कुल पेज दृश्य

घनाक्षरी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
घनाक्षरी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 10 मार्च 2026

मार्च १०, भारत, कहमुकरी, कहावत- कथा, कुण्डलिया, घनाक्षरी, दोहा, ग़ज़लिका

 सलिल सृजन मार्च १०

*
ग़ज़लिका १ . खोटे भीतर, बाहर सिक्के खरे-खरे देख रहे हम हक्के-बक्के डरे-डरे . हरियाली गायब है, कोंपल पीपल की आँख मूँदकर देख रही है झरे-झरे . मुँह में राम, बगल में छूरी पंडज्जी ताक रहे जजमान, जाप कर हरे-हरे . थोथा चना घना बाजे नित संसद में खाली पेट कटोरे बोले- 'भरे-भरे' . रपट पड़े कह हर-हर गंगे स्नान करो मत पछताओ नाहक कहकर अरे-अरे . कही न जाए बीत रही है जो खुद पर बिन बोले ही बोलें आँसू ढरे-ढरे . आँख मूँदकर रहे मुसीबत लगा गले 'सलिल' मनाए कुशल सोचकर टरे-टरे १०.३.२०२६ ००० ग़ज़लिका २ ० चलते सिक्के खोटे खारिज हुए खरे घाव पुराने नफ़रत ने कर दिए हरे . दांव-पेंच सत्ता की खातिर खूब किए लाख छिपाए लेकिन जन-मन से उतरे . जिए देश की खातिर जब तब एक रहे स्वार्थ-सिद्धि की राह चलते तो झट बिखरे . रौंद न पग-रज को तू बिना वजह इतना आसमान तक उड़ तेरे सर पर उतरे . दर दर भटक रहे दरवाजे दर्शन हों लाज-हया ग़ायब हो दिखा रहे नखरे . आदम है तो आ दम रखकर सच भी कह मन की बात कही तो जन की भी सुन रे! . नहीं संस्कृत, ना अंग्रेजी जन भाषा भूल न हिंदी, जनवाणी ही पढ़-लिख रे! १०.३.२०२६ ००० ग़ज़लिका ३ ० आब्जर्वर बन जा पर कुछ आब्जर्व न कर जो होता है होने दे, मत टोंका कर . नहीं यांत्रिकी आब्जर्वर की कद्र रही गैर यांत्रिकी आब्जर्वर को पूजा कर . सिर्फ न दो दस एक साथ देंगे वायवा नहीं सुनेगा कोई व्यर्थ न रोका कर . एक्सटर्नल को इंटर्नल भी होना है समय कीमती नहीं भाड़ में झोंका कर . लिखित परीक्षा हो लिखवाने-लिखने दे सबको मन की करने दें, मत झगड़ा कर . जन्म सिद्ध अधिकार नकल विद्यार्थी का पकड़, बनाकर प्रकरण, व्यर्थ न लफड़ा कर . नाम न सूची में होगा, गर सच बोला देख अदेखा करता रह मत खो अवसर १०.३.२०२६ ०००
भारत अविजित
एक एक मिल ग्यारह हों जब, तब बढ़ जाता वेट।
ग्यारह मिल जब एक बनें तो जीतें विश्व क्रिकेट।।
सब सपना देखें 'विराट' मिल, करें उसे साकार।
'शुभ मन' हो तो 'हार्दिक' खुशियाँ, मिलतीं आखिरकार।।
'अक्षर' अक्षय खेल भावना, 'श्रेयस' की हकदार।
'राहुल-रोहित अर्श दीप' ले, 'हर्षित' हर अँधियार।।
तरुण 'वरुण' ले गेंद गरुण सम चकरा दे हर बार।
'ऋषभ-यशस्वी' दें ताली, 'सुंदर' 'कुलदीप' प्रहार।।
जड़े 'जडेजा' चौका जीते, न्यूजीलैंड पराजित।
पाकिस्तानी मुँह लटकाए, 'गौतम' भारत अविजित।।
शमा जलाकर 'शमी' मिटा दे, हर शंका-संदेह।
ट्राफी लिए चैंपियन की हँस लौटें अपने गेह।।
९.३.२०२३
०००
अनुरोध:
भोजन-स्थान पर निम्न सन्देश लिखवायें / घोषणा करवायें :
१. अन्न देवता का अपमान मत करें
२. भोजन फेंकना पाप है.
३. देवता भोग ग्रहण करते हैं, मनुष्य भोजन खाते हैं, राक्षस फेंकते हैं.
४. भोजन की बर्बादी,भूखे की मौत.
५. जितनी भूख उतना लें, जितना लें, उतना खाएं.
६. इस जन्म में भोजन फेंकें, अगले जन्म में भूखे मरें.
७. खाना खा. फेंक मत.
८. खाने से प्यार, बर्बादी से इंकार
९. खाना बचे, भूखे को दें.
१० जितना खा सकें उससे कुछ कम लें.
११. दाने-दाने पर खानेवाले का नाम
जो दाना फेंका उस पर था आपका नाम
अगले जनम में दाने पर नहीं होगा आपका नाम
तब क्या करेंगे?
१२. जीवनाधार
भोजन का सामान
बर्बादी रोकें.
१३. जितना खाना
परोसें उतना ही
फेकें न दाना
१४. भूखे-मुँह में देना दाना
एक यज्ञ का पुण्य कमाना.
१५. पशु-पक्षी को जूठन डालें
प्रभु से गलती क्षमा करा लें.
१६. कम खाना, कम बीमारी
ज्यादा खाना, मुश्किल भारी.
१७. खाना गैर का, पेट आपका.
१८. खाना सस्ता, इलाज मंहगा.
१९. सरल खाना / कठिन पचाना.
२०. भूख से कम खायें, सेहत बनायें.
२१. बचा हुआ शुद्ध ताजा भोजन अनाथालय, वृद्धाश्रम, महिलाश्रम अथवा मंदिर के बाहर
भिक्षुकों को वितरित करा दें. जूठा भोजन / जूठन पशुओं को खाने के लिये दें.
***
कहमुकरी
मन की बात अनकही कहती
मधुर सरस सुधियाँ हँस तहती
प्यास बुझाती जैसे सरिता
क्या सखि वनिता?
ना सखि कविता।
लहर-लहर पर लहराती है।
कलकल सुनकर सुख पाती है।।
मनभाती सुंदर मन हरती
क्या सखि सजनी?
ना सखि नलिनी।
नाप न कोई पा रहा।
सके न कोई माप।।
श्वास-श्वास में रमे यह
बढ़ा रहा है ताप।।
क्या प्रिय बीमा?
नहिं प्रिये, सीमा।
१०-३-२०२२
लोककथा कहावत की
ये मुँह और मसूर की दाल
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
एक राजा था, अन्य राजाओं की तरह गुस्से का तेज हुए खाने का शौक़ीन। रसोइया बाँकेलाल उसके चटोरेपन से परेशान था। राजा को हर दिन कुछ नया खाने की लत और कोढ़ में खाज यह कि मसूर मसालेदार दाल की दाल राजा को विशेष पसंद थी। मसूर की दाल बाँकेलाल के अलावा और कोई बनाना नहीं जानता था। इसलिए बांके लाल राजा की मूँछ का बाल बन गया।
एक दिन बाँकेलाल की साली, अपने जीजा के घर आई। उसकी खातिरदारी में कोई कमी न रह जाए इसलिए बाँकेलाल ने राजा से कुछ दिनों के लिए छुट्टी माँगी।
राजा के पास उसके मित्र पड़ोसी देश के राजा के आगमन का संदेश आ चुका था।
हुआ यह कि राजा ने अपने मित्र राजा से बाँकेलाल की बनाई मसूर की दाल की खूब तारीफ की थी। मित्र राजा अपनी रानी सहित आया, ताकि मसूर की दाल का स्वाद ले सके। इसलिए राजा ने बाँकेलाल की छुट्टी मंजूर नहीं की। बाँकेलाल की साली ने उसका खूब मजाक उड़ाया कि जीजाजी साली से ज्यादा राजा का ख्याल रखते हैं। घरवाली का मुँह गोलगप्पे की तरह फूल गया कि उसकी बहिन के कहने पर भी बाँकेलाल ने उसके साथ समय नहीं बिताया। बाँकेलाल मन मसोसकर काम पर चला गया।
खीझ के कारण उसका मन खाना बनाने में कम था। उस दिन दाल में नमक कुछ ज्यादा पड़ गया और दाल कुछ कम गली। मेहमान राजा को भोजन में आनंद नहीं आया। नाराज राजा से बाँकेलाल को नौकरी से निकाल दिया। बेरोजगारी ने बाँकेलाल के सामने समस्या खड़ी कर दी। राजा एक रसोइया रह चुका था इसलिए किसी आम आदमी के घर काम करने में उसे अपमान अनुभव होता। घर में रहता तो घरवाली जली-कटी सुनाती।
कहते हैं सब दिन जात न एक समान, बिल्ली के भाग से छींका टूटा, नगर सेठ मन ही मन राजा से ईर्ष्या करता था। उसे घमंड था कि राजा उससे धन उधार लेकर झूठी शान-शौकत दिखाता था। उसे बाँकेलाल के निकले जाने की खबर मिली तो उसने बाँकेलाल को बुलाकर अपन रसोइया बना लिया और सबसे कहने लगा कि राजा क्या जाने गुणीजनों की कदर करना?
अँधा क्या चाहे दो आँखें, बाँकेलाल ने जी-जान से काम करना आरंभ कर दिया। सेठ को राजसी स्वाद मिला तो वह झूम उठा।
सेठ की शादी की सालगिरह का दिन आया। अधेड़ सेठ युवा रानी को किसी भी कीमत पर प्रसन्न देखना चाहता था। उसने बाँकेलाल से कुछ ऐसा बनाने की फरमाइश की जिसे खाकर सेठानी खुश हो जाए। बाँकेलाल ने शाही मसालेदार मसूर की दाल पकाई। सेठ के घर में इसके पहले मसूर की दाल कभी नहीं बनी थी। सेठ-सेठानी और सभी मेहमानों ने जी भरकर मसूर की दाल खाई। सेठ ने बाँकेलाल को ईनाम दिया। यह देखकर उसका मुनीम कुढ़ गया।
अब सेठ अपना वैभव प्रदर्शित करने के लिए जब-तब मित्रों को दावत देकर वाहवाही पाने लगा।
बाँकेलाल खुद जाकर रसोई का सामान खरीद लाता था इस कारण मुनीम को पहले की तरह गोलमाल करने का अवसर नहीं मिल पा रहा था। मुनीम बाँकेलाल से बदला लेने का मौका खोजने लगा। बही में देखने पर मुनीम ने पाया की जब से बाँकेलाल आया था रसोई का खर्च लगातार बढ़ था। उसे मौका मिल गया। उसने सेठानी के कान भरे कि बाँकेलाल बेईमानी करता है। सेठानी ने सेठ से कहा। सेठ पहले तो अनसुनी करता रहा पर सेठानी ने दबाव डाला तो उसकी नाराजगी से डरकर सेठ ने बाँकेलाल को बुलाकर डाँट लगाई और जवाब-तलब किया कि वह रसोई का सामान लाने में गड़बड़ी कर रहा है।
बाँकेलाल को काटो तो खून नहीं, वह मेहनती और ईमानदार था। उसने सेठ को मेहमानों और दावतों की बढ़ती संख्या और मसलों के लगातार लगातार बढ़ते बाजार भाव का सच बताया और मसूर की दाल में गरम मसाले और मखाने आदि डलने की जानकारी दी। सेठ की आँखें फ़टी की फ़टी रह गईं। उसने नौकर को भेजकर किरानेवाले को बुलवाया और पूछताछ की। किरानेवाले ने बताया कि बाँकेलाल हमेशा उत्तम किस्म के मसाले पूरी तादाद में लता था और भाव भी काम करते था। बाँकेलाल बेईमानी के झूठे इल्जाम से बहुत दुखी हुआ और सेठ की नौकरी छोड़ने का निश्चय कर अपना सामान उठाने चला गया।
वह जा ही रहा था कि उसके कानों में आवाज पड़ी सेठानी नौकर से कह रही थी कि शाम को भोजन में मसूर की दाल बनाई जाए। स्वाभिमानी बाँकेलाल ने यह सुनकर कमरे में प्रवेश कर कहा 'ये मुँह और मसूर की दाल'। मैं काम छोड़कर जा रहा हूँ।
सेठ-सेठानी मनाते रह गए पाए वन नहीं माना। तब से किसी को सामर्थ्य से अधिक पाने की चाह रखते देख कहा जाने लगा 'ये मुँह और मसूर की दाल'।
••
कुण्डलिया
*
दर्शन के दर्शन बिना, रहता मन बेज़ार
तेवर वाली तेवरी, करे निरंतर वार
करे निरंतर वार, केंद्र में रखे विसंगति
करे कौन मनुहार, बढ़े हर समय सुसंगति
मत करिए वन काम, करे मन जिसका वर्जन
अंतर्मन में झांक, कीजिए प्रभु का दर्शन
*
देवर आए खेलने, भौजी से रंग आज
भाई ने दे वर रँगा, भागे बिगड़ा काज
भागे बिगड़ा काज, न गुझिया पपड़ी खाई
भौजी की बहिना न, सामने पड़ी दिखाई
रंग हुए बेरंग, उदास हो गए देवर
लाल पलाश हार, पहनाएँ किसको जेवर
***
घनाक्षरी
होली पर चढ़ाए भाँग, लबों से चुआए पान, झूम-झूम लूट रहे रोज ही मुशायरा
शायरी हसीन करें, तालियाँ बटोर चलें, हाय-हाय करती जलें-भुनेंगी शायरा
फख्र इरफान पै है, फन उन्वान पै है, बढ़ता ही जाए रोज आशिकों का दायरा
कत्ल मुस्कान करे, कैंची सी जुबान चले, माइक से यारी है प्यारा जैसे मायरा
१०-३-२०२०
*
नैन पिचकारी तान-तान बान मार रही, देख पिचकारी ​मोहे ​बरजो न राधिका
​आस-प्यास रास की न फागुन में पूरी हो तो, मुँह ही न फेर ले साँसों की साधिका
गोरी-गोरी देह लाल-लाल हो गुलाल सी, बाँवरे से ​साँवरे की कामना भी बाँवरी-
बैन​ से मना करे, सैन से न ना कहे, नायक के आस-पास घूम-घूम नायिका ​
१०-३-२०१७
***
गीत:
ओ! मेरे प्यारे अरमानों,
आओ, तुम पर जान लुटाऊँ.
ओ! मेरे सपनों अनजानों-
तुमको मैं साकार बनाऊँ...
मैं हूँ पंख उड़ान तुम्हीं हो,
मैं हूँ खेत, मचान तुम्हीं हो.
मैं हूँ स्वर, सरगम हो तुम ही-
मैं अक्षर हूँ गान तुम्हीं हो.
ओ मेरी निश्छल मुस्कानों
आओ, लब पर तुम्हें सजाऊँ..
मैं हूँ मधु, मधु गान तुम्हीं हो.
मैं हूँ शर संधान तुम्हीं हो.
जनम-जनम का अपना नाता-
मैं हूँ रस रसखान तुम्हीं हो.
ओ! मेरे निर्धन धनवानों
आओ! श्रम का पाठ पढाऊँ...
मैं हूँ तुच्छ, महान तुम्हीं हो.
मैं हूँ धरा, वितान तुम्हीं हो.
मैं हूँ षडरसमधुमय व्यंजन.
'सलिल' मान का पान तुम्हीं हो.
ओ! मेरी रचना संतानों
आओ! दस दिश तुम्हें गुंजाऊँ...
***
गीत,
मैं हूँ मधु, मधु गान तुम्हीं हो.
मैं हूँ शर संधान तुम्हीं हो.
जनम-जनम का अपना नाता-
मैं हूँ रस रसखान तुम्हीं हो.
ओ! मेरे निर्धन धनवानों
आओ! श्रम का पाठ पढाऊँ...
मैं हूँ तुच्छ, महान तुम्हीं हो.
मैं हूँ धरा, वितान तुम्हीं हो.
मैं हूँ षडरसमधुमय व्यंजन.
'सलिल' मान का पान तुम्हीं हो.
ओ! मेरी रचना संतानों
आओ, दस दिश तुम्हें गुंजाऊँ...
***
दोहा
आँखमिचौली खेलते, बादल सूरज संग.
यह भागा वह पकड़ता, देखे धरती दंग..
*
पवन सबल निर्बल लता, वह चलता है दाँव .
यह थर-थर-थर काँपती, रहे डगमगा पाँव ..
१०-३-२०१०
***

रविवार, 4 जनवरी 2026

जनवरी ४, सॉनेट, कौन हूँ मैं, वागीश्वरी सवैया, भाषा गीत, सिगिरिया लंका, घनाक्षरी, राजस्थानी मुक्तिका,

सलिल सृजन जनवरी ४
*

पूर्णिका 
दुनिया ठिठुरे भले शीत से
अपने मन बसंत चलता है
.
नहीं सियासत करते हैं हम
इसीलिए सिक्का चलता है
.
शब्दों का मजहब बस सच है
उगे-ढले सूरज चलता है
.
नेह नर्मदा हमीं नहाए
धुआँधार निश-दिन चलता है
.
ग़ज़ल फ़सल है जज़्बातों की
खोटा सिक्का अब चलता है
.  
मन-दर्पण में खुद की सूरत
दिखे, खुदा बिन भी चलता है
.
सीरत तीरथ रोज कर रही
घर में ही मेरा चलता है
.
लब पर लिए तबस्सुम आ जा
सँग चल तू तो जग चलता है
.
सरल तरल हो बहे सलिल तो
कलकल कलरव बह चलता है
४.१.२०२६
०००
सॉनेट
.
क्षण में युग को जीना सीखें
अपनी किस्मत आप लिखें हम
भिन्न तनिक औरों से दीखें
अपनी मंजिल आप चुनें हम।
अपने पग हैं; अपनी राहें
मन ठोकर से मत घबराना
अपनी बाँहें; अपनी चाहें
जो मन भाए; हृदय लगाना।
अवगाहन श्रम-सीकर में कर
बिंदु सिंधु को जन्म दे सके
हो भगवान भक्त के वश में
भोग लगे जो विहँस ले सके।
नित नव कोशिश-माला जपते
प्रभु! तब हाथ शीश पर रखते।
०००
मुक्तक
नए साल में शशि अनुरागी हो पल-पल
नए साल में रवि सहभागी हो पल-पल
जनता कसे कसौटी पर नित नेता को-
नए साल में सत्ता त्यगी हो पल-पल
४.१.२०२५
०००
सवैया सलिला १:
वागीश्वरी सवैया
*
गले आ लगो या गले से लगाओ, तिरंगी पताका उड़ाओ।
कहो भी, सुनो भी, न बातें बनाओ, भुला भेद सारे न जाओ।।
जरा पंछियों को निहारो, न जूझें, रहें साथ ही ये हमेशा।
न जोड़ें, न तोड़ें, न फूँकें, न फोड़ें, उड़ें साथ ही ये हमेशा।।
विधान: (सात यगण) प्रति पंक्ति ।
***
सॉनेट
हयात
है हयात यह धूप सुनहरी
चीर कोहरा हम तक आई
झलक दिखाए ठिठक रुपहली
ठिठुर रहे हर मन को भाई
गौरैया बिन आँगन सूना
चपल गिलहरी भी गायब है
बिन खटपट सूनापन दूना
छिपा रजाई में रब-नब है
कायनात की ट्रेन खड़ी है
शीत हवाओं के सिगनल पर
सीटी मारे घड़ी, अड़ी है
कहे उठो पहुँचो मंज़िल पर
दुबकी मौत शीत से डरकर
चहक हयात रही घर-बाहर

४-१-२०२३, ८•२२
●●●
सॉनेट
नूपुर
नूपुर की खनखन हयात है
पायल सिसक रही नूपुर बिन
नथ-बेंदी बिसरी बरात है
कंगन-चूड़ी करे न खनखन
हाई हील में जीन्स मटकती
पिज्जा थामे है हाथों में
भूल नमस्ते, हैलो करती
घुली गैरियत है बातों में
पीढ़ी नई उड़ रही ऊँचा
पर जमीन पर पकड़ खो रही
तनिक न भाता मंज़र नीचा
आँखें मूँदे ख्वाब बो रही
मान रही नूपुर को बंधन
अब न सुहाता माथे चंदन
संजीव
४-१-२०२३, ८•५७
●●●
सॉनेट
दीवार
*
क्या कहती? दीवार मनुज सुन।
पीड़ा मन की मन में तहना।
धूप-छाँव चुप हँसकर सहना।।
हो मजबूत सहारा दे तन।।
थक-रुक-चुक टिक गहे सहारा।
समय साइकिल को दुलराती।
सुना किसी को नहीं बताती।।
टिके साइकिल कह आभार।।
झाँक झरोखा दुनिया दिखती।
मेहनत अपनी किस्मत लिखती।
धूप-छाँव मिल सुख-दुख तहती।
दुनिया लीपे-पोते-रँगती।।
पर दीवार न तनिक बदलती।।
न ही किसी पर रीझ फिसलती।।
संवस
४-१-२०२२
*
आश्चर्यजनक पुरातात्विक स्थल सिगिरिया (श्रीलंका)
आप दुनिया के सबसे महान पुरातात्विक स्थलों में से एक को सिगिरिया कहा जाता है जिसे रावण के महलों में से एक माना जाता है। श्रीलंका में स्थित यह अद्भुत स्थल दुनिया में ऐसा कुछ भी नहीं है, इसीलिए इसे दुनिया का 8वां अजूबा भी कहा जाता है। अब आप सोच रहे होंगे कि इस साइट में ऐसा क्या खास है। यह वास्तव में एक विशाल अखंड चट्टान है, लगभग 660 फीट लंबा, और आप देख सकते हैं कि इसका एक सपाट शीर्ष है, जैसे किसी ने इसे एक विशाल चाकू से काटा। शीर्ष पर अविश्वसनीय खंडहर हैं जो बेहद रहस्यमय हैं।
जैसा कि आप देख सकते हैं कि यहां और वहां बहुत सी अजीबोगरीब ईंट संरचनाएं हैं और यह न केवल आगंतुकों के लिए भ्रमित करने वाली है, बल्कि पुरातत्वविद भी पूरी तरह से यह नहीं समझ पा रहे हैं कि इन संरचनाओं का उपयोग किस लिए किया गया था। वे पुष्टि करते हैं कि आप जो कुछ भी देखते हैं वह कम से कम 1500 वर्ष पुराना है। लेकिन रहस्य यह नहीं है कि ये संरचनाएं क्या हैं, यह है कि इन संरचनाओं का निर्माण कैसे हुआ। प्राचीन बिल्डरों ने इन सभी ईंटों को चट्टान के शीर्ष पर ले जाने का प्रबंधन कैसे किया? बताया जाता है कि यहां कम से कम 30 लाख ईंटें मिलती हैं, लेकिन इन ईंटों को चट्टान के ऊपर बनाना असंभव होगा, यहां पर्याप्त मिट्टी उपलब्ध नहीं है। उन्हें इन ईंटों को जमीन से ले जाना होगा।
अब, वास्तव में विचित्र बात यह है कि जमीनी स्तर से कोई प्राचीन सीढ़ियां नहीं हैं जो चट्टान की चोटी तक जाती हैं। देखिए, ये सभी धातु सीढ़ियां पिछली शताब्दी में बनाई गई थीं। इन नई सीढ़ियों के बिना इस चट्टान पर चढ़ना काफी मुश्किल होगा। यह पूरी चट्टान अब विभिन्न प्रकार की सीढ़ियों से स्थापित है, यह एक अलग स्तर पर सर्पिल सीढ़ियाँ हैं। प्राचीन बिल्डरों ने बहुत सीमित सीढ़ियाँ बनाईं, लेकिन ये सीढ़ियाँ निश्चित रूप से ऊपर तक नहीं पहुँचीं। यही कारण है कि 200 साल पहले तक सिगिरिया के बारे में यहां तक ​​कि स्थानीय लोगों को भी नहीं पता था क्योंकि ऊपर तक सीढ़ियां नहीं थीं। 1980 के दशक के दौरान श्रीलंकाई सरकार ने धातु के खंभों का उपयोग करके सीढ़ियों का निर्माण किया ताकि इसे एक पर्यटक स्थल के रूप में इस्तेमाल किया जा सके और मुर्गी ने इसे एक विरासत स्थल घोषित किया।
और यही कारण है कि जोनाथन फोर्ब्स के नाम से एक अंग्रेज ने 1831 में सिगिरिया के खंडहरों की "खोज" की। तो प्रारंभिक मानव सिगिरिया के शीर्ष पर कैसे पहुंचे? आइए मान लें कि इन बहुत खड़ी, जंगली इलाकों के माध्यम से चढ़ाई करना संभव है। लेकिन जमीनी स्तर से 30 लाख ईंटें लाने के लिए आपको उचित सीढ़ियों की जरूरत जरूर पड़ेगी। इसके बिना उन्हें शीर्ष पर पहुंचाना असंभव होगा। भले ही हम यह दावा करें कि ईंटों को चट्टान के ऊपर ही किसी चमत्कारी तरीके से बनाया गया था, यहां के निर्माण कार्य में सैकड़ों श्रमिकों की आवश्यकता होती। उन्हें अपना भोजन कैसे मिला? और टूल्स के बारे में क्या? उन्होंने अपने विशाल आदिम औजारों को कैसे ढोया? वे कहाँ आराम और सोते थे?
यहाँ केवल ईंटें ही नहीं हैं, आप संगमरमर के विशाल ब्लॉक भी पा सकते हैं। दूधिया सफेद संगमरमर के पत्थर इस क्षेत्र के मूल निवासी नहीं हैं। ये ब्लॉक वास्तव में बहुत भारी होते हैं, एक कदम बनाने वाले हर पत्थर का वजन लगभग 20-30 किलोग्राम होता है। और हम यहां हजारों संगमरमर के ब्लॉक पा सकते हैं। विशेषज्ञ इस बात से सहमत हैं कि संगमरमर प्राकृतिक रूप से आस-पास कहीं नहीं पाया जाता है, तो उन्हें 660 फीट की ऊंचाई तक कैसे ले जाया गया, खासकर बिना सीढ़ियों के? इसमें पानी की एक बड़ी टंकी भी है। यदि आप इसके चारों ओर ईंटों और संगमरमर के ब्लॉकों को नजरअंदाज करते हैं, तो आप समझते हैं कि यह ग्रेनाइट से बना दुनिया का सबसे बड़ा मोनोलिथिक टैंक है। यह पत्थर के ब्लॉकों को जोड़कर नहीं बनाया गया है, इसे ग्रेनाइट को हटाकर, सॉलिड रॉक से टन और टन ग्रेनाइट को निकालकर बनाया गया है।
यह पूरा टैंक 90 फीट लंबा और 68 फीट चौड़ा और करीब 7 फीट गहरा है। इसका मतलब है कि कम से कम 3,500 टन ग्रेनाइट को हटा दिया गया है। तो आप वास्तव में वापस बैठने के लिए एक मिनट ले सकते हैं और सोच सकते हैं कि मुख्यधारा के पुरातत्वविद सही हैं या नहीं। यदि मनुष्य ग्रेनाइट पर छेनी, हथौड़े और कुल्हाड़ी जैसे आदिम औजारों का उपयोग कर रहे होते, जो कि दुनिया की सबसे कठोर चट्टानों में से एक है, तो 3,500 टन को हटाने में वर्षों लग जाते। और इतने सालों में ये मजदूर अपना पेट कैसे पालते थे, जब उनके पास जमीनी स्तर तक जाने के लिए सीढ़ियां भी नहीं हैं? मुख्यधारा की इतिहास की किताबों में कुछ मौलिक रूप से गलत है जो प्राचीन लोगों को छेनी और हथौड़े से चट्टानों को काटने की बात करती है। लेकिन यह सिर्फ एक सिद्धांत नहीं है, हमारे आंखों के सामने वास्तविक सबूत हैं। क्या यह अद्भुत नहीं है?
***
:छंद सलिला:
घनाक्षरी
*
सघन संगुफन भाव का, अक्षर अक्षर व्याप्त.
मन को छूती चतुष्पदी, रच घनाक्षरी आप्त..
तीन चरण में आठ सात चौथे में अक्षर.
लघु-गुरु मात्रा से से पदांत करते है कविवर..
*
लाख़ मतभेद रहें, पर मनभेद न हों, भाई को हमेशा गले, हँस के लगाइए|
लात मार दूर करें, दशमुख सा अनुज, शत्रुओं को न्योत घर, कभी भी न लाइए|
भाई नहीं दुश्मन जो, इंच भर भूमि न दें, नारि-अपमान कर, नाश न बुलाइए|
छल-छद्म, दाँव-पेंच, द्वंद-फंद अपना के, राजनीति का अखाड़ा घर न बनाइये||
*
जिसका जो जोड़ीदार, करे उसे वही प्यार, कभी फूल कभी खार, मन-मन भाया है|
पास आये सुख मिले, दूर जाये दुःख मिले, साथ रहे पूर्ण करे, जिया हरषाया है|
चाह-वाह-आह-दाह, नेह नदिया अथाह, कल-कल हो प्रवाह, डूबा-उतराया है|
गर्दभ कहे गधी से, आँख मूँद - कर - जोड़, देख तेरी सुन्दरता चाँद भी लजाया है||
(श्रृंगार तथा हास्य रस का मिश्रण)
*
शहनाई गूँज रही, नाच रहा मन मोर, जल्दी से हल्दी लेकर, करी मनुहार है|
आकुल हैं-व्याकुल हैं, दोनों एक-दूजे बिन, नया-नया प्रेम रंग, शीश पे सवार है|
चन्द्रमुखी, सूर्यमुखी, ज्वालामुखी रूप धरे, सासू की समधन पे, जग बलिहार है|
गेंद जैसा या है ढोल, बन्ना तो है अनमोल, बन्नो का बदन जैसे, क़ुतुब मीनार है||
*
ये तो सब जानते हैं, जान के न मानते हैं, जग है असार पर, सार बिन चले ना|
मायका सभी को लगे - भला, किन्तु ये है सच, काम किसी का भी, ससुरार बिन चले ना|
मनुहार इनकार, इकरार इज़हार, भुजहार, अभिसार, प्यार बिन चले ना|
रागी हो, विरागी हो या हतभागी बड़भागी, दुनिया में काम कभी, 'नार' बिन चले ना||
(श्लेष अलंकार वाली अंतिम पंक्ति में 'नार' शब्द के तीन अर्थ ज्ञान, पानी और स्त्री लिये गये हैं.)
*
बुन्देली
जाके कर बीना सजे, बाके दर सीस नवे, मन के विकार मिटे, नित गुन गाइए|
ज्ञान, बुधि, भासा, भाव, तन्नक न हो अभाव, बिनत रहे सुभाव, गुनन सराहिए|
किसी से नाता लें जोड़, कब्बो जाएँ नहीं तोड़, फालतू न करें होड़, नेह सों निबाहिए|
हाथन तिरंगा थाम, करें सदा राम-राम, 'सलिल' से हों न वाम, देस-वारी जाइए||
छत्तीसगढ़ी
अँचरा मा भरे धान, टूरा गाँव का किसान, धरती मा फूँक प्राण, पसीना बहावथे|
बोबरा-फार बनाव, बासी-पसिया सुहाव, महुआ-अचार खाव, पंडवानी भावथे|
बारी-बिजुरी बनाय, उरदा के पीठी भाय, थोरको न ओतियाय, टूरी इठलावथे|
भारत के जय बोल, माटी मा करे किलोल, घोटुल मा रस घोल, मुटियारी भावथे||
निमाड़ी
गधा का माथा का सिंग, जसो नेता गुम हुयो, गाँव खs बटोsर वोsट, उल्लूs की दुम हुयो|
मनखs को सुभाsव छे, नहीं सहे अभाव छे, हमेसs खांव-खांव छे, आपs से तुम हुयो|
टीला पाणी झाड़s नद्दी, हाय खोद रएs पिद्दी, भ्रष्टs सरsकारs रद्दी, पता नामालुम हुयो|
'सलिल' आँसू वादsला, धsरा कहे खाद ला, मिहsनतs का स्वाद पा, दूरs माsतम हुयो||
मालवी:
दोहा:
भणि ले म्हारा देस की, सबसे राम-रहीम|
जल ढारे पीपल तले, अँगना चावे नीम||
कवित्त
शरद की चांदणी से, रात सिनगार करे, बिजुरी गिरे धरा पे, फूल नभ से झरे|
आधी राती भाँग बाटी, दिया की बुझाई बाती, मिसरी-बरफ़ घोल्यो, नैना हैं भरे-भरे|
भाभीनी जेठानी रंगे, काकीनी मामीनी भीजें, सासू-जाया नहीं आया, दिल धीर न धरे|
रंग घोल्यो हौद भर, बैठी हूँ गुलाल धर, राह में रोके हैं यार, हाय! टारे न टरे||
राजस्थानी
जीवण का काचा गेला, जहाँ-तहाँ मेला-ठेला, भीड़-भाड़ ठेलं-ठेला, मोड़ तरां-तरां का|
ठूँठ सरी बैठो काईं?, चहरे पे आई झाईं, खोयी-खोयी परछाईं, जोड़ तरां-तरां का|
चाल्यो बीज बजारा रे?, आवारा बनजारा रे?, फिरता मारा-मारा रे?, होड़ तरां-तरां का.||
नाव कनारे लागैगी, सोई किस्मत जागैगी, मंजिल पीछे भागेगी, तोड़ तरां-तरां का||
हिन्दी+उर्दू
दर्दे-दिल पीरो-गम, किसी को दिखाएँ मत, दिल में छिपाए रखें, हँस-मुस्कुराइए|
हुस्न के न ऐब देखें, देखें भी तो नहीं लेखें, दिल पे लुटा के दिल, वारी-वारी जाइए|
नाज़ो-अदा नाज़नीं के, देख परेशान न हों, आशिकी की रस्म है कि, सिर भी मुड़ाइए|
चलिए न ऐसी चाल, फालतू मचे बवाल, कोई न करें सवाल, नखरे उठाइए||
भोजपुरी
चमचम चमकल, चाँदनी सी झलकल, झपटल लपकल, नयन कटरिया|
तड़पल फड़कल, धक्-धक् धड़कल, दिल से जुड़ल दिल, गिरल बिजुरिया|
निरखल परखल, रुक-रुक चल-चल, सम्हल-सम्हल पग, धरल गुजरिया|
छिन-छिन पल-पल, पड़त नहीं रे कल, मचल-मचल चल, चपल संवरिया||
===========================================
राजस्थानी मुक्तिकाएँ :
संजीव 'सलिल'
*
१. ... तैर भायला
लार नर्मदा तैर भायला.
बह जावैगो बैर भायला..
गेलो आपून आप मलैगो.
मंजिल की सुण टेर भायला..
मुसकल है हरदां सूँ खडनो.
तू आवैगो फेर भायला..
घणू कठिन है कविता करनो.
आकासां की सैर भायला..
सूल गैल पै यार 'सलिल' तूं.
चाल मेलतो पैर भायला..
*
२. ...पीर पराई
देख न देखी पीर पराई.
मोटो वेतन चाट मलाई..
इंगरेजी मां गिटपिट करल्यै.
हिंदी कोनी करै पढ़ाई..
बेसी धन स्यूं मन भरमायो.
सूझी कोनी और कमाई..
कंसराज नै पटक पछाड्यो.
करयो सुदामा सँग मिताई..
भेंट नहीं जो भारी ल्यायो.
बाके नहीं गुपाल गुसाईं..
उजले कपड़े मैले मन ल्ये.
भवसागर रो पार न पाई..
लडै हरावल वोटां खातर.
लोकतंत्र नै कर नेताई..
जा आतंकी मार भगा तूं.
ज्यों राघव ने लंका ढाई..
४.१.२०२०
***
एक कविता:
कौन हूँ मैं?...
*
क्या बताऊँ, कौन हूँ मैं?
नाद अनहद मौन हूँ मैं.
दूरियों को नापता हूँ.
दिशाओं में व्यापता हूँ.
काल हूँ कलकल निनादित
कँपाता हूँ, काँपता हूँ.
जलधि हूँ, नभ हूँ, धरा हूँ.
पवन, पावक, अक्षरा हूँ.
निर्जरा हूँ, निर्भरा हूँ.
तार हर पातक, तरा हूँ..
आदि अर्णव सूर्य हूँ मैं.
शौर्य हूँ मैं, तूर्य हूँ मैं.
अगम पर्वत कदम चूमें.
साथ मेरे सृष्टि झूमे.
ॐ हूँ मैं, व्योम हूँ मैं.
इडा-पिंगला, सोम हूँ मैं.
किरण-सोनल साधना हूँ.
मेघना आराधना हूँ.
कामना हूँ, भावना हूँ.
सकल देना-पावना हूँ.
'गुप्त' मेरा 'चित्र' जानो.
'चित्त' में मैं 'गुप्त' मानो.
अर्चना हूँ, अर्पिता हूँ.
लोक वन्दित चर्चिता हूँ.
प्रार्थना हूँ, वंदना हूँ.
नेह-निष्ठा चंदना हूँ.
ज्ञात हूँ, अज्ञात हूँ मैं.
उषा, रजनी, प्रात हूँ मैं.
शुद्ध हूँ मैं, बुद्ध हूँ मैं.
रुद्ध हूँ, अनिरुद्ध हूँ मैं.
शांति-सुषमा नवल आशा.
परिश्रम-कोशिश तराशा.
स्वार्थमय सर्वार्थ हूँ मैं.
पुरुषार्थी परमार्थ हूँ मैं.
केंद्र, त्रिज्या हूँ, परिधि हूँ.
सुमन पुष्पा हूँ, सुरभि हूँ.
जलद हूँ, जल हूँ, जलज हूँ.
ग्रीष्म, पावस हूँ, शरद हूँ.
साज, सुर, सरगम सरस हूँ.
लौह को पारस परस हूँ.
भाव जैसा तुम रखोगे
चित्र वैसा ही लखोगे.
स्वप्न हूँ, साकार हूँ मैं.
शून्य हूँ, आकार हूँ मैं.
संकुचन-विस्तार हूँ मैं.
सृष्टि का व्यापार हूँ मैं.
चाहते हो देख पाओ.
सृष्ट में हो लीन जाओ.
रागिनी जग में गुंजाओ.
द्वेष, हिंसा भूल जाओ.
विश्व को अपना बनाओ.
स्नेह-सलिला में नहाओ..
***
भाषा गीत 
हिंद और हिंदी की जय-जयकार करें हम
भारत की माटी, हिंदी से प्यार करें हम
*
भाषा सहोदरी होती है, हर प्राणी की
अक्षर-शब्द बसी छवि, शारद कल्याणी की
नाद-ताल, रस-छंद, व्याकरण शुद्ध सरलतम
जो बोले वह लिखें-पढ़ें, विधि जगवाणी की
संस्कृत सुरवाणी अपना, गलहार करें हम
हिंद और हिंदी की, जय-जयकार करें हम
भारत की माटी, हिंदी से प्यार करें हम
*
असमी, उड़िया, कश्मीरी, डोगरी, कोंकणी,
कन्नड़, तमिल, तेलुगु, गुजराती, नेपाली,
मलयालम, मणिपुरी, मैथिली, बोडो, उर्दू
पंजाबी, बांगला, मराठी सह संथाली
सिंधी सीखें बोल, लिखें व्यवहार करें हम
हिंद और हिंदी की, जय-जयकार करें हम
भारत की माटी, हिंदी से प्यार करें हम
*
ब्राम्ही, प्राकृत, पाली, बृज, अपभ्रंश, बघेली,
अवधी, कैथी, गढ़वाली, गोंडी, बुन्देली,
राजस्थानी, हल्बी, छत्तीसगढ़ी, मालवी,
भोजपुरी, मारिया, कोरकू, मुड़िया, नहली,
परजा, गड़वा, कोलमी से सत्कार करें हम
हिंद और हिंदी की, जय-जयकार करें हम
भारत की माटी, हिंदी से प्यार करें हम
*
शेखावाटी, डिंगल, हाड़ौती, मेवाड़ी
कन्नौजी, मागधी, खोंड, सादरी, निमाड़ी,
सरायकी, डिंगल, खासी, अंगिका, बज्जिका,
जटकी, हरयाणवी, बैंसवाड़ी, मारवाड़ी,
मीज़ो, मुंडारी, गारो मनुहार करें हम
हिन्द और हिंदी की जय-जयकार करें हम
भारत की माटी, हिंदी से प्यार करें हम
*
देवनागरी लिपि, स्वर-व्यंजन, अलंकार पढ़
शब्द-शक्तियाँ, तत्सम-तद्भव, संधि, बिंब गढ़
गीत, कहानी, लेख, समीक्षा, नाटक रचकर
समय, समाज, मूल्य मानव के नए सकें मढ़
'सलिल' विश्व, मानव, प्रकृति-उद्धार करें हम
हिन्द और हिंदी की जय-जयकार करें हम
भारत की माटी, हिंदी से प्यार करें हम
****
गीत में ५ पद ६६ (२२+२३+२१) भाषाएँ / बोलियाँ हैं।
***
एक द्विपदी :
*
मन अमन की चाह में भटका किया है
भले बेमन ही सही पर मन जिया है
*
***
दोहा सलिला :
*
इधर घोर आतंक है, उधर तीव्र भूडोल
रखें सियासत ताक पर, विष में अमृत घोल
*
गर्व शहीदों पर अगर, उनसे लें कुछ सीख
अनुशासन बलिदान के, पथ पर आगे दीख
*
प्राण निछावर कर गये, जो कर उन्हें सलाम
शपथ उठायें आयेंगे, ;सलिल' देश के काम
*
आतंकी यह चाहते, बातचीत हो बंद
ठेंगा उन्हें दिखाइए, करें न वार्ता मंद
*
सेना भारत-पाक की, मिल जाए यदि साथ
दहशतगर्दों को कुचल, बढ़े उठाकर माथ
*
अखबारी खबरें रहीं, वातावरण बिगाड़
ज्यों सुन्दर उद्यान में, उगें जंगली झाड़
*
सबसे पहले की न हो, यदि आपस में होड़
खबरी चैनल ना करें, सच की तोड़-मरोड़
*
संयम बरत नहीं सके,पत्रकार नादान
रुष्ट हुआ नेपाल पर,उन्हें नहीं है भान
*
दूरदर्शनी बहस का, होता ओर न छोर
सत्य न कोई बोलता, सब मिल करते शोर
४-१-२०१६
***
नवगीत:
.
संक्रांति काल है
जगो, उठो
.
प्रतिनिधि होकर जन से दूर
आँखें रहते भी हो सूर
संसद हो चौपालों पर
राजनीति तज दे तंदूर
संभ्रांति टाल दो
जगो, उठो
.
खरपतवार न शेष रहे
कचरा कहीं न लेश रहे
तज सिद्धांत, बना सरकार
कुर्सी पा लो, ऐश रहे
झुका भाल हो
जगो, उठो
.
दोनों हाथ लिये लड्डू
रेवड़ी छिपा रहे नेता
मुँह में लैया-गज़क भरे
जन-गण को ठेंगा देता
डूबा ताल दो
जगो, उठो
.
सूरज को ढाँके बादल
सीमा पर सैनिक घायल
नाग-सांप फिर साथ हुए
गुँजा रहे बंसी-मादल
छिपा माल दो
जगो, उठो
.
नवता भरकर गीतों में
जन-आक्रोश पलीतों में
हाथ सेंक ले कवि तू भी
जाए आज अतीतों में
खींच खाल दो
जगो, उठो
*
***
नवगीत:
.
गोल क्यों?
चक्का समय का गोल क्यों?
.
कहो होती
हमेशा ही
ढोल में कुछ पोल क्यों?
.
कसो जितनी
मिले उतनी
प्रशासन में झोल क्यों?
.
रहे कड़के
कहे कड़वे
मुफलिसों ने बोल क्यों?
.
कह रहे कुछ
कर रहे कुछ
ओढ़ नेता खोल क्यों?
.
मान शर्बत
पी गये सत
हाय पाकी घोल क्यों?
...
नवगीत:
.
भारतवारे बड़े लड़ैया
बिनसें हारे पाक सियार
.
घेर लओ बदरन नें सूरज
मचो सब कऊँ हाहाकार
ठिठुरन लगें जानवर-मानुस
कौनौ आ करियो उद्धार
बही बयार बिखर गै बदरा
धूप सुनैरी कहे पुकार
सीमा पार छिपे बनमानुस
कबऊ न पइयो हमसें पार
.
एक सिंग खों घेर भलई लें
सौ वानर-सियार हुसियार
गधा ओढ़ ले खाल सेर की
देख सेर पोंके हर बार
ढेंचू-ढेचूँ रेंक भाग रओ
करो सेर नें पल मा वार
पोल खुल गयी, हवा निकर गयी
जान बखस दो करें पुकार
(प्रयुक्त छंद: आल्हा, रस: वीर, भाषा रूप: बुंदेली)
...
नवगीत:
संजीव
.
करना सदा
वह जो सही
.
तक़दीर से मत हों गिले
तदबीर से जय हों किले
मरुभूमि से जल भी मिले
तन ही नहीं मन भी खिले
वरना सदा
वह जो सही
भरना सदा
वह जो सही
.
गिरता रहा, उठता रहा
मिलता रहा, छिनता रहा
सुनता रहा, कहता रहा
तरता रहा, मरता रहा
लिखना सदा
वह जो सही
दिखना सदा
वह जो सही
.
हर शूल ले, हँस फूल दे
यदि भूल हो, मत तूल दे
नद-कूल को पग-धूल दे
कस चूल दे, मत मूल दे
सहना सदा
वह जो सही
तहना सदा
वह जो सही
(प्रयुक्त छंद: हरिगीतिका)
...
नवगीत:
.
भारतवारे बड़े लड़ैया
बिनसें हारे पाक सियार
.
घेर लओ बदरन नें सूरज
मचो सब कऊँ हाहाकार
ठिठुरन लगें जानवर-मानुस
कौनौ आ करियो उद्धार
बही बयार बिखर गै बदरा
धूप सुनैरी कहे पुकार
सीमा पार छिपे बनमानुस
कबऊ न पइयो हमसें पार
.
एक सिंग खों घेर भलई लें
सौ वानर-सियार हुसियार
गधा ओढ़ ले खाल सेर की
देख सेर पोंके हर बार
ढेंचू-ढेचूँ रेंक भाग रओ
करो सेर नें पल मा वार
पोल खुल गयी, हवा निकर गयी
जान बखस दो करें पुकार
(प्रयुक्त छंद: आल्हा, रस: वीर, भाषा रूप: बुंदेली)
४.१.२०१५
***

रविवार, 30 नवंबर 2025

नवंबर ३०, विजया, घनाक्षरी, शब्द-अर्थ, स्वर, व्यंजन, दोहा, अक्षर गीत, मुक्तिका,

कार्य शाला
पूर्णिका
आँधर पीसें, कुत्ते खाँय
जो रोके बापे गुर्राँय
पोंगा पंडित पुजा-पूज रय
काक भुसुंडी खों गरियाँय
जै गोबर गनेस की बोलो
नई तो बुलडोजर चल जाँय
लगा पैग अंबर कों छूते
पैगंबर कों लड़ा-भिड़ाँय
जै ढपोरसंखन की हो रई
हीरे माटी मोल बिकाँय
आपन मूँ मिट्ठू बन रय रे
अपनी मूरत आप लगाँय
'सलिल' सफा कर र ओ तन मल मल
मन मैला तो चिंता नाँय
३०.११.२०२५
०००
मुक्तिका १
वज़्न--212 212 212 212 
*
गालिबों के नहीं कद्रदां अब रहे 
शायरी लोग सोते हुए कर रहे 

बोल जुमले; भुला दे सभी वायदे
जो हकीकत कही; आप भी डर रहे  
  
जिंदगी के रहे मायने जो कभी 
हैं नहीं; लोग जीते हुए मर रहे 

ये निजामत झुकेगी तुम्हारे लिए 
नौजवां गर न भागे; डटे मिल रहे 
 
मछलियों ने मगर पर भरोसा किया 
आसुओं की खता; व्यर्थ ही बह रहे 

वेदना यातना याचना सत्य है 
हुक्मरां बोलते स्वर्ग में रह रहे 

ये सियासत न जिसमें सिया-सत रहा 
खेलते राम जी किसलिए हैं रहे 
***
मुक्तिका २ 
वज़्न--२१२ x ४ 
बह्रे - मुतदारिक़ मुसम्मन सालिम.
अर्कान-- फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
क़ाफ़िया— "ए" (स्वर)
रदीफ़ --- हुए
*
मुक्तिका 
कायदे जो कभी थे; किनारे हुए 
फायदे जो मिले हैं; हमारे हुए 

चाँद सोया रहा बाँह में रात भर 
लाख गर्दिश मगर हम सितारे हुए 

नफरतों से रही है मुहब्बत हमें 
आप मानें न मानें सहारे हुए 

हुस्न वादे करे जो निभाए नहीं 
इश्किया लोग सारे बिचारे हुए 

सर्दियाँ सर्दियों में बिगाड़ें गले 
फायदेमंद यारां गरारे हुए 

सर कटा तो कटा, तुम न मातम करो 
जान लो; मान लो हम तुम्हारे हुए   

धार में तो सदा लोग बहते रहे 
हम बहे थे जहाँ वां किनारे हुए  
***
उदाहरण 
एक मुद्दत हुई घर से निकले हुए
अपने माहौल में खुद को देखे हुए  -  शारिक़ कैफ़ी
गीत
1. कर चले हम फिदा जानो तन साथियों
2. खुश रहे तू सदा ये दुआ है मेरी
3. आपकी याद आती रही रात भर
4. गीत गाता हूँ मैं गुनगुनाता हूँ मैं
5. बेख़ुदी में सनम उठ गये जो क़दम
6. एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा
7. हाल क्या है दिलों का न पूछो सनम
8. आजकल याद कुछ और रहता नहीं
9. तुम अगर साथ देने का वादा करो
10. ऐ वतन ऐ वतन हमको तेरी कसम
11. छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए
■■■
अक्षर गीत
संजीव
*
अक्षर स्वर-व्यंजन सुन-पढ़-लिख
आओ! गाएँ अक्षर गीत।
माँ शारद को नमस्कार कर
शुभाशीष पा हँसिए मीत।
स्वर :
'अ' से अनुपम; अवनि; अमर; अब,
'आ' से आ; आई; आबाद।
'इ' से इरा; इला; इमली; इस,
'ई' ईश्वरी; ईख; ईजाद।
'उ' से उषा; उजाला; उगना,
'ऊ' से ऊर्जा; ऊष्मा; ऊन।
'ए' से एड़ी; एक; एकता,
'ऐ' ऐश्वर्या; ऐनक; ऐन।
'ओ' से ओम; ओढ़नी; ओला,
'औ' औरत; औषधि; औलाद।
'अं' से अंक; अंग, अंगारा,
'अ': खेल-हँस हो फौलाद।
*
व्यंजन
'क' से कमल; कलम; कर; करवट,
'ख' खजूर; खटिया; खरगोश।
'ग' से गणपति; गज; गिरि; गठरी,
'घ' से घट; घर; घाटी; घोष।
'ङ' शामिल है वाङ्मय में
पंचम ध्वनि है सार्थक रीत।
अक्षर स्वर-व्यंजन सुन-पढ़-लिख
आओ! गायें अक्षर गीत।
*
'च' से चका; चटकनी; चमचम,
'छ' छप्पर; छतरी; छकड़ा।
'ज' जनेऊ; जसुमति; जग; जड़; जल,
'झ' झबला; झमझम, झरना।
'ञ' हँस व्यञ्जन में आ बैठा,
व्यर्थ न लड़ना; करना प्रीत।
अक्षर स्वर-व्यंजन सुन-पढ़-लिख
आओ! गायें अक्षर गीत।
*
'ट' टमटम; टब; टका; टमाटर,
'ठ' ठग; ठसक; ठहाका; ठुमरी।
'ड' डमरू; डग; डगर; डाल; डफ,
'ढ' ढक्कन; ढोलक; ढल; ढिबरी।
'ण' कण; प्राण; घ्राण; तृण में है
मन लो जीत; तभी है जीत।
अक्षर स्वर-व्यंजन सुन-पढ़-लिख
आओ! गायें अक्षर गीत।
*
'त' तकिया; तबला; तसला; तट,
'थ' से थपकी; थप्पड़; थान।
'द' दरवाजा; दवा, दशहरा,
'ध' धन; धरा; धनुष; धनवान।
'न' नटवर; नटराज; नगाड़ा,
गिर न हार; उठ जय पा मीत।
अक्षर स्वर-व्यंजन सुन-पढ़-लिख
आओ! गायें अक्षर गीत।
*
'प' पथ; पग; पगड़ी; पहाड़; पट,
'फ' फल; फसल; फलित; फलवान।
'ब' बकरी; बरतन, बबूल; बस,
'भ' से भवन; भक्त; भगवान।
'म' मइया; मछली; मणि; मसनद,
आगे बढ़; मत भुला अतीत।
अक्षर स्वर-व्यंजन सुन-पढ़-लिख
आओ! गायें अक्षर गीत।
*
'य' से यज्ञ; यमी-यम; यंत्री,
'र' से रथ; रस्सी; रस, रास।
'ल' लकीर; लब; लड़का-लड़की;
'व' से वन; वसंत; वनवास।
'श' से शतक; शरीफा; शरबत,
मीठा बोलो; अच्छी नीत।
अक्षर स्वर-व्यंजन सुन-पढ़-लिख
आओ! गायें अक्षर गीत।
*
'ष' से षट; षटकोण; षट्भुजी,
'स' से सबक; सदन; सरगम।
'ह' से हल; हलधर; हलवाई,
'क्ष' क्षमता; क्षत्रिय; क्षय; क्षम।
'त्र' से त्रय, त्रिभुवन; त्रिलोचनी,
'ज्ञ' से ज्ञानी; ज्ञाता; ज्ञान।
'ऋ' से ऋषि, ऋतु, ऋण, ऋतंभरा,
जानो पढ़ो; नहीं हो भीत
अक्षर स्वर-व्यंजन सुन-पढ़-लिख
आओ! गायें अक्षर गीत।
*
२९-३० नवंबर २०२०
***
पुस्तक चर्चा-
सृजन समीक्षा : डॉ. राजलक्ष्मी शिवहरे अंक, पृष्ठ १६, मूल्य ४०रु.।
डॉ. साधना वर्मा
*
सृजन समीक्षा अंतरा शब्द शक्ति प्रकाशन बालाघाट द्वारा संस्कारधानी जबलपुर की सुपरिचित उपन्यासकार डॉ राजलक्ष्मी शिवहरे की सात कविताओं को लेकर प्रकाशित इस अंक में कविताओं के बाद कुछ पाठकों की प्रतिक्रियाएं भी संलग्न की गई हैं। डॉ. राजलक्ष्मी शिवहरे मूलतः उपन्यासकार कथाकार हैं, काव्य लेखन में उनकी रुचि और गति अपेक्षाकृत कम है। प्रस्तुत रचनाओं में कथ्य भावनाओं से भरपूर हैं किंतु शिल्प और भाषिक प्रवाह की दृष्टि से रचनाओं में संपादन की आवश्यकता प्रतीत होती है। चन्द रचनाओं को लेकर छोटी-छोटी पुस्तिकाएँ निकालने से पुस्तकों की संख्या भले ही बढ़ जाए लेकिन रचनाकार विशेषकर वह जिसके ९ उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं, का गौरव नहीं बढ़ता। बेहतर हो इस तरह के छोटे कलेवर में शिशु गीत, बाल गीत, बाल कथाएँ पर्यावरण गीत आदि प्रकाशित कर निशुल्क वितरण अथवा अल्प मोली संस्करण प्रकाशित किए जाएँ तभी पाठकों के लिए इस तरह के सारस्वत अनुष्ठान उपयोगी हो सकते हैं। इस १६ पृष्ठीय लघ्वाकारी संकलन का मूल्य ४०रु. रखा जाना उचित नहीं है।
***
पुस्तक चर्चा-
हिंदी और गाँधी दर्शन, डॉक्टर श्रीमती राजलक्ष्मी शिवहरे, अंतरा शब्द शक्ति प्रकाशन बालाघाट, प्रथम संस्करण २०१८, पृष्ठ बत्तीस, मूल्य ५५ रु.।
*
हिंदी और गाँधी दर्शन एक बहुत महत्वपूर्ण विषय पर प्रकाशित कृति है जिसमें हिंदी पर गाँधीजी ही नहीं, संत कबीर, राजा राममोहन राय, महर्षि दयानंद सरस्वती, एनी बेसेंट, महर्षि अरविंद, सुभाष चंद्र बोस आदि महापुरुषों के प्रेरक विचार प्रकाशित किए गए हैं। राजलक्ष्मी जी गद्य लेखन में निपुण हैं और प्रस्तुत पुस्तिका में उन्होंने हिंदी के विविध आयामों की चर्चा की है। भारत में बोली जा रही १७९ भाषाएँ एवं ५४४ बोलियों को भारत के राष्ट्रीय भाषाएँ मानने का विचार राष्ट्रीय एकता को पुष्ट करता है। गाँधी जी ने दैनंदिन व्यवहार में हिंदी के प्रयोग के लिए कई सुझाव दिए थे। उन्होंने हिंदी के संस्कृतनिष्ठ स्वरूप की जगह जन सामान्य द्वारा दैनंदिन जीवन में बोले जा रहे शब्दों के प्रयोग को अधिक महत्वपूर्ण माना था। गाँधी का एक सुझाव थी कि भारत की समस्त भाषाएँ देवनागरी लिपि में लिखी जाएँ तो उन्हें सारे भारतवासी पढ़ और क्रमश: समझ सकेंगे।
अधिकांश भाषाएँ संस्कृत से जुड़ी रही हैं इसीलिए उनकी शब्दावली भी एक दूसरे के द्वारा आसानी से समझी जा सकेगी। गाँधी जी के निधन के बाद भाषा का प्रश्न राजनीतिक स्वार्थ साधन का उपकरण बनकर रह गया। राजनेताओं ने भाषा को जनगण को बाँटने के औजार के रूप में उपयोग किया और सत्ता प्राप्ति का स्वार्थ साधा। राजलक्ष्मी जी की यह प्रस्तुति युवाओं को सही रास्ता दिखाने के लिए एक कदम ह। कृति का मूल्य ₹ ५५ रखा जाना उसे उन सामान्य पाठकों की क्रय सीमा से बाहर ले जाता है जिनके लिए राजभाषा संबंधी तथ्यों को व्यवस्थित और समृद्ध बनाया है।
***
सरस्वती स्तवन
स्मृतिशेष प्रो. श्यामलाल उपाध्याय
जन्म - १ मार्च १९३१।
शिक्षा - एम.ए., टी.टी.सी., बी.एड.।
संप्रति - पूर्व हिंदी प्राध्यापक-विभागाध्यक्ष, मंत्री भारतीय वांग्मय पीठ कोलकाता।
प्रकाशन - नियति न्यास, नियति निक्षेप, नियति निसर्ग, संक्षिप्त काव्यमय हिंदी बालकोश, शोभा, सौरभ, सौरभ रे स्वर।
उपलब्धि - अनेक प्रतिष्ठित साहित्यिक सम्मान।
*
जननी है तू वेद की, वीणा पुस्तक साथ।
सुविशाल तेरे नयन, जनमानस की माथ।।
*
सर्वव्याप्त निरवधि रही, शुभ वस्त्रा संपृक्त।
सदा निनादित नेह से, स्रोत पयस्विनी सिक्त।।
*
विश्वपटल पर है इला, अंतरिक्ष में वाणि।
कहीं भारती स्वर्ग में, ब्रह्मलोक ब्रह्माणि।।
*
जहाँ स्वर्ग में सूर्य है, वहीं मर्त्य सुविवेक।
अंतर्मन चेतन करे, यह तेरी गति नेक।।
*
ऋद्धि-सिद्धि है जगत में, ग्यान यग्य जप-जाप।
अभयदान दे जगत को, गर वो सब परिताप।।
*
तब देवी अभिव्यक्ति की, जग है तेरा दास।
सुख संपति से पूर्ण कर, हर ले सब संत्रास।।
***
***
दोहा सलिला
*
भौजी सरसों खिल रही, छेड़े नंद बयार।
भैया गेंदा रीझता, नाम पुकार पुकार।।
समय नहीं; हर किसी पर, करें भरोसा आप।
अपना बनकर जब छले, दुख हो मन में व्याप।।
उसकी आए याद जब, मन जा यमुना-तीर।
बिन देखे देखे उसे, होकर विकल अधीर।।
दाँत दिए तब थे नहीं, चने हमारे पास।
चने मिले तो दाँत खो, हँसते हम सायास।।
पावन रेवा घाट पर, निर्मल सलिल प्रवाह।
मन को शीतलता मिले, सलिला भले अथाह।।
हर काया में बसा है, चित्रगुप्त बन जान।
सबसे मिलिए स्नेह से, हम सब एक समान।।
*
मुझमें बैठा लिख रहा, दोहे कौन सुजान?
लिखता कोई और है, पाता कोई मान।।
३०-११-२०१९
***
कार्यशाला-
शब्द सामर्थ्य बढ़ाइए,
*
अंतरंग = अतिप्रिय
अंबर = आकाश
अंभोज = कमल
अंशुमाली = सूर्य
अक्षत = अखंड, पूर्ण
अक्षय = शिव
अक्षर = आत्मा,
अच्युत = ईश्वर
अतीन्द्रिय = आत्मा
अतिस्वान = सुपर सोनिक
अद्वितीय = अनुपम
अनंत = ईश्वर
अनुभव = प्रत्यक्ष ज्ञान
अन्वेषक = आविष्कारक
अपराजित = जिसे हराया नहीं जा सका, ईश्वर
अपरिमित = बहुत अधिक
अभिजीत = विजय दिलानेवाला,
अभिधान = नाम, उपाधि
अभिनंदन = स्वागत, सम्मान
अभिनव = नया
अमर = अविनाशी
अमिताभ = सूर्य
अमृत = मृत्यु से बचानेवाला
अमोघ = अचूक
अरुण = सूर्य
अर्चित = पूजित
अलौकिक - अद्भुत
अवतंस = श्रेष्ठ व्यक्ति
अवतार = ईश्वर का जन्म
अवनींद्र = राजा
अवसर = मौका
अविनाश = अमर
अव्यक्त = ब्रह्म
अशोक = शोक रहित
अशेष = संपूर्ण
अश्वत्थ = पीपल, जिसमें
अश्विनी = प्रथम नक्षत्र
असीम = सीमाहीन
अभियान = विष्णु
*
ॐ = ईश्वर
ओंकार = गणेश
ओंकारनाथ = शिव
ओजस्वी = तेजस्वी, प्रभावकारी
ओषधीष = चन्द्रमा,
ओजस = कांतिवाला, चमकनेवाला
ओदन = बादल
***
एक दोहा
राम दीप बाती सिया, तेल भक्ति हनुमान।
भरत ज्योति तीली लखन, शत्रुघ्न उजाला जान।।
२९-११-२०१९
***
घनाक्षरी
*
चलो कुछ काम करो, न केवल नाम धरो,
उठो जग लक्ष्य वरो, नहीं बिन मौत मरो।
रखो पग रुको नहीं, बढ़ो हँस चुको नहीं,
बिना लड़ झुको नहीं, तजो मत पीर हरो।।
गिरो उठ आप बढ़ो, स्वप्न नव नित्य गढ़ो,
थको मत शिखर चढ़ो, विफलता से न डरो।
न अपनों को ठगना, न सपनों को तजना,
न स्वारथ ही भजना, लोक हित करो तरो।।
***
विजया घनाक्षरी
*
राम कहे राम-राम, सिया कैसे कहें राम?,
होंठ रहे मौन थाम, नैना बात कर रहे।
मौन बोलता है आज, न अधूरा रहे काज,
लाल गाल लिए लाज, नैना घात कर रहे।।
हेर उर्मिला-लखन, देख द्वंद है सघन,
राम-सिया सिया-राम, बोल प्रात कर रहे।
श्रुतिकीर्ति-शत्रुघन, मांडवी भरत हँस,
जय-जय सिया-राम मात-तात कर रहे।।
३०.११.२०१८
***
क्षणिकाएँ
*
शिकवों-शिकायतो ने कहा
हाले-दिल सनम.
लब सिर्फ़ मुस्कुराते रहे,
आँख थी न नम.
कानों में लगी रुई ने किया
काम ही तमाम-
हम ही से चूक हो गई
फ़ोड़ा नहीं जो बम.
.
उस्ताद अखाड़ा नहीं,
दंगल हुआ?, हुआ.
बाकी ने वृक्ष एक भी,
जंगल हुआ? हुआ.
दस्तूरी जमाने का अजब,
गजब ढा रहा-
हाय-हाय कर कहे
मंगल हुआ? हुआ.
***
घर-घर में गान्धारियाँ हैं,
कोई क्या करे?
करती न रफ़ू आरियाँ हैं,
कोई क्या करे?
कुन्ती, विदुर न धर्मराज
शेष रहे हैं-
शकुनी-अशेष पारियाँ हैं,
कोई क्या करे?
२९-११-२०१७
***
अलंकार सलिला ३६
परिणाम अलंकार
*
हो अभिन्न उपमेय से, जहाँ 'सलिल' उपमान.
अलंकार परिणाम ही, कार्य सके संधान..
जहाँ असमर्थ उपमान उपमेय से अभिन्न रहकर किसी कार्य के साधन में समर्थ होता है, वहाँ परिणाम अलंकार होता है।
उदाहरण:
१. मेरा शिशु संसार वह दूध पिये परिपुष्ट हो।
पानी के ही पात्र तुम, प्रभो! रुष्ट व तुष्ट हो।।
यहाँ संसार उपमान शिशु उपमेय का रूप धारण करने पर ही दूध पीने में समर्थ होता है, इसलिए परिणाम अलंकार है।
२. कर कमलनि धनु शायक फेरत।
जिय की जरनि हरषि हँसि हेरत।।
यहाँ पर कमल का बाण फेरना तभी संभव है, जब उसे कर उपमेय से अभिन्नता प्राप्त हो।।
३. मुख चन्द्र को / मनुहारते हम / पियें चाँदनी।
इस हाइकु में उपमान चंद्र की मनुहार तभी होगी जब वह उपमान मुख से अभिन्न हो।
४. जनप्रतिनिधि तस्कर हुए, जनगण के आराध्य।
जनजीवन में किस तरह, शुचिता हो फिर साध्य?
इस दोहे में तस्कर तभी आराध्य हो सकते हैं जब वे जनप्रतिनिधि से अभिन्न हों।
५. दावानल जठराग्नि का / सँग साँसों की लग्निका / लगन बन सके भग्निका।
इस जनक छंद में दावानल तथा जठराग्नि के अभिन्न होने पर ही लगन-शर्म इसे भग्न कर सकती है। अत:, परिणाम अलंकार है।
३०.११.२०१५
***
नवगीत:
नयन झुकाये बैठे हैं तो
मत सोचो पथ हेर रहे हैं
*
चहचह करते पंछी गाते झूम तराना
पौ फटते ही, नहीं ठण्ड का करें बहाना
सलिल-लहरियों में ऊषा का बिम्ब निराला
देख तृप्त मन डूबा खुद में बन बेगाना
सुन पाती हूँ चूजे जगकर
कहाँ चिरैया? टेर रहे हैं
*
मोरपंख को थाम हाथ में आँखें देखें
दृश्य अदेखे या अतीत को फिर-फिर लेखें
रीती गगरी, सूना पनघट,सखी-सहेली
पगडंडी पर कदम तुम्हारे जा अवरेखें
श्याम लटों में पवन देव बन
श्याम उँगलियाँ फेर रहे हैं
*
नील-गुलाबी वसन या कि है झाँइ तुम्हारी
जाकर भी तुम गए न मन से क्यों बनवारी?
नेताओं जैसा आश्वासन दिया न झूठा-
दोषी कैसे कहें तुम्हें रणछोड़ मुरारी?
ज्ञानी ऊधौ कैसे समझें
याद-मेघ मिल घेर रहे हैं?
***
नवगीत:
अनेक वर्णा पत्तियाँ हैं
शाख पर तो क्या हुआ?
अपर्णा तो है नहीं अमराई
सुख से सोइये
बज रहा चलभाष सुनिए
काम अपना छोड़कर
पत्र आते ही कहाँ जो रखें
उनको मोड़कर
किताबों में गुलाबों की
पंखुड़ी मिलती नहीं
याद की फसलें कहें, किस नदी
तट पर बोइये?
सैंकड़ों शुभकामनायें
मिल रही हैं चैट पर
सिमट सब नाते गए हैं
आजकल अब नैट पर
ज़िंदगी के पृष्ठ पर कर
बंदगी जो मीत हैं
पड़ गये यदि सामने तो
चीन्ह पहचाने नहीं
चैन मन का, बचा रखिए
भीड़ में मत खोइए
३०-११-२०१४
***
गीत:
हर सड़क के किनारे
*
हर सड़क के किनारे हैं उखड़े हुए,
धूसरित धूल में, अश्रु लिथड़े हुए.....
*
कुछ जवां, कुछ हसीं, हँस मटकते हुए,
नाज़नीनों के नखरे लचकते हुए।
कहकहे गूँजते, पीर-दुःख भूलते-
दिलफरेबी लटें, पग थिरकते हुए।।
बेतहाशा खुशी, मुक्त मति चंचला,
गति नियंत्रित नहीं, दिग्भ्रमित मनचला।
कीमती थे वसन किन्तु चिथड़े हुए-
हर सड़क के किनारे हैं उखड़े हुए,
धूसरित धूल में, अश्रु लिथड़े हुए.....
*
चाह की रैलियाँ, ध्वज उठाती मिलीं,
डाह की थैलियाँ, खनखनाती मिलीं।
आह की राह परवाह करती नहीं-
वाह की थाह नजरें भुलातीं मिलीं।।
दृष्टि थी लक्ष्य पर पंथ-पग भूलकर,
स्वप्न सत्ता के, सुख के ठगें झूलकर।
साध्य-साधन मलिन, मंजु मुखड़े हुए
हर सड़क के किनारे हैं उखड़े हुए,
धूसरित धूल में, अश्रु लिथड़े हुए.....
*
ज़िन्दगी बन्दगी बन न पायी कभी,
प्यास की रास हाथों न आयी कभी।
श्वास ने आस से नेह जोड़ा नहीं-
हास-परिहास कुलिया न भायी कभी।।
जो असल था तजा, जो नकल था वरा,
स्वेद को फेंककर, सिर्फ सिक्का ।
साध्य-साधन मलिन, मंजु उजड़े हुए
हर सड़क के किनारे हैं उखड़े हुए,
धूसरित धूल में, अश्रु लिथड़े हुए.....
३०-११-२०१२
*