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मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026

अक्टूबर २०, लक्ष्मी मंत्र, बाल गीत, सॉनेट, मुक्तक, करवा चौथ, सोरठे, महावीर छंद, उत्प्रेक्षा अलंकार, लघुकथा

सलिल सृजन अक्टूबर २०
*
अनुष्ठान:
लक्ष्मी मंत्र : क्यों और कैसे?
सहस्त्रों वर्ष पूर्व रचित भागवत पुराण के अनुसार कलियुग में एक अच्छा कुल (परिवार) वही कहलाएगा, जिसके पास सबसे अधिक धन होगा। आजकल धन जीवन की आवश्यकता पूर्ति का साधन मात्र नहीं, समाज में सम्मान पाने आधार है। जीवन में सफलता के दो आधार भाग्य और पौरुष हैं। तुलसी 'हुईहै सोहि जो राम रचि राखा / को करि तरक बढ़ावै साखा' के साथ 'कर्म प्रधान बिस्व करि राखा / जो जस करहि सो तस फल चाखा' कहकर इस द्वैत को व्यक्त करते हैं। शास्त्रों में 'उद्यमेन हि सिद्धन्ति कार्याणि न मनोरथैः / नहिं सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशंति मुख्य मृगा:' कहकर कर्म का महत्त्व दर्शाया गया है। गीता भी 'कर्मण्येवाधिकारस्ते माँ फलेषु कदाचन' अर्थात 'कर्म मात्र अधिकार तुम्हारा, क्या फल होगा सोच न कऱ निष्काम कर्म हेतु प्रेरित करती है।
यह भी देखा जाता है कि भाग्य में धन लिखा है तो किसी न किसी प्रकार मिल जाता है, भाग्य में न हो तो सकल सावधानी के बाद भी सब वैभव नष्ट हो जाता है। सत्य नारायण की कथा के अनुसार अपने पूर्व जन्मों के कर्म का फल भी जीव को भोगना पड़ता है। ज्योतिष शास्त्र तथा धार्मिक कर्मकांड के अनुसार अनेक शास्त्रीय उपाय हैं जिन्हें करने से मनुष्य अपनी इच्छाओं को पूर्ण करने में सक्षम होता है। ये शास्त्रीय उपाय मंत्र जाप, दान-पुण्य आदि हैं। धनवान बनने हेतु जातक की राशि के अनुसार धन की देवी लक्ष्मी के मंत्र का जाप करने से जातक पर धन-वर्षा होकर जीवन से दरिद्रता दूर होती है और वह सुखी बनता है। लक्ष्मी का आशीर्वाद जीवन में धन और खुशहाली दोनों लाते हैं।
मेष राशि- मंगल ग्रह से प्रभावित मेष जातक में कम साधनों में गुजारा करने का गुण नहीं होता। ये हमेशा जीवन से अधिक की अपेक्षा रखते हैं। मेष जातक को धन हेतु ‘श्रीं’ मंत्र का जाप १०००८ बार करना चाहिए।
वृषभ राशि- परिवार व जीवन के प्रति संवेदनशील वृषभ जातक 'ॐ सर्व बढ़ा विनिर्मुक्तो धन-धान्यसुतान्वित:। मनुष्योमत्प्रसादेन भविष्यति न संशय:।।' मंत्र की एक माला नित्य जपें।
मिथुन राशि- दोहरे व्यक्तित्ववाले मिथुन जातक अपनी धुन के पक्के तथा कार्य के प्रति समर्पित होते हैं। इन्हें 'ॐ श्रीं श्रींये नम:' मंत्र की एक माला नित्य जपनी चाहिए ।
कर्क राशि- परिवार की हर आवश्यकतापूर्ति को अपनी जिम्मेदारी समझनेवाले कर्क जातक 'ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ॐ॥' मंत्र की एक माला नित्य जपें।
सिंह राशि- सम्मान, यश व धन के प्रति बेहद आकर्षित रहनेवाले सिंह जातक 'ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नम:' मंत्र की एक माला नित्य जपें।
कन्या राशि- समझदार और सभी लोगों को साथ लेकर चलने वाले कन्या जातकों की जीवन के प्रति सोच सरल किन्तु शेष से भिन्न होती है। ये 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्मी नम:' मंत्र की एक माला नित्य प्रात: जपें।
तुला राशि- समझदार और सुलझे तुला जातक' ॐ श्रीं श्रीय नम:' मंत्र की एक या अधिक माला नित्य जपें।
वृश्चिक राशि- जीवनारंभ में परेशानियाँ झेल, २८ वर्ष के होने तक संपन्न होनेवाले वृश्चिक जातक अधिक उन्नति हेतु 'ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीभयो नम:' मन्त्र की एक माला नित्य जपें।
मकर राशि- मेहनती-समझदार मकर जातक जल्दबाजी न कर, हर काम सोच-विचार कर करते हैं। ये ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौं ॐ ह्रीं क्लीं ह्रीं श्रीं ह्रीं क्लीं ह्रीं ॐ सौं ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं ॐ॥' मंत्र की एक माला नित्य जपें।
कुंभ राशि- कुम्भ राशि स्वामी शनि कर्मानुसार फल देने वाला ग्रह है। कुम्भ जातक कर्मानुसार शुभाशुभ फल शीघ्र पाते हैं। इन्हें 'ऐं ह्रीं श्रीं अष्टलक्ष्यम्ये ह्रीं सिद्धये मम गृहे आगच्छागच्छ नमः स्वाहा।' मंत्र की एक माला जाप नित्य जपना चाहिए।
मीन राशि- राशि स्वामी देवगुरु बृहस्पतिधन-धान्य प्रदाता हैं। मीन जातक को ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नम:' मंत्र की दो माला नित्य जपने से फल की प्राप्ति होगी।
***
II श्री महालक्ष्यमष्टक स्तोत्र II
नमस्तेस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते I
शंख चक्र गदा हस्ते महालक्ष्मी नमोsस्तुते II१II
सुरपूजित श्रीपीठ विराजित, नमन महामाया शत-शत.
शंख चक्र कर-गदा सुशोभित, नमन महालक्ष्मी शत-शत..
नमस्ते गरुड़ारूढ़े कोलासुर भयंकरी I
सर्व पापहरे देवी महालक्ष्मी नमोsस्तुते II२II
कोलाsसुरमर्दिनी भवानी, गरुड़ासीना नम्र नमन.
सरे पाप-ताप की हर्ता, नमन महालक्ष्मी शत-शत..
सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्ट भयंकरी I
सर्व दु:ख हरे देवी महालक्ष्मी नमोsस्तुते II३II
सर्वज्ञा वरदायिनी मैया, अरि-दुष्टों को भयकारी.
सब दुःखहरनेवाली, नमन महालक्ष्मी शत-शत..
सिद्धि-बुद्धिप्रदे देवी भुक्ति-मुक्ति प्रदायनी I
मन्त्रमूर्ते सदा देवी महालक्ष्मी नमोsस्तुते II४II
भुक्ति-मुक्तिदात्री माँ कमला, सिद्धि-बुद्धिदात्री मैया.
सदा मन्त्र में मूर्तित हो माँ, नमन महालक्ष्मी शत-शत..
आद्यांतर हिते देवी आदिशक्ति महेश्वरी I
योगजे योगसंभूते महालक्ष्मी नमोsस्तुते II५II
हे महेश्वरी! आदिशक्ति हे!, अंतर्मन में बसो सदा.
योग्जनित संभूत योग से, नमन महालक्ष्मी शत-शत..
स्थूल-सूक्ष्म महारौद्रे महाशक्ति महोsदरे I
महापापहरे देवी महालक्ष्मी नमोsस्तुते II६II
महाशक्ति हे! महोदरा हे!, महारुद्रा सूक्ष्म-स्थूल.
महापापहारी श्री देवी, नमन महालक्ष्मी शत-शत..
पद्मासनस्थिते देवी परब्रम्ह स्वरूपिणी I
परमेशीजगन्मातर्महालक्ष्मी नमोsस्तुते II७II
कमलासन पर सदा सुशोभित, परमब्रम्ह का रूप शुभे.
जगज्जननि परमेशी माता, नमन महालक्ष्मी शत-शत..
श्वेताम्बरधरे देवी नानालंकारभूषिते I
जगत्स्थिते जगन्मातर्महालक्ष्मी नमोsस्तुते II८II
दिव्य विविध आभूषणभूषित, श्वेतवसनधारे मैया.
जग में स्थित हे जगमाता!, नमन महालक्ष्मी शत-शत..
महा लक्ष्यमष्टकस्तोत्रं य: पठेद्भक्तिमान्नर: I
सर्वसिद्धिमवाप्नोति राज्यंप्राप्नोति सर्वदा II९II
जो नर पढ़ते भक्ति-भाव से, महालक्ष्मी का स्तोत्र.
पाते सुख धन राज्य सिद्धियाँ, नमन महालक्ष्मी शत-शत..
एककालं पठेन्नित्यं महापाप विनाशनं I
द्विकालं य: पठेन्नित्यं धन-धान्यसमन्वित: II१०II
एक समय जो पाठ करें नित, उनके मिटते पाप सकल.
पढ़ें दो समय मिले धान्य-धन, नमन महालक्ष्मी शत-शत..
त्रिकालं य: पठेन्नित्यं महाशत्रु विनाशनं I
महालक्ष्मीर्भवैन्नित्यं प्रसन्नावरदाशुभा II११II
तीन समय नित अष्टक पढ़िये, महाशत्रुओं का हो नाश.
हो प्रसन्न वर देती मैया, नमन महालक्ष्मी शत-शत..
II तद्रिन्कृत: श्री महालक्ष्यमष्टकस्तोत्रं संपूर्णं II
तद्रिंरचित, सलिल-अनुवादित, महालक्ष्मी अष्टक पूर्ण.
नित पढ़ श्री समृद्धि यश सुख लें, नमन महालक्ष्मी शत-शत..
*******************************************
बाल गीत:
अहा! दिवाली आ गयी
आओ! साफ़-सफाई करें
मेहनत से हम नहीं डरें
करना शेष लिपाई यहाँ
वहाँ पुताई आज करें
हर घर खूब सजा गयी
अहा! दिवाली आ गयी
कचरा मत फेंको बाहर
कचराघर डालो जाकर
सड़क-गली सब साफ़ रहे
खुश हों लछमी जी आकर
श्री गणेश-मन भा गयी
अहा! दिवाली आ गयी
स्नान-ध्यान कर, मिले प्रसाद
पंचामृत का भाता स्वाद
दिया जला उजियारा कर
फोड़ फटाके हो आल्हाद
शुभ आशीष दिला गयी
अहा! दिवाली आ गयी
*
सॉनेट
दीपांजलि
*
दीपांजलि सत्कार है,
वसुधा प्रमुदित हो कहे,
रश्मि-दीप अनगिन दहे,
दिनकर का आभार है।
किरण किए शृंगार है,
पवन मिलन यादें तहे,
नहीं किसी से कुछ कहे,
ऊषा पर बलिहार है।
प्रकृति प्रणय पटकथा रच,
मौन; मंद मुस्का रही,
मानव कर नित नव सृजन।
है आत्मा की प्रीत सच,
परमात्मा यश गा रही,
चाहे हो पल-पल मिलन।
मुक्तक:
सत्य-शिव-सुंदर अनुसंधान है दीपावली
सत-चित-आनंद का अनुगान है दीपावली
प्रकृति-पर्यावरण के अनुकूल जीवन हो 'सलिल'
मनुजता को समर्पित विज्ञान है दीपावली
धर्म राष्ट्र विश्व पर अभिमान है दीपावली
प्रार्थना प्रेयर सबद अजान है दीपावली
धर्म का है मर्म निरासक्त कर्म ही सलिल
निष्काम निष्ठा-लगन का सम्मान है दीपावली
पुरुषार्थ को परमार्थ की पहचान है दीपावली
नयन में पलता हसीं अरमान है दीपावली
आन-बान-शान से जीवन जियें हँसकर 'सलिल'
असत पर शुभ सत्य का जयगान है दीपावली
निस्वार्थ सेवा का सतत अभियान है दीपावली
तृषित अधरों की मधुर मुस्कान है दीपावली
सृजित कर कंकर से शंकर जो अचीन्हें रह गए
काय-स्थित ईश्वर कायस्थ है दीपावली
सर्व सुख लिये निज बलिदान है दीपावली
आस्था विश्वास निष्ठा मान है दीपावली
तूफ़ान-तम को जीतता जो 'सलिल' दृढ़ संकल्प से
उसी नन्हें दीप का जयगान है दीपावली
***
२०.१०.२०२५
***
करवा चौथी सोरठे
चाँद रही है खोज, चंद्रमुखी जा चाँद पर।
करे किस तरह भोज, नहीं गगन में दिखा रहा।।
*
कहे देख लो चाँद, जीवन साथी सिर झुका।
पग-तल नीचे चाँद, चमक गँवा लज्जित हुआ।।
*
तोड़े धरती देख, नई रीत पति व्रत रखे।
तज सिंदूरी रेख, पत्नी जी आशीष दें।।
*
विक्रमनी हैरान, विक्रम उतरा चाँद पर।
मन मसोस मायूस, मिल न सकें नभ फाँद कर।।
*
प्रज्ञानिन हैरान, करवा कैसे बनाए?
बिन पानी प्रज्ञान, व्रत कैसे तुड़वाएगा??
२०.२०.२०२४
***
एक दोहा
पैर जमा ले धरा पर, तब छूना आकाश
मत पतंग; पीपल बनो, खुद को खुदी तराश
२०.१०.२०२१
***
हिन्दी के नए छंद- १४
महावीर छंद
हिंदी के नए छंदों की श्रुंखला में अब तक आपने पढ़े पाँच मात्रिक भवानी, राजीव, साधना, हिमालय, आचमन, ककहरा, तुहिणकण, अभियान, नर्मदा, सतपुडा छंद। अब प्रस्तुत है षड्मात्रिक छंद महावीर
विधान-
१. प्रति पंक्ति ६ मात्रा।
२. प्रति पंक्ति मात्रा क्रम लघु गुरु गुरु लघु।
गीत
.
नमस्कार!
निराकार!!
.
रचें छंद
निरंकार।
भरें भाव
अलंकार।
मिटे तुरत
अहंकार।
रहें देव
इसी द्वार।
नमस्कार!
निराकार!!
.
भरें बाँह
हरें दाह।
करें पूर्ण
सभी चाह।
गहें थाह
मिले वाह।
लगातार
करें प्यार
नमस्कार!
निराकार!!
२०-१०-२०१७
***
मुक्तक
आपने चाहा जिसे वह गीत चाहत के लिखेगा
नहीं चाहा जिसे कैसे वह मिलन-अमृत चखेगा?
राह रपटीली बहुत है चाह की, पग सम्हल धरना
जान लेकर हथेली पर जो चले, आगे दिखेगा
२०-१०-२०१६
***
अलंकार सलिला :
उत्प्रेक्षा अलंकार
*
जब होते दो वस्तु में, एक सदृश गुण-धर्म
एक लगे दूजी सदृश, उत्प्रेक्षा का मर्म
इसमें उसकी कल्पना, उत्प्रेक्षा का मूल.
जनु मनु बहुधा जानिए, है पहचान, न भूल..
जो है उसमें- जो नहीं, वह संभावित देख.
जानो-मानो से करे, उत्प्रेक्षा उल्लेख..
जब दो वस्तुओं में किसी समान धर्म(गुण) होने के कारण एक में दूसरे के होने की सम्भावना की जाए तब वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है. सम्भावना व्यक्त करने के लिये किसी वाचक शब्द यथा मानो, मनो, मनु, मनहुँ, जानो, जनु, जैसा, सा, सम आदि का उपयोग किया जाता है.
उत्प्रेक्षा का अर्थ कल्पना या सम्भावना है. जब दो वस्तुओं में भिन्नता रहते हुए भी उपमेय में उपमान की कल्पना की जाये या उपमेय के उपमान के सदृश्य होने की सम्भावना व्यक्त की जाये तो उत्प्रेक्षा अलंकार होता है. कल्पना या सम्भावना की अभिव्यक्ति हेतु जनु, जानो, मनु, मनहु, मानहु, मानो, जिमी, जैसे, इव, आदि कल्पनासूचक शब्दों का प्रयोग होता है..
उदाहरण:
१. चारू कपोल, लोल लोचन, गोरोचन तिलक दिए.
लट लटकनि मनु मत्त मधुप-गन मादक मधुहिं पिए..
यहाँ श्रीकृष्ण के मुख पर झूलती हुई लटों (प्रस्तुत) में मत्त मधुप (अप्रस्तुत) की कल्पना (संभावना) किये जाने के कारण उत्प्रेक्षा अलंकार है.
२. फूले कांस सकल महि छाई.
जनु वर्षा कृत प्रकट बुढाई..
यहाँ फूले हुए कांस (उपमेय) में वर्षा के श्वेत्केश (उपमान) की सम्भावना की गयी है.
३. फूले हैं कुमुद, फूली मालती सघन वन.
फूली रहे तारे मानो मोती अनगन हैं..
४. मानहु जगत क्षीर-सागर मगन है..
५. झुके कूल सों जल परसन हित मनहुँ सुहाए.
६. मनु आतप बारन तीर कों, सिमिटि सबै छाये रहत.
७. मनु दृग धारि अनेक जमुन निरखत ब्रज शोभा.
८. तमकि धरहिं धनु मूढ़ नृप, उठे न चलहिं लजाइ.
मनहुँ पाइ भट बाहुबल, अधिक-अधिक गुरुवाइ..
९. लखियत राधा बदन मनु विमल सरद राकेस.
१०. कहती हुए उत्तरा के नेत्र जल से भर गए.
हिम के कणों से पूर्ण मानो हो गए पंकज नए..
११. उस काल मारे क्रोध के तनु काँपने लगा.
मानो हवा के जोर से सोता हुआ सागर जगा..
१२. तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाये.
झुके कूल सों जल परसन हित मनहु सुहाए..
१३. नित्य नहाता है चन्द्र क्षीर-सागर में.
सुन्दरि! मानो तुम्हारे मुख की समता के लिए.
१४. भूमि जीव संकुल रहे, गए सरद ऋतु पाइ.
सद्गुरु मिले जाहि जिमि, संसय-भ्रम समुदाइ..
१५. रिश्ता दुनियाँ में जैसे व्यापार हो गया।
बीते कल का ये मानो अखबार हो गया।। -श्यामल सुमन
१६. नाना रंगी जलद नभ में दीखते हैं अनूठे
योधा मानो विविध रंग के वस्त्र धारे हुए हैं
१७. अति कटु बचन कहति कैकेई, मानहु लोन जरे पर देई
१८. दूरदर्शनी बहस ज्यों बच्चे करते शोर
'सलिल' न दें परिणाम ज्यों, बंजर भूमि कठोर
***
लघुकथा:
जले पर नमक
*
- 'यार! ऐसे कैसे जेब कट गयी? सम्हलकर चला करो.'
= 'कहते तो ठीक हो किन्तु कितना भी सम्हलकर चलो, कलाकार हाथ की सफाई दिखा ही देता है.'
- 'ऐसा कहकर तुम अपनी असावधानी पर पर्दा नहीं डाल सकते।'
= 'पर्दा कौन कम्बख्त डाल रहा है? जेबकतरे तो पूरी जनता जनार्दन की जेब काट रहे हैं पिछले ६७ सालों से कौन रोक पाया और कौन बच पाया?'
- 'तुम किस की बात कर रहे हो ?'
=' उन्हें की जो चुनाव की चौपड़ पर आश्वासन के पांसे फेंककर जनमत की द्रौपदी का दिल्ली के दरबार में दिन दहाड़े चीरहरण ही नहीं करते, प्यादों को शह देकर दाल, प्याज जैसी चीजों की जमाखोरी कर कई गुना ऊँचे दामों पर बिकवाकर जन गण की जेब कतरते रहते हैं. इतना ही नहीं दु:शासनी जनविरोधी नीतियों के पक्ष में दूरदर्शन पर गरज-गरज कर जन के जले मन पर नमक भी छिड़कते हैं.'
-'तुमसे तो कुछ कहना ही बेकार है .....'
***
लघुकथाः
मुखड़ा देख ले
*
कक्ष का द्वार खोलते ही चोंक पड़े संपादक जी| गाँधी जी के चित्र के ठीक नीचे विराजमान तीनों बंदर दो थिगड़े लपेटे कमर मटकाती बंदरिया को ताकते हुए मुस्कुरा रहे थे|
आँखें फाड़कर घूरते हुए पहले बंदर के गले में लटकी पट्टी पर लिखा था- 'बुरा ही देखो'|
हाथ में माइक पकड़े दिगज नेता की तरह मुँह फाड़े दूसरे बंदर का कंठहार बनी पट्टी पर अंकित था- 'बुरा ही बोलो'|
'बुरा ही सुनो' की पट्टी दीवार से कान सटाये तीसरे बंदर के गले की शोभा बढ़ा रही थी|
'अरे! क्या हो गया तुम तीनों को?' गले की पट्टियाँ बदलकर मुट्ठी में नोट थामकर मेज के नीचे हाथ क्यों छिपाये हो? संपादक जी ने डपटते हुए पूछा|
'हमने हर दिन आपसे कुछ न कुछ सीखा है| आज प्रैक्टिकल कर रहे हैं कोई कमी रह गयी हो तो बतायें|'
ठगे से खड़े संपादक जी के कानों में गूँज रहा था- 'मुखड़ा देख ले प्राणी जरा दर्पण में ...'
२०-१०-२०१५

***

सोमवार, 12 अक्टूबर 2026

अक्टूबर १२, अलंकार, बुन्देली, मुक्तक, सोरठे, जिकड़ी, बाल, गीत, लँगड़ी, लघुकथा, नर्मदा,



सलिल सृजन अक्टूबर १२

0

दोहा ग़ज़ल . रोज रोज़ डे मनाकर, ले-ले फेंके फूल। जो उनका लव मिल रहा, माटी में वे फूल।। . अरसे बाद किताब में, मिला धरोहर फूल। कमसिन अल्हड़ एक छवि, गई याद में झूल।। . चाहो तो मन-प्राण से, वरना मत दो तूल। कसक श्वास को हास दे, करें न विचलित शूल।। . नाम न लेना प्रीत का, चुप रह सह लो हूल। तनिक न वह बदनाम हो, हो न प्रतिष्ठा धूल।। . फूल मिला तो फूल मत, बैठ नदी के कूल। लहर-घाट से सीख ले, मिलन-विरह मत भूल।। १२.१०.२०२६
मुक्तक
०
बड़े भक्त हैं, बना रहे हैं देवों को भी दैत्य समान।
देख सहम जाए बच्चा मन, है सम्मान या कि अपमान।।
नहीं स्मरण रहा इन्हें क्या, कंकर-कंकर में शंकर-
वेद-पुराण युगों से कहते, कण-कण में रहते भगवान।।
०
ग्रंथ बताते जला विभीषण ने रावण को दिया
राम-बाण से जलवाते क्यों प्रथा रची मिथ्या
रावण वध की तिथि न दशहरा, लीला करती भ्रांत-
मर्यादा कर भंग न कंपित होता क्यों कर हिया?
०
हिंदी दिवस मनाने का अंग्रेजी में आदेश
तंत्र कर दमन जन गण-मन का देता क्या संदेश?
या तो अंग्रेजी बोले या हिंदी संस्कृत घोल-
सरल-सहज बोली से पाले क्यों यह पाले बैर हमेश?
१२.१०.२०२५
०००
मुक्तिका (बुंदेली)
*
कर धरती बर्बाद चाँद पै जा रओ है
चंदा डर सें पीरो, जे बर्रा रओ है
एक दूसरे की छाती पै फेंकें बम्म
लोग मरें, नेता-अफसर गर्रा रओ है
करे अमंगल धरती को मंगल जा रओ
नव ग्रह जालम आदम सें थर्रा रओ है
छुरा पीठ में भोंखें; गले मिलें जबरन
गिरगिट हेरे; हैरां हो सरमा रओ है
मैया कह रओ लूट-लूट खें धरती खों
चंदा मम्मा लूटन खों हुर्रा रओ है
***
सोरठे
•
चंद्रमुखी जी रूठ, जा बैठी हैं चाँद पर।
कहा न मैंने झूठ, तुम चंदा सी लग रहीं।।
•
चाँद
झुकें दिखा दें चाँद, निकला है नभ पर नहीं।
तोड़ूँ व्रत निष्पाप, कहे चाँदनी चाँद से।।
•
प्रज्ञानिन जा चाँद, अर्ध्य धरा को दे रही।
भागा कक्षा फाँद, विक्रम को आई हँसी।।
•
रोवर पढ़ता पाठ, कक्षा में कक्षा लगी।
लैंडर का है ठाठ, गोल मारकर घूमता।
•
१२-१०-२०२३
मुक्तिका
गम के बादल अंबर पर छाते जब भी
प्रियदर्शी को देख हवा हो जाते हैं
हुए गमजदा गम तो पाने छुटकारा
आँखों से झर मन का ताप मिटाते हैं
रखो हौसला होता है जब तिमिर घना
तब ही दिनकर-उषा सवेरा लाते हैं
तूफानों से नीड़ उजड़ जाए चाहे
पंछी आकर सरस प्रभाती गाते हैं
दिया शारदा ने वर गीतों का अनुपम
गम हरने वे मन-कुंडी खटकाते हैं
अमरकंटकी विष पीने की परंपरा
शब्दामृत पी विष को अमिय बनाते हैं
बे-गम हुई जिंदगी तो क्या जीतें हम
गम आ मिल मिट हमको जयी बनाते हैं
अंबर का विस्तार नहीं गम नाप सके
बारिश बन बह, भू को हरा बनाते हैं
१२-१०-२०१९
***
अभिनव प्रयोग:
प्रस्तुत है पहली बार खड़ी हिंदी में बृजांचल का लोक काव्य भजन जिकड़ी
जय हिंद लगा जयकारा
(इस छंद का रचना विधान बताइए)
*
भारत माँ की ध्वजा, तिरंगी कर ले तानी।
ब्रिटिश राज झुक गया, नियति अपनी पहचानी।। ​​​​​​​​​​​​​​
​अधरों पर मुस्कान।
गाँधी बैठे दूर पोंछते, जनता के आँसू हर प्रात।
गायब वीर सुभाष हो गए, कोई न माने नहीं रहे।।
जय हिंद लगा जयकारा।।
रास बिहारी; चरण भगवती; अमर रहें दुर्गा भाभी।
बिन आजाद न पूर्ण लग रही, थी जनता को आज़ादी।।
नहरू, राजिंदर, पटेल को, जनगण हुआ सहारा
जय हिंद लगा जयकारा।।
हुआ विभाजन मातृभूमि का।
मार-काट होती थी भारी, लूट-पाट को कौन गिने।
पंजाबी, सिंधी, बंगाली, मर-मिट सपने नए बुने।।
संविधान ने नव आशा दी, सूरज नया निहारा।
जय हिंद लगा जयकारा।।
बनी योजना पाँच साल की।
हुई हिंद की भाषा हिंदी, बाँध बन रहे थे भारी।
उद्योगों की फसल उग रही, पञ्चशील की तैयारी।।
पाकी-चीनी छुरा पीठ में, भोंकें; सोचें: मारा।
जय हिंद लगा जयकारा।।
पल-पल जगती रहती सेना।
बना बांग्ला देश, कारगिल, कहता शौर्य-कहानी।
है न शेष बासठ का भारत, उलझ न कर नादानी।।
शशि-मंगल जा पहुँचा इसरो, गर्वित हिंद हमारा।।
जय हिंद लगा जयकारा।।
सर्व धर्म समभाव न भूले।
जग-कुटुंब हमने माना पर, हर आतंकी मारेंगे।
जयचंदों की खैर न होगी, गाड़-गाड़कर तारेंगे।।
आर्यावर्त बने फिर भारत, 'सलिल' मंत्र उच्चारा।।
जय हिंद लगा जयकारा।।
६.७.२०१८
***
बाल गीत:
लँगड़ी खेलें.....
*
आओ! हम मिल
लँगड़ी खेलें.....
*
एक पैर लें
जमा जमीं पर।
रखें दूसरा
थोडा ऊपर।
बना संतुलन
निज शरीर का-
आउट कर दें
तुमको छूकर।
एक दिशा में
तुम्हें धकेलें।
आओ! हम मिल
लँगड़ी खेलें.....
*
आगे जो भी
दौड़ लगाये।
कोशिश यही
हाथ वह आये।
बचकर दूर न
जाने पाए-
चाहे कितना
भी भरमाये।
हम भी चुप रह
करें झमेले।
आओ! हम मिल
लँगड़ी खेलें.....
*
हा-हा-हैया,
ता-ता-थैया।
छू राधा को
किशन कन्हैया।
गिरें धूल में,
रो-उठ-हँसकर,
भूलें- झींकेगी
फिर मैया।
हर पल 'सलिल'
ख़ुशी के मेले।
आओ! हम मिल
लँगड़ी खेलें.....
*************
मुक्तक:
शीत है तो प्रीत भी है.
हार है तो जीत भी है.
पुरातन पाखंड हैं तो-
सनातन शुभ रीत भी है
***
छंद में ही सवाल करते हो
छंद का क्यों बवाल करते हो?
है जगत दन्द-फन्द में उलझा
छंद देकर निहाल करते हो
१२-१०-२०१७
***
दोहा सलिला
*
हर सिक्के में हैं सलिल, चित-पट दोनों साथ
बिना पैर के मंज़िलें, कैसे पाए हाथ
*
पुत्र जन्म हित कर दिया, पुत्री को ही दान
फिर कैसे हम कह रहे?, है रघुवंश महान?
*
सत्ता के टकराव से, जुड़ा धर्म का नाम
गलत न पूरा दशानन, सही न पूरे राम
*
मार रहे जो दशानन , खुद करते अपराध
सीता को वन भेजते, सत्ता के हित साध
*
कैसी मर्यादा? कहें, कैसा यह आदर्श?
बेबस को वन भेजकर, चाहा निज उत्कर्ष
*
मार दिया शम्बूक को, अगर पढ़ लिया वेद
कैसा है दैवत्व यह, नहीं गलत का खेद
१२-१०-२०१६
***
अलंकार सलिला
: २० : मालोपमा अलंकार
काव्यांश में जब मिले, एकाधिक उपमान
'सलिल' वहीं मालोपमा, अलंकार पहचान
*
किसी काव्य एक उपमेय के लिए एक से अधिक से अधिक उपमान दर्शित हों तो वहाँ मालोपमा अलंकार होता है.
उदाहरण:
१. नील सरोरुह, नील मनि, नील नीरधर स्याम
२. कान्ह जिमि कंस पर, तेज तम अंस पर
तिमि आरी-वंस पर सेर शिवराज हैं
३. तम सा नीरव, नभ सा विस्तृत
वह सूनापन ही उनका, यह सुख-दुखमय स्पंदन मेरे हों
४. मुख है सुंदर चंद्र सो, कोमल कमल समान
५. द्विरद-दन्तों से उठ सुन्दर,
सुखद कर-सीकर से बढ़कर
भूति से शोभित बिखर-बिखर
फ़ैल फिर कटि के से परिकर
बदल यों विविध वेश जलधर
बनाते थे गिरि को गजधर
६. सुरसरि अमल सी, शतदल कमल सी
रजत धार जैसी, बही जा रही है.
ये रतनार लाली, घटा श्याम-काली
घुलकर लहर में, ढली जा रही है
७. ममता की गागर जैसी हो,
करुणा की सागर जैसी हो,
दुष्टों खातिर काल सरीखी-
भक्तों को मैया जैसी हो
८. घोर गरजते मेघ सदृश गरजें बंदूकें
बिना रुके बारिश जैसी बरसें बंदूकें
नहा लहू में अरिदल की दहलातीं छाती
मार शत्रु को, जोगिन सी हर्षें बंदूकें।
९. भोर की लालिमा सी है बेटी अहो
माँ के वरदान जैसी है पावन कहो
बोझ के जैसे इसको न माने कोई
है ये अरमान जैसी न फिर क्यों चहो?
===
लघुकथा
स्वजन तन्त्र
*
राजनीति विज्ञान के शिक्षक ने जनतंत्र की परिभाषा तथा विशेषताएँ बताने के बाद भारत को विश्व का सबसे बड़ा जनतंत्र बताया तो एक छात्र से रहा नहीं गया। उसने अपनी असहमति दर्ज करते हुए कहा- ' गुरु जी! भारत में जनतंत्र नहीं स्वजन तंत्र है।
"किताब में ऐसे किसी तंत्र का नाम नहीं है" - गुरु जी बोले।
"कैसे होगा? यह हमारी अपनी खोज है और भारत में की गयी खोज को किताबों में इतनी जल्दी जगह मिल ही नहीं सकती। यह हमारे शिक्षा के पाठ्य क्रम में भी नहीं है लेकिन हमारी ज़िन्दगी के पाठ्य क्रम का पहला अध्याय यही है जिसे पढ़े बिना आगे का कोई पाठ नहीं पढ़ा जा सकता।" छात्र ने कहा।
"यह स्वजन तंत्र होता क्या है? यह तो बताओ" - सहपाठियों ने पूछा।
"स्वजन तंत्र एसा तंत्र है जहाँ चंद चमचे इकट्ठे होकर कुर्सी पर लदे नेता के हर सही-ग़लत फैसले को ठीक बताने के साथ-साथ उसके वंशजों को कुर्सी का वारिस बताने और बनाने की होड़ में जी-जान लगा देते हैं। जहाँ नेता अपने चमचों को वफादारी का ईनाम और सुख-सुविधा देने के लिए विशेष प्राधिकरणों का गठन कर भारी धन राशि, कार्यालय, वाहन आदि उपलब्ध कराते हैं जिनका वेतन, भत्ता, स्थापना व्यय तथा भ्रष्टाचार का बोझ झेलने के लिये आम आदमी को कानून की आड़ में मजबूर कर दिया जाता है। इन प्राधिकरणों में मनोनीत किये गये चमचों को आम आदमी के दुःख-दर्द से कोई सरोकार नहीं होता पर वे जन प्रतिनिधि कहलाते हैं। वे हर काम का ऊँचे से ऊँचा दाम वसूलना अपना हक मानते हैं और प्रशासनिक अधिकारी उन्हें यह सब कराने के उपाय बताते हैं।"
"लेकिन यह तो बहुत बड़ी परिभाषा है, याद कैसे रहेगी?" छात्र नेता के चमचे ने परेशानी बताई।
"चिंता मत कर। सिर्फ़ इतना याद रख जहाँ नेता अपने स्वजनों और स्वजन अपने नेता का हित साधन उचित-अनुचित का विचार किए बिना करते हैं और जनमत, जनहित, देशहित जैसी भ्रामक बातों की परवाह नहीं करते वही स्वजन तंत्र है लेकिन किताबों में इसे जनतंत्र लिखकर आम आदमी को ठगा जाता है ताकि वह बदलाव की माँग न करे।"
गुरु जी अवाक् होकर राजनीति के व्यावहारिक स्वरूप का ज्ञान पाकर धन्य हो रहे थे।
१२-१०-२०१५
***
नर्मदा नामावली
*
पुण्यतोया सदानीरा नर्मदा.
शैलजा गिरिजा अनिंद्या वर्मदा.
शैलपुत्री सोमतनया निर्मला.
अमरकंटी शांकरी शुभ शर्मदा.
आदिकन्या चिरकुमारी पावनी.
जलधिगामिनी चित्रकूटा पद्मजा.
विमलहृदया क्षमादात्री कौतुकी.
कमलनयनी जगज्जननि हर्म्यदा.
शाशिसुता रौद्रा विनोदिनी नीरजा.
मक्रवाहिनी ह्लादिनी सौंदर्यदा.
शारदा वरदा सुफलदा अन्नदा.
नेत्रवर्धिनि पापहारिणी धर्मदा.
सिन्धु सीता गौतमी सोमात्मजा.
रूपदा सौदामिनी सुख-सौख्यदा.
शिखरिणी नेत्रा तरंगिणी मेखला.
नीलवासिनी दिव्यरूपा कर्मदा.
बालुकावाहिनी दशार्णा रंजना.
विपाशा मन्दाकिनी चित्रोंत्पला.
रुद्रदेहा अनुसूया पय-अंबुजा.
सप्तगंगा समीरा जय-विजयदा.
अमृता कलकल निनादिनी निर्भरा.
शाम्भवी सोमोद्भवा स्वेदोद्भवा.
चन्दना शिव-आत्मजा सागर-प्रिया.
वायुवाहिनी कामिनी आनंददा.
मुरदला मुरला त्रिकूटा अंजना.
नंदना नाम्माडिअस भव मुक्तिदा.
शैलकन्या शैलजायी सुरूपा.
विपथगा विदशा सुकन्या भूषिता.
गतिमयी क्षिप्रा शिवा मेकलसुता.
मतिमयी मन्मथजयी लावण्यदा.
रतिमयी उन्मादिनी वैराग्यदा.
यतिमयी भवत्यागिनी शिववीर्यदा.
दिव्यरूपा तारिणी भयहांरिणी.
महार्णवा कमला निशंका मोक्षदा.
अम्ब रेवा करभ कालिंदी शुभा.
कृपा तमसा शिवज सुरसा मर्मदा.
तारिणी वरदायिनी नीलोत्पला.
क्षमा यमुना मेकला यश-कीर्तिदा.
साधना संजीवनी सुख-शांतिदा.
सलिल-इष्ट माँ भवानी नरमदा.
***
मुक्तिका
मुस्कान
*
जिस चहरे पर हो मुस्कान १५
वह लगता मितवा रस-खान..
अधर हँसें तो लगता है- १४
हैं रस-लीन किशन भगवान..
आँखें हँसती तो दिखते -
उनमें छिपे राम गुणवान..
उमा, रमा, शारदा लगें
रस-निधि रही नहीं अनजान..
'सलिल' रस कलश जन जीवन
सुख देकर बन जा इंसान..
***
लघु कथा
समय का फेर
गुरु जी शिष्य को पढ़ना-लिखना सिखाते परेशां हो गए तो खीझकर मारते हुए बोले- ' तेरी तकदीर में तालीम है ही नहीं तो क्या करुँ? तू मेरा और अपना दोनों का समय बरबाद कार रहा है. जा भाग जा, इतने समय में कुछ और सीखेगा तो कमा खायेगा.'
गुरु जी नाराज तो रोज ही होते थे लेकिन उस दिन चेले के मन को चोट लग गयी. उसने विद्यालय आना बंद कर दिया, सोचा: 'आज भगा रहे हैं. ठीक है भगा दीजिये, लेकिन मैं एक दिन फ़िर आऊंगा... जरूर आऊंगा.'
गुरु जी कुछ दिन दुखी रहे कि व्यर्थ ही नाराज हुए, न होते तो वह आता ही रहता और कुछ न कुछ सीखता भी. धीरे-धीरे गुरु जी वह घटना भूल गए.
कुछ साल बाद गुरूजी एक अवसर पर विद्यालय में पधारे अतिथि का स्वागत कर रहे थे. तभी अतिथि ने पूछा- 'आपने पहचाना मुझे?'
गुरु जी ने दिमाग पर जोर डाला तो चेहरा और घटना दोनों याद आ गयी किंतु कुछ न कहकर चुप ही रहे.
गुरु जी को चुप देखकर अतिथि ही बोला- 'आपने ठीक पहचाना. मैं वही हूँ. सच ही मेरे भाग्य में विद्या पाना नहीं है, आपने ठीक कहा था किंतु विद्या देनेवालों का भाग्य बनाना मेरे भाग्य में है यह आपने नहीं बताया था.'
गुरु जी अवाक् होकर देख रहे थे समय का फेर.
१२-१०-२०१४
***
मुक्तक
मत कहो घर में महज मेहमान हैं ये बेटियाँ
मान-मर्यादा मृदुल मुस्कान हैं ये बेटियाँ
मोह, ममता, नाज़-नखरे, अदा भी, अंदाज़ भी-
मौन की आवाज़ हैं, अरमान हैं ये बेटियाँ
१२-१०-२०१३
***
बालगीत
(लोस एंजिल्स अमेरिका से अपनी मम्मी रानी विशाल सहित ददिहाल-ननिहाल भारत आई नन्हीं अनुष्का के लिए २०१० में रचा गया था यह गीत)
*
लो भारत में आई अनुष्का.
सबके दिल पर छाई अनुष्का.
यह परियों की शहजादी है.
खुशियाँ अनगिन लाई अनुष्का..
है नन्हीं, हौसले बड़े हैं.
कलियों सी मुस्काई अनुष्का..
दादा-दादी, नाना-नानी,
मामा के मन भाई अनुष्का..
सबसे मिल मम्मी क्यों रोती?
सोचे, समझ न पाई अनुष्का..
सात समंदर दूरी कितनी?
कर फैला मुस्काई अनुष्का..
जो मन भाए वही करेगी.
रोको, हुई रुलाई अनुष्का..
मम्मी दौड़ी, पकड़- चुपाऊँ.
हाथ न लेकिन आई अनुष्का..
ठेंगा दिखा दूर से हँस दी .
मन भरमा भरमाई अनुष्का..
***
गीत:
सहज हो ले रे अरे मन !
*
मत विगत को सच समझ रे.
फिर न आगत से उलझ रे.
झूमकर ले आज को जी-
स्वप्न सच करले सुलझ रे.
प्रश्न मत कर, कौन बूझे?
उत्तरों से कौन जूझे?
भुलाकर संदेह, कर-
विश्वास का नित आचमन.
सहज हो ले रे अरे मन !
*
उत्तरों का क्या करेगा?
अनुत्तर पथ तू वरेगा?
फूल-फलकर जब झुकेगा-
धरा से मिलने झरेगा.
बने मिटकर, मिटे बनकर.
तने झुककर, झुके तनकर.
तितलियाँ-कलियाँ हँसे,
ऋतुराज का हो आगमन.
सहज हो ले रे अरे मन !
*
स्वेद-सीकर से नहा ले.
सरलता सलिला बहा ले.
दिखावे के वसन मैले-
धो-सुखा, फैला-तहा ले.
जो पराया वही अपना.
सच दिखे जो वही सपना.
फेंक नपना जड़ जगत का-
चित करे सत आकलन.
सहज हो ले रे अरे मन !
*
सारिका-शुक श्वास-आसें.
देह पिंजरा घेर-फांसे.
गेह है यह नहीं तेरा-
नेह-नाते मधुर झाँसे.
भग्न मंदिर का पुजारी
आरती-पूजा बिसारी.
भारती के चरण धो, कर
निज नियति का आसवन.
सहज हो ले रे अरे मन !
*
कैक्टस सी मान्यताएँ.
शूल कलियों को चुभाएँ.
फूल भरते मौन आहें-
तितलियाँ नाचें-लुभाएँ.
चेतना तेरी न हुलसी.
क्यों न कर ले माल-तुलसी?
व्याल मस्तक पर तिलक है-
काल का है आ-गमन.
सहज हो ले रे अरे मन !
१२-१०-२०१०
***

गुरुवार, 13 अगस्त 2026

अगस्त १३, लेफ्ट हैंडर्स डे, केतकी, सोरठे, महासंस्कारी छंद, नवगीत, फिरोज गाँधी, संसद भवन, हास्य

सलिल सृजन अगस्त १३
लेफ्ट हैंडर्स डे
*
पूर्णिका
आईना
०
बोलता सच आईना
खोलता सच आईना
.
बिका जबसे मीडिया
तोलता सच आईना
.
हाय! संसद में न अब
ढोलता सच आईना
.
सलिल-जनमत में सतत
घोलता सच आईना
१३.८.२०२५
०००
पूर्णिका
०
छप्पर है पानी पानी
भू-चूनर धानी-धानी
.
आसमान खैरात लिए
बादल गरजे बन दानी
.
नदी समंदर में फेंके
पाया जल सचमुच मानी
.
पवन बिजुरिया को छेड़े
कहे- जान, दिलवर जानी
.
लिव इन, लव जिहाद घातक
रहो दूर तितली रानी
.
चंपा और चमेली ने
शादी करने की ठानी
.
फुलबगिया अपनी सुंदर
कली कली है लासानी
.
सावन-फागुन दीवाली
बिना 'सलिल' है बेमानी
.
बागबान गुल गुलशन का
नाता नाजुक अरमानी
१३.८.२०२५
०००
पूर्णिका
मन मंदिर में प्रेम
बसे तभी हो क्षेम
.
कोशिश कर अनवरत
जब तक मिले न एम
.
जग काजल का कक्ष
बच हो नहीं डिफेम
.
शेष न जब धन-देह
हो तब बुक अरु फेम
.
बने हार भी जीत
'सलिल' न छोड़ो गेम
०००
षट्पदी
सामना
.
मैके से लाली लौटी तो, सुन लालू का लाफ
कारण पूछा तो कहे लालू- 'करना माफ
कहता ट्रुथ होना नहीं तुम मुझसे नाराज़
कहा गुरू जी ने यही, प्रवचन में था आज
सिर चढ़ जाए मुसीबत तो मत डरकर भाग
हँसी-खुशी कर सामना, पग पर रखकर पाग।।
०००
केतकी पर सोरठे
०
हुई केतकी दीन, शिव से मिथ्या वचन कह।
थी मन-वृत्ति मलीन, पछताई भी शाप पा।।
.
श्वेत-पीत अभिराम, कोमल पात हरे हरे।
जपती हरि का नाम, सुरभि बिखेरे दूर तक।।
.
कहें गवाही झूठ, जो वे यह भी जान लें।
किस्मत जाती रूठ, मिलता है अभिशाप भी।।
.
जड़-पत्तों से आप, बना चटाई-टोकनी।
सकें जगत में व्याप, हस्त शिल्प से ख्याति पा।।
.
फुलबगिया में बैठ, जुही-केतकी सहेली।
कह मुकरी में पैठ रोज बूझतीं पहेली।।
.
लव-जिहाद तूफान,
हुई केतकी भीत है।
कोई न ले ले मान, बली बने तब जीत है।।
.
रंग-जाति शैतान, रिपु दहेज दानव मुआ।
लिए ले रहा जान, दिखा केतकी को कुँआ।।
.
१२.८.२०२५
०००
इतिहास
धोया गया संसद भवन
मुहूर्त निकाल तय किया था आजादी का दिन|
हमारे संविधान के निर्माण में २ साल ११ महीने १८ दिन का समय लगा। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को संविधान निर्माता कहलाने का गौरव प्राप्त है। डॉ. वे संविधान सभा के अध्यक्ष थे। संविधान के विविध पहलू पर अध्ययन और अनुश्ंसाओं हेतु कई समिति थीं। भीमराव अंबेडकर संविधान बनाने वाली प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे जिसमें कुल ७ सदस्य थे।
१९४७ में जब यह तय हो गया कि अंग्रेज भारत छोडऩे के लिए तैयार हैं, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने गोस्वामी गणेशदत्त महाराज के माध्यम से उज्जैन के पंडित सूर्यनारायण व्यास को बुलावा भेजा। पंडित व्यास ने पंचांग देखकर बताया कि आजादी के लिए सिर्फ दो ही दिन शुभ हैं। १४ और १५ अगस्त। इसमें एक दिन पाकिस्तान को आजाद घोषित किया जा सकता है और एक दिन भारत को। उन्होंने डॉ. प्रसाद को भारत की आजादी के लिए मध्यरात्रि १२ बजे यानी स्थिर लग्न नक्षत्र का समय सुझाया। ताकि देश में लोकतंत्र स्थिर रहे। डॉ. राजेंद्र प्रसाद के आग्रह पर उन्होंने बताया कि अगर आजादी १५ अगस्त १९४ की मध्यरात्रि १२ बजे ली गई तो हमारा गणतंत्र अमर रहेगा, १९९० के बाद से देश की तरक्की होगी और २०२० तक भारत विश्व का सिरमौर बन जाएगा। इतना ही नहीं पंडित व्यास के कहने पर आजादी के बाद देर रात संसद को धोया भी गया था। क्योंकि ब्रिटिश शासकों के बाद अब यहां भारतीय बैठने वाले थे। धोने के बाद उनके बताए मुहूर्त पर गोस्वामी गिरधारीलाल ने संसद की शुद्धि करवाई थी। इसके बाद से चाहे शनि की दशा में देश को आजादी मिली, देश के टुकड़े हो गए, केतु की महादशा में देश भुखमरी और तंगहाली से गुजरा। मगर १९९० में शुक्र की महादशा शुरू होने के बाद देश की तरक्की भी शुरू हो गई।
पंडित सूर्यनारायण व्यास के पुत्र राजशेखर ने उनके जीवन और उनकी भविष्यवाणियों पर एक किताब लिखी है। 'याद आते हैं 'शीर्षक वाली इस किताब के ३४ वें 'अध्याय ज्योतिष जगत के सूर्य (पृष्ठ क्रमांक १९७-१९८) में आजादी के दिन के मुहूर्त का उल्लेख किया गया है। राजशेखर ने इस अध्याय में अपने पिता की अन्य भविष्यवाणियों का भी जिक्र किया है। सांदीपनी ऋषि के वंशज महान ज्योतिषाचार्य, लेखक, पत्रकार, पंडित सूर्यनारायण व्यास थे। उनका जन्म २ मार्च १९९ को हुआ था।
भविष्यवाणियां याँ सच निकली - लालबहादुर शास्त्री के ताशकंद जाने से पहले सूर्यनारायण व्यास ने एक लेख में इस बात का उल्लेख कर दिया था कि वे जीवित नहीं लौटेंगे। उन तक यह खबर पहुंची भी लेकिन उन्होंने इसे हँसकर टाल दिया। बाद में भविष्यवाणी सच साबित हुई। ७ दिसंबर १९५० को एक अखबार में उन्होंने लिखा कि उपप्रधानमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल का स्वास्थ्य अत्यंत चिंताजनक हो सकता है। १७ दिसंबर तक उनके लिए कठिन समय रहेगा। आखिर १६ दिसंबर की अर्ध रात्रि को सरदार पटेल दिवंगत हो गए। इससे पहले १९३२ में उन्होंने एक अंग्रेजी अखबार में भूकंप पर एक लेख लिखा था। फिर एक पत्र लिखकर आने वाले ३०० भूकंपों की सूची प्रकाशित करवा दी। समय के साथ-साथ ये भी सही साबित होती जा रही है। यह पत्र और अखबार सुरक्षित हैं। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू, राजेन्द्र प्रसाद और महात्मा गाँधी के बारे में भी कई सटीक भविष्यवाणियाँ काफी पहले ही कर दी थीं।
***
भ्रष्टाचार के विरुद्ध खड़े होते थे फिरोज गाँधी
*
परिवार से जुड़े होने के बावजूद अपनी अलग पहचान रखने के कायल फिरोज गांधी को एक ऐसे नेता और सांसद के रूप में याद किया जाता है जो हमेशा स्वच्छ सामाजिक जीवन के पैरोकार रहे और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करते रहे। फिरोज के समकालीन लोगों का कहना है कि वह भले ही संसद में कम बोलते रहे लेकिन वे बहुत अच्छे वक्ता थे और जब भी किसी विषय पर बोलते थे तो पूरा सदन उनको ध्यान से सुनता था। उन्होंने कई कंपनियों के राष्ट्रीयकरण का भी अभियान चलाया था।
फिरोज गाँधी अपने दौर के एक कुशल सांसद के रूप में जाने जाते थे। फिरोज इलाहाबाद के रहने वाले थे और आज भी लोग उनकी पुण्यतिथि के दिन उनकी मजार पर जुटते हैं और उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है। दिल्ली में मृत्यु के बाद फिरोज गांधी की अस्थियों को इलाहाबाद लाया गया था और पारसी धर्म के रिवाजों के अनुसार वहां उनकी मजार बनाई गई।
फिरोज गाँधी अच्छे खानपान के बेहद शौकीन थे। इलाहाबाद में फिरोज को जब भी फुर्सत मिलती थी वह लोकनाथ की गली में जाकर कचौड़ी तथा अन्य लजीज व्यंजन खाना पसंद करते थे। इसके अलावा हर आदमी से खुले दिल से मिलते थे। फिरोज गांधी का जन्म १२ अगस्त १९१२ को मुंबई के एक पारसी परिवार में हुआ था। बाद में वह इलाहाबाद आ गए और उन्होंने एंग्लो वर्नाकुलर हाई स्कूल और इवनिंग क्रिश्चियन कालेज से पढ़ाई की। पढ़ाई के दौरान ही उनकी जान पहचान नेहरू परिवार से हुई। शिक्षा के लिए फिरोज बाद में लंदन स्कूल आफ इकोनामिक्स चले गये।
इंग्लैंड में पढ़ाई के दौरान फिरोज और इंदिरा गांधी के बीच घनिष्ठता बढ़ी। इसी दौरान कमला नेहरू के बीमार पड़ने पर वह स्विट्जरलैंड चले गये। कमला नेहरू के आखिरी दिनों तक वह इंदिरा के साथ वहीं रहे। फिरोज बाद में पढ़ाई छोड़कर वापस आ गए और मार्च 1942 में उन्होंने इंदिरा गांधी से हिन्दू रीति रिवाजों के अनुसार विवाह कर लिया। विवाह के मात्र छह महीने बाद भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान दंपत्ति को गिरफ्तार कर लिया गया। फिरोज को इलाहाबाद के नैनी जेल में एक साल कारावास में बिताना पड़ा। आजादी के बाद फिरोज नेशनल हेरल्ड समाचार पत्र के प्रबंध निदेशक बन गये। पहले लोकसभा चुनाव में वह रायबरेली से जीते। उन्होंने दूसरा लोकसभा चुनाव भी इसी संसदीय क्षेत्र से जीता। संसद में उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ कई मामले उठाये जिनमें मूंदड़ा मामला प्रमुख था। फिरोज गांधी का निधन ८ सितंबर १९६० को दिल्ली में दिल का दौरा पड़ने से हुआ।
***
दोहा सलिला
मित्र
*
निधि जीवन की मित्रता, करे सुखी-संपन्न
मित्र न जिसको मिल सके, उस सा कौन विपन्न.
*
सबसे अधिक गरीब वह, मिला न जिसको मित्र
गुल गुलाब जिससे नहीं, बन सकता हो इत्र
*
बिना स्वार्थ संबंध है, मन से मन का मित्र
मित्र न हो तो ज़िंदगी, बिना रंग का चित्र
१३-८-२०२०
***
नवगीत:
*
हल्ला-गुल्ला
शोर-शराबा
*
जंगल में
जनतंत्र आ गया
पशु खुश हैं
मन-मंत्र भा गया
गुराएँ-चीखें-रम्भाएँ
काँव-काँव का
यंत्र भा गया
कपटी गीदड़
पूजता बाबा
हल्ला-गुल्ला
शोर-शराबा
*
शतुरमुर्ग-गर्दभ
हैं प्रतिनिधि
स्वार्थ साधते
गेंडे हर विधि
शूकर संविधान
परिषद में
गिद्ध रखें
परदेश में निधि
पापी जाते
काशी-काबा
हल्ला-गुल्ला
शोर-शराबा
*
मानुष कैट-वाक्
करते हैं
भौंक-झपट
लड़ते-भिड़ते हैं
खुद कानून
बनाकर-तोड़ें
कुचल निबल
मातम करते हैं
मिटी रसोई
बसते ढाबा
हल्ला-गुल्ला
शोर-शराबा
***
मुक्तक
*
मापनी: २१२११ १२१११ २११
छंद: महासंस्कारी
बह्र: फाइलातुन मुफाईलुन फैलुन
*
रोकना मत, चले सदन संसद
चेतना झट, अगर रुके संसद
स्वार्थ साधन करें सतत जो दल
छोड़ना मत, गति भटक संसद
*
लीडरों! फिर बबाल करना मत
जो हुआ, अब धमाल करना मत
लोक का दुःख नहीं तनिक भी कम
शोक का इंतिज़ाम करना मत
*
पंडितों! तनिक राम भजिए अब
लोभ-लालच हराम तजिए अब
अस्थियाँ धरम की करम में लख
भूत-भावन सदृश्य सजिए अब
***
एक दोहा
बाप, बाप के है सलिल, बच्चे कम मत मान
वे तुझसे आगे बहुत, खुद पर कर न गुमान
१३-८-२०१५

सोमवार, 13 जुलाई 2026

जुलाई १३, शिला दिवस, सोरठे, सॉनेट, गुरु, सवैया, भाषा, कुंडलिया, हाइकु, पोयम, शिव, शक्ति

सलिल सृजन जुलाई १३
शिला दिवस
*
ग़ज़लिका . भोर भई रे! बदरी छाई। धरा-सूर्य की भइ कुड़माई।। . नखरेबारी बिजुरी नच रइ बदरा ने ढोलकी बजाई।। . सज-धज दादुर बनें बराती हरियाली कर रई पहुनाई।। . दरवज्जे पे ठांड़ी ऊसा हुलस उमग जी भर मुसकाई।। . पवन ससुर बाँटत नजराना सुनत बेड़ी तुरतइ धाई १३.७.२०२६ ०००
सोरठे
हृदय लिली के नाम, जब से किया गुलाब ने।
खुशियों के पैगाम, तबसे नित मिलने लगे।।
.
चैनो-अमन हराम, रजनीगंधा ने किया।
मुफ्त हुआ बदनाम, अमलतास बाजार में।।
.
कान पकड़ गुलफाम, माफी माँगे रात-दिन।
कर दी नींद हराम, नागफनी ने धौंस दे।।
.
करती काम तमाम, शौहर का दे सुपारी।
सबकी नींद हराम, कर दी गाजर घास ने।।
.
हुए विधाता वाम, भाग गई घर छोड़कर।
डुबा दिया कुलनाम, लिव इन में जा जुही ने।।
.
हाथ गैर का थाम, ठगी जा रही चमेली।
रुचा नहीं गृह-धाम, डायवोर्स खुश रही ले।
.
हैरां खासो-आम, हवा बदलती देखकर।
बहुएँ नींद हराम, करें ननदियां सांस की ।।
१२.७.२०२५
०0०
श, ष, स भेद , उच्चारण स्थान
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श ष स के उच्चारण भेद को बहुधा लोग नहीं जानते, यदि जानते भी होंगे तो जानबूझ त्रुटि करते हैं अथवा स्वाभविक सुगमतावश गलत उच्चारण होता है। संस्कृत ही एक मात्र व्यवस्थित जिसका विज्ञानपरक व्याकरण को समूचा विश्व अपनी आवश्यकतानुकूल ग्रहण कर रहा है। हमें समझना होगा उच्चारण स्थान को -
1 अकुहविसर्जनीयानां कण्ठः
क वर्ग (क, ख, ग, घ, ङ) अ, आ, ह और विसर्ग का उच्चारण स्थान कण्ठ है।
2 इचुयशानां तालुः
च वर्ग (च, छ, ज, झ, ´) इ, ई, य, श का उच्चारण स्थान तालु है। इसी आधार पर श के तालव्यी होने की पहचान सर्व विदित है।
3 ऋटुरषानां मूर्घाः
ट वर्ग (ट, ठ, ड, ढ, ण) ऋ, र, ष का उच्चारण स्थान मूर्धा है। इसी आधार पर ष के मूर्धन्नी होने की पहचान सर्व विदित है।
4 लृतुलसानां दन्तः
त वर्ग (त, थ, द, ध, ना) लृ, ल, स का उच्चारण स्थान दंत है। इसी आधार पर स के दन्ती होने की पहचान सर्व विदित है।
5 उपूपध्मानीयानामोष्ठौ
प वर्ग (प, फ, ब, भ, म) )( उ, ऊ का उच्चारण स्थान ओष्ठ है।
तालव्यी, मूर्धन्नी, दन्ती रूपी पहचान ही श,ष,स के भेद को प्रकट करती है। च वर्ग के फ्लो में जीभ का तालु से स्पर्श होते हुए निकलने वाली शकार ध्वनि तालव्यी है। टवर्ग के फ्लो में मुंह के खुलने से निकलने वाली षकार ध्वनि मूर्धन्नी है, जबकि त वर्ग के फ्लो में दंतपंक्तियों के परस्पर मिलने से होने वाली सकार ध्वनि दन्ती है।
*
सॉनेट
गट्टू
•
नटखट-चंचल है गट्टू,
करे शरारत जी भरकर,
सीधा-साधा है बिट्टू,
रहे मस्त पुस्तक पढ़कर।
तुहिना जीजी के प्यारे,
भैया सनी लड़ाते लाड़,
दादी के चंदा-तारे,
बब्बा करते जान निसार।
शैंकी जी को दुलराते,
धमाचौकड़ी करते खूब,
मिल चिंकी को दुलराते,
हिल-मिल रहें स्नेह में डूब।
खड़ी करें मिल सबकी खाट।
एक एक से बढ़कर ठाठ।।
१३-७-२०२३
•••
सॉनेट
•
प्राण निकलते गर्मी से, नवगीतों में गाया,
धरती की छाती फटती, सुन इंद्र देव पिघले,
झुलस रहा लू से तन-मन, सूरज को गरियाया,
रूठा छिपा मेघ पीछे, बोला जी भर जल ले।
हुई मूसलाधार वृष्टि, हो कुपित गिरी बिजली,
वन काटे रूठे पर्वत, हो गीले फिसल गिरे,
कर विनाश कहकर विकास, हँस राजनीति पगली,
अच्छे सोच बुरे दिन पा, जुमलों से लोग घिरे।
पानी मरा आँख का तो, तू पानी-पानी हो,
रौंद प्रकृति को ठठा रहा, पानी आँखों में भर,
भोग कर्म का दंड न अब, तुझसे नादानी हो,
हाय हाय क्यों करता है, गलती करने से डर।
गीत खुशी के मत बिसरा, गा बंबुलिया कजरी।
पूज प्रकृति को सुत सम तब देखे हालत सुधरी।।
१३-७-२०२३
•••
सॉनेट
गुरु
•
गुरु को नतशिर नमन करो रे!
गुरु की महिमा कही न जाए
गुरु ही नैया पार लगाए
गुरु पग रज पा अमन वरो रे!
गुरु वचनामृत पान करो रे!
गुरु शब्दों में सत्य समाहित
गुरु वाणी में अर्थ विराजित
गुरु का महिमा-गान करो रे!
गुरु का मन में मान करो रे!
गुरु-दर्पण में निज छवि देखो
गुरु-परखे तो निज सच लेखो
गुर-वचनों का ध्यान धरो रे!
गुरु को सत्-शिव सुंदर मानो
गुरु का खुद को चाकर मानो
१३-७-२०२२
रुद्राक्ष, गुलमोहर, भोपाल
•••
सॉनेट
गुरु
•
गुरु गुर सिखलाता है उत्तम
दिखलाता है राह हमेशा
हरता है अज्ञानजनित तम
दिलवाता है वाह हमेशा
लेता है गुरु कड़ी परीक्षा
ठोंक-पीटकर खोट निकाले
देता केवल तब ही दीक्षा
दीप-ज्योति अंतर में बाले
कहे दीप अपना खुद होओ
गिरकर रुको न, उठ फिर भागो
तम पी, उजियारा बो जाओ
खुद समर्थ हो भीख न माँगो
गुरु-वंदन कर शिष्य तर सके
अपनी मंजिल आप वर सके
१३-७-२०२२
रुद्राक्ष, गुलमोहर, भोपाल
•••
नवान्वेषित द्वि इंद्रवज्रा सवैया
२ x (त त ज ग ग), २२ वर्ण, सम पदांत।
*
दूरी मिटा दे मिल ले गले आ, श्वासें करेंगी मनुहार तेरा।
आँखें मिलीं तो हट ही न पाई, आसें बनेंगी गलहार तेरा।
तू-मैं किनारे नद के भले हों, है सेतु प्यारी शुभ प्यार तेरा।
पूरा करेंगे हम वायदों को, जीना मुझे है बन हार तेरा।
१३-७-२०१९
***
भाषा व्याकरण
*
*ध्वनि*
कान सुन रहे वह ध्वनि, जो प्रकृति में व्याप्त।
अनहद ध्वनि गुंजरित है, सकल सृष्टि में आप्त।।
*
*रसानुभूति*
ध्वनि सुनकर प्रतिक्रिया हो, सुख-दुख की अनुभूति।
रस अनुभूति सजीव को, जड़ को हो न प्रतीति।।
*
*उच्चार*
जो स्वतंत्र ध्वनि बोलते, वह ही है उच्चार।
दो प्रकार लघु-गुरु कहें, इनको मात्रा भार।।
*
*अर्थ*
ध्वनि सुनकर जो समझते, उसको कहते अर्थ।
अगर न उसका भान तो, बनता अर्थ अनर्थ।।
*
*सार्थक ध्वनि*
कलकल कलरव रुदन में, होता निश्चित अर्थ।
शेर देख कपि हूकता, दे संकेत न व्यर्थ।।
*
*निरर्थक ध्वनि*
अंधड़ या बरसात में, अर्थ न लेकिन शोर।
निरुद्देश्य ध्वनि है यही, मंद या कि रव घोर।।
*
*सार्थक ध्वनि*
सार्थक ध्वनियाँ कह-सुनें, जब हम बारंबार।
भाव-अर्थ कह-समझते, भाषा हो साकार।।
*
*भाषा*
भाषा वाहक भाव की, मेटे अर्थ अभाव।
कहें-गहें हम बात निज, पड़ता अधिक प्रभाव।।
*
*लिपि*
जब ध्वनि को अंकित करें देकर चिन्ह विशेष।
चिन्ह देख ध्वनि विदित हो, लिपि विग्यान अशेष।।
*
*अक्षर*
जो घटता-कमता नहीं,
ऐसा ध्वनि-संकेत।
अक्षर अथवा वर्ण से,
यही अर्थ अभिप्रेत।।
*
*मात्रा*
लघु-गुरु दो उच्चार ही, लघु-गुरु मात्रा मीत।
नीर-क्षीर वत वर्ण से, मिल हों एक सुनीत।।
*
*वर्ण माला*
अक्षर मात्रा समुच्चय, रखें व्यवस्थित आप।
लिख-पढ़ सकते हैं सभी, रखें याद कर जाप।।
*
*शब्द*
वर्ण जुड़ें तो अर्थ का, और अधिक हो भान।
अक्षर जुड़कर शब्द हों, लक्ष्य एकता जान।।
*
*रस*
स्वाद भोज्य का सार है, गंध सुमन का सार।
रस कविता का सार है, नीरस बेरस खार।।
*
*रस महिमा*
गो-रस मधु-रस आम्र-रस,
गन्ना रस कर पान।
जौ-रस अंगूरी चढ़़े, सिर पर बच मतिमान।।
.
बतरस, गपरस दे मजा, नेतागण अनजान।
निंदारस में लीन हों, कभी नहीं गुणवान।।
.
पी लबरस प्रेमी हुए, धन्य कभी कुर्बान।
संजीवित कर काव्य-रस, फूँके सबमें प्राण।।
*
*अलंकार*
पत्र-पुष्प हरितिमा है, वसुधा का श्रृंगार।
शील मनुज का; शौर्य है, वीरों का आचार।।
.
आभूषण प्रिय नारियाँ, चला रहीं संसार।
गह ना गहना मात्र ही, गहना भाव उदार।।
.
शब्द भाव रस बिंब लय, अर्थ बिना बेकार।
काव्य कामिनी पा रही, अलंकार सज प्यार।।
.
शब्द-अर्थ संयोग से, अलंकार साकार।
मम कलियों का मोहकर, हरे चित्त हर बार।।
*
*ध्वनि खंड*
कुछ सार्थक उच्चार मिल, बनते हैं ध्वनि खंड।
ध्वनि-खंडों के मिलन से, बनते छंद अखंड।।
*
*छंद*
कथ्य भाव रस बिंब लय, यति पदांत मिल संग।
अलंकार सज मन हरें, छंद अनगिनत रंग।।
*
*पिंगल*
वंदन पिंगल नाग ऋषि, मिला बीन फुँफकार।
छंद-शास्त्र नव रच दिया, वेद-पाद रस-सार।।
*
*पाद*
छंद-पाद हर पंक्ति है, पग-पग पढ़-बढ़ आप।
समझ मजा लें छंद का, रस जाता मन व्याप।।
*
*चरण*
चरण पंक्ति का भाग है, कदम-पैर संबंध।
द्वैत मिटा अद्वैत वर, करें सहज अनुबंध।।
*गण*
मिलें तीन उच्चार जब, तजकर लघु-गुरु भेद।
अठ गण बन मिल-जुल बनें, छंद मिटा दें खेद।।
.
यमत रजभ नस गण लगग, गगग गगल के बाद।
गलग लगल फिर गलल है, ललल ललग आबाद।।
*वाक्*
वाक् मूल है छंद का, ध्वनि-उच्चार स-अर्थ।
अर्थ रहित गठजोड़ से, रचना करे अनर्थ।।
*
*गति*
निर्झर-नीर-प्रवाह सम, तीव्र-मंद हो पाठ।
गति उच्चारों की सधे, कवि जनप्रियता हों ठाठ।।
.
कथ्य-भाव अनुरूप हो, वाक्-चढ़ाव-उतार।
समय कथ्य जन ग्राह्य हो, करतल गूँज अपार।।
*
*यति*
कुछ उच्चारों बाद हो, छंदों में ठहराव।
है यति इसको जानिए, यात्रा-मध्य पड़ाव।।
.
यति पर रुककर श्वास ले, पढ़िए लंबे छंद।
कवित-सवैया का बढ़े, और अधिक आनंद।।
.
श्वास न उखड़े आपकी, गति-यति लें यदि साध।
शुद्ध रखें उच्चार तो, मिट जाए हर व्याध।।
*
*उप यति*
दो विराम के मध्य में, निश्चित जो न विराम।
स्थिर न रहें- जो बदलते, उपरति उनका नाम।।
*
*विराम चिह्न*
मध्य-अंत में पाद के, यति संकेत-निशान।
रखता कवि पाठक सके, उनको झट पहचान।।
*
विस्मय संबोधन कहाँ, कहाँ प्रश्न संकेत।
कहाँ उद्धरण या कथन, चिन्हों का अभिप्रेत।।
१२-७-२०१९
***
एक रचना:
*
मन-वीणा पर चोट लगी जब,
तब झंकार हुई.
रिश्तों की तुरपाई करते
अँगुली चुभी सुई.
खून जरा सा सबने देखा
सिसक रहा दिल मौन?
आँसू बहा न व्यर्थ
पीर कब,
बाँट सका है कौन?
१३-७-२०१८
*
दोहा सलिल- रूप धूप का दिव्य
*
धूप रूप की खान है, रूप धूप का दिव्य।
छवि चिर-परिचित सनातन, पल-पल लगती नव्य।।
*
रश्मि-रथी की वंशजा, या भास्कर की दूत।
दिनकर-कर का तीर या, सूर्य-सखी यह पूत।।
*
उषा-सुता जग-तम हरे, घोर तिमिर को चीर।
करती खड़ी उजास की, नित अभेद्य प्राचीर।।
*
धूप-छटा पर मुग्ध हो, करते कलरव गान।
पंछी वाचिक काव्य रच, महिमा आप्त बखान।।
*
धूप ढले के पूर्व ही, कर लें अपने काम।
संध्या सँग आराम कुछ, निशा-अंक विश्राम।।
*
कलियों को सहला रही, बहला पत्ते-फूल।
फिक्र धूप-माँ कर रही, मलिन न कर दे धूल।।
*
भोर बालिका; यौवना, दुपहर; प्रौढ़ा शाम।
राग-द्वेष बिन विदा ले, रात धूप जप राम।।
*
धूप राधिका श्याम रवि, किरण गोपिका-गोप।
रास रचा निष्काम चित, करें काम का लोप।।
*
धूप विटामिन डी लुटा, कहती- रहो न म्लान।
सूर्य-़स्नान कर स्वस्थ्य हो, जीवन हो वरदान।।
*
सलिल-लहर सँग नाचती, मोद-मग्न हो धूप।
कभी बँधे भुजपाश में, बाँधे कभी अनूप।।
*
रूठ क्रोध के ताप से, अंशुमान हो तप्त।
जब तब सोनल धूप झट, हँस दे; गुस्सा लुप्त।।
*
आशुतोष को मोहकर, रहे मेघ ना मौन।
नेह-वृष्टि कर धूप ले, सँग-सँग रोके कौन।।
*
धूप पकाकर अन्न-फल, पुष्ट करे बेदाम।
अनासक्त कर कर्म वह, माँगे दाम न नाम।।
*
कभी न ब्यूटीपारलर, गई एक पल धूप।
जगती-सोती समय पर, पाती रूप अनूप।।
*
दिग्दिगंत तक टहलती, खा-सो रहे न आप।
क्रोध न कर; हँसती रहे, धूप न करे विलाप।।
१३-७-२०१८
***
कुंडलिया
*
विधान: एक दोहा + एक रोला
अ. २ x १३-११, ४ x ११-१३ = ६ पंक्तियाँ
आ. दोहा का आरंभिक शब्द या शब्द समूह रोला का अंतिम शब्द या शब्द समूह
इ. दोहा का अंतिम चरण, रोला का प्रथम चरण
*
परदे में छिप कर रहे, हम तेरा दीदार।
परदा ऐसा अनूठा, तू भी सके निहार।।
तू भी सके निहार, आह भर, देख हम हँसे।
हँसे न लेकिन फँसे, ह्रदय में शूल सम धँसे।।
मुझ पर मर, भर आह, न कहना कर में कर दे।
हो जा तू संजीव, हटाकर आ जा परदे।।
१४-७-२०१७
***
हाइकु सलिला
*
कल आएगा?
सोचना गलत है
जो करो आज।
*
लिखो हाइकु
कागज़-कलम ले
हर पल ही।
*
जिया में जिया
हर पल हाइकु
जिया ने रचा।
*
चाह कलम
मन का कागज़
भाव हाइकु।
*
शब्द अनंत
पढ़ो-सुनो, बटोरो
मित्र बनाओ।
*
शब्द संपदा
अनमोल मोती हैं
सदा सहेजो।
*
श्वास नदिया
आस नद-प्रवाह
प्रयास नौका।
*
ध्यान में ध्यान
ध्यान पर न ध्यान
तभी हो ध्यान।
*
मुक्ति की चाह
रोकती है हमेशा
मुक्ति की राह।
*
खुद से ऊब
कैसे पायेगा राह?
खुद में डूब।
***
एक कुण्डलिया
औकात
अमिताभ बच्चन-कुमार विश्वास प्रसंग
*
बच्चन जी से कर रहे, क्यों कुमार खिलवाड़?
अनाधिकार की चेष्टा, अच्छी पड़ी लताड़
अच्छी पड़ी लताड़, समझ औकात आ गयी?
क्षमायाचना कर न समझना बात भा गयी
रुपयों की भाषा न बोलते हैं सज्जन जी
बच्चे बन कर झुको, क्षमा कर दें बच्चन जी
१३-७-२०१७
***
मुक्तक
था सरोवर, रह गया पोखर महज क्यों आदमी?
जटिल क्यों?, मिलता नहीं है अब सहज क्यों आदमी?
काश हो तालाब शत-शत कमल शतदल खिल सकें-
आदमी से गले मिलकर 'सलिल' खुश हो आदमी।।
१३-७-२०१६
***
ॐ
पुस्तक सलिला-
स्व. श्याम़ श्रीवास्तव गीत-नवगीत ‘यादों की नागफनी’
आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
[पुस्तक परिचय- यादों की नागफनी, गीत संग्रह, स्व. श्याम़ श्रीवास्तव, प्रथम संस्करण २०१६, आकार २१.५ से.मी. x १४ से.मी., आवरण बहुरंगी पेपरबैक लेमिनेटेड, पृष्ठ ६२, मूल्य १५० रु., शैली प्रकाशन, २०सहज सदन, शुभम विहार, कस्तूरबा मार्ग, रतलाम, संपादन- डाॅ. सुमनलता श्रीवास्तव sumanshrivastava2003@yahoo.com ]
00000
‘यादों की नागफनी’सनातन सलिला नर्मदा के तट पर बसी संस्कारधानी जबलपुर के लाड़ले रचनाकार स्व. श्याम़ श्रीवास्तव की प्रतिनिधि रचनाओं का संकलन है जिसे उनके स्वजनों ने अथक प्रयास कर उनके ७५ वें जन्म दिवस पर प्रकाशित कर उनके सरस-सरल व्यक्तित्व को पुनः अपने बीच महसूसने का श्लाघ्य प्रयास किया। स्व. श्याम ने कभी खुद को कवि, गायक, गीतकार नहीं कहा या माना, वे तो अपनी अलमस्ती में लिखते - गाते रहे। आकाशवाणी ए ग्रेड कलाकार कहे या श्रोता उनके गीतों-नवगीतों पर वाह-वाह करें, उनके लिये रचनाकर्म हमेशा आत्मानंद प्राप्ति का माध्यम मा़त्र रहा। आत्म में परमात्म को तलाशता-महसूसता रचनाकार विधाओं और मानकों में बॅंधकर नहीं लिखता, उसके लिखे में कहाॅं-क्या बिना किसी प्रयास के आ गया यह उसके जाने के बाद देखा-परखा जाता है।
यादों की नागफनी में गीत-नवगीत, कविता तीेनों हैं। श्याम का अंदाज़े-बयाॅं अन्य समकालिकों से जुदा है-
‘‘आकर अॅंधेरे घर में / चौंका दिया न तुमने
मुझको अकेले घर में / मौका दिया न तुमने
तुम दूर हो या पास /क्यों फर्क नहीं पड़ता?
मैं तुमको गा रहा हूॅं / हूॅंका दिया न तुमने
‘जीवन इक कुरुक्षेत्र’ में श्याम खुद से ही संबोधित हैं- "जीवन / इक कुरुक्षेत्र है / मैं अकेला युद्ध लड़ रहा /अपने ही विरुद्ध लड़ रहा ......... शांति / अहिंसा क्षमा को त्याग / मुझमें मेरा बुद्ध लड़ रहा।"
यह बुद्ध आजीवन श्याम की ताकत भी रहा और कमजोरी भी। इसने उन्हें बड़े से बड़े आघात को चुपचाप सहने और बिल्कुल अपनों से मिले गरल को पीने में सक्षम बनांया तो अपने ‘स्व’ की अनदेखी करने की ओर प्रवृत्त किया। फलतः, जमाना ठगकर खुश होता रहा और श्याम ठगे जाकर।
श्याम के नवगीत किसी मानक विधान के मोहताज नहीं रहे। आनुभूतिक संप्रेषण को वरीयता देते हुए श्याम ‘कविता कोख में’ शीर्षक नवगीत में संभवतः अपनी और अपने बहाने हर कवि की रचना प्रक्रिया का उल्लेख करते हैं।
तुमने जब / समर्पण किया
धरती आसमान मुझे / हर जगह क्षितिज लगे।
छुअन - छुअन मनसिज लगे।
कविता आ गई कोख में।
वैचारिक लयता / उगी /मिटटी पगी
राग के बयानों की/भाषा जगी
छंद-छंद अलंकार- पोषित हुए
नव रसों को ले कूदी /चिंतन मृगी
सृष्टि का / अर्पण किया
जनपद की खान मुझे
समकालिक क्षण खनिज लगे।
कथ्य उकेरे स्याहीसोख में।
कविता आ गई कोख में।
श्याम के श्रृंगारपरक गीत सात्विकता के साथ-साथ सामीप्य की विरल अनुभूति कराते हैं। ‘नमाज़ी’शीर्षक नवगीत श्याम की अन्वेषी सोच का परिचायक है-
पूर्णिमा का चंद्रमा दिखा
विंध्याचल-सतपुड़ा से प्रण
पत्थरों से गोरे आचरण
नर्मदा का क्वांरापन नहा
खजुराहो हो गये हैं क्षण
सामने हो तुम कुरान सी
मैं नमाज़ी बिन पढ़ा-लिखा
‘बना-ठना गाॅंव’ में श्याम की आंचलिक सौंदर्य से अभिभूत हैं। उरदीला गोदना, माथे की लट बाली, अकरी की वेणी, मक्का सी मुस्कान, टिकुली सा फूलचना, सरसों की चुनरिया, अमारी का गोटा, धानी किनार, जुन्नारी पैजना, तिली कम फूल जैसे कर्णफूल, अरहर की झालर आदि सर्वथा मौलिक प्रतीक अपनी मिसाल आप हैं। समूचा परिदृश्य श्रोता/पाठक की आॅंखों के सामने झूलने लगता है।
गोरी सा / बना-ठना गाॅंव
उरदीला गोदना गाॅंव।
माथे लट गेहूॅं की बाली
अकरी ने वेणी सी ढाली,
मक्का मुस्कान भोली-भाली
टिकुली सा फूलचना गाॅंव।
सरसों की चूनरिया भारी
पल्लू में गोटा अमारी,
धानी-धानी रंग की किनारी
जुन्नारी पैंजना गाॅंव।
तिली फूल करनफूल सोहे
अरहर की झालर मन मोहे,
मोती अजवाइन के पोहे।
लौंगों सा खिला धना गाॅंव।
श्रेष्ठ-ज्येष्ठ गीतकार स्व, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ ने श्याम की रचनाओं को ‘विदग्ध, विलोलित, विभिन्न आयामों से गुजरती हुई अनुभूति के विरल क्षणों को समेटने में समर्थ, पौराणिक संदर्भों के साथ-साथ नई उदभावनाओं को सॅंजोने में समर्थ तथा भावना की आॅंच में ढली भाषा से संपन्न‘’ ठीक ही कहा है। किसी रचनाकार के महाप्रस्थान के आठ वर्ष पश्चात भी उसके सृजन को केंद्र में रखकर सारस्वत अनुष्ठान होना ही इस बात का परिचायक है कि उसका रचनाकर्म जन-मन में पैठने की सामथ्र्य रखता है। स्व. रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ के अनुसार ‘‘कवि का निश्छल सहज प्रसन्न मन अपनम कथ्य के प्रति आश्वस्त है और उसे अपनी निष्ठा पर विश्वास है। पुराने पौराणिक प्रतीकों की भक्ति तन्मयता को उसने अपनी रूपवर्णना और प्रमोक्तियों में नये रूप् में ढालकर उन्हें नयी अर्थवत्ता प्रदान की हैं।’’
श्याम के समकालीन चर्चित रचनाकारों सर्व श्री मोहन शशि, डाॅ. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’, संजीव वर्मा ‘सलिल’ की शब्दांजलियों से समृद्ध और श्रीमती पुष्पलता श्रीवास्तव, माधुरी श्रीवास्तव, मनोज श्रीवास्तव, रचना खरे तथा सुमनलता श्रीवास्तव की भावांजलियों से रससिक्त हुआ यह संग्रह नयी पीढ़ी के नवगीतकारों ही नहीं तथाकथित समीक्षकों और पुरोधाओं को नर्मदांचल के प्रतिनिधि गीतकार श्याम श्रीवास्तव के अवदान सें परिचित कराने का सत्प्रयास है जिसके लिये शैली निगम तथा मोहित श्रीवास्तव वास्तव में साधुवाद के पात्र हैं।
श्याम सामाजिक विसंगतियों पर आघात करने में भी पीछे नहीं हैं। "ये रामराजी किस्से / जनता की सुख-कथाएॅं / भूखे सुलाते बच्चों को / कब तलक सुनायें", "हम मुफलिस अपना पेट काट / पत्तल पर झरकर परस रहे", "गूँथी हुई पसीने से मजदूर की रोटी, पेट खाली लिये गीत गाता रहा" आदि अनेक रचनाएॅं इसकी साक्षी हैं।
तत्सम-तदभव शब्द प्रयोग की कला में कुशल श्याम श्रीवास्तव हिंदी, बुंदेली, उर्दू, अंग्रेजी के शब्दों को भाव-भंगिमाओं की टकसाल में ढालकर गीत, नवगीत, ग़ज़ल, कविता के खरे सिक्के लुटाते चले गये। समय आज ही नहीं, भविष्य में भी उनकी रचनाओं को दुहराकर आश्वस्ति की अनुभूति करता रहेगा।
***
मुक्तिका:
*
जिसे भी देखिये वो बात कर रहा प्रहार की
नहीं किसी को फ़िक्र तनिक है यहाँ सुधार की
सुबह से शाम चीखते ही रह गये न बात की
दूरदर्शनी बहस न आर की, न पार की
दक्षिणा लिये बिना टले न विप्र द्वार से
माँगता नगद न बात मानता उधार की
सियासती नुमाइशें दिखा रही विधायिका
नफरतों ने लीं वसूल कीमतें गुहार की
बाँध बनाने की योजना बना रहे हो तुम
ज़िक्र कर नहीं रहे हो तुम तनिक दरार की
***
1. Water
There is an ocean
In every drop of water.
Can you see it?
There is a life
In every drop of water
Can you live it?
There is a civilization
In every drop of water
Can you save it?
If not:
See by Heart and not through Eyes
You will certainly notice that
There is Past
There is Present
There is Future
There is Culture
In every drop of water.
If You will forget Heart
And will see through Eyes
You will say with fear that
There is flood
There is death
There is an end.
It depend upon you
What do you want to see?
Try to be neat, clean and
Transparent as Water.
Then only You will be
Able to witness
Water in it's reality & totality.
***
विमर्श
शिव, शक्ति और सृष्टि
सृष्टि रचना के सम्बन्ध में भारतीय दर्शन में वर्णित एक दृष्टान्त के अनुसार शिव निद्रालीन थे. शिव के साथ क्रीड़ा (नृत्य) करने की इच्छा लिये शक्ति ने उन्हें जाग्रत किया. आरंभ में शिव नहीं जागे किन्तु शक्ति के सतत प्रयास करने पर उग्र रूप में गरजते हुए क्रोध में जाग्रत हुए. इस कारण उन्हें रूद्र (अनंत, क्रोधी, महाकाल, उग्ररेता, भयंकर, क्रंदन करने वाला) नाम मिला। शिव ने शक्ति को देखा, वह शक्ति पर मोहित हो उठ खड़े हुए. शक्ति के प्रेम के कारण वे शांत होते गये. उन्होंने दीर्घवृत्ताभ (इलिप्सॉइड) का रूप लिया जिसे लिंग (स्वगुण, स्वभाव, विशेषता, रूप) कहा गया.
शिव कोई सशरीर मानव या प्राणी नहीं हैं. शिव का अर्थ है निर्गुण, गुणातीत, अक्षर, अजर, अमर, अजन्मा, अचल, अज्ञेय, अथाह, अव्यक्त, महाकाल, अकर्ता आदि. शिव सृष्टि-कर्ता भी हैं. शक्ति सामान्य ताकत या बल नहीं हैं. शक्ति का अर्थ आवेग, ऊर्जा, ओज, प्राण, प्रणोदन, फ़ोर्स, एनर्जी, थ्रस्ट, त्रिगुणा, माया, प्रकृति, कारण आदि है. शिव अर्थात “वह जो है ही नहीं”। जो सुप्त है वह होकर भी नहीं होता। शिव को हमेशा श्याम बताया गया है. निद्रावस्था को श्याम तथा जागरण को श्वेत या उजला कहकर व्यक्त किया जाता है.
शक्ति के उपासकों को शाक्त कहा जाता है. इस मत में ईश्वर की कल्पना स्त्री रूप में कर उसे शक्ति कहा गया है. शक्ति के आनंदभैरवी, महाभैरवी, त्रिपुरसुंदरी, ललिता आदि नाम भी हैं.
विज्ञान सृष्टि निर्माण के कारक को बिग-बैंग कहता है और भारतीय दर्शन शिव-शक्ति का मिलन. विज्ञान के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति के पीछे डार्क मैटर और डार्क इनर्जी की भूमिका है. योग और दर्शन के अनुसार डार्क मैटर (शिव) और डार्क एनर्जी (महाकाली) का मिलन ही सृष्टि-उत्पत्ति का कारण है. स्कॉटिश यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के अनुसार डार्क मैटर और डार्क एनर्जी के बीच संबंध (लिंक) है. पहले वे इन्हें भिन्न मानते थे अब अभिन्न कहते हैं. विज्ञान के अनुसार डार्क मैटर और डार्क इनर्जी के मिलन से एक विस्फोट नहीं विस्फोटों की श्रृंखला उत्पन्न होती है. क्या यह विस्फोट श्रंखला जागकर क्रुद्ध हुए शिव के हुंकारों की ध्वनि है?
वैज्ञानिकों के अनुसार आरम्भ में समूची सृष्टि दीर्घवृत्ताभ आकार के विशाल गैस पिंड के रूप में गर्जना कर रही थी. धीरे-धीरे वह गैसीय पिंड ठंडा होता गया. शीतल होने की प्रक्रिया के कारण इस जगत की रचना हुई. योग कहता है कि जब शक्ति ने शिव को जगा दिया तो वह गुस्से में दहाड़ते हुए उठे। वह कुछ समय के लिये रूद्र बन गये थे. शक्ति को देखकर उनका गुस्सा ठंडा हुआ. शक्ति पर मोहित होकर वह दीर्घवृत्ताभ बन गये, जिसे लिंग कहा गया.
वैज्ञानिक बड़ा धमाकों के बाद की स्थिति एक खंभे की तरह बताते हैं, जिसमें ऊपर के सिरे पर छोटे-छोटे मशरूम लगे हैं. यह ठीक वैसा है जैसा योग-विद्या में बताया गया है. सृष्टि दीर्घवृत्त के आकार में है, जो ऊष्मा, गैसों के फैलाव और संकुचन तथा उनके द्रव्यमान की सघनता पर निर्भर है. इसका ज्यादातर हिस्सा खाली है जिसमें द्रव्य कण, तारे, ग्रह और आकाशीय पिंड बिखरे हुए हैं। सम्भवत:ज्यादातर चीजें अब तक आकार नहीं ले सकी हैं।
विज्ञान जो बात अब समझा है, उसे दर्शन बहुत पहले समझा चुका था। यह शरीर भी वैसे ही है, जैसे कि यह संपूर्ण सृष्टि। पेड़ के तने में बने छल्लों से पेड़ के जीवन-काल में धरती पर घटित हर घटना का ज्ञान हो सकता है. मानव शरीर में अन्तर्निहित ऊर्जा से साक्षात हो सके तो ब्रह्मांड के जन्म और विकास की झाँकी अपने भीतर ही मिल सकती है।
संदर्भ:
१. हिंदी साहित्य कोष, सं. डॉ. धीरेन्द्र वर्मा, डॉ. ब्रजेश्वर वर्मा, डॉ. धर्मवीर भारती, श्री रामस्वरूप चतुर्वेदी, डॉ. रघुवंश
२. बृहत् हिंदी कोष सं. कलिका प्रसाद, राजवल्लभ सहाय, मुकुन्दीलाल श्रीवास्तव
३. समान्तर कोष, अरविन्द कुमार, कुसुम कुमार,
१३-७-२०१५
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गीतः
सुग्गा बोलो
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सुग्गा बोलो
जय सिया राम...
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काने कौए कुर्सी को
पकड़ सयाने बन बैठे
भूल गये रुकना-झुकना
देख आईना हँस एँठे
खिसकी पाँव तले धरती
नाम हुआ बेहद बदनाम...
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मोहन ने फिर व्यूह रचा
किया पार्थ ने शर-सन्धान
कौरव हुए धराशायी
जनगण सिद्‍ध हुआ मतिमान
खुश मत हो, सच याद रखो
जन-हित बिन होगे गुमनाम...
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हर चूल्हे में आग जले
गौ-भिक्षुक रोटी पाये
सांझ-सकारे गली-गली
दाता की जय-जय गाये
मौका पाये काबलियत
मेहनत पाये अपना दाम...
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गीत:
हम मिले…
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हम मिले बिछुड़ने को
कहा-सुना माफ़ करो...
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पल भर ही साथ रहे
हाथों में हाथ रहे.
फूल शूल धूल लिये-
पग-तल में पाथ रहे
गिरे, उठे, सँभल बढ़े
उन्नत माथ रहे
गैरों से चाहो क्योँ?
खुद ही इन्साफ करो...
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दूर देश से आया
दूर देश में आया
अपनों सा अपनापन
औरों में है पाया
क्षर ने अक्षर पूजा
अक्षर ने क्षर गाया
का खा गा, ए बी सी
सीन अलिफ काफ़ करो…
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नर्मदा मचलती है
गोमती सिहरती है
बाँहों में बाँह लिये
चाह जब ठिठकती है
डाह तब फिसलती है
वाह तब सँभलती है
लहर-लहर घहर-घहर
कहे नदी साफ़ करो...
१३-७-२०१४
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एक कविता:
सीखते संज्ञा रहे...
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सीख पाए हम न संज्ञा.
बन न पाए सर्वनाम.
क्रिया कैसी?
क्या विशेषण?
कहाँ है कर्ता अनाम?
कर न पाए
साधना हम
वंदना ना प्रार्थना.
किरण आशा की लिये
करते रहे शब्द-अर्चना.
साथ सुषमा को लिये
पुष्पा रहे रचना कमल.
प्रेरणा देती रहें
नित भावनाएँ नित नवल.
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१३-७-२०११