मंगलवार, 31 मई 2011

घनाक्षरी /कवित्त योगराज प्रभाकर


घनाक्षरी /कवित्त 
योगराज प्रभाकर  
*
 भ्रूण हत्या

जैसे बेटा पैदा होना, इक वरदान कहा,
घर में न बेटी होना, एक बड़ा श्राप है !

होती न जो बेटियां तो, होते कैसे बेटे भला
इन्ही की वजह से तो, शिवा है - प्रताप है !

पैदा ही न होने देना, कोख में ही मार देना,
हर मज़हब में ये, घोर महापाप है !

महामृत्युंजय सम, वंश के लिए जो बेटा,
उसी तरह कन्या भी, गायत्री का जाप है !
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(2)
(टीस)

राष्ट्र अपने के लिए, नशा कोढ़ के समान ,
जिसने उजाड़ दिए, लाखों नौजवान हैं !

नशे के गुलाम हुए, भूले इस बात को वो,
उनकी जवानी से ही, भारती की शान हैं !

भूल निज वंश करें, दानवों सी हरकतें
उन्हें बतलाए वे तो, ऋषि की संतान है !

देना होगा हौसला भी, इन्हें समझाना होगा,
हिम्मत करो तो सभी, मंजिलें आसान है
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3 टिप्‍पणियां:

  1. एक योगराज और साथ में प्रभाकर हैं ,
    आपकी हे गुणीश्रेष्ठ ! वाकई क्या बात है !
    छंद के महारथी ! उस्ताद शाइरी के ! गुरू !
    आपमें बताएं और क्या - क्या करामात है ?
    आपके गुणों का क्या बखान करे कोई … अजी
    अरे अरे ! किसकी मजाल है ? औक़ात है ?
    और गुणियों का नाम मिले जहां डाल - डाल ,
    आपका 'राजेन्द्र' वहीं नाम पात - पात है !

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  2. आपकी फराखदिली, देख सदा ऐसे लगे
    आपका ये दिल जैसे, अपना पंजाब है !

    आपने जो हाथ रखा, खादिम की पीठ पर,
    मेरी जिंदगानी का ये, दिलकश बाब है !

    आपकी कलम द्वारा, किया गया ज़िक्र मेरा,
    मुझे अब तक लगे, जैसे कोई खाब है !

    पढ़ा ख़त आपका तो, मुझे पता चला तब ,
    ज़र्रे को बनाया जाता, कैसे आफताब है !

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  3. योगराज-राजेंद्र की, घनाक्षरी हैं ललित,
    मेरा मन पढ़कर, झूम-झूम जाता है.
    स्वाति नक्षत्र में ज्यों, पियू पियू पियू कहाँ?
    टेर-टेर-टेरकर, सारंगा बुलाता है.
    नरमदा नेह की, देव यूँ ही बहे सदा,
    भाट भारती का यही, 'सलिल' मनाता है.
    छत्रपति छंद यह, घनाक्षरी सुनाम है,
    रसिकों के मनुआ को, खूब-खूब भाता है.

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