सोमवार, 16 जुलाई 2018

सूचना: दोहा शतक मंजूषा

- : दोहा शतक मंजूषा: -
विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर के तत्वावधान में दोहा-लेखन तथा दोहाकारों को प्रोत्साहित तथा प्रतिष्ठित करने का उद्देश्य लेकर समकालिक वरिष्ठ तथा नवोदित दोहाकारों के दोहा-शतकों का संकलन शीघ्र ही प्रकाशित किया जा रहा है। १५-१५ दोहकारों को एक-एक भाग में सम्मिलित किया जा रहा है। भाग १ व २ का मुद्रण प्रगति पर है। भाग ३ का संपादन कार्य आधा हो चुका है। दोहा को लेकर इतना विराट अनुष्ठान पहली बार हो रहा है। ये संकलन दोहा का अजायबघर नहीं, क्यारी और उद्यान हैं।  
संकलन में सम्मिलित प्रत्येक दोहाकार के १०० दोहे, चित्र, संक्षिप्त परिचय (नाम, जन्म तिथि व स्थान, माता-पिता, जीवनसाथी व काव्य गुरु के नाम, शिक्षा, लेखन विधा, प्रकाशित कृतियाँ, उपलब्धि, पूरा पता, चलभाष, ईमेल आदि) १० पृष्ठों में प्रकाशित किए जाएँगे। हर सहभागी के दोहों पर संक्षिप्त विमर्शात्मक टीप तथा दोहा पर आलेख भी होगा। संपादन वरिष्ठ दोहाकार आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' द्वारा किया जा रहा है, संपादकीय संशोधन स्वीकार्य हों तो आप सादर आमंत्रित हैं। प्रत्येक सहभागी ३०००/- अग्रिम सहयोग राशि देना बैंक, राइट टाउन शाखा जबलपुर IFAC: BKDN ०८११११९ में संजीव वर्मा के खाता क्रमांक १११९१०००२२४७ में अथवा नकद जमा करें। संकलन प्रकाशित होने पर हर सहभागी को सहभागिता-सम्मान पत्र तथा पुस्तक की ११ प्रतियाँ निशुल्क भेंट की/भेजी जाएँगी। प्राप्त दोहों में आवश्यकतानुसार संशोधन का अधिकार संपादक को होगा। दोहे unicode में भेजने हेतु ईमेल- salil.sanjiv@gmail.com, चलभाष ७९९९५५९६१८, ९४२५१८३२४४ । भारतीय बोलियों / अहिंदी भाषाओँ के दोहे देवनागरी लिपि में आंचलिक शब्दों के अर्थ पाद टिप्पणी में देते हुए भेजें।
अब तक निम्न दोहाकारों के दोहे के दोहे यथावश्यक संशोधित / संपादित तथा सहभागिता निधि प्राप्त हो जाने पर प्रकाशनार्थ अनुमोदित किए जा चुके हैं। वर्ण क्रमानुसार नाम - सर्व श्री / सुश्री / श्रीमती १. अखिलेश खरे 'अखिल', २. अनिल कुमार मिश्र, ३. अरुण शर्मा, ४. आभा सक्सेना 'दूनवी', ५. इंद्रकुमार श्रीवास्तव, ६उदयभानु तिवारी 'मधुकर', ७. ॐ प्रकाश शुक्ल, ८. कांति शुक्ल 'उर्मि', ९. कालिपद प्रसाद, १०. डॉ. गोपालकृष्ण भट्ट 'आकुल', ११. चंद्रकांता अग्निहोत्री', १२. छगनलाल गर्ग 'विज्ञ', १३. छाया सक्सेना 'प्रभु', १४. जयप्रकाश श्रीवास्तव, १५. त्रिभुवन कौल, १६. नीता सैनी, १७. डॉ. नीलमणि दुबे, १८. प्रेमबिहारी मिश्र, १९. बसंत शर्मा, २०. मनोजकुमार शुक्ल, २१. मिथिलेश बड़गैया, २२. रामकुमार चतुर्वेदी, २३. रामलखन सिंह चौहान, २४. रामेश्वरप्रसाद सारस्वत, २५. रीता सिवानी, २६. विजय बागरी, २७. विनोद जैन 'वाग्वर', २८. विश्वंभर शुक्ल २९. श्यामल सिन्हा, ३०. शशि त्यागी, ३१. शुचि भवि, ३२. शोभित वर्मा, ३३. श्रीधर प्रसाद द्विवेदी, ३४. सरस्वती कुमारी, ३५. सुरेश कुशवाहा 'तन्मय', ३६. संतोष नेमा, ३७. डॉ. हरि फैजाबादी, ३८. हिमकर श्याम। निम्न सहयोगियों से प्राप्त दोहे स्वीकृत किये जा चुके हैं, सहभागिता राशि अविलंब जमा करें ताकि प्रकाशनार्थ स्थान आरक्षित  हो सके: १. अरुण अर्णव खरे, २. डॉ. चित्रभूषण श्रीवास्तव 'विदग्ध',  ३. डॉ. जगन्नाथ प्रसाद बघेल, ४महातम मिश्र, ५राजकुमार महोबिया, ६. लता यादव, ७. विनीता श्रीवास्तव, ८. साहबलाल दशरिये। सहभागिता हेतु सहमति व्यक्त कर चुके निम्न दोहाकार १२० दोहे, चित्र, परिचय व सहभागिता निधि शीघ्रादिशीघ्र भेजें। सर्व श्री / सुश्री / श्रीमती १. गोपकुमार मिश्र, २. डॉ. रमन चेन्नई, ३. कृष्णा राजपूत, ४. प्रो. अपूर्व श्रीवास्तव, ५. प्रो. हेमंत पटेल, ६. रमेश विनोदी, ७. सविता तिवारी मारीशस, ८. सुमन श्रीवास्तव. ९. तृप्ति नेमा माहुले, १२. डॉ. वसुंधरा उपाध्याय, १३. पूजा अनिल स्पेन आदि। 
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दोहा लेखन विधान:

१. दोहा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व है कथ्य। कथ्य से समझौता न करें। कथ्य या विषय को सर्वोत्तम रूप में प्रस्तुत करने के लिए विधा (गद्य-पद्य, छंद आदि) का चयन किया जाता है। कथ्य को 'लय' में प्रस्तुत किया जाने पर 'लय'के अनुसार छंद-निर्धारण होता है। छंद-लेखन हेतु विधान से सहायता मिलती है। रस तथा अलंकार लालित्यवर्धन हेतु है। उनका पालन किया जाना चाहिए किंतु कथ्य की कीमत पर नहीं। दोहाकार कथ्य, लय और विधान तीनों को साधने पर ही सफल होता है। 
२. दोहा द्विपदिक छंद है। दोहा में दो पंक्तियाँ (पद) होती हैं। हर पद में दो चरण होते हैं। 
३. दोहा मुक्तक छंद है। कथ्य (जो बात कहना चाहें वह) एक दोहे में पूर्ण हो जाना चाहिए। सामान्यत: प्रथम चरण में उद्भव, द्वितीय-तृतीय चरण में विस्तार तथा चतुर्थ चरण में उत्कर्ष या समाहार होता है। 
४. विषम (पहला, तीसरा) चरण में १३-१३ तथा सम (दूसरा, चौथा) चरण में ११-११ मात्राएँ होती हैं।
५. तेरह मात्रिक पहले तथा तीसरे चरण के आरंभ में एक शब्द में जगण (लघु गुरु लघु) वर्जित होता है। पदारंभ में 'इसीलिए' वर्जित, 'इसी लिए' मान्य। 
६. विषम चरणांत में 'सरन' तथा सम चरणांत में 'जात' से लय साधना सरल होता है है किंतु अन्य गण-संयोग वर्जित नहीं हैं। 
७. विषम कला से आरंभ दोहे के विषम चरण मेंकल-बाँट ३ ३ २ ३ २ तथा सम कला से आरंभ दोहे के विषम चरण में में कल बाँट ४ ४ ३ २ तथा सम चरणों की कल-बाँट ४ ४.३ या ३३ ३ २ ३ होने पर लय सहजता से सध सकती है।
८. हिंदी दोहाकार हिंदी के व्याकरण तथा मात्रा गणना नियमों का पालन करें। दोहा में वर्णिक छंद की तरह लघु को गुरु या गुरु को लघु पढ़ने की छूट नहीं होती।
९. आधुनिक हिंदी / खड़ी बोली में खाय, मुस्काय, आत, भात, आब, जाब, डारि, मुस्कानि, हओ, भओ जैसे देशज / आंचलिक शब्द-रूपों का उपयोग न करें। बोलियों में दोहा रचना करते समय उस बोली का यथासंभव शुद्ध रूप व्यवहार में लाएँ।
१०. श्रेष्ठ दोहे में अर्थवत्ता, लाक्षणिकता, संक्षिप्तता, मार्मिकता (मर्मबेधकता), आलंकारिकता, स्पष्टता, पूर्णता, सरलता तथा सरसता होना चाहिए।
११. दोहे में संयोजक शब्दों और, तथा, एवं आदि का प्रयोग यथासंभव न करें। औ' वर्जित 'अरु' स्वीकार्य। 'न' सही, 'ना' गलत। 'इक' गलत।
१२. दोहे में यथासंभव अनावश्यक शब्द का प्रयोग न हो। शब्द-चयन ऐसा हो जिसके निकालने या बदलने पर दोहा अधूरा सा लगे।
१३. दोहा में विराम चिन्हों का प्रयोग यथास्थान अवश्य करें।
१४. दोहे में कारक (ने, को, से, के लिए, का, के, की, में, पर आदि) का प्रयोग कम से कम हो।
१५. दोहा सम तुकांती छंद है। सम चरण के अंत में सामान्यत: वार्णिक समान तुक आवश्यक है। संगीत की बंदिशों, श्लोकों आदि में मात्रिक समान्त्तता भी राखी जाती रही है। 
१६. दोहा में लय का महत्वपूर्ण स्थान है। लय के बिना दोहा नहीं कहा जा सकता। लयभिन्नता स्वीकार्य है लयभंगता नहीं 
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मात्रा गणना नियम
१. किसी ध्वनि-खंड को बोलने में लगनेवाले समय के आधार पर मात्रा गिनी जाती है।
२. कम समय में बोले जानेवाले वर्ण या अक्षर की एक तथा अधिक समय में बोले जानेवाले वर्ण या अक्षर की दो मात्राएँ गिनी जाती हैंं। तीन मात्रा के शब्द ॐ, ग्वं आदि संस्कृत में हैं, हिंदी में नहीं।
३. अ, इ, उ, ऋ तथा इन मात्राओं से युक्त वर्ण की एक मात्रा गिनें। उदाहरण- अब = ११ = २, इस = ११ = २, उधर = १११ = ३, ऋषि = ११= २, उऋण १११ = ३ आदि।
४. शेष वर्णों की दो-दो मात्रा गिनें। जैसे- आम = २१ = ३, काकी = २२ = ४, फूले २२ = ४, कैकेई = २२२ = ६, कोकिला २१२ = ५, और २१ = ३आदि।
५. शब्द के आरंभ में आधा या संयुक्त अक्षर हो तो उसका कोई प्रभाव नहीं होगा। जैसे गृह = ११ = २, प्रिया = १२ =३ आदि।
६. शब्द के मध्य में आधा अक्षर हो तो उसे पहले के अक्षर के साथ गिनें। जैसे- क्षमा १+२, वक्ष २+१, विप्र २+१, उक्त २+१, प्रयुक्त = १२१ = ४ आदि।
७. रेफ को आधे अक्षर की तरह गिनें। बर्रैया २+२+२आदि।
८. अपवाद स्वरूप कुछ शब्दों के मध्य में आनेवाला आधा अक्षर बादवाले अक्षर के साथ गिना जाता है। जैसे- कन्हैया = क+न्है+या = १२२ = ५आदि।
९. अनुस्वर (आधे म या आधे न के उच्चारण वाले शब्द) के पहले लघु वर्ण हो तो गुरु हो जाता है, पहले गुरु होता तो कोई अंतर नहीं होता। यथा- अंश = अन्श = अं+श = २१ = ३. कुंभ = कुम्भ = २१ = ३, झंडा = झन्डा = झण्डा = २२ = ४आदि।
१०. अनुनासिक (चंद्र बिंदी) से मात्रा में कोई अंतर नहीं होता। धँस = ११ = २आदि। हँस = ११ =२, हंस = २१ = ३ आदि।
मात्रा गणना करते समय शब्द का उच्चारण करने से लघु-गुरु निर्धारण में सुविधा होती है। इस सारस्वत अनुष्ठान में आपका स्वागत है। कोई शंका होने पर संपर्क करें। ***

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