समस्त कहानियाँ पाठक को एकही बैठक में पढ़ी जाने के लिए आतुरता बनाये रखती हैं।
सलिल जी के नवगीत संग्रह ‘काल है संक्रांति का’ के नवगीतों की भाँति ‘आदमी जिंदा है’ कथा संग्रह की कहानियों की विषय-वस्तु भी समान है। सामाजिक-पारिवारिक विसंगतियाँ एवं कुरीतियाँ (गाइड, मान-मनुहार, आदर्श), राजनीतिक कुचक्र एवं विडंबनाएँ (एकलव्य, सहनशीलता, जनसेवा, सर पर छाँव, राष्ट्रीय सुरक्षा, कानून के रखवाले, स्वतंत्रता, संग्राम, बाजीगर इत्यादि), पारिवारिक समस्या (दिया, अविश्वासी मन, आवेश आदि), राष्ट्र और लिपि की समस्या (अंधमोह), साहित्य जगत एवं छात्र जगत में फैली अराजकतायें (उपहार, अँगूठा, करनी-भरनी) इत्यादि विषयों के दंश से कहानीकार का विक्षुब्ध मन मानो चीत्कार करने लगता हुआ व्यंग्यात्मकता को वाणी देने लगता है। इस वाणी में हास्य कहीं नहीं है, बस उसकी पीड़ा ही मुखर है।
सलिल जी की कहनियों की सबसे बड़ी विशेषता है कि वे जिन समस्याओं को उठाते हैं उसके प्रति उदासीन और तटस्थ न रहकर उसका समाधान भी प्रस्तुत करते हैं। पारिवारिक समस्याओं के बीच वे नारी का मानवीय रूप प्रस्तुत करते हैं, साथ ही स्त्री-विमर्श के समानांतर पुरुष-विमर्श की आवश्यकता पर भी बल देते हैं। उनकी इन रचनाओं में आस्था की ज्योति है और मनुष्य का अस्मिताजन्य स्वाभिमान. ‘विक्षिप्तता’, ‘अनुभूति’ कल का छोकरा’, ‘सम्मान की दृष्टि’ इत्यादि कहानियाँ इसके उत्तम दृष्टांत हैं. सत्ता से जुड़कर मिडिया के पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण से आहूत होकर वे तनाव तो रचती हैं किन्तु ‘देशभक्ति और जनहित की दुहाई देते खोखले स्वर’ से जनगण की सजग-मानवीय चेतना को विचलित नहीं कर पातीं- ‘मन का दर्पण’ उसके मलिन प्रतिबिम्ब का साक्षी बन जाता है। लेखकीय अनुभति का यह कथा-संसार सचमुच मानवीय आभा से रंजित है। भविष्य में ऐसे ही और इससे भी अधिक परिपक्व सृजन की अपेक्षा है।
***
संपर्क- डॉ. निशा तिवारी, ६५० नेपियर टाउन, भँवरताल पानी की टंकी के सामने, जबलपुर ४८२००१, चलभाष ९४२५३८६२३४

***
दोहा
हिंदी महिमा
*
हिंदी बिंदी हिन्द की, अद्भुत इसकी शान
जो जान हिंदी बोलता, बढ़ता उसका मान
*
हिंदी में कहिए कथा, विहँस मनाएँ पर्व
मुदित हुए सुन ईश्वर, गॉड खुदा गुरु सर्व
*
हिंदी हिन्दुस्तान के, जनगण की आवाज
सकल विश्व में गूँजती, कर जन-मन पर राज
*
नेह नर्मदा सम सरम, अमल विमल अम्लान
हिंदी पढ़ते-बोलते, समझदार विद्वान्
*
हिंदी राखी दिवाली, हिंदी फाग अबीर
घाघ भड्डरी ईसुरी, जगनिक संत कबीर
*
पनघट नुक्क्ड़ झोपड़ी, पगडंडी खलिहान
गेहूँ चाँवल दाल है, हिंदी खेत मचान
*
हिंदी पूजा आरती, घंटी शंख प्रसाद
मन मानस में पूजिए, रहें सदा आबाद।
२४-५-२०२०
***

शृंगार गीत
*
अधर पर मुस्कान १०
नयनों में निमंत्रण, ११
हाथ में हैं पुष्प, १०
मन में शूल चुभते, ११
बढ़ गए पेट्रोल के फिर भाव, १७
जीवन हुआ दूभर। ११
*
ओ अमित शाही इरादों! १४
ओ जुमलिया जूठ-वादों! १४
लूटते हो चैन जन का १४
नीरवों के छिपे प्यादों! १४
जिस तरह भी हो न सत्ता १४
हाथ से जाए। ९
कुर्सियों में जान १०
संसाधन स्व-अर्पण, ११
बात में टकराव, १०
धमकी खुली देते, ११
धर्म का ले नाम, कर अलगाव, १७
खुद को थोप ऊपर। ११
बढ़ गए पेट्रोल के फिर भाव, १७
जीवन हुआ दूभर। ११
*
रक्तरंजित सरहदें क्यों? १४
खोलते हो मैकदे क्यों? १४
जीविका अवसर न बढ़ते १४
हौसलों को रोकते क्यों? १४
बात मन की, ध्वज न दल का १४
उतर-छिन जाए। ९
लिया मन में ठान १०
तोड़े आप दर्पण, ११
दे रहे हो घाव, १०
नफरत रोज सेते, ११
और की गलती गिनाकर मुक्त, १७
ज्यों संतुष्ट शूकर। ११
बढ़ गए पेट्रोल के फिर भाव, १७
जीवन हुआ दूभर। ११
*
२३-५-२०१८


***
मुक्तिका ​:
*
अंधे देख रहे हैं, गूंगे बोल रहे
पोल​ उजालों की अँधियारे खोल रहे
*
लोभतंत्र की जय-जयकार करेगा जो
निष्ठाओं का उसके निकट न मोल रहे
*
बाँध बनाती है संसद संयम के जो
नहीं देखती छिपे नींव में होल रहे ​
​*
हैं विपक्ष जो धरती को चौकोर कहें
सत्ता दल कह रहा अगर भू गोल रहे
*
कौन सियासत में नियमों की बात करे?
कुछ भी कहिए, पर बातों में झोल रहे
२४-५-२०१७
***
इंगलिश की यादगार कविताओं का हिन्दी में अनुवादकी श्रंखला में पहला अुनुवाद
A Dream Within A Dream
by Edgar Allan Poe
Take this kiss upon the brow!
And, in parting from you now,
Thus much let me avow--
You are not wrong, who deem
That my days have been a dream;
Yet if hope has flown away
In a night, or in a day,
In a vision, or in none,
Is it therefore the less gone?
All that we see or seem
Is but a dream within a dream.
I stand amid the roar
Of a surf-tormented shore,
And I hold within my hand
Grains of the golden sand--
How few! yet how they creep
Through my fingers to the deep,
While I weep--while I weep!
O God! can I not grasp
Them with a tighter clasp?
O God! can I not save
One from the pitiless wave?
Is all that we see or seem
But a dream within a dream?
स्वप्न में स्वप्न
अनुवाद-बीनू भटनागर
तुम्हारा माथा चूमकर
मैं विदा ले रहा हूँ,
इसलिये खुलकर कहूँगा कि
तुम ग़लत नहीं थी,जो सोचती थीं,
मेरे दिन ,दिवास्प्न हैं, स्वपन!
दिन हो या रात
आशायें धूमिल हो चुकी हैं
जो सोचा नहीं था, जो था ही नहीं
इसलिये बहुत खोया भी नहीं?
जो हम देखते हैं
या महसूस करते हैं वहतो बस
स्वप्न में स्वप्न है।
मैं लहरों के शोर में खड़ा हूँ
संतप्त सागर के तट पर
रेत के कण हाथ में लेता हूँ
इतने कम हैं
फिरभी फिसल रहे हैं
मेरी उंगलियां गहराई में हैं
मैं रोता हूँ, बहुत रोता हूँ
हे प्रभु! क्या मैं इन्हे पकड़े रह सकता हूँ।
क्या मुट्ठी में बाँध सकता हूँ
हे प्रभु!क्या मैं इन्हे निर्दयी लहरों से बचा सकता हूँ।
यही मैं देखता रहता हूँ।
सपनो में सपने...,
स्वप्न मे स्वप्न
***
मुक्तिका
*
बँधी नीलाकाश में
मुक्तता भी पाश में
.
प्रस्फुटित संभावना
अगिन केवल 'काश' में
.
समय का अवमूल्यन
हो रहा है ताश में
.
अचेतन है ज़िंदगी
शेष जीवन लाश में
.
दिख रहे निर्माण के
चिन्ह व्यापक नाश में
.
मुखौटों की कुंडली
मिली पर्दाफाश में
.
कला का अस्तित्व है
निहित संगतराश में
***
[बारह मात्रिक आदित्य जातीय छन्द}
११.५.२०१६, ६.४५
सी २५६ आवास-विकास, हरदोई
***
दोहा सलिला
*
लहर-लहर लहर रहे, नागिन जैसे केश।
कटि-नितम्ब से होड़ ले, थकित न होते लेश।।
*
वक्र भृकुटि ने कर दिए, खड़े भीत के केश।
नयन मिलाये रह सके, साहस रहा न शेष।।
*
मनुज-भाल पर स्वेद सम, केश सजाये फूल।
लट षोडशी कुमारिका, रूप निहारे फूल।।
*
मदिर मोगरा गंध पा, केश हुए मगरूर।
जुड़े ने मर्याद में, बाँधा झपट हुज़ूर।।
*
केश-प्रभा ने जब किया, अनुपम रूप-सिंगार।
कैद केश-कारा हुए, विनत सजन बलिहार।।
*
पलक झपक अलसा रही, बिखर गये हैं केश।
रजनी-गाथा अनकही, कहतीं लटें हमेश।।
*
केश-पाश में जो बँधा, उसे न भाती मुक्ति।
केशवती को पा सकें, अधर खोजते युक्ति।।
*
'सलिल' बाल बाँका न हो, रोज गूँथिये बाल।
किन्तु निकालें मत कभी, आप बाल की खाल।।
*
बाल खड़े हो जाएँ तो, झुका लीजिए शीश।
रुष्ट रूप से भीत ही, रहते भूप-मनीष।।
***
२४-५०२०१६
***
कृति चर्चा:
कृति विवरण:
रत्ना मंजूषा : छात्रोपयोगी काव्य संग्रह
चर्चाकार: आचार्य संजीव
*
[कृति विवरण: रत्न मंजूषा, काव्य संग्रह, रत्ना ओझा 'रत्न', आकार डिमाई, आवरण पेपरबैक, बहुरंगी, पृष्ठ १८०, मूल्य १५० रु., प्राप्ति संपर्क: २४०५/ बी गाँधी नगर, नया कंचनपुर, जबलपुर]
*
रत्न मंजूषा संस्कारधानी जबलपुर में दीर्घ काल से साहित्य सृजन और शिक्षण कर्म में निमग्न कवयित्री श्रीमती रत्ना ओझा 'रत्न' की नवीन काव्यकृति है. बँटवारे का दर्द कहानी संग्रह, गीत रामायण दोहा संग्रह, जरा याद करो क़ुरबानी भाग १ वीरांगनाओं की जीवनी, जरा याद करो क़ुरबानी भाग २ महापुरुषों की जीवनी, का लेखन तथा ७ स्मारिकाओं का संपादन कर चुकी रत्ना जी की कविताओं के विषय तथा शिल्प लक्ष्य पाठक शालेय छात्रो को ध्यान में रखकर काव्य कर्म और रूपाकार और दिशा निर्धारित की है. उच्च मापदंडों के निकष पर उन्हें परखना गौरैया की उड़ान की बाज से तुलना करने की तरह बेमानी होगा. अनुशासन, सदाचार, देशभक्ति, भाईचारा, सद्भाव, परिश्रम तथा पर्यावरण सुधार आदि रत्ना जी के प्रिय विषय हैं. इन्हें केंद्र में रखकर वे काव्य सृजन करती हैं.
विवेच्य कृति रत्न मञ्जूषा को कवयित्री ने २ भागों में विभाजित किया है. भाग १ में राखी गयी ४३ कवितायेँ राष्ट्रीय भावभूमि पर रची गयी हैं. मातृ वंदना तथा शहीदों को नमन करने की परम्परानुसार रत्ना जी ने कृति का आरंभ शईदों को प्रणतांजलि तथा वीणा वंदना से किया है.रानी दुर्गावती, रानी लक्ष्मीबाई, स्वामी विवेकानन्द, बापू, सुभद्रा कुमारी चौहान, इंदिराजी, जैसे कालजयी व्यक्तित्वों के साथ पर्यावरण और किसानों की समस्याओं को लेकर शासन-प्रशासन के विरुद्ध न्यायालय और ज़मीन पर नेरंतर संघर्षरत मेघा पाटकर पर कविता देकर रत्ना जी ने अपनी सजगता का परिचय दिया है. नर्मदा जयंती, वादियाँ जबलपुर की, ग्राम स्वराज्य, आदमी आदि परिवेश पर केन्द्रित रचनाएँ कवयित्री की संवेदनशीलता का प्रतिफल हैं. इस भाग की शेष रचनाएँ राष्ट्रीयता के रंग में रंगी हैं.
रत्न मञ्जूषा के भाग २ में सम्मिलित ८८ काव्य रचनाएँ विषय, छंद, कथ्य आदि की दृष्टि से बहुरंगी हैं. तस्वीर बदलनी चाहिए, मिट जाए बेगारी, लौट मत जाना बसंत, माँ रेवा की व्यथा-कथा, दहेज, आँसू, गुटखा, बचपन भी शर्मिंदा, ये कैसी आज़ादी आदि काव्य रचनाओं में कवयित्री का मन सामाजिक सामयिक समस्याओं की शल्य क्रिया कर कारण और निवारण की ओर उन्मुख है. रत्ना जी ने संभवत: जन-बूझकर इन कविताओं की भाषा विषयानुरूप सरस, सरल, सहज, बोधगम्य तथा लयात्मक रखी है. भूमिका लेखक आचार्य भगवत दुबे ने इसे पिन्गलीय आधार पर काव्य-दोष कहा है किन्तु मेरी दृष्टि में जिन पाठकों के लिए रचनाएँ की गयीं हैं, उनके भाषा और शब्द-ज्ञान को देखते हुए कवयित्री ने आम बोलचाल के शब्दों में अपनी बात कही है. प्रसाद गुण संपन्न ये रचनाएं काव्य रसिकों को नीरस लग सकती हैं किन्तु बच्चों को अपने मन के अनुकूल प्रतीत होंगी.
कवयित्री स्वयं कहती है: 'नवोदित पीढ़ी में राष्ट्रीयता, नैतिकता, पर्यावरण, सुरक्षा, कौमी एकता और संस्कार पनप सकें, काव्य संग्रह 'रत्न मञ्जूषा' में यही प्रयास किया गया है. कवयित्री अपने इस प्रयास में सफल है. शालेय बच्चे काव्यगत शिल्प और पिंगल की बारीकियों से परिचित नहीं होते. अत: उन्हें भाषिक कसावट की न्यूनता, अतिरिक्त शब्दों के प्रयोग, छंद विधान में चूकके बावजूद कथ्य ग्रहण करने में कठिनाई नहीं होगी. नयी पीढ़ी को देश के परिवेश, सामाजिक सौख्य और समन्वयवादी विरासत के साथ-साथ पर्यावरणीय समस्याओं और समाधान को इंगिर करती-कराती इस काव्य-कृति का स्वागत किया जाना चाहिए.
***
आरक्षण समस्या: एक समाधान
*
सबसे पहला आरक्षण संसद में हो
शत-प्रतिशत दें पिछड़े-दलित-आवर्णों को
आरक्षित डोक्टर आरक्षित को देखे
आरक्षित अभियन्ता ही बनवाये मकान
कुछ वर्षों में समाधान हो जाएगा
फिर न कहीं भी घमासान हो पायेगा...
२४-५-२०१५

***
दोहा गाथा ९ : दोहा कम में अधिक है
संजीव
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब्ब.
पल में परलय होयेगी, बहुरि करैगो कब्ब.
बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर.
पंछी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर.
*
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय.
टूटे तो फ़िर ना जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाय.
*
दोहे रचे कबीर ने, शब्द-शब्द है सत्य.
जन-मन बसे रहीम हैं, जैसे सूक्ति अनित्य. कबीर
दोहा सबका मीत है, सब दोहे के मीत.
नए काल में नेह की, 'सलिल' नयी हो नीत.
सुधि का संबल पा बनें, मानव से इन्सान.
शान्ति सौख्य संतोष दो, मुझको हे भगवान.
गुप्त चित्र निज रख सकूँ, निर्मल-उज्ज्वल नाथ.
औरों की करने मदद, बढ़े रहें मम हाथ.
दोहा रचकर आपको, मिले सफलता-हर्ष.
नेह नर्मदा नित नहा, पायें नव उत्कर्ष.
नए सृजन की रश्मि दे, खुशियाँ कीर्ति समृद्धि.
पा जीवन में पूर्णता, करें राष्ट्र की वृद्धि.
जन-वाणी हिन्दी बने, जग-वाणी हम धन्य.
इसके जैसी है नहीं, भाषा कोई अन्य.
'सलिल' शीश ऊँचा रखें, नहीं झुकाएँ माथ.
ज्यों की त्यों चादर रहे, वर दो हे जगनाथ.
दोहा संसार के राजपथ से जनपथ तक जिस दोहाकार के चरण चिह्न अमर तथा अमिट हैं, वह हैं कबीर ( संवत १४५५ - संवत १५७५ )। कबीर के दोहे इतने सरल कि अनपढ़ इन्सान भी सरलता से बूझ ले, साथ ही इतने कठिन की दिग्गज से दिग्गज विद्वान् भी न समझ पाये। हिंदू कर्मकांड और मुस्लिम फिरकापरस्ती का निडरता से विरोध करने वाले कबीर निर्गुण भावधारा के गृहस्थ संत थे। कबीर वाणी का संग्रह बीजक है जिसमें रमैनी, सबद और साखी हैं।
मुगल सम्राट अकबर के पराक्रमी अभिभावक बैरम खान खानखाना के पुत्र अब्दुर्रहीम खानखाना उर्फ़ रहीम ( संवत १६१० - संवत १६८२) अरबी, फारसी, तुर्की, संस्कृत और हिन्दी के विद्वान, वीर योद्धा, दानवीर तथा राम-कृष्ण-शिव आदि के भक्त कवि थे। रहीम का नीति तथा शृंगार विषयक दोहे हिन्दी के सारस्वत कोष के रत्न हैं। बरवै नायिका भेद, नगर शोभा, मदनाष्टक, श्रृंगार सोरठा, खेट कौतुकं ( ज्योतिष-ग्रन्थ) तथा रहीम काव्य के रचियता रहीम की भाषा बृज एवं अवधी से प्रभावित है। रहीम का एक प्रसिद्ध दोहा देखिये--
नैन सलोने अधर मधु, कहि रहीम घटि कौन?
मीठा भावे लोन पर, अरु मीठे पर लोन।
कबीर-रहीम आदि को भुलाने की सलाह हिन्द-युग्म के वार्षिकोत्सव २००९ में मुख्य अतिथि की आसंदी से श्री राजेन्द्र यादव द्वारा दी जा चुकी है किंतु...
छंद क्या है?
संस्कृत काव्य में छंद का रूप श्लोक है जो कथ्य की आवश्यकता और संधि-नियमों के अनुसार कम या अधिक लम्बी, कम या ज्यादा पंक्तियों का होता है। संकृत की क्लिष्टता को सरलता में परिवर्तित करते हुए हिंदी छंदशास्त्र में वर्णित अनुसार नियमों के अनुरूप पूर्व निर्धारित संख्या, क्रम, गति, यति का पालन करते हुए की गयी काव्य रचना छंद है। श्लोक तथा दोहा क्रमशः संस्कृत तथा हिन्दी भाषा के छंद हैं। ग्वालियर निवास स्वामी ॐ कौशल के अनुसार-
दोहे की हर बात में, बात बात में बात.
ज्यों केले के पात में, पात-पात में पात.
श्लोक से आशय किसी पद्यांश से है। जन सामान्य में प्रचलित श्लोक किसी स्तोत्र (देव-स्तुति) का भाग होता है। श्लोक की पंक्ति संख्या तथा पंक्ति की लम्बाई परिवर्तनशील होती है।
दोहा घणां पुराणां छंद:
११ वीं सदी के महाकवि कल्लोल की अमर कृति 'ढोला-मारूर दोहा' में 'दोहा घणां पुराणां छंद' कहकर दोहा को सराहा गया है। राजा नल के पुत्र ढोला तथा पूंगलराज की पुत्री मारू की प्रेमकहानी को दोहा ने ही अमर कर दिया।
सोरठियो दूहो भलो, भलि मरिवणि री बात.
जोबन छाई घण भली, तारा छाई रात.
आतंकवादियों द्वारा कुछ लोगों को बंदी बना लिया जाय तो उनके संबंधी हाहाकार मचाने लगते हैं, प्रेस इतना दुष्प्रचार करने लगती है कि सरकार आतंकवादियों को कंधार पहुँचाने पर विवश हो जाती है। एक मंत्री की लड़की को बंधक बनाते ही आतंकवादी छोड़ दिए जाते हैं। मुम्बई बम विस्फोट के बाद भी रुदन करते चेहरे हजारों बार दिखानेवाली मीडिया ने पूरे देश को भयभीत कर दिया था।
संस्कृत, प्राकृत तथा अपभ्रंश तीनों में दोहा कहनेवाले, 'शब्दानुशासन' के रचयिता हेमचन्द्र रचित दोहा बताता है कि ऐसी परिस्थिति में कितना धैर्य रखना चाहिए? संकटग्रस्त के परिजनों को क़तर न होकर देश हित में सर्वोच्च बलिदान का अवसर पाने को अपना सौभाग्य मानना चाहिए।
भल्ला हुआ जू मारिआ, बहिणि म्हारा कंतु.
लज्जज्जंतु वयंसि यहु, जह भग्गा घर एन्तु.
भला हुआ मारा गया, मेरा बहिन सुहाग.
मर जाती मैं लाज से, जो आता घर भाग.
*
अम्हे थोवा रिउ बहुअ, कायर एंव भणन्ति.
मुद्धि निहालहि गयण फलु, कह जण जाण्ह करंति.
भाय न कायर भगोड़ा, सुख कम दुःख अधिकाय.
देख युद्ध फल क्या कहूँ, कुछ भी कहा न जाय.
गोष्ठी के अंत में :
दोहा सुहृदों का स्वजन, अक्षर अनहद नाद.
बिछुडे अपनों की तरह, फ़िर-फ़िर आता याद.
बिसर गया था आ रहा, फ़िर से दोहा याद.
दोहा रचना सरल यदि, होगा द्रुत संवाद.
दोहा दिल का आइना, कहता केवल सत्य.
सुख-दुःख चुप रह झेलता, कहता नहीं असत्य.
दोहा सत्य से आँख मिलाने का साहस रखता है. वह जीवन का सत्य पूरी निर्लिप्तता, निडरता, स्पष्टता से संक्षिप्तता में कहता है-
पुत्ते जाएँ कवन गुणु, अवगुणु कवणु मुएण
जा बप्पी की भूः णई, चंपी ज्जइ अवरेण.
गुण पूजित हो कौन सा?,क्या अवगुण दें त्याग?
वरित पूज्य- तज चम्पई, अवरित बिन अनुराग..
चम्पई = चंपकवर्णी सुन्दरी
बेवफा प्रियतम को साथ लेकर न लौटने से लज्जित दूती को के दुःख से भावाकुल प्रेमिका भावाकुल के मन की व्यथा कथा दोहा ही कह सकता है-
सो न आवै, दुई घरु, कांइ अहोमुहू तुज्झु.
वयणु जे खंढइ तउ सहि ए, सो पिय होइ न मुज्झु
यदि प्रिय घर आता नहीं, दूती क्यों नत मुख?
मुझे न प्रिय जो तोड़कर, वचन तुझे दे दुःख..
हर प्रियतम बेवफा नहीं होता। सच्चे प्रेमियों के लिए बिछुड़ना की पीड़ा असह्य होती है। जिस विरहणी की अंगुलियाँ प्रियतम के आने के दिन गिन-गिन कर ही घिसी जा रहीं हैं उसका साथ कोई दे न दे दोहा तो देगा ही।
जे महु दिणणा दिअहडा, दइऐ पवसंतेण.
ताण गणनतिए अंगुलिऊँ, जज्जरियाउ नहेण.
प्रिय जब गये प्रवास पर, बतलाये जो दिन.
हुईं अंगुलियाँ जर्जरित, उनको नख से गिन.
परेशानी प्रिय के जाने मात्र की हो तो उसका निदान हो सकता है पर इन प्रियतमा की शिकायत यह है कि प्रिय गये तो मारे गम के नींद गुम हो गयी और जब आये तो खुशी के कारण नींद गुम हो गयी। करें तो क्या करे?
पिय संगमि कउ निद्दणइ, पियहो परक्खहो केंब?
मई बिन्नवि बिन्नासिया, निंद्दन एंव न तेंव.
प्रिय का संग पा नींद गुम, बिछुडे तो गुम नींद.
हाय! गयी दोनों तरह, ज्यों-त्यों मिली न नींद.
मिलन-विरह के साथ-साथ दोहा हास-परिहास में भी पीछे नहीं है। 'सारे जहां का दर्द हमारे जिगर में है' अथवा 'मुल्ला जी दुबले क्यों? - शहर के अंदेशे से' जैसी लोकोक्तियों का उद्गम शायद निम्न दोहा है जिसमें अपभ्रंश के दोहाकार सोमप्रभ सूरी की चिंता यह है कि दशानन के दस मुँह थे तो उसकी माता उन सबको दूध कैसे पिलाती होगी?
रावण जायउ जहि दिअहि, दहमुहु एकु सरीरु.
चिंताविय तइयहि जणणि, कवहुं पियावहुं खीरू.
एक बदन दस वदनमय, रावन जन्मा तात.
दूध पिलाऊँ किस तरह, सोचे चिंतित मात.
दोहा सबका साथ निभाता है, भले ही इंसान एक दूसरे का साथ छोड़ दे। बुंदेलखंड के परम प्रतापी शूर-वीर भाइयों आल्हा-ऊदल के पराक्रम की अमर गाथा महाकवि जगनिक रचित 'आल्हा खंड' (संवत १२३०) का श्री गणेश दोहा से ही हुआ है-
श्री गणेश गुरुपद सुमरि, ईस्ट देव मन लाय.
आल्हखंड बरनन करत, आल्हा छंद बनाय.
इन दोनों वीरों और युद्ध के मैदान में उन्हें मारनेवाले दिल्लीपति पृथ्वीराज चौहान के प्रिय शस्त्र तलवार के प्रकारों का वर्णन दोहा उनकी मूठ के आधार पर करता है-
पार्ज चौक चुंचुक गता, अमिया टोली फूल.
कंठ कटोरी है सखी, नौ नग गिनती मूठ.
कवि को नम्र प्रणाम:
राजा-महाराजा से अधिक सम्मान साहित्यकार को देना दोहा का संस्कार है. परमल रासो में दोहा ने महाकवि चंद बरदाई को दोहा ने सदर प्रणाम कर उनके योगदान को याद किया-
भारत किय भुव लोक मंह, गणतिय लक्ष प्रमान.
चाहुवाल जस चंद कवि, कीन्हिय ताहि समान.
बुन्देलखंड के प्रसिद्ध तीर्थ जटाशंकर में एक शिलालेख पर डिंगल भाषा में १३वी-१४वी सदी में गूजरों-गौदहों तथा काई को पराजित करनेवाले विश्वामित्र गोत्रीय विजयसिंह का प्रशस्ति गायन कर दोहा इतिहास के अज्ञात पृष्ठ को उद्घाटित कर रहा है-
जो चित्तौडहि जुज्झी अउ, जिण दिल्ली दलु जित्त.
सोसुपसंसहि रभहकइ, हरिसराअ तिउ सुत्त.
खेदिअ गुज्जर गौदहइ, कीय अधी अम्मार.
विजयसिंह कित संभलहु, पौरुस कह संसार.
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वीरों का प्यारा रहा, कर वीरों से प्यार.
शौर्य-पराक्रम पर हुआ'सलिल', दोहा हुआ निसार.
दोहा दीप जलाइए, मन में भरे उजास.
'मावस भी पूनम बने, फागुन भी मधुमास.
बौर आम के देखकर, बौराया है आम.
बौरा गौरा ने वरा, खास- बताओ नाम?
लाल न लेकिन लाल है, ताल बिना दे ताल.
जलता है या फूलता, बूझे कौन सवाल?
लाल हरे पीले वसन, धरे धरा हसीन.
नील गगन हँसता, लगे- पवन वसन बिन दीन.
सरसों के पीले किए, जब से भू ने हाथ.
हँसते-रोते हैं नयन, उठता-झुकता माथ.
राम राज्य का दिखाते, स्वप्न किन्तु खुद सूर.
दीप बुझाते देश का, क्यों कर आप हुजूर?
'कम लिखे को अधिक समझना' लोक भाषा का यह वाक्यांश दोहा रचना का मूलमंत्र है. उक्त दोहों के भाव एवं अर्थ समझिये.
सरसुति के भंडार की, बड़ी अपूरब बात.
ज्यों खर्चो त्यों-त्यों बढे, बिन खर्चे घट जात.
करत-करत अभ्यास के, जडमति होत सुजान.
रसरी आवत-जात ते, सिल पर पडत निसान.
दोहा गाथा की इस कड़ी के अंत में वह दोहा जो कथा समापन के लिये ही लिखा गया है-
कथा विसर्जन होत है, सुनहूँ वीर हनुमान.
जो जन जहाँ से आए हैं, सो तंह करहु पयान।
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बुन्देली मुक्तिका:
मंजिल की सौं...
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मंजिल की सौं, जी भर खेल
ऊँच-नीच, सुख-दुःख. हँस झेल
रूठें तो सें यार अगर
करो खुसामद मल कहें तेल
यादों की बारात चली
नाते भए हैं नाक-नकेल
आस-प्यास के दो कैदी
कार रए साँसों की जेल
मेहनतकश खों सोभा दें
बहा पसीना रेलमपेल

२४-५-२०१३

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