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मंगलवार, 5 मई 2026

मई ५, ओशो, दोहा, विधाता छंद, जग छंद, कुमार रवींद्र, नवगीत

सलिल सृजन मई ५  

ओशो चिंतन: दोहा मंथन १.

लाओत्से ने कहा है, भोजन में लो स्वाद।
सुन्दर सी पोशाक में, हो घर में आबाद।।
रीति का मजा खूब लो
*
लाओत्से ने बताया, नहीं सरलता व्यर्थ।
रस बिन भोजन का नहीं, सत्य समझ कुछ अर्थ।।
रस न लिया; रस-वासना, अस्वाभाविक रूप।
ले विकृत हो जाएगी, जैसे अँधा कूप।।
छोटी-छोटी बात में, रस लेना मत भूल।
करो सलिल-स्पर्श तो, लगे खिले शत फ़ूल।
जल-प्रपात जल-धार की, शीतलता अनुकूल।।
जीवन रस का कोष है, नहीं मोक्ष की फ़िक्र।
जीवन से रस खो करें, लोग मोक्ष का ज़िक्र।।
मंदिर-मस्जिद की करे, चिंता कौन अकाम।
घर को मंदिर बना लो, हो संतुष्ट सकाम।।
छोटा घर संतोष से, भर होता प्रभु-धाम।
तृप्ति आदमी को मिले, घर ही तीरथ-धाम।।
महलों में तुम पाओगे, जगह नहीं है शेष।
सौख्य और संतोष का, नाम न बाकी लेश।।
जहाँ वासना लबालब, असंतोष का वास।
बड़ा महल भी तृप्ति बिन, हो छोटा ज्यों दास।।
क्या चाहोगे? महल या, छोटा घर; हो तृप्त?
रसमय घर या वरोगे, महल विराट अतृप्त।।
लाओत्से ने कहा है:, "भोजन रस की खान।
सुन्दर कपड़े पहनिए, जीवन हो रसवान।।"
लाओ नैसर्गिक बहुत, स्वाभाविक है बात।
मोर नाचता; पंख पर, रंगों की बारात।।
तितली-तितली झूमती, प्रकृति बहुत रंगीन।
प्रकृति-पुत्र मानव कहो, क्यों हो रंग-विहीन?
पशु-पक्षी तक ले रहे, रंगों से आनंद।
मानव ले; तो क्या बुरा, झूमे-गाए छंद।।
वस्त्राभूषण पहनते, थे पहले के लोग।
अब न पहनते; क्यों लगा, नाहक ही यह रोग?
स्त्री सुंदर पहनती, क्यों सुंदर पोशाक।
नहीं प्राकृतिक यह चलन, रखिए इसको ताक।।
पंख मोर के; किंतु है, मादा पंख-विहीन।
गाता कोयल नर; मिले, मादा कूक विहीन।।
नर भी आभूषण वसन, बहुरंगी ले धार।
रंग न मँहगे, फूल से, करे सुखद सिंगार।।
लाओ कहता: पहनना, सुन्दर वस्त्र हमेश।
दुश्मन रस के साधु हैं, कहें: 'न सुख लो लेश।।'
लाओ कहता: 'जो सहज, मानो उसको ठीक।'
मुनि कठोर पाबंद हैं, कहें न तोड़ो लीक।।
मन-वैज्ञानिक कहेंगे:, 'मना न होली व्यर्थ।
दीवाली पर मत जला, दीप रस्म बेअर्थ।।'
खाल बाल की निकालें, यह ही उनका काम।
खुशी न मिल पाए तनिक, करते काम तमाम।।
अपने जैसे सभी का, जीवन करें खराब।
मन-वैज्ञानिक शूल चुन, फेंके फूल गुलाब।।
लाओ कहता: 'रीति का, मत सोचो क्या अर्थ?
मजा मिला; यह बहुत है, शेष फ़िक्र है व्यर्थ।।
होली-दीवाली मना, दीपक रंग-गुलाल।
सबका लो आनंद तुम, नहीं बजाओ गाल।।
***
५-५-२०१८, १८.२०
दोहा मुक्तक
लता-लता पर छा रहा, नव वासंती रंग।
ताल ताल पर ताल दें, मछली सहित तरंग।।
नेह-नर्मदा में नहा, भ्रमर-तितलियाँ मौन-
कली-फूल पी मस्त हैं, मानो मद की भंग।।
५.५.२०१८
कृति चर्चा-
'अप्प दीपो भव' प्रथम नवगीतिकाव्य
चर्चाकार- आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
[कृति विवरण- अप्प दीपो भव, कुमार रवीन्द्र, नवगीतीय प्रबंध काव्य, आवरण बहुरंगी,सजिल्द जेकेट सहित, आकार २२ से.मी. x १४.५ से.मी., पृष्ठ ११२, मूल्य ३००/-, उत्तरायण प्रकाशन के ३९७ आशियाना, लखनऊ २२६०१२, ९८३९८२५०६२, रचनाकार संपर्क- क्षितिज ३१०, अर्बन स्टेट २ हिसार हरयाणा ०१६६२२४७३४७]
*
'अप्प दीपो भव' भगवान बुद्ध का सन्देश और बौद्ध धर्म का सार है। इसका अर्थ है अपने आत्म को दीप की तरह प्रकाशवान बनाओ। कृति का शीर्षक और मुखपृष्ठ पर अंकित विशेष चित्र से कृति का गौतम बुद्ध पर केन्द्रित होना इंगित होता है। वृक्ष की जड़ों के बीच से झाँकती मंद स्मितयुक्त बुद्ध-छवि ध्यान में लीन है। कृति पढ़ लेने पर ऐसा लगता है कि लगभग सात दशकीय नवगीत के मूल में अन्तर्निहित मानवीय संवेदनाओं से संपृक्तता के मूल और अचर्चित मानक की तरह नवगीतानुरूप अभिनव कहन, शिल्प तथा कथ्य से समृद्ध नवगीति काव्य का अंकुर मूर्तिमंत हुआ है।
कुमार रवीन्द्र समकालिक नव गीतकारों में श्रेष्ठ और ज्येष्ठ हैं। नवगीत के प्रति समीक्षकों की रूढ़ दृष्टि का पूर्वानुमान करते हुए रवीन्द्र जी ने स्वयं ही इसे नवगीतीय प्रबंधकाव्य न कहकर नवगीत संग्रह मात्र कहा है। एक अन्य वरिष्ठ नवगीतकार मधुकर अष्ठाना जी ने विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर द्वारा आयोजित संगोष्ठी में इसे 'काव्य नाटक' कहा है । अष्ठाना जी के अनुसार रचनाओं की प्रस्तुति नवगीत के शिल्प में तो है किन्तु कथ्य और भाषा नवगीत के अनुरूप नहीं है। यह स्वाभाविक है। जब भी कोई नया प्रयोग किया जाता है तो उसके संदर्भ में विविध धारणाएँ और मत उस कृति को चर्चा का केंद्र बनाकर उस परंपरा के विकास में सहायक होते हैं जबकि मत वैभिन्न्य न हो तो समुचित चर्चा न होने पर कृति परंपरा का निर्माण नहीं कर पाती।
एक और वरिष्ठ नवगीतकार निर्मल शुक्ल जी इसे नवगीत संग्रह कहा है। सामान्यत: नवगीत अपने आप में स्वतंत्र और पूर्ण होने के कारण मुक्तक काव्य संवर्ग में वर्गीकृत किया जाता है। इस कृति का वैशिष्ट्य यह है कि सभी गीत बुद्ध के जीवन प्रसंगों से जुड़े होने के साथ-साथ अपने आपमें हर गीत पूर्ण और अन्यों से स्वतंत्र है। बुद्ध के जीवन के सभी महत्वपूर्ण प्रसंगों पर रचित नवगीत बुद्ध तथा अन्य पात्रों के माध्यम से सामने आते हुए घटनाक्रम और कथावस्तु को पाठक तक पूरी संवेदना के साथ पहुँचाते हैं। नवगीत के मानकों और शिल्प से रचनाकार न केवल परिचित है अपितु उनको प्रयोग करने में प्रवीण भी है। यदि आरंभिक मानकों से हटकर उसने नवगीत रचे हैं तो यह कोई कमी नहीं, नवगीत लेखन के नव आयामों का अन्वेषण है।
काव्य नाटक साहित्य का वह रूप है जिसमें काव्यत्व और नाट्यत्व का सम्मिलन होता है। काव्य तत्व नाटक की आत्मा तथा नाट्य तत्व रूप व कलेवर का निर्माण करता है। काव्य तत्व भावात्मकता, रसात्मकता तथा आनुभूतिक तीव्रता का वाहक होता है जबकि नाट्य तत्व कथानक, घटनाक्रम व पात्रों का। अंग्रेजी साहित्य कोश के अनुसार ''पद्य में रचित नाटक को 'पोयटिक ड्रामा' कहते हैं। इनमें कथानक संक्षिप्त और चरित्र संख्या सीमित होती है। यहाँ कविता अपनी स्वतंत्र सत्ता खोकर अपने आपको नाटकीयता में विलीन कर देती है।१ टी. एस. इलियट के अनुसार कविता केवल अलंकरण और श्रवण-आनंद की वाहक हो तो व्यर्थ है।२ एबरकोम्बी के अनुसार कविता नाटक में पात्र स्वयं काव्य बन जाता है।३ डॉ. नगेन्द्र के मत में कविता नाटकों में अभिनेयता का तत्व महत्वपूर्ण होता है।४, पीकोक के अनुसार नाटकीयता के साथ तनाव व द्वंद भी आवश्यक है।५ डॉ. श्याम शर्मा मिथकीय प्रतीकों के माध्यम से आधुनिक युगबोध व्यंजित करना काव्य-नाटक का वैशिष्ट्य कहते हैं६ जबकि डॉ. सिद्धनाथ कुमार इसे दुर्बलता मानते हैं।७. डॉ. लाल काव्य नाटक का लक्षण बाह्य संघर्ष के स्थान पर मानसिक द्वन्द को मानते हैं।८.
भारतीय परंपरा में काव्य दृश्य और श्रव्य दो वर्गों में वर्गीकृत है। दृश्य काव्य मंचित किए जा सकते हैं। दृश्य काव्य में परिवेश, वेशभूषा, पात्रों के क्रियाकलाप आदि महत्वपूर्ण होते हैं। विवेच्य कृति में चाक्षुष विवरणों का अभाव है। 'अप्प दीपो भव' को काव्य नाटक मानने पर इसकी कथावस्तु और प्रस्तुतीकरण को रंगमंचीय व्यवस्थाओं के सन्दर्भ में भी आकलित करना होगा। कृति में कहीं भी रंगमंच संबंधी निर्देश या संकेत नहीं हैं। विविध प्रसंगों में पात्र कहीं-कहीं आत्मालाप तो करते हैं किन्तु संवाद या वार्तालाप नहीं हैं। नवगीतकार द्वारा पात्रों की मन: स्थितियों को सूक्ष्म संकेतों द्वारा इंगित किया गया है। कथा को कितने अंकों में मंचित किया जाए, कहीं संकेत नहीं है। स्पष्ट है कि यह काव्य नाटक नहीं है। यदि इसे मंचित करने का विचार करें तो कई परिवर्तन करना होंगे। अत:, इसे दृश्य काव्य या काव्य नाटक नहीं कहा जा सकता।
श्रव्य काव्य शब्दों द्वारा पाठकों और श्रोताओं के हृदय में रस का संचार करता है। पद्य, गद्य और चम्पू श्रव्यकाव्य हैं। गत्यर्थक में 'पद्' धातु से निष्पन ‘पद्य’ शब्द गति प्रधान है। पद्यकाव्य में ताल, लय और छन्द की व्यवस्था होती है। पद्यकाव्य के दो उपभेद महाकाव्य और खण्डकाव्य हैं। खण्डकाव्य को ‘मुक्तकाव्य’ भी कहते हैं। खण्डकाव्य में महाकाव्य के समान जीवन का सम्पूर्ण इतिवृत्त न होकर किसी एक अंश का वर्णन किया जाता है— खण्डकाव्यं भवेत्काव्यस्यैकदेशानुसारि च। – साहित्यदर्पण।
कवित्व व संगीतात्मकता का समान महत्व होने से खण्डकाव्य को ‘गीतिकाव्य’ भी कहते हैं। ‘गीति’ का अर्थ हृदय की रागात्मक भावना को छन्दोबद्ध रूप में प्रकट करना है। गीति की आत्मा भावातिरेक है। अपनी रागात्मक अनुभूति और कल्पना के कवि वर्ण्यवस्तु को भावात्मक बना देता है। गीतिकाव्य में काव्यशास्त्रीय रूढ़ियों और परम्पराओं से मुक्त होकर वैयक्तिक अनुभव को सरलता से अभिव्यक्त किया जाता है। स्वरूपत: गीतिकाव्य का आकार-प्रकार महाकाव्य से छोटा होता है। इस निकष पर 'अप्प दीपो भव' नव गीतात्मक गीतिकाव्य है। संस्कृत में गीतिकाव्य मुक्तक और प्रबन्ध दोनों रूपों में प्राप्त होता है। प्रबन्धात्मक गीतिकाव्य मेघदूत है। मुक्तक काव्य में प्रत्येक पद्य अपने आप में स्वतंत्र होता है। इसके उदाहरण अमरूकशतक और भतृहरिशतकत्रय हैं। संगीतमय छन्द व मधुर पदावली गीतिकाव्य का लक्षण है। इन लक्षणों की उपस्थित्ति 'अप्प दीपो भव' में देखते हुए इसे नवगीति काव्य कहना उपयुक्त है। निस्संदेह यह हिंदी साहित्य में एक नयी लीक का आरम्भ करती कृति है।
हिंदी में गीत या नवगीत में प्रबंध कृति का विधान न होने तथा प्रसाद कृत 'आँसू' तथा बच्चन रचित 'मधुशाला' के अतिरिक्त अन्य महत्त्वपूर्ण कृति न लिखे जाने से उपजी शून्यता को 'अप्प दीपो भव' भंग करती है। किसी चरिते के मनोजगत को उद्घाटित करते समय इतिवृत्तात्मक लेखन अस्वाभाविक लगेगा। अवचेतन को प्रस्तुत करती कृति में घटनाक्रम को पृष्ठभूमि में संकेतित किया जाना पर्याप्त है। घटना प्रमुख होते ही मन-मंथन गौड़ हो जाएगा। कृतिकार ने इसीलिये इस नवगीतिकाव्य में मानवीय अनुभूतियों को प्राधान्य देने हेतु एक नयी शैली को अन्वेषित किया है। इस हेतु लुमार रवीन्द्र साधुवाद के पात्र हैं।
बुद्ध को विष्णु का अवतार स्वीकारे जाने पर भी पर स्व. मैथिलीशरण गुप्त रचित यशोधरा खंडकाव्य के अतिरिक्त अन्य महत्वपूर्ण काव्य कृति नहीं है जबकि महावीर को विष्णु का अवतार न माने जाने पर भी कई कवत कृतियाँ हैं। कुमार रवीन्द्र ने बुद्ध तथा उनके जीवन काल में महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह करनेवाले पात्रों में अंतर्मन में झाँककर तात्कालिक दुविधाओं, शंकाओं, विसंगतियों, विडंबनाओं, उनसे उपजी त्रासदियों से साक्षात कर उनके समाधान के घटनाक्रम में पाठक को संश्लिष्ट करने में सफलता पाई है। तथागत ११, नन्द ५, यशोधरा ५, राहुल ५, शुद्धोदन ५, गौतमी २, बिम्बसार २, अंगुलिमाल २, आम्रपाली ३, सुजाता ३, देवदत्त १, आनंद ४ प्रस्तुतियों के माध्यम से अपने मानस को उद्घाटित करते हैं। परिनिर्वाण, उपसंहार तथा उत्तर कथन शीर्षकान्तार्गत रचनाकार साक्षीभाव से बुद्धोत्तर प्रभावों की प्रस्तुति स्वीकारते हुए कलम को विराम देता है।
गृह त्याग पश्चात बुद्ध के मन में विगत स्मृतियों के छाने से आरम्भ कृति के हर नवगीत में उनके मन की एक परत खुलती है. पाठक जब तक पिछली स्मृति से तादात्म्य बैठा पाए, एक नयी स्मृति से दो-चार होता है। आदि से अंत तक औत्सुक्य-प्रवाह कहीं भंग नहीं होता। कम से कम शब्दों में गहरी से गहरी मन:स्थिति को शब्दित करने में कुमार रवीन्द्र को महारथ हासिल है। जन्म, माँ की मृत्यु, पिता द्वारा भौतिक सुख वर्षा, हंस की प्राण-रक्षा, विवाह, पुत्रजन्म, गृह-त्याग, तप से बेसुध, सुजाता की खीर से प्राण-रक्षा, भावसमाधि और बोध- 'गौतम थे / तम से थे घिरे रहे / सूर्य हुए / उतर गए पल भर में / कंधों पर लदे-हुए सभी जुए', 'देह के परे वे आकाश हुए', 'दुःख का वह संस्कार / साँसों में व्यापा', 'सूर्य उगा / आरती हुई सॉंसें', ''देहराग टूटा / पर गौतम / अन्तर्वीणा साध न पाए', 'महासिंधु उमड़ा / या देह बही / निर्झर में' / 'सभी ओर / लगा उगी कोंपलें / हवाओं में पतझर में', 'बुद्ध हुए मौन / शब्द हो गया मुखर / राग-द्वेष / दोनों से हुए परे / सड़े हुए लुगड़े से / मोह झरे / करुना ही शेष रही / जो है अक्षर / अंतहीन साँसों का / चक्र रुका / कष्टों के आगे / सिर नहीं झुका / गूँजे धम्म-मन्त्रों से / गाँव-गली-घर / ऋषियों की भूमि रही / सारनाथ / करुणा का वहीं उठा / वरद हाथ / क्षितिजों को बेध गए / बुद्धों के स्वर'
गागर में सागर समेटती अभिव्यक्ति पाठक को मोहे रखती है। एक-एक शब्द मुक्तामाल के मोती सदृश्य चुन-चुन कर रखा गया है। सन्यस्त बुद्ध के आगमन पर यशोधरा की अकथ व्यथा का संकेतन देखें 'यशोधरा की / आँख नहीं / यह खारे जल से भरा ताल है... यशोधरा की / देह नहीं / यह राख हुआ इक बुझा ज्वाल है... यशोधरा की / बाँह नहीं / यह किसी ठूँठ की कटी डाल है... यशोधरा की / सांस नहीं / यह नारी का अंतिम सवाल है'। अभिव्यक्ति सामर्थ्य और शब्द शक्ति की जय-जयकार करती ऐसी अभिव्यक्तियों से समृद्ध-संपन्न पाठक को धन्यता की प्रतीति कराती है। पाठक स्वयं को बुद्ध, यशोधरा, नंद, राहुल आदि पात्रों में महसूसता हुआ सांस रोके कृति में डूबा रहता है।
कुमार रवींद्र का काव्य मानकों पर परखे जाने का विषय नहीं, मानकों को परिमार्जित किये जाने की प्रेरणा बनता है। हिंदी गीतिकाव्य के हर पाठक और हर रचनाकार को इस कृति का वाचन बार-बार करना चाहिए।
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संदर्भ- १. दामोदर अग्रवाल, अंग्रेजी साहित्य कोश, पृष्ठ ३१४।२. टी. एस. इलियट, सलेक्ट प्रोज, पृष्ठ ६८। ३. एबरकोम्बी, इंग्लिश क्रिटिक एसेज, पृष्ठ २५८। ४. डॉ. नगेंद्र, अरस्तू का काव्य शास्त्र, पृष्ठ ७४। ५. आर. पीकोक, द आर्ट ऑफ़ ड्रामा, पृष्ठ १६०। ६. डॉ. श्याम शर्मा, आधुनिक हिंदी नाटकों में नायक, पृष्ठ १५५। ७. डॉ. सिद्धनाथ कुमार, माध्यम, वर्ष १ अंक १०, पृष्ठ ९६। ८. डॉ. लक्ष्मी नारायण लाल, आधुनिक हिंदी नाटक और रंगमंच, पृष्ठ १०। ९.
***
दोहा दुनिया
*
सरहद पर सर काट कर, करते हैं हद पार
क्यों लातों के देव पर, हों बातों के वार?
*
गोस्वामी से प्रभु कहें, गो स्वामी मार्केट
पिज्जा-बर्जर भोग में, लाओ न होना लेट
*
भोग लिए ठाकुर खड़ा, करता दंड प्रणाम
ठाकुर जी मुस्का रहे, आज पड़ा फिर काम
*
कहें अजन्मा मनाकर, जन्म दिवस क्यों लोग?
भले अमर सुर, मना लो मरण दिवस कर सोग
*
ना-ना कर नाना दिए, है आकार-प्रकार
निराकार पछता रहा, कर खुद के दीदार
५-५-२०१७
***
मुक्तिका
*
वार्णिक छंद: अथाष्टि जातीय छंद
मात्रिक छंद: यौगिक जातीय विधाता छंद
1 2 2 2 , 1 2 2 2 , 1 2 2 2 , 1 2 2 2.
मुफ़ाईलुन,मुफ़ाईलुन, मुफ़ाईलुन,मुफ़ाईलुन।
बहरे हज़ज मुसम्मन सालिम।।
*
दियों में तेल या बाती नहीं हो तो करोगे क्या?
लिखोगे प्रेम में पाती नहीं भी तो मरोगे क्या?
.
बुलाता देश है, आओ! भुला दो दूरियाँ सारी
बिना गंगा बहाए खून की, बोलो तरोगे क्या?
.
पसीना ही न जो बोया, रुकेगी रेत ये कैसे?
न होगा घाट तो बोलो नदी सूखी रखोगे क्या?
.
परों को ही न फैलाया, नपेगा आसमां कैसे?
न हाथों से करोगे काम, ख्वाबों को चरोगे क्या?
.
न ज़िंदा कौम को भाती कभी भी भीख की बोटी
न पौधे रोप पाए तो कहीं फूलो-फलोगे क्या?
...
इस बह्र में कुछ प्रचलित गीत
१. तेरी दुनिया में आकर के ये दीवाने कहाँ जाएँ
मुहब्बत हो गई जिनको वो परवाने कहाँ जाएँ
२. मुझे तेरी मुहब्बत का सहारा मिल गया होता
३. चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाए हम दोनों
४. खुदा भी आसमाँ से जब जमीं पर देखता होगा
५. सुहानी रात ढल चुकी न जाने तुम कब आओगेे
६. कभी तन्हाइयों में भी हमारी याद आएगी
७. है अपना दिल तो अावारा न जाने किस पे आएगा
८. बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है
९. सजन रे! झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है
५-५-२०१७
***
दोहा प्रश्नोत्तर
कविता का है मूल क्या?,
और आप हैं कौन?
उत्तर दोनों प्रश्न का,
'सलिल' एक है- 'मौन'..
नवगीत:
*
जिन्स बना
बिक रहा आजकल
ढाई आखर
.
दाँत दूध के टूट न पाये
पर वयस्क हैं.
नहीं सुंदरी नर्स इसलिए
अनमयस्क हैं.
चूस रहे अंगूठा लेकिन
आँख मारते
बाल भारती पढ़ न सके
डेटिंग परस्त हैं
हर उद्यान
काम-क्रीड़ा हित
इनको बाखर
जिन्स बना
बिक रहा आजकल
ढाई आखर
.
मकरध्वज घुट्टी में शायद
गयी पिलायी
वात्स्यायन की खोज
गर्भ में गयी सुनायी
मान देह को माटी माटी से
मिलते हैं
कीचड किया, न शतदल कलिका
गयी खिलायी
मन अनजाना
तन इनको केवल
जलसाघर
जिन्स बना
बिक रहा आजकल
ढाई आखर
५-५-२०१५
***
छंद सलिला:
जग छंद
*
छंद-लक्षण: जाति रौद्राक, प्रति चरण मात्रा २३ मात्रा, यति १० - ८ - ५, चरणान्त गुरु लघु (तगण, जगण) ।
लक्षण छंद:
कदम-कदम मंज़िल / को छू पायें / पग आज
कोशिश-शीश रखेँ / अनथक श्रम कर / हम ताज
यति दस आठ पाँच / पर, गुरु लघु हो / चरणांत
तेइस मात्री जग / रच कवि पा यश / इस व्याज
उदाहरण:
१. धूप-छाँव, सुख-दुःख / धीरज धरकर / ले झेल
मन मत विचलित हो / है यह प्रभु / का खेल
सच्चे शुभ चिंतक / को दुर्दिन मेँ / पहचान
संग रहे तम मेँ / जो- हितचिंतक / मतिमान
२. चित्रगुप्त परब्रम्ह / ही निराकार / साकार
कंकर-कंकर मेँ / बसते लेकर / आकार
घट-घटवासी हैं / तन में आत्मा / ज्यों गुप्त
जागृत देव सदैव / होते न कभी / भी सुप्त
३. हम सबको रहना / है मिलकर हर/दम साथ
कभी न छोड़ेंगे / हमने थामे / हैं हाथ
एक-नेक होँ हम / सब भेद करें/गे दूर
'सलिल' न झुकने दें/गे हम भारत / का माथ
५-५-२०१४
***
मुखपुस्तकी गपशप- स्त्री विमर्श
women are like vehicles, everyone appreciate the outside beauty, but the inner beauty is embraced by her owner- - पायल शर्मा
*
संजीव
'स्त्री वाहन नहीं, संस्कृति की वाहक है.
मानव मूल्यों की स्त्री ही तो चालक है..
वाहन की चाबी कोई भी ले सकता है.
चाबी लगा घुमा कर उसको खे सकता है.
स्त्री चाबी बना पुरुष को सदा घुमाती.
जब जी चाहे रोके, उठा उसे दौडाती.
विधि-हरि-हर पर शारद-रमा-उमा हावी हैं.
नव दुर्गा बन पुजती स्त्री ही भावी है'
*
नवीन चतुर्वेदी, मुम्बई- आपकी भाषा जानी पहचानी सी लगती है |
*
राज भाटिया- बहुत सुंदर लगी आप की यह कविता
*
संजीव
स्त्री सदा 'नवीन' है, पुरुष सदा प्राचीन.
'राज' करे नाराज हो, यह उँगली वह बीन..
कौन 'चतुर्वेदी' जिसे, यह चतुरा न नचाय.
भाट बने जो 'भाटिया', का ख़िताब वह पाय..
नाच इशारों पर 'सलिल', तभी रहेगी खैर.
देव न दानव बच सके, स्त्री से कर बैर..
*
नवींन चतुर्वेदी
बात करें यूँ सार की, लगती मगर अजीब |
उनका ही तो नाम है, वर्मा सलिल संजीव ||
*
संजीव
बात सार की चाहता, करता जगत असार.
मतभेदों को पोसते, 'सलिल' न पालें प्यार..
है 'नवीन' जो आज वह, कल होता प्राचीन.
'राज' स्वराज विराजता, पर जनगण है दीन..
*
५.५.२०१०
प्रश्नोत्तर
कविता का है मूल क्या?,
कवि होता है कौन?
उत्तर दोनों प्रश्न का,
'सलिल' एक है- 'मौन'..
५-५-२०१०

गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

ओशो, रेलगाड़ी, भारतीय रेलवे, बेगम अखतर, सॉनेट,

सॉनेट
रेलगाड़ी
रेलगाड़ियाँ दौड़ रही हैं।
पूरब-पच्छिम-उत्तर-दक्खिन।
सबको पीछे छोड़ रही हैं।।
करें सफर हर साँझ-रात-दिन।।
कौन बताए कितने चक्के?
बोगी-बर्थ-सीट हैं कितनी?
खातीं, देतीं कितने धक्के?
सहनशक्ति है ईश्वर जितनी।।
जितना पैसा, उतनी सुविधा।
बिना टिकट मत चढ़ो मुसाफिर।
रखना मन में तनिक न दुविधा।।
लड़ना हर मुश्किल से डटकर।।
सबसे लेती होड़ रही हैं।
रेलगाड़ियाँ दौड़ रही हैं।।
२१-४-२०२३
●●●
ओशो और रेलगाड़ी
यह बात वर्ष १९६० की है। ओशो इटारसी (म.प्र.) के एक महाविद्यालय में व्याख्यान देने आये थे। व्याख्यान के तुरंत बाद उन्हें ट्रेन से जबलपुर के लिये रवाना होना था।

स्टेशन आते समय रास्ते में किसी कारण थोड़ी देर हो गई। कुछ मित्र उन्हें विदा करने रेलवे स्टेशन आये थे। इटारसी बड़ा रेलवे जंक्शन हैं जिसमें कई प्लेटफॉर्म्स हैं, जिनमें फुट ओवरब्रिज से जाना होता है।
अभी ओशो फुट ओवरब्रिज पर ही थे, देखा कि उन्हें जिस ट्रेन से जाना था वह चलना शुरू हो गयी है। मित्रों ने कहा भी कि अब नीचे जाने का कोई फ़ायदा नहीं है, जब तक हम नीचे पहुँचेंगे तब तक ट्रेन निकल चुकी होगी। चलिए वापस चलते हैं।
ओशो मुस्कुराए, बोले नहीं, नीचे चल कर देखते हैं। उन्होंने कोई जल्दबाज़ी नहीं दिखाई, अपनी सामान्य चाल से चलते हुए आराम से सीढ़ियाँ उतर कर प्लेटफार्म पर पहुँचे। न चाहते हुए भी मित्र उनके साथ नीचे आये।
देखा गाड़ी प्लेटफार्म के बाहर निकल कर अचानक रुक गई और वापस पीछे आने लगी। जिस डिब्बे में ओशो का आरक्षण था वह ठीक वहीं आकर रुका जहां वे खड़े हुए थे।
टीसी बाहर आया और बोला, आइये आचार्य जी। मित्रों से विदा ले ओशो गाड़ी में सवार हुए और गाड़ी चल दी। आश्चर्यचकित मित्र देखते ही रह गये।
बाद में इस बारे में किसी ने ओशो से पूछा भी तो उन्होंने हँस कर टाल दिया। कहा कि शायद कुछ ज़रूरी सामान लोड होने से रह गया होगा जिसे लोड करने गाड़ी को पीछे लौटना पड़ा और यह मात्र एक संयोग था कि डिब्बा ठीक मेरे सामने आकर रुका।
दूसरी घटना भी रेलयात्रा से ही संबंधित है।
उन दिनों, 1960 के दशक में सूचनाओं का आदान-प्रदान मुख्यतः पत्राचार द्वारा ही हुआ करता था। भारतीय डाक सेवा भी अपनी श्रेष्ठ कार्यक्षमता के लिए जानी जाती थी। भारत के किसी भी कोने में पत्र केवल ३-४ दिन में पहुँच जाता था।
ओशो के प्रवचन एवम ध्यान के कार्यक्रम देश के विभिन्न हिस्सों में आयोजित हुआ करते थे। ओशो 1-2 सप्ताह पूर्व ही आयोजकों को पत्र द्वारा सूचित कर दिया करते थे कि वे किस ट्रेन से किस समय वहाँ पहुँचेंगे। गुजरात में एक ध्यान शिविर आयोजित था।
ओशो ने सप्ताह पूर्व ही आयोजकों को पत्र लिख कर ट्रेन और उसके वहाँ पहुँचने का समय सूचित कर दिया।
आयोजक मित्रों को पत्र पढ़ कर हैरानी हुईं, ओशो ने जिस ट्रेन का नाम लिखा था और उसके पहुँचने का जो समय लिखा था वह उस ट्रेन के नियत समय से मेल नहीं खाता था।
ख़ैर, नियत दिन पर आयोजक मित्र उस ट्रेन के नियत समय पर उन्हें लेने स्टेशन पहुँचे। स्टेशन पहुँच कर पता चला कि ट्रेन कुछ देर से चल रही हैं। बाद में घोषणा हुई कि और लेट हो गई हैं।
मित्रों के विस्मय का तब ठिकाना न रहा जब ट्रेन ठीक उसी समय पहुँची जो ओशो ने अपने पत्र में लिखा था। ओशो के ट्रेन से उतरते ही मित्रों का पहला प्रश्न यही था कि आपको कैसे पता था कि आज ट्रेन इस समय यहाँ पहुँचेगी?
ओशो हँसने लगे और बोले मुझे कुछ पता नहीं था वह गलती से लिख दिया होगा। भूल तो सभी से हो जाती है।
***
बेगम अखतर सिगरेट और ट्रेन 
क्या कभी आपने सुना है कि सिगरेट पीने के लिए किसी ने पूरी ट्रेन रुकवा दी हो। या फिर आपने कभी सुना हो कि सिगरेट की लत किसी इंसान पर इतनी हावी हो सकती है कि उसे एक फिल्म को पूरा देखने के लिए छह दफा टिकट खरीदकर सिनेमा हॉल में जाना पड़ा हो। वैल, करना तो दूर, कोई आम इंसान ऐसी हरकत करने के बारे में सोच भी नहीं सकता। लेकिन आज जिस शख्सियत की कहानी मैं आपको सुनाऊंगा, उसने ये दोनों कारनामे किए हैं। कौन है ये हस्ती? चलिए, जान लेते हैं।
भारतीय शास्त्रीय संगीत में जो मुकाम बेगम अख्तर उर्फ अख्तरी बाई ने हासिल किया है वो कोई और फिर कभी ना कर सका। वो कईयों के लिए अम्मी थी। कईयों की बेगम अख्तर थी। और जाने कितने लोग उन्हें बेतहाशा चाहते थे। बेगम अख्तर को चाहने वालों में अमीर-गरीब का कोई फर्क नहीं था। हर दर्जे के लोग बेगम अख्तर और उनकी गायकी से बेपनाह मुहब्बत किया करते थे।
दादरा और ठुमरी की एक्सपर्ट कहलाए जाने वाली बेग़म अख़्तर की ज़िंदगी की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं है। यही वजह है कि बेगम अख्तर के बारे में वक्त-वक्त पर बहुत से लेखकों ने बहुत कुछ लिखा है। पर इस लेख में हम उनकी ज़िंदगी की कहानी नहीं, बल्कि उनसे जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें जानेंगे।
7 अक्टूबर 1914 को बेगम अख्तर का जन्म फैज़ाबाद में हुआ था। इनकी मां मुश्तरी बेगम इन्हें प्यार से बिब्बी कहकर पुकारती थी। बिब्बी के पिता असग़र हुसैन लखनऊ के एक नामदार वकील थे। मुश्तरी बेगम उनकी दूसरी पत्नी थी। कहा जाता है कि बिब्बी यानि बेगम अख्तर की मां मुश्तरी बेगम पहले एक कोठे पर गाने का काम किया करती थी। वहीं पर उनकी मुलाकात असग़र हुसैन से हुई थी। पहले से शादीशुदा असग़र हुसैन मुश्तरी बेगम को अपना दिल दे बैठे और उन्होंने मुश्तरी बेगम से शादी कर ली।
शादी के एक साल बाद ही मुश्तरी बेगम ने दो जुड़वा बेटीयों को जन्म दिया। एक थी बिब्बी और दूसरी थी ज़ोहरा। दोनों बच्चियां जब महज़ चार साल की थी तो किसी ने इन दोनों को ज़हरीली मिठाईयां खिला दी। बिब्बी तो किसी तरह बच गई। लेकिन उनकी बहन ज़ोहरा ना बच सकी। बेटी खोने के ग़म से मुश्तरी बेगम अभी ठीक से उबर भी नहीं पाई थी कि पति असग़र हुसैन ने भी उन्हें और उनकी बेटी बिब्बी को छोड़ दिया। मुश्तरी बेग़म के लिए ज़िंदगी बेहद मुश्किल हो गई।
बेटी की परवरिश करने में उन्हें परेशानी होने लगी। दूसरी तरफ बेटी अख्तरी उर्फ बिब्बी का मन भी पढ़ाई में नहीं लगता था। बिब्बी की दिलचस्पी शेरो शायरी में ज़्यादा थी। शुरु में तो मुश्तरी बेग़म इसके सख्त खिलाफ थी लेकिन बाद में वो भी मान गई। और फिर शुरु हुआ संगीत की तालीम बिब्बी का सफर। उस्ताद इमदाद ख़ान और उस्ताद अता मोहम्मद खान इनकी तालीम के सफर के शुरूआती गुरू रहे। बाद में ये कलकत्ता आ गई और यहां इन्होंने उस्ताद मोहम्मद खान, उस्ताद अब्दुल वहीद खान और उस्ताद झंडे खान से इंडियन क्लासिकल म्यूज़िक की तालीम हासिल की।
बेग़म अख्तर 15 साल की थी जब उन्होंने पहली दफा स्टेज पर गज़ल गायकी की थी। तब तक वो अपना नाम बिब्बी से बदलकर अख्त़री बाई फैज़ाबादी कर चुकी थी। कांपते पैरों संग अख्त़री बाई ने अपनी पहली गज़ल परफॉर्मेंस दी थी। और जैसे ही उनकी वो परफॉर्मेंस खत्म हुई, हिंदुस्तान में गज़ल गायकी के एक नए अध्याय की शुरूआत हो गई।
ये कहीं से कहीं तक भी तय नहीं था कि अख्तरी बाई कोलकाता में हुए उस प्रोग्राम में गाएंगी। देश के कई दिग्गज कलाकारों ने उस प्रोग्राम में शिरकत की थी। उस्ताद अमान अली खान साहब और उनके नौजवान शागिर्द उस्ताद बिस्मिल्लाह खान भी उस प्रोग्राम में मौूजद थे। प्रोग्राम जब अपने दूसरे हिस्से में पहुंचा तो अचानक आयोजकों के बीच अफरा-तफरी मच गई। एक बड़े कलाकार ने ऐन वक्त पर प्रोग्राम में आने से इन्कार कर दिया था।
आयोजकों को समझ में नहीं आ रहा था कि उस कलाकार की जगह अब किससे गवाया जाए। तब उस्ताद अता मोहम्मद खान ने आयोजकों से कहा कि उनकी एक शागिर्द है। उससे गवा दिया जाए। आगे जो होगा उसका अल्लाह मालिक है। वहीं दूसरी तरफ हॉल में बैठे दर्शकों ने भी शोर मचाना शुरू कर दिया था। आखिरकार लोग टिकट खरीदकर वो प्रोग्राम देखने आए थे। उस्ताद अता मोहम्मद ख़ान के कहने पर कांपती टांगो से अख़्तरी बाई फ़ैज़ाबादी स्टेज पर आई और आंख बंद करके उन्होंने अल्लाह को याद किया। फिर उन्होंने छेड़ा मुमताज़ बेग़म का मशहूर कलाम,"तूने बुत-ए-हरजाई, कुछ ऐसी अदा पाई। तकता है तेरी ओर हर एक तमाशाई।"
उस हॉल में बैठे लोग अख़्तरी बाई की आवाज़ की कशिश के दीवाने हो गए। एक के बाद एक अख़तरी बाई ने चार गज़लें सुना दी। तालियों की गड़गड़ाहट के साथ जब वो प्रोग्राम खत्म हुआ तो एक महिला अख़्तरी बाई के पास आई और बोली,"मैं कुछ ही देर के लिए इस प्रोग्राम में आई थी। लेकिन जब तुम्हें सुना तो फिर जाने का मन ही नहीं किया। अब कल तुम मुझे सुनने आना।" उस महिला ने अख़्तरी बाई को खादी की एक साड़ी तोहफे में दी। वो महिला थी भारत की स्वर कोकिला सरोजिनी नायडू।
अख्तरी बाई फैज़ाबादी यानि बेग़म अख्तर को तनहाई से बड़ा डर लगता था। उन्हें तनहाई का इतना खौफ था कि होटल के अपने कमरे में वो कभी भी अकेले नहीं ठहरती थी। तनहाई की वजह से ही उन्होंने शराब और सिगरेट को अपना साथी बना लिया था। लोग कहते हैं कि वो चेन स्मोकर थी। सिगरेट की लत की इस कदर शिकार थी कि रमज़ान के महीने में रोज़े भी बमुश्किल ही रख पाती थी।
बेग़म अख्तर की सिगरेट की तलब से एक बड़ा ही दिलचस्प किस्सा जुड़ा है। हुआ कुछ यूं कि एक दफा बेग़म ट्रेन में सफर कर रही थी। सफ़र के दौरान जब सिगरेट खत्म हो गई तो बेगम अख्तर टेंशन में आ गई। वो सिगरेट की लत की इतनी ज़्यादा शिकार थी कि जैसे ही एक स्टेशन पर ट्रेन रुकी तो बेग़म फौरन ट्रेन से उतरकर स्टेशन पर सिगरेट की दुकान तलाशने लगी। लेकिन पूरे स्टेशन पर ना तो उन्हें सिगरेट की कोई दुकान नज़र आई और ना ही कोई शख़्स ही सिगरेट बेचता हुआ नज़र आया।
बेग़म दौड़ती हुई ट्रेन के गार्ड के पास पहुंची और उससे अपने लिए सिगरेट लाने के लिए कहा। शुरू में तो गार्ड ऐसा करने के लिए कतई तैयार नहीं हुआ। मगर बेग़म अख्तर सिगरेट की तलब के सामने इतनी बेबस हो रही थी कि उन्होंने गार्ड से उसका लालटेन और हरा झंडा छीन लिया। फिर तो मजबूरी में गार्ड को स्टेशन के बाहर जाकर बेग़म के लिए सिगरेट का एक पैकेट खरीदकर लाना ही पड़ा। तब कहीं जाकर ट्रेन आगे रवाना हो सकी।
बेग़म की सिगरेट की आदत से ही एक और कहानी जुड़ी है। दरअसल, बेग़म अख़्तर ने पाकिज़ा फिल्म को सिनेमा हॉल में छह दफा देखा था। और वो इसलिए, क्योंकि बेग़म सिगरेट पीने के लिए फिल्म छोड़कर बाहर चली जाती थी। और जब तक वो वापस लौटती थी तो तब फिल्म काफी आगे निकल चुकी होती थी। इस दौरान फिल्म के कई सीन्स छूट जाते थे। इसलिए बेग़म ने छह दफा टिकट खरीदकर पाकिज़ा फिल्म देखी और तब जाकर उनकी ये फिल्म पूरी हुई।
***

बुधवार, 11 मार्च 2026

भारतीय रेल, ओशो,

 ओशो और भारतीय रेल 

यह बात वर्ष 1960 की है। ओशो इटारसी (म.प्र.) के एक महाविद्यालय में व्याख्यान देने आये थे। व्याख्यान के तुरंत बाद उन्हें ट्रेन से जबलपुर के लिये रवाना होना था। स्टेशन आते समय रास्ते में किसी कारण थोड़ी देर हो गई। कुछ मित्र उन्हें विदा करने रेलवे स्टेशन आये थे। इटारसी बड़ा रेलवे जंक्शन हैं जिसमें कई प्लेटफॉर्म्स हैं, जिनमें फुट ओवरब्रिज से जाना होता है। अभी ओशो फुट ओवरब्रिज पर ही थे, देखा कि उन्हें जिस ट्रेन से जाना था वह चलना शुरू हो गयी है। मित्रों ने कहा भी कि अब नीचे जाने का कोई फ़ायदा नहीं है, जब तक हम नीचे पहुँचेंगे तब तक ट्रेन निकल चुकी होगी। चलिए वापस चलते हैं।

ओशो मुस्कुराए, बोले नहीं, नीचे चल कर देखते हैं। उन्होंने कोई जल्दबाज़ी नहीं दिखाई, अपनी सामान्य चाल से चलते हुए आराम से सीढ़ियाँ उतर कर प्लेटफार्म पर पहुँचे। न चाहते हुए भी मित्र उनके साथ नीचे आये। देखा गाड़ी प्लेटफार्म के बाहर निकल कर अचानक रुक गई और वापस पीछे आने लगी। जिस डिब्बे में ओशो का आरक्षण था वह ठीक वहीं आकर रुका जहां वे खड़े हुए थे। कंडक्टर बाहर आया और बोला, आइये आचार्य जी। मित्रों से विदा ले ओशो गाड़ी में सवार हुए और गाड़ी चल दी। आश्चर्यचकित मित्र देखते ही रह गये।

बाद में इस बारे में किसी ने ओशो से पूछा भी तो उन्होंने हँस कर टाल दिया। कहा कि शायद कुछ ज़रूरी सामान लोड होने से रह गया होगा जिसे लोड करने गाड़ी को पीछे लौटना पड़ा और यह मात्र एक संयोग था कि डिब्बा ठीक मेरे सामने आकर रुका।

दूसरी घटना भी रेलयात्रा से ही संबंधित है।

उन दिनों, 1960 के दशक में सूचनाओं का आदान-प्रदान मुख्यतः पत्राचार द्वारा ही हुआ करता था। भारतीय डाक सेवा भी अपनी श्रेष्ठ कार्यक्षमता के लिए जानी जाती थी। भारत के किसी भी कोने में पत्र केवल ३-४ दिन में पहुँच जाता था।

ओशो के प्रवचन एवम ध्यान के कार्यक्रम देश के विभिन्न हिस्सों में आयोजित हुआ करते थे। ओशो 1-2 सप्ताह पूर्व ही आयोजकों को पत्र द्वारा सूचित कर दिया करते थे कि वे किस ट्रेन से किस समय वहाँ पहुँचेंगे। गुजरात में एक ध्यान शिविर आयोजित था। ओशो ने सप्ताह पूर्व ही आयोजकों को पत्र लिख कर ट्रेन और उसके वहाँ पहुँचने का समय सूचित कर दिया।

आयोजक मित्रों को पत्र पढ़ कर हैरानी हुईं, ओशो ने जिस ट्रेन का नाम लिखा था और उसके पहुँचने का जो समय लिखा था वह उस ट्रेन के नियत समय से मेल नहीं खाता था। ख़ैर, नियत दिन पर आयोजक मित्र उस ट्रेन के नियत समय पर उन्हें लेने स्टेशन पहुँचे। स्टेशन पहुँच कर पता चला कि ट्रेन कुछ देर से चल रही हैं। बाद में घोषणा हुई कि और लेट हो गई हैं। मित्रों के विस्मय का तब ठिकाना न रहा जब ट्रेन ठीक उसी समय पहुँची जो ओशो ने अपने पत्र में लिखा था। ओशो के ट्रेन से उतरते ही मित्रों का पहला प्रश्न यही था कि आपको कैसे पता था कि आज ट्रेन इस समय यहाँ पहुँचेगी?

ओशो हँसने लगे और बोले मुझे कुछ पता नहीं था वह गलती से लिख दिया होगा। भूल तो सभी से हो जाती है।

सोमवार, 19 जनवरी 2026

जनवरी १९, चित्रगुप्त, शिव, सोरठा, सॉनेट, बिरजू, कालगणना, ब्राह्मण, ओशो, विवाह दिवस, नवगीत, लघुकथा,

सलिल सृजन जनवरी १९
आज विवाह दिवस 
काशी-क्रंदन
.
काशी-क्रंदन 
रहा अनसुना
प्रभु की मरजी
.
मंदिर घायल
प्रतिमा रोई
ध्वस्त कँगूरे।
आहत जन-मन
हो हताश चुप
मरघट घूरे।
बुलडोजर की
गड़गड़ सुनकर
फेंके अरजी।
काशी-क्रंदन 
रहा अनसुना
प्रभु की मरजी
.
कंकर कंकर  
बसते शंकर 
सत्य सनातन।
मिला धूल में
भवन पुरातन
ठठा प्रशासन।
सत्य छिपाए
लोक रुदन को
कहकर फरजी।
काशी-क्रंदन 
रहा अनसुना
प्रभु की मरजी
.
तोड़ो मढ़िया
शीश झुकाकर
पड़ता जाना।
वैरागी को
महल निवासी
कर दें, ठाना।
क्रीत मीडिया
अंधभक्ति की
करतल गरजी।
काशी-क्रंदन 
रहा अनसुना
प्रभु की मरजी
१९.१.२०२६
०००
सामयिक गीत
घट-घटवासी
घट-घटवासी!
मरघट तजकर
रहो महल में
बनो विकासी।
.
गाँजा-भाँग, धतूरा छोड़ो
मिष्ठान्नों से नाता जोड़ो।
राख-भभूत न अंग सजाओ
कर श्रंगार जगत मन भाओ।
पाँच सितारा 
स्वर्णालय में
वी आई पी बन
रहो प्रवासी।
घट-घटवासी!
मरघट तजकर
रहो महल में
बनो विकासी।
.
वामन की विराट प्रतिमाएँ
दानव भी छोटे पड़ जाएँ।
त्याग-योग-वैराग न भाए
राग-भोग-संपदा सुहाएँं।
धनकुबेर ही
दर्शन पाएँ,
कंगालों प्रति
रखो उदासी
घट-घटवासी!
मरघट तजकर
रहो महल में
बनो विकासी।
.
उन्हें न देखो जो कतार में 
सुख नगदी में, नहिं उधार में।
वरण करेगी राजकुमारी 
मायापति को, तज त्रिपुरारी।
पहले डेटिंग
फिर लिव इन का
युग समझो भी
है आभासी
घट-घटवासी!
मरघट तजकर
रहो महल में
बनो विकासी।
.
पार्टी-चंदा, गोरखधंधा
मारक है चुनाव का फंदा।
अंधभक्ति जुमले अय्यारी
नफ़रत, घृणा विभाजनकारी।
नेता करता
हर दल का हर
कह अन्यों को
कुर्सीवासी।
घट-घटवासी!
मरघट तजकर
रहो महल में
बनो विकासी।
.
तनिक किसी से न्यून न कोई
किया भरोसा जनता रोई।
चट्टे-बट्टे इक थैली के
सब धारक चादर मैली के।
स्वार्थ साध्य सब
सत्ता कामी
जनहित-रवि को
गहन खग्रासी।
घट-घटवासी!
मरघट तजकर
रहो महल में
बनो विकासी।
१९.१.२०२६
०००
प्रभु श्री चित्रगुप्त जी का पवित्र ग्रंथों में महिमा वर्णन
- ०१. ऋग्वेद अध्याय ४,५,६ सूत्र ९-१-२४ अध्याय १७ सूत्र १०७ /१० - ७-२४ में। ऋग्वेद गायत्री मंत्र-
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे श्री चित्रगुप्तायधीमहि तन्नो गुप्त: प्रचोदयात् ।
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे श्री चित्रगुप्तायधीमहि तन्नो कवि लेखक: प्रचोदयात्।
ऋग्वेद नमस्कार मंत्र में - यमाय धर्मराजाय श्री चित्रगुप्ताय वै नम:।
ॐ सचित्र: चित्रं विन्तये तमस्मै चित्रक्षत्रं चित्रतम वयोधाम् चंद्ररायो पुरवौ ब्रहभूयं चंद्र चंद्रामि गृहीते यदस्व:।
२- अर्थववेद- अध्याय १३-२-३२ के आश्वलायन स्त्रोत ४-१२-३ श्री चित्रश्वि कित्वान्महिष: सुपर्ण आरोचयन रोदसी अन्तरिक्षम् आखलायन क्षति। सचित्रश्रीचित्र चिन्तयंत मस्वो अग्निरीक्षे व्रहत: क्षत्रियस्य ।
३- पद्मपुराण - सृष्टिखण्ड व पातालखण्ड के अध्याय ३१ में, भूखण्ड के अध्याय १६, ६७, ६८ व स्वर्गखण्ड - चित्रगुप्त जी के नाम- यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक, वैवस्त, सर्वभूतक्षय, औदम्बर, घघ्न, परमेष्ठी, बृकोदराय, श्रीचित्रगुप्त, चित्र, काल, नीलाम।
४- अग्नि पुराण - श्री चित्रगुप्त प्रणम्यादौ - वात्मानं सर्वदेहिनाम् । कायस्थअवतरण यथार्थ्यान्वेषणेेनोच्यते मया।। येनेदं स्वेच्छया सर्व मायया मोहित्जगत। राजयत्यजित: श्रीमान कायस्थ परमेश्वर:।।
५- गरुण पुराण - ब्रह्माणा निर्मित: पूर्णा विष्णुना पालितं यदा यद्र संहार मूर्तिश्व ब्रह्मण: तत: वायु सर्वगत सृष्ट: सूर्यस्तेजो विवृद्धिमान धर्मराजस्तत: सृष्टिश्चित्रगुप्तेन संयुत: ।
६- शिव पुराण में उमासंहिता अध्याय ७ में व अग्निपुराण अघ्याय २० व ३७० में - मार्कण्डेय धर्मराज श्रीचित्रगुप्तजी को 'कायस्थ' कहा गया है। शिव पुराण ज्ञान संहिता ध्याय १६- श्री चित्रगुप्त जी, भगवान शंकरजी के विवाह में शामिल हैं।
७- वशिष्ठ पुराण में - भगवान राम के विवाह में भगवान श्री राम जी के द्वारा सर्वप्रथम आहुति परमात्मा श्री चित्रगुप्त जी को दी गई।
८- लिंग पुराण में - अध्याय ९८ में शिवजी का नाम 'भक्त कायस्थ' लिखा है।
९- ब्रह्म पुराण में - अध्याय २-५-5५६ में श्री चित्रगुप्तजी परम न्यायाधीश का कार्य करते हैं।
१० - मत्स्य पुराण में -
श्री चित्रगुप्त जी को केतु, दाता, प्रदाता, सविता, प्रसविता, शासत:, आमत्य, मंत्री, प्राज्ञ, ललाट का विधाता, धर्मराज, न्यायाधीश, लेखक, सैनिक, सिपाहियों का सरदार, याम्यसुब्रत, परमेश्वर, घमिष्ठ, यम कहा गया है।
११- ब्रह्मावर्त पुराण में - श्री चित्रगुप्त जी का वर्णन है।
१२- कूर्म पुराण में - पूर्व भाग अध्याय ४० में।
१३- भविष्य पुराण में - उत्तराखण्ड अध्याय ८९ में।
१४- स्कन्द पुराण में - श्री चित्रगुप्त जी के अवतरण का वर्णन है।
१५- यम संहिता में - उदीच्य वेषधरं सौम्यंदर्शनम् द्विभुजं केतु प्रत्याउयधिदेवं श्रीचित्रगुप्तं आवाह्यमि। चितकेत दीता प्रदाता सविता प्रसादिता शासनानमन्त:।
उपनिषदों में - श्री चित्रगुप्त जी का वर्णन
१६- कठोपनिषद् में - यम के नाम से श्री चित्रगुप्त जी का वर्णन।
१७- वाल्मीकि रामायण में - आत्मज्ञानी जनक ने श्री चित्रगुप्त जी का पूजन किया।
१८- महाभारत अनुशासन पर्व में - श्रीकृष्ण चँद्र वासुदेव जी ने सर्वप्रथम श्री चित्रगुप्त जी का पूजन किया है -
मषिभाजन सुयुक्तश्चरसित्वं महीतले
लेखनी कटनी हस्ते श्री चित्रगुप्त: नमस्तुते।
•••
***
सोरठा सलिला
जो करते संदेह, शांत न हो सकते कभी।
कर विश्वास विदेह, रहे शांत ही हमेशा।।
दिखती भले विराट, निराधार गिरती लहर।
रह साहस के घाट, जीत अविचलित रह सलिल।।
मिले वहीं आनंद, भय बंधन कटते जहाँ।
गूँजा करते छंद, मन के नीलाकाश में।।
कर्म स्वास्थ्य अनुभूति, संगत मिल परिणाम दें।
शुभ की करें प्रतीति, हों असीम झट कर विलय।।
सोच सकारात्मक रखें, जीवन हो सोद्देश्य।
कार्य निरंतर कीजिए, पूरा हो उद्देश्य।।
जीवन केवल आज, नहीं विगत; आगत नहीं।
पल पल करिए काज, दें संदेश किशन यही।।
मन के अंदर झाँक, अटक-भटक मत बावरे।
खुद को कम मत आँक, साथ हमेशा साँवरे।।
हुए मूल से दूर, ज्यों त्यों ही असहाय हम।
आँखें रहते सूर, मिले दर्द-दुख अहं से।।
•••
सॉनेट
बिरजू महाराज
*
ताल-थाप घुँघरू मादल
एक साथ हो मौन गए
नृत्य कथाएँ कौन कहे?
कौन भरे रस की छागल??
रहकर भी थे रहे नहीं
अपनी दुनिया में थे लीन
रहे सुनाते नर्तन-बीन
जाकर भी हो गए नहीं
नटसम्राट अनूठे तुम
फिर आओ पथ हेरें हम
नहीं करेंगे हम मातम
आँख भले हो जाए नम
जब तक अपनी दम में दम
छवियाँ नित सुमिरेंगे हम
१८-१-२०२२
***
भारतीय कालगणना
१८ निमेष = १ काष्ठा
३० काष्ठा = १ कला
३० कला = १ क्शण
१२ क्शण = १ मुहूर्त
३० मुहूर्त = १ दिन-रात
३० दिन रात = १ माह
२ माह = १ ऋतु
३ ऋतु = १ अयन
२ अयन = १ वर्ष
१२ वर्ष = १ युग
१ माह = पितरों का दिन-रात
१ वर्ष = देवों का दिन-रात
युग। दिव्य वर्ष - सौर वर्ष
सत = ४८०० - १७२८०००
त्रेता = ३६०० - १२९६०००
द्वापर = २४०० - ८६४०००
कलि = १२०० - ४३२००००
एक महायुग = १२००० दिव्य वर्ष = ४३,२०,००० वर्ष = १ देवयुग
१००० देवयुग = १ ब्रह्म दिन या ब्रह्म रात्रि
७१ दिव्य युग = १ मन्वन्तर
१४ मन्वन्तर = १ ब्रह्म दिन
*
ब्रह्मा जागने पर सतासत रूपी मन को उत्पन्न करते हैं। मन विकारी होकर सृष्टि रचना हेतु क्रमश: आकाश (गुण शब्द), गंध वहनकर्ता वायु (गुण स्पर्श), तमनाशक प्रकाशयुक्त तेज (गुण रूप), जल (गुण रस) तथा पृथ्वी (गुण गंध) उत्पन्न होती है।
*
***
भविष्यपुराण से
*
ब्राह्मण के लक्षण -
संस्कार ही ब्रह्त्व प्राप्ति का मुख्य कारण है। जिस ब्राह्मण के वेदादि शास्त्रों में निर्दिष्ट गर्भाधान, पुंसवन आदि ४८ संस्कार विधिपूर्वक हुए हों, वही ब्राह्मण ब्रह्मलोक और ब्रह्मत्व को प्राप्त करता है।
४८ संस्कार - गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, उपनयन, ४ वेदव्रत, वेदस्नान, विवाह, पंचमहायग्य (जिनसे देवता, पितरों, मनुष्य, भूत और ब्रह्म तृप्त हों), सप्तपाक यग्य (संस्था, अष्टकाद्वय, पार्वण, श्रावणी, आग्रहायणी, चैत्री या शूलगव तथा अाश्वयुजी), सप्तविर्यग्य (संस्था, अग्न्याधान, अग्निहोत्र, दर्श पौर्णमास, चातुर्मास्य, निरूढ-पशुबंध, सौत्रामणी) और सप्तसोम (संस्था-अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ्य। षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र व आप्तोर्याम) तथा ८ आत्मगुण (अनसूया-दूसरों के गुणों में दोष-बुद्धि न रखना, दया-परदुख दूर करने की इच्छा, क्शांति-क्रोध व वैर न करना, अनायास-सामान्य बात के लिए जान की बाजी न लगाना, मंगल-मांगलिक वस्तुओं का धारण, अकार्पण्य-दीन वचन न बोलना व अति कृपण न बनना, शौच-बाह्यभ्यंतर की शुद्धि तथा अस्पृहा-परधन की इच्छा न रखना।) ।
***
ओशो विमर्श
*बुद्धपुरूषों का बुद्धत्तव के बाद दुबारा जन्म क्यों नहीं होता है?*
ओशो: जरूरत नहीं रह जाती। जन्म अकारण नहीं है, जन्म शिक्षण है। जीवन एक परीक्षा है, पाठशाला है। यहाँ तुम आते हो क्योंकि कुछ जरूरत है। बच्चे को हम स्कूल भेजते है, पढ़ने लिखने,समझने-बूझने; फिर जब वह सब परीक्षाएँ उत्तीर्ण हो जाता है, फिर तो नहीं भेजते। फिर वह अपने घर आ गया। फिर भेजने की कोई जरूरत न रही।
परमात्मा घर है, सत्य कहो, निर्वाण कहो, मोक्ष कहो संसार विद्यालय है। वहाँ हम भेजे जाते हैं, ताकि हम परख लें, निरख लें, कस लें कसौटी पर अपने को सुख-दुख की आँच में, सब तरह के कडुवे-मीठे अनुभव से गुजर लें और वीतरागता को उपलब्ध हो जाएँ। सब गँवा दें, सब तरफ से भटक जाएँ, दूर-दूर अँधेरों में, अँधेरी खाइयों-खड्डों में सरकें, सत्य से जितनी दूरी संभव हो सके निकल जाएँ और फिर बोध से वापस लौटें।
बच्चा भी शांत होता, निर्दोष होता; संत भी शांत होता, निर्दोष होता। लेकिन संत की निर्दोषता में बड़ा मूल्य है, बच्चे की निर्दोषता में कोई खास मूल्य नहीं है। यह निर्दोषता जो बच्चे की है, मुफ्त है, कमाई हुई नहीं है। यह आज है, कल चली जाएगी। जीवन इसे छीन लेगा। संत की जो निर्दोषता है, इसे अब कोई भी नहीं छीन सकता। जो-जो घटनाएँ छिन सकती थीं, उनसे तो गुजर चुका संत। इसलिए परमात्मा को खोना, परमात्मा को ठीक से जानने के लिए अनिवार्य है। इसलिए हम भेजे जाते हैं।
बुद्धपुरुष को तो भेजने की कोई जरूरत नहीं, जब फल पक जाता है तो फिर डाली से लटका नहीं रहता, फिर क्या लटकेगा! किसलिए? वृक्ष से लटका था पकने के लिए। धूप आई, सर्दी आई, वर्षा आई, फल पक गया, अब वृक्ष से क्यों लटका रहेगा! कच्चे फल लटके रहते हैं। बुद्ध यानी पका हुआ फल।
छोड़ देती है डाल
रस भरे फल का हाथ
किसी और कसैले फल को
मीठा बनाने के लिए
छोड़ ही देना पड़ेगा। वृक्ष छोड़ देगा पके फल को, अब क्या जरूरत रही? फल पक गया, पूरा हो गया, पूर्णता आ गयी। बुद्धत्व का अर्थ है, जो पूर्ण हो गया। दुबारा लौटने का कोई कारण नहीं।
हमारे मन में सवाल उठता है कभी-कभी, क्योंकि हमें लगता है, जीवन बहुत मूल्यवान है। यह तो बिल्कुल उलटी बात हुई कि बुद्धत्व को उपलब्ध व्यक्ति को फिर जीवन नहीं मिलता। हमें लगता है, जीवन बहुत मूल्यवान है। बुद्धत्व को जो उपलब्ध है, उसे तो पता चल गया और बड़े जीवन का, और विराट जीवन का।
ऐसा ही समझो कि तुम शराब-घर जाते थे रोज, फिर एक दिन भक्ति-रस लग गया, फिर मंदिर में नाचने लगे, डोलने लगे, फिर प्रभु की शराब पी ली, अब शराब-घर नहीं जाते। शराबी सोचते होंगे कि बात क्या हो गयी? ऐसी मादक शराब को छोड़कर यह आदमी कहाँ चला गया? अब आता क्यों नहीं?
इसे बड़ी शराब मिल गयी, अब यह आए क्यों? इसे असली शराब मिल गयी, अब यह नकली के पास आए क्यों? इसे ऐसी शराब मिल गई जिसको पीकर फिर होश में आना ही नहीं पड़ता। और इसे एक ऐसी शराब मिल गई जिसमें बेहोशी भी होश है। अब यह इस क्षुद्र सी शराब को पीने क्यों आए?
बुद्धत्व को पाया व्यक्ति परम सागर में डूब गया। जिसकी तुम तलाश करते थे, जिस आनंद की, वह उसे मिल गया, अब वह यहाँ क्यों आए? यह जीवन तो कच्चे फलों के लिए है, ताकि वे पक जाएं, परिपक्य हो जाएं। इस जीवन के सुख-दुख, इस जीवन की पीड़ाएँ, इस जीवन के आनंद, जो कुछ भी है, वह हमें थपेड़े मारने के लिए है, चोटें मारने के लिए है।
देखा, कुम्हार घड़ा बनाता है, घड़े को चोटें मारता है। एक हाथ भीतर रखता है, एक हाथ बाहर रखता, चाक पर घड़ा घूमता और वह चोटें मारता! फिर जब घड़ा बनकर तैयार होगा, चोटें बंद कर देता है; फिर घड़े को आग में डाल देता है। फिर जब घड़ा पक गया, तो न चोट की जरूरत है, न आग में डालने की जरूरत है। संसार में चोटें हैं और आग में डाला जाना है। जब तुम पक जाओगे, तब प्रभु का परम रस तुममें भरेगा। तुम पात्र बन जाओगे, तुम घड़े बन जाओगे, फिर कोई जरूरत न रह जाएगी।
***
विश्व विवाह दिवस पर
*
विवाह के बाद पति-पत्नि एक सिक्के के दो पहलू हो जाते हैं, वे एक दूसरे का सामना नहीं कर सकते फिर भी एक साथ रहते हैं। - अल गोर
*
जैसे भी हो शादी करो। यदि अच्छी बीबी हुई तो सुखी होगे, यदि बुरी हुई तो दार्शनिक बन जाओगे। - सुकरात
*
महिलाएँ हमें महान कार्य करने हेकु प्रेरित करती हैं और उन्हें प्राप्त करने से हमें रोकती हैं। - माइक टायसन
*
मैं ने अपनी बीबी से कुछ शब्द कहे और उसने कुछ अनुच्छेद। - बिल क्लिंटन
*
इलैक्ट्रॉनिक बैंकिंग से भी अधिक तेजी से धन निकालने का एक तरीका है। उसे शादी कहते हैं। - माइकेल जॉर्डन
*
एक अच्छी बीबी हमेशा अपने शौहर को माफ कर देती है जब वह गलत होती है। - बराक ओबामा
*
जब आप प्रेम में होते हैं तो आश्चर्य होते रहते हैं। किंतु एक बार आपकी शादी हुई तो आप आश्चर्य करते हैं क्या हुआ?
*
और अंत में सर्वोत्तम
शादी एक सुंदर वन है जिसमें बहादुर शेर सुंदर हिरणियों द्वारा मारे जाते हैं।
***
नवगीतकार संध्या सिंह को
फेसबुक द्वारा ऑथर माने जाने पर प्रतिक्रिया
संध्या को ऑथर माना मुखपोथी जी
या सिंह से डर यश गाया मुखपोथी जी
फेस न बुक हो जाए लखनऊ थाने में
गुपचुप फेस बचाया है मुखपोथी जी
लाजवाब नवगीत, ग़ज़ल उम्दा लिखतीं
ख्याल न अब तक क्यों आया मुखपोथी जी
जुड़ संध्या के साथ बढ़ाया निज गौरव
क्यों न सैल्फी खिंचवाया मुखपोथी जी
है "मुखपोथी रत्न" ठीक से पहचानो
कद्र न करना आया है मुखपोथी जी
फेस "सलिल" में देख कभी "संजीव" बनो
अब तक समय गँवाया है मुखपोथी जी
तुम से हम हैं यह मुगालता मत पालो
हम से तुम हो सच मानो मुखपोथी जी
१९-१-२०
***
नवगीत-
पड़ा मावठा
*
पड़ा मावठा
घिरा कोहरा
जला अँगीठी
आगी ताप
*
सिकुड़-घुसड़ मत बैठ बावले
थर-थर मत कँप, गरम चाय ले
सुट्टा मार चिलम का जी भर
उठा टिमकिया, दे दे थाप
पड़ा मावठा
घिरा कोहरा
जला अँगीठी
आगी ताप
*
आल्हा-ऊदल बड़े लड़ैया
टेर जोर से,भगा लड़ैया
गा रे! राई, सुना सवैया
घाघ-भड्डरी
बन जा आप
पड़ा मावठा
घिरा कोहरा
जला अँगीठी
आगी ताप
*
कुछ अपनी, कुछ जग की कह ले
ढाई आखर चादर तह ले
सुख-दुःख, हँस-मसोस जी सह ले
चिंता-फिकिर
बना दे भाप
पड़ा मावठा
घिरा कोहरा
जला अँगीठी
आगी ताप
*
बाप न भैया, भला रुपैया
मेरा-तेरा करें लगैया
सींग मारती मरखन गैया
उठ, नुक्कड़ का
रस्ता नाप
पड़ा मावठा
घिरा कोहरा
जला अँगीठी
आगी ताप
*
जाकी मोंड़ी, बाका मोंड़ा
नैन मटक्का थोड़ा-थोड़ा
हम-तुम ने नाहक सर फोड़ा
पर निंदा का
मत कर पाप
पड़ा मावठा
घिरा कोहरा
जला अँगीठी
आगी ताप
***
लघुकथा-
भारतीय
*
- तुम कौन?
_ मैं भाजपाई / कॉंग्रेसी / बसपाई / सपाई / साम्यवादी... तुम?
= मैं? भारतीय।
***
लघुकथा-
चैन की साँस
*
- हे भगवान! पानी बरसा दे, खेती सूख रही है।
= हे भगवान! पानी क्यों बरसा दिया? काम रुक गया।
- हे भगवान! रेलगाड़ी जल्दी भेज दे समय पर कार्यालय पहुँच जाऊँ।
= हे भगवान! रेलगाड़ी देर से आये, स्टेशन तो पहुँच जाऊँ।
- हे भगवान पास कर दे, लड्डू चढ़ाऊँगा।
= हे भगवान रिश्वतखोरों का नाश कर दे।
_ हे इंसान! मेरा पिंड छोड़ तो चैन की साँस ले सकूँ।
***
रोचक संवाद कथा-
ताना-बाना
*
- ताना ताना?
= ताना पर टूट गया।
- अधिक क्यों ताना?, और बाना?
= पहन लिया।
- ताना क्यों नहीं?
= ताना ताना
- बाना क्यों नहीं ताना?
= ताना ताना, बाना ताना।
- ताना, ताना है तो बाना कैसे हो सकता है?
= इसको ताना, उसको ताना, ये है ताना वो है बाना
- ताना मारा, बाना नहीं मारा क्यों?
दोनों चुप्प.
१९.१.२०१६
...
नवगीत:
.
उड़ चल हंसा
मत रुकना
यह देश पराया है
.
ऊपर-नीचे बादल आये
सूर्य तरेरे आँख, डराये
कहीं स्वर्णिमा, कहीं कालिमा
भ्रमित न होना
मत मुड़ना
यह देश सुहाया है
.
पंख तने हों ऊपर-नीचे
पलक न पल भरअँखियाँ मीचे
ऊषा फेंके जाल सुनहरा
मुग्ध न होना
मत झुकना
मत सोच बुलाया है
...
नवगीत
काम तमाम
.
काम तमाम तमाम का
करतीं निश-दिन आप
मम्मी मैया माँ महतारी
करूँ आपका जाप
.
हो मनुष्य या यंत्र बताये कौन? विधाता हारे
भ्रमित न केवल तुम, पापा-हम खड़े तुम्हारे द्वारे
कहतीं एक बात तब तक जब तक न मान ले दुनिया
बदल गया है समय तुम्हें समझा-समझा हम हारे
कैसे जिद्दी कहूँ?
न कर सकता मैं ऐसा पाप
.
'आने दो उनको' कहकर तुम नित्य फ़ोड़तीं अणुबम
झेल रहे आतंकवाद यह हम हँस पर निकले दम
मुझ सी थीं तब क्या-क्या तुमने किया न अब बतलाओ
नाना-नानी ने बतलाया मुझको सच क्या थीं तुम?
पोल खोलकर नहीं बढ़ाना
मुझको घर का ताप
.
तुमको पता हमेशा रहता हम क्या भूल करेंगे?
हो त्रिकालदर्शी न मानकर हम क्यों शूल वरेंगे?
जन्मसिद्ध अधिकार तुम्हारा करना शक-संदेह
मेरे मित्र-शौक हैं कंडम, चुप इल्जाम सहेंगे
हम भी, पापा भी मानें यह
तुम पंचायत खाप
१९.१.२०१५
...
शिव पर दोहे
*
शिव ही शिव जैसे रहें, विधि-हरि बदलें रूप।
चित्र गुप्त हो त्रयी का, उपमा नहीं अनूप।।
*
अणु विरंचि का व्यक्त हो, बनकर पवन अदृश्य।
शालिग्राम हरि, शिव गगन, कहें काल-दिक् दृश्य।।
*
सृष्टि उपजती तिमिर से,श्यामल पिण्ड प्रतीक।
रवि मण्डल निष्काम है, उजियारा ही लीक।।
*
गोबर पिण्ड गणेश है, संग सुपारी साथ।
रवि-ग्रहपथ इंगित करें, पूजे झुकाकर माथ।।
*
लिंग-पिण्ड, भग-गोमती,हर-हरि होते पूर्ण।
शक्तिवान बिन शक्ति के, रहता सुप्त अपूर्ण।।
*
दो तत्त्वों के मेल से, बनती काया मीत।
पुरुष-प्रकृति समझें इन्हें, सत्य-सनातन रीत।।
*
लिंग-योनि देहांग कह, पूजे वामाचार।
निर्गुण-सगुण न भिन्न हैं, ज्यों आचार-विचार।।
*
दो होकर भी एक हैं, एक दिखें दो भिन्न।
जैसे चाहें समझिए, चित्त न करिए खिन्न।।
*
सत्-शिव-सुंदर सृष्टि है, देख सके तो देख।
सत्-चित्-आनंद ईश को, कोई न सकता लेख।।
*
१९.१.२०११, जबलपुर।

गुरुवार, 19 जून 2025

जून १९, दोना-पत्तल, सुखदा छंद, मिट्टी, शुद्ध ध्वनि छंद, मल्लिका छंद, दुर्गावती, ओशो, सरस्वती

सलिल सृजन जून १९
विश्व तापस (स्पेनिश चाट) दिवस
*
सरस्वती वंदना,
आलोक दो माँ शारदे!
*
तम-तोम से दुनिया घिरी है
भीड़ एकाकी निरी है
अजब माया, आप छाया
अकेलेपन से डरी है
लेने न चिंता चैन देती
आमोद दो माँ शारदे!
*
सननसन बह पवन बनकर
छूम छनननन बज सके मन
कलल कलकल सलिल निर्मल
करे कलरव नाचकर तन
सुन सकूँ पल पल अनाहद
नाद नित माँ शारदे!
*
बरस टप टप तृषा हर लूँ
अंकुरित हो आँख खोलूँ
पल्लवित कर हरी धरती
पुलक पुष्पित धन्य हो लूँ
झुकूँ चरणों में फलित हो
पग-लोक दो माँ शारदे!
१९-६-२०२०
***
गीत
*
मल्लिका छंद
रजगल
ग ल ग ल ग ल ग ल
२१ २१ २१ २१
*
मल्लिका रहे न मौन
.
लोकतंत्र की पुकार
लोग ही करें सुधार
दोष और का न मान
लें सुधार रीति जान
गंदगी बटोर साफ
कीजिए; न धार मौन
.
शक्ति लोक की अपार
तंत्र से न मान हार
पौध रोप दें हजार
भूमि हो हरी निहार
राजनीति स्वार्थ त्याग
अग्रणी बनें; न मौन
.
ऊगता न आप भोर
सूर्य ले उषा अँजोर
आसमान दे बुहार
अंधकार मान हार
भागता; प्रकाशवान
सूर्य लोग हों; न मौन
*
संवस, ७९९९५५९६१८
१९-६-२०१९
***
ओशो चिंतन: घाट भुलाना 5
*
निष्ठा-श्रद्धा का नहीं, बंधन है स्वीकार।
ढाँचे में बँधती नहीं, जैसे मुक्त बयार।।
*
श्रद्धा-निष्ठा पर बने, ढाँचा जड़ मजबूत।
गत-आगत तक एक सा, जड़ता प्रबल-अकूत।।
*
यदि न बदलता; तो हुआ, समझें जीवन-अंत।
हर पल नया कहूँ तभी, हो चिंतन में तंत।।
*
हर कल हो यदि आज सा, ले केवल दोहराव।
तब समझे मैं मर गया, शेष न यदि बदलाव।।
*
मित्र जुड़े; चाहें बनूँ, मैं उनके अनुकूल।
नहीं बना तो शत्रु बन, हो जाते प्रतिकूल।।
*
दोष न उनका; मानता, अपना आप कसूर।
वे ज्यों का त्यों चाहते, मुझे नहीं मंजूर।।
*
जीवन में सादृश्यता, न्यून; अधिक है भेद।
मात्र मृत्यु है एक सी, सत्य यही; क्यों खेद?
*
सूरज कल जैसा उगे, लिए पुराना रूप।
तब पूजोगे यदि कहो, मान न उगे अनूप।।
*
28.5.2018
***
दोहा सलिला:
*
जन्म; ब्याह; राखी; तिलक; गृह-प्रवेश; त्यौहार.
सलिल बचा; पौधे लगा, दें पुस्तक उपहार.
*
पुस्तक जग की प्रीत है, पुस्तक मन का मीत.
पुस्तक है तो साथ है, भावी-आज-अतीत.
*
पुश्त-पुश्त पुस्तक चले, शेष न रहता साथ.
जो पुस्तक पढ़ता रहा, उसका ऊँचा माथ.
*
पौधारोपण कीजिए, सतत बचाएँ नीर.
पंछी कलरव करें तो, आप घटेगी पीर.
*
तबियत होती है हरी, हरियाली को देख.
रखें स्वच्छता हमेशा, सुधरे जीवन-लेख.
***
१९.६.२०१८
***
२४ जून १५६४ महारानी दुर्गावती शहादत दिवस पर विशेष रचना
छंद सलिला: ​​​शुद्ध ध्वनि छंद
*
छंद-लक्षण: जाति लाक्षणिक, प्रति चरण मात्रा ३२ मात्रा, यति १०-८-८-६, पदांत गुरु
लक्षण छंद:
लाक्षणिक छंद है / शुद्धध्वनि पद / अंत करे गुरु / यश भी दे
यति रहे अठारह / आठ आठ छह, / विरुद गाइए / साहस ले
चौकल में जगण न / है वर्जित- करि/ए प्रयोग जब / मन चाहे
कह-सुन वक्ता-श्रो/ता हर्षित, सम / शब्द-गंग-रस / अवगाहे
.
उदाहरण:
१. बज उठे नगाड़े / गज चिंघाड़े / अंबर फाड़े / भोर हुआ
खुर पटकें घोड़े / बरबस दौड़े / संयम छोड़े / शोर हुआ
गरजे सेनानी / बल अभिमानी / मातु भवानी / जय रेवा
ले धनुष-बाण सज / बड़ा देव भज / सैनिक बोले / जय देवा
कर तिलक भाल पर / चूड़ी खनकीं / अँखियाँ छलकीं / वचन लिया
'सिर अरि का लेना / अपना देना / लजे न माँ का / दूध पिया'
''सौं मातु नरमदा / काली मैया / यवन मुंड की / माल चढ़ा
लोहू सें भर दौं / खप्पर तोरा / पिये जोगनी / शौर्य बढ़ा''
सज सैन्य चल पडी / शोधकर घड़ी / भेरी-घंटे / शंख बजे
दिल कँपे मुगल के / धड़-धड़ धड़के / टँगिया सम्मुख / प्राण तजे
गोटा जमाल था / घुला ताल में / पानी पी अति/सार हुआ
पेड़ों पर टँगे / धनुर्धारी मा/रें जीवन दु/श्वार हुआ
वीरनारायण अ/धार सिंह ने / मुगलों को दी / धूल चटा
रानी के घातक / वारों से था / मुग़ल सैन्य का / मान घटा
रूमी, कैथा भो/ज, बखीला, पं/डित मान मुबा/रक खां लें
डाकित, अर्जुनबै/स, शम्स, जगदे/व, महारख सँग / अरि-जानें
पर्वत से पत्थर / लुढ़काये कित/ने हो घायल / कुचल मरे-
था नत मस्तक लख / रण विक्रम, जय / स्वप्न टूटते / हुए लगे
बम बम भोले, जय / शिव शंकर, हर / हर नरमदा ल/गा नारा
ले जान हथेली / पर गोंडों ने / मुगलों को बढ़/-चढ़ मारा
आसफ खां हक्का / बक्का, छक्का / छूटा याद हु/ई मक्का
सैनिक चिल्लाते / हाय हाय अब / मरना है बिल/कुल पक्का
हो गयी साँझ निज / हार जान रण / छोड़ शिविर में / जान बचा
छिप गया: तोपखा/ना बुलवा, हो / सुबह चले फिर / दाँव नया
रानी बोलीं "हम/ला कर सारी / रात शत्रु को / पीटेंगे
सरदार न माने / रात करें आ/राम, सुबह रण / जीतेंगे
बस यहीं हो गयी / चूक बदनसिंह / ने शराब थी / पिलवाई
गद्दार भेदिया / देश द्रोह कर / रहा न किन्तु श/रम आई
सेनानी अलसा / जगे देर से / दुश्मन तोपों / ने घेरा
रानी ने बाजी / उलट देख सो/चा वन-पर्वत / हो डेरा
बारहा गाँव से / आगे बढ़कर / पार करें न/र्रइ नाला
नागा पर्वत पर / मुग़ल न लड़ पा/येंगे गोंड़ ब/नें ज्वाला
सब भेद बताकर / आसफ खां को / बदनसिंह था / हर्षाया
दुर्भाग्य घटाएँ / काली बनकर / आसमान पर / था छाया
डोभी समीप तट / बंध तोड़ मुग/लों ने पानी / दिया बहा
विधि का विधान पा/नी बरसा, कर / सकें पार सं/भव न रहा
हाथी-घोड़ों ने / निज सैनिक कुच/ले, घबरा रण / छोड़ दिया
मुगलों ने तोपों / से गोले बर/सा गोंडों को / घेर लिया
सैनिक घबराये / पर रानी सर/दारों सँग लड़/कर पीछे
कोशिश में थीं पल/टें बाजी, गिरि / पर चढ़ सकें, स/मर जीतें
रानी के शौर्य-पराक्रम ने दुश्मन का दिल दहलाया था
जा निकट बदन ने / रानी पर छिप / घातक तीर च/लाया था
तत्क्षण रानी ने / खींच तीर फें/का, जाना मु/श्किल बचना
नारायण रूमी / भोज बच्छ को / चौरा भेज, चु/ना मरना
बोलीं अधार से / 'वार करो, लो / प्राण, न दुश्मन / छू पाये'
चाहें अधार लें / उन्हें बचा, तब / तक थे शत्रु नि/कट आये
रानी ने भोंक कृ/पाण कहा: 'चौरा जाओ' फिर प्राण तजा
लड़ दूल्हा-बग्घ श/हीद हुए, सर/मन रानी को / देख गिरा
भौंचक आसफखाँ / शीश झुका, जय / पाकर भी थी / हार मिली
जनमाता दुर्गा/वती अमर, घर/-घर में पुजतीं / ज्यों देवी
पढ़ शौर्य कथा अब / भी जनगण, रा/नी को पूजा / करता है
जनहितकारी शा/सन खातिर नित / याद उन्हें ही / करता है
बारहा गाँव में / रानी सरमन /बग्घ दूल्ह के / कूर बना
ले कंकर एक र/खे हर जन, चुप / वीर जनों को / शीश नवा
हैं गाँव-गाँव में / रानी की प्रति/माएँ, हैं ता/लाब बने
शालाओं को भी , नाम मिला, उन/का- देखें ब/च्चे सपने
नव भारत की नि/र्माण प्रेरणा / बनी आज भी / हैं रानी
रानी दुर्गावति / हुईं अमर, जन / गण पूजे कह / कल्याणी
नर्मदासुता, चं/देल-गोंड की / कीर्ति अमर, दे/वी मैया
जय-जय गाएंगे / सदियों तक कवि/, पाकर कीर्ति क/था-छैंया
*********
टिप्पणी: कूर = समाधि,
दूरदर्शन पर दिखाई जा रही अकबर की छद्म महानता की पोल रानी की संघर्ष कथा खोलती है.
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामिनीमोहन, काव्य, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदन,मदनावतारी, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, रसाल, राजीव, राधिका, रामा, रूपमाला, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विरहणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुद्ध ध्वनि, शुभगति, शोभन, सरस, सार, सारस, सिद्धि, सिंहिका, सुखदा, सुगति, सुजान, सुमित्र, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)
***
मुक्तिका
मिट्टी मेरी...
*
मोम बनकर थी पिघलती रही मिट्टी मेरी.
मौन रहकर भी सुलगती रही मिट्टी मेरी..
बाग़ के फूल से पूछो तो कहेगा वह भी -
कूकती, नाच-चहकती रही मिट्टी मेरी..
पैर से रौंदी गयी, सानी गयी, कूटी गयी-
चाक-चढ़कर भी, सँवरती रही मिट्टी मेरी..
ढाई आखर न पढ़े, पोथियाँ रट लीं, लिख दीं.
रही अनपढ़ ही, सिसकती रही मिट्टी मेरी..
कभी चंदा, कभी तारों से लड़ायी आखें.
कभी सूरज सी दमकती रही मिट्टी मेरी..
खता लम्हों की, सजा पाती रही सदियों तक.
पाक-नापाक दहकती रही मिट्टी मेरी..
खेत-खलिहान में, पनघट में, रसोई में भी.
मैंने देखा है, खनकती रही मिट्टी मेरी..
गोद में खेल, खिलाया है सबको गोदी में.
फिर भी बाज़ार में बिकती रही मिट्टी मेरी..
राह चुप देखती है और समय आने पर-
सूरमाओं को पटकती रही मिट्टी मेरी..
कभी थमती नहीं, रुकती नहीं, न झुकती है.
नर्मदा नेह की, बहती रही मिट्टी मेरी..
१९-६-२०१७
***
नवगीत
*
होरा भूँज रओ छाती पै
आरच्छन जमदूत
पैदा होतई बनत जा रए
बाप बाप खें, पूत
*
लोकनीति बनबास पा रई
राजनीति सिर बैठ
नाच नचाउत नित तिगनी का
घर-घर कर खें पैठ
नाम आधुनिकता को जप रओ
नंगेपन खों भूत
*
नींव बगैर मकान तान रए
भौत सयाने लोग
त्याग-परिस्रम खों तलाक दें
चाह भोग लें भोग
फूँक रए रे, मिली बिरासत
काबिल भए सपूत
*
ईंट-ईंट में खेंच दिवारें
तोड़ रए हर जोड़
लाज-लिहाज कबाड़ बता रए
बेसरमी हित होड़
राह बिसर कें राह दिखा रओ
सयानेपन खों भूत
२०-११-२०१५
चित्रकूट एक्सप्रेस,
उन्नाव-कानपूर
***
मुक्तिका:
*
मापनी:
१२१२ / ११२२ / १२१२ / २२
ल ला ल ला ल ल ला ला, ल ला ल ला ला ला
महारौद्र जातीय सुखदा छंद
*
मिलो गले हमसे तुम मिलो ग़ज़ल गाओ
चलो चलें हम दोनों चलो चलें आओ
.
यही कहीं लिखना है हमें कथा न्यारी
कली खिली गुल महके सुगंध फैलाओ
.
कहो-कहो कुछ दोहे चलो कहो दोहे
यहीं कहीं बिन बोले हमें निकट पाओ
.
छिपाछिपी कब तक हो?, लुकाछिपी छोड़ो
सुनो बुला मुझ को लो, न हो तुम्हीं आओ
.
भुला गिले-शिकवे दो, सुनो सपन देखो
गले मिलो हँस के प्रिय, उन्हें 'सलिल' भाओ
१९-६-२०१५
क्या यह 'बहरे मुसम्मन मुरक़्क़ब मक्बूज़ मख्बून महज़ूफ़ो मक्तुअ' में है?
***
नवगीत:
*
पगड़ी हो
या हो दिल
न किसी का उछालिये
*
हँसकर गले लगाइये
या हाथ मिलायें
तीरे-नज़र से दिल,
छुरे से पीठ बचायें
हैं आम तो न ख़ास से
तकरार कीजिए-
जो कीजिए तो झूठ
न इल्जाम लगायें
इल्हाम हो न हो
नहीं किरदार गिरायें
कैसे भी हो
हालात
न जेबें खँगालिये
पगड़ी हो
या हो दिल
न किसी का उछालिये
*
दिल से भले भुलाइये
नीचे न गिरायें
यादें न सही जाएँ तो
चुपके से सिरायें
माने न मन तो फिर
मना इसरार कीजिए-
इकरार कीजिए
अगर तो शीश चढ़ायें
जो पाठ खुद पढ़ा नहीं
न आप पढ़ायें
बच्चे बिगड़ न जाएँ
हो सच्चे
सम्हालिए
पगड़ी हो
या हो दिल
न किसी का उछालिये
***
स्वास्थ्य चर्चा
दोना-पत्तल से स्वास्थ्य
*
भारत में 2000 से ज्यादा वनस्पतियों से भोजन को रखने के लिए दोने पत्तल बनाई जाती है और इन दोने पत्तल मे हर एक दोने पत्तल कई कई बीमारियो का इलाज है और औषधीय गुण रखता है।
केला - प्राचीन ग्रंथों मे केले की पत्तियो पर परोसे गये भोजन को स्वास्थ्य के लिये लाभदायक बताया गया है। आजकल मँहगे होटलों और रिसोर्ट में भी केले पत्ते प्रयोग हो रहे हैं।
पलाश - पलाश के पत्तल में भोजन करने से स्वर्ण के बर्तन में भोजन करने का पुण्य व आरोग्य मिलता है। रक्त की अशुद्धता के कारण होने वाली बीमारियों के लिये पलाश से तैयार पत्तल को उपयोगी माना जाता है। पाचन तंत्र सम्बन्धी रोगों के लिये भी इसका उपयोग होता है। सफेद फूलों वाला पलाश से तैयार पत्तल बवासीर (पाइल्स) के रोगियों के लिये उपयोगी है।
करंज - जोड़ों के दर्द के लिये करंज की पत्तियों से तैयार पत्तल उपयोगी माना जाता है। पुरानी पत्तियों को नयी पत्तियों की तुलना में अधिक उपयोगी माना जाता है।
अमलतास - लकवा (पैरालिसिस) होने पर अमलतास की पत्तियों से तैयार पत्तल उपयोगी है।
दोन-पत्तल के अन्य लाभ :
१. मितव्ययिता - कम पैसों में उपलब्ध।
२. परावरण मित्र - दोना-पत्तल पशु खा लें तो उन्हें हानि नहीं होती। मिट्टी में दबा दें तो उर्वरता बढ़ती है।
३. श्रम और पानी की बचत - अन्य बर्तन धोने में लगनेवाले श्रम और पानी की बचत होती हैl
४. रोजगार - पत्ते तोड़ने और दोना-पत्तल बनाने के कार्य से कम शिक्षित लोगों को रोजकार मिलता हैl
५. बर्तन धोने से निकले डिटर्जेंट व रसायनों से डोनेवाले ले अहथ खराब नहीं होंगे तथा मिट्टी का प्रदूषण नहीं होगाl
६. पत्तों की आवश्यकता पूर्ति के लिए अधिक वृक्ष होंगे, जिससे अधिक आक्सीजन भी मिलेगी l
७. जलस्रोतों का प्रदूषण कम होगा।
८. पेड़ों से प्राप्त लकड़ी बहुत उपयोगी होगी।
९. कम पूँजी तथा अकुशलता के बाद भी व्यवसाय का अवसर मिलेगा।
१९-६-२०१०
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