गुरुवार, 4 नवंबर 2010

दें उजियारा आत्म-दीप बन : --- संजीव वर्मा 'सलिल'

दें उजियारा आत्म-दीप बन :                                    

--- संजीव वर्मा 'सलिल'

जलकर भी तम हर रहे, चुप रह मृतिका-दीप.
मोती पलते गर्भ में, बिना कुछ कहे सीप.
सीप-दीप से हम मनुज तनिक न लेते सीख.
इसीलिए तो स्वार्थ में लीन पड़ रहे दीख.
दीप पर्व पर हों संकल्पित रह हिल-मिलकर.
दें उजियारा आत्म-दीप बन निश-दिन जलकर.
- छंद अमृतध्वनि

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रचना विधान:

1. पहली दो पंक्तियाँ दोहा: 13- 11 पर यति.

2. शेष 4 पंक्तियाँ: 24 मात्राएँ 8, 8, 8, पर यति.

3. दोहा का अंतिम शब्द तृतीय पंक्ति का प्रथम पद.

4. दोहा का प्रथम शब्द (शब्द समूह नहीं) छ्न्द का अंतिम शब्द हो.

7 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय सलिल जी,
    मैने बहुत ढूँढा, पर मिला नहीं|
    फिर से कोशिस करनी होगी|
    बहरहाल अब आपने काम पर लगा ही दिया, तो ये मन का कीड़ा शांत बैठे भी कैसे|
    स्मृति को टटोला, आपके द्वारा विधान को पढ़ा, कुछ गुना, कुछ बुना तो ये सूझा:-

    अमृत ध्वनि छंद कुंडलिया का ध्वनि आधारित विकसित और अलंकृत रूप है|
    इस में भी ६ पन्क्तियाँ होती हैं|

    पहली दो पंक्तियाँ दोहे के समान १३+११ मात्रा वाली| पहले-तीसरे चरण के अंत में लघु गुरु तथा दूसरे चौथे चरण के अंत में गुरु लघु का विधान दोहे को पूर्णता प्रदान करता है|

    मित्रों से निवेदन है कि दोहे को लयात्मक स्वरूप प्रदान करना अनिवार्य होता है| यह गद्यात्मक नहीं लगना चाहिए| तुलशी, कबीर और रहीम को पढ़ना इस के लिए सब से अच्छा रहेगा, और ये तीनों ही वेब पर अधिकाधिक मात्रा में उपलब्ध भी हैं| हाँ कबीर ने कहीं कहीं दोहे की जगह साखी भी लिखी हैं, जो दोहे जैसी लगती हैं| रहीम के दोहे सबसे ज़्यादा चर्चित रहे हैं|

    बाकी ४ पंक्तियाँ रोला के समान २४ मात्रा वाली, परन्तु यहाँ हर पंक्ति को ८-८ मात्रा के ३ भागों में विभक्त करना होता है| सिवाय इस के, जैसा कि सलिल जी ने भी लिखा है, हर भाग के अंत में यति आना अपेक्षित है|

    अमृत ध्वनि छंद एक ध्वनि प्रधान छंद है| इस को बोलने के समय हमें देखना होता है कि हमारी आवाज़ में ध्वनि गुँजायमान हो रही है कि नहीं| लय और ध्वनि की आवृत्ति इस छंद की विशेषता होती है|

    अब जब कीड़ा कुलबुला ही गया, तो एक छोटा सा प्रयास भी कर लिया है| आचार्य जी कृपया देखें, यह सही है कि नहीं:-

    संशय मन का मीत ना, जानत चतुर सुजान|
    इस में कोई गुण नहीं, ये है अवगुण ख़ान||
    ये है अवगुण ख़ान, करे नुकसान भयानक|
    मान मिटावत, शान गिरावत, द्वेष प्रचारक|
    द्वंद बढ़ावत, चैन नसावत, शांति करे क्षय|
    मन भटकावत, जिय झुलसावत, बैरी संशय||

    आशा है आप को मेरा प्रयास सही लगा होगा| यदि कोई त्रुटि हो तो साधिकार बताने की कृपा करें|
    हाँ, एक बात और साझा करना चाहूँगा| मथुरा वासी लला कवि जी के बाद, इस छंद की रचना बहुत कम ही हुई है|

    गुरुवर श्री 'प्रीतम' जी ने भी 'राष्ट्र हित शतक' के दरम्यान इस छंद की रचना की है| वाचन तो लगभग ना के बराबर ही मालूम पड़ता है| कारण - इस छंद को एक ही साँस में और वो भी सुनने वाले को समझ आ सके, इस तरह बोलने से ही मज़ा आता है| आज के दौर में अगर कोई मित्र इस छंद को बोलने की कोशिस करना चाहे, तो ये उस के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि होगी| मैं हर यथेष्ट मदद करने के लिए तत्पर हूँ|

    एक बार फिर से शुभ दीपावली|

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  2. सीप-दीप से हम मनुज तनिक न लेते सीख. / द्वंद बढ़ावत, चैन नसावत, शांति करे क्षय

    प्रभाकर जी के मतानुसार तो यहाँ 'सकता दोष है. आपका क्या मत है? क्या हिंदी कविताओं में यह दोष मान्य है?

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  3. आचार्य संजीव वर्मा '' सलिल '' जी की और उनकी रचनाओं की जितनी भी प्रशंसा की जाये कम ही होगी. मैं उनकी बहुत कृतज्ञ हूँ और हमेशा रहूँगी...दोहों का जो कुछ भी ज्ञान है, थोड़ा सा मुझे, उसके लिये मैं हमेशा उनकी ऋणी रहूँगी..और मेरा फेसबुक पर आना भी उनकी ही वजह से हुआ..मतलब मुझे कुछ भी पता नहीं था इसके बारे में..सलिल जी ने ही प्रोत्साहित किया..और आज उन्हीं की वजह से मैं फेसबुक पर और यहाँ भी हूँ आप सबके बीच...आदरणीय गुरुदेव, यदि आप यह सब पढ़ रहे हैं तो मैं कहना चाहती हूँ कि मैं आपके चरणों की धूल भी नहीं हूँ..आपको मेरा कोटि-कोटि प्रणाम.

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  4. शन्नो जी! सादर नमन, आप सत्य ही धन्य.
    दोहा ने मोहा जगत, सचमुच छंद अनन्य..

    दी संगति शुभ आपने, मैंने पाया ज्ञान.
    श्रेय मुझे किंचित नहीं, आप गुणों की खान..

    सीख रहा हूँ सभी से, मिटे तनिक अज्ञान.
    रच पाऊँ कुछ सार्थक ऐसा दें वरदान..

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  5. - शन्नो अग्रवालशनिवार, नवंबर 06, 2010 12:40:00 pm

    गुरुवर ना दीजे मुझे, इतना सारा श्रेय
    मैंने कक्षा में झाँका, बिना कोई ध्येय.

    आपकी संगत में भई, चिंता सभी विलीन
    छात्रों संग मिलकर हुई, मैं दोहों में लीन.

    मोती बांटे आपने, सबको एक समान
    मैंने भी ट्राई करी, देकर पूरा ध्यान.

    पत्थर को घिसते रहो, उस पर पड़त निशान
    मैं मूरख वैसी रही, बढ़ा बहुत नहिं ज्ञान.

    'सलिल' आप टीचिंग में, रहे सदा सदभाव
    ज्ञान के दीपक आप हैं, बहुतय महानुभाव.

    - शन्नो अग्रवाल

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  6. बहन भाई मिल बाँटते, बड़ा अनोखा प्यार|
    इस जानिब भी छेड़ दो, कुछिक सनेही तार||

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  7. परस्पर सीख रहे हैं
    गुणीजन!
    आह्लादित है सर्वत्र
    सुन्दर यह आयोजन!!

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