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मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

फरवरी २४, सॉनेट गीत, केरल, हाइकु, शिव, नवगीत, भजन, दोहा, कुंडलिया, आलोक रंजन, शशि पुरवार

सलिल सृजन फरवरी २४
*
कार्यशाला - दोहा से कुण्डलिया
सजल नयन काजल दिये,लिये हृदय में गाँव! रुनझुन गोरी जा रही,रचे महावर पाँव!! - अशोक व्यग्र- भोपाल

रचे महावर पाँव, छाँव भी छोड़ चली है।
सपन नयन में लिए, ठाँव नव लगे भली है।।
नयन-नयन में डूब, नेह-नाता अटलाचल।
वरण करें अद्वैत, द्वैत तज नयन हों सजल।।
०००
दोहा सलिला वहम अहम् का नष्ट कर, देते गुरु आशीष। सद्गुरु आत्म प्रकाश दे, मन को करें मनीष।। ० एक ब्रह्म अल्लाह गुरु, ईसा, गौतम एक। छवि अनेक गढ़ लड़ रहे, मानव त्याग विवेक।। . संप्रदाय को धर्म कह, पंथ करें संघर्ष। सत्य-असत्य न जानकर, हो मनु का अपकर्ष।।
०००
प्रिय आलोक रंजन के प्रति
जागकर स्वागत करे जग नित्य कह आ लोक
हाथ थामे साथ लाए नित उषा आलोक
रंज न करना कभी भी धूप हो या छाँव
करो मन रंजन हुलसकर नगर   हो या गाँव
और जब आलोक रंजन हो हमारे साथ
नदी भाषा-बोलियों की बहा लाए नाथ! 
प्रखर हो दिन-दिन निखरकर दिखाए नित राह
सौ बरस तक साथ रहकर सलिल की है चाह
०००
२४ . २ . २०२६
०००
सॉनेट गीत
वसुंधरा
हम सबकी माँ वसुंधरा।
हमें गोद में सदा धरा।।
हम वसुधा की संतानें।
सब सहचर समान जानें।
उत्तम होना हम ठानें।।
हम हैं सद्गुण की खानें।।
हममें बुद्धि परा-अपरा।
हम सबकी माँ वसुंधरा।।
अनिल अनल नभ सलिल हमीं।
शशि-रवि तारक वृंद हमीं।
हम दर्शन, विज्ञान हमीं।।
आत्म हमीं, परमात्म हमीं।।
वैदिक ज्ञान यहीं उतरा।
हम सबकी माँ वसुंधरा।।
कल से कल की कथा कहें।
कलकल कर सब सदा बहें।
कलरव कर-सुन सभी सकें।।
कल की कल हम सतत बनें।।
हर जड़ चेतन हो सँवरा।
हम सब की माँ वसुंधरा।।
(विधा- अंग्रेजी छंद, शेक्सपीरियन सॉनेट)
२४-२-२०२२
•••
सॉनेट गीत
वंदे मातरम्
वंदे मातरम् कहना है।
माँ सम सुख-दुख तहना है।।
माँ ने हमको जन्म दिया।
दुग्ध पिलाया, बड़ा किया।
हर विपदा से बचा लिया।।
अपने पैरों खड़ा किया।।
माँ संग पल-पल रहना है।
वंदे मातरम् कहना है।।
नेह नर्मदा है मैया।
स्वर्गोपम इसकी छैंया।
हम सब डालें गलबैंयां।
मिल खेलें इसकी कैंया।।
धूप-छाँव सम सहना है।
वंदे मातरम् कहना है।।
सब धर्मों का मर्म यही।
काम करें निष्काम सही।
एक नीड़ जग, धरा मही।।
पछुआ-पुरवा लड़ी नहीं।।
धूप-छाँव संग सहना है।
वंदे मातरम् कहना है।।
२४-२-२०२२
•••
मुक्तिका
शशि पुरवार
न माने हार।
रोग को जीत
सुनो जयकार।
पराजित पीर
मानकर हार।
खुशी लो थाम
खड़ी तव द्वार।
अधर पर हास
बने सिंगार।
लिखो नवगीत
बने उपचार।
करे अभिषेक
सलिल की धार।
***
पुरोवाक
केरल : एक झाँकी - मनोरम और बाँकी
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
भारत भूमि का सौंदर्य और समृद्धि चिरकाल से सकल विश्व को आकर्षित करता रहा है। इसी कारण यह पुण्यभूमि आक्रांताओं द्वारा बार-बार पददलित और शोषित की गयी। बकौल इक़बाल 'कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौरे-जमां हमारा', भारत हर बार संघर्ष कर स्वाभिमान के साथ पूर्वापेक्षा अधिक गौरव के साथ सर उठाकर न केवल खड़ा हुआ अपितु 'विश्वगुरु' भी बना। संघर्ष और अभ्युत्थान के वर्तमान संघर्षकाल में देश के सौंदर्य, शक्ति और श्रेष्ठता को पहचान कर संवर्धित करने के साथ-साथ-कमजोरियों को पहचान कर दूर किया जाना भी आवश्यक है। विवेच्य कृति 'केरल : एक झाँकी' इस दिशा में एक सार्थक प्रयास है।
पुस्तक की लेखिका अश्वती तिरुनाळ गौरी लक्ष्मीभायी प्रतिष्ठित राजघराने की सदस्य (केणल गोदवर्म राजा की पुत्री, थिरुवल्ला के राजराजा की पत्नी) होते हुए भी जन सामान्य की समस्याओं में गहन रूचि लेकर, उनके कारणों का विश्लेषण और समाधान की राह सुझाने का महत्वपूर्ण दायित्व स्वेच्छा से निभा सकी हैं। हिंदी में संस्मरण निबंध विधाओं में अन्य विधाओं की तुलना में लेखन कम हुआ है जबकि संस्मरण लेखन लेखन बहुत महत्वपूर्ण विधाएँ हैं । इस महत्वपूर्ण कृति का सरस हिंदी अनुवाद कर प्रो. डी. तंकप्पन नायर तथा अधिवक्ता मधु बी. ने हिंदी-मलयालम सेतु सुदृढ़ करने के साथ-साथ केरल की सांस्कृतिक विरासत और प्राकृतिक सौंदर्य से अन्य प्रदेश वासियों को परिचित कराने का सफल प्रयास किया है। राष्ट्रीय एकता की दृष्टि से इस स्तुत्य सारस्वत अनुष्ठान के लिए लेखिका अश्वती तिरुनाळ गौरी लक्ष्मीभायी तथा अनुवादक द्व्य प्रो. डी. तंकप्पन नायर तथा अधिवक्ता मधु बी. साधुवाद के पात्र हैं।
प्रथम संस्मरण 'जरूरत है एक मलयाली गुड़िया की' में सांस्कृतिक पहचानों के प्रति सजग होने का आह्वान करती विदुषी लेखिका का पूरे देश में खिचड़ी अपसंस्कृति के प्रसार को लेकर चिंतित होना स्वाभाविक है। 'स्मृतियाँ विस्मृति में' ऐतिहासिक स्मारकों की सुरक्षा की ओर ध्यानाकर्षित किया गया है। 'आयुर्वेद एक अमूल्य निधि' में भारत के पुरातन औषधि विज्ञान एवं वैद्यक परंपरा की महत्ता को रेखांकित किया गया है। भारतीय संस्कारों की महत्ता 'आचार प्रभवो धर्म:' में प्रतिपादित की गयी है। 'तिरुवितांकुर का दुर्भाग्य' विलोपित होती विरासत की करुण कथा कहती है। 'हे मलयालम माफ़ी! माफ़ी!' में मातृभाषा की उपेक्षाजनित पीड़ा मुखरित हुई है। आंचलिक परिधानों की प्रासंगिकता और महत्व 'मुंट (धोती) और तोर्त (अँगोछा) का महत्व' संस्मरण में है।
वर्तमान में केरल की ख्याति नयनाभिराम पर्यटल स्थल के रूप में सारी दुनिया में है। वर्षों पूर्व केरल का भविष्य पर्यटन में देख सकने की दिव्य दृष्टि युक्त केणल गोदवर्म राजा पर भारत सरकार को डाक टिकिट निकलना चाहिए। केरल सरकार प्रतिवर्ष उनकी जन्मतिथि को केरल पर्यटन दिवस के रूप में मनाये। लेखिका का परिवार भी इस दिशा में पहल कर केरल के पर्यटन पर देश के अन्य प्रांतों के लेखकों से पुस्तक लिखवा-छपाकर राजाजी की स्मृति को चिरस्थायी कर सकता है। 'पिताजी के सपने और यथार्थ' शीर्षक संस्मरण में उनके अवदान को उचित ही स्मरण किया गया है। समयानुशासन का ध्यान न रखने पर अपनी लाड़ली बेटी को दंडित कर, समय की महत्ता समझाने का प्रेरक संस्मरण 'समय की कैसी गति' हमारे जन सामान्य, अफसरों और नेताओं को सीख देता है। 'किस्सा एक हठी का' रोचक संस्मरण है जो अतीत और वर्तमान के स्थापित करता है।
आधुनिक वैज्ञानिक उन्नति और शहरीकरण ने भारत की परिवार व्यवस्था को गंभीर क्षति पहुँचाने के साथ-साथ बच्चों के कुपोषण तथा संस्कारों की उपेक्षा की समस्या को जन्म दिया है। 'टेलीविजन और नन्हें बच्चे', 'नारी की आवाज', 'मलयाली का ह्रास', 'कन्या कनक संपन्ना' में समकालिक सामाजिक समस्याओं को उठाते हुए, निराकरण के संकेत अन्तर्निहित हैं। 'क्या मलयाली व्यंजन भी फ्रीज़र में रखे जायेंगे?' में आहार संबंधी अपसंस्कृति को उचित ही लांछित किया गया है। 'टिकिट के साथ गंदगी और गर्द' तथा 'धन्यवाद और निंदा' में सामाजिक दायित्वों की ओर सजगता वृद्धि का उद्देश्य निहित है। समाजिक जीवन में नियमों और उद्घोषणाओं के विपरीत आचरण कर स्वयं को गर्वित करने के कुप्रवृत्ति पर शब्दाघात करते हुए लेखिका ने 'उद्घोषणा करने लायक कुछ मौन सत्य' शीर्षक संस्मरण में सार्वजानिक अनुशासन और सामाजिक शालीनता की महत्ता प्रतिपादित की है।
'धार्मिक मैत्री का तीर्थाटन मौसम', 'आयात की गई जीवन शैलियाँ', 'अतिथि देवो भव' आदि में लेखिका के संतुलित चिंतन की झलक है। लेखिका के बहुआयामी व्यक्तित्व की झलक देते इनसंस्मरणों में पर्यावरण के प्रति चिंता 'काई से भरे मन और जलाशय' में दृष्टव्य है। दुर्भाग्य से प्राचीन विरासत के विपरीत स्वतंत्र भारत में जल परिवहन को महत्व न देकर खर्चीले हुए परवरण के लिए हानिप्रद वायु परिवहन तथा थल परिवहन को महत्व देकर देख का राजकोषीय घाटा बढ़ाया जाता रहा है।
चिर काल से भारत कृषि प्रधान देश था, है और रहेगा। विलुप्त होती फसलों के संबंध में लेखिका की चिंता 'उन्मूलन होती फसलें' संस्मरण में सामने आई है। देश के हर भाग में साधनहीन बच्चों द्वारा भिक्षार्जन की समस्या पर 'नियति की धूप मुरझाती कलियाँ', रोग फैलाते मच्छरों पर 'मच्छर उन्मूलन : न सुलझती समस्या', महत्वपूर्ण व्यक्तियों के लिए विशेष व्यवस्थाओं पर 'प्रदर्शकों को एक मार्ग, जनता को राजमार्ग' पठनीय मात्र नहीं, चिंतनीय भी हैं। कृति के अंत में 'स्वगत' के अंतर्गत अपने व्यक्तित्व पर प्रकाश डालकर उनके ऊर्जस्वित व्यक्तित्व से अपरिचित पाठकों को अपना परिचय देते हुए अपनी समृद्ध पारिवारिक पृष्ठभूमि, बहुरंगी बचपन और असाधारण व्यक्तित्व का उल्लेख इतने संतुलित रूप में किया है की कहीं भी अहम्मन्यता नहीं झलती तथा सामान्य पाठक को भी वे अपने परिवार की सदस्य प्रतीत होती हैं।
सारत: 'केरल : एक झाँकी - मनोरम और बाँकी' एक रोचक, ज्ञानवर्धक, लोकोपयोगी कृति है जो देश के सामान्य और विशिष्ट वर्ग की खूबियों और खामियों को भारतीय विरासत के संदर्भ से जोड़ते हुए इस तरह उठाती है कि किसी को आघात भी न पहुँचे और सबको निराकरण हेतु संदेश और सुझाव मिल सकें। इस तरह के लेखन की कमी को देखते हुए इस कृति के अल्प मोली संस्करण निकाले जाकर इसे हर बच्चे और बड़े पाठक तक पहुँचाया जाना चाहिए।
२४.२.२०२१
***
हाइकु:
*
हर-सिंगार
शशि भभूत नाग
रूप अपार
*
रूप को देख
धूप ठिठक गयी
छवि है नयी
*
झूम नाचता
कंठ लिपटा सर्प
फुंफकारता
*
अर्धोन्मीलित
बाँके तीन नयन
करें मोहित
*
भंग-भवानी
जटा-जूट श्रृंगार
शोभा अपार
***
चिंतन
शिव, शक्ति और सृष्टि
सृष्टि रचना के सम्बन्ध में भारतीय दर्शन में वर्णित एक दृष्टान्त के अनुसार शिव निद्रालीन थे. शिव के साथ क्रीड़ा (नृत्य) करने की इच्छा लिये शक्ति ने उन्हें जाग्रत किया. आरंभ में शिव नहीं जागे किन्तु शक्ति के सतत प्रयास करने पर उग्र रूप में गरजते हुए क्रोध में जाग्रत हुए. इस कारण उन्हें रूद्र (अनंत, क्रोधी, महाकाल, उग्ररेता, भयंकर, क्रंदन करने वाला) नाम मिला। शिव ने शक्ति को देखा, वह शक्ति पर मोहित हो उठ खड़े हुए. शक्ति के प्रेम के कारण वे शांत होते गये. उन्होंने दीर्घवृत्ताभ (इलिप्सॉइड) का रूप लिया जिसे लिंग (स्वगुण, स्वभाव, विशेषता, रूप) कहा गया.
शिव कोई सशरीर मानव या प्राणी नहीं हैं. शिव का अर्थ है निर्गुण, गुणातीत, अक्षर, अजर, अमर, अजन्मा, अचल, अज्ञेय, अथाह, अव्यक्त, महाकाल, अकर्ता आदि. शिव सृष्टि-कर्ता भी हैं. शक्ति सामान्य ताकत या बल नहीं हैं. शक्ति का अर्थ आवेग, ऊर्जा, ओज, प्राण, प्रणोदन, फ़ोर्स, एनर्जी, थ्रस्ट, त्रिगुणा, माया, प्रकृति, कारण आदि है. शिव अर्थात “वह जो है ही नहीं”। जो सुप्त है वह होकर भी नहीं होता। शिव को हमेशा श्याम बताया गया है. निद्रावस्था को श्याम तथा जागरण को श्वेत या उजला कहकर व्यक्त किया जाता है.
शक्ति के उपासकों को शाक्त कहा जाता है. इस मत में ईश्वर की कल्पना स्त्री रूप में कर उसे शक्ति कहा गया है. शक्ति के आनंदभैरवी, महाभैरवी, त्रिपुरसुंदरी, ललिता आदि नाम भी हैं.
विज्ञान सृष्टि निर्माण के कारक को बिग-बैंग कहता है और भारतीय दर्शन शिव-शक्ति का मिलन. विज्ञान के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति के पीछे डार्क मैटर और डार्क इनर्जी की भूमिका है. योग और दर्शन के अनुसार डार्क मैटर (शिव) और डार्क एनर्जी (महाकाली) का मिलन ही सृष्टि-उत्पत्ति का कारण है. स्कॉटिश यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के अनुसार डार्क मैटर और डार्क एनर्जी के बीच संबंध (लिंक) है. पहले वे इन्हें भिन्न मानते थे अब अभिन्न कहते हैं. विज्ञान के अनुसार डार्क मैटर और डार्क इनर्जी के मिलन से एक विस्फोट नहीं विस्फोटों की श्रृंखला उत्पन्न होती है. क्या यह विस्फोट श्रंखला जागकर क्रुद्ध हुए शिव के हुंकारों की ध्वनि है?
वैज्ञानिकों के अनुसार आरम्भ में समूची सृष्टि दीर्घवृत्ताभ आकार के विशाल गैस पिंड के रूप में गर्जना कर रही थी. धीरे-धीरे वह गैसीय पिंड ठंडा होता गया. शीतल होने की प्रक्रिया के कारण इस जगत की रचना हुई. योग कहता है कि जब शक्ति ने शिव को जगा दिया तो वह गुस्से में दहाड़ते हुए उठे। वह कुछ समय के लिये रूद्र बन गये थे. शक्ति को देखकर उनका गुस्सा ठंडा हुआ. शक्ति पर मोहित होकर वह दीर्घवृत्ताभ बन गये, जिसे लिंग कहा गया.
वैज्ञानिक बड़ा धमाकों के बाद की स्थिति एक खंभे की तरह बताते हैं, जिसमें ऊपर के सिरे पर छोटे-छोटे मशरूम लगे हैं. यह ठीक वैसा है जैसा योग-विद्या में बताया गया है. सृष्टि दीर्घवृत्त के आकार में है, जो ऊष्मा, गैसों के फैलाव और संकुचन तथा उनके द्रव्यमान की सघनता पर निर्भर है. इसका ज्यादातर हिस्सा खाली है जिसमें द्रव्य कण, तारे, ग्रह और आकाशीय पिंड बिखरे हुए हैं। सम्भवत:ज्यादातर चीजें अब तक आकार नहीं ले सकी हैं।
विज्ञान जो बात अब समझा है, उसे दर्शन बहुत पहले समझा चुका था। यह शरीर भी वैसे ही है, जैसे कि यह संपूर्ण सृष्टि। पेड़ के तने में बने छल्लों से पेड़ के जीवन-काल में धरती पर घटित हर घटना का ज्ञान हो सकता है. मानव शरीर में अन्तर्निहित ऊर्जा से साक्षात हो सके तो ब्रह्मांड के जन्म और विकास की झाँकी अपने भीतर ही मिल सकती है।
संदर्भ:
१.
२. बृहत् हिंदी कोष सं. कलिका प्रसाद, राजवल्लभ सहाय, मुकुन्दीलाल श्रीवास्तव
३. समान्तर कोष, अरविन्द कुमार, कुसुम कुमार
==============
नवगीत:
.
शिव के मन मांहि
बसी गौरा
.
भाँग भवानी कूट-छान के
मिला दूध में हँस घोला
शिव के मन मांहि
बसी गौरा
.
पेड़ा गटकें, सुना कबीरा
चिलम-धतूरा धर झोला
शिव के मन मांहि
बसी गौरा
.
भसम-गुलाल मलन को मचलें
डगमग डगमग दिल डोला
शिव के मन मांहि
बसी गौरा
.
आग लगाये टेसू मन में
झुलस रहे चुप बम भोला
शिव के मन मांहि
बसी गौरा
.
विरह-आग पे पिचकारी की
पड़ी धार, बुझ गै शोला
शिव के मन मांहि
बसी गौरा
२४-२-२०१७
...
भजन
*
प्रभु!
तेरी महिमा अपरम्पार
*
तू सर्वज्ञ व्याप्त कण-कण में
कोई न तुझको जाने।
अनजाने ही सारी दुनिया
इष्ट तुझी को माने।
तेरी आय दृष्टि का पाया
कहीं न पारावार
प्रभु!
तेरी महिमा अपरम्पार
*
हर दीपक में ज्योति तिहारी
हरती है अँधियारा।
कलुष-पतंगा जल-जल जाता
पा मन में उजियारा।
आये कहाँ से? जाएँ कहाँ हम?
जानें, हो उद्धार
प्रभु!
तेरी महिमा अपरम्पार
*
कण-कण में है बिम्ब तिहारा
चित्र गुप्त अनदेखा।
मूरत गढ़ते सच जाने बिन
खींच भेद की रेखा।
निराकार तुम,पूज रहा जग
कह तुझको साकार
प्रभु!
तेरी महिमा अपरम्पार
***
नवगीत:
ओ उपासनी
*
ओ उपासनी!
शीतल-निर्मल सलिल धार सी
सतत प्रवाहित
हो सुहासिनी!
*
भोर, दुपहरी, साँझ, रात तक
अथक, अनवरत
बहती रहतीं।
कौन बताये? किससे पूछें?
शांत-मौन क्यों
कभी न दहतीं?
हो सुहासिनी!
सबकी सब खुशियों का करती
अंतर्मन में द्वारचार सी
शीतल-निर्मल सलिल धार सी
सतत प्रवाहित
ओ उपासनी!
*
इधर लालिमा, उधर कालिमा
दीपशिखा सी
जलती रहतीं।
कोना-कोना किया प्रकाशित
अनगिन खुशियाँ
बिन गिन तहतीं।
चित प्रकाशनी!
श्वास-छंद की लय-गति-यति सँग
मोह रहीं मन अलंकार सी
शीतल-निर्मल सलिल धार सी
सतत प्रवाहित
ओ उपासनी!
*
चौका, कमरा, आँगन, परछी
पूजा, बैठक
हँसती रहतीं।
माँ-पापा, बेटी-बेटा, मैं
तकें सहारा
डिगीं, न ढहतीं
मन निवासिनी!
आपद-विपद, कष्ट-पीड़ा का
गुप-चुप करतीं फलाहार सी
शीतल-निर्मल सलिल धार सी
सतत प्रवाहित
ओ उपासनी!
२४.२.२०१६
***
नवगीत:
बहुत समझ लो/सच, बतलाया/थोड़ा है
.
मार-मार
मनचाहा बुलावा लेते हो.
अजब-गजब
मनचाहा सच कह देते हो.
काम करो,
मत करो, तुम्हारी मर्जी है-
नजराना
हक, छीन-झपट ले लेते हो.
पीर बहुत है/दर्द दिखाया/थोड़ा है
बहुत समझ लो/सच, बतलाया/थोड़ा है
.
सार-सार
गह लेते, थोथा देते हो.
स्वार्थ-सियासत में
हँस नैया खेते हो.
चोर-चोर
मौसेरे भाई संसद में-
खाई पटकनी
लेकिन तनिक न चेते हो.
धैर्य बहुत है/वैर्य दिखाया/थोड़ा है
बहुत समझ लो/सच, बतलाया/थोड़ा है
.
भूमि छीन
तुम इसे सुधार बताते हो.
काला धन
लाने से अब कतराते हो.
आपस में
संतानों के तुम ब्याह करो-
जन-हित को
मिलकर ठेंगा दिखलाते हो.
धक्का तुमको /अभी लगाया/थोड़ा है
बहुत समझ लो/सच, बतलाया/थोड़ा है
२४.२.२०१५

*** 

गुरुवार, 25 जून 2020

समीक्षा के भेदक तत्व

समीक्षा के भेदक तत्व
डॉ०आलोक रंजन कुमार

शास्त्रीय समीक्षा तथा स्वच्छंदतावादी समीक्षा के भेदक तत्व--

शास्त्रीय समीक्षाशास्त्र के रूप में समीक्षा की परंपरा अति प्राचीन है। "शास्त्र" शब्द को परिभाषित करते हुए "शासनात शास्त्रम्" तथा "शंसनात शास्त्रम्" दोनों बातें कही गई हैं। वस्तुतः शास्त्र शासन भी करता है और अनुशंसा (संस्तुति) भी। भारतवर्ष में आचार्य भरत के समय विक्रम संवत दूसरी सदी तथा पाश्चात्य जगत में प्लेटो के काल से ही क्रमशः काव्य और कला के रूप में साहित्य के लिए निकष की स्थापना होती रही है। परवर्ती रचनाकार उनका अनुसरण करते रहे हैं। आज भी कुछ तथावत् तथा कुछ परिवर्तित रूपों में आलोचनाशास्त्र साहित्य रूपों का नियमन तथा उसका परीक्षण करता है। हां , इतनी बात अवश्य है कि आचार्य भरत के शब्दों में- लोक जीवन का अनुकरण है "लोकानुकरणम् नाट्यम्" तथा प्लेटो के शब्दों में - "वह प्रकृति का अनुकरण है"- (इमिटेशन ऑफ नेचर)। लोक मान्यताओं की परिवर्तनशीलता तथा पाश्चात्य मान्यताओं के प्रभाव स्वरूप भारतीय मान्यताएं भी बदलती रही हैं। तदनुसार साहित्य की समीक्षा भी भिन्न-भिन्न ढंग से होती रही हैं।
संस्कृत वांग्मय में प्रतिभा के दो रूप माने गए हैं --
(१).कारयित्रि प्रतिभा तथा, (२).भावयित्री प्रतिभा ।

(१). कारयित्री प्रतिभा के बल पर रचनाकार सृजन करता है।
(२).भावयित्री प्रतिभा के बल पर पाठक तथा आलोचक उसका मूल्यांकन करते हैं । आलोचक इस तथ्य को उद्घाटित करता है कि कोई रचनाकार मानव हृदय की अनुभूतियों को किस सौंदर्य और सीमा के साथ उद्घाटित करने में सफल हुआ है।
आलोचना के दो रूप माने जाते हैं --
(1). सैद्धांतिक आलोचना,
(2). व्यावहारिक आलोचना।

(1). सैद्धांतिक आलोचना के अंतर्गत साहित्य रचना के सिद्धांतों का निरूपण होता है। इसके अंतर्गत रचनाओं के प्रतिमान गठित किए जाते हैं।
(2). व्यावहारिक आलोचना के अंतर्गत उन सिद्धांतों के आधार पर किसी कृतिकार अथवा उसकी कृति विशेष का परीक्षण किया जाता है।
संस्कृत में सैद्धांतिक समीक्षा की तो सुदीर्घ परंपरा मिलती है । परंतु व्यावहारिक आलोचना /समीक्षा का कोई रूप वहां नहीं मिलता। व्यवहारिक समीक्षा का विकास हिंदी में शुक्ल युग से प्रारंभ हुआ। हिंदी में इसकी दीर्घ परंपरा है ।
सैद्धांतिक समीक्षा के अंतर्गत शास्त्रीय - समन्वयात्मक, स्वच्छंदतावादी, उपयोगितावादी, मनोविश्लेषणात्मक तथा समाजशास्त्रीय इत्यादि कई प्रकार की समीक्षा पद्धतियों का विकास हुआ है।
हिंदी आलोचना के जनक के रूप में आचार्य रामचंद्र शुक्ल को प्रायः सभी विद्वान् स्वीकारते हैं। इन्होंने सैद्धांतिक तथा व्यावहारिक दोनों प्रकार की समीक्षा की है।
सैद्धांतिक समीक्षा के अंतर्गत ये शास्त्रीय समीक्षक माने जाते हैं । उनकी "रस- मीमांसा" तथा "चिंतामणि" में "कविता क्या है?" शीर्षक निबंध शास्त्रीय समीक्षा के उदाहरण हैं । आगे भी शास्त्रीय समीक्षा से संबंधित जो भी ग्रंथ लिखे गए हैं, उसके शलाका पुरुष के रूप में आचार्य रामचंद्र शुक्ल को ही स्वीकार किया गया है। वैसे तो हिंदी साहित्य में आचार्य रामचंद्र शुक्ल के पूर्व भी रीतिकालीन कवि - आचार्यों ने लक्षण ग्रंथ की रचना की है, जिसे शास्त्रीय समीक्षा के रूप में स्वीकार किया जाता है। किंतु वह परंपरा डॉ० राम विनोद सिंह के शब्दों में - "अनगढ़-सी" है। वस्तुतः हिंदी में शास्त्रीय समीक्षा के पुरोधा आचार्य शुक्ल जी ही हैं , जिनका आगमन द्विवेदी युग के अंत में हुआ है। हिंदी आलोचना के इतिहास में शुक्ल जी को स्वमेव एक युग मानना समीचीन होगा।
आचार्य शुक्ल के पूर्व रीतिकालीन आचार्यों ने संस्कृत की शास्त्रीय समीक्षा के छ: संप्रदायों में से केवल चार अर्थात रस, छंद, अलंकार और ध्वनि संप्रदायों का अनुसरण करने का प्रयास किया। द्विवेदी युग में इसका विस्तार हुआ किंतु यहां भी शास्त्रीय समीक्षा संस्कृत के प्रभाव से मुक्त एवं आत्मनिर्भर नहीं है। शुक्ल जी ने साहित्य के नवबोध के साथ ही बदलती हुई भारतीय सामाजिकता से प्रभाव ग्रहण किया तथा साहित्य को लोकमंगल से जोड़कर उसके स्वरूप को लोचदार और कारण सापेक्ष बनाया ।
आचार्य शुक्ल जी की शास्त्रीय समीक्षा अपने काल के साहित्य आदर्शों तथा पारंपरिक साहित्य सिद्धांतों के समीकरण से निर्मित है। शुक्ल जी यह महसूस करते हैं कि शास्त्रीय समीक्षा अपने देश की समस्त सांस्कृतिक परंपरा से जुड़कर ही अधिक सार्थक एवं संगत बन गई है। परंतु कुछ विद्वानों का आरोप है कि आचार्य शुक्ल तथा ,उनकी समीक्षा नैतिक वादी है जो पारंपरिक भाव ।बोध का अंध समर्थन और नवबोध का प्रतिकार करती है। नैतिकता वादी दृष्टि प्रायः जीवन के व्यवहार पक्ष की अवहेलना करती है तथा यथार्थ से दूर वह आदर्शों में जीती है। साथ ही स्वरूप उपदेशात्मक हो जाता है। कुल मिलाकर हिंदी की शास्त्रीय समीक्षा साहित्य के पारंपरिक प्रतिमानों, प्राचीन एवं अर्वाचीन भावबोधों तथा पाश्चात्य एवं प्राचीन तथा नवीन मान्यताओं के समीकरण से निर्मित है। जीवन आदर्शों का पोषक तथा उससे जुड़ कर चलने वाली समीक्षा पद्धति है।
आचार्य शुक्ल जी की समीक्षा पद्धति रसवादी है। इन्होंने रस को ही काव्य की आत्मा के रूप में स्वीकार किया है। रीति काल में प्राय: अलंकारवादी समीक्षा की होड़ सी रही है। किंतु आचार्य शुक्ल के काल में तथा शुक्लोत्तर हिंदी समीक्षा का स्वरूप प्राय: रसवादी तथा लोक मांगलिक रहा है।
शास्त्रीय समीक्षकों की परंपरा में आचार्य शुक्ल के पश्चात् गुलाब राय( काव्य के रूप: सिद्धांत और अध्ययन), चंद्रबली पांडे, पीतांबर दत्त बड़थ्वाल, लक्ष्मीनारायण सुधांशु (काव्य में अभिव्यंजनावाद ,जीवन के तत्व एवं काव्य के सिद्धांत), रामकृष्ण सिलीमुख, आचार्य विश्वनाथ प्रताप मिश्र( वांग्मय विमर्श), पंडित रमाशंकर शुक्ल रसाल, हरिऔध , माधव प्रसाद मिश्र, डॉ श्यामसुंदर दास, डॉ नगेंद्र आदि की सुदीर्घ परंपरा आती है।
स्वच्छंदतावादी समीक्षा-
आचार्य शुक्ल की शास्त्रीय समीक्षा के परंपरावादी एवं आदर्श परक दृष्टिकोण की प्रतिक्रिया रूप में विकसित स्वच्छंदतावादी समीक्षा पद्धति प्रकाश में आई । शुक्ल जी का रसवादी दृष्टिकोण इतिवृत्तात्मक साहित्य के अभिव्यंजना कौशल तथा मूल्यांकन की नैतिकतावादी दृष्टि स्वच्छंदतावादी समीक्षकों को मान्य नहीं । प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात् (1914 से 1919) भारतीय जीवन में एक बहुत बड़ा बदलाव आया तथा उसमें प्रभावित नए ढंग के काव्य का सूत्रपात हुआ तथा काव्य कला संबंधी नई धारणाएं सामने आईं। पारंपरिक मान्यताओं से हटकर साहित्यकारों ने आत्मानुभूति को साहित्य में अभिव्यक्ति प्रदान की। 1920 के आसपास दार्शनिक आभा से अभिमंडित, नूतन कोमल कल्पनाओं से सुसज्जित, आत्मपरक साहित्य के प्रणयन होने लगे, जो आगे चलकर छायावादी साहित्य के नाम से अभिहित हुआ।इनके मूल्यांकन में आचार्य शुक्ल द्वारा स्थापित शास्त्रीय समीक्षा पद्धति असमर्थ रही। इन समीक्षकों ने न तो वैसे साहित्यकारों के प्रति सहानुभूति दिखलाई और ना तो उन्हें इसकी सही परख ही हो सकी । फलत: छायावादी साहित्य को अनेक तरह के आरोपों का शिकार होना पड़ा। फलत: वैसे साहित्यकारों को अपने विरोधियों का उत्तर देने के लिए आलोचना के क्षेत्र में उतरना पड़ा और उन्होंने साहित्य के नए प्रतिमान गठित किए।
स्वच्छंदतावादी समीक्षा काव्य और शिल्प दोनों ही क्षेत्रों में नवीन मार्ग का अनुसरण करती है। यहां समष्टिगत अनुभूतियों और मान्यताओं की जगह व्यक्तिगत अनुभूतियों को साहित्य में स्थान दिया गया। स्वतंत्रता की भावना तथा विद्रोह की प्रवृत्ति स्वच्छंदतावाद की मुख्य विशेषता है । साहित्यकार अपनी रचना में व्यक्तिगत अनुभूतियों की अभिव्यक्ति के लिए पूर्णत: स्वतंत्र है। वस्तुतः एक सफल कलाकार की व्यष्टिपरक अनुभूति साहित्य जगत में आकर स्वमेव व्यष्टिगत हो जाती है और समग्र लोक जीवन को प्रभावित करती है ।
पंत, प्रसाद, निराला तथा महादेवी ने स्वयं अपनी रचनाओं में छायावादी साहित्य पर लगाए गए आरोपों के उत्तर देते हुए लंबी-लंबी भूमिकाएं लिखी तथा स्वतंत्र रचनाओं के रूप में युगीन काव्य की प्रेरणा , अनुभूति , अभिव्यक्ति एवं काव्य सौष्ठव पर विचार किया। यहीं से हिंदी साहित्य में स्वच्छंदतावादी समीक्षा का विकास हुआ।
हिंदी में स्वच्छंदतावादी समीक्षा के उद्भावक के रूप में सुमित्रानंदन पंत को माना जाता है । इन्होंने सर्वप्रथम 1926 ईस्वी में "पल्लव* की भूमिका में स्वच्छंदतावादी काव्य-शिल्प पर विचार किया। पंत जी के अनुसार-" कविता की भाषा चित्रात्मक होनी चाहिए । काव्य में शब्द और अर्थ का अभिन्न संबंध होता है तथा भावों की अभिव्यक्ति और भाषा सौष्ठव मुक्त छंद में अधिक सुघड़ता से व्यक्त किया जा सकता है।" पंत जी ने साहित्य और जीवन में अन्योन्याश्रय संबंध माना है ।
स्वच्छंदतावादी समीक्षकों की परंपरा में छायावाद चतुष्टय के कवियों के अतिरिक्त आचार्य नंददुलारे वाजपेयी का नाम अग्रगण्य है। इन्होंने शुक्ल जी की आलोचना को सीमित बतलाया तथा छायावाद के सौंदर्य बोध एवं भाषा शिल्प पर भी नूतन दृष्टि डाली। आचार्य वाजपेई के पश्चात् शांतिप्रिय द्विवेदी , आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, डॉ० नागेंद्र प्रवृत्ति आलोचकों के नाम इसी परंपरा में आते हैं।

शास्त्रीय एवं स्वच्छंदतावादी समीक्षा के भेदक तत्व-
१). सैद्धांतिक समीक्षा के अंग होते हुए भी जहां शास्त्रीय समीक्षा परंपरावादी है वहां स्वच्छंदतावादी समीक्षा परंपरा मुक्त है । वह परंपराओं और रूढ़ियों के प्रति विद्रोहात्मक है।
२). शास्त्रीय समीक्षा जहां परंपराओं और आदर्शों के प्रति मोह ग्रस्त है वहां स्वच्छंदतावादी समीक्षा पारंपरिक मान्यताओं से हटकर नवीन उद्भावनाओं का आग्रह है। फलत: कविवर प्रसाद कहते हैं-
"पुरातनता का यह निर्भीक
सहन करती न प्रकृति पल एक,
नित्य नूतनता का आनंद
किए हैं परिवर्तनों में टेक।"
३). शास्त्रीय समीक्षा जहां आदर्शवादी है वहां स्वच्छंदतावादी समीक्षा यथार्थवादी।
४). शास्त्रीय समीक्षा साहित्य में समष्टिपरक अनुभूतियों को अभिव्यक्ति प्रदान करने का आग्रही है, वहां स्वच्छंदतावादी मान्यताएं व्यक्तिगत अनुभूतियों विचारों तथा कल्पनाओं की अभिव्यक्ति की पूरी छूट देती है।
५). स्वच्छंदता वादी समीक्षक कला को साहित्य का बाह्य रूप मानते हैं तथा जीवन को उसका अंतः स्वरूप । अतः साहित्य में कृतिकार की निजी संवेदना ही अभिव्यक्ति पाएगी। डॉ०शांति प्रिय द्विवेदी के शब्दों में -"कला साहित्य का बाह्य रूप है, जीवन उसका अंत रूप। कला अभिव्यक्ति है जीवन अभिव्यक्त।"
६). शास्त्रीय समीक्षा के उद्भावक आचार्य शुक्ल ने जहां अपनी समीक्षा का केंद्रबिंदु तुलसी और उनके रामचरितमानस को माना है वहां स्वच्छंदतावादी समीक्षकों का केंद्रबिंदु छायावादी साहित्य है।
७).स्वच्छंदतावादी समीक्षा साहित्य में व्यक्ति का उदात्त कल्पना, कलात्मक उत्कर्ष, प्रकृति चित्रण आदि की पूरी छूट देते हैं तथा कवि को शास्त्र एवं परंपरा के हर बंधन से उन्मुक्त । जबकि शास्त्रीय समीक्षक आदर्श के मोह का त्याग नहीं करते, वे सामाजिक अनुभूतियों, लोक मर्यादाओं तथा परंपराओं के प्रति आग्रही हैं।
समग्रत: हम कह सकते हैं कि स्वच्छंदतावादी समीक्षा सैद्धांतिक समीक्षा के क्षेत्र में एक आंदोलन है जो प्राचीन रूढ़ियों का विरोध कर हर क्षण नवीन उद भावनाओं तथा उन्मुक्त भावनाओं का स्वागत करती है।