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कौन, किसे, कैसे समझाये?
सब निज मन से हारे हैं.....
*
इच्छाओं की कठपुतली हम
बेबस नाच दिखाते हैं.
उस पर भी तुर्रा यह
खुद को तीसमारखां पाते हैं.
रास न आये सच कबीर का
हम बुदबुद गुब्बारे हैं...
*
बिजली के जिन तारों से
टकरा पंछी मर जाते हैं.
हम नादां उनका प्रयोगकर
घर में दीप जलाते हैं.
कोई न जाने कब चुप हों-
नाहक बजते इकतारे हैं...
*
पान, तमाखू, ज़र्दा, गुटखा
खुद खरीदकर खाते हैं.
जान हथेली पर लेकर
वाहन जमकर दौड़ाते हैं.
'सलिल' शहीदों के वारिस या
दिशाहीन बंजारे हैं ...
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Acharya Sanjiv Salil
http://divyanarmada.blogspot.com
संजीव जी
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर बधाई, विशेषकर ये पंक्तियाँ
रास न आये सच कबीर का
हम बुदबुद गुब्बारे हैं...
रेखा
आदरणीय सलिल जी,
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर रचना......मन-मोहक , मन-भावन और स्मरणीय बनी रहने वाली !
अशेष सराहना के साथ,
दीप्ति
सुन्दर नवगीत !
जवाब देंहटाएंरास न आये सच कबीर का
हम बुदबुद गुब्बारे हैं........ बहुत सुन्दर !
सादर
प्रताप
आ० आचार्य जी ,
जवाब देंहटाएंहम शहीदों के वारिस नहीं, सचमुच दिशाहीन बंजारे हैं |
इस सच को कविता कुशलता से प्रकट करती है | साधुवाद !
सादर
कमल
बिजली के जिन तारों से
जवाब देंहटाएंटकरा पंछी मर जाते हैं.
हम नादां उनका प्रयोगकर
घर में दीप जलाते हैं.
आ० सलिल जी
वाह --- मार्मिक और सच्चाई की अभिव्यक्ति। बधाई।
सन्तोष कुमार सिंह
नवगीत:
जवाब देंहटाएंदिशाहीन बंजारे हैं....----- सुन्दर सम्बोधन !
संजीव 'सलिल'
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कौन, किसे, कैसे समझाये?
सब निज मन से हारे हैं.....
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इच्छाओं की कठपुतली हम----- सही आकलन
बेबस नाच दिखाते हैं.
उस पर भी तुर्रा यह
खुद को तीसमारखां पाते हैं.---------- वाह !
रास न आये सच कबीर का
हम बुदबुद गुब्बारे हैं...
*
बिजली के जिन तारों से
टकरा पंछी मर जाते हैं.
हम नादां उनका प्रयोगकर
घर में दीप जलाते हैं.
कोई न जाने कब चुप हों------- अटल सत्य
नाहक बजते इकतारे हैं...----- बहुत खूब !
*
पान, तमाखू, ज़र्दा, गुटखा
खुद खरीदकर खाते हैं.
जान हथेली पर लेकर
वाहन जमकर दौड़ाते हैं.
'सलिल' शहीदों के वारिस या----- सही संकेत
दिशाहीन बंजारे हैं ...
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Acharya Sanjiv Salil