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रविवार, 11 अक्टूबर 2026

अक्टूबर ११, दुर्गा, रुहेली, दोहा। हाइकु, मुक्तिका, वास्तु , भवन, हरिगीतिका, लघुकथा, नवगीत,

सलिल सृजन अक्टूबर ११
*
हाइकु 
देवी 
० 
मिट्टी से बनी 
जगत में पूजित 
मिट्टी में मिली। 
. 
जगजननी
जो कहे आज, 
कल वही कुलटा। 
. 
घर में पूजे 
सड़क पर मारे 
वरदीवाला। 
. 
चंदे की चोरी 
देखकर न देखें 
देवता-देवी। 
. 
जैसी भावना 
देवी की प्रतिमा 
वैसी दिखती। 
. 
प्राण प्रतिष्ठा 
जो करे, वही करे 
विसर्जन भी। 
. 
महिमामयी 
हो ही नहीं सकती 
ममतामयी। 
. 
मत देखिए 
विवाह हेतु कन्या 
उसे जानिए। 
. 
पूजो न रौंदो 
पाकर समानता
खुश हो देवी। 
000
मुक्तक
हासिले-जिंदगी कुछ नहीं है मुझे
काम आऊँ यही बंदगी है मुझे
देश को फख्र मुझ पर हमेशा रहे
साँस लेने दे पाबंदगी है मुझे
०००

द्विपदि सलिला
जिह्वा विराजें शारदा, भुजा भवानी बैठ।
करतल हों माँ लक्ष्मी, हृदय त्रिसुर आ पैठ।।
.
चित्र गुप्त मति से बने, मस्तक-कृति गुणवान।
श्वास-वाक्-स्वर त्रिदेवी, करें सृजन रस-खान।।
.
वीणा की झंकार मय, सुना अनाहद नाद।
माँ शायद वरदान दें, मात्र यही फरियाद।।
.
मैहर बैठीं शारदा, मूल शारदा पीठ।
शायद लिपि-भाषा जिए, करें कृपामय दीठि।।
.
स्वर-व्यंजन अक्षर सबद, साखी कह युग-सत्य।
शायद का संदेश दें, कर अकाम हर कृत्य।।
११.१०.२०२६
०००
मुक्तक
धरती की बर्बाद चाँद पे जा रए हैं २३
चंदा डर सें पीरो, जे मुस्का रए हैं २३
एक दूसरे की धरती पै बम फेंकें २२
संधि बार्ता कैंसी दोउ गुर्रा रए हैं २३
***
***
गीत
चंदा! हमैं वरदान दै
(रुहेली)
*
चंदा! हमैं वरदान दै,
पाँयन तुमारिन सै परैं।
पूनम भौत भाती हमैं
उम्मीद दै जाती हमैं।
उजियारते देवा तुमई
हर साँझ हरसाते हमैं।
मम्मा! हमैं कछु ज्ञान दै,
अज्ञान सागर सै तरैं।।
दै सूर्य भैया उजारो
बहिन उसा नैं पुकारो।
तारों सैं यारी पुरानी
रजनी में सासन तुमारो।
बसबे हमें स्थान दै,
लै बिना ना दर सै टरैं।।
तुम चाहते हौ सांत हौं
सबसै मिलें हम प्रेम से।
किरपा तुमारी मिलै तौ
तुम पै बसें हम छेम से।
खुस हो तुरत गुनगान सें ,
हम सब बिनै तुम सै करैं।।
११-१०-२०२३
***
दोहा मुक्तिका:
संदेहित किरदार.....
*
लोकतंत्र को शोकतंत्र में, बदल रही सरकार.
असरदार सरदार सशंकित, संदेहित किरदार..
योगतंत्र के जननायक को, छलें कुटिल-मक्कार.
नेता-अफसर-सेठ बढ़ाते, प्रति पल भ्रष्टाचार..
आम आदमी बेबस-चिंतित, मूक-बधिर लाचार.
आसमान छूती मंहगाई, मेहनत जाती हार..
बहा पसीना नहीं पल रहा, अब कोई परिवार.
शासक है बेफिक्र, न दुःख का कोई पारावार..
राजनीति स्वार्थों की दलदल, मिटा रही सहकार.
देश बना बाज़ार- बिकाऊ, थाना-थानेदार..
अंधी न्याय-व्यवस्था, सच का कर न सके दीदार.
काले कोट दलाल- न सुनते, पीड़ित का चीत्कार..
जनमत द्रुपदसुता पर, करे दु:शासन निठुर प्रहार.
कृष्ण न कोई, कौन सकेगा, गीता-ध्वनि उच्चार?
सबका देश, देश के हैं सब, तोड़ भेद-दीवार.
श्रृद्धा-सुमन शहीदों को दें, बाँटें-पायें प्यार..
सिया जनास्था का कर पाता, वनवासी उद्धार.
सत्ताधारी भेजे वन को, हर युग में हर बार..
लिये खडाऊँ बापू की जो, वही बने बटमार.
'सलिल' असहमत जो वे भी हैं, पद के दावेदार..
'सलिल' एक है राह, जगे जन, सहे न अत्याचार.
अफसरशाही को निर्बल कर, छीने निज अधिकार..
***
नवगीत:
कम लिखता हूँ...
*
क्या?, कैसा है??
क्या बतलाऊँ??
कम लिखता हूँ,
बहुत समझना...
*
पोखर सूखे,
पानी प्यासा.
देती पुलिस
चोर को झाँसा.
खेतों संग
रोती अमराई.
अन्न सड़ रहा,
फिके उदासा.
किस्मत में
केवल गरीब की
भूखा मरना...
*
चूहा खोजे,
मिला न दाना.
चमड़ी ही है
तन पर बाना.
कहता भूख,
नहीं बीमारी,
जिला प्रशासन
बना बहाना.
न्यायालय से
छल करता है
नेता अपना...
*
शेष न जंगल,
यही अमंगल.
पर्वत खोदे-
हमने तिल-तिल.
नदियों में
लहरें ना पानी.
न्योता मरुथल
हाथ रहे मल.
जो जैसा है
जब लिखता हूँ
बहुत समझना...
***
मुक्तिका :
भजे लछमी मनचली को..
*
चाहते हैं सब लला, कोई न चाहे क्यों लली को?
नमक खाते भूलते, रख याद मिसरी की डली को..
गम न कर गर दोस्त कोई नहीं तेरा बन सका तो.
चाह में नेकी नहीं, तू बाँह में पाये छली को..
कौन चाहे शाक-भाजी-फल खिलाना दावतों में
चाहते मदिरा पिलाना, खिलाना मछली तली को..
ज़माने में अब नहीं है कद्र फनकारों की बाकी.
बुलाता बिग बोंस घर में चोर डाकू औ' खली को..
राजमार्गों पर हुए गड्ढे बहुत, गुम सड़क खोजो.
चाहते हैं कदम अब पगडंडियों को या गली को..
वंदना या प्रार्थना के स्वर ज़माने को न भाते.
ऊगता सूरज न देखें, सराहें संध्या ढली को..
'सलिल' सीता को छला रावण ने भी, श्री राम ने भी.
शारदा तज अवध-लंका भजे लछमी मनचली को..
***
लेख :
भवन निर्माण संबन्धी वास्तु सूत्र
*
वास्तुमूर्तिः परमज्योतिः वास्तु देवो पराशिवः
वास्तुदेवेषु सर्वेषाम वास्तुदेव्यम नमाम्यहम् - समरांगण सूत्रधार, भवन निवेश
वास्तु मूर्ति (इमारत) परम ज्योति की तरह सबको सदा प्रकाशित करती है। वास्तुदेव
चराचर का कल्याण करनेवाले सदाशिव हैं। वास्तुदेव ही सर्वस्व हैं वास्तुदेव को प्रणाम।
सनातन भारतीय शिल्प विज्ञान के अनुसार अपने मन में विविध कलात्मक रूपों की
कल्पना कर उनका निर्माण इस प्रकार करना कि मानव तन और प्रकृति में उपस्थित पञ्च
तत्वों का समुचित समन्वय व संतुलन इस प्रकार हो कि संरचना का उपयोग करनेवालों
को सुख मिले, ही वास्तु विज्ञान का उद्देश्य है।
मनुष्य और पशु-पक्षियों में एक प्रमुख अन्तर यह है कि मनुष्य अपने रहने के लिये ऐसा
घर बनाते हैं जो उनकी हर आवासीय जरूरत पूरी करता है जबकि अन्य प्राणी घर या तो
बनाते ही नहीं या उसमें केवल रात गुजारते हैं। मनुष्य अपने जीवन का अधिकांश
समय इमारतों में ही व्यतीत करते हैं। एक अच्छे भवन का परिरूपण कई तत्वों पर निर्भर
करता है। यथा : भूखंड का आकार, स्थिति, ढाल, सड़क से सम्बन्ध, दिशा, सामने व आस-
पास का परिवेश, मृदा का प्रकार, जल स्तर, भवन में प्रवेश कि दिशा, लम्बाई, चौडाई,
ऊँचाई, दरवाजों-खिड़कियों की स्थिति, जल के स्रोत प्रवेश भंडारण प्रवाह व् निकासी की
दिशा, अग्नि का स्थान आदि। हर भवन के लिये अलग-अलग वास्तु अध्ययन कर
निष्कर्ष पर पहुँचना अनिवार्य होते हुए भी कुछ सामान्य सूत्र प्रतिपादित किये जा सकते हैं जिन्हें ध्यान में रखने पर अप्रत्याशित हानि से बचकर सुखपूर्वक रहा जा सकता है।
* भवन में प्रवेश हेतु पूर्वोत्तर (ईशान) श्रेष्ठ है। पूर्व, उत्तर, पश्चिम, दक्षिण-पूर्व (आग्नेय)
तथा पूर्व-पश्चिम (वायव्य) दिशा भी अच्छी है किंतु दक्षिण, दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य), दक्षिण-
पूर्व (आग्नेय) से प्रवेश यथासम्भव नहीं करना चाहिए। यदि वर्जित दिशा से प्रवेश
अनिवार्य हो तो किसी वास्तुविद से सलाह लेकर उपचार करना आवश्यक है।
* भवन के मुख्य प्रवेश द्वार के सामने स्थाई अवरोध खम्बा, कुआँ, बड़ा वृक्ष, मोची, मद्य, मांस
आदि की दूकान, गैर कानूनी व्यवसाय आदि नहीं हो।
* मुखिया का कक्ष नैऋत्य दिशा में होना शुभ है।
* शयन कक्ष में मन्दिर न हो।
* वायव्य दिशा में अविवाहित कन्याओं का कक्ष, अतिथि कक्ष आदि हो। इस दिशा में वास करनेवाला अस्थिर होता है, उसका स्थान परिवर्तन होने की अधिक सम्भावना होती है।
* शयन कक्ष में दक्षिण की और पैर कर नहीं सोना चाहिए। मानव शरीर एक चुम्बक की
तरह कार्य करता है जिसका उत्तर ध्रुव सिर होता है। मनुष्य तथा पृथ्वी का उत्तर ध्रुव एक
दिशा में ऐसा तो उनसे निकलने वाली चुम्बकीय बल रेखाएँ आपस में टकराने के कारण
प्रगाढ़ निद्रा नहीं आयेगी। फलतः अनिद्रा के कारण रक्तचाप आदि रोग ऐसा सकते हैं। सोते
समय पूर्व दिशा में सिर होने से उगते हुए सूर्य से निकलनेवाली किरणों के सकारात्मक
प्रभाव से बुद्धि के विकास का अनुमान किया जाता है। पश्चिम दिशा में डूबते हुए सूर्य
से निकलनेवाली नकारात्मक किरणों के दुष्प्रभाव के कारण सोते समय पश्चिम में सिर रखना
मना है।
* भारी बीम या गर्डर के बिल्कुल नीचे सोना भी हानिकारक है।* शयन तथा भंडार कक्ष यथासंभव सटे हुए न हों।
* शयन कक्ष में आइना रखें तो ईशान दिशा में ही रखें अन्यत्र नहीं।
* पूजा का स्थान पूर्व या ईशान दिशा में इस तरह इस तरह हो कि पूजा करनेवाले का मुँह पूर्व
या ईशान दिशा की ओर तथा देवताओं का मुख पश्चिम या नैऋत्य की ओर रहे। बहुमंजिला
भवनों में पूजा का स्थान भूतल पर होना आवश्यक है। पूजास्थल पर हवन कुण्ड या
अग्नि कुण्ड आग्नेय दिशा में रखें।
* रसोई घर का द्वार मध्य भाग में इस तरह हो कि हर आनेवाले को चूल्हा न दिखे। चूल्हा
आग्नेय दिशा में पूर्व या दक्षिण से लगभग ४'' स्थान छोड़कर रखें। रसोई, शौचालय एवं पूजा
एक दूसरे से सटे न हों। रसोई में अलमारियाँ दक्षिण-पश्चिम दीवार तथा पानी ईशान दिशा में
रखें।
* बैठक का द्वार उत्तर या पूर्व में हो. दीवारों का रंग सफेद, पीला, हरा, नीला या गुलाबी हो पर
लाल या काला न हो। युद्ध, हिंसक जानवरों, भूत-प्रेत, दुर्घटना या अन्य भयानक दृश्यों के चित्र न हों। अधिकांश फर्नीचर आयताकार या वर्गाकार तथा दक्षिण एवं पश्चिम में हों।
* सीढ़ियाँ दक्षिण, पश्चिम, आग्नेय, नैऋत्य या वायव्य में हो सकती हैं पर ईशान में न हों।
सीढियों के नीचे शयन कक्ष, पूजा या तिजोरी न हो. सीढियों की संख्या विषम हो।
* कुआँ, पानी का बोर, हैण्ड पाइप, टंकी आदि ईशान में शुभ होता है। दक्षिण या
नैऋत्य में अशुभ व नुकसानदायक है।
* स्नान गृह पूर्व में, धोने के लिए कपडे वायव्य में, आइना ईशान, पूर्व या उत्तर में गीजर
तथा स्विच बोर्ड आग्नेय दिशा में हों।
* शौचालय वायव्य या नैऋत्य में, नल ईशान, पूर्व या उत्तर में, सेप्टिक टेंक उत्तर या पूर्व में हो।
* मकान के केन्द्र (ब्रम्ह्स्थान) में गड्ढा, खम्बा, बीम आदि न हो। यह स्थान खुला, प्रकाशित व् सुगन्धित हो।
* घर के पश्चिम में ऊँची जमीन, वृक्ष या भवन शुभ होता है।
* घर में पूर्व व् उत्तर की दीवारें कम मोटी तथा दक्षिण व् पश्चिम कि दीवारें अधिक मोटी हों।
तहखाना ईशान, उत्तर या पूर्व में तथा १/४ हिस्सा जमीन के ऊपर हो। सूर्य किरनें तहखाने तक
पहुँचना चाहिए।
* मुख्य द्वार के सामने अन्य मकान का मुख्य द्वार, खम्बा, शिलाखंड, कचराघर आदि न हो।
* घर के उत्तर व पूर्व में अधिक खुली जगह यश, प्रसिद्धि एवं समृद्धि प्रदान करती है।
वराह मिहिर के अनुसार वास्तु का उद्देश्य 'इहलोक व परलोक दोनों की प्राप्ति है। नारद
संहिता, अध्याय ३१, पृष्ठ २२० के अनुसार-
'अनेन विधिनन समग्वास्तुपूजाम करोति यः आरोग्यं पुत्रलाभं च धनं धन्यं लाभेन्नारह।'
अर्थात इस तरह से जो व्यक्ति वास्तुदेव का सम्मान करता है वह आरोग्य, पुत्र धन -
धन्यादि का लाभ प्राप्त करता है।
***
हरिगीतिका:
मानव सफल हो निकष पर पुरुषार्थ चारों मानकर.
मन पर विजय पा तन सफल, सच देवता पहचान कर..
सौरभमयी हर श्वास हो, हर आस को अनुमान कर.
भगवान को भी ले बुला भू, पर 'सलिल' इंसान कर..
*
अष्टांग की कर साधना, हो अजित निज उत्थान कर.
थोथे अहम् का वहम कर ले, दूर किंचित ध्यान कर..
जो शून्य है वह पूर्ण है, इसका तनिक अनुमान कर.
भटकाव हमने खुद वरा है, जान को अनजान कर..
*
हलका सदा नर ही रहा नारी सदा भारी रही.
यह काष्ट है सूखा बिचारा, वह निरी आरी रही..
इसको लँगोटी ही मिली उसकी सदा सारी रही.
माली बना रक्षा करे वह, महकती क्यारी रही..
*
माता बहिन बेटी बहू जो, भी रही न्यारी रही.
घर की यही शोभा-प्रतिष्ठा, जान से प्यारी रही..
यह हार जाता जीतकर वह, जीतकर हारी रही.
यह मात्र स्वागत गीत वह, ज्योनार की गारी रही..
*
हमने नियति की हर कसौटी, विहँस कर स्वीकार की.
अब पग न डगमग हो रुकेंगे, ली चुनौती खार की.
अनुरोध रहिये साथ चिंता, जीत की ना हार की..
हर पर्व पर है गर्व हमको, गूँज श्रम जयकार की..
*
उत्सव सुहाने आ गये हैं, प्यार सबको बाँटिये.
भूलों को जाएँ भूल, नाहक दण्ड दे मत डाँटिये..
सबसे गले मिल स्नेह का, संसार सुगढ़ बनाइये.
नेकी किये चल 'सलिल', नेकी दूसरों से पाइये..
*
हिल-मिल मनायें पर्व सारे, बाँटकर सुख-दुःख सभी.
ऐसा लगे उतरे धरा पर, स्वर्ग लेकर सुर अभी.
सुर स्नेह के छेड़ें, सुना सरगम 'सलिल' सद्भाव की.
रच भावमय हरिगीतिका, कर बात नहीं अभाव की..
*
दिल से मिले दिल तो बजे त्यौहार की शहनाइयाँ.
अरमान हर दिल में लगे लेने विहँस अँगड़ाइयाँ..
सरहज मिले, साली मिले या सँग हों भौजाइयाँ.
संयम-नियम से हँसें-बोलें, हो नहीं रुस्वाइयाँ..
*
कस ले कसौटी पर 'सलिल', खुद आप अपने काव्य को.
देखे परीक्षाकर, परखकर, गलतियां संभाव्य को..
एक्जामिनेशन, टेस्टिंग या जाँच भी कर ले कभी.
कविता रहे कविता, यहे एही इम्तिहां लेना अभी..
*
अनुरोध है हम यह न भूलें एकता में शक्ति है.
है इल्तिजा सबसे कहें सर्वोच्च भारत-भक्ति है..
इसरार है कर साधना हों अजित यह ही युक्ति है.
रिक्वेस्ट है इतनी कि भारत-भक्ति में ही मुक्ति है..
*
मुक्तिका:
*
काम कर बेकाम, कोई क्यों निठल्ला रह मरे?
धान इस कोठे का बनिया दूजे कोठे में भरे.
फोड़ सर पत्थर पे मिलता है अगर संतोष तो
रोकता कोई नहीं, मत आप करने से डरे
काम का परिणाम भी होता रहा जग में सदा
निष्काम करना काम कब चाहा किसी ने नित करे?
नाम ने बदनाम कर बेनाम होने ना दिया
तार तो पाता नहीं पर चाहता है नर तरे
कब हरे हमने किसी के दर्द पहले सोच लें
हुई तबियत हरी, क्यों कोई हमारा दुःख हरे
मिली है जम्हूरियत तो कद्र हम करते नहीं
इमरजेंसी याद करती रूह साये से डरे
बेहतर बहता रहे चुपचाप कोई पी सके
'सलिल' कोई आ तुझे अपनी गगरिया में भरे
११-१०-२०१५
***
नवगीत
बचपन का
अधिकार
उसे दो
याद करो
बीते दिन अपने
देखे सुंदर
मीठे सपने
तनिक न भाये
बेढब नपने
अब अपना
स्वीकार
उसे दो
पानी-लहरें
हवा-उड़ानें
इमली-अमिया
तितली-भँवरे
कुछ नटखटपन
कुछ शरारतें
देखो हँस
मनुहार
उसे दो
इसकी मुट्ठी में
तक़दीरें
यह पल भर में
हरता पीरें
गढ़ता पल-पल
नई नज़ीरें
आओ!
नवल निखार
इसे दो
***
लघुकथा
सफलता
*
गुरु छात्रों को नीति शिक्षा दे रहे थे- ' एकता में ताकत होती है. सबको एक साथ हिल-मिलकर रहना चाहिए- तभी सफलता मिलती है.'
' नहीं गुरु जी! यह तो बीती बात है, अब ऐसा नहीं होता. इतिहास बताता है कि सत्ता के लिए आपस में लड़ने वाले जितने अधिक नेता जिस दल में होते हैं' उसके सत्ता पाने के अवसर उतने ज्यादा होते हैं. समाजवादियों के लिए सत्ता अपने सुख या स्वार्थ सिद्धि का साधन नहीं जनसेवा का माध्यम थी. वे एक साथ मिलकर चले, धीरे-धीरे नष्ट हो गए. क्रांतिकारी भी एक साथ सुख-दुःख सहने कि कसमें खाते थे. अंतत वे भी समाप्त हो गए. जिन मौकापरस्तों ने एकता की फ़िक्र छोड़कर अपने हित को सर्वोपरि रखा, वे आज़ादी के बाद से आज तक येन-केन-प्रकारेण कुर्सी पर काबिज हैं.' -होनहार छात्र बोला.
गुरु जी चुप!
११-१०-२०१४
***
दोहा सलिला
दोहे बात ही बात में
*
बात करी तो बात से, निकल पड़ी फिर बात
बात कह रही बात से, हो न बात बेबात
*
बात न की तो रूठकर, फेर रही मुँह बात
बात करे सोचे बिना, बेमतलब की बात
*
बात-बात में बढ़ गयी, अनजाने ही बात
किये बात ने वार कुछ, घायल हैं ज़ज्बात
*
बात गले मिल बात से, बन जाती मुस्कान
अधरों से झरता शहद, जैसे हो रस-खान
*
बात कर रही चंद्रिका, चंद्र सुन रहा मौन
बात बीच में की पड़ी, डांट अधिक ज्यों नौन?
*
आँखों-आँखों में हुई, बिना बात ही बात
कौन बताये क्यों हुई, बेमौसम बरसात?
*
बात हँसी जब बात सुन, खूब खिल गए फूल
ए दैया! मैं क्या करूँ?, पूछ रही चुप धूल
*
बात न कहती बात कुछ, रही बात हर टाल
बात न सुनती बात कुछ, कैसे मिटें सवाल
*
बात काट कर बात की, बात न माने बात
बात मान ले बात जब, बढ़े नहीं तब बात
*
दोष न दोषी का कहे, बात मान निज दोष
खर्च-खर्च घटत नहीं, बातों का अधिकोष
*
बात हुई कन्फ्यूज़ तो, कनबहरी कर बात
'आती हूँ' कह जा रही, बात कहे 'क्या बात'
११-१०-२०११
***

गुरुवार, 21 मई 2026

मई २१, सॉनेट, आयुर्वेद, चित्रक, नुस्खे, दोहा, कान, गीत, वास्तु,

 सलिल सृजन मई २१

*
नवगीत
भोर भई चूँ चूँ सुन प्रभु को दे धन्यवाद, भू-नभ-रवि को प्रणाम सुमिर पितर हाथ जोड़। . जो बीता सो बीता, घट रीता रे! आज खेत, गोड़-बीज डाल सींच। श्रम सीकर बहा, बैठ नयन मींच।। फल की चिंता मत कर, पढ़ गीता रे! शोर न कर दुपहर सुन धुन रुचि की, भोजन कर मन को रख शांत-शाद कल पर कम काम छोड़। भोर भई चूँ चूँ सुन प्रभु को दे धन्यवाद, भू-नभ-रवि को प्रणाम सुमिर पितर हाथ जोड़। . जग मीठा खट्टा कड़वा तीखा रे! अपना सपना नपना बना रीत। चादर पर पड़े खींच, रुक न नीत। आशा मत छोड़ वही परिणीता रे! जो मन को रुचती धुन उसको ही रखो याद, कीर्तिवान हो अकाम नाहक क्यों करें होड़। भोर भई चूँ चूँ सुन प्रभु को दे धन्यवाद, भू-नभ-रवि को प्रणाम सुमिर पितर हाथ जोड़। . झट बिसार जीत-हार, जो बीता रे! ले निहार जो पाया बहुत मान। और मिले सोच न दे व्यर्थ जान।। श्वास-आस गति-यति हो संगीता रे! नौ नगद भले न भूल तेरह उधार धूल, मन का संतोष कोष फिक्स डिपॉजिट न तोड़। भोर भई चूँ चूँ सुन प्रभु को दे धन्यवाद, भू-नभ-रवि को प्रणाम सुमिर पितर हाथ जोड़। २१.६.२०२६ ०००
सॉनेट
पेड़ की छाँव
मापनी: २१२-२१२-२१२-२१२
*
बैठिए दो घड़ी पेड़ की छाँव में,
पंछियों की सुनें चहचहाहट जरा,
देख लूँ मैं सपन आपकी ठाँव में,
देखने से अभी मन कहाँ है भरा।
आपके नैन में मैं बसा हूँ विहँस,
नैन में हैं बसे आप मेरे सनम,
दृष्टि बंकिम गई धँस; गया तीर फँस,
पीर हृद में उठी; आँख है मीत नम।
हाथ में हाथ ले हम चलें साथ हो,
ज़िंदगी की डगर पर कदम साथ रख,
दृष्टि नत हो मगर उच्च सिर-माथ हो,
प्रेम प्याला पिएँ विष-अमिय साथ चख।
तोड़ बेड़ी पड़ी जो रही पाँव में,
हम बसें हौसलों के किसी गाँव में।
२१.५.२०२४
***
प्रश्नोत्तर
प्रश्न -
आत्म विश्वास की कमी को कैसे दूर करें?
उत्तर -
दर्पण सम्मुख बैठकर, मिला नैन से नैन।
कहें आप से आप ही, मन मत हो बेचैन।।
किस्मत मेरे हाथ में, बनकर रहे लकीर।
अंकित भाग्य कपाल पर, हूँ सच बहुत अमीर।।
धरती माँ की गोद है, गगन पिता की छाँव।
स्नेहपूर्ण संबंध ही, है मेरा घर-गाँव।।
अपने मन का ब्रह्म मैं, विष्णु देह का सत्य।
तजता शिव बन असत को, मेरी आत्म अनित्य।।
जो वह वह मैं है नहीं, मुझमें प्रभु में भेद।
मुझसे मिलने अवतरे, वह भी करे न खेद।।
अधिक राम से भी रहे सिर्फ राम का दास।
मैं भी हूँ प्रभु से अधिक, मेरा बल विश्वास।।
***
आयुर्वेद, चित्रक
*
चित्रक की दो जातियाँ, श्वेत-रक्त हैं फूल।
भारत लंका बांग्ला, खिले न इसमें शूल।१।
*
कालमूल चीता दहन, अग्नि ब्याल है आम।
बेखबरंदा फारसी, अरब शैतरज नाम।२।
*
चित्रमूल चित्रो कहें, महाराष्ट्र गुजरात।
चित्रा है पंजाब में, लीडवर्ट ही भ्रात।३।
*
प्लंबैगो जेलेनिका, है वैज्ञानिक नाम।
कुल प्लंबैजिलेनिका, नेफ्थोक्विनोन अनाम।४।
*
कोमल चिकनी हरी हों, शाख आयु भरपूर।
जड़ पत्ते अरु अर्क भी, करें रोग झट दूर।५।
*
चीनी लिपिड फिनोल है, संग प्रोटीन-स्टार्च।
संधिशोथ कैंसर हरे, करे पंगु भी मार्च।६।
*
एंटीबायोटिक जड़ें, एंटी ऑक्सीडेन्ट।
करतीं दूर मलेरिया, सचमुच एक्सीलेंट।७।
*
अल्कलाइड प्लंबेंगिन, कैंसर हरता तात।
नेफ्रोटॉक्सिक असर को, सिस्प्लेटिन दे मात।८।
*
प्लंबेगिन अग्न्याशयी, कैंसर देता रोक।
कोलस्ट्राल एलडीएल, कम करता हर शोक।९।
*
पथरी गठिया पीलिया, प्रजनन कैंसर रोक।
किडनी-ह्रदय विकार हर, घाव भरे मत टोंक।१०।
*
छह फुटिया झाड़ीनुमा, पौधा सदाबहार।
तना रहे छोटा हरा, पत्ते लट्वाकार।११।
*
तीन इंच लंबा रहे, एक इंच फैलाव।
अग्रभाग पैना रहे, जड़ के साथ जुड़ाव।१२ ।
*
लंबाई नौ इंच के, नलिकावाले फूल।
गंधहीन गुच्छे खिलें, पुष्पदण्ड हो मूल।१३।
*
लंब-गोल फल में रहे, बीज हमेशा एक।
श्याम-श्वेत बाह्यांsतर, खाएँ सहित विवेक।१४।
*
जड़ भंगुर हों छाल पर, छोटे कई उभार।
स्वाद तीक्ष्ण-कटु चिपचिपे, रोमयुक्त फलदार।१५।
*
है यह ऊष्ण त्रिदोष हर, करे वात को शांत।
कृमिनाशी मल निकाले, पाचन दीपन कांत।१६।
*
कफ-ज्वर बंधक शोथहर, है पौष्टिक-कटु रुक्ष।
श्लेष्मा वमन प्रमेह विष, कुष्ठ मिटाए दक्ष।१७।
*
दुग्ध-रक्त शोधन करे, योनीदोष भी दूर।
गुल्म वायु दीपन अरुचि, मिटे शांति भरपूर।१८।
*
हो जाए नकसीर यदि, शहद-चूर्ण दो ग्राम।
चाट लीजिए तुरत हो, सच मानें आराम।१९।
*
चित्रक-हल्दी-आँवला, अजमोदा-यवक्षार।
तीन ग्राम चूरन बना, दिन में लें दो बार।२० अ।
खाएँ मधु-घृत में मिला, दूर रहे स्वर भेद।
रामबाण है यह दवा, चूक न करिए खेद।२० आ।
*
चित्रक-सेंधा नमक लें, हरड़-पिप्पली संग।
सुबह-शाम दो ग्राम पी, पानी गर्म मलंग।२१ अ।
पचता भोज्य गरिष्ठ भी, मत सँकुचें सरकार।
अग्नि दीप्त हो पच सके, जो खाएँ आहार।२१ आ।
*
ताजी जड़ का चूर्ण लें, नागरमोथे साथ।
वायविडंग न भूलिए, सम मात्रा रख हाथ।२२ अ।
पाँच ग्राम खा जाइए, भोजन करने पूर्व।
पाचन शक्ति दुरुस्त हो, लगती भूख अपूर्व।२२ आ।
*
कल्क सिद्ध घी लीजिए, चित्रक क्वाथ समेत।
भोजन पहले कीजिए, संग्रहणी हो खेत।२३।
*
चित्रक चूर्ण मिटा सके, तिल्ली-सूजन सत्य।
बीस ग्राम घृतकुमारी, गूदे सँग लें नित्य।२४।
*
चित्रक जड़ का चूर्ण लें, तीन बार हर रोज।
प्लीहा रोग मिटे- बढ़े, बल चेहरे का ओज।२५।
*
तक्र सहित दो ग्राम लें, चित्रक त्वक का चूर्ण।
तब ही भोजन कीजिए, अर्श मिटे संपूर्ण।२६।
*
चित्रक-जड़ का चूर्ण लें, मृदा-पात्र में लेप।
दही जमाएँ छाछ पी, अर्श मिटा मत झेंप।२७।
*
चित्रक-जड़ चूरन शहद, चाटें यदि दस ग्राम।
सहज सुखद हो प्रसव अरु, माँ पाए आराम।२८।
*
चित्रक-जड़ कुटकी हरड़, इंद्रजौ और अतीस।
काली पहाड़ जड़ मिलाएँ, सम उन्नीस न बीस।२९ अ।
तीन ग्राम लें चूर्ण नित, सुबह-शाम बिन भूल।
वात रोग से मुक्त हों, मिटे दर्द का शूल।२९ आ।
*
चित्रक जड़ पीपल हरड़, अरु चीनी रेबंद।
काला नमक व आँवला, लें पीड़ा हो मंद।३० अ।
गर्म नीर के साथ लें, पाँच ग्राम हर रात।
आंत-वायु के संग ही, संधिवात की मात।३० आ।
*
चित्रक जड़ ब्राह्मी सहित, वच समान लें पीस।
तीन बार दो ग्राम लें, हिस्टीरिआ मरीज।३१।
*
चित्रक जड़ पीपल मरीच, सौंठ चूर्ण सम आप।
चार ग्राम लें तो मिटे, जल्दी ही ज्वर-ताप।३२।
*
ज्वर में अन्न न खा सके, रक्त संचरण मंद।
टुकड़े चित्रक मूल के, चबा मिले आनंद।३३।
*
छत्रक जड़ रस निर्गुंडी, तीन बार दो ग्राम।
लें प्रसूतिका ज्वर घटे, झट पाएँ आराम।३४ अ।
गर्भाशय देता बहा, दूषित आर्तव दूर।
मिटता मक्क्ल शूल भी, पीड़ा होती दूर।३४ आ।
*
चित्रक छाला दूध-जल, पीस लेपिए आप।
चरम रोग अरु कुष्ठ भी, मिटे घटे संताप।३५ अ।
पुल्टिस बाँधें उठेगा, छाला जब हो ठीक।
दाग दूर हो जाएँगे, कहती आयुष लीक।३५ आ।
*
दूध लाल चित्रक लगा, खुजली पर लें लीप।
मिले शीघ्र आराम अरु, रोग न रहे समीप।३६।
*
सिफलिस-कोढ़ मिटा सके, सूखी जड़ की छाल।
सुबह-शाम त्रै ग्राम लें, चित्रक होगा लाल।३७।
*
पीप बहे लें घाव पर, लेप चित्रकी छाल।
घाव ठीक हो शीघ्र ही, आयुर्वेद कमाल।३८।
*
मूषक ज्वर जाए उतर, तलुए मलिए तेल।
चित्रक छाला चूर्ण सँग, पका न पीड़ा झेल।३९।
*
मात्रा अधिक न लें 'सलिल', विष सम करे अनिष्ट।
मात्रा-विधि हो सही तो, चित्रक हरता कष्ट।४०।
***
गीत
सफर अधूरा लगता है
*
मीत-प्रीत बिन गीत का सफर अधूरा लगता है
*
चरण करें अभिषेक पंथ का
नयन करें नित संग ग्रंथ का
चल गिर उठ बढ़ बिना रुके तू
बिना रुके तू, बिना झुके तू
मोह-छोह बिन रीत का सफर अधूरा लगता है
मीत-प्रीत बिन गीत का सफर अधूरा लगता है
*
मन में मनबसिया बैठा है
चाहे-अनचाहे पैठा है
राधा कैसे कहो निकाले
जब राधा को वही सम्हाले
हार मिले बिन जीत का सफर अधूरा लगता है
मीत-प्रीत बिन गीत का सफर अधूरा लगता है
*
मनमानी कर मन की बातें
मुई सियासत करती घातें
बिना सिया-सत राम नाम ले
भक्ति भूल आसक्ति थाम ले
बिना राग संगीत का सफर अधूरा लगता है
मीत-प्रीत बिन गीत का सफर अधूरा लगता है
२१.५.२०२३
***
मुक्तिका
*
मुश्किल कोई डगर नहीं है
बेरस कोई बहर नहीं है
किस मन में मिलने-जुलने की
कहिए उठती लहर नहीं है
सलिल-नलिन हैं रात-चाँद सम
इस बिन उसकी गुजर नहीं है
हो ऊषा तुम गृहाकाश की
तुम बिन होती सहर नहीं है
हूँ सूरज श्रम करता दिन भर
बिन मजदूरी बसर नहीं है
***
औरत
*
औरत होती नहीं रिटायर
करती रोज पुरुष को टायर
माँ बन आँचल में दुबकाए
बहना बन पहरा दिलवाए
सखी अँगुलि पर नाच नचाए
भौजी ताने नित्य सुनाए
बीबी सहयोगिनी कह आए
पर गृह की स्वामिन बन जाए
बेटी चिंता-फिक्र बढ़ाए
पल-पुस कर झट फुर हो जाए
बहू छीन ले आकर कमरा
वृद्धाश्रम की राह दिखाए
कहो न अबला, नारी सबला
तबला नर को बना बजाए
नर बेचारा समझ रहा यह
तम में आशा दीप जलाए
शारद-रमा-उमा नित पूजे
घर न घाट का पर रह जाए
२१-५-२०२०
***
मुक्तिका: जिंदगी की इमारत
जिंदगी की इमारत में, नींव हो विश्वास की।
प्रयासों की दिवालें हों, छत्र हों नव आस की।
*
बीम संयम की सुदृढ़, मजबूत कॉलम नियम के।
करें प्रबलीकरण रिश्ते, खिड़कियाँ हों हास की।।
*
कर तराई प्रेम से नित, छपाई कर नीति से।
ध्यान धरना दरारें बिलकुल न हों संत्रास की।।
*
रेत कसरत, गिट्टियाँ शिक्षा, कला सीमेंट हो।
फर्श श्रम का, मोगरा सी गंध हो वातास की।।
*
उजाला शुभकामना का, द्वार हो सद्भाव का।
हौसला विद्युतिकरण हो, रौशनी सुमिठास की।।
*
फेंसिंग व्यायाम, लिंटल मित्रता के हों 'सलिल'।
बालकनियाँ पड़ोसी अपनत्व के अहसास की।।
*
वरांडे हो मित्र, स्नानागार सलिला सरोवर।
पाकशाला तृप्ति, पूजास्थली हो सन्यास की।।
***
मुक्तिका
.
शब्द पानी हो गए
हो कहानी खो गए
.
आपसे जिस पल मिले
रातरानी हो गए
.
अश्रु आ रूमाल में
प्रिय निशानी हो गए
.
लाल चूनर ओढ़कर
क्या भवानी हो गए?
.
नाम के नाते सभी
अब जबानी हो गए
.
गाँव खुद बेमौत मर
राजधानी हो गए
.
हुए जुमले, वायदे
पानी पानी हो गए
२१-५-२०१७
...
एक गीत
*
मात्र मेला मत कहो
जनगण हुआ साकार है।
*
'लोक' का है 'तंत्र' अद्भुत
पर्व, तिथि कब कौन सी है?
कब-कहाँ, किस तरह जाना-नहाना है?
बताता कोई नहीं पर
सूचना सब तक पहुँचती।
बुलाता कोई नहीं पर
कामना मन में पुलकती
चलें, डुबकी लगा लें
यह मुक्ति का त्यौहार है।
*
'प्रजा' का है 'पर्व' पावन
सियासत को लगे भावन
कहीं पण्डे, कहीं झंडे- दुकाने हैं
टिकाता कोई नहीं पर
आस्था कब है अटकती?
बुझाता कोई नहीं पर
भावना मन में सुलगती
करें अर्पित, पुण्य पा लें
भक्ति का व्यापार है।
*
'देश' का है 'चित्र' अनुपम
दृष्ट केवल एकता है।
भिन्नताएँ भुला, पग मिल साथ बढ़ते
भुनाता कोई नहीं पर
स्नेह के सिक्के खनकते।
स्नान क्षिप्रा-नर्मदा में
करे, मानें पाप धुलते
पान अमृत का करे
मन आस्था-आगार है।
***
मुक्तिका
*
मखमली-मखमली
संदली-संदली
.
भोर- ऊषा-किरण
मनचली-मनचली
.
दोपहर है जवाँ
खिल गयी नव कली
.
साँझ सुन्दर सजी
साँवली-साँवली
.
चाँद-तारें चले
चन्द्रिका की गली
.
रात रानी न हो
बावली-बावली
.
राह रोके खड़ा
दुष्ट बादल छली
***
(दस मात्रिक दैशिक छन्द
रुक्न- फाइलुन फाइलुन)
२१-५-२०१६
***
अमीर खुसरो के रोचक घरेलू नुस्खे
.
हरड़-बहेड़ा आँवला, घी सक्कर में खाय!
हाथी दाबे काँख में, साठ कोस ले जाय!
.
मारन चाहो काऊ को, बिना छुरी बिन घाव!
तो वासे कह दीजियो, दूध से पूरी खाय!!
.
प्रतिदिन तुलसी बीज को, पान संग जो खाय!
रक्त-धातु दोनों बढ़े, नामर्दी मिट जाय!!
.
माटी के नव पात्र में, त्रिफला रैन में डारी!
सुबह-सवेरे-धोए के, आँख रोग को हारी!!
.
चना-चून के-नोन दिन, चौंसठ दिन जो खाए!
दाद-खाज-अरू सेहुवा-जरी मूल सो जाए!!
.
सौ-दवा की एक दवा, रोग कोई न आवे!
खुसरो-वाको-सरीर सुहावे, नित ताजी हवा जो खावे!!
***
दोहा सलिला- कान
वाद-विवाद किये बिना, करते चुप सहयोग
कान धीर-गंभीर पर, नहीं चाहते शोर
*
कान कतरना चाहती, खुद को स्याना मान
अपने ही माँ-बाप के, 'सलिल' आज सन्तान
*
कान न भरिये किसी के, मत तोड़ें विश्वास
कान-दान मत कीजिए, पायेंगे संत्रास
*
कर्ण न हो तो श्रवण, रण, ज्यामिति शोभाहीन
कर्ण-शूल बेचैन कर, अमन चैन ले छीन
*
कान न हों तो सुन सकें, हम कैसे आवाज?
हो न सके संवाद तो, रुक जाएँ जग-काज
*
कान मकान दूकान से, बढ़ते क्रिया-कलाप
नहीं एक भी हो अगर, जीवन बने विलाप
*
कान-नाक से जुड़ा है, नाज़ुक नाड़ी-तन्त्र
छेद-कीलते विज्ञ जन, स्वस्थ्य रहे तन-यंत्र
*
आँखें चश्मा हीन हों, अगर नहीं हों कान
कान पकड़ चश्मा सजे, मगर न घटता मान
*
कान कटे जिसके लगे, श्रीयुत भी श्री हीन
नकटी शूर्पनखा लगे, नहीं श्रेष्ठ अति दीन
*
कान खींचना ही नहीं, भूलों का उपचार
मार्ग प्रदर्शन भी करें, तब हो बेडा पार
*
कनबहरी करिए नहीं, अवसर जाता चूक
व्यर्थ विवादों की दवा, लेकिन यही अचूक
*
आन गाँव का कनफटा, लगता जोगी सिद्ध
कौन बताये कब कहाँ, रहा मोह में बिद्ध
*
छवि देखें मुख चन्द्र की, कर्ण फूल के साथ
शतदल पाटल मध्य ज्यों, देख मुग्ध शशिनाथ
*
कान खड़े कर सुन रहा, जो न समय की बात
कान बंद कर जो रहा, दोनों की है मात
*
जो जन कच्चे कान के, उनसे रहें सतर्क
अफवाहों पर भरोसा, करें- न मानें तर्क
*
रूप नहीं गुण देखते, जो- वे हैं मतिमान
सुनें सतासत कान पर, दें न असत पर ध्यान
*
सूपे जैसे नख लिये, गई सुपनखा हार
सूप-काट ले गणपति, पुजें सकल संसार
*
आभा बढ़ती रूप की, गह आभामय हार
लेते-देते जो वही, जाते क्यों दिलहार
*
नूतन दाँव अचूक है, पहनाकर भुज-हार
गला दबा सकते 'सलिल', जता-जताकर प्यार
*
तेल कान में डालकर, बैठे सत्तासीन
कौन सुधारे देश को, सब स्वार्थों में लीन
*
स्वर्णहार ले आओ तो, विहँस कंठ में धार
पहना दूँ पल में तुम्हें, झट बाँहों का हार
*
रक्त कमल दल मध्य है, मुक्ता मणि रद-पंक्ति
आप आप पर रीझते, नयन गहें भव-मुक्ति
*
मिले अकेलापन कभी, खुद से खुद कर भेंट
'सलिल' व्यर्थ बिखराव को, होकर मौन समेट
***
षटपदी के रंग नाक के संग
*
नाक के बाल ने, नाक रगड़कर, नाक कटाने का काम किया है
नाकों चने चबवाए, घुसेड़ के नाक, न नाक का मान रखा है
नाक न ऊँची रखें अपनी, दम नाक में हो तो भी नाक दिखा लें
नाक पे मक्खी न बैठन दें, है सवाल ये नाक का, नाक बचा लें
नाक के नीचे अघट न घटे, जो घटे तो जुड़े कुछ राह निकालें
नाक नकेल भी डाल सखे, न कटे जंजाल तो नाक़ चढ़ा लें
२१-५-२०१५
***
वास्तु सूत्र
*
(१ ) भवन के मुख्य द्वार पर किसी भी ईमारत, मंदिर, वृक्ष, मीनार आदि की छाया नहीं पड़नी चाहिए।
(२ ) मुख्य द्वार के सामने रसोई बिलकुल नहीं होनी चाहिए।
(३ ) रसोई घर, पूजा कक्ष तथा शौचालय एक साथ अर्थात लगे हुए न हों। इनमे अंतर होना चाहिए।
(४ ) वाश बेसिन, सिंक, नल की टोंटी, दर्पण आदि उत्तरी या पूर्वी दीवार के सहारे ही लगवाएं।
(५) तिजोरी (केश बॉक्स या सेफ) दक्षिण या पश्चिमी दीवार में लगवाएं ताकि उसका दरवाजा उत्तर या पूर्व में खुले।
(६) भवन की छत एवं फर्श नैऋत्य में ऊँचा रखें एवं शान में नीचा रखें।
(७) पूजा स्थान इस तरह हो कि पूजा करते समय आपका मुँह पूर्व, उत्तर या ईशान (उत्तर-पूर्व) दिशा में हो।
(८) जल स्रोत (नल, कुआँ, ट्यूब वेल आदि), जल-टंकी ईशान में हो।
(९) अग्नि तत्व (रसोई गृह) भूखंड के आग्नेय में हो। चूल्हा, ओवन, बिजली का मीटर आदि कक्ष के दक्षिणआग्नेय में हों।
(१०) नैऋत्य दिशा में भारी निर्माण जीना, ममटी आदि तथा भारी सामान हो। घर की चहार दीवारी नैऋत्य में अधिक ऊँची व मोटी तथा ईशान में दीवार कम नीची व कम मोटी अर्थात पतली हो।
(११) वायव्य दिशा में अतिथि कक्ष, अविवाहित कन्याओं का कक्ष, कारखाने का उत्पादन कक्ष रखें। यहाँ सेप्टिक टैंक बना सकते हैं। टैक्सी सर्विस वाले यहाँ वहां रखें तो सफलता अधिक मिलेगी।
२१-५-२०१३
***
एक दोहा
प्राची से होती प्रगट, खोल कक्ष का द्वार.
अलस्सुबह ऊषा पुलक, गुपचुप झाँक-निहार..
२१-५-२०१२
***
नव गीत:
*
मौन देखकर
यह मत समझो
मुँह में नहीं जुबान...
*
शांति-शिष्टता,
धैर्य-भद्रता,
जीवट की पहचान.
शांत सतह के
नीचे हलचल,
मचल रहे अरमान.
श्वेत-शयन लख
यह मत समझो
रंगों से अनजान.
मौन देखकर
यह मत समझो
मुँह में नहीं जुबान...
*
ऊपर-नीचे
सब जानें पर
ऊँच-नीच से दूर.
दिक्-दिगंत पर
नजर जमाये
आशान्वित भरपूर.
मुस्कानों से
'सलिल' न होगा
पीड़ा का अनुमान.
मौन देखकर
यह मत समझो
मुँह में नहीं जुबान...
*
उत्तर का
प्रत्युत्तर देना
बहुत सहज आसान.
कह न अनर्गल
मौन साधना
क्या जानें नादान?
जो सचमुच
है बड़ा, 'सलिल' वह
नहीं दिखता शान.
मौन देखकर
यह मत समझो
मुँह में नहीं जुबान...
२१-५-२०१०