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सोमवार, 10 जुलाई 2017

दोहा

: विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर :
गुरु पूर्णिमा पर दोहोपहार 
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नहीं रमा का, दिलों पर, है रमेश का राज।
दौड़े तेवरी कार पर, पहने ताली ताज।।
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आ दिनेश संग चंद्र जब, छू लेता आकाश।
धूप चाँदनी हों भ्रमित, किसको बाँधे पाश।।
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श्री वास्तव में साथ ले, तम हरता आलोक।
पैर जमाकर धरा पर, नभ हाथों पर रोक।।
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चन्द्र कांता खोजता, कांति सूर्य के साथ।
अग्नि होत्री सितारे, करते दो दो हाथ।।
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देख अरुण शर्मा उषा, हुई शर्म से लाल।
आसमान के गाल पर, जैसे लगा गुलाल।।
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खिल बसन्त में मंजरी, देती है पैगाम।
देख आम में खास तू, भला करेंगे राम।।
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जो दे सबको प्रेरणा, उसका जीवन धन्य।
गुप्त रहे या हो प्रगट, है अवदान अनन्य।।
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जो दे सबको प्रेरणा, उसका जीवन धन्य।
गुप्त रहे या हो प्रगट, है अवदान अनन्य।।
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वही पूर्णिमा निरूपमा, जो दे जग उजियार।
चंदा तारे नभ धरा, उस पर हों बलिहार।।
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प्रभा लाल लख उषा की, अनिल रहा है झूम।
भोर सुहानी क्यों हुई, किसको है मालूम?
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श्वास सुनीता हो सदा, आस रहे शालीन।
प्यास पुनीता हो अगर, त्रास न कर दे दीन।।
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भाव अल्पना डालिए, कर कल्पना नवीन।
शब्दों का ऐपन सरस, बिम्ब-प्रतीक नवीन।।
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हीरा लाल न जोड़ते, लखे नेह अनिमेष।
रहे विनीता मनीषा, मन मोहे मिथलेश।।
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जिया न रज़िया बिन लगे,बेकल बहुत दिनेश।
उषा दुपहरी साँझ की, आभा शेष अशेष।।
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कांता-कांति न घट सके, साक्षी अरुण-उजास।
जय प्रकाश की हो सदा, वर दे इंद्र हुलास ।।
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